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Friday, January 22, 2016

फिल्‍म समीक्षा : एयरलिफ्ट

मानवीय संवेदना से भरपूर

-अजय ब्रह्मात्‍मज
हिंदी फिल्‍में आम तौर फंतासी प्रेम कहानियां ही दिखाती और सुनातीं हैं। कभी समाज और देश की तरफ मुड़ती हैं तो अत्‍याचार,अन्‍याय और विसंगतियों में उलझ जाती हैं। सच्‍ची घटनाओं पर जोशपूर्ण फिल्‍मों की कमी रही है। राजा कृष्‍ण मेनन की एयरलिफ्ट इस संदर्भ में साहसिक और सार्थक प्रयास है। मनोरंजन प्रेमी दर्शकों को थोड़ी कमियां दिख सकती हैं,पर यह फिल्‍म से अधिक उनकी सोच और समझ की कमी है। फिल्‍में मनोरंजन का माध्‍यम हैं और मनोरंजन के कई प्रकार होते हैं। एयरलिफ्ट जैसी फिल्‍में वास्‍तविक होने के साथ मानवीय संवेदना और भावनाओं की सुंदर अभिव्‍यक्ति हैं।
एयरलिफ्ट 1990 में ईराक-कुवैत युद्ध में फंसे 1,70,000 भारतीयों की असुरक्षा और निकासी की सच्‍ची कहानी है। (संक्षेप में 1990 मेंअमेरिकी कर्ज में डूबे ईराक के सद्दाम हुसैन चाहते थे कि कुवैत तेल उत्‍पादन कम करे। उससे तेल की कीमत बढ़ने पर ईराक ज्‍यादा लाभ कमा सके। ऐसा न होने पर उनकी सेना ने कुवैत पर आक्रमण किया और लूटपाट के साथ जानमान को भारी नुकसान पहुंचाया। कुवैत में काम कर रहे 1,70,000 भारतीय अचानक बेघर और बिन पैसे हो गए। ऐसे समय पर कुवैत में बसे कुछ भारतीयों की मदद और तत्‍कालीन विदेश मंत्री इंद्र कुमार गुजराल की पहल पर एयर इंडिया ने 59 दिनों में 488 उड़ानों के जरिए सभी भारतीयों की निकासी की। यह अपने आप में एक रिकार्ड है,जिसे गिनीज बुक में भी दर्ज किया गया है।) एयरलिफ्ट के नायक रंजीत कटियाल वास्‍तव में कुवैत में बसे उन अग्रणी भारतीयों के मिश्रित रूप हैं। राजा कृष्‍ण मेनन ने सच्‍ची घटनाओं को काल्‍पनिक रूप देते हुए भी उन्‍हें वास्‍विक तरीके से पेश किया है। चरित्रों के नाम बदले हैं। घटनाएं वैसी ही हैं। दर्शक पहली बार बड़े पर्दे पर इस निकासी की रोमांचक झलक देखेंगे। निर्देशक और उनके सहयोगियों तब के कुवैत को पर्दे पर रचने में सफलता पाई है। उल्‍लेखनीय है कि उन्‍होंने यह सफलता सीमिज बजट में हासिल की है। हालीवुड की ऐसी फिल्‍मों से तुलना न करने लगें,क्‍योंकि उन फिल्‍मों के लिए बजट और अन्‍य संसाधनों की कमी नहीं रहती।
एयरलिफ्ट रंजीत कटियाल,उनकी पत्‍नी अमृता और बच्‍ची के साथ उन सभी की कहानी है,जो ईराक-कुवैत युद्ध में नाहक फंस गए थे। शातिर बिजनेसमैन रंजीत के व्‍यक्तित्‍व और सोच में आया परिवर्त्‍तन पत्‍नी तक को चौंकाता है। वह समझती है कि उसका पति बीवी-बच्‍ची की जान मुसीबत में डाल कर मसीहा बनने की कोशिश कर रहा है। क्रूर,अमानवीय और हिंसक घटनाओं का चश्‍मदीद गवाह होने पर रंजीत का दिल पसीज जाता है। कुवैत से खुद निकलने की कोशिश किनारे रह जाती है। वह देशवासियों की मुसीबत की धारा में बहने लगता है। हम जिसे देशभक्ति कहते ह,वह कई बार अपने देशवासियों की सुरक्षा की चिंता से पैदा होता है। दैनिक जीवन में आप्रवासी भारतीय सहूलियतों और कमाई के आदी हो जाते हैं। कभी ऐसी क्राइसिस आती है तो देश याद आता है। एयरलिफ्ट में निर्देशक ने अप्रत्‍यक्ष तरीके से सारी बातें कहीं हैं। उन्‍होंने देश के राजनयिक संबंध और राजनीतिक आलस्‍य की ओर भी संकेत किया है। कुवैत में अगर रंजीत थे तो देश में कोहली भी था,जिसका दिल भारतीयों के लिए धड़कता था।एयरलिफ्ट देशभक्ति और वीरता से अधिक मानवता की कहानी है,जो मुश्किल स्थितियों में आने पर मनुष्‍य के भाव और व्‍यवहार में दिखता है।
एयरलिफ्ट में अक्षय कुमार ने मिले अवसर के मुताबिक खुद का ढाला और रंजीत कटियाल को जीने की भरसक सफल कोशिश की है। उन्‍हें हम ज्‍यादातर कामेडी और एक्‍शन फिल्‍मों में देखते रहे हैं। एयरलिफ्टमें वे अपनी परिचित दुनिया से निकलते हैं और प्रभावित करते हैं। समर्थ व्‍यक्ति की विवशता आंदोलित करती है। फिल्‍म के कुछ दृश्‍यों में उनके यादगार एक्‍सप्रेशन हैं। बीवी अमृता की भूमिका में निम्रत कौर के लिए सीमित अवसर थे। उन्‍होंने मिले हुए दृश्‍यों में अपनी काबिलियत दिखाई है। पति के विरोध से पति के समर्थन में आने की उनकी यह यात्रा हृदयग्राही है। अस फिल्‍म में इनामुलहक ने ईराकी सेना के कमांडर की भूमिका को जीवंत कर दिया है। भाषा और बॉडी लैंग्‍वेज को चरित्र के मुताबिक पूरी फिल्‍म में कायदे से निभा ले जाने में कामयाब हुए हैं। छोटी भूमिकाओं में आए किरदार भी याद रह जाते हैं।
एयरलिफ्ट की खूबी है कि यह कहीं से भी देशभक्ति के दायरे में दौड़ने की कोशिश नहीं करती। हां,जरूरत के अनुसार देश,राष्‍ट्रीय ध्‍वज,भारत सरकार सभी का उल्‍लेख होता है। एक खास दृश्‍य में झंडा देख कर हमें उस पर गुमान और भरोसा भी होता है। यह फिल्‍म हमें अपने देश की एक बड़ी घटना से परिचित कराती है।
अवधि-124 मिनट
स्‍टार-चार स्‍टार

Monday, January 18, 2016

अच्‍छा लगा अक्षय का साथ - निम्रत कौर


-अजय ब्रह्मात्‍मज
निम्रत कौर ने लंचबाक्‍स के बाद कोई फिल्‍म साइन नहीं की। इस बीच में उन्‍होंने अमेरिकी पॉलिटिकल थ्रिलर होमलैंड में काम किया। हिंदी में वह मनपसंद फिल्‍म के इंतजार में रही। आखिरकार उन्‍हें एयरलिफ्ट मिली। उसके बाद अजहर की भी बात चली,लेकिन किसी वजह से वह उस फिल्‍म से अलग हो गईं। एयरलिफ्ट में वह अक्षय कुमार के साथ हैं। इस फिल्‍म के लिए उनके चुनाव में दैनिक जागरण की अप्रत्‍यक्ष भूमिका है। दरअसल 2014 के पांचवें जागरण फिल्‍म फेस्टिवल के उद्घाटन समारोह में अक्षय कुमार और निम्रत कौर की पहली मुलाकात हुई थी। अक्षय ने कहा था कि हम साथ काम करेंगे,जबकि निम्रत ने समझा था कि यह महज औपचारिक आश्‍वासन होगा। अभी दोनों की फिल्‍म एयरलिफ्ट रिलीज हो रही है।

-कैसे आई एयरलिफ्ट आपके पास?
0 एयरलिफ्ट मेरे पास 2014 के अंत में आई थी।  निखिल आडवाणी ने मुझे कॉल किया। उन्होंने मुझे स्क्रिप्ट बताई। उन्होंने एक और दिलचस्प बात बताई। उन्होंने कहा कि मेरे दिमाग में एक पोस्टर है। उसमें अक्षय और निमरत साथ में हैं। मैं तुम दोनों को लेकर उत्साहित हूं। मुझे आप दोनों के बीच खास केमिस्ट्री दिख रही है। मुझे यह सुन कर बहुत अच्छा लगा था।

 -निखिल ने आपके बारे में सोचा। स्क्रिप्ट में अपने लिए क्या उम्मीद कर रही थीं?
0 सच कहूं तो अक्षय के साथ काम करना मेरे लिए दिलचस्प था। मेरी दूसरी फिल्म के लिए अलग तरह के हालात थे। मैं जिस स्पेस से आती हूं, उसे स्वंतत्र सिनेमा कहा जाता है। इस फिल्म का विषय गंभीर है। मेरी पिछली फिल्म भी गंभीर विषय पर थी। दर्शकों को अगली फिल्म में भी वैसी ही उम्मीद होती है। यह कहानी हीरो केंद्रित है। एक ही इंसान के ईद-गिर्द घूमती रहती है। मैं उनकी पत्नी के किरदार में हूं। यह वैसा किरदार नहीं है,जो कहानी में नया मोड़ लाए। फिर भी उसके अपने संघर्ष हैं,जो मेरे लिए रोचक है। उसे लगता है कि पति हीरो बन रहा है तो हमारी सुरक्षा दांव पर लगेगीं। फिल्म में धीरे-धीरे उसका दिल बदलता है। दिलचस्प सफर है मेरा।

-आप के किरदार का नाम क्या है।
0 अमृता कटियाल। पहले किरदार का नाम कुछ और था। मुझे बताया गया कि पंजाबी कपल है। फिर मैंने यह नाम चुना। मुझे यह नाम पंजाबी सा लगता है। पहले मेरे किरदार का नाम दिव्या था। मुझे दिव्या पंजाबी नाम नहीं लगता है। नाम से जुड़ना रोचक होता है। मजे की बात होती है कि मेरे लिए हमेशा अपने किरदार का नाम जानना दिलचस्प होता है। दूसरे नाम से जब मुझे पुकारा जाता है तो बढ़िया लगता है। मेरा बस चले तो अपने सारे किरदारों के नाम खुद चुना करूं।

-किस तरह की हाउस वाइफ का किरदार निभा रही है?
0 मैं पति से असहमत रहती हूं। मैंने रंजीत कटियाल की एक अलग साइड देखी है। वह बहुत ही मतलबी किस्म के इंसान हैं। अपने काम को कैसे आगे ले जाने की फिक्र में लगे रहते हैं। कुवैत के बहुत बड़े बिजनेसमैन हैं। शुरू में रंजीत को ऐसा दिखाया गया है कि वह भारत से जुड़ा हुआ नहीं है। एक हालात उन्हें देशभक्त बना देती है। इतनी बड़ी घटना को वह खुद संभालता है। अमृता को पहले यकीन नहीं होता कि वह सचमुच दूसरों के लिए कुछ कर रहे हैं। वह जानना चाहती है कि सच्ची बात क्या है?
-कितना लंबा और कीमती रहा यह इंतजार? आपके दर्शक आपको पर्दे पर देखना चाहते थे?
0 यह तो फिल्म देखने के बाद पता चलेगा। अब तक की प्रतिक्रिया अच्छी है। हमें साथ देखकर लोग पसंद कर रहे हैं। अक्षय के साथ काम करना आपको कहीं और ले जाता है। हमें प्रोमो में पसंद किया जा रहा है,जो उत्साहित करता है। मेरे हिसाब से इतना इंतजार मैंने नहीं किया । यह जानबूझ कर नहीं होता है। 2014 में मैं होमलैंड में व्यस्त रही। उसके बाद डेट की समस्या रही। कुछ ना कुछ होता रहा। मैं फिल्‍में नहीं कर पाई।

-निम्रत इस वक्त करियर में क्या करना चाहती है?
0 मैं नहीं जानती कि किस तरह की फिल्म करना चाहती हूं। कुछ भी ऐसा,जिसे करने पर क्रिएटिव मजा आए। वह कमर्शियल भी हो सकता है। या कुछ और। कुछ ऐसा जो मैंने कभी नहीं किया हो। जैसे कि कॉमेडी। एक बेहतरीन फन मस्ती वाली फिल्म। हां, तो मैं निजी तौर पर मस्ती वाला काम करना चाहती हूं।

-अक्षय कुमार के साथ कैसा अनुभव रहा?
0 अक्षय से मेरा मिलना जागरण फिल्म फेस्टिवल में हुआ था। हम स्टेज पर साथ बैठे हुए थे। उस दिन उनसे एक अनौपचारिक वाइब आ रही थी। वह अपने स्टारडम को लेकर बचाव में रहते हैं। वह ऐसा सोचते हैं कि उन तक पहुंचना दूसरे व्यक्ति के लिए मुश्किल ना हो। वह इसके लिए मिलने के थोड़ी देर बाद कुछ कर देते हैं,जिस से आपको समझ में आ जाए कि उनसे बात करना आसान है। हम उस दिन लिफ्ट में साथ में नीचे आए थे। हंसी-मजाक कर रहे थे। उन्होंने बड़े प्यार से बात की थी। उन्होंने लंचबाक्स भी देखी थी। अच्छी मुलाकात रही। उसके बाद फिल्म फाइनल होने के बाद हम मिले। उनका सेंस ऑफ हयूमर गजब का है। हम पंजाबी में बातें करते हैं। मातृभाषा में किसी से बात करना हमेशा सुखद होता है। वह खरी पंजाबी बोलते हैं।

-कभी ऐसा हुआ कि आपने उन्हें मुश्किल हालात में डाल दिया हो।
0 जी नहीं। ऐसा मौका नहीं मिला।

- राजा मेनन कैसे निर्देशक हैं? मैंने उनकी काफी तारीफ सुनी है?
0 हां। वह अच्छे इंसान हैं। वह बहुत कॉफी पीते हैंं। हर वक्त ब्लैक कॉफी पीते रहते हैं। उनका सहज ज्ञान और निरीक्षण बढ़िया है। यह उनकी यूए पी है। वह जान लेते हैं कि सामने वाला क्या सोच रहा है। वह कई बार मुझे बॉडी कंट्रोल करना बता देते थे। यहां पर यह पार्ट कंट्रोल करके देखे।
-होमलैंड की कैसी प्रतिक्रिया रही? मुझे लगता है कि आप हो या इर फान या प्रियंका चोपड़ा...आप सभी को यथोचित सम्‍मान अपने देश में नहीं मिला,जबकि आप तीनों ने विदेशों में जगह बनाई।
0 हां सर यह इसलिए है कि भारतीय दर्शक क्वांटिको और होमलैंड के बारे में नहीं जानता। लोग हमें और वहां के हमारे काम को नहीं जानते। उनके लिए हमारे काम का कोई मायने नहीं है। मैं प्रेस मीट में जाती हूं। वहां पर बी होमलैंड का जिक्र नहीं होता है। मुझे बुरा नहीं लगता।

-यह सवाल इसलिए भी बनता है कि आप तीनों आउटसाइडर हैं। आप तीनों ने बाहर से आकर अपना मुकाम बनाया है। 
0 सच कहूं तो मैं अपने आप को दूर ही रखती हूं। मैं कभी अंदर घुसने की कोशिश नहीं करती हूं। साइड में अपना काम करती रहती हूं। वह मेरे लिए फायदेमंद होगा या नहीं,पता नहीं?

Monday, January 4, 2016

उस साहस को सलाम : अक्षय कुमार




-अजय ब्रह्मात्‍मज
सन् 1990। 13 अगस्‍त से 11 अक्‍टूबर,1990 ।
1990 में कुवैत में ईराक ने घुसपैठ की। ईराक-कुवैत के इस युद्ध में वहां रह रहे भारतीय फंस गए थे। हालांकि तत्‍कालीन विदेश मंत्री आई के गुजराल ने ईराक के राष्‍ट्रपति से मिलकर भारतीयों के सुरक्षित निकास की सहमति ले ली थी,लेकिन समस्‍या थी कि कैसे कुवैत के विभिन्‍न्‍ इलाकों से भारतीयों को अमान लाया जाए और फिर उन्‍हें मुंई तक की एयरलिफ्ट दी जाए। ऐसे संगीन वक्‍त में भारतीय मूल के रंजीत कटियाल ने खास भूमिका निभायी। खुद को भारतीय से अधिक कुवैती समझने वाले रंजीत कटियाल ने मुसीबत के मारे भारतीयों को सु‍रक्षित मुंबई पहुंचाने की जिममेदारी ली। उनकी मदद से 56 दिनों में 1,11,711 भारतीयों की निकासी मुमकिन हो सकी। दुनिया की इस सबसे बड़ी निकासी और उसमें रंजीत कटियाल की भूमिका के बारे में अधिक जानकारी नहीं मिलती। कहते हैं अमेरिकी दबाव में इस घटना और समाचार को दबा दिया गया। 25 सालों के बाद राजा कृष्‍ण मेनन ने रंजीत कटियाल की जिंदगी और मातृभूमि के प्रति प्रेम के इस साहिसक अभियान को एयरलिफ्ट के रूप में पर्दे पर पेश कर रहे हैं। इसमें रंजीत कटियाल की भूमिका अक्षय कुमार निभा रहे हैं।
-अभी आप की एयरलिफ्ट आ रही है। हम लगातार आप को भिन्‍न भूमिकाओं में देख रहे हैं। यह किसी रणनीति के तहत है क्‍या ?
0 जी,ऐसा ही चल रहा है। रॉ आफिसर,कॉन आर्टिस्‍ट,नेवी ऑफिसर,हाउसफुल3,रुस्‍तम और अभी एयरलिफ्ट जैसी फिलमें कर रहा हूं। आप किसी को वर्सेटाइल एक्‍टर क्‍यों कहते हैं ? हमें ऐसे मौके मिलते हैं। हम अभिनय की वैरायटी दिखा सकते हैं। पिछले छह सालों से ऐसा ही चल रहा है।मैं तो कहता हूं कि अकेला मैं ही ऐसी भूमिकाएं कर रहा हूं। यहां से वहां और वहां से यहां जाने-आने में मुझे दिक्‍कत नहीं होती। एयरलिफ्ट मेरे लिए अलग अनुभव है।
-क्‍या है एयरलिफ्ट’?
0 यह सच्‍ची घटना पर आधारित फिल्‍म है। जब यह स्क्रिप्‍ट सुनाई गई थी तो मुझे खुद नहीं पता था कि कुवैत में ऐसा कुछ हुआ था। 2 अगस्‍त को ईराक के सद्दाम हुसैन ने कुवैत में घुसपैठ की। हाहाकार मच गया था। वहां के भारतीय समझ नहीं पा रहे थे कि वे क्‍या करें और कहां जाएं ? लूटमार मची हुई थी। सभी सड़क पर आ गए थे। एक लाख से ज्‍यादा भारतीयों की जिंदगी और भविष्‍य का सवाल था। बैंक में रखे पैसे एक झटके में शून्‍य हो गया। रात को अटैक हुआ और सुबह आप अमीर से फकीर हो गए। सब कुछ बदल गया।
-आप को कैसी तैयारी करनी पड़ी ? एयरलिफ्ट का नायक कौन है ?
0 कैरेक्‍टर स्‍केच और लुक तो निर्देशक अपनी टीम के साथ तैयार करते हैं। इस फिल्‍म की कहानी से मुझे बलराज शाहनी की फिल्‍म वक्‍त की याद आई। उसमें भूकंप में सब कुछ बर्बाद हो जाता है। मुझे यही डर रहता है कि हम इतनी मेहनत से सब जोड़ते और जमा करते हैं और प्रकृति या मनुष्‍य एक झटके में सब खत्‍म कर देते हैं। अभी हम यहां बैठे हैं(अक्षय कुमार का आवास और दफ्तर जुहू में समुद्र के किनारे है।) और सुनामी आ जाए। मौका भी नहीं मिलेगा। हर सुबह उठ कर यही प्रार्थना करता हूं कि प्रकृति नाराज न हो। सब कुछ खो जाने का भाव मैं समझ सकता हूं। मैं कुवैत से आए लोगों से मिला। उनके किस्‍से सुने। इतने सालों के बाद भी बताते समय उनकी आंखों में आंसू आ जाते थे। निकासी के लिए जरूरी डाक्‍यूमेंट यानी पासपोर्ट आदि नहीं थे उनके पास। वैसे लाखों बदहवास लोगों की निकासी में रंजीत कटियाल ने मदद की थी। हम इस फिल्‍म के अंत में उनके बारे में बताएंगे। हम उनकी तस्‍वीर भी देंगे।
-क्‍या हुआ था और रंजीत कटियाल ने क्‍या किया था?
0 यह तो ऐतिहासिक घटना है। कुवैत में ईराक की घुसपैठ के बाद भारतीयों की निकासी में रंजीत कटियाल ने अग्रणी भूमिका निभायी थी। युद्ध के उस माहौल में सारे इंतजाम करना और उन पर नजर रखना। 56 दिनों तक यह काम चला। हाल ही में यमन में कुछ भारतीय फंसे थे तो ऐसी निकासी की गई थी। कुवैत की निकासी का वर्ल्‍ड रिकार्ड है और इसे अंजाम देने में रंजीत कटियाल की बड़ी भूमिका रही है। यह आसान नहीं है। जब गोलियां उड़ रही हों तो बस एक गोली ही तो लगनी है। रंजीत के साहस ने मुझे प्रभावित किया। मुझे लगता है कि इस हादसे और रंजीत की बहादुरी को टेक्‍स्‍ट बुक में लाना चाहिए। रजीत कटियाल ने जान की परवाह नहीं की। उसने ईराकी अधिकारियों से तालमेल बिठा कर अपने रसूख का इस्‍तेमाल कर भारतीयों को सुरक्षित निकासी दी।
-बहुत ही मुश्किल काम और माहौल रहा होगा ?
0 कुछ हल्‍के प्रसंग भी हैं। भारतीयों की पहचान के लिए ईराकी सैनिक उनसे कहते थे कि हिंदी फिल्‍म के गाने सुनाओ। रंगरूप से कुवैती और भारतीय एक जैसे लगते हैं। इंटरेस्टिंग स्‍टोरी है।
- आप की सहभागिता किन स्‍तरों पर है ?
0 एक्टिंग के साथ मैं इसका एक निर्माता भी हूं। अभी तो हर फिल्‍म के निर्माण में मेरी सहभागिता रहती है। मेरी एक कंपनी केप ऑफ गुड फिल्‍म्‍स के बैनर में है यह फिल्‍म। ानौ साल पुरानी कंपनी है।
- इस फिल्‍म के पहले लुक में आप का पहनावा और खड़े होने के अंदाज में ही भिन्‍नता झलकती है। किसी किरदार को निभाने में ऐसे बदलाव सेक कितनी मदद मिलती है ?
0 पहनावे और लुक के बदलाव से फर्क पड़ता है। पूरा मिजाज ही बदल जाता है। अभी मैं ट्रैक पैंट में हूं तो उछलने और छलांग मारने का मन कर रहा है। बेल्‍ट और टाई काते ही आदमी बदल जाता है। बिजनेस सोचने लगता है। चेहरे पर दाढ़ी-मूंछ आ जाए। आप पगड़ी बांध लें। उस समय आईने में खुद को देखते ही बदलाव की प्रक्रिया आरंभ हो जाती है। पहनावे और लुक के साथ माहौल का भी महत्‍व होता है। हम तो एहसानमंद हैं रसल खेमा के राज परिवार को धन्‍यवाद देना चाहूंगा। उन्‍होंने हमारी पूरी मदद की। हम ने उसे ही कुवैत बनाया है। उन्‍होंने लॉजिस्टिक सुविधाएं भी दीं।
- राजा मेनन नए डायरेक्‍टर हैं। उनके साथ कैसा अनुभव रहा ?
0 मैंने अभी तक 20-22 नए डायरेक्‍टरों के साथ तो काम किया ही होगा। राजा ने पहले ऐड फिल्‍में बनाई हैं। समझदार हैं,तभी तो उन्‍होंने ऐसा विषय लिया।
- आप स्‍वयं अनुशासित हैं और पूरी यूनिट को भी वैसे ही रखते हें।
0 मैंने यह फिल्‍म 32 दिनों में पूरी की है। मैं 250-300 दिनों की फिल्‍में नहीं कर सकता। बेबी 42 दिनों में बनी थी। मेरी फिल्‍मों में इतने दिन ही लगते हैं। मैं संडे को काम नहीं करता। सैटरडे को हाफ डे काम करता हूं। हर तीन महीने के बाद सात दिनों की छुट्टी लेता हूं। साल के डेढ़ महीने छुट्टी करता हूं। घर के ऊपर ऑफिस है। कहीं जाना नहीं पड़ता। ऑफिस में तामझाम नहीं है। ऑफिस का प्राकृतिक माहौल है। सामने समुद्र है। घर या ऑफिस को म्‍यूजियम नहीं बनाया है।
- फिल्‍म में पत्‍नी बनी निम्रत कौर के बारे में बताएं?
0 मेरे खयाल में निम्रत बेहतरीन एक्‍टर हैं। उनके साथ काम करने में मजा आया। वह डिफरेंटली ब्‍यूटीफुल हैं। उनके चेहरे पर गजब को सौंदर्य है। वह उतनी ही अच्‍छी इंसान भी हैं। प्रोफेशनल किस्‍म की हैं। मेहनती हैं और रिहर्सल करती हैं। मुझे भी रिहर्सल करना जूरी लगता है। कुढ एक्‍टर मना कर देते हैं। वे सीधे टेक करती हैं।


Monday, August 25, 2014

टीवी सीरिज ‘होमलैंड 4’ में निम्रत कौर


-अजय ब्रह्मात्मज
    2013 में आई फिल्म ‘लंचबाक्स’ में इला की भूमिका निभा कर मशहूर हुई निम्रत कौर हाल ही में अमेरिकी टीवी सीरिज ‘होमलैंड 4’ की आरंभिक शूटिंग कर लौटी हैं। इस टीवी सीरिज की शूटिंग दक्षिण अफ्रीका के शहर केप टाउन में चल रही है। वहां इस्लामबाद का सेट लगाया गया है। निम्रत कौर इस टीवी सीरिज में पाकिस्तानी आईएसआई अधिकारी तसनीम कुरेशी की भूमिका निभा रही हैं। पहले योजना थी कि इजरायल में ही शूटिंग की जाए।  बाद में इसे केपटाउन में शिफ्ट कर दिया गया। ‘होमलैंड’ इजरायली टीवी सीरिज का अमेरिकी संस्करण है। निम्रत कौर के मुताबिक केपटाउन में ही इस्लामबाद का सेट लगाया गया है। मेरा सारा काम यहीं होना है। ‘होमलैंड 4’ की कहानी पाकिस्तान और अफगानिस्तान में घूमती है।
      ‘होमलैंड’ इजरायली टीवी सीरिज का अमेरिकी संस्करण है। ‘होमलैंड’ एक अमेरिकी फौजी की कहानी है। अफगानिस्तान से उसे बचा कर लाया तो जाता है,लेकिन शक है कि वह आतंकवादियों का एजेंट बन गया है। युद्धवीर की सीधी तहकीकात नहीं की जा सकती,इसलिए अप्रत्यक्ष घेराबंदी की जाती है। ‘होमलैंड’ के तीन सीजन आ चुके हैं। तीनों सीजन अमेरिका के शोटाइम चैनल पर बहुत पॉपुलर रहे हैं। चौथे सीजन का प्रसारण 5 अक्टूबर से आरंभ होगा। चौथे सीजन के चौथे एपीसोड में निम्रत कौर नजर आएंगी और उसके बाद बारहवें एपीसोड तक रहेंगी। ‘होमलैंड’ का हर सीजन 12 एपीसोड का होता है।
    मजेदार घटना है कि हाल ही में निम्रत कौर पहली बार लंदन गई थीं। वहां उन्हें अपने एजेंट से ‘होमलैंड 4’ के ऑडिशन की जानकारी मिली। लंदन में पहले दिन ही उन्होंने ऑडिशन दे दिया। तब तक उन्होंने ‘होमलैंड’ के पिछले सीजन नहीं देखें थे। निम्रत कहती हैं,‘जब कुछ खास होना होता है तो यों ही हो जाता है। अमेरकी टीवी सीरिज में काम करने की कोई योजना नहीं थी,लेकिन अभी मैं उसकी शूटिंग कर रही हूं। मुंबई में ‘लंचबाक्स’ की रिलीज के बाद दर्जनों डायरेक्टर से मिल चुकी हूं और 30-32 स्क्रिप्ट पढ़ डाली। कहीं बात नहीं बनी। इंतजार में हूं कि अगली फिल्म शुरु हो। ‘लंचबाक्स’ पिछले साल 20 सितंबर को रिलीज हुई थी। लगभग एक साल हो गए। यह तो अच्छा हुआ कि ‘होमलैंड 4’ का ऑफर मिल गया।’
    निम्रत कौर समझ नहीं पातीं कि उन्हें उचित किस्म की हिंदी फिल्में क्यों नहीं मिल पा रही हैं? वह स्वीकार करती है कि शायद ‘लंचबाक्स’ को मिली सराहना से एक धारणा बन गई होगी। सभी को लगता होगा कि मैं घरेलू महिला की भूमिका के लिए ही उपयुक्त हूं। वह बताती हैं,‘फिल्मों से पहले जब मैं ऐड कर रही थी,तब दोस्त यही कहते थे कि तुम्हारा रेगुलर लुक नहीं है। तुम्हें हिंदी फिल्में कैसे मिलेंगी? मतलब मैं शहरी लगती हूं। अभी ‘लंचबाक्स’ कर ली तो यह धारणा सी बन गई है कि मैं इला जैसी ही भूमिकाएं कर सकती हूं। यह तो ज्यादती है। मैं अच्छी स्क्रिप्ट के इंतजार में हूं। मुझे बड़ी या छोटी फिल्म से फर्क नहीं पड़ता। मुझे अपना किरदार पसंद आना चाहिए। अभी कुछ निर्देशकों से बातें चल रही हैं। उनमें से एक निखिल आडवाणी हैं। उनके साथ एक फिल्म करूंगी। अपनी उम्र और लुक का सही एहसास है मुझे। मैं छरहरी हीरोइन नहीं हो सकती हूं। अभी इतनी तरह की फिल्में बन रही हैं। यकीनन कोई मेरी पर्सनैलिटी के हिसाब से स्क्रिप्ट लिख रहा होगा। बस,उसी स्क्रिप्ट की प्रतीक्षा है।’
    ‘होमलैंड 4’ से विदेशी फिल्मों और टीवी सीरिज के द्वार खुल सकते हैं ना? निम्रत कौर फिलहाल ऐसी हड़बड़ी में नहीं हैं। वह ‘होमलैंड 4’ के प्रसारण और उस पर मिली प्रतिक्रिया के बाद ही कोई बड़ा फैसला लेंगी। फिलहाल वह इस सीरिज में काम करने का आनंद उठा रही हैं। वह कहती हैं,‘उनके काम करने का तरीका बहुत अनुशासित है। सारी तैयारियां पहले हो चुकी होती हैं। इस सीरिज के निर्माता-निर्देशक चौकस रहते हैं। मुझे मालूम नहीं कि मेरा किरदार आगे क्या रूप लेगा। भारत की तरह वहीं भी टीवी सीरिज के किरदारों का भविष्य उनकी लोकप्रियता के अनुसार प्रभावित होता है।’ वह आगे जोड़ती हैं,‘स्वयं ‘लंचबाक्स’ अमेरिका और अन्य देशों में इतना पॉपुलर रहा और देखा-सराहा गया है कि हमें आरंभिक पहचान मिल गई है। अगर विदेशों में काम मिलता है तो क्यों नहीं करूंगी? अभी के दौर में कलाकारों के लिए अनेक अवसर हैं। पहला ब्रेक मिलने के बाद चीजें आसान हो जाती हैं। ’

Thursday, January 2, 2014

दरअसल : 2013 की उपलब्धि हैं राजकुमार और निम्रत


-अजय ब्रह्मात्मज
    बाक्स आफिस और लोकप्रियता के हिसाब से कलाकारों की बात होगी तो राजकुमार राव और निम्रत कौर किसी भी सूची में शामिल नहीं हो पाएंगे। चरित्र, चरित्रांकन और प्रभाव के एंगल से बात करें तो पिछले साल आई हिंदी फिल्मों के कलाकारों में उन दोनों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकेगा। हंसल मेहता निर्देशित ‘शाहिद’ और रितेश बत्रा निर्देशित ‘द लंचबाक्स’ देखने के बाद आप मेरी राय से असहमत नहीं हो सकेंगे। दोनों कलाकारों ने अपने चरित्रों को आत्मसात करने के साथ उन्हें खास व्यक्तित्व दिया। दोनों अपनी-अपनी फिल्मों में इतने सहज और स्वाभाविक हैं कि फिल्म देखते समय यह एहसास नहीं रहता कि व्यक्तिगत जीवन में राजकुमार राव और निम्रत कौर कुछ और भी करते होंगे।
    हिंदी फिल्मों में कभी-कभार ही ऐसे कलाकारों के दर्शन होते हैं। समीक्षक, दर्शक और फिल्म पत्रकार इन्हें अधिक तरजीह नहीं देते, क्योंकि ये फिल्म से पृथक नहीं होते। इनके बारे में चटपटी टिप्पणी नहीं की जा सकती। इनकी स्वाभाविकता को व्याख्यायित नहीं किया जा सकता। दूसरे कथित स्टारडम नहीं होने से इन्हें अपेक्षित लाइमलाइट नहीं मिल पाता। ‘शाहिद’ और ‘द लंचबाक्स’ में श्रेष्ठ अभिनय और प्रदर्शन के बावजूद 2013 की उपलब्धियों में दोनों कलाकारों को शामिल नहीं किया गया। पत्र-पत्रिकाओं में इनके बारे में अलग से नहीं लिखा गया। टीवी चैनलों के पास वक्त नहीं है कि वे इनके प्रयासों को रेखांकित कर सकें। बहुत संभव है कि 2013 की फिल्मों के लिए दिए जाने वाले अवाडर््स में भी इनका नाम न हों। हिंदी फिल्मों में ज्यादातर चमक चलती है। खोटा भी चमकदार है तो वह खरा पर भारी पड़ता है।
    राजकुमार राव और निम्रत कौर अपारंपरिक कलाकार हैं। हिंदी फिल्मों में लाउड और ओवर द वोर्ड अभिनय को ही आम दर्शक नोटिस करते हैं। उसे ही एक्टिंग मान लिया जाता है। देखा गया है कि किरदारों को अंडरप्ले या रियलिस्ट तरीके से पोट्रे करने पर कलाकारों की मेहनत अनदेखी रह जाती है। वे फिल्म के अविभाज्य हिस्से होते हैं।  उनकी फिल्मों की तारीफ करते समय हम उस प्रभाव को नहीं समझ पाते, जो उनके परफारमेंस के कारण होता है। ‘शाहिद’ और ‘द लंचबॉक्स’ के साथ यही हो रहा है। दोनों फिल्मों की तारीफ में भी राजकुमार राव और निम्रत कौर गौण हैं।
    राजकुमार राव ने एफटीआईआई से अभिनय का प्रशिक्षण लिया। हिंदी फिल्मों में प्रशिक्षित अभिनेताओं को अयोग्य ही माना जाता है। पापुलर कलाकारों ने यह भ्रम फैलाया है कि अभिनय का प्रशिक्षण नहीं दिया जा सकता, जबकि अभी चल रहे समर्थ अभिनेताओं की पृष्ठभूमि में रंगमंच या प्रशिक्षण रहा है। बहरहाल, राजकुमार ने बहुत पहले तय किया था कि उन्हें फिल्मों में ही आना है। यही वजह है कि दिल्ली के समीप गुडग़ांव से होने के बावजूद उन्होंने कभी एनएसडी में दाखिले की नहीं सोची। वे सीधे एफटीआईआई गए और फिर मुंबई आ गए। दिबाकर बनर्जी की ‘लव सेक्स और धोखा’ उनकी पहली फिल्म थी। ‘शाहिद’ उनकी आखिरी फिल्म है। राजकुमार राव इन दिनों हंसल मेहता के निर्देशिन में ‘सिटी लाइट््स’ की शूटिंग कर रहे हैं। राजस्थान के बैकड्रॉप पर बन रही इस फिल्म के निर्माता मुकेश भट्ट हैं। इसके अलावा सोनम कपूर के साथ वे ‘डॉली की डोली’ और विद्या बालन के साथ ‘मेरी अधूरी कहानी’ भी कर रहे हैं।
    निम्रत कौर ने अभी तक कोई फिल्म साइन नहीं की है। ‘द लंचबॉक्स’ से मिली तारीफ और उम्मीद से कमतर कोई भी फिल्म वह कर नहीं सकतीं। पहली फिल्म चर्चित हो जाने के ये अंतर्निहित खतरे हैं। ‘द लंचबॉक्स’ की चर्चा से यह फर्क जरूर पड़ा है कि फिल्म इंडस्ट्री में उनकी पहचान और साख बढ़ गई है। उन्हें प्रस्ताव मिल रहे हैं। कुछ तय भी हो चुके हैं, लेकिन घोषणा बाकी है। निम्रत कौर ने अभिनय की दुनिया में आने के बाद कोई जल्दबाजी नहीं दिखाई। वह सही ब्रेक की प्रतीक्षा मेंथिएटर में खुद को मांजती रहीं । उन्होंने माडलिंग और ऐड फिल्में जरूर कीं और खुद को व्यस्त रखा। फिल्मों में काम पाने की कोशिश में ही निम्रत कौर इंडस्ट्री के तौर-तरीके से परिचित होती गई। बगैर किसी रंजिश और हीन भावना के वह प्रयास करती रहीं। इंतजार और धैर्य काम आया। ‘द लंचबॉक्स’ ने उन्हें बड़ा प्रतिसाद दिया। पिछले दिनों एक बातचीत में उन्होंने बताया कि वह टाइपकास्ट नहीं हो रही हैं। ‘द लंचबॉक्स’ के लगभग साथ आए कैडबरी ऐड से उनकी इमेज एक खांचे में बंधने से बच गई। कुछ लोगों ने इस संयोग को निम्रत कौर की रणनीति माना। मुख्यधारा की ग्लैमरयुक्त फिल्म पत्रकारिता में निम्रत कौर पर भी वाजिव ध्यान नहीं दिया गया है।


Monday, September 30, 2013

संवाद और संवेदना की रेसिपी और लंचबॉक्स :सुदीप्ति

यह सिर्फ 'लंचबॉक्स' फिल्म की समीक्षा नहीं है. उसके बहाने समकालीन मनुष्य के एकांत को समझने का एक प्रयास भी है. युवा लेखिका सुदीप्ति ने इस फिल्म की संवेदना को समकालीन जीवन के उलझे हुए तारों से जोड़ने का बहुत सुन्दर प्रयास किया है. आपके लिए- जानकी पुल.से साभार और साधिकार
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पहली बात: इसे‘लंचबॉक्स’ की समीक्षा कतई न समझें. यह तो बस उतनी भर बात है जो फिल्म देखने के बाद मेरे मन में आई.

अंतिमबात यानी कि महानगरीय आपाधापी में फंसे लोगों से निवेदन:इससे पहले कि ज़िंदगी उस मोड़ पर लाकर खड़ा कर दे, जहाँ खुशियों का टिकट वाया भूटान लेना पड़े, कम-से-कम ‘लंचबॉक्स’ देख आईये.

अंदर की बात:दरअसल कोई भी फिल्म मेरे लिए मुख्यत: दृश्यों में पिरोयी गई एक कथा की तरह है.माध्यम और तकनीक की जानकारी रखते हुए किसी फिल्म का सूक्ष्म विश्लेषण एक अलग और विशिष्ट क्षेत्र है,जानती हूँ. फिर भी कुछ फ़िल्में ऐसी होती हैं,जिन्हें देख आप जो महसूस करते हैं उसे ज़ाहिर करने को बेताब रहते है. ऐसी ही एक फिल्म है ‘लंचबॉक्स’.

‘लंचबॉक्स’ में तीन मुख्य किरदार हैं- मि.साजन फर्नांडिस(इरफ़ान खान), इला(निमरत कौर) और शेख(नवाजुद्दीन सिद्दीकी). तीनों की तीन कहानियां हैं और ये मुख्य कथा में जीवन के प्रति अपना भिन्न दृष्टिकोण लेकर आते हैं. मि.फर्नांडिस अपने अकेलेपन में स्वनिर्वासन झेल रहे हैं. उम्मीद, हंसी और अपनत्व से रहित उनका जीवन डब्बे के बेस्वाद खाने की तरह है. जब वो दूसरी बार इला का भेजा लंचबॉक्स खा चिट्ठी का जवाब ‘द फ़ूड वाज साल्टी टुडे’ भेजते हैंतो यह जैसे उनके जीवन में नमक और लावण्य का प्रवेश है.

इला अपनी चिट्ठियों में मुखर और खुली हुई है क्योंकि “चिट्ठियों में तो कोई कुछ भी लिख सकता है.”आरम्भ से ही वह अपनी उदासी छिपाने की कोशिश नहीं करती. पति लंच सफाचट कर नहीं भेजता और उसे परवाह भी नहीं- यह बात पहली चिट्ठी में ही लिखने से नहीं झिझकती. अपनी ओर से वह पति के साथ संवाद बढ़ाने को प्रयासरत है. व्यवहार में आए ठंडेपन को मसालों के स्वाद से छूमंतर कर देना चाहती है. तभी तो रेडियो पर रोज़ नई रेसेपी सुनना, पूरे मनोयोग से लंच तैयार करना और देशपांडे आंटी से नुस्खे लेना उसकी कोशिशों में शामिल है.पर ये सब काम नहीं आता, बावजूद इसके कि आंटी मैजिक होने का भरोसा देती हैं.

शेख अनाथ है. उसकी जिजीविषा काबिले-तारीफ है.उसकी कहानी फिल्म को हंसी से सराबोर करती है, सहज बनाती है. लोकल ट्रेन में सब्जी काटने से लेकर नौकरी जाने के भय, मि.फर्नांडिस द्वारा बचाये जाने और उसके खिलंदड़े स्वभाव के लौटने के बीच हास्य के कई दृश्य हैं.

फिल्म का मेरा पहला पसंदीदा दृश्य है— मि.फर्नांडिस जब गलती से मिले सही डब्बे को खोलते हैं, डब्बा सर्विस के खाने से ऊब चुके व्यक्ति के नीरस जीवन में नई खुशबू, नया स्वाद आ जाता है. उनके पूरे शरीर में उत्सुकता की लहर दौड़ पड़ती है. बार-बार रोटियों को उलटते-पलटते वह चावल-सब्जी के डब्बों को सूंघते  हैं. उनके चारों ओर देखिये तो सभी किसी-न-किसी के साथ बैठे हैं, पर वे अकेले हैं, निपट अकेले. इस अकेलेपन ने उनके स्वभाव को रुखा बना दिया है.मोहल्ले के बच्चों और सहकर्मियों से उनके व्यवहार को देख, उनके बारे में प्रचलित धारणाओं को जान हमें आभास हो जाता है कि मि. फर्नांडिस महानगरीय जीवन की एकरसता में डूबे एकाकीपन का प्रतिनिधि चरित्र है. वाकई सभी कहीं पहुँचने की ऐसी जिद्द में हैं कि अपने को ही खो देते हैं. जो इस भागमभाग में नहीं हैं, वे दूसरोंकी भाग-दौड़ में पीछे और अकेले छूट जाते हैं. इससे पहले कि हम बिलकुल अकेले पड़ जाएँ यह फिल्म मौका देती है ठहर कर सोचने का कि आखिर सारी भाग-दौड़ का हासिल क्या?

दूसरा दृश्य ठीक इसके बाद का है. इला डब्बे के लौटने के बेसब्र इंतजार में है और दरवाजे पर आहट पाते ही लपक कर डब्बा उठाती है. हिलाने-डुलाने से उसे लगता है कि आज तो चमत्कार हो गया. खोलकर देखने पर उमंग-उछाह से भर वह देशपांडे आंटी को बताने पहुँच जाती है कि आज डब्बा चाट-पोंछकर खाया गया है. आंटी भी चहककर जवाब देती हैं कि “मैंने कहा था न, ये नुस्खा काम करेगा.” पति के आने पर उससे कुछ सुनने की आस लगायी हुई इला निराश हो, खुद ही लंच के बारे में पूछती है. पति ‘अच्छा था’ का नपा-तुला जवाब देता है. नाप-तौल से वस्तु-विनिमय तो होता है, भाव-विनिमय नहीं होता. इला कुछ और सुनना चाहती है. बेरुखी को दरकिनार कर बात पगाने का फिर प्रयास करती है, बेपरवाह पति डब्बे में ‘आलू-गोभी’ होने की बात कह वहां से चला जाता है.
संवादहीनता का आलम यह है कि इला पति को बता भी नहीं पाती कि उसका बनाया लंचबॉक्स उसे मिला ही नहीं है.भारतीय समाज के बहुतेरे परिवारवादी, नैतिकतावादी यह कह सकते हैं कि देखो ‘बेचारा’ पति पत्नी और बच्चों के लिए इतनी मेहनत करता है, मुंह अँधेरे उठकर जाता है, देर रात को आता है और यह औरत बता भी नहीं रही कि उसकी गाढ़ी मेहनत की कमाई से बनाया लंच किसी और ने खाया होगा. अब ऐसी कमाई किस काम की कि परिवार से दो बातें करने भर की मोहलत ना हो! औरत तो कह भी रही है कि अब हमारे पास कितना कुछ है. सामान बढ़ाते जाने का क्या लाभ जब उसे भोगने का वक्त नहीं? पर ध्यान कौन देता है. परवाह किसको है घर में बंधी औरत का!

ऐसे पति को क्या सजा नहीं मिलनी चाहिए जिसे शादी के छह-सात साल बाद भी अपनी पत्नी के हाथ के बने खाने का स्वाद तक की पहचान नहीं? खैर, इस गफलत से ही सही, गलत ट्रेन के दो तनहा मुसाफिर सही तरीके से एक दूसरे की ज़िंदगी में शामिल हो जाते हैं. चिट्ठी पहले इला ही भेजती है. अपनेपन से भरी औपचारिक चिट्ठी कैसे लिखी जाती है, यह इला की पहली चिट्ठी से पता चलता है.
एक दृश्य है जिसमें शेख मि.फर्नांडिस के पास आकर कहता है कि “सब कहते हैं आप मुझे कभी नहीं सिखाएंगे. मैं अनाथ हूँ. बचपन से सबकुछ अपने-आप सीखा है. यह भी सीख लूँगा.”यहीं से वह दुर्गम किले से दिखनेवाले फर्नांडिस के जीवन में घुसपैठ कर लेता है. ट्रेन की उनकी यात्राएँ और ‘पसंदा’ खिलाने घर ले जाना सब एक क्रम में होता है. पहली बार जब शेख फर्नांडिस को घर बुलाता है तब लगता है कि यह काम निकालने की तरकीब है, लेकिन दफ्तर, लंचटाइम और रेलयात्रा के एक जैसे लगते कई दृश्यों से उन दोनों का एक सहज संबंध विकसित होता है. यह भी साफ़ हो जाता है कि शेख निश्छल स्वभाव का, लेकिन चतुर और आशावादी व्यक्ति है. आज की मतलबी दुनिया में ऐसे लोग कम ही है.

‘लंचबॉक्स’ में चार स्त्री किरदार हैं— इला, देशपांडे आंटी, इला की माँ और मि.फर्नांडिस की मर चुकी पत्नी. मि.फर्नांडिस की मृत पत्नी एक जीवित पात्र की तरह फिल्म में मौजूद है. एक पूरा दृश्य उसके साथ मि.फर्नांडिस के संबंध पर केंद्रित है. मरी हुई पत्नी से उन्हें जितना लगाव है, उतना इला के पति को उससे होता तो क्या बात थी! खैर,रात भर फर्नांडिस पत्नी के पसंदीदा रिकार्डेड वीडियो को देखते हैं और पुरानी साइकिल पर हाथ फेरते समय उसके हंसते हुए चेहरे के टीवी स्क्रीन पर उभरते प्रतिबिम्ब को अब याद करते हैं तो हमारे सामने उनके भावुक व्यक्तित्व की तहें खुल जाती हैं.

इला की माँ के साथ इला के दो दृश्य हैं और दोनों अद्भुत. पहला वह जिसमें पति के अफेयर के शुबहे से टूटी इला अपनी माँ के पास जाती है परन्तु वहां माँ की हालत देख चुप्प रह जाती है. ऐसी ही तो होती हैं बेटियां, अक्सरहाँ. गम खा न रोने वालीं. दवा के लिए रुपयों की बात चलती है. टी.वी. बिकने और भाई का हवाला आने के बीच इला रुपयों से मदद की बात करती है. पीछे के दृश्य में हम देख चुके हैं कि पति उसे भाई का ताना दे चुका है और मदद करने की हालत में इला है नहीं.माँ जब मना करती है तो उसके चेहरे पर राहत का भाव आता है तभी माँ का जवाब बदल जाता है. उस क्षण बेटी होने की तकलीफ, मदद ना कर पाने की लाचारगी और जीवन के अनगिनत असमंजस इला के चेहरे पर एक साथ उभरते हैं.निमरत ने इस क्षण को इस खूबसूरती से अपने अभिनय में जिया है कि क्या कहें! पिता की मृत्यु के बाद माँ की  गफलत,बेचैनी और भूख के बीच इला घर में मौजूद लोगों के बीच उसके व्यवहार को संतुलित करने की जद्दोजहद में है. माँ बेटे के साथ पैसे का भी अभाव झेलती औरत है, जिसके लिए मृत्यु राहत की बात है.

माँ के बरक्स देशपांडे आंटी जीवंत, उम्मीद का दामन न छोड़ने वाली औरत हैं. बरसों से उनके पति कोमा में हैं पर उन्हें ज़िन्दा रखने की ज़िद्द में जेनरेटर खरीदने से लेकर चलता पंखा साफ़ करने तक का हौसला वे रखती हैं. ‘ज़िंदगी हर हाल में खूबसूरत है’— यही झलकता है उनकी खनकती आवाज़ से. शेख और देशपांडे आंटी जैसे किरदार अगर नहीं होते तो यह प्रेमकथा बोझिल और उदास होती. उनके होने भर से फिल्म भावों की विविधता से भरी है.

इरफ़ान के हिस्से कई तनाव भरे, बेचैनी और व्याकुलता को झलकाने वाले दृश्य आए हैं जिन्हें उन्होंने बखूबी निभाया है. उन्हें इला के पत्र में एक बार आखिरी पंक्ति यह मिली कि ‘तो किसलिए जिए कोई.’ अगली सुबह ऑटोवाले से पता चलता है कि एक ऊँची इमारत से एक औरत अपनी बच्ची समेत कूद गई है. वह अपनी भयमिश्रित व्याकुलता में उसका नाम पूछते हैं. अब ऑटोवाले को भला नाम क्या पता? उस दिन जबतक ‘लंचबॉक्स’ नहीं आ जाता और आने पर उसमें से इला के हाथों की खुशबू नहीं पहचान लेते, मि.फर्नांडिस बेचैन रहते हैं. इसी तरह सिगरेट छोड़ने की कोशिश करते हुए भी.

आप कल्पना कीजिए, वह आदमी अपने मन के अंतिम कोने तक कितना अकेला होगा, उसे किसी की परवाह की कितनी भूख होगी, जो एक अपरिचित औरत के प्यार से कहने भर से अपनी बरसों पुरानी लत छोड़ने की कोशिश कर रहा है? फिर अपने से काफी छोटी उम्र की इला को देख उसके जीवन से बाहर चले जाने की कोशिश के बाद रिटायरमेंट ले नासिक की ट्रेन में बैठने पर सामने बैठे भविष्य को देख पैदा हुई वह बेचैनी, जिसमें वह डब्बा वालों के साथ इला का घर ढूंढने निकल पड़ते हैं.

फिल्म का सबसे भयावह दृश्य वह है जिसमें इला की कल्पनाशीलता एक दु:स्वप्न का रूप लेती है. रात में वह गहने उतारती है, बेटी को उठाती है, उसकी आँखों पर पट्टी बांधती है और छत की सीढियाँ चढ़ती है. यह होता नहीं, बस उस अनाम औरत की आत्महत्या के बाद के पत्र में लिखा जाता है और फर्नांडिस की आँखों के आगे एक दृश्य की तरह उभरता है. उफ्फ, माएं किस क्षण में अपने बच्चों समेत करती हैं आत्महत्याएं! कितनी बेबसी के बाद, अवसाद के उन्माद में लेती होंगी यह फैसला? सोचना भी दुष्कर है.इला कूदने भर के साहस की बात कहती है, लेकिन मेरे लिए वह अवस्था साहस,विवेक,समझ— सबसे परे चरम उन्माद की स्थिति है.

फिल्म‘ओपन एंडेड’ है और ऐसी फिल्मों के साथ अच्छी और बुरी बात यही है कि आप अंत की कल्पना में खुश हो सकते हैं या खीझ सकते हैं. मैं जीवन में ट्रेजेडी को नहीं पसंद करती तो मेरे लिए यही अंत है कि तुकाराम को गाते हुए डब्बेवालों के साथ साजन फर्नांडिस इला के घर पहुँच जाते हैं और नासिक के बदले भूटान को निकल पड़ते हैं. उस भूटान को जहाँ हमारा रूपया भी पांच गुना अधिक मूल्य रखता है और खुशियाँ भी हमसे पांच गुना ज्यादा होती हैं. क्या कहते हैं, भूटान जाकर ही मिल सकती हैं खुशियाँ?

इस फिल्म में संवाद कम और छोटे हैं, पर इन छोटे संवादों के अर्थ और मर्म बड़े गहरे हैं. इला जब भूटान की बात लिखती है तब जवाब में मि.फर्नांडिस का सवाल आता है-“क्या मैं तुम्हारे साथ भूटान चल सकता हूँ?” इस एक सवाल से आत्मीयता से अनुराग तक की दूरी एक झटके में तय हो जाती है.


इस फिल्म में जो ज़ाहिर है वह सशक्त है और जो ज़ाहिर नहीं है वह बेहद मुखर है.याद कीजिये वह नि:संवाद दृश्य जब मि.फर्नांडिस किसी के सामने चिट्ठी देखना नहीं चाहते, पर खुद को रोक भी नहीं पाते. याद करिए उनके चेहरे का वह अबोला भाव जिसमें झिलमिल चमकता है उनका अत्यंत निजी गोपनीय आनंद, जिसे वे अपने भर में समेट लेना चाहते हैं. जो इला शुरुआत में देशपांडे आंटी से कहती है कि ‘मुझे ये सब ठीक नहीं लग रहा’, वही अपनी हंसी का राज छुपा लेती है. ‘साजन’ फिल्म के गाने का रहस्य तो बाद में खुलता है, बात हमें पहले समझ में आने लगती है. फर्नांडिस इला से मिलने पहुँचता है, उसको छुप कर देखता है. लेकिन इला की मुलाकात उससे नहीं होती. दोनों के बीच निकटता का संयोग फिल्म खत्म होने के बाद भी पक्के तौर पर नहीं घटित होता. फिर भी यह एक प्रेमकथा है.इससे पहले ‘स्लीपलेस इन सिएटल’ नामक एक रोमांटिक फिल्म मैंने देखी थी, जिसमें नायक-नायिका फिल्म के अंत में एक बार मिलते हैं पर फिल्म एक जबरदस्त प्रेमकथा है.पूरी फिल्म में मिसेज देशपांडे कहीं दिखतीं नहीं, लेकिन फिल्म में उनसे ज्यादा मुखर चरित्र भला कौन है, शेखको अगर भूल जाइये. मैं तो कहती हूँ कि संवाद और संवेदना की रेसिपी से तैयार इस ‘लंचबॉक्स’ का आस्वाद कभी भूलना संभव नहीं होगा.