Search This Blog

Showing posts with label नवाजुद्दीन सिद्दिकी. Show all posts
Showing posts with label नवाजुद्दीन सिद्दिकी. Show all posts

Friday, February 20, 2015

फिल्‍म समीक्षा : बदलापुर

-अजय ब्रह़मात्‍मज 
श्रीराम राघवन की 'बदलापुर' हिंदी फिल्मों के प्रचलित जोनर बदले की कहानी है। हिंदी फिल्मों में बदले की कहानी अमिताभ बच्चन के दौर में उत्कर्ष पर पहुंची। उस दौर में नायक के बदले की हर कोशिश को लेखक-निर्देशक वाजिब ठहराते थे। उसके लिए तर्क जुटा लिए जाते थे। 'बदलापुर' में भी नायक रघु की बीवी और बच्चे की हत्या हो जाती है। दो में से एक अपराधी लायक पुलिस से घिर जाने पर समर्पण कर देता है और बताता है कि हत्यारे तो फरार हो गए, हत्या उसके साथी जीयु ने की। रघु उसके साथी की तलाश की युक्ति में जुट जाता है। इधर कोर्ट से लायक को 20 साल की सजा हो जाती है। रघु लायक के साथी की तलाश के साथ उस 20वें साल का इंतजार भी कर रहा है, जब लायक जेल से छूटे और वह खुद उससे बदला ले सके।
इस हिस्से में घटनाएं तेजी से घटती हैं। फिल्म की गति धीमी नहीं पड़ती। श्रीराम राघवन पहले ही फ्रेम से दर्शकों को सावधान की मुद्रा में बिठा देते हैं। अच्छी बात है कि टर्न और ट्विस्ट लगातार बनी रहती है। परिवार को खोने की तड़प और बदले की चाहत में रघु न्याय और औचित्य की परवाह नहीं करता। बदले की इस भावना में वह सही और गलत का भेद भूल जाता है। यहां तक कि लायक की दोस्त झिमली को तकलीफ देने से भी वह बाज नहीं आता। नेकी और बदी गड्डमड्ड होने लगती है। श्रीराम राघवन का यही ध्येय भी है। वे अन्य फिल्मों की तरह अपने नायक को दूध का धुला नहीं दिखाते। हम नेक नायक को खल नायक में बदलते देखते हैं। रघु किसी भी सूरत में लायक और उसके साथी से अपनी बीवी और बच्चे की हत्या का बदला लेना चाहता है। इस प्रक्रिया में वह निर्मम होता जाता है।
कहानी पंद्रह साल का जंप लेती है। लायक पंद्रह साल की सजा काट चुका है। पता चलता है कि उसे कैंसर हो चुका है और अब उसकी जिंदगी का एक साल ही बचा है। कैदियों की भलाई के लिए काम कर रहे एक एनजीओ की कार्यकर्ता अकेली जिंदगी बसर कर रहे रघु से मिलती है। वह उससे आग्रह करती है कि अगर वह चाहे तो लायक की रिहाई हो सकती है। लायक का आखिरी साल राहत में गुजर सकता है। रघु पहले मना कर देता है, लेकिन लायक के साथी तक पहुंचने की उम्मीद में वह उसकी रिहाई के लिए तैयार हो जाता है। लायक की रिहाई, दूसरे साथी की पहचान और रघु की पूरी होती दिखती रंजिश के साथ घटनाएं तेज हो जाती हैं। थोड़ी देर के लिए लगता है कि कहानी किरदारों और घटनाओं के बीच उलझ गई है। श्रीराम स्पष्ट हैं। वे फिल्म के क्लाईमेक्स और निष्कर्ष तक बगैर लाग-लपेट के पहुंचते हैं। यहां आगे की घटनाएं और किरदारों के व्यवहार के विस्तार व उल्लेख से दर्शकों की जिज्ञासा बाधित होगी। मजा किरकिरा होगा।
श्रीराम राघवन ने बदले की इस अनोखी कहानी में ग्रे किरदार भी अपना रंग बदलते हैं। 'बदलापुर' सिर्फ बदले की कहानी नहीं है। यह बदले में आए बदलाव की भी कहानी है। सब कुछ बदल जाता है। अच्छा अच्छा नहीं रहता और बुरे का बदला हुआ आचरण सोचने पर मजबूर करता है कि क्या वह सचमुच बुरा था? नैतिकता और आदर्श को परिस्थितियों और मनोभावों के बरक्स देखना होगा। रघु और लायक के व्यवहारों को हम पारंपरिक चश्मे से नहीं आंक सकते। इस फिल्म में गौर करें तो अच्छा बुरा है और बुरा अच्छा है। श्रीराम दोनों किरदारों की जटिलताओं में गहरे घुसते हैं और उनके अंतस को उजागर कर देते हैं। हम जो देखते और पाते हैं, वह हमारे समय के उलझे समाज का द्वंद्व है। फिल्म समाप्त होने के बाद उलझन बढ़ जाती है कि किसे सही कहें और किसे गलत?
मेरे खयाल में फिल्म का कथ्य उस सामान्य दृश्य में है जब लायक अपनी मां से पिता के बारे में पूछता है। मां कहती है-क्यों पुराने चावल मे कीड़े ढ़ूंढ रहा है। मां के पास पिता के बारे में अच्छा बताने के लिए कुछ भी नहीं है। लायक को गहरी चोट लगती है। उसका एहसास जागता है। वह मां को कुछ कहता हुआ निकलता है। उसके बाद की घटना बताना उचित नहीं होगा। फिल्म के अंत में लेखक-निर्देशक ने झिमली के जरिए अनावश्यक ही अपनी बात और लायक की मंशा स्पष्ट कर दी है। वह अव्यक्त रहता तो ज्यादा प्रभावी बात होती।
वरुण धवन अपेक्षाकृत नए एक्टर हैं। उनकी मेहनत जाहिर है। उन्होंने रघु के बदलते भावों को व्यक्त करने में अच्छी-खासी मेहनत की है। दूसरी तरफ नवाजुद्दीन सिद्दीकी की फितरत प्रभावित करती है। वरुण की मेहनत और नवाज की फितरत से 'बदलापुर' रोचक और रोमांचक हुई है। वरुण सधे अभिनेता नवाज के आगे टिके रहते हैं। नवाज हमारे समय के सिद्ध अभिनेता हैं। लायक हमारे मन में एक साथ घृणा और हास्य पैदा करता है। वह शातिर है, लेकिन कहीं भोला भी है। वह हिंदी फिल्मों के पारंपरिक खल चरित्रों की तरह खूंखार नहीं है, लेकिन उसकी कुटिलता से सिहरन होती है। खूंखार तो हमारा नायक हो जाता है जो जान लेने के लिए आवेश में दस हथौड़े मारते हुए हांफने लगता है। यह फिल्म वरुण और नवाज के अभिनय के लिए याद रखी जाएगी। फिल्म में महिला किरदारों को सीमित स्पेस में ही पर्याप्त महत्व दिया गया है। उन्हें अच्छी तरह गढ़ा गया है। पांचों महिला किरदारों ने अपनी भूमिकाओं को संजीदगी से निभाया है। प्रभावशाली दृश्य राधिका आप्टे और हुमा कुरैशी को मिले हैं। यों दिव्या दत्ता, प्रतिमा कण्णन और यामी गौतम लेश मात्र भी कम असरदार नहीं हैं। कुमुद मिश्रा की सहजता और स्वाभाविकता उल्लेखनीय है।
श्रीराम राघवन ने बदले की रोमांचक फिल्म को नया ट्विस्ट दे दिया है।
अवधि: 147 मिनट
चार स्‍टार ****

Saturday, August 30, 2014

निर्माण में आ सकते हैं नवाज


-अजय ब्रह्मात्मज
   
    लंबे अभ्यास और प्रयास के बाद कामयाबी मिलने पर इतराने के खतरे कम हो जाते हैं। नवाजुद्दीन सिद्दिकी के साथ ऐसा ही हुआ है। ‘सरफरोश’ से ‘किक’ तक के सफर में बारहां मान-अपमान से गुजर चुके नवाज को आखिरकार अब पहचान मिली है। इसकी शुरुआत ‘न्यूयार्क’ और कहानी से हो चुकी थी। ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ से उनकी योग्यता पर मुहर लगी और प्रतिष्ठा मिली। अभी स्थिति यह है कि उनके पास मेनस्ट्रीम फिल्मों के भी ऑफर आ रहे हैं। पिछली कामयाबी ‘किक’ के बाद भी नवाज ने तय कर रखा है कि वे साल में एक-दो ऐसी फिल्में करने के साथ अपने मिजाज की फिल्में करते रहेंगे। वे स्पष्ट कहते हैं कि इस पहचान से मेरी छोटी फिल्मों को फायदा होगा। पिछले दिनों मेरी ‘मिस लवली’ रिलीज हुई थी। उसके बारे में दर्शकों का पता ही नहीं चला। उस फिल्म में मैंने काफी मेहनत की थी।
    आमिर खान और सलमान खान के साथ काम कर चुके नवाज दोनों की शैली की भिन्नता के बारे में बताते हैं,‘आमिर खान के बारे में सभी जानते हैं कि वे परफेक्शनिस्ट हैं। उनके साथ रिहर्सल और सीन पर चर्चा होती है। सलमान खान के साथ अलग अनुभव रहा। ज्यादातर स्पॉनटेनियस काम होता रहा। दोनों की निजी खूबियों का असर सीन और फिल्म में दिखता है। मेरे लिए अच्छी बात रही कि लिखने के समय ही साजिद नाडियाडवाला ने इस किरदार के लिए मुझे चुन लिया था। उन्हें मालूम था कि मुझ से क्या चाहिए?’ नवाज आमिर और सलमान की फिल्मों की पहुंच से वाकिफ हैं। उनकी ख्वाहिश है कि भविष्य में उनकी फिल्मों को इस कमर्शियल पहचान का लाभ हो। अभी उनकी कुछ फिल्में तैयार हैं। वे बताते हैं,‘केतन मेहता के साथ मैंने दशरथ मांझी की जिंदगी पर बनी ‘माउंटेन मैन’ की है। बुद्धदेव भट्टाचार्य के साथ ‘अनवर का किस्सा’ कर चुका हूं। एक फिल्म ‘लायर्स डाइस’ है। फैंटम के साथ ‘घूमकेतु’ पूरी हो चुकी है। अभी श्रीराम राघवन के साथ ‘बदलापुर’ की शूटिंग कर रहा हूं।’
    एक कलकार के तौर पर नवाज चाहते हैं कि उन्हें केंद्रीय भूमिकाओं की फिल्में मिलती रहें। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के पुराने तौर-तरीके और व्यावसायिक दृष्टिकोण से फिलहाल ऐसा संभव नहीं हो पा रहा है। नवाज किसी भ्रम में नहीं हैं। वह कहते हैं,‘मुझे अपनी सीमा और पहुंच मालूम है। मैं किसी गलतफहमी में नहीं हूं। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में लंबे अनुभव ने बहुत कुछ सिखा दिया है। मैं संतुलन के साथ आगे बढऩे की कोशिश में रहूंगा। मैं तो रोमांटिक लव स्टोरी करना चाहता हूं। उसमें रोमांस का मेरा अपना तरीका होगा।’ नवाज भविष्य में अपनी खूबियों के साथ ऐसी फिल्में करना चाहते हैं,जो पहुंच और बजट में भले ही छोटी हों,लेकिन उनका इंपैक्ट बड़ा हो।
     नवाज बड़े गर्व से कहते हैं कि छोटी फिल्मों ने मुझे निराशा से बचा लिया। मैंने कभी छोटी-बड़ी के खांचे में फिल्मों या रोल को नहीं रखा। काम करता रहा और बेहतर का प्रयास करता रहा। अनुराग कश्यप और कुछ अन्य निर्देशकों ने मुझ पर विश्वास किया। उन अवसरों की वजह से यहां आ सका। नवाज स्पष्ट हैं कि किसी भी सूरत में वह निर्देशन या लेखन की कोशिश नहीं करेंगे। भविष्य में हो सकरी है कि प्रोडक्शन कंपनी आरंभ करें।
   


Friday, July 25, 2014

फिल्‍म समीक्षा : किक

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
कुछ फिल्में समीक्षाओं के परे होती हैं। सलमान खान की इधर की फिल्में उसी श्रेणी में आती हैं। सलमान खान की लोकप्रियता का यह आलम है कि अगर कल को कोई उनकी एक हफ्ते की गतिविधियों की चुस्त एडीटिंग कर फिल्म या डाक्यूमेंट्री बना दे तो भी उनके फैन उसे देखने जाएंगे। ब्रांड सलमान को ध्यान में रख कर बनाई गई फिल्मों में सारे उपादानों के केंद्र में वही रहते हैं। साजिद नाडियाडवाला ने इसी ब्रांड से जुड़ी कहानियों, किंवदंतियो और कार्यों को फिल्म की कहानी में गुंथा है। मूल तेलुगू में 'किक' देख चुके दर्शक बता सकेगे कि हिंदी की 'किक' कितनी भिन्न है। सलमान खान ने इस 'किक' को भव्यता जरूर दी है। फिल्म में हुआ खर्च हर दृश्य में टपकता है।
देवी उच्छृंखल स्वभाव का लड़का है। इन दिनों हिंदी फिल्मों के ज्यादातर नायक उच्छृंखल ही होते हैं। अत्यंत प्रतिभाशाली देवी वही काम करता है, जिसमें उसे किक मिले। इस किक के लिए वह अपनी जान भी जोखिम में डाल सकता है। एक दोस्त की शादी के लिए वह हैरतअंगेज भागदौड़ करता है। इसी भागदौड़ में उसकी मुलाकात शायना से हो जाती है। शायना उसे अच्छी लगती है। देवी उसके साथ बूढ़ा होना चाहता है। शायना चाहती है कि देवी किसी नियमित जॉब में आ जाए। उधर देवी की दिक्कत है कि हर नए काम से कुछ ही दिनों में उसका मन उचट जाता है। शायना उसे टोकती है। उसकी एक बात देवी को लग जाती है। इसके बाद वह किक के लिए देवी से डेविल में बदल जाता है। डेविल और पुलिस अधिकारी हिमांशु की अलग लुकाछिपी चल रही होती है। इनके बीच भ्रष्ट नेता और उसका भतीजा भी है।
रोमांस, एक्शन, चेज, कॉमेडी, सॉन्ग एंड डांस और इमोशन से भरपूर 'किक' से साजिद नाडियाडवाला केवल सलमान खान के प्रशंसकों को खुश करने की कोशिश में हैं। दृश्य विधान ऐसे रचे गए हैं कि कैमरा आखिरकार हर बार सलमान की भाव-भंगिमाओं पर आकर ठहर जाता है। अगर कभी दूसरे किरदार पर्दे पर दिखते हैं तो वे भी देवी या डेविल की ही बातें कर रहे होते हैं। हिंदी फिल्मों में स्क्रिप्ट लेखन का यह खास कौशल है, जो पॉपुलर स्टार की फिल्मों में आजमाया जाता है। एकांगी होने से बचते हुए ढाई घंटे की ऐसी स्क्रिप्ट तैयार करने में अलहदा मेहनत लगती है। 'किक' जैसी फिल्मों का एकमात्र उद्देश्य आम दर्शकों का मनोरंजन करना है। आम दर्शक अपने परिवार के सदस्यों के साथ उसका आनंद उठा सकें।
'किक' अपनी इन सीमाओं और खूबियों में कहीं बिखरती और कहीं प्रभावित करती है। इंटरवल के पहले का विस्तार लंबा हो गया है। देवी और उसके पिता के रिश्ते को स्थापित करने वाले दृश्य नाहक खींचे गए हैं। इसी तरह नायक-नायिका की मुलाकात के दृश्य में दोहराव है। हम दशकों से ऐसी छेड़खानियां और बदमाशियां देखते आए हैं। अगर फिल्म के नायक सलमान खान हैं तो सीधे व सामान्य की उम्मीद ही नहीं करनी चाहिए। देवी और डेविल की हरकतों में कई बार लॉजिक की परवाह नहीं की गई है, लेकिन क्या सलमान खान के प्रशंसक इन पर गौर करते हैं? बेहतर है कि दिल में आने वाले इस नायक को समझने में दिमाग न लगाया जाए।
'किक' में सलमान खान पूरे फॉर्म में हैं। उम्र चेहरे और शरीर पर दिखती है, लेकिन ऊर्जा में कोई कमी नहीं है। सलमान ने एक्शन के दृश्यों में आवश्यक फुर्ती दिखाई है। रोमांस और डांस का उनका खास अंदाज यहां भी मौजूद है। सलमान खान की इस फिल्म में रणदीप हुडा और नवाजुद्दीन सिद्दिकी अपनी उपस्थिति दर्ज करते हैं। रणदीप हुड्डा ने पुलिस अधिकारी हिमांशु के किरदार में स्फूर्ति बरती है। कुछ दृश्यों में वे अवश्य लड़खड़ा गए हैं। नवाज की तारीफ करनी होगी कि चंद दृश्यों के अपने किरदार का उन्होंने अदायगी से यादगार बना दिया है। चटखारे लेकर उनके बोलने के अंदाज की नकल होगी। जैकलीन फर्नांडीज के लिए कुछ डांस स्टेप्स और रोमांस के सीन थे। उनमें वह जंचती हैं। संवाद अदायगी और नाटकीय दृश्यों के लिए उन्हें और मेहनत करनी होगी। सौरभ शुक्ला, मिथुन चक्रवर्ती, विपिन शर्मा और संजय मिश्रा अपनी भूमिकाओं में उपयुक्त हैं।
ईद के मौके पर सलमान खान और साजिद नाडियाडवाला की पेशकश 'किक' आम दर्शकों का ध्यान में रख कर बनाई गई सलमान खान की विशेषताओं की फिल्म है।
अवधि: 146 मिनट
***  तीन स्‍टार

Monday, April 7, 2014

दरअसल : गलत भडक़े ऋषि कपूर

दरअसल ़ ़ ़
गलत भडक़े ऋषि कपूर
-अजय ब्रह्मात्मज

पिछले दिनों अंगे्रजी अखबारों में ऋषि कपूर के एक बयान का खूब उछाला गया। उस बयान में उन्होंन युवा अभिनेता नवाजुद्दीन सिद्दिकी की किसी टिप्पणी पर आक्रामक प्रतिक्रिया व्यक्त की। इस प्रतिक्रिया में उन्होंने उम्र और अनुभव का लिहाज नहीं रखा। उन्होंने नवाज की औकात का सवाल उठाया और फिर अहंकार में नवाज के बाप-दादा को भी समेट लिया। ऊिल्म इंडस्ट्री के कथित पहले परिवार के ऋषि कपूर की इस प्रतिक्रिया को किसी भी सूरत मेंजायज नहीं ठहराया जा सकता। दरअसल ़ ़ ़फिल्म इंडस्ट्री के आउटसाइडर पर इनसाइडर ऐसे ही भडक़ते हैं। जब भी कोई नया अभिनेता या अभिनेत्री मिले मौके को अपनी प्रतिभा से उल्लेखनीय बना देता है तो पहले से पॉपुलर और जम-जमाये इनसाइडर हस्तियों का कुर्सी हिलने लगती है। वे स्वागत और तारफ करते हैं,लेकिन उसी क्षण से उक्त प्रतिभा को पृष्ठभूमि में धकेलने की कवायद आरंभ हो जाती है। बीस सालों की फिल्म पत्रकारिता और फिल्मी हस्तियों से मेल-मुलाकात के अनुभवों पर मैं यह बात कह रहा हूं।
    नवाजुद्दीन सिद्दिकी ने अपने किसी इंटरव्यू में हिंदी फिल्मों मेंप्रचलित घिसे-पिटे रोमांस और रोमांटिक हीरो के बारे में कहा था कि इनमें बदलाव आना चाहिए। पेड़ों के इर्द-गिर्द नाचना ही रोमांस नहीं है। नवाज के इस ऑब्जर्वेशन से अनेक की सहमति होगी और कुछ असहमत भी होंगी। एक्टिंग के एक डिफरेंट स्कूल से आने और उसी के दम पर एक दशक से अधिक समय लगा कर अपनी पहचान बना चुके नवाज को अपनी राय रखने का पूरा अधिकार है। उन्होंने इसी अधिकार का उपयोग किया। ऋषि कपूर को नवाज की टिप्पणी नागवार गुजरी। उन्होंने पहला मौका मिलते ही वार किया। उन्होंने साफ कहा कि उनके बाप-दादा भी नहीं कर सकते ऐसा काम। वे खुद तो क्या करेंगे ़ ़ ़ तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई ऐसा कहने की। तुम्हारी औकात क्या है? ़ ़ ़आप ने अपनी जिंदगी में वह कभी किया नहीं है और आप को कभी मौका नहीं मिलेगा। आप कर भी नहीं सकते। आप की इमेज नहीं है। आप में वह टैलेंट नहीं है। ऋषि कपूर की इस टिप्पणी में औकात और बाप-दादा का जिक्र अशोभनीय और अनुचित है। ऐसे कठोर और असभ्य शब्दों के इस्तेमाल के लिए ऋषि कपूर की आलोचना होनी चाहिए।
    आलोचना तो दूर ़ ़ क़ोई उन्हें गलत भी नहीं ठहराएगा। नवाज ने संयम से काम लिया। उन्होंने ऋषि कपूर की टिप्पणी पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि मेरी बात को सही संदर्भ में नहीं समझा गया। प्यार जाहिर करने के सौ तरीके हो सकते हैं और उन्हें एक्सप्लोर करना चाहिए। मेरे बारे में वे ऐसा नहीं कह सकते कि मैं पर्दे पर रोमांस नहीं कर सकता। मैं कर सकता हूं,लेकिन उसे अलग तरीके से करूंगा। ऋषिजी अगर मुझ औसत अभिनेता मानते हैं तो यह मेरे लिए तारीफ है। मैं तो औसत से भी कमतर अभिनेता हूं। नवाज अपनी प्रतिक्रिया में शिष्ट रहे। उन्होंने ऋषि कपूर से असहमति जाहिर की,लेकिन उनका अनादर नहीं किया। हम सभी जानते हैं कि सालों की मेहनत और लगन की बाद नवाज ने पहचान हासिल की है। दिक्कत यह है कि अभी भी उनके प्रति फिल्म इंडस्ट,ी का रवैया पूरी तरह से सकारात्मक नहीं हुआ है। अकेले नवाज नहीं हैं। फिल्म इंडस्ट्री के सभी आउटसाइडर को ऐसी छींटाकशी सहनी पड़ती है। उन्हें हमेश उनकी औकात बतायी जाती है। हतोत्साहित किया जाता है। उनके गिरने का इंतजार किया जाता है। अगर वे सफलता की सीढिय़ां चढ़ते जाएं तो भी यही कहा जाता रहेगा कि देखना इस बार तो वह गिरेगा ही।
    इतना ही नहीं सफल होने के बाद अगर आउटसाइडर अभिनेता ने पारिश्रमिक बढ़ा दिया तो टीका-टिप्पणियां होने लगती हैं। इंडस्ट्री से आया कोई पॉपुलर स्टार ऐसा करे तो इसे उसका हक समझा जाता है। अगर दीपिका पादुकोण यर इरफान ज्यादा पैसों की मांग करें तो यही कहा जाता है कि कामयाबी से उनका दिमाग फिर गया है। बाहर से फिल्म इंडस्ट्री में बराबरी दिखती है और उसका दावा भी किया जाता है। यथार्थ में ऐसा है नहीं।


Monday, March 24, 2014

नवाजुद्दीन की औकात क्या है? -ऋषि कपूर

इसे रघुवेन्‍द्र सिंह के ब्‍लॉग अक्‍स से लिया गया है चवन्‍नी के पाठकों के लिए...
कमर्शियल सिनेमा का कोई मजाक उड़ाए, यह ऋषि कपूर को बर्दाश्त नहीं. रघुवेन्द्र सिंह से एक बातचीत में वह अपने गुस्से पर नियंत्रण नहीं रख सके
हिंदी फिल्मों में उम्र के साथ चरित्र बदल जाते हैं. जवानी में हीरो की भूमिका निभाने वाले स्टार भी एक समय के बाद छिटक कर साइड में चले जाते हैं, लेकिन अमिताभ बच्चन के बाद अब ऋषि कपूर ने इस परिपाटी को तोड़ा है. उन्होंने सहयोगी भूमिकाओं को अपने लिए अयोगय साबित किया है और एक बार फिर से बड़े पर्दे पर केंद्र में आ गए हैं. 2010 में हबीब फैजल की फिल्म दो दूनी चार में पत्नी नीतू कपूर के साथ मिलकर ऋषि ने बॉक्स-ऑफिस पर ऐसा धमाल मचाया कि निर्माता-निर्देशक फिर से उनके दरवाजे पर खड़े होने लगे. ऋषि कपूर खुशी के साथ कहते हैं, ''दो दूनी चार के बाद मेरे लिए चीजें बदल गईं. अब मैं कैरेक्टर एक्टर नहीं रहा. मैं ऐसे रोल अब लेता ही नहीं हूं. मेरे रोल मेन लीड के बराबर होते हैं." 
इस वक्त हम ऋषि कपूर के साथ सुभाष घई की फिल्म कांची के सेट पर हैं. तैंतीस साल के बाद कर्ज की यह सुपरहिट जोड़ी इसमें साथ लौट रही है. ऋषि एक भव्य गाने की शूटिंग करने जा आए हैं. फिलहाल, उनके मन में कई भावनाएं उमड़ रही हैं. उनके मन में अपने बेटे की कामयाबी की खुशी है, तो कमर्शियल सिनेमा का माखौल उड़ाने वाले लोगों के प्रति बहुत गुस्सा है. हम बातचीत का सिलसिला आगे बढ़ाते हैं...
आजकल आप एक ओर डी-डे जैसी गंभीर फिल्म कर रहे हैं, तो  दूसरी ओर शुद्ध देसी रोमांस और कांची जैसी हल्की-फुल्की मनोरंजक मिजाज की फिल्में. अब आप ज्यादा एक्सपेरिमेंट मोड में दिख रहे हैं?
एक एक्टर का यही तो काम है ना! मुझे एक्टर का खिताब चाहिए. पहले ऐसे चांस नहीं मिलते थे. अभी चांस मिला है, तो मैंने अपने आपसे प्रॉमिज किया है कि मुझे सभी तरह के किरदार करने हैं. लुक हर फिल्म में अलग होना चाहिए. निगेटिव हो, पॉजिटिव हो, कॉमिक हो, ट्रैजिक हो, कुछ भी हो. मुझमें सब कुछ करने की योग्यता होनी चाहिए. मैं अब कैरेक्टर एक्टर नहीं रहा हूं. मैं फिल्म का सेकेंड हीरो होता हूं और मेरा रोल मेन लीड के बराबर होता है. आप देख लो कि हर पिक्चर में मैं कितने वेरायटी के कैरेक्टर अब कर रहा हूं.

सुभाष घई और आपकी जोड़ी ने कर्ज में इतना धमाल मचाया था. इसके बावजूद दोबारा साथ आने में तैंतीस साल क्यों लग गए?
वो तो सुभाष जानें. तैंतीस साल बाद हम साथ काम कर रहे हैं. मैं सत्ताइस साल का था, जब उन्होंने मेरे साथ ओम शांति ओम गाना शूट किया था. आज मैं 61 साल का हूं और इस तरह का गाना मेरे साथ कर रहे हैं (हंसते हैं). आपको यह दोनों फोटोग्राफ्स एक साथ पाठकों को दिखानी चाहिए.
आपको सेट पर डांस करते हुए देखकर हमें बहुत अच्छा लग रहा है.
मुझे तो बहुत अजीब लग रहा है. मैं 61 साल का हूं. आज भी मैं डांस कर रहा हूं. मैंने सोचा कि साउथ में सभी हीरो एनटीआर, एमजीआर सब सोलह साल की लड़कियों श्रीदेवी से प्यार करते थे. मुझे श्रीदेवी आकर बोलती थी कि सर, मैं एनटीआर, कृष्णा के साथ डांस करती थी, जो मेरी उम्र से डबल के होते थे. आज मैं इस गाने में हेजेल के साथ डांस कर रहा हूं, जो मेरी आधी उम्र की है. मैं इसे सम्मान की तरह देखता हूं. ईश्वर की कृपा रही है हम पर कि उसने ऐसा वक्त भी हमको दिखाया है. लेकिन मैं अपने काम को एंजॉय करता हूं. ये मत सोचना कि मैं काम मजबूरी में कर रहा हूं.

सुभाष घई के साथ इतने साल बाद काम कर रहे है. उनमें क्या बदलाव आए हैं?
उनका पैशन सेम है. बाल थोड़े सफेद हो गए हैं. मेरे बाल भी सफेद हो गए हैं. प्यार और सम्मान हमारा एक-दूसरे के लिए सेम है. पैशन, प्यार और लगन आज भी वही है. वक्त बदल गया है. लेकिन हमारा पैशन सिनेमा के लिए एक ही है. देखिए, अभी मैं यहां से एक दूसरी फिल्म की शूटिंग में जा रहा हूं. दस बजेंगे रात के. लेकिन मजा आ रहा है. ईश्वर कितने लोगों को ऐसा मौका देता है. मैं अपने फैंस को खुश कर पा रहा हूं, यह मेरे लिए बड़ी बात है.

कांची में अपने रोल के बारे में बताएं?
यह सुभाष घई टाइप एक निगेटिव कैरेक्टर है. उनका होता है ना ओवर द टॉप, कॉमेडी-रोमांटिक. इसमें उन्होंने मुझे थोड़ा अलग किस्म का रोल दिया है. यह विजय माल्या से प्रेरित किरदार है. मेरा पूरा गेटअप उन्हीं से लिया गया है. स्टाइलाइज भी वैसे ही किया है. लेकिन यह उनके जीवन की कहानी नहीं है.

क्या आपको अपने किरदारों के लिए तैयारी की जरूरत पड़ती है?
नहीं, हिंदी फिल्मों में ऐसा नहीं होता है. जो लोग रिसर्च की बात करते है, उनको मेरी तरफ से एक झापड़ खींचकर देना. अंडे से बाहर निकले दो दिन होते नहीं है कि अपने आपको एक्टर बोलते हैं और रिसर्च-विचर्स की बात करते हैं. आजकल के नए एक्टर अपने आपको तीस मार खां समझते हैं. उनसे पूछना कि क्या रिचर्स करते हो तुम लोग? और अगर तुमने किया है, तो क्या उखाड़ा है? कमर्शियल सिनेमा में तो आओ. पर्दे पर पहले धंधा करके तो दिखाओ. बातें करते हैं. इन पर मुझे बहुत गुस्सा आता है. बेसिकली हम सब कमर्शियल एक्टर्स हैं. हम सब एंटरटेनर्स हैं. वी प्रोवाइड एंटरटेनमेंट. वी ब्लडी डोंट प्रोवाइड एनी काइंड ऑफ नॉनसेंस. चालीस साल से मैं वही कर रहा हूं, ईश्वर की कृपा से और वही करना चाहता हूं. 
आज भी आप दर्शकों को सरप्राइज कर रहे हैं. यह बड़ी बात है.
वह एक एक्टर का ट्रिक होना चाहिए- सरप्राइज द ऑडियंस. वरना आप बासी हो जाओगे. मैंने 25 साल अपनी जिंदगी में वही काम किया. केवल रोमांटिक हीरो के रोल. आगे देखो, मैं क्या क्या करता हूं. तब मिलते नहीं थे ऐसे कैरेक्टर्स. बनती नहीं थीं ऐसी पिक्चरें. हमको कोई देता नहीं था. आज ऐसा मौका मिल रहा है.

रणबीर भी आपकी तरह सबको सरप्राइज करते रहते हैं. क्या आप दोनों ने मिलकर प्लानिंग की है?
बिल्कुल नहीं. दुनिया जानती है कि मैं उसके क्रिएटिव पहलू में इंटरफीयर नहीं करता. यह एक संयोग भर है.

रणबीर की उड़ान से खुश हैं?
देखो, उसकी मेहनत है बेचारे की. एक बार में एक पिक्चर करता है बस. वो भी देखो रिस्क कितना बड़ा लेता है. अगर वह पिक्चर नहीं चले, तो उसके हाथ से काम जा सकता है. लोग कहेंगे कि अरे यार छोड़ो. इतना गट्स होना चाहिए आपमें. आप एक बर्फी! कर रहे हो और आपने तीन पिक्चरों को ना बोला. वो भी एक राजकुमार हिरानी की पिक्चर, एक रोहित शेïट्टी की और एक अभिनव की. किस एक्टर में इतना दम है यार... मैं इस इंडस्ट्री के बिगेस्ट स्टार की बात भी कर रहा हूं. किसी एक्टर में इतना दम नहीं है कि वह एक्सपेरिमेंटल फिल्म करे. मैं अपनी बात भी कर रहा हूं. कोई सोचे तो सही कि चलो एक हटकर पिक्चर करते हैं, मेरे फैंस को अच्छा लगेगा. वो भी नहीं करते, क्योंकि उनके लिए पैसा महत्वपूर्ण है.

क्या आप रणबीर की चॉइसेस से खुश हैं?
नहीं. उस वक्त तो खुश नहीं था, जब उसने यह सब करना शुरू किया था. सब कहते थे कि क्या हो गया है तेरे बेटे को? मैं भी सोचता था कि क्या हो गया है. आज उसने सबको चुप करवा दिया है. पहले जब सरदार (रॉकेट सिंह सेल्समैन ऑफ द ईयर) बनकर घूमता था, फिर बाल बढ़ाकर रॉकस्टार कर रहा था, फिर गूंगे-बहरे का रोल कर रहा था, तो लोगों को कसीदे कसने में और कमेंट पास करने में तो कुछ जाता नहीं है ना. मुझे भी बुरा महसूस होता था कि यार, मेरा बेटा क्या कर रहा है. आज रणबीर ने सबको बोल दिया है कि शट अप. जस्ट कीप क्वाइट. मैं वही करूंगा, जो मैं करना चाहता हूं.
उस दौरान क्या आप रणबीर को बोलते थे कि ऐसा मत करो?
नहीं, मैंने कभी नहीं बोला. मैंने उसे उसका स्पेस दिया. आज उसने कमर्शियल जोन में आकर ये जवानी है दीवानी करके अपने आपको प्रूव कर दिया है. बर्फी! जैसी पिक्चर ने सौ करोड़ का बिजनेस किया. यह एक बड़ी अचीवमेंट है. ईश्वर की उस पर कृपा रही है. बस, अपना काम मेहनत से करते रहो, हमने अपने बुजुर्गों से यही सीखा है. मैं अपने बच्चे से यही बोलता हूं कि जैसे काम कर रहे हो, वैसे ही करो, लगन से करो.

क्या आरके बैनर फिर से सक्रिय हो रहा है?
आरके के बारे में मेरे से बात मत करो. आरके मेरे हिसाब से बंद हो चुका है. कोई पिक्चर उसमें बनने वाली नहीं है. सब झूठ बोलते हैं कि उसमें पिक्चर बनने वाली है.

क्या आप दोबारा डायरेक्शन में लौटेंगे?
मेरे पास बिल्कुल समय नहीं है. मैं डायरेक्टर गलती से बन गया था. मैं बेसिकली एक एक्टर हूं. फिल्ममेकिंग मेरा पैशन नहीं है.

नए कलाकारों में आपको किसका काम अच्छा लगता है?
मुझे इरफान खान बहुत अच्छे लगते हैं. बहुत अच्छे इंसान भी हैं. वह फाइन एक्टर हैं. अर्जुन रामपाल ने भी बहुत इंप्रूव किया है. मेरे हिसाब से सुशांत सिंह राजपूत, आयुष्मान खुराना और अर्जुन कपूर अच्छा काम करते हैं. मैं उन्हीं के बारे में बोल सकता हूं, जिनके साथ काम किया है.

किस निर्देशक का काम आपको पसंद है?
अनुराग कश्यप की फिल्म देखी है गैग्स ऑफ वासेपुर. अच्छी लगी थी. थोड़ी स्लो और लंबी थी. उनकी और कोई पिक्चर नहीं देखी. सुना है कि वह अच्छी पिक्चरें बनाते हैं.
नवाजुद्दीन पर भड़के ऋषि कपूर 
"मैंने कहीं पढ़ा कि नवाजुद्दीन (सिद्दिकी) नाम के कोई एक्टर हैं, उन्होंने कुछ उल्टा-सीधा कहा है कि रोमांटिक हीरोज रनिंग अराउंड द ट्रीज. उनके बाप-दादा भी नहीं कर सकते हैं ऐसा काम. वो खुद तो क्या करेंगे. इट्स वेरी डिफिकल्ट टू ब्लडी सिंग सॉन्ग्स एंड रोमांस द ब्लडी डैम हीरोइन. डोंट थिंक्स इट्स ईजी. तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई ऐसा कहने की? तुम्हारी औकात क्या है कि तुम किसी में इंसपिरेशन डालो. तुम हो कौन यार? तुम कमेंट क्या पास करते हो कि व्हाट इज ग्रेट अबाउट डूइंग दैट? आपको पता है कि यह करने में क्या हुनर चाहिए होता है? कभी शाहरुख खान से पूछना, सलमान से पूछना, कभी अक्षय कुमार से पूछना, कभी जितेन्द्र से पूछना, राजेश खन्ना तो रहे नहीं. बच्चन साब से पूछना... गाना गाना या रोमांस करना आसान काम नहीं है हिंदी फिल्मों में. मेरे दोस्त, मेरे अजीज, मेरे जूनियर नवाजुद्दीन शाह (सिद्दिकी) को यह पता नहीं. और उनको ऐसी गलत बात बिल्कुल नहीं बोलनी चाहिए. इट्स टेक्स लॉट ऑफ आर्ट, इट टेक्स लॉट ऑफ टैलेंट टू डू दिस. मैं आपके टैलेंट को धुत्कार नहीं रहा हूं. मैंने सुना है कि आप बहुत अच्छे एक्टर हैं. एकाद पिक्चरें आपकी देखी भी हैं, जिसमें आप बहुत एवरेज थे. लेकिन दूसरे जो करते हैं, उसमें बहुत मेहनत लगती है. आपने जिंदगी में वह कभी किया नहीं है और आपको कभी मौका भी नहीं मिलेगा. आप कर भी नहीं सकते. आपकी इमेज नहीं है. आपमें वह टैलेंट नहीं है."

साभार: फ़िल्मफ़ेयर

Friday, September 20, 2013

फिल्‍म समीक्षा : द लंचबाक्‍स

मर्मस्‍पर्शी और स्‍वादिष्‍ट
-अजय ब्रह्माात्‍मज 
रितेश बत्रा की 'द लंचबॉक्स' सुंदर, मर्मस्पर्शी, संवेदनशील, रियलिस्टिक और मोहक फिल्म है। हिंदी फिल्मों में मनोरंजन की आक्रामक धूप से तिलमिलाए दर्शकों के लिए यह ठंडी छांव और बार की तरह है। तपतपाते बाजारू मौसम में यह सुकून देती है। 'द लंचबॉक्स' मुंबई के दो एकाकी व्यक्तियों की अनोखी प्रेमकहानी है। यह अशरीरी प्रेम है। दोनों मिलते तक नहीं, लेकिन उनके पत्राचार में प्रेम से अधिक अकेलेपन और समझदारी का एहसास है। यह मुंबई की कहानी है। किसी और शहर में 'द लंचबॉक्स' की कल्पना नहीं की जा सकती थी।
'द लंचबॉक्स' आज की कहानी हे। मुंबई की भागदौड़ और व्यस्त जिंदगी में खुद तक सिमट रहे व्यक्तियों की परतें खोलती यह फिल्म भावना और अनुभूति के स्तर पर उन्हें और दर्शकों को जोड़ती है। संयोग से पति राजीव के पास जा रहा इला का टिफिन साजन के पास पहुंच जाता हे। पत्‍‌नी के निधन के बाद अकेली जिंदगी जी रहे साजन घरेलू स्वाद और प्यार भूल चुके हैं। दोपहर में टिफिन का लंच और रात में प्लास्टिक थैलियों में लाया डिनर ही उनका भोजन और स्वाद है। इस रूटीन में टिफिन बदलने से नया स्वाद आता है। उधर इला इस बात से खुश होती है कि उसका बनाया खाना किसी को इतना स्वादिष्ट लगा कि वह टिफिन साफ कर गया। ऊपर वाली आंटी की सलाह पर वह हिचकते हुए साजन को पत्र भेज देती है। सामान्य औपचारिकता से आंरभ हुए पत्राचार में खुशियों की तलाश आरंभ हो जाती है।
साजन और इला हिंदी फिल्मों के नियमित किरदार नहीं हैं। रिटायरमेंट की उम्र छू रहे विधुर साजन और मध्यवर्गीय परिवार की उपेक्षित बीवी इला को स्वाद के साथ उन शब्दों से राहत मिलती है, जो टिफिन के डब्बे में किसी व्यंजन की तरह आते-जाते हैं। एक-दूसरे के प्रति वे जिज्ञासु होते हैं। मिलने की भी बात होती है, लेकिन ऐन मौके पर साजन बगैर मिले लौट आते हैं। इला नाराजगी भी जाहिर करती है। वास्तव में साजन और इला मुंबई शहर के ऐसे लाखों व्यक्तियों के प्रतिनिधि हैं, जिनकी दिनचर्या का स्वयं के लिए कोई महत्व नहीं है। शहरी जिंदगी में अलगाव की विभीषिका से त्रस्त इन व्यक्तियों के जीवन में संयोग से कोई व्यतिक्रम आता है तो उन्हें अन्य अनुभूति होती है।
साजन और इला के अलावा 'द लंचबॉक्स' में अनाथ असलम शेख भी हैं। असलम लापरवाह होने के साथ चालाक भी हैं। वह साजन के करीब आना चाहता है। साजन की बेरुखी से वह परेशान नहीं होता। अपनी कोशिशों से वह साजन को हमदर्द और गार्जियन भी बना लेता है। दोनों के रिश्ते में अनोखा जुड़ाव है। असलम के साथ हम मुंबई की जिंदगी की एक और झलक देखते हैं।
रितेश बत्रा ने कुछ किरदारों को दिखाया ही नहीं है, लेकिन उनकी मौजूदगी महसूस होती है। 'ये जो है जिंदगी' के रिकॉर्डेड एपीसोड देखते समय साजन हमें अपनी बीवी से मिलवा देते हैं। असलम की मां भी तो नजर नहीं आती, जबकि असलम की हर बातचीत में उनका जिक्र होता है। इला के ऊपर के माले के देशपांडे अंकल का उल्लेख होता है, जो बिस्तर पकड़ चुके हैं। आंखें खुलने पर वे दिन-रात छत से टंगा पंखा ही निहारते रहते हैं। और देशपांडे आंटी ़ ़ ़ उनकी खनकदार और मददगार आवाज ही सुनाई पड़ती है। आरती आचरेकर की आवाज से भारतीय दर्शकों के मानस में उनकी आकृति और अदा उभर सकती है। रितेश बत्रा ने किरदारों के चित्रण में मितव्ययिता से फिल्म को चुस्त रखा है। अगर ये सभी किरदार दिखाए जाते तो फिल्म की लंबाई बढ़ती। उनकी अदृश्य मौजूदगी अधिक कारगर और प्रभावशाली बन पड़ी है।
इरफान (साजन) और निम्रत कौर (इला) सहज, संयमित और भावपूर्ण अभिनय के उदाहरण हैं। डायनिंग हॉल के टेबल पर अपरिचित टिफिन को खोलते समय इरफान के एक-एक भाव को पढ़ा सकता है। टिफिन खोलते और व्यंजनों की सूंघते-छूते समय इरफान के चेहरे पर संचरित भाव अंतस की खुशी जाहिर करता है। ऐसे कई दृश्य हैं, जहां इरफान की खामोशी सीधे संवाद करती है। निम्रत कौर ने उपेक्षित पत्‍‌नी के अवसाद को अपनी चाल-ढाल और मुद्राओं से व्यक्त किया है। व्यस्त पति की उपेक्षा से घरेलू किस्म की महिला की दरकन को वह बगैर बोले बता देती हैं। इन दोनों प्रतिभाओं के योग में नवाजुद्दीन सिद्दिकी का स्वाभाविक अभिनय अतिरिक्त प्रभाव जोड़ता है।
'द लंचबॉक्स' मुंबई शहर की भी कहानी है। हिंदी फिल्मों से वंचित शहरी जीवन के अंतरों में बसे आम आदमी के सुख-दुख को यह समानुभूति के साथ पेश करती है। फिल्म की खूबियों में इसका छायांकन और पाश्‌र्र्व संगीत भी है। फिल्म के रंग और ध्वनि में शहर की ऊब, रेलमपेल, खुशी और गम के साथ ही हर व्यक्ति से चिपके अकेलेपन को भी हम देख-सुन पाते हैं।
अवधि-110 मिनट
**** 1/2  साढ़े चार स्‍टार

Tuesday, July 16, 2013

नवाजुद्दीन सिद्दिकी पर खुर्शीद अनवर

खुर्शीद अनवर दोस्‍त हैं मेरे। उन्‍होंने घोषित रूप से 1985 के बाद फिल्‍में नहीं देखी हैं। उनकी दोस्‍ती मुझ से और संजय चौहान से है। हमारी वजह से वे इस दशक की फिल्‍मों के बारे में थोड़ा-बहुत जानते हैं। फिल्‍में फिर भी नहीं देखते। वैसे एक फिल्‍म 'लीला' के संवाद लिख चुके हैं। और दबाव डालने पर संजय चौहान की लिखी 'पान सिंह तोमर' देखी थी। पिछले दिनों मैं दिल्‍ली में था। नवाजुद्दीन सिद्दिकी भी आए थे। हम एक साथ डिनर पर गए। रास्‍ते में परिचय कराने के बावजूद तीन मर्तबा खुर्शीद ने नवाज को शाहनवाज नाम सं संबोधित किया। गलती का एहसास होने पर उसने माफी मांगी और वादा किया कि उनकी फिल्‍म देखेंगे। और सिर्फ देखेंगे ही नहीं,उन पर कुछ लिखेंगे। तो प्रस्‍तुत है नवाजुद्दीन सिद्दिकी के बारे में खुर्शीद अनवर के विचार....

ज़माना गुज़रा फिल्में मेरे लिए ख़्वाब हुई। नाता रहा तो फिल्म इंडस्ट्री में मौजूद दोस्तों से. अजय ब्रह्मात्मज और संजय चौहान जो मेरे दोस्त, रिश्तेदार, सब हैं। हाँ, फ़िल्मी गीत संगीत से नाता बना रहा। बस ज़ायके में ज़रा बदमज़गी का एहसास ज़रूर रहा जब नया दौर आया फ़िल्मी संगीत का। पर संस्कृति तो बदलेगी समाज की रफ़्तार के साथ. वक्त करवट लेता है और तो संस्कृति पहलू बदलेगी ही। “चलत मुसाफिर मोह लिए रे पिंजरे वाली मुनिया” से “मुन्नी बदनाम हुई”. “तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है” फिर “अंखियों से गोली मारे”. बदलाव और भी आये। वह किस्सा अलग मगर कल मुझे देखनी पड़ी गैंग ऑफ वासेपुर. देखनी पड़ी।हाँ दो वजह से. नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी से हुई मुलाक़ात और अजय ब्रह्मात्मज के तंज. नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी से मुलाक़ात का ज़िक्र उनकी फिल्म देखने के सन्दर्भ के साथ। यानि फिल्म के किरदार का अक्स और और वह शख्स जिस से मुलाक़ात हुई मेरी।
वादा किया गैंग ऑफ वासेपुर देखूंगा। अभी चंद सीन देखे थे, जिसमे नवाज़ुद्दीन नज़र आये. बरबस, खुद-बा-खुद काज़ी नज़रुल इस्लाम की कालजयी कविता “बिद्रोही कानों में गूंजने लगी।
“अमी उन्माद अमी उन्माद अमी उन्माद”. “
दानिश की मौत. नग्मा का चैलेन्ज. और फैज़ल का चेहरा.. बहुत आहिस्ता ...बदला लेगा...इस आहिस्ता में मैंने सुनी “ अमी महा हुंकार” “अमी प्रचण्ड”. इतना आत्मविश्वास मगर हुंकार में दबी गरज को अभिव्यक्ति तब मिलती है जब “वासेपुर की कोई दुकान ......” “रुद्रो रुद्रो भगवान चोले” “अमी महामारी, अमी बिध्वंशो”
मैंने पीछे पलट कर देखा. अजय के साथ होटल से बाहर आता एक चेहरा. नाआशना। एक इंसान. “ मैं खुर्शीद”... “ नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी” हम गाड़ी में बैठे. “माफ करना शाहनवाज़ फिल्मे देखना बंद करने के बाद ज़रा पीछे रह गया।” मैंने देखा नहीं पर नवाज़ को नागवार गुज़रा होगा मेरा गलत नाम लेना। कोई आपत्ति नहीं . अजय ने बताया. नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी, शाहनवाज़ नहीं. “ सिगरेट पी लूँ आपकी गाड़ी में” फिर अजनबियत खत्म. हर बात मजाक और पुराने दोस्त जैसे। मेरा ख्याल है कि कोई और स्टार मुझसे बात न करता उसके बाद। मगर “चिरो उन्नतो शिर” नवाज़ुद्दीन.
अब फिल्म जो अभी देख रहा था.देखते देखते रामाधीर सिंह की हत्या तक आया। दृश्य. बेदर्द. “ अमी परशुरामेर कठोर कुठार”. चेहरे के हाव भाव।
नवाज़ुद्दीन और हम सब खाने की टेबल पर। हँसते मुस्कुराते। कानाफूसी करते। कुठार की जगह दिलदार. वसीम भाई के सामने एक इंसान जो अपने अतीत के संघर्ष को उतना ही अज़ीज़ मानता है जितना वर्तमान की सफलता को। फिर बातों का सिलसिला. फोन. वादे। जो मैंने पूरा किया। और पहली बार कलम किसी फिल्म कलाकार पर उठाई।
अब कलाकार का कारनामा याद आया. रामाधीर सिंह की हत्या का दृश्य देखना मेरे बस का नहीं पर देखा। गोलियों पर गोलियां दागने के बाद एक बार गर्दन दायें तरह हलकी सी मुड़ी। जैसे कहा हो “बदला लेगा. बाप का दादा का।” देखो मैंने पूरा किया।
अंत... तल्ख़ ज़हरीली मुकुराहट।. “अमी नृशंसो . अमी धृष्टओ”
नवाज़ुद्दीन मैं और अजय साथ निकले हिमानी और वसीम भाई के यहाँ से। शालीन। बेबाक। दोस्त जैसे पुराने हों. अगले रोज़ फोन। और वासेपुर देखने का वादा निभाया।
 जाना ज़मीन से जुड़े इन्सां को और उसके अंदर के किरदारी तूफ़ान को।

Thursday, January 3, 2013

पुरस्कारों से वंचित प्रतिभाएं




-अजय ब्रह्मात्मज
    साल खत्म होने के साथ ही हिंदी फिल्मों के लोकप्रिय पुरस्कारों के इवेंट शुरू हो गए हैं। इस साल जून तक इनका सिलसिला जारी रहेगा। विभिन्न मीडिया घरानों और संस्थानों द्वारा आयोजित इन पुरस्कार समारोहों में पिछले साल दिखे और चमके सितारों में से चंद लोकप्रिय नामों को पुरस्कृत किया जाएगा। शुरू से यह परंपरा चली आ रही है कि लोकप्रिय पुरस्कार बाक्स आफिस पर सफल रही फिल्मों के मुख्य कलाकारों को ही दिए जाएं। अभी तक उनका पालन हो रहा है। दरअसल, फिल्मों के लगभग सारे पुरस्कार समारोह इवेंट में बदल चुके हैं। कालांतर में इनका टीवी पर प्रसारण होता है इसलिए जरूरी होता है कि परिचित और मशहूर चेहरों को ही सम्मान से नवाजा जाए। इसी बहाने वे इवेंट में परफार्म करते हैं। इवेंट की शोभा बढ़ाते हैं। प्रसारण के समय दर्शक जुटाते हैं।
    2012 में  नौ फिल्मों ने सौ करोड़ से अधिक का बिजनेस किया। इन फिल्मों में हमने तीनों खान के अलावा अजय देवगन, अक्षय कुमार, रितिक रोशन और रणबीर कपूर को देखा। इस साल सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के तमाम पुरस्कार इन्हीं के बीच बटेंगे। आमिर खान और अजय देवगन घोषित रूप से पुरस्कार समारोहों में हिस्सा नहीं लेते, इसलिए उन्हें पुरस्कृत करने की संभावनाएं कम हैं। रह गए सलमान खान और शाहरुख खान ़ ़ ़ इन में सलमान को पुरस्कारों की परवाह नहीं रहती। हां, शाहरुख खान अभी तक पुरस्कारों के लिए लालायित रहते हैं। ‘अग्निपथ’ में रितिक रोशन और ‘बर्फी’ में रणबीर कपूर ने उल्लेखनीय अभिनय से प्रभावित किया है। संभावना है कि एक-दो पुरस्कार इनके हिस्से भी आ जाएं।
    इन लोकप्रिय सितारों के अलावा इस साल तीन अन्य अभिनेताओं ने अपनी फिल्मों में अदाकारी की खास छाप छोड़ी। सबसे पहले इरफान खान का नाम लें। तिग्मांशु धूलिया की फिल्म ‘पान सिंह तोमर’ में इरफान खान ने शीर्षक भूमिका को उसकी उम्र और भावनाओं के साथ संजीदगी से निभाया। एथलीट फौजी पान सिंह तोमर की गतिशीलता को पर्दे पर चपल तरीके से दिखाना आसान नहीं रहा होगा। और फिर जब पान सिंह तोमर बागी होकर बीहड़ में घूसता है तो उसकी जिंदगी उबड़-खाबड़ हो जाती है। इरफान ने भाषा, लहजा और बॉडी लैंग्वेज के लिहाज से बहुत ही उम्दा अभिनय किया है।
    ऐसे ही पिछले साल मनोज बाजपेयी की प्रतिभा के भिन्न आयाम पर्दे पर दिखे। अनुराग कश्यप की ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’,  प्रकाश झा की ‘चक्रव्यूह’ और वेदव्रत पाएन की ‘चिटगांव’ में हमने इस प्रतिभाशाली अभिनेता को विभिन्न किरदारों में देखा। हर किरदार को मनोज बाजपेयी ने अभिनय की बारीकी से अलग रखा। उन्होंने एक बार फिर से साबित किया कि अलग चुनौतीपूर्ण भूमिकाएं मिले तो उन में गहराई तक उतर सकते हैं।
    पिछले साल ही हमने लगभग एक दशक से ज्यादा समय से सक्रिय और संघर्षरत अभिनेता नवाजुद्दीन सिद्दिकी को अपनी छंटा बिखेरते देखा। ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ में फैजल खान के किरदार को उन्होंने सच्चाई के साथ चित्रित किया। इस फिल्म के दूसरे भाग के नायक नवाजुद्दीन सिद्दिकी ही हैं। उन्होंने निर्देशक अनुराग कश्यप के भरोसे को नहीं टूटने दिया। पर्दे पर उनके किरदार में आया परिवर्तन बखूबी उभरा। एक साथ इमोशन के इतने शेड कम किरदारों को मिलते हैं। यह नवाजुद्दीन की प्रतिभा ही है कि वे इस भूमिका में कहीं नहीं चूकते।
    यकीन करें। ये तीनों प्रतिभाएं इस साल पुरस्कारों से वंचित रहेंगी। कुछ स्थानों पर इनका नामांकन भले ही हो जाए, लेकिन ठीक इनकी आंखों के सामने साधारण और औसत अभिनेताओं को पुरस्कृत कर इन्हें ठेस पहुंचाया जाएगा। एक-दो आयोजकों ने अगर हिम्मत की तो भी इन्हें क्रिटिक अवार्ड की कैटेगरी में डाल देंगे। तात्पर्य यह है कि प्रतिभा, लोकप्रियता और पुरस्कार के बीच कोई तालमेल नहीं रहता। पुरस्कार तो सिर्फ उन चमकते चेहरों को दिया जाता है जो भीड़ जुटाने को काम करते हैं। यह भी एक किस्म की प्रतिभा है, लेकिन इसे सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का नाम देना सही नहीं है।


Wednesday, August 8, 2012

फिल्‍म समीक्षा : गैंग्‍स ऑफ वासेपुर 2

ओझल समाज का लहूलुहान सच 

-अजय ब्रह्मात्‍मज

कहानी अब जाकर पूरी हुई। दुश्मनों के वंशजों ने नए और निजी स्वार्थो की वजह से हाथ मिला लिए। भरपूर बदला लिया गया। खून की होली खेली गई। लहूलुहान रामाधीर सिंह को देख कर फैजल खान की प्रतिहिंसा की मात्रा का पता चला। नृशंस हत्यारे में तब्दील हो चुका फैजल खान अपने जीवन के दंश से फिर भी नहीं निकल पाया। उसने बदले की राह चुनी नहीं थी। वह दबाव में आ गया था,लेकिन हुआ क्या? खुद ही उसने अपना अंत तय कर लिया। गैंग्स ऑफ वासेपुर 2 में कोई किसी का सगा नहीं है। सभी पाला बदलते हैं। 1985 से 2009 तक की इस लोमहर्षक कहानी से हिंदी फिल्मों के दर्शक वंचित रहे हैं। गौर से देखिए। यह भी एक हिंदुस्तान है। यहां भी जीवन है और जीवन के तमाम छल-प्रपंच हैं। जीवन की इस सच्चाई से उबकाई या घिन आए तो मान लीजिए कि हिंदी सिनेमा ने आप को संवेदनशून्य कर दिया है। सच देखने की मौलिकता भ्रष्ट कर दी है।
गैंग्स ऑफ वासेपुर 2 सही मायने में सिक्वल है। इन दिनों हर फिल्म के 2और 3 की झड़ी लगी हुई है,लेकिन उनमें से अधिकांश सिक्वल नहीं हैं। सभी पहली फिल्म की सफलता का ब्रांड इस्तेमाल कर रहे हैं। इसके पहले राम गोपाल वर्मा ने अवश्य रक्तचरित्र दो हिस्सों में सिक्वल के तौर पर बनाई थी। गैंग्स ऑफ वासेपुर 2 की कहानी गैंग्स ऑफ वासेपुर के समाप्त होने से शुरू होती है। पिता की मौत पर दानिश खान का अनियंत्रित गुस्सा विनीत सिंह ने पूरी ऊर्जा के साथ पर्दे पर उतारा है। इस किरदार का फिल्म में ज्यादा स्पेस नहीं मिला है,लेकिन अपनी संक्षिप्त मौजूदगी के बावजूद वह हमें हिला देता है। बदले की इन घटनाओं से विरक्त फैजल खान चिलम के धुएं में मस्त रहता है। बड़े भाई दानिश की फब्तियों से भी उसे फर्क नहीं पड़ता,लेकिन मां के उलाहने को वह बर्दाश्त नहीं कर पाता। कसम खाता है कि दादा का,बाप का,भाई का ़ ़ ़ सबका बदला लेगा। इस संवाद के बाद हम फैजल खान के व्यक्तित्व में आए परिव‌र्त्तन को देखते हैं। हालांकि मोहसिना के प्रति उसकी मोहब्बत का गुलाबी रंग और अमिताभ बच्चन की फिल्मों का असर भी अंत तक बरकरार रहता है,लेकिन नए तेवर में वह धीरे-धीरे क्रूर और नृशंस होता चला जाता है। रोमांटिक,डिस्टर्ब और फ्रस्ट्रेटेड फैजल खान का बदला जघन्यतम है। फजलू के गला रेतने से लेकर रामाधीर सिंह की हत्या तक हम फैजल खान को ऐसे किरदार के रूप में देखते हैं,जो हिंदी फिल्मों के पर्दे पर पहली बार आया है।
हिंदी सिनेमा के प्रभाव और पारिवारिक-सामाजिक विसंगतियों के दबाव में फैजल खान का सृजन हुआ है। लेखक और निर्देशक ने अवश्य ही किसी वास्तविक किरदार पर उसे आधारित किया होगा,लेकिन उसके मिजाज को अपनी फिल्म के अनुकूल गढ़ा है। फैजल खान के किरदार में हम नवाजुद्दीन सिद्दिकी को देखते हैं। यह अनुराग कश्यप की सृजनात्मक हिम्मत ही है कि उन्होंने नवाजुद्दीन सिद्दिकी जैसे एक्टर को केंद्रीय किरदार निभाने की जिम्मेदारी दी। लुक और प्रेजेंस में वे पारंपरिक हीरो या प्रमुख किरदार की धारणा तोड़ते हैं। सिर्फ अपनी अभिनय प्रतिभा के बल पर नवाजुद्दीन सिद्दिकी ने इस जिम्मेदारी को सफलता से निभाया है। वे फिल्म के हर फ्रेम में प्रभावित करते हैं। निर्देशक का भरोसा भी उन दृश्यों में जाहिर होता है। और केवल फैजल खान ही नहीं,परपेंडिकुलर,डेफिनिट,टेंजेंट,गुड्डू,फजलू,गोपाल सिंह,शमशाद आदि के किरदारों के लिए भी नए एक्टरों में अनुराग कश्यप के विश्वास और साहस के दर्शन होते हैं। यह फिल्म कैरेक्टर,कैरेक्टराइजेशन और कास्टिंग के लिए भी भविष्य में पाठ के रूप में रेफर की जाएगी। अनुराग कश्यप और मुकेश छाबड़ा की टीम ने बेहतरीन काम किया है।
हालांकि फिल्म के अच्छे या बुरे होने का सारा क्रेडिट फिल्म के निर्देशक को मिलता है। इस फिल्म के पहले हिस्से के लिए अनुराग कश्यप की तारीफ हो चुकी है। दूसरे हिस्से के लिए भी उन्हें तारीफ मिलेगी। उनकी इस तारीफ के हिस्सेदार उनकी टीम भी है। कास्टिंग डायरेक्टर मुकेश छाबड़ा का उल्लेख हो चुका है। कॉस्ट्यूम डिजायनर सुबोध श्रीवास्तव दशकों में चल रही फिल्म के किरदारों को पीरियड के हिसाब से कपड़े पहनाए हैं। उन्होंने किरदारों के मिजाज का भी ध्यान रखा है। कैमरामैन राजीव रवि और अनुराग कश्यप की युगलबंदी देखने लायक है। भीड़ भरे बाजार के चेज सीन हों या दो व्यक्तियों के संवाद ़ ़ ़कई बार पूरी फ्रेम में अकेला किरदार है। राजीव रवि ने जरूरत के मुताबिक उन्हें कैमरे में कैद किया है। दो भिन्न दूश्यों के बीच में पर्दे को काला कर देने की युक्ति से फिल्म के प्रभाव में खलल नहीं पड़ता। देसी एक्शन और हिंसा की इस फिल्म चाकू,सुआ के उपयोग से लेकर गोलियों की बौछार तक में एक्शन डायरेक्टर के सुसंगत निर्देशन की झलक मिलती है। उन्होंने हिंसात्मक एक्शन को रचने में वास्तविकता का खयाल रखा है। चेज दृश्यों में एक्शन की टाइमिंग सहज नहीं रही होगी,क्योंकि उन्हें वास्तविक ट्रैफिक और बाजार की भीड़ के बीच शूट किया गया है। फिल्म की स्क्रिप्ट के लिए अनुराग कश्यप समेत सचिन लाडिया,अखिलेश और जीशान कादरी का उल्लेख करना ही होगा। लेखकों की टीम ने दूश्य रचने से लेकर संवाद गढ़ने तक में फिल्म के मर्म को ध्यान में रखा है। कुछ दृश्यों में अवश्य लेखक रमते नजर आते हैं।
फिल्म के गीत-संगीत का अंतिम प्रभाव में बड़ा योगदान है। स्नेहा खानवलकर ने पियूष मिश्रा और वरूण ग्रोवर की गीतों को लोक धुनों से सजाया है। इस फिल्म के तार बिजली से और काला रे गीतों में शब्दों के चयन पर गौर करें तो अर्थ की परतें खुलती हैं। तार बिजली से पतले हुए पिया और कोई नहीं इस इलाके की जनता है। गीतकार ने शादी के गीत के बहाने पिया की इस स्थित के लिए कहीं न कहीं बापू,गुलाबी चाचा,बाबूजी,लोकनायक और जननायक को दोषी ठहराते हुए उलाहना दिया है। दर्शक इन नामों से संबंधित नेताओं को जरा याद कर लें। वास्तव में यह शोकगीत है। इसी प्रकार काला रे गीत में फिल्म के नायक फैजल खान के चरित्र और द्वंद्व को गीतकार ने काला शब्द की विभिन्न छटाओं और क्रियाओं के इस्तेमाल से सटीक बना दिया है। पियूष मिश्रा की आवाज में आबरू गीत दृश्य के भाव को सही ढंग से पेश करता है। यशपाल शर्मा के गाए गीत और बैंड फिल्म के दृश्यों को मार्मिक बनाते हैं। गीत और पाश्‌र्र्व संगीत के सही उपयोग से फिल्म अधिक प्रभावशाली और अर्थपूर्ण हो गई है।
अनुराग कश्यप की यह फिल्म भी पहले हिस्से की तरह झकझोरती है। ऊपरी तौर पर यह गालियों और गोलियों से लबरेज लगती है,लेकिन निर्देशक ने उनका इस्तेमाल आयटम की तरह नहीं बल्कि टूल की तरह किया है। दर्शकों के दृश्य पटल से ओझल समाज और किरदारों को फिल्म में पेश कर अनुराग कश्यप ने उल्लेखनीय काम किया है। यह फिल्म आजादी के बाद एक इलाके में आयी तब्दीलियों को पूरी कठोरता के साथ पर्दे पर उतारती है। निर्देशक ने दर्शकों के असहज या बेचैन होने की परवाह नहीं की है। उन्होंने सही नब्ज पर उंगली रखी है।
**** चार स्टार

Friday, June 22, 2012

फिल्‍म समीक्षा : गैंग्‍स ऑफ वासेपुर

पर्दे पर आया सिनेमा से वंचित समाज

-अजय ब्रह्मात्‍मज
इस फिल्म का केवल नाम ही अंग्रेजी में है। बाकी सब कुछ देसी है। भाषा, बोली, लहजा, कपड़े, बात-व्यवहार, गाली-ग्लौज, प्यार, रोमांस, झगड़ा, लड़ाई, पॉलिटिक्स और बदला.. बदले की ऐसी कहानी हिंदी फिल्मों में नहीं देखी गई है। जिन दर्शकों का इस देश से संबंध कट गया है। उन्हें इस फिल्म का स्वाद लेने में थोड़ी दिक्कत होगी। उन्हें गैंग्स ऑफ वासेपुर भदेस, धूसर, अश्लील, हिंसक, अनगढ़, अधूरी और अविश्वसनीय लगेगी। इसे अपलक देखना होगा। वरना कोई खास सीन, संवाद, फायरिंग आप मिस कर सकते हैं।
अनुराग कश्यप ने गैंग्स ऑफ वासेपुर में सिनेमा की पारंपरिक और पश्चिमी सोच का गर्दा उड़ा दिया है। हिंदी फिल्में देखते-देखते सो चुके दर्शकों के दिमाग को गैंग्स ऑफ वासेपुर झंकृत करती है। भविष्य के हिंदी सिनेमा की एक दिशा का यह सार्थक संकेत है। देश के कोने-कोने से अपनी कहानी कहने के लिए आतुर आत्माओं को यह फिल्म रास्ता दिखाती है।
इस फिल्म में अनुराग कश्यप ने सिनेमाई साहस का परिचय दिया है। उन्होंने वासेपुर के ठीक सच को उसके खुरदुरेपन के साथ अनगिनत किरदारों के माध्यम से उतारा है। उनकी फिल्म रामाधीर सिंह और सरदार खान की दुश्मनी के बीच ही नहीं उलझी रहती। कहानी के महीन तार वासेपुर की गलियों से जुड़े हैं। एक पूरी तहजीब गैंग्स ऑफ वासेपुर में साकार होती है। जीवन की धड़कन सुनें।
फिल्म के किरदारों के साथ भटकें और हिंदी सिनेमा के पर्दे से दूर किए गए उन वंचितों से मिले जिन्हें अनुराग कश्यप और उनकी टीम ने पूरी संजीदगी के साथ पर्दे पर उतारा है। क्राफ्ट, टेकनीक और सिनेमा के लिहाज से फिल्म कमजोर हो सकती है, लेकिन कथ्य, कंटेंट और काले परिवेश को रचने में अद्भूत मजबूती है। फिल्म के छोटे-बड़े सभी किरदार अपनी छवि छोड़ जाते हैं।
गैंग्स ऑफ वासेपुर की कहानी 2004 में देश के हर घर में देखे जा रहे टीवी सीरियल सास भी कभी बहु थी से आरंभ होती है। छोटे से कमरे में सीरियल देख रहे परिवार पर अचानक हुई गोलीबारी से आफत आती है। टीवी स्क्रीन टूटता है। कहानी अपने परिवेश में आ जाती है और हमें वॉयसओवर से पता चलता है कि यह वासेपुर है, जो कभी बंगाल, फिर बिहार और अब झारखंड का हिस्सा है। मैट्रो और मल्टीप्लेक्स के कई दर्शक झारखंड से अपरिचित हो सकते हैं। देश के इसी हिस्से में अपने पिता शाहिद खान की हत्या पर सरदार खान कसम खाता है कि अब तो जिंदगी का एक ही मकसद है बदला। बदले की यह कहानी एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में आती है। फिल्म के अंत में बदले के लिए तैयार हो रही तीसरी पीढ़ी की भी झलक मिल जाती है।
गैंग्स ऑफ वासेपुर का ठोस सामाजिक-ऐतिहासिक संदर्भ है। यह सच्ची घटनाओं पर आधारित काल्पनिक कहानी है। कुछ किरदारों के नाम बदले गए हैं, लेकिन उन किरदारों का चरित्र वैसे ही रखा गया है। अनुराग कश्यप बताते चलते हैं कि समय के साथ वासेपुर के कारोबार में किस तरह के परिवर्तन होते गए। कोयले की चोरी, रेत का धंधा और लोहा-लक्कड़ की चोरी पृष्ठभूमि में चलती और दिखती रहती है। बदले की इस कहानी में केवल खून-खराबा ही नहीं है। मानव स्वभाव के मुताबिक प्रेम-रोमांस, हवस, दंगा-फंसाद की भी गुंजाइश बनी रहती है। पार्टी-पॉलिटिक्स पर अधिक ध्यान नहीं दिया गया है, लेकिन नौकरशाही और पॉलिटिक्स का फिल्म छूती है।
गैंग्स ऑफ वासेपुर में अनुराग कश्यप ने देश के एक हिस्से का स्लाइस निकालकर पर्दे पर परोस दिया है। इस स्लाइस में उस समाज के सतह के ऊपर-नीचे के सभी नमूने आ गए हैं। सब कुछ आम भारतीय समाज की तरह ऊपर से ठंडा,ठहरा, धीमा और शिथिल है,लेकिन थोड़ा खुरचें तो खलबली महसूस होती है। 1941 से 1985 तक पहुंची इस कहानी में देश के उस हिस्से को बखूबी देखा जा सकता है।
सरदार खान की भूमिका में मनोज बाजपेयी ने अभिनय की लंबी लकीर खींच दी है। उनकी परतदार प्रतिभा का अनुराग कश्यप ने प्रभावपूर्ण उपयोग किया है। सरदार खान में कोई भी गुण नहीं है, फिर भी वह रोचक, आत्मीय, करीबी और आसपास का लगता है। क्रूरता से लेकर रोमांस तक के दृश्यों में मनोज बाजपेयी की सहजता मुग्ध करती है। अपनी बीवी नगमा और दूसरी बीवी दुर्गा से सरदार के संबंधों के चित्रण में मनोज बाजपेयी एक साथ हंसाते और हर्षाते हैं। रिचा चड्ढा ने नगमा के किरदार को बहुत अच्छी तरह से निभाया है। वह इस फिल्म की खोज हैं। रीमा सेन को हम मसाला फिल्मों में देखते रहे हैं। यहां उनकी प्रतिभा का इस्तेमाल हुआ है। हुमा कुरेशी फिल्म के अंत में आती हैं। उनकी मौजूदगी आकर्षक है। हुमा कुरेशी और नबाजुद्दीन सिद्दिकी के बीच का कस्बाई रोमांस कोमल और ताजा है।
फैजल के किरदार में नवाजुद्दीन सिद्दिकी का प्रस्फुटन हुआ है। उनके बड़े भाई दानिश की भूमिका में आए विनीत सिंह ने संयमित अभिनय से चौंकाया है। वे प्रभावित करते हैं। साफ पता चलता है कि फिल्म के दूसरे भाग में दानिश और फैजल कमाल करेंगे। जयदीप अहलावत, जमील अहमद, पियूष मिश्रा, पंकज त्रिपाठी समेत सभी कलाकारों ने इस फिल्म को प्रभावशाली बनाया है। रामाधीर सिंह की भूमिका में में तिग्मांशु धूलिया चौंकाते हैं। उन्होंने किरदार के स्वभाव को समझा है और बगैर नाटकीय हुए उसे जी लिया है।
फिल्म का गीत-संगीत और पाश्‌र्र्व संगीत विशेष रूप से उल्लेखनीय है। वरूण ग्रोवर और पियूष मिश्रा के गीतों में कथ्य के अनुरूप शब्द और भाव हैं और स्नेहा ने उन्हें स्थानीय ध्वनियों से फिल्मों में अच्छी तरह पिरो दिया है। जीवी प्रकाश का पाश्‌र्र्व संगीत फिल्म की कथा को अर्थ और संदर्भ देता है। जीशान कादरी, सचिन और अनुराग कश्यप 44 साल की कहानी को ढाई घंटे में समेटने में सफल रहे हैं। कहीं-कहीं कहानी धीमी और ढीली जरूर पड़ती है, लेकिन संपूर्णता में कोई कमी नहीं रहती। अनुराग कश्यप की संलिप्तता कुछ दृश्यों को लगी करती और दोहराती है। थिएटर में जाकर गैंग्स ऑफ वासेपुर देखना एक अनुभव है। 
**** चार स्टार

Thursday, June 7, 2012

मेरे पास खोने के लिए कुछ नहीं था-नवाजुद्दीन सिद्दिकी


 
-अजय ब्रह्मात्मज
    (कई सालों तक नवाजुद्दीन सिद्दिकी गुमनाम चेहरे के तौर पर फिल्मों में दिखते रहे। न हमें उनके निभाए किरदार याद रहे और न वे खुद कभी लाइमलाइट में आए। उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री में पहचान बनाने की लंबी राह पकड़ी थी। शोहरत तो आंखों से ओझल रही। वे अपने वजूद के लिए पगडंडियों से अपनी राह बनाते आगे बढ़ते रहे। उन्होंने कभी हिम्मत नहीं हारी। वे अनवरत चलते रहे। और अब अपनी खास शख्सियत और अदाकारी से नवाजुद्दीन सिद्दिकी ने सब कुछ हासिल कर लेने का दम दिखाया है। पिछले पखवाड़े कान फिल्म फेस्टिवल में उनकी दो फिल्में ‘मिस लवली’ और ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ प्रदर्शित की गई। इंटरनेशनल फेस्टिवल में मिली सराहना से उनके किसान माता-पिता और गंवई घरवालों का सीना चौड़ा हुआ होगा।)
    दिल्ली से तीन घंटे की दूरी पर मुजफ्फरनगर जिले में बुढ़ाना गांव है। वहीं किसान परिवार में मेरा जन्म हुआ। घर में खेती-बाड़ी का काम था। पढ़ाई-लिखाई से किसी को कोई वास्ता नहीं था। अपने खानदान में मैंने पहली बार स्कूल में कदम रखा। उन दिनों जब पिता से पांच रुपए लेकर पेन खरीदा तो उनका सवाल था कि इसमें ऐसा क्या है कि पांच रुपए खर्च किए। मैंने उन्हें पेन खोलकर उसके पांच हिस्से दिखाए। लिखकर बताया। उस समय गांव में बिजली का नाम-ओ-निशान नहीं था। अभी भी बमुश्किल घंटे-दो घंटे के लिए बिजली आती है। अंधेरे में पूरा गांव सोता और जागता था। आज भी मेरे माता-पिता और दो भाई बुहाना में ही रहते हैं। बाकी भाई देहरादून शिफ्ट कर गए हैं।
    गांव से इंटरमीडिएट करने के बाद मैंने हरिद्वार के साइंस कॉलेज से बीएससी की डिग्री ली। यह 1990 की बात है। उसके बाद नौकरी की तलाश में बड़ौदा पहुंच गया। बड़ौदा में एक पेट्रोकेमिकल कंपनी में चीफ केमिस्ट की नौकरी मिल गई। क्रूड ऑयल के इलेक्ट्रिकल टेस्ट का काम था। काम करने के दौरान एक बार मुझे डर लगा कि थोड़ा भी ध्यान बंटा तो इलेक्ट्रिक शॉक लग सकता है। घबराहट में मैंने नौकरी छोड़ दी। पता नहीं था कि आगे क्या करना है? दोस्तों की संगत में खाली समय में नाटकों में रुचि जगी। थिएटर का सिलसिला आरंभ हुआ। एक साल तक नाटक देखने और फिर उनमें काम करना जारी रहा। दो-ढाई सौ नाटक देखने और दर्जन भर नाटक करने के बाद मुझे एहसास हुआ कि हिंदी थिएटर में बड़ौदा में कोई फ्यूचर नहीं है। दोस्तों ने सलाह दी कि दिल्ली चले जाओ। दिल्ली आने पर साक्षी ग्रुप से रिश्ता बना।
    साक्षी में तब सौरभ शुक्ला और मनोज बाजपेयी आदि सीनियर एक्टर थे। उनके साथ मैंने काम शुरू किया। दो सालों के अभ्यास और अनुभव के बाद एनएसडी में एडमिशन मिल गया। 1993 में एनएसडी में दाखिला मिला। वहां तीन सालों में थिएटर की सभी बारीकियां सीखीं। गांव से आने की वजह से लड़कियों-लडक़ों से मिलने में झेंप होती थी। वह टूटा। फिर एक रूसी निर्देशक पेपलेकोव से मुलाकात हुई। थर्ड इयर में उनका वर्कशॉप किया। उन्होंने मु़झे जीरो लेवल पर लाकर खड़ा कर दिया। फिर एक्टिंग के बारे में समझाना शुरू किया। उनके साथ नाटक करने के दौरान अपने अंदर के एक्टर से परिचय हुआ। तब तक मैं कामेडी रोल में पॉपुलर और स्टीरियोटाइप था। उन्होंने मुझे उससे निकाला और चुनौतियों के लिए प्रेरित किया। फिर मुझे किरदारों को जीने-निभाने के तरीके मिल गए।
    एनएसडी से निकलने के बाद मैं रेपटरी नहीं गया। मैं नहीं चाहता था कि वहां एक्टरों की तरह छोटी सुविधाओं और पैसों के पीछे भागूं। फ्रीज, गाड़ी और बाकी सुविधाओं से आगे सोचता था मैं। दिल्ली में तीन सालों तक अलग-अलग लोगों के साथ थिएटर, वर्कशॉप और ट्रेनिंग करता रहा। इस वजह से मैं निगेटिविटी से बच गया। गाइड करने वाला कोई नहीं था। सब कुछ अंदर से प्रस्फुटित हो रहा था। पेपलेकोव ने समझाया था कि फोकस और ध्यान कभी नहीं भटकना चाहिए। मैं उनसे बहुत मुतासिर और प्रेरित हुआ। एक्टिंग के प्रति ईमानदार हो गया। दिल्ली में पैसे कमाए। अपनी जिंदगी चलती रही। लगभग संतुष्ट था, लेकिन भागादौड़ी बहुत होती थी। तब तक फिल्म का कोई खयाल नहीं आया था। घरवाले समझते नहीं थे कि मैं क्या कर रहा हूं। उन्हें लगता था कि खाता-कमाता रहे। एक दिन अचानक लगा कि मैं कर क्या रहा हूं? दिन-रात की भागदौड़ और खाने के नाम पर चाय-बिस्किट या बिस्किट-चाय ़ ़ ़ फिर मैंने दिल्ली छोडऩे का निर्णय लिया और मुंबई आ गया।
    मुंबई यह सोच कर आया कि सीनियर लोग आते ही गले मिलेंगे और काम मिलना शुरू हो जाएगा। कुछ दोस्त थे अपने बैच के। तब सारे लोग गोरेगांव ईस्ट के वनराई में रहते थे। चार लोग एक साथ रूम शेयर करते थे। 1200 रुपए के कमरे में अपना शेयर भी जुटाना मुश्किल होता था। फिर फिल्मों में छोटे-मोटे काम शुरू किया। दिल्ली में रहते हुए मुझे ‘सरफरोश’ फिल्म में एक झलक दिखाने का मौका मिला था। फिल्म के आखिरी दृश्य में एक मिनट के लिए आया था। यहां आने के बाद एपिसोडिक टीवी सीरियल किए। तब तक एकता कपूर को सीरियलों का दौर आ गया और हमारे जैसे एक्टर निकम्मे हो गए।
    उन्हीं दिनों मुझे इरफान के निर्देशन में बनी इकलौती छोटी फिल्म ‘अलविदा’ में काम करने का मौका मिला। वह स्टार बेस्टसेलर में आया था। उससे बहुत तारीफ मिली। उसके बाद अनुराग कश्यप से मुलाकात हुई। उनकी ‘ब्लैक फ्रायडे’ मिली। उसमें टाइगर मेनन का एकाउंटेंट मुकादम बना था। ‘बाईपास’, ‘अलविदा’ और ‘ब्लैक फ्रायडे’ के बाद लगा कि काम मिल सकता है। उनके वीएचएस लोगों को दिखाने लगा था। मेरे कुछ दोस्त निराश होकर लौट गए। मैं वापस नहीं जा सकता था। सोचता था कि क्या मुंह लेकर जाऊंगा? दिल्ली भी नहीं जा सकता था। शर्म होती थी। माता-पिता की उम्मीद नहीं तोड़ सकता था। मैं भाई-बहनों में सबसे बड़ा हूं। उसका प्रेशर था। सात भाई और दो बहनें हैं मेरी। घर में कमाने वाला कोई नहीं था। लौटता तो भाइयों पर क्या असर होता?
     यहां रहकर फिल्में करता रहा। एक सीन भी कर लेता था कि अगली फिल्म में दो सीन मिलेंगे। एक-एक सीन की कई फिल्में हो गईं, लेकिन दूसरा सीन नहीं मिला। ‘सरफरोश’, ‘शूल’, ‘जंगल’, ‘मुन्नाभाई एमबीबीएस’ जैसी फिल्में कीं। एक एड फिल्म में बस में बैठने का काम मिला। निर्देशक ने कहा कि सब कोई न कोई एक्टिविटी करे। मैंने कहा कि मैं सो जाता हूं। शाम में सोने के पैसे मिल गया। एक और एड फिल्म की, जिसमें कैमरा सामने आने पर मुंह घूमा लेता था।
    मुंबई डराती बहुत थी, लेकिन मेरे पास खोने के लिए कुछ नहीं था। मैं निडर हो गया था। चार सालों तक गड़बड़ हालत रही। अनुराग कश्यप हमेशा भरोसा देता था कि अभी मेरी कोई औकात नहीं है, लेकिन किसी दिन कुछ लायक हुआ तो तुम्हें फिल्म दूंगा। उन दिनों मैंने एक्टरों को ट्रेंड किया। राजीव खंडेलवाल और रणवीर सिंह को ट्रेनिंग दी। ‘अभय’ और ‘हे राम’ के समय कमल हासन का डायलॉग निर्देशक था। उनके संवाद लिखे। पैसे कमाता रहा,लेकिन फिल्में नहीं थीं। फिर कबीर खान की ‘न्यूयार्क’ मिली। उस फिल्म के बाद लगा कि मैं टाइपकास्ट हो रहा हूं। मैं रोता अच्छा हूं तो टार्चर के सीन के लिए गरीब आदमी के लिए मुझे बुला लेते हैं। मैंने तय किया कि अब खुद का इस्तेमाल नहीं होने दूंगा। वैसे ही काम की वजह से ‘ए वेडनेसडे’ के लिए मना किया।
    बीच में ‘पीपली लाइव’ , ‘पान सिंह तोमर’ और ‘कहानी’ आ गई। मैं दावे के साथ कहता हूं कि एक्टिंग के क्राफ्ट पर मेरी इतनी मेहनत कम एक्टरों ने की होगी। मैं मनोज बाजपेयी का लोहा मानता हूं। उनकी तरह मैं खुद को एक्सप्लोर करता हूं। एक्टिंग की एक्सरसाइज करता हूं। मैं मोटी बुद्धि का अभिनेता हूं। स्मार्ट एक्टर नहीं हूं। अभी तक स्टेज पर नहीं बोल पाता। भीड़ में कोने में घुसने की कोशिश करता हूं। फिर भी मेरे मन में कभी कोई बदगुमानी नहीं हुई। शुरू में कुछ एक आदर्श थे। अभी कोई नहीं है। मुझे अच्छे दोस्त मिले हैं। अनुराग कश्यप ने हमेशा कहा कि छोड़ के जाना मत। हम लड़ेंगे और जीतेंगे। वापस जाओगे तो वहां कौन सी जिंदगी अच्छी हो जाएगी। मैं डटा रहा।
    अब ऐसा लग रहा है कि मेरा नंबर आ गया है। लोग पहचान रहे हैं। लेकिन अभी भी लंबी लड़ाई है। यहां केंद्रीय भूमिका में आना मुश्किल है। वह लगातार मिले तो हम अपनी प्रतिभा दिखा सकते हैं। स्थिति तो यह है कि जिन्हें दो करोड़ दिए जा रहे हैं, वे एक्टर ही नहीं हैं। हम एक्टर हैं, लेकिन हमारे लिए दो लाख भी महंगा हो जाता है। मन में विश्वास है कि मेरे दिन भी बदलेंगे। उम्मीद जाग रही है।
(2012 नवाजुद्दीन सिद्दिकी का साल कहा जा रहा है। उनकी ‘तलाश’,‘मिस लवली’,‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’,‘पतंग’,‘चिटगांव’ और ‘लायर्स डाइस’ इस साल रिलीज होंगी।)