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Thursday, February 26, 2009

एक तस्वीर:दिल्ली ६,अभिषेक बच्चन और...

इस तस्वीर के बारे में आप की टिप्पणी,राय,विचार,प्रतिक्रिया का स्वागत है.यह तस्वीर पीवीआर,जुहू,मुंबई में २२ फरवरी को एक खास अवसर पर ली गई है.बीच में घड़ी के साथ मैं हूँ आप सभी का अजय ब्रह्मात्मज.



Wednesday, February 18, 2009

विश्वास और भावनाओं से मैं भारतीय हूं: अभिषेक बच्चन

-अजय ब्रह्मात्मज
अभिषेक बच्चन की फिल्म 'दिल्ली 6' शुक्रवार को रिलीज हो रही है। यह फिल्म दिल्ली 6 के नाम से मशहूर चांदनी चौक इलाके के जरिए उन मूल्यों और आदर्शो और सपनों की बात करती है, जो कहीं न कहीं भारतीयता की पहचान है। अभिषेक बच्चन से इसी भारतीयता के संदर्भ में हुई बात के कुछ अंश-

आप भारतीयता को कैसे डिफाइन करेंगे?
हमारा देश इतना विशाल और विविध है कि सिर्फ शारीरिक संरचना के आधार पर किसी भारतीय की पहचान नहीं की जा सकती। विश्वास और भावनाओं से हम भारतीय होते हैं। भारतीय अत्यंत भावुक होते हैं। उन्हें अपने राष्ट्र पर गर्व होता है। मुझमें भी ये बातें हैं।

क्या 'दिल्ली 6' के रोशन मेहरा और अभिषेक बच्चन में कोई समानता है?
रोशन मेहरा न्यूयार्क में पला-बढ़ा है। वह कभी भारत नहीं आया। इस फिल्म में वह पहली बार भारत आता है, तो किसी पर्यटक की नजर से ही भारत को देखता है। यहां बहुत सी चीजें वह समझ नहीं पाता, जो शायद आप्रवासी भारतीय या विदेशियों के साथ होता होगा। मैं अपने जीवन के आरंभिक सालों में विदेशों में रहा, इसलिए राकेश मेहरा ने मेरे परसेप्शन को भी फिल्म में डाला। इससे भारत को अलग अंदाज से देखने में मदद मिली।

पढ़ाई के बाद भारत लौटने पर आप की क्या धारणाएं बनी थीं?
मेरे लिए सब कुछ आसान रहा। मैंने कभी भी खुद को देश से अलग नहीं महसूस किया। मेरा दृष्टिकोण अलग था। अलग संस्कृति और माहौल में पलने से वह दृष्टिकोण बना था। पश्चिमी और भारतीय संस्कृति को एक साथ मैं समझ सकता था। मुझे भारत आने पर कभी झटका या बिस्मय नहीं हुआ। सड़क पर गाय बैठे देखना किसी विदेशी के लिए अजीब बात हो सकती है, लेकिन मेरे लिए यह सामान्य बात थी। मेरे मुंह से कभी नहीं निकला कि स्विट्जरलैंड में तो ऐसा नहीं होता।

आपकी पीढ़ी के युवक विदेश भागना चाहते हैं या विदेश में रहना चाहते हैं। आप क्या सोचते हैं?
बाहर रहते हुए तो हमें छुट्टियों का इंतजार रहता था कि घर कब जाएंगे? घर का खाना कब मिलेगा। अपने कमरे के पलंग पर कब सोएंगे। बोर्डिग स्कूल के बच्चे स्कूल पहुंचते ही लौटने के बारे में सोचने लगते हैं। मैं कोई अपवाद नहीं था। आज भी आउटडोर शूटिंग में कुछ दिन गुजरने पर मैं घर लौटना चाहता हूं। छुट्टी मिलने पर परिजनों के साथ घर पर समय बिताता हूं। बचपन से यही ख्वाहिश रही है। मुझे भारत में रहना अच्छा लगता है।
विदेश प्रवास में भारत की किन चीजों की कमी महसूस करते हैं?
घर का सपना, घर के लोग, दोस्त और यहां का माहौल, दुनिया के किसी और देश में ऐसी मेहमाननवाजी नहीं होती। किसी देश के लोगों में ऐसी गर्मजोशी नहीं मिलेगी। पश्चिम के लोग ठंडे और एक-दूसरे से कटे रहते हैं।

एक विकासशील देश में अभिनेता होना कैसी चुनौती या आनंद पेश करता है?
हम जो भी हैं, वह दर्शकों की वजह से हैं। इस दृष्टि से देखें, तो हम जमीन पर रहे। मुझे नहीं लगता कि सड़क पर चल रहे आदमी से मैं किसी मायने में अलग हूं। मैं सुविधा संपन्न या अलग नहीं हूं। मैं खुद को उनके जैसा ही पाता हूं। उन्होंने मुझे स्टार बनाया है। मैं जो हूं वही रहता हूं। लोगों से मिलने या बात करते समय मैं कोई और नहीं होता। लोगों को प्रभावित करने के लिए मुझे मेहनत नहीं करनी पड़ती।

कहते हैं आप अपनी छवि को लेकर आक्रामक नहीं हैं। आप अपने प्रचार में भी ज्यादा रुचि नहीं लेते?
मैं अपना प्रचार नहीं कर सकता। मैं इसे अच्छा भी नहीं मानता। दर्शक मुझे मेरी फिल्मों से जानते-पहचानते हैं। वे फैसला करते रहते हैं। मीडिया से बातें करते समय मैं बहुत खुश होता हूं। मुझे अपनी रोजमर्रा जिंदगी के बारे में बातें करना अच्छा नहीं लगता। दर्शकों से मेरा रिश्ता अभिनेता होने की वजह से है। उनकी रुचि मेरी फिल्मों में है। मैं अपना बिगुल नहीं बजा सकता। हां, फिल्म आती है, तो जरूर फिल्म के बारे में बातें करता हूं।

Tuesday, February 17, 2009

दिल्ली ६ के बारे में राकेश ओमप्रकश मेहरा

अभिषेक बच्चन और सोनम कपूर के साथ दिल्ली 6 में दिल्ली के चांदनी चौक इलाके की खास भूमिका है। चांदनी चौक का इलाका दिल्ली-6 के नाम से भी मशहूर है। राकेश कहते हैं, मुझे फिल्मों के कारण मुंबई में रहना पड़ता है। चूंकि मैं दिल्ली का रहने वाला हूं, इसलिए मुंबई में भी दिल्ली खोजता रहता हूं। नहीं मिलने पर क्रिएट करता हूं। आज भी लगता है कि घर तो जमीन पर ही होना चाहिए। अपार्टमेंट थोड़ा अजीब एहसास देते हैं।

क्या दिल्ली 6 दिल्ली को खोजने और पाने की कोशिश है?
हां, पुरानी दिल्ली को लोग प्यार से दिल्ली-6 बोलते हैं। मेरे नाना-नानी और दादा दादी वहीं के हैं। मां-पिता जी का भी घर वहीं है। मैं वहीं बड़ा हुआ। बाद में हमलोग नयी दिल्ली आ गए। मेरा ज्यादा समय वहीं बीता। बचपन की सारी यादें वहीं की हैं। उन यादों से ही दिल्ली-6 बनी है।

बचपन की यादों के सहारे फिल्म बुनने में कितनी आसानी या चुनौती रही?
दिल्ली 6 आज की कहानी है। आहिस्ता-आहिस्ता यह स्पष्ट हो रहा है कि मैं अपने अनुभवों को ही फिल्मों में ढाल सकता हूं। रंग दे बसंती आज की कहानी थी, लेकिन उसमें मेरे कालेज के दिनों के अनुभव थे। बचपन की यादों का मतलब यह कतई न लें कि यह पुरानी कहानी है। दिल्ली 6 आने वाले कल की कहानी है। फिल्म के अंशो को देख चुके लोगों ने बताया कि यह फिल्म अब ज्यादा प्रासंगिक हो गयी है। पूरी दुनिया में जो घटनाएं घट रही हैं, वे इस फिल्म को अधिक महत्वपूर्ण बना रही हैं। इसमें जिंदगी का हिस्सा बन रही घटनाओं का चित्रण है। फिल्म को भौगोलिक तौर पर दिल्ली में रखा है। मैं दिल्ली की गलियों, खुश्बू, तौर-तरीकों और लोगों से परिचित हूं। मुझे रिसर्च करने की ज्यादा जरूरत नहीं पड़ी।

रंग दे बसंती में दिल्ली थी और दिल्ली 6 में तो दिल्ली नाम में ही है। आपकी फिल्मों में स्थान या देशकाल सुनिश्चित रहने का कोई खास कारण?
मैं दिल्ली का हूं। मैं इस देश की भाषा बोलता हूं। इसकी संस्कृति में पला हूं और यही देख-देख कर बड़ा हुआ हूं। मैंने बाहर की दुनिया भी देखी है। 19 साल की उम्र से घूम रहा हूं। विदेश में भी नौकरी की। बाहर के एक्सपोजर का मतलब यह नहीं होता कि हम नकलची बंदर बन जाएं। अपनी कहानियां सुनाने में मजा आता है। गांव-घर में आज भी किस्से सुनाए जाते हैं। हम वही काम कर रहे हैं। बस,माध्यम अलग और खर्चीला है।

दिल्ली 6 के बारे में बताएं?
दिल्ली से जुड़ा मेरा एक अनुभव था। उसी को मैंने कहानी का रूप दिया। कमलेश जी ने उसका विस्तार किया। फिर प्रसून जोशी आए और वे कहानी को दूसरे स्तर पर ले गए। इस फिल्म में 9 गाने हैं, लेकिन कोई भी गाना लिप सिंक में नहीं है। एक जागरण है, जिसे मैंने रघुवीर यादव, ओम पुरी और पवन मल्होत्रा की आवाज में रखा है। एक रैप अभिषेक ने गाया है।

अभिषेक बच्चन और सोनम कपूर को प्रमुख भूमिकाएं सौंपने की क्या वजह रही?
अभिषेक बच्चन और मैं एक साथ करियर शुरू करने वाले थे। हम लोग समझौता एक्सप्रेस पर काम कर रहे थे। वह फिल्म नहीं बन सकी। फिर रंग दे बसंती आ गयी। दिल्ली 6 भी थोड़ी पहले बन सकती थी, लेकिन अभिषेक के पास समय नहीं था। मैंने बाहर तलाश की। संतुष्ट नहीं हुआ तो फिर अभिषेक के पास लौटा। सोनम के बारे में सोचने के बावजूद मैं आशंकित था। मुझे लग रहा था कि दिल्ली के मध्यवर्गीय परिवार की सामान्य लड़की की भूमिका में वो जंचेगी या नहीं? मैं मिलने गया तो एक घंटे की मुलाकात दिन भर लंबी हो गयी। मुझे सोनम न केवल जंची, बल्कि मैं तो कहूंगा कि वह दमदार अभिनेत्री हैं। उनमें नर्गिस और वहीदा रहमान की झलक है।