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Thursday, November 17, 2016

दरअसल : किसे परवाह है बच्‍चों की



-अजय ब्रह्मात्‍मज

वैसे भी वर्तमान सरकार को पिछली खास कर कांग्रेसी सरकारों की आरंभ की गई योजनाएं अधिक पसंद नहीं हैं। उन योजनाओं को बदला जा रहा है। जिन्‍हें बदल नहीं सकते,उन्‍हें नया नाम दिया जा रहा है। लंबे समय तक 14 नवंबर बाल दिवस के रूप में पूरे देश में मनाया जाता रहा है। 14 नवंबर देश के पहले प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरू का जन्‍मदिन है। चूंकि बचचों से उन्‍हें अथाह प्रेम था,इसलिए उनके जन्‍मदिन को बाल दिवस का नाम दिया गया। 40 की उम्र पार कर चुके व्‍यक्तियों को याद होगा कि स्‍कूलों में बाल दिवस के दिन रंगारंग कार्यक्रम होते थे। बच्‍चों के प्रोत्‍साहन और विकास के लिए खेल और सांस्‍कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते थे। कह सकते हैं कि तब बच्‍चों के लिए मनोरंजन के विकल्‍प कम थे,इसलिए ऐसे कार्यक्रमों में बच्‍चों और उनके अभिभावकों की अच्‍छी भागीदासरी होती थी।
इस साल 14 नवंबर आया और गया। देश के अधिकांश नागरिकों का समय बाल दिवस के पहले कतारों में बीत गया। वे अपनी गाढ़ी कमाई के पुराने पड़ गए नोटों को बदलवाने में लगे थे। उन्‍हें अपने बच्‍चों की सुधि नहीं रही। कमोबेसा सिनेमा में भी यही हाल रहा। पहले पत्र-पत्रिकाओं में औपचारिकता के लिए ही सही... लेकिन इस कमी पर चर्चा होती थी कि बच्‍चों के लिए फिल्‍में नहीं बन रही हैं। हमेकं बचचों के मनोरंजन के बारे में सोचना चाहिए। देश में चिल्‍ड्रेन फिल्‍म सोसायटी है। पिछले 61 सालों में इस सोसायटी की मदद से 61 फिल्‍में भी नहीं आ सकी हैं। फिल्‍म इंडस्‍ट्री की अनेक बड़ी हस्तियां इस सोसायटी की चेयरपर्सन रही हैं,लेकिन किसी ने भी उल्‍लेखनीय योगदान नहीं किया। सरकारी तंत्र में फंसे रहने की वजह से सोसायटी की अनेक सीमाएं हैं। उनसे निकलने के लिए किसी कल्‍पनाशील और विजनरी अध्‍यक्ष की जरूरत है। अभी इसके अध्‍यक्ष मुकेश खन्‍ना हैं। बच्‍चों से उनके लगाव और बच्‍चों की फिल्‍मों के प्रति उनकी चतना का आधार यही है कि उन्‍होंने कभी शक्तिमान नामक धारावाहिक बनाया था। यह काफी लोकप्रिय हुआ था। उनकी नियुक्ति के बाद कोई भारी बदलाव नहीं हुआ है। नीतियां वही हैं। पुरानी,घिसी-पिटी और बच्‍चों से बेरूख। बजट इतना कम रहता है कि ढंग से छोटी फिल्‍म भी नहीं बनाई जा सकती।
हां,चिल्‍ड्रेन फिल्‍म सोसायटी ने इतना अवश्‍य किया कि इस साल भी चिल्‍ड्रेन फिल्‍म फेस्टिवल का आयोजन किया। नए स्‍वरूप में हर दूसरे साल इसका आयोजन होता है। पिछली बार यह हैदराबाद में आयोजित किया गया था। इस साल 14 से 16 नवंबर तक इसका आयोजन जयपुर में किया गया। वहां बचचों की फिल्‍मों के विषय में औपचारिक चर्चाएं हुईं। ऐसे सेमिनारों का मकसद किसी ठोस निर्णय पर पहुंचना नहीं रहता। वही हुआ।
होना तो यह चाहिए कि चिल्‍ड्रेन फिल्‍म सोसायटी देश के लोकप्रिय फिल्‍मकारों को आमंत्रित करे। उन्‍हें एक बजट आबं‍टित करे। साथ ही उन्‍हें खुले बाजार से सहयोग की अनुमति दे। वे अपने प्रिय विषय पर फिल्‍में बनाएं। सभी फिल्‍मकार निजी बातचीत में स्‍वीकार करते हैं कि वे बच्‍चों के लिए फिल्‍में बनाना चाहते हैं। अपनी व्‍यस्‍तता और असुरक्षा की वजह से वे बच्‍चों की फिल्‍मों पर ध्‍यान नहीं दे पाते। अगर उन्‍हें सरकारी सुविधा और सुरक्षा मिले तो निश्चित ही वे सुंदर और मनोरंजक फिल्‍में लेकर आ सकते हैं। अभी तो शॉर्ट फिल्‍म और वेब सीरिज का दौर है। इनकी लागत कम होती है। इनके माध्‍यम से बच्‍चों के लिए मर्मस्‍पर्शी फिल्‍में बनाई जा सकती हैं।
बच्‍चों की फिल्‍मों के लिए स्‍पष्‍ट नीति के साथ सरकारी धन भी हो। चिल्‍ड्रेन फिल्‍म फस्टिवल किसी एक शहर तक सीमित न रहे। स्‍कूलों के सहयोग से वीकएंड में मिनी फेस्टिवल किए जाएं। देश-विदेश की फिल्‍मों का पैकेज तैयार हो और चिल्‍ड्रेन फिल्‍म सोसायटी इस कार्य में लीड लेने के साथ मदद भी करे। मुंबई में आयोजित इंटरनेशनल फिल्‍म फेस्टिवल में इस बार हाफ टिकट के अतर्गत देश-विदेश की चिल्‍ड्रेन फिल्‍म दिखाने की पहल अच्‍छी रही। इसके अनुसरण में देश के तमाम फिल्‍म फेस्टिवल में कुछ शो बच्‍चों के लिए समर्पित हों तो भी बेहतर होगा। फिर लगेगा कि हमें बच्‍चों की परवाह है।

Thursday, November 10, 2016

दरअसल : इस बार फिल्‍म बाजार



-अजय ब्रह्मात्‍मज
सन् 2007 में एनएफडीसी ने गवा में आयेजित इंटरनेशनल फिल्‍म फेस्टिवल के दौरान फिल्‍म बाजार का आयोजन आरंभ किया था। आरंभिक आशंका के बाद इसने अभियान का रूप ले लिया है। दक्षिण एशिया में इस स्‍तर का कोई फिल्‍म बाजार आयेजित नहीं होता। 2015 में 38 देशों के 1152 प्रतिनिधियों ने इसमें हिस्‍सा लिया,जिनमें 242 विदेशों से आए थे। अभी कई देशों से डिस्‍ट्रीब्‍यूटर,प्रोड्यूसर और फेस्टिवल क्‍यूरेटर फिल्‍म बाजार में आते हैं। यहां युवा फिल्‍मकारों को दिशा मिलती है। उनके लिए संभावनाएं बढ़ती हैं। फिल्‍म बाजार के प्रयास से ही पिछले कुछ सालों की चर्चित और पुरस्‍कृत फिल्‍में बन पाईं। हाल ही में मामी और टोक्‍यो में पुरस्‍कृत अलंकृता श्रीवास्‍तव की फिल्‍म लिपस्टिक अंडर माय बुर्का ने यहीं से प्रयाण किया था। पिछले सालों में लंचबॉक्‍स,चौथी कूट,कोर्ट और तिली जैसी फिल्‍मों को यहीं से उड़ान मिली।
फिल्‍म बाजार भारत के युवा फिल्‍मकारों के लिए क्रिएटिव संधिस्‍थल बन गया है। हर साल सैकड़ों युवा उद्यमी फिल्‍मकार यहां पहुंचते हैं और फिल्‍मों के ट्रेंड और बाजार से वाकिफ होते हैं। फिल्‍म बाजार अगर आक्रामक प्रचार करे और हिंदी एवं अन्‍य भारतीय भाषाओं में भी स्क्रिप्‍ट स्‍वीकार करे तो भागीदारी बढ़ सकती है। उन फिल्‍मकारों को भी लाभ होगा,जिनके पास कंटेंट है लेकिन वे अंग्रेजी में तंग हैं। चूंकि यह सरकारी आयेजन है,इसलिए भारत सरकार के जिम्‍मेदार अधिकारियों को इस तरफ ध्‍यान देना चाहिए। सुविधा और चलन से सारा विमर्श अंग्रेजी में हो रहा है। देश की लाखों प्रतिभाएं अंग्रेजी के दबाव में आगे नहीं बढ़ पा रही हैं। हालांकि यह फिजूल सी बात लगती है,लेकिन यह बहुत ही अहम मुद्दा है।

फिल्‍म बाजार में स्क्रिप्‍टरायटर्स लैब में लेखकों-निर्देशकों को देश-विदेश के विशेषज्ञों के साथ अपनी स्क्रिप्‍ट को बेहतर करने की समझ मिलती है। पिछले साल चिल्‍ड्रेन फिल्‍म के लिए भी स्क्रिप्‍टराटर्स लैब की शुरूआत हुई। इस साल स्क्रिप्‍टराटर्स लैब में 30 फिल्‍में चुनी गई हैं। इनमें से हिंदी की चार फिल्‍में चिल्‍ड्रेन लैब के लिए हैं और आठ फिल्‍में सामान्‍य श्रेणी में...उम्‍मीद की जानी चाहिए कि इनमें से कुछ फिल्‍में 2017 में चर्चित और पुरस्‍कृत होंगी। फिल्‍म बाजार में आउट ऑफ बॉक्‍स कटेंट की फिल्‍में आती हैं। इन फिल्‍मों को फिल्‍मकला के हिसाब से परखा और निखारा जाता है। कोशिश यह र‍हती है कि सिनेमा की प्रचलित सीमाएं टूटें। नए स्‍वरों और हस्‍ताक्षरों को मजबूत सहारा मिले।

फिल्‍म बाजार में विभिन्‍न प्रदेशों के स्‍टॉल भी लगते हैं,जो अपने प्रदेशों में शूटिंग की सुविधाओं और संभावनाओं के बारे में बताते हैं। अभी सभी हिंदी प्रदेशों में फिल्‍म नीति बन चुकी है। उनके लिए मौका है कि वे फिल्‍मकारों को अपने प्रदेश के लिए आकृष्‍ट करें। गुजरात और उत्‍तर प्रदेश इस संदर्भ में अग्रणी हैं। 

फिल्‍म बाजार की नॉलेज सीरिज अनोखी पहल है। इसमें फिल्‍म और संबंधित इंडस्‍ट्री के जानकार और विशेषज्ञ नॉलेज शेयर करते हैं। उनके लेक्‍चर और डिस्‍कशन से कई नए ट्रेंड की जानकारी मिलती है। पैनल डिस्‍कशन में फिल्‍म इंडस्‍ट्री के साथ दूसरे क्षेत्रों के माहिर से भी विमर्श के अवसर मिलते हैं। पिछले सालों में नॉलेज सीरिज में प्रतिनिधियों की भागीदारी बढ़ी है। जरूरत है कि फिल्‍म बाजार इस नॉलेज सीरिज को किसी माध्‍यम से सार्वजनिक तौर पर मुहैया कराए। फिल्‍म बाजार अपेन वेबसाइट से यह काम आसानी से कर सकता है।

एक जमाने में एनएफडीसी से सिनेमा इन इंडिया मैग्‍जीन का प्रकाशन होता था। ऐसी मैग्‍जीन फिर से प्रकाशित की जा सकती है। फंड और बजट की समस्‍या हो तो उसे ऑनलाइन किया जा सकता है। देश में फिल्‍मों के आर्ट और क्राफ्ट पर मैग्‍जीन व मंच की कमी है। फिल्‍म इंडस्‍ट्री में आने की इच्‍छुक प्रतिभाओं को संदर्भ सामग्री और पाठ नहीं मिल पाते। फिल्‍मी सामग्रियों के नाम पर पत्र-पत्रिकाओं में गॉसिप और लाइफ स्‍टायल का चलन बढ़ता जा रहा है।

फिल्‍म बाजार ने पिछले दस सालों में खास जगह और प्रतिष्‍ठा हासिल की है। वक्‍त आ गया है अब वह अगले लेवल की तैयारी करे। इसके लिए उसे सरकार और फिल्‍म इंडस्‍ट्री की भरपूर मदद मिलनी चाहिए।   

Thursday, November 3, 2016

दरअसल : रोमांटिक फिल्‍मों की कमी



दरअसल...
रोमांटिक फिल्‍मों की कमी
-अजय ब्रह्मात्‍मज
कभी हिंदी फिल्‍मों का प्रमुख विषय प्रेम हुआ करता था। प्रेम और रोमांस की कहानियां दर्शकों को भी अच्‍छी लगती थीं। दशकों तक दर्शकों ने इन प्रेम कहानियों को सराहा और आनंदित हुए। आजादी के पहले और बाद की फिल्‍मों में प्रेम के विभिन्‍न रूपों को दर्शाया गया। इन प्रेम कहानियों में सामाजिकता भी रहती थी। गौर करें तो आजादी के बाद उभरे तीन प्रमुख स्‍टारों दिलीप कुमार,देव आनंद और राज कपूर ने अपनी ज्‍यादार फिल्‍मों में प्रेमियों की भूमिकाएं निभाईं। हां,वे समाज के भिन्‍न तबकों का प्रतिनिधित्‍व करते रहे। इस दौर की अधिकांश फिल्‍मों में प्रेमी-प्रेमिका या नायक-नायिका के मिलन में अनेक कठिनाइयां और बाधाएं रहती थीं। प्रेमी-प्रेमिका का परिवार,समाज और कभी कोई खलनायक उनकी मुश्किलें बढ़ा देता था। दर्शक चाहते थे कि उनके प्रेम की सारी अड़चनें दूर हों और वे फिल्‍म की आखिरी रील तक आते-आते मिल रूर लें।
इन तीनों की अदा और रोमांस को अपनाने की कोशिश बाद में आए स्‍टारों ने की। कुछ तो जिंदगी भर किसी न किसी की नकल कर ही चलते रहे। धर्मेन्‍द्र जैसे एक्‍टर ने अलग पहचान बनाई। उन्‍होंने रोमांस में मर्दानगी जोड़ दी। वे पहले की पीढि़यों के सुकुमार हीरो नहीं थे। अपनी प्रेमिका को पाने के लिए खलनायकों से जूझने और भिड़ने में उनहें दिक्‍कत नहीं होती थी। अपने दम-खम से वे विश्‍वसनीय भी लगते थे। फिर आया अमिताभ बच्‍चन के एंग्री यंग मैन का दौर। अमिताभ बच्‍चन की फिल्‍मों में हीरोइनें तो रहती थीं,लेकिन उनकी भूमिका सिमट गई थी। उनकी सेक्‍स अपील पर निर्देशक अधिक भरोया करते थे। हिंसा और एक्‍शन के साथ नायिकाओं के देह दर्शन पर जोर दिया जाने लगा। ऐसी फिल्‍मों में प्रेम और रोमांस के लिए कम जगह रहती थी। हालांकि अमिताभ बच्‍चन ने कुछ उम्‍दा रोमांटिक फिल्‍मों में काम किया,लेकिन उनकी छवि नाराज युवक की ही रही।
बॉबी और कयामत से कयामत तक ने प्रेम का नर्द दिशा दी। न मिल पाने और साथ जीने की मुश्किलों को देखते हुए नायक-नायिका साथ मरने लगे। यह निराशाजनक विद्रोह था। अच्‍छा हुआ कि यह ट्रेंड मजबूती से नहीं चला। नहीं तो देश के युवक आत्‍महंता से आत्‍महत्‍या की तरफ बढ़ते। फिर एक दौर ऐसा भी आया,जब परिवार और समाज की नामंजूरी पर विद्रोह करने के बजाए उन्‍हें मनाने और राजी करने पर जोर दिया जाने लगा। इसे पारिवारिक मूल्‍यों में विश्‍वास और परंपरा के वहन के तौर पर पेश किया गया। दर्शक ज्‍यादा समय तक झांसे में नहीं रहे। उन्‍होंने ऐसी फिल्‍मों से नजरें फेर लीं। पारिवारिक मूल्‍यों के निर्वाह का आडंबर जल्‍दी ही टूट गया। करण जौहर अपनी फिल्‍म में प्‍यार और दोस्‍ती के द्वंद्व को लेकर आए। ऐ दिल है मुश्किल तक में उनका नायक यही संवाद दोहरा रहा है कि लड़का व लड़की दोस्‍त नहीं हो सकते
पिछले हफ्ते रिलीज हुई उनकी ऐ दिल है मुश्किल को मैच्‍योर लव स्‍टोरी के तौर पर पेश किया जा रहा है। क्रिटिक और फिल्‍म पत्रकारों की सीमा है कि उन्‍हें निर्माता-निर्देशक या अभिनेता जो समझा या बता देते हैं,वे उसी को लिखते और बताते रहते हैं। कोई सवाल नहीं करता। ऐ दिल है मुश्किल मैच्‍योर लव स्‍टोरी तो कतई नहीं है। सिर्फ उम्र में एक्‍टरों के बड़े होने से कोई लव स्‍टोरी मैच्‍योर हो जातीद हो तो अलग बात है। विदेश की धरती पर सुविधा-संपन्‍न अरधनिक व्‍यक्तियों के प्रेम और दोस्‍ती की समझ हिंदी फिल्‍मों के दायरे से बाहर नहीं निकल पाती। हिंदी फिल्‍मों ने एक वायवीय समाज रचा है। करण जौहर और उनके किरदार इसी दुनिया में विचरते हैं। अपने समय और समाज से उनका कोई रिश्‍ता नहीं होता। करण जौहर ने अपनी रोमांटिक फिल्‍म में निराश किया।
हमें हिंदी में सहस्‍त्राब्दि(मिलेनियल) पीड़ी के यूथ की प्रेमकहानी चाहिए। गांवों,कस्‍बों,शहरों और महानगरों के ये यूथ अपनी पिछली पीढि़यों से अलग और आगे हैं। रिश्‍तों के बारे में उनकी सोच खुली हुई हैं। अब वे बिछ़ुड़ने पर आहें नहीं भरते। वे नए तरीके से जीवन और प्रेम को अपनाते हैं। जल्‍दी से अमीर और कामयाब होने के दबाव में आज के यूथ प्रेम के बारे में क्‍या सोचते हैं और कैसे जीते हैं...हिंदी फिल्‍मों में इसकी झलक आनी चाहिए। इम्तियाज अली अपनी फिल्‍मों में आज के यूथ के रोमांस के पहलुओं को ले आते हैं। हमें उनके जैसे और फिल्‍मकारों की जरूरत है,जो लब आज कल दिखा सके।
 

Thursday, October 27, 2016

दरअसल : खतरनाक है यह उदासी



-अजय ब्रह्मात्‍मज
मालूम नहीं करण जौहर की ऐ दिल है मुश्किल देश भर में किस प्रकार से रिलीज होगी? इन पंक्तियों के लिखे जाने तक असंमंजस बना हुआ है। हालांकि केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह और महाराष्‍ट्र के मुख्‍यमंत्री देवेन्‍द्र फड़नवीस ने करण जौहर और उनके समर्थकों को आश्‍वासन दिया है कि किसी प्रकार की गड़बड़ी नहीं होने दी जाएगी। पिछले हफ्ते ही करण जौहर ने एक वीडियो जारी किया और बताया कि वे आहत हैं। वे आहत हैं कि उन्‍हें देशद्रोही और राष्‍ट्रविरोधी कहा जा रहा है। उन्‍होंने आश्‍वस्‍त किया कि वे पड़ोसी देश(पाकिस्‍तान) के कलाकारों के साथ काम नहीं करेंगे,लेकिन इसी वीडियो में उन्‍होंने कहा कि फिल्‍म की शूटिंग के दरम्‍यान दोनों देशों के संबंध अच्‍छे थे और दोस्‍ती की बात की जा रही थी।
यह तर्क करण जौहर के समर्थक भी दे रहे हैं। सच भी है कि देश के बंटवारे और आजादी के बाद से भारत-पाकस्तिान के संबंध नरम-गरम चलते रहे हैं। राजनीतिक और राजनयिक कारणों से संबंधों में उतार-चढ़ाव आता रहा है। परिणामस्‍वरूप फिल्‍मों का आदान-प्रदान प्रभावित होता रहा है। कभी दोनों देशों के दरवाजे बंद हो जाते हैं तो कभी अमन की आशा के गीत गाए जाते हैं। इस तथ्‍य से इंकार नहीं किया जा सकता है कि समान इतिहास और साझा संस्‍कृति के कारण दोनों देशों में अनेक सांस्‍कृतिक समानताएं हैं। फिल्‍मों के मामले में आजादी के बाद से भारत का बाजार बढ़ा है। हिंदी फिल्‍में बहुत अच्‍छा कारोबार कर रही हैं। इस संदर्भ में पाकिस्‍तन की फिल्‍म इंडस्‍ट्री की कमर टूट चुकी है। सीमित बाजार के कारण फिल्‍मों की क्‍वालिटी और उनके निर्माण पर असर पड़ा है। वैध्‍-अवैध तरीके से हिंदी फिल्‍में पाकिस्‍तान में जाती रही हैं। वहां के दर्शक इन फिल्‍मों को देखते रहे हें। महेश भट्ट की पहल से पाकिस्‍तानी कलाकारों का भात आगमन आरंभ हुआ। वहां की प्रतिभाओं को यहां काम मिले। पाकिस्‍तान में भी लंबे अर्से के बाद हिंदी फिल्‍मों का प्रदर्शन आरंभ हुआ। धीरे-धीरे हिंदी की बड़ी फिल्‍में पाकिस्‍ताने से 10-15 करोड़ का व्‍यवसाया करने लगीं। साथ ही वहां के कलाकारों को भारत की फिल्‍मों में काम मिलने लगा। ताजा विवाद के बावजूद इसमें कोई शक नहीं है कि फवाद खान हिंदी फिल्‍मों के दर्शकों के बीच अत्‍यंत लोकप्रिय हैं।
कला और संस्‍कृति के मामले में संकीर्ण नजरिए से काम नहीं चल सकता। हम पाकिस्‍तानी शायरो,साहित्‍यकारों,गायको,कव्‍वालों और कलाकारों के फन का मजा लेते रहे हैं। इसी प्रकार भारतीय कलाकार पाकिस्‍तान में लोकप्रिय हैं। तुलना की जाए तो भारत का पासंग बड़ा हुआ ही मिलेगा। कई मित्र सवाल करते हैं कि भारत में जिस प्रकार से पाकिस्‍तानी कलाकरों को धन और सम्‍मनान दिया जाता है,वैसा ही धन या मान-सम्‍मान पाकिस्‍तान में भारतीय कलाकारों को नहीं मिलता। यह सच है,लेकिन हमें इस सच्‍चाई की जड़ में जाना चाहिए। गौर करने पर पाएंगे कि पाकिस्‍तान का मनोरंजन बाजार व प्रभाव छोटा है। लता मंगेशकर जैसी नामचीन कलाकार को बुलाकर वे प्रभावशाली कार्यक्रम नहीं कर सकते। ऐसे कार्यक्रम की लागत ही भारी पड़ेगी। संगीत और फिल्‍मों का भारतीय बाजार बड़ा है। फिर भी भारतीय कलाकारों के छोटे-मोटे कार्यक्रम पाकिस्‍तान में होते रहते हैं। पता ही होगा कि ताजा प्रसंग में राजू उपाध्‍याय ने अपनी यात्रा रद्द की। अनेक भारतीय कलाकारों ने पाकिस्‍तान की निजी और आधिकारिक यात्राएं की हैं और सभी खुश व संतुष्‍ट होकर लौटे हैं।
ऐ दिल है मुश्किल में फवाद खान की मौजूदगी को लेकर महाराष्‍ट्र की एक राजनीतिक पार्टी ने फतवा दिया कि वे इस फिल्‍म को रिलीज नहीं होने देंगे। अभी माहौल कुछ ऐसा है कि उग्र राष्‍ट्रवाद की हवा में ज्‍यादातर को लग रहा है कि पाकिस्‍तानी कलाकारों को निकालने या काम न देने से हम पाकिस्‍तान को जवाब दे रहे हैं या सबक सिख रहे हैं। दरअसल,ऐसा कर हम आतंकवादियों के इरादों को पानी दे रहे हें। वे यही चाहते हैं कि दोनों देशों के बीच दुश्‍मनी का माहौल बना रहे। होना तो यह चाहिए था कि ऐसे फतवों का हर स्‍तर पर विरोध होता। आम दर्शक और सरकारें इसका संज्ञान लेतीं। ऐसी ताकतों को चेतावनी देतीं कि उन्‍हें कानूनव्‍यवस्‍था भंग करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। जनता और सरकार की उदासी इस बार खतरनाक रही। उम्‍मीद है कि आगे इसका दोहराव नहीं होगा।





















Thursday, October 20, 2016

दरअसल : फिल्‍म गीतकारों को दें महत्‍व



-अजय ब्रह्मात्‍मज
2016 के लिए साहित्‍य का नोबेल पुरस्‍कार अमेरिकी गायक और गीतकार बॉब डिलन को मिला है। इस खबर से साहित्यिक समाज चौंक गया है। भारत में कुछ साहित्‍यकारों ने इस पर व्‍यंग्‍यात्‍मक टिप्‍पणी की है। उन्‍होंने आशंका व्‍यक्‍त की है कि भविष्‍य में भारत में साहित्‍य और लोकप्रिय साहित्‍य का घालमेल होगा। वहीं उदय प्रकाश ने अपने फेसबुक वॉल पर स्‍टेटस लिखा... बॉब डिलन के बाद क्या हम हिंदी कविता के भारतीय जीनियस गुलज़ार जी के लिए सच्ची उम्मीद बांधें ?’ ऐसी उम्‍मीद गलत नहीं है। हमें जल्‍दी से जल्‍दी इस दिशा में विचार करना चाहिए। हिंदी फिल्‍मों के गीतकारों और कहानीकारों के सृजन और लेखन को रेखांकित कर उन्‍हें पुरस्‍कृत और सम्‍मानित करने की दिशा में पहल करनी चाहिए।
हिंदी कहानीकार तेजेन्‍द्र शर्मा दशकों से हिमायत कर रहे हैं कि शैलेन्‍द्र के गीतों का साहित्यिक दर्जा देकर उनका अध्‍ययन और विश्‍लेषण करना चाहिए। उन्‍हें पाठ्यक्रम में शामिल करना चाहिए। उनके इस आग्रह को साहित्‍यकार और हिंदी के अध्‍यापक सिरे से ही खारिज कर देते हैं। हिंदी में धारणा बनी हुई है कि अगर कोई लोक्रिपय माध्‍यम में कर रहा है तो वह साहित्यिक और सांस्‍कृतिक महत्‍व का नहीं है। उन्‍होंने साहित्‍य के प्रति पारंपरिक और शुद्ध्‍तावादी दृष्टिकोण अपना रखा है। कविता,कहानी,उपन्‍यास ,नाटक और रेखाचित्र के अलावा किसी और प्रकार के लेखन में शब्‍दों का उपयोग कर रहे श्‍िल्पियों को साहित्‍यकार नहीं मानने का संकीर्ण रिवाज चला आ रहा है। फिल्‍मी गीतकारों में नरेन्‍द्र शर्मा,साहिर लुधियानवी,मजरूह सुल्‍तानपुरी,शैलेन्‍द्र आदि से लेकर इरशाद कामिल,स्‍वानंद किरकिरे,राज शेखर और वरूण ग्रोवर जैसे दर्जनों गीतकार हैं,जिनके गीतों में साहित्‍य की स्‍पष्‍ट झलक है। उन्‍होंने फिल्‍मों के खास सिचुएशन के लिए लिखते समय भी अभिव्‍यक्ति और कल्‍पना को उदात्‍त रखा। ऐसे सैकड़ों गीत मिल जाएंगे। विविध भारती के अनाउंसर युनूस खान हिंदी फिल्‍मों के ललित गीतों के संकलन और विश्‍लेषण का नेक काम कर रहे हैं। हमें अपना संकोच खत्‍म करना चाहिए।
साहित्‍य और लोकप्रिय साहित्‍य में शब्‍द ही मूल धुरी है। शब्‍दों के प्रयोग-उपयोग से ही सभी अपनी भावनाएं और विचार व्‍यक्‍त करते हैं। भावों की उदात्‍तता और व्‍यापकता ही लिखे,बोले या गाए शब्‍दों को साहित्‍य का रूप देती है। इस लिहाज से बॉब डिलन का रचना संसार पिछले पांच दशकों से अमरिकी समाज को झिंझाोड़ रहा है। उन्‍होंने समानता,न्‍याय और शांति को बोल और स्‍वर दिया है। नागरिक अधिकारों से लेकर अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता जैसे मसलों पर वे मुखर रहे। उन्‍होंने अमेरिकी सत्‍ता को अपने शब्‍दों से चुनौती दी। अमेरिकी समाज के युवकों को विरोध करना सिखया और न्‍याय के पक्ष में खड़े रहने का आह्वान किया। अमेरिकी समाज ने उन्‍हें ध्‍यान से सुना और उनकी वाणी को गुनगुनाया। बॉब डिलन के गीतों की अनुगूंज पूरी दुनिया में सुनाई पड़ी। सभी ने उसे स्‍वीकार किया।
भारत में हम सभी हिंदी फिल्‍मों को गुनगुनाते हैं। अपने सुख-दुख के मुताबिक गीतों को चुनते और गुनगुनाते हैं। हम सभी के अपने प्रिय गीत हैं,जिन्‍हें हम अपने एकांत में गुनगुनाते हें। हिंदी फिल्‍मों के गीतों ने देश के करोड़ों युवकों को प्रेरित किया है। उनका संबल बना है। वक्‍त आ गया है कि हमारे साहित्‍यकार और अभिव्‍यक्ति की संस्‍थाएं अपने पुराने विचार और रवैए बदलें। हम फिल्‍मों के गीतकारों और कहानीकारों को नए नजरिए से देखना आरंभ करें।
हिंदी फिल्‍मों के अनेक गीतकार और कहानीकारों का साहित्‍य की दुनिया में भी दखल रहा है। हम उनके बारे में बातें करते समय उनकी रचनाओं को फिल्‍मी और साहित्यिक में बांट देते हैं। जो किताबों में आ गया है,वह साहित्‍य है। जो फिल्‍मों में आया,वह साहित्‍य नहीं है। गुलजार की ही बाते करें तो साहित्‍यकार उन्‍हें फिल्‍मी गीतकार मानते हैं और फिल्‍मों में उन्‍हें साहित्‍यकार समझा जाता है। सच तो यह है कि गुलजार और उन जैसे दूसरे गीतकारों को हम महत्‍व देना सीखें। उन्‍हें साहित्यिक सम्‍मनों और पुरस्‍कारों से नवाजे। लोकप्रिय माध्‍यमों में सृजनरत रचनाकारों को साहित्‍यकारों की पंगत में शामिल करें।   

Friday, October 14, 2016

दरअसल : भिखारी के तीन चेंज



-अजय ब्रह्मात्‍मज
यह कानाफूसी नहीं है। स्‍वयं करण जौहर ने स्‍वीकार किया है। इस प्रसंग से पता चलता है कि हमारे फिल्‍मकार अपने समाज से कितना कटे हुए हैं। वे जिस दुनिया में रहते हैं और पर्दे पर जिस दुनिया को रचते हैं,वह वास्‍तविक दुनिया से कोसों दूर उनके खयालों में रहती है। हमें पर्दे पर रची उनकी दुनिया भले ही आकर्षक और सपने की तरह लगे,उसमें रमने का मन भी करे,उसकी चौंधियाहट से हम विस्मित होते रहे....लेकिन सच से उनका वास्‍ता नहीं होता। वस्‍तु,चरित्र,दृश्‍य,प्रसंग और कहानियां सब कुछ वायवीय होती हैं। जीवन के कड़वे और मीठे अनुभवों की काल्‍पनिक उड़ान से कहानियां रची जाती हैं। उन कहानियों को जब कलाकार पर्दे पर जीते हैं तो वह फिल्‍म का रूप लेती हैं। जरूरी है जीवनानुभव....इसके अभाव में इधर अनेक फिल्‍मकार आए हैं,जिन्‍होंने फिल्‍मों में एक वायवीय और चमकदार दुनिया रची है।
एक बार सुधीर मिश्रा से बात हो रही थी। उनसे मैंने पूछा कि कुछ फिल्‍मकारों की फिल्‍में और उनमें किरदारों की मनोदशा इतनी नकली क्‍यों लगती है? उन्‍होंने सवाल खत्‍म होते ही कहा,क्‍योंकि उन्‍हें नकली लोग रच रहे होते हैं। ऐसे लोगों का बाहरी दुनिया से कोई संपर्क नहीं है। पूरी जिंदगी वे कवच में जीते हैं। बचपन से लेकर जवानी तक अपनी सीमित और सुरक्षित दुनिया में रहने की वजह से उनका अनुभव संसार भी सीमित रहता है। सच कहूं तो वे साहित्‍य भी नहीं पढ़ते। उन्‍होंने ढंग से भारतीय सिनेमा भी नहीं देखा है। वे ज्‍यादातर विदेशी समाज,साहित्‍य और सिनेमा से परिचित होते हैं। मॉयथोलोजी औरर हिस्‍ट्री की भी उनकी जानकारी विदेशी होती है। उनकी फिल्‍मों के किरदारों के नाम राज या राहुल होते हैं,लेकिन वे किरदार भारतीय सोच के नहीं होते हैं।
सुधीर मिश्रा की राय से असहमत नहीं हुआ जा सकता। आए दिन फिल्‍मों में ऐसी नकली दुनिया दिखती रहती है। भावों बौर भावनाओं की अतिरंजना को वे भारतीयता का नाम देते हैं। सिनेमा की भारतीय विशेषता के नाम पर वे उसे दिखा-बता रहे होते हैं। दिखावा और नकलीपन इतना हावी रहता है कि उनके बात-व्‍यवहार में भी इसकी झलक दिखाई पड़ती है। उनके कहे शब्‍दों का भावार्थ भिन्‍न होता है। तभी तो उन्‍हें अपनी बात खत्‍म करने के बाद सामने वाले से आश्‍वस्ति लेनी पड़ती है...यू नो ह्वाट आई मीन। इनकी फिल्‍मों का यथार्थ भी फिल्‍मी होता है। यह महज संयोग नहीं है कि इनकी फिल्‍मों में पुरानी फिल्‍मों के रेफरेंस आते हैं। वे अपनी बात पर जोर देने के लिए फिल्‍मी यादों का सहारा लेते हैं। उनकी फिल्‍मों के शॉट्स का गंभीर विश्‍लेषण कोई जानकार करे तो उसे उनके मूल और बीज पुरानी फिल्‍मों के शॉट्स में आसानी से मिल जाएंगे।
बात शुरू हुई थी करण जौहर से। तीन साल पहले एक फिल्‍म आई थी बांबे टाकीज। 2013 में करण जौहर,जोया अख्‍तर,दिबाकर बनर्जी और अनुराग कश्‍यप ने बांबे टाकीज के लिए एक-एक फिल्‍म निर्देशित की थी। इस फिल्‍म में करण जौहर की कड़ी का नाम था अजीब दास्‍तान है यह। इस फिल्‍म में एक भिखारी के तीन सीन थे। करण जौहर ने भिखारी के तीन सीन के लिए तीन चेंज रखे थे। यानी तीनों सीन के लिए उसे अलग-अलग कपड़े पहनने थो। करण जौहर की फिल्‍मों में कपड़ों पर खास ध्‍यान रहता है। बहरहाल,उनके सहायक ने उन्‍हें समझाया कि भिखारी के तीन चेंज नहीं हो सकते। उसके पास खाने,पहनने और रहने की जगह नहीं है,इसीलिए तो वह भिखारी है। करण जौहर कोतब तक  पता नहीं था कि अपनी आर्थिक स्थिति के कारण भिखारी कपड़े बदलने की लग्‍जरी नहीं कर सकते। अपने स्‍वभाव और सोच के मुताबिक उनका जोर था कि तीन सीन है तो तीनों में तीन कपड़ों में दिखें। बाद में सहायक और यूनिट के दूसरे सदस्‍यों के समझाने-बताने पर वे मान गए। हालांकि अपनी इस भूल को वे खुद ही सुनाते हैं। उन्‍होंने नेहा के पॉडकास्‍ट शो नो फिल्‍टर नेहा में यह बात कही है।  कलाकार और निर्देशक की सोच-समझ में उसकी परवरिश की बड़ी भूमिका होती है। किताबों,फिल्‍मों और वीडियो से जानकारियों की बारीकियां नहीं समझी जा सकतीं। उनके लिए तो उन्‍हें स्‍वयं छूना और देखना होता है। पांचों ज्ञाने‍न्द्रियों के इस्‍तेमाल से ही कोई अनुभव ठोस ज्ञान में तब्‍दील होता है।

Saturday, October 8, 2016

दरअसल : तनिष्‍ठा और सोनम



-अजय ब्रह्मात्‍मज

तनिष्‍ठा चटर्जी की फिल्‍म पार्च्‍ड हाल ही में रिलीज हुई। इस फिल्‍म में तनिष्‍ठा चटर्जी ने रानी का किरदार निभाया था। छोटी उम्र में शादी के बाद विधवा हो गई रानी अपने बेटे को पालती है और आदर्श मां के तौर पर समाज में पूछी जाती है। अचानक उसके जीवन में एक चाहनेवाला आता है और फिर वह शरीर के स्‍फुरण से परिचित होती है। तनिष्‍ठा ने इस किरदार को बखूबी निभाया। एनएसडी से प्रशिक्षित तनिष्‍ठा ने अनेक हिंदी और इंटरनेशनल फिल्‍मों में काम कर प्रतिष्‍ठा अर्जित की है। वह पुरस्‍कृत भी हो चुकी हैं। हिंदी सिनेमा में जो थोड़ी-बहुत पैरेलल और कलात्‍मक फिल्‍में बन रही हैं,उनमें सभी की चहेती हैं तनिष्‍ठा चटर्जी। उनका एक अलग मुकाम है।
पिछले दिनों इसी फिल्‍म के प्रचार के सिलसिले में वह एक कॉमेडी शों में गई थीं। यह विडंबना है कि मास अपील रखने वाली हिंदी फिल्‍में प्रचार के लिए टीवी शो का सहारा लेती हैं। ऐसे ही एक कॉमेडी शो में तनिष्‍ठा चटर्जी का मजाक उड़ाया गया। यह मजाक उनके रंग(वर्ण) को लकर था। तनिष्‍ठा ने आपत्ति की और बाद में चैनल के अधिकारियों से भी शिकायत की। उन्‍होंने फेसबुक पर अपनी बात सार्वजनिक की। विवाद बढ़ता देख चैनल के अधिकारियों ने तो माफी मांग ली,लेकिन उक्‍त शो के एंकर मोहम्‍मद अली रोड में पास्‍त का तर्क देने लगे।(बता दें कि मोहम्‍मल अली रोड मुंबई का मश्‍रूर मुस्लिम बहुल इलाका है,जो अपने लजीज नॉन वेज व्‍यंजनों के लिए भी मशहूर है।) तनिष्‍ठा ने लिखा है कि उनसे किया जा रहा मजाक अपने नेचर में रेसिस्‍ट और पुरानी धारणाओं पर आधारित था। न केवल रंग,बल्कि उनके ब्राह्मण होने पर भी सवाल किए गए और हैरत जाहिर किया गया कि उनका रंग ऐसा क्‍यों है? ऐसे भद्दे और फूहड़ मजाक होते रहे हैं। प्रतिष्ठित और लोकप्रिय कलाकार और स्‍टार फिल्‍म के प्रचार के दबाव में यह सब सहते रहे हैं। वे अपनी नाखुशी भी जाहिर नहीं करते।
तनिष्‍ठा की आपत्ति पर एक तबका कह रहा है कि उन्‍हें ऐसे शो पर जाना ही नहीं चाहिए था। एक मूड दिख रहा है जो ऐसे फूहड़ कामेडी शो के औचित्‍य को वाजिब ठहरा रहा है। कपिल शर्मा से आरंभ हुआ यह कामेडी का ऐसा गर्त है,जिसमें सभी गिरते हैं और ठिठोली करते हैं। कहीं ने कहीं हमारे हास्‍य-विनोद का स्‍तर लगातार गिरता जा रहा है। हरिशंकर परसाई और शरद जोशी जैसे व्‍यंग्‍यकारों के लिए गुंजाइश कम होती जा रही है। गौर करें मो हास्‍य कवि सम्‍मेलनों में टीवी शो की फूहड़ता ही दोहरायी जा रही है। कविता और लतीफों में दूसरों की भिन्‍नता का मजाक उड़ाया जाता है। सदियों पुरानी धारणाओं और पूर्वाग्रहों के आधार पर भिन्‍नताओं को कमियों की तरह पेश किया जाता है। दर्शक और समाज के तौर पर इन बेतुके लतीफों पर हम हंसते हैं।
पिछले दिनों सोनम कपूर ने आपबीती के अनुभवों को एक लेख के रूप में साझा किया। इस लेख में उन्‍होंने सौंदर्य के कथित मानदंडों की ध्‍ज्‍जी उड़ाई है। उन्‍होंने साफ सोच के साथ लिखा है कि कैसे वह किशोरावस्‍था में अपने शरीर और सौंदर्य को लेकर हीनभावना से ग्रस्‍त रहती थीं। फिल्‍मों में आ जाने के बाद भी उनकी दिक्‍कतें कम नहीं हुईं,क्‍योंकि तब किसी और कारण से उन पर फब्तियां कसी जाने लगीं। उन्‍हें बार-बार निशाना बनाया गया। उकता कर उन्‍होंने भी अपने शरीर में कॉस्‍मेटिक तब्दिीलियों की बात सोची,लेकिन तब उनकी पर्सनल मेकअप आर्टिस्‍ट नताशा सोनी ने उन्‍हें नेक और उचित सलाह दी। उन्‍होंने सोनम कपूर को आत्‍मविश्‍वास दिया। उन्‍हें यकीन कराया कि जिसे लोग उनके शरीर और सौंदर्य की कमियां कहते हैं,वास्‍तव में वे उनकी खूबियां हैं। उनकी वजह से ही सोनम कपूर दूसरी लड़कियों से अलग और विशेष हैं। उन्‍हें इन विशेषताओं पर फोकस करना चाहिए। उनकी बहन रिया ने उन्‍हें विश्‍वास दिया कि वह खूबसूरत और आकर्षक हैं। वह वैसी ही बनी रहें। नतीजा सभी के सामने हैं। आज सोनम कपूर फैशन आइकॉन हैं। वह करोड़ों लडकियों की आदर्श बनी हुई हैं। आज वह कुछ भी पहनती है तो वह उन पर फबता है। वजह सिर्फ इतनी है कि वह पूरे आत्‍मविश्‍वास से हर तरह के परिधान कैरी करती हैं। वह अदृश्‍य मैग्‍नीफाइंग ग्‍लास की परवाह नहीं करतीं,जो हर अपीयरेंस पर उनका सूक्ष्‍म परीक्षण कर रहा होता है।
तनिष्‍ठा और सोनम जैसी लाखों लड़कियां हमारे आसपास और समाज में आपत्ति और उपस्‍थ‍िति से धारणाएं बदल रही हैं। हमें उनका स्‍वागत करना चाहिए। उनका साथ देना चाहिए।

Thursday, September 29, 2016

दरअसल : पिंक फिल्‍म तो पसंद आई...उसकी फिलासफी?



-अजय ब्रह्मात्‍मज
शुजीत सरकार की देखरेख में बनी पिंक देश-विदेश के दर्शकों को पसंद आई है। उसके कलेक्‍शन से जाहिर है कि दर्शक सिनेमाघरों में जाकर पिंक देख रहे हैं। दूसरे हफ्ते में भी फिल्‍म के प्रति दर्शकों का उत्‍साह बना रहा है। रितेश शाह की लिखी इस फिल्‍म को बांग्‍ला के पुरस्‍कृत निर्देशक अनिरूद्ध राय चौधरी ने निर्देशित किया है। सोशल मीडिया से लेकर घर-दफ्तर तक में इस फिल्‍म की चर्चा हो रही है। ज्‍यादातर लोग इस फिल्‍म के पक्ष में बोल रहे हैं। लेखक-निर्देशक ने बड़ी खूबसूरती से लड़कियों के प्रति बनी धारणाओं को ध्‍वस्‍त किया है। कोट्र में जिरह के दौरान बुजुर्ग वकील दीपक सहगल(अमिताभ बच्‍चन) के तर्कों से असहमत नहीं हुआ जा सकता। उनके तर्कों का कटाक्ष चुभता है।
पिंक की फिलासफी उस ना पर टिकी है,जो किसी लड़की को अपनी तरह से जीने की आजादी दे सकती है। दीपक सहगल कहते हैं,’ ‘ना सिर्फ एक शब्‍द नहीं है,एक पूरा वाक्‍य है अपने आप में...इसे किसी व्‍याख्‍या की जरूरत नहीं है। नो मतलब नो...परिचित,फ्रेंड,गर्लफ्रेंड,सेक्‍स वर्कर या आपकी अपनी बीवी ही क्‍यों न हो...नो मीन्‍स नो। लेकिन हम सभी जाते और देखते हैं कि पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं की ना पर गौर नहीं किया जाता। हिंदी फिल्‍में तो पुरजोर तरीके से दशकों से यही बता रही हैं कि हीरोइन की ना में हां छिपा होता है। गौर करें तो ज्‍यादातर मसाला हिंदी फिल्‍मों में हीरो-हीरोइन का संबंध बदतमीजी का होता है। छेड़खानी से ही प्रेम शुरू होता है। कोई चाहे तो हीरोइन की ना में छिपी हां से संबंधित गाने,संवाद और दृश्‍य एकत्रित कर दिखा और बता सकता है। पिंक में महिलाओं के अधिकारों के पैरोकार बने मिताभ बच्‍चन की अनेक फिल्‍मों के उदाहरण दिए जा सकते हैं। फिल्‍म के किरदार और उनकी फिलासफी कई बार अभिनेताओं के साथ रह जाती है। उसका प्रभाव पर्दे के बाहर तक रहता है। अमिताभ बच्‍चन पर पिंक का ऐसा प्रभाव रहा। यही वजह है कि शुजीत सरकार की सलाह पर वह अपनी पोती और नातिन को व्‍यक्तिगत पत्र लिखने के लिए तैयार हुए।
पिंक बतौर फिल्‍म तो पसंद आ गई है। अब देखना है कि फिल्‍म की फिलासफी को आम दर्शक अपनी रोजमर्रा जिंदगी में अपनाते हैं कि नहीं? औरतों की आजादी की दुहाई देने वाले अपने परिवारों में ही औरतों पर अत्‍याचार करने से नहीं हिचकते। वहां वे परिवार,संस्‍कार और मर्यादा का हवाला देने लगते हैं। कभी व्‍यावहारिकता के नाम पर तो कभी सामजिकता के नाम पर उनकी ना को इग्‍नोर किया जाता है। उनकी आजादी छीन ली जाती है। उसकी सोच कुचल दी जाती है। नैतिक पाबंदियां लगा कर उनके मूवमेंट रोक दिए जाते हैं। उनके पहनावे और चाल-ढाल पर नजर रखी जाती है। कुल मिलाकर समाज औरतों को संकुचित और सीमित करता है। यह सब उनकी सुरक्षा और भलाई के नाम पर किया जाता है।
समाज बदल रहा है। समाज में औरतों की भूमिका बदल रही है। अब लड़कियां लड़कों की तरह करिअर और बेहतर भविष्‍य की खोज में शहरों में निकल रही है। पहले शहरों में एकाध वर्किंग वीमेन हॉस्‍अल हुआ करते थे। इधर देखने में आ रहा है कि कामकाजी लड़कियां दो से पांच के समूहों में पूरा फ्लैट किराए पर लेकर साथ में रह रही हैं। इस तरह वे हॉस्‍टल के पिछड़े नियम-कानूनों से बची रहती हैं। इन समूहों में लड़कियां एक-दूसरे का खयाल रखती हैं। कई बाद तो मुश्किल स्थितियों में भी वे परिवारों को खबर नहीं करतीं।
उनकी इस आजादी और सामूहिकता को समाज सहज तरीके से स्‍वीकार नहीं कर पा रहा है। कई बार शहरों की हाउसिंग सोसायटी का कोई सदस्‍य उनके चाल-चलन पर शक करता है। उनसे बेतुके सवाल करता है और सफाई मांगता है। पिंक की सफलता तब मानी और आंकी जाएगी जब लडकियों के प्रति समाज की सोच में फर्क आए। उन्‍हें सिर्फ भोग की वस्‍तु न माना जाए। लड़कियां समाज में योग कर रही हैं। जरूरत है कि हम उनके योगदान को बढ़ावा दें।




Thursday, September 22, 2016

दरअसल : टीवी पर आ रहे फिल्‍म कलाकार



-अजय ब्रह्मात्‍मज
देश-विदेश फिल्‍म कलाकार टीवी पर आ रहे हैं। वे टीवी के रिएलिटी,फिक्‍शन,टॉक और गेम शोज का हिस्‍सा बनते हैं। यह उनकी कमाई और क्रिएटिविटी का कारगर जरिया है। इससे उनकी दृश्‍यता(विजीबिलिटी) बनी रहती है। काम करने के पैसे मिलते हैं सो अलग। भारत में टीवी के पॉपुलर होने और सैटेलाइट चैनलों के आने के बाद टीवी शोज में फिल्‍म कलाकारों को लाने का चलन बढ़ा। कौन बनेगा करोड़पति के साथ अमिताभ बच्‍चन का टीवी पर आना सबसे उल्‍लेखनीय रहा। उसके बाद से तो तांता लग गया। सभी टीवी शोज करने लगे। फिर भी फिक्‍शन शोज में उनकी मौजूदगी कम रही। गौर करें तो भारत में फिल्‍म कलाकार अपनी पॉपुलैरिटी के दौरान टीवी का रुख नहीं करते हैं।
भारत में हाशिए पर आ चुके फिल्‍म कलाकार ही टीवी के फिक्‍शन शोज में आते हैं। पिछले दशकों में किरण कुमार हों या अभी शबाना आजमी। इन सभी को टीवी पर देखना अच्‍छा लगता है। बात तब गले से नीचे नहीं उतरती,जब वे टीवी पर अपनी मौजूदगी के लिए बेतुके तर्क देने लगते हैं। उन्‍हें अचानक टीवी सशक्‍त माध्‍यम लगने लगता है। उन्‍हें क्रिएटिविटी के लिए यह मीडियम जरूरी जान पड़ता है। सभी के अपने पक्ष और तर्क होते होते हैं। कोई भी यह नहीं कहता कि वे खाली थे,इसलिए टीवी पर काम कर रहे हैं। शबाना आजमी आजकल कुछ ऐसी ही बातें कर रही हैं। उनसे पूछा जाना चाहिए कि अपने उत्‍कर्ष के दिनों में क्रिएटिविटी के इस सशक्‍त माध्‍यम को क्‍यों नहीं अपनाया? तब भी तो टीवी शोज बन रहे थे। कंटेंट के लिहाज से वे आज से बेहतर ही थे। अनिल कपूर का 24 भी ऐसा ही एक उदाहरण है।
हां,न्रियंका चोपड़ा,निमरत कौर और इरफान खान अपने प्राइम और पॉपुलैरिटी के दाक्‍रान ही टीवी में भी काम कर रहे हैं,लेकिन ये सभी विदेशी टीवी शो को समय दे रहे हें। प्रियंका चोपड़ा क्‍वांटिको की वजह से देश-विदेश में मशहूर हो गई हैं। अगर इस कद और श्रेणी के कलाकार टीवी के चुनिंदा फिक्‍शन शोज में आएं तो भारतीय टीवी का स्‍वरूप बदले। भारतीय टीवी को अगले चरण में ले जाने के लिए ऐसी पहलकदमी की सख्‍त जरूरत है। अभी भारतीय टीवी सांप,नागिन,राक्षस आदि के जादू-टोटकों में उलझ कर रह गया है। हां,इसके साथ ही 24 जैसे स्‍लीक और बेहतरीन शो भी आ रहे हैं। जल्‍दी ही निखिल आडवाणी युद्ध के बंदी जेसा टीवी शो लेकर आएंगे। ऐसा नहीं है कि भारत में टैलेंट की कमी है। कमी है तो सोच की...हम संभावनाओं की तलाश में नहीं रहते। हर चैनल यथास्थिति बनाए रखना चाहता है।
भारतीय टीवी और फिल्‍म कलाकारों का एक नया रिश्‍ता कायम हुआ है। पिछले कुछ सालों में यह मजबूत और पॉपुलर हो गया है। आप देखते होंगे कि इन दिनों फिल्‍मों की रिलीज के समय उसके कलाकार टीवी शोज में दिखाई पड़ने लगते हैं। इसकी शुरूआत एकता कपूर ने की थी। धीरे-धीरे अब इसकी आदत बन गई है। फिल्‍म के निर्माता और उनके कलाकार परेशान रहते हैं कि रिलीज के समय सभी पाॅपुलर शोज में वे दिख जाएं। मालूम नहीं इससे उनके दर्शक बढ़ते हैं या नहीं? टीवी शोज को अवश्‍य फायदा होता है। उन्‍हें दर्शक मिलते हैं। विशेषज्ञ माने हैं कि परस्‍पर लाभ की वजह से यह रिश्‍ता दोनों पक्षों से निभाया जा रहा है। लेकिन कपिल शर्मा के शो में नामचीन कलाकारों को हास्‍यास्‍पद हरकतें करते देख कर दुख होता है कि फिल्‍मों के प्रमोशन के लिए उन्‍हें किस हद तक नीचे उतरना पड़ता है।
भारतीय संदर्भ में फिल्‍म स्‍टारों की लोकप्रियता का इस्‍तेमाल टीवी को करना चाहिए। उस पर चिंतन-मनन हो और कुछ नए फार्मेट पर विचार हो। अपने देश में फिल्‍मस्‍टारों की लोकप्रियता यूनिक है। उस यूनिकनेस को बचाते हुए शोज और प्रोग्राम सोचे जा सकते हैं।

Friday, September 16, 2016

दरअसल : बॉयोपिक में हूबहू चेहरा

-अजय ब्रह्मात्‍मज
इस महीने की आखिरी तारीख 30 सितंबर को एमएस धौनी रिलीज हो रही है। इसे नीरज पांडे ने निर्देशित किया है। फिलम में शीर्षक भूमिका सुशांत सिंह राजपूत निभा रहे हैं। उन्‍होंने ढाई सालों की कड़ी महनत के बाद धौनी के किरदार को स्‍क्रीन पर चरितार्थ किया है। उन्‍होंने सधी महनत और लगन से धौनी की चाल-ढाल पकड़ी है। उनकी तरह विकेट कीपिंग,फील्डिंग और बैटिंग करने का तरीका सीखा है। उम्‍मीद है धौनी की भूमिका में वे पसंद आएं। हम ने कुछ महीनों और सालों पहले सरबजीत,मैरी कॉम,मिल्‍खा सिंह और पान सिंह तोमर आदि फिल्‍में देखीं। इनमें से किसी भी फिल्‍म में कलाकार का चेहरा किरदार से नहीं मिल रहा था। हो सकता है कि उनकी बॉडी लैंग्‍वेज मिल रही हो,लेकिन उनका तुलनात्‍मक अध्‍ययन नहीं हुआ है। सवाल है कि क्‍या बॉयोपिक में किरदार और कलाकार के चहरे की साम्‍यता जरूरी नहीं है? अगर है तो हम हिंदी फिल्‍मों में उस पर ध्‍यान क्‍यों नहीं दे रहे हैं?  एक मान्‍यता है कि सिनेमा में अशिक्षित हिंदी दर्शकों को कुछ भी इमोशन और एंगेजिंग परोस दो तो वे संतुष्‍ट हो जाते हैं। उनका मनोरंजन हो जाता है।
रिचर्ड ऐटेनबरो की गांधी याद करें। इस फिल्‍म में सर बेन किंग्‍सले ने गोधी जी की भूमिका निभाई थी। चेहरे की समानता के साथ उन्‍होंने जिस फुर्ती और बारीकी से गांधी जी की बॉडी लैंग्‍वेज पर्दे पर उतरी थी,उससे गांधी जी जीवंत हो गए थे। गांधी जी को साक्षात देख चुके लोगों की मालूम नहीं क्‍या प्रतिक्रिया रही? बाद की पीढ़ी के दर्शकों को तो अच्‍छा ही लगा। हिंदी फिल्‍मों में श्‍याम बेनेगल,केतन मेहता और कुछ अन्‍य निर्देशको ने बॉयोपिक और ऐतिहासिक चरित्रों को पर्दे पर पेश करते समय हूबहू चेहरे तलाशे। अगर किसी एक्‍टर का चेहरा हूबहू नहीं मिला तो प्रोस्‍थेटिक मेकअप से उसके करीब पहुंचने की कोशिश की गई। यह विवाद और मतभेद का विषय है कि उनके निरूपण प्रामाणिक और सटीक रहे।
किरदारों के हूबहू कलाकारों की जरूरत पर निर्देशकों की राय अलग-अलग हो सकती है। हिंदी फिल्‍मों में सबसे बड़ी समस्‍या बजट की है। निर्देशकों का इतना बजट नहीं मिलता कि वे हूबहू चित्रण और निरूपण में समय और ऊर्जा लगा सकें। इसके अलावा देश में दक्ष तकनीशियनों की कमी है। अपने यहां माहिर मेकअप आर्टिस्‍ट नहीं हैं। अकेले विक्रम गायकवाड़ हिंदी समेत अन्‍य भाषाओं की फिल्‍मों की प्रोस्‍थेटिक जरूरतें पूरी करते हैं। भारत में प्रोस्‍थेटिक मेकअप के लिए समर्पण की कमी की भी बात की जाती है। ऐसे मेकअप के लिए कलाकारों को पर्याप्‍त समय देना पड़ता है। उनमें धैर्य भी होना चाहिए। भारत का मौसम प्रोस्‍थेटिक के अनुकूल नहीं है। आउटडोर में यहां की गर्मी कलाकारों को परेशान करती है। उन्‍हें आदत भी नहीं है कि वे प्रोस्‍थेटिक के साथ एक्टिंग कर सके। हिंदी फिल्‍मों के स्‍टार सिस्‍टम में स्‍टार का चेहरा ही खास होता है। दबी जुबान से कुछ निर्देशकों ने स्‍वीकार किया कि एक्‍टर किसी और चेहरे में ढलने और बदलने में हिचकते हैं। उनका तर्क होता है कि हमारा चेहरा बिकता है। उसे ही देखने दर्शक आते हैं।
एक निर्देशक ने जोर दिया कि बॉयोपिक में अंतिम प्रभाव महत्‍वपूर्ण है। अगर किसी चरित्र के गुणों को निर्देशक अपने चुने हुए कलाकार के जरिए असरदार तरीके से व्‍यक्‍त कर ले तो बॉयोपिक का ध्‍येय पूरा हो जाता है। इस ध्‍येय के लिए हूबहू चेहरे से अधिक जरूरी कलाकार का योग्‍य और प्रतिभाशाली होना है। समर्थ अभिनेता और अभिनेत्री किरदार के भाव-प्रभाव को सही परिप्रेक्ष्‍य में जाहिर कर सकते हैं।
इन सारे तर्को और कारणों से परे जाकर सोचने की आवश्‍यकता है। हिंदी में बॉयोपिक की लोकप्रियता और सफलता देखते हुए यह तय है कि आगे भी बॉयोपिक फिल्‍में बनती रहेंगी। इन बॉयोपिक फिल्‍मों की क्‍वालिटी और प्रेजेंटेशन में सुधार होगा।

Thursday, September 8, 2016

दरअसल : प्रयोग बढ़ा है हिंदी का,लेकिन...



-अजय ब्रह्मात्‍मज
हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री में हिंदी के चलन पर इस स्‍तंभ में हिंदी दिवस के अवसर पर लिखे गए रस्‍मी लेखों के अलावा भी हिंदी के चलन पर कुछ तथ्‍य आते रहे हैं। निश्चित ही धीरे-धीरे यह स्थिति बन गई है कि सेट या दफ्तर में चले जाएं तो थोड़ी देर के लिए कोई भी हिंदीभाषी वहां प्रचलित अंग्रेजी से संकोच और संदेह में आ सकता है। फिलमें जरूर हिंदी में बनती हैं,लेकिन फिल्‍मी हस्तियों के व्‍यवहार की आम भाषा अंग्रेजी हो चुकी है। बताने की जरूरत नहीं स्क्रिप्‍ट,पोस्‍टर और प्रचार अंगेजी में ही होते हैं। पिछले दिनों भारत भ्रमण पर आए एक विदेशी युवक ने अपने यात्रा संस्‍मरण में इस बात पर आश्‍चर्य व्‍यक्‍त किया कि शहर के सारे लोग हिंदी बोल रहे हैं,लेकिन दुकानों के नाम और अन्‍य साइन बोर्ड अंग्रेजी में लिखे हुए हैं। हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री में अंग्रेजी के प्रति झुकाव के संबंध में कटु विचार प्रकट कर रहे हिंदीभाषियों को सबसे पहले अपने गांव,कस्‍बे और समाज में आ रहे परिवर्तन में हस्‍तक्षेप करना चाहिए।
हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री में लगभग दो दशक के अपने अनुभवों के आधार पर मैं कह सकता हूं कि इधर हिंदी का चलन बढ़ा है। फिल्‍मों के प्रचार-प्रसार में हिंदी की जरूरत समझ कर हिंदी मीडिया और फिल्‍मों के हिंदी पत्रकारों को स्‍थान दिया जा रहा है। हां,यह सब करते हुए फिल्‍म इंडस्‍ट्री के लोग अधिक खुश नजर नहीं आते। कई बार वे इसे निबटाते नजर आते हैं। हिंदी में बातें करते समय वे हमेशा जल्‍दीबाजी में रहते हैं। कई बार लगता है कि उन्‍हें हिंदी से एलर्जी है। सच्‍चाई यह है कि उन्‍हें हिंदी में इंटरव्‍यू देने नहीं आता। ज्‍यादातर स्‍टार हिंदी में खुद को व्‍यक्‍त नहीं कर पाते। उनके पास पर्याप्‍त शब्‍द नहीं होते। हम भी जब उनसे बातें करते हैं तो अपने सवालों को उनकी समझ में आने लायक भाषा मैं अनूदित कर लेते हैं। क्रिया हिंदी की रहती है,लेकिन अधिकांश शब्‍द अंग्रेजी के हो जाते हैं। शाह रुख खान और अमिताभ बच्‍चन जैसे चंद स्‍टार ही अपवाद हैं। वे हिंदी के मुहावरे भी समझते हैं।
इन दिनों निर्माता और प्रचार कंपनियां हिंदी में रिलीज जारी करती हैं। कई बार इन विज्ञप्तियों की भाषा अशुद्ध और भ्रष्‍ट होती है। चूंकि कहीं भी हिंदी के जानकार नहीं रखे जाते और बाज दफा वे मिल भी नहीं पाते,इसलिए मराठी अनुवादकों की हिंदी से काम चला लिया जाता है। उनकी हिंदी सही नहीं होती। फिर भी यह सराहनीय है कि उनकी तरफ से कोशिशें होने लगी हैं। उन्‍हें इन विज्ञप्तियोंं और अन्‍य हिंदी सामग्रियों के लिए हिंदी जानकारों की मदद लेनी चाहिए। कई बार पोस्‍टर पर नाम गलत आते हैं। फिल्‍मों में संवाद गलत होते हैं। फिल्‍मों में कभी टीवी समाचार दिखाया जा रहा हो फ्लिकर में चल रही हिंदी गलत होती है। हिंदी के लिखें पाठों में में तो अशु‍द्धियां रहती ही हैं।
अभी निर्माता रिलीज के समय अपनी सामग्रियां हिंदी में भी देना चाहते हैं। उन्‍हें लगता है कि हिंदी पाठ रहने पर हिंदी मीडिया में अंग्रेजी की तरह उसे ले लिया जाएगा। हाल ही में करण जौर की आगमी फिल्‍म ऐ दिल है मुश्किल के टीजर रिलीज के साथ धर्मा प्रोडक्‍शंस की एक विज्ञप्ति आई। उनकी हिंदी का नमूना देख लें.... करन जोहर अपनी अगली निर्देशित फिल्म के साथ वापस आ गए है। ऐ दिल है मुश्किल में अभिनीत है ऐश्वर्या राय बच्चन, रनबीर कपूर, और अनुष्का शर्मा। फिल्म इस दीवाली 28 अक्टूबर को आ रही है।
देखिये टीज़र। बातचीत में शामिल हों
ऊपर बोल्‍ड में लिखी विज्ञप्ति पढ़ कर देखें।नाम गलत हैं। हैं की बिंदी गायब है। भाषा से भी स्‍पष्‍ट है कि इसे हिंदी में नहीं लिखा गया है। यह अंग्रेजी से अनूदित है और इसे किसी ने जस का तस उल्‍था कर दिया है। जब करण जौहर की कंपनी से ऐसी गलतियां हो सकती हैं तो छोटे निर्माता-निर्देशकों का कहना ही क्‍या?

Thursday, September 1, 2016

दरअसल : पायरेसी,सिनेमा और दर्शक




-अजय ब्रह्मात्‍मज


पारेसी के खिलाफ जंग छिड़ी है। पिछले महीनों में कुछ फिल्‍में ठीक रिलीज के पहले लीक हुईं। जाहिर है इससे उन फिल्‍मों का नुकसान हुआ। सरकार भी पायरेसी के खिलाफ चौकस है। तमाम कोशिशों के बावजूद पायरेसी का काट नहीं मिल पा रहा है। अभी नियम सख्‍त किए गए हैं। आर्थिक दंड की रकम और सजा की मियाद बढ़ा दी गई,लेकिन पायरेसी बदस्‍तूर जारी है।

मुंबई की लोकल ट्रेनों में कुछ सालों पहले तक शाम के अखबार होते थे। किसी जमाने में देश में शाम सबसे ज्‍यादा अखबार मुंबई में निकला करते थे। अभी कुछ के प्रकाशन बंद हो गए। कुछ किसी प्रकार निकल रहे हैं। वे शाम के बजाए सुबह के अखबार हो गए हैं। आप शाम में इन ट्रेनों में सफर करें तो पाएंगे कि सभी अपने स्‍मार्ट फोन में लीन हैं। उनमें से अधिकांश फिल्‍में देख रहे होते हें। ताजा फिल्‍में...और कई बार तो फिलमें रिलीज के पूर्व थिएटर से पहले स्‍मार्ट फोन में पहुंच जा रही हैं। पहले अखबार बांट कर पढ़ते थे। अब फिल्‍में बांट कर देखते हैं। अपरिचितों को भी फिल्‍म फाइल ट्रांसफर करने में किसी को गुरेज नहीं होता। सिर्फ मुंबई में ही नहीं,देश के हर छोटे-बड़े शहर में यही हो रहा है। फिल्‍मों के निर्माता रो रहे हैं। उनकी कमाई छीजती जा रही हैं।

सभी जानते हैं कि भारत में फिल्‍में खूब देखी जाती हैं। देश की प्रमुख भाषाओं में फिल्‍में बन रही हैं और उन्‍हें हम सब देख रहे हैं। एक आंकड़े के मुताबिक फिल्‍मों से लगभग 130 अरब रुपयों की कमाई होती है। यह रकम ज्‍यादा लग रही होगी,लेकिन क्‍या आप को पता है कि पायरेसी के जरिए नामालूम और अनजान लोग इससे 35 प्रतिशत अधिक की कमाई कर रहे हैं। वे लगभग 175 अरब रुयए पायरेसी से कमा रहे हैं। निर्माताओं के साथ सरकार के राजस्‍व का नुकसान हो रहा है। हजारों लोगों के रोजगार छीन रहे हैं। पायरेसी रोकने की बातें होती रहती हैं। अभी तक कोई ऐसा कारगर और ठोस उपाय नहीं हो सका है कि इस पर रोक लग सके।उल्‍टा पायरेसी से कमाई की रकम बढ़ती जा रही है। भयावह और खतरनाक स्थिति है। इसके बावजूद फिल्‍म इंडस्‍ट्री और सरकार के प्रभावशाली कदम नहीं उठ रहे हैं। सेमिनार,रिपोर्ट और बहसों में आंकड़े गिना दिए जाते हैं।

पायरेसी के कारणों पर विचार करने की जरूरत है। सबसे पहले तो दर्शकों की नैतिकता की बात आती है। दर्शक पायरेटेड डीवीडी देखने से परहेज नहीं करते। अब तो डीवीडी की भी जरूरत नहीं है। पेन ड्राइव और स्‍मार्ट फोन पायरेटेड मूवी के स्‍टोर हाउस और करिअर हो गए हैं। दर्शकों के नजरिए से देखें तो अधिकांश दर्शक वैधानिक तरीके से फिल्‍म देखने की सुविधाओं से वंचित हैं। मैट्रो शहरों में मल्‍टीप्‍लेक्‍स आ गए हैं। यहां के निम्‍न आय समूह के दर्शक मल्‍टीप्‍लेक्‍स में जाकर फिल्‍म देखने की जुर्रत नहीं कर पाते। सारे सिंगल स्‍क्रीन की कब्रों पर मल्‍टीप्‍लेक्‍स की दूब लहलहा रही है। वे शहर की भीतरी गलियों में चल रहे अवैध वीडियो पार्लर का सहारा लेते हैं। वे मोबाइल फोन के 2-4 इंच के स्‍क्रीन पर फिल्‍में देख रहे होते हैं। छोटे शहरों और कस्‍बों में नई फिल्‍में चंद रुपए लेकर मोबाइल में लोड कर दी जाती हैं। सरकार चाहे तो इस पर रोक लगा सकती है,लेकिन उसके लिए पर्याप्‍त इच्‍छा शक्ति होनी चा‍हिए। स्‍पष्‍ट नीति होनी चाहिए। कुछ देशों में बेचने वालों के समान इस्‍तेमाल करने वालों की भी धड़-पकड़ होती है। भारत में भी ऐसा किया जा सकता है।

उसके पहले हमें सभी दर्शकों के लिए नई फिल्‍में उपलब्‍ध करानी होंगी। हमें ऐसे उपाय और प्‍लेटफार्म तैयार करने होंगे,जिनके जरिए फिल्‍में रिलीज होने के साथ जल्‍दी से जल्‍दी सभी तबकों के दर्शकों के बीच पहुंच सके। देश में कुल 13,000 सिनेमाघर हैं। देखा जाए तो प्रति 96,000 दर्शकों पर एक सिनेमाघर है। ऐसे में सारे दर्शक सिनमाघरों में जाकर फिल्‍में नहीं देख सकते। ठीक है कि देश की पूरी आबादी फिल्‍में नहीं देखती,फिर भी सभी दर्शकों की पहुंच में फिल्‍में नहीं हैं। सारे अवैध तरीकों को वैध बना कर उन पर शुल्‍क लगाने की जरूरत है। फिल्‍म निर्माताओं को भी बाक्‍स आफिस यानी सिनेमाघरों की कमाई की ग्रंथि से बाहर निकलना होगा। शुरू में ऐसा लग सकता कि एक साथ सभी प्‍लेटफार्म पर आने से कमाई कम हो जाएगी और बूंद-बूंद से समुद्र बनने में तो लंबा वक्‍त लगेगा। दरअसल,नए प्‍लेटफार्म से हाने वाली कुल कमाई बाक्‍स आफिस से कई गुना ज्‍यादा होगी। अगर फिल्‍में थिएटर में रिलीज करने के बाद वीकएंड बीतते ही अगले सोमवार को सभी प्‍लेटफार्म पर आ जाएं तो दर्शक और निर्माता दोनों लाभ में रहेंगे।    

Friday, August 26, 2016

दरअसल : जरूरी है सरकारी समर्थन



-अजय ब्रह्मात्‍मज
इन दिनों विभिन्‍न राज्‍य सरकारें फिर से सिनेमा पर गौर कर रही हैं। अपने राज्‍यों के पर्यटन और ध्‍यानाकर्षण के लिए उन्‍हें यह आसान रास्‍ता दिख रहा है। इस साल गुजरात और उत्‍तर प्रदेश की सरकारों को पुरस्‍कृत भी किया गया। उन्‍हें फिल्‍म फ्रेंडली स्‍टेट कहा गया। फिल्‍मों के 63 वें राष्‍ट्रीय पुरस्‍कारों में एक नई श्रेणी बनी। बताया गया था कि इससे राज्‍य सरकारें फिल्‍मों के प्रोत्‍साहन के लिए आगे आएंगी। इसके साथ ही सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अधीन कार्यरत एनएफडीसी(नेशनल फिल्‍म डेवलपमंट कारपोरेशन) के दिल्‍ली कार्यालय में फिल्‍म फैसिलिटेशन विभाग खोला गया। उद्देश्‍य यह है कि फिल्‍मकारों को साथ लाया जाए और उन्‍हें फिल्‍में बनाने की सुविधाएं दी जाएं।
एनएफडीसी सालों सार्थक फिल्‍मों के समर्थन में खड़ी रही। इसके सहयोग से पूरे देश में युवा फिल्‍मकार अपनी प्रतिभाओं और संस्‍कृति के साथ सामने आए। हालांकि फिल्‍मों के लिए एनएफडीसी सीमित फंड ही देती थी,लेकिन उस सीमित फंड में ही युवा फिल्‍मकारों ने प्रयोग किए और समांतर सिनेमा अभियान खड़ा कर दिया। अब पैरेलल,समांतर या वैकल्पिक सिनेमा को कोई नाम नहीं लेता। गौर करें तो फिल्‍मों के निर्माण और कटेंट में कला और व्‍यवसाय के गड्डमड्ड होने के बावजूद कुछ फिल्‍में स्‍वंतत्र तरीके से आ रही हैं। ऐसा लग रहा है कि सरकारी स्‍तर पर कोई विजनरी निदेशक आए तो फिर से सार्थक सिनेमा का अभियान चल सकता है। अब तो दर्शकों के बीच पहुंचने के लिए पहले जैसी थिएटर रिलीज की समस्‍या भी नहीं रही। फिल्‍मों के प्रदर्शन के अनेक प्‍लेटफार्म आ गए हैं।
हालांकि राज्‍य सरकारों ने फिल्‍म निर्माताओं को रिझाने की नीतियां बनाई हैं। सबसे बड़ा आकर्षण सब्सिडी में मिलने वाली रकम है। इस रकम के लालच में मुंबई के फिल्‍म निर्माता इन राज्‍यों के लोकेशन चुन रहे हैं। ठीक है कि उत्‍तर प्रदेश,झारखंड और बिहार के अनदेखे लोकेशन फिल्‍मों में आएंगे। उनसे पर्यटन भी बढ़ सकता है। किंतु यहां ठहर कर सोचना होगा कि फिल्‍म निर्माता-निर्देशकों को अपने राज्‍यों में लाने का उद्देश्‍य क्‍या हो? कोशिश तो यह होनी चाहिए कि वहां के साहित्‍य और संस्‍कृति को भी इन फिल्‍मों जगह मिले। फिल्‍म की कहानियों में उन राज्‍यों का समाज और सामाजिकता हो। चेहरे भी वहीं के दिखें तो और बेहतर। मेरी एक संकल्‍पना है कि हिंदी फिल्‍मों में ऐसी विविधता और स्‍थानीयता आए कि यूपी,मध्‍यप्रदेश,बिहार,झारखंड आदि राज्‍यों का अपना हिंदी सिनेमा हो। इसके साथ ही वहां की भाषाओं में भी फिल्‍में बनें। फिल्‍में भाषाओं के संरक्षण और प्रसार में बड़ी भूमिकाएं निभाती हैं। हम मानते हैं कि हिंदी सिनेमा ने हिंदी भाषा का प्रसार किया है। राज्‍य सरकारों को ऐसे निर्माताओं को निमंत्रण और समर्थन देना चाहिए,जो इन राज्‍यों की कहानियों पर स्‍थानीय भाषाओं में फिल्‍में बना सके। यहीं जरूरत है कि हम कुछ विजनरी निदेशकों को फिल्‍म नीतियों के नेतृत्‍व और क्रियान्‍वयन के लिए चुनें। मुंबई के लोकप्रिय कलाकारों को फंड और समर्थन देने से खबरें बनेंगी,लेकिल फिल्‍मों का स्‍थानीय विकास नहीं होगा। वह राज्‍य की प्रतिभाओं को विशेष समर्थन देने से ही होगा।
इन रात्ज्‍यों को यह भी खयाल रखना होगा कि स्‍थानीयता के नाम पर साधारण और घटिया फिल्‍मों को प्रश्रय न दें। घटिया फिल्‍मों को किसी भी प्रकार की छूट मिलते हैं तो अनेक महात्‍वाकांक्षी औसत काम की ओर बढ़ते हैं। गुणवत्‍ता पर ध्‍यान देना जरूरी है। पश्चिम बंगाल और कर्नाटक उदाहरण हैं। जब वहां की सरकारों ने समर्थन दिया तो श्रेष्‍ठ फिल्‍मकार उभरे। नए सिरे से ऐसा प्रयास किया जा सकता है। युवा फिल्‍मकारों को दिशा दी जा सकती है। फिलहाल महाराष्‍ट्र की राज्‍य सरकार फिल्‍मों के निर्माण और समर्थन में अनुकरणीय कार्य कर रही है। महाराष्‍ट्र में फिल्‍मों के प्रदर्शन पर ध्‍यान दिया गया है। मल्‍टीप्‍लेक्‍स में प्रादम टाइम पर शो सनिश्चित किया गया है। इन सारे कदमों से फर्क पड़ा है। आज मराठी सिनेमा क्‍वालिटी और क्‍वांटिटी में तेजी से आगे बढ़ रहा है। देश के अन्‍य राज्‍यों को महाराष्‍ट्र से सीखना चाहिए।
हर सूरत और सीढ़ी में सरकारी समर्थन जरूरी है। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को राष्‍ट्रीय स्‍तर पर पहल करनी होगी। एक बार फिल्‍मों का बाजार बन गया तो स्‍वतंत्र निर्माता भी आगे आएंगे। सभी राज्‍यों की प्रतिभाएं अपने राज्‍यों के बारे में भी सोचेंगी। अभी तो बस मुंबई ही मंजिल है। सभी को करण जौहर बनना है। जुहू चौपाटी पर अपनी फिल्‍म की होर्डिंग देखनी है।

Thursday, August 11, 2016

दरअसल : सोशल मीडिया के दौर में फिल्‍म समीक्षा



-अजय ब्रह्मात्‍मज

पिछले हफ्ते जयपुर में था। वहां टॉक जर्नलिज्‍म के एक सत्र में विष्‍य था सोशल मीडिया के दौर में किसे चाहिए फिल्‍म समीक्षक?’। सचमुच अभी सोशल मीडिया पर जिस तेजी और अधिकता में फिल्‍मों पर टिप्‍पणियां आ रही हैं,उससे जो यही आभास होता है कि शायद ही कोई फिल्‍म समीक्षा पढ़ता होगा। अखबारों और चैनलों पर नियमित समीक्षकों की समीक्षा आने के पहले से सोशल मीडिया साइट पर टिप्‍पणियां चहचहाने लगती हैं। इनके दबाव में मीडिया हाउस भी अपने साइट पर यथाशीघ्र रिव्‍यू डालने लगे हैं। एक प्रतिष्ठित अंग्रेजी अखबार तो प्रीव्‍यू में रिव्‍यू का भ्रम देता है। केवल आखिर में एक पंक्ति रहती है कि हमारे समीक्षक की समीक्षा का इंतजार करें। हम जल्‍दी ही पोस्‍ट करेंगे। सभी हड़बड़ी में हैं। डिजिटल युग में आगे रहना है तो सर्वप्रथम होना होगा। जो सबसे पहले आएगा,उसे सबसे ज्‍यादा हिट मिलेंगे। इस दबाव में कंटेंट पर किसी का ध्‍यान नहीं है।
पहले बुधवार या गुरूवार को निर्माता फिल्‍में दिखाते थे। अखबारों में शनिवार और रविवार को इंटरव्‍यू छपते थे। फिल्‍मों पर विस्‍तार से चर्चा होती थी। आज के पाठकों को यकीन नहीं होगा कि तब पत्रिकाओं में भी रिव्‍यू छपते थे। फिल्‍मों की रिलीज के कई दिनों के बाद छपे इन रिव्‍यू को भी पाटक चाव से पढ़ते थे। उन्‍हें भाव देते थे। अभी अखबारों के नियमित समीक्षकों कें रिव्‍यू भी अखबार से पहले उनके डिजिटल साइट पर शुक्रवार को ही आ जाते हैं। प्रतियोगिता है तो भला कौन पीछे रहना चाहेगा? दूसरी तरफ सोशल मीडिया पर तत्‍काल रिव्‍यू आने से घबराए फिल्‍म निर्माता अपनी कमजोर और बढि़या फिल्‍मों के प्रीव्‍यू का सिलसिला खत्‍म कर रहे हैं। यशराज फिल्‍म्‍स सालों से अपनी फिल्‍मों का प्रीव्‍यू नहीं करता। वे शुक्रवार को ही फिल्‍म दिखाते हैं,जबकि शुक्रवार को मुंबई में सुबह नौ बजे से नर्द फिल्‍मों के शो चालू हो जाते हैं। निर्माताओं का तर्क यह है कि वे पहले दिखा कर समीक्षकों समीक्षा लिखने का मौका नहीं देना चाहते। फिल्‍म के बारे में बुराई आ जाए तो आरंभिक दर्शक घट जाते हैं। आरंभिक दर्शकों या फिल्‍म ट्रेड की भाषा में आपनिंग के चक्‍कर में प्रीव्‍यू का महत्‍व खत्‍म हो गया है। शुक्रवार के ही दिन फिल्‍म देखने-दिखाने से समय के दबाव में विस्‍तृत समीक्षा नहीं आ पाती।
इन दिनों सोशल मीडिया साइट पर लाइव रिव्‍यू का चलन बढ़ा है। ऐसे रिव्‍यू में फिल्‍म शुरू होते ही अिप्‍पणियां आने लगती हैं। कई बार कहानी भी खुलती जाती है। सीन दर सीन चल रही कथित समीक्षा और टिप्‍पणी में फिल्‍म के आस्‍वाद का कचूमर निकल चुका होता है। मुझे नहीं लगता कि ऐसे रिव्‍यू फिल्‍म के प्रति धारणा बनाने या देखने व न देखने का निर्णय लेने में कोई मदद करते हैं। सोशल मीडिया साइट पर तो एक और फैशन बढ़ गया है। छोटी-बड़ी फिल्‍मों के प्रायवेट शो होते हैं। इनमें फिल्‍म बिरादरी के ही सदस्‍य होते हैं। फिल्‍म खत्‍म होते ही उनके अपडेट आरंभ हो जाते हैं। जाहिर है कि सभी फिल्‍म की तारीफ कर रहे होते हैं। साथ ही दर्शकों से भी गुजारिश रहती है कि वे फिल्‍म अवश्‍य देखें। परस्‍पर प्रचार की इस रणनीति से फिल्‍मों को फायदा होता है। अब अगर करण जौहर,अनुराग कश्‍यप और विशाल भारद्वाज सिफारिश करेंगे तो उनके प्रशंसक एक बार फिल्‍म देखने का मन तो बना ही लेंगे। ताजा उदाहरण अक्षय कुमार की रुस्‍तम का है। सलमान खान,रणवीर सिंह और करण जौहर दर्शकों से आग्रह कर रहे हैं कि वे रुस्‍तम देखें। रिलीज के दिन या उसके पहले फिल्‍म के बारे में अच्‍छी राय के साथ और भी सेलिब्रिटी अपडेट आ जाएंगे।
निश्चित ही दर्शक जुटाने और बढ़ाने के ये तरीके तीन दिनों के वीकएंड बिजनेस के लिए किए जा रहे हैं। शुक्र,शनि और रवि के तीन दिनों में एक-एक दिन काउंट होता है। विपरीत समीक्षा का असर पड़ता है। यही वजह है कि नियमित समीक्षकों का अप्रासंगिक बता कर बीच से निकालने की साजिश चल रही है। विदेशों में उन्‍हें कामयाबी मिल चुकी है। अब भारत में माहौल तैयार किया जा रहा है। भारत में इंटरनेट बढ़ा है। सोशल मीडिया साइट पर भी यातायात बढ़ा है,लेकिन जनसंख्‍या और दर्शकों के अनुपात में यह अभी कम है। अभी तक अखबारों की समीक्षा पर पाठक व दर्शक गौर करते हैं। वे इंतजार भी करते हैं।