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Saturday, March 18, 2017

दरअसल : विरोध के नाम पर हिंसा और बयानबाजी क्‍यों?



दरअसल...
विरोध के नाम पर हिंसा और बयानबाजी क्‍यों?
-अजय ब्रह्मात्‍मज

गनीमत है कि कोल्‍हापुर में संजय लीला भंसाली की पद्मावती के सेट पर हुई आगजनी में किसी की जान नहीं गई। देर रात में हुड़दंगियों ने तोड़-फोड़ के बाद सेट को आग के हवाले कर दिया। संजय लीला भंसाली की टीम को माल का नुकसान अवश्‍य हुआ। कॉस्‍ट्यूम और जेवर खाक हो गए। अगली शूटिंग में कंटीन्‍यूटी की दिक्‍कतें आएंगी। फिर से सब कुछ तैयार करना होगा। ऐसी परेशानियों से हुड़दंगियों को क्‍या मतलब? उन पर किसी प्रकार की कार्रवाई नहीं होती तो उनका मन और मचलता है। वे फिर से लोगों और विचारों को तबाह करते हैं।
देश में यह कोई पहली घटना नहीं है,लेकिन इधर कुछ सालों में इनकी आवृति बढ़ गई है। किसी भी समूह या समुदाय को कोई बात बुरी लगती है या विचार पसंद नहीं आता तो वे हिंसात्‍मक हो जाते हैं। सोशल मीडिया पर गाली-गलौज पर उतर आते हैं। सेलिब्रिटी तमाम मुद्दों पर कुछ भी कहने-बोलने से बचने लगे हैं। कोई भी नहीं चाहता कि उसके घर,परिजनों और ठिकानों पर पत्‍थर फेंके जाएं। खास कर क्रिएटिव व्‍यक्ति ऐसी दुर्घटनाओं की संभावना से बचने के लिए सुरक्षित चाल चलने लगे हैं। डर पसर रहा है। फिल्‍मों के लेखन और निर्देशन में यह डर घुस रहा है। सीबीएफसी से लेकर सेंसर के लिए तत्‍पर वृहत समाज से आगत परेशानियों से बचने के लिए लेखक और निर्देशक पहले से ही कतरब्‍योंत में लग जाते हैं। किसी भी सभ्‍य समाज में सृजन पर लग रहे ऐसे ग्रहण का समर्थन नहीं किया जा सकता।
सृजन के क्षेत्र में मतभेद और विरोध होना चाहिए। विमर्श होना चाहिए। अगर किसी विचार या फिल्‍म से समाजिक उपद्रव की आशंका है तो उसके प्रसारण और प्रदर्शन को रोकने के संवैधानिक तरीके हैं। उन पर अमल किया जा सकता है। अभी तो यह स्थिति बनती जा रही है कि मतभेद,असहमति और विरोध दर्ज करने के लिए हर कोई हिंसक हो जा रहा है। भड़काऊ बयान दे रहा है। सोशल मीडिया पर ट्रोल आरंभ हो जाता है। यों लगने लगता है कि देश की सबसे बड़ी समस्‍या फिलहाल यही है।
पिछले दिनों नाहिद आफरीन को लेकर जिस प्रकार कथित फतवे जारी हुए। पूरे मामले को जो रंग दिया गया,उससे यही एहसास बढ़ रहा है कि सृजन और अभिव्‍यक्ति का दायरा निरंतर संकीर्ण होता जा रहा है। कुछ कट्टरपंथी समाज में समागम नहीं चाहते। वे प्रतिभाओं को उभरने नहीं देना चाहते। खिलने के पहले ही वे प्रतिभाओं को मसल देना चाहते हैं। दिक्‍कत यह है कि ऐसी घटनाओं पर प्रशासन की चुप्‍पी और उदासी हुड़दंगियों का बेजा जोश बढ़ाती है। उन्‍हें लगता है कि उन पर कोई कानूनी कार्रवाई नहीं होगी। अफसोस की बात है कि समाज के कुछ तबकों से उन्‍हें समर्थन मिल जाता है। हमेशा से सोसायटी के नेक बंदे खामोश रहते हैं। किसी भी लफड़े में शामिल होकर अपनी मुसीबत कोई क्‍यों बढ़ाए? क्‍योंकि उन्‍हें समर्थन और सहयोग नहीं मिलता।
कुछ व्‍यक्ति(इंडिविजुअल) होते हैं,जो साहस करते हैं। वे सृजन के लिए हर जोखिम उठाते हैं। कुर्बानियां भी देनी पड़ती है,लेकिन ऐसे साहसी सर्जकों की बदौलत ही क्रिएटिव संसार फलता-फूलता है। ऐसे सृजनधर्मी व्‍यक्ति ही हमारे समाज के गौरव होते हैं। कभी उनका नाम संजय लीला भंसाली होता है तो कभी नाहिद आफरीन। हमें ऐसे व्‍यक्तियों के समर्थन में आना होगा। समाज में विभिन्‍न मतों,विचारों और कृतियों के लिए गुजाईश रखनी होगी। तभी हम देश और समाज के विकास में सहायक होंगे।
अन्‍यथा दिख रहा है कि हम किस विध्‍वंस की ओर बढ़ रहे हैं।  

Monday, February 13, 2017

दरअसल : डराती है हकीकत



दरअसल...
डराती है हकीकत
-अजय ब्रह्मात्‍मज

आज देश के कुछ सिनेमाघरों में जॉली एलएलबी2 रिलीज होगी। रिलीज के हफ्ते में यह चर्चा में रही। सभी जानते हैं कि इस फिल्‍म में जज और देश की न्‍याय प्रणाली के चित्रण पर एक वकील ने आपत्ति की। कोर्ट ने उसका संज्ञान लिया और फसला फिल्‍म के खिलाफ गया। फिल्‍म से चार दृश्‍य निकाल दिए गए। उन दृश्‍यों की इतनी चर्चा हो चुकी है कि दर्शक समझ जाएंगे कि वे कौन से सीन या संवाद रहे होंगे। कुछ सालों के बाद इस फिल्‍म को देख रहे दर्शकों को पता भी नहीं चलेगा कि इस फिल्‍म के साथ ऐसा कुछ हुआ था। हां,फिल्‍म अध्‍येता देश में चल रहे सेंसर और अतिरिक्‍त सेंसर के पर्चों में इसका उल्‍लेख करेंगे। निर्माता ने पहले सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी,लेकिन उन्‍होंने उसे वापिस ले लिया। उन्‍होंने लेखक-निर्देशक को सीन-संवाद काटने के लिए राजी कर लिया। लेखक-निर्देशक की कचोट को हम समझ सकते हैं। उनका अभी कुछ भी बोलना उचित नहीं होगा। उससे कोट्र की अवमानना हो सकती है। सवाल है कि क्‍या कोर्अ-कचहरी की कार्य प्रणाली पर सवाल नहीं उठाए जा सकते? क्‍या उनका मखौल नहीं उड़ाया जा सकता या कोई प्रहसन नहीं तैयार किया जा सकता? अभी जो लोग खामोश है,वे याद रखें कि ऐसा ही चलता रहा तो अतिरिक्‍त सेंसर की तलवार अभिव्‍यक्ति के सभी माध्‍यमों को क्षत-विक्षत करेगी। यह खतरनाक संकेत है।
कुछ दिनों पहले संजय लीला भंसाली के सेट पर पहुंच कर एक सेना विशेष ने हड़कंप मचाया। पुलिस और प्रशासन की निष्क्रियता या उासी ही कहें कि संजय लीला भंसाली ने शूटिंग रोक दी। उन्‍होंने उक्‍त सेना के प्रतिनिधियों से बातचीत की और आश्‍वस्‍त किया कि फिल्‍म में ऐसा कुछ नहीं है। अजीब सी प्रतिक्रियाएं आईं। जिस दुर्घटना के वीडियो वायरल हुए। उसके संदर्भ में हड़कंप के हिमायती तर्क दे रहे हैं कि संजय लीला भंसाली ने ही एफआईआर नहीं किया तो पुलिस और प्रशासन क्‍या करे? तो क्‍या जरूरी है कि अनाचार और अत्‍याचार के खिलाफ भुक्‍तभोगी शिकायत करे तभी कोई कार्रवाई होगी? और फिर ये कौन लोग हैं,जो संस्‍कृति और इतिहास के संरक्षक के तौर पर उग आए हैं। समाज और राजनीति में अनुदारता और असहिष्‍णुता बढ़ रही है। भारतीय समाज में यह कोई नई दुर्घटना नहीं है,लेकिन पहले उसे ऐसा समर्थन नहीं मिलता था।
ऐसी दुर्घटनाओं और उनके परिणाम से स्‍पष्‍ट है कि लेखक,निर्देशक और निर्माता इस प्रकार के विषयों पर फिल्‍में बनाने से हिचकेंगे। फिल्‍म की रिलीज के समय निर्माता किसी प्रकार के विवाद में नहीं पड़ना चाहता। सभी निर्माता प्रकाश झा और अनुराग कश्‍यप के तरह अपने सृजन के साथ खड़े होने और सिस्‍टम से टकराने का साहस नहीं कर पाते। दबाव और मजबूरी में ज्‍यादातर फिल्‍मकार घुटने टेक देते हैं। गौर करें तो पिछले कुछ सालों में फिल्‍मकारों ने अपनी कहानियों में स्‍थान,किरदार और उनके चित्रण में वास्‍तविकता पर जोर दिया है। कुछ दशक पहले तक हिंदी फिल्‍मों के किरदारों का कोई शहर ही नहीं होता था। स्‍थान और काल से भी कहानी का संबंध नहीं होता था। नायक-नायिका प्रेम या बदला लेने के अलावा कुछ नहीं करते थे। उनका कोई पेशा नहीं होता था। वे काम नहीं करते थे। इधर लेखकों और निर्देशकों ने स्‍थान,काल और किरदारों की वास्‍तविकता पर जोर देना शुरू किया तो कुछ समूहों और व्‍यक्तियें को आपत्ति होने लगी। उन्‍हें डर लगने लगा है। चित्रण वास्‍तविक होगा तो वह असंतुष्‍टों को खटकेगा। उन्‍हें लगेगा कि यह अनुचित है। वे आपत्ति करेंगे और फिर सीन व संवाद कटते रहेंगे। फिल्‍में फंसती रहेंगी।
ऐसी रोक-टोक,पाबंदी और पवित्रता हमें जड़ता की ओर ही ले जाती है। कला और अभिव्‍यक्ति के क्षेत्र में कल्‍पना और प्रयोग से ही कथ्‍य का विस्‍तार होता है। हमें इस दिशा में उदारता और सहिष्‍णुता बरतनी होगी।
बााक्‍स आफिस
पिछलें हफ्ते की फिल्‍मों में सीमित रिलीज की फिल्‍म  जैागम इमाम की अलिफ का कलेक्‍शन उल्‍लेखनीय नहीं है। दूसरी फिल्‍म जैकी चान की कुंगफु योगा है। इस फिल्‍म ने चीन में पहले हफ्ते में 943 करोड़ का कलेक्‍शन किया है। भारत में अधिकतम कलेक्‍शन की हिंदी फिल्‍म दंगल है,जिसने 385 करोंड़ का कलेक्‍शन किया है। इसकी वजह यह है कि चीन और भारत में सिनेमाघरों की संख्‍या में पांच गुने का भारी अंतर है। कुंगफू योगा को भारत के दर्शकों ने स्‍वीकार नहीं किया। फिल्‍म का कलेक्‍शन सामान्‍य से भी कम रहा।