Search This Blog

Showing posts with label दरअसल. Show all posts
Showing posts with label दरअसल. Show all posts

Monday, August 14, 2017

दरअसल : यंग एडल्‍ट के लिए फिल्‍में



दरअसल...
यंग एडल्‍ट के लिए फिल्‍में
-अजय ब्रह्मात्‍मज
बृजमोहन अमर रहे,अभी और अनु,आश्‍चर्यचकित,अज्‍जी,नोबलमैन,द म्‍यूजिक टीचर,कुछ भीगे अल्‍फाज,हामिद... उन कुछ फिल्‍मों के नाम हैं,जो अगले महीने से हर महीने रिलीज होंगी। योजना है कि दर्शकों तक ऐसी फिल्‍में आएं,जो कथ्‍य के स्‍तर पर गंभीर हैं। कुछ कहना चाहती हैं। अच्‍छी बात है कि इन सारी फिल्‍मों की योजना 18 से 30 साल के दर्शकों को धन में रख कर बनाई गई है। एक सर्वे के मुताबिक पहले दिन फिल्‍म देखने आए दर्शकों में से 64 प्रतिशत की उम्र 24 साल से कू होती है। सिनेमाघरों में युवा दर्शक जाते हैं। इस समूह के दर्शक विश्‍व सिनेमा से परिचित हैं। अगर उन्‍हें फिल्‍म पसंद नहीं आती है तो बड़े से बड़े लोकप्रिय सितारों की भी फिल्‍में बाक्‍स आफिस पर औंधे मुंह गिरती हैं।
ऊपर उल्लिखित सभी फिल्‍मों का निर्माण यूडली फिल्‍म्‍स कर रही है। यूडली फिल्‍म्‍स मूल रूप से सारेगाम म्‍यूजिक कंपनी की नई फिल्‍म निर्माण कंपनी है। एक अर्से की खामोशी के बाद फिल्‍म निर्माण में सारेगामा का उतरना अच्‍छी खबर है। हिंदी फिल्‍में हमेश एण्‍क संक्राति से दूसरी संक्राति के बीच रहती है। उसी के दरम्‍यान कुछ नया करने के उद्देश्‍य से कोई आता है। विषय,प्रस्‍तुति और मनोरंजन की नई बयार दर्शकों को भी राहत देती है। उन्‍हें कुछ नया मिलता है। बाहुबली और दंगल जैसी फिलमें रोजाना नहीं बन सकतीं। जरूरत है कि सीमित बजट और मझोले स्‍टारडम के एक्‍टरों को लकर फिल्‍में आएं। दर्शकों को मनोरंजन मिले तो वे ऐसी फिल्‍मों को सपोर्ट करते हैं। जैसे कि तमाम लोकप्रिय सितारों के बीच अभी शुभ मंगल सावधान और बरेली की बर्फी उम्‍मीद की हिलारें दे रही हैं।
मनोरंजन के क्षेत्र में माना जा रहा है कि यंग एडल्‍ट(युवा वयस्‍क) को धन में रख कर फिल्‍में नहीं बन रही हैं। मेनस्‍ट्रीम हिंदी सिनेमा की खुराक से बड़े हुए दर्शकों को पारंपरिक शैली में आ रही फार्मूला फिल्‍में अच्‍छी लगती हैं। वे उनसे खुश हैं। बच्‍चों को टीवी से किड्स शो मिल जाते हैं। समस्‍या यंग एडल्‍ट की है। हिंदी फिल्‍मों की प्‍लानिंग में यह समूह नदारद है,जबकि आज वही हिंदी फिल्‍मों का पहला दर्शक है। यूडली फिल्‍म्‍स की कोशिश है कि इन दर्शकों की संवेदनाओं और अपेक्षाओं की कहानी दिखाई जाए। तात्‍पर्य यह है कि उनकी सोच और जरूरतों को प्रमुखता दी जाए। हिंदी सिनेमा के अभाव में वे तेजी से से ओटीटी कंटेंट(ओवर द टॉप कंटेंट) की ओर भाग रहे हैं। ओटीटी कंटेंट में इंटरनेट के लिए निर्मित और जारी शोज आते हैं। एमेजॉन और नेटफिल्‍क्‍स इस श्रेणी के बड़ प्‍लेयर के रूप में उभरे हैं।
कोशिश है कि युवा दर्शकों को यूथ रियलिज्‍म की फिल्‍में दी जाएं। यूडली फिल्‍म्‍स फिलहाल हर साल 12 से पंद्रह फिल्‍में बनाने की सोच रही है। सिनेमाघरों में इन फिल्‍मों के आते ही अन्‍य प्रोडक्‍शन हाउस भी ऐसी फिल्‍मों की तैयारी करेंगे। यों लग रहा है कि 2018 का नया ट्रेड युवा दर्शकों की फिल्‍में होंगी। ये फिल्‍में अधिकतम दो घंटे की अवधि की होगी। भाषा की हदें तोड़ कर यह भी कोशिश की जा रही है कि फिल्‍म के विरूाय और परिवेश के अनुरूप भाषा रखी जा और उसे सभी भाषाओं के दर्शकों के बीच ले जाया जाए। हिंदी के दर्शकों के बीच तो लाया ही जाएं। वैसे भी बाहुबली ने जता दिया है कि कंटेंट दमदार हो तो भाषा दीवार नहीं बन सकती। संगीतप्रेमियों को इन फिल्‍मों के जरिए सारेगामा के बैंक से पुरानी फिल्‍मों के गाने मूल या कवर के रूप में देखने-सुनने को मिल सकते हैं।
युवा दर्शकों के लिए फिल्‍में बदलने को तैयार हैं। उनकी रुचि और क्रय श्‍क्ति की वजह से ही यह बदलाव हो रहा है।

Friday, August 4, 2017

दरअसल : खानत्रयी का आखिरी रोमांटिक हीरो



दरअसल....
खानत्रयी का आखिरी रोमांटिक हीरो
-अजय ब्रह्मात्‍मज
दोनों पैरों के बीच खास दूरी बना कर ऐंठते हुए वे जब अपनी बांहों को फैला कर ऊपर की ओर उठाते हैं तो यों लगता है कि वे पूरी दुनिया को उसमें समोने के लिए आतुर है। उनका यह रोमांटिक अंदाज ै।इतना पॉपुलर है कि कोई भी निर्देशक इसे दोहराने से नहीं बचता। शाह रूख खान भी सहर्ष तैयार हो जाते हैं। अब तो इवेंट और शो में भी उनसे फरमाईश होती है कि इस क्‍लासिक रोमांटिक अंदाज में वे अपनी तस्‍वीर उतारने दें। गौर करेंगे इस पोज में वे दायीं तरफ देख रहे होते हैं और कैमरा भी दायीं तरफ ही रहता हैं। उनके होंठो पर आकर्षक टेढ़ी मुस्‍कान रहती है। वे खुली बांहों से सभी को निमंत्रण दे रहे होते हैं। अब तो उनकी मिमिक्री कर रहे कलाकार भी उनके इस अंदाज से वाहवाही बटोर लेते हैं।
आज रिलीज हो रही जब हैरी मेट सेजल में इम्तियाज अली ने अगर उनके इस अंदाज को दोहराया होगा तो कोई जुर्म नहीं किया होगा। दर्शक तो मुग्‍ध ही होंगे। जब हैरी मेट सेजल रोमांटिक फिल्‍म होने का अहसास दे रही है। वैसे भी शाह रुख खान कह ही चुके हैं कि इम्तियाज अली नए जमाने के यश चोपड़ा हैं। स्‍टार ने डायरेक्‍टर को सर्टिफिकेट दिया। और डायरेक्‍टर ने फिर से स्‍टार को रोमांटिक किरदार दिया। अब देखना है कि इस किरदार को देख कर दर्शक कितने खुश होंगे और प्रशंसक पागल... खानत्रयी(आमिर,शाह रुख और सलमान) में अब अकेले शाह रुख खान ही रोमांटिक लीड कर रहे हैं। अपनी हीरोइनों के लिए रोमांटिक गाने गा रहे हैं। रईस जैसी फिल्‍म में भी जालिमा का सीक्‍वेंस फिट कर दिया। हालांकि उसकी वजह से फिल्‍म फिसल गई। बहरहाल,जब हैरी मेट सेजल में ऐसी फिसलन की संभावना नहीं है। इम्तियाज और शाह रूख दोनों ही पूरे कंफीडेंट दिख रहे हैं।
आमिर खान ने सन् 2000 के बाद से ही अपनी राह बदल ली। बीच की कुछ फिल्‍मों में वे रोमांस करते दिखे,लेकिन उन्‍हें प्‍योर रोमांटिक फिल्‍में नहीं कहा जा सकता। आमिर खान ने अपनी सीमाओं को वक्‍त से पहचान नलया और समय रहते दिशा बदल दी। अपनी अपारंपरिक फिल्‍मों से उन्‍होंने साबित किया कि दर्शकों की नब्‍ज पर उनका हाथ है। उनकी पिछली फिल्‍में निरंतर कीर्तिमान स्‍थपित कर रही हैं। पिछली फिल्‍म दंगल की कामयाबी ने तो नया मानदंड तय कर दिया। सलमान खान भी पहले की तरह रोमांटिक और कॉमेडी फिल्‍में नहीं कर रहे हैं। कबीर खान के निदेशन में आई उनकी बजरंबी भाईजान और ट्यूबलाइट वे भी बदलने को तैयार हैं। उनकी पारंपरिक फिल्‍मों में भी रोमांस का प्रतिशत लगातार कम होता जा रहा है। निकट भविष्‍य में आ रही उनकी फिल्‍मों में रोमांस की उम्‍मीद नहीं दिखती। यों अप्रत्‍याशित व्‍यवहार और पहल के लिए मशहूर सलमान खान के बारे में स्‍पष्‍ट रा नहीं बनाई जा सकती। फिर भी सलमान खान अपने एक प्रतिद्वंद्वी शाह रूख खान की राह पर लौटते नहीं दिखाई दे रहे।
सचमुच,शाह रूख खान खानत्रयी के आखिरी रोमांटिक हीरो रह गए हैं। कहा तो जा रहा है कि वे अपनी रोमांटिक इमेज में कैद हो गए हैं। कुंदन शाह की राय में शाह रूख खान दुखी और उदास किरदारों में अधिक जंचते,लेकिन कभी हां,कभी ना की हद से वे निकल गए। रोमांटिक हीरो बने। अब उन्‍हें जल्‍दी ही खुद को रीइन्‍वेंट करना चाहिए। वर्ना उनकी गति पिछली सदी के अंतिम दशक के अमिताभ बच्‍चन जैसी हो सकती है। दर्शक उन्‍हें रिजेक्‍ट कर सकते हैं। उनकी पिछली फिल्‍मों की कम कामयाबी संकेत दे रही है। फिलहाल आमिर और सलमान से वे फिल्‍मों के बिजनेश के मामले में पिछड़ गए हैं। यह भी जाहिर है कि इस से उनके स्‍टारडम में अधिक फर्क नहीं पड़ा है। फिर भी जब हैरी मेट सेजल जरूरी चमत्‍कार उसे उन्‍हें आमिर खान और सलमान खान के समकक्ष ला सकती है।

Friday, July 28, 2017

दरअसल : ट्रेलर और गानों के व्‍यूज की असलियत



दरअसल...
ट्रेलर और गानों के व्‍यूज की असलियत
-अजय ब्रह्मात्‍मज

आए दिन रिलीज हो रही फिल्‍म के निर्माता और अन्‍य संबंधित निर्देशक व कलाकार सोशल मीडिया पर बताते रहते हैं कि उनके ट्रेलर और गानों को इतने लाख और करोड़ व्‍यूज मिले। तात्‍पर्य यह रहता है कि उक्‍त ट्रेलर या गाने को संबंधित स्‍ट्रीमिंग चैनल पर उतनी बार देखा गया। ज्‍यादातर स्‍ट्रीमिंग यूट्यूब के जरिए होती है। व्‍यूज यानी दर्शकता बताने का आशय लोकप्रियता से रहता है। यह संकेत दिया जाता है कि रिलीज हो रही फिल्‍म के ट्रेलर और गानों को दर्शक पसंद कर रहे हैं। इससे निर्माता के अहं की तुष्टि होती है। साथ ही फिल्‍म के पक्ष में माहौल बनाया जाता है। दर्शकों को तैयार किया जाता है। लुक,टीजर,ट्रेलरऔर गानों को लकर ऐसे दावे किए जाते हैं। आम दर्शकों पर इसका कितना असर होता है? क्‍या वे इसके दबाव में फिल्‍म देखने का मन बनाते हैं? अभी तक कोई स्‍पष्‍ट अध्‍ययन या शोध उपलब्‍ध नहीं है,जिससे व्‍यूज और दर्शकों का अनुपात तय किया जा सके। सफलता का अनुमान किया जा सके।
टीजर,ट्रेलर या गाने आने के साथ फिल्‍म से जुड़े सभी व्‍यक्ति सोशल मीडिया पर एक्टिव हो जाते हैं। वे ट्वीट और रीट्वीट करने लगते हैं। उनके नुमांइदे मीडियाकर्मियां से आग्रह करते हैं वे उनके बो में ट्वीट करें। साथ ही टीजर,ट्रेलर और गानों के लिंक भी दें। फिल्‍मी हस्तियों के गुडबुक में बने रहने या निकटता पाने की लाासा और भ्रम में अनेक मीडियकर्मी फिल्‍म यूनिट के सदस्‍यों से अधिक सक्रियता दिखाते हैं। ने तरीफ के शब्‍दों के साथ उक्‍त्‍टीजर,ट्रेलर और गाने के लिंक ट्वट कर देते हैं। यह एक ऐसी नादानी है,जिसमें फिल्‍मों और फिल्‍म के निर्माताओं का सीधा फायदा होता है। मीडियाकर्मी अप्रत्‍यक्ष प्रचारक बन जाते हैं। उन्‍हें पता भी नहीं चलता और वे फिल्‍म की कमाई में सहायक हो जाते हैं। अगर आप के ट्वीट की वजह से आपके फॉलोअर उक्‍त वीडियो को देखते हैं तो कहीं न कहीं रूट्रीमिंग नेटवर्क से मिल रही कमाई में आप का योगदान हो जाता है। एक तरीके से मीडियाकर्मी रिटेलर की भूमिका में आ जाते हैं। अब कुछ मीडियकर्मियों की समझ में यह बात आई है तो उनकी सक्रियता कम हुई है। 

उचित तो यह होगा कि जिस फिल्‍म ,फिल्‍मकार या कलाकार के काम में विश्‍वास हो और उसे सपोर्ट करने का मन करे तो हमें अवश्‍य लिंक के साथ ट्वीट या रीट्वीट करना चाहिए। सिर्फ सराहना से काम चल सकता हो तो ज्‍यादा बेहतर।यह भी रोचक तथ्‍य है कि किसी व‍ीडियो को मिली संख्‍यात्‍मक दर्शकता(व्‍यूज) वास्‍तव में दर्शकों में तब्‍दील नहीं होती। पिछले महीनों में ऐसे कई उदाहरण मिल जाएंगे,जब किसी वीडियो को करोड़ों में दर्शक मिले,लेकिन बाक्‍स आफिस पर फिल्‍म का बुरा हाल रहा। दर्शक उस फिल्‍म को देखने थिएटर नहीं गए। करोड़ो दर्शकता के वीडियो की फिल्‍म की कमाई पहले दिन करोड़ रुपयों तक भी नहीं पहुंच पाई। भारतीय राजनीति से उदाहरण लें तो किसी सभा में आई भीड़ इस बात का कतई संकेत नहीं होती कि उक्‍त उम्‍मीदवार चुनाव में जीत ही जाएगा। भीड़ की वजह उस दिन का वक्‍ता भी हो सकता है। या किसी और वजह से उस दिन की सभा में भीड़ उमड़ सकती है। यह भी ध्‍यान में रखना चाहिए कि किसी भी वीडियो को देखने के प्रत्‍यक्ष पैसे नहीं लगते। इंटरनेट या ब्रॉडबैंड के किराए में हो रहे खर्च सीधे जेब पर भारी नहीं पड़ते। अगर वीडियों के हर व्‍यू के लिए एक पैसा भी देने पड़े तो करोड़ों की दर्शकता लाखों तक भी रेंग कर पहुंचेगी। अभी तक भारत में पैसे देकर हर शो या वीडियो देखने की आदत आम नहीं हुई है।हर निर्माता और उसकी फिल्‍म यूनिट अपने प्रचारात्‍मक वीडियो की दर्शकता बढ़ा-चढ़ा कर दर्शक बटोरना चाहती है। उनकी इसचाहत को देखते हुए वीडियो स्‍ट्रीमिंग कंपनिया पैसे लेकर व्‍यूज बढ़ाने का काम करने लगी हैं। दर्शकों को छलने और झांसा देने की मुहिम जारी है।

Friday, June 23, 2017

दरअसल : भारत में जू जू,चीन में आमिर खान



दरअसल...
भारत में जू जू,चीन में आमिर खान
-अजय ब्रह्मात्‍मज
कबीर खान निर्देशित ट्यूबलाइट में चीन की अभिनेत्री जू जू दिखाई पड़ेंगी। यह पहला मौका होगा जब किसी हिंदी फिल्‍म में पड़ोसी देश की अभिनेत्री सलमान खान जैसे लोकप्रिय सितारे के साथ खास किरदार निभाएंगी। पिछले कुछ सालों से भारत और चीन के बीच फिल्‍मों के जरिए आदन-प्रदान बढ़ा है। कुछ फिल्‍मों का संयुक्‍त निर्माण हुआ है। कुछ निर्माणाधीन हैं। चीन में दंगल की कामयाबी ने हमारी तरफ से दरवाजे पर चढ़ाई गई कुंडी खोल दी है। दरवाजा खुला है। अभी तक भारत में चीनी सामानों को दोयम दर्जे के सस्‍ते प्रोडक्‍ट का का माना और मखौल उड़ाया जाता है। चीन के राष्‍ट्रपति तक ने भारत के प्रधानमंत्री से दंगल की तारीफ की। हिंदी-चीनी भाई-भाई नारे की अनुगूंज अब कहीं नहीं सुनाई पड़ती। 21 वीं सदी में दोनों देशों की सिनेमाई दोस्‍ती नई लहर के तौर पर आई है। हिंदी-चीनी सिनेमाई भाई का नारा बुलंद किया जा सकता है।
जू जू को हिंदी में झू झू और चू चू भी लिखा जा रहा है। हम दूसरे देशों की भाषा के शब्‍दों के प्रति लापरवाही की वजह से सही उच्‍चरित शब्‍द की खोज नहीं करते। हिंदी ध्‍वनि प्रधान भाष है। थोड़ी मेहनत की जाए तो हिंदी में दुनिया की हर भाषा का करीबी उच्‍चरण किया जा सकता है। बहरहाल,जू जू में एक जू उनका पारिवारिक सरनेम है। और उनके जू नाम का मतलब मोती है। मोती की चमक और शुद्धता है जू जू के व्‍यक्तित्‍व में। जू जू अगले महीने 33 साल की हो जाएंगी। चीन के पेइचिंग शहर में एक सैनिक परिवार में पैदा हुई जू जू बचपन से कलात्‍मक रुझान की हैं। उन्‍होंने छोटी उम्र में पियानो बजाना सीखा। बता दें कि चीन में लगभी सभी बच्‍चे कोई न कोई वाद्य यंत्र बजाना सीखते हैं। चीन में आर्थिक उदार नीति आने के बाद पियानो का आकर्षण बढ़ा है। सांस्‍कृतिक क्राति के दौर में पियानों जैसे वाद्य यंत्र पर पाबंदी सी लगी थी। गाने-बजाने की शौकीन जू जू भारत की अनेक प्रतिभाओं की तरह ही एक म्‍यूजिकल कंटेस्‍ट से सामने आईं। उन्‍होंने चीन में एमटीवी के शो होस्‍अ किए और अपने रुझान का दायरा बढ़ाती गईं। 2011 में आई छन तामिंग की फिल्‍म वु चिड़ न्‍वी रन सिन(औरतें क्‍या चाहती हैं) से उनके एक्टिंग करिअर की शुरुआत हुई। 2012 में उन्‍‍हें हालवुड की द मैन विद द आयन फिस्‍ट फिल्‍म मिल गई। फिल्‍मों और टीवी शो से इंटरनेशनल पहचान हासिल कर चुकी जू जू ने 2016 में ट्यूबलाइट साइन की। वह भारत आईं और उन्‍होंने हिंदी भी सीखी।
जू जू का भारत में कैसा स्‍वागत होगा? यह तो कुछ घंटों के बाद पता चल जाएगा। हिंदी-चीनी सिनेमाई भाई के संदर्भ में हाल में चीन में मिली आमिर खान की पहचान और सफलता उल्‍लेखनीय है। किसी भी भारतीय कलाकार को चीन में ऐसी कमर्शियल कामयाबी नहीं मिली थी। वैसे चीन में राज कपूर और उनकी फिल्‍म आवारा के बारे में 35-40 से अधिक उम्र के सभी नागरिक जानते हैं। अमेरिकी फिल्‍मों के प्रवेश के पहले भारतीय फिल्‍में ही चीनी दर्शकों के विदेशी मनोरंजन के लिए उपलब्‍ध थीं। उनमें राज कपूर शीर्ष पर रहे। दंगल ने आमिर खान की पहचान मजबूत कर दी है। राजकुमार हिरानी की 3 इडियट ने सबसे पहले चीनी दर्शकों को आमिर खान के प्रति आकर्षित किया। बता दें कि 2009 में आई 3 इडियट का अधिकांश चीनियों ने पायरेटेड फार्मेट में देखा। यह फिल्‍म वहां के युवकों के बीच खूब पसंद की गई। उन्‍हें रैंचो अपने बीच का ही युवक लगा था। फिर धूम 3 की रिलीज तक चीन में थिएटर का्रति आ चुकी थी। सिनेमाघरों के संख्‍या मशरूम की तर बड़ी। आमिर खन की धूम 3 को चीन में अच्‍छी रिलीज मिली। इस फिल्‍म में एक्‍शन और अदाकारी से आमिर खान से चीनी दर्शकों के दिल में जगह बना ली। उनकी पीके भी वहां पॉपुलर रही। और अब दंगल ने तो सारे रिकार्ड तोड़ दिए। अभी तो कहा जा रहा है कि चीन का हर फिल्‍मप्रेमी आमिर खान को पहचानता है। उसने दंगल देख रखी है।
जू जू और आमिर खान दोनों देशों के बीच सांस्‍कृतिक दोस्‍ती के नए राजदूत हैं। जू जू अपनी व्‍यस्‍तता की वजह से ट्यूबलाइट के प्रचार में शामिल नहीं हो सकी,लेकिन आमिर खान दंगल के लिए चीन गए थे। उम्‍मीद है कि आगे यह सहयोग और संपर्क बढ़ेगा।

Friday, June 16, 2017

दरअसल : पाकिस्‍तान जाएगा सुपर सिंह

दरअसल...
पाकिस्‍तान जाएगा सुपर सिंह
-अजय ब्रह्मात्‍मज
आज पाकिस्‍तान के आठ शहरों के 36 सिनमाघरों में अनुराग सिंह निर्देशित सुपर सिंह रिलीज होगी। दिलजीत दोसांझ और सोनम बाजवा अभिनीत सुपर सिंह एक पंजाबी सुपरहीरो की कहानी है। पंजाबी में सुपरहीरो क्रिएट करने की पहली कोशिश की गई है। पंजाबी में बनी यह फिल्‍म भारत के साथ पाकिस्‍नान में भी आज रिलीज हो रही है। एक अंतराल के बाद कोई भारतीय फिल्‍म पाकिस्‍तानी सिनेमाघरों में एक ही दिन रिलीज हो रही है। यह एक खुशखबर है,जो दोनों देशों के नागरिकों को करीब ले आएगी।
याद करें तो पिछले साल ऐ दिल है मुश्किल की रिलीज के समय भयंकर पाकिस्‍तान विरोधी माहौल था। मुंबई में एक राजनीतिक पार्टी ने खुली घोषणा कर दी थी कि अगर पाकिस्‍तानी कलाकार फवाद खान को भारत बुलाया गया तो हंगामा होगा। तब महाराष्‍ट्र के मुख्‍यमंत्री ने निर्देशक करण जौहर और उक्‍त पार्टी के नेता के बीच मध्‍यस्‍थता की थी। उसके बाद दो हिंदी फिल्‍में आईं,जिनमें पाकिस्‍तानी कलाकार माहिरा खान और सबा कमर थीं। उन फिल्‍मों को लेकर कोई हंगामा नहीं हुआ। सबा कमर की फिल्‍म हिंदी मीडियम को हिंदी दर्शकों ने खूब पसंद किया। दर्शकों के जहन में यह बात भी नहीं आई कि इरफान की बीवी बनी अभिनेत्री पाकिस्‍तान की है। सबा कमर ने अंग्रेजी की ग्रंथि से पीडि़त बीवी का किरदार शानदार और विश्‍वसनीय तरीके से निभाया।
यहां बता दें कि भारत में पाकिस्‍तानी कलाकारों को नया काम देने की अघोषित पाबंदी लगने के बाद पाकिस्‍तान ने भी हिंदी फिल्‍मों की रिलीज रोक दी थी। लंबे समय के बाद विशेष तौर पर रिति5क रोशन की काबिल रिलीज की गई थी। चीन में धम मचा रही दंगल पाकिस्‍तानी सेंसर के संकीर्ण रवैए की वजह से वहां रिलीज नहीं हो सकी थी। उन्‍हें फिल्‍म में भारत के राष्‍ट्र गान पर आपत्ति थी। आमिर खान ने स्‍पष्‍ट किया था कि बगैर राष्‍ट्रगान के वे पाकिस्‍तान में दंगल रिलीज नहीं करना चाहते। इस बीच दोनों देशों के बीच तनातनी और झड़पें चल रही हैं। हांलांकि इन दिनों इंग्‍लैंड में चल रहे चैंपियत ट्राफी में भारत-पाकिस्‍तान की क्रिकेट टीम का मैच हुआ। संभावना है कि दोनों देश फिर से फायनल में टकराएं। सरहद पर दोनों देशों की सेनाएं चौकन्‍ना रहती हैं। पाकिस्‍तानी घुसपैठ को नाकाम करने की काशिशमें भारतीय सेना आगे रहती है। सरहद के इसतनाव के बावजूद दोनों देशों के नागरिक क्रिकेट और फिल्‍मों में रुचि लेते रहते हैं। पाकिस्‍तान के सिनेमाघरों में हिंदी फिल्‍में भले ही नहीं लग रही हों,लेकिन पाकिस्‍तानी दर्शक दूसरे प्‍लेटफार्म पर हिंदी फिल्‍में देखने से नहीं चूकते।
सुपर सिंह का पाकिस्‍तान में रिलीज होना स्‍वागतयोग्‍य कदम हैं। पंजाबी फिल्‍म से शुरू होकर यह कदम हिंदी फिल्‍मों की तरफ बढ़ेगा।दरअसल,भारत और पाकिस्‍तन के सिनेमाई संबंध विभाजन और दुश्‍मनी के बावजूद कभी  सक्रिय तो कभी शिथिल रूप में बने रहे। भारतीय सिनेमा की नींव गढ़ने में लाहौर की बड़ी भूमिका रही है। आजादी के पहले हिंदी सिनेमा के तीन प्रमुख गढ़ थे। मुंबई,कोलकाता और लाहौर में एक साथ हिंदी फिल्‍मों का निर्माण हो रहा था। अविभाजित भारत में लाहौर प्रमुख सांस्‍कृतिक और शैक्षणिक शहर था। फिल्‍म सहित सारी सांस्‍कृतिक गतिविधियों का प्रमुख केंद था लाहौर...उच्‍च शिक्षा,थिएटर,साहित्‍य और फिल्‍म में लाहौर की अग्रणी भूमिका थी। विभाजन के बाद लाहौर से अनेक निर्मात,निर्देशक और कलाकार मुंबई आ गए। कुछ कलाकार और निर्देशक मुंबई से लाहौर गए। कालांतर में लाहौर की फिल्‍म इंडस्‍ट्री प्रतिभाओं और बाजार के अभाव में सिमटती गई और धीरे-धीरे खत्‍म हो गई। आल पाकिस्‍तान में सिनेमा का अस्तित्‍व खतरे में है। दोनों देशों के बीच फिल्‍मों, कलाकारों और कलाकारों की आमदरुत बढ़ती है तो पाकिस्‍तान में फिल्‍मों केनर्माण में रवानगी आती है।
इस संदर्भ और पृष्‍ठभूमि में पाकिस्‍तान के 36 शहरों में सुपर सिंह की रिलीज से दोनों देशों के बीच बने छत्‍तीस के संबंध में नरमी आएगी। देखना यह है कि भारत की इस पंजाबी फिल्‍म का पाकिस्‍तान में कैसा स्‍वागत होता है और कितने दर्शक मिलते हैं?



Friday, June 9, 2017

दरअसल : हिंदी सिनेमा का चीनी पहलू



दरअसल...
हिंदी सिनेमा का चीनी पहलू
-अजय ब्रह्मात्‍मज
कुछ सालों पहले हांगकांग से एक पत्रकार मुंबई आए थे। वे हिंदी फिल्‍मों में चीन के वर्णन और चित्रण पर शोध कर रहे थे। उन्‍हें बहुत निराशा हाथ लगी थी। उन्‍हें कहीं से पता चला था कि मैं चीन में रह चुका हूं और मैंने सिनेमा के संदर्भ में भारत-चीन पर कुछ लिखा है। हम मिले और हम ने विमर्श किया कि ऐसा क्‍यों हुआ कि भारतीय फिल्‍मों में चीन की उचित छवि नहीं पेश की गई है। चीनी किरदार दिखाए भी गए तो उन्‍हें विलेन या कॉमिकल किरदारों के रूप में दिखाया गया। उनका हमेश मजाक उड़ाया गया। अपने देश की आजादी और चीन की मुक्ति के बाद बुलंद हुआ हिंदी-चीनी भाई-भाई का नारा अचानक 1962 के बाद सुनाई पड़ना बंद हो गया। भारतीय मीडिया में चीन को दुश्‍मन देश के रूप में पेश किया गया। यह बताया गया कि नेहरू की दोस्‍ती के प्रयासों को नजरअंदाज कर चीन ने भारत की पीठ में छूरा घोंप दिया। पचपन सालों के बाद भी हम उस मानसिकता से नहीं निकल पाए हैं।
अभी हाल में नितेश तिवारी निर्देशित दंगल ने चीन में 700 करोड़ रुपयों से अधिक का कारोबार किया तो फिर से चीन सभी की निगाह में आ गया। मानें या ना मानें फिल्‍में जीवन के हर क्षेत्र में हमारा ध्‍यान खींच रही हैं। दंगल की कामयाबी के बाद चीन फिर से भारतीय मानस को उत्‍प्रेरित कर रहा है। भारतीय फिल्‍म इंडस्‍ट्री और खास कर हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री उसे एक बड़ बाजार के रूप में देख रही है। पाकिस्‍तान से राजनयिक संबंध खराब होने के बाद  वहां फिर से भारतीय फिल्‍मों का प्रदर्शन बंद हो गया है। ऐसे में एक नए बाजार का मिलना और बिजनेस टेरिटरी के रूप में चीन का उभरना खास महत्‍व रखता है। दंगल के परिणाम से उत्‍साहित हिंदी फिल्‍मप्रेमियों को शायद नहीं मालूम कि चीन फिल्‍मों के संदर्भ में सख्‍त आयात नीति का पालन करता है। चीन साल में केवल 34 विदेशी फिल्‍मों को आयात करने की अनुमति देता है,जिसमें अधिकांश हॉलीवुड की ही फिल्‍में रहती हैं। पिछले कुछ सालों से साल में एक या दो भारतीय फिल्‍में पहुंचने लगी हैं। अभी तक 100 करोड़ रुपयों से अधिक का कारोबार की फिल्‍मों में से चार आमिर खान की हैं। आमिर खान वहां के चहेते स्‍टार हैं। चीनी सोशल मीडिया में आमिर खान देश के प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी से अधिक पॉपुलर हैं।
दरअसल,अंग्रेजों के शासन और आजादी के पश्चिमोन्‍मुखी होने के कारण फिल्‍मों के क्षेत्र में हमेशा से हमारी नजर हॉलीवुड पर रही। भारतीय सरकार और समाज ने सार्क देशों और एशियाई देशों पर गौर ही नहीं किया। हम साम्राज्‍यवादी देशों से ही विकास का फार्मूला लेने की सोचते रहे। देश के अधिकांश फिल्‍म समीक्षक हॉलीवुड की फिल्‍मों की पूरी जानकारी रखते हैं। उन्‍हें यह नहीं मालूम रहता कि कन्‍न्‍ड़  वृद्धि से दूसरे देशो की फिल्‍मों की तरफ ध्‍यान गया है। चीन के पेइचिंग और शंगहाए फिल्‍म फस्टिवल में भारतीय फिल्‍में और फिल्‍म कलाकार जाने लगे हैं। भात के इंटरनेशनल फिल्‍म फेस्टिवल और मामी में वहां की फिल्‍में और कलाकारों की आमद होने लगी है। ऐसा लगता है कि अचानक दोनों देशों के बीच फिल्‍म के जरिए आदान-प्रदान बढ़ गया है। यह अच्‍छा संकेत है।
इस ईद पर रिलीज हो रही कबीर खान निर्देशित अौर सलमान खान अभिनीत ट्यूबलाइट का चीनी कनेक्‍शन है। भारत-चीन युद्ध की पृष्‍ठभूमि की इस फिल्‍म में चीन का पहलू है। यहां तक कि चीनी अभिनेत्री जू जू ने इस फिल्‍म में काम भी किया है। अभी नहीं मालूम कि ट्यूबलाइट में चीन कितना और किस रूप में चित्रित हुआ है,लेकिन मेल-मिलाप दोनों देशो के लिए शुभ है। पिछले दिनों सोनू सूद ने जैकी चान के साथ कुंगफू पांडा में काम किया। एक और चीनी फिल्‍म बन कर तैयार है,जिसमें भारतीय कलाकारों ने काम किया है। कुछ भारतीय फिल्‍मों की योजनाओं में चीन शामिल है। संयुक्‍त निर्माण की दिशा में भी निर्माता विचार कर रहे हैं।

Friday, June 2, 2017

दरअसल : फिल्‍मों पर 28 प्रतिशत जीएसटी



दरअसल...
फिल्‍मों पर 28 प्रतिशत जीएसटी
-अजय ब्रह्मात्‍मज
बाहुबली और दंगल की अद्वितीय कामयाबी और 1000 करोड़ से अधिक के कलेक्‍शन के बावजूद भारतीय सिनेमा की आर्थिक सच्‍चाई छिपी हुई नहीं है। बमुश्किल 10 प्रतिशत फिल्‍में मुनाफे में रहती हैं। बाकी फिल्‍मों के लिए अपनी लागत निकाल पाना भी मुश्किल होता है। फिल्‍में अगर नहीं चलती हैं तो उससे जुड़े दूसरे व्‍यापारों को भी नुकसान उठाना पड़ता है। अगर कोई फिल्‍म चल जाती है तो अ के पास के खोमचे वाले की भी बिक्री और आमदनी बढ़ जाती है। फिल्‍मों पर आजादी के पहले से टैक्‍स लग रहे हैं। विभिन्‍न सरकारें अपनी सोच के हिसाब से कर सुधार करती हैं। लंबे समय से फिल्‍म बिरादरी और दर्शकों की मांग रही है कि फिल्‍मों के टिकट पर कर नहीं लगना चाहिए। फिल्‍म व्‍यवसाय को बढ़ाने के लिए यह जरूरी है।
सबसे पहले अंगेजों ने मनोरंजन कर आरंभ किया। फिल्‍मों के प्रदर्शन पर कर लादने के पीछे उनका दोहरा उद्देश्‍य था। उन्‍हें लगता था कि फिल्‍में देखने के लिए दर्शक जमा होते हैं। वहां उनके समूह को ग्रेजों के खिलाफ उकसाया जा सकता है। भीड़ कम करने की गरज से उन्‍होंने फिल्‍मों के प्रदर्शन पर कर लगाए। आजादी के बाद देश की सरकारदने उन्‍हीं करों के प्रावधान का अनुपालन किया। उन्‍होंने कर सुधार किए तो भी दर्शकों पर भार बना रहा। अभी राज्‍य सरकारें अपनी मर्जी और जरूरत के हिसाब से मनोरंजन कर वसूलती हैं। यह कर कहीं 20 प्रतिशत तो कहीं 110 प्रतिशत तक है। फिल्‍म व्‍यवसाय से संबंधित व्‍यक्तियों को लग रहा था कि जीएसटी लागू होन पर राहत मिलेगी।
पिछले दिनों जीएसटी की घोषणा के बाद पता चला कि फिल्‍मों पर यह 28 प्रतिशत होगा। फिल्‍म बिरादरी को इस घोषणा से भारी झटका लगा। जीएसटी की प्रारंभिक बैठकों में फिल्‍म बिरादरी के प्रतिनिधियों ने 5 प्रतिशत जीएसटी की सिफारिश की थी। फिल्‍म बिरादरी की समझ में आ गया है कि सरकार ने उनकी सिफारिशों को ताक पर रख दिया। उन्‍होंने अपनी नई नीति के तहत 28 प्रतिशत जीएसटी लाद दिया। साथ ही फिल्‍मों को जुएबाजी,सट्टेबाजी और घुड़दौड़ की श्रेणी में रख दिया। अभी विभिन्‍न श्रेणियों में 5 प्रतिशत से लेकर 28 प्रतिशत तक जीएसटी का प्रावधान है। फिल्‍म बिरादरी के विरोध और प्रतिरोध के बाद संभावना व्‍यक्‍त की जा रही है कि 3 जून की बैठक में इसमें फेरबदल हो। फेरबदल नहीं हुआ तो फिल्‍म व्‍यवसाय पर कर का भार बढ़ेगा। पहले से ही चरमरायी फिल्‍मों की अर्थ व्‍यवस्‍था टूट सकती है।
तर्क दिया जा रहा है कि अभी मनोरंजन कर में एकरूपता नहीं है। कुछ राज्‍यों में मनोरंजन कर 28 प्रतिशत से ज्‍यादा है। उन प्रदेशों के दर्शकों को राहत मिलगी। गौर करने की जरूरत है कि ज्‍यादातर राज्‍यों में मनोरजन कर 20 से 30 प्रतिशत के बीच है। इन राज्‍यों में टिकटों की कीमत बढ़ जाएगी। इसके साथ ही स्‍थानीय निकाय और सरकारी एजेंसियां कर लगा सकती हैं। वह कर जीएसटी के 28 प्रतिशत के अतिरिक्‍त होगा। ऐसी सूरत में फिल्‍म व्‍यवसाय पर अंदरूनी चोट आएगी। विशेषज्ञ बता रहे हैं कि क्षेत्रीय फिल्‍मों को अधिक नुकसान झेलना पड़ेगा। उन्‍हें दूसरे विकल्‍पों के बारे में सोचना होगा।
दरअसल,वर्तमान सरकार फिल्‍मों के सेंसर से लेकर कर तक के बारे में स्‍पष्‍ट नहीं है। एक ढ़लमुल नीति चल रही है। हो रही मुश्किलों के प्रति सरकार बेपरवाह है। फिल्‍म सेंसर में तो फिल्‍मों में रामभजन नाम रखने तक पर आपत्ति हो रही है। दूसी तरफ करों का बोझ...गरीबी में आटा गीला हो रहा है फिल्‍म इंडस्‍ट्री का। जरूरत है कि भारत के बड़े ब्रांड के तौर पर उभर रहे भारतीय फिल्‍मों के प्रति सरकार उदार रवैया अनपाए और हर तरह की सुविधाएं मुहैया कराए। फिल्‍में सॉफ्ट प्रोडक्‍ट हैं,जो अ‍ार्थिक हित साधने के साथ ही वैचारिक,सामाजिक और राजनयिक भूमिकाएं भी अदा करती हैं। हर मोर्चे पर फिल्‍मों और फिल्‍मी सितारों का इस्‍तेमाल कर रहा समाज इस धारणा से बाहर निकले कि फिल्‍मों में अकूत पैसा है।

Friday, May 26, 2017

दरअसल : नंदिता दास के मंटो



दरअसल...
नंदिता दास के मंटो
-अजय ब्रह्मात्‍मज

नंदिता दास पिछले कुछ सालों से मंटो के जीवन पर फिल्‍म बनाने में जुटी हैं। भारतीय उपमाद्वीप के सबसे ज्‍यादा चर्चित लेखक सआदत हसन मंटो के जीवन में पाठकों और दर्शकों की रुचि है। वे अपने लखन और लेखन में की गई टिप्‍पणियों से चौंकाते और हैरत में डाल देते हैं। आज उनकी जितनी ज्‍यादा चर्चा हो रही है,अगर इसका आंशिक हिस्‍सा भी उन्‍हें अपने जीवनकाल में मिल गया होता। उन्‍हें समुचित पहचान के साथ सम्‍मान मिला होता तो वे 42 की उम्र में जिंदगी से कूच नहीं करते। मजबूरियां और तकलीफें उन्‍हें सालती और छीलती रहीं। कौम की परेशानियों से उनका दिल पिघलता रहा। वे पार्टीशन के बाद पाकिस्‍तान के लाहौर गए,लेकिन लाहौर में मुंबई तलाशते रहे। मुंबई ने उन्‍हें लौटने का इशारा नहीं दिया। वे न उधर के रहे और न इधर के। अधर में टंगी जिंदगी धीरे-धीरे घुलती गई और एक दिन खत्‍म हो गई।
नंदिता दास अपनी फिल्‍म में उनके जीवन के 1946 से 1952 के सालों को घटनाओं और सहयोगी किरदारों के माध्‍यम रख रही हैं। यह बॉयोपिक नहीं है। यह पीरियड उनकी जिंदगी का सबसे अधिक तकलीफदेह और खतरनाक हैं। कुछ पाठकों को याद होगा कि इन छह सालों के दौरान उन पर छह मुकदम हुए। तीन भारत में और तीन पाकिस्‍तान में...आज जरा सी निंदा,आलोचाना या सवाल पर लेखक बौखला जाते हैं। और सोशल मीडिया पर अनाप-शनाप बकने लगते हैं। आप उस दौर को याद करें जब लेखकों के पास और कोई माध्‍यम नहीं था। समाज उन्‍हें खुले दिल से स्‍वीकार नहीं रहा था और सरकार वा सत्‍ता लगातार तिरस्‍कार कर रही थी। मंटो ने अपने दौर के मजलूमों और मजबूरों पर लिखा। समय और सोच की विसंगतियों को वे उजागर करते रहे। सत्‍ता और समाज के लांछन सहते रहे।ऐसे में भला कोई कब तक हिम्‍मत बनाए रखे?
नंदिता दास उनकी जिंदगी के उथल-पुथल के सालों पर ही ध्‍यान दे रही हैं। उन्‍होंने उनकी रचनाओं और व्‍यक्त्गित साक्षात्‍कारों के आधार पर उस दौर में मंटों को गढ़ा है। उन्‍होंने मीर अली के साथ इस फिल्‍म का लेखन किया है। फिल्‍म में मंटो का शीर्षक किरदार नवाजुद्दीन सिद्दीकी निभा रहे हैं। इस फिल्‍म में उनके साथ रसिका दुग्‍गल,ताहिर राज भसीन,शबाना आमी,जावेद अख्‍तर और अनेक मशहूर कलाकार छोटी-बड़ी भूमिकाएं निभा रहे हैं। फिल्‍म की शूटिंग जून के मध्‍य तक पूरी हो जाएगी। इस फिल्‍म का एक हिस्‍सा पिछले दिनों एक मीडिया कॉनक्‍लेव में दिखाया गया था। उसे देख कर यही लगा कि नवाजुद्दी सिद्दीकी की सही कास्टिंग हुई है। वे मंटों की संजीदगी और ठहराव के साथ बेचैनी को भी आत्‍मसात कर सके हैं। इस फिल्‍म की शुरूआत के समय नंदिता दास मंटो की भूमिका के लिए इरफान से बात कर रही थीं। वे राजी भी थे,फिर पता नहीं दोनों के बीच क्‍या गुजरी कि नचाज आ गए।
मंटो पर नाटक होते रहे हैं। उनकी कहानियों पर शॉर्ट और फीचर फिल्‍में बनती रही हैं। दो साल पहले उनकी बेटियों की मदद से बनी पास्तिानी फिल्‍म मंटो आई थी,जिसका निर्देशन समाद खूसट ने किया था। मंटो की भूमिका भी उन्‍होंने निभाई थी। पाकिस्‍तान में उनके ऊपर डाक्‍यूमेंट्री भी बन चुकी है। नंदिता दस के टेक को देखना रोचक होगा। देखना होगा कि मंटो की सोच और साफगोई को वह पर्दे पर कैसे ले बाती हैं? मंटो अपने समय की जलती मशाल हैं। नंदिता के लिए इस मशाल को 2017 में थामना आसान नहीं होगा। अपन पिछली फिल्‍म फिराक में उन्‍होंने अपना स्‍पष्‍ट पक्ष रखा था। इस फिल्‍म के जरिए मंटो की पा्रसंगिकता स्‍थापित करने में उनका पक्ष जाहिर होगा। मंटो प्रासंगिक हैं। उनका उल्‍लेख सभी करते हैं,लेकिन उन्‍हें पढ़ते और समझने वालों की संख्‍या कम है। उन्‍हें ढंग से पढ़ा गया होता तो भारत और पाकिस्‍तान के हालात आज जैसे नहीं होते। अभी तो दोनों तरफ से तोपें तनी हैं।

Friday, May 12, 2017

दरअसल : सिनेमा के शोधार्थी



दरअसल...
सिनेमा के शोधार्थी
-अजय ब्रह्मात्‍मज
पिछले दिनों ट्वीटर पर एक सज्‍जन ने राज कपूर की 1951 की  आवारा के बारे में लिखा कि यह 1946 में बनी किसी तुर्की फिल्‍म की नकल है। सच्‍चाई यह है कि आवारा से प्रेरित होकर तुर्की की फिल्‍म आवारे नाम से 1964 में बनी थी। राज कपूर की आवारा एक साथ तत्‍कालीन सोवियत संघ,चीन,अफ्रीका,तुर्की और कई देशों में लोकप्रिय हुई थी। जन्‍म और परिवेश से व्‍यक्तित्‍व के निर्माण के बारे में रोचक तरीके से बताती यह फिल्‍म वास्‍तव में इस धारणा को नकारती है कि व्‍यक्ति पैदाइशी गुणों से संचालित होता है। अभी तक आवारा के विश्‍वव्‍यापी प्रभाव पर विश्‍लेषणात्‍मक शोध नहीं हुआ है। अगर कोई विश्‍वद्यालय,संस्‍थान या चेयर पहल करे तो भारतीय फिल्‍मों के प्रभाव की उम्‍दा जानकारी मिल सकती है।
सही जानकारी के अभाव में आवारा के बारे में फैली सोशल मीडिया सूचना को सही मान कर लोग आगे बढ़ा रहे हैं। एक तो मानसिकता बन गई है कि हम केवल चोरी ही कर सकते हैं। हीनभावना से ग्रस्‍त समाज किसी प्रतिमा के टूटने पर भी गर्व महसूस करता है। उसे बांटता और फैलाता है। सिनेमा पर हो रहा लेखन मुख्‍य रूप से फिल्‍म स्टारों की जीवन शैली में सिमट रहा है। अब क्राफ्ट की बातें नहीं होतीं। थेड़ा-बहुत गंभर काम हो भी रहा है तो देश में फिल्‍म पत्रिकाओं और जर्नल के अभाव से फिल्‍मों पर हो रहे शोध और लिखे जा रहे निबंधों की जानकारी नहीं मिल पाती है। सूची बनायी जाए तो भारतीय विश्‍वविद्यालयों में हुए सैकड़ों शोधों के बारे में पता चलेगा। सिनेमा पर व्‍यवस्थित अध्‍ययन,संकलन और दस्‍तावेजीकरण का काम नहीं हो रहा है। इन दिनों हर शैक्षणिक संस्‍थान में मीडिया की पढ़ाई हो रही है। स्‍पष्‍ट पाठ्यक्रम और योग्‍य शिक्षकों के अभाव में अधकचरी जानकारियां ही बढ़ाई जा रही हैं। दशकों पुरानी अवधारणाओं और सिद्धांतों के बारे में शिक्षक बता रहे हैं। लोकप्रिय संचार माध्‍यमों में गंभारता और विश्‍लेषण के लिए जगह नहीं होती। रंगीन और आकर्षक तस्‍वीरों से स्‍पेस भर दिया जाता है। पाठ के रूप में छिछली सूचनाएं होती हैं।
पिछले दिनों बनारस और इलाहाबाद की यात्राओं में कुछ शोधार्थियों से भेंट हुई। बनारस हिंदम विश्‍वविद्यालय और इलाहाबाद विश्‍वविद्यालयों में शोध कर रहे इन छात्रों को उनके गाइड से ही मुख्‍य मदद मिल रही है। सिनेमा पर शोध करने वालों पर साथी,अभिभावक और शिक्षक हंसते हैं। भला हो ललित मोहन जोशी और फरीद काज़मी जैसे शिक्षकों और गाइड का कि वे अपनी जिद और जोश से छात्रों को शोध के लिए प्रोत्‍साहित करते हैं। मुझे बनारस में अमृता और इलाहाबाद में अंकित व अंकिता मिले। ये तीनों किसी मीडिया विभाग के छात्र नहीं हैं। इतिहसा,राजनीति शास्‍त्र और मानवविज्ञान के नवभागों में उन्‍होंने सिनेमा पर शोध करने का फैसला किया है। उनके शोधों से नए तथ्‍य साने आएंगे। हिंदी सिनेमा की प्रवृतियों के साथ खासियतों के बारे में भी पता चलेगा। अच्‍छी बात यह भी है कि वे अपने शोध हिंदी में लिख रहे हैं।
हिंदी सिनेमा पर इन दिनों अंग्रेजी में काफी शोध और लेखन हो रहा है। कुछ जीवनियां और आत्‍मकथाएं भी प्रकाशित हुई हैं। हिंदी के प्रकाशक इस दिशा में आगे नहीं बढ़ रहे हैं। वे पुस्‍तक लेखन के लिए आवश्‍यक अग्रिम राशि देने में सकुचाते हैं। वे जीरो या मामूली निवेश कर अधिकाधिक लाभ कमाना चाहते हैं। हिंदी सिनेमा पर पुस्‍तकों और पाठ्य सामग्रियों की मांग के बावजूद वे पहल लहीं कर रहे हैं। सिनेमा पर पुस्‍तक के नाम पर श्रद्धा गीत गाए जा रहे हैं या फिर चटपटे टायटल से लेखों के संकलन तैयार किए जा रहे हैं। अंग्रेजी में हो रहा अधिकांश लेखन हिंदी सिनेमा को विदेशी पाठकों से इंट्रोड्यूस कराने में लगा रहता है। देश के दर्शकों और पाठकों के लिए इन किताबों में कुछ खास नहीं होता।
देश में सिनेमा के शोधार्थियों की आवश्‍यकता है। उन्‍हें सरकार,संस्‍थान और समाज का समर्थन मिले तो हम देश के 100 से अधिक सालों के गौरवपूर्ण अतिहास को समझ पाएंगे। कुछ बात है कि हस्‍ती मिटती नहीं भारतीय फिल्‍मों की...यह आज भी हालीवुड के आक्रामक प्रचार और बाजार के बावजूद टिका हआ है।
@brahmatmajay
abrahmatmaj@mbi.jagran.com

Tuesday, May 9, 2017

दरअसल : नारी प्रधान फिल्‍मों पर उठते सवाल




दरअसल...
नारी प्रधान फिल्‍मों पर उठते सवाल
-अजय ब्रह्मात्‍मज
हिंदी में हर साल बन रही 100 से अधिक फिल्‍मों में ज्‍यादातर नहीं चल पातीं। उन असफल फिल्‍मों में से ज्‍यादातर पुरुष्‍ प्रधान होती हैं। वे नायक केंद्रित होती है। उनकी निरंतर नाकामयाबी के बावजूद यह कभी लिखा और विचारा नहीं जाता कि नायकों या पुरुष प्रधान फिल्‍मों का मार्केट नहीं रहा। ऐसी फिल्‍मों की सफलता-असफलता पर गौर नहीं किया जाता। इसके विपरीत जब को कथित नारी प्रधान या नायिका केंद्रित फिल्‍म असफल होती है तो उन फिल्‍मों की हीरोइनों के नाम लेकर आर्टिकल छपने लगते हैं कि अब ता उनका बाजार गया। उन्‍होंने नारी प्रधान फिल्‍में चुन कर गलती की। उन्‍हें मसाला फिल्‍मों से ही संतुष्‍ट रहना चाहिए। हाल ही में बेगम जान और नूर की असफलता के बाद विद्या बालन और सोनाक्षी सिन्‍हा को ऐसे सवालों के घेरे में बांध दिया गया है।
इन दिनों नारी प्रधान फिल्‍में फैशन में आ गई हैं। हर अभिनेत्री चाहती है कि उसे ऐसी कुछ फिल्‍में मिलें,जिन्‍हें उनके नाम से याद किया जा सके। डर्टी पिक्‍चर,क्‍वीन,मैरी कॉम,पीकू,पिंक और अनारकली ऑफ आरा जैसी फिल्‍मों की चर्चा, कामयाबी और तारीफ ने निश्चित ही बाकी हीरोइनों को इस दिशा में प्रेरित किया है। निर्माता और निवेशक मूल रूप से मुनाफे के लिए काम करते हैं। अगर उन्‍हें लगता है कि नारी प्रधान फिल्‍में भी चल रही हैं तो वे निवेश करने लगते हें। लेखक-निर्देशक खोजे जाते हैं। चर्चि हीरोइनों को इंगित किया जाता है। हीरोइनें भी उत्‍साह में हां कह देती हें। वे पूरी स्क्रिप्‍ट को ध्‍यान से नहीं पढ़तीं। केवल अपने रोल की जानकारी से खुश हो लेती हैं। उन्‍हें लगता है कि कुछ नया करने और अपना हुनर दिखाने का मौका मिलेगा।
रोल की तैयारी में वजन घटाने-बढ़ाने से लेकर नए कौशन और पैंतरे सीखती हैं। भाषा और लहजे पर काम करती हैं। सच में इन फिल्‍मों में उनकी मेहनत झलकती है। उनका निखार दिखता है। जाहिर है कि वे भी आश्‍वस्‍त रहती हैं कि दर्शक उन्‍हें पसंद करेंगे। उनकी फिल्‍म हिट होगी। उनका बाजार भाव बढ़ेगा। उनकी फीस में बढ़ोत्‍तरी होगी। हुआ भी है। डर्टी पिक्‍चर के बाद विद्या बालन और क्‍वीन के बाद कंगना रनोट का स्‍टेटस बढ़ गया। दरअसल,दोनों ही फिल्‍में अच्‍छी थीं। उन फिल्‍मों में उनकी भूमिकाओं को लेखक और निर्देशक का पूर्ण समर्थन था। पूरी फिल्‍म का प्रभाव रहा। सभी हीरोइनों की सभी फिल्‍मों में यह बात नहीं होती तो फिल्‍म नापसंद की जाती है। और फिल्‍म के बजाए उनकी हीरोइनों पर सवाल खड़े किए जाने लगते हैं। क्‍यों नहीं लेखक और निर्देशक की काबिलियत पर सवाल किए जाते।
पिछले दिनों आई बेगम जान,नूर और मातृ वास्‍तव में कमजोर फिल्‍में थीं। उनके लेखक और निर्देशक ने समुचित मेहनत नहीं की थी,लेकिन उनकी असफलता का ठीकरा विद्या बालन,सोनाक्षी सिन्‍हा और रवीना टंडन पर फूटा। अगर फिर से उन फिल्‍मों के रिव्‍यू पढ़े जाएं तो पाएंगे कि ज्‍यादातर समीक्षकों ने तीनों अभिनेत्रियों की तारीफ में पंक्तियां लिखीं। उनके अभिनय के बारे में ट्वीट किया गया। उम्‍मीद की गई कि फिल्‍में चलेंगी। अफसोस कि आम दर्शकों को वे फिल्‍में पसंद नहीं आईं। यही हाल उन सभी असफल फिल्‍मों का रहा,जो जल्‍दबाजी में फैशन के तहत किसी हीरोइन को लेकर बनाई गईं।
हमें फिल्‍मों के इस नजरिए और कैटेगरी से देखना बंद करना होगा। फिल्‍म को नारी प्रधान बताते ही उन फिल्‍मों पर दबाव बढ़  जाता है। उनके लिए निकष भी अलग हो जाता है। अगर उन्‍हें आम फिल्‍मों की तरह ही पेश और प्रचारित किया जाए तो अपेक्षाएं नहीं बढ़ेंगी। दर्शक भी उन्‍हें आम फिल्‍मों की तरह देखेंगे।

Friday, April 21, 2017

दरअसल : पक्ष और निष्‍पक्ष



दरअसल...
पक्ष और निष्‍पक्ष
-अजय ब्रह्मात्‍मज
पिछले दिनों सोनू निगम अपने पक्ष को रखने की वजह से चर्चा में रहे। उसके कुछ दिनों पहले सुशांत सिंह राजपूत अपना पक्ष नहीं रखने की वजह से खबरों में आए। फिल्‍म जगत के सेलिब्रिटी आए दिन अपने पक्ष और मंतव्‍य के कारण सोशल मीडिया,चैनल और पत्र-पत्रिकाओं की सुर्खियों में रहते हैं। कुछ अपने अनुभवों और मीडिया मैनेजर के सहयोग से बहुत खूबसूरती से बगैर विवादों में आए ऐसी घटनाओं से डील कर लेते हैं। और कुछ नाहक फंस जाते हैं। अभी एक नया दौर है,जब सारे मंतव्‍य राष्‍ट्रवाद और सत्‍तासीन राजनीतिक पार्टी के हित के नजरिए से आंके जाते हैं। नतीजतन अधिकांश सेलिब्रिटी किसी भी मुद्दे पर अपना पक्ष रखने से बचते हैं। वे निष्‍पक्ष और उदासीन होने का नाटक करते हैं। आप अकेले में मिले तो ऑफ द रिकॉर्ड वे अपनी राय शेयर करते हैं,लेकिन सार्वजनिक मंचों से कुछ भी कहने से कतराते हैं।
कुछ समय पहले सहिष्‍णुता के मसले पर आमिर खान और शाह रूख खान के खिलाफ चढ़ी त्‍योरियां सभी को याद होंगी। गौर करें तो एक जिम्‍मेदार नागरिक के तौर पर उन्‍होंने अपना सहज पक्ष रखा था,लेकिन उन्‍हें लोकप्रिय राजनीति के समर्थकों की नाराजगी का शिकार होना पड़ा। उसके बाद से फिल्‍म सेलिब्रिटी ने खामोश रहने या कुछ न कहने का ढोंग ओढ़ लिया है। डर से वे जरूरी मुद्दों पर स्‍वीकृत राय रखने से भी हिचकते हें। राब्‍ता के ट्रेलर लांच में एक पत्रकार के यह पूछने पर कि कुलभूषण जाधव को पाकिस्‍तान में मिली फांसी की सजा पर आप सभी की क्‍या राय है? उन्‍होंने कुछ भी कहने के बजाए सवाल को टाला। यह एक ऐसा मुद्दा है जिस पर दो राय की गुंजाइश नहीं है। एक स्‍वर से पूरा देश चाहता है कि कुलभूषण जाधव सुरक्षित भारत लौटें। भारत सरकार इस मसले को गंभीरता से ले रही है। अपनी नादानी में ट्रेलर लांच में शरीक फिल्‍म स्‍टारों ने चुप्‍पी साधी। सवाल को टाला और दोबारा जोर देने पर भिड़ गए कि इस मुद्ृदे की हमें सही जानकारी नहीं है। यह भी कहा गया कि ट्रेलर लांच में ऐसे सवाल नहीं पूछे जाने चाहिए।
अगला सवाल बनता है कि सार्वजनिक व्‍यक्तियों से कोई सवाल कब पूछा जाए? ऐसी कोई संहिता नहीं है। सार्वजनिक मंचों पर किसी इवेंट में ही ऐसे सवाल पूछे जा सकते हैं। मुमकिन है कि सेलिब्रिटी किसी मुद्दे से वाकिफ न हों। वैसे ममामले पर वे ईमानदारी से अपनी अनभिज्ञता जाहिर कर सकते हैं,लेकिन कन्‍नी काटना तो उचित नहीं है। अब तो ऐसा समय आ गया है कि सभी सेलिब्रिटी को आसपास की घटनाओं और गतिविधियों पर नजर रखनी होगी। उन्‍हें तैयार रहना होगा। जरूरत पड़े तो उन्‍हें सामान्‍य ज्ञान और सामयिक घटनाओं की अद्यतन जानकारी के लिए सलाहकार भी रखनी होगी। सेलिब्रिटी होने के बाद उनसे अपेक्षा बढ़ जाती है कि वे सभी विषयों की सामान्‍य जानकारी रखें। इन दिनों तो फोरम और सेमिनार में चिंतको,अध्‍येताओं और विचारकों के साथ उन्‍हें बुलाया जाने लगा है। उनके व्‍यावहारिक ज्ञान को भी महत्‍व दिया जा रहा है।
यह तटस्‍थ्र या निष्‍पक्ष रहने का समय नहीं है। निष्‍पक्षता वास्‍तव में विवादों से बचने का कवच है। अमिताभ बच्‍चन अपने ब्‍लॉग पर हमेशा सेलिब्रिटी होने की चुनौतियों पर लिखते हैं। वे मानते हैं कि हमें इसके लिए तैयार रहना चाहिए। गालियों और निंदा के रूप में मिले खट्टे बादामों का भी स्‍वाद लेना चाहिए। सच में सेलिब्रिटी घोर असुरक्षित व्‍यक्ति होता है,जो हर वक्‍त सभी के निशाने पर रहता है। सेलिब्रिटी की निजता लगभग खत्‍म हो जाती है। हमेशा उसकी स्‍क्रूटनी चल रही होती है। जाहिर है कि ऐसी स्थिति में उन्‍हें अपना पक्ष मजबूत रखना चाहिए और उसके लिए सामाजिक सरोकार बढ़ाना चाहिए।

Friday, April 14, 2017

दरअसल : पहचान का संकट है चेतन जी



दरअसल...
पहचान का संकट है चेतन जी
-अजय ब्रह्मात्‍मज
चेतन जी,
जी हमारा नाम माधव झा है। हमें मालूम है कि आप हिंदी बोल तो लेते हैं,लेकिन ढंग से लिख-पढ़ नहीं सकते। आप वैसे भी अंगेजी लेखक हैं। बहुते पॉपुलर हैं। हम स्‍टीवेंस कालिज में आप का नावेल रिया के साथ पढ़ा करते थे। खूब मजा आता था। प्रेमचंद और रेणु को पढ़ कर डुमरांव और पटना से निकले थे। कभी-कभार सुरेन्‍द्र मोहन पाठक और वेदप्रकाश शर्मा को चोरी से पढ़ लेते थे। गुलशन नंदा,कर्नल रंजीत और रानू को भी पढ़े थे। आप तो जानबे करते होंगे कि गुलशन नंदा के उपन्‍यास पर कैगो ना कैगो फिल्‍म बना है। अभी जैसे कि आप के उपन्‍यास पर बनाता है। हम आप के उपन्‍यास के नायक हैं माधव झा। हम तो खुश थे कि हमको पर्दा पर अर्जुन कपूर जिंदा कर रहे हैं। सब अच्‍छा चल रहा था।
उस दिन ट्रेलर लांच में दैनिक जागरण के पत्रकार ने मेरे बारे में पूछ कर सब गुड़-गोबर कर दिया।  उसने आप से पूछ दिया था कि झा लोग तो बिहार के दरभंगा-मधुबनी यानी मैथिल इलाके में होते हैं। आप ने माधव झा को डुमरांव,बक्‍सर का बता दिया। सवाल तो वाजिब है। आप मेरा नाम माधव सिंह या माधव उपाध्‍याय भी कर सकते थे। मेरा सरनेम झा ही क्‍यों रखा? और झा ही रखा तो हमको दरभंगा का बता देते। दरभंगा में भी तो राज परिवार है। उसी से जोड़ देते। हमको लगता है कि आप का कोई झा दोस्‍त रहा होगा। मेरे बहाने आप ने उससे कोई पुराना हिसाब पूरा किया है। अब जो भी हो...हम तो फंस गए। हमारे पहचान का संकट हो गया है।
उस पत्रकार को जवाब देने के लिए आप ने जो कमजोर तर्क जुटाए,वह पढ़ लीजिए...हम अक्षरश: लिख रहे हैं...
यह लड़का पटना इंग्लिश सीखने आता है। मुझे ऐसी जगह चाहिए थी जो पटना से अधिक दूर ना हो। असके लिए मैंने लिबर्टी ली। बुक में जो है,वही यहां भी है।(यानी फिल्‍म में)
आय एम वेरी हैप्‍पी कि आप हमारी फिल्‍म को इतनी बारीकी से देखते हैं। बक्‍सर में झा कम होते हैं। ऐसा नहीं है कि जीरो होते हैं। इंडिया में कोई आदमी कहीं रह सकता है। लेकिन योर पाइंट इज राइट।
मुझे क्रिएटिव लिबर्टी लेना था। मैं चाहता था कि वह कैरेक्‍टर वीकएंड पर पटना आए। इंग्लिश सीख कर जाए। इसके लिए मुझे पास वाली जगह चाहिए थी। दरभंगा जरा दूर है। वहां से वीकएंड में पटना करना जरा मुश्किल है।
साफ लग रहा है कि आप ने सवाल सुनने के बाद जवाब सोचा और हमारे पहचान के संकट को और बढ़ा दिए। कहीं ना कहीं आप का रिसर्च कमजोर था। अब गलती कर गए हैं तो अपने को सही ठहराने के लिए लाजिक जुटा रहे हैं। रिसर्च करते तो पता चल जाता कि डुमरांव पटना से जादे पास नहीं है। चेतन जी,पटना से डुमरांव 110 किलोमीटर है और दरभंगा 127 किलोमीटर है। आने-जाने में बराबरे टाइम लगता है। लालू जी के समय तो सड़क इतना खराब था कि तीन घंटा से जादा ही लगता था पटना पहुंचने में। वैसे आपने भी उपन्‍यास में तीन घंटा बताया है। उतना ही टाइम दरभंगा से भी लगता था।
डुमरांव के हिसाब से हमारा भाषा भोजपुरी तो सहीये बताए,लेकिन झा लोग की पहचान मैथिली भाषा से है। हमको तो साफ लगता है कि सरनेम देने में आप से चूक हो गया। और सजा हम भुगत रहे हैं। इंटरनेट के रिसर्च से ऐसी भूल होता है। टिवंकल खन्‍न भी तो द लिजेंड ऑफ लक्ष्‍मी प्रसाद में छठ के प्रसाद में बनाना फ्राय करवा चुकी हैं। बताइए,छठ में बनाना फ्राय?
जगह की कमी से एतना ही लिख रहे हैं,बाकी शिकायत तो और भी है।
आपका,
माधव झा
(हाफ गर्लफ्रेंड का हीरो)

Saturday, April 8, 2017

दरअसल : बंद हो रहे सिंगल स्‍क्रीन,घट रहे दर्शक



दरअसल...
बंद हो रहे सिंगल स्‍क्रीन,घट रहे दर्शक
-अजय ब्रह्मात्‍मज

पिछले साल की सुपरहिट फिल्‍म दंगल के प्रदर्शन के समय भी किसी सिनेमाघर पर हाउसफुल के बोर्ड नहीं लगे। पहले हर सिनेमाघर में हाउसफुल लिखी छोट-बड़ी तख्तियां होती थीं,जो टिकट खिड़की और मेन गेट पर लगा दी जाती थीं। फिल्‍म निर्माताओं के लिए वह खुशी का दिन होता था। अब तो आप टहलते हुए थिएटर जाएं और अपनी पसंद की फिल्‍म के टिकट खरीद लें। लोकप्रिय और चर्चित फिल्‍मों के लिए भी एडवांस की जरूरत नहीं रह गई है। लंबे समय के बाद हाल में दिल्‍ली के रीगल सिनेमाघर में हाउसफुल का बोर्ड लगा। रीगल के आखिरी शो में राज कपूर की संगम लगी थी। दिलली के दर्शक रीगल के नास्‍टेलजिया में टूट पड़े थे। आज के स्‍तंभ का कारण रीगल ही है। दिल्‍ली के कनाट प्‍लेस में स्थित इस सिंगल स्‍क्रीन के बंद होने की खबर अखबारों और चैनलों के लिए सुर्खियां थीं।
गौर करें तो पूरे देश में सिंगल स्‍क्रीन बंद हो रहे हैं। जिस तेजी से सिंगल स्‍क्रीन सिनेमाघरों के दरवाजे बंद हो रहे हैं,उसी तेजी से मल्‍टीप्‍लेक्‍स के गेट नहीं खुल रहे हैं। देश में मल्‍टीप्‍लेक्‍स संस्‍कृति आ चुकी है। फिल्‍मों के प्रदर्शन,वितरण और बिजनेस को मल्‍टीप्‍लेक्‍स प्रभावित कर रहा है। किसी भी फिल्‍म की रिलीज के पहले ही तय किया जा रहा है कि यह फिल्‍म किस समूह के लिए है। दर्शकों का यह विभाजन फिल्‍म के आस्‍वादन से अधिक टिकट मूल्‍य पर आधारित होता है। वितरक निर्माताओं को बताने लगे हैं और अनुभवी निर्माता वितरकों को समझाने लगे हैं कि उनकी फिल्‍म किन दर्शकों के बीच पहुंचे। दर्शकों की अस्‍पष्‍ट समझ से फिल्‍मों का बिजनेस मार खाता है। अभी निर्माताओं का जोर और फोकस मल्‍टीप्‍लेक्‍स पर रहता है,क्‍योंकि वहां कलेक्‍शन की पारदर्शिता है।
देश में सिनेमाघरों की संख्‍या कम है। सिंगल स्‍क्रीन के बंद होने से यह संख्‍या तेजी से घट रही है। फिल्‍म फेउरेशन ऑफ इंडिया के आकलन के मुताबिक 2011 में 10,000 से कुछ अधिक सिनेमाघर था। उन्‍होंने ताजा आंकड़े नहीं बटोरे हैं। अनधिकृत आंकड़ों के मुताबिक 2016 में देश में सिंगल स्‍क्रीन की संख्‍या 13,900 और मल्‍टीप्‍लेक्‍स स्‍क्रीन की संख्‍या 2050 रही। कहा जाता है कि 10 लाख दर्शकों के बीच 9 सिनेमाघर हैं। यह अलग बात है कि इन दिनों वे भी खाली रहते हैं। पिछले साल ही भारत में 1902 फिल्‍में रिलीज हुईं। अब आप अंदाजा लगा लें कि इनमें से कितनी फिल्‍मों को सिनेमाघर नसीब हुए होंगे। सिनेमाघर बंद हो रहे हैं,दर्शक घट रहे हैं और फिल्‍मों का निर्माण बढ़ रहा है। कोई समझ नहीं पा रहा है कि हम किस दिश में बढ़ या पिछड़ रहे हैं?
स्‍पष्‍ट नीति और सुविधाओं के अभाव में स्थिति विकराल होती जा रही है। सभी प्रेशों,केंद्र सरकार और भारतीय फिल्‍म इंडस्‍ट्री को बैठ कर नीतिया असैर योजनएं तय करनी होंगी। देश में सिनेमाघरों की संख्‍या बढ़ाने के साथ उनके टिकट मूल्‍यों पर भी विचार करना होगा ताकि सभी आय समूह के दर्शक सिनेमाघरों में जाकर फिल्‍में देख सकें। भारतीय फिल्‍म इंडस्‍ट्री को हालीवुड ने डेंट मारना शुरू कर दिया है। अगर अभी से बचाव और सुधार नहीं किया गया तो दुनिया के अन्‍य देशों का हाल भारत का भी होगा। हालीवुड की डब फिल्‍में भारतीय भाषाओं में दिखाई जाएंगी और भारतीय भाषाओं की मूल फिल्‍मों को सरकारी संरक्षण के आईसीयू में जीवन दिया जाएगा।
पड़ोसी देश चीन में सिनेमा नीति बनने के बाद से निमाघरों की संख्‍या तिगुनी हो गई है। दर्शक बढ़ हैं और बाक्‍स आफिस कलेक्‍शन में भारी इजाफा हुआ है। बाकी क्षेत्रों में हम उनके जैसे होने का सपना देख रहे हैं तो सिनेमा और मनोरंजन में क्‍यों नहीं?

दरअसल : कंगना के आरोप से फैली तिलमिलाहट



दरअसल...
कंगना के आरोप से फैली तिलमिलाहट
-अजय ब्रह्मात्‍मज
कल कंगना रनोट का जन्‍मदिन था। रिकार्ड के मुताबिक वह 30 साल की हो गई। उनकी स्‍क्रीन एज 13 साल की है। 2004 में आई अनुराग बसु की गैंगस्‍टर से उन्‍होंने हिंदी फिल्‍मों में धमाकेदार एंट्री की। 13 सालों में 31 फिल्‍में कर चुकी कंगना को तीन बार अभिनय के लिए राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार मिल चुके हें। अपने एटीट्यूड और सोच की वजह से वह पॉपुर फिल्‍म अवार्ड की चहेती नहीं रहीं। वह परवाह नहीं करतीं। उन अवार्ड समारोहों में वह हिस्‍सा नहीं लेतीं। मानती हैं कि ऐसे सामारोहों और इवेंट में जाना समय और पैसे की फिजूलखर्ची है। अपनी बातों और बयानों से सुर्खियों में रही कंगना रनोट ने हिंदी फिल्‍मों में खास मुकाम हासिल किया है। कह सकते हैं कि हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री में बाहर से आकर अपनी ठोस जगह और पहचान बना चुकी अभिनेत्रियों में वह सबसे आगे हैं। उनकी आगामी फिल्‍म हंसल मेहता निर्देशित सिमरन है। पाठकों को याद होगा कि पहली फिल्‍म गैंगस्‍टर में उनका नाम सिमरन ही था। सिमरन से सिमरन तक के इस सफर से एक चक्र पूरा होता है। एक दिन देर से ही सही,उन्‍हें जन्‍मदिन की बधाई।
कंगना रानोट को याद करने की खास वजह है। पिछले दिनों कॉफी दि करण शो में उन्‍होंने मेजबान करण जौहर पर प्रत्‍यक्ष आरोप लगाया था कि वह नेपोटिज्‍म(भाई-भतीजावाद) के झंडबरदार हैं। करण ने शो में कंगना के आरोप ज्‍यों के त्‍यों जाने देकर वाहवाही और टीआरपी बटोरी थी,लेकिन उनकी यह उदारता कुछ दिनों में ही फुस्‍स हो गई। उन्‍होंने एक बातचीत में कंगना के आरोप का जवाब देते हुए सलाह दिया कि अगर कंगना को इतनी ही दिक्‍कत है तो वह इंडस्‍ट्री छोड़ दें। उन्‍होंने यह भी कहा कि वह विक्टिम और वीमैन कार्उ खेलती हैं। कंगना चुप नहीं रहीं। कोई उन्‍हें टपकी मार कर निकले और वह खामोश रहें...हो ही नहीं सकता। कंगना ने फिर से जवाब दिया। उसके बाद से फिल्‍म इंडस्‍ट्री से आए इनसाइडर स्टार और कुछ बाहर से आए आउटसाइडर ने भी कहना-बताना शुरू कर दिया है कि हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री में कोई नेपोटिज्‍म नहीं है। उनके पास अपने विकलांग तर्क हैं,जिनसे हिंदी फिल्‍मों में मौका और जगह पाने की कोशिश में जूझता कोई भी महात्‍वाकांक्षी सहमत नहीं हो सकता।
वे अमिताभ बच्‍चन, शाह रूख खान और सुशांत सिंह राजपूत जैसे अपवादों के उदाहरण भी देते हैं। सच्‍चाई यह है कि हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री में प्रवेश करना और प्रतिभा के अनुरूप ऊंचाई हासिल करना किसी परीकथा की तरह है। रोजाना सैकड़ों प्रतिभाएं मौके की उम्‍मीद में दम तोड़ रही हैं। निराशा और हताशा की यह सुरंग इतनी गहरी और अंधेरी है कि कामयाबी की रोशनी की आस में उम्र बीत जाती है। कंगना के प्रत्‍यक्ष आरोप से फिल्‍म इंडस्‍ट्री की तिलमिलाहट इस तथ्‍य से भी समझी जा सकती है कि करण जौहर से लेकर आलिया भट्ट तक सफाई और दुहाई दे रहे हैं। कुमार गौरव और अभिषेंक बच्‍चन के साक्ष्‍य से वे दंभ भरते हैं कि आख्रिकार प्रतिभा चलती है। प्रतिभा के प्रभाव से कौन इंकार करता है। सवाल है कि क्‍या बाहरी प्रतिभाओं को समान अवसर मिल पाते हैं। फिल्‍म इंडस्‍ट्री ने तो अजय देवगन और रोहित शेट्टी को भी समान अवसर नहीं दिए।
भारतीय समाज के दूसरे क्षेत्रों की तरह हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री भी भाई-भतीजावाद से ग्रस्‍त है। कंगना रनोट ने दुखती रग और वह भी सीधे करण जौहर पर उंगली रख दी तो सभी तिलमिला गए हैं।
कहानी की खोज
मसान और आंखिन देखी जैसी फिल्‍मों के निर्माता मनीष मुंद्रा चाहते हैं कि देश के कोने-अंतरों से उन्‍हें कहानियं मिलें। उन्‍होंने 20 मार्च से 20 अप्रैल के बीच लेखकों से हिंदी या अंग्रेजी में लिखी कहानियां मांगी हैं। इस साल पांच कहानियां चुनी जाएंगी। लेखकों को कहानी के अधिकार और क्रेडिट के लिए 5 लाख रुपए मिलेंगे। मनीष मुंद्रा अभी तक सनडांस फिल्‍म फस्टिवल के साथ मिल कर स्क्रिप्‍ट लैब चलाते रहे हैं। प्रविष्टि की विस्‍तृत जानकारी दृश्‍यम फिल्‍म्‍स के वेबसाइट पर उपलब्‍ध है। हिंदीभाषी इलाकों के लेखकों के लिए यह अच्‍दा मौका है।
abrahmatmaj@mbi.jagran.com