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Thursday, August 9, 2018

दरअसल करण जौहर की ‘तख़्त' में मुग़ल सल्तनत


दरअसल
करण जौहर कीतख़्त' में मुग़ल सल्तनत
-अजय ब्रह्मात्मज

करण जौहर ने आज अपनी नई फिल्मतख़्त' की घोषणा की है. अभी केवल यह बताया गया है कि यह फिल्म 2020 में आएगी. इस फिल्म में रणवीर सिंह, करीना कपूर खान, आलिया भट्ट, विकी कौशल, भूमि पेडणेकर, जान्हवी कपूर और अनिल कपूर मुख्य भूमिकाओं में हैं. धर्मा प्रोडक्शन की यह सबसे महत्वाकांक्षी फिल्म है. इस फिल्म से करण जौहर की एक नई निर्देशकीय यात्रा शुरू होगी. वह इतिहास के किरदारों को भव्य भंगिमा के साथ पर्दे पर ले आयेंगे. इस फिल्म की कहानी सुमित राय ने लिखी है  घोषणा के अनुसार  इसके संवाद  हुसैन हैदरी  और सुमित राय लिखेंगे. घोषणा में तो नहीं लेकिन करण जौहर ने एक ट्विट में सोमेन मिश्र का उल्लेख  किया है.
दरअसल, इस फिल्म के पीछे सोमेन मिश्रा का बड़ा योगदान है.उन्होंने ही इस फिल्म की स्क्रिप्ट तैयार करवाई है.तख्तमुग़ल सल्तनत के के बादशाह शाहजहां के अंतिम दिनों की कहानी होगी. बादशाह बीमार हो गए थे और उनके बेटों के बीच तख़्त पर काबिज होने की लड़ाई चालू हो गई थी. हम सभी जानते हैं कि शाहजहां के बाद औरंगजेब हिंदुस्तान के बादशाह बने थे. औरंगजेब की छवि कट्टर मुसलमान शासक की है, जिन्होंने अपने हिसाब से इस्लाम को भारत में फैलाने और मजबूत करने की कोशिश की.उनके शासन कल में ही मुग़ल सल्तनत की चूलें हिलीं और फिर देखते-देखते वह साम्राज्य ख़त्म हो गया. शाहजहां औरंगजेब के दिमाग,इरादे और हरकतों से वाकिफ थे. उन्होंने औरंगजेब को अपनी नजरों से दूर भी रखा था. उनकी ख्वाहिश थी कि तख्त का वारिस उनका बड़ा बेटा दारा हो. दारा का पूरा नाम दारा शिकोह था.वे संत और सूफी मिजाज के इन्सान थे.
तख़्त राज परिवार की कहानी है.इसमें छल-कपट,ईर्ष्या,महत्वाकांक्षा,धोखा,मोहब्बत और तख़्त हथियाने का ड्रामा है.करण जौहर परिवार की कहानी से आगे बढ़ कर राज परिवार की कहानी सुनाने-दिखाने आ रहे हैं.हिंदी सिनेमा का यह नया दौर बेहद रोचक और विशाल होने जा रहा है.बाहुबली' की कामयाबी ने सभी को संकेत दिया है कि भारतीय इतिहास और मिथक को परदे पर लाने का समय आ गया है.इतिहास के किरदारों को झाड-पोंछ कर जिंदा किया जा रहा है.करण जौहर की घोषणा के पहले ही आशुतोष गोवारिकरपानीपत' में जुटे हैं  तो डॉ चंद्रप्रकाश द्विवेदीपृथ्वीराज' की तैयारी कर रहे हैं..डॉ चंद्रप्रकाश द्विवेदी के नाम से याद आया की कभी वह दारा शिकोह के जीवन पर फिल्म बनाने की सोच रहे थे.उनकी सनी देओल से आरंभिक बातें भी हुई थीं.फिल्म नहीं बन सकी तो उन्होंने दूरदर्शन के धारावाहिकउपनिषद गंगा' में दारा शिकोह पर दो एपिसोड किये थे.उपनिषद गंगा' के पांचवें एपिसोड के दो खण्डों में दारा शिकोह की झलक मिल जाएगी.
फिल्म की कास्टिंग से स्पष्ट है कि यह सिर्फ औरंगजेब और दारा शिकोह के संघर्ष और विजय की कहानी नहीं है. इसमें उनकी दोनों बहनें जहांआरा और रोशनआरा की भी भूमिकाएं हैं. जहांआरा विदुषी और दारा के मिजाज की थीं,इसलिए वह बड़े भाई के समर्थन में थीं.और रोशनआरा महल में रहते हुए औरंगजेब की मदद कर रही थीं.इतिहास गवाह है की सल्तनत कोई भी हो,बादशाहत के लिए भाइयों और रिश्तेदारों में खूनी संघर्ष होते रहे हैं.औरंगज़ेब ने अपने वालिद शाहजहाँ की ख्वाहिश के खिलाफ जाकर दारा को बंदी बनाया और सजा-ए-मौत दी. वह खुद बादशाह बना और उसने शाहजहाँ को भी कैदी बना दिया.उसने देश के रियाया पर ज़ुल्म किया. सच तो यही है कि उसके फैसलों से आख़िरकार मुग़ल सल्तनत का ही नुकसान हुआ.
कहते हैं शाहजहाँ के तख्त्नशीं होने के पहले ही जहाँगीर ने लाहौर के पीर मियां मीर को आगरा बुलाया था.हर तरह के मुशाव्रे के बाद उन्होंने शाहजहाँ के चारों बेटे दारा,शूजा,मुराद और औरंगजेब से उन्हें मिलवाया और पूछा था कि इनमें से कौन बादशाह हो सकता है? मियां मीर ने दारा की तरफ इशारा किया था.दारा जहीन और नेकदिल था.वह पढने-लिखने में रूचि रखता था.उसने 14 साल की छोटी उम्र में अपनी लाइब्रेरी में पढ़ा कि मोहम्मद गजनी ने भारत पर आक्रमण कर सोमनाथ मंदिर को लूटा था. दारा को यह बात समझ में नहीं आई. उन्होंने मिया मीर से अपनी जिज्ञासा रखी.मियां मीर ने उन्हें भारतीय वेद और उपनिषद पढने की सलाह दी और साथ ही कहा कि उपनिषद का फारसी में अनुवाद करो.हिन्दू शास्त्रों में दारा की रूचि को औरंगजेब ने इस्लाम के खिलाफ कह कर प्रचार किया और मुल्लों को लामबंद किया. उसने यह बात फैलाई कि काफ़िर दारा तख़्त पर बैठा तो हिंदुस्तान में इस्लाम का नाम-ओ- निशां नहीं रह जायेगा. उसने धर्म के नाम पर तख़्त हथियाने की साजिशें कीं और कामयाब रहा..
अगर दारा शिकोह को तख़्त मिला होता तो आज हिंदुस्तान कुछ और होता.धर्म के नाम पर चल रही लड़ाइयाँ सदियों पहले ख़त्म हो गयी होतीं. उम्मीद है कि करण जौहरतख़्त' में इस पक्ष को भी रखेंगे.


Friday, July 20, 2018

दरअसल : ‘धड़क’ में ‘सैराट’ की धड़कन



दरअसल
धड़कमेंसैराटकी धड़कन
- अजय ब्रह्मात्मज

दो साल पहले नागराज मंजुले की मराठी फिल्मसैराटआई थी.किसी आम मराठी फिल्म की तरह रिलीज हुई सैराट कुछ ही दिनों में खास फिल्म बन गई. विशेष कर मुंबई में  इसकी बेहद चर्चा हुई. फिल्म बिरादरी और फिल्म प्रेमी समाज में  उन दिनों एक ही जिज्ञासा थी किआपने सैराट देखी क्या?’ फिल्म की सराहना और कमाई से अभिभूत गैरमराठी दर्शकों ने भी यह फिल्म देखी. हर साल एक-दो ऐसी मराठी फिल्में आ ही जाती हैं,जिनकी राष्ट्रीय चर्चा होती है. सिनेमा के भारतीय  परिदृश्य में मराठी सिनेमा की कलात्मक धमक महसूस की जा रही है. सैराट कलात्मक होने के साथ व्यावसायिक सफलता हासिल कर सभी को चौंकाया. यह अधिकतम व्यवसाय करने वाली मराठी फिल्म है.
सैराटकी लोकप्रियता और स्वीकृति से प्रभावित निर्माताओं ने इसे अन्य भारतीय भाषाओं में रीमेक किया.यहा अभी तक कन्नड़,उड़िया, पंजाबी और बंगाली में बन चुकी है. हिंदी में यहधड़कनाम से रिलीज हो रही है.धड़कके निर्माता  करण जोंहर हैं. इसके निर्देशक शशांक खेतान हैं,जिन्होंने करण जौहर के लिए दुल्हनिया सीरीज  में दो सफल लव स्टोरी फिल्में निर्देशित की हैं. उन्हें लव स्टोरी रोमांटिक फिल्मों का नया उस्ताद माना जा रहा है.
शशांक की अपनी खूबियां हैं जो उन्हें पिछली संगतों और पढ़ाई से मिली है. आदित्य चोपड़ा कीदिलवाले  दुल्हनिया ले जाएंगेके मुरीद शशांक खेतान की सिनेमाई समझ मैं सुभाष घई, नसीरुद्दीन शाह और करण जौहर की सीख और शैली का स्पष्ट असर है. इस अवसर में उनकी फिल्में मेनस्ट्रीम ढांचे में रहते हुए रियलिस्ट फील देती हैं.निश्चित ही उनकी इस खूबी को ध्यान में रखकर ही करण जौहर ने उन्हेंसैराटको हिंदी में लिखने और बनाने की मंजूरी दी होगी.
करण जौहर खास किस्म के फिल्मकार हैं.कुछ कुछ होता हैसे लेकरऐ दिल है मुश्किलमें अपने विषयों के चुनाव और निर्वाह  उनकी अलग रूमानी छवि बनी है.  उनके व्यक्तित्व और व्यवहार में  रूमानियत झलकती है. ऐसा  लग सकता है और लगता  भी है  कि जिंदगी की कठोर सच्चाइयों से करण जौहर का कोई वास्ता नहीं है इसलिए उनकी फिल्मों में वास्तविकता की गुंजाइश नहीं बनती है.किन्तु गौर करें तो बतौर निर्माता  करण जौहर नई कथाभूमियों की तलाश में दिखते हैं. हिंदी में सरकार बनाने का फैसला इसी तलाश का सबूत है. वे भिन्न सोच के निर्देशकों को मौके देते रहे हैं.धड़ककी घोषणा के समय से ही या आशंका व्यक्त की जा रही है की क्या उसमें  सैराटकी धड़कन होगी?
इस फिल्म के ट्रेलर पर मिक्स रिएक्शन आए.सैराटखोज रहे प्रशंसकों को घोर निराशा हुई, लेकिन नई फिल्म के तौर परधड़क' को देख रहे दर्शकों ने तारीफ की. इसके ट्रेलर और गानों को उन्होंने खूब पसंद किया. दरअसल,हम भारतीय किसी भी प्रकार की तुलना में गहरी रुचि और आनंद लेते हैं. पहले और पुराने की तुलना में नए की निंदा और आलोचना करना हमारा प्रिय शगल है. धोने,गिराने और कूटने में हमें मज़ा आता है.हमें आशंका रहती है कि नई फिल्म में पुरानी फिल्म जैसी  बात हो ही नहीं सकती.और फिर सैराट ने तो सफलता और सराहना का कीर्तिमान रचा है. भलाधड़कउसे दोहरा पाएगी?
हिंदी फिल्मों के इतिहास में हर पांच-आठ सालों के बाद आई लव स्टोरी  ने नया ट्रेंड शुरू किया है.बॉबी'(1973),’लव स्टोरी'(1981),’एक दूजे के लिए'(1981),’क़यामत से कयामत तक'(1988) औरमैंने प्यार किया’(1989) का उदहारण हमारे सामने है.इधर लम्बे समय से कपि प्रेमकहानी नहीं आई है,खासकर टीनएज उम्र की लव स्टोरी.इस बार तो ईशान खट्टर और जान्हवी कपूर दो नए चेहरे इस फिल्म के साथ लांच हो रहे हैं.मुझे लगता है किधड़क' देखते समयसैराटका चश्मा नहीं लगाना होगा.फिर हमेंधड़क' की धड़कन सुनाई देगी.

Thursday, June 28, 2018

दरअसल : ‘संजू’ है बाप-बेटे और दोस्ती की फिल्म


दरअसल
संजू है बाप-बेटे और दोस्ती की फिल्म
-अजय ब्रह्मात्मज
    
राजकुमार हिरानी निर्देशित संजू अगले हफ्ते रिलीज होगी.संजय दत्त की ज़िन्दगी पर आधारित इस फिल्म के बारे में दर्शकों की जिज्ञासा रिलीज की तारीख नज़दीक आने के साथ बढती जा रही है.फिल्म के ट्रेलर में संजय दत्त खुद के बारे में बताते हैं कि वे बेवडा हैं,ठरकी हैं,ड्रग एडिक्ट हैं....सब कुछ हैं,लेकिन टेररिस्ट नहीं हैं. इस ट्रेलर में यह बात दोहराई जाती है.याद होगा जब संजय दत्त सजा पूरी कर आये थे तो उन्होंने मीडिया से गुजारिश की थी कि उन्हें टेररिस्ट न कहा जाए.हो सकता है कि फिल्म में संजय दत्त पर लगे इस दाग को मिटाने की भी कोशिश हो.यूँ राजकुमार हिरानी अपने इंटरव्यू में लगातार कह रहे हैं कि यह फिल्म संजय दत्त की इमेज ठीक करने के लिए नहीं बनायीं गयी है.
हम भी मानते हैं कि राजकुमार हिरानी सरीखा डायरेक्टर इस उद्देश्य से फिल्म नहीं बना सकता.इसी ट्रेलर में हमने संजय दत्त के कुछ सीन पिता सुनील दत्त और दोस्त परेश के साथ के भी देखें हैं.दोस्त के किरदार में तो अनेक दोस्तों की छवियाँ समेटी गयी हैं,लेकिन बाप-बेटे के सम्बन्ध का चित्रण तो उनके बीच का है.इस सम्बन्ध के बारे में संजय दत्त के बताये प्रसंगों,घटनाओं और भावोँ के साथ राजकुमार हिरानी और अभिजात जोशी के जुटाए तथ्य भी होंगे.यह फिल्म बाप-बेटे के रिश्ते और दोस्ती की भी कहानी कहती हैं.पिता जो अडिग भाव से अपने बेटे के साथ खड़े रहे और उन्हें हर मुश्किलों से निकाला. बेटे के प्रति सुनील दत्त के लगाव और एहसास को समझने के लिए इतना ही काफी है कि जब संजय दत्त ठाणे जेल में बंद थे तो वे कई बार रातों को जेल की दीवार से लगी सड़क पर घूमने जाते थे.उन्हें लगता था कि वे अपने बेटे को महसूस कर पा रहे हैं.
१९९६ में क्रिस रोडली ने बीबीसी के चैनल ४ के लिए टू हेल एंड बैक शीर्षक से एक documentry बनायीं थी.संजू फिल्म देखने के पहले या बाद में यह documentry ज़रूर देखनी चाहिए.बहुत संक्षेप में संजय दत्त के जीवन के झंझावातों को समेटती यह फिल्म पिता सुनील दत्त के दर्द को जाहिर करती है. हमें एक परिप्रेक्ष्य भी मिलता है.पिता के दुःख,विवशता और बेटे से हमदर्दी को हम समझ सकते हैं.सुनील दत्त अपने ज़माने के हिसाब से सख्त पिता थे. वे अनुशासन पर बहुत जोर देते थे,लेकिन माँ के लाड-दुलार की आड़ में संजय दत्त हाथ से निकलते गए. वे बिगडैल मिजाज की स्वछन्द ज़िन्दगी जीने वाले कथित बांद्रा बॉयज में शामिल हो गए..वे किसी प्रकार का अंकुश नहीं स्वीकार करते थे.
टू हेल एंड बैक में सुनील दत्त कहते हैं...मेरे बेटे ने जो भी तकलीफ सही,वह मेरी वजह से थी...मेरी विचारधारा,मेरी सोच और आम लोगों के लिए मैंने जो काम किया...उसी की वजह से उसे तकलीफ हुई.मैं इसलिए ज्यादा दुःख महसूस करता हूँ. संजय राजनीति के बारे में कुछ नहीं जानता.उसने कभी राजनीति में हिस्सा नहीं लिया. उन्होंने अपना दिल खोलते हुए कहा है...जब मेरे बेटे को हथकड़ी पहनाई गयी तो लगा कि कोई मेरी प्रतिष्ठा और इज्ज़त,मैंने देश के लिए जो भी किया...उन सभी को फांसी दे रहा है.उस क्षण मैं अपनी भावनाओं पर काबू नहीं रख सका...हालाँकि मैं चाहता था कि यह जाहिर नहीं हो,क्योंकि मेरा बेटा प्रभावित होगा और खुद को कमजोर महसूस करेगा.फिर भी मैं अपने आंसू नहीं रोक सका और उसने इसे महसूस किया.
भावनाओं पर काबू पाने और आंसू रोकने की कोशिश संजय भी करते थे.एक तरफ वे नहीं चाहते थे उन्हें कमजोर भांप कर पिता और बहनें टूटें.दूसरी तरफ पिता औरबहनें मुलाकातों में अपनी हिम्मत और एनर्जी बनाये रखते थे.सुनील दत्त को यह तो मालूम हो गया था कि बम विस्फोट और उसके बाद हुए दंगों से पीड़ित मुस्लिम बहुल इलाके में किये उनके काम को सही नज़रिए से नहीं देखा जा रहा है.घर पर धमकी भरे कॉल आने लगे थे.बाप-बेटे के बीच एक संवादहीनता थी.असुरक्षा की इस घडी में आक्रमण की आशंका में संजय दत्त ने खुद से तैयारी की और अवैध हथियार रखने की आपराधिक भूल की. इस दरम्यान सुनील दत्त को फिल्म बिरादरी से तो समर्थन मिला,लेकिन खुद कांग्रेस पार्टी उदासीन रही.इस कठिन दौर में उनके पड़ोसी और मित्र दिलीप कुमार साथ खड़े रहे.सुनील दत्त की उस पीड़ा का अनुमान ही लगाया जा सकता है जब करीबियों की सलाह  पर वे बाला साहेब ठाकरे से मदद मांगने गए थे.जीवन भर की राजनीति और सोच की पूँजी उन्होंने खो दी थी.इस विवशता और तकलीफ ने ही उन्हें राजनीतिक क्रिया-कलापों से दूर और उदासीन कर दिया.उनका दिल दरक गया था.
बाप-बेटे के बीच के दर्द के इस रिश्ते और भावना को राजकुमार हिरानी ने परदे पर उतारा होगा.उनकी फिल्मों में पिता की खास भूमिका होती है.अब की सच्ची कहानी है.इस बार तो हमे तीन बाप-बेटों के रिश्तो का सार दृश्यों के रूप में इस फिल्म में दिखेगा.लेखन और अभिनय हमारे अनुभवों की ही अभिवयक्ति है.संजू में संजय दत्त-सुनील दत्त,रणबीर कपूर-ऋषि कपूर और राजकुमार हिरानी-सुरेश हिरानी के रिश्तों की छवियाँ परदे पर निभाते रणबीर कपूर-परेश रावल दिखेंगे.विधु विनोद चोपड़ा ने बताया था कि मुन्नाभई एमबीबीएस की शूटिंग में बाप-बेटे के मिलने का दृश्य रियल हो गया था.शॉट हो जाने के बाद भी संजय दत्त का सर पिता के कंधे पर देर तक टिका रहा था.