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Saturday, June 9, 2018

दरअसल : सरहद पार के गांव बफा से सरहदी को बुलावा


दरअसल

सरहद पार के गांव बफा से सरहदी को बुलावा

-अजय ब्रह्मात्मज

कभी-कभी ,’चांदनी’,’सिलसिलाऔरकहो...न प्यार हैजैसी फिल्मों के लेखक और क्लासिक फिल्मबाजारके लेखक-निर्देशक सागर सरहदी इन दिनों बहुत खुश हैं। उन्हें बुलावा आया है। उन्हें अपने मूल पैतृक निवास बफा से बुलावा आया है। बफा पाकिस्तान के मनेशरा ज़िले का एक खूबसूरत गांव है। इसी गांव में सागर सरहदी का जन्म हुआ। 1947 में विभाजन के बाद उनके परिवार को अपनी जान की हिफाजत के लिए उस गांव को छोड़ना पड़ा था। उनका परिवार कश्मीर के रास्ते दिल्ली पहुंचा था। और फिर अपने बड़े भाई के साथ वह मुंबई आ गए थे। भाई जितने संजीदा और ज़िम्मेदार…. सागर उतने ही लापरवाह और आवारा। बुरी संगत,बुरी आदतें। संयोग ऐसा हुआ कि आवारगी के उन दिनों में उनकी मुलाक़ात इप्टा के रंगकर्मियों और शायरों से हो गयी। कैफी आज़मी और दूसरे कम्युनिस्ट और प्रगतिशील कलाकारों और शायरों की सोहबत में सागर भी लिखने लगे और अपना नाम गंगा सागर तलवार से बदल कर सागर सरहदी कर लिया।
बहरहाल,जिस गांव से 71 साल पहले उन्हें निकलना पड़ा था। आज वही गांव उन्हें सम्मान से  बुला रहा है। यह बताते हुए उनकी ख़ुशी छलकती है कि आज उस गांव के लोग उनके लेखक होने पर गर्व करते हैं। उन्हें जब पता चला कि कुछ मशहूर फिल्मों का लेखक औरबाजारका निर्देशक उनके गांव का है तो उन्होंने संपर्क किया। कोई एक मिलने भी आया। उसने पूरे गांव की तरफ से उन्हें निमंत्रण दिया। सागर बताते हैं कि उसी व्यक्ति ने जानकारी दी कि गांव की एक गली में तख्ती लगी है कि सागर यहाँ गुल्ली-डंडा खेला करते थे। बफा छोड़ते समय सागर सरहदी की उम्र 13-14 साल रही होंगे। आज वे 84 के हो चुके हैं।  अपनी सेहत को नज़रअंदाज कर वे बफा जाने के लिए के लिए उत्साहित और उतावले हैं। वहां की नदियां और पहाड़ उन्हें बुला रहे हैं। बचपन से आँखों में बसी गांव की धूमिल छवि अब साफ़ हो गयी है। वे अपने गांव की खूबसूरती का बखान करने लगते हैं। सचमुच स्मृतियाँ कभी बूढी नहीं होती।     
वे आज भी नियमित रूप से अपने दफ्तर पहुँचते हैं। सायन कोलीवाड़ा के भगत सिंह नगर से लोकल ट्रेन और बस पकड़ कर अँधेरी पश्चिम के फ़िल्मी इलाके में आते हैं और शाम में लौट जाते हैं। साथ में एक थैला,उसमें कुछ किताबें और एक मोबाइल फ़ोन ज़रूर रहता है। दफ्तर में ज़्यादातर स्ट्रगलर लेखक,कलाकार और कुछ अन्य लोग उनसे मिलने आते हैं। दफ्तर का दरवाज़ा हमेशा खुला रहता है। सभी अपनी मर्जी से आते हैं।  उन्हें कुछ बताते हैं,बतियाते हैं और चले जाते हैं। वे किसी को रोकते नहीं और न ही ठहरने को कहते हैं। ठहराव उनकी ज़िन्दगी में आ गया है। पहली निर्देशी फिल्मबाजारका सीक्वल लिखा पड़ा है। ऐसा कोई निर्माता नहीं मिल रहा जो उनकी कहानियों को फिल्म की शक्ल दे सके। इसके बावजूद वे निराश नहीं हैं। नयी कहानियां पढ़ना,नए कलाकारों से मिलना और उम्मीदें गढ़ना उन्हें भाता है।
अच्छा ही है कि सागर सरहदी कम सुन पाते हैं। उन्हें पास में बैठे व्यक्ति की फुसफुसाहट नहीं सुनाई पड़ती। हाँ,वे सामने बैठे व्यक्ति की मुस्कराहट और आँखों से टपक रही सहानुभूति तो समझ लेते हैं। फिर हथेलियों और कलाइयों को यूँ भींचते हैं,ज्यों जता रहे हों कि इतनी भी दया न दिखाओ और न फालतू मुस्कराओ। उनके अगले ही वाक्य में एक गाली निकलती है और बोझिल हो रहे माहौल को हल्का कर देती है। मशहूरियत के वक़्त से वे निकल चुके हैं। फिल्म निर्माण में मिले धोखों से उनकी योजनाएं चकनाचूर हो चुकी हैं। कुछ सीधापन और कुछ उसूलों पर चलने की ज़िद्द ने उन्हें फिलवक्त ख़ारिज सा कर दिया है। अपने प्रति फिल्म इंडस्ट्री की उदासीनता का उन्हें कोई मलाल नहीं है। मौका मिलने पर वे अपने अनुभव और यादें शेयर करने से नहीं हिचकते। उन्हें इस बात का गुमान भी है कि यश चोपड़ा जैसे काबिल निर्देशक ने  उनकी लिखी पंक्तियों में कभी फेरबदल नहीं की। सिर्फ एक बार एक पंक्ति को छोटी करने के लिए कहा।
सागर सरहदी ने जबबाजारलिखी और अपने दोस्तों को सुनाया तो सभी ने बताया कि यह फिल्म नहीं बन सकेगी। अगर बन भी गयी तो बिलकुल नहीं चलेगी। हम सभी जानते हैं कीबाज़ाबनी और खूब चली। समय के साथ वह क्लासिक भी मान ली गयी। इस प्रसंग में सागर सरहदी यह बताना भी नहीं भूलते कि इस फिल्म का ट्रायल शो देखने के बादगर्म हवाके डायरेक्टर एम एस सथ्यू ने हाथों को नाचते हुए कहा था.... क्या बना दिया है?

Thursday, May 31, 2018

दरअसल : पानी के लिए लड़ते किरदार



दरअसल
पानी के लिए लड़ते किरदार
- अजय ब्रह्मात्‍मज
विक्रमादित्य मोटवानी का सुपरहीरो भावेश जोशी मुंबई के वाटर माफिया को के खिलाफ खड़ा होता होता है। भावेश जोशी 21वीं का सजग युवक है,जो मुंबई में रहता है। वह अपने आसपास के भ्रष्टाचार और समाज के स्वार्थी व्यक्तियों के आचरण से उक्त चूका है। उसे कोई रास्ता नहीं सूझता तो वह नक़ाब पहन कर उन्हें बेनक़ाब करने की मुहीम पर निकलता है। यह सिस्टम से नाराज़ आज के यवक की कहानी है। विक्रमादित्य अपनी पीढ़ी के संवेदनशील फ़िल्मकार हैं। इस बार वे किरदारों के परस्पर मानवीय रिश्तों और उनकी उलझनों से निकल कर समाज से जूझते और टकराते किरदार को सुपरहीरो के तौर पर पेश कर रहे हैं। यथार्थ कठोर और जटिल हो तो साहित्य और फिल्मों में फंतासी का सहारा लिया जाता है। ज़िन्दगी में नामुमकिन लग रही मुश्किलों को फंतासी से सुलझाने का क्रिएटिव प्रयास किया जाता है। विक्रमादित्य का विषय आज की मुंबई और मुंबई की रोज़मर्रा की समस्याएं हैं। उनमें पानी एक विकट समस्या है।
ख़बरों और फिल्मों के जरिये महानगरों में पर्याप्त पानी के लिए तरसते नागरिकों की व्यथा हम देखते रहे हैं। हम में से अधिकांश भुक्तभोगी भी रहे हैं।  पानी के नियंत्रण और वितरण में अमीरों और अमीर बस्तियों का खास ख्याल रखा जाता है। मुंबई में मध्यवर्गीय और निम्नवर्गीय इमारतों और बस्तियों के बाशिंदे वाटर और टैंकर माफिया के नियमित शिकार होते हैं। यहाँ बहुमज़िली इमारतों के टॉप फ्लोर के बाथरूम में पानी पहुँचने में दिक्कत नहीं होती,लेकिन मलिन बस्तियों की नालों से बूँदें भी नहीं टपकतीं। इस सन्दर्भ में 1946 में बनी चेतन आनंद की फिल्मनीचा नगरकी याद आती है। कान फिल्म फेस्टिवल में उसी साल इसे ग्रैंड प्रिक्स अवार्ड से सम्मानित किया गया था।चेतन आनंद ने समाज में उंच-नीच के बढ़ते भेद और स्वार्थ को गहराई से चित्रित किया था। इस फिल्म ने सत्यजीत राय को फिल्म निर्देशन में उतरने की प्रेरणा दी थी।
हयातुल्लाह अंसारी की कहानी को स्क्रिप्ट का रूप देने में ख्वाजा अहमद अब्बास ने मदद की थी। हिंदी फिल्मों सामाजिक यथार्थ की फिल्मों की यह शुरुआत थी। उन दिनों मुंबई में इप्टा (इंडियन पीपल थिएटर एसोसिएशन) के सदस्य बहुत एक्टिव थे।  वामपंथी सोच के इन संस्कृतिकर्मियों का फ़िल्मी हस्तियों से अच्छा राब्ता था। उनमें से कुछ फिल्म जैसे लोकप्रिय माध्यम का उपयोग करना चाहते थे। हिंदी फ़िल्में पारसी थिएटर के प्रभाव में मेलोड्रामा,फंतासी,ऐतिहासिक और मिथकीय चरित्रों से बाहर नहीं निकल पा रही थी। ऐसे दौर में ख्वाजा अहमद अब्बास,चेतन आनद,बलराज साहनी और कैफ़ी आज़मी जैसे क्रिएटिव दिमाग फिल्मों में कुछ नया और सार्थक करने के लिए बेताब थे। ख्वाजा अहमद अब्बास कीनया संसारऐसी पहली कोशिश थी।नीचा नगरमें उस फिल्म की गलतियों से सीखते हुए नाच-गाने भी रखे गए थे। कान फिल्म फेस्टिवल के लिए फ्रांस भेजते समय एक गाना और नृत्य के दृश्य हटा दिए गए थे।
नीचा नगरमें लेखक-निर्देशक ने ऊंचा नगर और नीचा नगर का रूपक गढ़ा था। समाज में अमीर और गरीब के बीच की बढ़ती खाई और ख्वाहिशों को यह फिल्म आज़ादी के ठीक पहले की पृस्ठभूमि में रखती है।  दोनों नगर काल्पनिक हैं। ऊंचा नगर में आलीशान हवेली में सरकार निवास करते हैं। उनकी नज़र नीचा नगर के पास की उस दलदल पर है,जहाँ ऊंचा नगर का गंदा नाला जाता है। वे गंदे नाले का रुख नीचा नगर की तरफ मोड़ देते हैं ताकि दलदल सूखने पर वे माकन बना कर पैसे कमा सकें। नीचा नगर के बाशिंदों को यह बात नागवार गुजरती है। गंदा नाला अपने साथ बीमारियां भी लाया है। विद्रोह होता है तो सरकार के नुमाइंदे पानी बंद कर देते हैं। नीचा नगर में प्यास से त्राहि-त्राहि होने लगती है। फिर भी वे हिंसक नहीं होते। वे (गाँधी की प्रभाव में) अहिंसा का मार्ग अपनाते हैं। क़ुर्बानियों और संघर्ष के बाद आख़िरकार उनकी मांगे मानी जाती हैं।  नीचा नगर के बाशिंदों को गंदे नाले से निजात मिलती है और पानी मिलता है। कुछ सालों पहले शेखर कपूर ने भीपानीशीर्षक से फिल्म बनाने की घोषणा की थी। अब पानी की समस्या से विक्रमादित्य मोटवानी का भावेश जोशी अपने ढंग से निबट रहा है।  
नीचा नगरकामिनी कौशल की पहली फिल्म थी। चेतन आनंद की पत्नी उमा आनंद ने भी इस फिल्म में काम किया था। मशहूर संगीतज्ञ रवि शंकर भी इस फिल्म के साथ बतौर संगीतकार जुड़े थे।
jagran.comhttps://www.jagran.com/entertainment/bollywood-vishesh-cine-sanvad-indian-films-and-actors-now-fight-against-water-crisis-18031178.html 




Friday, May 25, 2018

दरअसल : संजू की ज़िंदगी का नया ‘प्रस्थान’


दरअसल

संजू की ज़िंदगी का नयाप्रस्थान
-अजय ब्रह्मात्मज

खबर आई है कि संजय दत्त माँ नरगिस दत्त के जन्मदिन 1 जून से अपने होम प्रोडक्शन की नई फिल्म की शूटिंग आरम्भ करेंगे। सात सालों  के बाद उनके करियर का यह नयाप्रस्थानहोगा।  उनकी इस फिल्म का निर्देशन मूल तेलुगूप्रस्थानमके निर्देशक देवा कट्टा ही करेंगे। इस नई शुरुआत के लिए संजय दत्त को बधाई और यह ख़ुशी की बात है कि उन्होंने इसके लिए माँ का जन्मदिन ही चुना। इसी महीने माँ नरगिस के पुण्य दिवस के मौके पर उन्होंने एक ट्वीट किया था किमैं जो भी हूँ,तुम्हारी वजह से हूँ।  मैं तुम्हारी कमी महसूस करता हूँ।माँ के प्रति उमड़े उनके प्यार की क़द्र होनी चाहिए।
सचमुच संजय आज जो भी हैं,उसमें नरगिस दत्त की परवरिश और लाड-प्यार का बड़ा योगदान है। राजकुमार हिरानी की फिल्मसंजूमें माँ-बेटे के सम्बन्ध को देखना रोचक होगा। उनके निर्देशन में मनीषा कोइराला ने अवश्य नरगिस के लाड,चिंता और तकलीफ को परदे पर उतारा होगा। संजय दत्त पर छिटपुट रूप से इतना कुछ लिखा जा चुका है कि माँ-बेटे के बीच की भावनात्मक उथल-पुथल और घटनाओं के बारे में सभी कुछ ना कुछ जानते हैं। उनके आधार पर संजय के प्रति उनकी धारणाएं भी बनी हुई हैं,जिसमें उनकी बाद की गतिविधियों ने दृश्टिकोण तय किया है। उन्हें बिगड़ैल बाबा के नाम से सम्बोधित किया जाता रहा है। बहुत मुमकिन है कि हिरानी कीसंजूसे संजय दत्त के बारे में बनी निगेटिव धारणाएं टूटें। हम उस संजय को देख पाएं,जो माँ की मौत के तीन सालों के बाद उनका सन्देश सुन कर चार दिनों तक फूट-फूट कर रोते रहे। उस सन्देश में नरगिस ने उन्हेंविनम्रऔरनेक इंसानहोने की सलाह दी थी।
अनुशासन प्रिय सख्त पिता और लाड-दुलार में डूबी माँ के बीच संजय को लेकर झगडे होते थे। नरगिस के जीवनीकारों ने विस्तार से इन झगड़ों और मतभेदों के बारे में लिखा है। शुरू में नरगिस संजय दत्त को पिता की डाट-फटकार से बचाती रहीं। संजय के पक्ष में खड़ी रहीं। ऐसे भी मौके आये जा सुनील दत्त ने दो टूक शब्दों में कहा कि हम दोनों में से एक को चुन लो तो नरगिस ने बेटे को चुना। एक बार ऐसी ही एक घटना के बाद नाराज़ सुनील दत्त दो दिनों तक घर नहीं लौटे। बुरी संगत और बुरी आदतों ने संजय दत्त को बिगाड़ दिया था। माँ से मिली शह संजय दत्त को सुधारने की सुनील दत्त की कोशिशें नाकाम रहीं। बाद में नरगिस को एहसास हुआ कि उनसे चूक हो गई। संजय दत्त की चिंता में वह घुलती गईं। जीवन के आखिरी दिनों कैंसर ने उनकी तकलीफ और बढ़ा दी। पीड़ा के इसी दौर में उन्होंने बेटे संजय समेत परिवार के सभी सदस्यों के लिए सन्देश छोडे थे।   
आज की पीढ़ी के पाठकों को नरगिस की फ़िल्में देखनी चाहिए। उनकी जीवनियां पढ़नी चाहिए। नरगिस ने बतौर अभिनेत्री लम्बी सफल पारी पूरी करने के बाद सुनील दत्त के साथ गृहस्थी में कदम रखा। सम्परित पत्नी और माँ की भूमिका तक हो वह सीमित नहीं रहीं। उन्हें राज्य सभा की सदस्यता मिली थी और पद्मा श्री से भी उन्हें सम्मानित किया गया था। देश के पहले प्रधान मंत्री नेहरू से उनके पारिवारिक सम्बन्ध थे। देशसेवा और राष्ट्रभक्ति के मिसाल रही दत्त दंपति। उनकी मृत्यु पर तत्कालीन प्रधानमंती इंदिरा गाँधी ने कहा था,’नरगिस की मृत्यु की खबर से उन्हें गहरा दुःख हुआ है। जी करोड़ों दर्शकों ने उन्हें परदे पर देखा,उनके लिए नरगिस प्रतिभा और समर्पण की प्रतीक हैं। वह गर्मजोशी और सहानुभूति की साक्षात देवी थीं। उन्होंने अनगिनत सामाजिक मुद्दों का समर्थन किया।
उम्र के इस पड़ाव पर बीवी-बच्चों,फिल्म इंडस्ट्री और प्रशंसकों से घिरे होने बावजूद संजय दत्त की तन्हाई का अंदाजा लगाना मुश्किल है। जीवन के इस मोड़ पर उन्हें माँ की याद आ रही है। वे उनकी कमी महसूस कर रहे हैं। यह एक प्रकार से उनका पश्चाताप है।  हम यही उम्मीद करते हैं कि वे ज़िन्दगी की भूलों के अफ़सोस पर काबू कर साढ़े क़दमों से आगे बढ़ें। सफल रहें।
नरगिस की जीवनियां:
Darlingji,The true story of Nargis & Sunil Dutt,KIswar desai
THe LIfe and Times of Nargis,T J S George

Friday, May 18, 2018

दरअसल : नवाज़ुद्दीन सिद्दीक़ी की ‘मंटो’

दरअसल

नवाज़ुद्दीन सिद्दीक़ी कीमंटो

-अजय ब्रह्मात्मज

भारत से कुछ फ़िल्मकार, पत्रकार और समीक्षक मित्र कान फिल्म फेस्टिवल गए हैं। उनकी राय,टिपण्णी और समीक्षा पर यकीन करें तो नवाज़ुद्दीन सिद्दीक़ी कीमंटोइस साल की बहुप्रतीक्षित फिल्म होगी। यह फिल्म कान फिल्म फेस्टिवल केउन सर्टेन रिगार्डखंड के लिए चुनी गयी है। इस फिल्म की निर्देशक नंदिता दास हैं। कान फिल्म फेस्टिवल की क्रिएटिव पवित्रता और वस्तुनिष्ठता बची हुई है। दुनिया भर के बेहतरीन फ़िल्में यहाँ देखने को मिल जाती हैं। यह पता चल जाता है कि इस साल का इंटरनेशनल सिनेमा सीन कैसा रहेगा? वहां दिखाई जा चुकी फ़िल्में कुछ महीनों के बाद घूमती हुई देश के विभिन्न शहरों में आयोजित फिल्म फेस्टिवल में पहुंचेंगी।

मैंमंटोको नवाज़ुद्दीन सिद्दीक़ी की फिल्म कह रहा हूँ। उन्होंने ही फिल्म में शीर्षक भूमिका निभाई है। कह सकते हैं कि किरदारों पर भी कलाकारों के नाम लिखे होते हैं। 2005 से सआदत हसन मंटो के जीवन पर फिल्म बनाने की कोशिशें जारी हैं। अनेक निर्देशकों ने सोचा। कुछ कलाकारों ने तैयारी की। बात आयी-गयी और फ़िल्में नहीं बन सकीं। इस बार नंदिता दास अपने प्रयास में सफल रहीं। कुछ सालों पहले उन्होंने जबमंटोके बारे में सोचा और तैयारियां शुरू कीं तो  उनके दिमाग में मुख्य भूमिका के लिए कोई और था। फंड के अभाव में फिल्म खिंचती गयी और नवाज़ुद्दीन सिद्दीक़ी आ गए। एक तरह से यह अच्छा ही हुआ ,क्योंकि मंटो के तेवर को नवाज़ पकड़ सकते थे। कहना नहीं चाहिए,लेकिन नवाज़ ने भी तिरस्कार और नाराज़गी के साल मुंबई में गुजारे हैं। लोगों ने उन्‍हें गलत समझा है। लंबे समय तक लोग समझ नहीं पा रहे थे और गरीब भूमिकाओं में नवाज़ को रेज़गारी की तरह खर्च कर रहे थे।

मंटोनंदिता दास की भी फिल्म है।  यह उनकी प्रिय ज़मीन है। उन्होंने 2002 में हुए गुजरात के दंगो परफ़िराक़’(2009 ) बनायी थी। नौ सालों के बाद वह लौटी हैं।  इस बार देश विभाजन का समय है। हालात 2002 से भी बदतर हैं। इस बार उनके पास इन हालात से जूझता ग़मज़दा नायक मंटो है। पिछले कुछ सालों में मंटो देश के सबसे अधिक चर्चित और पठित लेखक रहे हैं। उन्हें परफॉर्मेंस की अनेक विधाओं में अभिव्यक्ति मिली। उनकी कहानियों का पाठन,मंचन और फिल्मांकन भी हुआ। हम उनकी रचनाओं से वाकिफ होते रहे। फिर भी इस क्रम में मंटो अपरिचित ही रहे। हम उस लेखक के मानस और माहौल के बारे में ज़्यादा नहीं जान सके। उन्होंने अपनी कब्र पर लिखने के लिए इबादत लिखी थी,’यहां सआदत हसन मंटो लेटा हुआ है और उसके साथ कहानी लेखन की कला और रहस्य भी दफन हो रहे हैं। टनो मिट्टी के नीचे दबा वह सोच रहा है कि क्या वह खुदा से बड़ा कहानी लेखक नहीं है।
नंदिता दास ने अपनी फिल्‍म में मंटो के मिजाज को उकेरने की कोशिश की है। उन्होंने अपनी फिल्म में उनकी कहानियों का सहारा लिया है। नंदिता के लिए शिल्प की बड़ी चुनौती रही होगी। उन्हें बायोपिक के पॉपुलर फॉर्मेट में मंटो की कहानी नहीं कहनी थी। मंटो का साथ देने के लिए उन्होंने केवल उनकी बीवी साफिया (रसिका दुग्गल) और दोस्त श्याम चड्ढा (ताहिर राज भसीन ) को रखा है। इन तीनों के साथ वह उस दौर में उतरती हैं,जब मंटो भारत से पाकिस्तान जाते हैं। वहां पहुँचने के बाद मंटो ने लिखा था,मेरे लिए ये तय करना नामुमकिन हो गया है, कि दोनों मुल्कों में अब मेरा मुल्क कौन-सा है। बड़ी बेरहमी के साथ हर रोज जो खून बहाया जा रहा है, उसके लिए कौन जिम्मेदार है? अब आजाद हो गए हैं लेकिन क्या गुलामी का वजूद खत्म हो गया है? जब हम गुलाम थे तो आजादी के सपने देख सकते थे, लेकिन अब हम आजाद हो गए हैं तब हमारे सपने किसके लिए होंगे?यह सवाल आज भी कायम है। दोनों मुल्कों के लेखकों के सपने छीन गए हैं। हम सभी मंटो की दुविधा जीने को अभिशप्त हैं।
कान फिल्म फेस्टिवल मेंमंटोकी मुनासिब तारीफ हुई है। देखें यह फिल्म कब तक आम भारतीय दर्शकों तक पहुँचती है? नंदिता दास और नवजुद्दीन सिद्दीक़ी की इस पेशकश का इंतज़ार है।