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Friday, October 13, 2017

दरअसल : सारागढ़ी का युद्ध



दरअसल...
सारागढ़ी का युद्ध
-अजय ब्रह्मात्‍मज

तीन दिन पहले करण जौहर और अक्षय कुमार ने ट्वीट कर बताया कि वे दोनों केसरी नामक फिल्‍म लेकर आ रहे हैं। फिल्‍म के निर्देशक अनुराग सिंह रहेंगे। यह फिल्‍म बैटल ऑफ सारागढ़ी पर आधारित होगी। चूंकि सारागढ़ी मीडिया में प्रचलित शब्‍द नहीं है,इसलिए हिंदी अखबारों में ‘saragarhi’ को सारागरही लिखा जाने लगा। फिल्‍म इंडस्‍ट्री में भी अधिकांश इसे सारागरही ही बोलते हैं। मैं लगातार लिख रहा हूं कि हिंदी की संज्ञाओं को अंग्रेजी के साथ हिंदी में भी लिखा जाना चाहिए। अन्‍यथा कुछ पीढि़यों के बाद इन शब्‍दों के अप्रचलित होने पर सही उच्‍चारण नहीं किया जाएगा। देवनागरी में लिखते समय लोग सारागरही जैसी गलतियां करेंगे। दोष हिंदी के पत्रकारों का भी है कि वे हिंदी का आग्रह नहीं करते। अंग्रेजी में आई विस्‍प्तियों का गलत अनुवाह या प्यिंतरण कर रहे होते हैं।
बहरहाल,अक्षय कुमार और करण जौहर के आने के साथ सारागढ़ी का युद्ध पर फिल्‍म बनाने की तीसरी टीम मैदान में आ गई है। करण जौहर की अनुराग सिंह निर्देशित फिल्‍म का नाम केसरी रखा गया है। इसके पहले अजय देवगन ने भी इसी पृष्‍ठभूमि पर एक फिल्‍म की घोषणा की थी। कहते हैं अगस्‍त महीने में करण जौहर और काजोल के बीच पुन: दोस्‍ती हो जाने के बाद अपनी फिल्‍म विलंबित कर दी। वे करण जौहर की फिल्‍म से टकराना नहीं चाहते। पिछली फिल्‍म के समय दोनों के बीच बदमजगी हो चुकी है। सारागढ़ी का युद्ध की पृष्‍ठभूमि पर ही राजकुमार संतोषी की फिल्‍म निर्माणाधीन है। इस फिल्‍म में रणदीप हुडा केंद्रीय भूमिका निभा रहे हैं। अक्षय कुमार,अजय देगन और रणदीप हुडा के स्‍टारडम,अभिनय दक्षता और करिअर को ध्‍यान में रखें तो अजय देवगन ईशर सिंह की भूमिका के लिए उपयुक्‍त लगते हैं। यह ठीक है कि रणदीप हुडा अपने किरदारों पर मेहनत करते हैं। वे ईशर सिंह को भी जीवंत कर सकते हैं। अक्षय कुमार का तो जादुई समय चल रहा है। वे हर प्रकार की भूमिका में जंच रहे हैं।
सारागढ़ी का युद्ध है क्‍या?‍ पिछली सदियों के युद्धों में से एक सारागढ़ी का युद्ध वीरता और साहस के लिए विख्‍यात है।

अविभाजित भारत में अंग्रेजों ने अपन स्थिति मजबूत करने के साथ सीमाओं की चौकसी आरंभ कर दी थी। हमेशा की तरह उत्‍र पश्चिमी सीमांत प्रांत की तरफ से आक्रमणकारियों का खतरा जारी था। उनसे बचाव के लिए लॉकफोर्ट और गुलिस्‍ता फोट्र बनाए गए थे। दुर्गम इलाका होने और दोनों फरेर्ट के गीच संपर्क स्‍‍थापित करने के उद्देश्‍य से दोनों फोर्ट के बीच में सारागढ़ी पोस्‍ट बनार्ब गई थी। पोस्‍ट पर तैनात सैनिक मुस्‍तैदी से आततायी लश्‍करों पर नजर रखते थे।
12 सितंबर 1897 की घटना है। सारागढ़ी पोस्‍ट पर तैनात सैनिकों ने देखा की अफगानों का लश्‍कर पोस्‍अ की तरफ बड़ा चला आ रहा है। वहां से सैनिकों ने गुलिस्‍तान फोर्ट पर हेलिकॉग्राफ से मदद के लिए संदेश भेजा,लेकिन वहां मौजूद अंग्रेज फौजी अधिकारी मदद करने में असमर्थ रहा। आक्रमणकारी लश्‍कर में 10,000 से अधिक सैनिक थे। ऐसी स्थिति में सारागढ़ी पोस्‍ट पर मौजूद 21 जवानों की अुकड़ी ने हवलदार ईशर सिंह के नेतृत्‍व में पोस्‍ट की रक्षा के लिए लढ़ने का फैसला किया। दिन भर युद्ध चला। यह अलग बात है कि इस युद्ध में वे खेत आए,लेकिन उन्‍होंने अपने शौर्य और साहस से अफगान सैनिकों के दांत खट्टे कर दिए थे। उन्‍होंने उन्‍हें दिन भी उलझाए रख। इन जांबाज सैनिकों की बहादुरी की तारीफ ब्रिटिश संसद में हुई और क्‍चीन विक्‍टोरिया ने सभी सैनिकों को वीरता पुरस्‍कार से सम्‍मनित किया। उन्‍हें जमीनों के साथ ईनाम भी दिए गए। सारागढ़ी के युद्ध और स्‍मारक पर मीडिया में लिखा जाना चाहिए।
सारागढ़ी का युद्ध पर फिल्‍म बनना गौरव की बात है,लेकिन एक साथ तीन फिल्‍मों का बनना कुछ सालों पहले भगत सिंह के जीवन पर बनी छह फिल्‍मों की याद दिला रहा है।


Friday, September 29, 2017

दरअसल : मध्‍यवर्गीय कलाकारों के कंधों का बोझ



दरअसल...
मध्‍यवर्गीय कलाकारों के कंधों का बोझ
-अजय ब्रह्मात्‍मज
हिंदी फिल्‍मों में मध्‍यवर्गीय पृष्‍ठभूमि के परिवारों से आए कलाकारों की संख्‍या बढ़ रही है। दिल्‍ली,पंजाब,उत्‍त्‍रप्रदेश,राजस्‍थान,उत्‍तराखंड,हिमाचल प्रदेश,बिहार और झारखंड से आए कलाकारों और तकनीशियनों हिंदी फिल्‍म इंढस्‍ट्री में जगह बनानी शुरू कर दी है। ठीक है कि अभी उनमें से कोई अमिताभ बच्‍च्‍न या शाह रूख खान की तरह लोकप्रिय और पावरफुल नहीं हुआ है। फिर भी स्थितियां बदली हैं। मध्‍यवर्गीय परिवारों से आए कलाकारों की कामयाबी के किससों से नए और युवा कलाकारों की महात्‍वाकांक्षाएं जागती हैं। वे मुंबई का रुख करते हैं। आजादी के 7व सालों और सिनेमा के 100 सालों के बाद की यह दुखद सच्‍चाई है कि मुंबई ही हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री की राजधानी बनी हुई है। उत्‍तर भारत के किसी राज्‍य ने हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री के लिए संसाधन जुटाने या सुविधाएं देने का काम नहीं किया।
बहरहाल, हम बात कर रहे थे हिंदी फिल्‍मों में आए मध्‍यवर्गीय कलाकारों की कामयाबी की। लगभग सभी कलाकारों ने यह कामयाबी भारी कदमों से पूरी की है। किसी से भी बाते करें। संघर्ष और समर्पण का भाव एक सा मिलेगा। हम सभी जानते हैं कि उत्‍तर भारत में आज भी कोई किशोर-किशोरी फिल्‍मों में जाने की बात करे तो उसके साथ परिवार का क्‍या रवैया होता है? उनके प्रति सख्‍ती बढ़ जाती है। तंज कसे जाने लगते हैं। अगर वह ड्रामा या थिएटर में एक्टिव हो रहा हो तो दबाव डाला जाता है कि वह उसे छोड़ दे,क्‍योंकि उसमें कोई भविष्‍य नहीं है। सकल मध्‍यवर्गीय परिवारों में भविष्‍य का तात्‍पर्य सुरक्षित करियर और जीवन है। आप 10 से 5 की बंधी-बंधयी नौकरी कर लें। ऊपरी आमदनी हो तो अतिउत्‍तम। खयाल रहे कि पेंशन वाली नौकरी हो। इन दबावों से बचजे-निकलते कोई निकल आया तो तानों की शुरूआत हो जाती है। गली-मोहल्‍ले में कहा जाने लगता है कि फलां बाबू का बेटा अमिताभ बच्‍चन बनने गया है या फलां बाबू की बेटी को लगता है कि वही अगली कंगना रनोट होगी। सभी को उन युवक-युवतियों की असफल वापसी का इंतजार रहता है। अजीब समाज है अपना। सपनों को पंक्‍चर करने में माहिर इस समाज में अपनी उम्‍मीदों को बचाए रखना भी एक संघर्ष है।
बात आगे बढ़ती है। ये कलाकार सिर्फ अपनी लिद की बदौलत मुंबई आ धमकते हैं। धक्‍के खाते हैं। खाली पेट रहते हैं। सिर्फ अपनी आंखों की चमक बरकरार रखते हैं। संघर्षशील कलाकारों की अक्षुण्‍ण ऊर्जा पर कभी बात होनी चाहिए। मुंबई में उनके साथी ही उनके हमराज,हमखयाल और बुरे दिनों के दोसत बनते हैं। किसी प्रकार एक-दो काम मिलता है। कुछ पैसे आते हैं। फिल्‍में रिलीज होती हैं। पत्र-पत्रिकाओं में तस्‍वीरें छपती हैं। फिर भी यह कहना बंद नहीं होता कि अभी देखिए आगे क्‍या होता है? परिवार भी आश्‍वस्‍त नहीं रहता कि कुछ हो ही जाएगा। दूसरे दबी इच्‍छा रहती है कि बेटा या बेटी आज के सफलतम स्‍टारों की तरह चमकने लगे,जबकि उसे गर्दिश में रखने या धूमिल करने की उनकी कोशिशें जारी रहती है।
फिर एक दौर आता है। उनमें से कुछ कलाकार पहले टिमटिमाते और फिर चमकने लगते हैं। उनकी इस कौंध के साथ ही कंधों पर रिश्‍तेदारी उगने लगती है। न जाने कहां-कहां से परिचितों और रिश्‍तदारों की भीड़ मंडराने लगती है। होता यह है कि पहचान और नाम होते ही इन कलाकारों से इन रिश्‍तेदारों की भौतिक उम्‍मीदें बढ़ जाती हैं। उनके परिवारों के अधिकांश सदस्‍य उनकी तरह संपन्‍न और प्रभावशाली नहीं होते,इसलिए उन पर नैतिक दबाव बढ़ता है कि वे मित्रों और परिजनों की आर्थिक एवं अन्‍य मदद करें। यकीन करें बाहर से आए सभी कलाकारों को अपने परिवारों से मिले गडढोंंको भरने मेंही आधी एनर्जी और आमदनी खर्च हो जाती है। निश्चिंत होकर काम करने के बजाए उन्‍हें सभी परिजनों की अपेक्षाओं के दबाव में रहना पड़ता है। इस अपेषित दायित्‍व से उनके कंधे झ़ुकते हैं और करियर भी।

Friday, September 22, 2017

दरअसल : फिल्‍मों और फिल्‍मी दस्‍तावेजों का संरक्षण



दरअसल....
फिल्‍मों और फिल्‍मी दस्‍तावेजों का संरक्षण
-अजय ब्रह्मात्‍मज
कहते हैं कि रंजीत मूवीटोन के संस्‍थापक चंदूलाल शाह जुए के शौकीन थे। जुए में अपनी संपति गंवाने के बाद उन्‍हें आमदनी का कोई और जरिया नहीं सूझा तो उन्‍होंने खुद ही रंजीत मूवीटोन में आग लगवा दी ताकि बीमा से मिले पैसों से अपनी जरूरतें पूरी कर सकें। हमें आए दिन समाज में ऐसे किस्‍से सुनाई पड़ते हैं,जब बीमा की राशि के लिए लोग अपनी चल-अचल संपति का नुकसान करते हैं। हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री में ऐसी अनेक कहानियां प्रचलित हैं। मेहनत और प्रतिभा से उत्‍कर्ष पर पहुंची प्रतिभाएं ही उचित निवेश और संरक्षण की योजना के अभाव में एकबारगी सब कुछ गंवा बैठती हैं। कई बार यह भी होता है कि निर्माता,निर्देशक और कलाकारों के वंशज विरासत नहीं संभाल पाते। वे किसी और पेशे में चले जाते हैं। बाप-दादा के योगदान और उनकी अमूल्‍य धरोहरों का महत्‍व उन्‍हें मालूम नहीं रहता। वे लगभग मुक्‍त होने की मानसिकता में सस्‍ती कीमतों या रद्दी के भाव में ही सब कुछ बेच देते हैं। 
पिछले दिनों राज कपूर निर्मित आर के स्‍टूडियो में आग लग गई। इस आग में स्‍टेज वन जल कर खाक हो गया। इस स्‍टेज पर स्‍वयं राज कपूर,मनमोहन देसाई और सुभाष घई ने अनेक फिल्‍मों की शूटिंग की थी। आग लगने के बाद ऋषि कपूर ने सही ट्वीट किया था कि स्‍टूडियों तो फिर से बन जागा,लेकिन राज कपूर की फिल्‍मों से जुड्री सामग्रियों और कॉस्‍टयूम नहीं लाए जा सकते। यह एक ऐसी क्षति है,जिसकी कीमत रूपयों में नहीं आंकी जा सकती। मुमकिन है कि फिल्‍म देख कर हम फिर से वैसे कॉस्‍ट्यूम तैयार कर ले,लेकिन उनमें मौलिक होने का रोमांस और एहसास कहां से भरेंगे? इस नुकसान के लिए एक हद तक कपूर खानदान जिम्‍मेदार है। आरके स्‍टूडियो की संपत्ति और धरोहरों पर उनका मालिकाना अधिकार है। उनके रख-रखाव और संरक्षण की भी जिम्‍मेदारी उनकी थी। मैंने खुद आरके स्‍टूडियों में सामग्रियों के संरक्षण का बदहाल इंतजाम देखा है। वहां के स्‍टूडियो फ्लोर किराए पर दिए जाते थे,लेकिन उनकी सुरक्षा की समुचित व्‍यवस्‍था नहीं थी। लापरवाही तो रही है। इसके लिए फिल्‍म बिरादरी और राष्‍ट्रीय फिल्‍म अभिलेखागार के अधिकारियों को ठोस कदम उठाने होंगे। ऐसे नियम-कानून बनाने होंगे,जिनके तहत सरकरी संस्‍थाएं फिल्‍मी हस्तियों से जुड़ी सामग्रियों का अधिग्रहण कर सकें।
भारतीय राष्‍ट्रीय फिल्‍म अभिलेखागार पुणे में स्थित है।  इसके राष्‍ट्रीय फिल्‍म विरासत मिशन के तहत दुर्लभ फिल्‍म और गैर फिल्‍मी सामग्रियों का संरक्षण किया जाता है। इस मिशन का लक्ष्‍य परिरक्षण,संरक्षण्‍,डिजिटिलीकरण और देश की समृद्ध फिल्‍म सामग्रियों का जतन करना है। सोरे लक्ष्‍य और उद्देश्‍य कागजी रह गए हैं। मैंने पाया है कि फिल्‍म इंडस्‍ट्री के नामवर और सक्रिय सदस्‍य भी राष्‍ट्रीय अभिलेखागार की मौजूदगी और कार्य से वाकिफ नहीं हैं। अधिकांश निर्माताओं का यह भी नहीं मालूम कि कायदे से उन्‍हें अपनी फिल्‍म का एक प्रिट वहां भेज देना चाहिए। फिल्‍मों से संबंधित अन्‍य सामग्रियों और दस्‍तावेजों को संभालने के लिए उन्‍हें दे देना चाहिए। अभी तो शिवेंद्र सिंह ड़गरपुर ने निजी कोशिश से फिल्‍म हेरिटेज का काम शुरू किया है। प्राण के परिवार ने उन्‍हें प्राण से संबंधित सारी सामग्रियां सौंप दी हैं। शिवेंद्र सिंह ड़ंगरपुर ने फिल्‍म विरासत के संरक्षण का महती कार्य अपने हाथों में लिया है। अभी उनके जैसे दर्जनों व्‍यक्तियों की जरूरत है जो देश में बिखरी विरासत को समेट सकें।
इसके साथ ही हमें अपने इतिहास के प्रति जागरूक होना होगा। भविष्‍य के लिए अतीत का जाना हमेशा जरूरी होता है। जो समाज अपने अतीत का संरक्षण नहीं कर सकता,उसका कोई भविष्‍य नहीं हो सकता। हमें फिल्‍म निर्माताओं को यह तमीज सिखानी होगी कि वे अपनी ही चीजों की कीमत समझें और उनके संरक्षण पर ध्‍यान दें। पहली फिल्‍म से ही जरूरी सामग्रियों का दस्‍तावेजीकरण आरंभ कर दें। नौ साल,पच्‍चीस साल या पचास साल पूरे होन पर करोंड़ों की पार्टी करने से बेहतर है कि लाखों खर्च कर यादों को बचा लें। आनेवाली पीढि़यों की जरूरतों का खयाल करें। साथ ही खुद के लिए अमरता हासिल करें।

Friday, September 8, 2017

दरअसल : चाहिए नई कहानियां



दरअसल..
चाहिए नई कहानियां
-अजय ब्रह्मात्‍मज
हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री में नई कहानियों की कमी है। गौर करें तो पायेंगे कि जब भी किसी नए विषय पर ठीक-ठाक फिल्‍म आती है तो दर्शक उसे पसंद करते हैं। वे ऐसी फिल्‍मों को समर्थन देते हैं। हम ने धारणा बना ली है कि दर्शक तो एक ही प्रकार की फिल्‍में पसंद करते हैं। उन्‍हें केवल मसाला फिल्‍में चाहिए। यह प्रयोग से बचने का आसान तरीका है। इसकी आड़ में निर्माता-निर्देशक अपनी मीडियोक्रिटी छिपाते हैं। देखते ही देखते कल के अनेक मशहूर निर्देशक अप्रासंगिक हो गए है। उन्‍होंने खुद को नही बदला। कुछ नया करना चाहा तो भी अपनी सहज शैली से बाहर नहीं निकल सके। उनके लिए सबसे मुश्किल है कि नए विषय के महत्‍व और प्रभाव को समझ पाना। उन्‍हें लगता रहता है कि अगर दृश्‍य संरचना और चरित्र चित्रण में अपनी शैली छोड़ दी तो हस्‍ताक्षर मिट जाएगा।
फिल्‍म इंडस्‍ट्री के स्‍थापित और मशहूर लेखक भी एक-दो फिल्‍मों के बाद अपने लेखन के फार्मूले में फंस जाते हैं। उनसे यही उम्‍मीद की जाती है कि वे पिछली सफलता दोहराते रहें। अगर उनके बीच से कोई नया प्रयोग करना चाहे या नई कथाभूमि की तलाश करे तो उसे हताश किया जाता है। इस प्रवृति के शिकार वैसे लेखक भी होते हैं,जो अपनी पहली फिल्‍म लिख रहे हों। वे प्रचलन और फैशन को फॉलो करते हैं। उन्‍हें लगता है कि वे नकल से ही अपनी जगह बना सकेगे। क्रिएटिव फील्‍ड में मशहूर और लोकप्रिय प्रतिभाओं की नकल नई बात नहीं है। कला के सभी क्षेत्रों में यह आम चलन है। सीखने का यही मूल है कि हम नकल करें। इसकी शुरूआत तो अक्षर ज्ञान और लेखन से ही हो जाती है।अक्षर ज्ञान के बाद निरंतर अभ्‍यास से हम लिखावट हासिल करते हैं। वही हमारी भिन्‍नता है। अभी स्‍माट फोन और कीबोर्ड के चलन ने लिखावट की भिन्‍न्‍ता का एहसास खत्‍म कर दिया है। हम लिखने के बजाए टाइप करने लगे हैं। यकीन करें इससे लेखन प्रभावित हुआ है। कल्‍पना और विचारों की सरणि टाइपिंग की नहर में नहीं समा पाती।
अभी नई कहानियां की डिमांड सबसे ज्‍यादा है। हिंदी फिल्‍मों के स्‍थापित घराने और कारपोरेट हाउस लेखन की इस जरूरत को खूब समझ रहे हैं। वे अने तई काशिश भी करते हैं। आए दिन विभिन्‍न शहरों में स्क्रिप्‍ट राइटिंग के वर्कशॉप चल रहे हैं। मुंबई के अनेक फिल्‍म लेखक इस शैक और शगल में शामिल हैं। वे स्क्रिप्‍ट लेखन की तकनीक बांट और सीखा रहे हैं। और इन दिनों तो फिल्‍म लेखन सीखने के लिए ऑन लाइन सुविधाएं आ गई हैं। ऐसे अनेक फिल्‍म साइट हैं,जहां से आप बेहतरीन फिल्‍मों की स्क्रिप्‍ट पढ़ सकते हैं। उन्‍हें डाउनलोड कर सकते हैं। अफसोस यही है कि यह सब कुछ अंग्रेजी में है। भाष एक बड़ी दिक्‍कत है। हिंदी फिल्‍मों में अंगेजी की अनिवार्यता ने भी नई प्रतिभाओं को फिल्‍मों में आने से रोका है। सरकार के समर्थन से चल रही संस्‍थाओं और कारपोरेट हाउस में अंग्रेजी में ही स्क्रिप्‍ट ली जाती है। इस बड़ी बाधा को दूर किए बिना हिंदी फिल्‍मों के लिए नई स्क्रिप्‍ट की मांग बेमानी हो जाती है। बड़ी संस्‍‍थाओं को अपने यहां ऐसे जानकारों की नियुक्ति करनी होगी,जो भारतीय भाषाओं को समझते हो।
इसके साथ नए लेखकों को भी अपनी जिद छोड़नी होगी। वे अंग्रेजी सीखने और उसकी कामचलाऊ जानकारी रखने से भी परहेज करते हैं। लिखने के लिए नहीं,लेकिन फिल्‍म इंडस्‍ट्री के व्‍यक्तियों से संपर्क और व्‍यवहार के लिए तो अंग्रेजी सीख लेनी चाहिए। जैसे हम दूसरे देशों और क्षेत्रों में जाने पर वहां की स्‍थानीय भाषा और शब्‍दावली सीखते हैं,वैसे ही फिल्‍मों की दुनिया में आने और काम पाने के लिए अंग्रेजी सीखनी होगी। ऐसा है तो है। इस अड़चन को ख्‍त्‍म करते ही आप पाएंगे कि आप की नई कहानियों के गा्रहक दोड़े चले आ रहे हैं।

Friday, September 1, 2017

दरअसल : वेब सीरीज का दौर



दरअसल...
वेब सीरीज का दौर
-अजय ब्रह्मात्‍मज
चौदह साल पहले अमेरीका में बर्नी बर्न्‍स ने सबसे पहले वेब सीरीज के बारे में सोचा। तब इस नाम का खयाल नहीं आया था। उन्‍होंने एक कॉमिकल साइंस फिक्‍शन की कल्‍पना की,जिसमें रेड और ब्‍लू टीमों की टक्‍कर होती है। उन्‍होंने इसे अपने वेब साइट रुस्‍टर टीथ से प्रसारीत किया। इसकी पॉपुलैरीटी ने टीवी और सिनेमा में कार्यरत क्रिएटिव दिमागों को एक नई विधा से परीचित कराया। ये शो इंटरनेट के जरीए अपनी सुविधा से देखे जा सकते थे। धीरे-धीरे वेब सीरीज का चलन बढ़ा। अब तो नेट फिल्‍क्‍स और एमैजॉन जैसे इंटरनेशनल प्‍लेटफार्म आ गए हैं,जो दुनिया भर के शो पूरी दुनिया में पहुंचा रहे हैं। यकीन करें ये शो सभी देशों में प्रचलित टीवी और फिल्‍मों के दर्शक और बिजनेश ग्रस रहे हैं।
अपने देश में वेब सीरीज 12 सालों के बाद पहुंचा। इसने देर से धमक दी,लेकिन देखते ही देखते इसका प्रसार दर्शकों और निर्देशकों के बीच तेजी से हुआ। अभी जिसे देखो,वही वेब सीरीज के लेखन और निर्माण में संलग्‍न है। आम चर्चा का विषय है वेब सीरीज। टीवी और फिल्‍मों के साथ वेब सीरीज की योजनाएं बन रही हैं। छोटी-बड़ी कंपलनयां वेब सीरीज के लिए कहानियों आम्‍र लेखकों की तलाश में हैं। समस्‍या यह है कि भारत में हर विधा की तरह इसमें भी एक हड़बड़ी दिखाई दे रही है। कोई भी प्रोडक्‍शन हाउस उचित तैयारी और संभावनाओं के साथ नहीं आ रही है। टीवी और फिल्‍म के कांसेप्‍ट वेब सीरीज में तब्‍दील किए जा रहे हैं। फिल्‍म नहीं बन पा रही है तो उसी कहानी के टुकड़े कर वेब सीरीज में ढाल दिया जा रहा है। इधर नेट फिल्‍क्‍स और एमैजॉन की पहल और रुचि से ओरीजिनल आइडिया भी आए हैं। लगभग हर कोई इन इंटरनेशनल प्‍लेटफार्म पर आने को बेताब है।
माना जाता है कि देश में लगभी 40 करोड़ इंटरनेट यूजर हैं। इनमें से अधिकांश ऑन लाइन रहते हैं। मुख्‍य रूप से शहरों के युवा समूह पारंपरीक हिंदी फिल्‍मों और टीवी शो को दरकिनार कर वेब सीरीज को तरजीह दे रहे हैं। दो साल पहले तक सब कुछ फ्री चल रहा था। अब वे उसी के लिए पैसे भी खर्च कर रहे हैं। एक रकम देने के बाद उन्‍हें देश-विदेश के तमाम शो देखने के लिए मिल जाते हैं। इन दिनों अधिकांश शहरी दर्शक वेब सीरीज की चर्चाओं में निमग्‍न मिलते हैं। कस्‍बों और छोटे शहरों की महिलाएं टीवी सोप की कहानियां में डूबी रहती हैं। शहरी युवक-युवतियों का प्रिय शगल गेम ऑफ थ्रोन्‍स,हाउस ऑफ कार्ड्स जैसे वेब सीरीज की खूबियों पर जिरह करना है।
गौर करें तो वेब सीरीज के दर्शक मुख्‍य रूप से शहरी हैं। उनके पास अनलिमिटेड इंटनेट सुविधाएं हैं। वे कुछ सालों पहले से इंटरनेट सैवी हो चुके हें। उनके सारे काम ऑन लाइन ही होते हैं। फुर्सत मिलते ही वे ऐसे शो देखने लगते हैं। देखा जा रहा है कि शहरों के युवा दर्शक पर्सनल व्‍यूइंग अधिक एंज्‍वॉय कर रहे हैं। फिल्‍मों की सामूहिक दर्शकता छीज रही है। यहां तक कि परीवार के सभी सदस्‍यों के साथ बैठ कर टीवी देखने की आदत भी खत्‍म हो रही है। शहरों के परीवारो में एक से अधिक टीवी आने से सभी अपने कमरे में कैद हो रहे हैं। स्‍मार्ट फोन की लोकप्रियता और इंटरनेट सेवाओं के दर में आई कमी से भी इंटरनेट यूजर बढ़ रहे हैं।
दिक्‍कत यही है कि किसी प्रकार की पांबंदी और हदबंदी नहीं रहने से ज्‍यादातर एडल्‍ट कंटेंट ही वेब सीरीज में आ रहे हैं। वेब सीरीज के सिर्फ नाम ही देखें तो ये ज्‍यादातर अंग्रेजी में हैं। साथ ही उनमें सेक्‍स,रोमांस,विवाहेतर संबंध जैसे विषय और शहरों के बेचैन युवा ही किरदार हैं। कोशिश है कि विदेशी कंटेंट में भारतीय छौंक लगा कर पेश कर दिया जाए। देखना रोचक होगा कि 2018 में वेब सीरीज किस रूप में विकसित और प्रचलित होगा। अब तो इसमें कुछ देसी प्‍लेयर भी अपनी पैठ बना रहे हैं।

Monday, August 28, 2017

दरअसल : सृजन और अभिव्‍यक्ति की आजादी



दरअसल...
सृजन और अभिव्‍यक्ति की आजादी
-अजय ब्रह्मात्‍मज

ठीक चार महीने पहले भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा गठित श्‍याम बेनेगल की अध्‍यक्षता में गठित कमिटी ने अपनी रिपोर्ट दे दी थी। सीबीएफसी(सेट्रल फिल्‍म सर्टिफिकेशन बोर्ड) की कार्यप्रणाली और प्रमाणन प्रिया में सुधार के लिए गठित इस कमिटी में श्‍याम बेनेगल के साथ कमल हासन,राकेश ओमप्रकाश मेहरा,पियूष पाडे,भावना सोमैया,गौतम घोष,नीना लाठ और के संजय मूर्ति थे। कमिटी की छह बैठकें हुईं। कमिटी ने फिल्‍म से संबंधित संस्‍थाओं,संगठनों और जिम्‍मेदार व्‍यक्तियों से सलाह मांगी थी। एनएफडीसी के सहयोग से आम दर्शकों के साथ भी विमर्श हुआ। उनकी रायों पर भी विचार किया गया। मिली हुई सलाहों के परिप्रेक्ष्‍य में सीबीएफसी की वर्तमान संरचना,कार्यप्रणाली और प्रमाणन प्रकिया पर हर पहलू से विचार-विमर्श करने के बाद कमिटी ने अपनी रिपोर्ट सौंपी।
सीबीएफसी को बोलचाल की भाषा में सेंसर बोर्ड कह दिया जाता है। यही चलन में है। आम धारणा है कि सेंसर बोर्ड का काम रिलीज हो रही फिल्‍मों को देखना और जरूरी कांट-छांट बताना है। फिल्‍म सर्किल में भी सेंसर शब्‍द ही प्रचलित है। सर्टिफिकेशन को सेंसर समझने की वजह से कई स्‍तरों पर चूकें होती रही हैं। दूसरी तरफ पिछले महीनों में हुए विवादों में सर्टिफिकेशन के उन्‍नेख और चर्चा से यह भ्रामक धारणा भी बनी कि सीबीएफसी किसी ीाी सूरत में काट-छांट की सलाह नहीं दे सकती। सभी दसिनैमेटोग्राफ एकट 1952 का उल्‍लेख करते हैं और कहते हैं कि यह 65 साल पुराना हो गया है। इसे अंग्रेजों के समय से चले आ रहे सिनेमैटोग्राफ एक्‍ट के आधार पर बनाया गया था। गौर करें तो ज्‍यादातर एक्‍ट अंग्रेजों के समय के जारी एक्‍ट के ही परिवर्द्धि और संशोधित रूप हैं। सीबीएफसी की कार्यप्रणाली और प्रमाणन प्रकिया में उसके बाद आए द सिनेमैटोग्राफ एक्‍ट(सर्टिफिकेशन),1983 और 1991 में केंद्रीय सरकार द्वारा जारी दिशानिर्देशों का भी पालन किया जाता है। 1991 के दिशानिर्देश में स्‍पष्‍ट लिखा गया है कि हिंसा,सेक्‍स,डिस्क्रिमिनेशन आदि के दृश्‍यों में काट-छांट के निर्देश दिए जा सकते हैं। गौर करें तो पिछले अध्‍यक्ष और उसके पहले के अध्‍यक्ष इन नियमों की सुविधानुसार व्‍याख्‍या कर छूट देते  और काट-छांट करते रहे हैं।
श्‍याम बेनेगल कमिटी ने सभी पहलुओ ंपर विचार किया है। कमिटी ने स्‍पष्‍ट सलाह दी है कि सृजन और अभिव्‍यक्ति की पूरी आजादी सभी को मिलनी चाहिए। फिल्‍मों में किसी प्रकार की काट-छांट की सलाह देना वास्‍तव में सृजनकार(फिल्‍मकार) पर अंकुश लगाना है। सीबीएफसी मोरल कंपास की भूमिका नहीं निभा सकता। यह उसका काम भी नहीं है। उन्‍होंने 1991 में दिए पांच दिशानिर्देशों पर फिर से विचार करने की सलाह दी है। समय के साथ उन्‍हें बदलने या उनकी नई व्‍याख्‍या की जरूरत है। सामाजिक बदलाव के अनुरूप ही मूल्‍य और मानक तय किए जा सकते हैं। उन्‍होंने यह भी सलाह दी है कि डायरेक्‍ट कट यानी फिल्‍म की मूल प्रति नेशनल फिल्‍म आर्काइव में रखी जानी चाहिए। प्रमाणन की जरूरतों और हिदायतों की वजह से फिल्‍में मूल स्‍वरूप में रिलीज नहीं हो पातीं। इसके अलावा कमिटी ने शोध और अध्‍ययन की सलाह दी है कि समूह और अकेले में फिल्‍में देखने का व्‍यक्ति असर किस रूप में भिन्‍न होता है या नहीं होता है।
अभी सारी फिल्‍में चार श्रेणियों में प्रमाणित की जाती हैं। U,UA,A और S(विशेष समूह के लिए)... अभी अधिकांश निर्माताओं की कोशिश अपनी फिल्‍म को U या UA श्रेणी में लाने की रहती है। इसी के लिए उन्‍हें कोट-छांट की सलाह दी जाती है। श्‍याम बेनेगल कमिटी ने प्रमाणन की UA और A श्रेणियों को दो उपश्रेणियों में बांटने की सलाह दी है। UA12+ और UA15+ तथा A और A-C ...पहली उपश्रेणियां 12 और 15 ाशय साल के दर्शकों को ध्‍यान में रख कर की गई है। A तो स्‍पष्‍ट है। A-C  से आशय  A(कॉशन) है...यानी इस झेणी के दर्शक सचेत रहें कि फिल्‍म में हिंसा और सेक्‍स की मुखरता होगी।
अगर श्‍याम बेनेगल कमिटी की रिपोर्ट पर हूबहू अमल होता है तो यह भारतीय फिल्‍मों के प्रमाणन में बड़ी क्रांति होगी।

Monday, August 14, 2017

दरअसल : यंग एडल्‍ट के लिए फिल्‍में



दरअसल...
यंग एडल्‍ट के लिए फिल्‍में
-अजय ब्रह्मात्‍मज
बृजमोहन अमर रहे,अभी और अनु,आश्‍चर्यचकित,अज्‍जी,नोबलमैन,द म्‍यूजिक टीचर,कुछ भीगे अल्‍फाज,हामिद... उन कुछ फिल्‍मों के नाम हैं,जो अगले महीने से हर महीने रिलीज होंगी। योजना है कि दर्शकों तक ऐसी फिल्‍में आएं,जो कथ्‍य के स्‍तर पर गंभीर हैं। कुछ कहना चाहती हैं। अच्‍छी बात है कि इन सारी फिल्‍मों की योजना 18 से 30 साल के दर्शकों को धन में रख कर बनाई गई है। एक सर्वे के मुताबिक पहले दिन फिल्‍म देखने आए दर्शकों में से 64 प्रतिशत की उम्र 24 साल से कू होती है। सिनेमाघरों में युवा दर्शक जाते हैं। इस समूह के दर्शक विश्‍व सिनेमा से परिचित हैं। अगर उन्‍हें फिल्‍म पसंद नहीं आती है तो बड़े से बड़े लोकप्रिय सितारों की भी फिल्‍में बाक्‍स आफिस पर औंधे मुंह गिरती हैं।
ऊपर उल्लिखित सभी फिल्‍मों का निर्माण यूडली फिल्‍म्‍स कर रही है। यूडली फिल्‍म्‍स मूल रूप से सारेगाम म्‍यूजिक कंपनी की नई फिल्‍म निर्माण कंपनी है। एक अर्से की खामोशी के बाद फिल्‍म निर्माण में सारेगामा का उतरना अच्‍छी खबर है। हिंदी फिल्‍में हमेश एण्‍क संक्राति से दूसरी संक्राति के बीच रहती है। उसी के दरम्‍यान कुछ नया करने के उद्देश्‍य से कोई आता है। विषय,प्रस्‍तुति और मनोरंजन की नई बयार दर्शकों को भी राहत देती है। उन्‍हें कुछ नया मिलता है। बाहुबली और दंगल जैसी फिलमें रोजाना नहीं बन सकतीं। जरूरत है कि सीमित बजट और मझोले स्‍टारडम के एक्‍टरों को लकर फिल्‍में आएं। दर्शकों को मनोरंजन मिले तो वे ऐसी फिल्‍मों को सपोर्ट करते हैं। जैसे कि तमाम लोकप्रिय सितारों के बीच अभी शुभ मंगल सावधान और बरेली की बर्फी उम्‍मीद की हिलारें दे रही हैं।
मनोरंजन के क्षेत्र में माना जा रहा है कि यंग एडल्‍ट(युवा वयस्‍क) को धन में रख कर फिल्‍में नहीं बन रही हैं। मेनस्‍ट्रीम हिंदी सिनेमा की खुराक से बड़े हुए दर्शकों को पारंपरिक शैली में आ रही फार्मूला फिल्‍में अच्‍छी लगती हैं। वे उनसे खुश हैं। बच्‍चों को टीवी से किड्स शो मिल जाते हैं। समस्‍या यंग एडल्‍ट की है। हिंदी फिल्‍मों की प्‍लानिंग में यह समूह नदारद है,जबकि आज वही हिंदी फिल्‍मों का पहला दर्शक है। यूडली फिल्‍म्‍स की कोशिश है कि इन दर्शकों की संवेदनाओं और अपेक्षाओं की कहानी दिखाई जाए। तात्‍पर्य यह है कि उनकी सोच और जरूरतों को प्रमुखता दी जाए। हिंदी सिनेमा के अभाव में वे तेजी से से ओटीटी कंटेंट(ओवर द टॉप कंटेंट) की ओर भाग रहे हैं। ओटीटी कंटेंट में इंटरनेट के लिए निर्मित और जारी शोज आते हैं। एमेजॉन और नेटफिल्‍क्‍स इस श्रेणी के बड़ प्‍लेयर के रूप में उभरे हैं।
कोशिश है कि युवा दर्शकों को यूथ रियलिज्‍म की फिल्‍में दी जाएं। यूडली फिल्‍म्‍स फिलहाल हर साल 12 से पंद्रह फिल्‍में बनाने की सोच रही है। सिनेमाघरों में इन फिल्‍मों के आते ही अन्‍य प्रोडक्‍शन हाउस भी ऐसी फिल्‍मों की तैयारी करेंगे। यों लग रहा है कि 2018 का नया ट्रेड युवा दर्शकों की फिल्‍में होंगी। ये फिल्‍में अधिकतम दो घंटे की अवधि की होगी। भाषा की हदें तोड़ कर यह भी कोशिश की जा रही है कि फिल्‍म के विरूाय और परिवेश के अनुरूप भाषा रखी जा और उसे सभी भाषाओं के दर्शकों के बीच ले जाया जाए। हिंदी के दर्शकों के बीच तो लाया ही जाएं। वैसे भी बाहुबली ने जता दिया है कि कंटेंट दमदार हो तो भाषा दीवार नहीं बन सकती। संगीतप्रेमियों को इन फिल्‍मों के जरिए सारेगामा के बैंक से पुरानी फिल्‍मों के गाने मूल या कवर के रूप में देखने-सुनने को मिल सकते हैं।
युवा दर्शकों के लिए फिल्‍में बदलने को तैयार हैं। उनकी रुचि और क्रय श्‍क्ति की वजह से ही यह बदलाव हो रहा है।

Friday, August 4, 2017

दरअसल : खानत्रयी का आखिरी रोमांटिक हीरो



दरअसल....
खानत्रयी का आखिरी रोमांटिक हीरो
-अजय ब्रह्मात्‍मज
दोनों पैरों के बीच खास दूरी बना कर ऐंठते हुए वे जब अपनी बांहों को फैला कर ऊपर की ओर उठाते हैं तो यों लगता है कि वे पूरी दुनिया को उसमें समोने के लिए आतुर है। उनका यह रोमांटिक अंदाज ै।इतना पॉपुलर है कि कोई भी निर्देशक इसे दोहराने से नहीं बचता। शाह रूख खान भी सहर्ष तैयार हो जाते हैं। अब तो इवेंट और शो में भी उनसे फरमाईश होती है कि इस क्‍लासिक रोमांटिक अंदाज में वे अपनी तस्‍वीर उतारने दें। गौर करेंगे इस पोज में वे दायीं तरफ देख रहे होते हैं और कैमरा भी दायीं तरफ ही रहता हैं। उनके होंठो पर आकर्षक टेढ़ी मुस्‍कान रहती है। वे खुली बांहों से सभी को निमंत्रण दे रहे होते हैं। अब तो उनकी मिमिक्री कर रहे कलाकार भी उनके इस अंदाज से वाहवाही बटोर लेते हैं।
आज रिलीज हो रही जब हैरी मेट सेजल में इम्तियाज अली ने अगर उनके इस अंदाज को दोहराया होगा तो कोई जुर्म नहीं किया होगा। दर्शक तो मुग्‍ध ही होंगे। जब हैरी मेट सेजल रोमांटिक फिल्‍म होने का अहसास दे रही है। वैसे भी शाह रुख खान कह ही चुके हैं कि इम्तियाज अली नए जमाने के यश चोपड़ा हैं। स्‍टार ने डायरेक्‍टर को सर्टिफिकेट दिया। और डायरेक्‍टर ने फिर से स्‍टार को रोमांटिक किरदार दिया। अब देखना है कि इस किरदार को देख कर दर्शक कितने खुश होंगे और प्रशंसक पागल... खानत्रयी(आमिर,शाह रुख और सलमान) में अब अकेले शाह रुख खान ही रोमांटिक लीड कर रहे हैं। अपनी हीरोइनों के लिए रोमांटिक गाने गा रहे हैं। रईस जैसी फिल्‍म में भी जालिमा का सीक्‍वेंस फिट कर दिया। हालांकि उसकी वजह से फिल्‍म फिसल गई। बहरहाल,जब हैरी मेट सेजल में ऐसी फिसलन की संभावना नहीं है। इम्तियाज और शाह रूख दोनों ही पूरे कंफीडेंट दिख रहे हैं।
आमिर खान ने सन् 2000 के बाद से ही अपनी राह बदल ली। बीच की कुछ फिल्‍मों में वे रोमांस करते दिखे,लेकिन उन्‍हें प्‍योर रोमांटिक फिल्‍में नहीं कहा जा सकता। आमिर खान ने अपनी सीमाओं को वक्‍त से पहचान नलया और समय रहते दिशा बदल दी। अपनी अपारंपरिक फिल्‍मों से उन्‍होंने साबित किया कि दर्शकों की नब्‍ज पर उनका हाथ है। उनकी पिछली फिल्‍में निरंतर कीर्तिमान स्‍थपित कर रही हैं। पिछली फिल्‍म दंगल की कामयाबी ने तो नया मानदंड तय कर दिया। सलमान खान भी पहले की तरह रोमांटिक और कॉमेडी फिल्‍में नहीं कर रहे हैं। कबीर खान के निदेशन में आई उनकी बजरंबी भाईजान और ट्यूबलाइट वे भी बदलने को तैयार हैं। उनकी पारंपरिक फिल्‍मों में भी रोमांस का प्रतिशत लगातार कम होता जा रहा है। निकट भविष्‍य में आ रही उनकी फिल्‍मों में रोमांस की उम्‍मीद नहीं दिखती। यों अप्रत्‍याशित व्‍यवहार और पहल के लिए मशहूर सलमान खान के बारे में स्‍पष्‍ट रा नहीं बनाई जा सकती। फिर भी सलमान खान अपने एक प्रतिद्वंद्वी शाह रूख खान की राह पर लौटते नहीं दिखाई दे रहे।
सचमुच,शाह रूख खान खानत्रयी के आखिरी रोमांटिक हीरो रह गए हैं। कहा तो जा रहा है कि वे अपनी रोमांटिक इमेज में कैद हो गए हैं। कुंदन शाह की राय में शाह रूख खान दुखी और उदास किरदारों में अधिक जंचते,लेकिन कभी हां,कभी ना की हद से वे निकल गए। रोमांटिक हीरो बने। अब उन्‍हें जल्‍दी ही खुद को रीइन्‍वेंट करना चाहिए। वर्ना उनकी गति पिछली सदी के अंतिम दशक के अमिताभ बच्‍चन जैसी हो सकती है। दर्शक उन्‍हें रिजेक्‍ट कर सकते हैं। उनकी पिछली फिल्‍मों की कम कामयाबी संकेत दे रही है। फिलहाल आमिर और सलमान से वे फिल्‍मों के बिजनेश के मामले में पिछड़ गए हैं। यह भी जाहिर है कि इस से उनके स्‍टारडम में अधिक फर्क नहीं पड़ा है। फिर भी जब हैरी मेट सेजल जरूरी चमत्‍कार उसे उन्‍हें आमिर खान और सलमान खान के समकक्ष ला सकती है।

Friday, July 28, 2017

दरअसल : ट्रेलर और गानों के व्‍यूज की असलियत



दरअसल...
ट्रेलर और गानों के व्‍यूज की असलियत
-अजय ब्रह्मात्‍मज

आए दिन रिलीज हो रही फिल्‍म के निर्माता और अन्‍य संबंधित निर्देशक व कलाकार सोशल मीडिया पर बताते रहते हैं कि उनके ट्रेलर और गानों को इतने लाख और करोड़ व्‍यूज मिले। तात्‍पर्य यह रहता है कि उक्‍त ट्रेलर या गाने को संबंधित स्‍ट्रीमिंग चैनल पर उतनी बार देखा गया। ज्‍यादातर स्‍ट्रीमिंग यूट्यूब के जरिए होती है। व्‍यूज यानी दर्शकता बताने का आशय लोकप्रियता से रहता है। यह संकेत दिया जाता है कि रिलीज हो रही फिल्‍म के ट्रेलर और गानों को दर्शक पसंद कर रहे हैं। इससे निर्माता के अहं की तुष्टि होती है। साथ ही फिल्‍म के पक्ष में माहौल बनाया जाता है। दर्शकों को तैयार किया जाता है। लुक,टीजर,ट्रेलरऔर गानों को लकर ऐसे दावे किए जाते हैं। आम दर्शकों पर इसका कितना असर होता है? क्‍या वे इसके दबाव में फिल्‍म देखने का मन बनाते हैं? अभी तक कोई स्‍पष्‍ट अध्‍ययन या शोध उपलब्‍ध नहीं है,जिससे व्‍यूज और दर्शकों का अनुपात तय किया जा सके। सफलता का अनुमान किया जा सके।
टीजर,ट्रेलर या गाने आने के साथ फिल्‍म से जुड़े सभी व्‍यक्ति सोशल मीडिया पर एक्टिव हो जाते हैं। वे ट्वीट और रीट्वीट करने लगते हैं। उनके नुमांइदे मीडियाकर्मियां से आग्रह करते हैं वे उनके बो में ट्वीट करें। साथ ही टीजर,ट्रेलर और गानों के लिंक भी दें। फिल्‍मी हस्तियों के गुडबुक में बने रहने या निकटता पाने की लाासा और भ्रम में अनेक मीडियकर्मी फिल्‍म यूनिट के सदस्‍यों से अधिक सक्रियता दिखाते हैं। ने तरीफ के शब्‍दों के साथ उक्‍त्‍टीजर,ट्रेलर और गाने के लिंक ट्वट कर देते हैं। यह एक ऐसी नादानी है,जिसमें फिल्‍मों और फिल्‍म के निर्माताओं का सीधा फायदा होता है। मीडियाकर्मी अप्रत्‍यक्ष प्रचारक बन जाते हैं। उन्‍हें पता भी नहीं चलता और वे फिल्‍म की कमाई में सहायक हो जाते हैं। अगर आप के ट्वीट की वजह से आपके फॉलोअर उक्‍त वीडियो को देखते हैं तो कहीं न कहीं रूट्रीमिंग नेटवर्क से मिल रही कमाई में आप का योगदान हो जाता है। एक तरीके से मीडियाकर्मी रिटेलर की भूमिका में आ जाते हैं। अब कुछ मीडियकर्मियों की समझ में यह बात आई है तो उनकी सक्रियता कम हुई है। 

उचित तो यह होगा कि जिस फिल्‍म ,फिल्‍मकार या कलाकार के काम में विश्‍वास हो और उसे सपोर्ट करने का मन करे तो हमें अवश्‍य लिंक के साथ ट्वीट या रीट्वीट करना चाहिए। सिर्फ सराहना से काम चल सकता हो तो ज्‍यादा बेहतर।यह भी रोचक तथ्‍य है कि किसी व‍ीडियो को मिली संख्‍यात्‍मक दर्शकता(व्‍यूज) वास्‍तव में दर्शकों में तब्‍दील नहीं होती। पिछले महीनों में ऐसे कई उदाहरण मिल जाएंगे,जब किसी वीडियो को करोड़ों में दर्शक मिले,लेकिन बाक्‍स आफिस पर फिल्‍म का बुरा हाल रहा। दर्शक उस फिल्‍म को देखने थिएटर नहीं गए। करोड़ो दर्शकता के वीडियो की फिल्‍म की कमाई पहले दिन करोड़ रुपयों तक भी नहीं पहुंच पाई। भारतीय राजनीति से उदाहरण लें तो किसी सभा में आई भीड़ इस बात का कतई संकेत नहीं होती कि उक्‍त उम्‍मीदवार चुनाव में जीत ही जाएगा। भीड़ की वजह उस दिन का वक्‍ता भी हो सकता है। या किसी और वजह से उस दिन की सभा में भीड़ उमड़ सकती है। यह भी ध्‍यान में रखना चाहिए कि किसी भी वीडियो को देखने के प्रत्‍यक्ष पैसे नहीं लगते। इंटरनेट या ब्रॉडबैंड के किराए में हो रहे खर्च सीधे जेब पर भारी नहीं पड़ते। अगर वीडियों के हर व्‍यू के लिए एक पैसा भी देने पड़े तो करोड़ों की दर्शकता लाखों तक भी रेंग कर पहुंचेगी। अभी तक भारत में पैसे देकर हर शो या वीडियो देखने की आदत आम नहीं हुई है।हर निर्माता और उसकी फिल्‍म यूनिट अपने प्रचारात्‍मक वीडियो की दर्शकता बढ़ा-चढ़ा कर दर्शक बटोरना चाहती है। उनकी इसचाहत को देखते हुए वीडियो स्‍ट्रीमिंग कंपनिया पैसे लेकर व्‍यूज बढ़ाने का काम करने लगी हैं। दर्शकों को छलने और झांसा देने की मुहिम जारी है।

Friday, June 23, 2017

दरअसल : भारत में जू जू,चीन में आमिर खान



दरअसल...
भारत में जू जू,चीन में आमिर खान
-अजय ब्रह्मात्‍मज
कबीर खान निर्देशित ट्यूबलाइट में चीन की अभिनेत्री जू जू दिखाई पड़ेंगी। यह पहला मौका होगा जब किसी हिंदी फिल्‍म में पड़ोसी देश की अभिनेत्री सलमान खान जैसे लोकप्रिय सितारे के साथ खास किरदार निभाएंगी। पिछले कुछ सालों से भारत और चीन के बीच फिल्‍मों के जरिए आदन-प्रदान बढ़ा है। कुछ फिल्‍मों का संयुक्‍त निर्माण हुआ है। कुछ निर्माणाधीन हैं। चीन में दंगल की कामयाबी ने हमारी तरफ से दरवाजे पर चढ़ाई गई कुंडी खोल दी है। दरवाजा खुला है। अभी तक भारत में चीनी सामानों को दोयम दर्जे के सस्‍ते प्रोडक्‍ट का का माना और मखौल उड़ाया जाता है। चीन के राष्‍ट्रपति तक ने भारत के प्रधानमंत्री से दंगल की तारीफ की। हिंदी-चीनी भाई-भाई नारे की अनुगूंज अब कहीं नहीं सुनाई पड़ती। 21 वीं सदी में दोनों देशों की सिनेमाई दोस्‍ती नई लहर के तौर पर आई है। हिंदी-चीनी सिनेमाई भाई का नारा बुलंद किया जा सकता है।
जू जू को हिंदी में झू झू और चू चू भी लिखा जा रहा है। हम दूसरे देशों की भाषा के शब्‍दों के प्रति लापरवाही की वजह से सही उच्‍चरित शब्‍द की खोज नहीं करते। हिंदी ध्‍वनि प्रधान भाष है। थोड़ी मेहनत की जाए तो हिंदी में दुनिया की हर भाषा का करीबी उच्‍चरण किया जा सकता है। बहरहाल,जू जू में एक जू उनका पारिवारिक सरनेम है। और उनके जू नाम का मतलब मोती है। मोती की चमक और शुद्धता है जू जू के व्‍यक्तित्‍व में। जू जू अगले महीने 33 साल की हो जाएंगी। चीन के पेइचिंग शहर में एक सैनिक परिवार में पैदा हुई जू जू बचपन से कलात्‍मक रुझान की हैं। उन्‍होंने छोटी उम्र में पियानो बजाना सीखा। बता दें कि चीन में लगभी सभी बच्‍चे कोई न कोई वाद्य यंत्र बजाना सीखते हैं। चीन में आर्थिक उदार नीति आने के बाद पियानो का आकर्षण बढ़ा है। सांस्‍कृतिक क्राति के दौर में पियानों जैसे वाद्य यंत्र पर पाबंदी सी लगी थी। गाने-बजाने की शौकीन जू जू भारत की अनेक प्रतिभाओं की तरह ही एक म्‍यूजिकल कंटेस्‍ट से सामने आईं। उन्‍होंने चीन में एमटीवी के शो होस्‍अ किए और अपने रुझान का दायरा बढ़ाती गईं। 2011 में आई छन तामिंग की फिल्‍म वु चिड़ न्‍वी रन सिन(औरतें क्‍या चाहती हैं) से उनके एक्टिंग करिअर की शुरुआत हुई। 2012 में उन्‍‍हें हालवुड की द मैन विद द आयन फिस्‍ट फिल्‍म मिल गई। फिल्‍मों और टीवी शो से इंटरनेशनल पहचान हासिल कर चुकी जू जू ने 2016 में ट्यूबलाइट साइन की। वह भारत आईं और उन्‍होंने हिंदी भी सीखी।
जू जू का भारत में कैसा स्‍वागत होगा? यह तो कुछ घंटों के बाद पता चल जाएगा। हिंदी-चीनी सिनेमाई भाई के संदर्भ में हाल में चीन में मिली आमिर खान की पहचान और सफलता उल्‍लेखनीय है। किसी भी भारतीय कलाकार को चीन में ऐसी कमर्शियल कामयाबी नहीं मिली थी। वैसे चीन में राज कपूर और उनकी फिल्‍म आवारा के बारे में 35-40 से अधिक उम्र के सभी नागरिक जानते हैं। अमेरिकी फिल्‍मों के प्रवेश के पहले भारतीय फिल्‍में ही चीनी दर्शकों के विदेशी मनोरंजन के लिए उपलब्‍ध थीं। उनमें राज कपूर शीर्ष पर रहे। दंगल ने आमिर खान की पहचान मजबूत कर दी है। राजकुमार हिरानी की 3 इडियट ने सबसे पहले चीनी दर्शकों को आमिर खान के प्रति आकर्षित किया। बता दें कि 2009 में आई 3 इडियट का अधिकांश चीनियों ने पायरेटेड फार्मेट में देखा। यह फिल्‍म वहां के युवकों के बीच खूब पसंद की गई। उन्‍हें रैंचो अपने बीच का ही युवक लगा था। फिर धूम 3 की रिलीज तक चीन में थिएटर का्रति आ चुकी थी। सिनेमाघरों के संख्‍या मशरूम की तर बड़ी। आमिर खन की धूम 3 को चीन में अच्‍छी रिलीज मिली। इस फिल्‍म में एक्‍शन और अदाकारी से आमिर खान से चीनी दर्शकों के दिल में जगह बना ली। उनकी पीके भी वहां पॉपुलर रही। और अब दंगल ने तो सारे रिकार्ड तोड़ दिए। अभी तो कहा जा रहा है कि चीन का हर फिल्‍मप्रेमी आमिर खान को पहचानता है। उसने दंगल देख रखी है।
जू जू और आमिर खान दोनों देशों के बीच सांस्‍कृतिक दोस्‍ती के नए राजदूत हैं। जू जू अपनी व्‍यस्‍तता की वजह से ट्यूबलाइट के प्रचार में शामिल नहीं हो सकी,लेकिन आमिर खान दंगल के लिए चीन गए थे। उम्‍मीद है कि आगे यह सहयोग और संपर्क बढ़ेगा।

Friday, June 16, 2017

दरअसल : पाकिस्‍तान जाएगा सुपर सिंह

दरअसल...
पाकिस्‍तान जाएगा सुपर सिंह
-अजय ब्रह्मात्‍मज
आज पाकिस्‍तान के आठ शहरों के 36 सिनमाघरों में अनुराग सिंह निर्देशित सुपर सिंह रिलीज होगी। दिलजीत दोसांझ और सोनम बाजवा अभिनीत सुपर सिंह एक पंजाबी सुपरहीरो की कहानी है। पंजाबी में सुपरहीरो क्रिएट करने की पहली कोशिश की गई है। पंजाबी में बनी यह फिल्‍म भारत के साथ पाकिस्‍नान में भी आज रिलीज हो रही है। एक अंतराल के बाद कोई भारतीय फिल्‍म पाकिस्‍तानी सिनेमाघरों में एक ही दिन रिलीज हो रही है। यह एक खुशखबर है,जो दोनों देशों के नागरिकों को करीब ले आएगी।
याद करें तो पिछले साल ऐ दिल है मुश्किल की रिलीज के समय भयंकर पाकिस्‍तान विरोधी माहौल था। मुंबई में एक राजनीतिक पार्टी ने खुली घोषणा कर दी थी कि अगर पाकिस्‍तानी कलाकार फवाद खान को भारत बुलाया गया तो हंगामा होगा। तब महाराष्‍ट्र के मुख्‍यमंत्री ने निर्देशक करण जौहर और उक्‍त पार्टी के नेता के बीच मध्‍यस्‍थता की थी। उसके बाद दो हिंदी फिल्‍में आईं,जिनमें पाकिस्‍तानी कलाकार माहिरा खान और सबा कमर थीं। उन फिल्‍मों को लेकर कोई हंगामा नहीं हुआ। सबा कमर की फिल्‍म हिंदी मीडियम को हिंदी दर्शकों ने खूब पसंद किया। दर्शकों के जहन में यह बात भी नहीं आई कि इरफान की बीवी बनी अभिनेत्री पाकिस्‍तान की है। सबा कमर ने अंग्रेजी की ग्रंथि से पीडि़त बीवी का किरदार शानदार और विश्‍वसनीय तरीके से निभाया।
यहां बता दें कि भारत में पाकिस्‍तानी कलाकारों को नया काम देने की अघोषित पाबंदी लगने के बाद पाकिस्‍तान ने भी हिंदी फिल्‍मों की रिलीज रोक दी थी। लंबे समय के बाद विशेष तौर पर रिति5क रोशन की काबिल रिलीज की गई थी। चीन में धम मचा रही दंगल पाकिस्‍तानी सेंसर के संकीर्ण रवैए की वजह से वहां रिलीज नहीं हो सकी थी। उन्‍हें फिल्‍म में भारत के राष्‍ट्र गान पर आपत्ति थी। आमिर खान ने स्‍पष्‍ट किया था कि बगैर राष्‍ट्रगान के वे पाकिस्‍तान में दंगल रिलीज नहीं करना चाहते। इस बीच दोनों देशों के बीच तनातनी और झड़पें चल रही हैं। हांलांकि इन दिनों इंग्‍लैंड में चल रहे चैंपियत ट्राफी में भारत-पाकिस्‍तान की क्रिकेट टीम का मैच हुआ। संभावना है कि दोनों देश फिर से फायनल में टकराएं। सरहद पर दोनों देशों की सेनाएं चौकन्‍ना रहती हैं। पाकिस्‍तानी घुसपैठ को नाकाम करने की काशिशमें भारतीय सेना आगे रहती है। सरहद के इसतनाव के बावजूद दोनों देशों के नागरिक क्रिकेट और फिल्‍मों में रुचि लेते रहते हैं। पाकिस्‍तान के सिनेमाघरों में हिंदी फिल्‍में भले ही नहीं लग रही हों,लेकिन पाकिस्‍तानी दर्शक दूसरे प्‍लेटफार्म पर हिंदी फिल्‍में देखने से नहीं चूकते।
सुपर सिंह का पाकिस्‍तान में रिलीज होना स्‍वागतयोग्‍य कदम हैं। पंजाबी फिल्‍म से शुरू होकर यह कदम हिंदी फिल्‍मों की तरफ बढ़ेगा।दरअसल,भारत और पाकिस्‍तन के सिनेमाई संबंध विभाजन और दुश्‍मनी के बावजूद कभी  सक्रिय तो कभी शिथिल रूप में बने रहे। भारतीय सिनेमा की नींव गढ़ने में लाहौर की बड़ी भूमिका रही है। आजादी के पहले हिंदी सिनेमा के तीन प्रमुख गढ़ थे। मुंबई,कोलकाता और लाहौर में एक साथ हिंदी फिल्‍मों का निर्माण हो रहा था। अविभाजित भारत में लाहौर प्रमुख सांस्‍कृतिक और शैक्षणिक शहर था। फिल्‍म सहित सारी सांस्‍कृतिक गतिविधियों का प्रमुख केंद था लाहौर...उच्‍च शिक्षा,थिएटर,साहित्‍य और फिल्‍म में लाहौर की अग्रणी भूमिका थी। विभाजन के बाद लाहौर से अनेक निर्मात,निर्देशक और कलाकार मुंबई आ गए। कुछ कलाकार और निर्देशक मुंबई से लाहौर गए। कालांतर में लाहौर की फिल्‍म इंडस्‍ट्री प्रतिभाओं और बाजार के अभाव में सिमटती गई और धीरे-धीरे खत्‍म हो गई। आल पाकिस्‍तान में सिनेमा का अस्तित्‍व खतरे में है। दोनों देशों के बीच फिल्‍मों, कलाकारों और कलाकारों की आमदरुत बढ़ती है तो पाकिस्‍तान में फिल्‍मों केनर्माण में रवानगी आती है।
इस संदर्भ और पृष्‍ठभूमि में पाकिस्‍तान के 36 शहरों में सुपर सिंह की रिलीज से दोनों देशों के बीच बने छत्‍तीस के संबंध में नरमी आएगी। देखना यह है कि भारत की इस पंजाबी फिल्‍म का पाकिस्‍तान में कैसा स्‍वागत होता है और कितने दर्शक मिलते हैं?



Friday, June 9, 2017

दरअसल : हिंदी सिनेमा का चीनी पहलू



दरअसल...
हिंदी सिनेमा का चीनी पहलू
-अजय ब्रह्मात्‍मज
कुछ सालों पहले हांगकांग से एक पत्रकार मुंबई आए थे। वे हिंदी फिल्‍मों में चीन के वर्णन और चित्रण पर शोध कर रहे थे। उन्‍हें बहुत निराशा हाथ लगी थी। उन्‍हें कहीं से पता चला था कि मैं चीन में रह चुका हूं और मैंने सिनेमा के संदर्भ में भारत-चीन पर कुछ लिखा है। हम मिले और हम ने विमर्श किया कि ऐसा क्‍यों हुआ कि भारतीय फिल्‍मों में चीन की उचित छवि नहीं पेश की गई है। चीनी किरदार दिखाए भी गए तो उन्‍हें विलेन या कॉमिकल किरदारों के रूप में दिखाया गया। उनका हमेश मजाक उड़ाया गया। अपने देश की आजादी और चीन की मुक्ति के बाद बुलंद हुआ हिंदी-चीनी भाई-भाई का नारा अचानक 1962 के बाद सुनाई पड़ना बंद हो गया। भारतीय मीडिया में चीन को दुश्‍मन देश के रूप में पेश किया गया। यह बताया गया कि नेहरू की दोस्‍ती के प्रयासों को नजरअंदाज कर चीन ने भारत की पीठ में छूरा घोंप दिया। पचपन सालों के बाद भी हम उस मानसिकता से नहीं निकल पाए हैं।
अभी हाल में नितेश तिवारी निर्देशित दंगल ने चीन में 700 करोड़ रुपयों से अधिक का कारोबार किया तो फिर से चीन सभी की निगाह में आ गया। मानें या ना मानें फिल्‍में जीवन के हर क्षेत्र में हमारा ध्‍यान खींच रही हैं। दंगल की कामयाबी के बाद चीन फिर से भारतीय मानस को उत्‍प्रेरित कर रहा है। भारतीय फिल्‍म इंडस्‍ट्री और खास कर हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री उसे एक बड़ बाजार के रूप में देख रही है। पाकिस्‍तान से राजनयिक संबंध खराब होने के बाद  वहां फिर से भारतीय फिल्‍मों का प्रदर्शन बंद हो गया है। ऐसे में एक नए बाजार का मिलना और बिजनेस टेरिटरी के रूप में चीन का उभरना खास महत्‍व रखता है। दंगल के परिणाम से उत्‍साहित हिंदी फिल्‍मप्रेमियों को शायद नहीं मालूम कि चीन फिल्‍मों के संदर्भ में सख्‍त आयात नीति का पालन करता है। चीन साल में केवल 34 विदेशी फिल्‍मों को आयात करने की अनुमति देता है,जिसमें अधिकांश हॉलीवुड की ही फिल्‍में रहती हैं। पिछले कुछ सालों से साल में एक या दो भारतीय फिल्‍में पहुंचने लगी हैं। अभी तक 100 करोड़ रुपयों से अधिक का कारोबार की फिल्‍मों में से चार आमिर खान की हैं। आमिर खान वहां के चहेते स्‍टार हैं। चीनी सोशल मीडिया में आमिर खान देश के प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी से अधिक पॉपुलर हैं।
दरअसल,अंग्रेजों के शासन और आजादी के पश्चिमोन्‍मुखी होने के कारण फिल्‍मों के क्षेत्र में हमेशा से हमारी नजर हॉलीवुड पर रही। भारतीय सरकार और समाज ने सार्क देशों और एशियाई देशों पर गौर ही नहीं किया। हम साम्राज्‍यवादी देशों से ही विकास का फार्मूला लेने की सोचते रहे। देश के अधिकांश फिल्‍म समीक्षक हॉलीवुड की फिल्‍मों की पूरी जानकारी रखते हैं। उन्‍हें यह नहीं मालूम रहता कि कन्‍न्‍ड़  वृद्धि से दूसरे देशो की फिल्‍मों की तरफ ध्‍यान गया है। चीन के पेइचिंग और शंगहाए फिल्‍म फस्टिवल में भारतीय फिल्‍में और फिल्‍म कलाकार जाने लगे हैं। भात के इंटरनेशनल फिल्‍म फेस्टिवल और मामी में वहां की फिल्‍में और कलाकारों की आमद होने लगी है। ऐसा लगता है कि अचानक दोनों देशों के बीच फिल्‍म के जरिए आदान-प्रदान बढ़ गया है। यह अच्‍छा संकेत है।
इस ईद पर रिलीज हो रही कबीर खान निर्देशित अौर सलमान खान अभिनीत ट्यूबलाइट का चीनी कनेक्‍शन है। भारत-चीन युद्ध की पृष्‍ठभूमि की इस फिल्‍म में चीन का पहलू है। यहां तक कि चीनी अभिनेत्री जू जू ने इस फिल्‍म में काम भी किया है। अभी नहीं मालूम कि ट्यूबलाइट में चीन कितना और किस रूप में चित्रित हुआ है,लेकिन मेल-मिलाप दोनों देशो के लिए शुभ है। पिछले दिनों सोनू सूद ने जैकी चान के साथ कुंगफू पांडा में काम किया। एक और चीनी फिल्‍म बन कर तैयार है,जिसमें भारतीय कलाकारों ने काम किया है। कुछ भारतीय फिल्‍मों की योजनाओं में चीन शामिल है। संयुक्‍त निर्माण की दिशा में भी निर्माता विचार कर रहे हैं।

Friday, June 2, 2017

दरअसल : फिल्‍मों पर 28 प्रतिशत जीएसटी



दरअसल...
फिल्‍मों पर 28 प्रतिशत जीएसटी
-अजय ब्रह्मात्‍मज
बाहुबली और दंगल की अद्वितीय कामयाबी और 1000 करोड़ से अधिक के कलेक्‍शन के बावजूद भारतीय सिनेमा की आर्थिक सच्‍चाई छिपी हुई नहीं है। बमुश्किल 10 प्रतिशत फिल्‍में मुनाफे में रहती हैं। बाकी फिल्‍मों के लिए अपनी लागत निकाल पाना भी मुश्किल होता है। फिल्‍में अगर नहीं चलती हैं तो उससे जुड़े दूसरे व्‍यापारों को भी नुकसान उठाना पड़ता है। अगर कोई फिल्‍म चल जाती है तो अ के पास के खोमचे वाले की भी बिक्री और आमदनी बढ़ जाती है। फिल्‍मों पर आजादी के पहले से टैक्‍स लग रहे हैं। विभिन्‍न सरकारें अपनी सोच के हिसाब से कर सुधार करती हैं। लंबे समय से फिल्‍म बिरादरी और दर्शकों की मांग रही है कि फिल्‍मों के टिकट पर कर नहीं लगना चाहिए। फिल्‍म व्‍यवसाय को बढ़ाने के लिए यह जरूरी है।
सबसे पहले अंगेजों ने मनोरंजन कर आरंभ किया। फिल्‍मों के प्रदर्शन पर कर लादने के पीछे उनका दोहरा उद्देश्‍य था। उन्‍हें लगता था कि फिल्‍में देखने के लिए दर्शक जमा होते हैं। वहां उनके समूह को ग्रेजों के खिलाफ उकसाया जा सकता है। भीड़ कम करने की गरज से उन्‍होंने फिल्‍मों के प्रदर्शन पर कर लगाए। आजादी के बाद देश की सरकारदने उन्‍हीं करों के प्रावधान का अनुपालन किया। उन्‍होंने कर सुधार किए तो भी दर्शकों पर भार बना रहा। अभी राज्‍य सरकारें अपनी मर्जी और जरूरत के हिसाब से मनोरंजन कर वसूलती हैं। यह कर कहीं 20 प्रतिशत तो कहीं 110 प्रतिशत तक है। फिल्‍म व्‍यवसाय से संबंधित व्‍यक्तियों को लग रहा था कि जीएसटी लागू होन पर राहत मिलेगी।
पिछले दिनों जीएसटी की घोषणा के बाद पता चला कि फिल्‍मों पर यह 28 प्रतिशत होगा। फिल्‍म बिरादरी को इस घोषणा से भारी झटका लगा। जीएसटी की प्रारंभिक बैठकों में फिल्‍म बिरादरी के प्रतिनिधियों ने 5 प्रतिशत जीएसटी की सिफारिश की थी। फिल्‍म बिरादरी की समझ में आ गया है कि सरकार ने उनकी सिफारिशों को ताक पर रख दिया। उन्‍होंने अपनी नई नीति के तहत 28 प्रतिशत जीएसटी लाद दिया। साथ ही फिल्‍मों को जुएबाजी,सट्टेबाजी और घुड़दौड़ की श्रेणी में रख दिया। अभी विभिन्‍न श्रेणियों में 5 प्रतिशत से लेकर 28 प्रतिशत तक जीएसटी का प्रावधान है। फिल्‍म बिरादरी के विरोध और प्रतिरोध के बाद संभावना व्‍यक्‍त की जा रही है कि 3 जून की बैठक में इसमें फेरबदल हो। फेरबदल नहीं हुआ तो फिल्‍म व्‍यवसाय पर कर का भार बढ़ेगा। पहले से ही चरमरायी फिल्‍मों की अर्थ व्‍यवस्‍था टूट सकती है।
तर्क दिया जा रहा है कि अभी मनोरंजन कर में एकरूपता नहीं है। कुछ राज्‍यों में मनोरंजन कर 28 प्रतिशत से ज्‍यादा है। उन प्रदेशों के दर्शकों को राहत मिलगी। गौर करने की जरूरत है कि ज्‍यादातर राज्‍यों में मनोरजन कर 20 से 30 प्रतिशत के बीच है। इन राज्‍यों में टिकटों की कीमत बढ़ जाएगी। इसके साथ ही स्‍थानीय निकाय और सरकारी एजेंसियां कर लगा सकती हैं। वह कर जीएसटी के 28 प्रतिशत के अतिरिक्‍त होगा। ऐसी सूरत में फिल्‍म व्‍यवसाय पर अंदरूनी चोट आएगी। विशेषज्ञ बता रहे हैं कि क्षेत्रीय फिल्‍मों को अधिक नुकसान झेलना पड़ेगा। उन्‍हें दूसरे विकल्‍पों के बारे में सोचना होगा।
दरअसल,वर्तमान सरकार फिल्‍मों के सेंसर से लेकर कर तक के बारे में स्‍पष्‍ट नहीं है। एक ढ़लमुल नीति चल रही है। हो रही मुश्किलों के प्रति सरकार बेपरवाह है। फिल्‍म सेंसर में तो फिल्‍मों में रामभजन नाम रखने तक पर आपत्ति हो रही है। दूसी तरफ करों का बोझ...गरीबी में आटा गीला हो रहा है फिल्‍म इंडस्‍ट्री का। जरूरत है कि भारत के बड़े ब्रांड के तौर पर उभर रहे भारतीय फिल्‍मों के प्रति सरकार उदार रवैया अनपाए और हर तरह की सुविधाएं मुहैया कराए। फिल्‍में सॉफ्ट प्रोडक्‍ट हैं,जो अ‍ार्थिक हित साधने के साथ ही वैचारिक,सामाजिक और राजनयिक भूमिकाएं भी अदा करती हैं। हर मोर्चे पर फिल्‍मों और फिल्‍मी सितारों का इस्‍तेमाल कर रहा समाज इस धारणा से बाहर निकले कि फिल्‍मों में अकूत पैसा है।

Friday, May 26, 2017

दरअसल : नंदिता दास के मंटो



दरअसल...
नंदिता दास के मंटो
-अजय ब्रह्मात्‍मज

नंदिता दास पिछले कुछ सालों से मंटो के जीवन पर फिल्‍म बनाने में जुटी हैं। भारतीय उपमाद्वीप के सबसे ज्‍यादा चर्चित लेखक सआदत हसन मंटो के जीवन में पाठकों और दर्शकों की रुचि है। वे अपने लखन और लेखन में की गई टिप्‍पणियों से चौंकाते और हैरत में डाल देते हैं। आज उनकी जितनी ज्‍यादा चर्चा हो रही है,अगर इसका आंशिक हिस्‍सा भी उन्‍हें अपने जीवनकाल में मिल गया होता। उन्‍हें समुचित पहचान के साथ सम्‍मान मिला होता तो वे 42 की उम्र में जिंदगी से कूच नहीं करते। मजबूरियां और तकलीफें उन्‍हें सालती और छीलती रहीं। कौम की परेशानियों से उनका दिल पिघलता रहा। वे पार्टीशन के बाद पाकिस्‍तान के लाहौर गए,लेकिन लाहौर में मुंबई तलाशते रहे। मुंबई ने उन्‍हें लौटने का इशारा नहीं दिया। वे न उधर के रहे और न इधर के। अधर में टंगी जिंदगी धीरे-धीरे घुलती गई और एक दिन खत्‍म हो गई।
नंदिता दास अपनी फिल्‍म में उनके जीवन के 1946 से 1952 के सालों को घटनाओं और सहयोगी किरदारों के माध्‍यम रख रही हैं। यह बॉयोपिक नहीं है। यह पीरियड उनकी जिंदगी का सबसे अधिक तकलीफदेह और खतरनाक हैं। कुछ पाठकों को याद होगा कि इन छह सालों के दौरान उन पर छह मुकदम हुए। तीन भारत में और तीन पाकिस्‍तान में...आज जरा सी निंदा,आलोचाना या सवाल पर लेखक बौखला जाते हैं। और सोशल मीडिया पर अनाप-शनाप बकने लगते हैं। आप उस दौर को याद करें जब लेखकों के पास और कोई माध्‍यम नहीं था। समाज उन्‍हें खुले दिल से स्‍वीकार नहीं रहा था और सरकार वा सत्‍ता लगातार तिरस्‍कार कर रही थी। मंटो ने अपने दौर के मजलूमों और मजबूरों पर लिखा। समय और सोच की विसंगतियों को वे उजागर करते रहे। सत्‍ता और समाज के लांछन सहते रहे।ऐसे में भला कोई कब तक हिम्‍मत बनाए रखे?
नंदिता दास उनकी जिंदगी के उथल-पुथल के सालों पर ही ध्‍यान दे रही हैं। उन्‍होंने उनकी रचनाओं और व्‍यक्त्गित साक्षात्‍कारों के आधार पर उस दौर में मंटों को गढ़ा है। उन्‍होंने मीर अली के साथ इस फिल्‍म का लेखन किया है। फिल्‍म में मंटो का शीर्षक किरदार नवाजुद्दीन सिद्दीकी निभा रहे हैं। इस फिल्‍म में उनके साथ रसिका दुग्‍गल,ताहिर राज भसीन,शबाना आमी,जावेद अख्‍तर और अनेक मशहूर कलाकार छोटी-बड़ी भूमिकाएं निभा रहे हैं। फिल्‍म की शूटिंग जून के मध्‍य तक पूरी हो जाएगी। इस फिल्‍म का एक हिस्‍सा पिछले दिनों एक मीडिया कॉनक्‍लेव में दिखाया गया था। उसे देख कर यही लगा कि नवाजुद्दी सिद्दीकी की सही कास्टिंग हुई है। वे मंटों की संजीदगी और ठहराव के साथ बेचैनी को भी आत्‍मसात कर सके हैं। इस फिल्‍म की शुरूआत के समय नंदिता दास मंटो की भूमिका के लिए इरफान से बात कर रही थीं। वे राजी भी थे,फिर पता नहीं दोनों के बीच क्‍या गुजरी कि नचाज आ गए।
मंटो पर नाटक होते रहे हैं। उनकी कहानियों पर शॉर्ट और फीचर फिल्‍में बनती रही हैं। दो साल पहले उनकी बेटियों की मदद से बनी पास्तिानी फिल्‍म मंटो आई थी,जिसका निर्देशन समाद खूसट ने किया था। मंटो की भूमिका भी उन्‍होंने निभाई थी। पाकिस्‍तान में उनके ऊपर डाक्‍यूमेंट्री भी बन चुकी है। नंदिता दस के टेक को देखना रोचक होगा। देखना होगा कि मंटो की सोच और साफगोई को वह पर्दे पर कैसे ले बाती हैं? मंटो अपने समय की जलती मशाल हैं। नंदिता के लिए इस मशाल को 2017 में थामना आसान नहीं होगा। अपन पिछली फिल्‍म फिराक में उन्‍होंने अपना स्‍पष्‍ट पक्ष रखा था। इस फिल्‍म के जरिए मंटो की पा्रसंगिकता स्‍थापित करने में उनका पक्ष जाहिर होगा। मंटो प्रासंगिक हैं। उनका उल्‍लेख सभी करते हैं,लेकिन उन्‍हें पढ़ते और समझने वालों की संख्‍या कम है। उन्‍हें ढंग से पढ़ा गया होता तो भारत और पाकिस्‍तान के हालात आज जैसे नहीं होते। अभी तो दोनों तरफ से तोपें तनी हैं।