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Saturday, March 18, 2017

दरअसल : विरोध के नाम पर हिंसा और बयानबाजी क्‍यों?



दरअसल...
विरोध के नाम पर हिंसा और बयानबाजी क्‍यों?
-अजय ब्रह्मात्‍मज

गनीमत है कि कोल्‍हापुर में संजय लीला भंसाली की पद्मावती के सेट पर हुई आगजनी में किसी की जान नहीं गई। देर रात में हुड़दंगियों ने तोड़-फोड़ के बाद सेट को आग के हवाले कर दिया। संजय लीला भंसाली की टीम को माल का नुकसान अवश्‍य हुआ। कॉस्‍ट्यूम और जेवर खाक हो गए। अगली शूटिंग में कंटीन्‍यूटी की दिक्‍कतें आएंगी। फिर से सब कुछ तैयार करना होगा। ऐसी परेशानियों से हुड़दंगियों को क्‍या मतलब? उन पर किसी प्रकार की कार्रवाई नहीं होती तो उनका मन और मचलता है। वे फिर से लोगों और विचारों को तबाह करते हैं।
देश में यह कोई पहली घटना नहीं है,लेकिन इधर कुछ सालों में इनकी आवृति बढ़ गई है। किसी भी समूह या समुदाय को कोई बात बुरी लगती है या विचार पसंद नहीं आता तो वे हिंसात्‍मक हो जाते हैं। सोशल मीडिया पर गाली-गलौज पर उतर आते हैं। सेलिब्रिटी तमाम मुद्दों पर कुछ भी कहने-बोलने से बचने लगे हैं। कोई भी नहीं चाहता कि उसके घर,परिजनों और ठिकानों पर पत्‍थर फेंके जाएं। खास कर क्रिएटिव व्‍यक्ति ऐसी दुर्घटनाओं की संभावना से बचने के लिए सुरक्षित चाल चलने लगे हैं। डर पसर रहा है। फिल्‍मों के लेखन और निर्देशन में यह डर घुस रहा है। सीबीएफसी से लेकर सेंसर के लिए तत्‍पर वृहत समाज से आगत परेशानियों से बचने के लिए लेखक और निर्देशक पहले से ही कतरब्‍योंत में लग जाते हैं। किसी भी सभ्‍य समाज में सृजन पर लग रहे ऐसे ग्रहण का समर्थन नहीं किया जा सकता।
सृजन के क्षेत्र में मतभेद और विरोध होना चाहिए। विमर्श होना चाहिए। अगर किसी विचार या फिल्‍म से समाजिक उपद्रव की आशंका है तो उसके प्रसारण और प्रदर्शन को रोकने के संवैधानिक तरीके हैं। उन पर अमल किया जा सकता है। अभी तो यह स्थिति बनती जा रही है कि मतभेद,असहमति और विरोध दर्ज करने के लिए हर कोई हिंसक हो जा रहा है। भड़काऊ बयान दे रहा है। सोशल मीडिया पर ट्रोल आरंभ हो जाता है। यों लगने लगता है कि देश की सबसे बड़ी समस्‍या फिलहाल यही है।
पिछले दिनों नाहिद आफरीन को लेकर जिस प्रकार कथित फतवे जारी हुए। पूरे मामले को जो रंग दिया गया,उससे यही एहसास बढ़ रहा है कि सृजन और अभिव्‍यक्ति का दायरा निरंतर संकीर्ण होता जा रहा है। कुछ कट्टरपंथी समाज में समागम नहीं चाहते। वे प्रतिभाओं को उभरने नहीं देना चाहते। खिलने के पहले ही वे प्रतिभाओं को मसल देना चाहते हैं। दिक्‍कत यह है कि ऐसी घटनाओं पर प्रशासन की चुप्‍पी और उदासी हुड़दंगियों का बेजा जोश बढ़ाती है। उन्‍हें लगता है कि उन पर कोई कानूनी कार्रवाई नहीं होगी। अफसोस की बात है कि समाज के कुछ तबकों से उन्‍हें समर्थन मिल जाता है। हमेशा से सोसायटी के नेक बंदे खामोश रहते हैं। किसी भी लफड़े में शामिल होकर अपनी मुसीबत कोई क्‍यों बढ़ाए? क्‍योंकि उन्‍हें समर्थन और सहयोग नहीं मिलता।
कुछ व्‍यक्ति(इंडिविजुअल) होते हैं,जो साहस करते हैं। वे सृजन के लिए हर जोखिम उठाते हैं। कुर्बानियां भी देनी पड़ती है,लेकिन ऐसे साहसी सर्जकों की बदौलत ही क्रिएटिव संसार फलता-फूलता है। ऐसे सृजनधर्मी व्‍यक्ति ही हमारे समाज के गौरव होते हैं। कभी उनका नाम संजय लीला भंसाली होता है तो कभी नाहिद आफरीन। हमें ऐसे व्‍यक्तियों के समर्थन में आना होगा। समाज में विभिन्‍न मतों,विचारों और कृतियों के लिए गुजाईश रखनी होगी। तभी हम देश और समाज के विकास में सहायक होंगे।
अन्‍यथा दिख रहा है कि हम किस विध्‍वंस की ओर बढ़ रहे हैं।  

Friday, March 10, 2017

दरअसल : वैदेही,अनारकली,शशि,शबाना और पूर्णा



दरअसल...
वैदेही,अनारकली,शशि,शबाना और पूर्णा
-अजय ब्रह्मात्‍मज
वैदेही,अनारकली,शशि,शबाना और पूर्णा...पांच लड़कियों के नाम है। सभी अपनी फिल्‍मों में मुख्‍य किरदार है। उन्‍हें नायिका या हीरोइन कह सकते हैं। इनमें से तीन अनारकली,शबाना और पूर्णा का नाम तो फिल्‍म के टायटल में भी है। कभी हीरो के लिए इन और ऐज लिखा जाता था,उसी अंदाज में हम स्‍वरा भास्‍कर को अनारकली ऑफ आरा,तापसी पन्‍नू को नाम शबाना और अदिति ईनामदार को पूर्णा की शीर्षक भूमिका में देखेंगे। वैदेही बद्रीनाथ की दुल्‍हनिया की नायिका है,जिसे पर्दे पर आलिया भट्ट निभा रही हैं। शशि फिल्‍लौरी की नायिका है,जिसे वीएफएक्‍स की मदद से अनुष्‍का शर्मा मूर्त्‍त रूप दे रही हैं। संयोग है कि ये सभी फिल्‍में मार्च में रिलीज हो रही है। 8 मार्च इंटरनेशनल महिला दिवस के रूप में पूरे विश्‍व में सेलिब्रेट किया जाता है। महिलाओं की भूमिका, महत्‍व और योगदान पर बातें होती हैं। हिंदी फिल्‍मों के संदर्भ में इन पांचों फिल्‍मों की नायिकाओं से परिचित होना रोचक होगा,क्‍योंकि अभी कुछ दिनो पहले ही कुख्‍यात सीबीएफसी ने लिपिस्टिक अंडर माय बुर्का को इस आधार पर प्रमाण पत्र देने से मना कर दिया कि वह लेडी ओरिएंटेड फिल्‍म है। सचमुच भारतीय समाज और मानस एक साथ कई दशकों और सदियों में जी रहा है।
हिंदी फिल्‍मों में परंपरागत रूप से नायिकाओं की महती भूमिका नहीं होती। मुख्‍यधारा की ज्‍यादातर फिल्‍मों में उन्‍हें सजावट और आकर्षण के लिए रखा जाता है। कुछ फिल्‍मों में उन्‍हें किरदार और नाम दिया भी जाता है तो फिल्‍म की कहानी में उनकी निर्णायक भूमिका नहीं होती। तात्‍पर्य यह कि उनके किसी एक्‍शन या रिमार्क से फिल्‍म की कहानी में मोड़ नहीं आता। सारे क्रिया-कलाप हीरो के पास रहते हैं। हीरोइन उनके आगे-पीछे डोलती रहती है। कभी हीरोइन की महत्‍वपूर्ण भूमिका हुई तो उस फिल्‍म को हीरोइन ओरिएंटेड या महिला प्रधान फिल्‍म कह कर अलग कैटेगरी में डाल दिया जाता है। दरअसल,भारतीय समाज में जिस तरह से महिलाओं की भूमिका गौण कर दी गई है,उसी की प्रतिछवि फिल्‍मों में आती है। 21 वीं सदी में समाज में महिलाओं ने अपनी जागृति और सक्रियता से खुद की भूमिका बड़ी कर ली है,लेकिन फिल्‍मों में अभी तक उन्‍हें समान महत्‍व और स्‍थान नहीं मिला है। इस लिहाज से भी मार्च महीने में आ रही पांचों लड़किया हमरा ध्‍यान खींच रही हैं।
10 मार्च को रिलीज हो रही बद्रीनाथ की दुल्‍हनिया में निर्देशक शशांक खेतान वैदेही त्रिवेदी को लकर आ रहे हैं। अपने वर्तमान से नाखुश वैदेही भविष्‍य के बारे में सोचती है। उसके कुछ ख्‍वाब हैं। छोटे शहर कोटा में रहने की वजह से उन ख्‍वाबों पर अंकुश है। शशांक खेतान ने आज के छोटे शहरों की उन लड़कियों के प्रतिनिधि के रूप में वैदेही का चित्रण किया है,जो अपनी ख्‍वाहिशों के साथ उफन रही हैं। 24 मार्च को रिलीज हो रही अविनाश दास निर्देशित अनारकली ऑफ आरा की अनारकली आरा की नाचने-गाने वाली लड़की है। वह अपनी आजीविका से संतुष्‍ट है,लेकिन एक समारोह में जब शहर के दबंग व्‍यक्ति उसकी मर्जी के खिलाफ उस पर हाथ डालते हैं तो वह बिफर उठती है। देश में लड़कियों के साथ जबरदस्‍ती और बलात्‍कार जैसी शर्मनाक घटनाओं पर गाहे-बगाहे चर्चा होती है। ऐसी घटनाएं नजरअंदाज कर दी जाती हैं। माना जाता है कि द्विअर्थी गीतों पर उत्‍तेजक नृत्‍य करने वाली लड़कियों के साथ कुछ भी किया जा सकता है। अनारकली ऐसी सोच के विरूद्ध खड़ी होती है और लड़ती है। अंशय लाल निर्देशित फिल्‍लौरी की नायिका शशि फिल्‍म में दो रूपों में आती है। एक तो भूतनी है,जो एक पेड़ पर निवास करती है। रुढि़यों के मुताबिक उस पेड़ से कानन की शादी होती है तो वह भूतनी उसे दिखाई पड़ने लगती है। दिक्‍कत है कि शादी के बाद पेड़ काट दिया गया है। अब शशि लौट भी नहीं सकती। ऊपरी तौर पर मजेदार सी दिखती इस कहानी में दूसरा लेयर भी है,जिसमें शशि और फिल्‍लौरी की प्रेमकहानी है।
ये चारों किरदार काल्‍पनिक हैं,जिन्‍हें लेखक-निर्देशक ने अपनी कल्‍पना से रख है। उनकी इस कल्‍पना में सच्‍ची घटनाओं और प्रसंगों का घोल है। राहुल बोस निर्देशित पूर्णा सच्‍ची कहानी है। यह तेलंगाना रात्‍य की 13 वर्षीया पूर्णा के यंघर्ष और विजय की कहानी है। प्रतिकूल परिरूिथतियों में पूर्णा ने माउंट एवरेस्‍ट की चढ़ाई की। 25 मई,2014 को माउंट एवरेस्‍ट के शिखर पर पहुंचने वाली वह दुनिया की सबसे कम उम्र की लड़की है।
सचमुच 2017 का मार्च का महीना हिंदी सिनेमा के इतिहस में उल्‍लेखनीय और यादगार रहेगा। हिंदी फिलमों को पांच सशक्‍त महिला किरदार मिल रहे हैं।    

Saturday, March 4, 2017

दरअसल : क्‍यों बचते और बिदकते हैं एक्‍टर?



दरअसल....
क्‍यों बचते और बिदकते हैं एक्‍टर?
-अजय ब्रह्मात्‍मज

फिल्‍म पत्रकारिता के दो दशक लंबे दौर में मुझे कई एक्‍टरों के साथ बैठने और बातें करने के अवसर मिले। पिछले कुछ सालों से अब सारी बातचीत सिर्फ रिलीज हो रही फिल्‍मों तक सीमित रहती है। एक्‍टर फिल्‍म और अपने किरदार के बारे में ज्‍यादा बातें नहीं करते। वे सब कुछ छिपाना चाहते हैं,लेकिन कम से कम पंद्रह-बीस मिनट बात करनी होती है। जाहिर सी बात है कि सवाल-जवाब की ड्रिब्लिंग चलती रहती है। अगर कभी किरदार की बातचीत का विस्‍तार एक्टिंग तक कर दो तो एक्‍टर के मुंह सिल जाते हैं। बड़े-छोटे,लोकप्रिय-नए सभी एक्‍टर एक्टिंग पर बात करने से बचते और बिदकते हैं। अगर पूछ दो कि किरदार में खुद को कैसे ढाला या कैसे आत्‍मसात किया तो लगभग सभी का जवाब होता है...हम ने स्क्रिप्‍ट रीडिंग की,डायरेक्‍टर की हिदायत पर ध्‍यान दिया,रायटर से किरदार को समझा,लेखक-निर्देशक ने रिसर्च कर रखा था...मेरा काम आसान हो गया। अमिताभ बच्‍चन से लकर वरुण धवन तक अभिनय प्रक्रिया पर बातें नहीं करते।
हाल ही में सरकार3 का ट्रेलर लांच था। ट्रेलर लांच भी एक शिगूफा बन कर रह गया है। इन दिनों प्रोडक्‍शन कंपनियां अपने स्‍टाफ,फिल्‍म और एक्‍टर के फैंस से थिएटर या हॉल भर देते हैं। उनके बीच ही मीडिया पर्सन रहते हैं। दो बार ट्रेलर दिखाने के बाद मखौल और हंसी-मजाक(जिसे क्‍वेशचन-एंसर सेशन कहा जाता है) का दौर शुरू होता है। गंभीर सवालों के मजाकिया जवाब दिए जाते हैं। लोकप्रिय निर्देशक और अभिनेता सीधे मुंह बात नहीं करते। हां तो सरकार 3 के ट्रेलर लांच में थोड़ी भिन्‍नता रखी गई। पहले राम गोपात वर्मा ने फिल्‍म के बारे में बताया और फिर अमिताभ बच्‍चन ने मंच पर मौजूद(निर्देशक,कलाकार,निर्माता) सभी व्‍यक्तियों से सवाल पूछे। यह दौर अच्‍छा चला। कुछ अच्‍छी बातें उद्घाटित हुईं। फिर मीडिया के सवाल और जवाब को दौर आरंभ हुआ तो एक पल्‍कार ने अमिताभ बच्‍चन से पूछा...सरकार जैसी फिल्‍म में इंटेंस और एंग्री मैन का रोल करने के बाद शाम में घर पहुंचने पर क्‍या होता है? पत्रकार की मंशा यह जानने की थी कि व्‍यक्ति व अभिनेता अमिताभ बच्‍चन अपने किरदार से कैसे डल करते हैं। अमिताभ बच्‍चन का जवाब था-घर जाते हैं,खाते हैं और सो जाते हैं। मुमकिन है सिद्धहस्‍त अभिनेता अमिताभ बच्‍चन के लिए सब कुछ इतना सरल होता हो,लेकिन उनके जवाबों पर गौर करें तो अपनी विनम्रता के आवरण में उन्‍होंने हमेशा एक्टिंग पर बात करने से बचने की कोशिश की है। अपनी चर्चिग्‍त और मील का पत्‍थ्‍र बन चुकी फिल्‍मों के किरदारों और रोल के बारे में पूछने पर वे हमेशा निर्देशक को श्रेय देते हैं...उन्‍होंने जैसा कहा,वैसा मैंने कर दिया और दर्शकों को पसंद आ गया।
अमित सर,एक अभिनेता के लिए सब कुछ इतना सरल और आसान रहता तो दिलीप कुमार को देवदास जैसी ट्रैजिक फिल्‍में करने के बाद किसी मनोचि‍कित्‍सक के शरण में नहीं जाना पड़ता उन्‍हें गुरू दत्‍त की फिल्‍म प्‍यासा का रोल नहीं छोड़ना पड़ता। इधर के अभिनेता एक्टिंग के नाम पर होमवर्क पर बहुत जोर देते हैं। वे हवाला देते हैं कि वजन कम किया या बढ़ाया,नए हुनर सीखे,शरीर पर काम किया...दरअसल,वे अपने किरदारों के लुक और एक्‍सटीरियर की बातें कर रहे होते हैं। किरदार में दिखना और किरदार में होना दो बातें हैं। एक्‍टर इस होने की प्रक्रिया को गोल कर जाते हैं। यह भी हो सकता है कि प्रशिक्षण और जानकारी के अभाव में वे इस प्रक्रिया को शब्‍द नहीं दे पाते हों। यहां तक कि थ्‍रएटर की ट्रेनिंग लेकर आए एक्‍टर भी एक्टिंग की बातें नहीं करते।
इन दिनों समर्थ और समृद्ध परिवारों के बच्‍चे एक्टिंग सीखने विदेशी फिल्‍म स्‍कूलों में जा रहे हैं। अपनी पढ़ाई और अभ्‍यास के दौरान वे विदेशी फिल्‍में देखते हैं। उनकी बोलचाल और पढ़ाई की भाषा अंग्रेजी है। और आखिरकार वे हिंदी फिल्‍मों के मैलोटैमैटिक किरदारों में अजीब से लगते हैं। प्रशिक्षण और कार्य के स्‍वभाव की भिन्‍नता उनकी एक्टिंग में दिखती है। वे जंचते ही नहीं। जरूरी है कि अनुभवी अभिनेता अभिनय पर सिलसिलेवार बातें करें और टेक्‍स्‍ब्‍ तैयार करें। एक्टिंग पर बातें करने से बिदकना बंद करें।

Monday, February 13, 2017

दरअसल : डराती है हकीकत



दरअसल...
डराती है हकीकत
-अजय ब्रह्मात्‍मज

आज देश के कुछ सिनेमाघरों में जॉली एलएलबी2 रिलीज होगी। रिलीज के हफ्ते में यह चर्चा में रही। सभी जानते हैं कि इस फिल्‍म में जज और देश की न्‍याय प्रणाली के चित्रण पर एक वकील ने आपत्ति की। कोर्ट ने उसका संज्ञान लिया और फसला फिल्‍म के खिलाफ गया। फिल्‍म से चार दृश्‍य निकाल दिए गए। उन दृश्‍यों की इतनी चर्चा हो चुकी है कि दर्शक समझ जाएंगे कि वे कौन से सीन या संवाद रहे होंगे। कुछ सालों के बाद इस फिल्‍म को देख रहे दर्शकों को पता भी नहीं चलेगा कि इस फिल्‍म के साथ ऐसा कुछ हुआ था। हां,फिल्‍म अध्‍येता देश में चल रहे सेंसर और अतिरिक्‍त सेंसर के पर्चों में इसका उल्‍लेख करेंगे। निर्माता ने पहले सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी,लेकिन उन्‍होंने उसे वापिस ले लिया। उन्‍होंने लेखक-निर्देशक को सीन-संवाद काटने के लिए राजी कर लिया। लेखक-निर्देशक की कचोट को हम समझ सकते हैं। उनका अभी कुछ भी बोलना उचित नहीं होगा। उससे कोट्र की अवमानना हो सकती है। सवाल है कि क्‍या कोर्अ-कचहरी की कार्य प्रणाली पर सवाल नहीं उठाए जा सकते? क्‍या उनका मखौल नहीं उड़ाया जा सकता या कोई प्रहसन नहीं तैयार किया जा सकता? अभी जो लोग खामोश है,वे याद रखें कि ऐसा ही चलता रहा तो अतिरिक्‍त सेंसर की तलवार अभिव्‍यक्ति के सभी माध्‍यमों को क्षत-विक्षत करेगी। यह खतरनाक संकेत है।
कुछ दिनों पहले संजय लीला भंसाली के सेट पर पहुंच कर एक सेना विशेष ने हड़कंप मचाया। पुलिस और प्रशासन की निष्क्रियता या उासी ही कहें कि संजय लीला भंसाली ने शूटिंग रोक दी। उन्‍होंने उक्‍त सेना के प्रतिनिधियों से बातचीत की और आश्‍वस्‍त किया कि फिल्‍म में ऐसा कुछ नहीं है। अजीब सी प्रतिक्रियाएं आईं। जिस दुर्घटना के वीडियो वायरल हुए। उसके संदर्भ में हड़कंप के हिमायती तर्क दे रहे हैं कि संजय लीला भंसाली ने ही एफआईआर नहीं किया तो पुलिस और प्रशासन क्‍या करे? तो क्‍या जरूरी है कि अनाचार और अत्‍याचार के खिलाफ भुक्‍तभोगी शिकायत करे तभी कोई कार्रवाई होगी? और फिर ये कौन लोग हैं,जो संस्‍कृति और इतिहास के संरक्षक के तौर पर उग आए हैं। समाज और राजनीति में अनुदारता और असहिष्‍णुता बढ़ रही है। भारतीय समाज में यह कोई नई दुर्घटना नहीं है,लेकिन पहले उसे ऐसा समर्थन नहीं मिलता था।
ऐसी दुर्घटनाओं और उनके परिणाम से स्‍पष्‍ट है कि लेखक,निर्देशक और निर्माता इस प्रकार के विषयों पर फिल्‍में बनाने से हिचकेंगे। फिल्‍म की रिलीज के समय निर्माता किसी प्रकार के विवाद में नहीं पड़ना चाहता। सभी निर्माता प्रकाश झा और अनुराग कश्‍यप के तरह अपने सृजन के साथ खड़े होने और सिस्‍टम से टकराने का साहस नहीं कर पाते। दबाव और मजबूरी में ज्‍यादातर फिल्‍मकार घुटने टेक देते हैं। गौर करें तो पिछले कुछ सालों में फिल्‍मकारों ने अपनी कहानियों में स्‍थान,किरदार और उनके चित्रण में वास्‍तविकता पर जोर दिया है। कुछ दशक पहले तक हिंदी फिल्‍मों के किरदारों का कोई शहर ही नहीं होता था। स्‍थान और काल से भी कहानी का संबंध नहीं होता था। नायक-नायिका प्रेम या बदला लेने के अलावा कुछ नहीं करते थे। उनका कोई पेशा नहीं होता था। वे काम नहीं करते थे। इधर लेखकों और निर्देशकों ने स्‍थान,काल और किरदारों की वास्‍तविकता पर जोर देना शुरू किया तो कुछ समूहों और व्‍यक्तियें को आपत्ति होने लगी। उन्‍हें डर लगने लगा है। चित्रण वास्‍तविक होगा तो वह असंतुष्‍टों को खटकेगा। उन्‍हें लगेगा कि यह अनुचित है। वे आपत्ति करेंगे और फिर सीन व संवाद कटते रहेंगे। फिल्‍में फंसती रहेंगी।
ऐसी रोक-टोक,पाबंदी और पवित्रता हमें जड़ता की ओर ही ले जाती है। कला और अभिव्‍यक्ति के क्षेत्र में कल्‍पना और प्रयोग से ही कथ्‍य का विस्‍तार होता है। हमें इस दिशा में उदारता और सहिष्‍णुता बरतनी होगी।
बााक्‍स आफिस
पिछलें हफ्ते की फिल्‍मों में सीमित रिलीज की फिल्‍म  जैागम इमाम की अलिफ का कलेक्‍शन उल्‍लेखनीय नहीं है। दूसरी फिल्‍म जैकी चान की कुंगफु योगा है। इस फिल्‍म ने चीन में पहले हफ्ते में 943 करोड़ का कलेक्‍शन किया है। भारत में अधिकतम कलेक्‍शन की हिंदी फिल्‍म दंगल है,जिसने 385 करोंड़ का कलेक्‍शन किया है। इसकी वजह यह है कि चीन और भारत में सिनेमाघरों की संख्‍या में पांच गुने का भारी अंतर है। कुंगफू योगा को भारत के दर्शकों ने स्‍वीकार नहीं किया। फिल्‍म का कलेक्‍शन सामान्‍य से भी कम रहा।

Sunday, February 5, 2017

दरअसल : एकाकी हैं करण जौहर



दरअसल
    एकाकी हैं करण जौहर
-अजय ब्रह्मात्‍मज
   
    करण जौहर की ऐन अनसुटेबल ब्‍वॉय मीडिया में चर्चित है। इसके कुछ अंश विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में छपे हैं। किताबों से वैसे रोचक प्रसंग लिए गए हैं, जहां करण जौहर अपने सेक्सुऐलिटी के बारे में नहीं बताना चाहते। वे सेक्स की बातें करते हैं, लेकिन अपने सेक्स ओरिएंटेशन को अस्पष्‍ट रखते हैं। उनकी अस्पष्‍टता के कई मायने निकाले जा रहे हैं। शायद पाठकों को मजा आ रहा होगा। करण जौहर बेहद स्मार्ट फिल्मी हस्ती हैं। उन्होंने दर्शकों और पाठकों को मुग्ध करने और अपने प्रति आकर्षित करने की कला सीख ली है। वह हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के पहली डिजाइनर पर्सनैलिटी हैं, जिनके बात-व्‍यवहार से लेकर चाल-ढाल और प्रस्तुति सब कुछ नपी-तुली होती है। उन्हें मालूम है कि उनका लेफ्ट प्रोफाइल ज्यादा अच्छा लगता है तो कैमरे के सामने आते ही वे हल्का सा दाहिना एंगल ले लेते हैं। फिल्म इंडस्ट्री में ऐसा सधा व्‍यक्तित्व नहीं है। पत्र-पत्रिकाओं में शाह रुख खान से उनके संबंध और काजोल से बिगड़ते रिश्‍तों के विवरण के अंश भी प्रकाशित हुए। दरअसल, फिल्मों से संबंधित हर किस्म के लेखन और उल्लेख में गॉसिप का तत्‍व बढ़ गया है। जब भी किसी फिल्मी हस्ती के बारे में कोई पूछता है कि ...और क्या चल रहा है उनकी जिंदगी में? तो उसका सीधा आशय होता है कि किसी नए प्रेमी या प्रेमिका की आमद हो गई है क्‍या? प्रेम और रोमांस के गुलछर्रों में सभी की रुचि रहती है। फिल्मी हस्तियों के निजी जीवन के दुख और संत्रास के बारे में हम जानना ही नहीं चाहते।
    ऐन अनसुटेबल बॉय के वे अध्‍याय अधिक रोचक और जानकारीपूर्ण हैं, जिनमें करण जौहर खुद के बारे में बातें करते हैं। वे बताते हैं कि बचपन के भोंदू करण जौहर में कब और कहां से आत्‍मविश्‍वास आया? कैसे उन्होंने अपनी बाकी कमियों को छिपाने के लिए आत्‍मविश्‍वास का इस्तेमाल किया? क्लास में सभी के चहेते बने और अपनी मां का नजरिया बदला। करण जौहर के पिता यश जौहर अब इस दुनिया में नहीं हैं। उनसे अपने लगाव और पिता के प्रेम और विश्‍वास की घटनाओं को पढ़कर आंखें छलक आती हैं। दे डेट ऑफ माय फादर में पिता के निधन के बाद अकेले पड़े करण जौहर को हम देखते हैं। उस असहाय अवस्था से वह कैसे निबटते हैं। मां और अपनी कंपनी को संभालते हैं। वे धर्मा प्रॉडक्‍शन को देश की सफल फिल्म कंपनी के तौर पर स्थापित करते हैं।
    उन्होंने धर्मा प्रोडक्शन और अपने प्रोडक्शन की फिल्मों के बारे में विस्तार से लिखा है। उन्होंने अपनी कमजोर फिल्मों का बचाव नहीं किया है। उनकी कमियों को उजागर और जाहिर किया है। उन्हें कुछ फिल्में बहुत प्रिय हैं तो कभी अलविदा न कहना को वे फिर से बनाना चाहते हैं। इन अध्‍यायों में हमें करण जौहर की सोच और दर्शन का परिचय मिलता है। पता चलता है कि उनकी सोच वास्‍तव में कितनी अर्बन और देश की कठोर सच्चाइयों से कटी हुई है। कहीं-कहीं वे इसके एहसास का आभास देते हैं, लेकिन अपने वजूद या परिवेश को लेकर वे किसी गिल्‍ट में नहीं हैं।
    इस किताब को पढ़ते हुए पता चलता है कि हंसमुख, मिलनसार और आकर्षक व्‍यक्तित्‍व  के धनी करण जौहर निहायत अकेले और एकाकी व्‍यक्ति हैं। उनके आसपास कोई नहीं है। एक मां के सिवा। वे चाहते हैं कि एक बच्चा गोद ले लें या माडर्न मेडिकल सुविधाओं से एक संतान पैदा करें। उन्हें अपने बुढापे और भविष्‍य की घोर चिंता है। उन्हें चिंता है कि अस्‍वस्थ और लाचार होने पर कौन उनकी देखभाल करेगा? उनकी सफल और समृद्ध कंपनी का वारिस कौन होगा? इस किताब को हमें उनके दोस्तों का हवाला मिलता है। उनके गिने-चुने दोस्त हैं। यहां तक कि फिल्म इंडस्ट्री की सारी यारी-दोस्ती की कलई खुलती सी दिखती है। करण जौहर अपने दोस्त और धर्मा प्रोडक्शन के सीईओ अपूर्वा का शिद्दत से उल्लेख करते हैं। ऐसी दोस्ती फिल्मों और किताबों में ही देखी पढी गई है। चौथी कक्षा से लेकर अभी तक अपूर्वा से उनकी दोस्ती जिंदगी की मुश्किलों से बचे रहने का ढाल रही है।
    इस किताब के अंतिम अध्‍यायों में उन्होंने समकालीन फिल्म इंडस्‍ट्री की भी बातें की हैं। इन अध्‍यायों में उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री में आए बदलावों का विस्‍तृत विवेचन किया है। साथ ही भविष्‍य की संभावनाओं के बारे में भी बताया है। करण जौहर की ऐन अनसुटेबल बॉय सभी फिल्म प्रेमियों और खास कर फिल्म इंडस्ट्री में कार्यरत युवाओं को पढनी चाहिए। यह पठनीय और उल्लेखनीय किताब है।
बॉक्स ऑफिस
है मुकाबला काबिल और रईस में  
    -अजय ब्रह्मात्‍मज
    इस बार बुधवार को ही नई फिल्में रिलीज हो गई हैं। रितिक रोशन की काबिल और शाह रुख खान की रईस आमने-सामने है। दोनों ही ल्रमें के प्रशंसक और दर्शक हैं। माना जा रहा है कि पहले दिन रईस का कलेक्शन ज्यादा होगा और उसके बाद उस फिल्म के दर्शक बढ़ेंगे, जिसका कंटेंट और एंटरटेनमेंट दर्शकों को अधिक पसंद आएगा। ट्रेड पंडितों के अनुसार दोनों फिल्में साथ नहीं आती तो दोनों को ही फायदा होता। ऐसी भी उम्मीद की जा रही है कि दोनों फिल्में चल सकती हैं। क्योंकि दोनों फिल्मों में अलग-अलग खूबियां हैं और दोनों में लोकप्रिय स्टार हैं। पिछली फिल्मों में दंगल अभी तक किसी-किसी थिएटर में टिकी हुई है और उसका कलेक्शन बढ़कर 385 करोड़ से अधिक पहुंच गया है।

Saturday, January 21, 2017

दरअसल : चित्रगुप्‍त की जन्‍म शताब्‍दी



दरअसल....
चित्रगुप्‍त की जन्‍म शताब्‍दी
-अजय ब्रह्मात्‍मज
2017 हुनरमंद संगीतकार चित्रगुप्‍त का जन्‍म शताब्‍दी वर्ष है। इंटरनेट पर उपलब्‍ध सूचनाओं के मुताबिक उन्‍होंने 140 से अधिक फिल्‍मों में संगीत दिया। बिहार के गोपालगंज जिले के कमरैनी गांव के निवासी चित्रगुप्‍त का परिवार अध्‍ययन और ज्ञान के क्षेत्र में अधिक रुचि रखता था। चित्रगुप्‍त के बड़े भाई जगमोहन आजाद चाहते थी। उनका परिवार स्‍वतंत्रता आंदोलन से भी जुड़ा था। कहते हैं चित्रगुप्‍त पटना के गांधी मैदान की सभाओं में हारमोनियम पर देशभक्ति के गीत गाया करते थे। बड़े भाई के निर्देश और देखरेख में चित्रगुप्‍त ने उच्‍च शिक्षा हासिल की। उन्‍होंने डबल एमए किया और कुछ समय तक पटना में अध्‍यापन किया। फिर भी उनका मन संगीत और खास कर फिल्‍मों के संगीत से जुड़ रहा। आखिरकार वे अपने दोस्‍त मदन सिन्‍हा के साथ मुंबई आ गए। उनके बेटों आनंद-मिलिंद के अनुसार चित्रगुप्‍त ने कुछ समय तक एसएन त्रिपाठी के सहायक के रूप में काम किया। उन्‍होंने पूरी उदारता से चित्रगुप्‍त को निखरने के मौके के साथ नाम भी दिया। आनंद-मिलिंद के अनुसार बतौर संगीतकार चित्रगुप्‍त की पहली फिल्‍म तूफान क्‍वीन थी। इंटरनेट पर फाइटिंग हीरो का उल्‍लेख मिलता है। यों दोनों ही फिल्‍मेंब 1946 में आई थीं।
एसएन त्रिपाटी के संरक्षण से निकलते पर चित्रगुप्‍त ने आरंभ में स्‍टंड और एक्‍शन फिल्‍मों में संगीत दिया। संगीतकार एसडी बर्मन ने उनका परिचय दक्षिण के एवीएम से करवा दिया। इस प्रोडक्‍शन के लिए उन्‍होंने अनेक धार्मिक और सामाजिक फिल्‍मों में संगीत दिया। दिग्‍गज संगीतकारों के बीच मुख्‍यधारा की फिल्‍मों में जगह बनाने में उन्‍हें देर लगी। हाशिए पर मिले कुछ मौकों में ही उन्‍होंने अपना हुनर जाहिर किया। उनके गीत पॉपुलर हुए। समीक्षकों और संगीतप्रेमियों ने उनकी तारीफ भी की। हालांकि 1946 से चित्रगुप्‍त को स्‍वतंत्र फिल्‍में मिलने लगी थीं,ले‍किन उन्‍हें सिंदबाद द सेलर से ख्‍याति मिली। इस फिल्‍म में उन्‍होंने अंजुम ज्‍यपुरी और श्‍याम हिंदी के लिखे गीतों को शमशाद बेगम,मोहम्‍मद रफी और किशोर कुमार से गवाया था। इसी फिल्‍म के एक गीत धरती आजाद है में चित्रगुप्‍त ने मोहम्‍म्‍द रफी के साथ आवाज भी दी थी।
16 नवंबर 1917 को बिहार में जन्‍मे चित्रगुप्‍त का निधन मुंबई में 14 जनवरी 1991 को उनके बेटों की फिल्‍म कयामत से कयामत तक आ चुकी थी। उन्‍होंने अपने पापा के नाम और परंपरा को थाम लिया था। चित्रगुप्‍त के करिअर में 1962 में आई भोजपुरी की पहली फिल्‍म गंगा मैया तोहे पियरी चढ़इबो का खास महत्‍व है। इस फिल्‍म के बाद उन्‍होंने अनेक भोजपुरी फिल्‍मों में संगीत दिया। इस उल्‍लेखनीय शिफ्ट से उनके संगीत में भी बदलाव आया। 1962 के बाद की उन्‍की हिंदी फिल्‍मों के संगीत में भी भोजपुरी या यूं कहें कि पुरबिया धुनों और वाद्यों की गूंज सुनाई पड़ती है। चित्रगुप्‍त के संगीत में हिंदुस्‍तान की धरती की भरपूर सुगंध है। हिंदीभाषी इलाके से आने की वजह से उनके निर्देशन में लोकप्रिय गायकों की आवाज में शब्‍दों की शुद्धता के साथ लहजे और उच्‍चारण पर भी जोर दिखता है। वे गीतकारों की भी मदद करते थे। अंतरों में शब्‍दों को ठीक करने से लेकर भावों के अनुकूल शब्‍दों के चयन तक में उनका योगदान रहता था। आज का दौर रहता तो उन्‍हें कई गीतों में गीतकार का भी क्रेडिट मिल जाता।
उम्‍मीद है कि उनकी जन्‍म शताब्‍दी के वर्ष में उनके महत्‍व और योगदान को रेखांकित किया जाएगा। कम से कम बिहार सरकार और वहां की सरकारी व गैरसरकारी फिल्‍म और सांस्‍कृतिक संस्‍थाएं ध्‍यान देंगी। 
बाक्‍स आफिस
दर्शक बढ़े हरामखोर के

समीति बजट से कम लागत में बनी श्‍लोक शर्मा की हरामखोर ने पहले वीकएंड में 1 करोड़ से अधिक का कलेक्‍शन किया। फिल्‍म कारोबार में ऐसी छोटी फिल्‍मों के मुनाफे पर ध्‍यान नहीं जाता। इस लिहाज से हरामखोर कामयाब फिल्‍म है। शुक्रवार को इसका कलेक्‍शन 23.70 लाख था,जो रविवार को बढ़ कर 41.90 लाख हो गया। वहीं शाद अली की फिल्‍म ओक जानू की यह बढ़त मामूली रही। शुक्रवार को ओक जानू का कलेक्‍शन 4.08 करोड़ था,जो शनिवार को 4.90 और रविवार को 4.82 करोड़ हुआ। ओके जानू का वीकएंड कलेक्‍शन 13.80 करोड़ रहा। हां,इस बीच दंगल ने 370 करोड़ का भी आंकड़ा पार कर लिया।
 


Friday, January 13, 2017

दरअसल : इंतजार है ईमानदार जीवनियों का



दरअसल...
इंतजार है ईमानदार जीवनियों का
-अजय ब्रह्मात्‍मज
इस महीने ऋषि कपूर और करण जौहर की जीवनियां प्रकाशित होंगी। यों दोनों फिल्‍मी हस्तियों की जीवनियां आत्‍मकथा के रूप में लाई जा रही हैं। उन्‍होंने पत्रकारों की मदद से अपने जीवन की घटनाओं और प्रसंगों का इतिवृत पुस्‍तक में समेटा है। मालूम नहीं आलोचक इन्‍हें जीवनी या आत्‍मकथा मानेंगे? साहित्यिक विधाओं के मुताबिक अगर किसी के जीवन के बारे में कोई और लिखे तो उसे जीवनी कहते हैं। हां,अगर व्‍यक्ति स्‍वयं लिखता है तो उसे आत्‍मकथा कहेंगे। देव आनंद(रोमासिंग विद लाइफ) और नसीरूद्दीन शाह(एंड देन वन डे: अ मेम्‍वॉयर) ने आत्‍मकथाएं लिखी हैं। दिलीप कुमार की द सब्‍सटांस ऐंड द शैडो : ऐन ऑटोबॉयोग्राफी आत्‍मकथा के रूप में घोषित और प्रचारित होने के बावजूद आत्‍मकथा नहीं कही जा सकती। यह जीवनी ही है,जिसे उदय तारा नायर ने लिखा है। इसी लिहाज से ऋषि कपूर और करण जौहर की पुस्‍तकें मुझे जीवनी का आभास दे रही है।
हिंदी फिल्‍मों के स्‍टार और फिल्‍मकार अपने जीवन प्रसंगों के बारे में खुल कर बातें नहीं करते। नियमित इंटरव्‍यू में उनके जवाब रिलीज हो रही फिल्‍म तक सीमित रहते हैं। इन दिनों तो फिल्‍म स्‍टारों के इंटरव्‍यू में उनके पीआर और मैनेजर पहले ही हिदायत दे देते हैं कि सवाल फिल्‍म या इवेंट से ही संबंधित हो। अब तो वे खुद इंटरव्‍यू के दौरान बैठे रहते हैं। अगर कभी स्‍टार जवाब देने में बह जाए तो वे आंखें तरेरने लगते हैं। उनका दबाव और हस्‍तक्षेप इतना बढ़ गया है कि वे कई बार पत्रकार और स्‍टार तक को सवाल व जवाब से रोक देते हैं। ऐसी स्थिति में हर बातचीत यांत्रिक और लगभग एक जैसी होती है। इसमें एक और रोचक समस्‍या सन्निहित है। हम पत्रकार जब किसी नई फिल्‍म के बारे में बातचीत करने जाते हैं तो एकत्रित सूचनाओं के आधार पर सवाल करते हैं। कोशिश रहती है कि फिल्‍म और फिल्‍म बनाने की प्रक्रिया पर जानकारियां मिलें। स्‍टार और डायरेक्‍टर की पूरी कोशिश यह र‍हती है कि वे फिल्‍म के बारे में कुछ भी नहीं पता चलने दें। सवाल-जवाब की इस लुकाछिपी की वजह से इन दिनों जीवन शैली,परिधान और उनकी यात्राओं से संबंधित बातें ही हो पाती हैं। अपने यहा फिल्‍म स्‍टार कुछ भी बोलने में हिचकने के साथ डरते भी हैं। हम ने देखा कि असहिष्‍णुता के मामले में अपना पक्ष रखने के नतीजे आमिर खान और शाह रूख खान ने भुगते। हम कल्‍पना नहीं कर सकते कि हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री की कोई हस्‍ती मेरिल स्ट्रिप की तरह देश के सर्वोच्‍च पद पर बैठी हस्‍ती पर सवाल करे।
तात्‍पर्य यह कि अभिव्‍यक्ति के इस संकोच की वजह से जीवनी और आत्‍मकथाएं रोचक नहीं हो पातीं। उन्‍हें पढ़ते हुए कोई नई जानकारी नहीं मिलती। कई बार तो यह भी लगता है कि फिल्‍मी हस्‍तियों की तरफ से तथ्‍यों की लीपापोती की जा रही है। जैसे वे पर्दे पर आने के पहले मेकअप कर लेते हैं,वैसे ही पन्‍नों पर आने के पहले बातों को डिजाइन और मेकअप से पोत देते हैं। करण जौहर की फिल्‍मों और जीवनशैली में जिंदगी की सच्‍चाइयों की झलक भी डिजाइन की जाती है। उनके शो और इवेंट स्क्रिप्‍टेड होते हैं। मुझे उनकी जीवनी में उनकी जिंदगी की सच्‍चाई की कम उम्‍मीद है। वे सेक्‍सुअलिटी के मामले को दबे-ढके तरीके से ही उजागर करेंगे। हां,ऋषि कपूर की जीवनी रोचक हो सकती है। उन्‍होंने ट्वीट किया है कि यह दिल से लिखी मेरी जिंदगी और घड़ी है...जैसा मैंने जिया। अगर वे वादे और पुस्‍तक के शीर्षक के मुताबिक खुल्‍लमखुल्‍ला कुछ कह पाते हैं तो बढि़या।

बाक्‍स आफिस
कलेक्‍शन के अखाड़े में दंगल विजेता
हिंदी फिल्‍मों में 100 करोड़ क्‍लब कलेक्‍शन और कमाई का पहला क्‍वालिफाइंग कदम बन चुका है। इसके बाद ही किसी फिल्‍म को सफल माना जाता है। ज्‍यादा सफल फिल्‍में 200-300 करोड़ तक पहुंचती हैं। कुछ फिल्‍मों ने ही 300 करोड़ से अधिक का कलेक्‍शन किया है। दंगल हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री की पहली फिल्‍म है,जिसने 350 करोड़ से अधिक का कलेक्‍शन कर एक नया मानदंड स्‍थापित कर दिया है। इसने सिर्फ 19 दिनों में 353ण्‍68 करोड़ का कलेक्‍शन किया है। अब देखना है कि यह 375 से 400 करोड़ तक पहुंच पाती है कि नहीं?


Friday, January 6, 2017

दरअसल : स्‍वागत 2017,अलविदा 2016



दरअसल...
स्‍वागत 2017,अलविदा 2016
-अजय ब्रह्मात्‍मज
2016 समाप्‍त होते-होते नीतेश तिवारी की दंगल ने हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री पर छाए शनि को मंगल में बदल दिया। इस फिल्‍म के अपेक्षित कारोबार से सभी खुश हैं। माना जा रहा है कि दंगल का कारोबार पिछले सारे रिकार्ड को तोड़ कर एक नया रिकार्ड स्‍थापित करेगा। दंगल की कामयाबी दरअसल उस ईमानदारी की स्‍वीकृति है,जो आमिर खान और उनकी टीम ने बरती। कभी सोच कर देखें कि कैसे एक निर्देशक,स्‍टार और फिल्‍म के निर्माता मिल कर एक ख्‍वाब सोचते हैं और सालों उसमें विश्‍वास बनाए रखते हैं। दंगल के निर्माण में दो साल से अधिक समय लगे। आमिर खान ने किरदार के मुताबिक वजन बढ़ाया और घटाया। हमेशा की तरह वे अपने किरदार के साथ फिल्‍म निर्माण के दौरान जीते रहे। उनके इस समर्पण का असर फिल्‍म यूनिट के दूसरे सदस्‍यों के लिए प्रेरक रहा। नतीजा सभी के सामने है।
दंगल साल के अंत में आई बेहतरीन फिल्‍म रही। इसके साथ 2016 की कुछ और फिल्‍मों का भी उल्‍लेख जरूरी है। हर साल रिलीज हुई 100 से अधिक फिल्‍मों में से 10-12 फिल्‍में ऐसी निकल ही आती हैं,जिन्‍हें हम उस साल का हासिल कह सकते हैं। 2016 में हिंदी फिल्‍मों की वैरायटी बढ़ी है। युवा फिल्‍मकारों ने नए प्रयोग किए। उन्‍हें सराहना मिली। निश्चित ही फिल्‍म एक ऐसा कला व्‍यापार है,जिसमें मुनाफे की उम्‍मीद बनी रहती है। फिर भी उन प्रयासों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता,जिनसे हिंदी सिनमा को गहराई के साथ विस्‍तार मिलता है। ऐसी फिल्‍में युवा फिल्‍मकारों के प्रेरणा बनती हैं। फिल्‍म निर्माता भी भविष्‍य में ऐसी फिल्‍मों के लिए तैयार रहते हैं।
2016 की अपनी प्रिय फिल्‍मों में मैं जुगनी,जुबान,निल बटे सन्‍नाटा,पिंक,की एंड का,एयरलिफ्ट,लाल रंग,नीरजा,अलीगढ़,’’धनक,वेटिंग,उड़ता पंजाब ,फैन,मदारी,बुधिया सिंह-बॉर्न टू रन,रमन राघव 2.0,पिंक,एम एस धौनी-द अनटोल्‍ड स्‍टोरी,डियर जिंदगी और दंगल को शामिल करूंगा। हो सकता है कि इनमें से कुछ फिल्‍में आप सभी के शहरों के सिनेमाघरों में नहीं पहुंच सकी हों। प्रदर्शकों और वितराकों का तंत्र कुछ फिल्‍मों का कारोबार पहले ही तय कर देता है। उनके मैनेजर आउट ऑफ बाक्‍स फिल्‍मों को तरजीह नहीं देते,जबकि उनके हिसाब से हिट समझी जा रही फिल्‍में भी बाक्‍स आफिस पर औंधे मुंह गिरती हैं। बमुश्किल वे इन फिल्‍मों की रिलीज के लिए तैयार भी होते हैं तो उन्‍हें थिएटर में ऐसी शो टाइमिंग मिलती है कि दर्शक अपनी मर्जी से फिल्‍म नहीं देख पाते।
मैं तो कहूंगा कि इनमें से कुछ फिल्‍में आप ने नहीं देखी हों तो उन्‍हें देखने का इंतजाम करें। अभी तो रिलीज के बाद फिल्‍में देखने के इतने माध्‍यम उपलब्‍ध हैं। आप गौर करेंगे कि पिछले साल की उल्‍लेखनीय फिल्‍मों में से किसी का भी निर्देशक स्‍थापित नाम नहीं है। वे सभी नए हैं। वे देश की सच्‍ची कहानियं चुन रहे हैं। मेरी पसंद की फिल्‍मों में से पांच तो बॉयोपिक हैं। उनमें से एक धौनी के अलावा बाकी सभी नामालूम व्‍यक्तियों पर हैं। निर्देशकों ने उनकी साधारण जिंदगियों की असाधारण उपलब्धियों को खास परिप्रेक्ष्‍य दिया। सभी फिल्‍मकार अपनी सोच से कुछ खास कहना चाहते हैं। और भी एक बात गौर करने की है कि इन निर्देशकों में कोई भी फिल्‍म इंडस्‍ट्री से नहीं आया है। वे सभी आउटसाइडर हैं। अपनी क्रिएटिव क्षमता के बल पर वे पहचान बना रहे हैं। मैं पिछले दस सालों से यह दोहरा रहा हूं कि हिंदी फिल्‍मों को आउटसाइटर ही विस्‍तार दे रहे हैं। उनके पास देश की माटी की कहानियां हैं। उनके पास जिंदगी के धड़कते अनुभव हैं।
उम्‍मीद है कि 2017 में भी यह सिलसिला कायम रहेगा। ऐसे फिल्‍मकारों और उनकी फिल्‍मों का दर्शकों का प्‍यार मिलेगा।
बाक्‍स आफिस
13 दिनों में दंगल के 300 करोड़

नीतेश तिवारी की दंगल नए कीर्तिमान रच रही है। यह पहली हिंदी फिल्‍म है,जिसने दूसरे हफ्ते के छह दिनों में 100 करोड़ से अधिक का कारोबार किया है। कुल 13 दिनों में 304.08 का कारोबार कर दंगल संकेत दे रही है कि यह सबसे अधिक कमाई की फिल्‍म हो जाएगी। 300 करोड़ से अधिक को कलेक्‍शन करनेवाली चौथी फिल्‍म हो गई है दंगल। अगर दर्शकों का प्रेम जारी रहा तो निश्चित ही यह अव्‍वल नंबर पर आ जाएगी। इस हफ्ते भी किसी नई फिल्‍म की रिलीज न होने से इसके शो कम नहीं हुए हैं।
 

दरअसल : प्रचार का ‘रईस’ तरीका



दरअसल,
प्रचार का रईस तरीका

- अजय बह्मात्‍मज
कुछ समय पहले शाह रुख खान ने अगले साल के आरंभ में आ रही अपनी फिल्‍म रईस का ट्रेलर एक साथ 3500 स्‍क्रीन में लांच किया। आप सोच सकते हैं कि इसमें कौन सी नई बात है। यों भी फिल्‍मों की रिलीज के महीने-डेढ़ महीने पहले फिल्‍मों के ट्रेलर सिनेमाघरों में पहुंच जाते हैं। मीडिया कवरेज पर गौर किया हो तो ट्रेलर लांच एक इवेंट होता है। बड़ी फिल्‍मों के निर्माता फिल्‍म के स्‍टारों की मौजूदगी में यह इवेंट करते हैं। प्राय: मुंबई के किसी मल्‍टीप्‍लेक्‍स में इसका आयेजन होता है। फिर यूट्यूब के जरिए या और सिनेमाघरों में दर्शक उन्‍हें देख पाते हैं। इन दिनों कई बार पहले से तारीख और समय की घोषण कर दी जाती है और ट्रेलर सोशल मीडिया पर ऑन लाइन कर दिया जाता है। इस बर लांच के समय देश के दस शहरों के सिनेमाघरों में आए दर्शकों ने उनके साथ इटरैक्‍ट किया।
आमिर खान और शाह रुख खान अपनी फिल्‍मों के प्रचार के नायाब तरीके खोजते रहते हैं। वे अपने इन तरीकों से दर्शकों और बाजार को अचंभित करते हैं। उनकी फिल्‍मों के प्रति जिज्ञासा बढ़ती है और उनकी फिल्‍में हिट होती हैं। उनकी हर नई फिल्‍म की रिलीज के समय अब दर्शकों को भी इंतजार रहता है कि इस बार कौन सी नई रणनीति अपना रहे हैं। इस बार सभीको आश्‍चर्य हो रहा है कि आमिर खान दंगल के प्रचार में आक्रामक रुख क्‍यों नहीं अपना रहे है? आप देखें कि फिल्‍म के बाकी कलाकारों के इंटरव्‍यू छप रहे हें,लेकिन आमिर खामोश हैं। वे बीच-बीच में ऐसा करते हैं। बगैर जोरदार प्रचार के ही दंगल के प्रति उत्‍सुकता बनी हुई है। कुछ सालों पहले रा.वन की रिलीज के समय तो शाह रुख खान ने अपने प्रचार से ऐसा आतंकित कर दिया था कि दर्शकों के बीच फुसफुसाहट चलने लगी थी कि यह फिल्‍म तो देखनी ही पड़ेगी। अन्‍यथा धर की टीवी से निकल कर शाह रुख बाहर आ जाएंगे।
शाह रुख खान ने रईस के प्रचार का नायब तरीका खोजा। उन्‍होंने यूएफओ की मदद से देश के दस शहरों के दर्शकों के साथ लाइव संवाद किया। मुंबई,दिल्‍ली,कोलकाता,मोगा,अहमदाबाद,सूरत,बंगलोर,हैदराबाद,इंदौर और जयपुर के मल्‍टीप्‍लेक्‍स में आए चुनिंदा दर्शकों के साथ उन्‍होंने रईस के बारे में बातें कीं। इस नए प्रयोग से यह भी जाहिर हुआ कि आने वाले समय में इवेंट कवरेज में मीडिया की भूमिका सीमित होने जा रही है। अब देश के दर्शकों से स्‍टार सीधा संवाद कर सकते हैं। उन्‍हें किसी और माध्‍यम की जरूरत नहीं रह जाएगी। शाह रुख ने कहा भी कि किसी एक शहर में ट्रेलर लांच करने से अच्‍छा है कि उसे ऐसे इवेंट के जरिए सबसे शेयर किया जाए। मुझे पूरी उम्‍मीद है कि आने वाले समय में और भी स्‍टार इस तरीके को अपनाएंगे। दर्शकों का फिल्‍म से लगाव बढ़ेगा और वे फिल्‍म देखने के लिए लालायित होंगे। निर्माताओं के लिए खर्च के हिसाब से भी यह मुफीद रहेगा। फिल्‍म स्‍टार को शहर-दर- शहर ले जाने के भारी खर्च में बचत होगी।
सोशल मीडिया के ट्वीटर,फेसबुक,यूट्यूब आदि फोरम के बाद यूण्‍फओ की मदद से देश के अनेक शहरों के दर्शकों से दोतरफा संवाद से नई संभावनाएं उजागर होंगी। पाठकों का बता दें कि यूएफओ देश की एक ऐसी कंपनी है,जिसने फिल्‍मों के डिजीटल प्रक्षेपण की शुरूआत की थी। डिजीटल प्रक्षेपण से निर्माता अपनी फिल्‍म देश के सुदूर सिनेमाघरों तक कम लागत में पहुंचा सकता है। इसमें पारंपरिक तरीके से फिल्‍म के प्रिंट पहुंचाने की जरूरत नहीं रहती। इसके अनेक फायदे दिख रहे हैं।
अपनी ख्‍याति के अनुरूप शाह रुख खान ने प्रचार की नई पहल में पूरा सहयोग किया। उन्‍होंने फिलम से इतर नोटबंदी आदि की भी बातें कीं और बताया कि फिल्‍म में पहनी ताबीज उनकी है। इसमें उनके मां-पिता की तस्‍वीर है। ऐसी निजी बातों और शेयरिंग से स्‍आर के प्रति दर्शक की वफादारी बढ़ती है। वे फिल्‍म के दर्शक बनते हैं।

Thursday, December 15, 2016

दरअसल : ’कयामत से कयामत तक’ की कहानी



दरअसल....
कयामत से कयामत तक की कहानी
-अजय ब्रह्मात्‍मज
29 अप्रैल 1988 को रिलीज हुई मंसूर खान की फिल्‍म कयामत से कयामत तक का हिंदी सिनेमा में खास स्‍थान है। नौवां दशक हिंदी सिनेमा के लिए अच्‍छा नहीं माना जाता। नौवें दशक के मध्‍य तक आते-आते ऐसी स्थिति हो गई थी कि दिग्‍गजों की फिल्‍में भी बाक्‍स आफिस पर पिट रही थीं। नए फिल्‍मकार भी अपनी पहचान नहीं बना पा रहे थे। अजीब दोहराव और हल्‍केपन का दोहराव और हल्‍केपन का दौर था। फिल्‍म के कंटेट से लेकर म्‍यूजिक तक में कुछ भी नया नहीं हो रहा था। इसी दौर में मंसूर खान की कयामत से कयामत तक आई और उसने इतिहास रच दिया। इसी फिलम ने हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री को आमिर खान जैसा अभिनेता दिया,जो 29 सालों के बाद भी कामयाब है। हमें अगले हफ्ते उनकी अगनी फिल्‍म दंगल का इंतजार है।
दिल्‍ली के फिल्‍म लेखक गौतम चिंतामणि ने इस फिलम के समय,निर्माण और प्रभाव पर संतुलित पुस्‍तक लिखी है। हार्पर का‍लिंस ने इसे प्रकाशित किया है। गौतम लगातार फिल्‍मों पर छिटपुट लेखन भी किया करते हैं। उन्‍होंने राजेश खन्‍ना की जीवनी लिखी है,जिसमें उनके एकाकीपन को समझने की कोशिश है। इस बार उन्‍होंने स्‍टार के बजाए फिल्‍म पर फोकस किया है। हिंदी फिल्‍मों की मेक्रिग पर बहुत कम लिखा गया है। चर्चित और क्‍लासिक फिल्‍मों पर भी व्‍यवथित और विस्‍तृत लेखन नहीं मिलता। इस संदर्भ में गौतम की पुस्‍तक का खास महत्‍व है। उन्‍होंने केवल एक कामयाब और ट्रेंड सेंटर फिल्‍म के निर्माण तक खुद को सीमित नहीं रख है। उन्‍होंने कयात से कयामत तक के समय और संदर्भ को समझने की कोशिश की है।
गौतम चिंतामणि ने फिल्‍म के निर्देशक मंसूर खान के नजरिए के साथ उन सभी की बातों पर भी ध्‍यान दिया है,जो कलाकार या किसी और तौर पर फिल्‍म से जुड़े हुए थे। उन्‍होंने आमिर खान,जूही चावला,दिलीप ताहिल,आलोकनाथ के साथ ही संगीतकार आंनद-मिलिंद और कैमरामेन किरण देवहंस से भी संदर्भ लिया है। अच्‍छी बात यह है कि इन सभी की बातों तक ही वे सीमित नहीं रहते1 वे कयामत से कयामत तक तक की सीमाओं पर भी अपनी राय रखते हैं। आखिर क्‍यों यह फिल्‍म दिलवाले दुल्‍हनिया ले जाएंगे की तरह बाद की फिल्‍मों को प्रभावित नहीं कर सकी? गौर करें तो स्‍वयं आमिर खान अपनी पहली फिल्‍म से इतने बड़े हो गए हैं कि यह फिल्‍म छोटी हो गई है। उन्‍होंने कंटेंट और कामयाबी की बड़ी लकीर खींच दी है। कयामत से कयामत तक के सीमित प्रभाव के बारे में गौतम के पास अपने तर्क हैं। उनसे असहमति नहीं हो सकती,लेकिन वे दोनों फिल्‍मों के सामाजिक संदर्भ और राष्‍ट्रीय परिप्रेक्ष्‍य में नहीं जाते। देश में आए आर्थिक उदारीकरण और आप्रवासी भारतीयों पर बढ़ते जोर के कारण हिंदी फिल्‍मों को कंटेंट तेजी से बदला था।
हालांमि पुस्‍तक में मंसूर खान के हवाले और स्‍वयं गौतम चिंतामणि के शोध से उस समय की हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री के साक्ष्‍य पेश किए गए हैं,लेकिन फिल्‍में केवल इंडस्‍ट्री के दायरे में नहीं रहतीं। उनके निर्माण और प्रभाव के सामयिक कारण होते हैं। इस पुस्‍तक में उन पक्षों की विवेचना नहीं मिलती। गौतम इस तथ्‍य पर अधिक जोर देते हैं कि मंसूर खान हिंदी फिल्‍मों के रिदारों में आधुनिकता ले आए। उन्‍होंने फिल्‍म का अंत भी पारंपरिक नहीं रखा। वे अपने पिता के दबाव में नहीं आए और उन्‍होंने अपनी सोच से कुछ नया किया। हिंदी फिल्‍मों की नैरेटिव परिपाटी से असंतुष्‍ट मंसूर खान ने अपनी फिल्‍म में बड़ा बदलाव किया।
द फिल्‍म दैट रिवाइव्‍ड हिंदी सिनेमा: कयामत से कयामत तक
लेखक- गौतम चिंतामणि
प्रकाशक- हार्पर कालिंस पब्लिशर्स

Thursday, December 8, 2016

दरअसल : लोकप्रिय स्‍टार और किरदार



दरअसल...
लोकप्रिय स्‍टार और किरदार

-अजय ब्रह्मात्‍मज

हाल ही में गौरी शिंदे निर्देशित डियर जिंदगी रिलीज हुई है। इस फिल्‍म को दर्शकों ने सराहा। फिल्‍म में भावनात्‍मक रूप से असुरक्षित क्‍यारा के किरदार में आलिया भट्ट ने सभी को मोहित किया। उनकी उचित तारीफ हुई। ऐसी तारीफों के बीच हम किरदार के महत्‍व को नजरअंदाज कर देते हैं। हमें लगता है कि कलाकार ने उम्‍दा परफारमेंस किया। कलाकारों के परफारमेंस की कद्र होनी चाहिए,लेकिन हमें किरदार की अपनी खासियत पर भी गौर करना चाहिए। दूसरे,कई बार कलाकार किरदार पर हावी होते हैं। उनकी निजी छवि और लोकप्रियता किरदार को आकर्षक बना देती है। किरदार और कलाकार की पसंदगी की यह द्वंद्वात्‍मकता हमारे साथ चलती है। कभी कलाकार अच्‍दा लगता है तो कभी कलाकार।
हम सभी जानते और मानते हैं कि सलमान खान अत्‍यंत लो‍कप्रिय अभिनेता हैं। समीक्षक उनकी और उनकी फिल्‍मों की निंदा और आलोचना करते रहे हैं,लेकिन इनसे उनकी लो‍कप्रियता में कोई कमी नहीं आई है। एक बार बातचीत के क्रम में जब मैंने उनसे ही उनकी लोकप्रियता को डिकोड करने के लिए कहा तो उन्‍होंने मार्के की बात कही। उन्‍होंने कहा कि आम दर्शक जब हमें पर्दे पर देखता है तो वह केवल उस फिल्‍म के किरदार को नहीं देख रहा होता है। वह उस सलमान को भी देख रहा होता है,जिसे वह बहुत प्‍यार करता है। मेरी फिल्‍में देखते समय उनके दिमाग में मेरी वह छवि भी चलती रहती है,जो उन्‍होंने खुद निर्मित की है। ऐसा सभी लोकप्रिय कलाकारों के साथ होता है। उनकी फिल्‍में देखते समय हम जाने-अनजाने कलाकार की लोकप्रियता के प्रभाव में उसकी छोटी कमियों को नजरअंदाज कर देते हें। उसकी खूबियों को बढ़ा देते हैं। वास्‍तव में हम खुश रहते और होते हैं। यह अपने प्रेमी-प्रेमिका,प्रिय परिजनों या दोस्‍तों से मिलने की तरह है,जिनके देखे से आ जाती है चेहरे पर रौनक....
बचपन से हम हिंदी फिल्‍में देख रहे हैं। हिंदी फिल्‍मों ने हमारे अंतस में एक संसार रचा है। इस संसार के कार्य-कलाप बाहरी दुनिया से अलग होते हैं। जाहिर तौर पर वे फिल्‍मी व्‍यवहार होते हैं,लेकिन आप गौर करेंगे कि हम जिंदगी में उन फिल्‍मी अनुभवों को दोहराते और जीना चाहते हैं। प्रेम का हमारा व्‍यक्तिगत प्रयास भी फिल्‍मों से प्रभावित होता है। हम प्रेमी या प्रेमिका से फिल्‍मी प्रतिक्रिया की अपेखा रखते हैं। हम सभी की जिंदगी किसी फिल्‍म से कम नही है। नीरस से नीरस व्‍यक्ति के जीवन की एडीटिंग कर दो-ढाई घंटे निकाल कर किसी चलचित्र की तरी देखें तो वह बहुत रोचक होगा। अपनी जिंदगी में हम सभी ढाई घंटे से ज्‍यादा ही खुश,संतुष्‍ट और तृप्‍त रहते हैं। भारतीय समाज में दर्शकों और फिल्‍मों के इस रिश्‍ते पर अधिक काम नहीं हुआ है।
बात डियर जिंदगी से आरंभ हुई थी। यह फिल्‍म अधिकांश दर्शकों को अच्‍छी लगी है। इसकी संवेदना ने टच किया है। जहांगीर खान के रूप में शाह रुख खान ने हम सभी को सहलाया है। हम चाहते और उम्‍मीद करते हैं हमारी जिंदगी में भी जहांगीर खान जैसा दिमाग का डाक्‍टर आ जाए तो जिंदगी की उलझने कम हों। हम सरल हो जाएं। जहांगीर खान की बातों और मशविरे से क्‍यारा को नई दिशा मिली। उसका आत्‍मविश्‍वास लौटा। उसकी असुरक्षा मिटी। अब जरा ठहरें और बताएं कि क्‍या महज जहांगीर खान के किरदार ने हमें प्रभावित किया या उस भूमिका में शाह रूख खान की मौजूदगी ने हमें संवेदित किया? आप पाएंगे कि शाह रुख खान का भी असर काम करता रहा। थोड़ी देर के लिए मान लें कि आप शाह रुख खान को नहीं जानते। आप उनकी छवि से अप्रभावित हैं। तब भी क्‍या यही असर रहता। शायद नहीं,क्‍योंकि जहांगीर खान में शाह रुख खान भी थे,जो हमें अच्‍छे लगते हैं। इस किरदार को गढ़ने और उसके परफारमेंस में गौरी शिंदे ने बारीकी से शाह रुख खान की पॉपुलर इमेज और मैनरिज्‍म का उपयोग किया है। गौरी शिंदे स्‍मार्ट डायरेक्‍टर हैं। उन्‍होंने संयम से काम लिया। शाह रुख खान की मौजूदगी में वह बही और बहकी नहीं।


Thursday, December 1, 2016

दरअसल : वर्चुअल रियलिटी



दरअसल...
वर्चुअल रियलिटी
-अजय ब्रह्मात्‍मज
पिछलें दिनों गोवा में आयोजित फिल्‍म बाजार में वर्चुअल रियलिटी के प्रत्‍यक्ष एहसास के लिए एक कक्ष रखा गया था। फिल्‍म बाजार में आए प्रतिनिधि इस कक्ष में जाकर वर्चुअल रियलिटी का अनुभव ले सकते थे। कुछ सालों से ऑडियो विजुअल मीडियम की यह नई खोज सभी को आकर्षित कर रही है। अभी प्रयोग चल रहे हैं। इसे अधिकाधिक उपयोगी और किफायती बनाने का प्रयास जारी है। यह तकनीक तो कुछ महीनों या सालों में अासानी से उपलब्‍ध हो जाएगी। अब जरूरत है ऐसे कल्‍पनाशील लेखकों की जो इस तकनीक के हिसाब से स्क्रिप्‍ट लिख सकें। अभी तक मुख्‍य रूप से इवेंट या समारोहों के वीआर(वर्चुअल रियलिटी) फुटेज तैयार किए जा रहे हैं। मांग और मौजूदगी बढ़ने पर हमें कंटेंट की जरूरत पड़ेगी।
वर्चुअल रियलिटी 360 डिग्री और 3डी से भी आगे का ऑडियो विजुअल अनुभव है। वर्चुअल रियलिटी का गॉगल्‍स या चश्‍मे की तरह का खास उपकरण आंखों पर चड़ा लेने और ईयर फोन कान पर लगा लेने के बाद हम अपने परिवेश से कट जाते हैं। हमारी आंखों के सामने केवल दृश्‍य होते हैं और कानों में आवाजें...किसी भी स्‍थान पर बैठे रहने के बावजूद हम यकायक निर्दिष्‍ट स्‍थान में पहुंच जाते हैं। कुछ ही देर में हम उस इवेंट या दृश्‍यलोक के भागीदार हो जाते हैं। दसों दिशाओं चल रही गतिविधियों को हम देख सकते हैं। यों लगता है कि हम कांच के फर्श पर बैठे हैं। हमारे पांवों के तले की दुनिया भी हमारे चाक्षुष अनुभव का हिस्‍सा हो जाती है। इस अनुभव को महसूस करने पर ही इसके प्रभाव का अंदाजा हो सकता है। युनाइटेड नेशन में एआर रहमान के वंदे मातरम की प्रस्‍तुति को वर्चुअल रियलिटी में देखते समय यों लग रहा था कि हम कहीं बीच में बैठ गए हैं और सारी गतिविधियां हमारे इर्द-गिर्द हो रही हैं।
जानकार बताते हैं कि वर्चुअल रियलिटी का उपयोग श्सिक्षण,मेडिकल,विज्ञान,फिल्‍मों के साथ जीवन के तमाम क्षेत्रों में हो सकता है। मेडिकल साइंस में इसका उपयोग अशक्‍त और पक्षाघात से ग्रस्‍त रोगियों को स्‍टीमुलेट करने में किया जा सकता है। बाहरी दुनिया से पृथक कर रोगियों का बेहतर इलाज किया जा सकता है। उनके दिमाग के स्‍नायु ही उनके शिथिल स्‍नायुओं को झंकृत कर सकेंगे। मेडिकल साइंस में इसे एक क्रांति के रूप में देखा जा रहा है।
वर्चुअल रियलिटी मनोरंजन के अनुभव को गहरा और विस्‍तृत कर देगा। हम सीधे किरदारों के बीच पहुंच जाएंगे और उनकी दुनिया का हिस्‍सा बन जाएंगे। फिल्‍मों में इसके उपयोग पर फिल्‍मकार और तकनीशियन काम कर रहे हैं। माना जा रहा है कि कुछ महीनों में ही यानी 2017 में वीआर फिल्‍में और शोज तैयार कर लिए जाएंगे। फिलहाल यह थोड़ा महंगा और जटिल कार्य है। बताते हैं कि वीआर शूट के लिए मिलने वाले कैमरों की कीमत ही 60 लाख से 1 करोड़ के बीच है। इसकी शूटिंग में कई कैमरे एक साथ इस्‍तेमाल किए जाते हैं। फिर सभी गतिचित्रों(फुटेज) की बारीक सिलाई की जाती है। कहीं भी कोई झटका न लगे। स्‍मार्ट फोन के कैमरे से कभी आप ने पैनोरोमिक तस्‍वीरे ली होंगी। यह उसी का वृहद विस्‍तार है। किसी भी खास पल में दसों दिशाओं में चल रही घटनाओं को हम एक साथ कैद कर सकते हैं और उन्‍हें दिखा सकते हैं।
वर्चुअल रियलिटी के पहले अनुभव में इसकी कुछ सीमाएं और अड़चनें भी जाहिर हुईं। फिल्‍में देखते समय हम सामने चल रहे क्रिया-कलापों पर गौर करते हैं। उन किरदारों के साथ जुड़ जाते हैं। पूरी फिल्‍म में हम उनके साथ रहते हैं। हम नहीं पता रहता कि नायक-नायिका के आसपास और क्‍या हो रहा है? वीआर देखते समय यह एहसास बना रहता है कि हमारे पीछे भी कुछ हो रहा है। हमारे पांवों के नीचे और सिर के ऊपर भी ्रिया-कलाप जारी हैं। इसकी वजह से दृश्‍यों में हमारी संलग्‍नता और एकाग्रता टूटती है। जानकारों ने बताया कि आरंभ में यह अनुभव खंडित लग सकता है,लेकिन धीरे-धीरे आदत होने पर हम आनंदित होना सीख लेंगे। हमारी रस ग्राह्यता वर्चुअल रियलिटी के अनुरूप हो जाएगी।
वर्चुअल रियजलटी को हिंदी में आभासी यथार्थ या वास्‍तविकता कह सकते हैं। इसका गॉगल्‍स बाजार में 500 से 5000 रुपए के बीच उपलब्‍ध है। क्‍या आप मनोरंजन के इस आभासी यथार्थ के लिए तैयार हैं। अभी भले ही ना-नुकूर करें,लेकिन यह तय है कि य‍ह बड़े पैमाने पर हमारे जीवन का प्रभावित करेगा।

Saturday, November 26, 2016

दरअसल : सितारों के बच्‍चे



दरअसल...
सितारों के बच्‍चे
-अजय ब्रह्मात्‍मज
हम यह मान कर चलते हैं कि फिल्‍म इंडस्‍ट्री में सितारों और अन्‍य सेलिब्रिटी के बच्‍चे बड़ चैन व आराम से रहते होंगे। सुख-सुविधाओं के बीच पल रहे उनके बच्‍चों को किसी प्रकार की तकलीफ नहीं होगी। जरूरत की सारी चीजें उन्‍हें मिल जाती होंगी और उनकी ख्‍वाहिशें हमेशा पूरी होती होंगी। ऐसा है भी और नहीं भी है। मां-बाप की लोकप्रियता की वजह से इन बच्‍चों की परवरिश समान आर्थिक समूह के बच्‍चों से अलग हो जाती है। बचपन से ही उन्‍हें यह एहसास हो जाता है कि उनके मां-बाप कुछ खास हैं। सोशल मीडिया और मीडिया के कारण छोटी उम्र में ही उन्‍हें पता चल जाता है कि वे अपने सहपाठियों और स्‍कूल के दोस्‍तों से अलग हैं। ऐसे बचपन के अनुभव के बाद स्‍टार बने कलाकारों ने निजी बातचीत में स्‍वीकार किया है कि हाई स्‍कूल तक आते-आते उनके दोस्‍तों का व्‍यवहार बदल जाता है। वे या तो दूरी बना लेते हैं या उनकी अपेक्षाएं बढ़ जाती हैं। दोनों ही स्थितियों में सितारों के बच्‍चे समाज से कट जाते हैं। उनका बचपन नार्मल नहीं रह जाता। वे दूसरे सितारों के बच्‍चों के साथ नकली और दिखावटी दुनिया में बड़े होते हैं।
आयुष्‍मान खुराना और शुजीत सरकार का परिवार मुंबई में नहीं रहता। दोनों ने अपने परिवार अपने जन्‍म स्‍थान में रखे हैं। आयुष्‍मान खुराना का परिवार चंडीगढ़ में रहता है और शुजीत सरकार को कोलकाता में। इस तरह वे अपने बच्‍चों को फिल्‍म इंडस्‍ट्री की रोजमर्रा चमक-दमक से दूर रखते हैं। संचार माध्यमों और यातायात की सहूलियतें बढ़ने से इस स्‍तर के कलाकारों के लिए फर्क नहीं पड़ता कि वे कहां से ऑपरेट करते हैं। इन दिनों फिल्‍म इंडस्‍ट्री की सेलिब्रिटी के साथ दूसरे संपन्‍न लोग भी अपने परिवारों और बच्‍चों को महानगरीय शोरगुल से अलग रखते हैं। बच्‍चे थोड़े बड़े होते ही देश-विदेश के बोर्डिंग स्‍कूलों में चले जाते हैं। यह अलग बात है कि इस प्रक्रिया में उन्‍हें दुनिया का सामान्‍य ज्ञान भी नहीं मिल पाता। बार में फिल्‍मों में आने पर वे अपनी पिछली पीढि़यों की तरह समाज से परिचित नहीं होते। यह उनकी फिल्‍मों और किरदारों में साफ दिखता है।
अपने बच्‍चों की सेहत,सुरक्षा और करिअर के लिए स्‍टार मां-बाप देश के किसी दूसरे नागरिक के समान ही चिंतित रहते हैं। किशोर उम्र में उनकी जिद और भटकन से वे भी व्‍यथ्ति होते हैं। कहेश भट्ट ने अपने कॉलम में कभी लिखा था कि वे अपनी बेटियों की सुरक्षा के लिए परेशान हो जाते हैं। एक बार उनकी बेटी शाहीन या आलिया किसी डिस्‍को पार्टी में चली गई थीं और देर रात हो गई थी। उन्‍होंने किसी सामान्‍य पिता की तरह अपनी चिंता जाहिर की थीं। हाल-फिलहाल में एक बार शाह रूख खान के इंटरव्‍यू के लिए हम उनके वैनिटी वैन में आए तो उन्‍हें फोन पर देखा। वे मेाबाइल पर किसी से बात कर रहे थे। उनके स्‍वर में चिंता थी। पता चला कि सुहाना परीक्षा के बाद अपनी दोस्‍तों के साथ पार्टी पर जा रही हैं। पिता शाह रूख खान चिंतित थे कि उसने सिक्‍युरिटी गार्ड साथ में लिए हैं कि नहीं। और चलते-चलते यह भी पूछ लिया कि पैसे हैं न? ठीक वैसे ही जैसे हम अपनी बेटियों से आश्‍वस्‍त होते हैं कि उनके पास पैसे हैं न?
कुछ समय पहले किरण राव से मुलाकात हुई। औपचारिक इंटरव्‍यू के बाद उनके बेटे आजाद के बारे में बात होने लगी। आजाद की अच्‍छी परवरिश की योजनाओं के बीच उन्‍हें यह खयाल रखना पड़ता है कि वह सुरक्षित रहे। उसे खेलने और बचपन की अन्‍य गतिविधियों के लिए भेजा जाता है,लेकिन आसपास गार्ड मौजूद रहते हैं। यही स्थिति सभी पॉपुलर सेलिब्रिटी के बच्‍चों के साथ रहती है। उन बच्‍चों पर क्‍या गुजरती होगी? क्‍या वे सामान्‍य तरीके से बड़े होते हैं? छोटी उम्र में ही अतिरिक्‍त ध्‍यान मिलने से उनकी सोच-समझ तो प्रभावित होगी। देश के सामान्‍य नागरिकों के प्रति उनकी क्‍या धारणा बनती है? अनेक सवाल हैं।