Search This Blog

Showing posts with label दरअसल. Show all posts
Showing posts with label दरअसल. Show all posts

Saturday, April 21, 2018

दरअसल : फालके अवार्ड से सम्मानित विनोद खन्ना

दरअसल  ... 
फालके अवार्ड से सम्मानित विनोद खन्ना
-अजय ब्रह्मात्मज

मनमोहन देसाई की फिल्म 'अमर अकबर एंथोनी' की रिलीज के समय अमिताभ बच्चन और विनोद खन्ना अपनी लोकप्रियता के चरम पर थे। दोनों के प्रशंसक अपने प्रिय अभिनेताओं के समर्थन में सिनेमाघर में सिटी और तालियां बजाया करते थे। मुझे याद है दरभंगा के उमा सिनेमाघर में लगी इस फिल्म को देखने के लिए मारामारी थी। टिकट खिड़की पर एक-दूसरे पर चढ़ते और फांदते लोगों की भीड़ देख कर मन घबरा गया था।  मैं अपनी साइकिल मोड़ने ही वाला था कि शरद दिख गया। टिकट लहरा कर उसने पास बुलाया। चिरौरी करने पर वह एक टिकट देने के लिए राजी हो गया। दरअसल,वह पॉपुलर फिल्मों के एक्स्ट्रा टिकट खरीद कर ब्लैक कर कुछ कमाई कर लेता था। फिल्म शुरू होने पर हम एक-दूसरे के मुकाबले में बैठ गए। वह अमिताभ बच्चन का प्रशंसक था और मैं विनोद खन्ना का.... दोनों भिड़ गए।  फिल्म के एक सीन में अमिताभ बच्चन और विनोद खन्ना के बीच लड़ाई होती है।  वह अमिताभ बच्चन की जीत की घोषणा कर चुका था और मैं नहीं चाहता था कि विनोद खन्ना हारें। मनमोहन देसाई ने हमारे जैसे सभी प्रशंसक दर्शकों का ख्याल रखा और दोनों को एक साथ चित कर दिया। मल्टीस्टारर फिल्मों के उस दौर में निर्देशक ऐसी युक्तियों से किसी भी प्रशंसक दर्शक को दुखी नहीं करते थे।
बहरहाल,हम अभिनेता विनोद खन्ना की बात करें।  हिंदी फिल्मों के आला अभिनेता विनोद खन्ना अपने करियर के एक पड़ाव पर आकर ग्लैमर और प्रसिद्धि की दुनिया से विरक्त हो गए थे।  बात बहुत पुरानी है...उनकी माँ का निधन हुआ था। अंतिम संस्कार के लिए श्मशान गए विनोद खन्ना तब बेहद दुखी और क़तर हुए जब किसी प्रशंसक शोक के उस माहौल में उंडे संवाद सुनाने के लिए कहा।  उन्होंने तब उस प्रशंसक की बात मान ली थी,लेकिन उन्हें अपनी लोकप्रियता की तुच्छता समझ में आ गयी थी।  इसके साथ ही पवित्र मन के विनोद खन्ना उस दौर में चल रही छल-कपट और साजिशों से खिन्न रहने लगे थे। अमिताभ बच्चन उनके निकटतम  प्रतिद्वंदी थे।  ऐसा कहते हैं कि उनसे जूझ पाने में वह खुद को असमर्थ महसूस कर रहे थे। निराशा और खिन्नता के इस वक़्त में महेश भट्ट ने उनका परिचय आचार्य रजनीश से करवा दिया।  विनोद खन्ना को राहत मिली और अध्यात्म्‍िाक सुकून के लिए उन्होंने एक दिन फिल्म इंडस्ट्री छोड़ने का फैसला कर लिया। तब उन्होंने कहा था कि मैं अपने विरोधियों की तरह साजिशें नहीं रच सकता। वे संकीर्ण,खतरनाक और चालबाज़ हैं। विनोद खन्ना ने किसी का नाम नहीं लिया था,फिर भी सब स्‍पष्‍ट था। यह भी विडंबना है की जिस महेश भट्ट ने विनोद खन्ना का परिचय आचार्य रजनीश से करवाया वे स्वयं उनकी माला कमोड में फ्लश कर फिल्मों में लौट आये।  विनोद खन्ना रजनीश के साथ अमेरिका गए।  मोहभंग के बाद जब वे फ़िल्मी दुनिया में लौटे तो समय बदल चुका था। उन्हें फ़िल्में तो मिलीं,लेकिन पुराणी लोकप्रियता हासिल नहीं हो सकी। फिर वे राजनीति में गए।
इस बार दादा साहेब फाल्के अवार्ड से विनोद खन्ना सम्मानित हुए। सिनेमा के क्षेत्र में यह देश का सबसे बड़ा सम्मान है,जो किसी भी कलाकार,फिल्मकार या फिल्म माधयम से जुड़े किसी व्यक्ति के योगदान के लिए दिया जाता है। निस्संदेह विनोद खन्ना हिंदी फिल्मों के लोकप्रिय अभिनेता रहे। उन्होंने कई दशकों तक दर्शकों का मनोरंजन किया। यह सवाल ज़रूर उठा कि उन्हें ही क्यों? कई वरिष्ठ कलाकार और फ़िल्मकार इस अवार्ड की योग्यता रखते हैं। इस तरह के सवाल हर साल उठाते हैं। बहुभाषी भारत देश की हर भाषा में ऐसे फ़िल्मकार हैं,जिनके योगदान को रेखांकित करने की ज़रुरत है। अभी तक यह अवार्ड हर साल किसी एक व्यक्ति को ही दिया जाता है। अगर इस अवार्ड की संख्या बढ़ाई जाये तो दिवंगत और सक्रिय पुराधाओं का सम्मान हो पायेगा। बेहतर तो यही होगा कि यह जीवित व्यक्तियों को दिया जाये। मरणोपरांत अवार्ड से अलंकृत करने में दिक्कत नहीं है। इसे जारी रखा जा सकता है। एक दिवंगत और एक जीवित की दो श्रेणियां बनायीं जा सकती हैं और योग्‍य कलाकारों को सम्‍मानित किया जा सकता है।



Thursday, April 12, 2018

दरअसल : भारत में ईरानी फिल्‍मकार माजिद मजीदी


दरअसल...
भारत में ईरानी फिल्‍मकार माजिद मजीदी
-अजय ब्रह्मात्‍मज
माजिद मजीदी की फिल्‍म ‘बियांड द क्‍लाउड्स’ रिलीज हो रही है। इस फिल्‍म में करण जौहर की शशांक खेतान निर्देशित ‘धड़क’ के नायक ईशान खट्टर हैं। ईशान खट्टर शाहिद कपूर के सहोदर भाई हैं। दोनों की मां एक हैं नीलिमा अजीम। अभी माजिद मजीदी की फिल्‍म ‘बियांड द क्‍लाउड्स’ में ईशान खटटर की वजह से मीडिया और दर्शकों की रुचि बढ़ गई है,क्‍योंकि करण जौहर उन्‍हें जान्‍हवी कपूर के साथ नए सिरे से लांच कर रहे हैं। पिछले साल गोवा के इंटरनेशनल फिल्‍म फेस्टिवल में यह आपनिंग फिल्‍म थी,लेकिन तब इसकी कोई चर्चा नहीं हो पाई थी। माजिद मजीदी ईरान के सुप्रसिद्ध निर्देशक हैं। उनकी फिल्‍में अनेक इंटरनेशनल पुरस्‍कारों से नवाजी जा चुकी हैं। लगभ बीस साल पहले आई ‘चिल्‍ड्रेन ऑफ हेवन’(1997) और ‘द कलर ऑफ पैराडाइज’(1999) उनकी बहुचर्चित और पुरस्‍कृत फिल्‍में हैं। ईरान में रहते हुए उन्‍होंने इंटरनेशनल ख्‍याति हासिल की। उन्‍हें विदेशों से निर्देशन के ऑफर आते रहे। 15 साल पहले सन् 2003 के इंटरव्‍यू में उन्‍होंने साफ शब्‍दों में कहा था कि वे देश के बाहर जाकर दूसरी भाषा में फिल्‍म बनाने की कल्‍पना नहीं कर सकते। आज सच्‍चाई यह है कि उन्‍होंने भारत आकर हिंदी में फिल्‍म निर्देशित की। इसके पहले वे चीन सरकार के आमंत्रण में पेइचिंग ओलि‍ंपिक के समय वहां भी फिल्‍म बना चुके हैं। भारत में उनकी दूसरी फिल्‍म की भी योजना बन रही है।
किसी भी फिल्‍मकार के लिए दूसरे देश में जाकर अपरिचित भाषा में फिल्‍म बनाना बड़ी चुनौती होती है। पूरी दुनिया में ऐसे कम फिल्‍मकार हैं। अधिकांश फिल्‍मकारों ने अपनी भाषा में नाम और प्रतिष्‍ठा हासिल करने के बाद अंग्रेजी में फिल्‍में जरूर बनाई हैं। कुछ ने हालीवुड जाकर भी हाथ आजमाया है। अंग्रेजी का अपवाद चल जाता है,क्‍योंकि वह इंटरनेशनल भाषा है। सभी देशों में वह बोली और समझी जाती है। इस लिहाज से माजिद मजीदी के प्रयास की तारीफ करनी होगी। उन्‍होंने भारत आकर हिंदी में मुंबई की पृष्‍ठभूमि की फिल्‍म निर्देशित की। उनकी ‘बियांड द क्‍लाउड्स’ हिंदी की मेनस्‍ट्रीम फिल्‍म से अलग है। उन्‍होंने पैरेलल सिनमा के दौर की शैली में 2017 में फिल्‍म बनाई है। यही कारण है कि फिल्‍म की गति और प्रस्‍तुति से आज के दर्शक माजिद मजीदी के नाम के प्रभाव के बावजूद मुग्‍ध नहीं हुए। इस फिल्‍म के संवाद विशाल भारद्वाज ने लिखे हैं और संगीत ए आर रहमान का है। इन महारथियों के सहयोग के बाद भी ‘बियांड द क्‍लाउड्स’ कमजोर फिल्‍म है। वास्‍तव में यह संस्‍क्‍ृति और पृष्‍ठभूमि की भिन्‍नता का परिणाम है। अगर फिल्‍म की भाषा पर आप का अधिकार नहीं है तो किसी और पर निर्भरता बढ़ती है। ऐसे में बेहतरीन निर्देशकों की भी मौलिकता का क्षरण होता है।
यों भारत और ईरान के सांस्‍कृतिक और फिल्‍मी संबंध बहुत पुराने हैं। भारत में ईरान की फिल्‍में खूब पसंद की जाती हैं। ईरान में भारत की मेनस्‍ट्रीम फिल्‍मों के दर्शक हैं। ईरान की फिल्‍म इंडस्‍ट्री भारत की हमेश ऋणी रहेगी। भारत के सहयोग से ही वहीं की इंडस्‍ट्री की नींव पड़ी। ईरान की पहली फिल्‍म का निर्माण भारत के निर्माता आर्देशिर ईरानी ने किया था। उन्‍होंने 1933 में ईरान की पहली फिल्‍म ‘दोखतर ए लोर’ का निर्देशन किया था। भारत में जन्‍मे ईरानी मूल के आर्देशिर ईरानी अनेक ‘फर्स्‍ट‘ के नियंता रहे। उन्‍होंने 1931 में भारत की पहली बोलती फिल्‍म ‘आलम आरा’ का निर्माण और निर्देशन किया। उन्‍होंने 1934 में पहली अंग्रेजी फिल्‍म ‘नूरजहां’ का निर्माण किया। इसके साथ ही वे भारत की पहली कलर फिल्‍म ‘किशन कन्‍हैया’ के भी निर्माता रहे। उनकी इस फिल्‍म के लेखक सआदत हसन मंटो थे।
आर्देशिर ईरानी से माजिद मजीदी तक भारत-ईरान के फिल्‍मी संबंधों को रेखांकित करने की जरूरत है। सत्‍यजित राय से प्रभावित माजिद मजीदी भारतीय प्रतिभाओं के साथ अगर अपनी चर्चित फिल्‍मों के स्‍तर का काम करें तो सही मायने में उनके योगदान और प्रयोगां का महत्‍व होगा। ‘बियांड द क्‍लाउड्स’ जैसी साधारण फिल्‍मों में अवसर विलीन हो जाते हैं। निराशा होती है।

Friday, April 6, 2018

दरअसल : क्रिस्‍टोफर नोलन से अभिभूत,मगर...

दरअसल...
क्रिस्‍टोफर नोलन से अभिभूत,मगर...
-अजय ब्रह्मात्‍मज
पिछले वीकएंड में ‘द डार्क नाइट’ ‘इंसेप्‍शन’,’इंटरस्‍टेलर’, ‘मेमेंटो’ और ‘डनकर्क’ के निर्देशक क्रिस्‍टोफर नोलन भारत आए थे। मुंबई के पड़ाव में उनकी दो फिल्‍मों (फिल्‍म से) के शो हुए। इन दिनों अधिकांश थिएटर में डिजिटल प्रोजेक्‍शन ही होते हैं। पुराने एनालॉग प्रोजेक्‍टर लगभग हटा दिए गए हैं,क्‍योंकि फिल्‍मों पर फिल्‍में बननी बंद हो गई हैं। हर निर्देशक और कैमरामैन डिजिटल शूट में सुविधा महसूस करने लगा है। यह किफायती और आसान भी है। पीछे पलट कर देखें तो 2010 तक भारत में भी सारी फिल्‍में फिल्‍म पर ही शूट होती थीं। आंकड़ों के मुताबिक 2010 में 1274 फिल्‍में फिल्‍म पर शूट हुईं। डिजिटल तकनीक के प्रसार के बाद 2013-14 में केवल 188 फिल्‍में ही फिल्‍म पर शूट हुईं और 1178 फिल्‍मों ने डिजिटल का सहारा लिया। 2016-17 तक डिजिटल की निर्भरता ऐसी बढ़ गई कि 1986 फिल्‍में डिजिटल पर शूट हुईं और केवल एक फिल्‍म ही फिल्‍म पर शूट हुई। इस पृष्‍ठभूमि में क्रिस्‍टोफर नोलन की यह वकालत की फिल्‍में फिल्‍म पर ही शूट हो...खास मायने रखती हैं।

तीन दिनों की भारत यात्रा में आए क्रिस्‍टोफर नोलन ने फिल्‍म इंडस्‍ट्री की खास हस्तियों से मुलाकत की। राउंड टेबल कांफ्रेंस और बातचीत में उन्‍होंने अपनी बात रखी। वे चाहते हैं कि फिल्‍में फिल्‍म(सेल्‍यूलाइड) पर शूट हों और उनका 37एमएम और 70एमएम प्रोजेक्‍शन हो। भारत में इस दिशा में बढ़ पाना किसी पहाड़ पर चढ़ने से कम दु:साध्‍य काम नहीं है। उनके अनुसार फिल्‍म के बजाए डिजिटल पर शूट करना एक तरह से पेंटर से रंग और कैनवास छीन लेना है। वे फिल्‍म या डिजिटल पर चल रही बहस को ही बेतुका मानते हैं। उनके मुताबिक फिल्‍म पर शूट करने के परिणाम उत्‍तम होते हैं। रंग निखर कर आते हैं। थिएटर में ऐसी फिल्‍में देखने का आनंद अनोखा और पूर्ण होता है। मूल बात है कि सेल्‍यूलाइड फिल्‍म का माध्‍यम है। अभी लागत और सुविधा के तर्क ने फिल्‍म और डिजिटल की बहस में फिल्‍म को भी तकनीक बना दिया है। डिजिटल के प्रसार और उपयोग के बाद निर्देशकों की कल्‍पना और शॉट की शुद्धता सीमित हो गई है। कैमरामैन भी ठोक-पीट कर शॉट सुनिश्चित नहीं करते। चूंकि फिल्‍म खर्च नहीं हो रही है,इसलिए डिजिटल पर ताबड़तोड़ शूट कर लिया जाता है। फिल्‍म एक माध्‍यम के रूप में निर्देशक और तकनीकी टीम को कल्‍पना की उड़ान और सृजन के गोते के अवसर और चुनौती देता है। तकनीशियन और कलाकार पूरी एकाग्रता से फोकस होकर शॉट लेते हैं। फिल्‍म के कैमरे की घिर्र-घिर्र बता रही होती है कि पैसे खर्च हो रहे हैं। दूसरी तरफ डिजिटल सब कुछ पोस्‍ट में ठीक कर लेने की लापरवाही देता है।

नोलन के साथ इस अभियान में उनकी सहयोगी टेसिटा डीन भी डिजिटल को एकदम से खारिज नहीं करती। वे चाते हैं कि फिल्‍म के साथ डिजिटल चले। निर्देशक अपनी जरूरत के मुताबिक माध्‍यम के रूप में फिल्‍म या डिजिटल चुन सके। सिनेमा को आर्ट के रूप में विकसित होना है तो निर्देशकों और कैमरामैन को माध्‍यम चुनने की सुविधा देनी होगी। आप किसी कलाकार से यह नहीं कह सकते कि वह केवल वाटर कलर या किसी एक ही मीडियम में काम करे। डिजिटल की महामारी के परिणाम हम देख भी रहे हैं। फिल्‍मों की सौंदर्यात्‍मक गुणवत्‍ता छीज रही है। एक समस्‍या यह भी है कि देश के 9000 थिएटर पूरी तरह से डिजिटल प्रोजेक्‍शन में तब्‍दील हो चुके हैं। उनकी सुविधा के लिए भी डिजिटल माध्‍यम उपयुक्‍त है। नोलन इससे इंकार या विरोध नहीं करते। वे मानते हैं कि डिजिटल प्रसार के दौर में जब दर्शक हर साइज के स्‍क्रीन पर फिल्‍म देखने का आनंद उठा रहे हैं तो इसे पलटा भी नहीं जा सकता,लेकिन जो फिल्‍म माध्‍यम को 35 या 70एमएम प्रोजेक्‍शन में देखना चाहते हैं...उनके लिए भी विकल्‍प रहे।

नोलन की इस यात्रा में दो कैमरामैन संतोष शिवन और सुदीप चटर्जी अपनी अगली फिल्‍में फिल्‍म पर ही शूट करने का मन बना चुके हैं। एक जागरुकता तो आई है। फिर भ भारत जैसे देश में डिजिटल माध्‍यम सस्‍ती तकनीक की वजह से अधिक उपयोगी है। महात्‍वाकांक्षी युवा फिल्‍मकार फिल्‍ममेकिंग में हाथ आजमा सकते हैं। अब तो मोबाइल पर फिल्‍में शूट होने  लगी हैं। हम नोलन से अभिभूत हैं। उनके प्रयासों की कद्र करते हैं,मगर हमें अपने देश की जरूरतों का भी खयाल रखना चाहिए। बेहतर यही है कि फिल्‍म और डिजिटल का सहअस्तित्‍व बना रहे।

Thursday, March 29, 2018

दरअसल : किफायती और कामयाब अजय देवगन

दरअसल...
किफायती और कामयाब अजय देवगन
(जन्‍मदिन 2 अप्रैल के मद्देनजर)
-अजय ब्रह्मात्‍मज
संयोग कुछ ऐसा बना था कि 2003 के राष्‍ट्रीय फिल्‍म पुरस्‍कारों की दिल्‍ली के एक पत्रकार मित्र से एक दिन पहले अग्रिम जानकारी मिल गई थी। यह पता चल गया था कि ‘द लिजेंड ऑफ भगत सिह’ में भगत सिंह की ओजपूर्ण भूमिका निभाने के लिए अजय देवगन को सर्वश्रेष्‍ठ अभिनेता का पुरस्‍कार मिलने जा रहा है। उन दिनों मैं महेश भट्ट के सान्निध्‍य में एक दैनिक का मनोरंजन परिशिष्‍ट संभाल रहा था। रहा नहीं गया तो मैंने महेश भट्ट को बता दिया। संभवत: उनसे अजय देवगन को पता चला। रात में अजय देवगन के एक सहयोगी का फोन आया...क्‍या यह सच है कि अजय देवगन को सर्वश्रेष्‍ठ अभिनेता का पुरस्‍कार मिल रहा है? ठोस जानकारी के बावजूद मैंने टालमटोल के अंदाज में कहा कि हां सुना तो है,लेकिन कल तक इंतजार करें। अगले दिन आधिकारिक जानकारी मिलने पर उनके उसी सहयोगी का फिर से फोन आया...अरे आप कल ही कंफर्म कर दिए होते। बहरहाल,’जख्‍म’ के बाद दूसरी बार राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार मिलने से महेश भट्ट,अजय देवगन और उनके प्रशंसक सभी खुश हुए।
महेश भट्ट की सिफारिश से अजय देवगन से मिलने और इंटरव्‍यू करने की कोशिश में मैं सफल रहा। तब उनकी ‘भूत’ रिलीज हो रही थी। तय हुआ कि ऑफिस में मिलते हैं। अचानक तबियत ढीली होने से यह मुलाकात उनके आवास के टेरेस पर शिफ्ट हो गई। पत्रकार मित्रों ने पहले से बता रखा था कि अजय मितभाषी हैं। बहुत मुश्किल से जवाब देते हैं। तब मीडिया जगत में ख्‍याति थी कि आमिर खान और अजय देवगन ने पत्रकारों को दूर रखने के लिए ही पीआरओ रखा है। दोनों के पीआरओ राजेन्‍द्र राव थे। और वे इस कला में माहिर थे। खैर,आदतन मैं पूरी तैयारी के साथ यह ठान कर पहुंचा था कि अच्‍छा,लंबा और गहरा(इन डेफ्थ) लेकर ही आना है। पूरे इंटरव्‍यू के चौथाई समय तक अजय देवगन चंद शब्‍दों और छोटे वाक्‍यों में जवाब देते रहे। फिर कुछ हुआ। मेरे एक सवाल ने तार जोड़ दिया और उनके जवाबों में प्रवाह आ गया। फिर तो हमारे बीच परस्‍पर विश्‍वास और सम्‍मान का एक रिश्‍ता बना,वह आज भी जारी है।
दो हफ्ते पहले राज कुमार गुप्‍ता के निर्देशन में उनकी ‘रेड’ आई है। इस फिल्‍म में भी वे ईमानदार,कर्तव्‍यनिष्‍ठ और धुनी नायक के किरदार में हैं। ऐसे किरदारों को निभाने में वे पारंगत हो चुके हैं। ‘गोलमाल’ जैसी कॉमिक सीरीज के बावजूद दर्शक उन्‍हें ऐसी भूमिकाओं में खूब पसंद करते हैं। ‘जख्‍म’ के बाद प्रकाश झा की मेनस्‍ट्रीम की रियलिस्‍ट फिल्‍मों में उन्‍होंने अपने अभिनेता के इस आयाम को खूब मांजा है। दर्शकों को किरदार की ईमानदारी का विश्‍वास दिलाने के लिए उन्‍हें संवादों और दृश्‍यों की अधिक जरूरत नहीं पड़ी। उनकी मौजूदगी ही दर्शकों को भरोसा देती है कि उनका नायक दृढ़प्रतिज्ञ है। वह हार नहीं मानेगा। खलनायक से वह सीधी भिडंत करेगा। रोहित शेट्टी ने उनके इसी व्‍यक्तित्‍व को लाउड और नाटकीय बना कर ‘सिंघम’ में पेश किया।
अभिनेता अजय देवगन के बारे में महेश भट्ट,प्रकाश झा और राज कुमार गुप्‍ता की राय एक सी है। अजय देवगन किफायती(इकोनॉमिकल) अभिनेता हैं। वे शॉट्स की बर्बादी नहीं करते। राज कुमार गुप्‍ता ने हाल की मुलाकात में बताया कि अपने किरदार और फिल्‍म के बारे में स्‍पष्‍ट हो जाने के बाद वे हर मुमकिन सहयोग के लिए तैयार रहते हैं। कागज पर लिखे गए किरदार शब्‍दों में होते हैं। अच्‍छा अभिनेता उन्‍हें ‘फ्लेश और ब्‍लड’ देकर पर्दे पर जीवंत करता है। अजय के अभिनय की प्रक्रिया में मेहनत नहीं दिखाई पड़ती। दरअसल वे ‘इंटेलिजेंट एक्‍टर’ हैं। वे किरदार का टोन पकड़ लेते हैं। ‘रेड’ में उन्‍होंने न तो कहीं हाथ उठाया है और न आवाज ऊंची की है। फिर भी अपने तेवर से वे सौरभ शुक्‍ला पर भारी ठहरते हैं। आप कह सकते हैं कि स्क्रिप्‍ट में ऐसा लिखा गया होगा...लिखा तो हर फिल्‍म में जाता है। केवल समर्थ अभिनेता ही उन्‍हें अपनी अदा और अंदाज से विश्‍वसनीय बना पाता है।
राजकुमार गुप्‍ता ने पाया कि अजय देवगन बेहद ‘सेक्‍योर’ अभिनेता हैं। सहयोगी कलाकारों की मदद करते हैं। उनके लिए जरूरी नहीं है कि हर दृश्‍य के केंद्र में वे रहें। वे दूसरों के सीन नहीं छीनते। इस प्रक्रिया से उम्‍दा फिल्‍म बनती हैं। अजय देवगन नैचुरल अभिनेता हैं। शॉट के पहले सीन समझ लेते हैं और सहज ही निभा जाते हैं। मुश्किल से मुश्किल दृश्‍यों को भी वे अधिकतम दो से तीन टेक में कर ही लेते हैं। ज्‍यादातर शॉट तो सिंगल टेक में ही पूरे हो जाते हैं।
मैंने देखा है कि अजय देवगन सेट पर मौज-मस्‍ती के मूड में रहते हैं। और हंसी-मजाक के बीच ही काम करते हैं। उन्‍हें कभी अपने सीन को मथते हुए नहीं देखा। अनुभव और अभ्‍यास से उन्‍होंने खुद के अंदर अभिनय की ऐसी वायरिंग कर ली है कि स्‍वीच दबाते ही वे कॉमिक,एक्‍शन,सीरियस और ईमानदार किरदारों के लिए झट से तैयार हो जाते हैं। अभी तक किसी फिल्‍म में क्रॉस वायरिंग से उनके परफारमेंस में कंफ्यूजन नहीं दिखा। उनके समकालीन कुछ अभिनेताओं में यह कंफ्यूजन दिखता है।  
जागरण डॉट कॉम में प्रकाशित