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Sunday, March 19, 2017

शबाना नाम है जिसका- तापसी पन्‍नू



शबाना नाम है जिसका- तापसी पन्‍नू
-अजय ब्रह्मात्‍मज
तापसी पन्‍नू की नाम शबाना भारत की पहली स्पिन ऑफ फिल्‍म है। यह प्रीक्‍वल नहीं है। स्पिन ऑफ में पिछली फिल्‍म के किसी एक पात्र के बैकग्राउंड में जाना होता है।
तापसी पन्‍नू ने नीरज पांडेय निर्देशित बेबी में शबाना का किरदार निभाया था। उस किरदार को दर्शकों ने पसंद किया था। उन्‍हें लगा था कि इस किरदार के बारे में निर्देयाक को और भी बताना चाहिए था। तापसी कहती हैं, दर्शकों की इस मांग और चाहत से ही नाम शबाना का खयाल आया। नीरज पांडेय ने बेबी के कलाकारों से इसे शेयर किया तो सभी का पॉजीटिव रेस्‍पांस था। इस फिल्‍म में पुराने लीड कलाकार अब कैमियो में हैं। दो नए किरदार जोड़े गए है,जिन्‍हें मनोज बाजपेयी और पृथ्‍वी राज निभा रहे हैं। मनोज बाजपेयी ही मुझे स्‍पॉट कर के एस्‍पीनोज एजेंसी के लिए मुझे रिक्रूट करते हैं।
नाम शबाना की शबाना मुंबई के भिंडी बाजार की निम्‍नमध्‍यवर्गीय मुसलमान परिवार की लड़की है। उसके साथ अतीत में कुछ हुआ है,जिसकी वजह से वह इस कदर अग्रेसिव हो गई है। तापसी उसके स्‍वभाव के बारे में बताती हैं, वह कम बोलती है। मेरे स्‍वभाव के विपरीत है। हम दोनों के बीच एक प्रतिशत भी समानता नहीं है। इस किरदार को शारीरिक तौर पर आत्‍मसात करने से अधिक मुश्किल था उसे मानसिक स्‍तर पर समझना। वह बोलती कम है,लेकिन समझती सब कुछ है। वह किसी भी मामले में पलट कर रिएक्‍ट करती है। वह भांप लेती है कि क्‍या होने वाला है। तभी मनोज बाजपेयी उसे रिक्रूट करना चाहते हैं। वह पहनावे में पर्दादारी करती है,लेकिन बुर्का और हिजाब में नहीं रहती है। उसके बात करने के लहजे में पूरी सफाई है। मुझे लहजे का भी अभ्‍यास करना पड़ा। कहानी का भेद खुल जाने के डर से तापसी नहीं बतातीं कि उसे क्‍यों रिक्रूट किया गया और वह क्‍यों राजी हुई? वही तो स्‍टोरी है, मैं नहीं बता सकती।
तापसी पून्‍नू इस फिल्‍म की शूटिंग के दौरान रोमांचित रहीं। ज्‍यादातर शूटिंग मुंबई के रियल लोकेशन में हुई है। वह शूटिंग के अनुभव शेयर करती हैं, मैं मुंबई के नल बाजार में घूम रही थी। कई बार लोग मुझ से पूछते थे कि क्‍या हो रहा है? कौन सी फिल्‍म है? मैं कौन हूं? अच्‍छा था कि लोग मुझे पहचान नहीं रहे थे या यों कहें कि तवज्‍जो नहीं दे रहे थे। कुछ ने पहचाना कि यह साउथ की फिल्‍म कांचना 2 की हीरोइन है। मुझे कुछ नया सा नहीं लगा। दिल्‍ली के जामा मस्जिद के पीछे की बस्‍ती की फीलिंग आती है। केवल मच्‍दी की गंध से दिक्‍कत हो रही थी। रियल लोकेशन पर लोग परेशान न करें तो बहुत मजा आता है। मैं तो गली-नुक्‍क्‍ड़ के लोगों से घुलमिल गई थी। मैंने तो कुछ दृश्‍यों में बॉडीगार्ड भी हटा दिए। गली की भीड़ का हिस्‍सा बन जाना मजेदार था।
तापसी चाहती थीं कि नीरज पांडेय ही इसे डायरेक्‍ट करें। नीरज ने उन्‍हें समझाया कि मैं लिख रहा हूं और मैं ही निर्माता हूं। सेट पर भी रहूंगा। तुम तनाव मत लो। तापसी के शब्‍दों में, वे नाम शबाना के डायरेक्‍टर शिवम नायर को अपना सीनियर मानते हैं। उन्‍होंने भरोसा दिलाया। शिवम नायर भी नीरज सर की तरह कम बोलते हैं। उन्‍होंने दूसरे निर्देशकों से अलग कुछ भी बताने,समझाने या डायरेक्‍अ करने के समय पास आकर ही सब कुछ बताया। उनकी यह बात मुझे बहुत अच्‍छी लगी। वे सीधे अपनी बात कहते थे। मुझे दोनों की शैली में अधिक फर्क नहीं लगा। और चूंकि शबाना उनकी क्रिएशन है,इसलिए वे शबाना से ज्‍यादा वाकिफ थे। उसकी बारीकियां जानते थे।
तापसी मानती हैं कि कामयाबी से लोगों का परसेप्‍शन और अपना कंफीडेंस बढ़ता है। पिंक की कामयाबी और सराहना से फर्क तो आया है। वह कहती हैं,व्‍यक्तिगत स्‍तर पर कुछ दिनों तक कुछ हासिल करने का अहसास रहता है। फिर जिंदगी रुटीन में आ जाती है। इंडस्‍ट्री और दर्शकों की सोच बदल जाती है। उनसे भाव मिलने लगता है। पिंक सभी उम्र और तबके के दर्शकों ने देखा है। आम व्‍यक्तियों से सराहना मिलती है तो मैं एंज्‍वॉय करती हूं।
तापसी डेविड धवन की फिल्‍म जुड़वां के लिए उत्‍साहित हैं। वे कहती हैं, मेंरे लिए गर्व की बात है कि उन्‍होंने मुझे चुना। मैंने उनसे पूछा कि मुझे क्‍या तैयारी करनी है? उन्‍होंने इतना ही कहा तूझे अच्‍छा लगना है। हर अभिनेत्री चाहती है कि उसे ऐसी फिल्‍ मिले।

Friday, February 17, 2017

फिल्‍म समीक्षा : रनिंग शादी



फिल्‍म रिव्‍यू
मूक और चूक से औसत मनोरंजन
रनिंग शादी
-अजय ब्रह्मात्‍मज
 अमित राय की फिल्‍म रनिंग शादी की कहानी का आधा हिस्‍सा बिहार में है। पटना जंक्‍शन और गांधी मैदान-मौर्या होटल के गोलंबर के एरियल शॉट के अलावा पटना किसी और शहर या सेट पर है। अमित राय और उनकी टीम पटना(बिहार) को फिल्‍म में रचने में चूक गई है। संवादों में भाषा और लहजे की भिन्‍नता है। ब्रजेन्‍द्र काला की मेहनत और पंकज झा की स्‍वाभाविकता से उनके किरदारों में बिहारपन दिखता है। अन्‍य किरदार लुक व्‍यवहार में बिहारी हैं,लेकिन उनके संवादों में भयंकर भिन्‍नता है। शूजित सरकार की कोचिंग में बन रही फिल्‍मों में ऐसी चूक नहीं होती। उनकी फिल्‍मों में लोकल फ्लेवर उभर कर आता है। इसी फिल्‍म में पंजाब का फ्लेवर झलकता है,लेकिन बिहार की खुश्‍बू गायब है। टायटल से डॉट कॉम मूक करने से बड़ा फर्क पड़ा है। फिल्‍म का प्रवाह टूटता है। इस मूक-चूक और लापरवाही से फिल्‍म अपनी संभावनाओं को ही मार डालती है और एक औसत फिल्‍म रह जाती है।
भरोसे बिहारी है। वह पंजाब में निम्‍मी के पिता के यहां नौकरी करता है। उसकी कुछ ख्‍वाहिशें हैं,जिनकी वजह से वह बिहार से पंजाब गया है। सामान्‍य मध्‍यवर्गीय बिहारी परिवार का भरोसे कुछ करना चाहता है। चुपके से उसकी ख्‍वाहिशों में निम्‍मी भी शामिल हो जाती है। निम्‍मी से दिल टूटने और नौकरी छूटने पर वह अपने दोस्‍त सायबर के साथ मिल कर एक वेबसाइट आरंभ करता है। उसके । जरिए वह प्रेमीयुगलों की शादी भगा कर करवाता है। उसका वेंचर चल निकला है,लेकिन 50वीं कोशिश में वह स्‍वयं फंस जाता है। फिल्‍म भी यहीं आकर फंस जाती है। एक नया विचार कल्‍पना और जानकारी के अभाव में दम तोड़ देता है।
कलाकारों में तापसी पन्‍नू निम्‍मी के किरदार में उपयुक्‍त लगती हैं। आरंभिक दृश्‍यों में उनके लुक पर मेहनत की गई है। बाद में व‍ि हिंदी फिल्‍मों की हीरोइन हो जाती है। यह फिल्‍म देखते हुए दर्शकों को याद रहना वाहिए कि रनिंग शादी उनकी पिंक के पहले की फिल्‍म है। इससे उनकी निराशा कम होगी। किरदारों को गढ़ने में टीम का ढीलापन भरोसे और अन्‍य किरदारों में भी दिखता है। भरोसे के लहजे में बिहारी टच नहीं है। अमित साध ने संवाद और भाषा का अभ्‍यास नहीं किया है। हो सकता है उन्‍हें बताया या गाइड ही नहीं किया गया हो। सायबर के किरदार में हर्ष बाजवा सही लगते हैं। उन्‍होंने नायक का साथ निभाया है। पटना प्रसंग में पंकज झा और ब्रजेन्‍द्र काला पहचान में आते हैं। वहां के चरित्रों के लिए कलाकारों का चयन बेहतर है। उनकी भाव-भंगिमाओं में अनोखापन है। नेहा,नेहा का प्रेमी,मामी आदि चरित्र सुंदर बन पड़ हैं।
अमित राय निर्देशन की पहली कोशिश में फिसल गए हैं। उन्‍हें सही कोचिंग नहीं मिली है या कोच का ध्‍यान अपनी टीम के अन्‍य खिलाडि़यों(निर्देशकों व फिल्‍मों) में लगा रहा। पिंक की खूबसूरती और कामयाबी का श्रेय शूजित सरकार को नलता है। रनिंग शादी की फिसलन और कमी के लिए उन्‍हें ही दोषी माना जाएगा।
अवधि-115 मिनट
** दो स्‍टार  

Thursday, February 16, 2017

फिल्‍म समीक्षा : द गाजी अटैक



फिल्‍म रिव्‍यू
युद्ध की अलिखित घटना
द गाजी अटैक
-अजय ब्रह्मात्‍मज
हाल ही में दिवंगत हुए ओम पुरी की मृत्‍यु के बाद रिलीज हुई यह पहली फिल्‍म है। सबसे पहले उन्‍हें श्रद्धांजलि और उनकी याद। वे असमय ही चले गए।
द गाजी अटैक 1971 में हुए भारत-पाकिस्‍तान युद्ध और बांग्‍लादेश की मुक्ति के ठीक पहलं की अलिखित घटना है। इस घ्‍सटना में पाकिस्‍तानी पनडुब्‍बी गाजी को भारतीय जांबाज नौसैनिकों ने बहदुरी और युक्ति से नष्‍ट कर दिया था। फिल्‍म के मुताबिक पाकिस्‍तान के नापाक इरादों को कुचलने के साथ ही भारतीय युद्धपोत आईएनएस विक्रांत की रक्षा की थी और भारत के पूर्वी बंदरगाहों पर नुकसान नहीं होने दिया था। फिल्‍म के आरंभी में एक लंबे डिस्‍क्‍लेमर में बताया गया है कि यह सच्‍ची घटनाओं की काल्‍पनिक कथा है। कहते हैं क्‍लासीफायड मिशन होने के कारण इस अभियान का कहीं रिकार्ड या उल्‍लेख नहीं मिलता। इस अभियान में शहीद हुए जवनों को कोई पुरस्‍कार या सम्‍मन नहीं मिल सका। देश के इतिहास में ऐसी अनेक अलिखित और क्‍लासीफायड घटनाएं होती हैं,जो देश की सुरक्षा के लिए गुप्‍त रखी जाती हैं।
द गाजी अटैक ऐसी ही एक घटला का काल्‍पलिक चित्रण है। निर्देशक संकल्‍प ने कलाकारों और तकनीशियनों की मदद से इसे गढ़ा है। मूल रूप से तेलुगू में सोची गई द गाजी अटैक भारतीय सिनेमा में विषय और कथ्‍य के स्‍तर पर कुछ जोड़ती है। निर्माता और निर्देशक के साथ इस फिल्‍म को संभव करने में सहयोगी सभी व्‍यक्तियों को धन्‍यवाद कि उन्‍होंने भारतीय दर्शकों को एक रोचक युद्ध फिल्‍म दी। हिंदी में युद्ध फिल्‍में नहीं की संख्‍या में हैं। कुछ बनी भी तो उनमें अंधराष्‍ट्रवाद के नारे मिले। दरअसल,ऐसी फिल्‍मों में संतुलन बनाए रखना मुश्किल होता है। राष्‍ट्रीय चेतना की उग्रता अंधराष्‍ट्रवाद की ओर धकेल देती है। द गाजी अटैक में लेखक-निर्देशक ने सराहनीय सावधानी बरती है। हालांकि इस फिल्‍म में जन गण मन और सारे जहां से अच्‍छा एक से अधिक बार सुनाई देता है,लेकिन वह फिल्‍म के कथ्‍य के लिए उपयुक्‍त है। युद्ध के दौरान जवानों का मनोबल ऊंचा रखने के लिए यह आवश्‍यक है।
द गाजी अटैक सीमित संसाधनों में बनी उल्‍लेखनीय युद्ध फिल्‍म है। यह मुख्‍य रूप से किरदारों के मनोभावों पर केंद्रित रहती है। संवाद में पनडुब्‍बी संचालन के तकनीकी शब्‍द अबूझ रहते हैं। निर्देशक उन्‍हें दृश्‍यों में नहीं दिखाते। हमें कुछ बटन,स्‍वीच,पाइप और यंत्र दिखते हैं। पनडुब्‍बी का विस्‍तृत चित्रण नहीं है। किरदारों के कार्य व्‍यापार भी चंद केबिनों और कमरों तक सीमित रहते हैं। पनडुब्‍बी के समुद्र में गहरे उतरने के बाद निर्देशक किरदारों के संबंधियों तक वापस नहीं आते। नौसेना कार्यालय और उनके कुछ अधिकारियां तक घूम कर कैमरा भारतीय पनडुब्‍बी एस-21(आईएनएस राजपूत) और पाकिस्‍तानी पनडुब्‍बी पीएनएस गाजी के अंदर आ जाता है।
पाकिस्‍तानी पनडुब्‍बी के कैप्‍टर रजाक हैं,जिनके कुशल और आक्रामक नेतृत्‍व के बारे में भारतीय नौसैनिक अधिकारी जानते हैं। भारतीय पनडुब्‍बी की कमान रणविजय सिहं को सौंपी गई है। रणविजय की छोटी सी पूर्वकथा है। उनका बेटा 1965 में ऐसे ही एक क्‍लासीफायड अभियान में सरकारी आदेश के इंतजार में शहीद हो चुका है। रणविजय पर अंकुश रखने के लिए अर्जुन को संयुक्‍त कमान दी गई है। उनके साथ पनडुब्‍बी के चालक देवराज हैं। तीनों अपनी युक्ति से गाजी के मंसूबे को नाकाम करने के साथ उसे नष्‍ट भी करते हैं। रणविजय और अर्जुन के सोच की भिन्‍नता से ड्रामा पैदा होता है। दोनों देशहित में सोचते हैं,लेकिन उनकी स्‍ट्रेटजी अलग है। लेखक दोनों के बीच चल रहे माइंड गेम को अच्‍छी तरह उकेरा है। उनके बीच फंसे देवराज समय पर सही सुझाव देते हैं। युद्ध सिर्फ संसाधनों से नहीं जीते जाते। उसके लिए दृढ़ इच्‍छाशक्ति  और राष्‍ट्रीय भावना भी होनी चाहिए। यह फिल्‍म पनडुब्‍बी के नौसेना जवानों के समुद्री जीवन और जोश का परिचय देती है।
मुख्‍य कलाकारों केके मेनन,अतुल कुलकर्णी,राहुल सिंह और राणा डग्‍गुबाती ने उम्‍दा अभिनय किया है। सहयोगी कलाकारों के लिए अधिक गुजाइश नहीं थी। फिल्‍म में महिला किरदार के रूप में दिखी तापसी पन्‍नू का तुक नहीं दिखता।
अवधि- 125 मिनट
स्‍टार तीन स्‍टार

Monday, December 19, 2016

बस अभी चलते रहो -तापसी पन्‍नू

बस अभी चलते रहो -तापसी पन्‍नू
-अजय ब्रह्मात्‍मज

हिंदी सिनेमा में अभिनय और एक्शन से बाकी अभिनेत्रियों के मुकाबले अलग पहचान बना रही हैं तापसी पन्नू। 'बेबी7 और 'पिंक7 के लिए तारीफ बटोर चुकीं तापसी 'नाम शबाना' में टाइटल रोल के साथ नजर आने वालीं हैं। उन्होंने अजय ब्रह्मात्मज से शेयर किए अपने अनुभव...

अभी क्या चल रहा है?
'नाम शबाना5 की शूटिंग चल रही है। साथ ही भगनानी की 'मखनाÓ की भी आधी शूटिंग हो चुकी है। 'मखना- में मैं साकिब सलीम के साथ कर रही हूं। इसकी निर्देशक अमित शर्मा की पत्नी आलिया सेन हैं। वो बहुत बड़ी एड फिल्ममेकर हैं। उन्होंने मेरी म्यूजिक वीडियो साकिब के साथ बनाई थी। हमारी केमेस्ट्री हम दोनों को पसंद आई तो सोचा कि उन्हीं के साथ फिल्म भी कर लेते हैं। दोनों फिल्मों की शूटिंग आगे-पीछे चल रही है।
'मखना7 किस तरह की फिल्म होगी?
यह पंजाबी लव स्टोरी है। दिल्ली के किरदार हैं पर वैसी दिल्ली बिल्कुल नहीं है, जैसी 'पिंकÓ में दिखाई थी। इसमें मैं अलग तरह की दिल्ली लड़की बनी हूं। मतलब उस टाइप की नहीं जैसी मैं हूं। बहुत अपोजिट किरदार है ये मेरे लिए।
और 'नाम शबाना' क्या है ?
'नाम शबानाÓ में भी मैं कंफर्ट जोन से बाहर आई हूं। इतनी बाहर कि कई बार समझ नहीं आता कि किस सिचुएशन में किरदार क्या रिएक्शन देगा। डायरेक्टर से जाकर पूछना पड़ता है। मैं कैजुअल हूं, पर मेरा किरदार बिल्कुल कैजुअल नहीं है। मैं हंसी-खेल में काम करने वाली लड़की हूं। शबाना ऐसी बिल्कुल नहीं है। वह हर चीज में ओवर अटेंटिव रहने वाली लड़की है या फिर बहुत जल्दी गुस्सा हो जाती है। उसका व्यंग्यात्मक सेंस ऑफ ह्यूमर है। इधर-उधर की बात बिल्कुल नहीं करती। उसके अपने अंदर ही बहुत गहरी कहानी चलती रहती है।
कितना सच है कि यह 'बेबी' का प्रीक्वेल है?
काफी हद तक सच है। हम इसको टैग नहीं करना चाहते कि यह प्रीक्वेल या सीक्वेल है। यह सच है ये 'बेबीÓ फ्रेंचाइजी का पार्ट है। 'बेबीÓ में मेरे निभाए किरदार के बनने की कहानी है। उस हिसाब से प्रीक्वेल मान लीजिए पर ऐसा कोई टैग देकर हम शुरुआत नहीं कर रहे हैं। हमने नाम भी अलग रखा है। 'बेबी-1Ó या 'बेबी-2Ó नहीं रखा है। यह पूरी अलग स्टोरी है। हां, 'बेबीÓ के किरदार यहां पर भी होंगे। संक्षेप में मेरे किरदार की बैकस्टोरी है।
मनोज वाजपेयी का एक नया किरदार है? वे आपके कोच हैं क्या?
जी हां। बहुत ही विशेष किरदार है उनका। वही हैं जो शबाना के बनने के लिए जिम्मेदार होंगे। वो पूरी तरह से कोच तो नहीं हैं। उनके किरदार के बारे में पूरी तरह से फिल्म देखने पर ही आपको पता चलेगा।
मनोज के साथ कैसा अनुभव रहा?
हमारे साथ में ज्यादा सीन नहीं हैं, एक-दो सीन हैं। एक्शन है इस वजह से ज्यादा मोमेंट, चेज और रन एक्शन है। अक्षय के साथ भी एक्शन सीक्वेंस हैं। अक्षय का इस फिल्म में कैमियो है। इस बार 'बेबीÓ से ज्यादा हमारी बातचीत हो पाई है। उनका सेंस ऑफ ह्यूमर कमाल का है। हर शॉट में उनका इनपुट रहता था। वे कहते थे कि चल अब इसे ऐसा कर लेते हैं। तू ऐसा कर दियो। मैं उनसे कहती कि सर यह नीरज पांडे की लिखी फिल्म है। इसमें अगर मैंने ऐसा-वैसा कुछ कर दिया... कोई गैग डाल दिया तो वो मुझे मार डालेंगे। वे कहते थे कि कोई नहीं तू कर। वे जब बोलते हैं तो पता ही नहीं चलता कि मजाक कर रहे हैं या गंभीर होकर बोल रहे हैं। बहुत मजा आया उनके साथ काम करके।
अपनी जर्नी को कैसे देखती हैं? कहां तक आप पहुंची हैं?
अभी पीछे मुडकर देखा नहीं है कि कहां तक पहुंच गई हूं। बस मजा आ रहा है।
आगे का कुछ तो सोचा होगा न, अगर एक से दस तक मान लें तो?
हम जब अपने आपको देखते हैं तो हमारे ऊपर और नीचे लोग होते हैं। आप चाहे किसी भी मुकाम पर पहुंच जाओ। आपके ऊपर भी लोग होंगे और नीचे भी। हमारी कोशिश रहती है कि अपने पोजिशन को हम किस तरह इंप्रूव करें। अगर आप यह देखना शुरू करेंगे कि मेरे ऊपर और कितने लोग रह गए हैं तो मुश्किल बढ़ जाएगी। 
'पिंक' से बेहतर करने का प्रेशर तो नहीं है?

बहुत प्रेशर है मुझ पर। अपने आपको मुश्किल में डाल दिया है मैंने। वह सोचती हूं एक सेकेंड के लिए फिर उसे स्नैप आउट करके साइड में रख देती हूं और दोबारा सोचती हूं कि जो भी है, बस अभी चलते रहो। जो होगा, सही होगा। मैंने बिल्कुल प्लान नहीं किया था। सब कुछ अपने आप होता गया। यही सोचती हूं कि हर फिल्म ऐसे करूं जैसे मेरी पहली फिल्म हो। उसी सोच से काम करती हूं। साऊथ में मैं कुछ गलतियां कर चुकी हूं। कोशिश है कि हिंदी सिनेमा में उसे रिपीट न करूं।
यह कहना गलत नहीं होगा कि तापसी मेनस्ट्रीम सिनेमा का हिस्सा हो चुकी हैं, कैसा लगता है?
जी बिल्कुल। मैंने तो अपनी शुरुआत कॉमर्शियल फिल्मों से की थी। उसके बाद सोचा कि लोगों को मैं दिख गई, चलो अब दिखाती हूं कि मैं एक्टिंग भी कर सकती हूं। अगर मैं 'पिंकÓ जैसी फिल्म से शुरुआत करती तो लोग मुझे गंभीर अदाकारा समझकर साइड लाइन कर देते।
किन डायरेक्टर्स के साथ काम करने का सोचा है?
अभी तो मैंने शुरुआत की है। तीन निर्देशकों के साथ काम किया है। अभी तो हर निर्देशक नए और टैलेंटेड हैं। ऐसा नहीं है कि गिनती के निर्देशक बचे हैं। जिन्होंने अच्छा काम किया है, अगर मैं उनकी लिस्ट बनाने बैठती हूं तो भी सबका नाम अपने दिमाग में नहीं रख सकती।
हिंदी सिनेमा में सफर में किस तरीके से आपका पूरा प्लान चल रहा है?
प्लान तो ऐसा है कि मेरा यहां पर आना ही प्लान में नहीं था। यही कोशिश करती हूं कि जहां पर भी हूं, वहां से एक लेवल ऊपर ही जाऊं। नीचे न जाऊं। उसी स्तर पर रहूं तो भी कुछ हद तक ठीक है। एक हिट फिल्म दे दी। अच्छी दिख गई। अच्छी फिल्म मिलने के लिए और क्या चाहिए? इसके बावजूद आज की तारीख में बताया जाता है कि आप कतार में हैं।
क्या ये इंडस्ट्री से बाहर का होने की वजह से होता है?
जी हां, ये तो मैं मानती हूं। मैं ये नहीं कहती कि इंडस्ट्री की लड़कियों पर मेहरबानी होती है। फिर भी उन्हें अधिक मौके मिलते हैं, जिनके माता-पिता, जान-पहचान वाला या कोई रिश्तेदार इंडस्ट्री में हों। मेरे पास इनमें से कुछ भी नहीं था। मेरे पास तो थ्री मूवी कांट्रेक्ट भी नहीं था। कई बार मुझसे पूछा जाता है कि बगैर किसी मदद के आप यहां तक कैसे पहुंच गईं? मेरे पास कोई जवाब नहीं होता। बस ये कि मुझे अपना काम पसंद है और मैं खुश होकर अपना काम करती हूं।

Thursday, September 15, 2016

फिल्‍म समीक्षा : पिंक




ना सिर्फ एक शब्‍द नहीं है
-अजय ब्रह्मात्‍मज
शुजीत सरकार पिंक के क्रिएटिव प्रोड्यूसर हैं। इस फिल्‍म के साथ उनका नाम इतने मुखर रूप से सामने रखा गया है कि निर्देशक गौण हो गए हैं। मार्केटिंग के लिहाज से यह सही रणनीति रही। शुजीत सरकार अलग ढंग के मनोरंजक सिनमा के पर्याय के रूप में उभर रहे हैं। विकी डोनर से पीकू तक में हम उनकी निर्देशकीय क्रिएटिविटी देख चुके हैं। यह फिलम उनकी निगरानी में बनी है,लेकिन यह अनिरूद्ध राय चौधरी की पहली हिंदी फिल्‍म है। अनिरूद्ध ने बांग्‍ला में अनुरणन और अंतहीन जैसी फिल्‍में निर्देशित की हैं,जिन्‍हें राष्‍ट्रीय पुरस्‍कारों से सम्‍मनित किया जा चुका है। इस पृष्‍ठभूमि का हवाला इसलिए कि राष्‍ट्रीय पुरस्‍कारों से सम्‍मानित फिल्‍मकारों की फिल्‍में भी आम दर्शकों का मनोरंजन कर सकती हैं। मनोरंजन के साथ सामाजिक संदेश से वे उद्वेलित भी कर सकती हैं। इसे रितेश शाह ने लिखा है। हम कहानी,एयरलिफ्ट,तीन और मदारी में उनका कौशल देख चुके हें।
पिंक तीन लड़कियों के साथ उन चार लड़कों की भी कहानी है,जो फिल्‍म की केंद्रीय घटना में शामिल हैं। हालांकि उनके चरित्र के विस्‍तार में लेखक नहीं जाते,मगर उनके बहाने पुरुष प्रधान समाज की सामंती सोच सामने आती है। दिल्‍ली के पॉश इलाके में तीन कामकाजी लड़किया एक फ्लैट किराए पर लेकर रहती हैं। मीनल दिल्‍ली के करोलबाग की है। फलक लखनऊ की है और एंड्रिया मेघालय से है...जिसे सभी नार्थ ईस्‍ट की लड़की कहते हैं। जैसे कभी सारे दक्षिण भारतीयों को मद्रासी कहा जाता था और मुंबई में आज भी सारे उत्‍तर भारतीयों को भैया समझा जाता है। बहरहाल,एक रात रॉक शो के बाद रिसॉर्ट में मीनल और राजवीर के बीच झड़प होती है,जिसमें मीनल खुद के बचाव के लिए राजवीर के सिर पर बोतल दे मारती है।
आरंभिक दृश्‍यों की इन घटनाओं के बाद असली ड्रामा आरंभ होता है। तीन सामान्‍य कामकाजी लड़कियां और सामंती सोच के वेल कनेक्‍टेड लड़के... कहानी कुछ-कुछ नो वन किल्‍ड जेसिका और थोड़े बदले संदर्भ में दामिनी जैसी लगती है। मूल मानसिकता वही है,लेकिन दीपक सहगल कोर्ट में अपनी बहस से उसे तार-तार कर देते हैं। वे बताते हैं कि किस तरह हम ने लड़कियों पर पाबंदियां लगा रखी हैं। अगर वे पुरुषों की सोच के दायरे से निकलती हैं तो उन्‍हें बदचलन कहा और समझा जा सकता है। जींस-टीशर्ट पहनना,हंस कर और छूकर बातें करना,शराब पीना,पार्टियों में जाना...अगर लड़कियां यह सब करती हैं तो बेचारे लड़के एज्‍यूम कर लेते हैं कि वो उनके साथ सो भी सकती हैं। वे उत्‍तेजित हो जाते हैं और बगैर अपनी गलती के ही गलती कर बैठते हैं। दीपक सहगल अपनी बहस में लड़कियों के लिए चार सेफ्टी रूल भी बताते हैं,जिनमें बताया जाता है कि किसी लड़की को किसी लड़के के साथ क्‍या-क्‍या नहीं करना चाहिए। दीपक सहगल तंजिया अंदाज में समाज में मौजूद लड़के-लड़कियों के प्रति चल रही भिन्‍न मान्‍यताओं की विसंगति भी जाहिर करते हैं।
पिंक लड़के-लड़कियों के प्रति समाज में प्रचलित धारणाओं और मान्‍यताओं की असमानता और पाखंड को उजागर करती है। फिल्‍म के दृश्‍यों और संवादों से एहसास होता है कि समाज जिसे सामान्‍य और उचित मानता है,दरअसल वह आदत में समायी पिछड़ी और पाखंडी सोच है। पिंक की कथाभूमि दिल्‍ली की है,लेकिन ऐसी इंडेपेंडेट लड़कियां इन दिनों किसी भी शहर में मिल सकती है,जो बेहतर भविष्‍य और करिअर के लिए अपने कथित सुरक्षित घरों से निकलकर शहरी बनैले पुरुषों के बीच रहती हैं। अगर थोड़ी देर के लिए भी इस फिल्‍म के पुरुष दर्शक मीनल,फलक और एंड्रिया के नजरिए से देखें तो पूरा पर्सपेक्टिव बदल जाएगा। उन्‍हें खुद से घिन आएगी। उन्‍हें पता चलेगा कि वे किस मानसिकता में जी रहे हैं।
इस फिल्‍म का सारा द्वंद्व एक ना पर है। दीपक सहगल के शब्‍दों में कहें तो ना सिर्फ एक शब्‍द नहीं है,एक पूरा वाक्‍य है अपने आप में...इसे किसी व्‍याख्‍या की जरूरत नहीं है। नो मतलब नो...परिचित,फ्रेंड,गर्लफ्रेंड,सेक्‍स वर्कर या आपकी अपनी बीवी ही क्‍यों न हो...नो मीन्‍स नो।इसी ना को आधार बना कर दीपक सहगल अपने तर्क गढ़ते हैं और सरकारी वकील के सारे आरोपों को निरस्‍त करते हैं। हिंदी फिल्‍मों में कोर्ट रूम ड्रामा का खस आकर्षण वकीलों की बहसबाजी होती है। दर्शक यातना और आरोप की शिकार के साथ हो जाते हैं और उसकी जीत चाहते हैं। लेखक और निर्देशक ने पिंक में अंत-अंत तक रहस्‍य बनाए रखा है।  हिंदी फिल्‍मों में यह सहज अनुमान भी चलता है कि लड़कियों के पक्ष में अमिताभ बच्‍चन हैं तो उनकी जीत सुनिश्चित है। इससे रहस्‍य का रोमांच थोड़ा कम होता है।
अमिताभ बच्‍चन को वकील के नए अंदाज में देख कर हम उनके अभिनय के नए पहलू से परिचित होते हैं। अमिताभ बच्‍चन प्रयोगों के लिए तैयार हैं। वे नई चुनौतियों के लिए नई रणनीति और शैली अपनाते हैं। उन्‍होंने अपने चरित्र के विकास पर ध्‍यान दिया है और उसी क्रम में आवाज बदलते गए हैं। अंतिम बहस में उनके तर्क आधिकारिक और दमदार हो जाते हैं। इस फिल्‍म में पियूष मिश्रा संयत भाव से अपने किरदार में हैं। निर्देशक ने उन्‍हें किरदार से छिटकने नहीं दिया है। तीनों लड़कियों में मीनल मुख्‍य है,इसलिए तापसी पन्‍नू के पास हुनर दिखाने के बेहतरीन अवसर थे। उन्‍होंने कोई कसर नहीं छोड़ी है। वह असरदार हैं। इसी प्रकार कीर्ति कुल्‍हारी और एंड्रिया भी अपने किरदारों का मजबूती से पेश करती हैं। राजवीर की भूमिका में अंगद बेदी उसकी ऐंठ को सही ढंग से पेश करते हें। अन्‍य छोटी और सहयोगी भूमिकाओं में कास्टिंग डायरेक्‍टर जोगी ने कलाकारों का सटीक चुनाव किया है।
पिंक का पार्श्‍व संगीत शांतनु मोइत्रा ने तैयार किया है। उन्‍होंने द्रुत,धकमी और मद्धिम ध्‍वनियों के साथ दश्‍यों को प्रभावशाली बना दिया है। फिल्‍म का अवसाद और तनाव पार्श्‍व संगीत के प्रभाव से बहुत खूबसूरती से निर्मित होता है।
फिल्‍म के अंत में अमिताभ बच्‍चन की आवाज में प्रस्‍तुत पिंक पोएम में फिल्‍म का सार और संवेदना है। इसे सुन कर ही सिनेमाघरों से निकलें।
तू खुद की खोज में निकल
तू किस लिए हताश है।
तू चल तेरे वजूद की
समय को भी तलाश है।
अवधि-136 मिनट
स्‍टार- चार स्‍टार    

Monday, February 16, 2015

परफारमेंस काफी है पहचान के लिए-तापसी पन्नू




-अजय ब्रह्मात्मज
    नीरज पाण्डेय की फिल्म ‘बेबी’ में तापसी पन्नू की सभी ने तारीफ की। फिल्म के नायक अजय की सहकर्मी प्रिया एक स्पेशल मिशन पर काठमांडू जाती है। वहां वसीम से सच जानने के लिए वह उसे अपने कमरे में ले आती है। वसीम को प्रिया का सच मालूम हो जाता है। वहां दोनों की भिड़ंत होती है। प्रिया अपने पुरुष सहकर्मी का इंतजार नहीं करती। वह टूट पड़ती और उसे धराशायी करती है। हिंदी फिल्मों में ऐसा कम होता है। ज्यादातर फिल्मों में स्त्री पात्र पुरुषों के हाथों बचायी जाती हैं। तापसी पन्नू चल रही तारीफ से खुश हैं।
- क्या वसीम से भिडंत के सीन करते समय यह खयाल आया था कि इसे ऐसी सराहना मिलेगी?
0 यह उम्मीद तो थी कि सराहना मिलेगी। फिल्म में मेरा रोल महत्वपूर्ण था। यह उम्मीद नहीं की थी कि मेरे सीन पर लोग तालियां और सीटियां मारेंगे। टिप्पणियां करेंगे। यह तो अविश्वसनीय सराहना हो गई है।
-क्या नीरज पाण्डेय ने कोई इशारा किया था कि सीन का जबरदस्त इंपैक्ट होगा?
0 नीरज पाण्डेय अधिक बात करने में विश्वास नहीं करते। उन्होंने यही कहा था कि रियल लगना चाहिए। दर्शकों को यकीन हो कि लडक़ी ने खुद से ताकतवर व्यक्ति को स्किल से हराया। उन्होंने एक्शन डायरेक्टर से साफ कहा था कि ओवर द टॉप एक्शन नहीं होना चाहिए। नीरज ने सीन के इंपैक्ट का कोई इशारा नहीं किया था। वैसे भी वे बहुत कम बोलते हैं।
- आप ने ‘बेबी’ साइन की तभी से अनुमान लगाया जा रहा था कि आप अक्षय की लव इंटरेस्ट हैं या कुछ और ़ ़ ़
0 अच्छा रहा न? ऐसा सरप्राइज होना चाहिए। इसी वजह से मैंने रिलीज के पहले अपने किरदार के बारे में इंटरव्यू नहीं दिए थे। मुझे पता तो था कि यह रेगुलर हीरोइन का रोल नहीं है। फिल्म देखने के बाद दर्शकों ने हीरो की तरह सराहा। परफारमेंस के लिए 20 मिनट या दो घंटे के रोल से फर्क नहीं पड़ता। आप बेहतर हैं तो छोटे रोल में भी जलवा दिखा जाएंगे।
-अगर मैं यह कहूं कि लड़कियों के प्रति समाज के बदल रहे द़ष्टिकोण की वजह से आप के राल को ऐसी सराहना मिली तो क्या कहेंगी? दस साल पहले ऐसे रोल की कल्पना और यकीन की गुंजाइश नहीं थी।
0 कह सकते हैं। समाज ने लड़कियों को रेगुलर जॉब से अलग काम में स्वीकार करना शुरू कर दिया है। पहले सहकर्मी होती तो उसका कैरेक्टराइजेशन अलग होता। इस फिल्म में मुश्किल में फंसने पर मैं विलेन को उलझाने का काम नहीं करती। रिझाने के लिए गीत नहीं गाती। मैं सीधा आक्रमण करती हूं। मैं बचाव के लिए नहीं चिल्लाती और न कोई अलार्म बजाती हूं। अभी समाज में स्त्रियां ऐसे पदों को जिम्मेदारी के साथ निभा रही हैं,जिन्हें कभी पुरुषों का ही समझा जाता था। ‘बेबी’ में मेरे फाइट सीन पर तालियां बजीं। दर्शक अक्षय कुमार के अभ्यस्त हो चुके हैं,इसलिए उन्हें मेरे सीन में नवीनता दिखी। सिनेमा और समाज लड़कियों के रोल को लेकर खुल रहा है।
-क्या ऐसा खतरा नहीं रहेगा कि अब आप को ऐसे बहादुरी के ही रोल मिलेंगे?
0 ‘चश्मेबद्दूर’ के बाद कहा गया था कि मुझे अब ऐसे ही रोल मिलेंगे। मैंने दूसरी फिल्म में ऐसे भविष्यवक्ताओं को गलत साबित किया। इंतजार करें मेरी अगली फिल्म का। फिर बात करेंगे। मैं झटके देती रहूंगी। मैं जानती हूं कि फिल्म इंडस्ट्री में मेरा कोई गॉडफादर नहीं है। मैं किसी की बहन-बेटी नहीं हूं। ना ही किसी बड़े प्रोडक्शन हाउस ने मुझे हायर किया है। किसी बिग हीरो के साथ मेरी शुरूआत भी नहीं हुई। मुझ से एक भी चूक हुई तो दोबारा मौका नहीं मिलेगा। मेरे टैलेंट और फैसलों के सिवा मेरे पास कुछ भी नहीं है। तभी दो सालों में केवल दो फिल्में कर पाई।
-कैसे देखती हो अपने इस सफर को?
0 जिस लडक़ी ने कभी अभिनय करने का प्लान नहीं किया था,वह यहां तक आ गई। यही बड़ी बात है। मैं पॉजीटिव लडक़ी हूं। मुझे लग रहा है कि आगे भी मेरे साथ अच्छा ही होगा। मुझे धैर्य के अच्छे पुरस्कार मिले हैं। ‘चश्मेबद्दूर’ के बाद मुझे अनेक ऑफर मिले,लेकिन मैंने इंतजार किया। बीच में केवल ‘रनिंगशादी डॉट कॉम’ की। अभी मुझे अच्छे ऐड और एंडोर्समेंट भी मिल रहे हैं।  मैं किसी रेस में खुद को डालना ही नहीं चाहती।
-अभी आप मुंबई आ गई हैं साज-ओ-सामान के साथ ़ ़ ़
0 मैंने पिछली बार बताया था कि पहली फिल्म रिलीज होने के बाद मैं मुंबई आ जाऊंगी। अभी आ गई। घर खोजने में थोड़ा वक्त लगा। मैं दिल्ली की हूं ना? ऐसा घर खोज रही थी,जहां से खुला आकाश दिख सके। मुंबई की आदत डाल रही हूं। दिल से तो दिल्लीवाली ही हूं।
-हिंदी फिल्म इंडस्ट्री ने आप को हाथोंहाथ स्वीकार कर लिया है?
0जी,शुक्र है। मुझे प्रायवेट पार्टी या गेट-टुगेदर नहीं अटेंड करनी पड़ी। एक अच्छी परफारमेंस काफी है पहचान और काम के लिए।
- आप की ताकत और प्रेरणा क्या हैं?
0 मैं मिडिल क्लास की लडक़ी हूं। मेरे पास अपने माहौल के अनुभव हैं। भाषा पर मेरी पकड़ है। किरदारों काे उनके संवादों के साथ आसानी से समझ लेती हूं। मैं डायरेक्टर के निर्देश मानती हूं। मैंने कभी मॉनीटर चेक नहीं किया। ‘रनिंगशादी डॉट कॉम’ के डायरेक्टर अमित राय ने मुझे बहुत कुछ सिखाया।
-समकालीन अभिनेत्रियों में किस का क्या पसंद है?
0 मुझे दीपिका का स्क्रिप्ट सेंस बहुत अच्छा लगता है। कैसे वह खुद के लिए सही स्क्रिप्ट चुन लेती हैं। प्रियंका चोपड़ा का कंफिडेंस प्रभावित करता है। उनका हां,मैं कर लूंगी एटीट्यूड अच्छा लगता है। आलिया ने अपनी कामयाबी टेकेन फॅर ग्रांटेड नहीं ली। वह अपने डैड पर डिपेंड नहीं कर रही। इन सब की कुछ-कुछ चीजें पसंद हैं। पुरानी पीढ़ी में माधुरी दीक्षित और करिश्मा कपूर पसंद हैं।