Search This Blog

Showing posts with label ट्रैप्‍ड. Show all posts
Showing posts with label ट्रैप्‍ड. Show all posts

Saturday, March 18, 2017

बार- बार नहीं मिलता ऐसा मौका - राजकुमार राव



राजकुमार राव
-अजय ब्रह्मात्‍मज

राजकुमार राव के लिए यह साल अच्‍छा होगा। बर्लिन में उनकी अमित मासुरकर निर्देशित फिल्‍म न्‍यूटन को पुरस्‍कार मिला। अभी ट्रैप्‍ड रिलीज हो रही है। तीन फिल्‍मों बरेली की बर्फी,बहन होगी तेरी और ओमेरटा की शूटिंग पूरी हो चुकी है। जल्‍दी ही इनकी रिलीज की तारीखें घोषित होंगी।
-एक साथ इतनी फिल्‍में आ रही हैं। फिलहाल ट्रैप्‍ड के बारे में बताएं?
0 ट्रैप्‍ड की शूटिंग मैंने 2015 के दिसंबर में खत्‍म कर दी थी। इस फिल्‍म की एडीटिंग जटिल थी। विक्रम ने समय लिया। पिछले साल मुंबई के इंटरनेशनल फिल्‍म फेस्टिवल मामी में हमलोगों ने फिल्‍म दिखाई थी। तब लोगों को फिल्‍म पसंद आई थी। अब यह रेगुलर रिलीज हो रही है।
-रंगमंच पर तो एक कलाकार के पेश किए नाटकों का चलन है। सिनेमा में ऐसा कम हुआ है,जब एक ही पात्र हो पूरी फिल्‍म में...
0 हां, फिल्‍मों में यह अनोखा प्रयोग है। यह एक पात्र और एक ही लोकेशन की कहानी है। फिल्‍म के 90 प्रतिशत हिस्‍से में मैं अकेला हूं। एक्‍टर के तौर पर मेरे लिए चुनौती थी। ऐसे मौके दुर्लभ हैं। फिलिकली और मेंटली मेरे लिए कष्‍टप्रद था। खाना नहीं खाना,दिन बीतने के साथ दुबला होना,उसी माहौल में रहना...लेकिन मजा आया।
- शूटिंग पैटर्न क्‍या रखा आप सभी ने। इस फिल्‍म में समय के साथ आप को कमजोर और दुर्बल दिखना था...
0 अच्‍छी बात रही कि शूटिंग लीनियर आर्डर में सीक्‍वेंस के हिसाब से ही की। और कोई तरीका भी नहीं था। एक बार फ्लैट में आ जाने के बाद आर्गेनिक प्रोसेस था। हर दिन के हिसाब से ग्राफ बना था। हम उसे ही भरते गए। फिलम में जब खाना खत्‍म हुआ था,तभी से मेरा खाना भी बंद हो गया था। दिन भर में दो-चार घूंट पानी और बहुत कमजोरी होने पर ब्‍लैक कॉफी... खाने के नाम पर मुझे सिर्फ एक-दो गाजर दिए जाते थे। पहली बार पता चला कि खाना न खाओ तो गुस्‍सा आता है। हताशा बढ़ती है। कई बार झटके से खड़े होने पर चक्‍कर भी आए। तकलीफें सहता रहा,क्‍योंकि पता नहीं फिर ऐसा मौका दोबारा कब मिले। मुझे पहले से बता दिया गया था कि यह सब होगा तो मैं पहले से तैयार था।
- ट्रैप्‍ड को आप ने एडवेंचर,चैलेंज या एक्‍सपेरिमेंट के तौर पर लिया?
0 सबसे पहले तो मुझे विक्रम के साथ काम करना था। उड़ान के समय से ही वे मेरे विश लिस्‍ट में थे। उनसे आयडिया सुन कर ही मैं उत्‍साहित हो गया था। स्क्रिप्‍ट सुनने के बाद तो तय हो गया कि इसे नहीं छोड़ना है। यह रोल मेरे लिए चैलेंज ही था। जैसे शाहिद का रोल था या अभी ओमेरटा का रोल है। इस चैलेंज के साथ खुशी भी थी कि विक्रम के साथ काम करने का मौका मिल रहा है।
- आप का जो किरदार मिल रहे हैं,वे साधारण किस्‍म के असाधारण लोग हैं। हिंदी फिल्‍मों के मेनस्‍ट्रीम किरदार नहीं हैं वे,जिन्‍हें कुछ रुटीन काम करने होते हैं। मुश्किल स्थितियों में फंसे हाशिण्‍ के लोग हैं...
0 फिलमों में वे हाशिए के हो सकते हैं,लेकिन रियल लाइफ में तो ऐसे ही साधारण लोगों की संख्‍या ज्‍यादा है। मैं तो उन्‍हें मेनस्‍ट्रीम ही मानता हूं। मैंने सोच कर ऐसे रोल नहीं चुने हैं। मुझे मिलते गए। अच्‍छी बात है कि मुझे मिले किरदारों के फिल्‍मी रेफरेंस नहीं मिलते। उन किरदारों से मैं दर्शकों के दिलों तक पहुंचा हूं। वे मुझे बताते हैं उन्‍होंने मेरे किरदारों में खुद को कैसे देखा?
-अच्‍छा है कि आप को हंसल मेहता और विक्रमादित्‍य मोटवाणी जैसे डायरेक्‍टर चुन रहे हैं। उन्‍के साथ आप की छनती भी है।
0 इनकी वजह से ही हम हैं। वे हमें मौके दे रहे हैं। वे ऐसे किरदारों को ला रहे हैं,जो हिंदी सिनेमा के अनदेखे किरदार हैं। वे फिल्‍में पुश कर रहे हैं। वे किसी फार्मूला के तहत चालू फिल्‍में नहीं बना रहे हैं। अभी हमें अलग नजरों से देखा जाने लगा है। अब न्‍यूटन देख कर वे सभी चौंके थे।
-क्‍या है न्‍यूटन में...
0 वह एक आयडियलिस्टिक लड़के नूतन कुमार की फिल्‍म है,जिसने अपना नाम बदल कर न्‍यूटन कुमार कर लिया है। नूतन किसी लड़की का नाम लगता है। उसे छत्‍तीसगढ़ के नक्‍सल इलाके में वोटिंग के लिए भेजा जाता है। वह खुद चााहता है कि वहां वोटिंग हो,जबकि और किसी का इंटरेस्‍ट नहीं है। इसी में ब्‍लैक कामेडी बनती है।
-आप की बरेली की बर्फी और बहन होगी तेरी यूपी में शूट हुईं। उनके बारे में क्‍या बताएंगे?
0 दोनों ही छोटे शहरों की फिल्‍मों हैं। उनमें मुझे मजेदार और कम तकलीफ वाले किरदार मिले हैं। शूटिंग में मजा आया। मैं भी पहली बार लखनऊ की गलियों में घूमा। इस फिल्‍म के जरिए उधर के किरदारों से मिला। ओमेरटा के बारे में मत पूछिएगा। उसके बारे में कुछ भी नहीं बता सकता। सख्‍त हिदायत है निर्देशक की।

Friday, March 17, 2017

फिल्‍म समीक्षा : ट्रैप्‍ड



फिल्‍म रिव्‍यू
जिजीविषा की रोचक कहानी
ट्रैप्‍ड
-अजयं ब्रह्मात्‍मज
हिंदी फिल्‍मों की एकरूपता और मेनस्‍ट्रीम मसाला फिल्‍मों के मनोरंजन से उकता चुके दर्शकों के लिए विक्रमादित्‍य मोटवाणी की ट्रैप्‍ड राहत है। हिंदी फिल्‍मों की लीक से हट कर बनी इस फिल्‍म में राजकुमार राव जैसे उम्‍दा अभिनेता हैं,जो विक्रमादित्‍य मोटवाणी की कल्‍पना की उड़ान को पंख देते हैं। यह शौर्य की कहानी है,जो परिस्थितिवश मुंबई की ऊंची इमारत के एक फ्लैट में फंस जाता है। लगभग 100 मिनट की इस फिल्‍म में 90 मिनट राजकुमार राव पर्दे पर अकेले हैं और उतने ही मिनट फ्लैट से निकलने की उनकी जद्दोजहद है।
फिल्‍म की शुरूआत में हमें दब्‍बू मिजाज का चशमीस शौर्य मिलता है,जो ढंग से अपने प्‍यार का इजहार भी नहीं कर पाता। झेंपू,चूहे तक से डरनेवाला डरपोक,शाकाहारी(जिसके पास मांसाहारी न होने के पारंपरिक तर्क हैं) यह युवक केवल नाम का शौर्य है। मुश्किल में फंसने पर उसकी जिजीविषा उसे तीक्ष्‍ण,होशियार,तत्‍पर और मांसाहारी बनाती है। ट्रैप्‍ड मनुष्‍य के सरवाइवल इंस्टिंक्‍ट की शानदार कहानी है। 21 वीं सदी के दूसरे दशक में तमाम सुविधाओं और साधनों के बीच एक फ्लैट में बंद व्‍यक्ति किस कदर लाचार और हतप्रभ हो सकता है? ऐसी मुश्किल में फंसे बगैर इसकी कल्‍पना तक नहीं की जा सकती।
ट्रैप्‍ड देखते समय पर्दे पर एक टक और अपलक देखने की जरूरत पड़ेगी। आज के चलन के मुताबिक अगर मोबाइल पर पल भर के लिए भी निगाह अटकी तो मुमकिन है कि तेजी से आगे बढ़ रही फिल्‍म का कोई सीन निकल जाए और फिर यह समझ में न आए कि अभी जो हो रहा है,वह कैसे हो रहा है? राजकुमार राव ने शौर्य की उलझन,मुश्किल,बेचारगी और हिम्‍मत को पूरी शिद्दत से पर्दे पर जीवंत किया है। हम शौर्य के व्‍यक्तित्‍व और सोच में आ रहे रूपातंरण से परिचित होते हैं। शौर्य से हमें हमदर्दी होती है और उसकी विवशता पर हंसी भी आती है। चूहे के साथ चल रहा शौर्य का एकालाप मर्मस्‍पर्शी है। दोनों ट्रैप्‍ड हैं। फिल्‍म में ऐसे अनेक प्रसंग हैं,जहां सिर्फ हाव-भाव और बॉडी लैंग्‍वेज से राजकुमार राव सब कुछ अभिव्‍यक्‍त करते हैं।
विक्रमादित्‍य मोटवाणी अपनी पीढ़ी के अनोखे फिल्‍मकार हैं। उनके मुख्‍य किरदार हमेशा परिस्थितियों में फंसे होते हैं,लेकिन वे निराश या हताश नहीं होते। वे वहां से निकलने और सरवाइव करने की कोशिश में रहते हें। उनकी यह कोशिश फिल्‍म को अलग ढंग से रोचक और मनोरंजक बनाती है। उन्‍होंने ट्रैप्‍ड में मुंबई महानगर में व्‍यक्ति के संभावित कैद की कल्‍पना की है। उन्‍हें राजकुमार राव का भरपूर साथ मिला है। शौर्य के किरदार के लिए आवश्‍यक स्‍फूर्ति,चपलता,गंभीरता,लरज और गरज राजकुमार ले आते हैं। किरदार के क्रमिक शारीरिक और मानसिक रूपांतरण को उन्‍होंने खूबसूरती से जाहिर किया है। यह फिल्‍म अभिनय के छात्रों को दिखाई और पढ़ाई जा सकती है।
फिल्‍म में कैमरे और साउंड का जबरदस्‍त उपयोग हुआ है।
अवधि 102 मिनट
**** चार स्‍टार

Saturday, March 4, 2017

वक्‍त के साथ बदला है सिनेमा - विक्रमादित्‍य मोटवाणी



 विक्रमादित्‍य मोटवाणी
-अजय ब्रह्मात्‍मज
विक्रमादित्‍य मोटवाणी की लूटेरा 2010 में आई थी। प्रशंसित फिल्‍में उड़ान और लूअेरा के बाद उम्‍मीद थी कि विक्रमादित्‍य मोटवाणी की अगली फिल्‍में फआफट आएंगी। संयोग कुछ ऐसा रहा कि उनकी फिल्‍में समाचार में तो रहीं,लेकिन फलोर पर नहीं जा सकीं। अब ट्रैप्‍ड आ रही है। राजकुमार राव अभिनीत यह अनोखी फिल्‍म है।
सात सालों के लंबे अंतराल की एक वजह यह भी रही कि विक्रमादित्‍य मोटवाणी अपने मित्रों अनुराग कश्‍यप,विकास बहल और मधु मंटेना के साथ प्रोडक्‍शन कंपनी फैंटम की स्‍थापना और उसकी निर्माणाधीन फिल्‍मों में लगे रहे। वे अपना पक्ष रखते हैं, मैं कोशिशों में लगा था। लूटेरा के बाद भावेश जोशी की तैयारी चल रही थी। लगातार एक्‍टर बदलते रहे और फिर उसे रोक देना पड़ा। बीच में एक और फिल्‍म की योजना भी ठप्‍प पड़ गई। प्रोडक्‍शन के काम का दबाव रहा। इन सगकी वजह से वक्‍त निकलता गया और इतना गैप आ गया।
ट्रैप्‍ड जैसी अपारंपरिक फिल्‍म का आयडिया कहां से आया? हिंदी की आम फिल्‍मों से अलग संरचना और कथ्‍य की इस फिल्‍म की योजना कैसे बनी? विक्रमादित्‍य बताते हैं, यह मेरा आयडिया नहीं है। अमित जोशी का एक मेल मिला था। उन्‍होंने अपनी फिल्‍मों के एक-दो सिनोप्सिस भेजे थे। यह आयडिया मुझे अच्‍छा लगा था। मैंने स्क्रिप्‍अ की मांग की तो कोई जवाब नहीं आया। दो महीनों के बाद वे 120 पेज की स्क्रिप्‍ट लेकर आए। मैंने अमित जोशी के साथ हार्दिक मेहता को जोड़ा और उन्‍हें स्क्रिप्‍ट डेवलप करने के लिए कहा। मैंने सोचा था कि स्क्रिप्‍ट तैयार कर लेते हैं। जब 20-25 दिन का समय और कोई एक्‍टर मिलेगा तो कर लेंगे। बीच में ऐसा एक विंडो आया तो मैंने राजकुमार से पूछा। वे राजी हो गए। वे आगे कहते हैं, राजकुमार राव ही मेरी पहली और आखिरी च्‍वाइस थे। मसान के समय राजकुमार राव फायनल हो चुके थे। फिर किसी वजह से वे अलग हो गए। उसके पहले से ही मेरे मन में था कि उनके साथ एक फिल्‍म करनी है। ट्रैप्‍ड के रोल के लिए वे सही चुनाव हैं। वनरेबल और ऑनेस्‍ट किरदार में वे सही लगे।
ट्रैप्‍ड ऊंची बिल्डिंग में फंसे एक व्‍यक्ति की कहानी है। फिल्‍म में अकेले किरदार की भूमिका राजकुमार राव निभा रहे हैं। इस फिल्‍म का निर्देशन किसी चुनौती सें कम नहीं रही। एक्‍टर और डायरेक्‍टर को मिल कर घटनाएं इतनी तेज और रोचक रखनी थीं कि दर्शकों का इंटरेस्‍ट बना रहे। विक्रमादित्‍य बताते हैं, हम ने स्क्रिप्‍ट पर मेहनत की थी। दर्शको को इंटरेस्‍ट हर सीन में बना रहे। मैं इसे किरदार के दिमाग से नहीं बना रहा था। मुझे इंटरेस्टिंग एक्‍टर मिल गया था। उनकी वजह से थोड़ा काम आसान हो गया था।
विक्रमादित्‍य ने फिल्‍म का बजट सीमित रखा। वे ऐसी फिल्‍मों के लिए इसे जरूरी मानते हैं, इस फिल्‍म को हम 20 करोड़ में नहीं बना सकते थे। किसी पॉपुलर स्‍टार के साथ भी बनाते तो फिल्‍म मंहगी हो जाती और दर्शकों की अपेक्षाएं बढ़ जातीं। अभी ऐसी फिल्‍मों के दर्शक आ गए हैं। यों अभी दंगल जैसी कमर्शियल फिल्‍में बन रही हैं। पिछले साल कमर्शियल फिल्‍मों में भी वैरायटी आ गई है। अभी अक्षय कुमार ने जॉली एलएलबी2 जैसी फिल्‍म की। पांच-दस साल पहले आप इन स्टारों के साथ ऐसी फिल्‍मों की कल्‍पना नहीं कर सकते थे। हम ने अपनी औकात में ही ट्रैप्‍ड बनायी है। इस फिल्‍म के ट्रेलर पर आ रहे रिएक्‍शन से विक्रम खुश हैं। सभी को लग रहा है कि राजकुमार राव फोन क्‍यों नहीं कर रहे? विक्रमादित्‍य हंसते हैं, मैं अभी नहीं बताऊंगा। उसके पीछे एक राज है। मुझ से तो कुछ पत्रकारों ने भी पूछा।
विक्रमादित्‍य मोटवाणी की अगली फिल्‍म भावेश जोशी में हर्षवर्द्धन कपूर हैं। नाम से ऐसा लगता है कि यह कोई बॉयोपिक है। विक्रमादित्‍य इस अनुमान से इंकार करते हैं, यह एक सजग युवक की कहानी है। यों समझें कि 21 वीं सदी के दूसरे दशक का एंग्री यंग मैन है। नाम के प्रति आकर्षण के बारे में सच यह है कि मेरे स्‍कूल का एक दोस्‍त था भावेश जोशी। उसके नाम को ऐसा असर था कि सभी उसे पूरा नाम लेकर बुलाते थे। मैंने फिल्‍म का वही नाम रख दिया।
विक्रमादित्‍य मोटवाणी हर तरह की फिल्‍में करना चाहते हैं। उनके प्रशंसकों को बता दें कि फिल्‍मों की इंटरनेशनल साइट आईएमडीबी की सूची में उनकी उड़ान दुनिया की बेहतरीन 200 फिल्‍मों में शामिल है।