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Friday, November 20, 2009

दरअसल : महत्वपूर्ण फिल्म है रोड टू संगम


-अजय ब्रह्मात्‍मज

पिछले दिनों मुंबई में आयोजित मामी फिल्म फेस्टिवल में अमित राय की फिल्म रोड टू संगम को दर्शकों की पसंद का अवार्ड मिला। इन दिनों ज्यादातर इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में दर्शकों की रुचि और पसंद को तरजीह देने के लिए आडियंस च्वॉयस अवार्ड दिया जाता है। ऐसी फिल्में दर्शकों को सरप्राइज करती हैं। सब कुछ अयाचित रहता है। पहले से न तो उस फिल्म की हवा रहती है और न ही कैटेगरी विशेष में उसकी एंट्री रहती है।

रोड टू संगम सीमित बजट में बनी जरूरी फिल्म है। इसके साथ दो अमित जुड़े हैं। फिल्म के निर्माता अमित छेड़ा हैं और फिल्म के निर्देशक अमित राय हैं। यह फिल्म अमित राय ने ही लिखी है। उन्होंने एक खबर को आधार बनाया और संवेदनशील कथा गढ़ी। गांधी जी के अंतिम संस्कार के बाद उनकी अस्थियां अनेक कलशों में डालकर पूरे देश में भेजी गई थीं। एक अंतराल के बाद पता चला था कि गांधी जी की अस्थियां उड़ीसा के एक बैंक के लॉकर में रखी हुई हैं। कभी किसी ने उस पर दावा नहीं किया। अमित राय की फिल्म में उसी कलश की अस्थियों को इलाहाबाद के संगम में प्रवाहित करने की घटना है।

गांधी जी की मृत्यु के बाद उनकी अस्थियां इलाहाबाद के संगम में प्रवाहित की गई थीं। अस्थि कलश को जिस गाड़ी से ले जाया गया था, वह इलाहाबाद के एक संग्रहालय में है। वर्षो बाद फिर से अस्थियां प्रवाहित करने की योजना बनती है, तो उसी गाड़ी के इस्तेमाल की बात सोची जाती है। समस्या यह है कि सालों से बंद होने के कारण वह गाड़ी खराब हो गई है। इलाहाबाद के मेकेनिक हशमत उल्लाह को गाड़ी ठीक करने का काम सौंपा जाता है। उनके अलावा और कोई उसे ठीक नहीं कर सकता। हशमत बड़े मनोयोग से यह काम शुरू करते हैं। बाद में उन्हें पता चलता है कि इस गाड़ी से गांधी जी की अस्थियां ले जाई जाएंगी, तो उनका मनोबल बढ़ जाता है। इस बीच शहर में दंगा होता है। कुछ मुसलिम नेताओं को गिरफ्तार कर लिया जाता है। उनकी गिरफ्तारी के खिलाफ मुसलिम नेता लामबंद होते हैं और वे फतवा जारी करते हैं कि उनके नेताओं की रिहाई तक इलाके की सभी दुकानें बंद रहेंगी। मजबूरन हशमत को अपना गैरेज बंद रखना पड़ता है। मामला लंबा ख्िाचता है, तो हशमत चिंतित होते हैं। उन्हें लगता है कि अगर समय पर गाड़ी ठीक नहीं हुई, तो उस महान आत्मा के साथ नाइंसाफी होगी। वे फतवे के विरुद्ध हो जाते हैं, गैरेज खोलते हैं और शांतिपूर्ण तरीके से अपना काम करते हैं। उनकी ईमानदारी और सादगी का प्रभाव इतना प्रबल है कि धीरे-धीरे दूसरे लोगों का नैतिक सहयोग उन्हें मिलने लगता है। आखिरकार गाड़ी ठीक हो जाती है और उसी गाड़ी से अस्थियां प्रवाह के लिए ले जाई जाती हैं।

हिंदी फिल्मों में मुसलिम किरदारों को पेश करने के निश्चित प्रारूप हैं। वे या तो त्याग करते हैं या फिर आतंकवादी होते हैं। हमारे फिल्मकारों ने मुसलिम समाज की दुविधा और व्यथाओं को व्यक्त ही नहीं किया है। उनके जीवन के हर्ष-विषाद भी हम नहीं जानते। रोड टू संगम में एक छोटे शहर का समाज है। फिल्म के किरदार वास्तविक और पड़ोसी लगते हैं।

च् अमित राय ने देश के मुसलमान और उनकी भावनाओं को नए तरीके से दर्शकों के सामने रखा है। देश के ज्यादातर मुसलमान हशमत की तरह सोचते हैं, लेकिन वे कट्टरपंथी नेताओं के आगे खड़े नहीं हो पाते। उन्हें अपनी बिरादरी से निष्कासन और हुक्का-पानी बंद होने का डर रहता है। हशमत के तर्क और सवाल देश के मुसलमान मन को अच्छी तरह व्यक्त करते हैं। फिल्म सादगी के साथ अपना मंतव्य रखती है। फिल्म में कोई स्टार नहीं है। फिल्म के मुख्य कलाकार परेश रावल, ओम पुरी, पवन मल्होत्रा और जावेद शेख हैं।


Sunday, May 3, 2009

लोकतंत्र का प्रचार

-अजय ब्रह्मात्मज
फिल्म स्टारों के इस भ्रम को बाजार अपने स्वार्थ की वजह से मजबूत करता है कि लोकप्रिय सितारों की संस्तुति से उत्पादों की बिक्री बढ़ती है। हालांकि अभी तक इस बात को लेकर कोई ठोस शोध और सर्वेक्षण उपलब्ध नहीं है कि फिल्म स्टारों के विज्ञापन किसी उत्पाद की बिक्री में कितने प्रतिशत का उछाल लाते हैं? सार्वजनिक जीवन में फिल्म स्टारों की उपयोगिता बढ़ी है। जनहित के कई विज्ञापनों में फिल्म स्टारों का उपयोग किया जा रहा है। सारे लोकप्रिय और बड़े स्टार ऐसे विज्ञापनों को अपना सामाजिक दायित्व मानते हैं। इस बार चुनाव की घोषणा के साथ ही आमिर खान समेत फिल्म बिरादरी के अनेक सदस्यों ने सक्रियता दिखाई। वे विभिन्न संस्थाओं के जागरूकता अभियानों से जुड़े। सभी इस बात को लेकर निश्चित थे कि मतदाताओं को जागरूक बनाने में फिल्म स्टार सफल रहेंगे। कुछ सिने स्टारों ने इस दिशा में काफी प्रयास भी किया। उन्होंने वोट देने से लेकर प्रत्याशियों के चुनाव तक में सावधानी बरतने तक की सलाह दी। एड व‌र्ल्ड के पंडितों की मदद से श्लोक गढ़े गए और विभिन्न माध्यमों से उनका गुणगान किया गया। रेडियो, टीवी, अखबार, बैनर और पोस्टर के जरिए जोरदार अभियान चलाया गया।
चूंकि अधिकांश फिल्म स्टार मुंबई में रहते हैं इसलिए उनकी गतिविधियों का केंद्र मुंबई ही रहता है। किसी भी सामाजिक कार्य, चैरिटी, जनहित और लोकोपकारी कार्य के लिए फिल्म स्टार अपने खाली समय के कुछ घंटों का ही अपनी सुविधा से इस्तेमाल करते हैं। हमेशा बताया जाता है कि समय की कमी और सुरक्षा की दिक्कतों के कारण वे सुदूर इलाकों में नहीं जा सकते। आप गौर करें तो मुंबई, दिल्ली और कभी-कभी कोलकाता में ही इनकी गतिविधियां संपन्न होती हैं। चेन्नई भी उनकी सक्रियता क्षेत्र में शामिल नहीं है। वास्तव में फिल्म स्टारों का सामाजिक दायित्व उनकी फिल्मों के दर्शकों तक ही सीमित रहता है। हिंदी फिल्म स्टारों का एक बड़ा दर्शक वर्ग इन महानगरों में ही है, खास कर उनका प्रभाव क्षेत्र मल्टीप्लेक्स के दर्शकों के दायरे से बाहर नहीं जाता। यही कारण है कि वे किसी भी प्रचार या अभियान के लिए महानगरों से बाहर नहीं निकलते। उन्हें मालूम है कि इलाहाबाद, पटना या जबलपुर जैसे शहरों के दर्शकों की जेबें खाली हैं, इसलिए वहां तक जाने की जहमत कोई क्यों करें? इस तरह देखा जाए तो चुनाव के बहाने अभिनेताओं ने अपनी मार्केटिंग भी की। फिल्म सितारे भूल गए कि मनोरंजन और मतदान, दो चीजें हैं। उन्हें यह गलतफहमी रही कि जैसे वे दर्शकों को सिनेमाघरों में खींच लाते हैं वैसे ही मतदाताओं को घरों से निकलने और वोट देने के लिए प्रेरित कर लेंगे। ऐसा होने की संभावना कम थी और मुंबई में मतदान के बाद जाहिर हो गया कि ऐसा हुआ भी नहीं। इस बार मुंबई में मतदान का प्रतिशत पिछले चुनाव से भी कम रहा। मीडिया विश्लेषक और इस क्षेत्र के दूसरे पंडित गर्मी, छुट्टी आदि को कारण बता रहे हैं। वास्तविकता यह है कि मतदाता लोकतंत्र की चुनावी प्रक्रिया से विरक्त हो गए हैं। लांछन, आरोप-प्रत्यारोप और मौखिक वायदों ने उन्हें राजनीति से विमुख कर दिया है। मतदाता स्पष्ट नहीं कि राजनीतिक पार्टियां किन स्थानीय और राष्ट्रीय मुद्दों पर चुनाव लड़ रही हैं? मुद्दा एक ही है-सत्ता। मुंबई के मतदाताओं ने बहुमत से राजनीति और चुनाव प्रक्रिया के प्रति विरक्ति जाहिर की है। 58 प्रतिशत मतदाताओं ने वोट नहीं किया। उन्होंने मीडिया के आकलन और निष्कर्षो को बेबुनियाद साबित कर दिया है। पिछले छह महीनों से मुंबई में पेज थ्री की सामाजिक हस्तियां दावा कर रही थीं कि मुंबई हमले के बाद मतदाताओं का मिजाज बदल गया है। वे इस बार राजनीतिक पार्टियों को सबक सिखाएंगे। क्या सबक सिखाया उन्होंने? यही कि चुनाव प्रक्रिया और लोकतंत्र में उनकी रुचि नहीं है।
गौर करें तो मुंबई हमले के बाद शहर के अभिजात और कुलीन वर्ग की मुखरता अराजनीतिक थी। उन्होंने तब प्रशासन, लोकतंत्र और सरकार पर उंगलियां उठाई थीं और देश को किसी तानाशाह के हाथों में सौंपने का नारा दिया था। मतदाताओं को जगाने का अभियान भी इसी प्रकार अराजनीतिक रहा। कोई भी अभियान वैचारिक पक्ष या राजनीतिक दृष्टिकोण स्पष्ट नहीं कर रहा था और न ही उसे समझने पर जोर दे रहा था। सभी नैतिकता की दुहाई दे रहे थे। इन फिल्म स्टारों को कौन समझाए कि लोकतंत्र में राजनीति और विचार ही कारक तत्व होते हैं। निश्चित रूप से इस बार मतदान के संदर्भ में फिल्म स्टारों द्वारा की गई अपील निष्प्रभावी रही। उनके प्रभाव में आकर दिया जा रहा यंगिस्तान का नारा भी निराधार साबित हुआ। इसके साथ ही यह भी सिद्ध हो गया कि शहरी मतदाताओं की अपेक्षा ग्रामीण मतदाता राजनीतिक दृष्टि से अधिक जागरूक और सक्रिय हैं।

Friday, April 3, 2009

फ़िल्म समीक्षा:8x10 तस्वीर

भेद खुलते ही सस्पेंस फिस्स
नागेश कुकुनूर ने कुछ अलग और बड़ी फिल्म बनाने की कोशिश में अक्षय कुमार के साथ आयशा टाकिया को जोड़ा और एक नई विधा में हाथ आजमाने की कोशिश की। इस कोशिश में वे औंधे मुंह तो नहीं गिरे, लेकिन उनकी ताजा पेशकश पिछली फिल्मों की तुलना में कमजोर रही। कहा जा सकता है कि कमर्शियल कोशिश में वे कामयाब होते नहीं दिखते। नागेश वैसे निर्देशकों के लिए केस स्टडी हो सकते हैं, जो अपनी नवीनता से चौंकाते हैं। उम्मीदें जगाते हैं, लेकिन आगे चलकर खुद हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के कोल्हू में जुतने को तैयार हो जाते हैं। अपनी पहली फिल्म हैदराबाद ब्लूज से उन्होंने प्रभावित किया था। डोर तक वह संभले दिखते हैं। उसके बाद से उनका भटकाव साफ नजर आ रहा है।
8/10 तस्वीर में नागेश ने सुपर नेचुरल शक्ति, सस्पेंस और एक्शन का घालमेल तैयार किया है। जय पुरी की अपनी पिता से नहीं निभती। वह उनके बिजनेश से खुश नहीं है। पिता-पुत्र के बीच सुलह होने के पहले ही पिता की मौत हो जाती है। जय को शक है कि उसके पिता की हत्या की गई है। जय अपनी सुपर नेचुरल शक्ति से हत्या का सुराग खोजता है। उसके पास अद्भुत शक्ति है। वह तस्वीर के जरिए बाद की घटनाओं को देख सकता है। नागेश ने जय की पिता की हत्या के पहले खींची तस्वीर में मौजूद चारों व्यक्तियों के जरिए घटनाओं को जोड़ते हुए सस्पेंस बढ़ाया है। जय को लगता है कि वह हत्यारे तक पहुंच रहा है, लेकिन जब हत्यारे का पता चलता है तो हंसी आती है। नागेश ने फिल्म में लंबे समय तक सस्पेंस बनाए रखा है। सस्पेंस खुलता है तो फिल्म अचानक लड़खड़ा जाती है। सस्पेंस फिल्मों के साथ दर्शकों की जिज्ञासा तभी जुड़ी रहती है, जब कातिल भी दृश्यों में मौजूद हो और उस पर शक नहीं कर पा रहे हों।
नागेश ने शिल्प में आधुनिक तकनीक व स्पेशल इफेक्ट का सुंदर उपयोग किया है। अक्षय के एक्शन दृश्य हैरतअंगेज तो नहीं हैं, लेकिन वे किरदार से मेल खाते हैं। फिल्म का लोकेशन कहानी के उपयुक्त है। फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी पटकथा है। चूंकि नागेश ने खुद फिल्म लिखी है, इसलिए कह सकते हैं कि लेखक नागेश ने निर्देशक नागेश का साथ नहीं दिया। अंतिम बीस मिनट में फिल्म सपाट हो जाती है। तब तक बना रोमांच काफूर हो जाता है। फिल्म में अक्षय कुमार निराश नहीं करते। वह एक्शन दृश्यों में सहज रहते हैं। आयशा टाकिया को दो दृश्य मिले हैं। उन दृश्यों को वह निभा ले जाती हैं। जावेद जाफरी ने जटिल किरदार निभाया है और उसे कामिकल नहीं होने दिया है। शर्मिला टैगोर समेत बाकी कलाकार सामान्य हैं।
रेटिंग : **

Friday, December 19, 2008

फ़िल्म समीक्षा:वफ़ा


दर्दनाक अनुभव

काका उर्फ राजेश खन्ना की फिल्म वफा से उम्मीद नहीं थी। फिर भी गुजरे जमाने के इस सुपर स्टार को देखने की लालसा थी। यह उत्सुकता भी थी कि वापसी की फिल्म में वह क्या करते हैं? हिंदी फिल्मों के पहले सुपर स्टार राजेश खन्ना ने कभी अपने अभिनय और अनोखी शैली से दर्शकों को दीवाना बना दिया था। दूज के चांद जैसी अपनी मुस्कराहट और सिर के झटकों से वह युवाओं को सम्मोहित करते थे। आरंभिक सालों में लगातार छह हिट फिल्मों का रिकार्ड भी उनके नाम है। फिर इस सुपरस्टार को हमने गुमनामी में खोते भी देखा।
वफा से एक छोटी सी उम्मीद थी कि वह अमिताभ बच्चन जैसी नहीं तो कम से कम धर्मेंद्र जैसी वापसी करेंगे। लगा जवानी में दर्शकों के चहेते रहे राजेश खन्ना को प्रौढ़ावस्था में देखना एक अनुभव होगा। अनुभव तो हुआ, मगर दर्दनाक। एक अभिनेता, स्टार और सुपरस्टार के इस पतन पर। क्या वफा से भी घटिया फिल्म बनाई जा सकती है? फिल्म देखने के बाद बार-बार यही सवाल कौंध रहा है कि राजेश खन्ना ने इस फिल्म के लिए हां क्यों की? किसी भी फिल्म की क्रिएटिव टीम से पता चल जाता है कि वह कैसी बनेगी? अपने समय के तमाम मशहूर निर्माता-निर्देशकों और अभिनेत्रियों के साथ काम कर चुके राजेश खन्ना को निर्देशक राकेश सावंत और अभिनेत्री सारा के साथ काम करने की क्या जरूरत पड़ गई?
वफा अश्लील ही नहीं, फूहड़ और घटिया भी है। स्त्री चरित्र का ऐसा घटिया चित्रण सी ग्रेड की कामुक फिल्मों में भी नहीं होता। उन फिल्मों की अश्लीलता का भी एक लाजिक होता है। वफा दर्शकों की संवदेनशीलता को चोट पहुंचाती है। राजेश खन्ना के प्रशंसकों को घोर निराशा होगी। ऐसी वापसी से तो बेहतर था कि राजेश खन्ना गुमनाम ही रहते।

Thursday, December 18, 2008

दरअसल: गल करो, भाई गल करो, सारे मसले हल करो..

-अजय ब्रह्मात्मज
भारत में मौजूद पाकिस्तानी कलाकार मुंबई में हुए ताज़ा हमले के कुछ दिनों के अंदर एक-एक कर अपने देश लौट गए। मुंबई में बने विरोधी माहौल को देखते हुए उन्होंने सही फैसला लिया। कहना मुश्किल है कि वे कितनी जल्दी फिर से अपने सपनों की तलाश में भारत आ पाएंगे! मुंबई की हिंदी फिल्म इंडस्ट्री का एक तबका तो शुरू से उनका विरोधी रहा है। उनका तर्क होता है कि क्या भारत में इतनी प्रतिभाएं नहीं हैं कि हम पाकिस्तान से कलाकारों को लाएं? एक सवाल यह भी पूछा जाता है कि वे हमारे कलाकारों को अपने यहां आने की इजाजत क्यों नहीं देते? दोनों तरह के सवालों में इसी जवाब की उम्मीद रहती है कि पाकिस्तान से हम अपने सांस्कृतिक संबंध खत्म कर लें।
इस बार भी हमले के दस दिनों के अंदर हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के कुछ लोगों ने जुलूस निकाला और पाकिस्तानी कलाकारों को खदेड़ने की बात की। गौर करें, तो पाएंगे कि इस जुलूस में ज्यादातर असफल कलाकार शामिल हुए। शायद उन्हें यह महसूस होता है कि यदि पाकिस्तानी कलाकार नहीं रहेंगे, तो उन्हें काम मिल जाएगा।
देखें, तो पाकिस्तानी कलाकारों ने हिंदी फिल्मों को नए स्वर और सुर दिए हैं। हाल-फिलहाल में गाए उनके गीत अत्यंत लोकप्रिय हुए हैं। ऐसी लोकप्रियता थोपी नहीं जा सकती। खास कर गायकी की बात करें, तो गायक और श्रोता का सीधा रिश्ता बनता है। ग्लोबलाइजेशन के इस दौर में संगीत और फिल्में अपने श्रोता और दर्शक खोज ही लेती हैं। हम प्रतिबंध लगाकर उन्हें अपनी फिल्मों से दूर जरूर रख सकते हैं, लेकिन उन्हें श्रोताओं से दूर कर पाना नामुमकिन है। अभी की बात छोड़ें। दरअसल, जिस जमाने में दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक संबंध टूटे हुए थे और संचार माध्यमों का ऐसा विकास नहीं हुआ था, तब भी मेहंदी हसन और गुलाम अली भारत में लोकप्रिय थे। पिछले दिनों बिहार में आयोजित नालंदा सांस्कृतिक महोत्सव का उद्घाटन करने गुलाम अली आने वाले थे। मुंबई हमले के बाद की परिस्थिति में उन्हें वीजा नहीं मिल पाया। तात्कालिक रूप से ऐसा कदम उचित जरूर हो सकता है, लेकिन पाकिस्तान से सांस्कृतिक संबंध खत्म करने और वहां के कलाकारों को यहां काम नहीं देने की दलील पर अमल नहीं किया जा सकता। दोनों देशों को नजदीक लाने और लोगों की परस्पर समझ बढ़ाने में कलाकारों का बड़ा योगदान होता है।
पिछले दो सालों में पाकिस्तान में हिंदी फिल्मों के प्रदर्शन का सिलसिला आरंभ हुआ था। एक ही दिन दोनों देशों में फिल्में रिलीज करने का फायदा भी दिखा, लेकिन वर्तमान माहौल में उस पर भी विराम लग गया है। मालूम नहीं कि फिर से सिलसिला बनने में कितना वक्त लगे! हम सभी जानते हैं कि भारतीय फिल्में पाकिस्तान में बेहद लोकप्रिय हैं। अगर उन्हें वैधानिक जरिए से फिल्में नहीं मिलतीं, तो वे पायरेटेड डीवीडी का सहारा लेते हैं। यश चोपड़ा ने बताया था कि वीर जारा पाकिस्तान में इतनी ज्यादा देखी गई है कि अगर उस कारोबार का आधा हिस्सा भी उन्हें मिला होता, तो बहुत पैसे मिलते! पिछले हफ्ते उनके बेटे की फिल्म रब ने बना दी जोड़ी रिलीज हुई है। नए माहौल में पाकिस्तान में यह फिल्म रिलीज नहीं हो सकी। पाकिस्तान के दर्शकों ने इसे पायरेटेड डीवीडी पर देखा। दरअसल, कलाकार और इंडस्ट्री की कोशिश यह होनी चाहिए कि वे दोनों देशों को करीब लाने की दिशा में प्रयत्नशील हों। संबंध तोड़ने, कलाकारों को भारत नहीं आने देने से हम माहौल को और खराब ही करेंगे। क्या पाकिस्तानी कलाकारों पर प्रतिबंध लगाने से आतंकवाद की समस्या खत्म हो जाएगी? हमें अच्छा संबंध बनाने का सिलसिला जारी रखना चाहिए। किसी ने बहुत सही कहा है, गल करो, भाई गल करो, सारे मसले हल करो..।

Saturday, November 15, 2008

फ़िल्म समीक्षा:दसविदानिया

अवसाद में छिपा हास्य
-अजय ब्रह्मात्मज
अलग मिजाज की फिल्म को पसंद करने वालों के लिए दसविदानिया उपहार है। चालू फार्मूले और स्टार के दबाव से बाहर निकल कर कुछ निर्देशक ऐसी फिल्में बना रहे हैं। शशांत शाह को ऐसे निर्देशकों में शामिल किया जा सकता है। फिल्म का नायक 37 साल का है। शादी तो क्या उसकी जिंदगी में रोमांस तकनहीं है। चेखव की कहानियों और हिंदी में नई कहानी के दौर में ऐसे चरित्र दिखाई पड़ते थे। चालू फिल्मों में इसे डाउन मार्केट मान कर नजरअंदाज किया जाता है।
अमर कौल एक सामान्य कर्मचारी है। काम के बोझ से लदा और मां की जिम्मेदारी संभालता अपनी साधारण जिंदगी में व्यस्त अमर। उसे एहसास ही नहीं है कि जिंदगी के और भी रंग होते हैं। हां, निश्चित मौत की जानकारी मिलने पर उसका दबा अहं जागता है। मरने से पहले वह अपनी दस ख्वाहिशें पूरी करता है। हालांकि इन्हें पूरा करने के लिए वह कोई चालाकी नहीं करता। वह सहज और सीधा ही बना रहता है।
अमर कौल की तकलीफ रूलाती नहीं है। वह उदास करती हैं। सहानुभूति जगाती हैं। चार्ली चैप्लिन ने अवसाद से हास्य पैदा करने में सफलता पाई थी। दसविदानिया उसी श्रेणी की फिल्म है। कमी यही है कि इसमें अवसाद ज्यादा गहरा नहीं हो पाता। विसंगतियां अधिक तकलीफदेह नहीं हैं। फिर भी विनय पाठक ने अपने अभिनय के दम पर बांधे रखा है।
दसविदानिया संबंध और एहसास की फिल्म है जो सामान्य व्यक्ति के छोटे इरादों की भावनात्मक गहराई को व्यक्त करती है।
मुख्य कलाकार : विनय पाठक, नेहा धूपिया, सरिता जोशी, रजत कपूर, सौरभ शुक्ला आदि।
निर्देशक : शशांत शाह
तकनीकी टीम : निर्माता- आजम खान और विनय पाठक, कथा-पटकथा- अरशद सैयद, गीत - कैलाश खेर, संगीत - कैलाश, परेश, नरेश

Friday, November 14, 2008

दोस्ती का मतलब वफादारी है: अभिषेक बच्चन

अभिषेक बच्चन की नई फिल्म दोस्ताना दोस्ती पर आधारित है। आज रिलीज हो रही इस फिल्म के बारे में पेश है अभिषेक बच्चन से खास बातचीत-
दोस्ती क्या है आप के लिए?
मेरे लिए दोस्ती का मतलब वफादारी है। दोस्त आसपास हों, तो हम सुरक्षा और संबल महसूस करते हैं।
क्या दोस्त अपने पेशे के ही होते हैं?
दोस्त तो दोस्त होते हैं। जरूरी नहीं है कि वे आप के पेशे में ही हों। मेरे कई दोस्त ऐसे हैं,जिनका फिल्मों से कोई नाता नहीं है।
दोस्त बनते हैं या बनाए जाते है?
दोस्त बनाए जाते हैं। दोस्ती खुद-ब-खुद नहीं होती। दोस्ती की जाती है। उसके लिए कोशिश करनी पड़ती है।
कौन सा रिश्ता ज्यादा मजबूत होता है? दोस्ती या खून का रिश्ता?
यह व्यक्ति पर निर्भर करता है। मेरे और आपके या किसी और के अनुभव में फर्क हो सकता है। मैं रिश्तों को अलग-अलग करके नहीं देखता।
दोस्त और दोस्ती को लेकर आप के अनुभव कैसे रहे हैं?
मेरे ज्यादातर दोस्त बचपन के ही हैं। गोल्डी बहल,सिकंदर खेर,उदय चोपड़ा और रितिक रोशन सभी मेरे बचपन के दोस्त हैं। हम सभी एक ही स्कूल में पढ़ते थे। मैंने दोस्ती निभाई है और वे सभी दोस्त बने रहे हैं।
कोई गैरफिल्मी दोस्त भी है?
बिल्कुल। अभी दो के नाम लूंगा। गौरव चेन्नई में रहते हैं और रियल एस्टेट के धंधे से जुड़े हैं। कॉलेज के दिनों में गौरव से दोस्ती हुई थी। विनय लंदन में रहते हैं और मार्केटिंग से जुड़े हैं। वह मेरे बचपन के दोस्त हैं। हम पड़ोसी थे।
आप ने हमेशा कहा है कि पापा आप के सबसे अच्छे दोस्त हैं। अमित जी भी अपने ब्लॉग में उल्लेख करते हैं कि आप उनके दोस्त हैं। क्या इस दोस्ती को परिभाषित करेंगे?
पापा के साथ मेरी दोस्ती को परिभाषित नहीं किया जा सकता। इस रिश्ते की यही खासियत है। वह मेरे सबसे घनिष्ठ दोस्त हैं। हम दोनों एक-दूसरे के लिए कुछ भी कर सकते हैं। दोस्ती की शुरुआत डैड ने की थी। उनका मानना था कि जिस दिन बेटे के पांव में मेरा जूता आ गया उस दिन से वह मेरा दोस्त हो गया। मैं उनसे किसी भी मुद्दे पर बात कर सकता हूं। इस दोस्ती में मैं अपनी मर्यादा नहीं भूलता कि वह मेरे पिता हैं। एक हद है,जो मैं पार नहीं कर सकता।
आप ऐश्वर्या को भी दोस्त कहते हैं?
ऐश्वर्या से मेरी दोस्ती अलग किस्म की है। वह मेरी पत्‍‌नी हैं। ऐश्वर्या हमउम्र और हमपेशा भी हैं। वह मुझे अच्छी तरह समझती हैं।
जॉन अब्राहम आपके दोस्त हैं और अभी उनके साथ दोस्ताना आ रही है।
जॉन की दोस्ती की वजह से ही हम फिल्म में बेहतर काम कर सके। हमारे बीच किसी प्रकार की होड़ नहीं रही। सीन चुराने या छा जाने वाली बात हमारे दिमाग में नहीं आई। आाप फिल्म देखेंगे, तो पता चलेगा। इस फिल्म में एक ही लड़की से हम दोनों प्यार कर बैठते हैं।

Thursday, November 13, 2008

दरअसल:दीवाली पर हुए बॉक्स ऑफिस धमाके

-अजय ब्रह्मात्मज
इस साल दीवाली के मौके पर रिलीज हुई गोलमाल रिट‌र्न्स और फैशन का बॉक्स ऑफिस कलेक्शन अच्छा रहा। दोनों फिल्मों को लेकर ट्रेड सर्किल में पहले से ही पॉजिटिव बातें चल रही थीं। कहा जा रहा था कि रिलीज के दिन गोलमाल रिट‌र्न्स का पलड़ा भारी होता दिखा। उसका कलेक्शन ज्यादा हुआ। फैशन भी बहुत पीछे नहीं रही। दोनों फिल्मों के धमाकों से बॉक्स ऑफिस पर छाई खामोशी टूटी है। हालांकि आने वाले हफ्तों में ही यह पता चलेगा कि दोनों की वास्तविक कमाई कितनी रही!
अगर सिर्फ लाभ के नजरिए से देखें, तो गोलमाल रिट‌र्न्स सभी के लिए फायदेमंद साबित होती दिख रही है। निर्माता, वितरक और प्रदर्शक सभी को फायदा हो रहा है। फिल्म बिजनेस में अब नए व्यापारी आ गए हैं। इरोज और इंडियन फिल्म्स जैसी कॉरपोरेट कंपनियां फिल्म निर्माण में शामिल नहीं होतीं। वे फिल्में पूरी होने के बाद खरीद लेती हैं। ऐसे में निर्माता भी एकमुश्त रकम पाने के बाद संतुष्ट हो जाता है। उसे फिल्म के चलने या न चलने की फिक्र ही नहीं सताती। गोलमाल रिट‌र्न्स और सिंह इज किंग के उदाहरण से इसे समझा जा सकता है। दोनों फिल्में पूरी होने के बाद इंडियन फिल्म्स ने खरीदी और उन्हें अपनी शर्तोपर रिलीज किया। सिंह इज किंग का जबरदस्त प्रचार होने के कारण उसके प्रति दर्शकों के बीच भारी उत्सुकता थी। इंडियन फिल्म्स ने उसे देखते हुए वितरकों से मीनिमम गारंटी में निश्चित रकम लेने के बाद फिल्म दे दी। इस तरह से रिलीज के पहले ही इंडियन फिल्म्स ने फिल्म की लागत से अधिक रकम एकत्रित कर खुद को सुरक्षित कर लिया। रिलीज होने के बाद सिंह इज किंग भी कामयाब कहलाई, लेकिन उतनी नहीं, जितनी रिलीज के पहले हाइप और प्रचार की वजह से लग रही थी। नतीजा यह हुआ कि मीनिमम गारंटी के रूप में भारी रकम दे चुके वितरकों को नुकसान हुआ।
गोलमाल रिट‌र्न्स में मामला उल्टा हो गया है। इस बार पिछले अनुभव से सबक लेकर वितरकों ने मीनिमम गारंटी नहीं दी। उन्होंने दूसरे समीकरणों के तहत फिल्म रिलीज की। इस बार वितरक फायदे में हैं। गोलमाल रिट‌र्न्स को जिस कीमत में इंडियन फिल्म्स ने खरीदा है, उस रकम को जुटाना और फिर मुनाफे की तरफ जाने में अभी कई अड़चनें हैं। फिल्म का ग्रॉस कलेक्शन पहले ही हफ्ते में 35 करोड़ से अधिक बताया जा रहा है, लेकिन सच तो यह है कि इसमें वितरकों और प्रदर्शकों के मुनाफे भी शामिल हैं। इंडियन फिल्म्स का मुनाफा तो फिल्म के सौ करोड़ के बिजनेस के बाद ही होगा। फिल्म व्यापार में कॉरपोरेट कंपनियों के आने के बाद से मुनाफा, लाभ और निवेश का आकलन बिल्कुल बदल गया है। सिर्फ बॉक्स ऑफिस कलेक्शन ही मुनाफे का आधार नहीं रह गया है। हां, उस कलेक्शन से आय के दूसरे स्रोत प्रभावित जरूर होते हैं। इसी वजह से निर्माता चाहता है कि फिल्म सप्ताहांत में अच्छा बिजनेस करे और फिल्म के हिट होने की खबर फैल जाए। दीवाली के दो धमाकों के बाद राजश्री की एक विवाह ऐसा भी बिल्कुल अलग रणनीति के साथ रिलीज की गई। वैसे, राजश्री की रणनीति के नतीजे कुछ दिनों में ही सामने आ जाएंगे। इस हफ्ते रिलीज हो रही दोस्ताना को लेकर भी काफी उम्मीदें हैं। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री दीवाली की कामयाबी के बाद खुश नजर आ रही है। अगले दो महीनों में बिजनेस सुधरता नजर आ रहा है। खासकर दिसंबर में रिलीज हो रही शाहरुख खान की रब ने बना दी जोड़ी और आमिर खान की गजनी पर सारी उम्मीदें टिकी हैं, क्योंकि दोनों ही फिल्मों को अभी से हिट माना जा रहा है। रब ने बना दी जोड़ी आदित्य चोपड़ा की फिल्म है। वे मोहब्बतें के छह साल बाद शाहरुख के साथ लौट रहे हैं। उन्होंने इस बार साधारण प्रेम कहानी ली है। दूसरी तरफ गजनी तमिल में बन चुकी गजनी की रिमेक है, जिसके लिए आमिर ने खास मेहनत की है। ट्रेड सर्किल में इसे दोनों खानों के वर्चस्व की लड़ाई के रूप में भी देखा जा रहा है। किसका पलड़ा भारी रहेगा, यह कहना मुश्किल है! वैसे, पिछले साल शाहरुख और आमिर दोनों की फिल्मों ने कामयाबी हासिल की थी। कुछ लोग तो यही उम्मीद कर रहे हैं कि दोनों फिर कामयाब हों और फिल्म इंडस्ट्री को भी आगे बढ़ाएं।

Friday, October 31, 2008

दरअसल:छोटी सफलता को बड़ी कामयाबी न समझें


-अजय ब्रह्मात्मज

पिछले दिनों सीमित बजट की कुछ फिल्मों को अच्छी सराहना मिली। संयोग से वे महानगरों के मल्टीप्लेक्स थिएटरों में सप्ताहांत के तीन दिनों से ज्यादा टिकीं और उनका कुल व्यवसाय लागत से ज्यादा रहा। तीन-चार फिल्मों की इस सफलता को अब नया ट्रेंड बताने वाले पंडित बड़ी भविष्यवाणियां कर रहे हैं। वे बता रहे हैं कि अब छोटी फिल्मों का जमाना आ गया है। इन भविष्य वक्ताओं में एक निर्माता भी हैं। चूंकि वे कवि, पेंटर और पत्रकार भी हैं, इसलिए अपनी धारणा को तार्किक बना देते हैं। उन्होंने इस लेख में अपनी जिन फिल्मों के नाम गिनाए हैं, उनकी न तो सराहना हुई थी और न ही उन्हें कामयाब माना गया। आमिर से लेकर ए वेडनेसडे की सराहना और कामयाबी के बीच हल्ला और अगली और पगली जैसी असफल फिल्में भी आई हैं। हां, चूंकि इन फिल्मों की लागत कम थी, इसलिए नुकसान ज्यादा नहीं हुआ। आमिर, मुंबई मेरी जान और ए वेडनेसडे जैसी फिल्मों का उदाहरण देते समय हमें यह भी देखने की जरूरत है कि इनके निर्माता कौन हैं? लोग गौर करें कि बड़ी फिल्मों के निर्माताओं और निर्माण कंपनियों ने ही छोटी फिल्मों के लिए एक शाखा खोल ली है। वे कुछ फिल्में इस श्रेणी की बनाते हैं। असल मुद्दा यह है कि क्या इन छोटी फिल्मों से बिजनेस मोड्यूल बदल रहा है? बड़ी कारपोरेट कंपनियां खास मिजाज, विषय और अंदाज की ही फिल्में चुन रही हैं। वे मल्टीप्लेक्स थिएटरों के दर्शकों की रुचि को ध्यान में रख कर फिल्में बना रही हैं। इन फिल्मों के निर्देशकों को भी अलग से देखें। ज्यादातर विज्ञापन फिल्मों की दुनिया से आए हैं। पहली फिल्म के लिए उन्हें बड़ा बजट नहीं मिल पाता, इसलिए छोटी फिल्म का ताना-बाना रचते हैं। छोटी फिल्म से क्वालिफाई करने के बाद वे बड़ी फिल्म के लिए हाथ-पांव मारते हैं।
इम्तियाज अली ने सोचा न था के बाद जब वी मेट बनाई और अब वे सैफ अली खान के प्रोडक्शन की फिल्म निर्देशित कर रहे हैं। छोटी फिल्मों का बाजार हमेशा रहा है और उसके दर्शक भी रहे हैं। कभी श्याम बेनेगल, कभी गुलजार, कभी बासु चटर्जी, तो कभी सईद मिर्जा की फिल्मों के रूप में हम उन्हें देखते रहे हैं। हिंदी फिल्मों के हाल-फिलहाल का इतिहास बताता है कि ऐसी फिल्मों की संभावनाएं सिमट गई हैं। स्वतंत्र निर्माता धीरे-धीरे खत्म होते गए हैं। फिल्म इंडस्ट्री चंद बड़े बैनर, प्रोडक्शन हाउस और कारपोरेट कंपनियों की मुट्ठी में आ चुकी हैं। इस माहौल में स्वतंत्र निर्माता और स्वतंत्र सोच के निर्देशकों के लिए कोई जगह नहीं है। साबुन और तेल की कंपनियों की तरह फिल्मों की कंपनियां भी प्रीमियम प्रोडक्ट्स और ब्लॉक बस्टर के साथ कम लागत की फिल्में बना रही हैं। ग्राहक बने दर्शक को तो सिनेमाघरों में बड़ी और छोटी दोनों फिल्मों के लिए एक ही राशि के टिकट खरीदने पड़ते हैं। इस तरह जो भी फायदा है, वह निर्माता का है। हिंदी फिल्मों का संसार बाकी भाषाओं और खासकर हॉलीवुड की फिल्मों से अलग नहीं है। बड़ी और भव्य फिल्में अधिक दर्शकों को आकर्षित करती हैं। लोकप्रिय स्टार दर्शकों को थिएटरों में ले आते हैं। आम दर्शकों का मनोरंजन इन फिल्मों से होता है और नतीजतन दर्शक ऐसी फिल्मों को बड़ी हिट बना देते हैं। विषय, शिल्प और शैली के लिहाज से ओम शांति ओम भले ही साधारण फिल्म रही हो, लेकिन उसका बिजनेस ए वेडनेसडे और आमिर के बराबर है, लेकिन फिल्म इंडस्ट्री अंतत: ओम शांति ओम जैसी फिल्मों से ही चलती है। यह क्रूर विडंबना है, लेकिन फिल्म इंडस्ट्री का यही सच है।
हां, छोटी फिल्मों की संभावना है, लेकिन उस संभावना को मूर्त रूप देने के लिए कारपोरेट कंपनियों के चंगुल से फिल्म इंडस्ट्री को बाहर आना होगा। नई सोच के युवा निर्देशकों को मौका देना होगा और मल्टीप्लेक्स और मेट्रो के बाहर के दर्शकों को भी ध्यान में रखना होगा। छोटे दर्शक समूहों को ध्यान में रखकर भी छोटी फिल्मों को बनाया जा सकता है, लेकिन उसके लिए कारपोरेट कंपनियों को एमबीए ऑफिसर के बजाए साहित्य, संस्कृति और इतिहास के जानकारों को बहाल करना होगा!

फ़िल्म समीक्षा:गोलमाल रिट‌र्न्स


पिछली फिल्म की कामयाबी को रिपीट करने के लोभ से कम ही डायरेक्टर व प्रोड्यूसर बच पाते हैं। रोहित शेट्टी और अष्ट विनायक इस कोशिश में पिछली कामयाबी को बॉक्स ऑफिस पर भले ही दोहरा लें लेकिन फिल्म के तौर पर गोलमाल रिट‌र्न्स पहली गोलमाल से कमजोर है।
ऐसी फिल्मों की कोई कहानी नहीं होती। एक शक्की बीवी है और उसका शक दूर करने के लिए पति एक झूठ बोलता है। उस झूठ को लेकर प्रसंग जुड़ते हैं और कहानी आगे बढ़ती है। कहानी बढ़ने के साथ किरदार जुड़ते हैं और फिर फिल्म में लतीफे शामिल किए जाते हैं। कुछ दर्शकों को बेसिर-पैर की ऐसी फिल्म अच्छी लग सकती है लेकिन हिंदी की अच्छी कॉमेडी देखने वाले दर्शकों को गोलमाल रिट‌र्न्स खास नहीं लगेगी।
अजय देवगन संवादों के माध्यम से अपना ही मजाक उड़ाते हैं। तुषार कपूर गूंगे की भूमिका में दक्ष होते जा रहे हैं। मालूम नहीं एक कलाकार के तौर पर यह उनकी खूबी मानी जाएगी या कमी? फिल्म में अरशद वारसी की एनर्जी प्रभावित करती है। श्रेयस तलपड़े हर फिल्म में यह जरूर बता देते हैं कि वे अच्छे मिमिक्री आर्टिस्ट हैं। उन्हें इस लोभ से बचने की जरूरत है।
गानों के फिल्मांकन में रोहित ने अवश्य भव्यता रखी है और फैंटेसी का सुंदर इस्तेमाल किया है। कंप्यूटरजनित छवियां उनकी कल्पना को साकार करती हैं। रोहित को अगली बार समर्थ लेखकों के साथ काम करना चाहिए। उम्मीद है कि वे भविष्य में अपनी तकनीकी दक्षता का बेहतरीन इस्तेमाल करेंगे और बेहतरीन फिल्में देंगे।

मुख्य कलाकार : अजय देवगन, अरशद वारसी, सेलिना जेटली, अमृता अरोरा, तुषार कपूर, श्रेयश तलपड़े, करीना कपूर, अंजना सुखानी।
निर्देशक : रोहित शेट्टी
तकनीकी टीम : निर्माता- ढिलिन मेहता

Wednesday, October 22, 2008

गजनी में गजब ढाएंगे आमिर खान

-अजय ब्रह्मात्मज
पिछले साल 'तारे जमीन पर' में दर्शकों ने आमिर खान को निकुंभ सर की सीधी-सादी भूमिका में देखा था। अब 'गजनी' में वे हैरतअंगेज एक्शन करते नजर आएंगे। गजनी के लिए उनके माथे पर कटे का निशान तो सभी ने देख रखा है। लेकिन, उनकी बाडी के बारे में किसी को पता नहीं था। 'गजनी' में आमिर उभरे 'बाइसेप्स' और 'शोल्डर्स' के साथ दर्शकों के सामने होंगे।
दैनिक जागरण से खास बातचीत में आमिर ने नए लुक और 'गजनी' के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने कहा, 'मैं लंबे अंतराल के बाद एक्शन फिल्म कर रहा हूं। फिल्म के निर्देशक मुरुगदास ने मुझे सलाह दी थी कि एक्शन हीरो होने के नाते मैं अपनी बाडी बनाऊं। ऐसी बाडी बनाने में डेढ़-दो साल लगते हैं।' आमिर ने कहा, 'मैंने तारे जमीन पर के पोस्ट प्रोडक्शन के समय से ही अपने शरीर पर काम शुरू कर दिया था। उन दिनों रोजाना तीन-चार घंटे की एक्सरसाइज के बाद मैं थक कर चूर हो जाता था। लेकिन, फिल्म के लिए यह करना जरूरी था।'
आमिर ने कहा, 'फिर मुझे दुनिया की नजरों से भी इस बाडी को छिपा कर रखना था। मैं उन दिनों ऐसे कपड़े पहनता था कि कोई भांप न सके।' उल्लेखनीय है कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में आमिर ने ही फिल्म के किरदार के हिसाब से लुक तैयार करने की परंपरा डाली। 'लगान', 'दिल चाहता है', 'मंगल पांडे', 'रंग दे बसंती', 'फना', 'तारे जमीन पर' और अब 'गजनी' में दर्शक उन्हें अलग लुक में देखेंगे।
हर फिल्म के साथ लुक बदलने के बारे में आमिर ने कहा, 'मैं इसे बहुत जरूरी मानता हूं। मुझे लगता है कि लुक अपनाने के बाद आप किरदार को जीने लगते हैं। मैं अपनी फिल्मों में जो किरदार निभाता हूं, वैसा ही महसूस करने लगता हूं। हालांकि यह थकान और तकलीफ से भरी प्रक्रिया होती है। लेकिन, जब दर्शक मेरी फिल्मों की सराहना करते हैं तो सब वसूल हो जाता है।'
'गजनी' तमिल में इसी नाम से बनी फिल्म का रीमेक है। इसे तमिल फिल्म के निर्देशक ए आर मुरुगदास ने ही निर्देशित किया है। गजनी में आमिर के साथ दक्षिण की हाट अभिनेत्री आसिन और जिया खान हैं। 'तारे जमीन पर' की रिलीज के पूरे एक साल के बाद इस साल क्रिसमस के मौके पर 'गजनी' रिलीज होगी।

Saturday, October 18, 2008

फ़िल्म समीक्षा:कर्ज्ज्ज्ज़


पुरानी कर्ज से कमतर

-अजय ब्रह्मात्मज

सतीश कौशिक रीमेक फिल्मों के उस्ताद हैं। ताजा कोशिश में उन्होंने सुभाष घई की कर्ज को हिमेश रेशमिया के साथ पेश किया है। कहानी के क्लाइमेक्स से पहले के ड्रामा में कुछ बदलाव है। 28 साल के बाद बनी फिल्म के किरदारों में केवल बाहरी परिवर्तन किए गए हैं उनके स्वभाव और कहानी के सार में कोई बदलाव नहीं है।
सतीश कौशिक और हिमेश ने हमेशा विनम्रता से स्वीकार किया है कि दोनों ही सुभाष घई व ऋषि कपूर की तुलना में कमतर हैं। पुनर्जन्म की इस कहानी में छल, कपट, प्रेम, विद्वेष और बदले की भावना पर जोर दिया गया है। यह शुद्ध मसाला फिल्म है। 25-30 वर्ष पहले ऐसी फिल्में दर्शक खूब पसंद करते थे। ऐसे दर्शक आज भी हैं। निश्चित ही उनके बीच कर्ज पसंद की जाएगी। फिल्म का संगीत, हिमेश की एनर्जी और उर्मिला मातोंडकर का सधा निगेटिव अंदाज इसे रोचक बनाए रखता है। यह हिंसात्मक बदले से अधिक भावनात्मक बदले की कहानी है।
पुरानी कर्ज की तरह यह कर्ज भी संगीत प्रधान है। हिमेश ने पुराने संगीत को रखते हुए अपनी तरफ से नई धुनें जोड़ी हैं। धुनें मधुर लगती हैं लेकिन उनके साथ पिरोए शब्द चुभते हैं। तंदूरी नाइट्स जैसे गीत में गीतकार की सीमा नजर आती है। पुरानी कर्ज में शब्दों और धुन का मधुर गठजोड़ था। हां, हिमेश के अभिनय पर बात नहीं की जा सकती। वे अपनी फिल्मों में किरदार को खूबसूरती से परफार्मर के रूप में पेश करते हैं। गाने और उनकी परफार्मेस से दर्शक मुग्ध रहते हैं। लेकिन, फिल्म के नाटकीय दृश्यों में अभिनेता हिमेश की कलई खुलने लगती है। सतीश कौशिक ने उन्हें बचाने की भरसक कोशिश की है और हिमेश की सीमाओं का खयाल रखते हुए कैमरा एंगल व सीन तैयार किए हैं। हमेशा की तरह डैनी छोटी भूमिका में भी प्रभावित करते हैं। साधारण किरदारों को भी पहचान देना उनकी खासियत है। नई अभिनेत्री श्वेता कुमार की एंट्री आकर्षक है। उन्हें काजोल का लुक देने का प्रयास किया गया है। बाद में उस किरदार को सही तरीके से विकसित नहीं किया गया। हां, उर्मिला मातोंडकर कामिनी की निगेटिव भूमिका में जंचती हैं। अन्य कलाकारों में राज बब्बर और हिमानी शिवपुरी साधारण हैं। मां की भूमिका में रोहिणी हटंगड़ी के हिस्से ज्यादा कुछ था ही नहीं।

Saturday, October 11, 2008

विश्वप्रिय अमिताभ बच्चन


जन्मदिन 11 अक्टूबर पर विशेष...

सम्राट अशोक के जीवन के एक महत्वपूर्ण प्रसंग पर डॉ।चंद्रप्रकाश द्विवेदी की अगली फिल्म है। इसमें अशोक की भूमिका अमिताभ बच्चन निभा रहे हैं। बिग बी के जन्मदिन (11 अक्टूबर) के मौके पर डॉ।द्विवेदी ने हमें अमिताभ बच्चन के बारे में बताया। इस संक्षिप्त आलेख में द्विवेदी ने भारतीय इतिहास के महानायक अशोक और भारतीय सिनेमा के महानायक अमिताभ बच्चन की कई समानताओं का उल्लेख किया है। बिग बी लोकप्रियता, पहचान और स्वीकृति की जिस ऊंचाई पर हैं, वहां उन्हें विश्वप्रिय अमिताभ बच्चन की संज्ञा दी जा सकती है।

पश्चिम के साहित्यकार एचजी वेल्स ने अपनी एकपुस्तक में सम्राट अशोक का उल्लेख किया है। उनके उल्लेख का आशय यह है कि अगर विश्व के सम्राटों की आकाशगंगा हो, तो उसमें जो सबसे चमकता हुआ सितारा होगा, वह अशोक हैं। यह अभिप्राय ऐसे लेखक और चिंतक का है, जो अशोक को भारत के बाहर से देख रहा है। जापान में सोकोतु नामक राजा हुए। उन्हें जापान का अशोक कहा जाता है। गौरतलब है कि राजा सोकोतु ने अशोक की तरह ही घोषणाएं जारी की थीं। दक्षिण-पूर्व एशिया में जहां-जहां बौद्ध धर्म है, वहां-वहां बौद्ध धर्म के इतिहासकार अशोक को जानते हैं। बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार में अशोक का प्राथमिक योगदान है। भारत के बाहर बौद्ध धर्म को पहुंचाने का श्रेय अशोक को ही है। इतिहास में अशोक की छवि देवानाम प्रिय है, यानी जो अपने कर्म से देवताओं का भी प्रिय हो गया। अशोक के लिए दूसरा विशेषण प्रियदर्शी है। सम्राट अशोक भारतीय इतिहास के एक ऐसे महानायक हैं, जिनके करीब कोई और नहीं पहुंचता। ऐसे महानायक पर फिल्म बनाने की बात सोचते ही वर्तमान भारतीय फिल्म इंडस्ट्री के अभिनेताओं में किसी को चुनना हो, जो इस महानायक के चरित्र को निभा सके, तो मैं निस्संकोच कहूंगा कि भारतीय सिनेमा में अमिताभ बच्चन से अधिक उपयुक्त दूसरा कोई नहीं है। वे न केवल श्रेष्ठ अभिनेता हैं, बल्कि उन्होंने एक ऐसा व्यक्तित्व अख्तियार कर लिया है, जो भारतीय दर्शकों के बीच सर्वाधिक लोकप्रिय है। सच तो यह है कि भारत के साथ ही अब वे देश की सीमाओं के बाहर विश्व नागरिकों के बीच भी सुपरिचित व्यक्तित्व बन चुके हैं। हम उन्हें विश्वप्रिय अमिताभ बच्चन कह सकते हैं। निश्चित ही सम्राट अशोक की तरह वे भी प्रियदर्शी हैं। सम्राट अशोक की भूमिका में अमिताभ बच्चन को देखने के मेरे कारण हैं। दरअसल, अशोक भारतीय इतिहास के जटिल चरित्र हैं। उनके जीवन के वैयक्तिक वैविध्य का अध्ययन होता रहा है। अशोक का आक्रामक व्यक्तित्व रहा है। वे अजेय योद्धा थे। अमिताभ बच्चन भी अपनी युवावस्था में एंग्री यंग मैन के रूप में दर्शकों के बीच लोकप्रिय रहे। वे हिंदी सिनेमा के अजेय नायक रहे। लोग देखें कि भारतीय इतिहास का एंग्री एंग मैन बाद में अपने व्यवहार से ऋषितुल्य हो जाता है। उन्हें बुद्धगतिक भी कहा जाता है, यानी जिसका व्यवहार बुद्ध जैसा हो। मुझे लगता है कि भारतीय सिनेमा में अशोक की तरह ही जीवन को इतनी परिपूर्णताओं के साथ देखने वाले और अपने व्यक्तिगत जीवन में इतनी विडंबनाओं को लेकर चलने वाले अकेले व्यक्ति अमिताभ बच्चन हैं। मैं सम्राट अशोक और अमिताभ बच्चन की तुलना करने की भूल नहीं कर सकता। दोनों की कुछ समानताएं बता रहा हूं। दोनों के अनुभवों की यात्रा कुछ-कुछ एक जैसी रही है।
अपनी फिल्म के सिलसिले में अमिताभ बच्चन से कई बार मिलना हुआ। मेरी स्क्रिप्ट में अशोकका जिस रूप में चित्रण है, वह उनके आचरण में भी दिखा। जैसे कि बौद्ध भिक्षुओं के लिए कहा जाता है कि वे आंखों से कम से कम संप्रेषण करें। वे प्रयत्न करते हैं कि दूसरे व्यक्तियों की आंखों में सीधे न देखा जाए। जैसे ही आंखों से आंखें मिलती हैं, परस्पर संवाद आरंभ हो जाता है। भिक्षा मांगते समय भी बौद्धों की नजर भूमि पर रहती है। आप आश्चर्य करेंगे कि अमिताभ बच्चन अधिकांश समय भूमि की ओर देखते हैं। वे अधिकतर चर्चाओं में नहीं रहते। वस्तुओं और घटनाओं पर वे अपना अभिप्राय नहीं देते। वे निर्णायक टिप्पणियां नहीं करते। मैं उन्हें उदात्त मौन का धनी व्यक्ति कहूंगा। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में लोगों को कई हस्तियां मिल जाएंगी, जो हर विषय पर टिप्पणी देती हैं। उनके पास आलोचना रहती है, उनके पास समीक्षा होती है, उनके पास निर्णय होते हैं, उनके पास पूर्वाग्रह होते हैं।
अमिताभ बच्चन आलोचना, समीक्षा, निर्णय और पूर्वाग्रह से ग्रस्त नहीं हैं। जो जैसा है, वे उसे वैसे ही स्वीकार करते हैं। मुझे लगता है कि उन पर यह प्रभाव हरिवंश राय बच्चन का भी हो सकता है। मैं जब-जब उनके नजदीक गया। मैंने उन्हें ऐसा ही पाया। ऐसी ही मुद्रा अशोक की है।
भारतीय सिनेमा के इतिहास में उन्होंने विशिष्ट स्थान प्राप्त कर लिया है। अशोक जैसे उदात्त और जटिल चरित्र को निभाने के लिए जो गरिमा चाहिए, वह उनके पास है। अशोक का व्यक्तित्व है उनमें। अशोक के लिए हमें जो भाषा चाहिए, उसमें वे पारंगत हैं। मेरी फिल्म में चौंसठ वर्ष के बाद के अशोक हैं। अमिताभ बच्चन की आयु भी चौंसठ से ज्यादा है। यह एक सुयोग है कि भारतीय इतिहास के एक महान चरित्र और महानायक की भूमिका भारतीय सिनेमा के महान व्यक्तित्व और महानायक निभा रहे हैं। अशोक की तरह उनकी कीर्ति भारत के बाहर फैल चुकी है। मुझे नहीं लगता कि अशोक की भूमिका के लिए अमिताभ बच्चन से अधिक उपयुक्त कोई दूसरा अभिनेता मिल सकता है। लोग चकित होंगे कि इसे लिखते समय भी मेरे मन-मस्तिष्क में अमिताभ बच्चन थे! यही लगता था कि इस भूमिका को वे ही निभा सकते हैं। इसे लिखने के तुरंत बाद मैंने उनसे संपर्क करने की कोशिश आरंभ कर दी थी। यह मेरा सौभाग्य है कि उन्होंने अशोक की भूमिका निभाने के लिए सहमति दे दी। अमिताभ बच्चन के व्यक्तित्व की विशेषताओं की बात करूं, तो वे हैं-ग्रहण, मनन और चिंतन। वे बहुत कम बोलते हैं। वे सारगर्भित बोलते हैं। पहले वे आपको स्वीकार करते हैं, ग्रहण करते हैं। वे बीच में कभी नहीं टोकते। दूसरी-तीसरी मुलाकात में लोगों को आभास होगा कि उन्होंने आपके आशय और मंतव्य पर मनन किया है। विचार किया है। उसके बाद की मुलाकातों में वे अहसास दिला देते हैं कि वे चिंतन कर रहे हैं। फिर लोगों को पता चलता है कि वे अपने निष्कर्षो और सहमति के प्रति कितने गंभीर हैं! रही बात अभिनेता अमिताभ बच्चन की, तो अपनी फिल्म की शूटिंग के बाद ही उसके बारे में निजी अनुभव बांट सकूंगा। अमिताभ बच्चन के व्यक्तित्व के अनेक अनजान पहलू हैं। इस बारे में उनके करीबी, रिश्तेदार और दोस्त ही बता सकते हैं।

Friday, October 10, 2008

फ़िल्म समीक्षा: हैलो

दर्शकों को बांधने में विफल
-अजय ब्रह्मात्मज
दावा है कि वन नाइट एट काल सेंटर को एक करोड़ से अधिक पाठकों ने पढ़ा होगा। निश्चित ही यह हाल-फिलहाल में प्रकाशित सर्वाधिक लोकप्रिय उपन्यास रहा है। इसी उपन्यास पर अतुल अग्निहोत्री ने हैलो बनाई है। इस फिल्म के लेखन में मूल उपन्यास के लेखक चेतन भगत शामिल रहे हैं, इसलिए वे शिकायत भी नहीं कर सकते कि निर्देशक ने उनकी कहानी का सत्यानाश कर दिया। फिल्म लगभग उपन्यास की घटनाओं तक ही सीमित है, फिर भी यह दर्शकों को उपन्यास की तरह बांधे नहीं रखती।
अतुल अग्निहोत्री किरदारों के उपयुक्त कलाकार नहीं चुन पाए। सोहेल खान की चुहलबाजी उनके हर किरदार की गंभीरता को खत्म कर देती है। हैलो में भी यही हुआ। शरमन जोशी पिछले दिनों फार्म में दिख रहे थे। इस फिल्म में या तो उनका दिल नहीं लगा या वे किरदार को समझ नहीं पाए। अभिनेत्रियों के चुनाव और उनकी स्टाइलिंग में समस्या रही। गुल पनाग, ईशा कोप्पिकर और अमृता अरोड़ा तीनों से ही कुछ दृश्यों के बाद ऊब लगने लगती है। उनकेलिबास पर ध्यान नहीं दिया गया। ले-देकर दिलीप ताहिल और शरत सक्सेना ही थोड़ी रुचि बनाए रखते हैं। जाहिर सी बात है कि दो प्रौढ़ कलाकार किसी फिल्म से दर्शकों को जोड़े नहीं रख सकते। इस फिल्म की समस्या यह है कि एक ही आफिस में सारे किरदारों को दिखाना है। लोकेशन की सीमाबद्धता के कारण निश्चित ही निर्देशक फिल्म को दृश्यात्मक तरीके से बहुत आकर्षक नहीं बना पाता। यहां उसकी कल्पनाशीलता की परीक्षा होती है। पढ़ते समय हम शब्दों में उलझे रहते हैं लेकिन देखते समय नाटकीयता और विविधता आवश्यक हो जाती है। बार-बार वही दीवारें, मेज, पैसेज और एक ही वेशभूषा में किरदार दिखते हैं। ऐसे में फ्लैशबैक और दृश्यांतरण बहुत जरूरी हो जाता है। निर्देशक अतुल अग्निहोत्री इस लिहाज से चूक गए हैं। उपन्यास का क्लाइमेक्स बेहद रोमांचक है। फिल्म में इसे और भी रोमांचक बनाया जा सकता था लेकिन निर्देशक ने किसी हड़बड़ी या मजबूरी में उस दृश्य को जल्दी समेट दिया। सलमान खान और कैटरीना कैफ की मौजूदगी भी फिल्म को रोचक नहीं बना पाती।

दरअसल:गांव और गरीब गायब हैं हिंदी फिल्मों से

-अजय ब्रह्मात्मज
बाजार का पुराना नियम है कि उसी वस्तु का उत्पादन करो, जिसकी खपत हो। अपने संभावित ग्राहक की रुचि, पसंद और जरूरतों को ध्यान में रखकर ही उत्पादक वस्तुओं का निर्माण और व्यापार करते हैं। कहने के लिए सिनेमा कला है, लेकिन यह मूल रूप से लाभ की नीति का पालन करता है। खासकर उपभोक्ता संस्कृति के प्रचलन के बाद हिंदी फिल्म इंडस्ट्री ने अपनी पूरी शक्ति वैसी फिल्मों के उत्पादन में लगा दी है, जिनसे सुनिश्चित कमाई हो। निर्माता अब उत्पादक बन गए हैं। माना जा रहा है कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की अधिकांश कमाई मुंबई और दिल्ली जैसे शहरों और विदेशों से होती है। नतीजतन फिल्मों के विषय निर्धारित करते समय इन इलाकों के दर्शकों के बारे में ही सोचा जा रहा है। यह स्थिति खतरनाक होने के बावजूद प्रचलित हो रही है। पिछले दिनों फिल्मों पर चल रही एक संगोष्ठी में जावेद अख्तर ने इन मुद्दों पर बात की, तो ट्रेड सर्किल ने ध्यान दिया। हिंदी पत्र-पत्रिकाओं और हिंदी पत्रकारों की चिंता के इस विषय पर फिल्म इंडस्ट्री अभी तक गंभीर नहीं थी, लेकिन जावेद अख्तर के छेड़ते ही इस विषय पर विचार आरंभ हुआ। लोग बैठकों में ही सही, लेकिन अब विमर्श करने लगे हैं। जावेद अख्तर ने स्पष्ट कहा कि देश की पचहत्तर प्रतिशत आबादी अभी गांव में ही रहती है। हिंदी सिनेमा उनकी सुध नहीं ले रही है। वेलकम टू सज्जनपुर एक अपवाद मात्र है। इसी प्रकार मल्टीप्लेक्स के दर्शकों को ज्यादा तवज्जो दी जा रही है, जबकि एक सच यह भी है कि ज्यादातर दर्शकों की पहुंच में अभी मल्टीप्लेक्स नहीं आए हैं। जावेद अख्तर ने कहा कि जब मैं इंडस्ट्री में आया था, तब मेरे सीनियरों ने सलाह दी थी कि ऐसी स्क्रिप्ट लिखने की कोशिश करना, जो गांव-कस्बों के दर्शकों को अपील करे। अभी यह बात किसी युवा लेखक या निर्देशक को कही जाए, तो वे हंस पड़ेंगे और संभव है, सुझाव देने वालों को पुरातनपंथी समझ कर आगे बातचीत ही न करें। जावेद अख्तर ने वाजिब चिंता जाहिर की है कि इस प्रवृत्ति से न केवल हिंदी सिनेमा विभाजित हो जाएगा, बल्कि वह मुख्य रूप से अमीरों का ही सिनेमा हो कर रह जाएगा। उसके दायरे से गरीब बाहर हो जाएंगे।
जावेद साहब मुंबई में रहते हैं और ओम शांति ओम और रॉक ऑन जैसी फिल्मों के गीत लिखते हैं। शायद उन्हें ठीक-ठीक मालूम नहीं है कि उनकी चिंताएं वास्तविक रूप ले चुकी हैं और गांव, गरीब और उनसे संबंधित सारी चीजें हिंदी फिल्मों से बाहर हो चुकी हैं और इन दिनों तो सामान्य फिल्मों की शूटिंग भी किसी कस्बे या गांव में नहीं होती। गांव आता भी है, तो सरसों से लहलहाता पंजाब का गांव आता है, जहां समृद्धि छलक रही होती है। हमारे फिल्मकार उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्यप्रदेश में जाने की हिम्मत ही नहीं करते, शायद इसलिए, क्योंकि वहां के परिदृश्य से उनकी फिल्मों की दृश्य संरचना में निर्धनता झलकने लगेगी। गरीबी पर फिल्म बनाने की बात कौन कहे? आज के फिल्मकार अपनी फिल्म के किसी कोने में भी गरीब की झलक नहीं दिखाना चाहते। सुख से अघाए दर्शक का स्वाद क्यों खराब किया जाए?
हिंदी फिल्म इंडस्ट्री का अगर यही रवैया रहा, तो जल्दी ही उसके पारंपरिक दर्शक अपनी रुचि और पसंद का सिनेमा खोज लेंगे या नई तरह की फिल्मों का निर्माण कर लेंगे। इसकी शुरुआत हो चुकी है। फिलहाल भोजपुरी फिल्मों ने बिहार से हिंदी फिल्मों को बाहर खदेड़ दिया है। पिछले दिनों द्रोण और किडनैप जैसी फिल्मों के मुकाबले बिहार में हम बाहुबली ने अच्छा प्रदर्शन किया। उसके ज्यादा प्रिंट रिलीज हुए। चूंकि हम बाहुबली का विषय बिहार के दर्शकों का परिचित और करीब था, इसलिए स्वाभाविक रूप से वह फिल्म चली। दर्शकों की बढ़ती भीड़ को देखते हुए भोजपुरी सिनेमा के साथ कॉरपोरेट व‌र्ल्ड जुड़ रहा है और स्तरीय फिल्मों के निर्माण के लिए आवश्यक धन भी आने लगा है। हम बाहुबली एक बड़ा संकेत है, लेकिन क्या मुंबई में बैठे ट्रेड पंडित इसे भांप कर मुंबइया निर्माताओं को सचेत कर रहे हैं? लगता है कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की पकड़ अपने अंदरूनी इलाकों पर ढीली हो गई है!

Sunday, October 5, 2008

फ़िल्म समीक्षा:द्रोण


४०० वीं पोस्ट
बड़े पर्दे पर तिलिस्म
-अजय ब्रह्मात्मज

स्पेशल इफेक्ट और एक्शन की चर्चा के कारण द्रोण को अलग नजरिए से देखने जा रहे दर्शकों को निराशा होगी। यह शुद्ध भारतीय कथा परंपरा की फिल्म है, जिसे निर्माता-निर्देशक सही तरीके से पेश नहीं कर सके। यह न तो सुपरहीरो फिल्म है और न ही इसे भारत की मैट्रिक्स कहना उचित होगा।
यह ऐयारी और तिलिस्म परंपरा की कहानी है, जो अधिकांश हिंदी दर्शकों के मानस में है। दूरदर्शन पर प्रसारित हो चुके चंद्रकांता की लोकप्रियता से जाहिर है कि दर्शक ऐसे विषय में रुचि लेते हैं। शायद निर्देशक गोल्डी बहल को भारतीय परंपरा के तिलिस्मी उपन्यासों की जानकारी नहीं है। यह एक तिलिस्मी कहानी है, जिसे व्यर्थ ही आधुनिक परिवेश देने की कोशिश की गई।
द्रोण एक ऐसे युवक की कहानी है, जिसके कंधे पर सदियों पुरानी परंपरा के मुताबिक विश्व को सर्वनाश से बचाने की जिम्मेदारी है। उसका नाम आदित्य है। वह राजस्थान के राजघराने की संतान है। उसकी मदद सोनिया करती है, क्योंकि सोनिया के परिवार पर द्रोण को बचाने की जिम्मेदारी है। अपनी जिम्मेदारियों को निभाने की भूमिका में आते ही दोनों वर्तमान से एक तिलिस्मी दुनिया में चले जाते हैं। वहां उन्हें असुरों के समकालीन वंशज रिज रायजदा से मुकाबला करना है और उसके इरादों को नाकामयाब करना है।
हालीवुड में ऐसी फिल्में आ रही हैं। उन्होंने मनोरंजन की यह नई विधा खोज ली है। तकनीक और स्पेशल इफेक्ट से वे आकर्षक और प्रभावशाली फिल्में बना रहे हैं। द्रोण निश्चित ही भारत में नई कोशिश है। लेकिन, यहां प्रचलित फार्मूले के दर्शकों को इस फिल्म से तालमेल बिठाने में दिक्कत हो सकती है।
फिल्म में जया बच्चन का रोल छोटा है लेकिन उनकी मौजूदगी से मां-बेटे का रिश्ता स्थापित करने में निर्देशक को समय और दृश्य नहीं खर्च करने पड़ते। कह सकते हैं कि गोल्डी ने उनका सटीक उपयोग किया है। अभिषेक बच्चन के लिए ही यह फिल्म लिखी और बनाई गई है। उनके किरदार से निर्देशक का लगाव साफ दिखता है। अभिषेक ने किरदार के अनुरूप मेहनत की है। अंगरक्षक की भूमिका में प्रियंका चोपड़ा आकर्षक लगी हैं। उन्होंने अपने किरदार को पूरी ऊर्जा से निभाया है। रिज रायजदा की भूमिका के के मेनन के लिए आसान नहीं रही होगी। कई फिल्मों के बाद वे कुछ अलग करते दिखे।
द्रोण का सबसे कमजोर पक्ष इसका गीत-संगीत है। संगीतकार ध्रुव घनेकर ने निराश किया है। गीत के बोल भी याद नहीं रहते। संवादों में भी अधिक दम नहीं है। समझ में नहीं आया कि फिल्म के एक दृश्य में संस्कृत में लिखी पंक्तियां प्रियंका चोपड़ा हिंदी में क्यों पढ़ती हैं?

Saturday, October 4, 2008

फ़िल्म समीक्षा:रामचंद पाकिस्तानी

पाकिस्तान से आई एक सहज फ़िल्म
-अजय ब्रह्मात्मज
पाकिस्तान की फिल्म रामचंद पाकिस्तानी पिछले कुछ समय से चर्चा में है। यह फिल्म विदेशों मेंकई फिल्म समारोहों में दिखाई जा चुकी है। इस फिल्म का महत्व सिनेमाई गुणवत्ता से अधिक इस बात के लिए है कि यह पाकिस्तानी सिनेमा में आ रहे बदलाव की झलक देती है। भारतीय दर्शकों ने कुछ समय पहले पाकिस्तान की खुदा के लिए देखी थी। इस बार मेहरीन जब्बार ने एक सच्ची घटना को लगभग ज्यों का त्यों फिल्मांकित कर दिया है।
भारतीय सीमा के करीब रहने वाला रामचंद एक छोटी सी बात पर अपनी मां से नाराज होकर निकलता है। उसे अंदाजा नहीं रहता और वह भारतीय सीमा में प्रवेश कर जाता है। रामचंद को सीमा पार करते देख उसका पिता उसके पीछे भागता है। वह भी भारतीय सीमा में आ जाता है। भारत में सीमा पर तैनात सुरक्षा अधिकारी उन्हें गिरफ्तार कर लेते हैं। दोनों बाप-बेटे खुद को निर्दोष साबित करने में असफल रहते हैं। उन्हें जेल में डाल दिया जाता है। दोनों के नाम किसी रजिस्टर में नहीं दर्ज किए जाते। उन्हें अपनी एक छोटी सी भूल के लिए लगभग सात साल भारतीय जेल में रहना पड़ता है। उधर रामचंद की मां की जिंदगी बिखर जाती है। वक्त हर जख्म को भर देता है। वह अपनी जिंदगी में सुख के बहाने खोजती है। ऐसा लगता है कि वह खुशहाल हो जाएगी लेकिन मजहब और जाति आड़े आ जाती है। सात साल बाद पहले उसका बेटा और फिर उसका पति पाकिस्तान लौटता है। फिर उनकी जिंदगी सामान्य होती है।
मेहरीन जब्बार ने इस घटना को बगैर किसी लाग-लपेट के प्रस्तुत किया है। उनकी इस मूलभूत ईमानदारी की तारीफ होनी चाहिए। फिल्म में बेटे की मासूमियत, मां के वियोग और पिता के असमंजस को निर्देशक ने एक सूत्र में पिरोकर बड़ा संदर्भ नहीं दिया है। इस फिल्म की मानवीयता द्रवित करती है। लेकिन, सीमा के आर-पार की विडंबनाओं को उससे जोड़ा जाता, कुछ सवाल खड़े किए जाते तो रामचंद पाकिस्तानी और बड़ी फिल्म हो जाती।
नंदिता दास की सहजता भूमिका के अनुकूल है। उन्हें इस परिवेश में हम बवंडर में देख चुके हैं। हां, पाकिस्तानी कलाकारों ने सुंदर और भावपूर्ण अभिनय किया है। खासकर रामचंद के किरदार में दोनों बाल कलाकार अपनी स्वाभाविकता से प्रभावित करते हैं।

Friday, October 3, 2008

फ़िल्म समीक्षा:हम बाहुबली

औरों से बेहतर
यह फिल्म भोजपुरी में बनी है। भोजपुरी सिनेमा ने पिछले कुछ सालों में हिंदी दर्शकों के बीच खास स्थान बना लिया है। हम बाहुबली भोजपुरी सिनेमा में आए उछाल का संकेत देती है। अनिल अजिताभ के निर्देशन में बनी यह फिल्म जाहिर करती है कि अगर लेखक-निर्देशक थोड़ा ध्यान दें और निर्माता पूरा सहयोग दें तो भोजपुरी फिल्मों की फूहड़ता खत्म हो सकती है।
हम बाहुबली की कथाभूमि दर्शकों ने प्रकाश झा की फिल्मों में देखी है। इस समानता की वजह यह हो सकती है कि अनिल लंबे समय तक प्रकाश के मुख्य सहयोगी रहे। इसके अलावा हम बाहुबली के लेखन में शैवाल का सहयोग रहा। शैवाल ने प्रकाश के लिए दामुल और मृत्युदंड लिखी है। अपनी पहली फिल्म में अनिल अजिताभ उम्मीद जगाते हैं। उन्होंने बिहार के परिवेश को राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में चित्रित किया है और बाहुबली बनने के कारणों और परिस्थितियों को भी रखा है।
हम बाहुबली भोजपुरी फिल्मों में प्रचलित नाच-गानों से नहीं बच पाई है। कुछ गाने ज्यादा लंबे हो गए हैं और वे कथा प्रवाह में बाधक बनते हैं। कलाकारों की बात करें तो दिनेश लाल निरहुआ की ऊर्जा प्रभावित करती है। अमर उपाध्याय खोए से दिखे। अभिनेत्रियों के हिस्से में कुछ विशेष करने के लिए नहीं था। अंत में, रवि किशन से निर्देशक को भरपूर सहयोग मिला है। रवि किशन भोजपुरी सिनेमा की सीमाएं लांघ कर अब हिंदी फिल्मों में जगह बना रहे हैं। इस फिल्म के दृश्यों से जाहिर है कि वे भोजपुरी परिवेश को समझते हैं और किरदार को बारीकी से आत्मसात करते हैं।
मुख्य कलाकार : रवि किशन, दिनेश लाल यादव, अमर उपाध्याय, मोनालिसा, रिंकू घोष, रानी चटर्जी आदि
निर्देशक : अनिल अजिताभ
तकनीकी टीम : निर्माता- अभय सिन्हा, एन जी पुरुषोत्तम और इंद्रनील चक्रवर्ती,
गीत- विनय बिहारी, संगीत- धनंजय मिश्रा।

Thursday, October 2, 2008

दरअसल:स्वागत है सज्जनपुर में

-अजय ब्रह्मात्मज
माफ करें, स्तंभ का शीर्षक वेलकम टू सज्जनपुर का अनुवाद नहीं है। सज्जनपुर यहां उस विषय का द्योतक है, जिसे हिंदी फिल्म इंडस्ट्री ने हाशिए पर डाल रखा है। ग्लोबल होने के इस दौर में हिंदी सिनेमा ने गांव को भुला दिया है। लंबे समय से न गांव की गोरी दिखी और न ग्रामीण परिवेश। ठीक है कि पनघट की जगह नलकूप आ गए हैं और मोबाइल और मोटरसाइकिल गांव में पहुंच गए हैं, लेकिन भाषा, संस्कृति, लहजा, भावनाओं का ताना-बाना अब भी अलग है। गांव से जुड़ी सारी चीजों को देशज, ग्रामीण और डाउन मार्केट का दर्जा देकर दरकिनार करने का चलन बढ़ा है। याद करें कि पिछली बार कब आपने साइकिल देखी थी, पजामा पहने लोगों को देखा था, सिर पर आंचल रखे औरत देखी थी और खेत-खलिहान के साथ खपरैल घर। ..और कब डपोरशंख संबोधन सुना था?
बातचीत में ग्रामीण लहजे को अभद्र और असभ्य माना जाता है। बातचीत में सहज रूप से आने वाली गालियों को अश्लील कहा जाता है और मुहावरे तो अब सिर के ऊपर से गुजर जाते हैं। मजे की बात यह है कि देश का शिक्षित समाज इतनी तेजी से अपनी भाषाई संस्कृति और परंपराओं से कट रहा है कि आम बोलचाल में देशज शब्दों के अर्थ उसे डिक्शनरी में देखने पड़ रहे हैं! इस परिपे्रक्ष्य में वेलकम.. का प्रदर्शन और दर्शकों के बीच उसका स्वागत होना बड़ी बात है। यह इस तथ्य का भी सूचक है कि हिंदी फिल्मों केदर्शक ऐसी फिल्में भी देखना चाहते हैं। उन्हें अपने गांव-देहात के भोले-भाले और साधारण लोग पसंद हैं और उनके जीवन में रचा-बसा हास्य उन्हें भी गुदगुदाता है। वेलकम.. मुंबई के मल्टीप्लेक्स से लेकर सहारनपुर के सिंगल स्क्रीन थिएटर तक में पसंद की जा रही है। दक्षिण भारतीय प्रदेशों में भी इस फिल्म को दर्शक मिल रहे हैं। यह फिल्म सिनेमाघरों में जितनी पसंद की जा रही है, उससे ज्यादा यह होम वीडियो सर्किट में पॉपुलर होगी।
कह सकते हैं कि देश के सम्मानित और बुजुर्ग फिल्मकार श्याम बेनेगल ने इस उम्र में विचलित, निराश और दिग्भ्रमित निर्देशकों को राह दिखाई है कि वेलकम.. भारतीय दर्शकों के मानस में है। बस जरूरत है कि उस पर जमी धूल हटाकर उसे साफ-सुथरे अंदाज में नई फ्रेमिंग के साथ पेश किया जाए। वेलकम.. के किरदार हमें अपरिचित नहीं लगते। हां, हमने उन्हें ग्लोबल होने की चाह में मुख्य परिदृश्य से बाहर जरूर कर दिया है। एकअजीब-सी होड़ लगी हुई है। शहरी और विदेशी दर्शकों को रिझाने की अनवरत कोशिश चल रही है। फैशन चल पड़ा है। नतीजतन फिल्में अपनी जड़ों, परिवेश और संदर्भ से कट और आखिरकार अपने मूल दर्शकों को खो रही हैं। वेलकम.. फिल्म बताती है कि तमाम तकनीकी प्रगति के बावजूद लेखक कितना महत्वपूर्ण होता है और वह फिल्म को किस कदर प्रभावशाली बना सकता है? उसके लिखे संवाद ही फिल्मों को विशेष सांस्कृतिक पहचान देते हैं। किसी भाषाई इलाके की कहानी दूसरी भाषा में बनाने पर भाव तो समझ में आता है, लेकिन अर्थ और उसकी छवियां बदल जाती हैं। फिल्मों की इस भाषाई अस्मिता पर ध्यान देने की जरूरत है। हिंदी फिल्मों में जिस तेजी से आधुनिकता के नाम पर अंग्रेजी संवाद डाले जा रहे हैं, उससे हिंदी के दर्शक और भी दूर होंगे। आज की बड़ी जरूरत है कि फिल्में अपने दर्शकों से जुड़ें। अपने दर्शकों के बीच लोकप्रिय होने के बाद ही वे बाहर पसंद की जा सकती हैं। क्रॉसओवर सिनेमा बन सकती हैं और दूसरे समूह के दर्शकों को पसंद आ सकती हैं। वेलकम.. श्याम बेनेगल की निर्देशकीय सोच के साथ अशोक मिश्र की सरल भाषा की वजह से भी याद रखी जाएगी। फिल्म के किरदारों का गठन, उनके निर्वाह और चित्रण में लेखक का योगदान साफ दिखाई पड़ता है। निश्चित ही सधे इन अभिनेताओं ने अपने अभिनय से फिल्म को निखारकर और सम्पे्रषणीय बना दिया है।
वैसे, यदि यह कहें कि वेलकम टू सज्जनपुर एकरूपता के घुप्प अंधेरे में पहचान खो रही हिंदी फिल्मों के लिए एक रोशनदान साबित हो सकती है, तो शायद गलत नहीं होगा। श्याम बेनेगल ने एक नया द्वार खोल दिया है। अब यह मुंबई के निर्माता-निर्देशकों पर निर्भर करता है कि वे इस द्वार से निकलना पसंद करते हैं या नहीं? इस नई राह की कोई सीमा नहीं है और अनंत विस्तार की संभावनाएं हैं। शर्त सिर्फ इतनी है कि पांव जमीन पर रहे और ध्येय अपने दर्शकों के बीच पहुंचना हो!

Friday, September 19, 2008

फ़िल्म समीक्षा:वेलकम टू सज्जनपुर


सहज हास्य का सुंदर चित्रण

-अजय ब्रह्मात्मज

श्याम बेनेगल की गंभीर फिल्मों से परिचित दर्शकों को वेलकम टू सज्जनपुर छोटी और हल्की फिल्म लग सकती है। एक गांव में ज्यादातर मासूम और चंद चालाक किरदारों को लेकर बुनी गई इस फिल्म में जीवन के हल्के-फुल्के प्रसंगों में छिपे हास्य की गुदगुदी है। साथ ही गांव में चल रही राजनीति और लोकतंत्र की बढ़ती समझ का प्रासंगिक चित्रण है।
बेनेगल की फिल्म में हम फूहड़ या ऊलजलूल हास्य की कल्पना ही नहीं कर सकते। लाउड एक्टिंग, अश्लील संवाद और सितारों के आकर्षण को ही कामेडी समझने वाले इस फिल्म से समझ बढ़ा सकते हैं कि भारतीय समाज में हास्य कितना सहज और आम है। सज्जनपुर गांव में महादेव अकेला पढ़ा-लिखा नौजवान है। उसे नौकरी नहीं मिलती तो बीए करने के बावजूद वह सब्जी बेचने के पारिवारिक धंधे में लग जाता है। संयोग से वह गांव की एक दुखियारी के लिए उसके बेटे के नाम भावपूर्ण चिट्ठी लिखता है। बेटा मां की सुध लेता है और महादेव की चिट्ठी लिखने की कला गांव में मशहूर हो जाती है। बाद में वह इसे ही पेशा बना लेता है। चिट्ठी लिखने के क्रम में महादेव के संपर्क में आए किरदारों के जरिए हम गांव की ऊंच-नीच, छल-प्रपंच और राजनीति को भी समझते चलते हैं।
श्रेयस तलपड़े ने महादेव की संजीदगी और सादगी को बेहद खूबसूरती से पर्दे पर पेश किया है। नई पीढ़ी के अभिनेताओं में हम श्रेयस को नेचुरल एक्टर के रूप में पाते हैं। अमृता राव सुंदर हैं और साधारण दिखने के लिए उन्हें अधिक मेहनत नहीं करनी पड़ती। कमला के किरदार को उन्होंने सहज तरीके से चित्रित किया है। रवि झांकल किन्नर मुन्नी बाई के रोल में प्रभावित करते हैं। रवि ने अपने बेधड़क अभिनय से किरदार को जीवंत कर दिया है। यशपाल शर्मा की स्वाभाविकता उल्लेखनीय है। वे अपने किरदारों के अनुरूप लगने लगते हैं।
फिल्म की खूबी भाषा की तरलता और मौलिकता है। शहरी दर्शकों को कुछ शब्दों को समझने में दिक्कत हो सकती है। वास्तव में पापुलर हिंदी फिल्मों ने हिंदी भाषा को दो-तीन हजार शब्दों में सीमित कर दिया है। फिल्म का गीत-संगीत पक्ष कमजोर है। थोड़े और भावपूर्ण गीत व मधुर संगीत की गुंजाइश थी। हां, पा‌र्श्व संगीत प्रभावशाली है। खासकर पृष्ठभूमि में दूर से आती लोक गीतों की आवाज गांव के माहौल को जिंदा कर देती है।