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Sunday, November 2, 2008

जन्मदिन विशेष:तब शाहरुख गार्जियन बन जाते हैं


-अब्बास टायरवाला

शाहरुख खान की जिन दो फिल्मों अशोका और मैं हूं ना का लेखन मैंने किया, उन दोनों के वे स्वयं निर्माता भी थे। निर्माता होने के साथ ही उन्होंने फिल्मों में लीड भूमिकाएं भी की थीं। गौर करने वाली बात यह है कि दोनों निर्देशकों को ही उन्होंने पहला अवसर दिया था। हालांकि संतोष शिवन पहले फिल्म बना चुके थे, लेकिन हिंदी में यह उनकी पहली फिल्म थी और यह अवसर उन्हें शाहरुख ने ही दिया। वैसे, संतोष हों या फराह खान, दोनों ही उनके पुराने परिचित और करीबी हैं। संतोष से उनकी मित्रता दिल से के समय हुई थी। इसी तरह फराह उनकी फिल्मों में नृत्य-निर्देशन करती रही हैं। फराह को वे छोटी बहन की तरह मानते हैं। शाहरुख के व्यक्तित्व की यही खास बात है कि वे अपने करीबी लोगों के गार्जियन बन जाते हैं या यूं कहें कि लोग उन्हें उसी रूप में देखने लगते हैं। सच तो यह है कि वे अपने मित्र और भरोसे के व्यक्तियों के साथ काम करना पसंद करते हैं। लोग उनके निर्देशक की सूची बनाकर देख सकते हैं। बतौर ऐक्टर वे अपने निर्देशक पर पूरी तरह से निर्भर करते हैं। शायद इसी वजह से भी वे मित्र निर्देशकों की फिल्में करते हैं। अशोका की शूटिंग का किस्सा बताता हूं, जिसमें कुछ नए ऐक्टर थे। शूटिंग करते समय एक प्वॉइंट के बाद शाहरुख के परफॉर्मेस से संतोष संतुष्ट हो जाते थे। शाहरुख के हिसाब से शॉट भी ओके हो जाता था, लेकिन साथ के कलाकारों की किसी छोटी गड़बड़ी से कई बार शॉट फिर से लेना पड़ता था। ऐसे में शाहरुख ने कभी उफ तक नहीं की और न कभी नए ऐक्टरों के बारे में कुछ कहा! वे शांत भाव से ओके किए शॉट को ही रिपीट कर देते थे। उनकी यह खूबी होती थी कि नए शॉट में वे कुछ नया नहीं जोड़ते थे। वे पहले शॉट की तरह खास समय पर ही पलकें झपकाते थे, टर्न लेते थे और मुस्कराते थे। दो-चार सेकंड भी आगे-पीछे नहीं होते थे। शाहरुख की ऐक्टिंग या कैमरे के सामने उनका परफॉर्मेस कम्प्यूटर प्रोग्रामिंग की तरह होता है। वे मेथॅड ऐक्टर नहीं हैं, लेकिन उनकी ऐक्टिंग की अपनी मेथॅडोलॉजी है। शाहरुख को जानना मुश्किल काम नहीं है। दरअसल, उनके बारे में हर कोई सारी बातें जानता है। उनसे चालू किस्म की जान-पहचान सभी से रहती है, लेकिन आप उन्हें किसी परिचित या स्टार से अधिक नहीं जान पाते। वे बहुत ही उम्दा अभिनेता हैं। पर्दे की तरह वे जिंदगी में भी बारीकी से अभिनय करते हैं और आपको दोस्त बताते हुए भी खुद से दूर रखते हैं। शाहरुख को गहरे दोस्त और व्यक्ति के रूप में जानना बहुत कम लोगों को नसीब हुआ है। वे सभी से कायदे से बात करते हैं। खुलकर जरूर मिलते हैं, लेकिन यदि लोग गौर करेंगे, तो पाएंगे कि वे अपने इर्द-गिर्द ऊंची दीवार तो नहीं, लेकिन एक पर्दा जरूर रखते हैं। उस पर्दे के पार के इनसान और शाहरुख को जान पाना आसान नहीं है। दरअसल, उस पर्दे के भीतर बहुत कम लोगों को ही आने दिया जाता है। पर्दे के बाहर से जो झीना-झीना दिखता है, वह बहुत साफ और सच्चा नहीं होता। असली शाहरुख तो पर्दे के अंदर हैं। शाहरुख ने कामयाबी हासिल की है, जो कि उन्हें किसी से खैरात में नहीं मिली है। लोग देखें कि दिल्ली से आया एक लड़का कैसे मुंबई में धीरे-धीरे सबसे मजबूत और चमकता सितारा बन गया! इसके पीछे उनकी मेहनत और लगन है। दर्शकों ने उन्हें सिर पर बिठाया, लेकिन शाहरुख ने यह साबित किया कि वे इस काबिल हैं। उन्होंने अपने प्रशंसक और दर्शकों को कभी निराश नहीं किया। उन्होंने निर्माता-निर्देशकों को हमेशा उचित सम्मान दिया और सेट पर शूटिंग के वक्त निर्देशक के हर आदेश का पालन भी किया। मैंने देखा है कि वे दूसरों की तरह निर्देशकों को सुझाव नहीं देते। मैं चाहूंगा कि भविष्य में कभी उन्हें निर्देशित करूं। मुझे पूरा यकीन है कि वे अपने पुराने निर्देशकों की तरह मुझ पर भी भरोसा करेंगे। उनके साथ काम करने का मेरा पिछला अनुभव हर लिहाज से सुखद और फायदेमंद रहा। उनके जन्मदिन पर बधाई देने के साथ मैं उनकी सुखद जिंदगी और कामयाब करियर की दुआ करता हूं।

Saturday, November 1, 2008

जन्मदिन विशेष:प्रियजनों को नाराज़ नहीं कर सकतीं ऐश्वर्या राय

-अजय ब्रह्मात्मज
जन्मदिन 1 नवंबर पर विशेष..
इंटरनेशनल पहचान वाली ऐश्वर्या राय हिंदी फिल्मों की पॉपुलर हीरोइन होने के साथ ही खूबसूरती की इंटरनेशनल आइकॉन भी हैं। माना जाता है कि नाम, इज्जत और धन पाने के बाद व्यक्ति डगमगा जाता है। उसका दिमाग सातवें आसमान पर पहुंच जाता है। ऐसे व्यक्तियों का जीवन दुख में बीतता है। ऐश्वर्या राय की खिलखिलाहट उनकी मौजूदगी की आहट देती है। करीब से देख रहे लोग मानेंगे कि जिंदगी और करियर के उतार-चढ़ाव के बावजूद उनके व्यक्तित्व में निरंतर निखार आया है। एक आशंका थी कि बच्चन परिवार में आने के बाद उनकी खिलखिलाहट की खनक खो सकती है, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। आज भी वे भोर की उजास की तरह मुग्ध करती हैं। अपनी हंसी से लोगों का मन शीतल करती हैं। कह सकते हैं कि उनकी खिलखिलाहट की खनक बढ़ी है।
वृंदा राय और कृष्णराज राय की बेटी हैं ऐश्वर्या राय। मध्यवर्गीय परिवार की परवरिश और आरंभिक हिंदी मीडियम की पढ़ाई ने उनके व्यक्तित्व को गढ़ा है। हाल ही में सभी ने देखा कि वे अपने पिता की सेवा के लिए हिंदुजा अस्पताल में नजर आई, तो श्वसुर के लिए मायके से सूप बनाकर ले गई। उन्होंने बेटी और बहू का दायित्व समान भाव से निभाया। हमेशा चर्चा में रहने के बावजूद ऐश्वर्या राय ने मां-पिता को पूरा सम्मान दिया है और किसी भी समारोह में स्वयं आकर्षण का केंद्र होने पर भी उन्होंने उनकी सुविधाओं का ध्यान रखा। मायके से मिले संस्कार बच्चन परिवार में आने के बाद और मजबूत हुए। ऐसा सौभाग्य कम लड़कियों को मिलता है कि ससुराल में मायके के प्यार और व्यवहार का विस्तार मिल जाए। ऐश्वर्या राय कहती हैं, मुझे कोई फर्क ही नहीं महसूस होता! अभिषेक और हम हमेशा कहते हैं कि हमें दो मां-पिता मिल गए हैं। यहां मां और पिताजी दोनों ही मेरा बहुत ज्यादा खयाल रखते हैं। पिताजी ने तो लिखा भी है कि मैं उनकी बेटी की तरह हूं। श्वेता दीदी और मुझमें उन्होंने कोई अंतर नहीं रखा है।
मैं जिस परिवार से आई और जिस परिवार में मेरी शादी हुई, दोनों लगभग एक जैसे हैं। दोनों परिवारों में कई समानताएं हैं। मायके से ससुराल आई किसी लड़की के लिए यह बहुत बड़ा सौभाग्य होता है। ऊपरी तौर पर कुछ भी नहीं बदला है। एक भीतरी बदलाव जरूर आता है। सोच और चिंता का दायरा बड़ा हो जाता है। पहले मैं ऐश्वर्या राय जैसी बात दिमाग में रखती थी। अब हम पर जोर रहता है। ऐश्वर्या राय शादी को जिंदगी का बेहद खूबसूरत अनुभव मानती हैं। हर लड़की को इस अनुभव से गुजरना चाहिए, क्योंकि इसके बगैर कोई लड़की खुद को अच्छी तरह समझने का दावा ही नहीं कर सकती। वे कहती हैं, अपनी जिंदगी और रिश्तों को हम अलग नजरिए से देखना सीखते हैं। मायका कभी नहीं छूटता। मेरी राय में ससुराल आने के बाद मायके से संबंध ज्यादा गहरे और मजबूत हो जाते हैं। यह दोतरफा होता है। हम मां-पिताजी के बारे में सोचने लगते हैं और वे हमारे प्रति ज्यादा संवेदनशील हो जाते हैं।
ऐश्वर्या को इस बात का अहसास है कि वे जिस पेशे में हैं, वहां लगातार उंगलियां उठती रहेंगी। वे कहती हैं, हमारा प्रोफेशन ही ऐसा है। शादी के बाद से ही कुछ लोग भविष्यवाणियां कर रहे हैं। मैं काम कर रही हूं, तो लोगों को शिकायत है। अगर काम बंद कर दूं, तो और भी उल्टा-सीधा लिखा जाएगा। इतना ही नहीं, मेरे और अभिषेक के बारे में तरह-तरह की बातें होती रहती हैं। आगे चलकर कोई बड़ा स्कैंडल भी हो सकता है। ऐश्वर्या राय की लोकप्रियता और उनकी इंटरनेशनल पहचान से अभिषेक बच्चन खुश रहते हैं। वे कहते हैं, मैं इन बातों पर सोचता भी नहीं। हालांकि मीडिया में लोग लिखते रहते हैं और मानते हैं कि मुझ पर दबाव होगा। सच तो यह है कि ऐसा कुछ भी नहीं है। ऐश्वर्या अपने करियर के फैसले खुद लेती हैं, लेकिन एक परिवार का सदस्य होने के नाते हम सारी बातें शेयर करते हैं और कई बार फैसले लेने के पहले दूसरे की राय भी लेते हैं।
बच्चन परिवार और खुद के बारे में ऐश्वर्या राय कहती हैं, हम सभी रिलैक्स्ड इंडिविजुअल हैं। एक-दूसरे की परवाह करते हैं, लेकिन अपना काम भी साथ ही साथ करते हैं। मुझे मालूम है कि मैं फिल्म स्टार होने के साथ ही बेटी, बीवी और बहू भी हूं। दोनों परिवारों से मुझे जो मूल्य और संस्कार मिले हैं, उन्हें मैं जीवन का अनमोल उपहार मानती हूं। हम सभी का निजी व्यक्तित्व है। मुझे अपने काम से बेहद प्यार है, लेकिन अपने प्रियजनों को नाराज कर मैं कुछ भी नहीं कर सकती। हमेशा यह खयाल रहता है कि हमारे काम और व्यवहार से दूसरों की भावना आहत न हो।

Sunday, October 19, 2008

अहंकार नहीं है सनी में -संजय चौहान


फिल्म धूप से मशहूर हुए संजय चौहान ने सनी देओल के लिए कई फिल्में लिखी हैं। सनी के जन्मदिन (19 अक्टूबर) पर संजय बता रहे हैं उनके बारे में॥

सनी देओल से मिलने के पहले उनके बारे में मेरे मन में अनेक बातें थीं। दरअसल, मीडिया और लोगों की बातों से ऐसा लगा था। उनसे मेरी पहली मुलाकात बिग ब्रदर के समय हुई। फिल्म के निर्देशक गुड्डू धनोवा के साथ मैं उनसे मिलने गया था। पुरानी बातों की वजह से सनी केबारे में मैंने धारणाएं बना ली थीं। औरों की तरह मैं भी मानता था कि वे गुस्सैल और तुनकमिजाज होंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। पहली मुलाकात में ही वे मुझे बहुत मृदु स्वभाव के लगे। यह सच है कि वे बहुत मिलनसार नहीं हैं, क्योंकि वे शर्मीले स्वभाव के हैं। दूसरे, उनके बारे में मशहूर है कि वे सेट पर समय से नहीं आते हैं। मैंने बिग ब्रदर की शूटिंग के दौरान पाया कि वे हर स्थिति में बिल्कुल समय से सेट पर आ जाते थे। फिल्म की शूटिंग के दौरान मैंने पाया कि वे काम के समय ज्यादा लोगों से नहीं मिलते। अपना काम किया, शॉट दिया और अपने स्थान पर चले गए। वैसे, मैंने यह भी कभी नहीं देखा कि उन्होंने सेट पर आए किसी मेहमान को झिड़क दिया हो या किसी ने ऑटोग्राफ या फोटोग्राफ के लिए रिक्वेस्ट की हो, तो उसे नखरे दिखाए हों। उनकी प्यारी मुस्कराहट सिर्फ पर्दे पर ही नहीं, वास्तविक जिंदगी में भी आपका दिल जीत लेती है।
बाद में गुलाबी और गुरुदक्षिणा लिखते समय उन्हें और करीब से देखने-समझने का मौका मुझे मिला। ये दोनों फिल्में अभी नहीं बनी हैं। मैं बताना चाहूंगा कि वे सिर्फ अपने किरदार या भूमिका के बारे में ही नहीं सोचते हैं, बल्कि वे दूसरे किरदारों में भी दिलचस्पी उतनी ही लेते हैं। फिल्म के खलनायक या दूसरे चरित्रों के प्रति भी वे उतने ही शिद्दत से सोचते हैं। गुरुदक्षिणा के एक लंबे दृश्य के अंत में उन्हें केवल दो संवाद बोलने हैं। उन्होंने यह पूछा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि मैं कम बोल रहा हूं। जैसे ही उन्हें उनके दो संवाद के महत्व के बारे में बताया गया, उन्होंने थोड़ी देर सोचा और कहा दैट्स कैरेक्ट। ज्यादातर ऐक्टर में यह गुण नहीं पाया जाता, क्योंकि ज्यादातर ऐक्टर अपने रोल और सीन को लेकर परेशान रहते हैं। मैं कहूंगा कि उन्हें स्क्रिप्ट की अच्छी समझ है। सच तो यह है कि वे उसे डिटेल में समझते हैं। हालांकि उनकी फिल्में देखते समय इसका अहसास नहीं होता है। उनके बारे में यह गलत धारणा बन गई है कि वे अपने रोल पर अधिक ध्यान नहीं देते, लेकिन मेरा मानना है कि रोल को लेकर उनकी समझ जबरदस्त है। फिल्म करते समय अगर आप उनकी समझ या सोच से सहमत नहीं हैं और तार्किक तरीके से उन्हें बताते हैं, तो वे अपनी सोच और राय बदलने के लिए तैयार जो जाते हैं। यह बड़ी बात है। उनमें रत्ती भर भी अहंकार नहीं है। वे पूरी फिल्म के बारे में सोचते हैं।
शायद कम लोग ही जानते हैं कि सनी बहुत ही टेक्नोसेवी भी हैं। घड़ी, कंप्यूटर और कार के बारे में उन्हें नई जानकारी रहती है। वे लोगों से इस बारे में घंटों बातें कर सकते हैं। उनके लैपटॉप में सारे नए सॉफ्टवेयर और प्रोग्राम मौजूद मिलेंगे और वे उनका इस्तेमाल किसी सिद्धहस्त जानकार की तरह करते हैं। मैं उनके व्यक्तित्व के एक पहलू के बारे में बताना चाहूंगा। लोगों ने कुछ फिल्मों में उन्हें दाढ़ी के साथ देखा होगा। क्या लोगों को मालूम है कि उन सभी फिल्मों में उनकी असली दाढ़ी थी। उन फिल्मों के लिए वे दाढ़ी बढ़ाते हैं। वे कभी नकली दाढ़ी नहीं लगाते। उनका मानना है कि चाहे जितने अच्छे तरीके से दाढ़ी चिपकाई जाए, वे दिख जाती हैं और फिर आपकी दाढ़ी नहीं है, तो उसका असर चेहरे के एक्सप्रेशन पर पड़ता है। सच तो यह है कि अपने रोल के प्रति ऐसा समर्पण कम कलाकारों में दिखता है। हां, सनी में एक कमी है। वे मीडिया प्रेमी नहीं माने जाते। शायद यह देओल परिवार में है। इन दिनों ऐक्टर जिस प्रकार मीडिया का इस्तेमाल करते हैं, वैसा सनी नहीं करते। उनमें बेसिक ईमानदारी है। वे कहते हैं कि हमें काम करना चाहिए, क्योंकि काम बोलता है। मुझे लगता है कि उन्हें इस तरफ ध्यान देना चाहिए। चूंकि वे अपनी तरफ से कोई सफाई नहीं देते और न ही खुद के बारे में आक्रामक तरीके से बताते हैं, इसलिए उनके बारे में बन चुकी धारणाएं खत्म नहीं हो पातीं!
काम में उनकी संलग्नता ऐसी रहती है कि वे सुबह छह बजे भी आपको तरोताजा मिलेंगे और पूरी भागीदारी के साथ बातचीत करेंगे। मैंने अभी उनके लिए राइट या रॉन्ग लिखी है। इसमें सनी बिल्कुल नए अंदाज में दिखेंगे। ऐसे रोल में लोगों ने उन्हें पहले कभी नहीं देखा है।

Saturday, October 11, 2008

विश्वप्रिय अमिताभ बच्चन


जन्मदिन 11 अक्टूबर पर विशेष...

सम्राट अशोक के जीवन के एक महत्वपूर्ण प्रसंग पर डॉ।चंद्रप्रकाश द्विवेदी की अगली फिल्म है। इसमें अशोक की भूमिका अमिताभ बच्चन निभा रहे हैं। बिग बी के जन्मदिन (11 अक्टूबर) के मौके पर डॉ।द्विवेदी ने हमें अमिताभ बच्चन के बारे में बताया। इस संक्षिप्त आलेख में द्विवेदी ने भारतीय इतिहास के महानायक अशोक और भारतीय सिनेमा के महानायक अमिताभ बच्चन की कई समानताओं का उल्लेख किया है। बिग बी लोकप्रियता, पहचान और स्वीकृति की जिस ऊंचाई पर हैं, वहां उन्हें विश्वप्रिय अमिताभ बच्चन की संज्ञा दी जा सकती है।

पश्चिम के साहित्यकार एचजी वेल्स ने अपनी एकपुस्तक में सम्राट अशोक का उल्लेख किया है। उनके उल्लेख का आशय यह है कि अगर विश्व के सम्राटों की आकाशगंगा हो, तो उसमें जो सबसे चमकता हुआ सितारा होगा, वह अशोक हैं। यह अभिप्राय ऐसे लेखक और चिंतक का है, जो अशोक को भारत के बाहर से देख रहा है। जापान में सोकोतु नामक राजा हुए। उन्हें जापान का अशोक कहा जाता है। गौरतलब है कि राजा सोकोतु ने अशोक की तरह ही घोषणाएं जारी की थीं। दक्षिण-पूर्व एशिया में जहां-जहां बौद्ध धर्म है, वहां-वहां बौद्ध धर्म के इतिहासकार अशोक को जानते हैं। बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार में अशोक का प्राथमिक योगदान है। भारत के बाहर बौद्ध धर्म को पहुंचाने का श्रेय अशोक को ही है। इतिहास में अशोक की छवि देवानाम प्रिय है, यानी जो अपने कर्म से देवताओं का भी प्रिय हो गया। अशोक के लिए दूसरा विशेषण प्रियदर्शी है। सम्राट अशोक भारतीय इतिहास के एक ऐसे महानायक हैं, जिनके करीब कोई और नहीं पहुंचता। ऐसे महानायक पर फिल्म बनाने की बात सोचते ही वर्तमान भारतीय फिल्म इंडस्ट्री के अभिनेताओं में किसी को चुनना हो, जो इस महानायक के चरित्र को निभा सके, तो मैं निस्संकोच कहूंगा कि भारतीय सिनेमा में अमिताभ बच्चन से अधिक उपयुक्त दूसरा कोई नहीं है। वे न केवल श्रेष्ठ अभिनेता हैं, बल्कि उन्होंने एक ऐसा व्यक्तित्व अख्तियार कर लिया है, जो भारतीय दर्शकों के बीच सर्वाधिक लोकप्रिय है। सच तो यह है कि भारत के साथ ही अब वे देश की सीमाओं के बाहर विश्व नागरिकों के बीच भी सुपरिचित व्यक्तित्व बन चुके हैं। हम उन्हें विश्वप्रिय अमिताभ बच्चन कह सकते हैं। निश्चित ही सम्राट अशोक की तरह वे भी प्रियदर्शी हैं। सम्राट अशोक की भूमिका में अमिताभ बच्चन को देखने के मेरे कारण हैं। दरअसल, अशोक भारतीय इतिहास के जटिल चरित्र हैं। उनके जीवन के वैयक्तिक वैविध्य का अध्ययन होता रहा है। अशोक का आक्रामक व्यक्तित्व रहा है। वे अजेय योद्धा थे। अमिताभ बच्चन भी अपनी युवावस्था में एंग्री यंग मैन के रूप में दर्शकों के बीच लोकप्रिय रहे। वे हिंदी सिनेमा के अजेय नायक रहे। लोग देखें कि भारतीय इतिहास का एंग्री एंग मैन बाद में अपने व्यवहार से ऋषितुल्य हो जाता है। उन्हें बुद्धगतिक भी कहा जाता है, यानी जिसका व्यवहार बुद्ध जैसा हो। मुझे लगता है कि भारतीय सिनेमा में अशोक की तरह ही जीवन को इतनी परिपूर्णताओं के साथ देखने वाले और अपने व्यक्तिगत जीवन में इतनी विडंबनाओं को लेकर चलने वाले अकेले व्यक्ति अमिताभ बच्चन हैं। मैं सम्राट अशोक और अमिताभ बच्चन की तुलना करने की भूल नहीं कर सकता। दोनों की कुछ समानताएं बता रहा हूं। दोनों के अनुभवों की यात्रा कुछ-कुछ एक जैसी रही है।
अपनी फिल्म के सिलसिले में अमिताभ बच्चन से कई बार मिलना हुआ। मेरी स्क्रिप्ट में अशोकका जिस रूप में चित्रण है, वह उनके आचरण में भी दिखा। जैसे कि बौद्ध भिक्षुओं के लिए कहा जाता है कि वे आंखों से कम से कम संप्रेषण करें। वे प्रयत्न करते हैं कि दूसरे व्यक्तियों की आंखों में सीधे न देखा जाए। जैसे ही आंखों से आंखें मिलती हैं, परस्पर संवाद आरंभ हो जाता है। भिक्षा मांगते समय भी बौद्धों की नजर भूमि पर रहती है। आप आश्चर्य करेंगे कि अमिताभ बच्चन अधिकांश समय भूमि की ओर देखते हैं। वे अधिकतर चर्चाओं में नहीं रहते। वस्तुओं और घटनाओं पर वे अपना अभिप्राय नहीं देते। वे निर्णायक टिप्पणियां नहीं करते। मैं उन्हें उदात्त मौन का धनी व्यक्ति कहूंगा। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में लोगों को कई हस्तियां मिल जाएंगी, जो हर विषय पर टिप्पणी देती हैं। उनके पास आलोचना रहती है, उनके पास समीक्षा होती है, उनके पास निर्णय होते हैं, उनके पास पूर्वाग्रह होते हैं।
अमिताभ बच्चन आलोचना, समीक्षा, निर्णय और पूर्वाग्रह से ग्रस्त नहीं हैं। जो जैसा है, वे उसे वैसे ही स्वीकार करते हैं। मुझे लगता है कि उन पर यह प्रभाव हरिवंश राय बच्चन का भी हो सकता है। मैं जब-जब उनके नजदीक गया। मैंने उन्हें ऐसा ही पाया। ऐसी ही मुद्रा अशोक की है।
भारतीय सिनेमा के इतिहास में उन्होंने विशिष्ट स्थान प्राप्त कर लिया है। अशोक जैसे उदात्त और जटिल चरित्र को निभाने के लिए जो गरिमा चाहिए, वह उनके पास है। अशोक का व्यक्तित्व है उनमें। अशोक के लिए हमें जो भाषा चाहिए, उसमें वे पारंगत हैं। मेरी फिल्म में चौंसठ वर्ष के बाद के अशोक हैं। अमिताभ बच्चन की आयु भी चौंसठ से ज्यादा है। यह एक सुयोग है कि भारतीय इतिहास के एक महान चरित्र और महानायक की भूमिका भारतीय सिनेमा के महान व्यक्तित्व और महानायक निभा रहे हैं। अशोक की तरह उनकी कीर्ति भारत के बाहर फैल चुकी है। मुझे नहीं लगता कि अशोक की भूमिका के लिए अमिताभ बच्चन से अधिक उपयुक्त कोई दूसरा अभिनेता मिल सकता है। लोग चकित होंगे कि इसे लिखते समय भी मेरे मन-मस्तिष्क में अमिताभ बच्चन थे! यही लगता था कि इस भूमिका को वे ही निभा सकते हैं। इसे लिखने के तुरंत बाद मैंने उनसे संपर्क करने की कोशिश आरंभ कर दी थी। यह मेरा सौभाग्य है कि उन्होंने अशोक की भूमिका निभाने के लिए सहमति दे दी। अमिताभ बच्चन के व्यक्तित्व की विशेषताओं की बात करूं, तो वे हैं-ग्रहण, मनन और चिंतन। वे बहुत कम बोलते हैं। वे सारगर्भित बोलते हैं। पहले वे आपको स्वीकार करते हैं, ग्रहण करते हैं। वे बीच में कभी नहीं टोकते। दूसरी-तीसरी मुलाकात में लोगों को आभास होगा कि उन्होंने आपके आशय और मंतव्य पर मनन किया है। विचार किया है। उसके बाद की मुलाकातों में वे अहसास दिला देते हैं कि वे चिंतन कर रहे हैं। फिर लोगों को पता चलता है कि वे अपने निष्कर्षो और सहमति के प्रति कितने गंभीर हैं! रही बात अभिनेता अमिताभ बच्चन की, तो अपनी फिल्म की शूटिंग के बाद ही उसके बारे में निजी अनुभव बांट सकूंगा। अमिताभ बच्चन के व्यक्तित्व के अनेक अनजान पहलू हैं। इस बारे में उनके करीबी, रिश्तेदार और दोस्त ही बता सकते हैं।

Thursday, January 10, 2008

कूल और कामयाब हैं रितिक रोशन


-अजय ब्रह्मात्मज
जन्मदिन, 10 जनवरी पर विशेष..
अगर आपके समकालीन और प्रतिद्वंद्वी आपकी सराहना करें, तो इसका मतलब यही है कि आपने कुछ हासिल कर लिया है। पूरी दुनिया से स्वीकृति मिलने के बाद भी प्रतिद्वंद्वी आपकी उपलब्धियों को नजरंदाज करते हैं। पिछले दिनों एक बातचीत में अभिषेक बच्चन ने अपने मुख्य प्रतिद्वंद्वी रितिक रोशन की खुली तारीफ की। फिल्मों के चुनाव से लेकर अभिनय तक में उनकी विविधता का उल्लेख किया और स्वीकार किया कि रितिक ने थोड़े समय में ही ज्यादा सफल फिल्में दी हैं। हां, यह सच भी है, क्योंकि रितिक रोशन ने पिछले आठ सालों में केवल तेरह फिल्में की हैं और उनमें से सच तो यह है कि पांच फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर सफलता हासिल की है। रितिक रोशन ने अभी तक केवल चुनिंदा फिल्में की हैं। उनके समकालीनों में अभिषेक बच्चन, विवेक ओबेराय और जॉन अब्राहम ने उनसे ज्यादा फिल्में जरूर कर ली हैं, लेकिन फिर भी वे काम और कामयाबी के लिहाज से रितिक रोशन से काफी पीछे हैं।
रितिक रोशन के रातोंरात स्टार बनने का गवाह रहा है दैनिक जागरण। पहली फिल्म कहो ना प्यार है के समय से रितिक रोशन और दैनिक जागरण का साथ रहा है। इस फिल्म के सिलसिले में पहली बार मुंबई से बाहर निकले रितिक रोशन से जब यह पूछा गया था कि वे अपने प्रति दर्शकों की दीवानगी को किस रूप में लेते हैं? उन्होंने स्वाभाविक विनम्रता के साथ कहा था, लोगों की दीवानगी को मैं अपनी सराहना समझता हूं। मुझे लगता है कि वे पसंद कर रहे हैं। रितिक ने अपने दीवानों और प्रशंसकों को हमेशा पूरा आदर और स्नेह दिया। बहुत मुश्किल होता है हर किसी से मुस्करा कर मिलना। अगर दिन में पांच सौ लोगों से हाथ मिलाना पड़े और हर बार मुस्कराना पड़े, तो हाथ और होंठ में दर्द होने लगता है। फिर व्यवहार और मुस्कराहट में कृत्रिमता आ जाती है, लेकिन रितिक के साथ ऐसा नहीं है। वे प्रशंसकों के स्पर्श को इनाम समझते हैं। उन्हीं दिनों रितिक ने कहा था, मुझे मालूम है कि यह ऊंचाई महंगी पड़ेगी, क्योंकि यहां से सीधी ढलान होगी। कहो ना प्यार है के बाद की असफलता के दौर में वन फिल्म वंडर के ताने सुनने के बावजूद रितिक कूल बने रहे। उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा था, मैं लौटूंगा और वादा करता हूं कि दस सालों में शाहरुख खान से आगे निकल जाऊंगा, लेकिन मुझे दस साल का वक्त चाहिए। ऐसे बयानों को बड़बोलापन समझने वालों के सामने रितिक ने अपनी लगन, मेहनत और परफेक्ट एटीट्यूड से साबित किया कि वे नापतौल कर ही फिल्में चुनते हैं। रितिक की लगन और मेहनत के ताजा प्रशंसक निर्देशक आशुतोष गोवारीकर हैं। उनकी फिल्म जोधा अकबर हाल ही में पूरी हुई है। आशुतोष बताते हैं, इस फिल्म की वेशभूषा से लेकर भाषा तक के प्रति रितिक रोशन अतिरिक्त रूप से सावधान रहे। अतिरिक्त इसलिए कि सामान्य तौर पर एक्टर अपने रोल के प्रति इतने गंभीर नहीं होते। पूरी हिंदी फिल्म इंडस्ट्री और रितिक के प्रशंसक जोधा अकबर में उनकी भूमिका को लेकर जिज्ञासु हैं। युवा अभिनेताओं में अभी तक किसी और ने ऐसी चुनौतीपूर्ण भूमिका स्वीकार नहीं की है। खबर तो यह भी है कि श्याम बेनेगल ने उन्हें बुद्ध का रोल ऑफर किया है।
एक नजर में
जन्मतिथि- 10 जनवरी,1974
सहायक निर्देशक- खुदगर्ज, करण-अर्जुन, कोयला।
बाल कलाकार- आपके दीवाने (1980), आशा (1980), भगवान दादा (1986)।
बतौर नायक - कहो ना प्यार है (2000), फिजा, मिशन कश्मीर, यादें, कभी खुशी कभी गम, आप मुझे अच्छे लगने लगे, न तुम जानो न हम, मुझसे दोस्ती करोगे, मैं प्रेम की दीवानी हूं, कोई मिल गया, लक्ष्य, कृष और धूम-2।
आने वाली फिल्में- जोधा अकबर

Thursday, December 13, 2007

जन्मदिन विशेष - राजकपूर , आरके बैनर और कपूर खानदान


-अजय ब्रह्मात्मज


राजकपूर और रणबीर कपूर में एक समानता है। दोनों जिस डायरेक्टर के असिस्टेंट थे, दोनों ने उसी डायरेक्टर की फिल्म से एक्टिंग करियर की शुरुआत की। सभी जानते हैं कि राजकपूर ने स्कूल की पढ़ाई पूरी नहीं की थी। वे केदार शर्मा के असिस्टेंट रहे और सन् 1944 में उन्हीं की फिल्म नीलकमल से बतौर एक्टर दर्शकों के सामने आए। 1947 में उन्होंने आरके फिल्म्स एंड स्टूडियोज की स्थापना की।
रणबीर भी अपने दादा की तरह संजय लीला भंसाली के सहायक रहे और फिर उनकी ही फिल्म सांवरिया से बतौर एक्टर दर्शकों के सामने आए। अब यह देखना है कि वे आरके फिल्म्स एंड स्टूडियोज को कब पुनर्जीवित करते हैं?
राजकपूर ने जब स्कूल न जाने का फैसला किया, तो उनके पिता ने उन्हें जवाब-तलब किया। राजकपूर ने जवाब देने के बजाए अपने सवाल से पिता को निरुत्तर कर दिया। उन्होंने पृथ्वीराज कपूर से पूछा, सर, स्कूल की पढ़ाई के बाद क्या होगा? अगर आपको वकील बनना हो, तो आप लॉ कॉलेज में जाते हैं। अगर आपको डॉक्टर बनना हो, तो आप मेडिकल कॉलेज में जाते हैं और अगर आपको फिल्ममेकर बनना हो, तो आप कहां जाएंगे? मैं जिस पेशे में जाना चाहता हूं, उसके लिए जरूरी है कि मैं किसी स्टूडियो में काम शुरू कर दूं। इस तरह राजकपूर की फिल्मी पढ़ाई केदार शर्मा से आरंभ हुई, जो चांटा खाने के साथ आगे बढ़ी और फिर एक्टिंग के मुकाम तक पहुंची।
राजकपूर और फिर उनके भाइयों ने फिल्म इंडस्ट्री में प्रतिष्ठा और शोहरत हासिल की और बाद में बेटे भी आए। उनके परिवार को फिल्म इंडस्ट्री के पहले परिवार के रूप में पहचाना गया। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में इस परिवार के योगदान का मूल्यांकन अभी तक नहीं हो सका है। कपूर खानदान के तमाम सदस्यों ने इंडस्ट्री में योगदान दिया है। इस परंपरा में नया नाम रणबीर का जुड़ा है। उल्लेखनीय है कि रणबीर का नाम आरके बैनर के वारिस के रूप में भी उछाला गया। यहां एक सवाल उभरता है। क्या रणबीर ही आरके बैनर के वारिस होने के हकदार हैं? अगर हां, तो क्यों? रणबीर की पीढ़ी के सदस्यों की बात करें, तो उनसे पहले करिश्मा कपूर फिल्मों में नाम कमा चुकी हैं और करीना कपूर आज भी एक्टिव हैं। करिश्मा और करीना के फिल्मों में आने के समय किसी ने उनके वारिस होने की बात नहीं कही और न ही इस दिशा में सोचा गया।
दरअसल.., फिल्मों में करिश्मा के प्रवेश को एक विरोध के रूप में लिया गया था। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के पहले परिवार में एक अनलिखा नियम था कि परिवार की लड़कियां फिल्मों में काम नहीं करेंगी। वैसे, यह नियम और भी फिल्मी परिवारों में है। मालूम नहीं, यह सवाल कभी राजकपूर से पूछा गया या नहीं कि उनकी बेटी रीतू फिल्मों में क्यों नहीं आई? उनकी जीवनियों में ऐसा संकेत मिलता है कि राजकपूर कभी इस पक्ष में नहीं रहे कि परिवार की लड़कियां फिल्मों में आएं। बबीता ने सिर्फ अपनी जिद के तहत करिश्मा को फिल्मों में उतारा। करिश्मा और करीना की लॉन्चिंग पर कपूर परिवार में वैसी खुशी नहीं मनाई गई थी, जैसी रणबीर की लॉन्चिंग के समय दिखी। इस प्रसंग में उल्लेखनीय यह है कि रणबीर की सांवरिया को लेकर चर्चा में जरूर रहे, लेकिन ऐसा नहीं है कि वे करीना से अधिक टैलॅन्टेड हैं। उनकी फिल्म ने इस बात को साबित किया है। इसे दर्शकों की पसंद कहिए या और कुछ..। ऐसी स्थिति में आरके बैनर का असली वारिस किसे समझा जाए? रणबीर या करीना को? वारिस के संबंध में हमारी-आपकी दो राय हो सकती है, लेकिन राजकपूर द्वारा आरंभ की गई परंपरा और उसमें इस परिवार के योगदान के संबंध में दो राय नहीं हो सकती। राजकपूर उन फिल्मकारों में हैं, जिनमें फिल्म निर्माण और निर्देशन का पैशन था। वे सिर्फ पैसों या मुनाफे के लिए फिल्में नहीं बनाते थे। आरके बैनर के तहत फिल्म विधा में किए गए उनके सफल प्रयोग आज उदाहरण बन चुके हैं। इस परिवार से यही अपेक्षा है कि वे आरके फिल्म्स एंड स्टूडियोज के पट शीघ्र ही खोलेंगे और फिल्म निर्माण की दिशा में कदम बढ़ाएंगे। वैसे, रणबीर ने संकेत दिया है कि वे अपने दादा की तरह फिल्मकार बनना चाहते हैं। हम चाहेंगे कि रणबीर की चाहत पूरी हो।