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Wednesday, October 15, 2008

पटना के रिजेंट सिनेमाघर में दो दिनों में तीन फिल्में

रिजेंट सिनेमाघर का टिकट (अगला-पिछला)


पटना का गांधी मैदान … कई ऐतिहासिक घटनाओं का गवाह रहा है। गांधी मैदान के ही एक किनारे बना है कारगिल चौक। कारगिल में शहीद हुए सैनिकों की याद दिलाते इस चौराहे के पास एलफिंस्टन, मोना और रिजेंट सिनेमाघर हैं। मोना का पुनरूद्धार चल रहा है। कहा जा रहा है कि इसे मल्टीप्लेक्स का रूप दिया जा रहा है। अगर जल्दी बन गया तो यह पटना का पहला मल्टीप्लेक्स होगा। वैसे प्रकाश झा भी एक मल्टीप्लेक्स पटना में बनवा रहे हैं। पटना के अलावा बिहार और झारखंड के दूसरे जिला शहरों में भी मल्टीप्लेक्स की योजनाएं चल रही हैं। पूरी उम्मीद है कि अगले एक-दो सालों में बिहार और झारखंड के दर्शकों का प्रोफाइल बदल जाएगा। सिनेमाघरों में भीड़ बढ़ेगी और उसके बाद उनकी जरूरतों का खयाल रखते हुए हिंदी सिनेमा भी बदलेगा।
फिलहाल, 1 अक्टूबर की बात है। भोजपुरी फिल्म 'हम बाहुबली' का प्रीमियर रिजेंट सिनेमाघर में रखा गया है। रिजेंट में आमतौर पर हिंदी फिल्में दिखाई जाती हैं। उस लिहाज से यह बड़ी घटना है। यहां यह बताना जरूरी होगा कि बिहार से हिंदी फिल्में लगभग बहिष्कृत हो चुकी हैं। ताजा उदाहरण 'हम बाहुबली' का ही लें। 2 अक्टूबर को यह फिल्म 35 प्रिंट्स के साथ रिलीज हुई, जबकि 'द्रोण' और 'किडनैप' को कुल 20 स्क्रीन ही मिल सके। मुंबई में बैठे हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के पंडितों, ट्रेड विशेषज्ञों और निर्माता-निर्देशकों के कानों पर अभी जूं नहीं रेंग रही है, लेकिन यह आगामी खतरे का संकेत है। हिंदी फिल्मों का साम्रा'य डांवाडोल स्थिति में है। इस साम्रा'य से बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश और झारखंड जैसे क्षेत्र निकल रहे हैं। इन इलाकों में भोजपुरी फिल्में ही चलती हैं। जब से हिंदी सिनेमा ने विदेशों का रुख किया है, तब से उसके अपने दर्शक बिसूर रहे हैं। उन्हें हिंदी फिल्मों में अपनी धडक़न नहीं सुनाई पड़ती, इसलिए वे सिनेमाघरों में ही नहीं जाते। इन इलाकों में सफल रही पिछली हिंदी फिल्म 'विवाह' थी। हां, 'आपका सुरुर', 'जन्नत' और 'जाने तू या जाने ना' बिहार में पटना समेत अन्य शहरों में चलीं, लेकिन शहरी मिजाज की फिल्मों को दर्शकों ने देखना जरूरी नहीं समझा।
पटना के दर्शक बदल रहे हैं। पहले सिनेमाघरों में लड़कियां नाम मात्र की दिखती थीं। माना जाता था कि शरीफ घरों की लड़कियां अकेले सिनेमा देखने नहीं जातीं। इस बार लड़कियों के ग्रुप दिखे तो जवान जोड़े भी थे। जाहिर सी बात है कि वे कॉलेज से क्लास छोड़ कर आए होंगे। सिनेमाघरों में लड़कियों की बढ़ती तादाद सुखद ही कही जा सकती है। पटना जैसे शहरों में मध्यवर्ग और उ'चमध्वर्गीय परिवार के सदस्य सिनेमाघरों में नहीं जाते। वे घर पर ही पायरेटेड डीवीडी देख लेते हैं। घर पर डीवीडी देखना सस्ता, सुरक्षित और सुविधाजनक होता है। फिल्म की क्वालिटी से आम दर्शकों का अधिक मतलब नहीं रहता। पर्दे पर चल रही झिर-झिर तस्वीर काफी होती है। आवाज यानी कि साउंड गड़बड़ हो तो भी क्या फर्क पड़ता है …
ऐसा लगता है कि हिंदी प्रदेशों में लगभग एक सी हालत है। 'यादातर दर्शक सिनेमाघरों में नहीं जाते। सिनेमा देखने का संस्कार बदला है। इस बदलाव की एक वजह कानून-व्यवस्था भी है। चूंकि अधिकांश शहरों में महिलाओं की असुरक्षा बढ़ी है और सिनेमाघरों के दर्शकों का प्रोफाइल उजड्ड, बबदमाश और आवारा नौजवानों का हो गया है, इसलिए मध्यवर्गीय परिवार सिनेमाघरों से परहेज करने लगे हैं। बड़े शहरों और महानगरों के दर्शकों को छोटे शहरों के दर्शकों का डर समझ में नहीं आएगा। बात थोड़ी पुरानी हो गयी, लेकिन इवनिंग शो के बाद लड़कियों के अपहरण के किस्से तो पटना में सुनाए-बताए जाते रहे हैं। और फिर सिनेमाघरों की जो स्थिति है, उसमें जाने की हिम्मत कौन करे?
वैसे पिछले दिनों चवन्नी ने पटला के रिजेंट सिनेमाघर में दो दिनों में तीन फिल्में देखीं। पहली फिल्म 'हम बाहुबली' थी। प्रीमियर शो था। उस शो में फिल्म के निर्देशक अनिल अजिताभ के साथ मुख्य कलाकार रवि किशन,दिनेश लान निरहुआ,रिंकू घोष और मोनालिसा भी थे। प्रीमियर शो में बिहार के गर्वनर भी आए थे। अगले दिन चवन्नी ने रिजेंट में ही 'द्रोण' और 'किडनैप' देखी। एक ही सीट पर बैठ कर दो शो की दो फिल्मों का मजा ही कुछ और था। फिल्म के साथ चल रही दर्शकों की विशेष टिप्पणियों और सुझाव से फिल्म देखने का मजा बढ़ गया। चवन्नी को आश्चर्य नहीं हुआ कि दर्शक आने वाले दूश्य के साथ संवादो का भी सही अनुमान लगा रहे थे। क्या करें हिंदी फिल्मों का यही हाल है। दर्शकों के लिए कुछ भी अनजाना या नया नहीं रह गया है। अरे हां, चवन्नी यह बताना भूल रहा था कि 40 रूपए के टिकट में दो गर्मागर्म समोसे भी शामिल थे,जो ठीक इंटरवल के दस मिनट पहले सीट पर मिल गए थे। आप कोल्ट ड्रिंक लेना चाहते हों तो वह भी सीट पर मिल जाता है,लेकिन उसके लिए 14 रूपए देने पड़ते हैं। एक बात चवन्नी की समझ में नहीं आई कि सिनेमाघर का गेट सिफग् पांच मिनट पहले क्यों खुलता है? जब तक आप अपनी सीछ पर पहुचें और आंखें अंधेरे से एडजस्ट करें कि फिल्म शुरू हो जाती है।
यह तो हुई पटना में फिल्म देखने का ताजा अनुभव। चवन्नी चाहेगा कि आप भी अपने शहरों के सिनेमाघरों की स्थिति और दर्शकों के बदलते प्रोफाइल पर लिखें। पता तो चले कि फिल्मों के प्रति हिंदी समाज का क्या रवैया है?

Thursday, October 9, 2008

राहुल उपाध्याय:बिग बी ब्लॉग के अनुवादक

चवन्नी की मुलाक़ात राहुल उपाध्याय से ब्लॉग पर ही हुई.चवन्नी को उनका नुवाद सरल,प्रवाहपूर्ण और मूल के भावानुरूप लगा.चवन्नी ने उनसे बात भी की.पेश है उनसे हुई संक्षिप्त बातचीत...
-आपने अमिताभ बच्चन के ब्लॉग के अनुवाद के बारे में क्यों सोचा?
मैंने कई लोगों को यह कहते हुए पाया कि अमिताभ अंग्रेज़ी में क्यों लिख रहे हैं। जबकि उनकी फ़िल्में हिंदी में हैं। उन फ़िल्मों को देखने वाले, उन्हें चाहने वाले अधिकांश हिंदी भाषी हैं। और ऐसा सवाल उनसे एक साक्षात्कार में भी किया गया था। सुनने में आया हैं कि अमित जी भरसक प्रयास कर रहे हैं ताकि वे हिंदी में ब्लाग लिख सके। कुछ अड़चनें होगी। कुछ उनकी सीमाएं होगी। जिनकी वजह से 170 दिन के बाद भी वे हिंदी में ब्लाग लिखने में असमर्थ हैं। मुझे भी शुरु में कुछ अड़चने पेश आई थी। आजकल यूनिकोड की वजह से हिंदी में लिखना-पढ़ना-छपना आसान हो गया है। तो मैंने सोचा कि क्यों न उनका बोझ हल्का कर दिया जाए। अगर मैं अनुवाद कर सकता हूँ तो मुझे कर देना चाहिए। बजाए इसके कि बार बार उनसे अनुरोध किया जाए और बार बार उन्हें कोसा जाए कि आप हिंदी में क्यों नहीं लिखते हैं। जो पाठक हिंदी में पढ़ना चाहते हैं अब उनके लिए अमित जी का ब्लाग उपलब्ध है हिंदी में यहाँ:http://amitabhkablog-hindi.blogspot.com/
-अमिताभ बच्चन के बारे में आपकी क्या धारणा है?
वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। एक सशक्त अभिनेता। उन्होंने कुछ यादगार गीत भी गाए हैं। मैं बचपन से उनका प्रशंसक हूँ। जबसे मैंने उनकी फ़िल्म 'आनंद' देखी थी, 5 वीं कक्षा में। उसके बाद से उनकी हर फ़िल्म देखी हैं। 'मिस्टर नटवरलाल', 'दो और दो पाँच', 'दीवार', 'फ़रार', 'अभिमान', 'मुक़द्दर का सिकंदर' आदि हर फ़िल्म एक से बढ़ कर एक थी। 'अकेला', 'जादूगर' आदि के समय की फ़िल्मों ने निराश किया। लेकिन उनका सितारा फिर बुलंद हुआ और अब उनकी तकरीबन हर दूसरी फ़िल्म अच्छी होती है।
-अमिताभ बच्चन की पोस्ट कितनी जल्दी आप अनुवाद करते हैं?
अनुवाद करने में ज्यादा से ज्यादा एक घंटा लगता है। उनका ब्लाग कब पोस्ट होता है उसका कोई निश्चित समय नहीं है और न ही कोई स्वचालित तरीका है पता करने का। इसलिए दिन में जब भी मौका मिलता है मैं देख लेता हूँ कि कोई नई पोस्ट आई हो तो अनुवाद कर दूँ। अभी तक 172 वें दिन की पोस्ट का इंतज़ार है।
-आपको कैसी प्रतिक्रियाएं मिली हैं?
सब ने बधाई दी है। कहा कि यह सार्थक प्रयास है। हिंदी पढ़ने-समझने वालों के लिए ये उपयोगी साबित होगा। कुछ ने चिंता ज़ाहिर की है कि कहीं अमित जी नाराज़ न हो जाए कि बिना उनकी अनुमति के मैंने ये कदम कैसे उठा लिया। मैंने अभी तक किसी को कोई जवाब नहीं दिया है। लेकिन तीन बातें आपसे कहना चाहूँगा।1 - इरादे अगर नेक हो तो काम बुरा नहीं हो सकता।2 - मैंने उन्हे 168 वें दिन की 40 वीं टिप्पणी में लिख दिया है कि अगर उन्हें इस अनुवाद से आपत्ति हो तो मुझसे कहे और मैं अनुवाद करना और पोस्ट करना बंद कर दूँगा। अगर वे चाहे तो मेरा अनुवाद अपने ब्लाग के साथ रख सकते हैं। या फिर वे मुझसे बेहतर अनुवादक से कह दे कि वे अनुवाद कर के एक हिंदी का ब्लाग खोल दे।3 - गाँधी जी ने कहा था कि 'be the change you want to see in the world' दुनिया बदलनी हो तो पहले खुद को बदलो। इस का मैंने ये अर्थ निकाला कि अमित जी से आग्रह करने के बजाए खुद ही क्यों न अनुवाद कर दूँ?
-आप अमेरिका के किस शहर और पेशे में हैं?
मैं अमेरिका के 'सिएटल' शहर में रहता हूँ। पिछले 22 साल से अमेरिका में हूँ। पहले चार साल पढ़ाई की फिर पिछले 18 साल सूचना प्रोद्योगिकी के क्षेत्र में काम किया। पिछली जुलाई तक मैं माईक्रोसाफ़्ट में काम कर रहा था। फ़िलहाल 1 साल के अवकाश पर हूँ। चिंतन में हूँ कि आगे क्या करूँ? ज़िंदगी एक ही होती है। ये कोई अनिवार्य तो नहीं कि इस ज़िंदगी में एक ही तरह का काम किया जाए। चाहता हूँ कि कुछ नया करूँ। कुछ अलग करूँ। कोरी किताबी ज़िंदगी न जीऊँ। कुछ लीक से हटकर काम करूँ। पैसे कमाने का ज़ुनून नहीं हैं। कुछ कर गुज़रने का है।
-भारत में कहाँ के रहने वाले हैं?
मैं रतलाम (मध्य प्रदेश) का रहने वाला हूँ। जहाँ से मैंने सातवीं कक्षा तक की शिक्षा प्राप्त की। उसके बाद शिमला, कलकत्ता, बनारस से शिक्षा प्राप्त की।
-कितनी हिन्दी फिल्में देखते हैं?
हर शुक्रवार को एक फ़िल्म देख लेता हूँ पूरे परिवार के साथ। घर पर। प्रोजेक्टर पर। घर में टी-वी नहीं है। कमरे की दीवार को पर्दा बना रखा है। पिछली जुलाई से, जब से नौकरी छोड़ी है, और चिंतन में लगा हूँ, तब से फ़िल्म देखना भी छोड़ दिया है। इन दिनों एक एक पल कुछ नया करने की दिशा में खर्च हो रहा है।
-हिन्दी फिल्मों के बारे में आप क्या सोचते हैं?
हिंदी फ़िल्मों ने मेरे जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। माँ की परिभाषा, बहन की इज़्ज़त, राखी की गरिमा, होली-दीवाली का महत्व - ये सब हिंदी फ़िल्मों से ही सीखा है। संक्षेप में - हिंदी फ़िल्मों से ही मुझे भारतीय संस्कार मिले हैं और उनका ज्ञान हुआ है। 'दीवार' फ़िल्म का छोटा सा डायलाग - 'मेरे पास माँ है' - बहुत बड़ी बात कह जाता है। जिसे कि दुनिया की कोई और फ़िल्म नहीं समझा सकती है और न हीं कोई दूसरी भाषा का दर्शक उसे समझ सकता है।
आप चाहें तो उन्हें upadhyay@yahoo.com पर पत्र भेज सकते हैं.

Tuesday, August 19, 2008

श्रीमान सत्यवादी और गुलजार

माना जाता है कि बिमल राय की फिल्म 'बंदिनी' से गुलजार का फिल्मी जीवन आरंभ हुआ। इस फिल्म के गीत 'मेरा गोरा अंग लेइ ले' का उल्लेख किया जाता है। किसी भी नए गीतकार और भावी फिल्मकार के लिए यह बड़ी शुरूआत है।

लेकिन क्या आपको मालूम है कि गुलजार ने 'बंदिनी' से तीन साल पहले एसएम अब्बास निर्देशित 'श्रीमान सत्यवादी' के गीत लिखे थे। इस फिल्म में गीत लिखने के साथ निर्देशन में भी सहायक रहे थे। तब उनका नाम गुलजार दीनवी था। दीनवी उपनाम उनके गांव दीना से आया था। हेमेन गुप्ता की फिल्म 'काबुलीवाला' में भी उनका नाम सहायक निर्देशक के तौर पर मिलता है। जाने क्यों गुलजार के जीवनीकार उनकी इस फिल्म का उल्लेख नहीं करते? गुलजार ने स्वयं भी कभी स्पष्ट नहीं कहा कि 'बंदिनी' के 'गोरा अंग लेई ले' के पहले वे गीत लिख चुके थे।

'श्रीमान सत्यवादी' में राज कपूर और शकीला ने मुख्य चरित्र निभाए थे। फिल्म में दत्ताराम वाडेकर का संगीत था। गीतकारों में हसरत जयपुरी, गुलजार दीनवी और गुलशन बावरा के नाम हैं। गुलजार दीनवी ने इस फिल्म में (1) भीगी हवाओं में (मन्ना डे,सुमन कल्याणपुर), (2) क्यों उड़ा जाता है आंचल (सुमन कल्याणपुर), (3) एक बात कहूं वल्लाह (मुकेश, मन्ना डे, सुमन कल्याणपुर) और (4) रुत अलबेला मस्त समां (मुकेश) गीत लिखे थे।

कल उनका जन्मदिन था। चवन्नी की विलंबित बधाइयां। चवन्नी जानना चाहता है कि गुलजार 'श्रीमान सत्यवादी' का उल्लेख क्यों नहीं करते और उनके जीवनीकार भी इस तथ्य के प्रति क्यों खामोश रहते हैं? क्या आप कुछ कहना चाहेंगे?

Wednesday, July 30, 2008

बच्चन परिवार का जोश






अमिताभ बच्चन ने अपने ब्लॉग पर 'अविस्मरणीय' यात्रा की झलकियाँ दी हैं.चवन्नी के पाठकों के लिए वहीँ से ये तस्वीरें ली गई हैं.

Monday, July 28, 2008

हिन्दी टाकीज:फिल्में देखना जरूरी काम है-रवि शेखर

रवि शेखर देश के जाने-माने फोटोग्राफर हैं.उनकी तस्वीरें कलात्मक और भावपूर्ण होती हैं.उनकी तस्वीरों की अनेक प्रदर्शनियां हो चुकी हैं.इन दिनों वे चित्रकारों पर फिल्में बनाने के साथ ही योग साधना का भी अभ्यास कर रहे हैं.चित्त से प्रसन्न रवि शेखर के हर काम में एक रवानगी नज़र आती है.उन्होंने हिन्दी टाकीज सीरिज में लिखने का आग्रह सहर्ष स्वीकार किया.चवन्नी का आप सभी से आग्रह है की इस सीरिज को आगे बढायें।


प्रिय चवन्नी,

एसएमएस और ईमेल के इस जमाने में बरसों बाद ये लाइनें सफेद कागज पर लिखने बैठा हूं। संभाल कर रखना। तुमने बनारस के उन दिनों को याद करने की बात की है जब मैं हिंदी सिनेमा के चक्कर में आया था।

और मुझे लगता है था कि मैं सब भूल गया हूं। यादों से बचना कहां मुमकिन हो पाता है - चाहे भले आपके पास समय का अभाव सा हो।

सन् 1974 की गर्मियों के दिन थे। जब दसवीं का इम्तहान दे कर हम खाली हुए थे। तभी से हिंदी सिनेमा का प्रेम बैठ चुका था। राजेश खन्ना का जमाना था। परीक्षा के बीच में उन दिनों फिल्में देखना आम नहीं था। तभी हमने बनारस के 'साजन' सिनेमा हाल में 'आनंद' पहली बार देखी थी और चमत्कृत हुआ था।

हम जिस समाज में रहते हैं उसके चरित्र हमें बनाते हैं। आज मुड़कर देखता हूं - तो दो-तीन ऐसे मित्र हैं जिनके प्रभाव से मैं हिंदी सिनेमा से परिचित हुआ।

सबसे पहली फिल्म हमने अपने बाबूजी के साथ देखी थी -'दो बदन' मनोज कुमार की निशांत सिनेमा में तब मैं चौथी क्लास में पढ़ता था। उसके बाद हर साल परीक्षा के बाद बाबू जी एक फिल्म देखने ले जाते थे। इस सिलसिले में दूसरी फिल्म थी -'अनुपमा'। उस समय 'अनुपमा' मेरे बिल्कुल पल्ले नहीं पड़ी थी। बए एक गीत था -'धीरे -धीरे मचल ऐ दिले बेकरार कोई आता है' फिल्म देखने के बाद गीत से एक दोस्ती सी हो जाती थी। जब रेडियो पर किसी देखी फिल्म का गाना आता था तो आवाज थोड़ी बढ़ा दी जाती थी।

बनारस उत्तर प्रदेश और बिहार की सीमा पर एक महत्वपूर्ण शहर है। वहां ढेरों सिनेमा हॉल थे -दीपक, कन्हैया, निशात, चित्रा, गणेश टाकीज मुख्य शहर में थे। कन्हैया बिल्कुल गोदौलिया चौराहे के पास और चित्रा चौक में। चित्रा पहली मंजिल पर था। चित्रा सिनेमा सुबह के शो में विदेशी फिल्में दिखाया करता था। जिसे देखने के लिए शहर के पढ़े- लिखे लोग इकट्ठे होते थे। उस वक्त यह पता करना मुश्किल होता था कि कौन सी अंग्रेजी फिल्म अच्छी होगी।

उस समय सिनेमा के दर अपनी जेब पर ज्यादा जोर नहीं डालते थे। दो की पाकेट मनी (जो कि एक रुपये हुआ करती थी) बचा कर एक फिल्म देखी जा सकती थी। एक रुपये नब्बे पैसे में फर्स्ट क्लास में बैठकर अनगिनत फिल्में देखी है मैंने। तभी तो आज कल फिल्मों के एक टिकट के लिए सौ रुपये का नोट निकालना जरा अच्छा नहीं लगता।

उस जमाने में गाने रेडियो पर सुने जाते थे। अमीन सायानी का बिना गीत माला रेडियो का सबसे लोकप्रिय कार्यक्रम हुआ करता था। अमीन भाई बीच- बीच में फिल्म पत्रकारिता भी किया करते थे। बिनाका गीत माला से मेरा पहला परिचय मेरे जीजा जी ध्रुवदेव मिश्र ने कराया था। वे मेरे जीवन में आने वाले पहले रसिक व्यक्ति थे - जिनको जीवन में आनंद लेना मजा लेना आता था।

उनके साथ मैंने राजेश खन्ना की 'हाथी मेरा साथी' देखी थी। तब मुझे लगा था . मैंने जीवन की सबसे अच्छी फिल्म देखी है।

पर सिनेमा का चश्का लगा था मुझे अपने मामा जी से गर्मियों की छुट्टियों में मैं बनारस से निकल जाया करता था- गोरखपुर। गोरखपुर से सटे हल्दिया पिघौरा गांव में मेरे मामा जी रहा करते हैं। तब नाना- नानी भी थे। पिघौरा से गोरखपुर लगभग 13 किलोमीटर है। और सायकिल से रोज हमलोग शहर जाया करते थे। शहर में छोटे- बड़े कई काम हुआ करते थे - मामा जी के और उसी में समय निकाल कर एक महीने तक हम लोग एक फिल्म भी देखा करते थे। इस तरह पहली बार हमने एक महीने में अठ्ठाइस फिल्म देख डाली थी। यी वीडियो के आने के पहले की बात है। और हमें स्वयं आशचर्य हुआ करता था।

गोरखपुर में सिनेमा रोडर पर ही तीन- चार सिनेमा हॉल थे। बाकी सायकिल हो तो कुछ भी दूर नहीं। मामा जी दिलीप कुमार के फैन थे। और मुझे पहली बार दिलीप कुमार की फिल्मों में रस लेना उन्होंने ही सिखाया था। तब पुरानी फिल्में भी सिनेमाघरों में धड़ल्ले से चला करती थी, वो भी रियायती दरों पर।

बनारस लौटा तो नये कॉलेज में दोस्त बने और फिल्मों का सिलसिला शुरू हो गया। मुझे लगता था कि - फिल्में देखना एक जरूरी काम है ताकि फिल्मों की जानकारी होनी चाहिए। यह सामान्य ज्ञान जैसा था और हम घंटों फिल्मों की चर्चा करते रहते थे।

'आनंद' सिनेमा शहर से थोड़ा दूर था उन दिनों। वहां पर 'रोटी, कपड़ा और मकान' रिलीज हुई थी। जिसका बेहद लोकप्रिय गीत था -'बाकी कुछ बचा तो महंगाई मार गयी'।

(यह गाना आज भी आकाशवाणी पर बैन है) धीरे-धीरे शहर के बीच पुराने सिनेमाहाल अपने रखरखाव की वजह से घटिया होते होते गये, -कुर्सियां टूट गयीं। उनमें खटमल भी होते थे। जगह-जगह पान के पीक होना तो बनारस की शान थी। पर इससे क्या फर्क पड़ता है। फिल्म देखने के सुख पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता था।

लहुरा बीर पर प्रकाश टॉकीज था। जिसमें 'बॉबी' रिलीज हुई थी। सड़क के उस पार क्वींस कॉलेज था। जहां हम पढ़ाई कर रहे थे। पता चला एक दिन क्वींस कॉलेज के प्रिंसिपल ने वहां धाड़- मार दी और स्कूल यूनिफार्म में सिनेमा देख रहे बच्चों को पकड़ लाए।

उसके बाद ही आयी थी 'शोले' आनंद सिनेमा हाल में। फिल्म हिट होने का क्या मतलब होता है वह किसी छोटे शहर में ही महसूस किया जा सकता है। शहर का शायद ही ऐसा कोई मानव हो जिसने 'शोले' और 'जय संतोषी मां' न देखी हो। दो फिल्में लगभग एक साल तक एक ही हॉल में जमी रही। दोनों फिल्मों की जबरदस्त 'रिपीट बैल्यू' थी। हमने भी 7 या 8 बार 'शोले' हॉल में देखी होगी - कभी किसी के साथ कभी किसी के साथ।

'जय संतोषी मां' देखने मैं नहीं गया।

'साजन' सिनेमा हॉल का जिक्र मैं कर चुका हूं। उसके बाद नदेसर पर 'टकसाल' खुला और लंका पर 'शिवम' 'शिवम' में काशी हिन्दू विशविद्यालय के छात्रों की भीड़ रहा करती थी। नदेसर शहर के दूसरे छोर पर था - वहां फिल्म देखना नहीं हो पाता था।

अस्सी पर एक सिनेमा हाल था 'भारती' वहां अच्छी अंग्रेजी फिल्में चलती थीं। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के नजदीक होने के कारण वहां भीड़ भी रहती थी। बीच में ऐसा भी होता था कि 'भारती' में लगने वाली कोई भी फिल्म देखी जा सकती है। वहां खचाखच भरे हॉल में हमने देखी थी। - 'इण्टर द ड्रैगन', 'टॉवरिंग इनफर्नो' तुम्हें याद होगा - वी एच एस टेप का जमाना उसके बाद आया। जनता ने सिनेमा हॉल जाना बंद कर दिया। जगह.जगह कैसेट लायब्रेरी खुल गयी।

मेरे एक मित्र हैं - संजय गुप्ता। उनकी अपनी वीडियो लायब्रेरी थी। हमलोग वीएचएस कैमरे से शादी भी शूट करते थे। तब एक-एक दिन न जाने कितनी फिल्में उसके ड्रॉइंग रूम में देखी होगी।

तब भी हॉल में जाकर फिल्म देखना हमेशा अच्छा लगता था। इस बीच भेलूपूर में दो नए हाल आकर पुराने हो गये थे - गुंजन और विजया।

गुंजन में हमने 'मदर इंडिया' पहली बार देखी थी। मेरे नए नए जवान होने के उस दौर में श्याम बेनेगल की फिल्मों की भी यादें हैं। विश्वास नहीं होता अब 'अंकुर', 'निशांत', 'भूमिका', 'मंथन', 'मंडी' जैसी फिल्मों को एक छोटे शहर में सिनेमा हॉल में देखा जा सकता था। ओर धर्मेन्द्र-हेमामालिनी, रेखा, अमोल पालेकर, संजीव कुमार, राजेन्द्र कुमार, वैजन्ती माला-दिलीप कुमार राज कपूर, देव आनंद जैसे नाम आप के जीवन पर किस कदर प्रभावित करते थे।

हिंदी सिनेमा और हिंदी गीतों का प्रेमी प्रेम सीखता है - सितारों से। रफी, किशोर, लता, आशा, गुलजार, मजरूह, आ डी, साहिर, मदन मोहन से।

मुझे पक्का भरोसा है आज भी अपने देश के सूदूर कोनों में लोग जवान हो रहे होंगे। वैसा ही प्रभाव होगा। वैसी ही सनक होगी। बस सितारों के नाम अलग होंगे - शाहरुख, सलमान, संजय दत्त, रानी, करीना, दीया, कंगना, आमिर ... इत्यादि।

तुम्हारा
रवि

Tuesday, July 22, 2008

बिग बक बन्नी

चवन्नी को बिग बक बन्नी का यह संक्षिप्त परिचय रवि रतलामी से प्राप्त हुआ।
तीन घंटों की हिन्दी फ़िल्में क्या आपको बोर नहीं करतीं? आम अंग्रेज़ी फ़िल्में भी डेढ़-दो घंटे से कम नहीं होतीं.

आमतौर पर किसी भी फ़िल्म में एक छोटी सी कथा होती है - बुराई पर अच्छाई की जीत. इसे कहने के लिए, इसी बात को बताने के लिए दर्शकों पर लगातार डेढ़ से तीन घंटे अत्याचार करना कितना सही है? कोई फ़िल्म कितना ही अच्छा बन जाए, गीत संगीत, दृश्य और भावप्रण अभिनय से सज जाए, परंतु फ़िल्म की लंबाई दर्शकों को पहलू बदलने को, बीच-बीच में जम्हाई लेने को मजबूर कर ही देती है.

ऐसे में, एक घिसी पिटी कहानी पर बनाई गई एक छोटी सी त्रिआयामी एनीमेशन फिल्म – बिग बक बन्नी देखना कई मामलों में सुकून दायक है.

वैसे यह फिल्म कई मामलों में बेजोड़ भी है. इसे ब्लेंडर नाम के एक मुफ़्त स्रोत अनुप्रयोग की सहायता से तैयार किया गया है. इस फिल्म को क्रिएटिव कॉमन्स लाइसेंस के तहत जारी किया गया है जिसे हर कोई मुफ़्त में देख सकता है व लोगों में वितरित कर सकता है. यानी आपको इसे देखने के लिए इसे खरीदने की आवश्यकता नहीं.

फ़िल्म का तकनीकी पक्ष तो शानदार है ही, प्रस्तुति, कथ्य में कसावट, दृश्यों की बुनावट सभी कुछ दर्शनीय है. दस मिनट से भी कम समय की इस फ़िल्म को देखकर आप महसूस कर सकते हैं कि बड़ी से बड़ी बात कहने के लिए ढाई तीन घंटे की फ़िल्मों की आवश्यकता ही क्या है?

यू ट्यूब में इस फ़िल्म को यहाँ या फिर यहाँ देखें. इसके बढ़िया क्वालिटी फ़िल्म को डाउनलोड कर देखने के लिए (जिसमें, जाहिर है आपको ज्यादा आनंद आएगा,) यहाँ चटका लगाएं.

Sunday, July 6, 2008

हरमन बवेजा बनाम इमरान खान

पिछली चार जुलाई को हरनाम बवेजा ने 'लव स्टोरी २०५०' और इमरान खान ने 'जाने तू या जाने ना' से अपनी मौजूदगी दर्शकों के बीच दर्ज की.अभी से यह भविष्यवाणी करना उचित नहीं होगा कि दोनों में कौन आगे जायेगा ?पहली फ़िल्म के आधार पर बात करें तो इमरान की फ़िल्म'जाने तू...'की कामयाबी सुनिशिचित हो गई है.'लव स्टोरी...' के बारे में यही बात नहीं कही जा सकती.हालाँकि चार जुलाई के पहले हरमन की फ़िल्म की ज्यादा चर्चा थी और इमरान की फ़िल्म छोटी मानी जा रही थी.वैसे भी हरमन की फ़िल्म ५० करोड़ में बनी है,जबकि इमरान की फ़िल्म की लगत महज १० करोड़ है।
चवन्नी को इसका अंदेशा था.सबूत है इसी ब्लॉग पर किया गया जनमत संग्रह.चवन्नी ने पूछा था की पहले किसकी फ़िल्म देखेंगे? २५ लोगों ने इस जनमत संग्रह में भाग लिया था,जिनमें से १७ ने इमरान की फ़िल्म पहले देखने की राय दी थी,बाकी ८ ने हरमन के पक्ष में मत दिए.चवन्नी को तभी समझ जाना चाहिए था कि दोनों फिल्मों के क्या नतीजे आने जा रहे हैं.चवन्नी ने एक पोस्ट के बारे में सोचा भी था।
हरमन और इमरान को मीडिया आमने-सामने पेश कर रहा है.मुमकिन है कि कुछ दिनों के अन्दर इस तरह के आलेख भी आने लगें कि इमरान ने हरमन को पछाड़ा.कोई शक नहीं कि 'जाने तू...' अच्छी चल रही है और उसकी तुलना में 'लव स्टोरी...' पिछड़ती जा रही है,किंतु सिर्फ़ इस आधार पर इमरान की जीत घोषित कर देना अनुचित होगा.अभी इश्क के इम्तेहान और भी हैं...इमरान की परीक्षा अगली फ़िल्म में होगी.हरमन को भी मौका मिलेगा कि वे अगली फ़िल्म में इस फ़िल्म की भरपाई कर सकें.उनकी अगली फ़िल्म अनीस बज्मी के साथ है,जो कामयाब फिल्मों के पर्याय बन गए हैं.इमरान कि अगली फ़िल्म संजय गडवी के साथ है,जिन्होंने धूम फिल्में बनाई थीं.हाँ कह सकते हैं कि पहले राउंड में इमरान आगे निकल गए हैं।
अगर दोनों के अभिनय क्षमता पर ध्यान देन तो ज्यादा अन्तर नहीं है.हरमन कुछ मामलों में आगे हैं.हिन्दी फिल्मों के अभिनेता के लिए आवश्यक नाच,गाना और मारधाड़ के लिए वे उपयुक्त हैं.उनके चेहरे में आकर्षण है,जो फिलहाल रितिक रोशन के नक़ल माना जा रहा है.जल्दी ही उनकी अपनी पहचान बन जायेगी.दूसरी तरफ़ इमरान का आम चेहरा उन्हें सहज और साधारण किरदारों के लिए अनुकूल ठहराता है.एक्शन दृश्यों में इमरान कैसे लगेंगे,कहना मुश्किल है।
आब आप कि बरी है.आप बताएं कि आप को कौन ज्यादा पॉपुलर होता दिख रहा है?

Tuesday, July 1, 2008

प्रियंका चोपड़ा, बारिश और एक मुलाकात

इन दिनों अंतरंग बातचीत तो छोड़िए, अंतरंग मुलाकातें भी नहीं हो पातीं। एक्टर व्यस्त हैं और फिल्म पत्रकार जल्दी से जल्दी अखबारों की जगह भरने में सिर्फ कानों और आंखों का सहारा ले रहे हैं। दिल और दिमाग अपने कोनों में दुबके पड़े हैं। आश्चर्य है कि इस स्थिति से सभी खुश हैं... अखबार के मालिक, संपादक, पत्रकार, पाठक और फिल्मी हस्तियां... इस स्थिति की परिस्थिति पर फिर कभी, फिलहाल चवन्नी की मुलाकात पिछले दिनों प्रियंका चोपड़ा से हुई। चवन्नी के पाठकों के लिए विशेष रूप से इस मुलाकात का विवरण...

प्रियंका चोपड़ा से अजय ब्रह्मात्मज मिलने गए थे। चूंकि चवन्नी हमेशा उनके साथ रहता है, इसलिए स्वाभाविक रूप से इस इंटरव्यू के लिए मौजूद था। चवन्नी ने अजय से कहा भी कि गाड़ी निकाल लो। बारिश का दिन है। अपनी गाड़ी रहेगी तो गीले नहीं होंगे और भीगी हुई बातों से आप भी बचे रहोगे, लेकिन अजय को प्रियंका चोपड़ा के इंटरव्यू के बाद स्वानंद किरकिरे से मिलने के लिए बांद्रा भी जाना था, इसलिए गाड़ी निकालना मुनासिब नहीं था। बारिश में अनजानी सड़कों के गड्ढों की जानकारी नहीं रहती और फिर मुंबई में पार्किंग इतनी बड़ी समस्या है।

प्रियंका चोपड़ा के पीआर (प्रचारक) अदिति ने अजय को पहले ही बता दिया था कि उनका समय आधे घंटे आगे चला गया है। अजय पिछले पंद्रह दिनों से प्रियंका चोपड़ा से बातचीत करने की कोशिश में थे। चवन्नी को उनकी परेशानी मालूम है। उनके अखबार के परिशिष्ट 10 से 15 दिन पहले क्लोज किए जाते हैं, लिहाजा कोई भी इंटरव्यू प्रकाशन तिथि से पंद्रह दिन पहले हो जाना चाहिए ताकि उसे समय से लिखकर भेजा जा सके।

प्रियंका काफी व्यस्त रहीं। अजय को उनके पीआर ने सलाह दी थी कि आप फोन पर इंटरव्यू कर लो। अजय फोनो इंटरव्यू पसंद नहीं करते। उन्होंने चवन्नी को बताया कि फोन पर उसी से लंबी और अच्छी बातचीत हो सकती है, जो आपको अच्छी तरह जानता हो और दोस्तों की तरह बात करने को तैयार हो।

बहरहाल, सोमवार की शाम को अजय ब्रह्मात्मज के साथ चवन्नी मुंबई की फिल्मसिटी गया। तय हुआ था फ्लोर नंबर 16 पर प्रियंका मिलेंगी। वह वहां करण जौहर की तरुण मनसुखानी निर्देशित 'दोस्ताना' की शूटिंग कर रही हैं। इस फिल्म में उनके साथ अभिषेक बच्चन और जॉन अब्राहम भी हैं। अजय को बारिश के कारण वहां पहुंचने में थोड़ी देर हो गई। फिल्मसिटी का रास्ता गड्ढों से भरा है।आश्चर्य होता है कि हजारों करोड़ों का कारोबार करनेवाली फिल्म इंडस्ट्री के प्राइम लोकेशन फिल्मसिटी का रास्ता भी मुंबई की नगरपालिका दुरूस्त नहीं रख पाती। फिल्म स्टारों को अपनी लक्जरी कारों में इन गड्ढ़ों के झटके महसूस नहीं होते। आप ऑटो से यात्रा करें तो पता चले। कमर और पीठ की नसें तड़तड़ा जाती हैं। देर तो हो चुकी थी, क्योंकि अजय के मोबाइल पर अदिति का मैसेज आया - कहां हैं सर?

फिल्मसिटी के 16 नंबर फ्लोर को रंग-रोगन कर दुरूस्त कर दिया गया है। इस फ्लोर पर संजय लीला भंसाली की 'ब्लैक' की शूटिंग के समय भयंकर आग लगी थी। आग लगने की तहकीकात, इंश्योरेंस के दावों और बाकी पड़ताल के कारण कई सालों तक यह फ्लोर नॉनवर्किंग कंडीशन में रहा। फ्लोर के बाहर गाड़ियों के काफिले लगे थे। चार-छह वैनिटी वैन पार्क थे। ये वैनिटी वैन फिल्म स्टारों के लिए होते हैं। ऑटो से उतरते ही गार्ड ने रोक दिया। बूंदाबादी चल रही थी। चूंकि गार्ड अपनी ड्यूटी करते हुए भीग रहा था, इसलिए चवन्नी भी चुप रहा। वह भी अजय की ड्यूटी समझकर खामोश हो गया। थोड़ी देर तक पूछताछ चलती रही। हालांकि प्रियंका चोपड़ा के सचिव चांद मिश्रा दिख गए थे, लेकिन उन्होंने अपरिचय की मुद्रा बना ली तो अजय ने भी उन्हें इग्नोर कर दिया। उसने अदिति को फोन किया और आप यकीन नहीं करेंगे कि फोन करने के छह मिनट के बाद अदिति प्रियंका के वैनिटी वैन से बाहर निकली और अजय के पास आईं। जबकि फासला सिर्फ 25 कदमों का था।

दो हिस्सों में बंटे वैनिटी वैन के एक हिस्से में प्रियंका इंटरव्यू दे रही थीं दूसरे हिस्से में उनकी सहायिका राधा और सेक्रेटरी चांद मिश्रा बैठे थे। रेडियो का एक आरजे चहकती आवाज में इंटरव्यू ले रहा था। उसने इंटरव्यू करने के बाद प्रियंका चोपड़ा को महंगे चॉकलेट भेंट किए। क्या हिंदी अखबारों के पत्रकार ऐसे महंगे उपहार दे सकते हैं? अजय का नंबर लगा दिया गया। चवन्नी भी साथ में बैठ गया। थोड़ी देर बैठने के बाद अजय को ऊब सी महसूस हुई। अजय नहीं चाहते कि उनकी बातचीत के समय कोई तीसरा मौजूद हो, इसलिए दूसरों की बातचीत सुनना भी उन्हें पसंद नहीं है। वे उठकर वैनिटी वैन के दूसरे हिस्से में आ गए। चांद मिश्रा वाइरल से परेशान थे, फिर भी ड्यूटी करने आए थे। सहायिका राधा का जन्मदिन था, मगर वह ठहरी हुई थी कि प्रियंका के इंटरव्यू समाप्त हो जाएं। स्टारों के स्टाफ को हमेशा तैनात रहना पड़ता है।

अदिति ने आकर अजय से कहा कि सवाल तो एक जैसे ही होंगे और उनके जवाब भी वही होंगे तो क्यों न आप दूसरों के साथ बैठकर बातचीत कर लें। चवन्नी ने देखा कि अजय का गुस्सा होंठो पर आते-आते रूक गया। अजय ने खुद पर नियंत्रण किया और ऐसी बातचीत से मना कर दिया। उन्होंने अदिति से कहा कि सभी का इंटरव्यू करवा दो। अदिति ने डराया कि आखिरी इंटरव्यू जल्दबाजी में करना होगा। अजय ने अदिति को निश्चिंत रहने के लिए कहा। आखिरकार वह वक्त आया। प्रियंका चोपड़ा ने कहा कि पंद्रह मिनट में बातचीत कर लें। अभी बातचीत शुरू ही हुई थी कि दीया मिर्जा मिलने आ गईं। प्रियंका ने माफी मांगी और उनसे थोड़ी देर तक बातचीत करती रहीं। फिर से अजय का इंटरव्यू आरंभ हुआ। बातें इतनी रोचक हो रही थीं कि राधा और अदिति भी वहीं बैठ गईं। अब बस... अजय के सवाल थे और प्रियंका के जवाब... कब पंद्रह मिनट का समय निकला पता ही नहीं चला... तकरीबन 40 मिनट के बाद अदिति किसी के फोन से चौंकी। उन्होंने आग्रह किया कि एक इवेंट में जाना है। क्या आज की बात यहीं खत्म करें?

चवन्नी इस बातचीत को सुनता रहा। वह खुश था कि अजय को एक अच्छा इंटरव्यू मिल गया। उसने अजय से कहा भी कि इसे जल्दी से ब्लॉग पर डालो। अजय ने आश्वस्त किया है कि जागरण में छपने के साथ ही यह चवन्नी चैप ब्लॉग पर आएगा। चवन्नी के साथ तब तक आप भी इंतजार करें। हां, प्रियंका चोपड़ा का जन्मदिन 18 जुलाई है।

Wednesday, June 18, 2008

अभिनेत्री करीना कपूर बनाम ब्रांड बेबो


ताजा खबर है कि करीना कपूर ने एक साबुन के विज्ञापन के लिए करोड़ों की रकम ली है। इस तरह वह विज्ञापन से कमाई करनेवाली महंगी अभिनेत्रियों में से एक हो गई हैं। इन दिनों वह हर तरह के कंज्यूमर प्रोडक्ट के विज्ञापनों में दिख रही हैं। अभिनेत्रियों की मांग कॉस्मेटिक, पर्सनल केयर प्रोडक्ट और ज्वेलरी के विज्ञापनों में ज्यादा रहती है। करीना कपूर इस तरह के विज्ञापनों में आगे हैं। वह लाइफ स्टाइल प्रोडक्ट बेचने के लिए सबसे उपयुक्त एक्ट्रेस मानी जा रही हैं।

इन दिनो फिल्म अभिनेत्रियों की कमाई का बड़ा हिस्सा विज्ञापनों से आता है। पॉपुलर एक्टर की तरह पॉपुलर एक्ट्रेस भी इस कमाई पर पूरा ध्यान दे रही हैं। बाजार में करीना कपूर की मांग बढ़ने का एक कारण यह भी है कि पिछले साल उनकी फिल्म 'जब वी मेट' जबरदस्त हिट रही। उनके कुछ प्रशंसकों को लग सकता है कि शाहिद कपूर से अलग होकर उन्होंने अच्छा नहीं किया। नैतिकता के इस प्रश्न से उनके इमेज पर कोई फर्क नहीं पड़ा। उल्टा दर्शकों के बीच उनकी चाहत बढ़ गई है। हीरोइनों के सपनों में खोए दीवाने दर्शकों के लिए करीना कपूर ऐसी आइकॉन बन गयी हैं, जो किसी एक सितारे से नहीं बंधी हैं। शाहिद कपूर के साथ उनके संबंध को टिकाऊ माना जा रहा था। सैफ अली खान के साथ उनके संबंधों को लेकर आम धारणा है कि वह कभी भी टूट सकता है। इस तरह करीना कपूर का ख्वाब उनके दीवानों के लिए सुरक्षित है। अमूमन शादीशुदा या मजबूत संबंधों की हीरोइनों की लोकप्रियता धीरे-धीरे कम हो जाती है। शाहिद से संबंध तोड़कर करीना कपूर ने अपनी लोकप्रियता में ज्यादा इजाफा ही किया है।

ऐसा लगता है कि करीना कपूर थोड़ी मेहनत, लगन और एकाग्रता से काम करें तो वह बेहतर अभिनय कर सकती हैं। उन्होंने 'चमेली', 'ओमकारा' और 'जब वी मेट' में इसके उदाहरण दिए हैं, लेकिन उन्हें सुधीर मिश्र, विशाल भारद्वाज या इम्तियाज अली जैसा निर्देशक भी चाहिए। करण जौहर टाइप निर्देशक तो करीना कपूर के जरिए लाइफ स्टाइल और फिगर में ही ऊब-डूब करते रहेंगे। तय करीना को ही करना है कि वह पॉपुलैरिटी और डिमांड के बीच कैसे संतुलन बिठाती हैं और अपने लिए कौन सा रास्ता चुनती हैं। अभिनेत्री करीना कपूर और ब्रांड बेबो एक-दूसरे की पूरक बन कर ही कामयाब रहेंगी।

Tuesday, June 3, 2008

जोधा अकबर के १०० दिन और उसके कटे दृश्य

जोधा अकबर के १०० दिन हो गए.इन दिनों हिन्दी फ़िल्म इंडस्ट्री में १०० दिनों और ५० दिनों की भी पार्टियाँ होती हैं.पहले फिल्में सिल्वर जुबली और गोल्डेन जुबली मनाती थीं.२१ वीं सदी में सिल्वर और गोल्डेन जुबली सपना हो गई हैं.आजकल तो पहले दिन की अच्छी शुरूआत हो जाए तो अल दिन या रविवार तक सुपर हित के पोस्टर लग जाते हैं.जन्नत के साथ ऐसा हुआ है।
बहरहाल,जोधा अकबर के १०० दिन पूरे होने के अवसर पर निर्देशक और निर्माता आशुतोष गोवारिकर ने पार्टी दी.चवन्नी भी वहाँ गया था.इस पार्टी में उन्होंने फ़िल्म के कटे हुए दृश्य दिखाए.आशुतोष ने बताया की उन्होंने पहले सब कुछ स्क्रिप्ट के मुताबिक शूट कर लिया था.बाद में फ़िल्म संपादित करते समय उन्होंने दृश्य काटे. इस मौके पर उन्होंने सारे कटे दृश्य दिखाए.कुछ अत्यन्त मार्मिक और महत्वपूर्ण दृश्य थे,लेकिन फ़िल्म की लम्बाई की वजह से उन्हें रखने का मोह आशुतोष को छोड़ना पड़ा।
अकबर के दरबार में बीरबल की एंट्री का दृश्य रोचक और जानदार था.कैसे महेश दास नाम का व्यक्ति अकबर को अपनी हाजिरजवाबी से खुश करता है और दरबार में जगह पाता है.कैसे मुल्ला दो प्याजा उसे दरबार में आने से रोकने की आखिरी कोशिश में विफल होते हैं.मुग़ल दरबार का यह दृश्य फ़िल्म में रहना चाहिए था.जोधा और अकबर के बीच के कुछ खास दृश्य भी कटे हैं।
चवन्नी उम्मीद करता है आशुतोष गोवारिकर जोधा अकबर की डीवीडी में ये सारे दृश्य अवश्य डालेंगे.

Friday, May 30, 2008

राम गोपाल वर्मा और सरकार राज

यहाँ प्रस्तुत हैं सरकार राज की कुछ तस्वीरें.इन्हें चवन्नी ने राम गोपाल वर्मा के ब्लॉग से लिया है.जी हाँ,रामू भी ब्लॉग लिखने लगे हैं।
http://rgvarma.spaces.live.com/default.aspx


















Tuesday, May 27, 2008

१२ घंटे पीछे क्यों है ब्लॉगवाणी?

ब्लॉगवाणी में सुधार और परिष्कार हुआ है.कई नई सुविधाएं आ गई हैं.देख कर अच्छा लग रहा है.लेकिन घड़ी क्यों गड़बड़ हो गई है ब्लॉगवाणी की?आज सवेरे १० बज कर ७ मिनट पर चवन्नी ने एगो चुम्मा पोस्ट किया था.जब ब्लॉगवाणी पर जाकर चवन्नी ने देखा तो वहाँ रात का १० बज कर ७ मिनट हो रहा था.तारीख भी कल की थी.ब्लॉगर लोग तो आजकल ब्लोगयुद्ध में लगे हैं,इसलिए शायद किसी धुरंधर ब्लॉगर का ध्यान इधर नहीं गया.चवन्नी की इस हिमाकत को ग़लत न लें आप सभी.जरूरी समझा चवन्नी ने,इसलिए ध्यान दिला रहा है।
अरे ये क्या हो रहा है...पसंद और टिप्पणी दोनों बरस रहे हैं...नहीं,नहीं ...बादल थे ,गरजे और गुजर गए...

Monday, May 26, 2008

सलमान खान का शुक्राना


सलमान खान ने भी ब्लॉग लिखना शुरू कर दिया है.उन्होंने यह ब्लॉग हम सभी की तरह ब्लागस्पाट पर ही आरंभ किया है.इसका नम दस का दम रखा गया है.इसी नाम से सलमान खान सोनी टीवी पर एक शो लेकर आ रहे है.यह उसी से संबंधित है.लोगों को लग सकता है कि दस का दम के प्रचार के लिए इसे शुरू किया गया है.अगर ऐसा है भी तो क्या दिक्कत है?सलमान खान ने अभी तक पाँच पोस्ट डाली है।

आप अवश्य पढ़ें.आप समझ पाएंगे कि सलमान किस मिजाज के व्यक्ति हैं.उनमें एक प्रकार का आलस्यपना है.वह उनके लेखन में झलकता है.खान त्रयी के बाकी दोनों खान आमिर और शाहरुख़ कि तरह उन्हें बतियाने नहीं आता.बहुत कम बोलते हैं और जिंदगी की साधारण चीजों में खुश रहते हैं.सलमान खान ने यहाँ अपने दर्शकों से सीधे बात की है.चवन्नी को तो उनकी बातों रोचक जानकारी मिली है.सलमान खान का कहना है कि अक्ल हर काम को ज़ुल्म बना देती है.यही कारन है कि सलमान खान अक्लमंदी की बातें करने से हिचकते हैं।

सलमान खान का अपना दर्शक समूह है.उनकी फ़िल्म को पहले दिन अवश्य दर्शक मिलते हैं.गौर करें तो उन्होंने बहुत उल्लेखनीय फ़िल्म नहीं की है,फिर भी लोकप्रियता के मामले में वे आगे रहे हैं.सलमान के दर्शकों का समूह अलग है.आप चाहें तो उसे चवन्नी छाप भी कह सकते है।

सलमान से एक बार चवन्नी ने पूछा था कि कभी वे दूसरे सितारों की तरह ऐतिहासिक या पीरियड फ़िल्म क्यों नहीं करते?तो सलमान खान ने छूटते ही कहा ...पागल हुआ हूँ क्या?मुझे एक्टिंग नहीं आती.मैं जैसा हूँ,वही परदे पर दिखाना है तो ठीक है.सलमान खान में गजब का आकर्षण है.परदे पर आते ही मानो किरणें निकलती है,जो आम दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर लेती हैं।
सलमान खान दस का दम को शुक्राना कह रहे हैं.उनका मानना है कि दर्शकों ने पिछले १९ सालों में उन्हें जो प्रेम और स्नेह दिया है,वे उसी का शुक्रिया अदा कर रहे हैं।

Tuesday, May 20, 2008

खप जाती है एक पीढ़ी तब मिलती है कामयाबी

हिंदी फिल्म इंडस्ट्री समेत हर इंडस्ट्री और क्षेत्र में ऐसे उदाहरण मिल जाएंगे। हजारों- लाखों उदाहरण हैं। एक पीढ़ी के खपने और होम होने के बाद ही अगली पीढ़ी कामयाब हो पाई। आजकल मनोवैज्ञानिक और अन्य सभी कहते हैं कि बच्चों पर अपनी इच्छाओं और सपनों का बोझ नहीं लादना चाहिए। लेकिन हम अपने आसपास ऐसे अनेक व्यक्तियों को देख सकते हैं, जिन्होंने अपने माता या पिता के सपनों को साकार किया।

हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में ऐसे कई उदाहरण हैं। हाल ही में 'हाल-ए-दिल' के म्यूजिक रिलीज के समय फिल्म के निर्माता कुमार मंगत मंच पर आए। उन्होंने कहा कि मैं कुछ भी बोलने से घबराता हूं। लेकिन आज मैं खुद को रोक नहीं पा रहा हूं। आज मैं अवश्य बोलूंगा। उन्होंने समय और तारीख का उल्लेख करते हुए बताया कि 1973 में मैं आंखों से सपने लिए मुंबई आया था। इतने सालों के बाद मेरा वह सपना पूरा हो रहा है। मेरी बेटी अमिता पाठक फिल्मों में हीरोइन बन कर आ रही है। अमिता पाठक के पिता कुमार मंगत हैं। लंबे समय तक वे अजय देवगन के मैनेजर रहे। इन दिनों वे बिग स्क्रीन एंटरटेनमेंट के मालिक हैं और कई फिल्मों का निर्माण कर रहे हैं।

आप लोगों को शायद मालूम हो कि अनिल कपूर और बोनी कपूर के पिता सुरेन्द्र कपूर कभी गीता बाली के सचिव थे। बोनी कपूर की फिल्म के आरंभ में सबसे पहले गीता बाली की ही तस्वीर आती है। सुरेन्द्र कपूर सचिव से प्रोड्क्शन में आए और फिर प्रोड्यूसर बन गए। आज उनके बेटे कामयाब हैं। उनकी पोती सोनम कपूर ने कपूर परिवार के वारिस रणवीर कपूर के साथ काम किया।

नरगिस, मीना कुमारी, मधुबाला की मां ने जिंदगी खपा दी अपनी बेटियों का भविष्य संवारने और अपने सपनों को निखारने में। निश्चित ही इस संदर्भ में और भी कई नाम गिनाए जा सकते हैं। संभव है कि कुछ के बारे में आप जानते हों। प्लीज बताएं ... हम उन लोगों को सादर याद करें, जिन्होंने अपनी मेहनत का नतीजा अगली पीढ़ी को दिया। खेत उन्होंने जोते, बीज उन्होंने डाले, फसल उन्होंने बोयी ... और फसल काटी अगली पीढ़ी ने ...

Monday, May 19, 2008

माँ से नहीं मिले खली पहलवान

खली पहलवान भारत आए हुए हैं.आप पूछेंगे चवन्नी को पहलवानी से क्या मतलब? बिल्कुल सही है आप का चौंकना. कहाँ चवन्नी चैप और कहाँ पहलवानी?
चवन्नी को कोई मतलब ही नहीं रहता.मगर खली चवन्नी की दुनिया में आ गए.यहाँ आकर वे राजपाल यादव के साथ फोटो खिंचवाते रहे और फिर रविवार को धीरे से मन्नत में जा घुसे.मन्नत ??? अरे वही शाहरुख़ खान का बंगला.बताया गया की आर्यन और सुहाना खली पहलवान के जबरदस्त प्रशंसक हैं.प्रशंसक तो आप के भी बच्चे हो सकते हैं,लेकिन खली वहाँ कैसे जा सकते हैं।बेचारे खली पहलवान के पास तो इतना समय भी नहीं है कि वे माँ के पास जा सकें.चवन्नी को पता चला है कि खली की माँ ने घर का दरवाजा ८ फीट का करवा दिया है.उसे ४ फीट चौडा भी रखा है,ताकि लंबे-चौड़े हो गए बेटे को घर में घुसने में तकलीफ न हो.वहाँ नए दरवाजे के पास बैठी माँ खली का इंतज़ार कर रही है और यहाँ खली पहलवान शाहरुख़ खान के बेटे-बेटी का मनोरंजन कर रहे हैं।
ऐसा कैसे हो रहा कि ढाई साल के बाद अपने देश लौटा बेटा माँ के लिए समय नहीं निकल पा रहा है.ऐसा भी तो नहीं है कि उसके पास गाड़ी-घोडा नहीं है.उसे तो बस सोचना है और सारा इन्तेजाम हो जायेगा.लगता है खली पहलवान कद-काठी से जितना बड़ा हुआ है,भावनाओं में उतना ही छोटा हो गया है.क्या आप को नहीं लगता कि उसे सबसे पहले अपनी माँ तंदी देवी का दर्शन करना चाहिए था और पिता ज्वाला राम का आशीर्वाद लेना चाहिए था।
हर भारतीय के मन में किसी न किसी रूप में फिल्मों से जुड़ने की दबी इच्छा रहती है.चवन्नी को लगता है कि खली पहलवान भी इसी इच्छा के वशीभूत होकर मुम्बई के चक्कर लगा रहा है.ख़बर मिली है कि उसे एक-दो फिल्में भी मिल गई हैं.

Tuesday, May 6, 2008

कैटरिना और अक्षय की नजदीकियां


यह तस्वीर अक्षय कुमार और कैटरिना कैफ की है.अक्षय कुमार दिल्ली की टीम की हौसलाआफजाई के लिए हमेशा पहुँच जाते हैं.कैटरिना कैफ विजय माल्या की टीम के साथ हैं.पिछले दिनों दोनों एक साथ मैच देख रहे थे.जाहिर सी बात है की दोनों अपनी-अपनी टीम के लिए ही वहाँ रहे होंगे.लेकिन लोगों कि निगाह का क्या कहेंगे?उन्होंने ने कुछ और ही देखा. मैच तो सारे लोग देख रहे थे,लेकिन घरों में टीवी पर मैच देख रहे दर्शक अक्षय और कैटरिना की नजदीकियां देख रहे थे।

चवन्नी की रूचि इन बातों में नहीं रहती कि कौन किस के करीब आया या कौन किस से दूर गया.लेकिन अक्षय-कैटरिना का मामला थोड़ा अलग है.चवन्नी ने शोभा डे के स्तम्भ में पढ़ा.उन्होंने साफ लिखा है कि सलमान को समझ जाना चाहिए कि कैटरिना क्या संकेत दे रही हैं.शोभा मानती हैं कि दोनों की शारीरिक मुद्राओं से ऐसा नहीं लग रहा था कि वे केवल सहयोगी कलाकार हैं.शोभा डे के इस निरीक्षण पर गौर करने की जरूरत हैं.क्योंकि शोभा डे बोलती हैं तो हिन्दी फ़िल्म इंडस्ट्री सुनती है।

सच क्या है?यह तो अक्षय या कैटरिना ही बता सकते हैं...हाँ,कुछ समय तक अब दोनों चर्चा में रहेंगे और इसी बहने उनकी फ़िल्म सिंग इज किंग गर्म हो जायेगी.

Tuesday, April 29, 2008

मलखंभ : मल्लिका और खम्भा

मल्लिका और खम्भा को एक साथ मिला देन तो यही शब्द बनेगा.अगर इस शब्द में किसी को कोई और अर्थ दिख रहा हो तो आगे न पढ़ें।
कमल हसन की फ़िल्म दसावतारम आ रही है.इस फ़िल्म में कमल हसन ने दस भूमिकाएं निभायीं हैं.कमल हसन को रूप बदलने का पुराना शौक है.बहरहाल एक रूप में उनका साथ दे रही हैं मल्लिका शेरावत.मल्लिका शेरावत ने अभिनेत्री के तौर पर भले ही अभी तक कोई सिक्का न जमाया हो,लेकिन उनकी चर्चा होती रहती है.इसी फ़िल्म के मुसिक रिलीज के मौके पर वह चेन्नई में मौजूद थीं और ऐसा कहते हैं की जब खास मेहमान के तौर पर आए जैकी चान से उछारण की गलतियां होने लगीं तो मल्लिका ने उनकी मदद की.आखी वह उनकी फ़िल्म में काम जो कर चुकी हैं.पिछले साल वह गुरु में मैंया मैंया गति नज़र आई थीं.और हाँ हिमेश रेशमिया की फ़िल्म आपका सुरूर में भी दिखी थीं.दोनों ही फिल्मों में उनके आइटम गीत थे.बस...
मल्लिका शेरावत के बारे में आप क्या सोचते हैं और क्या इस मलखंभ के लिए दसावतारम देखने जायेंगे?
और हाँ बिग बी के लिए काफी सवाल आए.कुछ सवालों के जवाब अमिताभ बच्चन ने दिए हैं.जल्दी ही आप उनके जवाब यहाँ पढेंगे.

Monday, April 21, 2008

ब्लॉग पर बेलाग बच्चन

बच्चन यानि बिग बी यानि अमिताभ बच्चन को इस अंदाज में आपने नहीं देखा होगा.आप जरा उनके ब्लॉग पर जाएं और उनकी छींटाकशी देखें। उन्होंने चौथे दिन के ब्लॉग में शत्रुघ्न सिन्हा पर सीधा आरोप लगाया है.पिछले दिनों शत्रु भइया ने अपने अंदाज में कहा कि आईफा के नामांकन की क्या बात करें?वहाँ कोई किसी का बेटा है,कोई किसी कि बहु है और कोई किसी कि बीवी है.उनकी इस टिपण्णी के आशय को समझते हुए बिग बी चुप नहीं रहे.उन्होंने रवीना टंडन को राष्ट्रीय पुरस्कार मिलने के समय के विवाद का जिक्र किया और बताया कि कि कैसे तब कि जूरी में पूनम सिन्हा की सिफारिश पर मैकमोहन को शामिल किया गया था.जो लोग नहीं जानते उनकी जानकारी के लिए चवन्नी बता दे कि शत्रुघ्न सिन्हा कि पत्नी हैं पूनम सिन्हा.बहरहाल,बिग बी के ब्लॉग से लग रहा है कि वे सभी को जवाब देने के मूड में हैं।
उन्होंने एक साल पहले आउटलुक पत्रिका में छपी एक रिपोर्ट में शामिल टिप्पणीकारों को भी नहीं बख्शा है.उन्होंने सुनील गंगोपाध्याय,राजेंद्र यादव,प्रभाष जोशी और परितोष सेन को जो पत्र लिखे थे,उन्हें सार्वजनिक कर दिया है.उन्होंने सभी को चुनौती दी है कि वे अपनी टिप्पणियों को सही ठहराएँ.उन्होंने लोकतांत्रिक और सेकुलर देश में रहने काहवाला देते हुए कहा है कि उन्हें अपने धर्म के पालन का पूरा अधिकार है .एक जगह वे ख़ुद को हिंदू कहते हैं।
बिग बी यानि अमिताभ बच्चन के ब्लॉग को पढ़ना रोचक अनुभव हो सकता है.आप पढ़ें और देखें कि हमारे आइकन कि क्या चिंताएं हैं.वे भी आम ब्लॉगर की तरह पहले अपना गुस्सा जाहिर कर रहे हैं.उन्हें ऐसा लगता है कि मीडिया ने उनके साथ हमेशा अन्याय किया है.इस ब्लॉग के जरिये वे स्सेधे अपने पाठकों और दर्शकों से सम्बन्ध बना रहे हैं।
शिकायत और गुस्से तक ही उनका ब्लॉग सीमित नहीं रहता.वे बेलाग तरीके से विभिन्न मुद्दों पर अपनी राय भी जाहिर करते हैं.पहली बार अमिताभ बच्चन के उदगार पढने को मिल रहे हैं.आप यह भी देखें कि वे कितने व्यस्त हैं,फिर भी अपनी पोस्ट करते हैं.रात के तीन और चार बजे उन्होंने पोस्ट अपडेट किए हैं।
चवन्नी को पूरी उम्मीद है कि इस ब्लॉग के जरिये हम देश के सुपरस्टार अमिताभ बच्चन को करीब से जान पाएंगे.

Monday, March 24, 2008

आमिर खान का माफीनामा

आमिर खान पिछले दिनों टोरंटो में थे.वहाँ पहुँचने के पहले उन्होंने अपने ब्लॉग के जरिये टोरंटो के ब्लॉगर मित्रों को संदेश दिया था कि आप अपना सम्पर्क नम्बर दें.अगर मुझे मौका मिला तो आप में से कुछ मित्रों को बुलाकर मिलूंगा.इस सुंदर मंशा के बावजूद आमिर खान टोरंटो में समय नहीं निकाल सके.उन्होंने टोरंटो के अपने सभी ब्लॉगर मित्रों से माफ़ी मांगी है,लेकिन वादा किया है कि वे भविष्य में अपने ब्लॉगर मित्रों से जरूर मिलेंगे.टोरंटो के एअरपोर्ट से उन्होंने यह पोस्ट डाली है।
गजनी के नए गेटउप में आमिर खान के कान काफी बड़े-बड़े दिख रहे हैं.आमिर खान ने बताया है कि उन्हें बचपन में बड़े कान वाला लड़का कहा जाता था.बचपन में उनका एक नाम बिग इअर्स (big ears) ही पड़ गया था.

Friday, March 21, 2008

गंजे हो गए आमिर खान

अपनी नई फ़िल्म 'गजनी' के लिए आमिर खान को गंजा होना था.कल टोरंटो जाने से पहले अपने आवास पर उन्होंने हेयर स्टाइलिस्ट अवाँ कांट्रेक्टर को घर पर बुलाया।बीवी किरण राव और गीतकार प्रसून जोशी के सामने उन्होंने बाल कटवाए और गजनी के लुक में आ गए.आमिर खान ने अपनी फिल्मों के किरदार के हिसाब से लुक बदलने का रिवाज शुरू किया.गजनी में उन्हें इस लुक में इसलिए रहना है कि सिर पर लगा जख्म दिखाया जा सके.आमिर ने फ़िल्म के निर्देशक मुर्गदोस से अनुमति लेने के बाद ही अपना लुक बदला.ऐसा कहा जा रहा है कि 'गजनी'में मध्यांतर के बाद वे इसी लुक में दिखेंगे.