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Monday, April 21, 2014

मैं अनपेक्षित भंगिमाओं का अभिनेता हूं-राजकुमार राव


-अजय ब्रह्मात्मज
    हाल ही में सफल हुई  ‘क्वीन’ में राजकुमार राव ने विजय की भूमिका में दर्शकों की घृणा हासिल की। उस किरदार की यही खासियत थी। विजय ऐन शादी के मौके पर रानी को रिजेक्ट कर देता है। इस रिजेक्शन से बिसूरने के पश्चात रानी अकेली हनीमून पर निकलती है। वहां से लौटने के बाद वह रानी से क्वीन बन चुकी होती है। राजकुमार राव इन दिनों नासिक में  ‘डॉली की डोली’ की शूटिंग कर रहे हैं। शूटिंग के लिए निकलने से ठीक पहले उन्होंने झंकार से खास बातचीत की।
-  ‘क्वीन’ की कामयाबी के बाद का समय कैसा चल रहा है?
0 पार्टियां चल रही हैं। कभी कंगना की बर्थडे पार्टी तो कभी  ‘क्वीन’ की सक्सेस पार्टी। दोस्तों की छोटी-मोटी पार्टियां बीच-बीच में चलती रहती है। हम सभी बहुत खुश हैं। फिल्म दर्शकों को पसंद आई। फिल्म ने अच्छा बिजनेस किया। ऐसी सफलता से  ‘क्वीन’ जैसी फिल्मों में सभी का विश्वास बढ़ता है।
- इस कामयाबी को आप कितना एंज्वॉय कर सके?
0 मेरे लिए हर कामयाबी क्षणिक होती है। बहुत खुश हूं। इससे जयादा नहीं सोचता हूं। अभी  ‘डॉली की डोली’ पर फोकस आ गया है।
-  ‘क्वीन’ के विजय को आप कैसे देखते हैं?
0 मेरे लिए वह बहुत ही नार्मल और इंपलसिव लडक़ा है। इस दुनिया में विजय जैसे लडक़ों की भरमार है। मैं उसे गलत नहीं मानता। आप गौर करें तो वह विलेन नहीं है। ग्रे शेड है उसका। मैंने उसे विलेन की तरह प्ले नहीं किया। मैं रानी से अपनी बात भर कहता हूं। उसे डांटता नहीं। मुझे नाटकीय नहीं होना था।
-  ‘शाहिद’ से कैसी और कितनी संतुष्टि मिली?
0 बहुत ज्यादा। वह बॉयोपिक फिल्म थी। शाहिद रियल कैरेक्टर था। मैं लालची एक्टर हूं। चाहूंगा कि हर फिल्म में शाहिद जैसा किरदार मिले। शाहिद मेरे लिए एक यादगार मौका रहा। फिल्म को मिली सराहना से हंसल मेहता और मुझे फायदा हुआ।  ‘काय पो छे’,  ‘शाहिद’ और  ‘क्वीन’ ... एक-एक कर आई तीनों फिल्मों ने मुझे संतुष्ट किया है। यह धारणा बनी है कि मैं सही फिल्में चुन रहा हूं।  ‘शाहिद’ के लिए मुझे फिल्मफेअर का क्रिटिक अवार्ड मिला।
- ख्याति,सराहना और पुरस्कारों के बाद अभी कक्या प्राथमिकाएं हैं?
0 अभी मैं अपनी पसंद की फिल्में चुन पा रहा हूं। ढेर सारी स्क्रिप्ट मिलती हैं। उनमें से दमदार किरदार की फिल्में चुनता हूं। कई बार दुविधा होती है, जब एक साथ एक ही समय शूट होने वाली दो फिल्में पसंद आ जाती हैं। एक को छोडऩा पड़ता है।
- स्क्रिप्ट आप सुनते हैं या पढ़ते है?
0 मैं पढऩा पसंद करता हूं। सुनते समय मैं व्यग्र होने लगता हूं। कई बार नैरेशन देने आया व्यक्ति अच्छा पाठ नहीं करता। मुंह बंद कर उबासियां लेनी पड़ती हैं तो कुढऩ होती है। पढ़ते समय अपना किरदार और फिल्म दोनों समझ में आ जाती है। फिर डायरेक्टर से बात-मुलाकात करनी होती है।
- आप प्रशिक्षित एक्टर हैं। प्रशिक्षण का क्या लाभ हुआ?
0 प्रशिक्षण और अनुभव हमेशा उपयोगी रहता है। एक्टिंग का प्रशिक्षण इंजीनियरिंग के लिए आईआईटी जाने जैसा है। आप सध जाते हैं। आत्मविश्वास बढ़ जाता है। मुझे प्रशिक्षण से बहुत लाभ हुआ। एक्टिंग का मतलब सिर्फ 20 लोगों को एक साथ मारना नहीं है या हीरोइन को भगाकर ले जाना भर नहीं है। एक्टिंग अत्यंत आध्यात्मिक प्रक्रिया है।
- सीखा हुआ काम आता है क्या हिंदी फिल्मों के ढांचे में ... 
0 देखना पड़ता है आप कैसी फिल्म कर रहे हैं और किस के साथ काम करे हैं। मैं पारंपरिक तरीके से कुछ भी नहीं करना चाहता हूं। भाव तो वही रहेंगे, लेकिन मेरी प्रतिक्रिया अलग होनी चाहिए। मैं अनपेक्षित भंगिमाओं का अभिनेता हूं। हिंदी फिल्मों में एक्सप्रेशन सीमित होते गए हैं। मैं अपने किरदार को विश्वसनीय रखना चाहता हूं। इसमें सीखा और देखा हुआ काम आता है।
- आपकी आगामी  ‘सिटी लाइट्स’ कैसी फिल्म है?
0 हंसल मेहता के साथ एक और फिल्म  ़ ़ ़ हम दोनों खूब एक्साइटेड हैं। यह ‘मैट्रो मनीला’ का आधिकारिक सीमेक है। हिंदुस्तान के हिसाब से कहानी बदली हुई है। मैं दीपक हूं। राजस्थान के एक गांव से पत्नी के साथ मुंबई आता हूं। यहां आने पर जिन मुसीबतों से जूझता हूं, उसी की कहानी है ‘सिटी लाइट््स’। हम दोनों मुंबई में एडजस्ट करने की कोशिश कर रहे हैं। यह सरवाइवल और होप की फिल्म है।
-  ‘डॉली की डोली’ क्या है?
0 यह फन कॉमेडी फिल्म है। निर्माता अरबाज खान के लिए अभिषेक डोरा इसे निर्देशित कर रहे हैं। सिचुएशनल कॉमेडी है। सोनम कपूर  डॉली की भूमिका में हैं। मैं हरियाणा का जाट सोनू सहरावत हूं। मैं इस फिल्म में कुछ नया कर रहा हूं। डॉली से में अंधा प्यार करता हूं। उसके लिए कुछ भी कर सकता हूं।

Sunday, March 16, 2014

द क्वीन मेकर विकास बहल

चवन्‍नी के पाठकों के लिए रघुवेन्‍द्र सिंह के ब्‍लॉग अक्‍स से साधिकार 
रिस्क लेना विकास बहल की पसंदीदा आदत है और आज उनकी यही क्वालिटी उन्हें फिल्ममेकिंग में लेकर आई है. अपने रोचक सफर को वर्तमान पीढ़ी के यह फिल्मकार रघुवेन्द्र सिंह से साझा कर रहे हैं 
मुंबई शहर की आगोश में आने को अनगिनत लोग तड़पते हैं, मगर यह खुद चंद खुशकिस्मत लोगों को अपनी जमीं पर लाने को मचलता है. विकास बहल ऐसा ही एक रौशन नाम हैं. यह शहर उनके सफर और सपनों का हिस्सा कभी नहीं था, लेकिन आज यह उनकी मंजिल बन चुका है. अनुराग कश्यप, विक्रमादित्य मोटवानी और मधु मंटेना जैसे तीन होनहार दोस्त मिले, तो उन्हें अपने ख्वाबों का एहसास हुआ. यूटीवी जैसे स्थापित कॉरपोरेट हाउस में अनपेक्षित आय वाली नौकरी को छोडक़र उन्होंने इन दोस्तों के साथ मिलकर फैंटम नाम की फिल्म प्रोडक्शन कंपनी की नींव रखी. जिसका लक्ष्य गुणवत्तापूर्ण मनोरंजक फिल्मों का निर्माण करना है. खुशमिजाज, सकारात्मक सोच एवं ऊर्जा से भरपूर विकास ने निर्देशन की ओर पहला कदम बढ़ाया और चिल्लर पार्टी जैसी एक प्यारी-सी फिल्म दर्शकों के बीच आई. अब अपनी दूसरी पिक्चर क्वीन में वह एक ऐसी साहसी लडक़ी की कहानी लेकर आ रहे हैं, जो अकेले हनीमून पर निकल पड़ती है. आइये, विकास बहल के जीवन की मजेदार कहानियां जानते हैं, जिसके हिस्सों को वह किस्सों के रूप में पर्दे पर बारी-बारी से लेकर आ रहे हैं...

मैं मुंबई फिल्म बनाने नहीं आया था. मैं वर्ष 2000 में नौकरी के लिए बैंगलोर गया था. फिर उसी कंपनी (इंडिया.कॉम) ने मेरा ट्रांसफर मुंबई कर दिया. वह कंपनी बंद हो गई. फिर मैंने रेडियो मिर्ची जॉइन किया. वहां मैं मार्केटिंग हेड था. मगर तीन महीने बाद मैंने वह नौकरी छोड़ दी. मुझे काम करने में मजा नहीं आ रहा था. मैंने सोनी जॉइन किया. उस वक्त सोनी ने सब टीवी खरीदा ही था. मैं उसका क्रिएटिव हेड बन गया. जबकि मुझे कुछ नहीं पता था कि टीवी कैसे चलता है. उसके बाद मैंने यूटीवी जॉइन किया. मुझे पता नहीं था कि मुझे फिल्ममेकर बनना है. इस ओर मैं अजय बिजली की वजह से आया. क्योंकि जब मैं सोनी में था, तो वो चाहते थे कि मैं पीवीआर मूवीज जॉइन करूं. उनसे बात चल ही रही थी कि बीच में मैं रॉनी स्क्रूवाला के संपर्क में आया. मैं रॉनी का फैन था. यूटीवी जॉइन करने के बाद मैंने यूटीवी स्पॉटबॉय शुरू किया. अब मुझे पता नहीं था कि पिक्चर बनती कैसे है? पहले हफ्ते मैं कमरे में बैठा रहा. मैं गेम खेलता रहता था. चिल्लर पार्टी मैंने इसलिए लिखनी शुरू की, क्योंकि मेरे पास कुछ काम करने को नहीं था. मैंने तिग्मांशु धूलिया को फोन किया. उनके साथ मैंने सब टीवी के लिए एक शो किया था- मोहल्ला मोहब्बत वाला. वो एक छोटी-सी पर्ची पर पान सिंह तोमर फिल्म लेकर आए. मैंने उनसे कहा कि हम ये पिक्चर बना रहे हैं. उसके दो-तीन बाद मैं राजकुमार गुप्ता से मिला. मैंने आमिर की कहानी सुनी. मैंने उनसे भी कहा कि हम ये फिल्म बना रहे हैं. एक दिन मैं राजकुमार के साथ बैठे था, तो अनुराग कश्यप आ गए. उन्होंने देव डी सुनाई. मैंने कहा कि हम ये फिल्म बना रहे हैं. अब मुझे नहीं पता था कि फिल्म कितने में बनती है. तो मैं सीख-सीख कर यहां तक आया हूं.
                                                    कंगना रनौत और विकास बहल
मुझे रिस्क लेने और एक्सपेरिमेंट करने में मजा आता है. और इसी प्रक्रिया में मुझे यह एहसास हुआ कि मुझे लिखना, डायरेक्शन और प्रोडक्शन आता है. लेकिन एक समय आया, जब मुझे लगा कि मैं अपनी ही टीम को नहीं समझा पा रहा था कि मैं गैंग्स ऑफ वासेपुर क्यों बनाना चाह रहा हूं. तब मैंने तय किया कि अब मुझे किसी को समझाने की जरूरत नहीं है. मुझे जो करना है, वह बस करना है. मैंने यूटीवी छोड़ दिया. मुझे लगा कि अब नहीं कर सकूंगा, तो कभी नहीं कर सकूंगा. क्योंकि मैं आर्थिक रूप से सिक्योर होता जाता, मेरी रिस्क लेने की आदत जाती रहती. जब मैंने नौकरी छोड़ी, तो मेरे पिता (हरिश्चन्द्र बहल) ने मुझसे बात करनी बंद कर दी. उनको लगा कि ये गलत फैसला है. लेकिन मैं अपनी जिंदगी अपने तरीके से जीना चाहता था. उस वक्त मेरी पत्नी ऋचा (विकास-ऋचा की लव मैरिज हुई है. ऋचा एक इंटिरियर डिजाइनर हैं) ने बहुत सर्पोट किया. उन्होंने मुझसे तब बस एक बात कही थी कि अगर हमारे कुत्ते का खाना आता रहेगा, तो बाकी सब ठीक है. ऋचा रॉकस्टार हैं.

मेरी मम्मी (उमा बहल) का एक छोटा-सा सपना था, जिसके बारे में उन्होंने मुझे बहुत साल बाद बताया कि वह लाइब्रेरियन बनना चाहती थीं. लेकिन घर, परिवार, बच्चों के चक्कर में वह नहीं बन पाईं. और वह अपनी जिंदगी में बहुत खुश हैं. मगर उनके जीवन में एक और रास्ता खुला होता, तो उन्होंने जीवन में क्या-क्या किया होता. क्वीन फिल्म का विचार मम्मी की वजह से मेरे मन में आया है. लेकिन क्वीन फिल्म में परिस्थितियां ऐसी बनती हैं कि हमें क्वीन का दूसरा पहलू देखने को मिलता है. क्वीन अपनी कहानी की हीरो है और मुझे हीरो की कहानियां बहुत पसंद हैं. क्वीन मेरे लिए कालिया बनाने की तरह है. इसमें केवल अमिताभ बच्चन की जगह कंगना हैं. क्वीन का सिर्फ पॉइंट ऑफ कॉनफ्लिक्ट अलग है. पिछली पिक्चर चिल्लर पार्टी में बच्चों का एक छोटा-सा मुद्दा था. लेकिन जो मुद्दा हमारे लिए छोटा था, वो बच्चों के लिए बड़ा था. मैं अनकंवेन्शनल हीरो से बहुत जल्दी प्रभावित हो जाता हूं. और यही बात चिल्लर पार्टी और क्वीन की दुनिया में कॉमन बात है. कुछ लोगों ने कहा कि क्वीन के लिए कंगना रनौट क्यों? मेरे खयाल से कंगना इस तरह की लड़कियों से परिचित हैं. वह जानती हैं कि अंडर कॉन्फिडेंस लड़कियां किस तरह की होती हैं. अगर मैंने किसी दूसरी एक्ट्रेस को इस किरदार के लिए चुना होता, तो उसे क्वीन को समझने के लिए एक आम घर और कॉलेज में जाना पड़ता. कंगना से बेहतर क्वीन को कोई नहीं निभा सकता था.   
          दोस्तों की टोली विक्रमादित्य मोटवानी, अनुराग कश्यप, मधु मंटेना और विकास बहल जब मैं क्वीन लिख रहा था, तब लोगों को समझाना मेरे लिए बहुत मुश्किल हो रहा था. मेरे लिए लाइफ फनी है. मैं ह्यïूमर बहुत अजीब जगहों में पाता हूं. तो वही फिल्म में आ गया, लेकिन वो बताना मुश्किल था. विक्रम मल्होत्रा ने इस स्क्रिप्ट को ग्रीन लाइट किया था. तब तक किसी को समझ में नहीं आ रहा था कि हम बनाना क्या चाहते हैं. मैं बहुत सारे स्टूडियोज के पास गया था. लेकिन किसी को मेरी स्क्रिप्ट समझ में नहीं आ रही थी. दरअसल, प्रोडक्शन हाउसेज को सीधे मार्केटिंग के आइडियाज चाहिए होते हैं. उनको कोई कॉनफ्लिक्ट या स्कैंडल चाहिए. इस फिल्म में ऐसा कुछ भी नहीं था. यह सच है कि बहुत-सी अच्छी फिल्में कॉरपोरेट को समझ में नहीं आती हैं, क्योंकि स्क्रिप्ट रिडिंग एक आर्ट है. यह जन्मजात होती है. आप इसे सीख नहीं सकते. हालांकि कॉरेपोरेट में कुछ अच्छे लोग भी हैं. अब कुछ कॉरपोरेट ऐसे हैैं, जो साल में 8 फिल्में बनाते हैं. अब 8 फिल्में बनाने के लिए वह कम से कम 50 रिजेक्ट करेंगे. मतलब कि पचास लोग सडक़ पर घूम रहे हैं, जिनकी फिल्म नहीं बनी और वो कॉरपोरेट को गाली दे रहे हैं. मैं भी उन पचास लोगों में से एक था, जो सडक़ पर गाली दे रहे थे. मगर हमें समझना होगा कि यह एक नई इंडस्ट्री है. कॉरपोरेट में काम करने वाले लोग अलग-अलग इंडस्ट्री से आए हैं. वो सीख रहे हैं. और फिल्ममेकिंग एक जर्नी है, लेकिन स्टूडियोज सोचते हैं कि जब वह ग्रीन लाइट देते हैं, तब वह जर्नी वहीं खत्म हो जाती है. उनको उसके पहले की एक निर्देशक की दो साल की जर्नी को समझना होगा.

जब मैं पहले दिन क्वीन शूट कर रहा था, तो मुझे नीतेश तिवारी (चिल्लर पार्टी के सह-निर्देशक) की बहुत याद आई, क्योंकि नीतेश और मैंने बाय चांस चिल्लर पार्टी साथ में लिखी और डायरेक्ट की थी. हमने कभी बैठकर यह तय नहीं किया था कि वह क्या कर रहा है और मैं क्या कर रहा हूं. किसी को क्रेडिट की नहीं पड़ी थी. मैं थोड़ा रेस्टलेस था, तो मैं मॉनीटर पर नहीं बैठता था, मैं बच्चों के साथ रहता था. नीतेश मॉनीटर के सामने बैठता था. कुछ दिन बाद हमें लगा कि अच्छा है कि दो लोग हैं, वरना ये दस बच्चे और एक कुत्ता अकेले नहीं संभलता. जब मैं क्वीन की शूटिंग करने गया, तो एक-दो दिन तो मुझे पता नहीं था कि कैमरा किधर रखना है. मैंने जाने से पहले अनुराग से बात की कि मैं जा तो रहा हूं, लेकिन ये बताओ कि फिल्म बनाते कैसे हैं? उसने बोला कि तुझे स्टोरी पता है ना, कैमरा रख और शूट कर. मुझे तीन-चार दिन लगे रिद्म आने में और फिर मैं सहज हो गया. मैंने यही समझा है कि अगर आपने अच्छा होमवर्क किया है, आपकी टीम अच्छी है और आपमें ईगो नहीं है, तो फिल्ममेकिंग आसान है. क्वीन की शूटिंग के 45 दिन, मेरी जिंदगी के सबसे अच्छे दिन थे.  

मेरे समकक्ष पसंदीदा फिल्मकार

राजकुमार हिरानी
वह जिंदगी को खूबसूरती से देखते हैं. उनका नजरिया मेरे जीवन के प्रति अप्रोच से मिलता-जुलता है. हमारी फिल्म चिल्लर पार्टी उनकी वजह से रिलीज हुई. उन्होंने वह फिल्म देखी और कहा कि अब यह मेरी पिक्चर है. वहां से सबको उस फिल्म में विश्वास आना शुरू हुआ. वह चिल्लर पार्टी से निर्माता के तौर पर जुडऩा चाहते थे.

अनुराग कश्यप
अनुराग फिल्ममेकिंग के मामले में इंडिया को एक अलग लेवल पर ले जाएंगे. वह जानते हैं कि एक फिल्म को कैसे दुनिया भर में पहुंचाया जा सकता है. विश्व स्तर पर उन्हें जो पहचान मिल रही है, वह उसके हकदार हैं. क्योंकि उनकी कहानियां आउट्रेजियस होती हैं, तो लोग सोचते हैं कि वह गैर-जिम्मेदार हैं. 

विक्रमादित्य मोटवानी
वह फिल्म इंडस्ट्री में इस वक्त बेस्ट क्राफ्टमैन हैं. कोई अन्य नहीं है, जो उनके जितना फिल्म के हर डिपार्टमेंट को समझता है. वह कमाल के स्टोरीटेलर हैं. वह जिस खूबसूरती के साथ कहानी को बयां करते हैं, उनकी वह कला अतुलनीय है.

विकास बहल के बारे में तीन रोचक तथ्य
-कॉलेज के दिनों में उन्होंने मंडल कमीशन के विरूद्ध काफी धरने दिए थे और मोर्चे निकाले थे. वह आत्मदाह जैसा कदम न उठा लें, इस डर से उनके पिता ने उन्हें दो दिन तक कमरे में बंद कर दिया था.
-जेब खर्च के लिए वह दिल्ली में मेडिकल कॉन्फ्रेंस में अशरिंग का काम किया करते थे. दिवाली में स्टॉल लगाते थे और कृष्ण जन्माष्टमी के दौरान अपनी मंडली बनाकर पैसा इकट्ठा करते थे.
-उन्होंने एमबीए में गोल्ड मेडल हासिल किया है. इस बात का उन्हें अब तक ताज्जुब होता है.

Friday, March 7, 2014

फिल्‍म समीक्षा : क्‍वीन

   जिंदगी की रसधार में डूबी 
-अजय ब्रह्मात्‍मज 
विकास बहल की 'क्वीन' देखते समय एहसास हुआ कि अपने देश में लड़कियां डकार नहीं लेतीं। बचपन से परिवार और समाज की हिदायतों में पलने की वजह से उन्हें ख्याल ही नहीं आता कि डकार भी लिया जा सकता है। पेरिस में विजयलक्ष्मी की डकार पर पर्दे पर चौंकी दिल्ली के राजौरी गार्डन की रानी उर्फ क्वीन की तरह मैं भी चौंक गया था। मेरी विस्मय अलग था कि मुझे यह मामूली स्थिति मालूम नहीं थी। 'क्वीन' एक लड़की के तितली बनने की कहानी है। पंख निकलते ही वह दुनिया से दो-चार होती है। खुद को समझती और फुदकती है।
दिल्ली की पृष्ठभूमि पर आ रही फिल्मों में शादी एक बड़ा जश्न होता है। इस फिल्म की शुरुआत भी मेंहदी से होती है। चाशनी में डूबी स्वीट रानी की शादी होने वाली है। ढींगड़ा अंकल का बेटा विजय उससे प्रेम करता है। फ्लैशबैक में हम देखते हैं कि वह कैसे रानी पर डोरे डालता है। उसे क्वीन नाम देता है। शादी की रजामंदी के बाद वह लंदन चला जाता है। लंदन से वह शादी के लिए लौटता है तो उसे अपनी रानी पिछड़ी और साधारण लगती है, जिंस पर कुर्ती पहनने वाली दिल्ली के मिडिल क्लास की आम लड़की। लंदन प्रवास में वह ग्लोबल मॉडर्न युवक हो गया है। शादी की नियत तारीख के दो दिन पहले विजय शादी तोड़ देता है। रानी इस झटके को बर्दाश्त नहीं कर पाती, वह एकांत और उपवास में चली जाती है। ऐसे पल में उसकी दादी सलाह देती है, वह दुखी न हो। अपने जीवन के साक्ष्य से वह रानी को वर्तमान और यथार्थ से लड़ने के लिए तैयार करती है। हम देखते हैं कि भूखी रानी पास में पड़े डब्बे से लड्डू निकाल कर गटक लेती है। अभी तक मां, पिता, भाई, सहेली और प्रेमी के साथ पली रानी का अगला फैसला होता है कि वह अकेले ही हनीमून पर जाएगी। उसने पेरिस और एम्सटर्डम जाने का सोच रखा था। घर वाले भी दिल रखने के लिए उसे जाने की इजाजत दे देते हैं।
रानी राजौरी गार्डन के अपने घर से निकलती है तो फिर निकल ही जाती है। पहले पेरिस और फिर एम्सटर्डम में उसका सामना जिन व्यक्तियों, स्थितियों और दिक्कतों से होता है, वे उसका विस्तार करते चले जाते हैं। रुढि़यों और धारणाओं की मैल उतरती चली जाती है। मन से स्वच्छ होते ही उसका पसमंजर बदल जाता है। वह सोच, विचार पहनावे और दृष्टिकोण में बदलती जाती है। रानी के व्यक्तित्व के रूपांतरण को लेखक-निर्देशक ने सहज और स्वाभाविक रखा है। दिल्ली से गई रानी और दिल्ली लौटी रानी की छवि और बॉडी लैंग्वेज को अलग-बगल में रखकर देखें तो यह परिवर्तन साफ नजर आएगा।
हिंदी फिल्मों में नायिका प्रधान, नारी स्वतंत्रता और औरतों की अभिव्यक्ति की फिल्मों में शोषण और दमन की पृष्ठभूमि रहती है। औरतें बिलखती, चीखती और छाती पीटती रहती है। विकास बहल की 'क्वीन' हिंदी फिल्मों की नारी प्रधान फिल्मों की किसी परंपरा का पालन नहीं करती। यह रानी के खुलने और खिलने की कहानी को एक व्यापक परिप्रेक्ष्य में पेश करती है। रानी चीखती नहीं है, सीखती है। अनजाने में हुआ एक्सपोजर उसे बंधनमुक्त कर देता है। फिल्म की कथाभूमि हमारे आसपास की है। रानी मध्यवर्गीय परिवारों की आम लड़की है, जो पंख लगते ही उड़ने को बेताब है। 'क्वीन' हिंदी सिनेमा के पर्दे पर लड़की की स्वच्छंद उड़ान है। वह किसी वाद, सोच और नारे से प्रभावित नहीं है।
कंगना रनौत ने रानी के किरदार को बखूबी पेश किया है। अगर चरित्र और कलाकार के स्वभाव में हल्की सी भी समानता हो तो पर्दे पर किरदार निखर जाता है। कंगना रनौत की 'फैशन' में यही हुआ था। 'क्वीन' में कंगना ने फिर से नैसर्गिक प्रतिभा का परिचय दिया है। उन्होंने रानी के कायांतरण के हर चरण को पूरे प्रभाव से परफॉर्म किया है। उनकी भाव मुद्राएं, संवाद अदायगी और संवादों के शब्द भी किताबी नहीं हैं। निश्चित ही संवादों में कंगना की निजी शब्दावली और एक्सप्रेशन हैं। विजयलक्ष्मी की भूमिका में लीजा हेडेन ने रुढि़मुक्त स्वच्छंद लड़की को फूहड़ और अश्लील नहीं होने दिया है। रानी के व्यक्तित्व व उसकी तब्दीली में उसकी संजीदा भूमिका है। एम्सटर्डम में मिले रानी के रूममेट की भूमिकाओं में आए तीनों कलाकारों ने कथ्य के प्रभाव को बढ़ा दिया है। और राजकुमार राव हमेशा की तरह अपने किरदार के मिजाज में रहते हैं। वे मिले हुए दृश्यों में रानी पर हावी होने की कोई कोशिश नहीं करते।
इस फिल्म का गीत-संगीत भी उल्लेखनीय है। अमित त्रिवेदी के संगीत और अन्विता दत्त के गीतों में रानी की आजादी की चपलता है। गीतों का चयन और फिल्मांकन खूबसूरत है। कहीं भी वह थोपा हुआ नहीं लगता।
'क्वीन' की रानी पर ममता कालिया की ये पंक्तियां सटीक हैं-अपनी मर्जी आप जिएंगे, जीवन का रसधार पिएंगे, कलश उठाकर ओक लगाकर, नहीं चाहिए हमें कृपाएं, करछुल-करछुल चम्मच..चम्मच।
अवधि- 146 मिनट
****  चार स्‍टार