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Thursday, October 29, 2015

‘दिलवाले’ में वरुण धवन


-अजय ब्रह्मात्‍मज
       इस साल 18 दिसंबर को रिलीज हो रही दिलवाले वरुण धवन की 2015 की तीसरी फिल्‍म होगी। इस साल फरवरी में उनकी बदलापुर और जून में एबीसीडी 2 रिलीज हो चुकी हैं। दिलवाले उनकी छठी फिल्‍म होगी। स्‍टूडेंट ऑफ द ईयर के तीन कलाकारों में वरूण धवन बाकी दोनों आलिया भट्ट और सिद्ार्थ मल्‍होत्रा से एक फिल्‍म आगे हो जाएंगे। अभी तीनों पांच-पांच फिल्‍मों से संख्‍या में बराबर हैं,लेकिन कामयाबी के लिहाज से वरुण धवन अधिक भरोसेमंद अभिनेता के तौर पर उभरे हैं।
    वरुण धवन फिलहाल हैदराबाद में रोहित शेट्टी की फिल्‍म दिलवाले की शूटिंग कर रहे हैं। इस फिल्‍म में वे शाह रुख खान के छोटे भाई बने हैं। उनके साथ कृति सैनन हैं। इन दिनों दोनों के बीच खूब छन रही है। पिछले साठ दिनों से तो वे हैदराबाद में ही हैं। आउटडोर में ऐसी नजदीकी होना स्‍वाभाविक है। यह फिल्‍म के लिए भी अच्‍छा रहता है, क्‍योंकि पर्दे पर कंफर्ट और केमिस्‍ट्री दिखाई पड़ती है। हैदराबाद में फिल्‍म के फुटेज देखने को मिले,उसमें दोनों के बीच के तालमेल से भी यह जाहिर हुआ।
    कृति सैनन और वरुण धवन की जोड़ी में एक ही समस्‍या रही। कृति थोड़ी लंबी हैं। उनके साथ के दृश्‍यों में वरुण धवन के लिए पाटला लगाया जाता था। पाटला मचिया या स्‍टूल की तरह का एक फर्नीचर होता है। शूटिंग में इसके अनेक उपयोगों में से एक उपयोग कलाकारों का कद बढ़ाना भी है। अब अगर दिलवाले में कद में छोटे वरुण धवन अगर कृति से लंगे या बराबर दिखें तो याद कर लीजिएगा कि उनके पांव के नीचे पाटला होगा। अस फिल्‍म के शाह रुख खान और काजोल भी लंबाई में कृति से छोटे हैं। वे भी कृति के साथ के दृश्‍यों में सावधान रहे। वैसे,फिल्‍म में कृति के लिए लंबी लड़की संबोधन का इस्‍तेमाल किया गया है।
    वरुण धवन इस फिल्‍म में शाह रुख खान के बेवकूफ छोटे भाई हैं,जिनकी वजह से मुसीबत आती रहती है। दिलवाले में वरुण धवन के दोस्‍त बने हैं वरुण शर्मा। सेट पर सब उन्‍हें चू चा ही कहते हैं। दोनों की दोस्‍ती उस जमाने की फिल्‍मों की याद दिलाएगी,जब हीरो के साथ एक कॉमेडियन चिपका रहता था। उसकी वजह से फिल्‍म में पैरेलल कॉमेडी ट्रैक चलता रहता था। वरुण धवन को अपने हमउम्र वरुण शर्मा के साथ सीन करने में इसलिए भी मजा आया कि दोनों ने मिल कर सीन इम्‍प्रूवाइज करते थे। रोहित ने उन्‍हें कभी-कभी खुली छूट दी। वरुण मानते हैं कि वरुण शर्मा और कृति सैनन ने रियल लाइफ एक्‍सपीरिएंस से फिल्‍म को एनरिच किया है। वे बेहिचक स्‍वीकार करते हें कि मुंबई में फिल्‍म इंडस्‍ट्री की परवरिश की वजह से रियल लाइफ का उनका एक्‍सपोजर कम है।
    वरुण धवन दिलवाले में शाह रुख के साथ काम कर बेहद खुश हैं। वे इसे किसी अचीवमेंट से कम नहीं मानते। वे कहते हें, फिल्‍म आने पर दर्शक खुद ही देख लेंगे। मेरे लिए तो इस फिल्‍म की शूटिंग ही यादगार एक्‍सपीरिएंस रही। मैंने उनसे बहुत कुछ सीखा। सबसे बड़ी सीख्‍ तो यह रही कि आप जिस सेट या लोकेशन पर शूट कर रहे हें,उसे अच्‍छी तर‍ह फील करें। उसे महसूस करें। उसकी मौजूदगी को अपने अंदर उतार लें। मेरे खयाल में इस से सेट और लोकेशन से रिश्‍ता बन जाता है। मैंने देखा है कि शाह रुख खान बगैर बताए हुए शूट से पहले अपने सेट पर घूमते हैं। एक-एक चीज को छूते हैं। इस स्‍पर्श से उनसे आत्‍मीय रिश्‍ता बन जाता है। मुझे लगता है कि इस प्रक्रिया में सेट की सही जानकारी भी मिल जाती है। स्‍पेस के साथ यह भी पता चल जाता है कि कौन सी चीज कैसी है ? अब अगर दीवार ईंट की है तो आप उस पर झटके के साथ टिक सकते हैं। वही दीचार प्‍लायवुड की है तो अलग ढंग से भार डालना होगा।
    वरुण धवन को दिलवाले में रोहित शेट्टी के निर्देशन में एक्‍शन और कॉमेडी के नए गुर मिले।
   
     

Friday, May 23, 2014

फिल्‍म समीक्षा : हीरोपंथी / हिरोपंती

सिर्फ और सिर्फ टाइगर श्रॉफ 
-अजय ब्रह्मात्‍मज 
जैकी श्रॉफ के बेटे टाइगर श्रॉफ को केंद्र में रख कर बनी निर्माता साजिद नाडियाडवाला की साबिर खान निर्देशित 'हीरोपंती' का एक ही मकसद है सिर्फ और सिर्फ टाइगर श्रॉफ की खूबियों को दिखाना। इन दिनों हिंदी फिल्मों में हीरो के परफॉर्मेस को जांचने-परखने का तरीका एक्शन और डांस रह गया है। ड्रामा और इमोशन के दृश्य उन्हें कम से कम दिए जाते हैं। 'हीरोपंती' में टाइगर श्रॉफ अपनी मचलती मांसपेशियों और चुस्त देहयष्टि के साथ मौजूद हैं। डांस सिक्वेंस में भी उनकी चपलता आकर्षित करती है। कमी है तो सिर्फ एक्टिंग में, संवाद अदायगी में स्पष्टता नहीं है और हर इमोशन में चेहरे का भाव एक सा ही बना रहता है। बतौर अभिनेता टाइगर को अभी काफी मेहनत करनी होगी।
'हीरोपंती' अंतर्निहित कमियों और खूबियों के साथ एंटरटेन करती है, क्योंकि लंबे समय के बाद पर्दे पर दिख रहे हीरो के स्टंट में विश्वसनीयता है। एक्शन के सभी दृश्यों में टाइगर श्रॉफ के आत्मविश्वास और दक्षता की झलक है। एक्शन डायरेक्टर ने इन दृश्यों को हैरतअंगेज नहीं रखा है। इसी प्रकार गानों के फिल्मांकन में टाइगर श्रॉफ के नृत्य कौशल का सही उपयोग किया गया है। डांस में वे रितिक रोशन की तरह सिद्ध हैं। एक्टिंग के मामले में एक प्रकाश राज के अलावा टाइगर श्रॉफ के इर्द-गिर्द कोई अनुभवी कलाकार नहीं है, इसलिए ज्यादा ध्यान नहीं जाता।
इस फिल्म की बड़ी कमी लेखन है। हरियाणा और दिल्ली के आसपास के जाट बहुत इलाके की पृष्ठभूमि में एक ऐसे चौधरी परिवार की कहानी चुनी गई है, जहां प्रेम स्त्रियों के लिए ही नहीं पुरुषों के लिए भी वर्जित है। ऐसे माहौल में शादी के मंडप से चौधरी की बड़ी बेटी अपने प्रेमी के साथ भाग जाती है। चौधरी बेटी की तलाश में बेटी के प्रेमी के दोस्तों को बंदी बना लेता है। उनमें से एक बबलू भी है। जब लोग उससे कहते हैं कि वह हीरोपंती क्यों करता है तो उसका जवाब होता है-'सब को आती नहीं, मेरी जाती नहीं।' पूरी फिल्म में यह संवाद बार-बार दोहराया जाता है। अगर फिल्म के नायक के किरदार और उसके मिजाज एवं रवैए को देखें तो स्पष्ट हो जाएगा कि हीरोपंती का मतलब निर्भीक और संतुलित व्यवहार है। फिल्म का नायक किसी प्रकार की उच्छृंखलता नहीं दिखाता। वह प्रेमिका के पिता से हमदर्दी रखता है।
फिल्म बाप-बेटी के संबंध और बेटी के भाग जाने से अपमानित हुए पिता की व्यथा और दर्द को भी व्यक्त करती है। विस्तार से रखे गए इस भाव के दृश्य हास्यास्पद भी हो गए हैं। प्रकाश राज अपनी प्रतिभा से इन दृश्यों को संभालने में असफल रहते हैं। फिल्म की नायिका कृति सैनन सुंदर और आकर्षक है, लेकिन अभिनय के मामले में वह संतुष्ट नहीं करतीं। छोटी भूमिकाओं में आए कलाकार सीमित दृश्यों में भी अपनी छाप छोड़ जाते हैं।
फिल्म में भाषा के प्रति लापरवाही है। जाट बहुत इलाके के प्रचलित शब्दों के बजाए हिंदी फिल्मों के प्रचलित शब्दों और मुहावरों का इस्तेमाल किया गया है। प्रकाश राज 'ढूंढा' को 'धूंधा' बोलते है। चौधरी की बड़ी बेटी के प्रेमी का नाम कभी राकेश तो कभी राजेश हो जाता है। इनके साथ फिल्म के टायटल के हिंदी उच्चारण और वर्तनी पर भी ध्यान नहीं दिया गया है। यह 'हीरोपंती' के बजाय 'हीरोपंथी' होना चाहिए था। अफसोस की अंग्रेजी का दोष हिंदी में भी लिप्यतंरित हो रहा है।
अवधि: 146 मिनट
**1/2