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Friday, June 9, 2017

फिल्‍म समीक्षा : राब्‍ता



फिल्‍म रिव्‍यू
मिल गए बिछुड़े प्रेमी
राब्‍ता
-अजय ब्रह्मात्‍मज

दिनेश विजन की राब्‍ता के साथ सबसे बड़ी दिक्‍क्‍त हिंदी फिल्‍मों का वाजिब-गैरवाजिब असर है। फिल्‍मों के दृश्‍यों,संवादों और प्रसंगों में हिंदी फिल्‍मों के आजमाए सूत्र दोहराए गए हैं। फिल्‍म के अंत में करण अर्जुन का रेफरेंस उसकी अति है। कहीं न कहीं यह करण जौहर स्‍कूल का गलत प्रभाव है। उनकी फिल्‍मों में दक्षता के साथ इस्‍तेमाल होने पर भी वह खटकता है। राब्‍ता में अनेक हिस्‍सों में फिल्‍मी रेफरेंस चिपका दिए गए हैं। फिल्‍म की दूसरी बड़ी दिक्‍कत पिछले जन्‍म की दुनिया है। पिछले जन्‍म की भाषा,संस्‍कार,किरदार  और व्‍यवहार स्‍पष्‍ट नहीं है। मुख्‍य रूप से चार किरदारों पर टिकी यह दुनिया वास्‍तव में समय,प्रतिभा और धन का दुरुपयोग है। निर्माता जब निर्देशक बनते हैं तो फिल्‍म के बजाए करतब दिखाने में उनसे ऐसी गलतियां हो जाती हैं। निर्माता की ऐसी आसक्ति पर कोई सवाल नहीं करता। पूरी टीम उसकी इच्‍छा पूरी करने में लग जाते हैं। राब्‍ता पिछली दुनिया में लौटने की उबासी से पहले 21 वीं सदी की युवकों की अनोखी प्रेमकहानी है।
फिल्‍म का वर्तमान नया है। हिंदी फिल्‍मों के प्रेमी समय के साथ बदलते रहे हैं। ये मिलेनियल युवा हैं। सदी करवट बदल रही थी तो वे बड़े हो रहे थे। सोशल मीडिया और ग्‍लोबल एक्‍सपोजर ने आज के युवा के लिए रिलेशनशिप और इश्‍क के उनके मायने और संदर्भ बदल दिए हैं। अब प्रेमी एकनिष्‍ठ नहीं होते। और न ही फिजिकल रिलेशन ज्‍यादा महत्‍व रखता है। इसी फिल्‍म में दोनों(शिव और सायरा) पहले से रिलेशनशिप में हैं,लेकिन उन्‍हें नए संबंध बनाने और सहवास में दिक्‍कत नहीं होती। ठीक है कि वे भारत में नहीं हैं,लेकिन जब पर्दे पर हिंदी बोलते परिचित कलाकार ऐसे नए व्‍यवहारों में नजर आते हैं तो देश के गांव-कस्‍बों के दर्शक भी प्रभावित होती है। उनकी सोच बदलती है। इस लिहाज से यह फिल्‍म उल्‍लेखनीय है। इसमें भारत के ग्‍लोबल युवा हैं,जो इमोशन में भले ही फायनली लोकल(फिल्‍मी) हो जाएं लेकिन एक्‍सप्रेशन में वे बदल चुके हैं। यहां कृति सैनन और सुशांत सिंह राजपूत दोनों की तारीफ करनी होगी कि उन्‍होंने बेहिचक सायरा और शिव के किरदारों को निभाया है। उनके बीच की केमिस्‍ट्री पर्दे पर दिखती है। अभी के आर्टिस्‍ट युगल दृश्‍यों में सचमुच करीबी और बेपरवाह दिखते हैं।
दिलफेंक और मनचला मध्‍यवर्गीय शिव पंजाब से बुदापेस्‍ट पहुंच जाता है। वहां उसे बैंक में नौकरी मिली है। विदेश की अपनी पोस्टिंग को वह विदेशी लड़कियों को पटाने,फंसाने और सोने का मौका मानता है।  वह स्त्रियों को मोहने में माहिर है। यहां तक कि यादों की केंचुल में कसमसाती और बाहरी दुनिया से एक दूरी निभाती सायरा भी उसकी चपेट में आ जाती है। उन्‍हें बाद में पता चलता है कि उनके बीच कोई राब्‍ता है। हमें तो पहले से मालूम है कि वे पिछले जन्‍म में बिछुड़ गए थे। इस जन्‍म में उनके मिलन को नाटकीय और रोमांचक बनाया जा सकता था,लेकिन लेखकों के पास हिंदी फिल्‍मों के दिए प्रसंग ही थे। उन्‍होंने वर्तमान के क्‍लाइमेक्‍स पर कुछ नया नहीं किया। यही कारण है कि प्रेम की नवीनता फिल्‍म के दूसरे भाग में आकर पुरानी लकीर पकड़ लेती है। हमारा इंटरेस्‍ट नहीं बना रहता।
इस फिल्‍म के खलनायक जिम सरभ विचित्र कलाकार हैं। उनमें एक आकर्षण तो है लेकिन दोनों हाथों से की गई उनकी एक्टिंग विस्मित करती है। राजकुमार राव पिछले जन्‍म के किरदार के रूप में भारी मेकअप और लुक चेंज के साथ अपनी जिम्‍मेदारी निभा ले जाते हैं। वे अपने संवादों में बार-बार इश्‍क के लिए आग का दरिया की मिसाल देते हैं,लगता है मिर्जा गालिब ने उनसे उधार लेकर ही कहा होगा...
ये इश्क़ नहीं आसाँ इतना ही समझ लीजे
इक आग का दरिया है और डूब के जाना है
दीपिका पादुकोण के दीवाने इस फिल्‍म में उनके डांस आयटम के लिए जा सकते हैं। उन्‍हें मादक रूप और सेक्‍सी स्‍टेप्‍स दिए गए हैं।
अवधि 154 मिनट
**1/2 ढाई स्‍टार     

Saturday, June 3, 2017

रब के बनाए रिश्‍ते हैं राब्‍ता - दिनेश विजन



दिनेश विजन
-अजय ब्रह्मात्‍मज

दिनेश विजन पहले निर्माता बने और फिर उन्‍होंने निर्देशक की कमान संभली। उनके निर्देशन सुशांत सिंह राजपूत और कृति सैनन अभिनीत राब्‍ता अगले हफ्ते रिलीज होगी। दिनेश विजन ने इस बातचीत में अपनी पसंद और यात्रा के बारे में बातें कीं।-क्‍या शुरू से ही निर्देशन में आने का इरादा था?
0 मुझे तो यह भी मालूम नहीं था कि मैा फिल्‍में बनाऊंगा। 20साल की उम्र में अपने बहनोई के साथ एक ऐड फिल्‍म के शूट पर गया था। तब यह विचित्र दुनिया मुझे अच्‍छी लगी थी। वह आकर्षण तक ही रहा। मुझे बचपन से किस्‍से सुनाने का शौक रहा है। मैंने अपने पिता से कहा भी था कि मुझे फिल्‍म और टीवी के लिए  काम करना है। उन्‍होंने फिल्‍म इंडस्‍ट्री में आकर बर्बाद हुए अनेक लोगों के बारे में सुन रखा था। उन्‍होने साफ शब्‍दों में कहा कि आप एमबीए करोगे।उनके इस आदेश का एक फायदा हुआ कि मुझे बिजनेस की समझ हो गई। पिताजी चाहते थे कि मैं उनके बिजनेस को आगे बढ़ाऊं। मैाने होमी अदजानिया केसाथ मिल कर एक कंपनी बनाई। होमी ने बीइंग साइरस की कहानी सुनाई थी। हम ने वह फिल्‍म अंग्रेजी में बना दी। उसके बाद भी पिताजी ने कहा कि अपनी कैंकिंग की नौकरी में वापस जाओ। बहरहाल,राब्‍ता का हीरो एक बैंकर है।
-मतलब वह दिनेश विजन है?
0 नहीं,फिर भी जब आप किरदार रचते हैं तो उसमें आप की झलक आ ही जाती है। हर किरदार के साथ ऐसा होता है।-खैर,आप ने सैफ अली खान के साथ कंपनी बनाई और फिल्‍म निर्माण में एक्टिव हो गए?
0 बीइंग साइरस के समय ही सैफ से मुलाकात हुई थी। हमारी अच्‍छी दोस्‍ती हो गई तो साथ में फिल्‍में बनाने की योजना बनी। हम दोनों ने लव आज कल बनाई। उसके बाद सब कुछ खुद ही आगे बढ़ता गया। मैाने प्रोउ्यूसर का जॉब सीख लिया।-क्‍या करना पड़ता है प्रोड्यसर को...पैसे निवेश करने के अलावा?
0हाहा..सबसे महत्‍वपूर्ण है कि वह अपनी टीम के बंदों को समझे और उन्‍हें संभाले। आखिरी फायदा तो उसी का होता है। डासयरेक्‍टर और एक्‍टर संवेदनशील प्राणि होते हैं। उन्‍हे समझना पड़ता है। सिर्फ पैसों से फिल्‍में नहीं बनतीं। मैं पैसों केलिए फिल्‍में नहीं बनाता और न पैसे बचाता हूं। मुझे फिल्‍में बनाना संतुष्टि देता है। मुझे 13 साल हो गए।
-और अब निर्देशन में आ गए हैं।
0 रब के बनाए रिश्‍ते को राब्‍ता कहते हैं। जो रिश्‍ते हमारी समझ में नहीं आते,लेकिन जिनका एहसास गहरा होता है उसे राब्‍ता कह सकते हैं। पहली बार में ही सुशांत और कृति की केमिस्‍ट्री देख कर मैं दंग रह गया। सुशांत तो पहले से तय थे। बाद में कृति भी फायनल हो गईं।और फिर जिम आ गया। वह वाइल्‍ड एक्‍टर है। उसे संभालना पड़ता है। जिम सभी की नजर में आएगा। निर्देशन के पहले मैंने अलग से फिल्‍में बनाईं। सैफ के साथ इलुमिनाती कंपनी है। उसमें सैफ के इर्द-गिर्द ही फिल्‍में बनानी थीं। कुछ फिल्‍में मैडॉक के तहत बनीं,क्‍योंकि मैं दूसरे एक्‍टर के साथ भी कुछ करना चाहता था।
-कैसा अनुभव रहा फिल्‍मों से जुड़ने का?
0 अच्‍छा रहा। शुरू में स्‍ट्रेस था। पिताजी चाहते थे कि मैं  किसी तकलीफ में ना फंसूं। हमेशा यही कहते रहे कि रात में सही नींद आनी चाहिए। मतलब यह था कि कोई गलत काम नहीं करना। मैंने हर तरह की फिल्‍में बना लीं। बहुत जरूरी है कि हम जिंदगी जिएं,सिर्फ गुजारें नहीं। आगे मेरी कोशिशरहेगी कि हर फिल्‍म से दर्शक कुछ लेकर जाएं और हम भी कुछ सीखें। इस लिहाज से हिंदी मीडियम का अनुभव बहुत अच्‍छा रहा। हिंदी और अंग्रेजी के फर्क का दबाव मैंने खुद महसूस किया है। अंग्रेजी खराब होने से कैसे कोई बंदा खराब हो जाएगा।- राब्‍ता में एक और कहानी है...
0 वह फिक्‍शनल है। कोई खास पीरियड या डायनेस्‍टी नहीं है। हम ने रिसर्च किया और और एक काल्‍पनिक कहानी बुनी। वह हिस्‍सा सिर्फ 25 मिनट का है।
बाक्‍स:सुशांत- बहुत मेहनती और एकाग्रचित्‍त एक्‍टर है। उसे सिर्फ अपने काम की लगी रहती है। निर्देशक की सोच को समझ लेता और बेहतर प्रदर्शन करता है। अपनी लगन से वह किसी भी ऊंचाई तक जा सकता है। वह प्रतिभाशाली भी है। शार्प है। भाषा पर अच्‍छी पकड़ है उसकी।कृति- कृति ने मेहनत की है। उसे खुद नहीं मालूम था कि वह कितनी जबरदस्‍त एक्‍टर है। अपने किरदार की ढाई महीने की तैयारी के बाद वह आई तो उसने सभी को चौंका दिया। सभी श्‍ंकालु थे कि पता नहीं सुशांत को मैच कर पाएगी या नहीं? वह पर्देपर बहुत सुंदर दिखती है।

Tuesday, May 23, 2017

फर्क है बस नजरिए का - कृति सैनन



कृति सैनन
-अजय ब्रह्मात्‍मज
- कृति सैनन के लिए राब्‍ता क्‍या है? फिल्‍म और शब्‍द...
0 शब्‍द की बात करूं तो कभी-कभी किसी से पहली बार मिलने पर भी पहली बार की भेंट नहीं लगती। लगता है कि पहले भी मिल चुके हैं। कोई संबंध हे,जो समझ में नहीं आता... मेरे लिए यही राब्‍ता है। मेरा मेरी पेट(पालतू) के साथ कोई राब्‍ता है। फिल्‍म मेरे लिए बहुत खास है। अभी यह तीसरी फिल्‍म है। पहली फिल्‍म में तो सब समझ ही रही थी। मार्क,कैमरा आदि। दिलवाले में बहुत कुछ सीखा,लेकिन इतने कलाकारों के बीच में परफार्म करने का ज्‍यादा स्‍पेस नहीं मिला। इसकी स्‍टोरी सुनते ही मेरे साथ रह गई थी। एक कनेक्‍शन महसूस हुआ। मुझे दो कैरेक्‍टर निभाने को मिले-सायरा और सायबा। दोनों की दुनिया बहुत अलग है।
-दोनों किरदारों के बारे में बताएं?
0 दोनों किरदार मुझ से बहुत अलग हैं। इस फिल्‍म में गर्ल नेक्‍स्‍ट डोर के रोल में नहीं हूं। सायरा को बुरे सपने आते हें। उसके मां-बाप बचपन में एक एक्‍सीडेंट में मर गए थे। वह बुदापेस्‍ट में अकेली रहती है। चॉकलेट शॉप चलाती है। उसे पानी से डर लगता है। वह बोलती कुछ है,लेकिन सोचती कुछ और है। फिर भी आप उससे प्‍यार करेंगे। सायबा के लिए कोई रेफरेंस नहीं था। मैं वैसी किसी लड़की को नहीं जानती थी। उसका कोई स्‍पष्‍ट समय नहीं है। वह बहादुर राजकुमारी है। झट से कुछ भी कर बैठती है। घुड़सवारी और शिकार करती है।
- बुदापेस्‍ट की सायरा और दिल्‍ली-मुंबई की कृति में कितना फर्क है?
0 उसकी तरह मैं भी जल्‍दी से फैसले नहीं ले पाती। मैं आउटस्‍पोकेन और फ्रेंडली हूं। मेरे कई दोस्‍त हैं। सायरा  बंद-बंद रहती है। वह लोगों को अपने पास आने देती है,लेकिन एक दूरी रखती है। शिव से मिलने के बाद उसमें परिवर्तन आता है। मेरा निजी जीवन बहुत सुरक्षित रहा है। मैंने सायरा की तरह स्‍ट्रगल नहीं किया है।
- क्‍या हर शहर की लड़कियां अलग होती हैं?
0 दिल्‍ली और मुंबई की लड़कियों में ज्‍यादा फर्क नहीं है। दूसरे देशों की लड़कियों की जीवन शैली और स्‍टायल अलग होती है। उनका सही-गलत का नजरिया भी अलग होता है। हमें कई बातें असहज लगती हैं। उन्‍हें इनसे फर्क नहीं पड़ता। संबंधों के मामले में हमारी सोच में अंतर रहता है। संस्‍कृति के भेद से ही यह भसेद आता होगा शायद।
-सुशांत सिंह राजपूत के साथ कैसा अनुभव रहा?
0 इस फिल्‍म से पहले मैं सुशांत को बिल्‍कुल नहीं जानती थी। मैंने उन्‍हें कभी हाय भी नहीं बोला था। पहली बार दिनेश के ऑफिस में मिला था तो यही इंप्रेशन था कि अच्‍छा एक्‍टर है। एक्‍टर के तौर पर मेरा अनुभव कम है तो डर था कि कोई दिक्‍कत न हो। यह भी लगा कि मेहनत के साथ अच्‍छी एक्टिंग करनी पड़ेगी। उस मीटिंग में एक सीन करते समय हमारी फ्रिक्‍वेंसी मिल गई थी। उसके बाद फिल्‍म की तैयारी में हमारी नजदीकी बढ़ी। हमारा कंफर्ट बढ़ा। एक्टिंग का हमारा प्रोसेस अलग है। सुशांत इंस्‍पायरिंग हैं। बुदापेस्‍ट पहुंचने तक हम एक-दूसरे को अच्‍छी तरह समझ गए थे। काम करने में बहुत मजा आया।
-खुश हो आप?
0 मैं बहुत खुश हूं। पिछले साल मेरी कोई फिल्‍म रिलीज नहीं हुई। फिर भी लगातार तैयारी की वजह से ऐसा नहीं लगा कि खाली हूं। इस फिल्‍म को लेकर एक संतोष है। फिल्‍म के दूसरे युग में हमलोगों ने जो प्रयास किया है,वह सभी को अच्‍छा लगेगा।
-किस की तरह याद किया जाना पसंद करेंगी?
0 माधुरी दीक्षित की तरह। वह मेरी फेवरिट हैं। बचपन में मैं उनके गानों पर ही डांस किया करती थी। अंखियां मिलाऊं,कभी अंखियां चुराऊं मेरा सबसे प्रिय गाना था। वह इतनी खूबसूरत और एक्‍सप्रसिव हैं। वह गाने की पंक्तियों में एक्‍सप्रेशन दे देती हैं। वह फेस से डांस करती थीं। वह स्‍क्रीन पर आती हैं तो स्‍क्रीन अलाइव हो जाता है। मैं जैसे उन्‍हें याद कर रही हूं,चाहूंगी कि वैसे ही कोई मुझे याद करे।

Tuesday, May 16, 2017

सात सवाल : कृति सैनन



कृति सैनन
-अजय ब्रह्मात्‍मज
सात सवाल
-यहां आने से पहले हिंदी फिल्‍मों के प्रति क्‍या परसेप्‍शन था?
0 बिल्‍कुल आम दर्शकों की तरह ही मेरा परसेप्‍शन था। मीडिया के जरिए जो पढ़ती और सुनती थी,वही जानती थी। इसका ग्‍लैमर आकर्षित करता था। लगता था कि स्‍टारों के लिए सब मजेदार और आसान होगा। बस,डांस करना है।
-परसेप्‍शन क्‍या बदला?
0 आने के बाद पता चला कि बहुत मेहनत है। फिल्‍म इंडस्‍ट्री के हर डिपार्टमेंट में काम करनेवालों के लिए रेसपेक्‍ट बढ़ गई है। एक छोटे से सीन के लिए भी सौ चीजें सोचनी पड़ती हैं। कई बार दर्शक उन पर ध्‍यान भी नहीं देते,लेकिन वही सिंक में न हो तो खटकेगा।
- कहते हैं यह टीमवर्क है?
0 बिल्‍कुल। हर डिपार्टमेंट मिल कर ही फिल्‍म पूरी करता है। फिल्‍मों में काम करने के बाद ही यह सब पता चला। मुझे लगता है कि क्रिटिक और दर्शकों को भी सभी के काम पर गौर करना चाहिए।
- हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री की क्‍या खासियत है?
0 विविधता है। हर तरह की प्रतिभाएं हैं। फिल्‍मों के विषयों की विविधता तो गजब की है। मैं देखती हूं कि अलग-अलग कारणों से सभी जुड़े हैं। एक बात समान है कि सभी को मेहनत करनी पड़ती है।
- हम कैसे अलग हैं?
0 कल्‍चर बहुत महत्‍वपूर्ण है। हमारे देसी भारतीय इमोशन अलहदा हैं। उनके बगैर हमें मजा नहीं आता1 म्‍यूजिक खास है हमारा। हमें फिल्‍म की कहानी याद रहे ना रहे...गाने याद रह जाते हैं। हम गीत-संगीत से कितनी बातें कह जाते हैं।
- फिल्‍म में दिख रहा समाज और वास्‍तविक समाज में कोई फर्क है क्‍या?
0 दोनों समाजों की दूरी धीरे-धीरे कम हो रही है। पहले के किरदार फिल्‍मी होते थे। अभी के किरदार रियल होते हैं। दर्शक भी सच के करीब की फिल्‍में देखना पसंद करने लगे हैं। दर्शकों को रियल के साथ मनोरंजन भी चाहिए।
- आप की सबसे फेवरिट फिल्‍म कौन सी है?
0 हम आप के हैं कौन मैं अनगिनत बार देख चुकी हूं। 

Thursday, October 29, 2015

‘दिलवाले’ में वरुण धवन


-अजय ब्रह्मात्‍मज
       इस साल 18 दिसंबर को रिलीज हो रही दिलवाले वरुण धवन की 2015 की तीसरी फिल्‍म होगी। इस साल फरवरी में उनकी बदलापुर और जून में एबीसीडी 2 रिलीज हो चुकी हैं। दिलवाले उनकी छठी फिल्‍म होगी। स्‍टूडेंट ऑफ द ईयर के तीन कलाकारों में वरूण धवन बाकी दोनों आलिया भट्ट और सिद्ार्थ मल्‍होत्रा से एक फिल्‍म आगे हो जाएंगे। अभी तीनों पांच-पांच फिल्‍मों से संख्‍या में बराबर हैं,लेकिन कामयाबी के लिहाज से वरुण धवन अधिक भरोसेमंद अभिनेता के तौर पर उभरे हैं।
    वरुण धवन फिलहाल हैदराबाद में रोहित शेट्टी की फिल्‍म दिलवाले की शूटिंग कर रहे हैं। इस फिल्‍म में वे शाह रुख खान के छोटे भाई बने हैं। उनके साथ कृति सैनन हैं। इन दिनों दोनों के बीच खूब छन रही है। पिछले साठ दिनों से तो वे हैदराबाद में ही हैं। आउटडोर में ऐसी नजदीकी होना स्‍वाभाविक है। यह फिल्‍म के लिए भी अच्‍छा रहता है, क्‍योंकि पर्दे पर कंफर्ट और केमिस्‍ट्री दिखाई पड़ती है। हैदराबाद में फिल्‍म के फुटेज देखने को मिले,उसमें दोनों के बीच के तालमेल से भी यह जाहिर हुआ।
    कृति सैनन और वरुण धवन की जोड़ी में एक ही समस्‍या रही। कृति थोड़ी लंबी हैं। उनके साथ के दृश्‍यों में वरुण धवन के लिए पाटला लगाया जाता था। पाटला मचिया या स्‍टूल की तरह का एक फर्नीचर होता है। शूटिंग में इसके अनेक उपयोगों में से एक उपयोग कलाकारों का कद बढ़ाना भी है। अब अगर दिलवाले में कद में छोटे वरुण धवन अगर कृति से लंगे या बराबर दिखें तो याद कर लीजिएगा कि उनके पांव के नीचे पाटला होगा। अस फिल्‍म के शाह रुख खान और काजोल भी लंबाई में कृति से छोटे हैं। वे भी कृति के साथ के दृश्‍यों में सावधान रहे। वैसे,फिल्‍म में कृति के लिए लंबी लड़की संबोधन का इस्‍तेमाल किया गया है।
    वरुण धवन इस फिल्‍म में शाह रुख खान के बेवकूफ छोटे भाई हैं,जिनकी वजह से मुसीबत आती रहती है। दिलवाले में वरुण धवन के दोस्‍त बने हैं वरुण शर्मा। सेट पर सब उन्‍हें चू चा ही कहते हैं। दोनों की दोस्‍ती उस जमाने की फिल्‍मों की याद दिलाएगी,जब हीरो के साथ एक कॉमेडियन चिपका रहता था। उसकी वजह से फिल्‍म में पैरेलल कॉमेडी ट्रैक चलता रहता था। वरुण धवन को अपने हमउम्र वरुण शर्मा के साथ सीन करने में इसलिए भी मजा आया कि दोनों ने मिल कर सीन इम्‍प्रूवाइज करते थे। रोहित ने उन्‍हें कभी-कभी खुली छूट दी। वरुण मानते हैं कि वरुण शर्मा और कृति सैनन ने रियल लाइफ एक्‍सपीरिएंस से फिल्‍म को एनरिच किया है। वे बेहिचक स्‍वीकार करते हें कि मुंबई में फिल्‍म इंडस्‍ट्री की परवरिश की वजह से रियल लाइफ का उनका एक्‍सपोजर कम है।
    वरुण धवन दिलवाले में शाह रुख के साथ काम कर बेहद खुश हैं। वे इसे किसी अचीवमेंट से कम नहीं मानते। वे कहते हें, फिल्‍म आने पर दर्शक खुद ही देख लेंगे। मेरे लिए तो इस फिल्‍म की शूटिंग ही यादगार एक्‍सपीरिएंस रही। मैंने उनसे बहुत कुछ सीखा। सबसे बड़ी सीख्‍ तो यह रही कि आप जिस सेट या लोकेशन पर शूट कर रहे हें,उसे अच्‍छी तर‍ह फील करें। उसे महसूस करें। उसकी मौजूदगी को अपने अंदर उतार लें। मेरे खयाल में इस से सेट और लोकेशन से रिश्‍ता बन जाता है। मैंने देखा है कि शाह रुख खान बगैर बताए हुए शूट से पहले अपने सेट पर घूमते हैं। एक-एक चीज को छूते हैं। इस स्‍पर्श से उनसे आत्‍मीय रिश्‍ता बन जाता है। मुझे लगता है कि इस प्रक्रिया में सेट की सही जानकारी भी मिल जाती है। स्‍पेस के साथ यह भी पता चल जाता है कि कौन सी चीज कैसी है ? अब अगर दीवार ईंट की है तो आप उस पर झटके के साथ टिक सकते हैं। वही दीचार प्‍लायवुड की है तो अलग ढंग से भार डालना होगा।
    वरुण धवन को दिलवाले में रोहित शेट्टी के निर्देशन में एक्‍शन और कॉमेडी के नए गुर मिले।
   
     

Friday, May 23, 2014

फिल्‍म समीक्षा : हीरोपंथी / हिरोपंती

सिर्फ और सिर्फ टाइगर श्रॉफ 
-अजय ब्रह्मात्‍मज 
जैकी श्रॉफ के बेटे टाइगर श्रॉफ को केंद्र में रख कर बनी निर्माता साजिद नाडियाडवाला की साबिर खान निर्देशित 'हीरोपंती' का एक ही मकसद है सिर्फ और सिर्फ टाइगर श्रॉफ की खूबियों को दिखाना। इन दिनों हिंदी फिल्मों में हीरो के परफॉर्मेस को जांचने-परखने का तरीका एक्शन और डांस रह गया है। ड्रामा और इमोशन के दृश्य उन्हें कम से कम दिए जाते हैं। 'हीरोपंती' में टाइगर श्रॉफ अपनी मचलती मांसपेशियों और चुस्त देहयष्टि के साथ मौजूद हैं। डांस सिक्वेंस में भी उनकी चपलता आकर्षित करती है। कमी है तो सिर्फ एक्टिंग में, संवाद अदायगी में स्पष्टता नहीं है और हर इमोशन में चेहरे का भाव एक सा ही बना रहता है। बतौर अभिनेता टाइगर को अभी काफी मेहनत करनी होगी।
'हीरोपंती' अंतर्निहित कमियों और खूबियों के साथ एंटरटेन करती है, क्योंकि लंबे समय के बाद पर्दे पर दिख रहे हीरो के स्टंट में विश्वसनीयता है। एक्शन के सभी दृश्यों में टाइगर श्रॉफ के आत्मविश्वास और दक्षता की झलक है। एक्शन डायरेक्टर ने इन दृश्यों को हैरतअंगेज नहीं रखा है। इसी प्रकार गानों के फिल्मांकन में टाइगर श्रॉफ के नृत्य कौशल का सही उपयोग किया गया है। डांस में वे रितिक रोशन की तरह सिद्ध हैं। एक्टिंग के मामले में एक प्रकाश राज के अलावा टाइगर श्रॉफ के इर्द-गिर्द कोई अनुभवी कलाकार नहीं है, इसलिए ज्यादा ध्यान नहीं जाता।
इस फिल्म की बड़ी कमी लेखन है। हरियाणा और दिल्ली के आसपास के जाट बहुत इलाके की पृष्ठभूमि में एक ऐसे चौधरी परिवार की कहानी चुनी गई है, जहां प्रेम स्त्रियों के लिए ही नहीं पुरुषों के लिए भी वर्जित है। ऐसे माहौल में शादी के मंडप से चौधरी की बड़ी बेटी अपने प्रेमी के साथ भाग जाती है। चौधरी बेटी की तलाश में बेटी के प्रेमी के दोस्तों को बंदी बना लेता है। उनमें से एक बबलू भी है। जब लोग उससे कहते हैं कि वह हीरोपंती क्यों करता है तो उसका जवाब होता है-'सब को आती नहीं, मेरी जाती नहीं।' पूरी फिल्म में यह संवाद बार-बार दोहराया जाता है। अगर फिल्म के नायक के किरदार और उसके मिजाज एवं रवैए को देखें तो स्पष्ट हो जाएगा कि हीरोपंती का मतलब निर्भीक और संतुलित व्यवहार है। फिल्म का नायक किसी प्रकार की उच्छृंखलता नहीं दिखाता। वह प्रेमिका के पिता से हमदर्दी रखता है।
फिल्म बाप-बेटी के संबंध और बेटी के भाग जाने से अपमानित हुए पिता की व्यथा और दर्द को भी व्यक्त करती है। विस्तार से रखे गए इस भाव के दृश्य हास्यास्पद भी हो गए हैं। प्रकाश राज अपनी प्रतिभा से इन दृश्यों को संभालने में असफल रहते हैं। फिल्म की नायिका कृति सैनन सुंदर और आकर्षक है, लेकिन अभिनय के मामले में वह संतुष्ट नहीं करतीं। छोटी भूमिकाओं में आए कलाकार सीमित दृश्यों में भी अपनी छाप छोड़ जाते हैं।
फिल्म में भाषा के प्रति लापरवाही है। जाट बहुत इलाके के प्रचलित शब्दों के बजाए हिंदी फिल्मों के प्रचलित शब्दों और मुहावरों का इस्तेमाल किया गया है। प्रकाश राज 'ढूंढा' को 'धूंधा' बोलते है। चौधरी की बड़ी बेटी के प्रेमी का नाम कभी राकेश तो कभी राजेश हो जाता है। इनके साथ फिल्म के टायटल के हिंदी उच्चारण और वर्तनी पर भी ध्यान नहीं दिया गया है। यह 'हीरोपंती' के बजाय 'हीरोपंथी' होना चाहिए था। अफसोस की अंग्रेजी का दोष हिंदी में भी लिप्यतंरित हो रहा है।
अवधि: 146 मिनट
**1/2