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Tuesday, December 25, 2018

सिनेमालोक : कार्तिक आर्यन

सिनेमालोक
कार्तिक आर्यन
-अजय ब्रह्मात्मज
इस महीने के हर मंगलवार को 2018 के ऐसे अचीवर को यह कॉलम समर्पित होगा,जो हिंदी फिल्मों में बहार से आए.जिन्होंने अपनी मेहनत और प्रतिभा के दम पर पहचान हासिल की.2018 में आई उनकी फिल्मों ने उन्हें खास मुकाम दिया.
दस महीने पहले 23 फ़रवरी को ‘सोनू के टीटू की स्वीटी’ रिलीज हुई थी. लव रंजन की इसी फिल्म के शीर्षक से ही प्रॉब्लम थी. कुछ को यह टंग ट्विस्टर लग रहा था तो अधिकांश का यही कहना था कि यह भी कोई नाम हुआ? फिल्म रिलीज हुई और सभी को पसंद आई. इस तरह के विषय की फिल्मों पर रीझ रहे दर्शक टूट पड़े तो वहीँ खीझ रहे समीक्षक इसे दरकिनार नहीं कर सके.समीक्षकों ने फिल्म के विषय की स्वाभाविक आलोचना की, लेकिन उसके मनोरंजक प्रभाव को स्वीकार किया.नतीजा यह हुआ कि खरामा-खरामा यह फिल्म 100 करोड़ के क्लब में पहुंची. फिल्म के कलाकारों में सोनू यानि कार्तिक आर्यन को शुद्ध लाभ हुआ. छह सालों से अभिनय की दुनिया में ठोस ज़मीन तलाश रहे कार्तिक आर्यन को देखते ही देखते दर्शकों और फिल्म इंडस्ट्री ने कंधे पर बिठा लिया. उन्हें फ़िल्में मिलीं,एनडोर्समेंट मिले और कार्तिक ग्लैमर वर्ल्ड के इवेंट में चमकने लगे.
22 नवम्बर 1990 को ग्वालियर के डॉक्टर दंपति के परिवार में जन्मे और पीला-बढे कार्तिक मुंबई तो आये थे इंजीनियरिंग की पढाई करने,लेकिन मन के कोने में सपना फिल्मों में एक्टिंग का था.पढाई के दौरान सपनों को पंख लगे और कार्तिक ने अभिनय के आकाश की तलाश जारी रखी. नए कलाकार फिल्म इंडस्ट्री के ताऊ-तरीकों से नावाकिफ होते हैं. सही हिम्मत और पूरा जज्बा न हो तो सपनों को चकनाचूर करने के रोड़े रास्तों में पड़े मिलते हैं.कार्तिक ने खुद ही राह बनायीं.दिक्कत का एहसास हुआ तो तैयारी की और प्रयास करते रहे. आख़िरकार 2011 में उन्हें लव रंजन की ‘प्यार का पंचनामा’ मिली.इस फिल्म में रजत का किरदार दर्शकों के ध्यान में आया.वह उन्हें याद रहा.पहली फिल्म के नए एक्टर के लिए इतना बहुत होता है.इस फिल्म में उनके लम्बे संवाद और उसकी अदायगी ने सभी को प्रभावित किया. कार्तिक के साथ ऐसा चल रहा है.उनकी फ़िल्में अपने विषय की वजह से आलोचित होती हैं,लेकिन उनका किरदार प्रशंसित होता है.कार्तिक की नयी फ़िल्में इस विरोधाभास को कम करें तो उनकी लोकप्रियता और स्वीकृति तेज़ी से बढ़ेगी.
पहली फिल्म की सफलता और चर्चा के बावजूद दूसरी फिल्म ‘आकाशवाणी’ दर्शकों ने पसंद नहीं की. अगले साल ई सुभाष घई की ‘कांची’ कब रिलीज होकर चली गयी? किसी को पता ही नहीं चला. इं दोनों फिल्मों की असफलता से कार्तिक के करियर में विराम आया.निराशा नज़दीक पहुंची.इस छोटे अंतराल में बेचैन होने के बावजूद कार्तिक ने बेसब्री में गलत फ़िल्में नहीं चुनीं.वक़्त गुजरता रहा और कार्तिक सही फिल्म के इंतजार में रहे.फिर से लव रंज आये और उन्होंने ‘प्यार का पंचनामा 2’ में कार्तिक आर्यन को अंशुल का किरदार दिया.इस फिल्म में फिर से उनके एकल संवाद की तारीफ हुई.बतौर एक्टर भी उनमें आत्मविश्वास और परफॉरमेंस की रवानी दिखी.बीच में आई ‘गेस्ट इन लंदन’ हलकी रही,लेकिन ‘सोनू के टीटू की स्वीटी’ ने परिदृश्य ही बदल दिया.
पिछले 10 महीनों में कार्तिक लगातार चौंका रहे हैं.वे सुर्ख़ियों में बने हुए हैं.उनकी फिल्मों की घोशनाएँ हो रही है.सही या गलत यह खबर भी फैल रही कि उन्होंने कौन सी फिल्म छोड़ दी.करीना कपूर के साथ रैंप वाक तो चर्चा में आये. उस इवेंट की तस्वीरों में कार्तिक का कॉन्फिडेंस देखते ही बनता है.यूँ लगता है की कार्तिक लगातार खुद को मंज रहे हैं और अभी से बड़ी चमक और खनक के लिए खुद को तैयार कर रहे हैं.कार्तिक की एक अघोषित खूबी है.ग्वालियर की पृष्ठभूमि और परिवार से उन्हें हिंदी मिली है.हिंदी के उच्चारण और अदायगी में अपने समकालीनों से बहुत आगे हैं.उनके एकल संवाद प्रमाण हैं कि हिंदी पर उनकी जबरदस्त पकड़ है.
कार्तिक की ‘लुका छुपी’ की शूटिंग पूरी हो चुकी है. इसमें वह कार्तिक आर्यन के साथ हैं.’किंक पार्टी’ में वह जैक्लिन फ़र्नांडिस के साथ नज़र आयेंगे. इम्तियाज़ अली की ‘लव आजकल 2’ में सारा अली खान के साथ उनकी जोड़ी बनेगी. 2018 ने कार्तिक के सपनों को ऊंची उड़ान दी है.


Friday, February 23, 2018

फिल्‍म समीक्षा : सोनू के टीटू की स्‍वीटी



फिल्‍म समीक्षा : सोनू के टीटू की स्‍वीटी
-अजय ब्रह्मात्‍मज
हिंदी फिल्‍मों में निर्देशक और अभिनेता की जोड़ी ने कमाल किए हैं। परस्‍पर भरोसे से कुछ बेहतरीन फिल्‍में आई हैं। लव रंजन और कार्तिक आर्यन की जोड़ी ने ‘प्‍यार का पंचनामा’(1-2),आकाशवाणी और अब ‘सोनू के टीटू की स्‍वीटी’ जैसी फिल्‍में दी हैं। इन फिल्‍मों को क्‍लासिक के दर्जे में नहीं डाल सकते,लेकिन ये कल्‍ट ब्रांड की फिल्‍में हैं। अकेले लव रंजन ही ऐसी फिल्‍में बना रहे हैं। दरअसल,इस तरह की फिल्‍मों के लिए बात और स्‍वभाव में देसी होना जरूरी है। अगर आप अपने समय और समाज में पगे होंगे,तभी ऐसी फिल्‍में लेकर आ सकते हैं। इन फिल्‍मों में कोई बड़ी बात नही कही गई है। रोजमर्रा की बातों का ही ऐसे नजरिए और एटीट्यूड के साथ पेश किया गया है कि किरदारों में आज के युवक दिखते हैं। लव रंजन की फिल्‍में मुख्‍य रूप से लड़कों के नजरिए से पेश की जाती हैं। उनकी लड़कियां कतई कमजोर नहीं होतीं,लेकिन लड़कों के ज्‍यादा दृश्‍यों और प्रसंगों की वजह से दरकिनार होती नजर आती हैं। गौर करें तो लव रंजन के किरदार शहरी और महानगरीय दिखते हैं,लेकिन उनकी मानसिकता उत्‍तर भारत के कस्‍बाई किरदारों की होती है। अपनी फिल्‍मों को रोचक और मनोरंज‍क बनाने के लिए लव रंजन  कॉस्‍मोपोलिटन युक्तियां जुटान में आगे रहते हैं। ‘सोनू के टीटू की स्‍वीटी’ ही देखें तो पाएंगे कि इसमें करण जौहर के रसीले कारनामे भी मौजूद हैं। फिर भी यह देसी पेशकश है। छोटे शहरों के युवा समूह के संबंधों की कशमकश है।
शहरों में ऐसी दोस्‍ती नहीं होती। सेनू और टीटू नर्सरी के दोस्‍त हैं। 13 की उम्र में मां के निधन के बाद सोनू टीअू के परिवार का हिस्‍सा हो गया है। कह सकते हैं कि दोनों जुड़वां भाइयों की ही तरह हैं। टीटू का परिवार और उसके परिजन ही सोनू के सगे हैं। सोनू थोड़ा व्‍यवहारिक है। वह टीटू की उलझनें कम करता है। खास कर प्रेम संबंधों में टीटू को चोट और ठोकरों से बचता है। प्रेम में असफल रहने के बाद टीटू अरेंज मैरिज करने के नलए तैयार हो जाता है। उसे स्‍वीटी पसंद आ जाती है। स्‍वीटी परफेक्‍ट,उदार और हंसमुख लड़की है। चंद मुलाकातों में ही वह टीटू समेत उसके परिजनों का दिल जीत लेती है। स्‍वीटी की यह जल्‍दीबाजी ही सोनू को अखर जाती है। उसे संदेह होता है। वह टीटू और शेष परिवार के सामने यह सवाल रखता है कि भला कोई लड़की ऐसी हो सकती है? कुछ दृश्‍यों के बाद सेनू और स्‍वीटी परस्‍पर नापसंदगी जाहिर हो जाती है। इन दोनों के बीच फंसा टीटू दोस्‍ती और लड़की के बीच पेंड़ुलम सा डोलता रहता है।
किरदारों के बीच के रिश्‍तों में कुछ व्‍यवहार सहज लगते हैं,लेकिन दादा घसीटा से टीटू और सोनू के रिश्‍ते का खुलापन स्‍वाभाविक नहीं लगता। क्‍या मेरठ जैसे शहर में दाद और पोते के बीच लड़की,शराब और अन्‍य मर्दाना हंसी-मजाक चलते हैं? लेखक-निर्देशक ने यह अतिछूट ली है। शादी के पहले टीटू के झार में स्‍वीटी का रातें बिताना भी सामान्‍य नहीं है। दृश्‍यों की जरूरत के किसाब से कभी यह परिवार संयुक्‍त हो जाता है। कभी सोनू और टीटू का हो जाता है। तो कभी दादा और उनके दोस्‍त सरीखे साले का...बहरहाल,सोनू,टीटू और स्‍वीटी के बीच एक त्रिकोण बनता है। यह समद्विबाहु त्रिकोण है,जिसका आधार टीटू है। सोनू और स्‍वीटी के बीच की लड़ाई वास्‍तव में स्‍पेस की लड़ाई है। कस्‍बाई दोस्तियों में किसी एक की शादी होने पर दोस्‍त को इस संकट से गुजरना पड़ता है। पत्‍नी के घर में आते ही दोस्‍त की जगह पहले जैसी नहीं रह जाती। इस फिल्‍म में तो संकेतों में बताया गया है कि स्‍वीटी का मकसद भी है। वह सोनू को चैलेंज भी करती है कि टीटू को उससे छीन लेगी और उसे लात पड़ेगी।
लव रंजन की फिल्‍म में मजेदार और अप्रत्‍याशित ट्वीस्‍ट एंड टर्न हैं। लव रंजन और राहुल मोदी ने कहानी को रोचक बनाए रखा है। उन्‍होंने छूट और उड़ान भी ली है,जिन्‍हें नजरअंदाज किया जा सकता है। इस फिल्‍म को निर्देशक के मन के मुताबिक पेश करने में कार्तिक अार्यन,सनी सिंह ऑर नुसरत भरूचा ने पूरा योगदान किया है। सहयोगी किरदारों के रूप में आए सभी कलाकार अपनी भूमिकाओं से कुछ न कुछ जोड़ते हैं। नुसरत भरूचा और कार्तिक आर्यन की भिड़ंत उनके किरदारों को अतिरिक्‍त आयाम और परफारमेंस के मौके देती है। कर्तिक इस फिल्‍म में पारंपरिक नायक नहीं हैं। कई बार वे खल चरित्र के रूप में उभते हैं। उन्‍हें खल और नेक की पतली रस्‍सी पर चलना है। उन्‍होंने अपने किरदार का बेसिक संतुलन बनाए रखा है। उनकी खीझ और मुस्‍कराहट दोनों प्‍यारी लगती है।
इस फिल्‍म में सात गीतकार और संगीतकार हैं। मेरठ और दिल्‍ली के बीच चल रही इस फिल्‍म में पंजाबी तड़के का संगीत है। इन दिनों ज्‍यादातर हिंदी फिल्‍मों में पंजाबी बोलों का संगीत लोकप्रिय हो रहा है। निर्माता-निर्देशक उन्‍हें जरूरी मानते हैा,लेकिन वह फिल्‍म के मूल मिजाज को खंडित करता है।
अवधि – 140 मिनट
साढ़े तीन स्‍टार ***1/2
     
                                          

Friday, October 16, 2015

फिल्‍म समीक्षा : प्‍यार का पंचनामा 2




प्रेम का महानगरीय प्रहसन
प्‍यार का पंचनामा 2
-अजय ब्रह्मात्‍मज
     प्‍यार का पंचनामा देख रखी है तो प्‍यार का पंचनामा 2 में अधिक नयापन नहीं महसूस होगा। वैसे ही किरदार हैं। तीन लड़के है और तीन लड़कियां भी इनके अलावा कुछ दोस्‍त हैं और कुछ सहेलियां। तीनों लड़कों की जिंदगी में अभी लड़कियां नहीं हैं। ऐसा संयोग होता है कि उन तीनों लड़कों की जिंदगी में एक साथ प्रेम टपकता है। और फिर पहली फिल्‍म की तरह ही रोमांस, झगड़े, गलतफहमी और फिर अलगाव का नाटक रचा जाता है। निश्चित रूप से पूरी फिल्‍म लड़कों के दृष्टिकोण से है, इसलिए उनका मेल शॉविनिज्‍म से भरपूर रवैया दिखाई पड़ता है। अगर नारीवादी नजरिए से सोचें तो यह फिल्‍म घोर पुरुषवादी और नारी विरोधी है।
दरअसल, प्‍यार का पंचनामा 2 स्‍त्री-पुरुष संबंधों का महानगरीय प्रहसन है। कॉलेज से निकले और नौकरी पाने के पहले के बेराजगार शहरी लड़कों की कहानी लगभग एक सी होती है। उपभोक्‍ता संस्‍कृति के विकास के बाद प्रेम की तलाश में भटकते लड़के और लड़कियों की रुचियों, पसंद और प्राथमिकताओं में काफी बदलाव आ गया है। नजरिया बदला है और संबंध भी बदले हैं। अब प्‍यार एहसास मात्र नहीं है। प्‍यार के साथ कई चीजें जुड़ गई हैं। अगर सोच में साम्‍य न हो तो असंतुलन बना रहता है। 21 वीं सदी में रिश्‍तों को संभालने में भावना से अधिक भौतिकता काम आती है। प्‍यार का पंचनामा 2 इस नए समाज का विद्रूप चेहरा सामने ले आती है। हालांकि, हम फिल्‍म के तीन नायकों के अंशुल,तरुण और सिद्धार्थ के साथ ही चलते हैं, लेकिन बार-बार असहमत भी होते हैं। प्‍यार पाने की उनकी बेताबी वाजिब है, लेकिन उनकी हरकतें उम्र और समय के हिसाब से ठीक लगने के बावजूद उचित नहीं हैं। लड़कियों के प्रति उनका रवैया और व्‍यवहार हर प्रसंग में असंतुलित ही रहता है।
    लव रंजन के लिए समस्‍या रही होगी कि पहली लकीर पर चलते हुए भी कैसे फिल्‍म को अलग और नया रखा जाए। तीन सालों में समाज में आए ऊपरी बदलावों को तो तड़क-भड़क, वेशभूषा और माहौल से ले आए, लेकिन सोच में उनके किरदार पिछली फिल्‍म से भी पिछड़ते दिखाई पड़े। हंसी आती है। ऐसे दृश्‍यों में भी हंसी आती है, जो बेतुके हैं। कुछकुछ लतीफों जैसी बात है। आप खाली हों और लतीफेबाजी चल रही हो तो बरबस हंसी आ जाती है। प्‍यांर का पंचनामा 2 किसी सुने हुए लतीफे जैसी ही हंसी देती है।
    इस फिल्‍म के संवाद उल्‍लेखनीय हैं। ऐसी समकालीन मिश्रित भाषा हाल-फिलहाल में किसी अन्‍य फिल्‍म में नहीं सुनाई पड़ी। यह आज की भाषा है, जिसे देश का यूथ बोल रहा है। संवाद लेखक ने नए मुहावरों और चुहलबाजियों को बखूबी संवादों में पिरोया है। संवादों में लहरदार प्रवाह है। उन्‍हें सभी कालाकारों ने बहुत अच्‍छी तरह इस्‍तेमाल किया है। फिल्‍म में अंशुल (कार्तिक आर्यन) का लंबा संवाद ध्‍यान खींचता है। इस लंबे संवाद में फिल्‍म का सार भी है। यकीनन यह फिल्‍म रोमांटिक कामेडी नहीं है। एक तरह से यह एंटीरोमांटिक हो जाती है।
    तीनों लड़कों ने अपने किरदारों पर मेहनत की है। कार्तिक आर्यन, ओंकार कपूर और सनी सिंह निज्‍जर ने कमोबेश एक सा ही परफॉरमेंस किया है। लेखक-निर्देशक ने अंशुल के किरदार को अध्रिक तवज्‍जो दी है। कार्तिक आर्यन इस तवज्‍जो को जाया नहीं होने दिया है। ओंकार कपूर अपने लुक और शरीर की वजह से हॉट अवतार में दिखे हें। सनी सिंह निज्‍जर ने लूजर किस्‍म के किरदार को अच्‍छी तरह निभाया है। तीनों लड़कियां न होतीं तो इन लड़कों के संस्‍कार और व्‍यवहार न दिखते। ये लड़कियां भी इसी समाज की हैं। उनकी असुरक्षा, अनिश्चितता और लापरवाही को उनके संदर्भ से समझें तो लड़के गलत ही नहीं मूर्ख भी दिखेंगे।
    क्‍या ही अच्‍छा हो कि कोई निर्देशक लड़कियों के दृष्टिकोण से प्‍यार का पंचनामा 3 बनाए?
अवधि- 137 मिनट
तीन स्‍टार