Search This Blog

Showing posts with label काजोल. Show all posts
Showing posts with label काजोल. Show all posts

Sunday, August 20, 2017

फिल्‍म समीक्षा : वीआईपी 2



फिल्‍म रिव्‍यू
प्रतिभाओं का दुरुपयोग
वीआईपी2
-अजय ब्रह्मात्‍म्‍ज
सौंदर्या रजनीकांत निर्देशित वीआईपी2 शायद रजनीकांत के वारिस की खोज है। परिवार के ही एक सदस्‍य धनुष को रजनीकांत की तरह की फिल्‍म में लाकर यही कोशिश की गई है। अफसोस धनुष में रजनीकांत की अदा और करिश्‍मा नहीं है। फिल्‍म में जब वे मुस्‍टंडे गुंडों को धराशायी करते हैं तो वह हंसी आती है। इसी प्रकार कैरेक्‍अर के लिए खास मैनरिज्‍म दिखाने में भी वे संघर्ष करते नजर आते हैं।
कह सकते हैं कि तमिल की मेनस्‍ट्रीम पॉपुलर शैली में बनी यह फिल्‍म हिंदी दर्शकों को वहां की फिल्‍मों की गलत छवि देगी। रजनीकांत की फिल्‍में इतनी लचर और स्‍तरहीन नहीं होतीं। उनकी खास शैली होती है,जिसे उन्‍होंने सालों की मेहनत और दर्शकों के प्रेम से हासिल किया है। धनुष अलग श्रेणी के अभिनेता हैं। उन्‍हें इस सांचे में ढालने में सौंदर्या रजनीकांत पूरी तरह से असफल रही हैं।
रघुवरण ईमानदार इंजीनियर है। कर्मठ और जमीर का पक्‍का रघुवरण कभी कोई गलत काम नहीं कर सकता। अपनी प्रतिभा से वह किसी को भी ललकार सकता है। संयोग से इस बार उसे वसुंधरा का सामना करना पड़ता है। वसुंधरा ने भी अपनी मेहनत,लगन और जिद से कंपनी खंड़ी की है। कामयाबी ने उसे अकड़ दी है। उसे बर्दाश्‍त नहीं होता कि एक साधारण इंजीनियर उसके ऑफर को ठुकरा दे। उसके लिए यह अहं की लड़ाई है तो रघुवरण अपने सिद्धांतो से डिगने के लिए तैयार नहीं है। इस मुठभेड़ में दोनों का नुकसान होता है। फिल्‍म का क्‍लाइमेक्‍स नाटकीय है। दोनों जब व्‍यक्ति के तौर पर मिलते हैं तो उन्‍हें लगता है कि वे मिजाज और सोच में एक से हैं।
ऐसी फिल्‍में हिंदी में भी बनती रही हैं,जिसमें किसी जिद्दी और अहंकार में नकचढ़ी नायिका को सीधा-सादा और ईमानदार नायक सही रोस्‍ते पर ले आता है। सही रास्‍ते का निर्णय नायक का होता है। इस फिलम की निर्देशक महिला हैं। उन्‍हें ऐसे घिसे-पिटे विषय से गेचैनी नहीं हुई। इतना ही नहीं फिल्‍म में औरतों और बीवियों के बारे में भद्दी टिप्‍पणियां की गई हैं। हंसाने के लिए महिलाविरोधी ऐसी टिप्‍पणियों का इस्‍तेमाल हिंदी फिल्‍मों में आम था।
धनुष और काजोल की प्रतिभा का दुरूपयोग करती वीआईपी2 अत्‍यंत साधारण फिल्‍म है।
अवधि- 129 मिनट
डेढ़ स्‍टार *1/2

Friday, December 18, 2015

फिल्‍म समीक्षा : दिलवाले

कार और किरदार
-अजय ब्रह्मात्‍मज

        रोहित शेट्टी की दिलवाले और आदित्‍य चोपड़ा की दिवाले दुल्‍हनिया ले जाएंगे में दिलवाले के अलावा एक संवाद की समानता है-बड़े-बड़ शहरों में एसी छोटी-छोटी बाते होती रहती है सैनोरीटा। इसे बोलते हुए शाह रुख खान दर्शकों को हंसी के साथ वह हसीन सिनेमाई याद भी देते हें,जो शाह रुख खान और काजोल की जोड़ी के साथ जुड़ी हुई है। ऐसा कहा और लिखा जाता है कि पिछले 20 सालों में ऐसी हॉट जोड़ी हिंदी फिल्‍मों में नहीं आई। निश्चित ही इस फिल्‍म के खयाल में भी यह जोड़ी रही होगी। ज्‍यादातर एक्‍शन और कॉमेडी से लबरेज फिल्‍में बनाने में माहिर रोहित शेट्टी ने इसी जोड़ी की उपयोगिता के लिए फिल्‍म में उनके रोमांटिक सीन और गाने रखे हैं। तकनीकी प्रभावो से वे शाह रुख और काजोल को जवान भी दिखाते हैं। हमें अच्‍छा लगता है। हिंदी स्‍क्रीन के दो प्रमियों को फिर से प्रेम करते,गाने गाते और नफरत करते देखने का आनंद अलग होता है।
    रोहित शेट्टी की फिल्‍मों में कार भी किरदार के तौर पर आती हैं। कारें उछलती हैं,नाचती हैं,टकराती हैं,उड़ती है,कलाबाजियां खाती हैं,और चींSSSSS की आवाज के साथ रुक जती हैं। रोहित शेट्टी की फिल्‍मों में कारों के करतब हैरान करते हैं। यही इनका रोमांच और आनंद है। दिलवाले में कारों की संख्‍या बढ़ी है और वे मंहगी भी हो गई हैं। उनकी चकम-दमक बढ़ी है। साथ ही उन्‍हें विदेश की सड़के मिली हैं। रोहित शेट्टी ने कारों की कीमत का खयाल रखते हुए फिल्‍म में उनकी भूमिका बढ़ा दी है। उल्‍लेखनीय है कि रोहित शेट्टी की फिल्‍मों में सिर्फ कार ही नहीं,किरदार भी होते हैं।
    इस बार राज/काली,मीरा,वीर,ईशिता,सिद्धू,मनी और ऑस्‍कर जैसे किरदार हैं। रोहित की फिल्‍मों में मुख्‍य किरदार भी कार्टून किरदारों की तरह आते हैं। इस बार शाह रुख और काजोल की वजह से थोड़ा बदलाव हुआ है,लेकिन उनकी वजह से फिल्‍म में शुरू के हिस्‍से में अनेक स्‍पीड ब्रेकर आ जाते हैं। रोहित रोमांस के अनजान रास्‍ते से होकर कॉमेडी और एक्‍शन के परिचित हाईवे पर आते हैं। हाईवे पर आने के पहले यह फिल्‍म झटके देती है। इन झटकों के बाद फिल्‍म सुगम और मनोरंजक स्‍पीड में आती है। उसके बाद का सफर आनंददायक और झटकारहित हो जाता है। शाह रुख और काजोल के रोमांस और नफरत के सीन अच्‍छे हैं। इस बार दोनों रोमांटिक सीन से ज्‍यादा अच्‍छे झगड़े औौर नाराजगी के सीन में दिखे हैं। फिल्‍म में 15 सालों के बाद दाढ़ी में आने पर शाह रुख ज्‍यादा कूल और आकर्षक लगते हैं। रोहित शेट्टी ने काजोल को भी पूरा महत्‍व दिया है। वे उनके किरदार को नया डायमेंशन देकर उन्‍हें अपनी क्षमता दिखाने का भी मौका देते हैं। निस्‍संदेह काजोल अपनी पीढ़ी की समर्थ अभिनेत्री हैं।
    इस फिल्‍म में वरुण धवन और कृति सैनन की जोड़ी शाह रुख और काजोल की जोड़ी के साए में रह गई है। उन्‍हें गानों और यंग रोमांस के लिए रखा गया है। वे इसे पूरा भी करते हैं,लेकिन कुछ दृश्‍यों में वे भाव-मनोभाव में कंफ्यूज दिखते हें। दरअसल,उन्‍हें ढंग से गढ़ा नहीं गया है या वे दो लोकप्रिय कलाकारों के साथ घबराहट में रहे हैं। अनेक दृश्‍यों के बहाव में वरुण तैरने के बजाए बहने लगते हैं। एक दिक्‍कत रही है कि वे अपने परफारमेंस पर काबू नहीं रख सके हैं। कृति सैनन छरहरी और खूबसूरत हैं। वह किसी और अभिनेत्री सरीखी दिखने की कोशिश में अपनी मौलिकता छोड़ देती हैं। उन्‍हें अपने सिग्‍नेचर पर ध्‍यान देना चाहिए।
    रोहित शेट्टी की फिल्‍मों में सहयोगी कलाकारों का खास योगदान रहता है। इस बार भी संजय मिश्रा,बोमन ईरानी,जॉनी लीवर,मुकेश तिवारी,वरुण शर्मा और पंकज त्रिपाठी के रूप में वे मौजूद हैं। इन सभी को अच्‍छे वनलाइनर मिले हें। खास कर संजय मिश्रा ब्रांड और प्रोडक्‍ट के नामों के तुक मिलाकर संवाद बोलते हैं तो हंसी आती है। संजय मिश्रा अपने करिअर के उस मुकाम पर हैं,जहां उनकी कैसी भी हरकत दर्शक स्‍वी‍कार करने के मूड में हैं। उनकी स्‍वीकृति बढ़ गई है। यह मौका है कि वे इसका सदुपयोग करें। इस बार बोमन ने निराश किया।
    रोहित शेट्टी की फिल्‍मों में रंगों की छटा देखते ही बनती है। इस बार तो आसमान भी सतरंगी हो गया है और कई बार इंद्रधनुष उभरा है। उनकी फिल्‍मों में वस्‍तुओं और कपड़ों के रंग चटखदार,सांद्र और आकर्षक होते हैं। रंगों के इस्‍तेमाल में पूरी सोच रहती है। रोहित शेट्टी इस पीढ़ी के अलहदा फिल्‍मकार हैं,जिनकी शैली दर्शकों को पसंद आती है। दर्शकों की इस पसंद में वे बंधते जा रहे हें। सफलता के हिसाब से यह सही हो सकता है,लेकिन सृजनात्‍मकता तो प्रभावित होने के साथ सीमित हो रही है।
अवधि-163 मिनट
स्‍टार तीन स्‍टार

Thursday, October 29, 2015

‘दिलवाले’ में वरुण धवन


-अजय ब्रह्मात्‍मज
       इस साल 18 दिसंबर को रिलीज हो रही दिलवाले वरुण धवन की 2015 की तीसरी फिल्‍म होगी। इस साल फरवरी में उनकी बदलापुर और जून में एबीसीडी 2 रिलीज हो चुकी हैं। दिलवाले उनकी छठी फिल्‍म होगी। स्‍टूडेंट ऑफ द ईयर के तीन कलाकारों में वरूण धवन बाकी दोनों आलिया भट्ट और सिद्ार्थ मल्‍होत्रा से एक फिल्‍म आगे हो जाएंगे। अभी तीनों पांच-पांच फिल्‍मों से संख्‍या में बराबर हैं,लेकिन कामयाबी के लिहाज से वरुण धवन अधिक भरोसेमंद अभिनेता के तौर पर उभरे हैं।
    वरुण धवन फिलहाल हैदराबाद में रोहित शेट्टी की फिल्‍म दिलवाले की शूटिंग कर रहे हैं। इस फिल्‍म में वे शाह रुख खान के छोटे भाई बने हैं। उनके साथ कृति सैनन हैं। इन दिनों दोनों के बीच खूब छन रही है। पिछले साठ दिनों से तो वे हैदराबाद में ही हैं। आउटडोर में ऐसी नजदीकी होना स्‍वाभाविक है। यह फिल्‍म के लिए भी अच्‍छा रहता है, क्‍योंकि पर्दे पर कंफर्ट और केमिस्‍ट्री दिखाई पड़ती है। हैदराबाद में फिल्‍म के फुटेज देखने को मिले,उसमें दोनों के बीच के तालमेल से भी यह जाहिर हुआ।
    कृति सैनन और वरुण धवन की जोड़ी में एक ही समस्‍या रही। कृति थोड़ी लंबी हैं। उनके साथ के दृश्‍यों में वरुण धवन के लिए पाटला लगाया जाता था। पाटला मचिया या स्‍टूल की तरह का एक फर्नीचर होता है। शूटिंग में इसके अनेक उपयोगों में से एक उपयोग कलाकारों का कद बढ़ाना भी है। अब अगर दिलवाले में कद में छोटे वरुण धवन अगर कृति से लंगे या बराबर दिखें तो याद कर लीजिएगा कि उनके पांव के नीचे पाटला होगा। अस फिल्‍म के शाह रुख खान और काजोल भी लंबाई में कृति से छोटे हैं। वे भी कृति के साथ के दृश्‍यों में सावधान रहे। वैसे,फिल्‍म में कृति के लिए लंबी लड़की संबोधन का इस्‍तेमाल किया गया है।
    वरुण धवन इस फिल्‍म में शाह रुख खान के बेवकूफ छोटे भाई हैं,जिनकी वजह से मुसीबत आती रहती है। दिलवाले में वरुण धवन के दोस्‍त बने हैं वरुण शर्मा। सेट पर सब उन्‍हें चू चा ही कहते हैं। दोनों की दोस्‍ती उस जमाने की फिल्‍मों की याद दिलाएगी,जब हीरो के साथ एक कॉमेडियन चिपका रहता था। उसकी वजह से फिल्‍म में पैरेलल कॉमेडी ट्रैक चलता रहता था। वरुण धवन को अपने हमउम्र वरुण शर्मा के साथ सीन करने में इसलिए भी मजा आया कि दोनों ने मिल कर सीन इम्‍प्रूवाइज करते थे। रोहित ने उन्‍हें कभी-कभी खुली छूट दी। वरुण मानते हैं कि वरुण शर्मा और कृति सैनन ने रियल लाइफ एक्‍सपीरिएंस से फिल्‍म को एनरिच किया है। वे बेहिचक स्‍वीकार करते हें कि मुंबई में फिल्‍म इंडस्‍ट्री की परवरिश की वजह से रियल लाइफ का उनका एक्‍सपोजर कम है।
    वरुण धवन दिलवाले में शाह रुख के साथ काम कर बेहद खुश हैं। वे इसे किसी अचीवमेंट से कम नहीं मानते। वे कहते हें, फिल्‍म आने पर दर्शक खुद ही देख लेंगे। मेरे लिए तो इस फिल्‍म की शूटिंग ही यादगार एक्‍सपीरिएंस रही। मैंने उनसे बहुत कुछ सीखा। सबसे बड़ी सीख्‍ तो यह रही कि आप जिस सेट या लोकेशन पर शूट कर रहे हें,उसे अच्‍छी तर‍ह फील करें। उसे महसूस करें। उसकी मौजूदगी को अपने अंदर उतार लें। मेरे खयाल में इस से सेट और लोकेशन से रिश्‍ता बन जाता है। मैंने देखा है कि शाह रुख खान बगैर बताए हुए शूट से पहले अपने सेट पर घूमते हैं। एक-एक चीज को छूते हैं। इस स्‍पर्श से उनसे आत्‍मीय रिश्‍ता बन जाता है। मुझे लगता है कि इस प्रक्रिया में सेट की सही जानकारी भी मिल जाती है। स्‍पेस के साथ यह भी पता चल जाता है कि कौन सी चीज कैसी है ? अब अगर दीवार ईंट की है तो आप उस पर झटके के साथ टिक सकते हैं। वही दीचार प्‍लायवुड की है तो अलग ढंग से भार डालना होगा।
    वरुण धवन को दिलवाले में रोहित शेट्टी के निर्देशन में एक्‍शन और कॉमेडी के नए गुर मिले।
   
     

Friday, September 3, 2010

फिल्‍म समीक्षा : वी आर फैमिली

-अजय ब्रह्मात्‍मज

क्या आप ने स्टेपमॉम देखी है? यह फिल्म 1998 में आई थी। कुछ लोग इसे क्लासिक मानते हैं। 12 सालों के बाद करण जौहर ने इसे हिंदी में वी आर फेमिली नाम से प्रोड्यूस किया है। सौतेली मां नाम रखने से टायटल डाउन मार्केट लगता न? बहरहाल, करण जौहर ने इसे आधिकारिक तौर पर खरीदा और हिंदी में रुपांतरित किया है। इस पर चोरी का आरोप नहीं लगाया जा सकता,फिर भी इसे मौलिक नहीं कहा जा सकता। इसका निर्देशन सिद्धार्थ मल्होत्रा ने किया है। इसमें काजोल और करीना कपूर सरीखी अभिनेत्रियां हैं और अर्जुन राजपाल जैसे आकर्षक अभिनेता हैं।

हिंदी में ऐसी फिल्में कम बनती हैं, जिन में नायिकाएं कहानी की दिशा तय करती हों। वी आर फेमिली का नायक कंफ्यूज पति और प्रेमी है, जो दो औरतों के प्रेम के द्वंद्व में है। साथ ही उसे अपने बच्चों की भी चिंता है। 21 वीं सदी में तीन बच्चों के माता-पिता लगभग 15 सालों की शादी के बाद तलाक ले लेते हैं। तलाक की खास वजह हमें नहीं बतायी जाती। हमारा परिचय तीनों किरदारों से तब होता है जब तलाकशुदा पति के जीवन में नई लड़की आ चुकी है। पूर्व पत्‍‌नी माया और प्रेमिका श्रेया की आरंभिक भिड़ंत के बाद ही पता चल जाता है कि माया कैंसर से पीडि़त है और उसकी जिंदगी अब चंद दिनों के लिए बची है। सालों को लमहों में जीने की डॉक्टर की सलाह के बाद माया चाहती है कि श्रेया उसके परिवार में आ जाए और बच्चों की जिम्मेदारी संभाल ले। सब कुछ इतना भावुक,अश्रुपूर्ण और मैलोड्रामैटिक हो जाता है कि उनकी परेशानियों से कोफ्त होने लगती है। सुबकते-रोते हुए फिल्म देखने के शौकीन दर्शकों को यह फिल्म पसंद आएगी।

करण जौहर ब्रांड की फिल्में विभ्रम का सृजन करती है। इस फिल्म की कथा भूमि विदेश की है। नाते-रिश्ते और स्त्री-पुरुष संबंध के पहलू विदेशी हैं। भारत के चंद महानगरों में विवाह की ऐसी समस्याओं से दंपति जूझ रहे होंगे, लेकिन मूल रूप से विदेशी चरित्रों और स्थितियों को लेकर बनी यह फिल्म अपने आसपास की लगने लगती है, क्योंकि इसमें हमारे परिचित कलाकार हैं। वे हिंदी बोलते हैं। वी आर फेमिली भारतीय कहानी नहीं है। यह थोपी हुई है। जूनियर आर्टिस्ट के तौर पर विदेशियों को पीछे खड़ा कर विदेशों में फिल्मांकित इन फिल्मों से करण लगातार हिंदी फिल्मों के दर्शकों को मनोरंजन के विभ्रम में रखने में सफल हो रहे हैं। ंिहंदी सिनेमा के लिए यह अच्छी स्थिति नहीं है।

दो अभिनेता या अभिनेत्री एक साथ फिल्म में आ रहे हों तो दर्शक उनके टक्कर से मनोरंजन की उम्मीद रखते हैं। काजोल और करीना कपूर के प्रशंसक इस लिहाज से निराश होंगे, क्योंकि लेखक-निर्देशक ने उनके बीच संतुलन बना कर रखा है। काजोल और करीना कपूर दक्ष अभिनेत्रियां हैं। दोनों अपने किरदारों को सही ढंग से निभा ले गई हैं। अर्जुन रामपाल को सिर्फ आकर्षक लगना था। शंकर उहसान लॉय का संगीत अब सुना-सुना सा लगने लगा है।

** दो स्टार


Friday, February 12, 2010

फिल्‍म समीक्षा : माय नेम इज खान

साधारण किरदारों की विशेष कहानी


-अजय ब्रह्मात्‍मज

करण जौहर ने अपने सुरक्षित और सफल घेरे से बाहर निकलने की कोशिश में माय नेम इज खान जैसी फिल्म के बारे में सोचा और शाहरुख ने हर कदम पर उनका साथ दिया। इस फिल्म में काजोल का जरूरी योगदान है। तीनों के सहयोग से फिल्म मुकम्मल हुई है। यह फिल्म हादसों से तबाह हो रही मासूम परिवारों की जिंदगी की मुश्किलों को उजागर करने के साथ धार्मिक सहिष्णुता और मानवता के गुणों को स्थापित करती है। इसके किरदार साधारण हैं, लेकिन फिल्म का अंतर्निहित संदेश बड़ा और विशेष है।

माय नेम इज खान मुख्य रूप से रिजवान की यात्रा है। इस यात्रा के विभिन्न मोड़ों पर उसे मां, भाई, भाभी, मंदिरा, समीर, मामा जेनी और दूसरे किरदार मिलते हैं, जिनके संसर्ग में आने से रिजवान खान के मानवीय गुणों से हम परिचित होते हैं। खुद रिजवान के व्यक्तित्व में भी निखार आता है। हमें पता चलता है कि एस्परगर सिंड्रोम से प्रभावित रिजवान खान धार्मिक प्रदूषण और पूर्वाग्रहों से बचा हुआ है। मां ने उसे बचपन में सबक दिया था कि लोग या तो अच्छे होते हैं या बुरे होते हैं। वह पूरी दुनिया को इसी नजरिए से देखता है। रिजवान की यह सीमा भी है कि वह अच्छाई और बुराई के कारणों पर गौर नहीं करता। उन्हें समझने की कोशिश नहीं करता। फिल्म के निर्देशक करण जौहर की वैचारिक और राजनीतिक सीमाओं की हद में रहने से रिजवान खान आतंकवाद की ग्लोबल समस्या और मुसलमानों के प्रति बनी धारणा को सिर्फ छूता हुआ निकल जाता है। हम इस धारणा के प्रभाव को महसूस करते हैं, लेकिन उत्तेजित और प्रेरित नहीं होते।

वैचारिक सीमा और राजनीतिक अपरिपक्वता के बावजूद माय नेम इज खान की भावना छूती है। करण जौहर अपने विषय के प्रति ईमानदार हैं। सृजन के क्षेत्र में एहसास और विचार हायर नहीं किए जा सकते। लेखक और निर्देशक का आंतरिक जुड़ाव ही विषय को प्रभावशाली बना पाता है। करण जौहर के पास कलाकारों और तकनीशियनों की सिद्धहस्त टीम है, इसलिए कथा-पटकथा के ढीलेपन के बावजूद फिल्म टच करती है। इस फिल्म में के रविचंद्रन के छायांकन का महत्वपूर्ण योगदान है।

माय नेम इज खान के संदर्भ में शाहरुख खान और काजोल के परफार्मेस की परस्पर समझदारी उल्लेखनीय है। दोनों नाटकीय दृश्यों में एक-दूसरे के पूरक के रूप परफार्म करते हैं और अंतिम प्रभाव बढ़ा देते हैं। काजोल का प्रवाहपूर्ण अभिनय किरदार को जटिल नहीं रहने देता। उनकेभाव और प्रतिक्रियाओं में आकर्षक सरलता और आवेग है। निश्चित ही उनकी आंखें बोलती हैं। शाहरुख खान ने इस फिल्म में अपनी परिचित भंगिमाओं को छोड़ा है और रिजवान खान की चारीत्रिक विशेषताओं को आवाज और अभिनय में उतारा है। कुछ दृश्यों में वे अपनी लोकप्रिय छवि से जूझते दिखाई पड़ते हैं। अभिनय की ऐसी चुनौतियां ही एक्टर के दायरे का विस्तार करती हैं। स्वदेस, चक दे इंडिया के बाद माय नेम इज खान में शाहरुख खान ने कुछ अलग अभिनय किया है। फिल्म का गीत-संगीत कमजोर है। निरंजन आयंगार भावों को शब्दों में नहीं उतार पाए हैं। उनके संवादों में भी यह कमी है।

हालांकि करण जौहर की माय नेम इज खान भी उनकी अन्य फिल्मों की तरह मुख्य रूप से अमेरिका में शूट हुई है, लेकिन फिल्म का मर्म हम महसूस कर पाते हैं। अच्छी बात है कि यह फिल्म सिर्फ आप्रवासी भारतीयों के द्वंद्व और दंश तक सीमित नहीं रहती। यह अमेरिका में रह रहे विदेशी मूल के नागरिकों की पहचान के संकट से जुड़ती है और मुसलमान के प्रति बनी ग्लोबल धारणा को तोड़ती है। माय नेम इज खान एंड आई एम नाट अ टेररिस्ट का संदेश समझ में आता है।

**** चार स्टार


Tuesday, February 9, 2010

पापुलैरिटी को एंजाय करते हैं शाहरुख

-अजय ब्रह्मात्मज
शाहरुख खान से मिलना किसी लाइव वायर को छू देने की तरह है। उनकी मौजूदगी से ऊर्जा का संचार होता है और अगर वे बातें कर रहे हों तो हर मामले को रोशन कर देते हैं। कई बार उनका बोलना ज्यादा और बड़बोलापन लगता है, लेकिन यही शाहरुख की पहचान है। वे अपने स्टारडम और पापुलैरिटी को एंजाय करते हैं। वे इसे अपनी मेहनत और दर्शकों के प्यार का नतीजा मानते हैं। उन्होंने इस बातचीत के दरम्यान एक प्रसंग में कहा कि हम पढ़े-लिखे नहीं होते तो इसे लक कहते ़ ़ ़ शाहरुख अपनी उपलिब्धयों को भाग्य से नहीं जोड़ते। बांद्रा के बैंडस्टैंड पर स्थित उनके आलीशान बंगले मन्नत के पीछे आधुनिक सुविधाओं और साज-सज्जा से युक्त है उनका दफ्तर। पूरी चौकसी है। फिल्मी भाषा में कहें तो परिंदा भी पर नहीं मार सकता, लेकिन फिल्म रिलीज पर हो तो पत्रकारों को आने-जाने की परमिशन मिल जाती है।
उफ्फ! ये ट्रैफिक जाम
मुंबई में कहीं भी निकलना और आना-जाना मुश्किल हो गया है। मन्नत से यशराज स्टूडियो (12-15 किमी) जाने में डेढ़ घंटे लग जाते हैं। मैं तो जाने से कतराता हूं। मेरा नया आफिस खार में बन रहा है। लगता है कि यहीं है, लेकिन 35 मिनट से ज्यादा लगते हैं। कई बार ऐसा होता है कि 10-15 मिनट के काम से आफिस निकलता हूं, लेकिन लौटते-लौटते ढाई घंटे बीत जाते हैं। सड़कों पर बहुत क्राउड हो गया है अभी। कार्टर रोड पर हमेशा भीड़ लगी रहती है। मैं गलियों से निकलता हूं फिर भी फंस जाता हूं।
बेस्ट सिटी, दिल्ली
दिल्ली इस वक्त इंडिया के बेस्ट सिटी हो गई है। इंफ्रास्ट्रक्चर इतना अच्छा हो गया है। मैट्रो चालू हो गया है। ब्रिज बन गए हैं। सड़क पर कहीं रुकना नहीं पड़ता। मैं अभी तक मैट्रो में नहीं चढ़ा हूं। एक बार जाना था। मुझे ओपनिंग के लिए भी बुलाया था। मैं जा नहीं सका। अभी तो मुंबई में भी मैट्रो आ रही है। तब शायद मुंबई में कहीं आना-जाना आसान हो जाए।
सिक्युरिटी और प्रशंसक
दिल्ली और नॉर्थ में सिक्युरिटी का प्राब्लम हो जाता है। मैं कई बार सुनता हूं कि एक्टर गए और झगड़ा हो गया। मैं बहुत क्लियर हूं इस मामले में। अच्छी सिक्युरिटी रखो। किसी को चोटें-वोटें न लगें। भीड़ और भगदड़ में क्या होता है? हम तो भाग जाते हैं गाड़ी में बैठकर ़ ़ ़ मैंने एक-दो बार देखा है, कुछ लोग गिर जाते हैं। बहुत बुरा लगता है। एक बार किसी सिनेमाघर की ओपनिंग में गया था। कैमरामैन पीछे खिसकते-खिसकते कांच तोड़ गया। अच्छा हुआ कि नीचे नहीं गिरा, नहीं तो जान भी जा सकती थी। कोलकाता में काफी भीड़ लग जाती है। पिछले दिनों कोई गुवाहाटी बुला रहा था। मैंने समझाया कि वहां फंक्शन न करें। सिक्युरिटी की समस्या से कई शहरों में नहीं जा पाता। अपने सभी प्रशंसकों से मिलना नहीं हो पाता।
माय नेम इज खान
अलग किस्म की फिल्म है। वो सभी चीजें डालने की कोशिश की है, जो होनी चाहिए। यह इंडियन सिनेमा है। ज्यादा तामझाम नहीं रखा है। फिल्म की कास्ट और मेकिंग कमर्शियल रखी है। कैरेक्टर बहुत अमीर नहीं हैं, लेकिन लुक में रिचनेस है। बड़ी फिल्म है। अमेरिका में शूट हुई है। यह चक दे नहीं है। इसमें लव स्टोरी भी है। काजोल, शाहरुख और करण हों तो दर्शक की उम्मीदें रहती हैं। हम उन्हें निराश नहीं कर सकते। यह एक ड्रामैटिक फिल्म है। इस फिल्म को दूर से देखो तो एक लव स्टोरी और मुसलमान की कहानी लगती है। पास आकर देखो हिंदू, मुसलमान, सिख और ईसाई में फर्क नहीं दिखेगा। सच कहूं तो यह एक साउथ एशियन व्यक्ति की कहानी है, जो अमेरिका में रहता है। इस फिल्म से साउथ एशिया के सभी लोग आइडेंटिफाय करेंगे। अमेरिका में हमें बराबरी का दर्जा नहीं मिला हुआ है। फर्क बरकरार है। ईस्ट और वेस्ट की सोच का भी फर्क है।
टेररिज्म का बैकड्राप
यह फिल्म टेररिज्म के ऊपर नहीं है। इसमें उसका बैकड्रॉप है। उस माहौल में कुछ किरदार फंस गए हैं। इस फिल्म के किरदारों पर टेररिज्म का बटर फ्लाय इफेक्ट है। ऐसे इफेक्ट में हम शामिल नहीं होते हैं, लेकिन प्रभावित होते हैं। उदाहरण केलिए किसी की बीवी रूठ के विदेश जा रही है। वह उसे मनाने जा रहा है। टैक्सी बुलाता है। तभी शहर में दंगा भड़क जाता है और टैक्सी ड्रायवर को कोई मार देता है। वह व्यक्ति समय पर एयरपोर्ट नहीं पहुंच पाता। बीवी विदेश चली जाती है। अब उस दंगे से उस व्यक्ति की जिंदगी तो तबाह हो गई, लेकिन वह दंगे में शामिल नहीं था। माय नेम इज खान के किरदार इसी तरह टेररिज्म से प्रभावित होते हैं।
सच्चे किरदारों पर आधारित
यह फिल्म सच्चे किरदारों पर आधारित है। मैं मिल चुका हूं उनसे। मियां मुसलमान हैं और बीवी हिंदू। मियां ने एक दंगे में उसे बचाया था। दंगे में उसके पति को मार दिया गया था। बाद में दोनों ने शादी कर ली थी। अमेरिका में 9-11 की घटना के तीन महीने बाद दिसंबर में वे बेचारे ईद मना रहे थे। किसी ने शिकायत कर दी तो पुलिस पूछताछ के लिए ले गई। बीवी ने तब अपनी बीमार बेटी का खयाल करते हुए पुलिस से कह दिया कि मैं तो हिंदू हूं ... मैं जाऊं। पुलिस वैसे भी उन्हें छोड़ने वाली थी। बीवी पहले चली गई। मियां आधे घंटे के बाद घर पहुंचा। उसने बीवी से पूछा, मैंने तुम्हारी जान बचाई। तुम्हारा बच्चा मुझे बाप जैसा प्यार करता है और तुम्हें यह कहने की जरूरत पड़ गई कि तुम मुसलमान नहीं हो। मैं तुम्हें नहीं समझा सका कि मुसलमान होना गलत नहीं है तो दुनिया को क्या समझाऊंगा। तब से दोनों आपस में बातचीत नहीं करते। शादीशुदा हैं। एक घर में रहते हैं, लेकिन उनके संबंध खत्म हो गए हैं। कल हो न हो के समय की बात है। हमें आयडिया अच्छा लगा तो हम ने इस पर काम किया। 9-11 के टेररिस्ट अटैक करने वाले को क्या मालूम कि उसकी वजह से एक मियां-बीवी की जिंदगी तबाह हो गई।
इमोशनल रियलिटी
इमोशनल रियलिटी यूनिवर्सल होती है। किसी के मरने पर सभी को दुख होता है। जन्म लेने पर खुशी होती है। प्यार सबको अच्छा लगता है। झगड़े से सभी डरते हैं। आप दुनिया के किसी भी कोने में चले जाएं। सभी जगह एक ही भाव होते हैं। यही हमारा नवरस है। जर्मनी में मेरे लाखों फैन हैं। उन्हें भाषा समझ में नहीं आती, गाना समझ में नहीं आता, मेरी शक्ल समझ में नहीं आती, लेकिन पर्दे पर मुझे रोता हुआ देख कर रोते हैं। अब आप अवतार ही देखें। इस फिल्म को देखते हुए आप किरदारों के इमोशन के साथ जुड़ जाते हैं। इमोशनल रियलिटी सभी को अपील करती है। मुझे विश्वास है कि अगर हमने अच्छी एक्टिंग की है और फिल्म की स्टोरी लाइन सही है तो फिल्म लोगों को पसंद आएगी, क्योंकि वे इमोशनली कनेक्ट होंगे।
नए डायरेक्टर
नए डायरेक्टर में मुझे इम्तियाज अली, विशाल भारद्वाज, अनुराग कश्यप और अनुराग बसु पसंद हैं। ये सिनेमा का विस्तार कर रहे हैं। इनकी फिल्मों से इंडियन सिनेमा का व‌र्ल्ड व्यू बदल सकता है। उनकी फिल्मों में कुछ इंटरनेशनल बातें होती हैं। अनुराग कश्यप थोड़े ऑफ बीट हैं, अगर इन सभी के लिए प्लेटफार्म क्रिएट हो तो अच्छी बात होगी।
प्राइस नहीं मांगता
ज्यादातर लोगों को यकीन नहीं होगा, लेकिन जिन फिल्मों में मैं एक्टिंग करता हूं, उनके लिए प्राइस नहीं मांगता। अगर फिल्म पहले हफ्ते चल जाती है तो प्रोडयूसर खुद आकर पैसे दे देते हैं। पिछले दस-बारह साल में किसी प्रोड्यूसर को मैंने नहीं बताया कि ये मेरा प्राइस है। किसी से निगोशिएट नहीं किया। शुरू में करते थे, जब पैसे नहीं थे। इस से एक मैसेज गया कि पैसे देकर मुझ से फिल्म नहीं करा सकते। पैसे देकर आप बाकी सब कुछ करा सकते हैं। एड करा सकते हैं। डांस करा सकते हैं। पार्टी कर लें। फिल्म की वजह से ही मैं हूं, वो नहीं बिकता। वह दिल से होता है तो होता है, अन्यथा नहीं होता।
विवेक वासवानी
मैं सच कहता हूं कि अगर विवेक वासवानी नहीं होता तो मैं मुंबई में नहीं होता। झूठे दिल से नहीं, सच बता रहा हूं। उसने अजीज मिर्जा को पटाया, जूही चावला को लाया। अमृता सिंह को घुमाया। नाना पाटेकर को समझाया। जी पी सिप्पी से मुझे राजू बन गया जैंटलमैन में लांच करवा दिया। उसने ऐसा समां बांध दिया था कि जिस पार्टी में जाऊं, सामने से लोग ऐसे मिलते थे कि इंडिया का सबसे बड़ा स्टार आ गया। उस रेपुटेशन से ही मुझे एक-दो साल काम मिले।
एक दिन में चार पिक्चर
मुझे अच्छी तरह याद है कि एक ही दिन में चार पिक्चर साइन की थी। दिल आशना है, किंग अंकल, राजू बन गया जेंटल मैन और चमत्कार चारों फिल्में एक ही दिन मिली थीं। इतनी अच्छी शुरूआत रही।
प्रिपरेशन
मैं रिजवान खान वाली बीमारी से ग्रस्त दो लोगों से मिला हूं। मेरे दोस्त ले आए थे। उनसे 14 दिनों तक मिला। वे चुपचाप बैठते हैं। बोलते नहीं हैं। मैं उन्हें बैठे हुए देखता और आब्जर्ब करता था। फिर मैंने एक का वाक, एक का बाल, थोड़ा अटक कर बोलना या रिपीट करना ़ ़ ़ ये सब नोट किया। वे आंखें मिलाकर बातें नहीं करते। वे जमीन पर देखकर बातें करते हैं। यह फिल्म रोमांटिक है, लेकिन आंखों से आंखों के मिलने का चक्कर ही नहीं है। मुझे इंटरेस्टिंग लगा यह कंसेप्ट कि डू रोमांस विदाउट एक्सप्रेसिंग। उन्हें छूना नहीं आता। गले मिलना नहीं आता। वैसे वे बहुत इंटेलिजेंट होते हैं। इस किरदार को निभाने के लिए आंखें भी चढ़ाई हैं। एक रोमांटिक सीन में मेरी आंखें टेढ़ी लगेंगी।
सीरियस हूं मैं भी
लोग मुझ से बार-बार कहते हैं कि मैं हर फिल्म में एक जैसा ही दिखता हूं तो वही मैंने भी कहना शुरू कर दिया। ऐसे सवालों से मैं गुस्सा नहीं होता। मैं अपनी एक्टिंग के बारे में सीरियसली बातें नहीं करता तो इसका मतलब यह नहीं है कि मैं सीरियसली एक्टिंग नहीं करता हूं। अगर मैं हर फिल्म में सेम हूं तो लोग बीस सालों से मेरी फिल्में क्यों देख रहे हैं? एक ही फिल्म देखते रहते। हर फिल्म में कुछ तो अलग करता ही हूं न। क्या अभी एक्टिंग के बारे में बोलना शुरू कर दूं कि क्या-क्या किया? आपको जवाब दे सकता था कि मैंने बहुत मेहनत की और लीन हो गया रोल के अंदर और छह महीने तक... ऑस्कर वाइल्ड ने लिखा था कि दुनिया का सबसे बोरिंग आदमी होता है वह, जो हाउ आर यू पूछने पर अपने बारे में बताने लगता है। टेक्नीकल बातें मैं क्या बताऊं? मौका और दस्तूर देखकर हम लोग काम करते हैं। डान एकदम स्टाइलिश है तो स्टाइल से चलूंगा, बैठूंगा, बातें करूंगा। बाल, कपड़े, बंदूक ़ ़ ़ सब कुछ स्टाइल में होंगे। अभी रा 1 करूंगा तो वही सुपरहीरो बनूंगा। मैं तो कहता हूं कि इंटेंस एक्टर से जरा बगीचे में तुझे देखा तो ये जाना सनम करा के दिखा दो। मैं वो कर सकता हूं और चक दे भी कर सकता हूं। अभी मुझे सीरियस एक्टिंग नहीं करनी है। मुझे कुछ हंसी की पिक्चर करनी है।
अवार्ड और एक्टिंग
किसी ने कहा था कि कामेडी करो तो लोग उसे एक्टिंग न हीं मानते। मुझे लगता है कि गोविंदा को अवश्य नेशनल अवार्ड मिलना चाहिए। मेरी बड़ी तमन्ना है नेशनल अवार्ड जीतने की। मुझे लगा कि चक दे और स्वदेस में मैंने अच्छा किया। वही एक अवार्ड मुझे नहीं मिला है। मेरी तमन्ना है कि आस्कर मिलने से पहले नेशनल मिल जाए तो अच्छा रहेगा। नहीं तो सभी को बुरा लगेगा कि देखो आस्कर मिल गया, नेशनल नहीं मिला। नेशनल अवार्ड मिले तो बच्चे भी खुश होंगे।
करण जौहर
वे जिस उम्र और मुकाम पर रहते हैं, उसी पर फिल्म बनाते हैं। 25-26 साल की उम्र में उन्होंने कुछ कुछ होता है बनायी थी। फिर डैडी के साथ उनका रिलेशन बेहतर हुआ और फैमिली को करीब से समझा तो उन्होंने कभी खुशी कभी गम बनाई। कल हो न हो बनाते समय उनके पिता की मौत हुई। उसके बहुत उनके सारे दोस्तों के विवाह टूट रहे थे तो उन्होंने कभी अलविदा ना कहना बनाई। अभी उन्होंने माय नेम इज खान बनाई है। इसमें आज का मुद्दा है।
इंडिया का मुसलमान
मेरी जिंदगी खुशहाल है। मैं इंडिया का मुसलमान हूं। हिंदू डोमिनेटेड देश में सुपर स्टार हूं। हिंदू से शादी हुई है मेरी। मुझे कभी कोई परेशानी नहीं हुई। न तो देश के अंदर और न देश के बाहर। मैं तो हर तरह से सही हूं, लेकिन दूसरों की कहानियां सुनता हूं तो मुझे लगता है कि इस पर बातें होनी चाहिए। मैंने महसूस किया है कि अभी परसेप्शन बदल रहा है।
एक किस्सा
दुनिया के एक अमीर आदमी से एक रिपोर्टर ने पूछा कि तुम्हारे पास इतने पैसे हैं। बड़ा बिजनेस है। हर बार ठीक बिजनेस कैसे कर लेते हो? अमीर ने कहा, हमेशा सही डिसीजन लेता हूं। भला यह भी कोई बात हुई? चलो, यही बताओ कि सही डिसीजन कैसे लेते हो? रिपोर्टर का अगला सवाल था। अमीर आदमी ने जवाब दिया, एक्सपीरिएंस से... फिर रिपोर्टर ने पूछा, एक्सपीरिएंस कहां से आया? अमीर ने जवाब दिया, गलत डिसीजन से, बार-बार गलत डिसीजन लेने से एक्सपीरिएंस हो गया।

Tuesday, June 30, 2009

दो तस्वीरें:माई नेम इज खान में काजोल और शाहरुख़




यह फ़िल्म अभी बन रही है.करण जौहर अपने कलाकारों के साथ अमेरिका में इस फ़िल्म की शूटिंग कर रहे हैं.मन जा रहा है की करण पहली बार अपनी ज़मीन से अलग जाकर कुछ कर रहे हैं.हमें उम्मीद है कि काजोल और शाहरुख़ के साथ वे कुछ नया करेंगे...