Search This Blog

Showing posts with label कबीर खान. Show all posts
Showing posts with label कबीर खान. Show all posts

Monday, June 19, 2017

बेवकूफ हैं जंग के पैरोकार – सलमान खान



जंग के पैरोकारों को लगता है, वे बच जाएंगे!...हाहाहा सलमान खान
हॉलीवुड में सुपरमैन और स्‍पाइडरमैन जैसे सुपरहीरो, जिन्‍हें देखने के लिए दुनिया के अधिकांश देशों के दर्शक इंतजार करते होंगे। भारत में खास कर हिंदी दर्शकों को तो सलमान(Sal Man) का इंतजार रहता है। पिछले कुछ सालों से वे अपनी फिल्‍मों की ईदी लेकर दर्शकों के बीच मनोरंजन बांटने आ जाते हैं। उन्‍होंने धीरे-धीरे एक फार्मूला तैयार किया है। वे इस फार्मूले के दायरे के बाहर नहीं जाते। उन्‍होंने अपनी सीमाओं के अंदर ही खूबियां खोज ली हैं और दर्शकों के चहेते बने हुए हैं। इस साल ईद के मौके पर उनकी फिल्‍म ट्यूबलाइट आ रही है। कबीर खान के साथ तीसरी बार उनकी जुगलबंदी नजर आएगी। एक था टाइगर और बजरंगी भाईजान की कामयाबी और तारीफ के बाद ट्यूबलाइट में उनकी जोड़ी फिर से दर्शकों को हंसाने और रुलाने आ रही है। सलमान खान ने झंकार के पाठकों के लिए अजय ब्रह्मात्‍मज से बातें कीं।
- ट्यूबलाइट की रिलीज के मौके पर हिंदी प्रदेशों के दर्शकों को क्‍या बताना चाहेंगे?
0 आप ने नोटिस किया होगा कि पिछले कुछ सालों से मैं वैसी ही फिल्‍में कर रहा हूं, जैसी हम अपने बचपन में देखा करते थे। उन फिल्‍मों के पोस्‍टर भी हमें आकर्षित करते थे। उन फिल्‍मों को देख कर थिएटर से निकलते समय ऐसी फीलिंग आती थी कि हमें भी ऐसा हीरो बनना है। मैा इन दिनों चुन कर वैसी ही फिल्‍में कर रहा हूं। फिल्‍मों का चुनाव इस आधार पर हो रहा है कि स्क्रिप्‍ट सुनते समय ही वह मुझे सारे काम छोड़ कर फिल्‍म शुरु करने का जोश दें। अगर मुझे हीरो और बाकी किरदार पसंद आ जाएं...स्‍क्रीनप्‍ले पसंद आ जाए और अंदरूनी फीलिंग आए कि फिल्‍म देख कर निकलते समय दर्शक खुश दिखें। वे हंस कर निकलें या रो कर निकलें...वे खुश दिल दिखें। या फिर उनकी चाल में मस्‍ती और स्‍वैग हो।- इन फिल्‍मों का उद्देश्‍य भी ध्‍यान में रहता है क्‍या?
0 बिल्‍कुल...अभी अपने लिए फिल्‍में नहीं करता। कोई गोल, कोई मकसद तो हो। फिल्‍म का हीरो लार्जर दैन लाइफ हो...वह अपने इमोशन से हिला दे। लार्जर दैन लाइफ का मतलब केवल यह नहीं होता कि हीरो दस लोगो को उठा कर पटक दे। दिल और दिमाग का ऐसा खेल हो कि साधारण दिख रहा व्‍यक्त्‍िा सभी का दिल जीत ले। परिवार, मोहल्‍ला, समाज और देश के लिए वह कुछ करे। उस पर सभी नाज करें। जिस पर शुरू में भरोसा नहीं रहा हो तो फिल्‍म के अंत तक सभी उस पर यकीन करने लगें। मेरी जिंदगी का सफर ऐसा ही रहा है। मेरी फिल्‍मों का हीरो कुछ-कुछ मेरे जैसा ही होता है।-खास कर बीइंग ह्ययूमन के तहत आप जो कर रहे हैं, उससे आप की छवि बदली है...0 बीइंग ह्यूमन की फिलासफी तो मेरे पैदा होने से पहले की है। मेरे वालिद और मां ने अपने बुजुर्गों से जो सीखा, वही हमें सिखाया। मैं उसे ही कंटीन्‍यू कर रहा हूं। मैंने सिर्फ इतना किया कि उसे एक संगठन का रूप दे दिया। बीइंग ह्यूमन के अस्तित्‍व में आने के पहले लोग हमें खूब बेवकूफ बना के जा रहे थे। लूट रहे थे। उसका बुरा असर यह होता था कि अगले जरूरतमंद की मदद नहीं हो पाती थी। पिछले का गुस्‍सा अगले पर निकलता था और बेकसूर व्‍यक्ति फंस जाता था। हमने छलियों को निकालने के लिए यह चैरीटेबल ट्रस्‍ट आरंभ किया। हम किसी को पैसे नहीं देते। हम स्‍कूलों की मदद कर रहे हैं। अस्‍पतालों को दान देते हैं। व्‍यक्तियों की मदद नहीं करते। अगर कोई शादी के लिए दो लाख मांगता है तो यही कहता हूं कि शादी के लिए अस्‍सी रुपए लेकर जाओ। मेरे माता-पिता की शादी अस्‍सी रुपए में हुई थी।
-ट्यूबलाइट के बिष्‍ट(लक्ष्‍मण और भरत) बंधुओं के बारे में बताएं?
0 दो भाई हैं। उनके मां-बाप नहीं हैं। बड़ा भाई लक्ष्‍मण मंदबुद्धि है। वह इतना सिंपल और सीधा है कि पूरा गांव उसे ट्यूबलाइट समझता है। वह बहुत ही प्‍यारा किरदार है। छोटा भाई उसे अपना हीरो समझता है। दोनों भाइयों के बड़े होने पर उनकी भूमिकाएं बदल जाती हैं। छोटा भाई वास्‍तव में बड़े भाई की तरह केयरिंग हो जाता है। भारत-चीन युद्ध के मौके पर गांव में बहाली चलती है। उसमें छोटा भाई क्‍वालीफाई कर जाता है। बड़ा भाई मतिमंद होने की वजह से नहीं चुना जाता। बड़ भाई अकेला रह जाता है। शुरु में वे इसे सामान्‍य बात मानते हैं कि बोर्डर पर जाना है और लौट आना है। जंग छिड़ जाती है और काफी जवान मारे जाते हैं। छोटा भाई नहीं लौटता। अब बड़ा भाई लक्ष्‍मण अपना यकीन जाहिर करता है कि वह छोटे भाई को ले आएगा। यह उसके पक्‍के यकीन की कहानी है। वह मिन्‍नतें करता है अपने तई कोशिश करता है। वह एक्‍शन में नहीं आता कि भाई को किसी के चंगुल से छुड़ा कर लाएगा। लक्ष्‍मण को यकीन है कि जंग रुकेगी और उसका भाई मौत के मुंह से लौट आएगा। उनके जवान अपने मां-बाप के पास लौट जाएंगे और हमारे जवान अपने भाइयों के पास आ जाएंगे। इसी कहानी में ट्विस्‍ट एंड टर्न और रोलर कोस्‍टर राइड है।
-इसे बजरंगी भाईजान जैसी फिल्‍म ही माना जा रहा है?
0 इमोशनली यह बजरंगी भाईजान से अधिक स्‍ट्रांग है। यह मैच्‍योर, लाइटर और इमोशनली गहरी जड़ों की फिल्‍म है। यह दो भाइयों की कहानी है ऑन स्‍क्रीन, जो ऑफ स्‍क्रीन भी भाई हैं। इसमें एक्टिंग और परफारमेंस नहीं है। भाई के प्रति भाई की फीलिंग है।- आप दोनों फिल्‍म में किस उम्र के बताए गए हैं?
0स्‍क्रीन एज तो है ही नहीं...पचास साल के तो हो चुके हैं। हमलोग तीन-चार के होते हैं। फिर थोड़े बड़े होते हैं और बाद में 26-27 साल के बताए गए हैं। हिंदी फिल्‍मों के हीरो की उम्र नहीं बताई जाती।
-फिल्‍म में दोनों भाइयों के साथ हाने से कोई निजी चुहलबाजी भी पर्दे पर आई है क्‍या?
0 वह तो आ ही जाती है। रियल लाइफ कनेक्‍ट पर्दे पर दिखता है। अभी जो गाना चल रहा है, उसमें हमारी केमिस्‍ट्री दिख रही है। कोई दूसरा एक्‍टर और बड़ा स्‍टार रहता तो वह रियल नहीं लगता। कुछ लोग कह रहे हैं कि भाई को प्रोमोट कर रहा हूं। अरे भाई, भाई-भाई की फिल्‍म है, इसलिए भाई को लिया। एक्‍ट करते समय ऐसी फीलिंग भी आई कि कहीं सचमुच में ऐसा हुआ तो क्‍या होगा...कल्‍पना में वास्‍तविकता का एहसास डरा गया। इस फिल्‍म में सोहैल के होने की वजह से हमेशा लगता रहा कि घर पर ही हैं। यह एक ईमानदार कोशिश है।
-आप ने शुरू में कहा कि यह फिल्‍म देख कर दर्शक निकलें तो आप की तरह बनना चाहें। आप जब बड़ हो रहे थे तो आप किस की तरह होना चाहते थे?
0 ब्रूस ली की फिल्‍में आती थीं तो थिएटर के बाहर झगड़ा हो ही होता था। केकड़ से केकड़ा आदमी भी खुद को ब्रूस ली समझता था। इस फिल्‍म से मैंने सबक लिया कि पर्दे की बात जिंदगी में भी की जा सकती है। मैं लक्ष्‍मण बनना चाहता हूं। मैं आश्‍वस्‍त हूं कि यह फिल्‍म अचेतन रूप से दर्शकों को प्रभावित करेगी। मुश्किलों में आप लक्ष्‍मण होना चाहेंगे। अपने यहां दिलीप कुमार की तरह किसी और ने असर नहीं डाला। मनोज कुमार की देशभक्ति की फिल्‍में मुझे बहुत अच्‍छी लगती थीं। अमिताभ बच्‍चन की मेरे डैड की फिल्‍मों में निभाई एंग्री यंगमैन की भूमिकाएं बहुत पसंद थीं। वह अलग और नया किरदार था। अपनी चाल-ढाल और अदाकारी से एक्‍शन फिल्‍मों में भी खूब जंचे।-चीन की अभिनेत्री जू जू के साथ कैसा अनुभव रहा?
0 बहुत अच्‍छा। वह चीनी फिल्‍मों के साथ इंटरनेशनल प्रोजेक्‍ट भी कर चुकी हैं। प्रोफेशनल और सुलझी हुई लड़की है। अपनी संस्‍कृति साथ लेकर चलती हैं।
-हिंदी फिल्‍मों और भारतीय समाज में चीन की छवि निगेटिव है। क्‍या आप की...0 हम ने वह टच ही नहीं किया। हम ने वॉर की भी बात नहीं की है।- अभी पूरी दुनिया में जंग सी छिड़ी है। ऐसा लग रहा कि तीसरा  विश्‍वयुद्ध कभी भी हो सकता है... आप कुछ कहना चाहेंगे?
0ऊपर वाला हमें बचाए। कितने बेवकूफ हैं जंग के पैरोकार? क्‍या उन्‍हें नहीं मालूम कि जंग होगी तो सभी मारे जाएंगे। उन्‍हें लगता है कि वे बच जाएंगे...हाहाहा।-आखिरी सवाल, क्‍या ट्यूबलाइट आप की ईदी है दर्शकों के लिए?
0 मेरी यह फिल्‍म देखें और अपना प्‍यार बनाए रखें। ईद के तोहफे के बाद क्रिसमस की गिफ्ट भी ला रहा हूं। हमारा काम एंटेरटेन करना सा है। वहीं करते रहेंगे। यही चाहूंगा कि मेरी फिल्‍म देखने के लिए पूरा परिवार इकट्ठा हो और साथ में फिल्‍म देखे।

-          


Wednesday, July 22, 2015

मेनस्ट्रीम स्पेस में ही कुछ कहना है- कबीर खान

-अजय ब्रह्मात्‍मज
कबीर खान हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के अनोखे निर्देशक हैं। उनकी मेनस्ट्रीम फिल्मों में कंटेंट की पर्याप्त मात्रा रहती है। वे खुद को राजनीतिक रूप से जागरूक और सचेत फिल्मकार मानते हैं। उनकी फिल्में सबूत हैं। इस बार वे ‘बजरंगी भाईजान’ लेकर आ रहे हैं। उन्होंने झंकार के लिए अजय ब्रह्मात्मज से बातचीत की  ¸ ¸ ¸

-‘बजरंगी भाईजान’ में बजरंगी का सफर सिर्फ भावनात्मक है या उसका कोई राजनीतिक पहलू भी है?
भारत-पाकिस्तान का संदर्भ आएगा तो राजनीति आ ही जाएगी। मेरी कोशिश रहती है कि फिल्मों का संदर्भ रियल हो। मैं मेनस्ट्रीम सिनेमा में रियल बैकड्रॉप की कहानी कहता हूं। बिना राजनीति के कोई इंसान जी नहीं सकता। मुझे राजनीतिक संदर्भ से हीन फिल्में अजीब लगती हैं। राजनीति से मेरा आशय पार्टी-पॉलिटिक्स नहीं है। ‘बजरंगी भाईजान’ में स्ट्रांग राजनीतिक संदर्भ है।
-पहली बार किसी फिल्म इवेंट में आप के मुंह से ‘पॉलिटिक्स ऑफ द फिल्म’ जैसा टर्म सुनाई पड़ा था?
मेरे लिए वह बहुत जरूरी है। अपने यहां इस पर बात नहीं होती। समीक्षक भी फिल्म की राजनीति की बातें नहीं कहते। मैं फिल्म में कोई भी कमी बर्दाश्त कर सकता हूं। फिल्म की पॉलिटिक्स खराब हो तो मैं फिल्म नहीं देख सकता। दुर्भाग्य से लिखते समय विश्लेषण में समीक्षक और फिल्म लेखक उस पर बातें ही नहीं करते, जबकि फिल्म की पॉलिटिक्स सबसे ज्यादा जरूरी चीज है। वह सही हो तो कम से कम फिल्मकार की राजनीति समझ में आए। सहमति-असहमति दीगर बात है। मेरी सर्वाधिक प्रिय फिल्म ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ है। वह अत्यंत राजनीतिक फिल्म है। उसका एक गहरा असर है। उस फिल्म में घोषित रूप से राजनीति की बातें नहीं हैं, लेकिन वह फिल्म अपनी राजनीति की वजह से सभी को अच्छी लगती हैं। अनेक फिल्मों में क्राफ्ट बेहतर होता है, लेकिन पॉलिटिक्स नहीं रहती। वैसी फिल्में दर्शक भी नहीं देखते। ऐसी फिल्में नहीं चल पातीं।
-फिर ‘बजरंगी भाईजान’ की क्या पॉलिटिक्स है?
सिंपल है। ‘बजरंगी भाईजान’ वास्तव में नेक इंसान होना है। आप किसी भी धार्मिक और राजनीतिक विचार के हों। आप बॉर्डर के इस तरफ हो या उस तरफ... आखिरकार इंसानियत सभी सीमाओं को तोड़ देती है। हम सभी चीजों को देखने-समझने का एक स्टीरियोटाइप बना देते है। उससे हमारी सोच प्रभावित होती है। ‘बजरंगी भाईजान’ इंसानियत की बात करती है। धार्मिक, राजनीतिक, वैचारिक और अन्य सीमाओं से ऊपर उठकर बातें करती है।
- आप ने पाकिस्तान का नाम कब सुना था और क्या धारणा थी?
नाम तो बहुत पहले सुन लिया था। मेरे पिता  रसीद्दुदीन खान जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में पॉलिटिकल साइंस के प्रोफेसर थे। घर में एकेडेमिक माहौल था। पॉलिटिकल डिस्कसन चलता रहता था। मेरी फिल्मों में भी पॉलिटिक्स रिफ्लेक्ट करता है।
-पाकिस्तान को लेकर समाज में अनेक धारणाएं प्रचलित हैं। खास किस्म की राजनीति उसे हवा भी देती है?
समस्या यह है कि पाकिस्तान का एक पॉलिटिकल क्लास है। उनके काम की जिम्मेदारी हम अवाम पर डाल देते हैं। पाकिस्तान के प्रशासन से मेरे मतभेद हैं। वे बहुत बुरा गेम खेल रहे हैं। वहां के अवाम को हम क्यों बुरा समझें? वे उतने ही परेशान हैं, जितने हम। आतंकवाद से उनका ज्यादा नुकसान हो रहा है। पिछले दस सालों में हमने जितनी जानें गंवाई हैं, उससे कई गुना पाकिस्तान गंवा चुका है। ‘काबुल एक्सप्रेस’ के समय भी यह प्रॉब्लम थी। अफगान सुनते ही टेररिस्ट का ख्याल आता है। तालिबान के हाथों सबसे च्यादा कौन मारे गए- अफगानी। हमें समझना होगा कि देश की राजनीति और देश का अवाम दोनों अलग चीजें हैं। ‘न्यूयॉर्क’ में भी मैंने यही कहने की कोशिश की थी।
-पॉलिटिक्स पर इतना जोर क्यों देते हैं?
वह डॉक्युमेंट्री के दिनों से आया है। मैंने सईद नकवी के साथ काम किया है। पांच सालों में उनके साथ सीएनएन और बीबीसी से अलग नजरिए से घटनाओं को देखने की कोशिश में राजनीतिक समझ बढ़ती गई। दक्षिण एशिया के संदर्भ और दृष्टिकोण से में मैंने सब कुछ देखा। जो हमें बताया जाता है और जो होता है, उन दोनों के बीच से मेरी कहानियां निकलती हैं। मेरी पांचों फिल्में उसी जोन की हैं।
-डॉक्यूमेंट्री से फिल्मों में आने की क्या वजह रही?
मैं वहां सफल था। डॉक्यूमेंट्री बनाने के बाद मुझे लगा कि भारत में उनके लिए स्पेस नहीं है। मेरी फिल्में विदेशों में दिखाई जा रही थीं। उन्हें भारत के दर्शक नहीं मिल रहे थे। मुझे संतोष नहीं हो रहा था। फिर समझ में आया कि मेनस्ट्रीम सिनेमा से बड़ा प्लेटफॉर्म भारत में नहीं है। अपने देश में सिनेमा के माध्यम से कई बातें कहीं जा सकती हैं। मेरा मकसद मेनस्ट्रीम स्पेस में ही कुछ कहना है। वैकल्पिक स्पेस में कुछ कहना या बताना तो जानकारों के बीच ही रहना है। उनकी वाह-वाह से कहीं पहुंचा नहीं जा सकता है। दर्शकों की तलाश में मैं फिल्मों में आया।
-शुरू में दिक्कतें हुई होंगी? यहां आउटसाइडर को जल्दी मौके नहीं मिलते। आप का कैसा अनुभव रहा?
मुझे खुशी है कि ‘यशराज फिल्म्स’ से मुझे मौके मिले। उसके पहले मैं ‘काबुल एक्सप्रेस’ की स्क्रिप्ट लेकर घूम रहा था। सभी स्क्रिप्ट की तारीफ करते थे, लेकिन कोई पैसे देने को तैयार नहीं था। कहीं से मेरी स्क्रिप्ट आदित्य चोपड़ा के पास पहुंची। उनका फोन आया तो पहले लगा कि कोई मजाक कर रहा है। आदि ने पांच मिनट में स्क्रिप्ट फायनल कर दी। दो महीनों के बाद शूटिंग आरंभ हो गई। फिर उनकी तरफ से ‘न्यूयॉर्क’ का सुझाव आया। वे मुझे मेनस्ट्रीम तक ले आए। यशराज के लिए वह वह बड़ा जोखिम था। उसके बाद ‘एक था टायगर’ आई। इस फिल्म में सलमान से संबंध बना और फिर ‘बजरंगी भाईजान’ आ गई। अब मुझे निर्माता मिल रहे हैं। रिलीज से पहले क्या कहूं, बस इतना समझें कि ‘बजरंगी भाईजान’ सलमान खान के लिए भी अलग फिल्म है।
-कैसे बात बनी?
‘बजरंगी भाईजान’ जैसी फिल्म सलमान को लेकर ही बन सकती थी। ‘एक था टायगर’ के समय हुई दोस्ती काम आई। हम दोनों कुछ अलग करना चाहते थे। हम दोनों एक पेज पर थे। इस फिल्म में हम दोनों की परस्पर समझदारी से मदद मिली। हम दोनों को इस फिल्म में बहुत यकीन है। तभी इसकी स्क्रिप्ट सुनते ही सलमान ने कहा था कि इसे हम खुद प्रोड्यूस करेंगे। इस फिल्म में सही ब्लेंडिंग हुई। सब कुछ रियल है और मेनस्ट्रीम माउंटिंग है।
- क्या इस ट्रांजिशन में कुछ समझौते भी करने पड़े?
‘एक था टायगर’ में जरूर समझौते करने पड़े थे। इस फिल्म में ऐसा कुछ नहीं है। यह फिल्म उदाहरण है कि कैसे मेनस्ट्रीम सिनेमा में कंटेंट लेकर आ सकते हैं।
-हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के अराजनीतिक माहौल में आप अपनी सोच कैसे रख पाते हैं? क्या उसे छिपा कर पेश करते हैं?
छिपा कर तो नहीं, लेकिन थोड़ी संवेदना और समझ के साथ बताना पड़ता है। फिल्मों में आप बहुत नोकदार बातें नहीं कर सकते। वैसे इस फिल्म में चुभने वाली बातें हैं। उस पर रिएक्शन होगा। इस फिल्म में मैंने चुटीली बातें मजाकिया लहजे में रखी हैं। अनेक शार्प कमेंट मिलेंगे।
-‘बजरंगी भाईजान’ शीर्षक की क्या कहानी है?
फिल्म की कहानी से निकला है यह शीर्षक। कैसे बजरंगी ‘बजरंगी भाईजान’ बन जाता है।
-कलाकारों के चुनाव के पीछे की सोच के बारे में कुछ बताएं?
सलमान खान को तो होना ही था। इस फिल्म का किरदार उनके बहुत करीब है। उन्होंने अच्छी तरह उस किरदार को  पर्दे पर पेश किया है। कैरेक्टर का एक्टर से आइडेंटिफिकेशन होना चाहिए। मैं हमेशा कास्टिंग के बाद स्क्रिप्ट लिखता हूं। एक्टर की खूबियां  उसमें डालता हूं। रीराइट करने पर एक्टर को सहूलियत होती है। मुझे भी आसानी रहती है। नवाज तो अपनी पीढ़ी के उम्दा अभिनेता हैं। कैरेक्टर लिखते समय नवाज ही ध्यान में थे।
- आप की फिल्म के शीर्षक पर आपत्ति है?
 जो आपत्ति कर रहे हैं, मेरी फिल्म उन लोगों के लिए ही है। उन्हें अपनी संकीर्णता खत्म करनी चाहिए। उन्हें इस देश की महानता की समझ नहीं है। इस तरफ और उस तरफ के कट्टरपंथियों के लिए ही फिल्म बनाई है, जिन्हें यह फिल्म देख कर शर्म आएगी।
-अभी के माहौल में आप जैसी सोच के साथ काम करना आसान है क्या?
हमें अपनी लड़ाई जारी रखनी होगी। अगर कुछ चीजें गलत हो रही हैं तो हमें बोलना होगा। उन सभी को बोलना होगा, जिनकी पहचान है। सोच-विचार के बिना आदमी होने का तो कोई मतलब ही नहीं रह जाता। उसकी वजह से हम जानवरों से अलग होते हैं। सलमान खान के स्टारडम के पॉवर का इस्तेमाल मैंने एक सही बात रखने में किया है। वे खुद ऐसी सोच में यकीन रखते हैं।
-शूटिंग के दरम्यान ही सलमान खान का मामला कोर्ट में चल रहा था। सुनवाई के आगे-पीछे सेट पर सलमान खान किस तरह पेश आते थे। कैसे नजर आते थे?
वे कभी सेट पर अपनी सच्ची भावना जाहिर नहीं करते थे। जाहिर तौर पर वे स्वयं स्ट्रेस में रहे होंगे, लेकिन उन्होंने कभी किसी को टेंशन नहीं दिया। बाहर जो भी हो रहा हो , लेकिन हमें पता था कि क्या हो सकता है? रिलीफ तो मिलना ही था। शूटिंग के आखिरी दिन तक वे पहले दिन के मूड में रहे। उनकी मौजूदगी में माहौल हल्का-फुल्का रहता है। मैं भी चाहता हूं कि फिल्ममेकिंग की जर्नी में मजा आना चाहिए। अगर प्रॉसेस में आनंद नहीं आएगा तो फिल्म बुरी हो जाएगी। अपने मामले की आंच से उन्होंने हमें दूर ही रखा।
- मुझे लगता है कि सलमान खान के फंडे स्पष्ट हैं, वे इतने सिंपल हैं कि सही रहते हैं। वे अच्छे वक्ता नहीं हैं। मुमकिन है कि वे अपनी सोच ढंग से नहीं रख पाते हों,  लेकिन उनकी फटकार में सच्चाई रहती है?
बिल्कुल सही ऑब्जर्वेशन है आप का। वे इतने सिंपल हैं कि हमेशा पॉलिटिक्ली राइट रहते हैं। वे हर बार कुछ नया नहीं बोलते। उनका दिल सही जगह पर रहता है, इसलिए वे सही बातें करते और कहते हैं। शूटिंग के समय मैंने उनकी दरियादिली देखी है। अगर उनकी मदद से कुछ हो जाए तो उनकी आंखें चमकने लगती हैं। मुझे लगता है कि वे अपनी चैरिटी कामों में सबसे ज्यादा खुश होते हैं। वे बच्चों की तरह चहकने लगते हैं। मुझे तो लगता है कि अब वे फिल्में भी इसलिए करते हैं कि चैरिटी चलती रहे।
 मेरी कोशिश रहती है कि फिल्मों का संदर्भ रियल हो। मैं मेनस्ट्रीम सिनेमा में रियल बैकड्रॉप की कहानी कहता हूं। बिना राजनीति के कोई इंसान जी नहीं सकता। मुझे राजनीतिक संदर्भ से हीन फिल्में अजीब लगती हैं। राजनीति से मेरा आशय पार्टी-पॉलिटिक्स नहीं है। ‘बजरंगी भाईजान’ में स्ट्रांग राजनीतिक संदर्भ है।
-पहली बार किसी फिल्म इवेंट में आप के मुंह से ‘पॉलिटिक्स ऑफ द फिल्म’ जैसा टर्म सुनाई पड़ा था?
मेरे लिए वह बहुत जरूरी है। अपने यहां इस पर बात नहीं होती। समीक्षक भी फिल्म की राजनीति की बातें नहीं कहते। मैं फिल्म में और कोई भी कमी बर्दाश्त कर सकता हूं। फिल्म की पॉलिटिक्स खराब हो तो मैं फिल्म नहीं देख सकता। दुर्भाग्य से लिखते समय विश्लेषण में समीक्षक में समीक्षक और फिल्म लेखक उस पर बात ही नहीं करते, जबकि फिल्म की पॉलिटिक्स सबसे ज्यादा जरूरी चीज है। वह सही हो तो कम से कम फिल्मकार की राजनीति समझ में आए। सहमति-असहमति दीगर बात है। मेरी सर्वाधिक प्रिय फिल्म ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ है। वह अत्यंत राजनीतिक फिल्म है। उसका एक गहरा असर है। उस फिल्म में घोषित रूप से राजनीति की बातें नहीं हैं, लेकिन वह फिल्म अपनी राजनीति की वजह से सभी को अच्छी लगती हैं। अनेक फिल्मों में क्राफ्ट बेहतर होता है, लेकिन पॉलिटिक्स नहीं रहती। वैसी फिल्में दर्शक भी नहीं देखते। ऐसी फिल्में नहीं चल पाती।
-फिर ‘बजरंगी भाईजान’ की क्या पॉलिटिक्स है?
सिंपल है। ‘बजरंगी भाईजान’ वास्तव में नेक इंसान होना है। आप किसी भी धार्मिक और राजनीतिक विचार के हो। आप बॉर्डर के इस तरफ हो या उस तरफ... आखिरकार इंसानियत सभी सीमाओं को तोड़ देती है। हम सभी चीजोां को देखने-समझने का एक स्टीरियोटाइप बना देते है। उससे हमारी सोच प्रभावित होती है। ‘बजरंगी भाईजान’ इंसानियत की बात करती है। धार्मिक, राजनीतिक, वैचारिक और अन्य सीमाओं से ऊपर उठकर बातें करती है।
- आप ने पाकिसतान का नाम कब सुना था और क्या धारणा थी?
नाम तो बहुत पहले सुन लिया था। मेरे पिता  रसीद्दुदीन खान जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में पॉलिटिकल साइंस के प्रोफेसर थे। घर में एकेडेमिक माहौल था। पॉलिटिकल डिसकसन चलता रहता था। मेरी फिल्मों में भी पॉलिटिक्स रिफ्लेक्ट करता है। पॉलिटिकल बैकड्रॉप के बगैर मैं सबजेक्ट ला ही नहीं सकता।
-पाकिस्तान को लेकर समाज में अनेक धारणाएं प्रचलित हैं। खास किस्म की राजनीति उसे हवा भी देती है?
समस्या यह है कि पाकिस्तान का एक पॉलिटिकल क्लास है। उनके काम की जिम्मेदारी हम अवाम पर डाल देते हैं। पाकिस्तान के प्रशासन से मेरे मतभेद हैं। वे बहुत बुरा गेम खेल रहे हैं। वहां के अवाम को हम क्यों बुरा समझें? वे उतने ही परेशान हैं, जितने हम। आतंकवाद से उनका ज्यादा नुकसान हो रहा है। पिछले दस सालों में हमने जितनी जानें गंवाई हैं, उससे कई गुना पाकिस्तान गंवा चुका है। ‘काबुल एक्सप्रेस’ के समय भी यह प्रॉब्लम थी। अफगान सुनते ही टेररिस्ट का ख्याल आता है। तालिबान के हाथों सबसे ज्यादा कौन मारे गए- अफगानी। हमें समझना होगा कि देश की राजनीति और देश का अवाम दोनों अलग चीजें हैं। ‘न्यूयॉर्क’ में भी मैंने यही कहने की कोशिश की थी।
-पॉलिटिक्स पर इतना जोर क्यों देते हैं?
वह डॉक्युमेंट्री के दिनों से आया है। मैंने सईद नकवी के साथ काम किया है। पांच सालों में उनके साथ सीएनएन और बीबीसी से अलग नजरिए से घटनाओं को देखने की कोशिश में राजनीतिक समझ बढ़ती गई। दक्षिण एशिया के संदर्भ में मैंने सब कुछ देखा। जो हमें बताया जाता है और जो होता है, उन दोनों के बीच से मेरी कहानियां निकलती हैं। मेरी पांचों फिल्में उसी जोन की हैं।
-डॉक्यूमेंट्री से फिल्मों में आने की क्या वजह रही?
मैं सफल था। डॉक्यूमेंट्री बनाने के बाद मुझे लगा कि भारत में उनके लिए स्पेस नहीं है। मेरी फिल्में विदेशों में दिखाई जा रही थीं। उन्हें भारत के दर्शक वर्ग नहीं मिल रहे थे। मुझे संतोष नहीं हो रहा था। फिर समझ में आसा कि मेनस्ट्रीम से बड़ा प्लेटफॉर्म नहीं है। अपने देश में सिनेमा के माध्यम से कई बातें कहीं जा सकती हैं। मेरा मकसद मेनस्ट्रीम स्पेस में ही कुछ कहना है। वैकल्पिक स्पेस में कुछ कहना या बताना तो जानकारों के बीच ही रहता है। उनकी वाह-वाह से कहीं पहुंचा नहीं जा सकता है। दर्शकों की तलाश में फिल्मों में आया।
-शुरू में दिक्कतें हुईं? यहां आउटसाइडर को जल्दी मौके नहीं मिलते। आप का कैसा अनुभव रहा?
मुझे खुशी है कि ‘यशराज फिल्म्स’ से मुझे मौके मिले। उसके पहले मैं ‘काबुल एक्सप्रेस’ की स्क्रिप्ट लेकर घूम रहा था। सभी स्क्रिप्ट की तारीफ करते थे, लेकिन कोई पैसे देने को तैयार नहीं था। कहीं से स्क्रिप्ट आदित्य चोपड़ा के पास पहुंची। उनका फोन आया तो पहले लगा कि कोई मजाक कर रहा है। आदि ने पांच मिनट में स्क्रिप्ट फायनल कर दी। दो महीनों के बाद शूटिंग आरंभ हो गई। फिर उनकी तरफ से ‘न्यूयॉर्क’ का सुझाव आया। वे मुझे मेनस्ट्रीम तक ले आए। यशराज के लिए वह वह बड़ा जोखिम था। उसके बाद ‘एक था टाईगर’ आई। इस फिल्म में सलमान से संबंध बना और फिर ‘बजरंगी भाईजान’ आ गई। अब मुझे निर्माता मिल रहे हैं। रिलीज से पहले क्या कहूं, बस इतना समझें कि ‘बजरंगी भाईजान’ सलमान खान के लिए भी अलग फिल्म है।
-कैसे बात बनी?
‘बजरंगी भाईजान’ जैसी फिल्म सलमान को लेकर ही बन सकती थी। ‘एक था टाइगर’ के समय हुई दोस्ती काम आई। हम दोनों कुछ अलग करना चाहते थे। हम दोनों एक मेज पर थे। इस पिुल्म में हम दोनों की समझदारी से मदद मिली। हम दोनों को इस फिल्म में बहुत यकीन है। तभी इसकी स्क्रिप्ट सुनते ही सलमान ने कहा था कि इसे हम खुद प्रोड्यूस करेंगे। इस फिल्म में सही ब्लेंडिंग हुई। सब कुछ रियल है और मेनस्ट्रीम माइंडिंग है।
- क्या इस ट्रांजिशन में कुछ समझौते भी करने पड़े?
‘एक था टायगर’ में जरूर समझौते करने पड़े थे। इस फिल्म में ऐसा कुछ नहीं है। यह फिल्म उदाहरण है कि कैसे मेनस्ट्रीम सिनेमा में कंटेट लेकर आ सकते हैं।
-हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के राजनीतिक माहौल में आप अपनी सोच कैसे रख पाते हैं? क्या उसे छिपा कर पेश करते हैं?
छिपा कर तो नहीं, लेकिन थोड़ी संवेदना और समझ के साथ बताना पड़ता है। फिल्मों में आप बहुत नोकदार बातें नहीं कर सकते। वैसे इस फिल्म में चुभने वाली बातें हैं। उस पर रिएक्शन होगा। इस फिल्म में मैंने चुटीली बातें मजाकिया लहले में रखी हैं। अनेक शार्प कमेंट मिलेंगे।
-‘बजरंगी भाईजान’ शीर्षक की क्या कहानी है?
फिल्म की कहानी से निकला यह शीर्षक। कैसे बजरंगी फिल्म में ‘बजरंगी भाईजान’ बन जाता है।
-कलाकारों के चुनाव के पीछे की सोच के बारे में कुछ बताएं?
सलमान खान को तो होना ही था। इस फिल्म का किरदार उनके बहुत करीब है। उन्होंने अच्छी तरह उस किरदार को  पर्दे पर पेश किया है। कैरेक्टर का एक्टर से आइडेंटिफिकेशन होना चाहिए। मैं हमेशा कास्टिंग के बाद स्क्रिप्ट लिखता हूं। एक्टर की खूबियां  उसमें डालता हूं। रीराइट करने पर एक्टर को सहूलियत होती है। मुझे भी आसानी रहती है। नवाज तो अपनी पीढ़ी के उम्दा अभिनेता हैं। कैरेक्टर लिखते समय नवाज ही ध्यान में थे।
- आप की फिल्म के शीर्षक पर आपत्ति है?
 जो आपत्ति कर रहे हैं, मेरी फिल्म उन लोगों के लिए ही है। उन्हें अपनी संकीर्णता खत्म करनी चाहिए। उन्हें इस देश की महानता की समझ नहीं है। इस तरफ या उस तरफ के कट्टरपंथियों के लिए ही फिल्म बनाई है, जिन्हें यह फिल्म देख कर शर्म आएगी।
-अभी के माहौल में आप जैसी सोच के साथ काम करना आसान है क्या?
कुछ नहीं कर सकते। हमें अपनी लड़ाई जारी रखनी होगी। अगर कुछ चीजें गलत हो रही हैं तो हमें बोलना होगा। उन सभी को बोलना होगा, जिनकी पहचान है। सोच और विचार के बिना आदमी होने का तो कोई मतलब ही नहीं रह जाता। उसकी वजह से हम जानवरों से अलग होते हैं। सलमान खान के स्टारडम के पॉवर का इस्तेमाल मैंने एक सही बात रखने में किया है। वे खुद ऐसी सोच में यकीन रखते हैं।
-शूटिंग के दरम्यान ही सलमान खान का मामला कोर्ट में चल रहा था। सुनवाई के आगे-पीछे सेट पर सलमान खान किस तरह पेश आते थे। कैसे नजर आते थे?
वे कभी सेट पर अपनी सच्ची भावना जाहिर नहीं करते थे। जाहिर तौर पर वे स्वयं स्ट्रेस में रहे होंगे, लेकिन उन्होंने कभी किसी को टेंशन नहीं दिया। बाहर जो भी हो रहा हो , लेकिन हमें पता था कि क्या हो सकता है? रिलीफ तो मिलना ही था। शूटिंग के आखिरी दिन तक वे पहले दिन के मूड में रहे। उनकी मौजूदगी में माहौल हल्का-फुल्का रहता है। मैं भी चाहता हूं कि फिल्ममेकिंग की जर्नी में मजा आना चाहिए। अगर प्रॉसेस में आनंद नहीं आएगा तो फिल्म बुरी हो जाएगी। अपने मामले की आंच से उन्होंने हमें दूर ही रखा।
- मुझे लगता है कि सलमान खान के फंडे स्पष्ट हैं, वे इतने सिंपल हैं कि सही रहते हैं। वे अच्छे वक्ता नहीं हैं। मुमकिन है कि वे अपनी सोच ढंग से नहीं रख पाते हों,  लेकिन उनकी फटकार में सच्चाई रहती है?
बिल्कुल सही ऑब्जर्वेशन है आप का। वे इतने सिंपल हैं कि हमेशा पॉलिटिक्ली राइट रहते हैं। वे हर बार कुछ नया नहीं बोलते। उनका दिल सही जगह पर रहता है, इसलए वे सही बातें करते और कहते हैं। शूटिंग के समय मैंने उनकी दरियादिली देखी है। अगर उनकी मदद से कुछ हो जाए तो उनकी आंखें चमकने लगती हैं। मुझे लगता है कि वे अपनी चैरिटी कामों में सबसे ज्यादा खुश होते हैं। वे बच्चों की तरह चहकने लगते हैं। मुझे तो लगता है कि अब वे फिल्में भी इसलिए करते हैं कि चैरिटी चलती रहे।

Friday, July 17, 2015

फिल्‍म समीक्षा : बजरंगी भाईजान

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
सलमान खान की ‘बजरंगी भाईजान’ को देखने के कई तरीके हो सकते हैं। पॉपुलर स्टार सलमान की फिल्में समीक्षा से परे होती हैं। खरी-खोटी लिखने या बताने से बेहतर होता है कि फिल्मों की अपील की बातें की जाएं। सलमान खान की खास शैली है। एक फॉर्मूला सा बन गया है।
 ‘वांटेड’ के बाद से उनकी फिल्मों में इसी का इस्तेमाल हो रहा है। निर्देशक बदलते रहते हैं, लेकिन सलमान खान वही रहते हैं। बात तब अलग हो जाती है, जब उन्हें राजनीतिक रूप से सचेत निर्देशक कबीर खान मिल जाते हैं। मनोरंजन के मसाले मेे मुद्दा मिला दिया जाता है। स्वाद बदलता है और फिल्म का प्रभाव भी बदलता है। कबीर खान ने बहुत चालाकी से सलमान की छवि का इस्तेमाल किया है और अपनी बात सरल तरीके से कह दी है। इस सरलता में तर्क डूब जाता है। तर्क क्यों खोजें? आम आदमी की जिंदगी भी तो एक ही नियम से नहीं चलती। ‘बजरंगी भाईजान’ बड़े सहज तरीके से भारतीय और पाकिस्तानी समाज में सालों से जमी गलतफहमी की काई को खुरच देती है। पॉपुलर कल्चर में इससे अधिक की उम्मीद करना उचित नहीं है। सिनेमा समाज को प्रभावित जरूर करता है, लेकिन दुष्प्रभाव ही ज्यादा दिखते हैं। सद्प्रभाव होता है तो ‘बजरंगी भाईजान’ का स्पष्ट संदेश है कि दोनों देशों की जनता नेकदिल और मानवीय हैं।
         पवन कुमार चतुर्वेदी उर्फ बजरंगी मध्यवर्गीय हिंदू परिवार में पला भोंदू किस्म का लड़का है। हांख्वह बजरंग बली का भक्त और सच्चा एवं ईमानदार लड़का है। उसके पिता कुछ कमाने के उद्देश्य से उसे दिल्ली जाने की सलाह देते हैं। दिल्ली पहुचने पर पवन की मुलाकात रसिका से होती है। दोनों के बीच स्वाभाविक प्रेम होता है। इस बीच एक गूंगी बच्ची भी उसके जीवन में आ जाती है। भटकी लड़की को उसके मां-बाप से मिलाने की कोशिश में बजरंगी गहरे फंसता जाता है। कहानी आगे बढ़ती है और पता चलता है कि बच्ची तो पाकिसतन की है। सरल स्वभाव का पवन उसे पाकिस्तान में उसके घर पहुंचाने की ठान लेता है। इसके बाद फिल्म में तेजी से मोड़ आते हैं। कई बार तर्क और कारण पर ध्यान नहीं दिया जाता। लेखक-निर्देशक जल्दी से अपने ध्येय तक पहुंचना चाहते हैं। वे दर्शकों को भावनात्मक रूप से झकझोरना चाहते हें। इसमें उनकी सहायता पाकिस्तानी टीवी रिपोर्टर चांद करता है। फिल्म जब खत्म होती है तो सभी की आंखें नम होती हैं। गूंगी बच्ची जिसे पवन मुन्नी कहता है और जो अपने मां-बाप की शाहिदा है, उसकी अंतिम पुकार दर्शकों को हिला देती है।
        ‘बजरंगी भाईजान’ हिंदी सिनेमा के इतिहास की उन चंद फिल्मों में से एक होगी, जिसमें पाकिस्तान को दुश्मन देश के तौर पर नहीं दिखाया गया है। देशभक्ति के नाम पर गालियां नहीं दी गई हैं। उन धरणाओं के प्रसंग हैं, जिनसे गलतफहमियां जाहिर होती हैं। दोनों देशों के शासकों और राजनीतिक शक्तियों ने इस वैमनस्य का बढ़ाया है। ‘बजरंगी भाईजान’ मानवीय और सौहार्दपूर्ण तरीके से उन धारणाओं को छेड़ती है। गलतफहमियां दोनों तरु से हें। भारत में रहते हुए हम अपनी कमियों से परिचित होते हैं और पाकिस्तान पहुंचने पर वहां मौजूद गलतफमियों से रूबरू होते हैं। पवन की तरह ही भोंदू टीवी रिपोर्टर की इंसानियत जागती है। बजरंगी में भाईजान लफ्ज जुड़ता है और हम देखते हैं कि कैसे दिल पिघलते हैं। सरहद पर खींची कंटीले तारों के बीच बने फाटक के दरवाजे खुलते हें। ‘बजरंगी भाईजान’ दोनों देशों को करीब लाने का नेक प्रयास करती है। 
          कलाकारों में हर्षाली मल्होरत्रा अपनी मासूमियत से दिल जीत लेती है। वह गूंगी है, लेकिन आंखें और चेहरे से प्रेम का इजहार करती है। नवाजुद्दीन सिद्दीकी की मौजूदगी फिल्म को आगे बढ़ाने के साथ रोचक भी बनाती है। वे दर्शकों को मोहते हें। उनके किरदार और अभिनय में सादगी है। सलमान खान का किरदार इतना सरल और प्रभावशाली है कि वह दर्शकों को अपने साथ लिए चलता है। 
अवधिः 159 मिनट 
**** चार स्‍टार

Monday, July 6, 2015

खुद पर हमेशा रखना चट्टान सा भरोसा -करीना कपूर खान


-अजय ब्रह्मात्‍मज 
-क्या कुछ है ‘बजरंगी भाईजान’ और जाहिर तौर पर क्या निभा रही हैं आप?
फिल्म के साथ सबसे रोचक बात तो यह है कि सलमान के संग फिर से काम कर रही हूं। ‘बॉडीगार्ड’ सफल रही थी। आम जनता भी काफी उत्साहित है कि हम दोनों साथ आ रहे हैं। फिल्म की यूएसपी कबीर खान भी हैं। मैंने पहले कभी उनके संग काम नहीं किया। वह बड़ा रोचक अनुभव रहा। मेरा किरदार बड़ा मजेदार है। वह चांदनी चौक के एक स्कूल में टीचर है। वह कैसे सलमान के किरदार से मिलती है? कैसे एक बच्ची उनकी जिंदगी में आती है? दोनों फिर कैसे उसे उसके घर पहुंचाते हैं, वह सब कुछ फिल्म में है।
- बाकी फिल्म में गाने-वाने तो होंगे ही?
हां, पर वे सब जरा हटकर हैं। ऐसे नहीं कि लंदन में प्रेमी-प्रेमिका नाच-गाना कर रहे हैं।
-और वह टीचर कैसी है? साड़ी वाली या..?
नहीं, यंग और मॉडर्न। टिपिकल चांदनी चौक वाली। वह लुक और फील तो आएगा।
- .. लेकिन दिल्ली वाली लड़कियों का रोल तो आपने पहले भी किया है?
यह वाली बड़ी मैच्योर है। पहले थोड़े बबली, चर्पी किस्म की लड़की का किरदार निभाया था। ‘जब वी मेट’ वाला तो बिल्कुल अलग ही मामला था। हां, उसे लोग मेरा सिग्नेचर रोल कहते हैं, मगर इसमें मेरा अवतार एक बेहद मैच्योर लड़की का है।
-अच्छा और फिल्म में सुनने को मिल रहा है कि पाकिस्तान की लड़की है। वहां से आ जाती है..? अगर इस पर थोड़ी  रौशनी डाल सकें तो, क्योंकि कइयों का मानना है कि जैसे ‘हिना’ में नायक हिंदुस्तान से पाकिस्तान चला जाता है, फिर वह कैसे हिंदुस्तान आता है? यहां उलटे क्रम में वह हो रहा है?
नहीं, जैसा ट्रेलर में दिखाया गया है कि सलमान का किरदार कैसे उस बच्ची को पाकिस्तान छोड़ कर आता है? उस सफर में क्या कुछ होता है, वह है इस फिल्म में। यह ‘हिना’ जैसी नहीं है। वह तो लव स्टोरी थी। यह तो ड्रामा है।
-कबीर खान के संग क्या खास बात लगी?
मेरे ख्याल से वे हमेशा बड़ी पिक्चरें बनाते हैं, लेकिन उनमें अच्छी कहानी होती है। यह नहीं कि उनमें महज गाने चल रहे हैं। वे बड़ी रस्टिक फिल्में बनाते हैं। स्क्रीन पर उनकी फिल्म काफी विश्वसनीय लगती है, इसलिए जिस सलमान को हम उनकी बाकी की फिल्मों में देखते हैं, कबीर की फिल्मों में वह बेहद अलग होता है।
-करीना को हमने ग्रो और मैच्योर होते देखा है। आप अपनी जर्नी को किस तरह देखती हैं?
लोग अक्सर कहते हैं कि एक एक्ट्रेस की शेल्फ लाइफ दस साल की होती है।
- आप के मामले में ऐसा नहीं है?
जी हां, जिस दिन ‘उड़ता पंजाब’ रिलीज होगी, उस दिन इंडस्ट्री में मैं 16 साल पूरे कर लूंगी। एक्टिंग में इतनी ताकत और दिलचस्पी आज भी है कि क्या कहूं? मुझे वह करना पसंद है। अच्छे व निरंतर परफॉरमेंसेज करना भाता है। वह मेरी रगों में दौड़ रहा है। कुछ कमर्शियल फिल्में कई लीक से जुदा फिल्में, सब कुछ करने को मिला है।
-ऑफबीट फिल्में तो आप ने तब ही कर दी थीं, जब उनकी चर्चा नहीं होती थी?
हां, पर लोग अब कह रहे हैं। मैंने विमेन सेंट्रिक फिल्में तो काफी पहले ही कर दी थी।
- पर अब जिस गति से वैसी फिल्में आ रही हैं तो कैसा लगता है?
बड़ी खुशी होती है। आज अभिनेत्रियां अपनी मर्जी व मिजाज की फिल्में कर रही हैं, वह बहुत बड़ी बात है।
- आप वे फिल्में देख पाती हैं ?
हां, कुछ तो देखी हैं, पर सब नहीं देख पाती। हां, उनके बारे में समाचारों में जो कुछ आता है, उनके बारे काफी कुछ पढ़ जरूर पाती हूं। यह भी बड़ी अच्छी बात है कि हर दशक की टॉप अभिनेत्रियां टॉप अभिनेताओं के संग काम रही हैं। वह चाहे शर्मिला जी हों, जिन्होंने राजेश खन्ना के संग काम किया। हेमा जी धर्मेंद्र के साथ। श्रीदेवी अनिल कपूर के संग। रेखा जी अमिताभ जी के साथ। वह तो हमेशा से होता आया है, लेकिन लोग पता नहीं क्यों कहते हैं कि खान के साथ बार-बार काम नहीं करना चाहिए। उन्हें विमेन सेंट्रिक फिल्में करनी चाहिए, पर कमर्शियल फिल्मों का मजबूत वजूद तो है ही। मसाला फिल्में तो बननी ही चाहिए। आम जनता को पसंद पड़ती हैं वे और कंटेंट ड्रिवेन फिल्में भी यकीनन करनी चाहिए। एक संतुलन रहे।
-लेकिन आप खुद को किस मूड में पा रही हैं? आप ‘मूडी’ भी कही जाती हैं। आप से शिकायत रही है कि आपने इंडस्ट्री को हंड्रेड पर्सेंट नहीं दिया है?
बिल्कुल, लेकिन वह समर्पण शायद अगले पांच सालों में आप लोगों को दिखे। अभी मैं वैसा कर रही हूं। मैंने बाल्की के संग पहले कभी काम नहीं किया, उनके संग कर रही हूं। अभिषेक चौबे के साथ कर रही हूं। कबीर के संग भी पहले कभी काम नहीं किया था। उनके साथ कर रही हूं। उक्त सभी की खासियत है कि उनकी फिल्में कमर्शियल जोन में रहते हुए भी काफी रियल रहती हैं।
- यानी यह माना जाए कि सिनेमा को लेकर आप की सोच व अप्रोच में फर्क आया है। अपने सफर में आपने हर किस्म के अनुभव हासिल भी कर लिए हैं?
वाकई। 15-16 साल के सफर के बाद भी काम कर रही हूं। हर किस्म के डायरेक्टर के साथ काम कर रही हूं। उन पर मेरा व मेरा उन पर पूरा भरोसा भी है।
- मुझे तो आप का वह फेज भी याद है, जब आप के बारे में एक टाइटिल दिया गया था ‘फ्लॉप फिल्मों की हिट हीरोइन’। तो उस दौर में भी खुद को भटकने व किसी और पर नाराज न होने देने से खुद को कैसे रोका?
 मेरे ख्याल से अपनी प्रतिभा पर भरोसा होना बहुत जरूरी है। मैं ऐसी ही हूं। जब कभी लोगों ने कहना शुरू किया कि करीना नहीं कर पा रही है तो बाद मैं फिनिक्स की तरह बाहर निकली हूं। मंै बचपन से ही ऐसी हूं। वह चट्टानी इरादा मुझे मेरी मां से मिला। मेरी मॉम काफी स्ट्रौंग शख्सियत रही हैं तो इन मामलों में मैं उन जैसी ही हूं।
- अच्छा खुद को आप कितनी सिंधी और कितनी पंजाबी?
सिंधी खाना बहुत पसंद है, पर दिल से, दिमाग से पूरी पंजाबी हूं। पूरी कपूर ही हूं मैं। दिल बड़ा है और खाने का शौक है।
-सैफ के संग जुड़ने के बाद तो नवाबी रंग भी चढ़ गया?
जी हां, पर हम सब बड़े मेहनती हैं। काम के लिए जो हमारी ख्वाहिश है, जो आग है, वह आज भी अंदर जलती रहती है। मुझे पूरी उम्मीद है कि पच्चीस साल बाद भी हम जब बात कर रहे हों तो कहें कि ढाई दशक गुजर भी गए और पता भी नहीं चला।
- वैसा आप की वर्किंग से  झलक रहा है। आजकल तो 40 पार अभिनेत्रियों के लिए भी रोल लिखे जा रहे हैं?
एज को ग्रेसफुली ही लेना चाहिए। उसके खिलाफ नहीं होना चाहिए?

बिल्कुल नहीं, मुझे तो वह सब पसंद नहीं है।
-तो आगे की क्या रूपरेखा है? सैफ के संग इल्युमिनाटी में सक्रिय होंगी?
जी नहीं। मुझे प्रॉडक्शन में बिल्कुल इंट्रेस्ट नहीं है। अभी इतने अच्छे किरदार गढ़े जा रहे हैं। नए निर्देशक काफी अच्छा कर रहे हैं,मैं उनके साथ अभिनय करूंगी। प्रोडक्शन की ओर जरा भी ध्यान नहीं है।
-...नहीं पर जैसे अभी अनुष्का ने किया। दीपिका कर रही हैं। प्रियंका ने भी किया ताकि फिल्मों की लागत कम हो जाए। ऐसा कभी ख्याल आया हो या कोई डायरेक्टर पसंद है, जिनके संग काम करना चाहें?
जी हां डायरेक्टर तो कई पसंद हैं, जहां तक लागत कम करने की बात है तो आजकल जैसे प्रॉफिट शेयरिंग हो रही है। पहले किया भी है। वह मैं कर सकती हूं, पर एक्टिव प्रोड्यूसर होना मुमकिन नहीं। मेरी उसमें दिलचस्पी भी नहीं है।
-एक्टिंग से फुर्सत मिलते ही कहां भागती हैं?
घूमने का शौक है। दुनिया देखने निकल पड़ती हूं। फैमिली के साथ, सैफ के संग, क्योंकि हम दोनों बिजी रहते हैं। घूमना तो अच्छा भी लगता है। हर तीन-चार महीने में कोशिश रहती है कि घूमने पर निकल जाएं।
-किस तरह की यात्राएं भाती हैं?
जाड़ों में तो राजस्थान या फिर लंदन।
-राजस्थान इसलिए तो नहीं कि वहां राजे-रजवाड़े रहे हैं?
नहीं-नहीं। वहां जिस किस्म के होटल हैं। मौसम है। वहां का खाना बहुत पसंद है मुझे। घूमने का टाइम आता है तो खाना तो अहम हो ही जाता है।
-‘चमेली’ जैसी फिल्म फिर से करने का इरादा है?
वैसा कुछ तो ‘तलाश’ में भी किया था, जो मुझे बहुत अच्छी लगी थी। आज की तारीख में तो वैसे रोल लिखे जा रहे हैं। खासकर नए निर्देशकों के द्वारा तो वैसी कहानी, भूमिका आती है तो मुझे कोई प्रॉब्लम नहीं है वह सब करने में।
-इन दिनों यह बात भी उठ रही है कि अभिनेत्रियों को भी अभिनेताओं के बराबर फीस मिलनी चाहिए, क्योंकि कंगना की फिल्म 100 करोड़ करती है तो ...?
बिल्कुल बराबरी होनी चाहिए। हम भी उतनी ही मेहनत करते हैं, जितनी अभिनेता। खूबसूरत लगना भी बहुत टफ है। वह एक ऐडेड रेसपॉन्सिबिलिटी है। हीरोइन के बना हीरो भी कम है। एक अधूरापन तो रह ही जाता है।
-वह अधूरापन तो खैर जिंदगी की बाकी चीजों में भी है। दोनों के परस्पर जुड़ने व अच्छे व्यवहार से ही जिंदगी सरल-सहज बनती है?
बिल्कुल सही। रिश्ता भी लंबा निभता है तब। हीरोइन के संग भी वैसी ही बात है। वह भी बिना हीरो के अधूरी ही है। नमक होना चाहिए फिल्म में।
-‘उड़ता पंजाब’ के बारे में बता सकती हैं थोड़ा बहुत? नाम बड़ा अजीब है?
बिल्कुल। यह ड्रग ड्रामा पर बेस्ड है। बड़ी एजी फिल्म है। अलग है उसकी कहानी। कास्ट भी बड़े प्यारे हैं। सब का रोल अलहदा है। मैं उसमें ड्रग रिहैब में एक डॉक्टर का रोल प्ले कर रही हूं। मैं बड़ी एक्साइटेड हूं। लोगों ने मुझे उस सेटिंग में नहीं देखा है।
-सेटिंग मतलब क्या, लो कॉस्ट या कुछ और?
नहीं लोगों ने अब तक मुझे ग्लैमरस अवतार में ही देखा है। इस बार पहली दफा वे मुझे रियल व डीग्लैम अवतार में देखेंगे।
-और दूसरी जो आर. बाल्की वाली फिल्म है, वह उनके मिजाज वाली ही है?
यकीनन। जैसी फिल्में बनाने में उनको महारथ हासिल है। मिसाल के तौर पर ‘चीनी कम’ जैसी। उसके बाद तो अन्य स्क्रिप्ट सुन ही रही हूं, क्योंकि अभी ‘उड़ता पंजाब’ की शूटिंग खत्म ही की है। फिर बाल्की की फिल्म की शूटिंग प्रारंभ होगी। तीन-चार महीने उसमें जाएंगे।
- सलमान के बारे में क्या कुछ कहना चाहेंगी?
वे सक्सेस व फेल्योर से बहुत आगे की चीज हैं। वे इंडिया के सबसे महान कलाकार हैं।
-कोई पर्सनल एक्सपीरिएंस अगर शेयर कर सकें?
पहली बार तो उनसे भप्पी सोनी की ‘निश्चय’ के सेट पर मिली थी। मैं दस साल की थी तब। आज मैं 34 की हूं। तो बचपन से लेकर शादी से पहले तक। अब शादी के बाद हमारा एक लंबा सफर रहा है। तब से लेकर आज तक उनके नेचर में कोई बदलाव नहीं आया है। तभी वे ग्रेट हैं। बस,तब उनके मसल्स बढ़े हुए थे।
- पर बतौर एक्टर उनकी खासियत क्या है?
मेरे ख्याल से उनकी स्माइल। वह सुपरस्टार वाली स्माइल है। पूरी दुनिया उस पर फिदा हो जाए।
- आप की भी एक आभा है। उनकी भी है। आप दोनों से सालों से हम मिल भी रहे हैं। आप लोग समझ पाते हैं कि सामने वाला आप की आभा से प्रभावित हो रहा है?
मुझे तो महसूस नहीं होता। मेरे ख्याल से जो कलाकार अपने आप को ज्यादा सीरियसली नहीं लेते, उनका सदा अच्छा होता है। स्टारडम को सीरियसली नहीं लेना चाहिए। अगर लोग मेरे आभामंडल से प्रभावित होते हैं तो मैं समझ जाती हूं, पर मैं रिएक्ट नहीं करती। वैसे भी एक सुपरस्टार की इफेक्ट होनी तो चाहिए।
-नहीं, क्योंकि सोसायटी में आप जितना कंट्रीब्यूट करते हो उस अनुपात में आप लोगों को मिल नहीं रहा। मिसाल के तौर पर आप एयरपोर्ट पर जाती हैं तो वहां के सभी लोग आप को देख अलग किस्म की खुशी महसूस करते हैं?
वही हमारी कमाई है। वह अच्छा भी लगता है। लोगों में रेस्पेक्ट की भावना है। आंखों की शरम उनमें है। मैं इस मामले में लकी हूं कि लंबे समय तक काम करने के अलावा मैं जिस परिवार से ताल्लुक रखती हूं, उसको लेकर भी पब्लिक प्लेस पर लोग मुझे बहुत सम्मान देते हैं।
-क्योंकि सलमान ने भी एक बात कही थी कि लोग जब उनकी  फिल्म देखने आते हैं तो उसी फिल्म भर में उन्हें नहीं देख रहे होते। उनकी पूरी पर्सनैलिटी के साथ उनका किरदार पर्दे पर देखा जाता है?
तभी तो लोगों में उनको लेकर क्रेज है, जो लोग समझ नहीं पाते। वही एक फैन का नशा है, जो सलमान को, करीना को, शाह रुख को उस अवतार में बार-बार देखना पसंद करते हंै।



Wednesday, August 15, 2012

फिल्‍म समीक्षा : एक था टाइगर

फार्मूलाबद्ध फिल्म है एक था टाइगर

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
भारत,आयरलैंड,तुर्की,क्यूबा और थाईलैंड से घूमती-घुमाती एक था टाइगर तुर्की में खत्म होती है। माशाल्लाह गाना तुर्की में ही फिल्माया गया है। यह गाना फिल्म के अंत में कास्टिंग रोल के साथ आता है। यशराज फिल्म्स ने यह अच्छा प्रयोग किया है कि कास्ट रोल स्क्रीन को छेंकते हुए नीचे से ऊपर जाने के बजाए दाएं से बाएं जाता है।
हम सलमान खान और कट्रीना कैफ को नाचते-गाते देख पाते हैं। इसके अलावा फिल्म में ठूंस-ठूंस कर एक्शन भरा गया है। हाल-फिलहाल में में दक्षिण भारतीय फिल्मों से आयातित रॉ एक्शन देखते-देखते अघा चुके दर्शकों को एक था टाइगर के एक्शन में ताजगी दिखेगी। इस फिल्म में हीरोइन के भी एक्शन सीन हैं। कॉनरेड पाल्मिसैनो की सलाह से किए गए एक्शन में स्फूर्ति नजर आती है और वह मुमकिन सा लगता है। वैसे इस फिल्म में भी हीरो का निशाना कभी खाली नहीं जाता, जबकि दुश्मनों को शायद गोली चलाने ही नहीं आता। फिल्में हिंदी की हों या किसी और भाषा की। हीरो हमेशा अक्षत रहता है।
कबीर खान निर्देशित एक था टाइगर जासूसी टाइप की फिल्म है। मिशन पर निकला हीरो दुश्मनों की एजेंट बनी हीरोइन से प्यार कर बैठता है। यहां एक फर्क है कि दोनों देशों के खुफिया एजेंसी उनके पीछे पड़ जाती है। फिल्म खत्म होने तक हिंदुस्तान और पाकिस्तान की खुफिया एजेंसियां हीरो-हीरोइन को पकड़ने में नाकामयाब रही हैं। लेखक-निर्देशक ने तर्क दिया है कि लगातार ठिकाना बदल रहे हीरो के पास उसके वेतन के 23 लाख रूपए हैं, जो उसने 12 सालों में जमा किए हैं। यह भी बताया गया है कि हीरो हमेशा मिशन पर सरकारी खर्चे पर रहता है। सचमुच हमारे रॉ एजेंट कितनी कम सैलरी में जान जोखिम में डाल रहे हैं। शायद हीरोइन के पास भी कुछ पैसे हैं। सलमान खान की फिल्म में तर्क,अभिनय और संजीदगी खोजने में कोई तुक नहीं है। यहा सिर्फ भावनाएं रहती हैं। ज्यादातर प्यार की भावना।
एक था टाइगर में फर्ज और मोहब्बत के बीच दहाड़ता हीरो है,जो मोहब्बत का दामन थाम लेता है। फिल्म के शुरू में हीरो के बॉस ने बताया है कि मोहब्बत के बजाए फर्ज निभाने की कचोट से वे उबर नहीं पाए हैं। हमारा हीरो अपने सीनियर की तरह प्यार के विषाद में नहीं जीना चाहता। हिंदी फिल्मों में वैसे भी प्यार सबसे बड़ा धर्म होता है। एक था टाइगर में यह मोहब्बत देशों के बीच की दीवार तोड़ देती है। यश चोपड़ा की वीर जारा में भी ऐसा ही कुछ हुआ था,उसकी पूष्ठभूमि अलग थी।
यह फिल्म सलमान खान के प्रशंसको को ध्यान में रख कर बनायी गई है। उसकी वजह से कबीर खान ने पिछली दो फिल्मों में जो उम्मीद दिखाई थी,वह बुझती नजर आती है। कहानी से ज्यादा सलमान खान और कट्रीना कैफ के सिक्वेंस पर मेहनत की गई है। फिल्म के ओपनिंग और इंट्रो सीन में लगता है कि हम अलग लेवल की फिल्म देखने जा रहे हैं। पर्दे पर सलमान खान के किरदार के उजागर होने और कट्रीना कैफ की हाजिरी के बाद जाहिर हो जाता है कि एक था टाइगर का लेवल आम मसाला हिंदी फिल्मों से अलग या ऊपर नहीं है। वही प्रेम कहानी। हीरो-हीरोइन के प्रेम का विरोध। यहां विरोध के लिए परिवार नहीं देश हैं। विरोधी के तौर पर हिंदुस्तान-पाकिस्तान का नाम लेते ही लेखक-निर्देशक को पुश्तैनी दुश्मनी दिखाने का शॉर्टकट मिल जाता है। एक था टाइगर फार्मूलाबद्ध फिल्म है।
कलाकारों में पहले कट्रीना कैफ की बात करें। निर्देशक ने उन पर कुछ ज्यादा ही भरोसा कर लिया है। उन्हें सिर्फ सुंदर दिखाने की हद से आगे जाकर एक्शन और इमोशन के सीन दे दिए हैं। एक्शन सीन में तो फिर भी डुप्लीकेट या कंप्यूटर इमेजेज के सहारे वह प्रभावित करती हैं, लेकिन इमोशनल सीन में अपने गिने-चुने एक्सप्रेशन से वह निराश करती हैं। और हां,कोई कट्रीना कैफ को बताए कि दर्शक उनका लेफ्ट प्रोफाइल देख-देख का ऊब चुके हैं। वह जैसे ही पर्दे पर स्थिर होती है। उनका बायां प्रोफाइल साने आ जाता है। सलमान खान ने कसर नहीं छोड़ी है। पहले सिक्वेंस से अखिरी सिक्वेंस तक उनकी भागीदारी स्पष्ट है। एक्शन दूश्यों में वे दक्ष हो चुके हैं। फिल्म के चेज सिक्वेंस में उनकी फुर्ती रोमांचक आनंद देती है। खूब सीटियां बजेंगी। वे रोल के मुताबिक फिट और स्मार्ट हैं। उन्हें कुछ वन लाइनर भी मिले हैं, जिन पर तालियां भी बजेंगी। आजादी की 66 वीं वर्षगांठ और ईद के मौके पर सतमान खान ने अपने प्रशंसकों और आम दर्शकों को मनोरंजक तोहफा दिया है। अन्य कलाकार सामान्य हैं। गिरीश कर्नाड और रणवीर शौरी के लिए अधिक गुंजाइश ही नहीं थी।
कैमरामैन असीम मिश्रा ने सभी देशों और शहरों को खूबसूरती से पर्दे पर उतारा है। गानों का फिल्मांकन सुंदर और आकर्षक है। गीत-संगीत सामान्य है। एक माशाल्लाह गीत ही याद रह पाता है। पाश्‌र्र्व संगीत अवश्य प्रभावशाली है। दृश्यों के रोमांचक प्रभाव में उससे मदद मिली है।
अवधि-132 मिनट
*** तीन स्टार

Saturday, June 27, 2009

फ़िल्म समीक्षा:न्यूयार्क

-अजय ब्रह्मात्मज
कबीर खान सजग फिल्मकार हैं। पहले काबुल एक्सप्रेस और अब न्यूयार्क में उन्होंने आतंकवाद के प्रभाव और पृष्ठभूमि में कुछ व्यक्तियों की कथा बुनी है। हर बड़ी घटना-दुर्घटना कुछ व्यक्तियों की जिंदगी को गहरे रूप में प्रभावित करती है। न्यूयार्क में 9/11 की पृष्ठभूमि और घटना है। इस हादसे की पृष्ठभूमि में हम कुछ किरदारों की बदलती जिंदगी की मुश्किलों को देखते हैं।
उमर (नील नितिन मुकेश) पहली बार न्यूयार्क पहुंचता है। वहां उसकी मुलाकात पहले माया (कैटरीना कैफ) और फिर सैम (जान अब्राहम) से होती है। तीनों की दोस्ती में दो प्रेम कहानियां चलती हैं। उमर को लगता है कि माया उससे प्रेम करती है, जबकि माया का प्रेम सैम के प्रति जाहिर होता है। हिंदी फिल्मों की ऐसी स्थितियों में दूसरा हीरो त्याग की मूर्ति बन जाता है। यहां भी वही होता है, लेकिन बीच में थोड़ा एक्शन और आतंकवाद आता है। आतंकवाद की वजह से फिल्म का निर्वाह बदल जाता है। स्पष्ट है कि उमर और सैम यानी समीर मजहब से मुसलमान हैं। उन पर अमेरिका की खुफिया एजेंसी एफबीआई को शक होता है। कहते हैं 9/11 के बाद अमेरिका में 1,200 मुसलमानों को शक के घेरे में लिया गया। समीर उनमें से एक है। नौ महीने की हिरासत में पुलिस यातना सहने के बाद वह मुक्त होता है तो उसके दिल में एफबीआई के लिए घोर नफरत है। एफबीआई को उस पर फिर से शक है, लेकिन इस बार वह समीर के दोस्त उमर को अपना एजेंट बना लेती है। पक्के सुबूत के लिए उमर का इस्तेमाल किया जाता है। एफबीआई में मुसलमान अधिकारी रोशन है, जो 9/11 के बाद मुसलमानों के प्रति फैले रोष और संदेह को मिटाना चाहता है। उसका मानना है कि इसके लिए मुसलमानों को आगे आना होगा।
दोस्ती, प्यार, रिश्ते और इज्जत जैसी भावनाओं को घोल कर न्यूयार्क तैयार की गई है। ऊपरी तौर पर रियलिस्टक और हार्ड हिटिंग लग रही यह फिल्म हिंदी फिल्मों के फार्मूले से बाहर नहीं निकल पाती। कबीर खान कहीं न कहीं यशराज फिल्म्स के प्रचलित ढांचे में खुद को ढालते नजर आते हैं। प्रसंग और स्थितियां वास्तविक होने के बावजूद गहराई से इसलिए नहीं छू पातीं क्योंकि उनमें बनावटीपन दिखाई पड़ता है। कबीर की छटपटाहट दिखाई पड़ती है। वह प्रचलित ढांचे से बार-बार निकलने की कोशिश करते हैं, लेकिन ऐसा लगता है कि उनकी कोशिशों को कतर दिया जा रहा है।
कबीर खान ने अमेरिकी समाज के सोच और राजनीति की आलोचना की है, लेकिन उस धारणा को ही रेखांकित किया है कि अमेरिकी समाज में हर नागरिक को मौलिक स्वतंत्रता हासिल है। 9/11 के बाद भी आतंकवाद के संदेह में आए मुसलमान व्यक्तियों का मामला एक मुसलमान अधिकारी को सौंपा जाता है। एक मुसलमान, आतंकवादी के बेटे को अमेरिकी समाज अपना हीरो बनाने को तैयार है। अमेरिका के इस स्वच्छ, लोकतांत्रिक और आदर्शवादी सोच को लेकर कई सवाल मन में उठते हैं। न्यूयार्क अमेरिका के प्रति भरोसा रखने और जगाने का प्रयास करती है।
कलाकारों की बात करें तो पहली बार ग्लैमरहीन भूमिका में कैटरीना कैफ दिखी हैं। कुछ दृश्यों में वे जंचती हैं तो कुछ में संघर्ष करती नजर आती हैं। कबीर खान ने माया की भूमिका सिर्फ उत्प्रेरक की रखी है। वह कारक नहीं है। फिल्म मुख्य रूप से नील नितिन मुकेश, जान अब्राहम और इरफान खान की है। इरफान दिए गए दृश्यों में ही अभिनय के पल चुरा लेते हैं। हां, नील नितिन मुकेश फिर से साबित करते हैं कि अगर उन्हें सही चरित्र मिले तो वह निराश नहीं करेंगे। जान अब्राहम के अभिनय में अपेक्षाकृत विकास है। यातना और रोष के दृश्यों में वे अपनी सीमित भंगिमाओं से बाहर आते हैं। फिल्म में गीत-संगीत लगभग अप्रासंगिक है। न्यूयार्क को फिल्माने में निर्देशक ने कैमरामैन का सही उपयोग किया है। फिल्म इस लिहाज से उल्लेखनीय है कि यह हिंदी फिल्मों के प्रचलित ढांचे में रहते हुए इश्क-मुहब्बत से परे जाकर रिश्तों और राजनीति की बात करती है।
रेटिंग : ***