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Friday, November 13, 2009

भारत का पर्याय बन चुकी हैं ऐश्वर्या राय

-हरि सिंह
ऐश्वर्या राय के बारे में कुछ भी नया लिख पाना मुश्किल है। जितने लिंक्स,उतनी जानकारियां। लिहाजा हमने कुछ नया और खास करने के लिए उनके बिजनेस मैनेजर हरि सिंह से बात की। वे उनके साथ मिस व‌र्ल्ड चुने जाने के पहले से हैं। हरि सिंह बता रहे हैं ऐश के बारे में॥
मुझे ठीक-ठीक याद नहीं कि मैंने कब उनके साथ काम करना आरंभ किया। फिर भी उनके मिस व‌र्ल्ड चुने जाने के पहले की बात है। उन्होंने मॉडलिंग शुरू कर दी थी। मिस इंडिया का फॉर्म भर चुकी थीं। आरंभिक मुलाकातों में ही मुझे लगा था कि ऐश्वर्या राय में कुछ खास है। मुझे उनकी दैवीय प्रतिभा का तभी एहसास हो गया था। आज पूरी दुनिया जिसे देख और सराह रही है, उसके लक्षण मुझे तभी दिखे थे। मॉडलिंग और फिल्मी दुनिया में शामिल होने के लिए बेताब हर लड़की में सघन आत्मविश्वास होता है, लेकिन हमलोग समझ जाते हैं कि उस आत्मविश्वास में कितना बल है। सबसे जरूरी है परिवार का सहयोग और संबल। अगर आरंभ से अभिभावक का उचित मार्गदर्शन मिले और उनका अपनी बेटी पर भरोसा हो, तो कामयाबी की डगर आसान हो जाती है।
ऐश के साथ यही हुआ। उन्हें अपने परिवार का पूरा समर्थन मिला। मां-बाप ने उन्हें अपेक्षित संस्कार और मूल्यों के साथ पाला। अपने लंबे परिचय के आधार पर मैं यह दावे के साथ कह सकता हूं कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में इतनी संस्कार वाली दूसरी कोई अभिनेत्री नहीं है। ऐश बड़ों का मान-सम्मान करना जानती हैं। फिल्म इंडस्ट्री के किसी भी सीनियर व्यक्ति से आप बात कर लें। उन्होंने उनके साथ काम किया हो या नहीं किया हो, लेकिन अगर एक बार मिल चुके हैं, तो वे ऐश के गुण गाते मिलेंगे। वे गुणवंती हैं। आदर्श बेटी, बहन, बीवी और बहू हैं। अपने सभी रिश्तों को उन्होंने सहेज कर रखा है। उन रिश्तों को वे आदर, स्नेह और प्यार से सींचती रहती हैं। वे खुद काफी व्यस्त रहती हैं, लेकिन एक पल को भी संबंधों के बीच में व्यस्तता को आड़े नहीं आने देतीं। निश्चित ही उनके करीबी भी उनकी भावनाओं को समझते हैं और उन्हें भी पूरी जगह देते हैं। हर संबंध परस्पर व्यवहार और सम्मान से ही खिलता है।
मैं अपने अनुभवों से ही उदाहरण दूं, तो ऐश्वर्या के लिए कतई जरूरी नहीं है कि वे कभी मेरे पांव छूएं। अपने हर जन्मदिन पर वे ऐसा कर आशीर्वाद लेती हैं। इस एक सामान्य सम्मान से वे कितनी दुआएं ले लेती हैं। दिल से उनके लिए दुआ निकलती है। मुझे याद है कि शादी की रस्म निभाने के बाद जब बड़ों से आशीर्वाद लेने की बारी आई, तो उन्होंने तमाम प्रतिष्ठित लोगों के बीच भी ऐसा ही किया। अभिषेक बच्चन ने भी उनका अनुकरण किया। आज सोचता हूं, तो लगता है कि उनकी यह सहज क्रिया के पीछे कितना सम्मान और संस्कार रहा होगा। अमूमन बड़े और मशहूर होने के बाद लोग अदब भूल जाते हैं। अपने पारिवारिक और पारंपरिक मूल्यों को निभाने में भी झेंप महसूस करते हैं।
दैवीय सौंदर्य की धनी ऐश्वर्या राय की कद्र पूरी दुनिया करती है। मुझे विदेशों के लोग मिलते हैं, तो वे बताते हैं कि कैसे पूरी दुनिया के लोग उन्हें पहचानते हैं। भारत का नाम लेते ही उनके जहन में ऐश का नाम आता है। वह भारत का पर्याय बन चुकी हैं। यह बड़ी उपलब्धि है और उतनी ही बड़ी जिम्मेदारी भी है। ऐश्वर्या में नैसर्गिक प्रतिभा है। उन्होंने अपनी मेहनत और लगन से उसे निखारा है। शुरू से ही वे मेहनत करने से नहीं हिचकतीं। आज नाम और पहचान होने के बाद भी वे मेहनत में ढील नहीं करतीं। आमतौर पर अपने यहां शादी के बाद हीरोइनों को नई फिल्मों के ऑफर नहीं मिलते, लेकिन उनके पास अभी चार फिल्में हैं। वे दक्षिण भारत के शंकर और मणिरत्नम के साथ काम कर रही हैं, तो हिंदी की विपुल शाह और संजय लीला भंसाली की फिल्में भी कर रही हैं। उनके साथ हर डायरेक्टर काम करना चाहता है। अगर पिछले दशक की दस बड़ी फिल्मों की सूची बनाएं, तो उसमें आधी में ऐश मिलेंगी। इस उपलब्धि का उन्हें रत्ती भर अभिमान नहीं है। जीवन में नाम और पैसा तो बहुत से लोग कमाते हैं, लेकिन लोगों का प्यार कमाना आसान नहीं होता। उससे भी मुश्किल है अपने से बड़ों का आशीर्वाद पाना। मैं तो उन्हें लगातार देख रहा हूं। उनके व्यक्तित्व में जरा भी बदलाव नहीं आया है। मैं तो कहूंगा कि वे और भी विनम्र और समझदार हो गई हैं। आने वाले समय में शायद ही कोई लड़की उनसे आगे निकल पाए। वे मिसाल हैं कि ग्लैमर की दुनिया में भी अपने संस्कारों के साथ कैसे सिर ऊंचा रखा जा सकता है। वे संस्कारी हैं और अच्छी बात यह हुई कि वे संस्कारवान परिवार में गई। उनका बच्चन परिवार की बहू बनना सोने पर सुहागा की तरह है।

Friday, December 5, 2008

मन में न हो खोट तो क्यों आँख चुराएँ?




टीवी शो बिग बॉस के अंतिम दिन मंच पर शिल्पा शेट्टी के साथ अक्षय कुमार के आने की खबर से मीडिया में उत्सुकता बनी हुई थी। लोग कयास लगा रहे थे कि महज औपचारिकता निभाई जाएगी और दोनों का व्यवहार एक-दूसरे के प्रति ठंडा रहेगा। यहां अक्षय और शिल्पा दोनों की तारीफ करनी होगी कि उन्होंने शो के विजेता को जानने की जिज्ञासा बनाए रखी। अक्षय को मंच पर बुलाते समय शिल्पा की आवाज एक बार लरज गई थी। हो सकता है कि यह उस इवेंट का दबाव हो या संभव है कि पुरानी यादों से गला रुंध गया हो! मौके की नजाकत को भांपते हुए शिल्पा ने फौरन खुद को और कार्यक्रम को संभाला। बाद में दोनों ने चुहलबाजी भी की और इवेंट को रसदार बना दिया।
ऐसा पहली बार नहीं हुआ था कि अंतरंग संबंध जी चुके दो व्यक्ति किसी सार्वजनिक मंच पर साथ आए हों और उन्होंने परस्पर बेरुखी नहीं दिखाई हो! औपचारिकताओं के अधीन दुश्मनों को भी हाथ मिलाते और गले लगाते हम देखते रहते हैं। ग्लैमर व‌र्ल्ड में संबंध बनते-बिगड़ते रहते हैं। कहा तो यही जाता है कि यहां यादों की गांठ नहीं बनती, लेकिन गौर करें, तो संबंध टूटने के बाद फिल्म स्टार पूर्व प्रेमियों, प्रेमिकाओं, पत्नियों और पतियों से बचने की कोशिश भी करते हैं। यहां तक कि आयोजक भी खयाल रखते हैं कि उनका आमना-सामना न हो और न कभी ऐसी स्थिति बने कि उनकी घबराहट, बेरुखी या अकुलाहट लोगों के सामने आ जाए! अक्षय और शिल्पा ने खूबसूरती से रिश्ते और जिम्मेदारी का निर्वाह किया।
पुरानी पीढ़ी की कशमकश
पीछे जाएं, तो दिलीप कुमार-मधुबाला, देव आनंद-सुरैया, राज कपूर-नरगिस, गुरुदत्त-वहीदा रहमान, हेमा मालिनी-जीतेंद्र, अमिताभ बच्चन-रेखा, और महेश भट्ट-परवीन बॉबी सरीखी जोडि़यां अलग होने के बाद एक-दूसरे के प्रति सहज और सामान्य नहीं रह सकीं। सच तो यह है कि आज भी बिग-बी और रेखा के संबंध को लेकर खबरें बनती रहती हैं। आज भी विभिन्न समारोहों में दोनों में से कोई एक मंच पर होता है, तो कैमरा दूसरे की प्रतिक्रिया दिखाने से नहीं चूकता। इन सितारों की अंदरूनी कशमकश जो भी रही हो, लेकिन उन्होंने कभी अपनी रंजिश या कशिश को सार्वजनिक नहीं होने दिया। अब हम आज की उन जोडि़यों पर नजर डालें, जो कभी दंपति बनने वाले थे, लेकिन समय ने ऐसी करवट ली कि वे एक-दूसरे के लिए अजनबी हो गए!
अभिषेक बच्चन-करिश्मा कपूर
फिल्म रिफ्यूजी की हीरोइन करीना कपूर थीं, लेकिन अभिषेक बच्चन का दिल करिश्मा कपूर पर आ गया था। उनकी नजदीकियों को देखते हुए सुनील दर्शन ने फटाफट हां मैंने भी प्यार किया का निर्माण कर डाला। उन्हें उम्मीद थी कि रिअॅल-लाइफ का प्रेम पर्दे पर आग लगा देगा। दूसरी तरफ अमिताभ बच्चन ने अपने साठवें जन्मदिन पर करिश्मा का परिचय अपनी पुत्रवधू के रूप में कराया। सभी मान रहे थे कि जल्दी ही दोनों परिणय-सूत्र में बंधेंगे। कपूर परिवार और बच्चन परिवार में एक और रिश्ता कायम होगा, लेकिन वह रिश्ता टूटा और दोनों अलग हो गए। करिश्मा ने इंडस्ट्री छोड़ दी और दिल्ली के संजय कपूर से शादी कर ली। कुछ वर्ष बाद अभिषेक ने भी ऐश्वर्या राय से शादी कर ली।
सलमान खान-ऐश्वर्या राय
इस जोड़ी को आरंभ से ही बेमेल माना जा रहा था। सलमान खान का उद्धत प्रेम और ऐश्वर्या के सौंदर्य का मेल लोग नहीं बिठा पा रहे थे। हम दिल दे चुके सनम के सेट पर आरंभ हुआ प्रेम चलते चलते के सेट पर टूटा। कहते हैं, सलमान ने अगर ऐश के माता-पिता का अपमान नहीं किया होता, तो शायद ऐश उनके प्रेम के बारे में दोबारा विचार भी करतीं। सलमान की हरकतों का असर ऐश के फिल्मी करियर और निजी जीवन पर पड़ रहा था। संबंध टूटने के बाद सलमान और ऐश एक-दूसरे के सामने आने से बचते हैं। किसी समारोह में ऐश खास मेहमान हों, तो सलमान किनारा कर जाते हैं।
ऐश्वर्या राय-विवेक ओबेराय
उधर सलमान से ऐश की अनबन हुई और इधर विवेक ओबेराय ऐश के प्रबल दोस्त के रूप में सामने आए। विवेक की तरफ से इस दोस्ती का ज्यादा प्रदर्शन हुआ। ऐश ने कभी विरोध जरूर नहीं किया, लेकिन खुलकर इस संबंध को स्वीकार भी नहीं किया। यही कारण है कि इस संबंध केटूटने पर किसी को आश्चर्य नहीं हुआ। कुछ लोगों ने इसे ऐश की व्यवहारिकता और चालाकी कहा, तो कुछ ने विवेक से सहानुभूति जताई। विवेक ने ऐश की मोहाशक्ति में सलमान से जो पंगा लिया था, उसका नुकसान वे आज भी भुगत रहे हैं। उनके पास काम के नाम पर खास कुछ भी नहीं है।
शाहिद कपूर-करीना कपूर
शाहिद कपूर और करीना कपूर की जोड़ी का अलगाव अभी तक रहस्य बना हुआ है। लंबे समय तक दोनों साथ रहने के बाद जब अलग हुए, तो किसी को भी यकीन नहीं हुआ। पहले तो सभी ने यही माना कि फिल्म जब वी मेट और टशन की मिली-जुली पब्लिसिटी हो रही है। जब सैफ अली खान से करीना की नजदीकियां नहीं छिपाई जा सकीं, तो तीनों ने संबंधों के बदले समीकरण को स्वीकार कर लिया। शाहिद ने करीना को लांछित नहीं किया और न करीना ने ही उन पर कोई आरोप लगाए! दो वयस्क व्यक्तियों ने पूरी समझदारी के साथ अलग हो जाने का फैसला किया। आज भी दोनों अपने जीवन में एक-दूसरे के महत्व को रेखांकित जरूर करते हैं।

और भी जोडि़यां हैं, लेकिन उनके प्रेम और अलगाव में ऐसी इंटेनसिटी नहीं दिखती कि उनकी अलग से चर्चा की जाए! डिनो मोरिया-बिपाशा बसु, लारा दत्ता-केली दोर्जी और तनुश्री दत्ता-आदित्य दत्ता भी कभी अंतरंग थे, लेकिन आज वे अलग-अलग कारणों से अलग हैं।

Saturday, November 1, 2008

जन्मदिन विशेष:प्रियजनों को नाराज़ नहीं कर सकतीं ऐश्वर्या राय

-अजय ब्रह्मात्मज
जन्मदिन 1 नवंबर पर विशेष..
इंटरनेशनल पहचान वाली ऐश्वर्या राय हिंदी फिल्मों की पॉपुलर हीरोइन होने के साथ ही खूबसूरती की इंटरनेशनल आइकॉन भी हैं। माना जाता है कि नाम, इज्जत और धन पाने के बाद व्यक्ति डगमगा जाता है। उसका दिमाग सातवें आसमान पर पहुंच जाता है। ऐसे व्यक्तियों का जीवन दुख में बीतता है। ऐश्वर्या राय की खिलखिलाहट उनकी मौजूदगी की आहट देती है। करीब से देख रहे लोग मानेंगे कि जिंदगी और करियर के उतार-चढ़ाव के बावजूद उनके व्यक्तित्व में निरंतर निखार आया है। एक आशंका थी कि बच्चन परिवार में आने के बाद उनकी खिलखिलाहट की खनक खो सकती है, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। आज भी वे भोर की उजास की तरह मुग्ध करती हैं। अपनी हंसी से लोगों का मन शीतल करती हैं। कह सकते हैं कि उनकी खिलखिलाहट की खनक बढ़ी है।
वृंदा राय और कृष्णराज राय की बेटी हैं ऐश्वर्या राय। मध्यवर्गीय परिवार की परवरिश और आरंभिक हिंदी मीडियम की पढ़ाई ने उनके व्यक्तित्व को गढ़ा है। हाल ही में सभी ने देखा कि वे अपने पिता की सेवा के लिए हिंदुजा अस्पताल में नजर आई, तो श्वसुर के लिए मायके से सूप बनाकर ले गई। उन्होंने बेटी और बहू का दायित्व समान भाव से निभाया। हमेशा चर्चा में रहने के बावजूद ऐश्वर्या राय ने मां-पिता को पूरा सम्मान दिया है और किसी भी समारोह में स्वयं आकर्षण का केंद्र होने पर भी उन्होंने उनकी सुविधाओं का ध्यान रखा। मायके से मिले संस्कार बच्चन परिवार में आने के बाद और मजबूत हुए। ऐसा सौभाग्य कम लड़कियों को मिलता है कि ससुराल में मायके के प्यार और व्यवहार का विस्तार मिल जाए। ऐश्वर्या राय कहती हैं, मुझे कोई फर्क ही नहीं महसूस होता! अभिषेक और हम हमेशा कहते हैं कि हमें दो मां-पिता मिल गए हैं। यहां मां और पिताजी दोनों ही मेरा बहुत ज्यादा खयाल रखते हैं। पिताजी ने तो लिखा भी है कि मैं उनकी बेटी की तरह हूं। श्वेता दीदी और मुझमें उन्होंने कोई अंतर नहीं रखा है।
मैं जिस परिवार से आई और जिस परिवार में मेरी शादी हुई, दोनों लगभग एक जैसे हैं। दोनों परिवारों में कई समानताएं हैं। मायके से ससुराल आई किसी लड़की के लिए यह बहुत बड़ा सौभाग्य होता है। ऊपरी तौर पर कुछ भी नहीं बदला है। एक भीतरी बदलाव जरूर आता है। सोच और चिंता का दायरा बड़ा हो जाता है। पहले मैं ऐश्वर्या राय जैसी बात दिमाग में रखती थी। अब हम पर जोर रहता है। ऐश्वर्या राय शादी को जिंदगी का बेहद खूबसूरत अनुभव मानती हैं। हर लड़की को इस अनुभव से गुजरना चाहिए, क्योंकि इसके बगैर कोई लड़की खुद को अच्छी तरह समझने का दावा ही नहीं कर सकती। वे कहती हैं, अपनी जिंदगी और रिश्तों को हम अलग नजरिए से देखना सीखते हैं। मायका कभी नहीं छूटता। मेरी राय में ससुराल आने के बाद मायके से संबंध ज्यादा गहरे और मजबूत हो जाते हैं। यह दोतरफा होता है। हम मां-पिताजी के बारे में सोचने लगते हैं और वे हमारे प्रति ज्यादा संवेदनशील हो जाते हैं।
ऐश्वर्या को इस बात का अहसास है कि वे जिस पेशे में हैं, वहां लगातार उंगलियां उठती रहेंगी। वे कहती हैं, हमारा प्रोफेशन ही ऐसा है। शादी के बाद से ही कुछ लोग भविष्यवाणियां कर रहे हैं। मैं काम कर रही हूं, तो लोगों को शिकायत है। अगर काम बंद कर दूं, तो और भी उल्टा-सीधा लिखा जाएगा। इतना ही नहीं, मेरे और अभिषेक के बारे में तरह-तरह की बातें होती रहती हैं। आगे चलकर कोई बड़ा स्कैंडल भी हो सकता है। ऐश्वर्या राय की लोकप्रियता और उनकी इंटरनेशनल पहचान से अभिषेक बच्चन खुश रहते हैं। वे कहते हैं, मैं इन बातों पर सोचता भी नहीं। हालांकि मीडिया में लोग लिखते रहते हैं और मानते हैं कि मुझ पर दबाव होगा। सच तो यह है कि ऐसा कुछ भी नहीं है। ऐश्वर्या अपने करियर के फैसले खुद लेती हैं, लेकिन एक परिवार का सदस्य होने के नाते हम सारी बातें शेयर करते हैं और कई बार फैसले लेने के पहले दूसरे की राय भी लेते हैं।
बच्चन परिवार और खुद के बारे में ऐश्वर्या राय कहती हैं, हम सभी रिलैक्स्ड इंडिविजुअल हैं। एक-दूसरे की परवाह करते हैं, लेकिन अपना काम भी साथ ही साथ करते हैं। मुझे मालूम है कि मैं फिल्म स्टार होने के साथ ही बेटी, बीवी और बहू भी हूं। दोनों परिवारों से मुझे जो मूल्य और संस्कार मिले हैं, उन्हें मैं जीवन का अनमोल उपहार मानती हूं। हम सभी का निजी व्यक्तित्व है। मुझे अपने काम से बेहद प्यार है, लेकिन अपने प्रियजनों को नाराज कर मैं कुछ भी नहीं कर सकती। हमेशा यह खयाल रहता है कि हमारे काम और व्यवहार से दूसरों की भावना आहत न हो।

Wednesday, July 30, 2008

बच्चन परिवार का जोश






अमिताभ बच्चन ने अपने ब्लॉग पर 'अविस्मरणीय' यात्रा की झलकियाँ दी हैं.चवन्नी के पाठकों के लिए वहीँ से ये तस्वीरें ली गई हैं.

Sunday, July 20, 2008

मेरी बीवी का जवाब नहीं: अभिषेक बच्चन

-अजय ब्रह्मात्मज
वे भारत ही नहीं, एशिया के सर्वाधिक ग्लैमरस परिवार के युवा सदस्य हैं, लेकिन घर जाने से पहले अभिषेक बच्चन शूटिंग स्पॉट के मेकअप रूम में पैनकेक की परतों के साथ ही अपनी हाई-फाई प्रोफाइल भी उतार आते हैं। ऐश्वर्या राय के साथ उनकी शादी का कार्ड पाना पूरे मुल्क की हसरत थी, तो अब देश इस इंतजार में है कि उनके आंगन में बच्चे की किलकारी कब गूंजेगी? एक लंबी बातचीत में जूनियर बच्चन ने खोला अपनी निजी जिंदगी के कई पन्नों को-
ऐश्वर्या राय में ऐसी क्या खास बात है कि आपने उनसे शादी की?
वह मेरी सबसे अच्छी दोस्त थीं। वह ऐसी हैं, जिनके साथ मैं अपनी जिंदगी गुजार सकता हूं। वह ऐसी हैं, जो सिर्फ मेरी ही चिंता नहीं करतीं, बल्कि पूरे परिवार का ख्याल रखती हैं। वह जैसी इंसान हैं, उनके बारे में कुछ भी कहना कम होगा। वह अत्यंत दयालु और सुंदर हैं। बचपन से मुझे मां-पिताजी ने यही शिक्षा दी कि जिंदगी का उद्देश्य बेहतर इंसान बनना होना चाहिए। ऐश्वर्या वाकई बेहतर इंसान हैं।
शादी के बाद आपका जीवन कितना बदला है?
फर्क यह आया है कि परिवार में अब एक नया सदस्य आ गया है। शादी के बाद सभी का जीवन बदलता है, जिम्मेदारी बढ़ती है। मैं कोई अलग या खास आदमी नहीं हूं। मेरे जीवन में भी बदलाव आया है।
अगर कोई विवाद हुआ तो किसकी बात मानी जाती है या मानी जाएगी?
आपकी शादी हो गई है न। आप अच्छी तरह जानते हैं कि किसकी बात मानी जाती है। वैसे अभी तक ऐसी स्थिति नहीं आई है। जब आएगी, तब देखेंगे।
ऐश्वर्या कितनी अच्छी पत्नी हैं?
मेरी तो एक ही पत्नी है और वह ऐश्वर्या हैं, इसलिए मैं किसी से उनकी तुलना नहीं कर सकता। जो मैंने सोचा था, वैसी पत्नी मिली।
जया जी के साथ ऐश्वर्या के संबंध के बारे में बताएं?
बहुत ही अच्छा है। मुझसे ज्यादा प्रगाढ़ संबंध हैं मां से, जो बहुत खास है। दोनों एक-दूसरे को स्नेह और आदर देते हैं। साथ में काफी समय बिताते हैं। मेरे मां-पिताजी को लगता है कि परिवार में एक बेटी आ गई है। उनके साथ बहू से ज्यादा बेटी जैसा व्यवहार होता है। श्वेता दीदी तो अब दिल्ली में रहती हैं, यहां परिवार में ऐश्वर्या उनकी कमी पूरी करती हैं।
कोई पुरानी आदत आप को छोड़नी पड़ी?
बिल्कुल नहीं। जैसा था, वैसा ही हूं।
ऐश्वर्या को आपने कितना बदल दिया?
यह आप उनसे पूछिए। मैं कैसे बता सकता हूं?
क्या ऐश्वर्या को खाना पकाना आता है?
जी हां, जिस दिन वह घर में आई, उस दिन रस्म के मुताबिक उन्होंने रसोई में काम किया। वह हलवा बहुत अच्छा बनाती हैं। हलवा मेरे घर में सभी को बहुत पसंद है।
आशंका व्यक्त की जा रही है कि शायद ऐश्वर्या लंबे समय तक फिल्मों में काम न करें?
वो काम कर रही हैं। लगातार फिल्में हैं उनके पास, वो काम करती रहेंगी। मैं चाहूंगा कि ऐश्वर्या काम करती रहें। मैं उनका जबरदस्त फैन हूं। यही चाहूंगा कि वो फिल्में करती रहें, जब तक उनका मन हो। मैंने, मां ने या पिताजी ने उन्हें कभी रोका नहीं है कि अब आप काम नहीं कर सकतीं। लोग भूल जाते हैं कि मेरे मां-पिता दोनों एक्टर हैं। मेरी मां ने शादी के बाद एक्टिंग नहीं छोड़ी, मेरी पैदाइश के समय उन्होंने एक्टिंग छोड़ी। मेरी बहन तब ढाई साल की थी, लेकिन वह काम करती रही थीं। उन्होंने एक्टिंग इसलिए छोड़ी कि उस समय वह सारा ध्यान परिवार में लगाना चाहती थीं। उन्होंने कहा कि अब मैं जीवन के इस दौर का आनंद उठाना चाहती हूं। वह उनकी व्यक्तिगत पसंद थी। उनसे किसी ने एक्टिंग छोड़ने के लिए नहीं कहा था। नौवें दशक के आरंभ में उन्होंने सिलसिला की। फिर हम बड़े हो गए। बोर्डिग स्कूल चले गए। जब हम बड़े हो गए तो उन्होंने फिर से एक्टिंग शुरू की और हजार चौरासी की मां जैसी फिल्म की। उस फिल्म के रोल ने उन्हें प्रेरित किया। मेरे परिवार में किसी ने किसी को कभी मना नहीं किया। मैं उम्मीद करता हूं कि ऐश्वर्या काम करती रहेंगी।
भारत इतना बड़ा देश है। इसमें दो राज्यों और संस्कृतियों के परिवारों में शादी होती है तो खान-पान से लेकर रस्म-ओ-रिवाज तक की कई दिक्कतें आती हैं। आप लोगों के परिवार में ऐसा सांस्कृतिक फर्क तो नहीं होगा?
पारंपरिक रूप से हम यूपी के हैं और वह कर्नाटक की हैं, लेकिन ऐसा कोई फर्क नहीं महसूस हुआ। ऐश्वर्या बहुत ही मिलनसार हैं और जल्दी घुल-मिल जाती हैं।
कितनी कोशिश रहती है कि आप दोनों साथ रहें और दिखें?
हम दोनों पति-पत्नी हैं। हम साथ रहना चाहते हैं। यह सामान्य बात है कि हम बाहर साथ जाएं और साथ दिखें। मौका मिलता है तो हम हमेशा साथ ही आते-जाते हैं। मैं न रहूं तो वह अकेली जाती हैं या वो न रहें तो मैं अकेला जाता हूं। कोशिश यही रहती है कि हम ज्यादा समय तक दूर न रहें।
पिछले साल खबर आई थी कि आप द्वारिका गए थे बच्चे की कामना लेकर, इस बारे में क्या कहेगे?
बिल्कुल गलत, मेरे दादा जी की पुण्यतिथि थी। हम लोग हर साल उनकी पुण्यतिथि के दिन किसी धार्मिक स्थान पर जाते हैं। ईश्वर का आशीर्वाद लेते हैं और उनके लिए प्रार्थना करते हैं।
फिर भी बच्चे की कामना तो होगी ही?
अभी हम लोगों ने इस बारे में नहीं सोचा है। हम युवा दंपति हैं और दोनों ही अपने-अपने काम में काफी व्यस्त हैं। हम दोनों मानते हैं कि जब बच्चे होने होंगे तो हो जाएंगे, आप उसकी प्लानिंग नहीं कर सकते।
एक बार खबर आई थी कि अमिताभ बच्चन ने अभिषेक बच्चन के लिए बेटी की नहीं, बेटे की कामना की। यह घटना समीर जी की पुस्तक के विमोचन के समय की है।
देखिए कि मीडिया कैसे गलत तरीके से कोई बात पेश करता है। मेरे पिताजी समीर जी की पुस्तक के विमोचन समारोह में गए थे। समीर जी ने कहा था कि मेरे पिता ने अमिताभ बच्चन के लिए गीत लिखे, मैं अभिषेक के लिए लिख रहा हूं और मैं चाहूंगा कि मेरा बेटा अभिषेक के बेटे के लिए गीत लिखे। इस संदर्भ में पिता जी ने कहा कि मैं जरूर चाहूंगा कि आपके बेटे मेरे पोते के लिए गीत लिखें। मीडिया ने इस वक्तव्य को गलत तरीके से पेश किया।
अपने पिताजी के बारे में कुछ बताएं?
उनके साथ सेट पर बीता हर दिन नया अनुभव छोड़ जाता है। जितना समय साथ बीते, उतना अच्छा। हर दिन विशेष होता है। वे पिता, इंसान और एक्टर सभी रूपों में द बेस्ट हैं।
अगर मैं पूछूं कि आप ने उनसे क्या सीखा है तो?
सब कुछ। मैंने अपने मा-पिता से ही सीखा है। मैं आज जो भी हूं, उन्हीं की वजह से हूँ। मैंने माँ-पिताजी की फिल्में देखी हैं और उनसे सीखा है। सेट पर वे किस तरह रोल को अप्रोच करते हैं? सेट से बाहर वे कैसे व्यवहार करते हैं? इंसान को कैसा होना चाहिए? इसके सर्वोत्तम उदाहरण हैं डैड।
आपके परिवार के चारों सदस्य अत्यंत व्यस्त हैं। एक परिवार के तौर पर मिलना-जुलना कैसे होता है?
बचपन से माँ का एक नियम रहा है कि अगर सारे लोग मुंबई में हैं तो चौबीस घंटे में एक बार सभी साथ मिलकर खाएंगे। वह चाहे नाश्ता हो या दिन या रात का खाना। आज भी वही नियम लागू होता है। हम लोग ज्यादातर डिनर एक साथ करते हैं।
लेकिन आप लोगों का काम तो अलग-अलग समय पर खत्म होता है?
सभी लोग इंतजार करते हैं। अगर मेरा पैकअप एक बजे रात को हो रहा है और पापा का छह बजे हो गया है तो वे इंतजार करेगे, मेरे लिए या मैं उनके लिए। पूरा परिवार एक साथ ही डिनर करता है।
आपके दादा जी के समय नियम था कि डायनिंग टेबल पर सभी हिंदी में बात करेंगे।
आज भी यही कोशिश रहती है। मां की सलाह रहती है कि डायनिंग टेबल पर कोई भी फिल्मों की बात नहीं करेगा। यह दादा जी के वक्त से चल रहा है। हम लोग अन्य विषयों पर बातें करते हैं। हम लोग हर तरह के विषयों पर बातें करते हैं। कितनी बातें हैं। दुनिया की इतनी घटनाएं हैं। मीडिया की वजह से हमें कितनी तो जानकारियां मिल जाती हैं। किसी ने कोई किताब पढ़ी हो तो उसकी बात होगी। ये सारे नियम-सिद्धांत दादा जी के समय से बने हैं।
आप एक अतिव्यस्त अभिनेता के पुत्र के रूप में बड़े हुए। आपका बचपन कैसा बीता था?
बचपन की अनेक यादें हैं। खासकर संडे की यादों से आज भी मन खुश हो जाता है। पिताजी संडे को छुट्टी लिया करते थे। उस दिन वे शूटिंग नहीं करते थे। हमलोग पूरे हफ्ते संडे का इंतजार करते थे और उसकी प्लानिंग करते थे। कई बार तो उनके साथ फुर्सत के पल बिताना ही महत्वपूर्ण हो जाता था। प्रतीक्षा के गार्डन में हम लोग खूब खेलते थे। संडे के लंच का खास महत्व रहता था। दादा जी-दादी जी, चाचा का परिवार और हमलोग एकत्रित होकर लंच लेते थे। एक कमरे में साथ बैठने की ऊर्जा आज भी महसूस करता हूं। अब लगता है कि कैसे हमारे अंदर भारतीय मूल्य आए। कैसे हम ने संयुक्त परिवार का महत्व समझा। पिताजी कभी-कभी यूं ही ड्राइव पर ले जाते थे। उनके साथ होने का आनंद कभी कम नहीं हुआ। आज भी पिताजी साथ रहते हैं तो मैं बहुत एक्साइटेड रहता हूं।
बचपन में पिताजी की डांट भी तो पड़ती होगी?
उन्होंने कभी किसी बात पर नहीं डांटा या पीटा। हमलोगों को अनुशासन में रखा जाता था, लेकिन कभी कोई चीज थोपी नहीं जाती थी। मां और पिताजी हमेशा सपोर्टिव रहे। हमने जो चाहा, वही किया और हर काम में उन दोनों का निर्देशन और समर्थन मिला। उनकी कोशिश रही कि हमें बेहतरीन चीजें और सुविधाएं दें। वे सब कुछ मुहैया करवा देते थे। यह हम पर निर्भर करता था कि हम उन चीजों और सुविधाओं का क्या उपयोग करते हैं? मां और पिताजी ने हमें खुला माहौल दिया। मैं अब महसूस करता हूं कि कैसे मां और पिताजी ने बगैर किसी प्रत्यक्ष दबाव के हमारे अंदर जिम्मेदारी का एहसास भरा। उन्होंने कभी नहीं कहा कि यह तुम्हें करना चाहिए या वह नहीं करना चाहिए। उन्होंने हमें ऐसी समझदारी दी कि हम स्वयं अपने लिए अच्छा-बुरा तय कर सकें।
मीडिया के रवैए के बारे में क्या कहेंगे?
पापा हमेशा कहते हैं कि यह जिंदगी तुमने चुनी है। यह सब इस जिंदगी का हिस्सा है। अगर पसंद नहीं है तो एक्टर मत बनो। अगर एक्टर बने हो तो यह सब होगा। तुम्हें इसके साथ जीना है और हम इसके साथ जीते हैं। मीडिया इतना बुरा नहीं है।
कहते हैं कि मीडिया आपकी प्रायवेसी में घुसपैठ करता है?
मैं बहुत ही प्रायवेट व्यक्ति हूं। यह आप पर निर्भर करता है कि आप अपनी प्रायवेसी कैसे संभालते हैं।
क्या आप मुंबई में आसानी से घूम लेते हैं। दर्शक और प्रशंसक घेर लेते होंगे?
मैं हाजी अली में जाकर जूस पीता हूं। वरली सी फेस पर भुट्टा खाता हूं और शिवाजी पार्क में वड़ा-पाव खा लेता हूं। आप अपना खाइए-पीजिए। हां, किसी ने पहचान लिया तो वह पास आता है। वे क्या चाहते हैं, एक ऑटोग्राफ। कभी हाथ मिलाना चाहते हैं या साथ में फोटो खींचते हैं। इसमें क्या जाता है? आप उन्हें खुश कर दें। मैं आज जो कुछ भी हूं, उनकी वजह से ही हूं। उनसे कैसे दूर रह सकता हूं।

Thursday, June 5, 2008

ऐश्वर्या राय से अजय ब्रह्मात्मज की बातचीत

ऐश्वर्या राय की यह बातचीत उनके व्यक्तित्व के ऐसे पहलुओं को सामने लाती है, जिनकेबारे में वे कम बातें करती हैं। यहां हम एक बेटी, बहू और बीवी ऐश्वर्या राय साथ ही ऐक्ट्रेस ऐश्वर्या राय से मिलते हैं॥

ऐश्वर्या राय की कई पहचान है। वह मिस व‌र्ल्ड रही हैं। एक्ट्रेस हैं। एक ब्रांड हैं। बेटी हैं और अब पत्नी एवं बहू भी हैं। बहू होते ही जब आप नए घर में जाती हैं तो बहुत कुछ छूटता या छोड़ना पड़ता है ़ ़ ़
मैं भगवान की शुक्रगुजार हूं। उनका आशीर्वाद है। मैं एक घर से ब्याह कर दूसरे घर में आई हूं तो फिर से वही मां-बाप का प्यार, वही अपनापन मिला ़ ़ ़ यह सिर्फ इंटरव्यू के लिए नहीं कह रही हूं। दिल की बात कह रही हूं। अभिषेक और हम हमेशा कहते हैं कि अब हमें दो मां-पिता मिल गए हैं। इसके लिए मैं उन्हें भी धन्यवाद दूंगी, क्योंकि हमारे अंदर अगर यह भावना है तो यह उनकी ही देन है। शायद हमारी परवरिश में ही था। हमें कुछ अलग से नहीं सिखाया गया। हमारे अंदर पहले से ही था। दोनों ही परिवारों में कई संभावनाएं हैं। मैं जिस परिवार से आई और जिस परिवार में व्याही गई-दोनों लगभग एक जैसे ही हैं। किसी भी लड़की के लिए यह बहुत बड़ा एहसास होता है ़ ़ ़ जब लगे ही नहीं कि यह अलग दुनिया है ़ ़ ़ अलग परिवार है। यहां सब कुछ नया है। अगर देखा जाए तो बदलाव जैसी कोई बात है भी नहीं, सब कुछ इतना सहज और सामान्य रहा ़ ़ ़ वही प्रवाह रहा। एक अंदरूनी बदलाव आ जाता है। सोचने और कंसर्न का दायरा बड़ा हो जाता है। अभी मेरा छोटा-परिवार नहीं रहा। बड़ा परिवार है। मैं से ज्यादा हम पर जोर है, जीवन में वह बहुत मजबूत हो गया है।

शादी को ऐश्वर्या राय किस रूप में लेती हैं?
बहुत ही खूबसूरत रूप है। अद्भुत खुशी का दौर होता है। मैं तो कहूंगी कि हर लड़की को इससे गुजरना चाहिए। शादी के बाद खुद का करीबी साक्षात्कार होता है। जिंदगी की सच्चाई और संबंधों को हम अलग से समझ पाते हैं। संबंधों का महत्व बढ़ जाता है। पति के साथ जो संबंध है, वह बहुत कीमती है। पति के साथ परस्पर आदर और प्रचुर प्रेम और सास-ससुर का स्नेह और प्यार तो मां-पिता के समान है। मैं तो बहुत सौभाग्यशाली हूं। शादी के बाद जब लड़की अपने ससुराल जाती है, तो मायके में उसकी जड़ें गहरी हो जाती हैं। परिवार के हर सदस्य के साथ आपके संबंध में कुछ नयी चीजें जुड़ जाती हैं। यह बहुत ही खूबसूरत साक्षात्कार है।

अमूमन मध्यवर्गीय परिवारों में सास-बहू के रिश्ते की बातें चलती हैं। माना जाता है कि आरंभ में समझदारी की दिक्कतें होती हैं। इस पारंपरिक धारणा के बारे में अपने संबंध में क्या कहेंगी?
हमारे तौर-तरीके और मूल्य मध्यवर्गीय हैं। मैं मध्यवर्गीय परिवार की लड़की हूं। आप यकीन करें कि इस परिवार के भी मूल्य और तौर-तरीके मध्यवर्गीय ही हैं। आप हमारी जड़ें देखिए। दादाजी, दादी मां और पा का परिवार मध्यवर्गीय रहा है। मां का भी परिवार ऐसा ही है। मेरी मां भी तीन बहनें हैं और यहां भी मां की तीन बहने हैं। उनके आपसी संबंधों की समानता देखकर दंग रह गई। सार्वजनिक तौर पर यह कहना शायद ज्यादा लगेगा, लेकिन अभिषेक और श्वेता को उनके मां-पिता ने बहुत सामान्य तरीके से पाला। आप उन्हें मनुष्य के रूप में देखें ़ ़ ़ उनके मूल्य बहुत मजबूत हैं। सिर्फ इस कारण इस परिवार को अलग नहीं कह सकते कि मां जया और पा अमिताभ बच्चन ऐक्टर हैं या मैं और अभिषेक ऐक्टर हैं। कल को हमारे बच्चे होंगे। उनके लिए तो हम भी ऐक्टर मां-बाप होंगे, लेकिन हमें अपने मां-बाप से जो मूल्य मिले हैं ़ ़ ़ हम उन्हीं मूल्यों को उन्हें सौंपेंगे। हमारे मूल सांस्कृतिक मूल्य मध्यवर्गीय ही है। करियर में हम जो भी करें, प्रोफेशनल तरीके से कुछ करें ़ ़ ़ तो उनसे बनी इमेज पर हमारा नियंत्रण नहीं है ़ ़ ़ उससे लग सकता है कि हमारे मूल्य अलग हैं, लेकिन हमारी जड़ों को देखें तो मूल्यों का पता चल जाएगा।

पहले परिवार का नियम था कि दिन का एक भोजन परिवार के सभी सदस्य साथ में करेंगे और डिनर टेबल पर सभी हिंदी में बातें करेंगे?
वह आज भी चल रहा है। हमलोग पूरी कोशिश करते हैं। अभिषेक के साथ मेरी बातचीत ज्यादा अंग्रेजी में ही होती है, लेकिन यह जरूरी है कि हमारी हिंदी मजबूत, स्पष्ट और साफ हो। मां और पा के कहने पर हम अमल करते हैं और पूरी कोशिश करते हैं कि हिंदी में बोलें। आपने सही कहा कि दिन का एक भोजन हमलोग साथ में करते हैं।

डिनर में क्या बनेगा, यह कौन डिसाइड करता है?
हम करते हैं। सभी की पसंद रहती है। मां कहती हैं कि तुम से कोई परेशानी नहीं होती। मैं भी यही कहती हूं कि सभी सामान्य और सहज हैं। कोई परेशानी नहीं होती। किसी के नखरे नहीं हैं। सभी दूसरों को समझने और उसके हिसाब से एडजस्ट करने के लिए तैयार रहते हैं। हम सभी रिलैक्स्ड इंडिविजुअल हैं।

अभिषेक बच्चन के बारे में बताएं?
अभिषेक को तो सभी जानते ही हैं। मैं तो उनसे प्यार ही करती हूं। मैं खुद को भाग्यशाली मानती हूं कि वे मेरी जिंदगी में आए।

अभिषेक की किस बात ने आपको आकर्षित किया?
किसी एक बात पर स्पष्ट रूप से कहना संभव नहीं होगा। वे जैसे व्यक्ति हैं ़ ़ ़ वे जैसे हैं। हमारे रिश्ते की सबसे अच्छी बात रही कि हम पहले से दोस्त रहे हैं। हमारी दोस्ती समय के साथ बढ़ती गई। हमारी समझदारी बहुत वास्तविक रही है। मैं नहीं कहती कि रिश्ते बनावटी होते हैं, लेकिन हमारा रिश्ता शुद्ध, स्पष्ट और पारदर्शी रहा। हम हमेशा एक-दूसरे से बातें शेयर करते रहे। हमारे बीच गहन प्यार और ढेर सारा आदर है। हम दोनों एक-दूसरे का भरपूर खयाल रखते हैं। एक-दूसरे की जरूरी चीजों को समझते हैं। हम दोनों एक जैसे ही हैं। अभिषेक चाइल्डमैन हैं और मैं चाइल्ड वीमैन हूं। इससे हम दोनों का संतुलन बना रहता है। कभी-कभी मैं किसी बच्ची की तरह व्यवहार करती हूं। उस समय अभिषेक मैच्योर हो जाते हैं। आप उनकी फिल्में देखें। उनके इंटरव्यू पढ़ें। आपको लगेगा कि उनमें परिपक्वता है। वे बहुत तीव्र और गहरे हैं, लेकिन कभी-कभी वे एकदम बच्चे बन जाते हैं। तमाशा करते हैं ़ ़ ़ आपको फंसाने की कोशिश करते हैं ़ ़ ़ ठीक मेरी तरह। मैं कभी बच्ची हो जाती हूं तो कभी सनसाइन गर्ल की तरह मैच्योर रहती हूं। मैं हमेशा अपनी उम्र से आगे रही। अपनी उम्र से ज्यादा बड़ी औरत रही।

आप दोनों के फैसलों में एक-दूसरे की सलाह या मदद की मात्रा कितनी रहती है?
हम दोनों के व्यक्तित्व में यह बात रही है कि हम अपनी बातें परिवार के साथ शेयर करते हैं। हम दोनों के परिवार ऐसे रहे हैं कि वे सलाह देंगे ़ ़ ़ और हम उनकी सलाह को पूरे ध्यान से सुनते हैं। आखिरकार हमारी फिल्में दर्शकों के लिए बनती हैं। वे भी दर्शक हैं। फिल्म के बारे में अलग-अलग राय सुनने से फिल्म को समझने में मदद मिलती हैं। उल्लेखनीय है कि उनकी सलाह और मदद के बावजूद यह अहसास दिलाया जाता है कि फैसले हम ने खुद लिए हैं। कभी मेरे मां-पिता या अभिषेक के मां-पा ने यह नहीं कहा या दवाब डाला कि ऐसा ही करो ़ ़ ़ इस तरह हमें अपने फैसलों का नाज होता है। एक आत्मविश्वास भी रहता है, लेकिन हम मन ही मन जानते हैं कि उनकी सलाह का निर्णायक प्रभाव है। हम उनकी राय पर ध्यान देते हैं और वे हमारे लिए महत्वपूर्ण है। वह आज भी चल रहा है। अब हम दोनों अलग नहीं रहे। अभिषेक और ऐश्वर्या अब दो मैं नहीं रहे। अब हम हम बन गए हैं। यह स्वाभाविक है कि हम एक-दूसरे से शेयर करें, तो हम अपने सोच-विचार और फैसले में एक-दूसरे की मदद लेते हैं। अगर एक तरह से सोच रहे हों, तो खुशी होती है।

कहते हैं कि शेयरिंग के साथ रिश्ते में स्पेस भी मिलना चाहिए?
हां, निश्चित ही। अभिषेक का एक अपना व्यक्तित्व है। वे इस बात को समझते हैं कि मैं अपना काम खुद देखती और संभालती रही हूं। वे इसका आदर करते हैं। हम दोनों एक-दूसरे पर कुछ थोपते नहीं हैं। हम खुद-ब-खुद एक-दूसरे के करीब आते हैं। सहारा लेते हैं और सुकून से रहते हैं। मेरे खयाल से इसी में दोनों की खुशी है कि हम मददगार बने रहें। हमारा निजी व्यक्तित्व तो है ही ़ ़ ़ मुझे अपने काम से बेहद प्यार है, लेकिन मैं अपने प्रियजनों को नाराज कर कुछ नहीं करती। सौभाग्य से मैं कभी ऐसी स्थिति में फंसी नहीं। मुझे हमेशा बेहतर और इज्जत भरा काम मिला, इसलिए दूसरों की भावनाएं अभी आहत ही नहीं हुई।

आप दोनों पहली फुर्सत में एक-दूसरे के पास चले जाते हैं, लेकिन इस संबंध में कहा जाता है किआपकी फिल्मों के नियमित काम में व्यवधान पड़ता है। दिल्ली-6, जोधा अकबर और दोस्ताना के संबंध में ऐसा कहा गया ़ ़ ़
हो ही नहीं सकता कि हम किसी फिल्म का नुकसान करें या व्यवधान डालें। हम सभी प्रोफेशनल हैं। परिवार के सभी सदस्य एक-दूसरे के काम का खयाल रखते हैं। अपने काम का खयाल रखते हैं। आपको याद होगा कि अभिषेक के जन्मदिन के मौके पर पा आए थे, लेकिन तबियत खरात होने के बावजूद वे शूटिंग पर लौट गए। हमलोग कई बार कहते भी हैं कि आप खुद को क्यों इतना झोंकते हैं ़ ़ ़ लेकिन यह उनका प्रोफेशनल अप्रोच है। इस परिवार में सभी अपने काम के प्रति बिल्कुल सही रहते हैं। जो धारणा है उसके विपरीत सच्चाई है। एक-दूसरे के सेट पर हम ज्यादा सावधान रहते हैं। जोधा अकबर के सेट पर दो-तीन बार अभिषेक आए, तो शॉट की जगह पर आने से बचते रहे। पा भी आए मिलने, तो आशु ने बुलाया कि सेट तो देख लीजिए। हम तो वैसे ही फूंक-फूंक कर कदम रखते हैं। हम ऐसे ही हैं। दिल्ली-6 की बात करें, तो राकेश, भारती और विनोद प्रधान को मैं बहुत पहले से जानती हूं। जोधा अकबर की रिलीज के समय अभिषेक विशेष तौर पर आए। जहां तक लोगों केकहने की बातें हैं, तो उस पर हमारा कोई काबू नहीं है।

कुछ तो लोग कहेंगे ़ ़ ़ लोगों का काम है कहना ़ ़ ़
बिल्कुल। अभी तो मैं आगे की बातें भी बता सकती हूं। हम जब से एक हुए, तब से ऐसी बातें चल रही हैं। आगे लिखेंगे कि उनके बीच तनाव हो गया है या किसी और से उनकी दोस्ती हो रही है। हम दोनों जिस प्रोफेशन में हैं, वहां यह स्वाभाविक है। अगर मैं अभी काम नहीं करती तो कहते कि देखो दबाव में आकर काम नहीं कर रही है। अगर मैं आज काम कर रही हूं और कल भी करती रहूंगी तो लिखा जाएगा कि वह केवल अपने करिअर पर ध्यान दे रही है। वह अपने परिवार के बारे में सोचती ही नहीं। दोनों ही तरह की बातें होती रहेंगी। लिखा जाएगा कि अभिषेक या मैं अपने को-स्टार को लेकर पजेसिव हैं या वे मेरे को-स्टार से जलते हैं। या मैं उनकी को-स्टार को पसंद नहीं करती। आगे चलकर स्कैंडल बनाने की कोशिश करेंगे। यह सब तो होगा ही। हमें मजबूत रहना है। हमें मालूम है कि हम किस सफर पर हैं ़ ़ ़ हमें मालूम है कि क्या-क्या लिखा है, लेकिन वही पहले हमारे निजी ताकत और फिर एक दंपति के रूप में हमारी ताकत काम आएगी। हमारा असली प्रेम, आदर और विश्वास ही ऐसी स्थितियों में हमारी मदद करेगा। ऐसी बातें हैं और रहेंगी ़ ़ ़ हमारी जिंदगी का यह भी एक पहलू है। हमें यह एहसास दिला दिया गया है।

क्या आपको नहीं लगता कि पिछले कुछ सालों में गहरी और अनुभूति वाली सारी फिल्में आपकी झोली में आ गिरीं ़ ़ ़ ऐसा संयोग कैसे हुआ?
आप इसे संयोग की बात कह कर मेरी प्रतिभा पर शक कर रहे हैं। गौर करें तो मैं जब फिल्मों में आई तब से ऐसी ही फिल्में कर रही हूं। पिछले दस-बारह सालों में इंडस्ट्री में काफी बदलाव आ गया है। पहले इस तरह की बात होती थी कि हीरो को इस तरह का रोल करना चाहिए। दो-चार गाने हों। स्क्रीन पर ज्यादा देर तक रहे तभी लंबा करिअर चलेगा। आप देखें कि मेरी पहली फिल्म इरूवर थी। उस समय कई फिल्मों के ऑफर थे। लोगों ने पूछा भी कि भले ही मणिरत्नम मोहन लाल के साथ काम कर रही हो। मेरे लिए तो वे किसी संस्थान की तरह हैं। मैं उनसे कितना सिखूंगी। मेरा परिप्रेक्ष्य यही था। जिसे लोग सुरक्षित रास्ता या निश्चित फार्मूले की बात कहते हैं, जिससे हर हीरोइन को गुजरना ही होता है ़ ़ ़ उसे शुरू से ही मैंने तय किया कि नहीं करूंगी। मैं इस सोच में नहीं फंसूंगी कि वैसी फिल्में करूंगी तो इंडस्ट्री में ज्यादा दिनों तक टिकी रहूंगी। या इस तरह के रोल करूं या किसी हीरो के साथ जोड़ी बना लूं, मैं इन सारी चीजों से दूर रही। यह मेरी ख्वाहिश, निर्देशकों का विश्वास है कि मैं हस तरह की धारणाओं को तोड़ पाई। इरूवर जींस और कंडू कोंडेन तमिल फिल्में कीं, तीनों ही फिल्में अलग-अलग किस्म की थीं। कथित रूप से कॉमर्शिअॅल नहीं थीं। मुझे खुशी है कि उन फिल्मों की चर्चा हुई। हिंदी फिल्मों में और प्यार हो गया मेरी पहली फिल्म थी। उसी फिल्म के साथ आ अब लौट चलें आरंभ हुई। वह हीरो-हीरोइन से ज्यादा बाप-बेटे की कहानी थी। आपने सही कहा कि मेरी झोली में अच्छी फिल्में आई, लेकिन मैं सच कह रही हूं कि मैंने कभी सुरक्षित होने के लिहाज से उन फिल्मों को नहीं चुना। संजय लीला भंसाली की हम दिल दे चुके सनम मेरी तीसरी फिल्म थी। उसमें मेरा देसी लुक था। मैंने यह नहीं सोचा कि केवल साडि़यों और भारतीय कपड़ों में ही लोग देखेंगे। वह किरदार बहुत मजबूत था। ताल में सुभाष जी ने मुझे बहुत अच्छा रोल दिया। जोश में पश्चिमी लुक था और चुलबुली लड़की थी मैं। शाहरुख खान की बहन बनी थी। लोगों ने कहा भी कि बहन क्यों बन रही हो? मैं घिसे-पिटे तरीके के रोल से बचने के लिए यह सब कर रही थी। मैं यह नहीं कह रही कि किसी मिशन के साथ आई थी, लेकिन जब ऐसी फिल्में मिली तो मैं पीछे नहीं हटी। मैंने कहा कि मैं फिल्मों में काम कर रही हूं। मुझे इंडस्ट्री और दर्शकों को स्पष्ट कर देना है, मुझे खुशी है कि यह संदेश गया। मैं किसी इमेज के चक्कर में नहीं रही। मैं खुद को कमर्शियल अभिनेत्री साबित करने के भी चक्कर में नहीं रही। नृत्य मेरी विशेषता है। मेरी फिल्मों में हर डायरेक्टर ने कुछ नया करने की कोशिश की। मेरे पास च्यादा गाने नहीं है, जो कि होने चाहिए थी। जोधा अकबर में मैंने आशुतोष से आग्रह किया था कि एक गाना मुझे दें। राजस्थानी लोक नृत्य और सूफीवाद का अच्छा मेल हो सकता है। आशु ने कहा कि विचार अच्छा है, लेकिन मेरे नैरेटिव में नहीं आता। मैं उनके फैसले का आदर किया। मुझे खुशी है कि मेरी फिल्में यादगार हो गई, क्योंकि मेरे निर्देशकों ने अपनी फिल्मों और किरदार पर ध्यान दिया।

आपकी फिल्मों में अच्छी फिल्मों का प्रतिशत अच्छा रहा है ़ ़ ़
हां, कई फिल्में तो छूट भी गई। ऐसी कई फिल्में चाह कर भी नहीं कर पाई। एक साल में ज्यादा से ज्यादा तीन ऐसी फिल्में कर सकते हैं। चौथी फिल्म के तौर पर एक हल्की-फुल्की फिल्म कर सकते हैं। ऐसी फिल्म हो, जिसमें एक्टिंग के लिहाज से च्यादा मेहनत नहीं करनी हो। जैसे कि मैंने डेविड धवन की फिल्म या क्यों हो गया न की ़ ़ ़ मैंने इन फिल्मों को इसलिए किया कि वे हल्की फिल्में थीं। मैं खुश हूं कि मैंने वे फिल्में कीं। मुझ पर कोई दबाव नहीं था। मैंने खाकी भी की। हालांकि वह एक स्ट्रांग स्टोरी थी, लेकिन मेरे काम पर च्यादा दबाव नहीं था। अब जैसे गुरु का उदाहरण दूं। उसमें सुजाता का काम च्यादा नहीं था, लेकिन मैंने पूरा समय दिया ताकि मणि अपने हिसाब से शूट कर सकें। मेरे ऊपर दबाव नहीं था। अभी रोबोट करने जा रही हूं। उसमें मेरा कोई इंटेंस रोल नहीं है। वह कमर्शियल और फन फिल्म है। उसमें वक्त लगेगा, क्योंकि तकनीकी रूप से वह बहुत डिमांडिंग फिल्म है ़ ़ ़ वक्त काफी लगेगा उस फिल्म के बनने में ़ ़ ़ मेरे लिए उसमें काफी काम रहेगा, क्योंकि वह एक अलग भाषा की फिल्म होगी। मुझे मेहनत करनी पड़ेगी। इनपुट और मेहनत तो रहेगी। भले ही दुनिया को लगे कि हल्का-फुल्का रोल है और इमोशनली इंटेंस नहीं है।

कहा जा रहा है कि आप सबसे महंगी एक्ट्रेस हो गयी हैं। ज्यादा पैसों का आकर्षण आपके काम और पसंद को भी प्रभावित कर सकता है?
मैं बाकी लोगों के बारे में कह नहीं सकती। मैं तो पहले जैसे काम करती थी, वैसे ही करती रहूंगी। मेरा काम ही बोलेगा। इतने सालों में आप लोगों ने पहचाना होगा कि मैं पैसे और काम में किसे महत्व देती हूं। जहां तक ऐक्टर के पैसे बढ़ने की बात है तो आमदनी बढ़ना तो पॉजीटिव बात है। यह फिल्म इंडस्ट्री की सफलता है। यह प्रगति है और मान लीजिए कि इंडस्ट्री फल-फूल रही है। यह पूरा बिजनेस है। कोई खेल-खिलवाड़ है नहीं ़ ़ ़ लोग समझ रहे हैं। निवेशक धन लगा रहे हैं। प्रोड्यूसर पैसे लगा रहे हैं। यह प्रोजेक्ट पर भी निर्भर करता है। आप इसका सरलीकरण नहीं कर सकते।

क्या शाहरुख खान के साथ कोई फिल्म करेंगी?
क्यों नहीं? पहली फिल्म में मैं उनकी बहन थी। मेरे लिए फिल्म और डायरेक्टर ज्यादा महत्वपूर्ण रहते हैं। मुझे खुशी है कि मेरी फिल्मों की कहानी अलग रही है। हीरो कभी मुद्दा नहीं रहे।

श्रीराम राघवन की फिल्म की क्या स्थिति है?
लोग मुझ पर आरोप लगा रहे थे कि मेरी वजह से देरी हो रही है। सच तो यह है कि श्रीराम अपनी स्क्रिप्ट को अंतिम रूप दे रहे हैं। मैंने श्रीराम से कहा कि आप स्पष्ट कर दीजिए। लोग खामखां मेरे परिवार पर आरोप लगा रहे हैं। ये बातें अच्छी नहीं हैं। स्क्रिप्ट तैयार होते ही हमलोग काम शुरू कर देंगे।

सरकार राज कैसी लग रही है? आप अभिषेक और अमित जी के साथ आ रही हैं?
उन दोनों के साथ काम करना आनंददायक है। मैं इसलिए नहीं कह रही हूं कि अमित जी मेरे श्वसुर और अभिषेक मेरे पति हैं। इंडस्ट्री में कोई भी कलाकार और तकनीशियन यही बात कहेगा। कैमरा चालू होते ही हमारे निजी रिश्ते खत्म हो जाते हैं और हम एक्टर में बदल जाते हैं। अमिताभ बच्चन और अभिषेक बच्चन के साथ काम करना तो हमेशा आनंददायक रहा। दोनों फैंटेस्टिक एक्टर हैं। रामू मुझ से सत्या के समय से मिल रहे हैं। तब से अभी तक हमलोग साथ काम नहीं कर पाए। तारीखों की दिक्कत थी। आखिरकार सरकार राज साथ कर सके। उनका दिमाग बिल्कुल अलग तरीके से काम करता है। उनके पास भविष्य के लिए भी कई फिल्मों की योजनाएं हैं।

अमिताभ बच्चन के साथ काम करना सुखद अनुभव रहता है। सभी ऐसा कहते हैं, आप क्या कहती हैं?
अनुभव से इतने समृद्ध ऐक्टर के साथ काम करना सुखद और सीखने लायक होता है। उनका अनुभव ही देख लें। अभिषेक ने भी बेहतर अभिनेता के तौर पर निखरे हैं। उनके साथ काम करना हमेशा अच्छा लगता है। गुरु में हमलोगों का काम पसंद किया गया। हम लोगों के पास अभी जिस तरह की फिल्मों के विषय और विचार आ रहे हैं, उससे लगता है कि सभी हमें एक्टर के तौर पर पहचान रहे हैं। जरूरी नहीं है कि पर्दे पर हम पति-पत्नी और प्रेमी-पे्रमिका ही रहें। मैं एक बात पर जोर देना चाहूंगी कि आप यह न भूलें कि जया जी और अमित जी मां-पिता भी हैं। उनके लिए मैं उनकी बहू हूं और अभिषेक उनके बेटे हैं। यह रिश्ता इतना रियल है।

जोधा में कौन सी बात सबसे प्रभावित करती है?
उनकी अंदरूनी ताकत। उन्होंने शादी का अहम फैसला लिया। मुगल शहंशाह और राजपूत राजा के बीच राजनीतिक संबंध बन रहा था। उस राजनीतिक संबंध के तहत जोधा की शादी हो रही थी। जोधा एक तरीके से अपने दुश्मन से शादी कर रही थी। वह जवान लड़की थी। निश्चित ही उसकी अंदरूनी ताकत रही होगी कि पिता से असहमत होते हुए भी उसने अपने पिता की प्रतिष्ठा रखी और अपनी प्रजा के लिए ऐसा कदम उठाया। वह एक नयी दुनिया में गयी नए धर्म के लोगों के बीच गयी। उसने उस शादी को स्वीकार किया और मौका दिया कि समझदारी विकसित हो। मतभेदों के बावजूद समझदारी बन सके। जोधा ने अकबर को किस तरह प्रभावित किया॥ एक संबंध में खूबसूरती यही है, जब किसी बात को थोपा न जाए और प्यार एवं अपनापन के साथ एक समझदारी और लगाव विकसित हो जाए। तब उस रिश्ते की जड़ें मजबूत होती हैं। उनके संबंधों की यही सुंदरता है। अकबर और जोधा ने एक-दूसरे पर धर्म, व्यवहार, विश्वास थोपा नहीं, लेकिन दोनों को अपनी संस्कृति और धर्म का अभिमान रहा। उन्होंने इस बारे में बड़े बयान नहीं दिए। जोधा यह बात मुगल जनाना में ले आई और अकबर को राजी कर सकी। अकबर राजनीतिज्ञ तो थे ही, लेकिन बेहतरीन इनसान भी थे। उनकी दूरदृष्टि ही थी कि उन्होंने जोधा से शादी की। पहले यह सोच दिमाग में थी, बाद में दिल में उतर गई।

जोधा अकबर मां-पिता द्वारा की गई शादी और उसके बाप पनपे प्यार को भी स्थापित करती है?
हां, इस हिसाब से यह आज की फिल्म है। आज भी देश में 70-80 प्रतिशत शादियां मां-पिता ही तय करते हैं। इस फिल्म को देखकर समझ सकते हैं कि शादी के बाद कैसे प्रेम पनपता है या नजदीकी बढ़ती है।

Thursday, February 14, 2008

प्रेमीयुगल अभिषेक और ऐश्वर्या


आज हर जगह रोमांस और प्रेम का जिक्र हो रहा है.चवन्नी ने सोचा कि क्यों नहीं फ़िल्म इंडस्ट्री की कोई प्रेमकहानी बताई जाए.वैसे तो कई प्रेमीयुगल हैं,जिनकी प्रेम्कहानियाँ आकर्षित करती हैं और उनसे पत्र-पत्रिकाओं की सुर्खियाँ बनती है.टीवी चैनलों के ब्रेकिंग न्यूज़ बनते हैं.हालांकि पूरा देश ऐसी खबरों को महत्व दिए जाने की निंदा करता है,लेकिन उन्हें देखता भी है.यह एक सच्चाई है,जिसे अमूमन लोग स्वीकार नहीं करते.पॉपुलर कल्चर के प्रति एक घृणा भाव समाज में व्याप्त है।

चवन्नी अभिषेक और ऐश्वर्या की जोड़ी को अद्भुत मानता है.दोनों की शादी को मीडिया ने विवादों में भले ही ला दिया हो और हमेशा उन पर नज़र रखने का सिलसिला कम नहीं हुआ हो,इसके बावजूद दोनों बेहद सामान्य पति-पत्नी की तरह की जिंदगी के मजे ले रहे हैं.चवन्नी यह बात फिलहाल दावे के साथ इसलिए कह सकता है कि,उसने हाल ही में दोनों से मुलाक़ात की और ऐसे ही मुद्दों पर बात की.कहते हैं उनका हनीमून अभी तक ख़त्म नहीं हुआ है.मौका मिलते ही दोनों एक जगह हो जाते हैं.उनके पास ऐसी सुविधाएं हैं की वे भौगोलिक दूरी को अपने प्रेम के आड़े नहीं आने देते.हालांकि मीडिया इस बात से भी नाराज रहता है कि दोनों इस तरह से क्यों मिलते और साथ रहते हैं।

इस प्रेमीयुगल के साथ एक ख़ास बात है कि दोनों वर्किंग फ़िल्म स्टार हैं और दोनों ही काफी व्यस्त हैं.फिलहाल ऐसी कोई फिल्मी जोड़ी नहीं है जो टक्कर के स्टार हों और पति-पत्नी भी हों.आप सारे पॉपुलर स्टार को देख लें या तो उनकी शादियाँ नहीं हुई हैं या फिर उनकी बीवियाँ या शौहर फ़िल्म स्टार नहीं हैं या नहीं रहे.बहुत मुश्किल होता है हमकदम बनना.अभिषेक और ऐश्वर्या अपने दाम्पत्य की चुनौतियों को समझते हैं और थोड़े सावधान भी रहते हैं।

चवन्नी आज उन्हें बधाई देता है और पुरने रिवाज के हिसाब से कहना चाहता है कि उन्हें किसी की नज़र न लगे.चश्मेबद्दूर ...

Tuesday, October 16, 2007

क्या हैं ऐश्वर्या राय ?

-अजय ब्रह्मात्मज
मिस व‌र्ल्ड, हिंदी फिल्मों की हीरोइन, मशहूर मॉडल या कुछ और? कई पहचानों की संश्लिष्ट अस्मिता में ऐश्वर्या राय से हम सभी ठीक से परिचित नहीं हो पाते। अगर सारी पहचानों से आंखें मूंद कर ऐश्वर्या राय के बारे में सोचें और आंखें खोलें तो कोमल खिलखिलाहट से भरी एक चंचल लडकी नजर आती है, जिसके मुस्कराते ही सतरंगी किरणें बिखरने लगती हैं और उसकी आंखों की नीली-हरी गहराई आमंत्रित करती है।
अपने समाज में लडकियों की स्वतंत्र पहचान नहीं है। इंदिरा गांधी भी आजन्म नेहरू की बेटी रहीं और आज की चर्चित नेता सोनिया गांधी भी राजीव गांधी की पत्नी हैं। लडकियां किसी भी ओहदे पर पहुंच जाएं, अपनी मेहनत और लगन से कुछ भी हासिल कर लें और अपनी मेधा से आकाश छूने का संकेत दें तो भी हम उन्हें किसी न किसी प्रकार मर्दो के घेरे में ले आते हैं। समाज उनकी उडान को सराहता है, लेकिन धीरे-धीरे उनके पंख भी कतरता रहता है। अगली बार जब वे उडान के लिए खुद को तौलती हैं तो डैनों में ताकत की कमी महसूस होती है, क्योंकि मर्यादा की आड में उनके पंख नोच लिए गए होते हैं।
बहुत जरूरी है ऐश्वर्या राय के व्यक्तित्व को समझना। वह हमारे बीच से उभरी एक ऐसी लडकी हैं, जिनका कद उनकी वर्तमान उपलब्धियों से ज्यादा है। अभी ऐश्वर्या राय के व्यक्तित्व के चंद पहलू ही सामने आए हैं। यकीन करें आने वाले सालों में उनकी पहलकदमी और चाहत से हम सभी चौंकेंगे। ऐश्वर्या राय को भी एहसास नहीं होगा कि वह कब इस ऊर्जा और क्षमता से भर गई। प्रतिभा, प्रशंसा और प्रतिष्ठा, निरंतर साधना और लक्ष्यभेद की एकाग्रता से हासिल होती है। छोटी उम्र में ही ऐश्वर्या राय को लग गया था कि वह एक दिन मशहूर होंगी। योग-संयोग तो बाद में होते हैं, पहले आत्म साक्षात्कार होता है। बुद्ध ने कहा था आत्मदीपो भव। सचमुच अंतस में चिराग जल जाए तो हर अंधेरा छंट जाता है। दुनिया रोशन होती है और रास्ते खुशगवार..। कल्पना करें सामान्य मध्यवर्गीय परिवार की एक लडकी क्या कभी शोहरत की इन बुलंदियों पर पहुंचने के ख्वाब देख सकती हैं? ऐश्वर्या ने भी नहीं सोचा होगा। हिंदी फिल्मों में कहते हैं न, दिल से ईमानदार ख्वाहिश करो तो सारी कायनात उसे पूरा करने में जुट जाती है।
घर का जोगी जोगडा, आन गांव का सिद्ध ऐश्वर्या पर यह मुहावरा चरितार्थ होता है। ऐश्वर्या राय की लोकप्रिय पहुंच की कद्र देश में नहीं हो सकी और न हो रही है। यहां हम उन्हें कभी सलमान खान, कभी विवेक ओबेराय तो कभी किसी और के साथ जोडकर चटखारे लेते हैं। ऐश्वर्या राय इन संबंधों तक सीमित नहीं हैं। वह भारत की लोकप्रिय पहचान बन चुकी हैं। मीडिया विस्फोट के इस दौर में इंटरनेशनल बाजार ऐश्वर्या राय की इमेज को सही ढंग से परख कर लाभ कमा रहा है। विदेशी शहरों और चौराहों पर मल्टीनेशनल कंपनियों के उपभोक्ता उत्पाद की प्रति आकर्षित करने में बाजार उनका इस्तेमाल कर रहा है। इसे अनायास या जुगाड कह कर नहीं टाला जा सकता कि ऐश्वर्या राय भारत की एकमात्र ऐसी अभिनेत्री हैं, जिन्होंने हॉलीवुड की फिल्मों में समान हैसियत के साथ प्रवेश किया है। हॉलीवुड की फिल्में मानदंड नहीं हो सकतीं, लेकिन इंटरनेशनल मार्केट में वैसी फिल्मों में किसी कलाकार की मौजूदगी से दबदबा बनता है। ऐश्वर्या राय एक ब्रैंड हैं। ऐश्वर्या राय यूथ आइकॉन हैं। ऐश्वर्या राय विदेशों में इंडिया का पर्याय हैं। लोकप्रिय संस्कृति और उसके प्रतिनिधियों को हिकारत से देखने वाले इस सच को स्वीकार करने से पहले नाक-भौं सिकोड सकते हैं, लेकिन आज इंडिया का नाम लेते ही महात्मा गांधी के साथ ऐश्वर्या राय का भी स्मरण होता है आम विदेशियों को लंदन के मादाम तुसाद के म्यूजियम में ऐश्वर्या राय का मुजस्समा भी लगा है।
अभिनेत्री के तौर पर बात करें तो हिंदी फिल्मों में उनकी चंद अविस्मरणीय छवियां हैं। हम दिल दे चुके सनम में कहानी शुरू होने के पहले कुलांचे भरती हुई किसी हिरणी की तरह पलटकर विस्मित नयनों से देखती ऐश्वर्या राय की चपलता को संजय लीला भंसाली ने संतुलित गति और ठहराव के साथ कैमरे में कैद किया था। संजय लीला भंसाली की ही फिल्म देवदास में पारो की जीती ऐश्वर्या अपनी समृद्धि में भी भावनात्मक विपन्नता को जाहिर करती है। पारो का दर्द और द्वंद्व दर्शकों तक पहुंचता है। गुरु की सुजाता चरित्रांकन की सीमाओं के बावजूद हमें भारतीय नारी का साक्षात्कार कराती है।
जीवन और व्यवहार में ऐश्वर्या राय की सरलता प्रभावित और सम्मोहित करती है। लोकप्रिय और प्रतिष्ठित व्यक्तियों की समस्या और दुविधा रहती है कि वे हर किसी के साथ सामान्य व्यक्ति-सा व्यवहार नहीं रखते। पेशे की जरूरतें ओर इमेज की चिंता उन्हें सार्वजनिक जीवन में सहज नहीं रहने देती। ऐश्वर्या राय के पास एक अचूक अस्त्र है , वह किसी भी असहज स्थिति में खिलखिलाती हैं और आपकी जिज्ञासा को अपनी हंसी की लहरों के साथ दिल के दरिया में डुबो देती हैं। जवाब अनकहा रह जाता है, मर्म आप समझ लेते हैं। ऐश्वर्या राय को कभी झल्लाते, कुढते या सहमते नहीं देखा। वास्तव में यह लोकप्रियता का आत्मविश्वास है, जो कानपुर से कान तक उन्हें ताकत देता है।
एक साक्षात्कार में आत्मीय उद्गारों के मध्य उन्होंने कहा था, मैं मामूली चिंताओं की औसत औरत हूं। ऐश्वर्या राय की मामूली चिंताएं दूसरी लडकियों से कम या ज्यादा नहीं हैं, फिर भी वह मीडिया और प्रशंसकों के सवालों, संदेहों और संशयों के चक्रव्यूह में फंसी रहती हैं। कई बार लगता है कि वह कुछ कहते-कहते रुक जाती हैं। उनकी तसवीरों में भी यह उद्विग्नता और अचकचाहट दिखती है। ऐश्वर्या राय ऐसी प्रतिभा हैं, जो अभी तक पूरी तरह से प्रस्फुटित नहीं हुई हैं। कहा नहीं जा सकता कि भविष्य के गर्भ में उनके और कौन से पहलू आकार ले रहे हैं इतना भरोसा किया जा सकता है कि ऐश्वर्या के प्रस्फुटन को नहीं रोका गया तो वह अपने रंग और खुशबू से हमारी दुनिया को और भी मोहक एवं रोचक बनाएंगी।