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Wednesday, June 22, 2016

ले लिया है चैलेंज : शाहिद कपूर

-स्मिता श्रीवास्‍तव
शाहिद कपूर लगातार वरायटी रोल कर रहे हैं। खासकर वैसे युवाओं का, जो किन्हीं कारणों से ‘भटका’ हुआ या बागी है। मिसाल के तौर पर हैदरमें बागी युवक। अब उड़ता पंजाबमें वह भटके हुए रॉक स्टार की भूमिका में हैं। ‘हैदर’ में किरदार को रियल टच देने के लिए उन्होंने सिर मुंडवाया था। यहां उनके लंबे बाल हैं। शरीर पर टैटूओं की पेंटिंग है। साथ में ज्वैलरी है।
        शाहिद कहते हैं, ‘‘ लोग मुझे ऐसी फिल्में करने से मना करते हैं। उनकी दलील रहती है कि पता नहीं वैसी फिल्मों की कितनी आडियंस होगी। मेरा मानना है अगर कहानी उम्दा हो, उसमें इमोशन और एंटरटेनमेंट हो तो उम्मीद से अधिक आडियंस उसे देखती है। साथ ही कहानी अच्छी से कही गई हो तो। आडियंस अब उम्दा कहानियां ही देखना चाहती है।‘
एक वक्त ऐसा भी था जब ‘उड़ता पंजाब’ खटाई में पड़ गई थी। दरअसल, मैंने स्वीकृति दे दी थी। बाकी तीन किरदारों को लेकर कलाकार संशय में थे। वे फैसला नहीं कर पा रहे थे कि करे या न करें। यह फैसला आसान भी नहीं था। यह जोखिम भरा कदम था। मुझे लगा यह सुअवसर है। दर्शकों ने मुझे इस अवतार में न देखा है न कभी उम्मीद की है। यही नहीं भारतीय सिनेमा में ऐसा किरदार पर्दे पर दिखा नहीं है। लिहाजा मेरे लिए यह काफी एक्साइटिंग था।
मेरे किरदार का नाम टॉमी सिंह है। मेरे लिए बेहद एंटरटेनिंग किरदार है। स्क्रिप्ट सुनाने के दौरान निर्देशक अभिषेक चौबे ने मुझसे कहा था कि आडियंस उससे नफरत करेगी। हालांकि थोड़े समय बाद उसे पसंद करने लगेगी। यही तुम्हें ट्रांसफॉर्म करना है। टॉमी सिंह बदतमीज, लाउड और बदमिजाज है। उसे लगता है कि वह सबसे अच्छा है। हालांकि उसकी हरकतें देखकर लगेगा कि उसे कमरे से निकाल दो। यह सब चीजें आम तौर पर हीरो के किरदार में नहीं होती। यह एंटी हीरो टाइप है। मुझे यकीन है कि लोगों को पसंद आएगा। टॉमी बाहरी तौर पर भले ही बुरा हो मगर अंदरुनी तौर पर भला इंसान है। उस किरदार को निभाने मेरे लिए बड़ा चैलेंज था।
        मैंने जब पहली बार किरदार सुना था तो तभी अपने मन में उसकी एक छवि बना ली थी। मसलन उसके शरीर पर टैटू होने चाहिए। बाल जटा की तरह लंबे। पहले सोचा था कि इसके बाल कलर कर देंगे। सडक़ पर इसे चलते देखकर लगेगा कि कौन पागल जा रहा है। मैंने अभिषेक से आइडिया शेयर किया तो वह डर गए। फिर मैंने बालों का लुक बनाकर फोटो भेजी। उसे देखकर वे और डर गए। उस समय वे करीना कपूर और दिलजीत दोसांझ के साथ पहले हिस्से की शूटिंग कर रहे थे। दोनों के किरदार काफी रियलिस्टिक हैं। उन्हें लगा कि शाहिद मेरी फिल्म खराब कर देगा। शूटिंग से फुर्सत पाकर अभिषेक मुझसे मिले। फिर हमने बात की। उन्हें भी वह लुक पसंद आने लगा। टॉमी बाकी सभी किरदारों से बेहद अलग है। वह कोकीन का आदी है। वह बहुत बड़ा रॉकस्टार है। वह अपने तौर-तरीके की जिंदगी जी रहा है। यह सब भावनात्मक ही नहीं शारीरिक तौर पर भी दिखना चाहिए था। लोगों ने टॉमी के लुक को पसंद किया, यह काफी उत्साहवद्र्धक था। मेरा अनुमान था कुछ लोगों की ही प्रतिक्रिया मिलेगी। मगर बड़ी संख्या में लोगों ने प्रतिक्रिया दी। शायद इसके विषय को देखते हुए।
इसका विषय ओरिजनल है। इस स्पेस में फिल्म नहीं बनी है। एक वक्त था, जब ऐसी फिल्मों को दर्शक नजरअंदाज करते थे। आज वक्त बदल चुका है। अब अगर आप कुछ अलग करते हैं तो आडियंस उसे नोटिस करती है। यही उड़ता पंजाब के साथ हुआ है। यह फ्रेश प्रोडक्ट लग रहा है। फिल्म में चार बड़े सितारे हैं लेकिन कोई स्टार सरीखा नहीं रहा। सबने अपने किरदारों को जीवंत किया है। सिर्फ इतना कहूंगा कि यह ओरिजनल फिल्म है। इसे सपोर्ट करना चाहिए। इसमें ड्रग्‍स की बात की गई है। इसकी अहमियत हमें वर्तमान में भले महसूस न हो लेकिन पांच साल बाद यह आने वाली पीढ़ी के लिए बड़ा मुद्दा बनने वाला है। इस विषय पर बात होनी चाहिए। कुछ फिल्में आप बतौर स्टार या एक्टर करते हैं। मैंने इसे अपने एक्टर की संतुष्टि के लिए किया है। साथ ही खुद को चैलेंज करने के लिए। मैं खुश हूं कि लोगों को पसंद आ रही।
        रॉकस्टार को चिरपरिचित छवि रही है। कई रॉकस्टार ने मादक पदार्थों के सेवन की बात भी स्वीकारी है। कुछ ने हताशा में आत्महत्या भी है। आप के मन-मस्तिष्क में रॉकस्टार को लेकर कैसी छवि रही है? यह पूछने पर शाहिद कपूर कहते हैं, आप टॉमी सिंह को रॉकस्टार या पॉप स्टार कह सकते हैं। वह म्यूजिशियन है। बहुत बड़ा स्टार है। इस प्रकार के कई पॉप स्टार रह चुके हैं। वह बहुत पापुलर थे। हालांकि कुछ तुनकमिजाज थे। कुछ की अल्पायु में मृत्यु हो गई। उनके बारे में थोड़ा बहुत रिसर्च किया। हालांकि मैंने ओरिजनल कैरेक्टर गढ़ा। उसे जीवित इंसान में परिणत करने की कोशिश नहीं की। यह कोई डाक्यूमेंट्री नहीं है। न ही पॉप स्टार की जिंदगी पर आधारित है। यह फिक्शन कहानी है। इसमें टॉमी सिंह को खोजना था। उसके अंदर इंसान है या नहीं यह समझना था। वह ऐसा क्यों है? यह समझना था। वही कोशिश रही कि ऐसा किरदार लाए जिसे पहले सिल्वर स्क्रीन पर देखा न गया हो। पर हां यह जरूर कहूंगा कि हमने कई स्टार के उदय की कहानी देखी है। यह एक सटार के ढलान की है। यह उसके खुद के खोजने की जर्नी है।
किरदार को जीवंत बनाने की हर कलाकार की कोशिश होती है। उसके लिए तमाम तैयारी होती है। उस जैसे लोगों से मिलने की कोशिश होती है। हालांकि शाहिद कपूर नशे के आदी व्यक्ति से मिलने से इन्कार करते हैं। वह कहते हैं, हमने कई डाक्यूमेंट्री देखी। मेरी उम्र 35 साल है। मैंने बहुत दुनिया देखी है। कई जगहों पर लोगों को अल्कोहल या नशे का सेवन करते देखा है। उस हालत में उनका व्यवहार अजीबोगरीब होता है। उन्हें आप आव्‍जर्व करते हैं। हालांकि कोकीन का नशा करने वालों की आदतें थोड़ा अलग होती है। दरअसल, मादक पदर्ा्थ और दुष्प्रभाव अलग-अलग होते हैं। मैंने और अभिषेक ने उस पर काफी रिसर्च की।
        फिल्म में पंजाब में फैली ड्रग समस्या उजागर की गई है। हालांकि शाहिद इसे पंजाब तक सीमित नहीं मानते। वह कहते हैं, मादक पदार्थों का सेवन सिर्फ पंजाब नहीं पूरे विश्व की समस्या है। इसमें पंजाब बैकड्राप है। जैसे कश्मीर पर हमने हैदर बनाई थी। हालांकि उसमें हो रही बातें सभी के हितार्थ थीं। सभी की जिंदगी में समस्याएं आती है। व्यक्तिगत संघर्ष सभी को करना पड़ता है। लत किसी भी चीज की लग सकती है। चारों किरदार ड्रग से ही संबंधित है। ड्रग्‍स  की समस्या किसी घर या राज्य तक सीमित नहीं है। पहले नशे को हेयदृष्टि से देखा जाता था। अब पार्टी वगैरह में इनका सेवन आम बात हो गई है। कम उम्र में ही लोगों को इनकी जानकारी हो रही है। इसमें वास्तविक विषय पर बात की गई है। यह किसी राज्य या देश की नहीं देशव्यापी समस्या है।हाई सोसाइटी में अल्कोहल का सेवन होना आम बात है। स्टार बनने के बावजूद शाहिद ने खुद को इन चीजों से दूर रखा है। इस बाबत वह कहते हैं, मेरा कभी मन ही नहीं किया। मुझे इसमें कभी दिलचस्पी ही नहीं रही।

Friday, June 17, 2016

फिल्‍म समीक्षा : उड़ता पंजाब

-अजय ब्रह्मात्‍मज
(हिंदी फिल्‍म के रूप में प्रमाणित हुई उड़ता पंजाब की मुख्‍य भाषा पंजाबी है। एक किरदार की भाषा भोजपुरी है। बाकी संवादों और संभाषणों में पंजाबी का असर है।)
विवादित फिल्‍मों के साथ एक समस्‍या जुड़ जाती है। आम दर्शक भी इसे देखते समय उन विवादित पहलुओं पर गौर करता है। फिल्‍म में उनके आने का इंतजार करता है। ऐसे में फिल्‍म का मर्म छूट जाता है। उड़ता पंजाब और सीबीएफसी के बीच चले विवाद में पंजाब,गालियां,ड्रग्‍स और अश्‍लीलता का इतना उल्‍लेख हुआ है कि पर्दे पर उन दृश्‍यों को देखते और सुनते समय दर्शक भी जज बन जाता है और विवादों पर अपनी राय कायम करता है। फिल्‍म के रसास्‍वादन में इससे फर्क पड़ता है। उड़ता पंजाब के साथ यह समस्‍या बनी रहेगी।
उड़ता पंजाब मुद्दों से सीधे टकराती और उन्‍हें सामयिक परिप्रेक्ष्‍य में रखती है। फिल्‍म की शुरूआत में ही पाकिस्‍तानी सीमा से किसी खिलाड़ी के हाथों से फेंका गया डिस्‍कनुमा पैकेट जब भारत में जमीन पर गिरने से पहले पर्दे पर रुकता है और उस पर फिल्‍म का टायटल उभरता है तो हम एकबारगी पंजाब पहुंच जाते हैं। फिल्‍म के टायटल में ऐसी कल्‍पनाशीलता और प्रभाव दुर्लभ है। यह फिल्‍म अभिषेक चौबे और सुदीप शर्मा के गहरे कंसर्न और लंबे रिसर्च का परिणाम है। कहना आसान है कि फिल्‍म डाक्‍यूमेंट्री का फील देती है। जब आप हिंदी फिल्‍मों की प्रचलित प्रेम कहानी से अलग जाकर सच्‍ची घटनाओं और समसामयिक तथ्‍यों को संवादों और वास्‍तविक चरित्रों को किरदारों में बदलते हैं तो इस प्रक्रिया में कई नुकीले कोने छूट जाते हें। वे चुभते हैं। और यही ऐसी फिल्‍मों की खूबसूरती होती है। हो सकता है कि पंजाब के दर्शकों का फिल्‍म देखते हुए कोई हैरानी नहीं हो,लेकिन बाकी दर्शकों के लिए यह हैरत की बात है। कैसे देश का एक इलाका नशे की गर्त में डूबता जा रहा है और हम उसे नजरअंदाज करना चाहते हैं। बेखबर रहना चाहते हैं। अगर एक फिल्‍मकार साहस करता है तो सरकारी संस्‍थाएं अड़ंगे लगाती है।
उड़ता पंजाब टॉमी सिंह(शाहिद कपूर),बिहारिन मजदूर(आलिया भट्ट,सरताज(दिलजीत दोसांझ),प्रीत सरीन(करीना कपूर खान) और अन्‍य किरदारों से गुंथी पंजाबी सरजमीन की कहानी है। उड़ता पंजाब में सरसों के लहलहाते खेत और भांगड़ा पर उछलते-कूदते और बल्‍ले-बल्‍ले करते मुंडे और कुडि़यां नहीं हैं। इस फिल्‍म में हिंदी फिल्‍मों और पॉपुलर कल्‍चर से ओझल पंजाब है। ड्रग्‍स के नशे में डूबा और जागरुक होता पंजाब है। उड़ता पंजाब पंजाब की सच्‍ची झलक पेश करती है। वह निगेटिव या पॉजीटिव से ज्‍यादा जरूरी है। फिल्‍मों का काम सिर्फ गुदगुदाना ही तो नहीं है। झिंझोरना और अहसास करना भी तो है। उड़ता पंजाब में अभिषेक चौबे कुछ सीमाओं के साथ सफल रहते हैं। निश्चित ही इसमें उन्‍हें सहयोगी लेखक सुदीप शर्मा,संगीतकार अमित त्रिवेदी,गीतकार शेली,शिवकुमार बटालवी और वरूण ग्रोवर व अन्‍य तकनीकी टीम से पूरी मदद मिली है।
शाहिद कपूर ने टॉमी सिंह की उलझनों को अच्‍छी तरह पर्दे पर उतारा है। शाहिद लगातार किरदारों का आत्‍मसात करने और उन्‍हें निभाने में अपनी हदें तोड़ रहे हैं। इस फिल्‍म में उनका किरदार परिस्थितियों में फंसा और जूझता गायक है,जो लोकप्रियता की खामखयाली में उतराने के बाद धप्‍प से खुरदुरी जमीन पर गिरता है तो उसे अपनी गलतियों का अहसास होता है। वह संभलता और अहं व अहंकार से बाहर निकल कर किसी और के लिए पसीजता है। शाहिद कपूर की मेहनत सफल रही है। किरदार की अपनी दुविधाएं हैं,जो लेखक और निर्देशक की भी हैं। बिहारिन मजदूर के रूप में आलिया भट्ट की भाषा और बॉडी लैंग्‍वेज की कमियां ईमानदार कोशिश से ढक जाती है। भोजपुरी बोलने में लहजा परफेक्‍ट नहीं है और बॉडी लैंग्‍वेज में हल्‍का सा शहरीपन है। फिर भी आलिया की इस कोशिश की तारीफ करनी होगी कि वह किरदार में ढलती हैं। दिलजीत दोसांझ पुलिस अधिकारी की भूमिका में सहज और स्‍वाभाविक हैं। उनके बॉस के रूप में आए कलाकार मानव भी ध्‍यान खींचते हैं। लंबे समय के बाद सतीश कौशिक का सदुपयोग हुआ है। इस फिल्‍म में प्रीत सरीन के किरदार पर दूसरे किरदारों की तरह ध्‍यान नहीं दिया गया है। प्रीत और सरताज की बढ़ती अनुभूतियों और नजदीकियों में भी लेखक-निर्देशक नहीं रमे हैं। यही कारण है कि जब-जब कहानी शाहिद-आलिया के ट्रैक से जब दिलजीत-करीना के ट्रैक पर शिफ्ट करती है तो थोड़ी सी फिसल जाती है।
अच्‍छी बात है कि उड़ता पंजाब में ड्रग्‍स और नशे को बढ़ावा देने वाले दृश्‍य नहीं है। डर था कि फिल्‍म में उसे रोमांटिसाइज न कर दिया गया हो। फिल्‍म के हर किरदार की व्‍यथा ड्रग्‍स के कुप्रभाव के प्रति सचेत करती है। महामारी की तरह फैल चुके नशे के कारोबार में राजनीतिज्ञों,सरकारी महकमों,पुलिस और समाज के आला नागरिकों की मिलीभगत और नासमझी को फिल्‍म बखूबी रेखांकित और उजागर करती है।
गीत-संगीत उड़ता पंजाब का खास चमकदार और उल्‍लेखनीय पहलू है। अमित त्रिवेदी ने फिल्‍म की कथाभूमि के अनुरूप संगीत संजोया है।
(फिल्‍म की मुख्‍य भाषा इसकी लोकप्रियता में अड़चन हो सकती है। मुंबई में पंजाबी के अंग्रेजी सबटायटल थे। क्‍या हिंदी प्रदेशों में हिंदी सबटायटल रहेंगे?)
अवधि- 148 मिनट
स्‍टार- चार स्‍टार