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Tuesday, June 19, 2018

लंदन से इरफ़ान का पत्र


इरफ़ान भारत से दूर विदेश में अपनी दुर्लभ बीमारी का इलाज करवा रहे हैं.यहाँ उनके दर्शक और प्रशंसक उनके जल्दी से सेहतमंद होकर लौटने की कामना कर रहे हैं.सभी की दुआएं और प्रार्थनाएं उनके साथ हैं. यह पूंजीभूत प्रार्थना इरफ़ान की जीवनधारा और विश्वास की शक्ति है.जिंदगी कई बार ऐसे मोड़ पर ले आती है जब अनिश्चित ही निश्चित जान पड़ता है.मिजाज से योद्धा इरफ़ान की मानसिक अवस्था और अहसास को हम उनकी लिखी इन पंक्तियों में महसूस कर सकते हैं.इरफ़ान ने न्यूज़ लॉन्ड्री के स्तंभकार अजय ब्रह्मात्मज के साथ अपने भावपूर्ण शब्द शेयर किए हैं.हम उसे यहाँ अविकल रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं....

कुछ महीने पहले अचानक मुझे पता चला था कि मैं न्यूरोएन्डोक्रिन कैंसर से ग्रस्त हूँ,मैंने पहली बार यह शब्द सुना था.खोजने पर मैंने पाया कि मेरे इस शब्द पर बहुत ज्यादा शोध नहीं हुए हैं,क्योंकि यह एक दुर्लभ शारीरिक अवसथा का नाम है और इस वजह से इसके उपचार की अनिश्चितता ज्यादा है.

अभी तक अपने सफ़र में मैं तेज़- मंद गति से चलता चला जा रहा था ... मेरे साथ  मेरी योजनायें,आकांक्षाएं,सपने और मंजिलें थीं.मैं इनमें लीन बढ़ा जा रहा था कि अचानक टीसी ने पीठ पर टैप किया ,’आप का स्टेशन आ रहा है,प्लीज उतर जाएं.मेरी समझ में नहीं आया ,ना ना मेरा स्टेशन अभी नहीं आया है.’ ...
जवाब मिला  अगले किसी भी स्टाप पर उतरना होगा , आपका गन्तव्य आ गया ...

अचानक एहसास हुआ कि आप किसी ढक्कन(कॉर्क) की तरह अनजान सागर में अप्रत्याशित लहरों पर बह रहे हैं...लहरों को क़ाबू करने की ग़लतफ़हमी लिए.

इस हड़बोंग,सहम और डर में घबरा कर मैं अपने बेटे से कहता हूँ,’ आज की इस हालत में मैं केवल इतना ही चाहता हूँ...मैं इस मानसिक स्थिति को  हडबडाहट, डर, बदहवासी की हालत में नहीं जीना चाहता. मुझे किसी भी सूरत में मेरे पैर चाहिए, जिन पर खड़ा होकर अपनी हालत को तटस्थ हो कर जी पाऊं.मैं खड़ा होना चाहता हूँ.

ऐसी मेरी मंशा थी, मेरा इरादा था...

कुछ हफ़्तों के बाद मैं एक अस्पताल में भर्ती हो गया. बेइंतहा दर्द हो रहा है. यह तो मालूम था कि दर्द होगा,लेकिन ऐसा दर्द... अब दर्द की तीव्रता समझ में आ रही है...कुछ भी काम नहीं कर रहा है. ना कोई सांत्वना और ना कोई दिलासा. पूरी कायनात उस दर्द के पल में सिमट आई थी... दर्द खुदा से भी बड़ा और विशाल महसूस हुआ.

मैं जिस अस्पताल में भर्ती हूँ, उसमें बालकनी भी है...बाहर का नज़ारा दिखता है. कोमा वार्ड ठीक मेरे ऊपर है.सड़क की एक तरफ मेरा अस्पताल है और दूसरी तरफ लॉर्ड्स स्टेडियम है ... वहां विवियन रिचर्ड्स का मुस्कुराता पोस्टर है.मेरे बचपन के ख्वाबों का मक्का,उसे देखने पर पहली नज़र में मुझे कोई एहसास ही नहीं हुआ...मानो वह दुनिया कभी मेरी थी ही नहीं.
 
मैं दर्द की गिरफ्त में हूँ.

और फिर एक दिन यह अहसास हुआ...जैसे मैं किसी ऐसी चीज का हिस्सा नहीं हूँ,जो निश्चित होने का दावा करे ...ना अस्पताल और ना स्टेडियम.मेरे अंदर जो शेष था ,वह वास्तव में कायनात की असीम शक्ति और बुद्धि का प्रभाव था...मेरे अस्पताल का वहां होना था.मन ने कहा...केवल अनिश्चितता ही निश्चित है.

इस अहसास ने मुझे समर्पण और भरोसे के लिए तैयार किया ...अब चाहे जो भी नतीजा हो,यह चाहे जहाँ ले जाये,आज से आठ महीनों के बाद,या आज से चार महीनों के बाद...या फिर दो साल...चिंता दरकिनार हुई और फिर विलीन होने लगी और फिर मेरे दिमाग से जीने- मरने का हिसाब निकल गया
 .
पहली बार मुझे शब्द आज़ादी का एहसास हुआ सही अर्थ में ! एक उपलब्धि का अहसास.

इस कायनात की करनी में मेरा विश्वास ही पूर्ण सत्य बन गया .उसके बाद लगा कि वह विश्वास मेरे हर सेल में पैठ गया.
वक़्त ही बताएगा कि वह ठहरता है कि नहीं...फ़िलहाल मैं यही महसूस कर रहा हूँ.

इस सफ़र में सारी दुनिया के लोग... सभी मेरे सेहतमंद होने की दुआ कर रहे हैं,प्रार्थना कर रहे हैं,मैं जिन्हें जानता हूँ और जिन्हें नहीं जानता,वे सभी अलग-अलग जगहों और टाइम जोन से मेरे लिए प्रार्थना कर रहे हैं.मुझे लगता है कि उनकी प्रार्थनाएं मिल कर एक हो गयी हैं,एक बड़ी शक्ति...तीव्र जीवन धारा बन कर मेरे स्पाइन से मुझ में प्रवेश कर सिर के ऊपर कपाल से अंकुरित हो रही हैं.

अंकुरित होकर यह कभी कली,कभी पत्ती,कभी टहनी और कभी शाखा बन जाती है...मैं खुश होकर इन्हें देखता हूँ.लोगों की सामूहिक प्रार्थना से उपजी हर टहनी,हर पत्ती,हर फूल मुझे एक नई दुनिया  दिखाती हैं

अहसास होता है कि ज़रूरी नहीं कि लहरों पर ढक्कन(कॉर्क) का नियंत्रण हो. जैसे आप क़ुदरत के पालने में झूल रहे  हों !



 











Wednesday, March 7, 2018

इरफान की बीमारी और मीडिया मित्र



इरफान की बीमारी और मीडिया मित्र
- अजय ब्रह्मात्‍मज

5 मार्च को इरफान ने ट्वीट किया कि उन्‍हें कोई गंभीर बीमारी हो गई है,जिसकी जांच चल रही है। उन्‍होंने उस ट्वीट में यह भी लिखा था कि हफ्ते दस दिन में वे खुद ही बता देंगे। लेकिन...

1.    एक परिचित का ह्वाट्स एप्‍प पर संदेश
- सर, इरफान को क्‍या हुआ है?
0 मुझे नहीं मालूम।
- नहीं,आप उनके करीब रहे हैं। वे आप को रेसपेक्‍ट देते हैं।
0 तो? उन्‍होंने मुझे कुछ नहीं बताया। पहले भी कभी बीमार पड़े तो मुझे नहीं बताया। वे मुझ से केवल अपनी खुशियां ही शेयर करते हैं।

2.    एक चैनल के संवाददाता
हेलो, इरफान के बारे में आप से बात करनी है?
0 उनकी बीमारी के बारे में मुझे कुछ भी नहीं मालूम...
- नहीं सर, उनकी एक्टिंग के बारे में बात करनी है।
0 आज अचानक उनकी एक्टिंग की सुधि कैसे आ गई? आज आप मनोज बाजपेयी की एक्टिंग के बारे में पूछें तो बताऊंगा। इरफान पर फिर कभी...
-    0000000 

3.    एक पॉपुलर वेब साइट के दोस्‍त
हेलो सर, क्‍या चल रहा है?
0 कुछ खास नहीं।
-रिटायरमेंट के बाद क्‍या कर रहे हैं? आप कुछ प्‍लान कर रहे थे?
0 फिलहाल कुछ भी नहीं। दुनिया के बदलते रवैए को समझ रहा हूं। रिटायरमेंट के साथ सभी का नजरिया बदल गया है। ऐसा मुझे लग रहा है।
- होता है। और क्‍या चल रहा है।
0 कुछ खास नहीं।
- अच्‍छा सर, इरफान को क्‍या हुआ है?
0 उन्‍होंने ट्वीट किया था न ? उन्‍हें कोई गंभीर बीमारी हुई है।
-    हां,लेकिन किस बीमारी की आशंका है।
0 अभी जांच चल रही है। दस दिन में वे खुद ही बता देंगे।
- हां,लेकिन आप को तो मालूम होगा। प्‍लीज बता दीजिए।
0 एक तो मुझे मालूम नहीं है। दूसरे,अगर मालूम भी हो तो आप को क्‍यों बता दूं? आप ने पहले कभी किसी और के बारे में तो नहीं पूछा।
- अच्‍छा सर फिर फोन करता हूं।

4.दिल्‍ली से एक फिल्‍मप्रेमी मित्र
- सर,एक बात पूछूं?
0 जी,बताएं क्‍या हालचाल है? दिल्‍ली का मौसम कैसा है?
सब ठीक है भाई। ये इरफान को क्‍या हुआ है?
0 उन्‍होंने ट्वीट में जो लिखा था,वही मालूम है।
- तुम तो सीनियर फिल्‍म जर्नलिस्‍ट हो और उनके दोस्‍त भी हो। बताओ ना। बहुत चिंता हो रही है। जानते हो मैं उनका कितना बड़ा फैन हूं?
0 यार मुझे नहीं मालूम। मैंने उनकी पत्‍नी सुतपा को फोन किया था। उन्‍होंने नहीं उठाया।
- अरे,उनको बताना चाहिए ना...
0 क्‍यों भला? इसलिए बता दें कि मैं तुम्‍हारी जिज्ञासा शांत करता रहूं। अभी सब्‍जी लाने जाना है। फिर  बात करता हूं।
- तुम भी ना?

5.    एक प्रकाशक का फोन
.- हेलो,कैसे हैं अजय जी?
0 ठीक हूं,आज कैसे कैसे?
- काफी समय से आप से बात नहीं हुई थी। पिछली मुलाकात में जिन किताबों के लिए बातें हुई थीं। उनके बारे में कुछ सोचा आप ने...
0 एक बार पैसों की बात हो जाए तो काम शुरू करता हूं। आप ने कुछ सोचा कि कितना एडवांस दे सकते हैं?
-    फिल्‍मों की किताबें कहां बिकती हैं? फिर भी हम विचार कर रहे हैं। आप ने इरफान की जीवनी या आत्‍मकथा के बारे में कहा था। क्‍या कुछ कर सकते हैं?
0 अभी,अचानक...क्‍यों?
उनकी जीवनी आनी चाहिए। आप के पास तो उनके ढेर सारे इंटरव्‍यू होंगे? इंटरव्यू का संकलन भी हो सकता है। आप बताएं?
0  लेकिन अभी क्यों?
- आप अच्छी तरह समझ रहे हैं... हमें समय रहते यह काम कर लेना चाहिए। 
0 माफ़ करें, मैं आप के समय के साथ नहीं चल सकता।  मैंने अनुराग कश्यप के इंटरव्यू संकलित कर लिए हैं।  कहें तो भेज दूं?
- अनुराग आप को बहुत प्रिय हैं न? अभी तो इरफ़ान पर किताब लाने  का इरादा है।
0 माफ़ करें,अभी नहीं हो पायेगा।  




Friday, November 10, 2017

फिल्‍म समीक्षा : करीब करीब सिंगल




फिल्‍म समीक्षा
करीब करीब सिंगल
-अजय ब्रह्मात्‍मज
अवधि- 125 मिनट
***1/2  साढ़े तीन स्‍टार
हिंदी में लिखते-बोलते समय क़रीब के क़ के नीचे का नुक्‍ता गायब हो जाता है। आगे हम इसे करीब ही लिखेंगे।
करीब करीब सिंगल कामना चंद्रा की लिखी कहानी पर उनकी बेटी तनुजा चंद्रा निर्देशित फिल्‍म है। नए पाठक जान लें कि कामना चंद्रा ने राज कपूर की प्रेमरोग लिखी थी। यश चोपड़ा की चांदनी और विधु विनोद चोपड़ा की 1942 ए लव स्‍टोरी के लेखन में उनका मुख्‍य योगदान रहा है। इस फिल्‍म की निर्माताओं में इरफान की पत्‍नी सुतपा सिकदर भी हैं। एनएसडी की ग्रेजुएट सुतपा ने फिल्‍में लिखी हैं। इरफान की लीक से हटी फिल्‍मों में उनका अप्रत्‍यक्ष कंट्रीब्‍यूशन रहता है। इस फिल्‍म की शूटिंग में इरफान के बेटे ने भी कैमरे के पीछे हिस्‍सा लिया था। तात्‍पर्य यह कि करीब करीब सिंगल कई कारणों से इसके अभिनेता और निर्देशक की खास फिल्‍म है। यह खासियत फिल्‍म के प्रति तनुजा चंद्रा और इरफान के समर्पण में भी दिखता है। फिल्‍म के प्रमोशन में इरफान की खास रुचि और हिस्‍सेदारी सबूत है।
इस फिल्‍म की पहली खूबी इरफान हैं। इरफान अपनी पीढ़ी के अलहदा अभिनेता हैं। रुटीन से जल्‍दी ही तंग आ जाने वाले इरफान लगातार ऐसी फिल्‍म और स्क्रिप्‍ट की तलाश में है,जो उनकी शख्सियत और मिजाज के करीब हो। दूसरे इसे उनकी सामा कह सकते हैं। मैं इसे उनकी खसियत मानता हूं कि वे हिंदी फिल्‍मों के पारंपरिक अभिनेता हैं। जब भी उन्‍हें हिंदी फिल्‍मों के प्रचलित किरदारों के खांचे में डालने की कोशिश की गई है,तब उनके साथ फिल्‍म का भी नुकसान हुआ है। विदेशी फिल्‍मों में मिली सफलता और हिंदी फिल्‍मों की कामयाब चपलता से उन्‍हें खास कद और स्‍पेस मिला है। वे अब इसका इस्‍तेमाल कर रहे हैं। -मदारी,हिंदी मीडियम और करीब करीब सिंगल उनके इसी प्रयास के नतीजे हैं।
इस फिल्‍म की दूसरी खूबी पार्वती हैं। मलयाली फिल्‍मों की सफल अभिनेत्री पार्वती को हिंदी फिल्‍मों के दर्शकों ने नहीं देखा है। अपने अंदाज,हाव-भाव और अभिनय से वह हिंदी फिल्‍मों में अनदेखे किरदार जया में जंचती हैं। हिंदी फिल्‍मों की परिचित और नॉपुलर अभिनेत्रियों में कोई भी जया के किरदार में नहीं जंचती। अगर थोड़ी कम पॉपुलर अभिनेत्री को इरफान के साथ में रखते तो फिल्‍म की माउंटिंग ही कमजोर हो जाती। हिंदी फिल्‍मों में कास्टिंग बहुत मायने रखती है। खास कर करीब करीब सिंगल जैसी फिल्‍मों की नवीनता के लिए ऐसी कास्टिंग जरूरी होती है। जया के रूप में पार्वती को देखते हुए ऐसा नहीं लगता कि हम रंदा मार कर सुडौल की गई अभिनेत्री को पर्दे पर देख रहे हैं। ऐसी अभिनेत्रियां किरदारों में नहीं दिख पातीं। पार्वती ने अपनी जिम्‍मेदारी सहजता से निभाई है। फिल्‍म के खास दृश्‍यों में उनका ठहराव तो हिंदी फिल्‍मों की पॉपुलर अभिनेत्रियों में कतई नहीं दिखता। फिल्‍म के एक खास दृश्‍य में पार्वती के चेहरे पर अनेक भाव एक-एक कर आते और जाते हैं और हर भाव के साथ उनकी अभिव्‍यक्ति बदलती जाती है। कैमरा उनके चेहरे पर टिका रहता है। कोई कट या इंटरकट नहीं है।
करीब करीब सिंगल मैच्‍योर लव स्‍टोरी है। मैच्‍युरिटी के साथ ही यह कमिंग ऑफ एज स्‍टोरी भी है। फिल्‍म की शुरूआत में हम जिन किरदारों(योगी और जया) से मिलते हैं,वे फिल्‍म के अंत तक नई शख्सियतों में तब्‍दील हो चुके होते हैं। बदलते तो हम हर उम्र में हैं। इस फिल्‍म में योगी पहले फ्रेम से ही खिलंदड़े व्‍यक्ति के रूप में पेश आते हैं। लाते,जातें और लातों का प्रसंग मजेदार है। कोई वाक्पटु अभिनेता ही इसे व्‍यक्‍त कर सकता था। बहरहाल,योगी चालू,स्‍मार्ट,बड़बोला अज्ञैर हावी हाने वाला व्‍यक्ति है। वह जया पर भी हावी होता है और उसे बरगलाने की कोशिश करता है। अने मिजाज से वह जया का खिझाता है,लेकिन अनजाने में उसे रिझाता भी जाता है। उसकी संगत में जया की ख्‍वाहिशें हरी होती हैं। वह अपनी इच्‍छाओं को पनपते देखती है और फिर ऐसे फैसले लेती है,जो अमूमन भारतीय औरतें नहीं ले पाती हैं। स्‍वतंत्र व्‍यक्त्त्वि के रूप में उसका परिवर्तन फिल्‍म का बेहद खूबसूरत पक्ष है।
करीब करीब सिंगल हिंदी की रेगुलर फिल्‍मों से अलग हैं। इसे दर्शकों की तवज्‍जो चाहिए है। यह फिल्‍म आपकी नई दोस्‍त की तरह है। ध्‍यान देने पर ही आप उसकी खूबसूरती देख-समझ पाएंगे। फिल्‍म इतनी सरल है कि साधारण लगती है,लेकिन अंतिम प्रभाव में यह फिल्‍म सुकून देती है। एक नई स्‍टोरी से अभिभूत करती है। इर फान और पार्वती के साथ तनुजा चंद्रा भी बधाई की पात्र हैं।
(माफ करें इस फिल्‍म का हिंदी पोस्‍टर नहीं मिल पाया,इसलिए...)

Thursday, May 18, 2017

मैंने सुनी दिल की आवाज़ : इरफान



मैंने सुनी दिल की आवाज़ : इरफान
‘हिंदी मीडियम’ ऊपरी तौर पर भाषाई विभेद की चीज लगे, पर यह अन्य पहलुओं की भी बातें करता है। इसमें नायक की भूमिका निभा रहे इरफान इसकी अहमियत से वाकिफ कराते हैं।
    -अजय ब्रह्मात्‍मज
-अभी मैं जिस इरफान से बात कर रहा हूं, वो एक्टर इरफान है, स्टार इरफान या वो इरफान जिसे हम सालों से जानते हैं।
0 अक्सर जब हम में बदलाव आते हैं तो लोगों को लगने लगता है कि बंदा बदल सा गया है। इससे मुझे दिक्कत होती है। तब्‍दीली अपरिहार्य है। हरेक का सफर यही होता है कि आप कल वैसा न रहें, जो कल थे। मैं अब क्या हूं, वह मुझे नहीं मालूम। अदाकारी मेरा शौक था। तभी मैंने इसमें कदम रखा। यह मुझे मेरे पागलपन से बचा कर रखता है। बाकी मीडिया ने मुझे किस उपाधि से नवाजा है, यह उनका प्यार है। यह उपाधि आज तो मुझ पर लागू हो रही है, चार साल बाद ऐसा नहीं होगा। मुझे इन उपाधियों व परिभाषाओं से दिक्कत है। असल में यह हमारी असुरक्षा की उपज है। इससे हम खुद को तसल्ली दे लेते हैं कि हम विषय विशेष या खुद के बारे में सब कुछ जान चुके हैं। मुझे असुरक्षाओं से कोई प्रॉब्लम नहीं है। इंसान की इससे बड़ी असुक्षा क्या होगी कि आखिरकार क्या होगा। इन चीजों के बजाय मुझे खुद और कायनात को गढ़ने वाले में रूचि है।
-आप में पहले जो बेताबी, अस्थिरता व बिखराव थे, वे इस लंबे सफर में कम हुए हैं।
0 जी हां। मैं खुद को सौभाग्यशाली मानता हूं, जो अंदर की आवाज सुन उसके दिखाए रस्ते पर चला और यहां तक पहुंच गया। मेरे ख्‍याल से अंत:करण की आवाज सुन जो काम किया जाता है, वे बड़े अच्छे नतीजे देते हैं। भीतर जो बिखराव है, उससे समझदारी से डील करने की जरूरत होती है। उसे  देखने की कला डेवलप करें। तब वह काबू में रहेगा। हां, अगर वह आप ही को ड्राइव करने लगे तो मामला गड़बड़ है।
-एक थ्‍योरी तो यह भी है कि भीतर केयॉस यानी कोलाहल है तो रचनात्‍मकता पुष्पित-पल्‍लवित होती रहती है।
0 हम जिसे कोलाहल मानते हैं, वह ढेर सारी शक्तियों का कॉलिजन है। हम जिस कायनात में रह रहे हैं, उसकी फिजिक्स यही है। बुनियादी नियम यही है कि विपरीत शक्तियां टकराती हैं तो विनाश होता है। उसके बाद ही अगला पड़ाव सृजन का है। हम मूरख व अज्ञानी उस टक्कर को अंत का नाम दे देते हैं। टकराहट, कोलाहल अवश्‍यंभावी है।
-‘हिंदी मीडियम’ का संयोग क्यों और कैसे बना।
मैं दरअसल एक तरह का रिमार्क यानी तबसरा ढूंढ रहा था। ऐसी फिल्‍म, जिससे हर कोई कनेक्ट करे। वे एंटरटेन हों। फिल्म देखते हुए खिलखिलाएं और जब हॉल से बाहर निकलें तो साथ कुछ लेकर जाएं। बहरहाल, इसका सब्जेक्‍ट अंग्रेजी कल्चर की बातें करता है, कि कैसे यह हमारी जरूरत बन जाता है। साथ ही भाषाई विभेद का असर भी। हिंदीभाषी प्रतिभावान होकर भी पिछड़ते हैं। फिल्‍म में भी मैं एक ऐसे शख्‍स की भूमिका में हूं, जिसकी अंग्रेजीदां पत्नी अंग्रेजी के सिंड्रोम से ग्रस्त है। वह बंदा अपनी बीवी के लिए हर कुछ कर चुका है। चांदनी चौक पर बड़ा सा एंपोरियम भी खोल चुका है। बेपनाह मुहब्बत करता है, पर बेगम के भीतर खालीपन है। दरअसल उसकी वाइफ उससे अंग्रेजी बेहतर करने पर जोर देती है, इससे वो बंदा सहमत नहीं है। उसे नहीं लगता कि अंग्रेजी उसकी जरूरत है। मैं उस किरदार के इस ढीठपने से प्रभावित हुआ।
- आज पूरा मिडिल क्लास कौन्वेंट स्कूल में अपने बच्चे को भेज रहा है। अंग्रेजी के इस आतंक पर आप क्या कहना चाहेंगे।
0 असल में अंग्रेजी को हमारी जरूरत बना दी गई है। यह अकस्मात नहीं हुआ है। अब कोलोनाइजेशन दूसरी तरह से होता है कंट्री का। इसकी शुरूआत लैंग्‍वेज से होती है। आप अपने यहां दूसरे देश की भाषा को अपना कर उसे पॉपुलर करते हैं। उसके बाद का पड़ाव कल्चर की ओर ले जाता है। वहां का कल्चर यहां लोकप्रिय हुआ तो विदेशी माल यहां पॉपुलर हो जाते हैं। मनोवैज्ञानिक तौर पर आप दूसरी भाषा को अपनी जिंदगी बेहतर करने की गरज से अपनाते हैं। आप अपने आप उसकी गिरफ्त में आ जाते हो। अंग्रेजी भी इस वजह से फैली है। इसके परिणाम हम देख रहे हैं। अपनी सोसायटी में पहनावे से लेकर व्‍यापारिक व प्रशासनिक मॉड्यूल तक हम उन्हीं का अख्तियार कर चुके हैं। जब तक हम किसी अच्छी सोच का मॉडल नहीं बनेंगे, तब तलक मुकाबला नहीं कर सकते। हम अनुसरण करने वाले ही बनकर रह जाते हैं।
-संपर्क भाषा तो अलग चीज है। इन दिनों कौशल की बजाय भाषा को तरजीह दी जाने लगी है। आप भी हिंदीभाषी हैं। क्या आप को भी अंग्रेजी न आने के चलते फजीहत झेलनी पड़ी कभी।
0 जी ऐसा कई बार हुआ है। मुझे नसीहत दी गई। एहसास कराया गया कि आप को वह भाषा भी आती है, तो आप की देहभाषा में क्यों नहीं झलकती। असल वजह यह थी कि मुझे जो चीज पसंद नहीं आती तो मैं उससे जुड़े कनविक्‍शन को ओढ नहीं सकता। हां, यह जरूर है कि अगर आप अंग्रेजी व चाइनीज फिल्में करना चाहते हैं तो आप को वह भाषा आनी चाहिए। मसला यह है कि अपने यहां व अंतरराष्‍ट्रीय स्तर पर भी अंग्रेजी को मानक बना दिया गया है। बाकी उसे सपोर्ट करने के लिए अंग्रेजी तो है ही।
-अपनी हीरोइन सबा कमर के बारे में बताएं?
0 सबा कमर के चुनाव की खास वजह रही। यहां की कई हीरोइनें मां बनने को तैयार नहीं थीं। हमें ऐसी अभिनेत्री चाहिए थी,जो ग्‍लैमरस दिखे और इस किरदार को ढंग से कैरी कर ले। सबा कमर में ये खूबियां मिलीं। मैं उनके अलावा दीपक डोबरियाल का नाम लेना चाहूंगा। वे कमाल के एक्‍टर हैं। उनके साथ मेरी खूब संगत बैठी।