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Friday, June 12, 2015

फिल्‍म समीक्षा : हमारी अधूरी कहानी

स्टार: 3

मोहित सूरी और महेश भट्ट एक साथ आ रहे हों तो एक बेहतरीन फिल्म की उम्मीद की ज सकती है। ‘हमारी अधूरी कहानी’ बेहतरीन की परिधि में आते-आते रह गई है। यह फिल्मी संवादों, प्रेम के सिचुएशन और तीनों मुख्य कलाकारों के जबरदस्त अभिनय के लिए देखी जा सकती है। फिल्म में आज के ट्रेंड के मुताबिक औरतों की आजादी की भी बातें हैं। पुरूष दर्शकों को वसुधा का गुस्सा कुछ ज्यादा लग सकता है, लेकिन सच तो यही है कि पति नामक जीव ने परंपरा और मर्यादा के नाम पर पत्नियों को सदियों से बांधा और सेविका बना कर रख लिया है। फिल्म के संवाद के लिए महेश भट्ट और शगुफ्ता रफीक को बधाई देनी होगी। अपने पति पर भड़क रही वसुधा अचानक पति के लिए बहुवचन का प्रयोग करती है और ‘तुमलोगों’ संबोधन के साथ सारे पुरुषों को समेट लेती है। 

 वसुधा भारतीय समाज की वह अधूरी औरत है, जो शादी के भीतर और बाहर पिस रही है। वह जड़ हो गई है, क्योंकि उसकी भावनाओं की बेल को उचित सपोर्ट नहीं मिल पा रहा है। वह कामकाजी और कुशल औरत है। वह बिसूरती नहीं रहती। पति की अनुपस्थिति में वह अपने बेटे की परवरिश करने के साथ खुद भी जी रही है। आरव के संपर्क में आने के बाद उसकी समझ में आता है कि वह रसहीन हो चुकी है। उसे अपना अधूरापन नजर आता है। आरव खुशी देकर उसका दुख कम करना चाहता है। हालांकि फिल्म में हवस और वासना जैसे शब्दों का इस्तेकमाल हुआ है, लेकिन गौर करें तो आरव और वसुधा की अधूरी जिंदगी की ख्वाहिशों में यह प्रेम का पूरक है। ‘हमारी अधूरी कहानी’ स्त्री-पुरुष संबंधों की कई परतें पेश करती है। हरि-वसुधा, आरव-वसुधा, आरव की मां और उनका प्रेमी, हरि के माता-पिता .... लेखक-निर्देशक सभी चरित्रों के विस्तार में नहीं गए हैं। फिर भी उनके जीवन की झलक से प्रेम के अधूरेपन की खूबसूरती और बदसूरती दोनों नजर आती है।

 ‘हमारी अधूरी कहानी’ का शिल्प कमजोर है। आरव और वसुधा के जीवन प्रसंगों में भावनाएं तो हैं, किंतु घटनाओं की कमी है। वसुधा जिंदगी से ली गई किरदार है। आरव को पन्नों पर गढ़ गया है। अपनी भावनाओं के बावजूद वह यांत्रिक लगता है। यही कारण है कि उसकी सौम्यदता, दुविधा और कुर्बानी हमें विचलित नहीं करती। इस लिहाज से हरि जीवंत और विश्वसनीय किरदार है। रुढियों में जीने की वजह से औरतों के स्वामित्व की उसकी धारणा असंगत लगती है, लेकिन यह विसंगति अपने समाज की बड़ी सच्चाई है। पुरुष खुद को स्वामी समझता है। वह औरतों की जिंदगी में मुश्किलें पैदा करता है। ‘हमारी अधूरी कहानी’ अपनी कमियों के बावजूद स्त्री-पुरुष संबंधों की बारीकियों में उतरती है। लेखकों की दृष्टि पुरानी है और शब्दों पर अधिक जोर देने से भाव का मर्म कम हुआ है। फिर भी यह फिल्म पॉपुलर ढांचे में कुछ सवाल रखती है।

इमरान हाशमी ने आरव के किरदार को उसके गुणों के साथ पर्दे पर उतारा है। कशमकश के दृश्योंण में वे प्रभावित करते हैं। उन्हें किरदार(लुक और कॉस्ट्यूम) में ढालने में फिल्म की तकनीकी टीम का भी योगदान है। विद्या बालन इस अधूरी कहानी में भी पूरी अभिनेत्री हैं। वह वसुधा के हर भाव को सलीके से पेश करती हैं। पति और प्रेमी के बीच फंसी औरत के अंतर्विरोधों को चेहरे से जाहिर करना आसान नहीं रहा होगा। विद्या के लिए वसुधा मुश्किल किरदार नहीं है, लेकिन पूरी फिल्म में किरदार के अधूरेपन को बरकरार रखना उललेखनीय है। राजकुमार राव के बार में यही कहा जा सकता है कि हर बार की तरह उन्होंने सरप्राइज किया है। हमें मनोज बाजपेयी और इरफान खान के बाद एक ऐसा एक्टैर मिला है, जो हर कैरेक्टर के मानस में ढल जाता है। हरि की भूमिका में उन्होंने फिर से जाहिर किया है कि वे उम्दा अभिनेता हैं। राजकुमार राव और विद्या बालन के साथ के दृश्य मोहक हैं। नरेन्द्र झा छोटे किरदार में जरूरी भूमिका निभाते हैं।

गीत-संगीत बेहतर है फिल्म के गीतों में अधूरी कहानी इतनी बार रिपीट करने की जरूरत नहीं थी। राहत फतह अली का गाया गीत फिल्म के कथ्य को कम शब्दों में बखूबी जाहिर करता है।
 वही हैं सूरतें अपनी वही मैं हूँ, वही तुम हो
मगर खोया हुआ हूँ मैं मगर तुम भी कहीं गुम हो
मोहब्बत में दग़ा की थी काफ़िर थे सो काफ़िर हैं
मिली हैं मंज़िलें फिर भी मुसाफिर थे मुसाफिर हैं
तेरे दिल के निकाले हम कहाँ भटके कहाँ पहुंचे
 मगर भटके तो याद आया भटकना भी ज़रूरी था
अवधि- 131 मिनट

Friday, April 17, 2015

फिल्म समीक्षा : मिस्टर एक्स

स्टार: डेढ़ स्टार
विक्रम भट्ट निर्देशित इमरान हाशमी की 'मिस्टर एक्स' 3डी फिल्म है। साथ ही एक नयापन है कि फिल्म का नायक अदृश्य हो जाता है। यह नायक अदृश्य होने पर भी अपनी प्रेमिका को चूमने से बाज नहीं आता, क्योंकि पर्दे पर इमरान हाशमी हैं। इमरान हाशमी की कोई फिल्म बगैर चुंबनों के समाप्त नहीं होती। विक्रम भट्ट 3डी तकनीक में दक्ष हैं। वे अपनी फिल्में 3डी कैमरे से शूट भी करते हैं, लेकिन इस तकनीकी कुशलता के बावजूद उनकी 'मिस्टर एक्स' में कथ्य और निर्वाह की कोई नवीनता नहीं दिखती। फिल्म पुराने ढर्रे पर चलती है।

रघु और सिया एटीडी में काम करते हैं। दोनों अपने विभाग के कर्मठ अधिकारी हैं। एक-दूसरे से प्रेम कर रहे रघु और सिया शादी करने की छट्टी ले चुके हैं। उन्हें बुलाकर एक खास असाइनमेंट दिया जाता है। कर्तव्यनिष्ठ रघु और सिया पीछे नहीं हटते। वे इस असाइनमेंट में एक कुचक्र के शिकार होते हैं। स्थितियां ऐसी बनती हैं कि दोनों एक-दूसरे के खिलाफ हो जाते हैं। अदृश्य हो सकने वाला नायक अब बदले पर उतारू होता है।

वह स्पष्ट है कि कानून उसकी कोई मदद नहीं कर सकता, इसलिए कानून तोडऩे में उसे कोई दिक्कत नहीं होती। बदले की इस भिड़ंत के बीच कुछ नहाने के दृश्य हैं, जहां अदृश्य नायक अपनी नायिका को चूमता है। इस मद में अच्छी रकम खर्च हुई होगी। महंगे चुंबन हैं 'मिस्टर एक्स' में। भट्ट कैंप की फिल्म है तो जब-तब गाने भी सुनाई पड़ते हैं। दर्शक अनुमान लगा सकते हैं कि कब गना शुरू हो जाएगा।

दर्शक इस फिल्म की पूरी कहानी का अनुमान लगा सकते हैं। सब कुछ प्रेडिक्टेबल और सरल है। महेश भट्ट और विशेष फिल्म्स की फिल्मों का एक पैटर्न बन चुका है। कभी कढ़ाई सुघड़ हो जाती है तो दर्शक फिल्म पसंद कर लेते हैं। 'मिस्टर एक्स' से ऐसी उम्मीद नहीं की जा सकती। इमरान हाशमी का जादू बेअसर हो चुका है।
फिल्म में उनका किरदार ढंग से लिखा भी नहीं गया है। सिया की भूमिका में अमायरा दस्तूर कमजोर हैं,जबकि उन्हें कुछ अच्छे दृश्य मिले हैं। अरूणोदय सिंह अपनी मौजूदगी से प्रभावित नहीं काते। उन्हें अभी तक अभ्यास की जरूरत है। तिवारी की छोटी भूमिका में आया कलाकार अपनी बेवकूफियों में अच्छा लगता है।

भट्ट कैंप की फिल्मों का संगीत कर्णप्रिय होने की वजह से लोकप्रिय होता है। इस बार वह मधुरता नहीं है। पॉपुला सिंगर अंकित तिवारी भी निराश करते हैं। वे एक ही तरीके से गाने लगे हैं या उनसे वैसी ही मांग की जाती है? दोनों ही स्थितियों में उन्हें सोचना चाहिए।

और हां, इस फिल्म में हर किरदार भारद्वाज को भरद्वाज क्यों बुलाता है? उ'चारण की और भी गलतियां हैं। फिल्म में भट्ट साहब ने शीर्षक गीत में आवाज दी है। बेहतर होगा कि वे ऐसे चमत्कारिक दबावों से बचें। कृष्ण, गीता और रघु व सिया के प्रतीकात्मक नाम...सब फिजूल रहा।
अवधि- 132 मिनट

Friday, August 29, 2014

फिल्‍म समीक्षा : राजा नटवरलाल

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
 ठगों के बादशाह नटवरलाल उर्फ मिथिलेश कुमार श्रीवास्तव के नाम-काम को समर्पित 'राजा नटवरलाल' कुणाल देशमुख और इमरान हाशमी की जोड़ी की ताजा फिल्म है। दोनों ने इसके पहले 'जन्नत' और 'जन्नत 2' में दर्शकों को लूभाया था। इस बीच इमरान हाशमी अपनी प्रचलित इमेज से निकल कर कुछ नया करने की कोशिश में अधिक सफल नहीं रहे। कहा जा रहा है कि अपने प्रशंसकों के लिए इमरान हाशमी पुराने अंदाज में आ रहे हैं। इस बीच बहुत कुछ बदल चुका है। ठग ज्यादा होशियार हो गए हैं और ठगी के दांव बड़े हो गए हैं। राजा बड़ा हाथ मारने के चक्कर में योगी को अपना गुरु बनाता है। एक और मकसद है। उसे अपने बड़े भाई के समान दोस्त राघव के हत्यारे को सबक भी सिखाना है। उसे बर्बाद कर देना है।
कहानी मुंबई से शुरू होती है और फिर धर्मशाला होते हुए दक्षिण अफ्रीका के शहर केप टाउन पहुंचती है। इमरान हाशमी भी योगी की मदद से राजा से बढ़ कर राजा नटवरलाल बनता है। वह अपना नाम भी मिथिलेश बताता है। फिल्म में ठगी के दृश्य या तो बचकाने हैं या फिर अविश्वसनीय। फिल्म की पटकथा सधी और कसी हुई नहीं है। साफ दिखता है कि डांस और गाने के लिए हीरोइन को बार डांसर बना दिया गया है। पाकिस्तान से आई हुमैमा मलिक को इस फिल्म में करने से अधिक दिखाने का काम मिला है। फुर्सत मिलते ही वह चुंबन और आलिंगन में मशगूल हो जाती हैं। वह समर्थ अभिनेत्री हैं, लेकिन स्क्रिप्ट की मांग ही न हो तो प्रतिभा का क्या करें? इस तरह की फिल्म की जरूरत के मुताबिक वह ढलने की कोशिश करती हैं, लेकिन झिझक उभर कर आ जाती है। हां, इमरान हाशमी अपने पुराने अंदाज में हैं। ऐसे किरदारों को उन्होंने साध लिया है। उन्होंने गाने, तेवर और प्रेजेंस में रौनक बिखेरी है।
'राजा नटवरलाल' में सभी किरदारों को कुछ चुटीले संवाद मिले है। संजय मासूम ने इन संवादों में देसी अनुभवों को शब्दों से सजा दिया है। ये संवाद फिल्म के कथ्य और दृश्यों के अनुरूप हैं और भाव को मारक बना देते हैं। हिंदी फिल्मों में बोलचाल की भाषा के बढ़ते असर में डायलॉग और डायलॉगबाजी की मनोरंजक परंपरा को यह फिल्म वापस ले आती है। कलाकारों में परेश रावल ऐसे किरदारों के लिए पुराने और अनुभवी अभिनेता हैं। लंबे समय के बाद दीपक तिजोरी छोटी सी भूमिका में भी अपनी मौजूदगी दर्ज करते हैं। के के मेनन निराश करते हैं। दरअसल, उनके चरित्र को ढंग से गढ़ा ही नहीं गया है। उनकी एक्टिंग मूंछ और विग संभालने में ही निकल गई है।
अगर आप फिल्म देखें तो अवश्य बताएं कि केके मेनन के किरदार का क्या नाम हैं? मुझे कभी वरदा, कभी वरधा, कभी वर्धा तो कभी वर्दा सुनाई पड़ा। हिंदी फिल्मों में उच्चारण की दुर्गति बढ़ती जा रही है?
अवधि: 141 मिनट
**1/2 ढाई स्‍टार-

Friday, April 19, 2013

फिल्‍म समीक्षा : एक थी डायन

यह किस्सा है। यह खौफ है। यह विभ्रम है। यह हॉरर फिल्म है। यह सब का मिश्रण है। क्या है 'एक थी डायन' एकता कपूर और विशाल भारद्वाज की प्रस्तुति एक थी डायन के निर्देशक कन्नन अय्यर हैं। इसे लिखा है मुकुल शर्मा और विशाल भारद्वाज ने। उन्होंने भारतीय समाज में प्रचलित डायन कथा को नया आयाम दिया है। मुख्यधारा के चर्चित कलाकारों को प्रमुख भूमिकाएं सौंप कर उन्होंने दर्शकों को भरोसा तो दे ही दिया है कि यह हिंदी में बनी आम हॉरर फिल्म नहीं है। हां,इसमें इमरान हाशमी हैं। उनके साथ कोंकणा सेन शर्मा,कल्कि कोइचलिन और हुमा कुरेशी भी हैं।
संयोग ऐसा हुआ कि इस फिल्म का क्लाइमेक्स मैंने पहले देख लिया और फिर पूरी फिल्म देखी। इसके बावजूद फिल्म में रुचि बनी रही और मैं उस क्षण की प्रतीक्षा करता रहा जहां फिल्म चौंकाती है। अप्रत्याशित घटनाएं हमेशा रोचक और रोमांचक होती हैं। फिल्म जादू“र बोबो इमरान हाशमी के मैजिक शो से आरंभ होती है। बोबो को मतिभ्रम होता है कि उसे कोई अनदेखी शक्ति तंग कर रही है। तार्किक जादूगर अपने मनोवैज्ञानिक मित्र की मदद लेता है। प्निोसिस के जरिए अपने अतीत में पहुंचने पर उसे पता चलता है कि बचपन की स्मृतियां नए सिरे से उसे उलझा रही हैं। मनोचिकित्सक उसकी बाल स्मृतियों को मानसिक ग्रंथि बतलाता है। हमें पता चलता है कि बचपन में डायन कथाएं पढ़ते-पढ़ते बोबो डायन में यकीन करने लगी है। अपने पिता की जिंदगी में आई औरत को वह डायन ही समझता है,जबकि मनोवैज्ञानिक की राय में सौतेली मां को स्वीकार नहीं कर पाने की वजह से उसने ऐसी कहानी अनजाने में रची हो“ी। 'एक थी डायन' की यहां तक की कहानी रोचक और विश्वसनीय लगती है। एहसास होता है कि कन्नन अय्यर हमें हॉरर फिल्मों की नई दुनिया में ले जा रहे हैं। इंटरवल के कुछ बाद तक फिल्म बांधे रखती है।
समस्या इस फिल्म के क्लाइमेक्स में है। जिस सहजता से फिल्म मुंबई के आधुनिक परिवेश में डायन की कथा बुनती है,उसी सहजता के साथ वह अंत तक नहीं पहुंचती। फिल्म अचानक टर्न लेती है और अपने तर्को को ही दरकिनार कर हिंदी फिल्मों के प्रचलित फार्मूले का अनुसरण करती है। इसके बाद फिल्म साधारण हो जाती है। क्या हो सकता था या क्या होना चाहिए था जैसी बातें समीक्षा के दायरे में नहीं आतीं। फिर भी शिकायत रह जाती है,क्यों कि फिल्म अपनी ही कथा का उल्लंघन करती है। इंटरवल से पहले दिए भरोसे को तोड़ देती है।
कलाकारों में हुमा कुरेशी सबसे ज्यादा प्रभावित करती हैं। उन्होंने दृश्यों के अनुसार भावों को जिम्मेदारी से निभाया है। कोंकणा सेन शर्मा तो हैं ही कुशल अभिनेत्री। उन्होंने साबित किया है कि किसी भी तरह की भूमिका में कौशल का इस्तेमाल किया जा सकता है। कल्कि कोइचलिन की भूमिका ढोटी और अस्पष्ट है। उन्हें कुछ पल मिले हैं। इमरान हाशमी अवश्य अलग अंदाज में दिखे। अपनी अन्य फिल्मों से अलग उनमें ठहराव दिखा। उनके प्रशंसकों का बता दें कि उनके किसिंग सीन हैं। फिल्म को विशेष तिवारी,सारा अर्जुन और भावेश बालचंदानी बाल कलाकारों से भरपूर मदद मिली है।
विशाल भारद्वाज और गुलजार की जोड़ी का गीत-संगीत है। उनकी संगत का जादू फिल्म में गूंजता है।
अवधि-135 मिनट
*** तीन स्टार

Friday, September 7, 2012

फिल्‍म समीक्षा : राज 3

Review : Raaz 3 

डर के आगे मोहब्बत है 

-अजय ब्रह्मात्मज  

 अच्छी बात है कि इस बार विक्रम भट्ट ने 3डी के जादुई प्रभाव को दिखाने के बजाए एक भावनापूर्ण कहानी चुनी है। इस कहानी में छल-कपट, ईष्र्या, घृणा, बदला और मोहब्बत के साथ काला जादू है। काला जादू के बहाने विक्रम भट्ट ने डर क्रिएट किया है, लेकिन दो प्रेमी (खासकर हीरो) डर से आगे निकल कर मोहब्बत हासिल करता है।

कल तक टॉप पर रही फिल्म स्टार सनाया शेखर अपने स्थान से फिसल चुकी हैं। संजना कृष्ण पिछले दो साल से बेस्ट एक्ट्रेस का अवार्ड ले रही हैं। सनाया किसी भी तरह अपनी खोई हुई पोजीशन हासिल करना चाहती है। पहले तो भगवान और मंत्र के जरिए वह यह कोशिश करती है। सफल नहीं होने पर वह काला जादू और तंत्र के चक्कर में आ जाती है। काला जादू राज-3 में एक तरकीब है डर पैदा करने का, खौफ बढ़ाने का। काला जादू के असर और डर से पैदा खौफनाक और अविश्वसनीय दृश्यों को छोड़ दें, तो यह प्रेमत्रिकोण की भावनात्मक कहानी है। फिसलती और उभरती दो अभिनेत्रियों के बीच फंसा हुआ है निर्देशक आदित्य अरोड़ा। वह सनाया के एहसानों तले दबा है। वह पहले तो उसकी मदद करता है, लेकिन काला जादू के असर से संजना की बढ़ती तकलीफ और अकेलेपन से उसे अपने अपराध का एहसास होता है। वह संजना से प्रेम करने लगता है, उसे बचाने के लिए वह आत्माओं की दुनिया में भी प्रवेश करता है। वह अपनी संजना को बचा कर ले आता है।
विक्रम भट्ट ने सनाया को खलनायिका के तौर पर पेश किया है। वह फिसल रही प्रतिष्ठा हासिल करने के लिए युक्ति अपनाती है। नाम और शोहरत के आगे वह रिश्तों और मोहब्बत का भी ख्याल नहीं करती। हमें बीच में पता चलता है कि संजना और कोई उसकी सौतेली बहन है। सनाया सिर्फ उसकी तरक्की से ही नहीं जल रही है। उसके दिल और दिमाग में बचपन में पिता के बंटे प्यार की खलिश भी है। शुरू में हमें सनाया से सहानुभूति होती है, लेकिन उसकी करतूतों से पता चलता है कि वह दुष्ट औरत है। फिर संजना की बेचारगी हमें उसका हमदर्द बना देती है। इस हमदर्दी में हीरो भी उसके साथ आता है, इसलिए राज-3 की कहानी भावनात्मक रूप से छूती है।
बिपाशा बसु ने सनाया के ग्रे शेड को अच्छी तरह उभारा है। अभिनय की उनकी सीमाओं के बावजूद विक्रम भट्ट ने उनसे बेहतरीन काम लिया है। नयी अभिनेत्री ईशा गुप्ता उम्मीद जगाती हैं। उन्होंने अपने किरदार के डर को अच्छी तरह चित्रित किया है। इन दोनों के बीच पाला बदलते इमरान हाशमी जंचे हैं। इमरान हाशमी के अभिनय में निखार आया है।
विक्रम भट्ट ने दोनों हीरोइन के साथ लंबे चुंबन दृश्यों को रखकर इमरान हाशमी के दर्शकों को खुश रखने की कोशिश की है। बिपाशा बसु के साथ के अंतरंग दृश्यों के पीछे भी यही उद्देश्य रहा होगा।
तीन स्टार
अवधि-136 मिनट

 

Sunday, July 1, 2012

खुद ही तोड़ दी अपनी इमेज-इमरान हशमी

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
इमरान हाशमी पर महेश भट्ट की टिप्पणी

    (आजादी के बाद पूरे देश में औपनिवेशिक मानसिकता के कुछ ब्राउन समाज के हर क्षेत्र में एक्टिव हैं। वे हर क्षेत्र में मानक तय करते हैं। उनमें से कुछ हिंदी फिल्मों में भी हैं। वे बताते हैं कि किस तरह का हीरो होना चाहिए या अच्छा होता है? ऐसे ब्राउन साहब को इमरान हाशमी अच्छा नहीं गलता था। वे हमेशा उसकी निंदा करते थे। वह अपनी तरह की फिल्मों से खुश था। दर्शकों के एक तबके में पहले से लोकप्रिय था।
    पहली ही फिल्म में डायरेक्टर के साथ काम करते देखते समय मुझे उनमें कुछ खास बात लगी। मैंने उसे सलाह दी कि तुम्हें कैमरे के सामने होना चाहिए। वह बहुत नर्वस था। बाद में उसने ‘मर्डर’, ‘गैंगस्टर’ और ‘जन्नत’ जैसी फिल्में कीं। गिरते-पड़ते उसने सीखा और अपनी एक जगह बनायी। अपनी जगह बनाने के बाद उसने हिम्मत दिखायी और ऑफबीट फिल्मों के लिए राह बदली। तब मैंने उसे रोका था। हिंदी फिल्मों में अधिकांश हीरो अपना चेहरा नहीं बदलना चाहते। अपनी शक्ल बिगाडऩा आसान फैसला नहीं होता। इमरान हाशमी ने पहले ‘वंस अपऑन अ टाइम इन मुंबई’ और फिर ‘शांघाई’ में यह किया। उसने उनकी बोली बोलने की कोशिश की। दोनों ही फिल्मों में दर्शकों और समीक्षकों ने उसे पसंद किया।
    हिंदी फिल्मों में हर हीरो अपनी मुट्ठी बंद रखना चाहता है। उसे लगता है कि मुट्ठी खोलते ही औकात पता चल जाएगी। इमरान हाशमी ने मुट्ठी खोल दी है। ‘शांघाई’ के बाद उसकी ‘राज 3’ आएगी। इमरान हाशमी समझदार लडक़ा है। सोच गहरी है। ऑफबीट फिल्मकारों के साथ वह खुद को रिस्की सिचुएशन में डालता है। उसकी यह कोशिश वास्तव में अपने अधूरेपन को खत्म करने की है।
    एक तरह से देखें तो उसने मेरी तरह ही एक ध्रुव से दूसरे धु्रव तक की यात्रा की है। हमारी यात्रा से विपरीत दिशाओं में दिख सकती है। मैंने ‘सारांश’ से आरंभ किया और ‘मर्डर’ तक आया। उसने ‘मर्डर’ से शुरू किया और ‘शांघाई’ तक आया। मैं तो उसे इस यात्रा के लिए बधाई दूंगा। )

इमरान हाशमी से हुई बातचीत
- किस मानसिक अवस्था में हैं अभी आप। बिल्कुल अलग भूमिका के बावजूद दर्शकों और समीक्षकों ने आप को ‘शांघाई’ में पसंद किया?
0 बहुत खुश हूं कि सभी ने ‘शांघाई’ को इस तरह स्वीकार किया है। मेरे लिए यह करिअर का टर्निंग पाइंट है। एक्टिंग करिअर में जो तारीफ मुझे आज तक नहीं मिली, वह ‘शांघाई’ ने दे दी। बिल्कुल अलग किरदार था। फिल्में जो में कर चुका हूं और इस फिल्म में जो स्पेस मिला है, वह बहुत रिस्की था। समीक्षक हमेशा कहा करते थे कि मुझे एक्टिंग नहीं आती है। सभी को सरप्राइज पैकेज लगा। ट्रू टू कैरेक्टर लगा। पिछली फिल्मों में जिस इमरान हाशमी को सभी देखते रहे थे, वह इसमें नहीं है। एक्टिंग और कुछ नहीं कैरेक्टर को जीना है। इतने सालों में मुझे ऐसा डायरेक्टर नहीं मिला जो समझदार हो और मेरे साथ प्रयोग कर सके। जोगी परमार कैरीकेचर नहीं है।  दिबाकर ने चैचुरल परफारमेंस निकाला।
- स्क्रिप्ट सुनते समय इल्म हुआ था कि यह किरदार इतना पसंद किया जाएगा?
0 मुझे किरदार पसंद था। यह सोच कर फिल्म नहीं साइन की थी कि इस से मेरा करिअर बदल जाएगा। मुझे दिबाकर बनर्जी के साथ काम करना था। लॉजिकल  इंटेलिजेंट और दर्शकों को सरप्राइज करने वाली फिल्म करनी थी। मेरी कोशिश रहेगी कि जब भी ऐसी फिल्म करूं तो दर्शक सरप्राइज हों। मेरी जो छवि बनी हुई है, उसे ‘वंस अपऑन अ टाइम इन मुंबई’ और ‘शांघाई’ जैसी फिल्में तोड़ती हैं। ‘शांघाईर्’ करते समय कुछ लोगों ने मुझ से पूछा भी कि अभय देओल, दिबाकर बनर्जी और तुम यह कौन सा काम्बिनेशन है।?मुझे लोगों का यह सवाल अच्छा लगा।
- दिबाकर ने इस रोल के बारे में क्या समझाया था?
0 उन्होंने बताया था कि मैं अभी तक जो करता रहा हूं उससे यह कम्पिलीट डिपार्चर है। आप अभी तक जिस रूप में जाने जाते हैं,मैं उसे पूरी तरह तोड़ दूंगा। अभी तक आपने ज्यादातर शहरी किरदार निभाए हैं। यह कस्बाई किरदार है। अपनी फिल्मों में आप बहुत दृढ़ और पक्के इरादे के लगते हैं। जोगी परमार असुरक्षित डरा हुआ किरदार है। शूटिंग के बाद उन्होंने कहा कि आप के एटीट्यूड ने मुझे चौंका दिया। मैं तो सोच रहा था कि आप के रिजर्वेशन होंगे। उनके अनुसार मुझे रोल में फेरबदल करनी पड़ेगी। शुरू में तो केवल वजन बढ़ाने और दांत पीला करने की बात कही थी। शूटिंग के समय किरदार के मिजाज के बारे में उन्होंने बताया और समझाया। उन्हें तो यह भी लगा था कि मैं थिएटर वर्कशॉप नहीं करूंगा। जबकि मैं थिएटर वर्कशॉप के कंसेप्ट से बहुत उत्साहित था। हमारा वर्कशॉप अतुल मोंगे ने लिया था। इस फिल्म में जो भीड़ दिखाई पड़ी उसकी भी कास्टिंग हुई थी। मैंने दस दिन वर्कशॉप अटेंड किया था। पहले तीन तो मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या हो रहा है। चौथे दिन से तो मैं एकदम सक्रिय हो गया।
- जोगी परमार का किरदार निभाने में किस तरह की चुनौती थी?
0 ज्यादातर एक्टर आत्ममुग्ध होते हैं। मैं उनसे अलग नहीं हूं। हम अपने बालों, लुक, कपड़े और मेकअप पर बहुत ध्यान देते हैं। जोगी परमार को देखकर घिन आती है। वह आकर्षक भी नहीं है। भद्दा और तोंदियल है। उसके दांत गंदे हैं। कोई सोच भी नहीं सकता कि ऐसा किरदार फिल्म का हीरो हो सकता है। जाहिर सी बात है जब वह हीरो नहीं हो सकता तो कोई भी स्टार उसे क्यों निभाएगा? यह तो दिबाकर की सोच और मेरी कोशिश का नतीजा है। वह फिल्म के आखिरी दृश्य में  हीरो बन जाता है। वह अपनी अतीत की कमजोरियों से निकल आता है।
- इन दिनों हर प्रोडक्शन हाउस में आपकी मांग की जा रही है। आपकी पूछ हो रही है।
0 (हंसते हुए) अभी तो बालाजी की एक फिल्म कर रहा हूं। विशाल भारद्वाज की ‘डायन’ भी करनी है। राजकुमार गुप्ता की ‘घनचक्कर’ भी कुछ दिनों के बाद शुरू होगी। इन सभी फिल्मों के बाद करन जौहर के साथ एक फिल्म कर रहा हूं। सच कहूं तो मुझे बहुत अच्छा लग रहा है। हर तरफ से मेरे पास आफर आ रहे हैं। मैं अपना दायरा बढ़ा रहा हूं। बाक्स आफिस पर कुछ फिल्में सफल हो तो नंबर गेम की लिस्ट में आपका नाम ऊपर आ जाता है। लोग यह मानते थे कि मुझे दर्शक पसंद करते हैं लेकिन जब से तारीफ मिली है तब से सभी का ध्यान मेरे ऊपर गया है। इधर मेरी कुछ ऐसी फिल्में चली जो मेनस्ट्रीम की नहीं थी।
- मुझे याद है शुरू में आप बहुत नर्वस और असहज रहते थे। कब खुद में आपका विश्वास बढ़ा और आपकी समझ में आया कि एक्टिंग का चुनाव गलत नहीं था।
0 यह आहिस्ता-आहिस्ता ही हुआ। ‘फुटपाथ’ की सात दिनों की शूटिंग के बाद भट्ट साहब, मुकेश भट्ट और विक्रम भट्ट ने फिल्म के रसेज देखे। उसके पहले बड़े पर्दे पर मैंने खुद को नहीं देखा था। थोड़ा अनिश्चित था। लेकिन अपना काम देखने के बाद ऐसा लगा कि मैं कुछ कर सकता हूं। भट्ट साहब ने मेरी पीठ थपथपायी तो हौसला बढ़ गया। इसके बाद ‘मर्डर’ हिट हुई तो विश्वास मजबूत हो गया । भट्ट साहब ने हमेशा मुझे प्रोत्साहित किया। मैं तो कहूंगा कि उनके गाइडेंस में ही मैं यहां तक पहुंचा हूं।




Friday, June 8, 2012

फिल्‍म समीक्षा : शांघाई

Review : shanghai 

जघन्य राजनीति का खुलासा

-अजय ब्रह्मात्‍मज
शांघाई दिबाकर बनर्जी की चौथी फिल्म है। खोसला का घोसला, ओय लकी लकी ओय और लव सेक्स धोखा के बाद अपनी चौथी फिल्म शांघाई में दिबाकर बनर्जी ने अपना वितान बड़ा कर दिया है। यह अभी तक की उनकी सबसे ज्यादा मुखर, सामाजिक और राजनैतिक फिल्म है। 21वीं सदी में आई युवा निर्देशकों की नई पीढ़ी में दिबाकर बनर्जी अपनी राजनीतिक सोच और सामाजिक प्रखरता की वजह से विशिष्ट फिल्मकार हैं। शांघाई में उन्होंने यह भी सिद्ध किया है कि मौजूद टैलेंट, रिसोर्सेज और प्रचलित ढांचे में रहते हुए भी उत्तेजक संवेदना की पक्षधरता से परिपूर्ण वैचारिक फिल्म बनाई जा सकती हैं।
शांघाई अत्यंत सरल और सहज तरीके से राजनीति की पेंचीदगी को खोल देती है। सत्ताधारी और सत्ता के इच्छुक महत्वाकांक्षी व्यक्तियों की राजनीतिक लिप्सा में सामान्य नागरिकों और विरोधियों को कुचलना सामान्य बात है। इस घिनौनी साजिश में नौकशाही और पुलिस महकमा भी चाहे-अनचाहे शामिल हो जाता है।
दिबाकर बनर्जी और उर्मी जुवेकर ने ग्रीक के उपन्यासकार वसिलिस वसिलिलोस के उपन्यास जी का वर्तमान भारतीय संदर्भ में रूपांतरण किया है। इस उपन्यास पर जी नाम से एक फिल्म 1969 में बन चुकी है। सची घटना पर आधारित इस उपन्यास को दिबाकर बनर्जी और उर्मी जुवेकर ने भारतीय रंग और चरित्र दिए हैं। मूल कहानी और फिल्म से शांघाई में कई अपरिहार्य समानताएं मिलेंगी, लेकिन सोच और संवेदना में यह पूरी तरह से भारतीय फिल्म है। दिबाकर बनर्जी ने उर्मी जुवेकर के साथ तीक्ष्ण कल्पनाशीलता का इस्तेमाल करते हुए सभी चरित्रों को भारत नगर में स्थापित किया है।
भारत नगर कस्बे से इंडिया बिजनेश पार्क में तब्दील हो रहा है। शांधाई बन रहा है। प्रदेश की मुख्यमंत्री से लेकर स्थानीय सहयोगी राजनीतिक पार्टी तक का ध्यान इस कस्बे की प्रगति पर टिका है। सभी तरक्की चाहते हैं और जय प्रगति के अभिवादन के साथ बातचीत करते हैं। निर्माण, विकास, प्रगति की ऐसी अवधारणा के विरोधी हैं डॉ ़ अहमदी। डॉ ़ अहमदी ने किस की प्रगति? किसका देश? नामक पुस्तक भी लिखी है। विदेश में अध्ययन-अध्यापन कर देश लौटे डॉ ़ अहमदी का एक ही लक्ष्य है कि विनाशकारी प्रगति को रोका जाए। वे स्वार्थी और सामाजिक लाभ से प्रेरित राजनीतिक चालों को बेनकाब करते रहते हैं। उन्होंने ऐसी कुछ योजनाओं पर जागृति फैला कर रोक लगवा दी है। अब वे भारत नगर आए हैं।
भारत नगर में डॉ ़ अहमदी के आने की खबर से शालिनी सहाय चिंतित हैं। शालिनी सहाय को भनक मिली है कि डॉ ़ अहमदी को इस बार जाने नहीं दिया जाएगा। उनकी हत्या हो जाएगी। परफेक्ट साजिश के तहत एक सड़क दुर्घटना में डॉ ़ अहमदी की मौत हो भी जाती है। उनकी विधवा इस दुर्घटना को हत्या मानती हैं और नेशनल टीवी पर इस हत्या की जांच की मांग करती है। मुख्यमंत्री के आदेश से जांच आरंभ होती है। इस जांच कमेटी के प्रमुख मुख्यमंत्री के प्रिय अधिकार टी ए कृष्णन हैं। ईमानदार जांच में जब कृष्णनन सच के करीब होते हैं तो उन्हें सलाह दी जाती है कि वे इस जांच को क्रिमिनल इंक्वारी कमेटी को सौंप दें। वे मान भी जाते हैं। उन्हें मुख्यमंत्री ने स्टाकहोम भेजने का प्रलोभन दे रखा है। बहरहाल, ऐन वक्त पर कृष्णनन को एक सुराग मिलता है। कृष्णन के व्यक्तित्व के सही धातु की जानकारी अब मिलती है। वह रफा-दफा हो रहे मामले को पलट देता है। साजिशों के तार मिलते और जुड़ते हैं और उनके पीछे के हाथ दिखते हैं तो पूरी राजनीति नंगी होकर खड़ी हो जाती है।
दिबाकर बनर्जी ने किसकी प्रगति? किसका देश के सवाल और उसकी पीछे की राजनीति को बगैर किसी लाग लपेट के उद्घाटित कर दिया है। सत्ता का समीकरण चौंकता है। अपनी कहानी के लिए दिबाकर बनर्जी ने उपयुक्त किरदार चुने हैं। मूल उपन्यास के चरित्रों के अलावा कुछ नए चरित्र जोड़े हैं। उन्होंने अपना ध्यान नहीं भटकने दिया है। फिल्म विषय के आसपास ही घूमती है। आयटम सौंग और डॉ ़ अहमदी की हत्या के इंटरकट राजनीति की जघन्यता जाहिर करते हैं।
शांघाई में इमरान हाशमी ने अपनी छवि से अलग जाकर कस्बाई वीडियोग्राफर की भूमिका को जीवंत कर दिया है। उन्होंने निर्देशक की सोच को बखूबी पर्दे पर उतारा है। शुरू में रोचक और हास्यास्पद लग रहा चरित्र क्लाइमेक्स में प्रमुख और महत्वपूर्ण चरित्र बन जाता है। इमरान हाशमी ने इस ट्रांजिशन में झटका नहीं लगने दिया है। टी ए कृष्णन जैसे रूखे, ईमानदार और सीधे अधिकारी की भूमिका में अभय देओल जंचते हैं। उनका किरदार एकआयामी लगता है, लेकिन चरित्र की दृढ़ता और ईमानदारी के लिए वह जरूरी था। अभय देओल पूरी फिल्म में चरित्र को जीते रहे हैं। कल्कि कोइचलिन दुखी और खिन्न लड़की की भूमिका में हैं। उन्हें टाइपकास्ट होने से बचना चाहिए।
खैर, इस फिल्म में उन्हें अधिक संवाद और दृश्य नहीं मिले हैं। भेद खुलने के दृश्य में उनकी प्रतिक्रिया प्रभावित करती है। भग्गू के किरदार में पित्ताबोस ने उन्मुक्त अभिनय किया है। फारुख शेख और प्रोसनेजीत अनुभवी अभिनेता हैं। वे भाव और संवाद की अभिव्यक्ति में सहज और स्वाभाविक हैं।
इस फिल्म का पाश्‌र्र्व संगीत उल्लेखनीय है। दृश्यों की नाटकीयता बढ़ाने में माइकल मैकार्थी़ के पाश्‌र्र्व संगीत का विशेष योगदान है। इन दिनों थ्रिलर फिल्मों में पाश्‌र्र्व संगीत के नाम पर शोर बढ़ गया है। शांघाई के छायांकन में दृश्यों के अनुरूप की गई लाइटिंग से भाव उभरे हैं। विभिन्न चरित्रों को उनके स्वभाव के अनुसार लिबास और लुक दिया गया है। इसके लिए मनोषी नाथ और रुशी श्मा बधाई के पात्र हैं। शांघाई में विशाल-शेखर का संगीत सामान्य है। भारत माता की जय गीत ही याद रह पाता है।
**** 1/2 साढ़े चार स्टार

Thursday, June 7, 2012

दिबाकर बनर्जी की पॉलिटिकल थ्रिलर ‘शांघाई’

 
-अजय ब्रह्मात्‍मज 
 हर फिल्म पर्दे पर आने के पहले कागज पर लिखी जाती है। लेखक किसी विचार, विषय, मुद्दे, संबंध, भावना, ड्रामा आदि से प्रेरित होकर कुछ किरदारों के जरिए अपनी बात पहले शब्दों में लिखता है। बाद में उन शब्दों को निर्देशक विजुअलाइज करता है और उन्हें कैमरामैन एवं अन्य तकनीशियनों की मदद से पर्दे पर रचता है। ‘शांघाई’ दिबाकर बनर्जी की अगली फिल्म है। उन्होंने उर्मी जुवेकर के साथ मिल कर इसका लेखन किया है। झंकार के लिए दोनों ने ‘शांघाई’ के लेखन के संबंध में बातें कीं।  
पृष्ठभूमि 
उर्मी - ‘शांघाई’ एक इंसान की जर्नी है। वह एक पाइंट से अगले पाइंट तक यात्रा करता है। दिबाकर से अक्सर बातें होती रहती थीं कि हो गया न ़ ़ ़ समाज खराब है, पॉलिटिशियन करप्ट हैं, पढ़े-लिखे लोग विवश और दुखी हैं। ऐसी बातों से भी ऊब हो गई है। आगे क्या बात करती है? 
दिबाकर - अभी तो पॉलीटिशयन बेशर्म भी हो गए हैं। वे कहते हैं कि तुम ने मुझे बुरा या चोर क्यों कहा? अभी अन्ना आंदोलन में इस तरह की बहस चल रही थी। ‘शांघाई’ में तीन किरदार हैं। वे एक सिचुएशन में अपने ढंग से सोचते और कुछ करते हैं। ‘लव सेक्स और धोखा’ के बाद मैंने उर्मी से चालू अंदाज में कहा कि भारत में पॉलिटिकल थ्रिलर फिल्में नहीं बनतीं। चलो हम बनाते हैं। कोस्टा गवारस की ‘जी’ (1969) जैसी फिल्म बनाते है। उर्मी ने उसी समय मुझ से पूछा कि तुम ने किताब पढ़ी है क्या? वसिलिस वसिलिकोस ने वह किताब लिखी थी। मुझे तब तक पता नहीं था कि ऐसी कोई किताब भी है। उर्मी के पास वह किताब बीस सालों से है।  
उर्मी - मैंने दिबाकर को वह किताब दी।  दिबाकर ने किताब पढऩे के बाद कहा कि हम इसे आज के समय में लिखेंगे। आज की कहानी लिखने में हम एक लेयर नीचे उतरे कि कैसे नियम-कानून में रह कर भारत में भ्रष्टाचार चल रहा है। हम सभी अच्छी दुनिया में जीना चाहते हैं, लेकिन एक समय के बाद सिनिकल हो जाते हैं कि कुछ भी बदला नहीं जा सकता।  
दिबाकर - यहां से हमारी फिल्म का विचार बढ़ा। उस समय मैंने पॉलिटिक्स को समझने की कोशिश की। क्या है पॉलिटिक्स? फिल्मों और टीवी ने बताया है कि कुछ सफेदपोश लोग सफेद घरों में कुछ कर रहे होते हैं। मेरे खयाल में अगर आप को अपने घर से दफ्तर की आधे घंटे की दूरी ढाई घंटे में तय करनी पड़ती है तो वह पॉलिटिक्स है। इसका मतलब है किसी ने कहीं बैठ कर कुछ ऐसा किया है या नहीं किया है, जिसकी वजह से आपकी यात्रा ढाई घंटे की हो गई है। रात के दस बजे आपका सोने का मन कर रहा है, लेकिन बिल्डिंग के नीचे या पड़ोस में इतनी जोर से लाउडस्पीकर बज रहा है कि आप को नींद नहीं आ रही है ... फिर भी आप कुछ कर नहीं सकते। यह पॉलिटिक्स है। मुंबई में कभी बिजली नहीं जाती, लेकिन कुछ इलाकों में कभी बिजली नहीं आती। यह पॉलिटिक्स है।  पॉलिटिक्स का सीधा असर हमारे दैनिक जीवन पर पड़ता है। इसे ज्यादातर लोग नहीं समझ पाते। हम सभी पॉलिटिकल एनीमल हैं और राजनीति के परिणाम हैं। हमारी जिंदगी राजनीति तय करती है। यह फिल्म उस पॉलिटिक्स की बात कर रही है।  
उर्मी - फिल्ममेकर ऐसे मुद्दों को नहीं छूते। राजनीति पर फिल्म बनाते समय हम एक बुरा पॉलीटिशियन रख लेते हैं और उसे अंत में मार देते हैं।  दिबाकर - उससे राहत मिल जाती है। पहले बुरा पॉलिटिशियन दिखाओ। फिल्म के अंत में हीरो उसे मार देगा। इस से बहुत राहत मिलती है कि देखो बुरे का अंत हो गया।   
फिल्म के तीन मुख्य किरदार  
टी ए कृष्णन 
टी ए कृष्‍णन(अभय देओल)- शहर के आला अफसर हैं। टी ए कृष्णन बहुत पावरफुल अधिकारी है। उसके कलम से शहर का नक्शा बदल सकता है। इस शहर में अरबों डॉलर का निवेश हो रहा है। शहर को विशेष आर्थिक क्षेत्र बनाया जा रहा है। उस शहर का विकास राज्य की सत्ताधारी पार्टी के लिए उस साल के चुनाव का झंडा है। उन्हें बताना है कि हम ने इंडिया बिजनेश पार्क बना कर दिखा दिया। और कोई पार्टी अभी तक यह नहीं कर सकी। केंद्र सरकार भी नहीं कर सकी। कृष्णन को आईबीपी की विशेष जिम्मेदारी उसे मिली है। मुख्यमंत्री उस पर बहुत भरोसा करती हैं। वह आईबीपी के इनवेस्टमेंट और वेंचर की सारी डील देख रहा है। कृष्णन भी विकास पर विश्वास करता है। कृष्णन 91-92 के बाद के विकास में यकीन रखता है। वह आईआईटी से निकला है और सिविल सर्विसेज की परीक्षा देकर आईएएस ऑफिसर बना है। उसने एमबीए भी किया। उसके हाथ में पावर है। उसके हाथ में इंडिया की डेस्टिनी है। वह नेहरू के प्रभाव के अपने पिता से आगे है। वह इंडिया शाइनिंग का नमूना है। वह ‘ट्रिकल डाउन इफेक्ट’ को कारगर मानता है। ऊपर की तरक्की चूकर नीचे आ जाएगी।  
जोगिन्दर परमार 
जोगिन्‍दर परमार(इमरान हाशमी)जोधपुर के भगोड़े राजपूत हैं। जोगी परमार को इस दुनिया के बारे में कुछ नहीं पता। आज उसे महीने में 8000 मिल रहे हैं। उसको अगले महीने से दो लाख बनाने हैं। वह आम भारतीय है। उसे जल्दी से अमीर होना है। उसके लिए कोई भी तरीका गलत नहीं है। वह कुछ भी कर सकता है। रोमांटिक लडक़ा है। रोमांटिक घपले की वजह से ही उसे जोधपुर छोडऩा पड़ा था। सात-आठ साल से यहां है। अगर आप से मिलेगा तो सबसे पहले अपने परिचय में कहेगा कि मैं पत्रकार हूं। फिर शाम को दारू पीने के बाद फोटोग्राफर हो जाएगा। कभी कहेगा कि वीडियोग्राफर हूं। कोई लडक़ी आ जाए तो उसे फोटो शूट का ऑफर देगा। कभी कहेगा कि रात में आ जाओ तो ऑडिशन कर दूंगा। उसमें कुछ और शूट हो जाता है और डीवीडी बन जाती है। वह हर तरह का काम करता है।  उसके पास 3-4 विजिटिंग कार्ड हैं। 
 शालिनी सहाय
शलिनी सहाय (कल्कि कोइचलिन)-आधी फिरंग और आधी हिंदुस्तानी है ़ ़ ़ मतलब न घर की न घाट की। इस शहर में उसके पिता का पुश्तैनी घर है। वह विदेश में पढ़ती है। यहां सारा मामला संभालने आई है। उसके पिता जनरल थे। वे एक गबन के मामले में दिल्ली की जेल में है। वह आधी भारतीय है, लेकिन बाहर जाकर पढ़ाई की है। उसकी गोरी चमड़ी है। बोलती हिंदी है, लेकिन उसकी चाल-ढाल और भाषा में भिन्नता है। कस्बे में सभी उसे विदेशी ही समझते हैं। सभी उससे अंग्रेजी में बात की शुरुआत करते है। वे सभी उसे बाहर की ही मिर्ची मानते हैं। उसे ज्यादा सीरियसली भी नहीं लेते। शहर में सभी जानते हैं कि वह जनरल सहाय की बेटी है। वह इस शहर और दुनिया से बहुत नाराज है। उसके अंदर गुस्सा उबल रहा है। 24 साल की शालिनी अभी तक आदर्श ख्यालों में जीती है। 
 ... और डा अली अहमदी 
डॉ. अली अहमदी (प्रसेनजीत) सोशल वर्कर है। यह भूमिका प्रसेनजीत निभा रहे हैं। वे डायनैमिक इंसान हैं। देश में जिस तेजी से करपशन बढ़ा है, उसी तेजी से ऐसे विद्रोही नेता बढ़े हैं। उनकी प्रतिष्ठा यही है कि वे झटपट विकास के कई प्रोजेक्ट बंद करवा चुके हैं। वे इस शहर में आने वाले हैं। उनके आने की खबर से सरगर्मी है। शहर के प्रशासन में खलबली है। वे एहतियात बरत रहे हैं। डॉ. अहमदी आते हैं। भाषण देते हैं। यहां एक पेंच है कि शालिनी सहाय न्यूयार्क में डॉ ़ अहमदी की स्टूडेंट रही हैं। उनके बीच एक अजीब सा अट्रैक्शन और केमिस्ट्री है। शालिनी अपने जज्बात कह नहीं पाती। डॉ. अहमदी ऊर्जावान और जुझारू सोशल रिफार्मर हैं। ऐसे लोग पॉलिटिशयन और फिल्म स्टार के मिक्स होते हैं। उनका चमत्कारी व्यक्तित्व है। एक स्टार पावर है उनमें। डॉ. अहमदी की बातों का शहर में असर हुआ है। स्थानीय लोग मान जाते हैं कि आईबीपी के लिए मिला मुआवजा उचित नहीं है। वह कम नहीं है। डॉ. अहमदी इस मुहिम में हैं। तभी एक्सीडेंट होता है और डॉ. अहमदी कोमा में चले जाते हैं।  शहर उस शहर में अनेक गतिविधियां जारी हैं। आईबीपी बन चुका है। पैसे लग रहे हैं। एक लोकल पार्टी यहां मजबूत है, जो राज्य की सरकार में भी शामिल है। दोनों पार्टियों का गठबंधन है। आईबीपी उनके लिए मंदिर है। वे उसे बनाने की ठान चुके हैं। उन्होंने शहर, राज्य और देश को सपना दिया है कि यह शहर रातों रात शांघाई बन जाएगा। मॉल, फ्लायओवर, स्काई स्क्रैपर सब आ जाएंगे। सबके लिए नौकरी होगी। हर घर में खुशहाली होगी। हर घर में चार टीवी होंगे। हर कमरे के लिए एक। इस तरह के सपने सभी देख रहे हैं। राजधानी में कुछ नया करना थोड़ा मुश्किल रहता है। सबकी नजर रहती है। ऐसे स्पेशल जो ना छोटे शहरों या कस्बे में ही खोले जाते हैं। स्थानीय पार्टी की सांठगांठ से सब होता है। जंगल कटते, बस्ती बसते, खान-खदान चालू होते और स्पेशल जोन बनने के किससे आप जानते ही हैं। स्थानीय पार्टी जन जागरण मोर्चा  इस मुहिम में है। राज्य सरकार तरक्की चाहती है। एक महिला मुख्यमंत्री हैं। उनका इंटरनेशनल आउटलुक है। प्रो बिजनेश हैं। किसी कारपोरेट कंपनी की सीईओ जैसी हैं। विकास चाहती हैं। देश में उनके प्रति धारणा है कि यह सीएम तो एक दिन पीएम बनेंगी।     
ड्रामा   
हमारी फिल्म की वास्तविक शुरुआत यहां से है। शालिनी सहाय को कहीं से भनक लगी थी कि अगर डॉ . अहमदी आए तो उन्हें वापस नहीं जाने दिया जाएगा। इस भनक की वजह से शालिनी मानती हैं कि यह हत्या है। चूंकि दुर्घटना सभी के सामने हुई है और ड्रायवर ने मान लिया है कि वह नशे में था। वह किसी भी सजा के लिए तैयार है। डॉ . अहमदी की पत्नी यहां आती हैं। वह पेशे से वकील हैं। यहां आईबीपी का उद्घाटन होने वाला है। डॉ . अहमदी की बीवी इनक्वायरी की मांग करती है। राज्य सरकार मान लेती है। कृष्णन को जांच की जिम्मेदारी दी जाती है। मुख्यमंत्री लोकप्रिय फैसला लेती हैं कि जांच होगी। कृष्णन उलझन में आ जाता है। यहां तक तो हम ने सोचा था  ...इसके बाद तीनों की क्रियाएं-प्रतिक्रियाएं सिचुएशन और सीन से तैयार होता है। कृष्णन कहता है कि यह तो पॉलिटिकल मामला है। वह द्वंद्व में है। कृष्णन को मुख्यमंत्री ने जिम्मेदारी दे दी है। वह एक स्कूल में जांच कमेटी की मीटिंग कर रहा है, जहां बाहर में बच्चे वालीबाल खेल रहे हैं। कृष्णन का पाला गंदे अविकसित भारत के लोगों से होता है। उसे वहां भी कूलर, कछुआ छाप, मिनरल वाटर और गुडनाइट चाहिए।   यहां से हम रियल कहानी में प्रवेश करते हैं। हमने सभी किरदारों को रियल इंडिया में रखा है। कोई भी किरदार फिल्मी और हीरोइक नहीं है। रियल इंडिया की समस्या उठायी जा रही है।  

Thursday, May 31, 2012

रियल ड्रामा और पॉलिटिक्स है ‘शांघाई’ में

 
-अजय ब्रह्मात्‍मज
अपनी चौथी फिल्म ‘शांघाई’ की रिलीज तैयारियों में जुटे बाजार और विचार के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहे हैं। उनकी यह फिल्म दिल्ली से बाहर निकली है। उदार आर्थिक नीति के के देश में उनकी फिल्म एक ऐसे शहर की कहानी कहती है, जहां समृद्धि के सपने सक्रिय हैं। तय हआ है कि उसे विशेष आर्थिक क्षेत्र के रूप में विकसित किया जाएगा। राज्य सरकार और स्थानीय राजनीतिक पार्टियों ने स्थानीय नागरिकों को सपना दिया है कि उनका शहर जल्दी ही शांघाई बन जाएगा। इस राजनीति दांवपेंच में भविष्य की खुशहाली संजोए शहर में तब खलबली मचती है, जब एक सामाजिक कार्यकर्ता की सडक़ दुर्घटना में मौत हो जाती है। ज्यादातर इसे हादसा मानते हैं, लेकिन कुछ लोगों को यह शक है कि यह हत्या है। शक की वजह है कि सामाजिक कार्यकर्ता राजनीतिक स्वार्थ के तहत पोसे जा रहे सपने के यथार्थ से स्थानीय नागरिकों को परिचित कराने की मुहिम में शामिल हैं। माना जाता है कि वे लोगों को भडक़ा रहे हैं और सपने की सच्चाई के प्रति सचेत कर रहे हैं।  
 दिबाकर बनर्जी राजनीतिक पृष्ठभूमि की फिल्म ‘शांघाई’ में हमें नए भारत से परिचित कराते हैं। यहां जोगिन्दर परमार, टीए कृष्णन, डाक्टर अली अहमदी,शालिनी सहाय जैसे किरदार हैं। वे समाज के विभिन्न तबकों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। रियल इंडिया की इस फिल्म में हिंदी फिल्मों के प्रचलित ग्रामर का खयाल नहीं रखा गया है। दिबाकर बनर्जी हमेशा की तरह वास्तविक और विश्वसनीय किरदारों के माध्यम से अपनी कहानी कह रहे हैं। वे स्वीकार करते हैं कि उन्हें बाजार के दबाव के बीच काम करना पड़ रहा है, लेकिन उन्हें बाजार की जरूरतों से कोई गुरेज नहीं है। रिलीज के एक महीने पहले उन्हें इमरान हाशमी के साथ एक गाने की शूटिंग करनी पड़ी है। फिल्म में इसकी जरूरत नहीं थी, फिर भी मार्केटिंग टीम की सलाह पर उन्होंने सूफियाना अंदाज का यह गीत इमरान हाशमी के प्रशंसकों और दर्शकों के लिए रखा। वे कहते हैं, ‘यह गाना मेरी फिल्म के कथ्य को प्रभावित नहीं करेगा और बाजार की जरूरत भी पूरी हो जाएगी।’ 
 ‘शांघाई’ में अभय देओल और इमरान हाशमी का साथ आना रोचक है। दोनों के बीच बमुश्किल चार सीन होंगे, लेकिन उनकी मौजूदगी अलग-अलग समूहों के दर्शकों को फिल्म से जोड़ेगी। दिबाकर कहते हैं, ‘फिल्म में जोगिन्दर परमार के किरदार के लिए उनसे बेहतर एक्टर नहीं हो सकता था। हर छोटे शहर में दो-चार ऐसे शख्य होते हैं। यह किरदार इमरान हाशमी की इमेज के साथ मैच करता है और फिल्म के लिए बिल्कुल उचित है।’ दिबाकर की बातचीत से पता चलता है कि पॉलिटिकल थ्रिलर के तौर पर बनी उनकी ‘शांघाई’ में आम दर्शकों के मनोरंजन का पूरा ख्याल रखा गया है। ‘जिंदगी का रियल ड्रामा किसी फैंटेसी से अधिक इंगेजिंग होता है’, कहते हैं दिबाकर बनर्जी। दिबाकर बनर्जी ने इस बार एक अलग लेवल पर ड्रामा रचा है।  

साथ आना अभय देओल और इमरान हाशमी का

 
-अजय ब्रह्मात्मज
फिल्म देखने के बाद दिबाकर बनर्जी के इस अहम फैसले का परिणाम नजर आएगा। फिलहाल अभय देओल और इमरान हाशमी का एक फिल्म में साथ आना दर्शकों को हैरत में डाल रहा है। फिल्म के प्रोमो से जिज्ञासा भी बढ़ रही है। कुछ धमाल होने की उम्मीद है। अभय देओल हिंदी फिल्मों के विशिष्ट अभिनेता हैं। इमरान हाशमी हिंदी फिल्मों के आम अभिनेता हैं। दोनों के दर्शक और प्रशंसक अलग हैं। दिबाकर बनर्जी ने ‘शांघाई’ में दोनों को साथ लाकर अपनी कास्टिंग से चौंका दिया है।
    ‘सोचा न था’ से अभय देओल की शुरुआत हुई। देओल परिवार के इस हीरो की लांचिंग पर किसी का ध्यान भी नहीं गया। उनके पीठ पीछे सनी देओल के होने के बावजूद फिल्म की साधारण रिलीज हुई। फिर भी अभय देओल ने पहले समीक्षकों और फिर दर्शकों का ध्यान खींचा। कुछ फिल्मों की रिलीज के पहले से ही चर्चा रहती है। ऐसी फिल्म रिलीज के बाद ठंडी पड़ जाती हैं। जिन फिल्मों पर उनकी रिलीज के बाद निगाह जाती है, उन्हें दर्शक और समीक्षकों की सराहना बड़ी कर देती है। ‘सोचा न था’ ऐसी ही फिल्म थी। इस फिल्म ने इंडस्ट्री को तीन प्रतिभाएं दीं - अभय देओल, आएशा और इम्तियाज अली।
    इसके विपरीत भट्ट परिवार से संबद्ध फिल्मों में विक्रम भट्ट के सहायक के तौर पर आए। उनमें महेश भट्ट को कुछ खास दिखा। उन्होंने उन्हें कैमरे के सामने लाकर खड़ा कर दिया। आरंभिक फिल्मों में इमरान हाशमी के लुक, प्रेजेंस और एक्टिंग की तीखी आलोचना हुई, लेकिन महेश भट्ट की बदौलत इमरान हाशमी टिके रहे। भट्ट परिवार उन्हें फिल्म दर फिल्म दोहराता रहा। विशेष प्रयास से उनकी सभी फिल्मों के कुछ गाने पॉपुलर होते गए और उन गानों के सहारे इमरान हाशमी भी देश के चवन्नी छाप दर्शकों के बीच अपनी जगह बनाते गए। ‘मर्डर’ फिल्म की कामयाबी ने इमरान हाशमी को ‘किसिंग स्टार’ का खिताब दिया। इस फिल्म के बाद इमरान हाशमी के पास उन्नति के सिवा कोई चारा नहीं रह गया। वे अपनी रफ्तार से लोकप्रियता की सीढियां चढ़ते गए। उन्होंने लगन, मेहनत और एकाग्रता से खास जगह बना ली।
    दरअसल, इमरान हाशमी की कामयाबी फिल्म अध्येताओं के पाठ और अध्ययन का विषय हो सकती है। देश के बदलते दर्शकों से इमरान हाशमी की लोकप्रियता का सीधा संबंध है। फिल्म ट्रेड में जिसे बी और सी सेंटर कहते हैं, वहां इमरान खासे पॉपुलर हैं। उनकी हर फिल्म बिहार में अच्छा बिजनेश करती है। इसके साथ ही वे पाकिस्तान में हिंदी फिल्मों के खान से पॉपुलर स्टार हैं। फिलहाल, हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के तमाम बड़े बैनर उनमें खास रुचि ले रहे हैं। निर्देशकों और दर्शकों की बढ़ती मांग की वजह से उन्हें भट्ट कैंप की चहारदीवारी छलांगनी पड़ी है।
    दूसरी तरफ अभय देओल ने ‘आउट ऑफ बाक्स’ फिल्मों में जगह बनाने के बाद मेनस्ट्रीम फिल्मों में भी प्रवेश किया है। ‘जिंदगी ना मिलेगी दोबारा’ में फरहान अख्तर और रितिक रोशन के साथ उनकी तिगड़ी पसंद की गई। फिलहाल वे प्रकाश झा की ‘चक्रव्यूह’ की शूटिंग कर रहे हैं। अपने दोनों बड़े भाइयों (सनी और बॉबी) से अलग छवि और फिल्मों में उनकी रुचि है। उन्होंने इस धारणा को तोड़ा है कि स्टारसन हमेशा कमर्शिल फिल्मों में कैद रहते हैं।
    अब इन दोनों को साथ लाकर दिबाकर बनर्जी दर्शकों के विशाल समुदाय को ‘शांघाई’ के लिए थिएटर में लाएंगे। दिबाकर बनर्जी की फिल्में अभी तक शहरी दर्शकों के बीच चर्चित और प्रशंसित रही हैं। इस बार उन्होंने इमरान हाशमी के साथ अपना दायरा तोड़ा है। इससे उन्हें फायदा होगा और अप्रत्यक्ष रूप से दर्शक भी फायदे में रहेंगे। इमरान हाशमी के प्रशंसक और दर्शक इसी बहाने दिबाकर बनर्जी की फिल्म से परिचित होंगे।