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Friday, March 10, 2017

फिल्‍म समीक्षा : बद्रीनाथ की दुल्‍हनिया



फिल्‍म रिव्‍यू
दमदार और मजेदार
बद्रीनाथ की दुल्‍हनिया
-अजय ब्रह्मात्‍मज

शशांक खेतान की बद्रीनाथ की दुल्‍हनिया खांटी मेनस्‍ट्रीम मसाला फिल्‍म है। छोटे-बड़े शहर और मल्‍टीप्‍लेक्‍स-सिंगल स्‍क्रीन के दर्शक इसे पसंद करेंगे। यह झांसी के बद्रीनाथ और वैदेही की परतदार प्रेमकहानी है। इस प्रेमकहानी में छोटे शहरों की बदलती लड़कियों की प्रतिनिधि वैदेही है। वहीं परंपरा और रुढि़यों में फंसा बद्रीनाथ भी है। दोनों के बीच ना-हां के बाद प्रेम होता है,लेकिन ठीक इंटरवल के समय वह ऐसा मोड़ लेता है कि बद्रीनाथ की दुल्‍हनिया महज प्रेमकहानी नहीं रह जाती। वह वैदेही सरीखी करोड़ों लड़कियों की पहचान बन जाती है। माफ करें,वैदेही फेमिनिज्‍म का नारा नहीं बुलंद करती,लेकिन अपने आचरण और व्‍यवहार से पुरुष प्रधान समाज की सोच बदलने में सफल होती है। करिअर और शादी के दोराहे पर पहुंच रही सभी लड़कियों को यह फिल्‍म देखनी चाहिए और उन्‍हें अपने अभिभावकों  को भी दिखानी चाहिए।
शशांक खेतान ने करण जौहर की मनोरंजक शैली अपनाई है। उस शैली के तहत नाच,गाना,रोमांस,अच्‍छे लोकेशन,भव्‍य सेट और लकदक परिधान से सजी इस फिल्‍म में शशांक खेतान ने करवट ले रहे छोटे शहरों की उफनती महात्‍वाकांक्षाओं को पिरो दिया है। लहजे और अंदाज के साथ वे छोटे शहरों के किरदारों को ले आते हैं। उन्‍होंने बहुत खूबसूरती से झांसी के सामाजिक ढांचे में मौजूद जकड़न और आ रहे बदलाव का ताना-बाना बुना है। अभी देश में झांसी जैसे हर शहर में ख्‍वाहिशें जाग चुकी है। खास कर लड़कियों में आकांक्षाएं अंकुरित हो चुकी हैं। वे सपने देखने के साथ उन पर अमल भी कर रही हैं।  उसकी वजह से पूरा समाज अजीब सी बेचैनी और कसमसाहट महसूस कर रहा है। नजदीक से देखें तो हमें अपने आसपास बद्रीनाथ मिल जाएंगे,जिन्‍हें अहसास ही नहीं है कि वे अपनी अकड़ और जड़ समझ से पिछड़ चुके हैं। ऐसे अनेक बद्री मिल जाएंगे,जो अपने माता-पिता के दबाव में रुढि़यों का विरोध नहीं कर पाते। हर बद्री की जिंदगी में वैदेही नहीं आ पाती। नतीजा यह होता है कि गुणात्‍मक और क्रांतिकारी बदलाव नहीं आ पाता।
शशांक की बद्रीनाथ की दुल्‍‍हनिया रियलिस्टिक फिल्‍म नहीं है। सभी किरदार लार्जर दैन लाइफ हैं। उनके बात-व्‍यवहार में मेलोड्रामा है। अभिनय और परफारमेंस में भी लाउडनेस है। इन सबके बावजूद फिल्‍म छोटे शहरों की बदलती सच्‍चाई को भावनात्‍मक स्‍तर पर टच करती है। फिल्‍म अपना संदेश कह जाती है। लेखक-निर्देशक किरदारों के जरिए प्रसंगों के बजाए पंक्तियों में यथास्थिति का बयान करते जाते हैं। शशांक खेतान ने किरदारों के बीच इमोशन की मात्रा सही रखी है। फिल्‍म ऐसे अनेक दृश्‍य है,जो भावुक किस्‍म के दर्शकों की आंखें नम करेंगे। शशांक ऐसे दृश्‍यों में ज्‍यादा देर नहीं रुकते।
वरुण धवन बधाई के पात्र हैं। उन्‍होंने ऐसी फिल्‍म स्‍वीकार की,जिसमें नायिका अधिक दमदार और निर्णायक भूमिका में है। हिंदी फिल्‍मों में ऐसे नायकों की भूमिका स्‍टार नहीं,एक्‍टर निभाते हैं। वरुण इस भूमिका में एक्‍टर के रूप में प्रभावित करते हैं। आलिया भट्ट आनी पीढ़ी की समर्थ अभिनेत्री हो चुकी हैं। उनके अथिनय का एक नया आयाम यहां देखने को मिलेगा। वरुण और आलिया दोनों पर्दे पर साथ होने पर अतिरिक्‍त आकर्षण पैदा करते हैं। फिल्‍म के अन्‍य किरदारों में आए कलाकार भी अपनी भूमिकाओं में सक्षम हैं। उनके योगदान से बद्रीनाथ की दुल्‍हनिया ऐसी रोचक,मनोरंजक और सार्थक हो पाई है। बद्री के दोस्‍त के रूप में साहिल वैद का अलग से उल्‍लेख होना चाहिए। हिंदी फिल्‍मों के पारंपरिक किरदार दोस्‍त को उन्‍होंने अच्‍छी तरह निभाया है।
फिल्‍म में कुछ कमियां भी हैं। नाच-गानों से भरपूर मनोरंजन की कोशिश में लेखक-निर्देशक ने थोड़ी छूट ली है। कुछ दृश्‍य बेवजह लंबे हो गए हैं। कुछ प्रसंग निरर्थक हैं। फिर भी बद्रीनाथ की दुल्‍हनिया मेनस्‍ट्रीम फिल्‍मों के ढांचे में रहते हुए कुछ सार्थक संदेश दे जाती है।
अवधि-139 मिनट
***1/2 साढ़े तीन स्‍टार

Friday, November 25, 2016

फिल्‍म समीक्षा : डियर जिंदगी



फिल्‍म समीक्षा
डियर जिंदगी
-अजय ब्रह्मात्‍मज

हम सभी की जिंदगी जितनी आसान दिखती है,उतनी होती नहीं है। हम सभी की उलझनें हैं,ग्रंथियां हैं,दिक्कतें हैं...हम सभी पूरी जिंदगी उन्‍हें सुलझाते रहते हैं। खुश रहने की कोशिश करते हैं। अनसुलझी गुत्थियों से एडजस्‍ट कर लेते हैं। बाहर से सब कुछ शांत,सुचारू और स्थिर लगता है,लेकिन अंदर ही अंदर खदबदाहट जारी रहती है। किसी नाजुक क्षण में सच का एहसास होता है तो बची जिंदगी खुशगवार हो जाती है। गौरी शिंदे की डियर जिंदगी क्‍यारा उर्फ कोको की जिंदगी में झांकती है। क्‍यारा अकेली ऐसी लड़की नहीं है। अगर हम अपने आसपास देखें तो अनेक लड़कियां मिलेंगी। वे सभी जूझ रही हैं। अगर समय पर उनकी भी जिंदगी में जहांगीर खान जैसा दिमाग का डाक्‍टर आ जाए तो शेष जिंदगी सुधर जाए।
हिंदी फिल्‍मों की नायिकाएं अब काम करने लगी हैं। उनका एक प्रोफेशन होता है। क्‍यारा उभरती सिनेमैटोग्राफर है। वह स्‍वतंत्र रूप से फीचर फिल्‍म शूट करना चाहती है। उसे रघुवेंद्र से आश्‍वासन मिलता है। संयोग कुछ ऐसा बनता है कि वह स्‍वयं ही मुकर जाती है। मानसिक दुविधा में वह अनिच्‍छा के साथ अपने मां-बाप के पास गोवा लौटती है। गोवा में उसकी मुलाकात दिमाग के डाक्‍टर जहांगीर खान से होती है। अपनी अनिद्रा के इलाज के लिए वह मिलती है तो बातचीत और सेशन के क्रम में उसके जीवन की गुत्थियों की जानकारी मिलती है। जहांगीर खान गुत्थियों की गांठों को ढीली कर देता है। उन्‍हें वह खुद ही खोलती है।
गुत्थियों को खोलने के क्रम में वह जब मां-बाप और उनके करीबी दोस्‍तों के बीच गांठ पर उंगली रखती है तो सभी चौंक पड़ते हैं। हमें क्‍यारा की जिंदगी के कंफ्यूजन और जटिलताओं की वजह मालूम होती है और गौरी शिंदे धीरे से पैरेंटिंग के मुद्दे को ले आती हैं। करिअर और कामयाबी के दबाव में मां-बाप अपने बच्‍चों के साथ ज्‍यादतियां करते रहते हैं। उन्‍हें पता ही नहीं चलता और वे उन्‍हें किसी और दिशा में मोड़ देते हैं। उनके कंधों पर हमेशा अपनी अपेक्षाओं का बोझ डाल देते हैं। बच्‍चे निखर नहीं पाते। वे घुटते रहते हैं। अपनी जिंदगी में अधूरे रहते हैं। कई बार वे खुद भी नहीं समझ पाते कि कहां चूक हो गई और उनके हाथों से क्‍या-क्‍या फिसल गया? डियर जिंदगी पैरेंटिंग की भूलों के प्रति सावधान करती है।
क्‍यारा की निजी(इस पीढ़ी की प्रतिनिधि) समस्‍या तक पहुंचने के लिए गौरी शिंदे लंबा रास्‍ता चुनती हैं। फिल्‍म यहां थोड़ी बिखरी और धीमी लगती है। हम क्‍यारा के साथ ही उसके बदलते दोस्‍तों सिड,रघुवेंद्र और रुमी से भी परिचित होते हैं। उसकी दो सहेलियां भी मिलती हैं। क्‍यारा को जिस परफेक्‍ट की तलाश है,वह उसे नहीं मिल पा रहा है। इसके पहले कि उसके दोस्‍त उसे छोड़ें,वह खुद को समेट लेती है,काट लेती है। भावनात्‍मक संबल और प्रेम की तलाश में भटकती क्‍यारा को जानकारी नहीं है कि अधूरापन उसके अंदर है। दिमाग के डाक्‍टर से मिलने के बाद यह स्‍पष्‍ट होता है। जिंदगी की छोटी तकलीफों,ग्रंथियों और भूलों को पाले रखने के बजाए उन्‍हें छोड़ देने में ही सुख है।
गोवा की पृष्‍ठभूमि में डियर जिंदगी के किरदार विश्‍वसनीय और असली लगते हैं। चमक-दमक और सजावटी जिंदगी और परिवेश में लिप्‍त फिल्‍मकारों को इस फिल्‍म सीख लेनी चाहिए। बहरहाल, गौरी शिंदे ने अपने तकनीकी सहयोगियों की मदद से फिल्‍म का कैनवास सरल और वास्‍तविक रखा है। उन्‍होंने कलाकारों के चुनाव में किरदारों के मिजाज का खयाल रखा है। क्‍यारा के परिवार के सभी सदस्‍य किसी आम मध्‍यवर्गीय परिवार के सदस्‍य लगते हैं। उनकी बातें और चिंताएं भी मध्‍यवर्गीय सीमाओं में हैं। गौरी बारीकी से घर-परिवार और समाज की धारणाओं और मान्‍यताओं को रेखांकित करती जराती है। वह रुकती नहीं हैं। वह मूल कथा तक पहुंचती हैं।
शाह रुख खान अपनी प्रचलित छवि से अलग साधारण किरदार में सहज हैं। उनका चार्म बरकरार है। वह अपने अंदाज और किरदार के मिजाज से आकर्षक लगते हैं। ऐसे किरदार लोकप्रिय अभिनेताओं को अभिनय का अवसर देते हैं। शाह रुख खान इस अवसर का लाभ उठाते हैं। आलिया भट्ट अपनी पीढ़ी की समर्थ अभिनेत्री के तौर पर उभर रही हैं। उन्‍हें एक और मौका मिला है। क्‍यारा के अवसाद,द्वंद्व और महात्‍वाकांक्षा को उन्‍होंने दृश्‍यों के मुताबिक असरदार तरीके से पेश किया है। लंबे संवाद बोलते समय उच्‍चारण की अस्‍पष्‍टता से वह एक-दो संवादों में लटपटा गई हैं। नाटकीय और इमोशनल दृश्‍यों में बदसूरत दिखने से उन्‍हें डर नहीं लगता। सहयोगी भूमिकाओं में इरा दूबे,यशस्विनी दायमा,कुणाल कपूप,अंगद बेदी और क्‍यारा के मां-पिता और भाई बने कलाकारों ने बढि़या योगदान किया है।
अवधि- 149 मिनट
साढ़े तीन स्‍टार

Tuesday, October 25, 2016

मुझे हारने का शौक नहीं : आलिया भट्ट

विस्‍तृत बातचीत की कड़ी में इस बार हैं आलिया भट्ट। आलिया ने यहां खुलकर बातें की हैं। आलिया के बारे में गलत धारणा है कि वह मूर्ख और भोली है। आलिया अपनी उम्र से अधिक समझदार और तेज-तर्रार है। छोटी उम्र में बड़ी सफलता और उससे मिले एक्‍सपोजर ने उसे सावधान कर दिया है।



23 की उम्र आमतौर पर खेल-कूद की मानी जाती है। मगर उस आयु की आलिया भट्ट अपने काम से वह मिथक ध्‍वस्‍त कर रही हैं। वह भी लगातार। नवीनतम उदाहरण ‘उड़ता पंजाब’ का है। ‘शानदार’ की असफलता को उन्होंने मीलों पीछे छोड़ दिया है। उनके द्वारा फिल्म में निभाई गई बिहारिन मजदूर की भूमिका को लेकर उनकी चौतरफा सराहना हो रही है। देखा जाए तो उन्होंने आरंभ से ही फिल्‍मों के चुनाव में विविधता रखी है। वे ऐसा सोची-समझी रणनीति के तहत कर रही हैं।

     आलिया कहती हैं, ‘मैं खेलने-कूदने की उम्र बहुत पीछे छोड़ चुकी हूं। मैं इरादतन कमर्शियल व ऑफबीट फिल्मों के बीच संतुलन साध रही हूं। इस वक्त मेरा पूरा ध्‍यान अपनी झोली उपलब्धियों से भरने पर है। हालांकि मैं किसी फिल्म को इतना गंभीर तरीके से नहीं लेती हूं कि मरने और जीने का मामला हो जाएं। कई बार एक्टर स्क्रीन पर अपने आप को इतना गंभीर लेने लगता है कि उसकी की भी झलक देखने को मिलती है। मैं किरदार में घुस जाती हूं। उसके बाद किरदार में बन जाने का अपना मजा आता है। जब मैंने ‘उड़ता पंजाब’ साइन की थी, तब मुझे पता था कि यहां पर परफॉरमेंस का काफी स्कोप है। अगर मैं उसे ठीक तरीके से ना करूं तो मेरे लिए बुरा होगा। मैं बहुत घबराई हुई थी। इस किरदार में काफी मुश्किलें थी। कुछ भी हो सकता था, पर मेरे लिए सब कुछ सकारात्मक रहा। मेरे लिए खुशी एकतरफ है। 

     खुद ही हदें पार करने की सोच मेरी परवरिश का नतीजा है। मेरे परिवार में मां हैं। पापा हैं। पूजा है। हर कोई अपने आप के साथ मुकाबला करता है। मैं भी अपने आप से ही मुकाबला करती हूं। मैं यह नहीं कह रही कि तोल-मोल कर काम कर रही हूं, पर अपने आप को चैलेंज करने के लिए हदें तोड़ने के लिए मैं काम करती हूं।अगर किसी ने मुझे कुछ कहा और मैंने कहा कि नहीं कर सकती।तब मैं सोचूंगी कि आखिर मैंने ना क्यों कहा। अब तो मुझे करना ही पड़ेगा। यह पाना हाई या थ्रिल है। यह डर वाली बात मुझे पापा से मिली है। पापा इतने बोल्ड हैं। वे कहा करते हैं कि अगर कोशिश नहीं करोंगे तो जीत कैसे मिलेगी। वैसे तो मैं बहुत स्पर्धावादी हूं। मुझे हारने का शौक नहीं है। जैसे शानदार को लेकर मुझे हार महसूस हुई। तब मुझे लगा कि मेरे साथ ऐसा नहीं हो सकता। तब पापा ने मुझसे एक बात कही थी। उन्होंने कहा कि द बेस्ट रिवेंज इज़ मैसिव सक्सेस। मैंने उसे अपने कमरे की दीवार पर लगा दिया था। मुझे पता था। उसके बाद मुझे बढ़त जरूर मिलेगा। मैं कोशिश करना नहीं छोड़ सकती। मुझे डरना नहीं है। डर से काम नहीं होता है।
     लोगों को ‘स्‍टूडेंट ऑफ द ईयर’ में अलग आलिया दिखी थी। हाइवे में लगा कि थोड़ा बदलाव हुआ है। पर अभी भी किरदार में बनने में आलिया को थोड़ा वक्त लगेगा। इसमें भी निर्देशक के पास थोड़ा सा समय नहीं रहता है। हुआ क्या कि ‘उड़ता पंजाब’ के किरदार में उसके बैठने चलने थोड़ी सी कमी दिखी। जो आगे ठीक होगा। यह जो कमी है इसे आलिया की ईमानदार कोशिश ने ढक दिया। कई बार आप फेल हो जाते हो फिर भी माता-पिता नहीं डाटते हैं, क्योंकि आपकी कोशिश सही होती है। इस पर आलिया अपनी प्रतिक्रिया जाहिर करती हैं, ‘हर किरदार में कुछ ना कुछ कमी रहेगी। यह मेरा मानना है कि यह होना भी चाहिए। अगर पऱफेक्ट काम हुआ तो उसमें बढ़त का स्कोप नहीं होगा। वह थोड़ा सा इन ह्यूमन भी लगता है। जब भी आप कोई परफेक्ट काम देखेंगे तो आप का इमोशनल कनेक्ट नहीं होगा, क्योंकि वह किताब की तरह सही है। एक थोड़ा सा ढिलमिल रहना चाहिए। मेरे पापा मुझ से कहते हैं कि एक एक्टर में वल्नरबिलिटी रहनी चाहिए। जो नए लोगों में होती है। इस वजह से वह स्क्रीन पर ताजा दिखते हैं। दस फिल्म के बाद भले ही वह बदल जाता है। सच कहूं तो मैं यह कभी नहीं खोना चाहती हूं। मैं चाहती हूं कि हर फिल्म में मुझे दस गलतियां दिखें। जिसे मैं तभी नहीं बदलूंगी, बल्कि आगे के किरदारों में बदल सकती हूं। पापा और पूजा दोनों बहुत स्मार्ट हैं मेरे लिए। रहा सवाल मां का तो हम तीनों में कुछ बातें समान हैं। वे हैं आजादखयाली, आत्मगौरव और लडऩे की क्षमता। पूजा और मैं फेमिनिस्ट हैं। हमारे लिए औरत होना ग्रेटेस्ट बात है। हम दोनों इसमें यकीन करते हैं। हमें कोई डोर मैट नहीं बना सकता। पूजा बहुत सपोर्टिव हैं।

     मेरे लिए फिल्म जगत में करियर बनाना एक स्‍वर्गिक अनुभव रहा। मैं ढेर सारी जिंदगी जी रही हूं। विभिन्न तबके से आई लड़कियों के सुख-दुख को महसूस कर पा रही हूं। मिसाल के तौर पर इसी फिल्म में एक सीन था , जब पहली बार वह लोग उसे उठा कर लेकर जाते हैं वह स्केप करने की कोशिश करती है। पहली बार सब उन्हें थोड़ा सा रेप वाला सीन हो जाता है। वह उसे इंजेक्ट करते हैं। तब मैंने अभिषेक से पूछा था कि मेरी आत्मा का उद्देश्य इस सीन में क्या है, क्योंकि यह इतना भयानक सीन है। एक लड़की के लिए इस हालात में होना भयानक है। उन्होंने कहा कि एक बस एक निराशा के साथ आप को स्केप होना है। एक और सीन था, जिसमें वह छत की तरफ भागती हुई जाती है इस सोच से कि वह गुद जाएगी। मैं बहुत असहज थी उस हालात को लेकर। मैंने एक जानवर की तरह रिएक्ट किया। हमने पूरे दिन उसकी शूटिंग की। अंत में मुझे याद है कि पैकअप के बाद एक घंटे मेरे हाथ कांप रहे थे। उस सीन में मुझे मजा आया। इसमें आशाहीन होकर करने की पूरी कोशिश थी।

     ठीक इसी तरह ‘हाईवे’ के दौरान इम्तियाज अली से मिले अनुभव ने मुझे सींचा। मैं उसे शब्दों में बयान नहीं कर सकती। हर अगला सीन पिछले सीन से अधिक इंटरेस्टिंग रहता था। उसमें एक्टिंग नहीं करनी पड़ी थी। खुद के अतीत को जिया था। इम्तियाज के सीन रियल होते हैं। उस फिल्म को करते हुए लग रहा है कि मैं ही वीरा ही हूं। मुझे सबसे ज्यादा इमोशन पर ध्यान देना था। सच कहूं तो ऐसी फिल्म का मुझे कभी खयाल ही नहीं आया था। मैंने केवल भाषा और अन्य सामान्य चीजों की तैयारी की थी। बाकी सेट पर मैं खाली स्लेट की तरह गई थी। मैंने एक्टिंग की खास ट्रेनिंग नहीं ली थी। पहली फिल्म में करण से ट्रेनिंग मिली और इसमें इम्तियाज सर से मिल रही है। मेरी ट्रेनिंग आगे बढ़ गई है। मैं सेट पर ही खुद को तैयार करती हूं। भूल होती है तो डायरेक्टर सुधार देते हैं। मैं क्ले हूं और डायरेक्टर आर्टिस्ट हैं। वे मुझे जिस रूप में बदल दें। मैं तैयारी में ज्यादा यकीन नहीं करती।मैं कहीं भी सो सकती हूं। कहीं भी लेट सकती हूं। मुझे कुछ भी गंदा नहीं लग रहा। बाल खराब हो जाएंगे। कपड़े मैले हो जाएंगे। इन बातों की फिक्र ही नहीं है। मैं हूं ही ऐसी।

     मैं सफलता को सिर न चढऩे भी नीं देती। हालांकि ग्लैमर जगत में काम करने वालों के लिए अहंकारी बनने के आसार ज्यादा रहते हैं। वजह प्रशंसकों से मिलने वाला बेशुमार प्यार। उनसे मिलने वाली तारीफ आप का दिमाग खराब कर सकती है। लिहाजा मैं खुद को स्टार की तरह नहीं देखती हूं। मैं यहां अपना काम कर रही हूं। कोई मुझ पर एहसान नहीं कर रहा है। साथ ही मैं एक्टिंग कर किसी पर एहसान नहीं कर रही हूं। मैं सिर्फ एक सम्मान चाहती हूं। कम समय में स्टारडम से उत्साहित होना गलत है। मैं कभी अपनी असफलता को दिल में जगह नहीं दूंगी, क्योंकि मुझे पता है कि वह मुझे बदल सकता है। असफलता के साथ सफलता भी आप को नकारात्मक शक्ल दे सकती है। मैं उसी हिसाब से सोच कर काम करती हूं। स्टारडम कभी मुझ पर हावी नहीं होगा। कभी हुआ भी तो मेरे पिता मुझे संभाल लेंगे।

     पहले जब आप बच्चे होते हो तो टीवी में दिखते हो। मुझे नहीं पता था कि सिनेमा सिनेमा है। मुझे केवल गोविंदा और करिश्मा कपूर नजर आते थे। वह दोनों रास्तों और बाकी जगहों पर नाच रहे हैं। सिनेमा से जुड़ी पहली याद तो वही थी। उससे पहले कार्टून थे। मेरे लिए सिनेमा हिंदी फिल्म इंडस्ट्री है। मैं केवल इसके बारे में बात करूंगी। हां। उसकी जो स्कोप है। जो लार्जर देन लाइफ अहसास है वह मुझे काम करने के बाद महसूस हुआ। मुझे पता चला कि क्या क्या हो सकता है। खासकर अभी। अभी मैं सिनेमा को लेकर ओपन हुई हूं। अब मैं हिंदी फिल्मों के अलावा हॅालीवुड की फिल्में भी देखती हूं। अब मैं पहले से ज्यादा हॅालीवुड, फ्रेंच और मराठी सिनेमा देख रही हूं। अभी मैंने ‘सैराट’ देखी। मुझे यह बहुत ज्यादा पसंद आयी। मैं बहुत सुरक्षित होकर कह सकती हूं कि सिनेमा मेरा पहला प्यार है।मेरे लिए सबसे कंफर्ट सिनेमा है। मैं महसूस करती हूं कि हमारी पीढ़ी के साथ चलते चलते सिनेमा और अधिक विकसित हो रहा है। पता नहीं भविष्य में क्या होगा।

     जब आप देखते हो कि सारी दुनिया आइडिया और परफॉर्म  के स्तर पर ऐसा काम कर रही है। हिंदी सिनेमा में आकर आप को अलग तरीके से सारी चीजें करनी प़ड़़ती है वह कितना संघर्षशील रहता है। इस सवाल के जवाब में आलिया कहती हैं, ‘आप कोई भी फिल्म जैसे गोलमाल या बजरंगी भाई जान कर रहे हो, उसे भी आप पूरी शिद्दत के साथ करोंगे। वह भी किरदार है। वह किरदार मुश्किल है। मैं नहीं मानती कि यह परफॉरमेंस का हिस्सा नहीं है। कॅामेडी मुझे सबसे ज्यादा कठिन लगता है। इंटेस कठिन है ही। पर कॅामेडी सबसे अधिक मुश्किल है। आप दूसरे लोगों से प्रभावित होने के लिए उन्हें देखते हैं। हम सोचते हैं कि यह इस तरह का काम कर रहे हैं तो शायद हमें भी मेहनत करनी पड़ेगी।अगर ऐसे डांस करें तो मुझे बेहतर करना है। एक मासूमियत है मेहनत है। किसी का एक्शन अच्छा लगा। मुझे लगता है कि जितना एक्सपोज करोगे। हालांकि आप की खुद की एक प्रेरणा होनी चाहिए।‘

     मुझे हिंदी फिल्मों की ढेर सारी चीजें रिझाती हैं। मेरे ख्याल से काम करने का तरीका हिंदी फिल्म इंडस्ट्री का अच्छा लगता है। एक परिवार सा है। शायद हॅालीवुड या कहीं औऱ यह टेक्‍निकल है। वहां निर्देशक या एक्टर लोग साथ में बैठकर खाना नहीं खाते। साथ में बैठकर बात नहीं करते हैं। मैंने अपने परिवार में देखा है कि निर्माता अपना घऱ गिरवी रखकर फिल्म बनाते हैं। वह करो या मरो वाली स्थिति होती है। जिस पैशन और जिस प्यार के साथ हिंदी फिल्म बनती है वह कहीं और नहीं बन सकती है। यह मुझे सबसे खास लगता है। रहा सवाल कमी का तो यहां लेखकों की कमी है। स्क्रीनप्ले की कमी है। एक लॅाजिक की कमी है। बहुत होता है। यही सबसे आकर्षण वाली चीज है कि जब मुझे कोई कहता है कि आलिया तुम इतने अलग अलग किरदार कैसे निभा रही हो। मैं कहती हूं कि एक्टर को वही करना चाहिए ना। यह मुझे आकर्षित करता है कि लोग अलग अलग किरदार को नया समझते हैं। वह यह नहीं मानते कि एक्टर का काम एक ही पार्ट नहीं बल्कि नया नया पा

     मैं बचपन से शांत रही हूं। मैंने कभी शैतानी नहीं की। बचपन में कभी किसी को तंग नहीं किया। मुझे आम लड़कियों की तरह लिपस्टिक या पाउडर लगाने का शौक नहीं था। मां ही कभी कभार फेसपैक लगाने को बोलती थी। हफ्ते में एक बार बालों में तेल लगाती थी। कभी-कभी मॉम चुपके से भी तेल डाल देती थी। हालांकि छोटी होने के बावजूद मैं अपने पहनने-ओढऩे को लेकर बेहद सजग रहती थी। मैं खूब खेलती थी। मेरे परिजन भी कहा करते थे कि बचपन का पूरा लुत्फ ले लो। हां अभिनेत्री बनने के बाद खान-पान की आदतों पर अंकुश रख रही हूं।

     मेरी मॉम बहुत अंडरस्टैंडिंग रही हैं। उनकी खासियत है कि वे सामने वाले को बातचीत में बेहद सहज कर देती हैं। जिससे तालमेल बेहतर हो जाता है। मैंने उनसे यह चीज सीखी है। वे पूरे परिवार को साथ लेकर चलती हैं। वह परिवार में सभी की भावनाओं की कद्र करती है। दूसरी चीज कि वह बहुत अनुशासित हैं। हर शाम को टहलने जाती है। स्वीमिंग और योग करती है। खानपान का ध्यान रखती हैं। हर कोई कुछ पलों को इंज्‍वाय करना चाहता है। उसमें भी सहयोग करती हैं। उनकी जिंदगी बेहद संतुलित है। इसका श्रेय मेरे नाना-नानी को भी जाता है। दोनों बहुत अनुशासित और हेल्दी लाइफ जीते हैं। यही चीजें मैं उनसे सीख रही हूं। इसके अलावा उनकी समय पर आने की सीख का मैं हमेशा ध्यान रखती हूं। बाकी हमारा रिश्ता टिपिकल मॉम बेटी का ही है। मॉम बेवजह रोक-टोक नहीं करती। मैं मेरी बहन और मॉम तीनों साल में एक बार छुट्टियां मनाने विदेश जाते हैं। वहां हम दोस्तों की तरह खूब मस्ती करते हैं। मैं उनसे निजी और प्रोफेशनल हर प्रकार की बातें शेयर करती हूं। वे लिबरल मॉम हैं। वे सचेत भी करती रहती हैं। कहती रहेंगी कि अगर देर हो जाए मुझे सूचित कर दिया करो। ताकि किसी समस्या में फंसी तो वे वहां मदद के लिए पहुंच सकेंगी। यह भी कि रात में बारह बजे ऑटो से चलने की जरूरत नहीं। वे खुद लेने आ जाएंगी। खुद की सुरक्षा के लिए यह जरूरी है। फ्रीडम के साथ जिम्मेदारी भी आती है। उन्होंने यह बात मुझे भली-भांति सिखाया है।


      



Friday, June 17, 2016

फिल्‍म समीक्षा : उड़ता पंजाब

-अजय ब्रह्मात्‍मज
(हिंदी फिल्‍म के रूप में प्रमाणित हुई उड़ता पंजाब की मुख्‍य भाषा पंजाबी है। एक किरदार की भाषा भोजपुरी है। बाकी संवादों और संभाषणों में पंजाबी का असर है।)
विवादित फिल्‍मों के साथ एक समस्‍या जुड़ जाती है। आम दर्शक भी इसे देखते समय उन विवादित पहलुओं पर गौर करता है। फिल्‍म में उनके आने का इंतजार करता है। ऐसे में फिल्‍म का मर्म छूट जाता है। उड़ता पंजाब और सीबीएफसी के बीच चले विवाद में पंजाब,गालियां,ड्रग्‍स और अश्‍लीलता का इतना उल्‍लेख हुआ है कि पर्दे पर उन दृश्‍यों को देखते और सुनते समय दर्शक भी जज बन जाता है और विवादों पर अपनी राय कायम करता है। फिल्‍म के रसास्‍वादन में इससे फर्क पड़ता है। उड़ता पंजाब के साथ यह समस्‍या बनी रहेगी।
उड़ता पंजाब मुद्दों से सीधे टकराती और उन्‍हें सामयिक परिप्रेक्ष्‍य में रखती है। फिल्‍म की शुरूआत में ही पाकिस्‍तानी सीमा से किसी खिलाड़ी के हाथों से फेंका गया डिस्‍कनुमा पैकेट जब भारत में जमीन पर गिरने से पहले पर्दे पर रुकता है और उस पर फिल्‍म का टायटल उभरता है तो हम एकबारगी पंजाब पहुंच जाते हैं। फिल्‍म के टायटल में ऐसी कल्‍पनाशीलता और प्रभाव दुर्लभ है। यह फिल्‍म अभिषेक चौबे और सुदीप शर्मा के गहरे कंसर्न और लंबे रिसर्च का परिणाम है। कहना आसान है कि फिल्‍म डाक्‍यूमेंट्री का फील देती है। जब आप हिंदी फिल्‍मों की प्रचलित प्रेम कहानी से अलग जाकर सच्‍ची घटनाओं और समसामयिक तथ्‍यों को संवादों और वास्‍तविक चरित्रों को किरदारों में बदलते हैं तो इस प्रक्रिया में कई नुकीले कोने छूट जाते हें। वे चुभते हैं। और यही ऐसी फिल्‍मों की खूबसूरती होती है। हो सकता है कि पंजाब के दर्शकों का फिल्‍म देखते हुए कोई हैरानी नहीं हो,लेकिन बाकी दर्शकों के लिए यह हैरत की बात है। कैसे देश का एक इलाका नशे की गर्त में डूबता जा रहा है और हम उसे नजरअंदाज करना चाहते हैं। बेखबर रहना चाहते हैं। अगर एक फिल्‍मकार साहस करता है तो सरकारी संस्‍थाएं अड़ंगे लगाती है।
उड़ता पंजाब टॉमी सिंह(शाहिद कपूर),बिहारिन मजदूर(आलिया भट्ट,सरताज(दिलजीत दोसांझ),प्रीत सरीन(करीना कपूर खान) और अन्‍य किरदारों से गुंथी पंजाबी सरजमीन की कहानी है। उड़ता पंजाब में सरसों के लहलहाते खेत और भांगड़ा पर उछलते-कूदते और बल्‍ले-बल्‍ले करते मुंडे और कुडि़यां नहीं हैं। इस फिल्‍म में हिंदी फिल्‍मों और पॉपुलर कल्‍चर से ओझल पंजाब है। ड्रग्‍स के नशे में डूबा और जागरुक होता पंजाब है। उड़ता पंजाब पंजाब की सच्‍ची झलक पेश करती है। वह निगेटिव या पॉजीटिव से ज्‍यादा जरूरी है। फिल्‍मों का काम सिर्फ गुदगुदाना ही तो नहीं है। झिंझोरना और अहसास करना भी तो है। उड़ता पंजाब में अभिषेक चौबे कुछ सीमाओं के साथ सफल रहते हैं। निश्चित ही इसमें उन्‍हें सहयोगी लेखक सुदीप शर्मा,संगीतकार अमित त्रिवेदी,गीतकार शेली,शिवकुमार बटालवी और वरूण ग्रोवर व अन्‍य तकनीकी टीम से पूरी मदद मिली है।
शाहिद कपूर ने टॉमी सिंह की उलझनों को अच्‍छी तरह पर्दे पर उतारा है। शाहिद लगातार किरदारों का आत्‍मसात करने और उन्‍हें निभाने में अपनी हदें तोड़ रहे हैं। इस फिल्‍म में उनका किरदार परिस्थितियों में फंसा और जूझता गायक है,जो लोकप्रियता की खामखयाली में उतराने के बाद धप्‍प से खुरदुरी जमीन पर गिरता है तो उसे अपनी गलतियों का अहसास होता है। वह संभलता और अहं व अहंकार से बाहर निकल कर किसी और के लिए पसीजता है। शाहिद कपूर की मेहनत सफल रही है। किरदार की अपनी दुविधाएं हैं,जो लेखक और निर्देशक की भी हैं। बिहारिन मजदूर के रूप में आलिया भट्ट की भाषा और बॉडी लैंग्‍वेज की कमियां ईमानदार कोशिश से ढक जाती है। भोजपुरी बोलने में लहजा परफेक्‍ट नहीं है और बॉडी लैंग्‍वेज में हल्‍का सा शहरीपन है। फिर भी आलिया की इस कोशिश की तारीफ करनी होगी कि वह किरदार में ढलती हैं। दिलजीत दोसांझ पुलिस अधिकारी की भूमिका में सहज और स्‍वाभाविक हैं। उनके बॉस के रूप में आए कलाकार मानव भी ध्‍यान खींचते हैं। लंबे समय के बाद सतीश कौशिक का सदुपयोग हुआ है। इस फिल्‍म में प्रीत सरीन के किरदार पर दूसरे किरदारों की तरह ध्‍यान नहीं दिया गया है। प्रीत और सरताज की बढ़ती अनुभूतियों और नजदीकियों में भी लेखक-निर्देशक नहीं रमे हैं। यही कारण है कि जब-जब कहानी शाहिद-आलिया के ट्रैक से जब दिलजीत-करीना के ट्रैक पर शिफ्ट करती है तो थोड़ी सी फिसल जाती है।
अच्‍छी बात है कि उड़ता पंजाब में ड्रग्‍स और नशे को बढ़ावा देने वाले दृश्‍य नहीं है। डर था कि फिल्‍म में उसे रोमांटिसाइज न कर दिया गया हो। फिल्‍म के हर किरदार की व्‍यथा ड्रग्‍स के कुप्रभाव के प्रति सचेत करती है। महामारी की तरह फैल चुके नशे के कारोबार में राजनीतिज्ञों,सरकारी महकमों,पुलिस और समाज के आला नागरिकों की मिलीभगत और नासमझी को फिल्‍म बखूबी रेखांकित और उजागर करती है।
गीत-संगीत उड़ता पंजाब का खास चमकदार और उल्‍लेखनीय पहलू है। अमित त्रिवेदी ने फिल्‍म की कथाभूमि के अनुरूप संगीत संजोया है।
(फिल्‍म की मुख्‍य भाषा इसकी लोकप्रियता में अड़चन हो सकती है। मुंबई में पंजाबी के अंग्रेजी सबटायटल थे। क्‍या हिंदी प्रदेशों में हिंदी सबटायटल रहेंगे?)
अवधि- 148 मिनट
स्‍टार- चार स्‍टार

Thursday, October 22, 2015

फिल्‍म समीक्षा - शानदार




नहीं है जानदार
शानदार
-अजय ब्रह्मात्‍मज
    डेस्टिनेशन वेडिंग पर फिल्‍म बनाने से एक सहूलियत मिल जाती है कि सभी किरदारों को एक कैशल(हिंदी में महल या दुर्ग) में ले जाकर रख दो। देश-दुनिया से उन किरदारों का वास्‍ता खत्‍म। अब उन किरदारों के साथ अपनी पर्दे की दुनिया में रम जाओ। कुछ विदेशी चेहरे दिखें भी तो वे मजदूर या डांसर के तौर पर दिखें। शानदार विकास बहल की ऐसी ही एक फिल्‍म है,जो रंगीन,चमकीली,सपनीली और भड़कीली है। फिल्‍म देखते समय एहसास रहता है कि हम किसी कल्‍पनालोक में हैं। सब कुछ भव्‍य,विशाल और चमकदार है। साथ ही संशय होता है कि क्‍या इसी फिल्‍मकार की पिछली फिल्‍म क्‍वीन थी,जिसमें एक सहमी लड़की देश-दुनिया से टकराकर स्‍वतंत्र और समझदार हो जाती है। किसी फिल्‍मकार से यह अपेक्षा उचित नहीं है कि वह एक ही तरह की फिल्‍म बनाए,लेकिन यह अनुचित है कि वह अगली फिल्‍म में इस कदर निराश करे। शानदार निराश करती है। यह जानदार नहीं हो पाई है। पास बैठे एक युवा दर्शक ने एक दृश्‍य में टिप्‍पणी की कि ये लोग बिहाइंड द सीन(मेकिंग) फिल्‍म में क्‍यों दिखा रहे हैं?’
    शानदार कल्‍पना और अवसर की फिजूलखर्ची है। यों लगता है कि फिल्‍म टुकड़ों में लिखी और रची गई है। इम्‍प्रूवाइजेशन से हमेशा सीन अच्‍छे और प्रभावशाली नहीं होते। दृश्‍यों में तारतम्‍य न‍हीं है। ऐसी फिल्‍मों में तर्क ताक पर रहता है,फिर भी घटनाओं का एक क्रम होता है। किरदारों का विकास और निर्वाह होता है। दर्शक किरदारों के साथ जुड़ जाते हैं। अफसोस कि शानदार में ऐसा नहीं हो पाता। जगिन्‍दर जोगिन्‍दर और आलिया अच्‍छे लगते हैं,लेकिन अपने नहीं लगते। उन की सज-धज पर पूरी मेहनत की गई है। उनके भाव-स्‍वभाव पर ध्‍यान नहीं दिया गया है। शाहिद कपूर और आलिया भट्ट अपने नकली किरदारों को सांसें नहीं दे पाते। वे चमकते तो हैं,धड़कते नहीं हैं। फिल्‍म अपनी भव्‍यता में संजीदगी खो देती है। सहयोगी किरदार कार्टून कैरेक्‍टर की तरह ही आए हैं। वे कैरीकेचर लगे हैं। लेखक-निर्देशक माडर्न प्रहसन रचने की कोशिश में असफल रहे हैं।
    फिल्‍म की कव्‍वाली,मेंहदी विद करण और सिंधी मिजाज का कैरीकेचर बेतुका और ऊबाऊ है। करण जौहर को भी पर्दे पर आने की आत्‍ममुग्‍धता से बचना चाहिए। क्‍या होता है कि फिल्‍म इंडस्‍ट्री के इतने सफल और तेज दिमाग मिल कर एक भोंडी फिल्‍म ही बना पाते हैं? यह प्रतिभाओं के साथ पैसों का दुरुपयोग है। फिल्‍म का अंतिम प्रभाव बेहतर नहीं हो पाया है। इस फिल्‍म में ऐसे अनेक दृश्‍य हैं,जिन्‍हें करते हुए कलाकारों को अवश्‍य मजा आया होगा और शूटिंग के समय सेट पर हंसी भी आई होगी,लेकिन वह पिकनिक,मौज-मस्‍ती और लतीफेबाजी फिल्‍म के तौर पर बिखरी और हास्‍यास्‍पद लगती है। शाहिद कपूर और आलिया भट्ट ने दिए गए दृश्‍यों में पूरी मेहनत की है। उन्‍हें आकर्षक और सुरम्‍य बनाने की कोशिश की है,लेकिन सुगठित कहानी के अभाव और अपने किरदारों के अधूरे निर्वाह की वजह से वे बेअसर हो जाते हैं। यही स्थिति दूसरे किरदारों की भी है। पंकज कपूर और शाहिद कपूर के दृश्‍यों में भी पिता-पुत्र को एक साथ देखने का सुख मिलता है। खुशी होती है कि पंकज कपूर आज भी शाहिद कपूर पर भारी पड़ते हैं,पर दोनों मिल कर भी फिल्‍म को कहीं नहीं ले जा पाते।
    लेखक-निर्देशक और कलाकरों ने जुमलेबाजी के मजे लिए हैं। अब जैसे आलिया के नाजायज होने का संदर्भ...इस एक शब्‍द में सभी को जितना मजा आया है,क्‍या दर्शकों को भी उतना ही मजा आएगा ? क्‍या उन्‍हें याद आएगा कि कभी आलिया भट्ट के पिता महेश भट्ट ने स्‍वयं को गर्व के साथ नाजायज घोषित किया था। फिल्‍मों में जब फिल्‍मों के ही लोग,किस्‍से और संदर्भ आने लगें तो कल्‍पनालोक पंक्‍चर हो जाता है। न तो फंतासी बन पाती है और न रियलिटी का आनंद मिलता है। मेंहदी विद करण ऐसा ही क्रिएटेड सीन है।
    शानदार की कल्‍पना क्‍लाइमेक्‍स में आकर अचानक क्रांतिकारी टर्न ले लेती है। यह टर्न थोपा हुआ लगता है। और इस टर्न में सना कपूर की क्षमता से अधिक जिम्‍मेदारी उन्‍हें दे दी गई है। वह किरदार को संभाल नहीं पातीं।
हां,फिल्‍म कुछ दृश्‍यों में अवश्‍य हंसाती है। ऐसे दृश्‍य कुछ ही हैं।
(घोड़ा चलाना क्‍या होता है ? हॉर्स रायडिंग के लिए हिंदी में घुड़सवारी शब्‍द है। उच्‍चारण दोष के अनेक प्रसंग हैं फिल्‍म में। जैसे कि छीलो को आलिया चीलो बोलती हैं।)
अवधि- 146 मिनट
स्‍टार- दो स्‍टार

अनुभव रहा शानदार - शाहिद कपूर




-अजय ब्रह्मात्‍मज
      उस दिन शाहिद कपूर झलक दिखला जा रीलोडेड के फायनल एपीसोड की शूटिंग कर रहे थे। तय हुआ कि वहीं लंच पर इंटरव्‍यू हो जाएगा। मुंबई के गोरेगांव स्थित फिल्मिस्‍तान स्‍टूडियो में उनका वैनिटी वैन शूटिंग फ्लोर के सामने खड़ा था।
       पाठकों को बता दें कि यह वैनिटी बैन किसी एसी बस का अदला हुआ रूप होता है। इसके दो-तिहाई हिस्‍से में स्‍टार का एकाधिकार होता है। एक-तिहाई हिस्‍से में उनके पर्सनल स्‍टाफ और उस दिन की शूटिंग के लिए बुलाए गए अन्‍य सहयोगी चढ़ते-उतरते रहते हैं। स्‍टार के कॉस्‍ट्यूम(चेंज के लिए) भी वहीं टंगे होते हें। अमूमन सुनिश्चित मेहमानों को इसी हिस्‍से के कक्ष में इंतजार के लिए बिठाया जाता है। स्‍टार की हामी मिलने के बाद बीच का दरवाजा खुलता है और स्टार आप के सामने अपने सबसे विनम्र रूप में रहते हैं। आखिर फिल्‍म की रिलीज के समय इंटरव्‍यू का वक्‍त होता है। स्‍टार और उनके स्‍टाफ को लगता है कि अभी खुश और संतुष्‍ट कर दिया तो सब कुछ ठीक हो जाएगा। इतनी बार चाय या काफी या ठंडा पूछा जाता है कि लगने लगता है कि अगर अब ना की तो ये जानवर समझ कर मुंह में कांड़ी डाल कर पिला देंगे।
         बहरहाल, उस दिन सब कुछ तय था। निश्चित समय से दस मिनट ज्‍यादा हुए होंगे कि बुला लिया गया। घुसने पर पहले शाहिद की पीठ दिखी। वे कुसर्भ्‍ पर बैठे थे। उनके साने टिफिन रखा था। टिफिन्‍ के डब्‍बों में सब्जियां और दाल थी। रोटी और चावल भी था। बताया गया था कि समय की तंगी की वजह से यह व्‍यवस्‍था की गई है। आप उनके लंच के समय बात कर लें। बात शुरू ही हुई थी कि उनकी मैनेजर भी आकर बैठ गई। अब यह नया सिलसिला है। स्‍टार के साथ बातचीत के समय उनके मैनेजर या पीआर टीम का कोई सदस्‍य बैठ जाता है। उनकी आप की हिंदी बातचीत में कोई रुचि नहीं होती। वे अपनी मोबाइल में उलझी रहती हैं और अपनी मौजूदगी मात्र से डिस्‍टर्ब कर रही होती हैं। सच कहें तो इंटरव्‍यू प्रेमालाप की तरह होते हैं। किसी तीसरे की मौजूदगी कुछ बातें पूछने और बताने से रह जाती हैं। आज का यह विवरण उस परिप्रेक्ष्‍य के लिए है,जिसमें स्‍टार के इंटरव्‍यू होते हैं। और हां,20 मिनट की इस बातचीत में पीआर की एक सदस्‍य तीन बार बताने आई कि आप का समय पूरा हो गया है। इस बातचीत के दौरान शाहिद ने अपना डायट फूड भी खत्‍म किया,क्‍योंकि उन्‍हें शूट के लिए फ्लोर पर जाना था।
          शादी के बाद शाहिद कपूर के जीवन में सबसे बड़ा फर्क यही आया है कि लंच में उनके लिए घर से टिफिन आता है। शाहिद टिफिन के डब्‍बों की तरफ इशारा करते हुए कहते हैं,’ इससे पहले की आप शादी के बारे में पूछें। मैं ही बता देता हूं कि अब घर से टिफिन आता है। डायटिशियन के सुझाव के अनुसार ही सब कुछ तैयार किया जाता है। स्‍वाद और वैरायटी मिल रही है। इसके साथ ही शूटिंग के बाद घर लौटने पर बात करने के लिए कोई रहता है। अच्‍छी बात है कि मीरा का फिल्‍मों से कोई ताल्‍लुक नहीं है। हमलोग कुछ और बातें करते हैं। इस बातचीत में ही हम एक-दूसरे को समझ रहे होते हैं। करीब आ रहे होते हैं।‘

      ‘शानदार’ की बात चलने पर शाहिद कपूर बताते हें,’ विकास बहल से मेरी मुलाकात ‘कमीने’ के समय हुई थी। तब वे डायरेक्‍श्‍न में नहीं आए थे। इस बीव वे डायरेक्‍शन में आ गए। उन्‍होंने पहले एक छोटी फिल्‍म और फिर क्‍वीन निर्देशित की। उनकी क्‍वीन बेहद सफल रही,लेकिन मैं बता दूं कि मैंने शानदार उनकी क्‍वीन की सफलता के पहले ही साइन कर ली थी। विकास में अलग सी एनर्जी और उत्‍साह है। आप उन्‍हें ना नहीं कह सकते। उन्‍होंने बताया था कि उन्‍हें डेस्टिनेशन वेडिंग पर एक मजेदार फिल्‍म करनी है। मुझे उनका आयडिया पसंद आया और मैंने हां कर दी। हिंदी में इस कंसेप्‍ट पर बनी यह अनोखी फिल्‍म है। हिंदी सिनेमा की सभी खासियतों को विकास ने बड़े स्‍केल पर शूट किया है। मौज-मस्‍ती और नाच-गाना सब कुछ है। पूरी फिल्‍म में पार्टी ही चलती रहती है। इसमें मेरे साथ प्रतिभाशाली आलिया भट्ट हैं। यह फिल्‍म मेरे लिए खास है,क्‍योंकि इसमें मेरे पिता पंकज कपूर और मेरी बहन सना कपूर भी हैं। उन सभी के साथ होने से शानदार यादगार फिल्‍म हो गई है।‘
      शाहिद कपूर की फिल्‍मों के चुनाव में एक बदलाव दिख रहा है। वे स्‍पष्‍ट कहते हैं,’पिछले सालों में मैं प्रयोग कर रहा था। हर तरह की फिल्‍मों में हाथ आजमा रहा था। यही चाहत थी कि सफल रहूं। फिर एहसास हुआ कि इस कोशिश में मैं कई चीजें खो रहा हूं और कहीं पहुंच नहीं पा रहा हूं। विशाल भारद्वाज के साथ कमीने करते समय जैसी एकाग्रता और ऊर्जा रहती थी... उसकी कमी महसूस हो रही थी। फिर हैदर आई। उसके बाद सब कुछ तय हो गया। मन की दुविधा और बेचैनी खत्‍म हो गई। मैंने समझ लिया कि सफलता के लिए कोई फिल्‍म नहीं करनी है। वही फिल्‍म करनी है,जहां सुकून मिले और काम करने से संतुष्टि हो। शानदार भी ऐसी ही फिल्‍म है। इसके बाद उड़ता पंजाब आएगी। एके वर्सेस एसके की भी शूटिंग चल रही है। मैंने यह दाढ़ी रंगून के लिए बढ़ा रखी है। विशाल सर ने मुझे कहा कि दाढ़ी बढ़ाओ। देखें फायनली क्‍या लुक मिलता है?’ शाहिद कपूर इन दिनों घनी दाढ़ी में ही हर जगह दिख रहे हैं।
     इस फिल्‍म में शाहिद आने पिता पंकज कपूर के साथ दिखेंगे। पिता के बारे में पूछने पर वे जवाब देते हैं,’ शानदार में डैड के साथ अच्‍छा अनुभव रहा। डैड इतने बड़े एक्‍टर हैं। विकास ने हम दोनों के बीच कुछ मजेदार सीन रखे हैं। ट्रेलर में तो अभी झलक मात्र मिली है। डैड के मुकाबले मैं कहीं नहीं हूं। बाकी,इस फिल्‍म के दृश्‍यों में उनके सामने वह सब विकास ने मुझ से करवाया,जो मैं अपने डैड के सामने जिंदगी में कभी नहीं कर सकता। डैड ने भी खूब मजे लिए।‘  

Friday, July 11, 2014

फिल्‍म समीक्षा : हंप्‍टी शर्मा की दुल्‍हनिया

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
हिदी फिल्मों की नई पीढ़ी का एक समूह हिंदी फिल्मों से ही प्रेरणा और साक्ष्य लेता है। करण जौहर की फिल्मों में पुरानी फिल्मों के रेफरेंस रहते हैं। पिछले सौ सालों में हिंदी फिल्मों का एक समाज बन गया है। युवा फिल्मकार जिंदगी के बजाय इन फिल्मों से किरदार ले रहे हैं। नई फिल्मों के किरदारों के सपने पुरानी फिल्मों के किरदारों की हकीकत बन चुके हरकतों से प्रभावित होते हैं। शशांक खेतान की फिल्म 'हंप्टी शर्मा की दुल्हनिया' आदित्य चोपड़ा की फिल्म 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' की रीमेक या स्पूफ नहीं है। यह फिल्म सुविधानुसार पुरानी फिल्म से घटनाएं लेती है और उस पर नए दौर का मुलम्मा चढ़ा देती है। शशांक खेतान के लिए यह फिल्म बड़ी चुनौती रही होगी। उन्हें पुरानी फिल्म से अधिक अलग नहीं जाना था और एक नई फिल्म का आनंद भी देना था।
चौधरी बलदेव सिंह की जगह सिंह साहब ने ले ली है। अमरीश पुरी की भूमिका में आशुतोष राणा हैं। समय के साथ पिता बदल गए हैं। वे बेटियों की भावनाओं को समझते हैं। थोड़ी छूट भी देते हैं, लेकिन वक्त पडऩे पर उनके अंदर का बलदेव सिंह जाग जाता है। राज मल्होत्रा इस फिल्म में हंप्टी शर्मा हो गया है। मल्होत्रा बाप-बेटे का संबंध यहां भी दोहराया गया है। हंप्टी लूजर है। सिमरन का नाम काव्या हो गया है। उसमें गजब का एटीट्यूड और कॉन्फिडेंस है। वह करीना कपूर की जबरदस्त फैन है। काव्या की शादी आप्रवासी अंगद से तय हो गई है। पुरानी फिल्म का कुलजीत ही यहां अंगद है। शादी के ठीक एक महीने पहले काव्या मनीष मल्होत्रा का डिजायनर लहंगा खरीदना चाहती है, जो करीना कपूर ने कभी पहना है। अंबाला में वैसा लहंगा नहीं मिल सकता, इसलिए वह दिल्ली आती है। दिल्ली में हंप्टी और काव्या की मुलाकात होती है। पहली नजर में प्रेम होता है और 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' की कहानी थोड़े फेरबदल के साथ घटित होने लगती है।
शशांक खेतान की फिल्म पूरी तरह से 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' पर आश्रित होने के बावजूद नए कलाकरों की मेहनत और प्रतिभा के सहयोग से ताजगी का एहसास देती है। यह शशांक के लेखन और फिल्मांकन का भी कमाल है। फिल्म कहीं भी अटकती नहीं है। उन्होंने जहां नए प्रसंग जोड़े हैं, वे चिप्पी नहीं लगते। 'हंप्टी शर्मा की दुल्हनिया' आलिया भट्ट के एटीट्यूड और वरुण धवन की सादगी से रोचक हो गई है। दोनों कलाकारों ने अपने किरदारों के मिजाज को अच्छी तरह निभाया है। वरुण के अभिनय व्यवहार में चुस्ती-फुर्ती है। वे डांस, एक्शन और रोमांस के दृश्यों में गति ले आते हैं। दूसरी तरफ आलिया ने इस फिल्म में काव्या की आक्रामकता के लिए बॉडी लैंग्वेज का सही इस्तेमाल किया है। खड़े होने के अंदाज से लेकर चाल-ढाल तक में वे किरदार की खूबियों का उतारती हैं। अलबत्ता कहीं-कहीं उनके चेहरे की मासूमियत प्रभाव कम कर देती है। लंबे समय के बाद आशुतोष राणा को देखना सुखद रहा। बगैर नाटकीय हुए वे आधुनिक पिता की पारंपरिक चिंताओं को व्यक्त करते हैं। हंप्टी शर्मा के दोस्तों की भूमिका में गौरव पांडे और साहिल वैद जंचते हैं। सिद्धार्थ शुक्ला अपनी पहली फिल्म में मौजूदगी दर्ज करते हैं।
शशांक खेतान की 'हंप्टी शर्मा की दुल्हनिया' हंसाती है। यह फिल्म रोने-धोने और बिछड़े प्रेम के लिए बिसूरने के पलों को हल्का रखती है। भिड़ंत के दृश्यों में भी शशांक उलझते नहीं हैं। यह फिल्म अंबाला शहर और दिल्ली के गलियों के उन किरदारों की कहानी है,जो ग्लोबल दौर में भी दिल से सोचते हैं और प्रेम में यकीन रखते हैं। शशांक खेतान उम्मीद जगाते हैं। अब उन्हें मौलिक सोच और कहानी पर ध्यान देना चाहिए।
अवधि: 134 मिनट
*** तीन स्‍टार

Friday, April 18, 2014

फिल्‍म समीक्षा : 2 स्‍टेट्स

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
अभिषेक वर्मन निर्देशित '2 स्टेट्स' आलिया भट्ट की तीसरी और अर्जुन कपूर की चौथी फिल्म है। दोनों फिल्म खानदान से आए ताजातरीन प्रतिभाएं हैं। उन्हें इंडस्ट्री और मीडिया का जबरदस्त समर्थन हासिल है। फिल्म की रिलीज के पहले प्रचार और प्रभाव से यह स्थापित कर दिया गया है कि दोनों भविष्य के सुपरस्टार हैं। वास्तव में दर्शकों के बीच स्वीकृति बढ़ाने के लिहाज से दोनों के लिए उचित माहौल बना दिया गया है। फिल्म देखते समय लेखक की समझ और निर्देशक की सूझबूझ से '2 स्टेट्स' अपेक्षाओं पर खरी उतरती है। साधारण होने के बावजूद फिल्म श्रेष्ठ लगती है।
अगर गानों की अप्रासंगिकता को नजरअंदाज कर दें तो पंजाबी कृष मल्होत्रा और तमिल अनन्या स्वामीनाथन की यह प्रेमकहानी बदले भारतीय समाज में अनेक युवा दंपतियों की कहानियों से मेल खाती है। विभिन्न प्रांतों,जातियों और संस्कृतियों के बीच हो रहे विवाहों में ऐसी अंतिर्निहित समस्याओं से दिक्कतें होती हैं। '2 स्टेट्स' में पाश्‌र्र्व संगीत और विभिन्न अवसरों के गीत की वजह से कुछ चीजें लार्जर दैन लाइफ और झूठ लगने लगती हैं। इसके अलावा अभिषेक वर्मन ने फिल्म की प्रस्तुति में चमक और चकाचौंध से बचने की पूरी कोशिश की है। आज के दौर में नायक का चश्मा लगाना ही निर्देशक की सोच को नई जमीन दे देता है। अभिषेक ने हीरो-हीरोइन के प्रणय (कोर्टशिप) में प्रचलित लटकों-झटकोंको नहीं अपनाया है। अगर वे गाने ठूंसने के व्यावसायिक दबाव से बच जाते तो फिल्म की सरलता गहरी हो जाती। कृष का अचानक 'लोचा-ए-उल्फत' गाना और उसके पीछे आईआईएम के छात्रों का नाचना फिल्मी लगने लगता है।
चेतन भगत के उपन्यास 'द स्टेट्स-द स्टोरी ऑफ माय मैरिज' नहीं पढ़े दर्शकों को बता दें कि यह अहमदाबाद केआईआईएम में पढ़ रहे पंजाब के कृष और तमिलनाडु की अनन्या की प्रेम कहानी है। दोनों शादी करना चाहते हैं, लेकिन दोनों के परिवारों की सांस्कृतिक अड़चनों की वजह से सामंजस्य नहीं बैठ पाता। सुशिक्षित प्रेमी युगल हिंदी फिल्मों का पुराना रास्ता नहीं अपनाते। यह 'दिल वाले दुल्हनिया ले जाएंगे' से प्रेरित पीढ़ी है, जो अपने माता-पिता के आशीर्वाद के बाद ही परिणय सूत्र में बंधना चाहती है। पंजाबी और तमिल परिवारों की परस्पर नासमझी, गलतफहमी और पूर्वाग्रहों से हास्यास्पद स्थितियां बनती हैं। लेखक-निर्देशक ने उन्हें शिष्ट रखा है।
अर्जुन कपूर ने कृष मल्होत्रा के किरदार को संयत तरीके से निभाया है। अभी तक की तीनों फिल्मों में उन्होंने थोड़े रूखे और आक्रामक किरदारों को निभाया था। इस बार विपरीत स्वभाव की भूमिका में उन्होंने खुद को सहज रखा है। बॉडी लैंग्वेज और संवाद अदायगी में उन्होंने अपना स्वर मद्धिम किया है। निश्चित ही उनके अभिनय में निखार आया है।
आलिया भट्ट एक बार फिर प्रभावित करती हैं। अनन्या स्वामीनाथन के किरदार को अपनी मासूमियत से वह अलग अंदाज तो देती हैं, लेकिन तमिल लड़की के रूप में वह संतुष्ट नहीं करतीं। उन्हें अपने लहजे और मुद्राओं पर ध्यान देना चाहिए था। तीसरी फिल्म में आलिया भट्ट अपनी सीमाएं भी जाहिर कर देती हैं। अभी तक दोनों फिल्मों में हम सभी ने आलिया भट्ट को देखा। पिछली दोनों फिल्मों में वह किरदारों में ढलने के बावजूद आलिया भट्ट ही रहीं, लेकिन अपने नएपन की वजह से अच्छी लगीं। '2 स्टेट्स' के नाटकीय दृश्यों में भावों की अभिव्यक्ति में वह खुद को ही दोहराती रहीं। अब उन्हें अभिनेत्री के तौर पर मंझना होगा और किरदारों के साथ बदलना होगा।
'2 स्टेट्स' के अंतिम प्रभाव को बढ़ाने में सहयोगी कलाकारों का जबरदस्त योगदान है। अमृता सिंह, रोनित राय, शिव सुब्रमण्यम और रेवती ने माता-पिता की भूमिकाओं में अपने परिवेश और परिवार की बारीकियों को भी व्यक्त किया है। हां, फिल्म के दृश्यों के अनुकूल संवाद नहीं हैं। संवादों में अर्थ और भाव की कमी है। फिल्म की प्रस्तुति का शिल्प भी एक बाधक है।
अवधि-129 मिनट
***1/2

Friday, February 21, 2014

फिल्‍म समीक्षा : हाईवे

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
हिंदी और अंग्रेजी में ऐसी अनेक फिल्में आ चुकी हैं, जिनमें अपहरणकर्ता से ही बंधक का प्रेम हो जाता है। अंग्रेजी में इसे स्टॉकहोम सिंड्रम कहते हैं। इम्तियाज अली की 'हाईवे' का कथानक प्रेम के ऐसे ही संबंधों पर टिका है। नई बात यह है कि इम्तियाज ने इस संबंध को काव्यात्मक संवेदना के साथ लय और गति प्रदान की है। फिल्म के मुख्य किरदारों वीरा त्रिपाठी (आलिया भट्ट) और महावीर भाटी (रणदीप हुड्डा) की बैकस्टोरी भी है। विपरीत ध्रुवों के दोनों किरदारों को उनकी मार्मिक बैकस्टोरी सहज तरीके से जोड़ती है। इम्तियाज अली की 'हाईवे' हिंदी फिल्मों की मुख्यधारा में रहते हुए भी अपने बहाव और प्रभाव में अलग असर डालती है। फिल्म के कई दृश्यों में रोंगटे खड़े हो जाते हैं। सच का सामना न होने से न केवल किरदार बल्कि दर्शक के तौर पर हम भी स्तब्ध रह जाते हैं। इम्तियाज ने आज के दौर में बच्चों की परवरिश की एक समस्या को करीब से देखा और रेखांकित किया है,जहां बाहर की दुनिया के खतरे के प्रति तो सचेत किया जाता है लेकिन घर में मौजूद खतरे से आगाह नहीं किया जाता।
वीरा की शादी होने वाली है। वह विरक्त भाव से शादी के विधि-विधानों में हिस्सा ले रही है। रात होते ही वह अपने मंगेतर के साथ तयशुदा सैर पर निकलती है। दमघोंटू माहौल से निकल कर उसे अच्छा लगता है। मानों उनकी नसें खुल रही हों और उनमें जीवन का संचार हो रहा हो। हाईवे पर वह अपराधी महावीर भाटी के हाथ लग जाती है। तैश और जल्दबाजी में वह वीरा का अपहरण कर लेता है। बाद में पता चलता है कि वीरा प्रभावशाली उद्योगपति एम के त्रिपाठी की बेटी है। अब महावीर की मजबूरी है कि वह वीरा को ढंग से ठिकाने लगाए। इस चक्कर में वह वीरा को लेकर एक अज्ञात सफर पर निकल पड़ता है। इस सफर में वीरा अपनी दुनिया के लोगों से कथित अपराधी महावीर की तुलना करती है। उसे इस कैद की आजादी तरोताजा कर रही है। वह लौट कर समृद्धि की आजादी में फिर से कैद नहीं होना चाहती। एक संवाद में वीरा के मनोभाव को सुंदर अभिव्यक्ति मिली है-जहां से आई हूं, वहां लौटना नहीं चाहती और जहां जाना है, वहां पहुंचना नहीं चाहती। यह सफर चलता रहे।
वीरा और महावीर दोनों विपरीत स्वभाव और पृष्ठभूमि के किरदार हैं। उनके जीवन की निजी रिक्तता ही उन्हें करीब लाती है। दोनों के आंतरिक एहसास के उद्घाटन के दृश्य अत्यंत मार्मिक और संवेदनशील हैं। स्पष्ट आभास होता है कि दुनिया जैसी दिखती है, वैसी है नहीं। वीरा जैसे अनेक व्यक्ति इस व्यवस्थित दुनिया की परिपाटी से निकलने की छटपटाहट में हैं। वीरा का बचपन उसे स्थायी जख्म दे गया है, जो महावीर की संगत में भरता है। वीरा उसके दिल पर जमी बेरुखी की काई हटाती है तो अंतस की निर्मलता छलक आती है। पता चलता है कि महावीर ऊपर से कठोर, निर्मम और निर्दयी है, लेकिन अंदर से नाजुक, क्षणभंगुर और संवेदनशील है।
इम्तियाज अली ने मुकेश छाबड़ा की मदद से सभी किरदारों के लिए उपयुक्त कलाकारों का चुनाव किया है। वीरा की भूमिका में आलिया भट्ट का प्रयास सराहनीय और प्रशंसनीय है। प्रयास इसलिए कि अभिनय अभी आलिया का स्वभाव नहीं बना है। उन्होंने अभी अभिनय का ककहरा सीखा है, लेकिन इम्तियाज अली के निर्देशन में वह परफॉरमेंस की छोटी कविता रचने में सफल रही है। कुछ दृश्यों में उनका प्रयास साफ दिखने लगता है। हिंदी फिल्मों में अभिनेत्रियां उत्तेजक दृश्यों में नथुने फुलाने लगती हैं। बहरहाल, आलिया भट्ट ने वीरा की जद्दोजहद और जिद को अच्छी तरह समझा और व्यक्त किया है। फिल्म में रणदीप हुड्डा चौंकाते हैं। भीतरघुन्ना मिजाज के नाराज व्यक्ति की पिनपिनाहट को उन्होंने सटीक ढंग से पेश किया है। दोनों ही कलाकारों के अभिनय ने फिल्म को असरकारी बना दिया है। सहयोगी कलाकारों दुर्गेश कुमार, सहर्ष कुमार शुक्ला और प्रदीप नागर ने फिल्म को पूर्णता दी है।
इम्तियाज अली की फिल्मों में गीत-संगीत का खास योगदान रहता है। इस फिल्म में भी इरशाद कामिल और ए आर रहमान की जोड़ी ने अपेक्षाएं पूरी की हैं। रहमान ने ध्वनि और इरशाद ने शब्दों से फिल्म के भाव को कथाभूमि में पिरो दिया है। 'सोचूं न क्या पीछे है, देखूं न क्या आगे है' में वर्तमान को जीने और समेटने का भाव बखूबी आया है। फिल्म की उल्लेखनीय खूबसूरती सिनेमैटोग्राफी है। हाल-फिलहाल में ऐसी दूसरी फिल्म नहीं दिखती, जिसमें देश के उत्तरी राज्यों की ऐसी मनोरम छटा फिल्म के दृश्यों के संगत में आई हो। अनिल मेहता ने इम्तियाज अली के रचे दृश्यों में प्रकृति के स्वच्छ रंग भर दिए हैं।
'हाईवे' में इम्तियाज अली ने संत कबीर के हीरा संबंधी तीन दोहों का इस्तेमाल किया है। उनमें से एक दोहा इस फिल्म के लिए समर्पित है।
हीरा पारा बाजार में रहा छार लपटाए।
केतिहि मूरख पचि मुए, कोई पारखी लिया उठाए।।
अवधि- 133 मिनट
**** चार स्‍टार 

Thursday, December 5, 2013

रणदीप हुडा : उलझे किरदारों का एक्‍टर


-अजय ब्रह्मात्मज
    रणदीप हुडा इम्तियाज अली की ‘हाईवे’ में रफ गूजर युवक महावीर भाटी की भूमिका निभा रहे हैं। ‘हाईवे’ रोड जर्नी फिल्म है। उनके साथ आलिया भट्ट हैं। इस फिल्म की शुटिंग 6 राज्यों में अनछुए लोकेशन पर हुई है।
    दिल्ली से हमारी यात्रा शुरू हुई थी और दिल्ली में ही खत्म हुई। इस बीच हमने छह राज्यों को पार किया। अपनी जिंदगी में मैंने देश का इतना हिस्सा पहले नहीं देखा था। हम ऐसी सूनी और एकांत जगहों पर गए हैं,जहां कभी पर्यटक नहीं जाते। फिल्म में हमारा उद्देश्य लोगों से दूर रहने का है। इम्तियाज ने इसी उद्देश्य के लिए हमें इतना भ्रमण करवाया है। लोकेशन पर पहुंचने में ही काफी समय निकल जाते थे। शूटिंग कुछ ही दृश्यों की हो पाती थी।
    यह पिक्चर जर्नी की है। इसमें किरदारों की बाहरी (फिजिकल) जर्नी के साथ-साथ भीतरी (इटरनल) जर्नी है। फिल्म के शुरू से अंत तक का सफर जमीन पर थोड़ा कम है। अंदरुनी यात्रा बहुत लंबी है। इस फिल्म में मैं दिल्ली के आस-पास का गूजर हूं, जो मेरे अन्य किरदारों के तरह ही परेशान हाल है। शायद निर्देशकों को लगता है कि मैं उलझे हुए किरदारों की आंतरिक कशमकश को अच्छी तरह निभा पाता हूं। यों मुझे भी जटिल किरदारों को निभाना अच्छा लगता है।
    करिअर की शुरुआत में लगता था कि फिल्म मेरे बारे में ही होनी चाहिए। मेरा ही केंद्रीय चरित्र होना चाहिए। अनुभवों से जाना कि अब कहानियां बदल गई हैं। फिल्म में किरदारों का महत्व बदल गया है। जरूरी है कि पर्दे पर आते ही किरदार की सच्चाई दिख जाए। मैं यही अप्रोच अपनाता हूं। दोस्तों की फिल्म हो तो रोल की लंबाई नहीं देखता।
    पिछले दो-तीन सालों से मेरे रवैए और बर्ताव में फर्क आया है। आप देखें तो शुरु के दस सालों में मैंने बमुश्किल दस फिल्में कीं, लेकिन पिछले तीन सालों में बारह फिल्में कर चुका हूं। बीच में इतने दिन घर बैठना पड़ा कि डर लगने लगा था। ऐसा लगा कि कहीं काम मिलना ही न बंद हो जाए। अब वह डर खत्म हो गया है। पिछले दिनों मेरे पिता जी कह रहे थे कि अब तू एक्टर हो गया है। अब तेरा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता है। तू बुड्ढा हो जाएगा तो भी एक्टर ही रहेगा।
    मैंने पहले ही बताया कि ‘हाईवे’ में मैं गूजर हूं। इस फिल्म में मेरा गेटअप और लुक ऐसा है कि कई बार अपनी ही यूनिट की सिक्युरिटी ने मुझे रोक दिया। बाद में इम्तियाज ने बुलाया तो सभी चौंके। लोगों को ध्यान नहीं रहता कि मैं एक्टर हूं। इस फिल्म का हीरो हूं। यह एक तरह से कंपलिमेंट है। ऐसा कभी हुआ तो मैं हुज्जत नहीं करता। बगल में जाकर बैठ जाता हूं।
    आलिया दिखने में नाजुक है। वह मेरी हीरोइन है। बहुत ही रिसेप्टिव है। सीखने में तेज है। भट्ट साहब से उसे कई गुण मिले हैं। मेरी ही तरह कहीं भी बैठ जाती है। कहीं भी लेट जाती है। इस किरदार में वह रम गई है। उसने बहुत बढिय़ा काम किया है। मैं और इम्तियाज तो पुराने ढीठ हैं। आलिया ने बहुत ही ईमानदारी से काम किया है। वह इम्तियाज के निर्देशों पर अमल करती है। मैंने अभी तक तो उसका कोई नाज-नखरा नहीं देखा। एक बात याद रखें कि वह भट्ट साहब का ही खून है। मिजाज और अप्रोच में भट्ट साहब और पूजा भट्ट से बहुत अलग नहीं है। हां, थोड़ी शांत और गंभीर है। उनसे सॉफ्ट है। उम्र बढऩे के साथ उनकी तरह बेपरवाह भी हो जाएगी।
    मुझे इम्तियाज ने बताया कि वे बहुत पहले से मेरे साथ काम करने को इच्छुक थे। स्क्रिप्ट और संयोग नहीं बन पा रहा था। मुझे लगता है कि अभी के दौर में उनकी तरह कोई भी लव स्टोरी नहीं बनाता। मैं इस कायनात का शुक्रगुजार हूं कि इम्तियाज ने ‘हाईवे’ में मुझे चैलेंजिंग रोल दिया है। वे बहुत ही सुलझे और सज्जन व्यक्ति हैं। संगीत, संवाद, लय और विषय की अच्छी पकड़ रखते हैं। मैंने उन्हें मॉनीटर पर बहुत कम देखा है। उनकी फिल्में कैरेक्टर ड्रिवेन और रियलिस्टिक अप्रोच की होती है। इसी कारण दर्शकों को उनकी फिल्में पसंद आती हैं।

Thursday, June 6, 2013

‘हाईवे’ के हमसफर वीरा और महावीर

Imtiaz Ali Shooting for Highway at Aru Valley, Kashmir, 11-05-2013.jpg.jpg
-अजय ब्रह्मात्मज
    ‘हाईवे’ के हमसफर हैं वीरा त्रिपाठी और महावीर भाटी। दोनों अलग मिजाज के हैं, लेकिन इस सफर में साथ हैं। कुछ मजबूरियां हैं कि उनके रास्ते जुदा नहीं हो सकते। साथ-साथ चलते हुए उन्होंने देश के छह राज्यों के रास्ते नापे हैं। वे अनेक शहरों, कस्बों और गांवों से गुजर रहे हैं। दिल्ली की वीरा त्रिपाठी आभिजात्य परिवार की अमीर लडक़ी है। समझने की बात तो दूर रही,अभी उसने ठीक से दुनिया देखी ही नहीं है। दूसरी तरफ महावीर भाटी है। वह गूजर है। आपराधिक पृष्ठभूमि के महावीर को दुनिया के सारे गुर मालूम हैं। वह चालाक और दुष्ट भी है। दो विपरीत स्वभाव के किरदारों की रहस्यमय यात्रा की कहानी है ‘हाईवे’। इसे इम्तियाज अली डायरेक्ट कर रहे हैं और  निर्माता हैं साजिद नाडियाडवाला।
    वीरा त्रिपाठी और महावीर भाटी से हमारी मुलाकात पहलगाम में हो गई। पहलगाम से 16 किलोमीटर दूर है अरू घाटी। अरू घाटी में उपर पहाडिय़ों पर दोनों के मौजूद होने की खबर मिली थी। स्थानीय गाइड और सहायकों की मदद से घोड़े पर सवार होकर ऊपर पहुंचना था। दो दिन पहले बारिश हो जाने से फिसलन बढ़ गई थी। कीचड़ तो पूरे भारत में बेहिसाब मिलती है। यहां भी थी। घोड़ों को भी संभल कर चलना पड़ रहा था। बारिश होने से वादी धुल गई थी। हरियाली कुछ और हरी हो गई थी। पहाड़ों के शिखरों से लिपटी बर्फ दूधिया हो गई थी। बहरहाल, ऊपर पहुंचने पर हमें पहले बकरवाल समुदाय के सदस्य दिखे। यह काश्मीर की ऐसी घुमंतू जाति हैं, जो पूरे कुनबे के साथ मौसम के हिसाब से टहलती रहती है। अपनी भेड़ों और जानवरों के लिए चारे की तलाश में इस समुदाय के सदस्य कहीं भी डेरा डाल देते हैं। प्रकृति ही उनका घर-आंगन है।
    Alia Bhatt Shooting for Highway at Aru Valley, Kashmir, 9-05-2013.jpg.jpgढलान की एक जगह पर लकड़ी के मोटे कुंदों के ऊपर मिट्टी की बनी चौरस छतों के नीचे भी कुछ लोग रहते हैं। ऐसी ही एक जगह पर वीरा त्रिपाठी और महावीर भाटी की सांसें एक पेड़ के नीचे टहल रही थीं। उन सांसों की धमक के सहारे आगे बढऩे पर अविश्वसनीय दृश्य दिखा। एक पेड़ के सहारे वीरा त्रिपाठी अधलेटी सोई हुई थी। उसने लबादा पहन रखा था। उसके पांवों के पास घुटने मोड़ महावीर भाटी भी लेटा था। फटे चिथड़ों में वह थका उद्विग्न दिख रहा था। चारों तरफ की चहल-पहल से बेसुध दोनों दो पल का आराम ले रहे थे। हम विस्फारित नयनों से हिंदी फिल्मों के दो स्टारों को ऐसी अप्रत्याशित स्थिति में देख रहे थे। मुंबई में अमूमन सारे स्टार एयरकंडीशंड स्टूडियों में शूटिंग करते हैं। बीच में कभी आराम करना हो या खाली बैठना हो तो आरामदेह वैनिटी वैन रहता है। पहलगाम में अरू की घाटियों में दुनिया से बेखबर लेटे आलिया भट्ट और रणदीप हुडा को देखकर घोर आश्चर्य हुआ। पता चला कि पिछले कई दिनों से वे भी घोड़े पर चढक़र ऊपर घाटियों में आते हैं। बैठने के लिए किसी बड़े पत्थर का सहारा लेते हैं। लेटने और सोने के लिए खुले आकाश के नीचे की खुरदुरी पथरीली जमीन रहती है। धूप की गुनगुनाहट उन्हें हल्की ठंड में नरमी और गरमी देती है। वे भी घुमंतू हो गए हैं।
    अब तक आप समझ ही गए होंगे कि इम्तियाज अली की आगामी फिल्म ‘हाईवे’ की शूटिंग पिछले दिनों काश्मीर के पहलगाम में चल रही थी। वीरा त्रिपाठी और महावीर भाटी के किरदानों को निभा रहे आलिया भट्ट और रणदीप हुडा विषम परिस्थितियों में ‘हाईवे’ की शूटिंग करते हुए खुश और संतुष्ट थे। न चेहरे पर कोई शिकन और न होंठो पर कोई शिकायत। हरियाणा के कस्बे में पले-बढ़े रणदीप हुडा को तो ऐसे कठोर जीवन का अनुभव रहा है, लेकिन महेश भट्ट की बेटी आलिया भट्ट को ऐसे हालात में खुश देख कर बेचैन आश्चर्य हो रहा था। मुंबई के जुहू इलाके में पली मैट्रो गर्ल आलिया भट्ट को जिंदगी में पहली बार धरती पर लेटने का मौका मिला था। हाथ-पांव और बालों में धूल, मिट्टी और पत्ते चिपक रहे थे। उन्हें कोई परेशानी नहीं थी।
    इम्तियाज अली के किरदार उन दिनों यात्रा करते हुए काश्मीर पहुंच गए थे। उनकी मुलाकात बकरवाल समुदाय के सदस्यों से हो गई थी। आगे बढऩे से पहले वे कुछ समय वहीं बिता रहे थे। इस समुदाय के बच्चों के साथ वे दोनों भी खुश और आह्लादित नजर आ रहे थे। इम्तियाज अली को काश्मीर विशेष रूप से प्रिय है। उनकी हर फिल्म में काश्मीर के नजारे दिखाई पड़ते हैं। इस बार भी उनके किरदार सफर में हैं, लेकिन यह यात्रा पहले से अलग और हैरतअंगेज है।
  Alia Bhatt with local Sheperds (called 'Bakarwals'),  Shooting for Highway at Chandanwari, Kashmir, 09-05-2013.jpg.jpg  इम्तियाज अली बताते हैं कि ‘हाईवे’ की कहानी पर ही वे अपनी पहली फिल्म बनाता चाहते थे। तब यह संभव नहीं हो सका था। तीन फिल्मों की कामयाबी के बाद खुद उन्हें साहस हुआ और निर्माता साजिद नाडियाडवाला ने उन पर भरोसा किया। ‘हाईवे’ वीरा और महावीर की दोहरी यात्रा है। आंतरिक और बाह्य यात्रा साथ-साथ चलती है। इस यात्रा में दोनों बदल रहे हैं थोड़ा-थोड़ा। सफर समाप्त होने पर पता चलेगा कि उनके अंदर क्या तब्दीली आई? उनके रिश्ते में क्या बदलाव आया? पता चला कि वे काश्मीर से दिल्ली जाएंगे। बहुत पहले दिल्ली से ही उन्होंने यह सफर शुरू किया था।


   


Thursday, April 18, 2013

आलिया भट्ट

आलिया भट्ट के प्रशंसकों के लिए उनके पिता महेश भट्ट की भेंट...उन्‍होंने आज सुबह ट्विट किया...Not in our wildest dream did we imagine that this 'Sumo wrestler' would transform herself into ALIA BHATT

Saturday, October 20, 2012

फिल्‍म समीक्षा : स्टूडेंट ऑफ द ईयर

Review: Student Of The Year-अजय ब्रह्मात्मज
देहरादून में एक स्कूल है-सेंट टेरेसा। उस स्कूल में टाटा(अमीर) और बाटा(मध्यवर्गीय) के बच्चे पढ़ते हैं। उनके बीच फर्क रहता है। दोनों समूहों के बच्चे आपस में मेलजोल नहीं रखते। इस स्कूल के डीन हैं योगेन्द्र वशिष्ठ(ऋषि कपूर)। वे अपने ऑफिस के दराज में रखी मैगजीन पर छपी जॉन अब्राहम की तस्वीर पर समलैंगिक भाव से हाथ फिराते हैं और कोच को देख कर उनक मन में ‘कोच कोच होने लगता है’। करण जौहर की फिल्मों में समलैंगिक किरदारों का चित्रण आम बात हो गई है। कोशिश रहती है कि ऐसे किरदारों को सामाजिक प्रतिष्ठा और पहचान भी मिले। बहरहाल, कहानी बच्चों की है। ये बच्चे भी समलैंगिक मजाक करते हैं। इस स्कूल के लंबे-चौड़े भव्य प्रांगण और आलीशान इमारत को देखकर देश के अनगिनत बच्चों को खुद पर झेंप और शर्म हो सकती है। अब क्या करें? करण जौहर को ऐसी भव्यता पसंद है तो है। उनकी इस फिल्म के लोकेशन और कॉस्ट्युम की महंगी भव्यता आतंकित करती है। कहने को तो फिल्म में टाटा और बाटा के फर्क की बात की जाती है, लेकिन मनीष मल्होत्रा ने टाटा-बाटा के प्रतिनिधि किरदारों को कॉस्ट्युम देने में भेद नहीं रखा है। रोहन और अभिमन्यु के वार्डरोब में एक से कपड़े हैं। फिल्म की नायिका सनाया तो मानो दुनिया के सभी मशहूर ब्रांड की मॉडल है। इस स्कूल में एक पढ़ाई भर नहीं होती,बाकी खेल-कूद,नाच-गाना,लब-शव चलता रहता है। आप गलती से भी भारतभूमि में ऐसे लोकेशन और कैरेक्टर की खोज न करने लगें। स्वागत करें कि करण जौहर विदेश से देश तो आए। भविष्य में वे छोटे शहरों और देहातों में भी पहुंचेगे।
    इस फिल्म की खूबी और कमी पर बात करने से बेहतर है कि हम तीन नए चेहरों की चर्चा करें। करण जौहर ने पहली बार अपनी फिल्म के मुख्य किरदारों में नए चेहरों को मौका देने का साहस दिखाया है। भविष्य में कैरेक्टर और कंटेंट भी देश्ी हो सकते हैं। उनके तीनों चुनाव बेहतर हैं। परफारमेंस के लिहाज से सिद्धार्थ मल्होत्रा बीस ठहरते हैं। फिल्म के लेखक और कहानी का सपोर्ट अभिमन्यु को मिला है, लेकिन उस किरदार में वरुण धवन मेहनत करते दिखते हैं। मुठभेड़, दोस्ती और मौजमस्ती के दृश्यों में सिद्धार्थ और वरुण अच्छे लगते हैं। मनीष मल्होत्रा और सिराज सिद्दिकी ने उन्हें आकर्षक कॉस्ट्युम दिए हैं। फिल्म तो इन दोनों के लिए ही बनाई गई लगती है। इस फिल्म से फैशन का नया ट्रेंड चल सकता है। पहली फिल्म और रोल के हिसाब से आलिया भट्ट निराश नहीं करतीं, लेकिन उनका परफारमेंस साधारण है। आती-जाती और इठलाती हुई वह सुंदर एवं आकर्षक लगती हैं। गानों में भी उन्होंने सही स्टेप्स लिए हैं, लेकिन भावपूर्ण और नाटकीय दृश्यों में उनका कच्चापन जाहिर हो जाता है। फिल्म के सहयोगी कलाकारों का चुनाव उल्लेखनीय है। उन सभी की मदद से फिल्म रोचक बनती है। ऋषि कपूर और रोनित रॉय अपने किरदारों में फिट हैं।
    इस फिल्म के तीनों किरदारों की एंट्री को करण जौहर ने विशेष तरीके से शूट किया है। पुरानी हिंदी फिल्मों के मुखड़े लेकर नए भाव जोड़े गए हैं और उनकी पर्सनैलिटी जाहिर की गई है। फिल्म के गानों में मौलिकता नहीं है। अन्विता दत्त गुप्तन ने पुराने गीतों के मुखड़े लेकर नए शब्दों से अंतरे बनाए हैं। संगीत में भी यही प्रयोग किया गया है। करण जौहर की इस फिल्म में उनकी पुरानी सपनीली मौलिकता भी लुप्त हो गई है। देश के धुरंधर युवा फिल्मकार की कल्पनाशीलता पर कोफ्त होने से भी क्या होगा? इस फिल्म की पैकेजिंग दर्शकों को थिएटर में ला सकती है।
    एक ही अच्छी बात हुई है कि ‘स्टूडेंट ऑफ द ईयर’ ने कुछ नई और युवा प्रतिभाओं को बड़े पर्दे पर अपना हुनर दिखाने का मौका दिया है। सचमुच हमें हिंदी फिल्मों में नए चेहरों की तलाश है। भले ही वे फिल्मी परिवारों से क्यों न हों?
निर्देशक-करण जौहर, कलाकार- सिद्धार्थ मल्होत्रा, आलिया भट्ट, वरुण धवन, सगीत-विशाल-शेखर, गीत- अन्विता दत्‍त गुप्‍तन,संवाद-निरंजन आयंगार
**१/२ ढाई स्टार
अवधि-146 मिनट