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Tuesday, December 11, 2018

सिनेमालोक :आयुष्मान खुराना



सिनेमालोक
आयुष्मान खुराना
-अजय ब्रह्मात्मज
इस महीने के हर मंगलवार को 2018 के ऐसे अचीवर को यह कॉलम समर्पित होगा,जो हिंदी फिल्मों में बहार से आए.जिन्होंने अपनी मेहनत और प्रतिभा के दम पर पहचान हासिल की.2018 में आई उनकी फिल्मों ने उन्हें खास मुकाम दिया.

2018 में दो हफ़्तों के अन्दर आयुष्मान खुराना की दो फ़िल्में कामयाब रहीं.श्रीराम राघवन निर्देशित ‘अंधाधुन’ और अमित शर्मा निर्देशित ‘बधाई हो’. दोनों फिल्मों का फलक अलग था.दोनों के नायक हिंदी फिल्मों के पारंपरिक नायक से अलग थे.आयुष्मान की ताहि खासियत उन्हें विशिष्ट बनाती है.शूजित सरकार की ‘विकी डोनर’ से लेकर ‘बधाई हो’ तक के उनके चुनाव पर गौर करें तो सभी फिल्मों में उनके किरदार अलहदा रहे हैं.धीरे-धीरे स्थापित होने के साथ ही नयी धारणा बन चुकी है की अगर आयुष्मान खुराना की कोई फिल्म आ रही है तो उसका नायक मध्यवर्गीय ज़िन्दगी के किसी अनछुए पहलू को उजागर करेगा.हाल ही में उनकी ताज़ा फिल्म ‘ड्रीम गर्ल’ का फर्स्ट लुक सामने आया है.यहाँ भी वह चौंका रहे हैं.उम्मीद करते हैं कि इस बार वह किसी शारीरिक या पारिवारिक उलझन में नहीं फंसे होंगे.
इन दिनों लोकप्रिय और बड़े स्टार भी दर्शक नहीं जुटा पाते.दर्शक निर्मम हो चुके हैं.उन्हें फिल्म पसंद नहीं आई तो वे परवाह नहीं करते कि इसमें आमिर खान हैं या अमिताभ बच्चन हैं,या फिर दोनों हैं.इस माहौल में ‘बधाई हो’ ने सिनेमाघरों में 50 दिन पूरे कर लिए.दर्शक अभी तक इसे देख रहे हैं.यह बड़ी बात है,क्योंकि आजकल कुछ फिल्मों के लिए कई बार 50 शो खींचना भी मुश्किल हो जाता है.क्या आप को याद है कि ‘बधाई हो’ के साथ ‘नमस्ते लंदन’ रिलीज हुई थी.फेसवैल्यू के लिहाज से उसमें बड़े नाम थे.चालू फार्मुले की पंजाब की चाशनी में लिपटी उस फिल्म को दर्शकों ने सिरे से नकार दिया था.दरअसल,दर्शक इन दिनों स्टार और बैनर के झांसे में पहले दिन सिनेमाघरों में चले भी जायें.अगले शो और अगले दिन तक उन्हें सही रिपोर्ट मिल चुकी होती है.
आयुष्मान के करियर को देखें तो स्टेज और टीवी शो के जरिये वह फिल्मों तक पहुंचे.चंडीगढ़ में मामूली परिवार एन पले-बढे आयुष्मान खुराना के सपने बड़े थे.चंडीगढ़ शहर भी उन सपनों के लिए छोटा पड़ गया था.पढाई के दिनों में ही उन्होंने मंडली बनायीं और सपनों को परवाज़ दिया.वक़्त रहले लोगों ने पहचाना और उन्हें उड़ने के लिए आकाश दिया.उन पारखी नज़रों को भी धन्यवाद् देना चाहिए,जिन्होंने साधारण चेहरे और कद-काठी के इस युवक को मौके दिए.आयुष्मान ने खुद की मेहनत और प्रतिभा से सभी अवसरों का भरपूर लाभ उठाया और निरंतर कामयाबी की सीढियां चढ़ते गए.आयुष्मान की कामयाबी नयी युवा प्रतिभाओं के लिए नयी मिसाल बन गयी है.
आयुष्मान खुराना की फिल्मों,किरदार और अभिनय शैली पर नज़र डालें तो उनमें हिंदी फिल्मों के हीरो के लक्षण नहीं दिखते.सभी किरदार मामूली परिवारों और परिवेश से आते हैं.ज्यादातर मध्यवर्गीय परिवार और परिवेश ही होते हैं.फिल्म शुरू होने के साथ नायक की साधारण उलझन उभर आती है.लगभग सभी फिल्मों में वे अपनी प्रेमिकाओं को रिझाने और उलझनों से निकलने की कोशिश में एक साथ लगे रहते हैं.उनकी नायिकाएं कामकाजी होती हैं.उनका अपना परिवार भी होता है.यानि आम फिल्मों की नायिकाओं की तरह उन्हें परदे पर सिर्फ प्रेम नहीं करना होता है.आयुष्मान खुराना आम हीरो जैसी मुश्किलों में नहीं फंसते,इसलिए उन्हें हीरोगिरी दिखाने का भी मौका नहीं मिलता.फिर भी यह मामूली नायक दर्शकों को पसंद आता है.कुछ आलोचक इस नए नायक को नहीं पहचान पाने की वजह से सुविधा के लिए आयुष्मान खुराना को अमोल पालेकर से जोड़ देते हैं.वास्तव में दोनों बहुत अलग कलाकार हैं.कह सकते हैं कि दोनों के निभाए किरदार समय और परिस्थिति की वजह से भी अलग मिजाज रखते हैं.
आयुष्मान खुराना की एक और खासियत है.वह गायक हैं.उनकी फिल्मों में उनकी आवाज़ का इस्तेमाल होता है.उन गीतों को परदे पर निभाते और गुनगुनाते समय  आयुष्मान खुराना की तल्लीनता देखते ही बनती है.ठीक है कि उन्हें अभि किशोर कुमार या सुरैया जैसी ऊंचाई नहीं मिली है,लेकिन यह एहसास ही कितना सुखद है कि 21वीं सदी में कोई कलाकार अभिनय के साथ गायन भी करता है.हिंदी फिल्मों की यह परमपरा विलुप्त ही हो गयी है. सुना है कि फुर्सत मिलते ही आयुष्मान खुराना जिम के बजे जैमिंग(गाने का अभ्यास) में समय बिताते हैं.







Sunday, November 4, 2018

आयुष्मान खुराना : रुपहले परदे के राहुल द्रविड़


आयुष्मान खुराना : रुपहले परदे के राहुल द्रविड़ 
-अजय ब्रह्मात्मज

क्रिकेट और फिल्म में अनायास रिकॉर्ड बनते हैं.अचानक कोई खिलाडी या एक्टर उभरता है और अपने नियमित प्रदर्शन से ही नया रिकॉर्ड बना जाता है.अक्टूबर का महीना हमें चौंका गया है.आयुष्मान खुराना की दो फ़िल्में 15 दिनों के अंतराल पर रिलीज हुईं और दोनों फिल्मों ने अच्छा प्रदर्शन किया.दोनों ने बॉक्स ऑफिस पर बेहतर परफॉर्म किया और आयुष्मान खुराना को एक्टर से स्टार की कतार में ला खडा किया.पिछले शनिवार को उनकी ताज़ा फिल्म ‘बधाई हो ने 8.15 करोड़ का कलेक्शन किया.यह आंकड़ा ‘बधाई हो के पहले दिन के कलेक्शन से भी ज्यादा है,जबकि यह दूसरा शनिवार था.लोकप्रिय स्टार की फ़िल्में भी दूसरे हफ्ते के वीकेंड तक आते-आते दम तोड़ देती हैं.इस लिहाज से आयुष्मान खुराना ‘अंधाधुन और ‘बधाई हो की कामयाबी से भरोसेमंद एक्टर-स्टार की श्रेणी में आ गए हैं.

गौर करने वाली बात है कि ‘बधाई हो अर्जुन कपूर और परिणीति चोपड़ा की ‘नमस्ते इंग्लैंड के साथ रिलीज हुई थी.विपुल शाह निर्देशित यह फिल्म ‘नमस्ते लंदन की कड़ी में पंजाब की पृष्ठभूमि की कहानी थी.स्वाभाविक तौर पर माना जा रहा था कि यह फिल्म अच्छा कारोबार करेगी.आजमाए हुए सफल फार्मुले की ‘नमस्ते इंग्लैंड के सामने ‘बधाई हो जैसी ‘आउटऑफ़ बॉक्स फिल्म थी.’बधाई हो के कलाकारों की स्टार वैल्यू ‘नमस्ते इंग्लैंड के कलाकारों से कम और कमज़ोर थी.फिर भी दर्शकों के रुझान से पहले ही दिन जाहिर हो गया कि पंजाब की देखी-सुनी कहानी से वे विरक्त हैं.उन्होंने ‘बधाई हो को पसंद किया और उमड़ कर सिनेमाघरों में पहुंचे.और अभी तक जा रहे हैं.

आज बासु चटर्जी,हृषीकेश मुखर्जी,सई परांजपे आदि डायरेक्टर एक्टिव होते तो अमोल पालेकर और फारुख शेख की तरह आयुष्मान खुराना उनके पसंदीदा एक्टर-स्टार होते.यह भी हो सकता था कि कुछ अनोखी कहानियां लिखी जातीं.आयुष्मान खुराना ने फिल्मों के चुनाव से यह स्पष्ट संकेत दिया है कि वे अपारंपरिक हीरो की भूमिका निभाने के लिए तैयार और सक्षम हैं.उनकी पहली फिल्म ‘विकी डोनर’ स्पर्म डोनेशन के अनोखे विषय पर बनी रोचक फिल्म थी.शूजित सरकार की इस फिल्म को दूसरे अभिनेताओं ने ठुकरा दिया था.फिल्म इंडस्ट्री के रिवाज से किसी भी नए एक्टर के लिए ऐसा विषय चुनना पूरी तरह से जोखिम का काम था,लेकिन शूजित सरकार के सधे हाथों और पैनी नज़र से यह फिल्म मानवीय संवेदना के अनछुए पहलू को लेकर आई.आयुष्मान खुराना,अन्नू कपूर और अन्य सहयोगी कलाकारों ने इसे फूहड़ और साधारण होने से बचा लिया.दर्शक फिल्म देखते हुए आनंदित हुए.

हाल ही में राष्टीय पुरस्कारों से सम्मानित और प्रशंसित एक्टर मनोज बाजपेयी से इधर तेज़ी से उभरे तीन अभिनेताओं राजकुमार राव,विकी कौशल और आयुष्मान खुराना की मौजूदगी पर बात हो रही थी.उन्होंने आयुष्मान खुराना के बारे में मार्के की बात कही.उनके मुताबिक,’ आयुष्मान खुराना का दिल और दिमाग सही जगह पर है.वह इंटेलीजेंट एक्टर हैं.उन्होंने अपना स्ट्रेंग्थ जान लिया है.वह फिल्मों के राहुल द्रविड़ हैं.वह खेलते रहेंगे.’ किसी सीनियर अभिनेता का यह ऑब्जरवेशन गौरतलब है.आयुष्मान खुराना मामूली विफलताओं के बावजूद समय बीतने के साथ लोकप्रियता और स्वीकृति की सीढियां चढ़ते गए हैं.’विकी डोनर के बाद उनसे भी ‘बेवकूफियां हुई हैं.’बेवकूफियां,’नौटंकी साला और ‘हवाईजादा’ उनकी कमज़ोर फ़िल्में रहीं.उन्होंने 2016 में आई ‘दम लगा के हईसा से बताया कि अपनी असफलता से वह बेदम नहीं हुए हैं.इस फिल्म में प्रेम प्रकाश तिवारी जैसे फेलियर और ग्रंथिपूर्ण किरदार को वह पूरी संजीदगी और प्रभाव के साथ जीते हैं.इस फिल्म के बाद उनके चढ़ते कदम अभी तक नहीं लड़खड़ायें हैं.2017 में ‘बरेली की बर्फी और ‘शुभ मंगल सावधान की कामयाबी से ‘मेरी प्यारी बिंदु को गौण कर दिया.उनके प्रशंसकों को उस फिल्म का नाम याद भी नहीं होगा.

हिंदी फिल्मों के इतिहास में हर अभिनेता को कुछ साल ऐसे मिलते हैं,जब उसकी जबरदस्त स्वीकृति रहती है.इस दौर में उसके उन्नीस-बीस परफॉरमेंस को दर्शक-प्रशंसक नज़रअंदाज कर देते हैं.वे किसी प्रेमी/प्रेमिका की तरह अपने प्रिय स्टार की मामूली चूकों पर ध्यान नहीं देते. आयुष्मान खुराना का अभी ऐसा ही वक़्त चल रहा है. अगर उनकी फिल्मों के विषय देखें तो हम पाते हैं कि अपनी अधिकांश फिल्मों में आयुष्मान खुराना पारंपरिक नायक नहीं होते.वे मध्यवर्गीय परिवारों के औसत युवक होते हैं,जो कभी शारीरिक तो कभी पारिवारिक उलझनों में फंसा है.वह उनसे निबटने का कोई ‘ओवर द टॉप’ या अतिरंजित युक्ति नहीं अपनाता.उसमें हिंदी फिल्मों के नियमित नायकों की अविश्वसनीय शक्तियां नहीं रहतीं.अपनी नायिकाओं के साथ उसकी गलतफहमियां चलती रहती हैं.आयुष्मान खुराना की फिल्मों की नायिकाएं दमदार और स्वतंत्र व्यक्तित्व की होती हैं.वे शरमाती या सिफोन की साड़ियाँ लहराती उसके पास नहीं आतीं.वे कामकाजी भी होती हैं.ऐसी नायिकाओं के साथ नायक के प्रेम संबंध दिखाने के लिए लेखकों और निर्देशकों को भी मशक्कत करनी पड़ती है.और फिर आयुष्मान खुराना अपनी सामान्य कद-काठी से उन नायकों को सहज भाव-भंगिमा देते हैं.आयुष्मान अपनी फिल्मों में अधिक नाटकीय या हाइपर नहीं दिखते.’बरेली की बर्फी में उनका किरदार आक्रामक और चालाक था,लेकिन अपनी मासूमियत से वह ठगा भी जाता है.उस फिल्म में तो राजकुमार राव अपने दोरंगी किरदार से दर्शकों के चहेते बन गए थे और आयुष्मान खुराना से लाइमलाइट छीन ली थी.

आयुष्मान खुराना ने पिछले छह सालों में खुद की मेहनत और दर्शकों के प्रेम से यह ऊंचाई हासिल की है.शादीशुदा आयुष्मान खुराना एक समझदार और सहयोगी पति की छवि पेश करते हैं और पारिवारिक गरिमा का पालन करते हैं.वे गायक,कवि और लेखक भी हैं.कहीं न कहीं माँ से उन्हें सारी सृजनात्मकता मिली है.अभिनय कौशल पर उनकी किताब आ चुकी है.और खबर है कि वे जल्दी ही अपनी कविताओं का संग्रह प्रकाशित करना चाहते हैं.सफलता के साथ हर एक्टर-स्टार के आसपास एक हुजूम खड़ा हो जाता है.शुभचिंतक बना यह हुजूम स्टार को खास दिशा में ले जाना चाहता है और शीर्ष पर ले जाने का भुलावा देकर ग्लैमर की गलियों में भटका भी देता है.बस,आयुष्मान खुराना सावधान रहें और बहके नहीं तो उनकी पारी राहुल द्रविड़ की तरह मजबूत और यादगार होगी.