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Friday, February 26, 2016

फिल्‍म समीक्षा : अलीगढ़



साहसी और संवेदनशील
अलीगढ़
-अजय ब्रह्मात्‍मज

हंसल मेहता की अलीगढ़ उनकी पिछली फिल्‍म शाहिद की तरह ही हमारे समकालीन समाज का दस्‍तावेज है। अतीत की घटनाओं और ऐतिहासिक चरित्रों पर पीरियड फिल्‍में बनाना मुश्किल काम है,लेकिन अपने वर्त्‍तमान को पैनी नजर के साथ चित्रबद्ध करना भी आसान नहीं है। हंसल मेहता इसे सफल तरीके से रच पा रहे हैं। उनकी पीढ़ी के अन्‍य फिल्‍मकारों के लिए यह प्रेरक है। हंसल मेहता ने इस बार भी समाज के अल्‍पसंख्‍यक समुदाय के व्‍यक्ति को चुना है। प्रोफेसर सिरस हमारे समय के ऐसे साधारण चरित्र हैं,जो अपनी निजी जिंदगी में एक कोना तलाश कर एकाकी खुशी से संतुष्‍ट रह सकते हैं। किंतु हम पाते हैं कि समाज के कथित संरक्षक और ठेकेदार ऐसे व्‍यक्तियों की जिंदगी तबाह कर देते हैं। उन्‍हें हाशिए पर धकेल दिया जाता है। उन पर उंगलियां उठाई जाती हैं। उन्‍हें शर्मसार किया जाता है। प्रोफेसर सिरस जैसे व्‍यक्तियों की तो चीख भी नहीं सुनाई पड़ती। उनकी खामोशी ही उनका प्रतिकार है। उनकी आंखें में उतर आई शून्‍यता समाज के प्रति व्‍यक्तिगत प्रतिरोध है।
प्रोफेसर सिरस अध्‍ययन-अध्‍यापन से फुर्सत पाने पर दो पैग ह्विस्‍की,लता मंगेशकर गानों और अपने पृथक यौन व्‍यवहार के साथ संतुष्‍ट हैं। उनकी जिंदगी में तब भूचाल आता है,जब दो रिपोर्टर जबरन उनके कमरे में घुस कर उनकी प्रायवेसी को सार्वजनिक कर देते हैं। कथित नैतिकता के तहत उन्‍हें मुअत्‍तल कर दिया जाता है। उनकी सुनवाई तक नहीं होती। बाद में उन्‍हें नागरिक अधिकारों से भी वंचित करने की कोशिश की जाती है। उनकी अप्रचारित व्‍यथा कथा से दिल्‍ली का युवा और जोशीला रिपोर्टर चौंकता है। वह उनके पक्ष से पाठकों को परिचित कराता है। साथ ही प्रोफेसर सिरस को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक भी करता है। प्रोफेसर सिरस बेमन से कोर्ट में जाते हैं। तब के कानूनी प्रावधान से उनकी जीत होती है,लेकिन वे जीत-हार से आगे निकल चुके हैं। वे सुकून की तलाश में बेमुरव्‍वत जमाने से चौकन्‍ने और चिढ़चिढ़े होने के बावजूद छोटी खुशियों से भी प्रसन्‍न होना जानते हैं।
पीली मटमैली रोशनी और सांवली छटा के दृश्‍यों से निर्देशक हंसल मेहता प्रोफेसर सिरस के अवसाद को पर्दे पर बखूबी उतारते हैं। उन्‍होंने उदासी और अवसन्‍न्‍ता को अलग आयाम दे दिया है। पहले दृश्‍य से आखिरी दृश्‍य तक की फीकी नीम रोशनी प्रोफेसर सिरस के अंतस की अभिव्‍यक्ति है। हंसल मेहता के शिल्‍प में चमक और चकाचौंध नहीं रहती। वे पूरी सादगी से किरदारो की जिंदगी में उतरते हैं और भावों का गागर भर लाते हैं।दरअसल,कंटेंट की एकाग्रता उन्‍हें फालतू साज-सज्‍जा से बचा ले जाती है। वे किरदार के मनोभावों और अंतर्विरोधों को कभी संवादों तो कभी मूक दूश्‍यों से जाहिर करते हैं। इस फिल्‍म में उन्‍होंने मुख्‍य कलाकारों की खामोशी और संवादहीन अभिव्‍यक्ति का बेहतरीन उपयोग किया है। वे प्रोफेसर सिरस का किरदार गढ़ने के विस्‍तार में नहीं जाते। शाहिद की तरह ही वे प्रोफेसर सिरस के प्रति दर्शकों की सहानुभूति नहीं चाहते। उनके किरदार हम सभी की तरह परिस्थितियों के शिकार तो होते हैं,लेकिन वे बेचारे नहीं होते। वे करुणा पैदा करते हैं। दया नहीं चाहते हैं। वे अपने तई संघर्ष करते हैं और विजयी भी होते हैं,लेकिन कोई उद्घोष नहीं करते। बतौर निर्देशक हंसल मेहता का यह संयम उनकी फिल्‍मों का स्‍थायी प्रभाव बढ़ा देता है।
अभिनेताओं में पहले राजकुमार राव की बात करें। इस फिल्‍म में वे सहायक भूमिका में हैं। अमूमन थोड़े मशहूर हो गए कलाकार ऐसी भूमिकाएं इस वजह से छोड़ देते हेंकि मुझे साइड रोल नहीं करना है। अलीगढ़ में दीपू का किरदार निभा रहे राजकुमार राव ने साबित किया है कि सहायक भूमिका भी खास हो सकती है। बशर्ते किरदार में यकीन हो और उसे निभाने की शिद्दत हो। राजकुमार के लिए मनोज बाजपेयी के साथ के दृश्‍य चुनौती से अघिक जुगलबंदी की तरह है। साथ के दृश्‍यों में दोनों निखरते हैं। राजकुमार राव के अभिनय में सादगी के साथ अभिव्‍यक्ति का संयम है। वे एक्‍सप्रेशन की फिजूलखर्ची नहीं करते। मनोज बाजपेयी ने फिर से एक मिसाल पेश की है। उन्‍होंने जाहिर किया है कि सही स्क्रिप्‍ट मिले तो वे किसी भी रंग में ढल सकते हैं। उन्‍होंने प्रोफेसर सिरस के एकाकीपन को उनकी भंगुरता के साथ पेश किया है। उनकी चाल-ढाल में एक किस्‍म का अकेलापन है। मनोज बाजपेयी ने किरदार की भाव-भंगिमा के साथ उसकी हंसी,खुशी और उदासी को यथोचित मात्रा में इस्‍तेमाल किया है। उन्‍होंने अभिनय का मापदंड खुद के साथ ही दूसरों के लिए भी बढ़ा दिया है। उन्‍होंने यादगार अभिनय किया है। फिल्‍म के कुछ दृश्‍यों में वे कविता की तरह संवादों के बीच की खामोशी में अधिक एक्‍सप्रेसिव होते हैं।
निश्चित ही यह फिल्‍म समलैंगिकता के प्रश्‍नों को छूती है,लेकिन यह कहीं से भी उसे सनसनीखेज नहीं बनाती है। समलैंगिकता इस फिल्‍म का खास पहलू है,जो व्‍यक्ति की चाहत,स्‍वतंत्रता और प्रायवेसी से संबंधित है। हिंदी फिल्‍मों में समलैंगिक किरदार अमूमन भ्रष्‍ट और फूहड़ तरीके से पेश होते रहे हैं। ऐसे किरदारों को साधरण निर्देशक मजाक बना देते हैं। हंसल मेहता ने पूरी गंभीरता बरती है। उन्‍होंने किरदार और मुद्दा दोनों के प्रति संवेदनशील रवैया अपनाया है। लेखक अपूर्वा असरानी की समझ और अपनी सोच से उन्‍होंने समलैंगिकता और सेक्‍शन 377 के प्रति दर्शकों की समझदारी दी है। अलीगढ़ साहसिक फिल्‍म है।
अवधि- 120 मिनट
स्‍टार- साढ़े चार स्‍टार

जीवन में संतुष्‍ट होना बहुत जरूरी : राजकुमार राव




-अजय ब्रह्मात्‍मज  
प्रतिभावान राजकुमार राव की अगली पेशकश ‘अलीगढ़़’ है। समलैंगिक अधिकारों व व्‍यक्ति की निजता को केंद्र में लेकर बनी इस फिल्‍म में राजकुमार राव पत्रकार दीपू सेबैस्टिन की भूमिका में हैं। दीपू न्‍यूज स्‍टोरी को सनसनीखेज बनाने में यकीन नहीं रखता। वह खबर में मानव अधिकारों को पुरजोर तरीके से रखने का पैरोकार है। 
राजकुमार राव अपने चयन के बारे में बताते हैं, ‘दीपू का किरदार तब निकला, जब मनोज बजापयी कास्ट हो रहे थे। उस वक्‍त हंसल मेहता सर की दूसरे एक्टरों से भी बातें हो रही थीं। नवाज से बातें हुईं। और भी एक्टरों के नाम उनके दिमाग में घूम रहे थे। जैसे कि नाना पाटेकर। वह सब केवल दिमाग में चल रहा था। तब दीपू का किरदार फिल्म में था ही नहीं। जहन में भी नहीं थी। केवल एक हल्का स्केच दिमाग में था। जब स्क्रिप्ट तैयार हुई तब पता चला कि दीपू तो प्रिंसिपल  कास्ट है। जैसे वो बना हंसल ने तय कर लिया कि यह राजकुमार राव का रोल है। हंसल मेहता के मुताबिक उन्‍हें मेरे बिना फिल्म बनाने की आदत नहीं है। दरअसल हम दोनों की जो कला है, कला में आप विस्तार करते हो। अपने भीतर के कलाकार को उभारने का मौका मिलता है। एक कलाकार के जरिए। दूसरे कलाकार के जरिए। एक दूसरे से बांटने का काम होता है। उनके लिए मैं सिग्नेचर बन चुका हूं।
वे मुझ पर काफी भरोसा करते हैं। ठीक वैसे, जैसे किसी पिता को अपने लायक बेटे पर होता है। सर का औऱ मेरा एक कनेक्शन है। वह केवल फिल्म तक नही है। वह सिर्फ डायरेक्टर और एक्टर का नहीं है। वह उसके भी आगे है। बहुत आगे। हम हर तरह की बात करते हैं। हम मस्ती करते हैं। पार्टी करते हैं। गोसिप करते हैं। फिल्म पर ढेर सारी बातें करते हैं। जब मैं सर के साथ काम करता हूं तो बतौर एक्टर बहुत चैलेंज महसूस करता हूं। वह इस तरह के किरदार मेरे लिए लिखते हैं। मुझे करने का मौका देते हैं। एक्टर के तौर पर मुझे बहुत मजा आता है। मेरे जितने भी बेहतरीन काम रहे हैं। जैसे शाहिद। मैं मानता हूं कि उसमें हंसल सर सबसे ऊपर आते हैं। मैंने कई फिल्में की लेकिन उन सब चीजों का मौका मुझे सर के साथ ही आता है। हंसल सर ऐसा एक माहौल देते हैं। एक स्पेस देते हैं कि बतौर एक्टर मैं बहुत खुला हुआ महसूस करता हूं। मुझे लगता है कि मैं किसी को कुछ दिखाने के लिए नहीं कर रहा हूं। मैं केवल अपने लिए काम कर रहा हूं।
मनोज बाजपयी प्रोफेसर सिरस की भूमिका में हैं। प्रोफेसर सिरस को समलैंगिकता के आरोप में अलीगढ़ युनिवर्सिटी से निकाला जाता है। राजकुमार राव सिरस के बारे में अपनी सोच जाहिर करते हैं, ‘प्रोफेसर सिरस मेरे लिए एक ऐसा बंदा है जो जिंदगी को जीना जानता है। उसमें कमाल का टैलेंट हैं।वह आइडियल आदमी है। हम सभी कहीं ना कहीं दूसरों पर निर्भर करते हैं अपनी खुशी के लिए या फिर अपना दुख बांटने के लिए। वहीं वह ऐसा आदमी है जो अपनी दुनिया में बहुत खुश है। उसको जीवन से ज्यादा कुछ नहीं चाहिए। उसके लिए उसका संगीत या यूं कह सकते हैं कि वह अपने स्पेस में बेहद खुश है। इस किरदार से मैंने एक शब्द सीखा कि जीवन में कंटेंट होना बहुत जरूरी है। नहीं तो दिमाग को तो कुछ ना कुछ चाहिए ही रहता है। हमें अपने रोज के जीवन में कुछ ना कुछ चाहिए ही रहता है। कभी गाड़ी .कभी घर को कभी नए दोस्त।
दीपू सेबैस्टियन एक ऐसा इंसान है जिसे कुछ नहीं चाहिए। उसे केवल अपना स्पेस चाहिए। यह सोसायटी उसे वह भी देने को तैयार नहीं है। उससे सबकुछ छिन लिया जा रहा है। मैंने सिरस से यहीं सीखा। मनोज बाजपयी सर उनके साथ मेरा खास नाता है। जब मैं बड़ा हो रहा था तो मैंने शूल देखकर बड़ा हो रहा था। उनका एक प्रभाव मुझ पर रहा है। वह बतौर एक्टर मुझ पर हावी रहे हैं। उनकी परफॉरमेंस से मैं प्रभावित हो जाता था। एक तरफ शाहरूख खान की डीडीएलजे देखकर उनकी भी नकल करता था। वैसा बनना चाह रहा था। दूसरा मैं शूल देख रहा था। मैं मनोज सर की नकल करता था। मुझ पर उनका बहुत बड़ा प्रभाव रहा है। वह आज तक है।

Thursday, February 25, 2016

किरदार ने निखारा मेरा व्‍यक्तित्‍व - मनोज बाजपेयी




-अजय ब्रह्मात्‍मज
अलीगढ़ का ट्रेलर आने के बाद से ही मनोज बाजपेयी के प्रेजेंस की तारीफ हो रही है। ऐसा लग रहा है कि एक अर्से के बाद अभिनेता मनोज बाजपेयी अपनी योग्‍यता के साथ मौजूद हैं। वे इस फिल्‍म में प्रो. श्रीनिवास रामचंद्र सिरस की भूमिका निभा रहे हैं।
- इस फिल्‍म के पीछे की सोच क्‍या रही है ?
0 एक आदमी अपने एकाकी जीवन में तीन-चार चीजों के साथ खुश रहना चाहता है। समाज उसे इतना भी नहीं देना चाहता। वह अपनी अकेली लड़ाई लड़ता है। मेरी कोशिश यही रही है कि मैं दुनिया के बेहतरीन इंसान को पेश करूं। उसकी अच्‍छाइयों को निखार कर लाना ही मेरा उद्देश्‍य रहा है।
-किन चीजों के साथ खुश रहना चाहते थे प्रोफेसर सिरस?
0 वे लता मंगेशकर को सुनते हैं। मराठी भाषा और साहित्‍य से उन्‍हें प्रेम है1 वे कविताओं में खुश रहते हैं। अध्‍ययन और अध्‍यापन में उनकी रुचि है। वे अलीगढ़ विश्‍वविद्यालय औा अलीगढ़ छोड़ कर नहीं जाना चाहते। वे अपनी जिंदगी अलग ढंग से जीना चाहते हैं।
-एक अंतराल के बाद आप ऐसी प्रभावशाली भूमिका में दिख रहे हैं?
0 अंतराल इसलिए लग रहा है कि मेरी कुछ फिल्‍में रिलीज नहीं हो पाई हैं। पोस्‍ट प्रोडक्‍शन में समय लग गया। सात उचक्‍के,मिसिंग,ट्रैफिक और दुरंतो फिल्‍में शूट हो चुकी हैं। अगले दो-तीन महीनों में ये रिलीज होंगी।तेवर के बाद लगभग साल हो गया है। अब फिल्‍में आ रही हैं।
-प्रोफेसर सिरस को कैसे आत्‍मसात किया। किन चीजों पर अधिक ध्‍यान रहा?
0 प्रोफेसर सिरस को अकेले रहने से तकलीफ नहीं है। एकाकी जीवन जी रहे व्‍यक्ति की चाल-ढाल बदल जाती है। उनके एकाकीपन को जाहिर करने के लिए मैंने उनकी आंखों की शून्‍यता पकड़ी। वे निष्‍पंद दिखाई पड़ते हें। उनकी आंखों से उनका व्‍यक्तित्‍व प्रकट हो। मुश्किल प्रक्रिया रही,लेकिन मुझे खुशी है कि लोग उसे देख और समझ पा रहे हैं। यह प्रक्रिया जादुई रही।प्रोफेसर सिरस को समाज ने कमरे तक सीमित कर दिया है। हद तो तब होती है,जब वे उसके कमरे में भी घुस जाते हैं। फिल्‍म यहीं से शुरू होती है।
-कलाकार भी एकाकी होते हैं। मैंने देखा है कि वे भीड़ में रहने पर भी खुद में लीन रहते हैं। आप क्‍या कहेंगे?
0 कलाकार निजी दुनिया में रहता है। जरूरी नहीं कि वह अकेला हो। समय और अभ्‍यास से कलाकार उसे चुन लेता है। लोगों की तेज नजरों से बचने के लिए वह एक कवच पहन लेता है। अमूमन ऐसा होता है कि कलाकार सभी पर संदेह करने लगते हैं। उसे लगता है कि उसे अच्‍छे-बुरे काम को ढंग से जांचा नहीं जा रहा है। आप देखेंगे कि कलाकारों की तारीफ और आलोचना में लोग अति कर देते हैं।
-फिर वास्‍तविकता का अंदाजा कैसे होता है?
0 अगर कलाकार खुद से झूठ न बोले। वह अपने ही झांसे में न रहे। अपना काम देख कर वह समझ सकता है कि वह कीां चूक गया। मैं अपनी फिल्‍में कम देखता हूं। मुझे अपनी भूलों और चूकों से परेशानी होती है। मेरे लिए अपनी फिल्‍में देखना प्रताड़ना होती है। हमारे टीचर बैरी जॉन और एनके शर्मा जैसे मित्र होते हैं। वे यिलिटी चेक करवा देते हैं।
-हंसल मेहता के बारे में बताएं?
0 उनसे 22 साल पुरानी दोस्‍ती है। फिल्‍ममेकर के तौर पर वे अलग जोन में आ गए हैं। पहले वे दिशाहीन थे। वे अपनी आवाज या कॉलिंग की तलाश में थे। वह उन्‍हें मिल गया है। अपने विषय और क्राफ्ट पर उनकी पकड़ बढ़ गई है। वे सामाजिक व राजनीतिक मुद्दों पर लगातार लिखते और बोलते रहे हैं,इसलिए वह स्‍पष्‍टता फिल्‍मों में दिख रही है।
-कलाकार और किरदार में संगति कैसे बैठती है?
0 जब तक आप केवल संवाद बोलते रहेंगे,तब तक पैक अप के बाद आप सब कुछ भूलते रहेंगे। अगर संवादों के पार जाते हैं तो हर किरदार एक गहरा निशान छोड़ जाता है। प्रोफेसर सिरस की भूमिका निभाने के बाद मैं ज्‍यादा बेहतरीन इंसान हो गया हूं।
-समलैंगिकता अभी तक समाज में स्‍वीकार नहीं है। सेक्‍शन 377 का मामला कोर्ट में है। क्‍या कहेंगे?
0 सेक्‍शन 377 पर फैसला आने दें। मुझे लगता है कि समय के साथ समाज को अधिक खुला और उदार होना चाहिए। अगर कानून उनके पक्ष में आ जाएगा तो समाज भी धीरे-धीरे स्‍वीकार कर लेगा।

Sunday, February 21, 2016

अभिनेता राजकुमार राव और निर्देशक हंसल मेहता की बातचीत




अजय ब्रह्मात्‍मज

( हंसल मेहता और राजकुमार राव की पहली मुलाकात शाहिद की कास्टिंग के समय ही हुई थी। दोनों एक-दूसरे के बारे में जान चुके थे,लेकिन कभी मिलने का अवसर नहीं मिला। राजकुमार राव बनारस में गैंग्‍स ऑफ वासेपुर की शूटिंग कर रहे थे तब कास्टिंग डायरेक्‍टर मुकेश छाबड़ा ने उन्‍हें बताया था कि हंसल मेहता शाहिद की प्‍लानिंग कर रहे हैं। राजकुमार खुश हुएफ उन्‍हें यह पता चला कि लीड और ऑयोपिक है तो खुशी और ज्‍यादा बढ़ गई। इधर हंसल मेहता को उनके बेटे जय मेहता ने राजकुमार राव के बारे में बताया। वे तब अनुराग कश्‍यप के सहायक थे। एक दिन मुकेश ने राजकुमार से कहा कि जाकर हंसल मेहता से मिल लो। मुकेश ने हंसल को बताया कि राजकुमार मिलने आ रहा है। तब तक राजकुमार उनके दफ्तर की सीढि़यां चढ़ रहे थे। हंसल मेहता के पास मिलने के सिवा कोई चारा नहीं था। दोनों मानते हैं कि पहली मुलाकात में ही दोनों के बीच रिश्‍ते की बिजली कौंधी। अब तो हंसल मेहता को राजकुमार राव की आदत हो गई है और राजकुमार राव के लिए हंसल मेहता डायरेक्‍टर के साथ और भी बहुत कुछ हैं।)
राजकुमार राव और हंसल मेहता की तीसरी फिल्‍म है अलीगढ़। दोनों के बीच खास समझदारी और अंतरंगता है। स्थिति यह है कि हंसल अपनी फिल्‍म उनके बगैर नहीं सोच पाते और राजकुमार राव उन पर खुद से ज्‍यादा यकीन करते हैं। झंकार के लिए यह खास बातचीत...यहां राजकुमार राव के सवाल हैं और जवाब दे रहे हैं हंसल मेहता।
-सिटीलाइट्स के बाद जब ईशानी ने आप का यह कहानी भेजी तो ऐसा क्‍यों लगा कि इसी पर फिल्‍म बनानी चाहिए? उन दिनों तो आप ढेर सारी कहानियां पढ़ रहे थे?
0 मैं कहानी के इंतजार में था। कई विचारों पर काम कर रहा था। सच कहूं तो मैं कहानियां ,खोजता नहीं। कहानियां ख्‍ुद ही मेरे पास आ जाती हैं। उस वक्‍त उनका मेल आ गया।वह भी जंक मेल में चला गया था। पढ़ते ही वह विचार मुझे प्रभावित कर गया। फिर भी उन्‍हें फोन करने के पहले मैंने तीन-चार घंटे का समय लिया।
-क्‍श्या लिखा था उन्‍होंने मेल में ?
0 उन्‍होंने प्रोफेसर सिरस के बारे में लिखा था कि एएमयू में ऐसे एक प्रोफेसर थे,जिनका इंतकाल हो गया था। उन्‍हें सेक्‍सुअलिटी के मुद्दे पर सस्‍पेंड कर दिया गया था। बेसिक थॉट था। प्रोफेसर सिरस से संबंणित कुछ आर्टिकल थे। मैंने उसी शाम ईशानी को बुलाया। ईशानी स्क्रिप्‍ट लिखने के लिए तैयार नहीं थी। तभी हमलोग सिटीलाइट्स की एडीटिंग कर रहे थे। मैंने अपने एडीटर अपूर्वा असरानी से पूछा कि क्‍या तुम लिखोगे? अपूर्वा कूद पड़ा। वह पहले से जानता था मुद्दे के बारे में। मैंने शैलेष सिंह को निर्माता के तौर पर जोडा। फिल्‍म पर काम शुरू हो गया। लिखने के दौरान ही तुम्‍हारे कैरेक्‍टर दीपू सैबेस्टियन का जन्‍म हुआ। हमें अकेली जिंदगी जी रहे प्रोफेसर सिरस की कहानी कहने के लिए कोई चाहिए था। फिर यह सिरस और दीपू की कहानी बन गई।
- शाहिद पर काम करते समय हम ने कहां सोचा था कि उसे नेशनल अवार्ड मिल जाएगा। अभी अजीगढ़ चर्चा में है। क्‍या निर्माण के दौरान यह अहसास था कि समलैंगिक अधिकारों की यह फिल्‍म ऐसी प्रासंगिक हो जाएगी? व्‍यक्ति सिरस से बढ़ कर अब यह एक सामाजिक विषय की फिल्‍म हो गई है।
0 हमेशा मेरी कोशिश रहती है कि मानव अधिकारों की कहानी पूरी जिम्‍मेदारी के साथ कहें। हम उन पर फिल्‍में क्‍यों बनाते हैं,क्‍योंकि वे समाज के बहुसंख्‍यकों से अलग हैं। हम उन्‍हें अल्‍पसंख्‍यक कहते हैं। चाहे वे मुसलमान हों या माइग्रैंट हों या होमोसेक्‍सुअल हों। मेरी कोशिश रहती है कि मैं उन्‍हें इंसान की तरह पेश करूं और उनके अधिकारों की बात करूं। समाज में उनकी मौजूदगी को रेखांकित करना ही ऐसी फिल्‍मों का ध्‍येय हो जाता है। जब हम लिख रहे थे तो सेक्‍शन 377 पर कोई बात करने को तैयार नहीं था। संसद ने चुप्‍पी साध ली थी। संसद यों भी निष्क्रिय ही रहता है। सड़क और संसद में बड़ा अंतर आ गया है। सभी चाहते हैं कि यह लॉ हटे। अब सुप्रीम कोर्ट लोगों की इच्‍छाओं पर ध्‍यान दे रहा है। अलीगढ़ अब उस लड़ाई का हिस्‍सा बन गई है।
- इस फिल्‍म का मकसद क्‍या है ?
0 सीधी सी बात है कि एक व्‍यक्ति अपने बंद कमरे में क्‍या कर रहा है,यह उसका निजी मामला है। दो व्‍यक्ति राजीखुशी क्‍या कर रहे हैं,उससे स्‍टेट का क्‍या लेनादेना है अगर वे समाज को नुकसान नहीं पहुंचा रहे हैं। हम फिल्‍म में यही दिखा रहे हैं। एक व्‍यक्ति की जिंदगी  कुछ लोगों ने तबाह कर दी।
-अगर आ से पूछूं कि बीच के दौर के हंसल मेहता और आज के हंसल मेहता में क्‍या अंतर दिखता है?
0 हर फिल्‍म में सेंसर से लड़ाई। फिल्‍म की रिलीज का संघर्ष... इसके बावजूद मैं थकता नहीं। बीच की फिल्‍मों में मैं थक जाता था। उनमें कहने के लिए कुछ नहीं रहता था। इन फिल्‍मों से मुझे ऊर्जा मिलती है। एक मकसद मिल गया है मुझे। उस दौर में मैं फिल्‍मों से अपने खाली समय भर रहा था। उन फिल्‍मों की एक भूमिका रही। मुझे असफलता मिली। उसकी वजह से मैंने अंदर झांका। और ऐसी फिल्‍मों की तरफ लौटा।