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Wednesday, June 29, 2016

नहीं चला तीन का तुक्‍का . पूजा श्रीवास्‍तव


नहीं चला तीन का तुक्क
-पूजा श्रीवास्तव
    अमिताभ बच्चन हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री के शायद अकेले एैसे कलाकार हैं जो छोटी और महत्वहीन भूमिका में  भी अपना सर्वश्रेष्ठ देने का प्रयास करते हैं। लेकिन उनके खाते भी एैसी बहुत सी फिल्में हैं जो उनकी सशक्त उपस्थिति के बावजूद दर्शकों द्वारा नकार दी गई हैं। हाल ही में आई तीन एक ऐसी ही फिल्म है जिसका पूरा बोझ अमिताभ बच्चन अकेले ही अपने कंधे पर ढोते हुए दिखाई देते हैं। एैसा नहीं है कि फिल्म में बेहतर कलाकारों की कमी हो।  मगर विद्या बालन ,नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी, सव्यसाची चक्रवर्ती जैसे सशक्त कलाकारों से सजी ये फिल्म, स्क्रिप्ट और उसके ट्रीटमेंट के स्तर पर मात खा गई है।
   
फिल्म दक्षिण कोरियाई फिल्म मोटांज से प्रेरित है। वैसे भी अपने देश में सस्पेन्स और थ्रिल से  भरपूर फिल्मों का बेहद अभाव है। जो इक्का दुक्का फिल्में बनती भी हैं उनमें थ्रिल और सस्पेन्स से ज़्यादा उत्तेजक दृश्यों का तड़का लगा होता है। इसलिए गंभीर दर्शक ऐसी फिल्मों से कन्नी काटते हैं। फिल्म तीन के प्रति आकर्षण की वजह इसका कथानक तो था ही, इसके कलाकार  भी हैं। नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी ने अपनी पिछली फिल्मों से ये साबित कर दिया है कि वे इन्डस्ट्री के बेहद सशक्त कलाकार हैं , वहीं विद्या बालन ने भी डर्टी पिक्चर और कहानी जैसी फिल्मों से अपने अभिनय का लोहा मनवाया है। लेकिन इस फिल्म में ये दोनों ही मिसफिट से लगे हैं।
          फिल्म  शुरु होती है कलकत्ता शहर के एक पुलिस स्टेशन से। जहां जॅान विस्वास का किरदार निभा रहे अमिताभ बच्चन आठ साल पहले हुए अपनी नातिन के अपहरण के विषय में पूछताछ करते हुए दिखते हैं।़ पहले ही दृश्य से ऐसा लगने लगता है कि जॉन विस्वास के किरदार को सहानुभूति दिलाने के लिए  ही उन्हें बूढ़ा और लाचार दिखाया गया है । इसके लिए उन्हें ओवर साइज़ कपड़े पहनाए गए हैं , चेहरे की झुर्रियों को मेकअप से ढंकने की नहीं बल्कि उभारने की कोशिश की गई है। जॉन विस्वास एक एैसा किरदार है जो अपनी कमजोरियों और लाचारियों के बावजूद संघर्षरत है। कुछ कुछ कहानी फिल्म की विद्या बालन जैसा जो गर्भवती होने के बावजूद अपने पति की तलाश में दर दर भटकती है।
       फिल्म की शुरुआत में ही हमारी मुलाकात  विद्या बालन से होती है जो कि एक पुलिस अधिकारी की भूमिका में हैं लेकिन अपने पहनावे और बॉडी लैंग्वेज से वे कहीं भी अपनी इस भूमिका के प्रति विश्वसनीयता नहीं जगा पातीं। कमोवेश ऐसा ही कुछ हाल नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी का भी है।  उनकी ये शायद पहली ऐसी फिल्म होगी जिसमें उन्हें देख कर ऐसा लगा मानों वो एक्टिंग ही कर रहे हों । चरित्र के साथ एकाकार हो जाने की उनकी प्रवृत्ति यहां  बिल्कुल अनुपस्थित है। इस  फिल्म में वो एक ऐसे पुलिस अधिकारी की भूमिका में हैं जोेे अपने अपराध बोध के चलते पादरी बन गया है।
    फिल्म  में विद्या बालन और नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी को देखकर कई बार ऐसा लगता है मानो उन्हें फिल्म की स्क्रिप्ट पर विश्वास ही नहीं था और वे बेमन से फिल्म कर रहे हों। पूरी फिल्म में विद्या बालन ने एक जैसा एक्सप्रेशन दिया है। इसका एक बहुत बड़ा कारण यह है कि फिल्म की स्क्रिप्ट में कोई दम नहीं है। चरित्रों को भी गढ़ने, उन्हें विस्तार और गहराई देने में श्रम की बेहद कमी दिखाई देती है। सब कुछ सतही और काम चलाऊ है। किसी भी थ्रिलर फिल्म में रहस्यात्मकता और नाटकीयता पैदा करने में संवाद महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लेकिन यह फिल्म इस मोर्चे पर भी विफल होती दिखती है। संवाद इतने सीधे और सपाट हैं कि कई बार ऊब और खीज पैदा करते हैं।
    इसके अलावा भी फिल्म में बहुत सारे झोल हैं। जैसे जॅान विस्वास की बेटी की मौत और उनकी पत्नी के अचानक व्हील चेअर पर आ जाने के घटना के बारे में लेखक,निर्देशक  ने दर्शकों कोई भी जानकारी नहीं दी है। इसकी वजह से किरदारों से कनेक्ट करने और उनके भागीदार बनने में अड़चन महसूस होती है। फिल्म का बैकगा्रउन्ड कलकत्ता का है। मगर फिल्म देखते वक्त कई बार ऐसा लगता है मानों हम कलकत्ता नहीं बल्कि गोवा की कहानी देख रहे हैं। कलकत्ता शहर का फील ,उसकी खुश्बू फिल्म से नदारद है।
   फिल्म के अन्त में अमिताभ बच्चन को मास्टर माइंड और सव्यसाची चक्रवर्ती को मुख्य अपहरणकर्ता के रुप में पचाना भी थोड़ा सा मुश्किल लगता है।  इतना ही नहीं पेशेवर अपराधियों की तरह प्लानिंग करना और युवाओं की तरह उनका पुलिस को चकमा देकर भाग निकलना इसे और भी संदिग्ध और अविश्वसनीय बनाता है। निर्देशक ने इसे जस्टिफाइड करने का भी कोई प्रयास नहीं किया है। कुल मिला कर फिल्म बेहद निराश करती है। फिर भी अमिताभ बच्चन जी की ऊर्जा उनकी लगन के लिए यह फिल्म एक बार तो देखी जा सकती है।

Thursday, February 20, 2014

दरअसल : साथ आना अमिताभ बच्चन और हनी सिंह का


-अजय ब्रह्मात्मज
 खबर है कि हनी सिंह अमिताभ बच्चन के साथ ‘भूतनाथ रिटन्र्स’ फिल्म का एक गीत गाएंगे। इस खबर को उलट कर भी पढ़ा जा सकता है। जी हां,अमिताभ बच्चन हनी सिंह के साथ गीत गाएंगे। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में हनी सिंह की मांग अभी सबसे ज्यादा है। उनके गाए गीत लोकप्रिय हो रहे हैं। किसी भी फिल्म की लोकप्रियता बढ़ाने के लिए उनके गाए गीतों का इस्तेमाल हो रहा है। इसी कड़ी में ‘भूतनाथ रिटन्र्स’ के गीत की योजना बनी है। भूषण कुमार  भी अपने पिता गुलशन कुमार की तरह जब किसी गायक को या संगीतकार को पसंद करते हैं तो उसे भरपूर मौके देते हैं। इन दिनों वे हनी सिंह पर कृपावान हो गए हैं। कहा तो यह भी जा रहा है कि भूषण कुमार की पिछली फिल्म ‘यारियां’ को हिट कराने में हनी सिंह के गीत का बड़ा योगदान रहा। वे ‘भूतनाथ रिटन्र्स’ में इसी लाभप्रद संयोग को दोहरा रहे हैं।
हनी सिंह की बात करें तो चलन के मुताबिक वे इन दिनों सभी की पसंद बने हुए हैं। हर बार कुछ सालों के अंतराल पर पंजाब से कोई एक नई आवाज आती है और वह हर जगह गूंजने लगती है। सुखविंदर,दलेर मेंहदी,मीका और अब हनी सिंह ़ ़ ़ इन सभी ने अलग-अलग दौर में हिंदी सिनेमा के गीत-संगीत को प्रभावित किया है। पिछले दो दशकों में पंजाबी संगीत ने हिंदी सिनेमा में खास जगह बना ली है। फिल्म की कथाभूमि कहीं की भी हो,उसमें एक-दो गीत पंजाबी लहजे,शब्दों और बीट के जरूर डाल दिए जाते हैं। कोशिश और चाहत यह रहती है कि वह गीत प्रोमो के काम आए और फिल्म को हिट करने में सहायक हो। निर्माता-निर्देशकों के सामने ऐसी अनेक फिल्मों के उदाहरण है,जिनमें पंजाबी गीतों के होने से लाभ हुआ।
लकीर की फकीर हिंदी फिल्म इंडस्ट्री हर नई कामयाबी को असफल होने तक घिसती है। कुछ फिलमों पहले तक मीका सिंह सबकी पसंद बने हुए थे। यहां तक कि निर्देशक उनके ऊपर गाने शूट करने से भी नहीं हिचकते थे। हाल ही में आई नीला माधव पांडा की ‘बबलू हैप्पी है’ में मीका के एक गीत का ऐसा ही नाहक इस्तेमाल किया गया था। मतलब यह कि निर्देशक लोकप्रिय गायकों के लिए फिल्म की कहानी और स्वर में विक्षेप पैदा करने से भी नहीं हिचकते। मालूम नहीं कि ‘भूतनाथ रिटर्न्‍स’ में हनी सिंह के गीत का कितना और कैसा सदुपयोग होगा? फिलहाल कोई भी यह सवाल नहीं पूछ सकता। हिंदी फिल्मों में लोकप्रियता के कारणों को लेकर संशय या सवाल नहीं किए जाते। सभी के लिए यह खबर ही काफी है कि अमिताभ बच्चन और हनी सिंह साथ गाएंगे।
अमिताभ बच्चन की प्रासंगिकता की खोज करें तो उन्होंने हमेशा वक्त के साथ चलने की कोशिश की है। वे इस बात की परवाह नहीं करते कि नई प्रतिभा उनके साथ आने योग्य है या नहीं ? उनके लिए इतना ही काफी रहता है कि अगर कोई लोकप्रिय है तो उसके साथ चलना चाहिए। कुछ पाठकों को याद होगा कि दलेर मंहदी की पॉपुलैरिटी के दिनों में अतिाभ बच्चन ने दलेर मेंहदी के साथ ‘मृत्युदाता’ फिल्म का गीत गाया था। खुद को वापिस जमाने के उस असुरक्षित दौर में उन्होंने गोविंदा के साथ कमर भी मटकाए थे। अमिताभ बच्चन अपनी फिल्मों और लोकप्रियता के लिए नई प्रतिभाओं का उपयोग करने से नहीं हिचकते। उन्होंने किसी समय अदनान सामी के साथ भी गीत गाए थे। एक ही बात गौर करने लायक है कि वे स्थापित हो चुके लोकप्रिय प्रतिभाओं का ही साथ लेते हैं। कितना अच्छा हो कभी वे किसी नई प्रतिभा को अपने साथ आने और गाने का पहला मौका दें। कभी यह सवाल उनसे पूछ लिया जाए तो वे बड़ी विनम्रता से अपनी लाचारी जाहिर कर देते हैं। हनी सिंह के साथ गीत गाने का श्रेय भी वे किसी और को सहर्ष दे देंगे।

Friday, October 11, 2013

नी ऊथाँ वाले टूर जाण गे : प्रकाश के रे

अमिताभ बच्चन और रेखा की कहानी एक दूसरे के बिना अधूरी है, चाहे यह कहानी उनके कैरियर की हो या ज़िंदगी की. इनके बारे में जब भी सोचता हूँ तो कहीं पढ़ा हुआ वाक़या याद आ जाता है. बरसों पहले एक भारतीय पत्रकार दक्षिण अफ़्रीका के राष्ट्रपति नेल्सन मंडेला से साक्षात्कार कर रहे थे. बातचीत के दौरान उनके प्रेम संबंधों पर सवाल पूछ दिया. तब मंडेला और मोज़ाम्बिक के पूर्व राष्ट्रपति की बेवा ग्रासा मशेल के बीच प्रेम की खबरें ख़ूब चल रही थीं. असहज राष्ट्रपति ने पत्रकार से कहा कि उनका संस्कार यह कहता है कि वे अपने से कम उम्र के व्यक्ति से ऐसी बातें न करें. अमिताभ और रेखा के व्यक्तिगत संबंधों पर टिप्पणी करना मेरे लिए उस पत्रकार की तरह मर्यादा का उल्लंघन होगा. जन्मदिन की बधाई देने के साथ उन दोनों से इस के लिए क्षमा मांगता हूँ.

फ़िल्मी सितारों के प्रेम-सम्बन्ध हमेशा से चर्चा का विषय रहे हैं. सिनेमा स्टडीज़ में दाख़िले से पहले इन चर्चाओं को मैं भी गॉसिप भर मानता था लेकिन पहली कुछ कक्षाओं में ही यह जानकारी मिली कि फ़िल्म इतिहास, जीवनी, स्टारडम, पब्लिसिटी, फ़ैन्स, प्रोडक्शन आदि से सम्बंधित शोध में ये गॉसिप स्रोत और सन्दर्भ के तौर पर गंभीरता से लिए जाते हैं. मंटो और बाबुराव पटेल के गॉसिप-लेखों के बिना तो 1940 और 1950 के दशक का तो इतिहास ही नहीं लिखा जा सकता है. जब कभी बॉम्बे सिनेमा के गॉसिपों को कोई सूचीबद्ध करेगा तो यह पायेगा कि बड़े लम्बे समय तक अपनी छवि, लोकप्रियता और लगातार काम के साथ छाये रहने वाले अमिताभ बच्चन और रेखा के तीन दशक पहले के संबंधों से जुड़े गॉसिप भी लगातार चलन में रहे और चाव से सुने-कहे-पढ़े जाते रहे हैं. अभी कुछ दिनों से उनके एक साथ हवाई जहाज़ में होने की तस्वीर चर्चा में है.
रेखा की कहानी परदे पर और फ़्लैश की चमक में दमकते 'अल्टीमेट दिवा' के खूबसूरत चेहरे के पीछे छिपे उसके मन की व्यथा की मार्मिक दास्तान है. उनके माता और पिता शादीशुदा नहीं थे, पिता ने बेटी को बेटी तब माना जब वह बड़ी हो गई थी. वे यह भी कहते रहे कि बेटी की वज़ह से ही उनके और उसकी माता के बीच दूरियाँ बनी रहीं. बेटी अपनी 'कल्पना' में तो पिता से बात करती रही लेकिन जब वे मरे तो अंतिम संस्कार में नहीं गई. पिता की चिता सुदूर दक्षिण में जलती रही. बेटी की आँखें हिमाचल की वादियों में बरसती रहीं. लेकिन उन्हें वह कभी माफ़ नहीं कर पाई. बाद में टेलीविज़न पर जब इस बारे में उनसे पूछा गया तो उनके चेहरे पर उदास ख़ामोशी पसर गई. इन तमाम बरसों में उनको अपनी माँ के दुःख का अहसास तो था ही उनके अपने दुःख भी कुछ कम न थे. पिता के प्रेम से मरहूम वह फ़िल्मी दुनिया की चकाचौंध में भरोसे का कंधा खोजती रही. भरोसे टूटते रहे.

चाँद तनहा है आसमाँ
तनहा
दिल मिला है कहाँ-कहाँ तनहा

ज़िन्दगी क्या इसी को कहते हैं
जिस्म तनहा है और जाँ तनहा

मीना कुमारी ने तो जाते-जाते अपना दर्द कह दिया, रेखा अब कुछ नहीं कहतीं. पहले कह देती थीं. पिता के बारे में भी और प्रेम के बारे में भी. 1970 के दशक के आख़िरी और 80 की दहाई के शुरूआती सालों में उनके और बच्चन साहब के संबंधों की बड़ी चर्चा थी. दोनों कैरियर के शिखर पर थे. कई सफल फ़िल्मों में साथ काम कर चुके थे. ज़िंदगी में परदे के पीछे चल रही कहानी सिलसिला बनकर परदे पर भी आ चुकी थी. यह इस जोड़ी की आख़िरी फ़िल्म थी. असल जीवन में भी प्रेम परेशानी में था. बालज़ाक ने लिखा है कि स्त्री अपने प्रेमी के चेहरे को उसी तरह जानती है जैसे नाविक समुद्र को जानता है. रेखा अपने प्रेमी के बदलते हाव-भाव को समझने लगी थीं. अब यह जो भी था- कोई बेचैनी, असुरक्षा की भावना या सबकुछ कह कर मन को हलका करने की कोशिश- रेखा ने एक साक्षात्कार (फ़िल्मफ़ेयर, नवम्बर 1984) में जीवन, प्रेमी, परिवार, हर चीज़ पर बेबाकी से बोल दिया.

तब वह तीस की हो रही थीं. कभी मिले तो वह साक्षात्कार ज़रूर पढ़िए. तब रेखा दो नहीं, दर्ज़न भर बच्चों की माँ होने की बात कर रही थीं. उन पर और उनकी माँ पर जो बीती थी उसको याद कर वो बिना शादी के बच्चे नहीं करने की बात कर रही थीं. अमिताभ बच्चन से अपने प्रेम पर इतरा रही थीं और कह रही थीं कि 'इसे मत छापियेगा' क्योंकि अमिताभ इससे 'इनकार' करेंगे और उनका 'कैम्प' बयान देगा कि 'शी इज़ नट्स लाइक परवीन बाबी'. तब उन्होंने जया बच्चन पर भी कुछ टिप्पणी की थी.
बरसों बाद में एक आयोजन में जब रेखा ने जया बच्चन को गले लगाया होगा तो दोनों के मन में कितना कुछ टूटा और बना होगा! क्या समय सचमुच कुछ घाव भर देता है या उन पर भावनाओं की नई मरहम लगा जाता है! इस टूटने-बनने की शुरुआत के दो महीने बाद एक साक्षात्कार में यश चोपड़ा के इस प्रेम कहानी पर फिर से चर्चा छेड़ देने से क्या असर पड़ा होगा! अगर आज जहाज़ में साथ होने की बात सही है तो इन दोनों ने छूटे वक़्त की दूरी को कैसे लांघा होगा! बारी निज़ामी के गीत में चले जाने वाले ऊँट के सवार क्या फिर आते हैं! अगर वे लौट भी आते हैं तो क्या मरुथल की विरहणी के पाँवों की टीस और दिल के कचोट का ईलाज हो जाता होगा! अच्छा होता कि यश जी वह बात ना करते. अच्छा होगा कि हम भी चुप हो जाएँ. निज़ामी कहते हैं कि इश्क़ की राह में रास्ता भटकने वालों को लम्बी दूरी तय करनी होती है.    

Thursday, October 10, 2013

दरअसल : सीख रहे हैं अमिताभ बच्चन


-अजय ब्रह्मात्मज
    इस बार ‘कौन बनेगा करोड़पति’ की टैगलाइन है  -सीखना बंद तो जीतना बंद। ऐसा लगता है कि सिद्धार्थ बसु और सेानी की टीम ने अमिताभ बच्चन के क्रिया-कलापों को नजदीक से देखने के बाद ही इस टैगलाइन के बारे में सोचा । पिछले कई सालों से अमिताभ बच्चन ‘कौन बनेगा करोड़पति’ पेश कर रहे हैं। हर साल थोड़ी तब्दीली आती है। उस तब्दीली के साथ अमिताभ बच्चन ताजगी ले आते हैं। उनकी सीखने की ललक अभी तक खत्म नहीं हुई है। आम तौर पर भारतीय समाज और परिवार में बुजुर्ग सीखना बंद कर देते हैं। वे नई तकनीक से बहुत घबराते हैं। चाल-चलन और व्यवहार में भी उन्हें नई बातें पसंद नहीं आतीं। यही वजह होती है कि वे हमेशा अपने दिनों और समय की याद करते हैं। खीझते हैं और कुंठित होते हैं।
    हिंदी फिल्मों में अमिताभ बच्चन ने चौवालिस साल बिता दिए। कई बार उनके करिअर की इतिश्री की गई और श्रद्धांजलि तक लिखी गई, लेकिन हर बार वे किसी अमरपक्षी की तरह राख से लहरा कर उठे और उन्होंने नई ऊंचाइयां हासिल कीं। फिल्मों के बाद टीवी पर भी सफल पारी खेली। वे अभी तक सक्रिय हैं। फिलहाल उनके प्रशंसक और दर्शक ‘कौन बनेगा करोड़पति’ का आनंद उठा रहे हैं। अगले साल कुछ फिल्में भी आ जाएंगी।
    अमिताभ बच्चन की मौजूदगी और सक्रियता ने लेखकों और निर्देशक ों की कल्पना को नई उड़ान दी है। वे उम्रदराज किरदारों के बारे में सोचने लगे हैं। अमिताभ बच्चन को ध्यान में रख कर फिल्मों की स्क्रिप्ट लिखी जाती हैं। अगर उन फिल्मों के लिए वे मना कर दें तो किसी और के साथ उन फिल्मों के लिए वे मना कर दें तो किसी और के साथ उन फिल्मों को पूरा नहीं किया जा सकता। इस लिहाज से अमिताभ बचन का कोई विकल्प नहीं है। हिंदी फिल्मों में ऐसे उदाहरण कम मिलते हैं, जहां साठ से अधिक उम्र के कलाकारों को केंद्रीय भूमिका सौंपी जाए। अपने इस महत्व के बावजूद अमिताभ बच्चन ने कभी कोई दावा नहीं किया। उन्होंने हमेशा अपने निर्देशकों और अब युवा कलाकारों को इसका श्रेय दिया। वे हमेशा यही कहते हैं कि निर्देशकों ने मुझे जो कहा, मैंने उनका पालन किया।
    पिछले चौदह-पंद्रह सालों में उनसे लगातार मिलने के अपने अनुभवों के आधार पर कह सकता हूं कि परिचितों के साथ वे एक निश्चित दूरी कायम रखते हैं। ज्यादातर मुलाकातें औपचारिक होती हैं। सुनिश्चित मुद्दे से अलग विषय पर बातें करना मुमकिन नहीं होता। फिर भी उनकी मुलाकातों से कोई असंतुष्ट होकर नहीं लौटता। इन दिनों कुछ कलाकार और निर्देशक पत्रकारों पर आक्षेप लगाते हैं कि वे एक जैसे ही सवाल करते हैं। अमिताभ बच्चन ने कभी ऐसी शिकायत नहीं की। एक बार तो उन्होंने दिन भर में 56 इंटरव्यू दिए। वे सभी इंटरव्यू एक-दूसरे से अलग थे। उन्होंने न तो कोई उकताहट दिखाई और न एक जैसे सवाल से खीझे। अपने तई उन्होंने एक जैसे सवालों के भी डिफरेंट जवाब दिए। वे अपने प्रोफेशन की जरूरतों को अच्छी तरह समझते हैं।
    अमिताभ बच्चन अपनी अच्छी-बुरी फिल्मों में फर्क नहीं करते। उनके लिए हिट और फ्लॉप दोनों फिल्में समान हैं। एक इंटरव्यू में उन्होंने यह जरूर कहा था कि फिल्म फ्लॉप होने पर उसमें किया गया अच्छा काम भी भुला दिया जाता है। उन्हें अपनी तीन फिल्मों के न चलने का बेहद अफसोस है - ‘नि:शब्द’, ‘आलाप’ और ‘मैं आजाद हूं’। तीनों ही फिल्मों में उन्होंने कुछ नया करने की कोशिश की थी। कुछ सालों पहले आई ‘पा’ सफल होने पर वे बहुत खुश हुए थे। अमिताभ बच्चन मानते हैं कि देश के दर्शक सजग और समझदार हैं। वे अच्छी-बुरी फिल्में समझ लेते हैं, लेकिन कई बार उनसे भी चूक होती है। इसके बावजूद हिंदी फिल्मों के विकास और विस्तार का श्रेय वे दर्शकों को ही देते हैं।
    निजी तौर पर व्यवस्थित और संगठित होने के बावजूद वे मानते हैं कि नई पीढ़ी के कलाकार अधिक समझदार और सुव्यवस्थित हैं। वे उनसे सीखने-समझने की कोशिश करते हैं। उनके नियमित संपर्क में रहने के लिए उनकी भाषा में बातें करते हैं। सोशल मीडिया नेटवर्क पर अपनी उपस्थिति और नियमितता से उन्होंने सभी को चौंका दिया है। अनेक व्यक्ति यही मानते हैं कि उनके ब्लॉग कोई और लिखता होगा। सच्चाई यह है कि हर रात सोने के पहले वे अपना ब्लॉग अपडेट करते हैं। वे समय मिलते ही ट््िवटर पर आते हैं। वे ब्लॉग और ट्विटर के पाठकों और फॉलोवर को अपना विस्तारित परिवार कहते हैं। वे उनके सुख-दुख में शब्दों से शामिल होते हैं।



Tuesday, October 8, 2013

अमिताभ बच्‍चन पर जयप्रकाश चौकसे के दो पुराने लेख



मुझे ये दोनों लेख अमित जैन के सौजन्‍य से प्राप्‍त हुए। जयप्रकाश चौकसे धनी हैं कि उनके ऐसे प्रशंसक पाठक हैं,जिन्‍होंने उनकी रचनाएं संभाल कर रखी हैं। आप सभी कुछ लिखना या भेजना चाहें तो स्‍वागत है। पता है... brahmatmaj@gmail.com
अमिताभ हुए पचपन के
जयप्रकाश चौकसे
ग्‍यारह अक्‍टूबर को अमिताभ बच्‍चन पचपन के हो गए हैं। इस समय वे अपने जीवन के भीषण संघर्ष काल से गुजर रहे हैं, परंतु ये संघर्ष बोफोर्स के आरोप वाले काले खंड के संघर्ष से कम वेदनामय है, क्‍योंकि अफवाहों के उन अंधड़ वाले दिनों में उन्‍हें देशद्रोही तक करार दिया था। सुभाष घई और राहुल रवैल ने अपनी निर्माणाधीन फिल्‍मों को निरस्‍त कर दिया था। मौजूदा संकट में उन्‍हें पहली बार वादे से मुकरना पड़ा कि बैंगलोर की अपाहिज बच्‍चों की संस्‍था को वे पचास लाख के बदले केवल 20 रु. दे पाए। अंतरराष्‍ट्रीय सौंदर्य प्रतियोगिता की असफलता ने अमिताभ की कंपनी को बहुत कष्‍ट में डाल दिया। प्राय: आयोजन धन कमाते हैं, परंतु विवादों के कारण अमिताभ को घाटा सहना पड़ा। घाटे के बावजूद उन्‍होंने 20 लाख रु. स्‍पास्टिक संस्‍थान को दिए। अब चायक आक्रामक मुद्रा में खड़ा हो जाए तो दाता अमिताभ क्‍या कर सकते हैं? मृत्‍युदाता की असफलता ने अमिताभ की सितारा हैसियत पर प्रश्‍नचिन्‍ह लगा दिया है, परंतु अभिनय क्षमता आज भी निर्विवाद है। मनमोहन देसाई और प्रकाश मेहरा को जीनियस मानने वाली विचार प्रक्रिया का अंत मेहुल कुमार पर होना ही था। जिन लोगों ने हरिवंशराय बच्‍चन की किताबें पढ़ीं हैं उनके लिए अमिताभ में व्‍यवसाय बुद्धि की कमी होना कोई आश्‍चर्य की बात नहीं है। बचपन से ही अजिताभ व्‍यवसायी प्रवृत्ति के रहे हैं।
      अजिताभ ने कार्पोरेशन का कार्यभार संभालते ही संगीत कक्ष गुलशन कुमार को बेच दिया और कंपनी में सफेद हाथियों की संख्‍या कम कर दी। सारे साधन मेजर साहब को पूरा करने में लगा दिए हैं और यह फिल्‍म कंपनी की साख वापस ला सकती है। अमिताभ बच्‍चन कार्पोरेशन में बचाव कार्य तेजी से चल रहे हैं। कंपनियों और इमारतों क बचाव कार्य से कहीं ज्‍यादा मुश्किल है, व्‍यावसायिक साख और व्‍य‍क्गित रिश्‍तों की दरारों को भरना। दोनों बच्‍चन बंधु इस कार्य में लगे हैं। यूरोप की गॉसिप पत्रिकाओं में अजिताभ और उनकी पत्‍नी के खिलाफ बहुत विषवमन किया है। भारतीय सिने पत्रिकाएं भी रेखा अमिताभ बच्‍चन के पुनर्मिलन के किस्‍सों से भरी पड़ी है। उधर जया बच्‍चन ने हजार चौरासी की मां में अपने अभिनय के जौहर फिर दिखाए हैं। जया ने अपनी प्रतिभा और गरिमा को अक्षुण्‍ण बनाए रखा है। अगर पारंपरिक मूल्‍यों और मानदंडों के अनुरूप अमिताभ और जया के दृष्टि मिलन की बात करें, तो कहना होगा कि अमिताभ की पलक झपकी है परंतु जया की दृष्टि स्थिर है। यह उनके व्‍यक्गित मामले हैं। अमिताभ बच्‍चन को निर्देशक बनने का शौक है और कई फिल्‍मों में वे दूसरों के कंधे पर बंदूक रखकर चलाते रहे हैं। अब खुलकर सामने आने का समय है। जया बच्‍चन भी निर्देशन करना चाहती हैं, परंतु उनकी बनाई फिल्‍म कला फिल्‍म ही होगी या उन्‍होंने खुद से बहुत रियायत बरती तो ऋषिकेश मुखर्जी की तरह मध्‍यम मार्गीय फिल्‍म होगी। अभिषेक के लिए भी शंखनाद की तैयारी है, परंतु सभी चीजें 26 जनवरी को मेजर साहब के प्रदर्शन के बाद। पचपन की अवस्‍था ढलान का प्रारंभ है, परंतु अनुभव से सधे कदम सफर को सुरक्षित बना देते हैं। लुढ़कने के ख‍तरे अनेक हैं। अमिताभ ने हमेशा लड़ाकू पात्र को जीया है, अत: पात्र में कुछ उनका जुझारू रूप आया है, तो पात्र को कुछ जीवट भी उन्‍होंने पाया होगा। अभिनेता और पात्र के बीच भी आदान प्रदान का एक रिश्‍ता होता है। ऊर्जा का प्रवाह दो तरफा होता है। इसीलिए अमिताभ बच्‍चन आज भी एक संभावना हैं।


परदे के पीछे
जयप्रकाश चौकसे
जिस्‍मानी दूरी और जन्‍मदिन की निकटता

ग्‍यारह अक्‍टूबर अमिताभ बच्‍चन का जन्‍मदिवस है और रेखा का जन्‍मदिन दस अक्‍टूबर है। एक दौर में इनका प्रेम प्रकरण सुर्खियों में छाया था और भीतरी जानकारों का ख्‍याल है कि सुर्खियों के मिट जाने के बाद भी अंतरंग संबंध का कोमल तार कायम रहा है। कौन बनेगा करोड़पति कार्यक्रम का वर्तमान दौर अत्‍यंत लोकप्रिय है, क्‍योंकि छोटे शहरों और कस्‍बों के आम आदमियों को अवसर मिल रहे हैं और उभरते भारत की झलक इसमें मौजूद है। अमिताभ बच्‍चन इसका संचालन बड़ी कुशलता से कर रहे हैं। खबर यह है कि बोनी कपूर ने रेखा को सहारा टेलीविजन पर दिखाए जाने वाले एक रिएलिटी शो के संचालन के लिए तैयार कर लिया है। आजकल किसी भी क्षेत्र में कभी लोकप्रिय रहा व्‍यक्ति एक नया अवसर पा जाता है, क्‍योंकि ब्रांड बन जाने के बाद लोग उसे पुन: देखना चाहते हैं। लोकप्रियता एक तरह का फिक्‍स्‍ड डिपॉजिट है, जिसमें से अवसर निकाले जा सकते हैं। कलाकार की लोकप्रियता ताउम्र काम आती है, परंतु नेता की लोकप्रियता चुनाव में खुद की या दल की पराजय के बाद काम नहीं आती।
      टेक्‍नोलॉजी के कारण विकसित डीवीडी और सैटेलाइट पर जारी होने वाली पुरानी फिल्‍मों के कारण गुजरे वक्‍त के कलाकार वर्तमान में भी लोकप्रिय हैं और गुणवत्‍ता वाली फिल्‍मों में अभिनय के कारण कुछ कलाकार भविष्‍य में भी लोकप्रिय बने रहेंगे। आज चरित्र भूमिकाओं के लिए गुजरे जमाने के अच्‍छे कलाकारों को खूब धन मिल रहा है। सच तो यह है कि शिखर दिनों में उन्‍होंने कल्‍पना भी नहीं की होगी कि करिअर के संध्‍या काल में इतना अधिक धन मिलेगा। अमिताभ बच्‍चन अपनी अभिनय प्रतिभा के दम पर आज भी अवसर और धन पा रहे हैं और अपने पुत्र अभिषेक से ज्‍यादा कमा रहे हैं। फिल्‍म उद्योग में अनेक ऐसे लोग हैं, जो उजागर और न उजागर होने वाले कारणों से एक व्‍यक्ति के रूप में अमिताभ बच्‍चन का सम्‍मान नहीं करते, परंतु वे लोग भी स्‍वीकार करते हैं कि वह विलक्षण कलाकार हैं। यहां तक कि तीस सेकंड की विज्ञापन फिल्‍मों में भी उनकी कुशलता देखी जा सकती है। वह अनेक व्‍याधियों से पीडि़त हैं और अनेक बार उनकी शल्‍य क्रिया हो चुकी है, परंतु अपनी अदम्‍य इच्‍छाशक्ति, अनुशासन और परिश्रम से वह अपना कार्य करते जा रहे हैं। उनके पिता हरिवंश राय बच्‍चन भी जुझारू रहे हैं और उनकी माता तेजी बच्‍चन हनुमान जी की अनन्‍य भक्‍त रही हैं। अमिताभ के जीन्‍स में ही संघर्ष है, परंतु यही सब शायद उनके सगे भाई अजिताभ के पास उनके परिणाम में नहीं है और यह जेनेटिक प्रभाव अभिषेक तक पहुंचते हुए शायद कमजोर पड़ गया है। हरिवंशजी अत्‍यंत गरीब परिवार में जन्‍मे और अमिताभ बच्‍चन के युवा होने के समय तक भी परिवार केवल उच्‍च मध्‍यम आय वर्ग का रहा, परंतु अभिषेक अत्‍यंत धनाढ्य परिवार की सुविधाभोगी संतान हैं।
      इसी तरह रेखा सितारा पुत्री अवश्‍य हें, परंतु उनके बचपन में ही उनके माता-पिता के संबंध बिगड़ जाने से तेरह वर्ष की वय में भी अपनी मां के लिए वह कमाऊ पुत्री हो गई। टूटे हुए परिवार की संतान कें मन का विकास अवरुद्ध रह सकता है। अपने बिंदास व्‍यवहार और मांसलता के कारण फिल्‍म जगत में कमसिन उम्र में ही लोकप्रियता पाने वाली रेखा अत्‍यंत मूडी और सनकी रहीं, परंतु दो अनजाने में अमिताभ के साथ मैत्री होते ही उसमें परिवर्तन आए।
      बर्नार्ड शॉ के नाटक की तरह अमिताभ उनके लिए मार्गदर्शक प्रोफेसर हिगिन्‍स की भूमिका में आए और रेखा कालांतर में उमराव जान अदा बन गईं। दो लोगों के बीच संबंध का रसायन विचित्र होता है। यह किस तरह काम करता है, बताया नहीं जा सकता और सबसे अधिक विचित्र यह है कि सिनेमा के परदे पर यह रसायन जाने कैसे उजागर होता है। अमिताभ बच्‍चन ने अपनी पत्‍नी जया बच्‍चन सहित अनेक नायिकाओं के साथ अभिनय किया, परंतु जो जादू उनके और रेखा के साथ देखा गया, वह अन्‍य किसी नायिका के साथ प्रस्‍तुत नहीं हुआ। यश चोपड़ा की सिलसिला में अमिताभ के साथ जया और रेखा थीं, परंतु यह प्रेम त्रिकोण फीका रहा। शायद प्रेम में प्रतिस्‍पर्धी की मौजूदगी के दबाव के कारण कोई भी स्‍वाभाविक नहीं रहा।
      बहरहाल, अमिताभ और रेखा अलग-अलग और साथ-साथ मनोरंजन जगत में अत्‍यंत महत्‍वपूर्ण रहे हैं। जीवन की पटकथा ने इन्‍हें आज दूरी पर रख दिया है, परंतु जन्‍मदिनों की निकटता किसी के मिटाए मिट नहीं सकती और एक को याद करो तो दूसरा याद आ ही जाता है। स्‍मृति में अंतरंगता कायम है।
एक्‍स्‍ट्रा शॉट...
वर्ष 1981 में प्रदर्शित यश चोपड़ा की फिल्‍म सिलसिला में अमिताभ बच्‍चन व रेखा आखिरी बार साथ नजर आए थे।



Friday, August 30, 2013

फिल्‍म समीक्षा : सत्‍याग्रह

  -अजय ब्रह्मात्‍मज 
                  इस फिल्म के शीर्षक गीत में स्वर और ध्वनि के मेल से उच्चारित 'सत्याग्रह' का प्रभाव फिल्म के चित्रण में भी उतर जाता तो यह 2013 की उल्लेखनीय और महत्वपूर्ण सामाजिक-राजनीतिक फिल्म हो जाती। प्रकाश झा की फिल्मों में सामाजिक संदर्भ दूसरे फिल्मकारों से बेहतर और सटीक होता है। इस बार उन्होंने भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाया है। प्रशासन के भ्रष्टाचार के खिलाफ द्वारिका आनंद की मुहिम इस फिल्म के धुरी है। बाकी किरदार इसी धुरी से परिचालित होते हैं।
              द्वारिका आनंद ईमानदार व्यक्ति हैं। अध्यापन से सेवानिवृत हो चुके द्वारिका आनंद का बेटा भी ईमानदार इंजीनियर है। बेटे का दोस्त मानव देश में आई आर्थिक उदारता के बाद का उद्यमी है। अपने बिजनेस के विस्तार के लिए वह कोई भी तरकीब अपना सकता है। द्वारिका और मानव के बीच झड़प भी होती है। फिल्म की कहानी द्वारिका आनंद के बेटे की मृत्यु से आरंभ होती है। उनकी मृत्यु पर राज्य के गृहमंत्री द्वारा 25 लाख रुपए के मुआवजे की रकम हासिल करने में हुई दिक्कतों से द्वारिका प्रशासन को थप्पड़ मारते हैं। इस अपराध में उन्हें हिरासत में ले लिया जाता है। मानव सोशल मीडिया नेटवर्क के जरिए चालाकी से उनकी मुक्ति के लिए एक अभियान आरंभ करता है। उसमें स्थानीय महत्वाकांक्षी नेता अर्जुन और टीवी पत्रकार यास्मीन अहमद शामिल हो जाते हैं। इस अभियान के निशाने पर गृह मंत्री बलराम सिंह, स्थानीय प्रशासन और सरकार हैं।
                    लेखक-निर्देशक ने ध्यानपूर्वक भ्रष्टाचार के मुद्दे को देश की सामाजिक जिंदगी से जोड़ा है। अन्ना हजारे के आंदोलन और अरविंद केजरीवाल के आम आदमी अभियान से भ्रष्टाचार भारतीयों के बीच विचार-विमर्श का प्रमुख विषय बना हुआ है। इसी विषय को प्रकाश झा ने द्वारिका आनंद के नायकत्व में पेश किया है। रिलीज होने तक यह चर्चा रही कि क्या द्वारिका आनंद का किरदार अन्ना हजारे से प्रभावित है। फिल्म के प्रतीकात्मक दृश्यों पर गौर करें तो यह मुख्य रूप से गांधी की छवि से प्रभावित है। उनके विचारों की छाया भर ही है द्वारिका आनंद की करनी में। उद्विग्नता में द्वारिका आनंद का हे राम कहना, सुमित्रा और यास्मीन के कंधों का सहारा लेकर खड़ा होना (महात्मा गांधी अंतिम दिनों में मनु और मीरा के कंधों पर हाथ दिए चलते थे), क्लाइमेक्स में छाती पर लगी तीन गोलियां .. इनके अलावा आमरण अनशन, अहिंसा पर बल और लेटने का अंदाज। गांधी के अलावा जयप्रकाश नारायण और अन्ना हजारे की भी प्रतिछवियां हैं द्वारिका आनंद में। दरअसल, जब भी कोई बुजुर्ग राजनीतिक प्रतिरोध में खड़ा होगा तो आचरण और विचार में गांधी एवं जयप्रकाश नारायण के करीब लगेगा।
                'सत्याग्रह' में द्वारिका आनंद और मानव के बीच के रिश्ते का द्वंद्व भी है। द्वारिका के प्रभाव में मानव के विचारों में परिवर्तन आता है। वह 6 हजार करोड़ से ज्यादा की संपत्ति का आनन-फानन में बंटवारा कर देता है। वैसे देश की आजादी के बाद से ऐसा कोई उद्यमी वास्तविक जिंदगी में दिखाई नहीं पड़ा है। लेखक-निर्देशक की आदर्शवादी कल्पना फिल्म की सोच में सहायक होती है। यास्मीन अहमद (करीना कपूर) के किरदार में भी ऐसी लिबर्टी ली गई है। अंबिकापुर में वह अकेली टीवी पत्रकार हैं और आंदोलन में शामिल होने के साथ वह फैसले भी लेने लगती है, जबकि अंत तक वह नौकरी में हैं। अर्जुन के किरदार पर मेहनत नहीं की गई है। गुंडागर्दी की वजह से कालेज से निष्कासित छात्र पर बाद में नेता बनना और द्वारिका के समर्थन में खड़ा होने के बीच भी कुछ हुआ होगा। फिल्म में भारत मुक्ति दल के रूप में सांप्रदायिक राजनीतिक पार्टी का चित्रण.. फिल्म के राजनीतिक चित्रण में वैचारिक घालमेल है। यह सब फिल्म की सुविधा के लिए किया गया है। पटकथा की रवानी में इन पर आम दर्शक का ज्यादा ध्यान नहीं जाता। 'सत्याग्रह' में राजनीतिक स्पष्टता नहीं है।
              निगेटिव किरदार के रूप में बलराम सिंह की कल्पना सच के करीब है। बलराम सिंह की राजनीतिक धौंस में किसी बाहुबली के मानस का सही चित्रण हुआ है। वह अपनी चालाकियों और कतरब्योंत में आज का अवसरवादी राजनीतिज्ञ दिखता है। मनोज बाजपेयी ने उसे सही तरीके से पर्दे पर उतारा है। मनोज बाजपेयी फिल्म में कहीं भी लाउड नहीं होते। वे कॉमिकल भी नहीं होते। फिर भी बलराम सिंह की मंशा और नकारात्मकता को पर्दे पर उतारने में सफल होते हैं। वे इस दौर में सघन प्रतिभा के धनी अभिनेता हैं। अजय देवगन के क्लोज शॉट में उम्र झांकने लगी है। इसके बावजूद उन्होंने मानव के स्वभाव और दुविधा को संयमित और भावानुकूल तरीके से पेश किया है। अर्जुन रामपाल और करीना कपूर निराश करते हैं। छोटी भूमिका में अमृता राव प्रभावित करती हैं, जबकि पर्दे पर और निर्वाह में वह अनेक किरदारों से छिप जाती हैं।
             प्रकाश झा की 'सत्याग्रह' उनकी पिछली फिल्मों की ही कड़ी में हैं। पिछली फिल्मों की ही तरह वे इस बार भी समाज में व्याप्त समस्या को कुछ चरित्रों के माध्यम से चित्रित करते हैं। कहानी परिवार से शुरू होती है और फिर समाज में शामिल हो जाती है। इस प्रक्रिया में उसका राजनीतिक पक्ष भी उजागर होता है। आज के कमाऊ सिनेमा के प्रचलित फॉर्मूलों से अलग जाकर एक सार्थक और उद्देश्यपूर्ण फिल्म बनाने की इस कोशिश में शामिल सभी प्रतिभाओं का प्रयास प्रशंसनीय है।
अवधि-140 मिनट

Thursday, May 23, 2013

कान फिल्म फेस्टिवल में गूंजी हिंदी



-अजय ब्रह्मात्मज
    देवियों और सज्जनों, नमस्कार। भारतीय सिनेमा 100 वर्ष पूरे कर चुका है और इस अवसर पर में कान फिल्म फेस्टिवल में अपना आभार प्रकट करता हूं और धन्यवाद देता हूं कि मुझे आज यहां आमंत्रित किया और इतने भव्य समारोह में हमें सम्मानित किया।
    मुख्य रूप से चार मनोभावों को और  ़ ़ ़ और से जोड़ता हिंदी में बोला गया यह लंबा वाक्य अमिताभ बच्चन के आत्मविश्वास को जाहिर करता है। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में फिलहाल अमिताभ बच्चन अकेले ऐसे शख्स हैं, जो निस्संकोच और धाराप्रवाह हिंदी बोलते हैं। आप उनसे हिंदी में सवाल पूछें तो उसका जवाब हिंदी में मिलेगा। आप के सवाल में भले ही आदतन अंग्रेजी के शब्द आ गए हों, लेकिन वे जवाब देते समय अंग्रजी के एक भी शब्द का प्रयोग नहीं करते। उनकी भाषा सातवें-आठवें दशकों के मुहावरे और शब्दों से सनी होती है। हम जिन शब्दों का प्रयोग भूल गए हैं या जिनका अनुचित उपयोग करते हैं। अमिताभ बच्चन उन शब्दों को आज भी पुराने संदर्भ और अर्थ में इस्तेमाल करते हैं।
    अमिताभ बच्चन ने पहली बार हालीवुड की एक फिल्म में काम किया है। ‘द ग्रेट गैट्सबाय’ नामक उनकी फिल्म कुछ ही दिनों पहले अमेरिका में रिलीज हुई थी। कान फिल्म फेस्टिवल की ओपनिंग फिल्म के रूप में चुनी गई इस फिल्म के निर्देशक और सह कलाकारों के साथ अमिताभ बच्चन मंच पर मौजूद रहे। कान फिल्म समारोह के आधिकारिक उद्घाटन के लिए उन्हें लियोनाडो डिकैप्रियो के साथ आमंत्रित किया गया। अमिताभ बच्चन ने पहले अपनी बात अंग्रेजी में रखी और फिर हिंदी में अपने मनोभाव दोहराना नहीं भूले। हिंदी बोलते समय उनकी आंखें चमक रही थीं। किसी भी भाषा के सम्मान के ये क्षण महत्वपूर्ण होते हैं। खास कर हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के लिए यह और भी उल्लेखनीय है, क्योंकि यहां हिंदी का चलन दिनोंदिन कम होता जा रहा है। सिर्फ फिल्में हिंदी में बनती हैं। उनके सवांद हिंदी में रहते हैं। बाकी कारोबार और व्यवहार की भाषा अंग्रेजी हो चुकी है।
    हिंदी फिल्म इंडस्ट्री का यह विचित्र व्यवहार दुनिया में अनोखा है। मुझे नहीं मालूम कि चीनी, कोरियाई, जर्मन, तमिल, तेलुगू और बंगाली फिल्में अपनी भाषाओं में लिखी जाती हैं कि अगे्रजी में ़ ़ ़ या फिर रोमन हिंदी की तरह रोमन चीनी, रोमन कोरियाई, रोमन जर्मन, रोमन तमिल, रोमन तेलुगू और रोमन बंगाली में ़ ़ ़ कितनी शर्म की बात है कि हिंदी फिल्मों का पहला पोस्टर रोमन हिंदी में आता है। हर इवेंट, प्रेस कांफ्रेंस और इंटरव्यू में फिल्म बिरादरी की प्राथमिकता अंग्रेजी रहती है। अगर आप हिंदी पत्र-पत्रिका से जुड़े पत्रकार हैं या हिंदी में सवाल करते हैं तो आप को हेय एवं तुच्छ नजरों से देखा जाता है। चंद हिंदी फिल्म पत्रकारों से मुंबई के कलाकार मुखामुखम बातें करते हैं। ज्यादातर मामलों में सामूहिक साक्षात्कार का सिलसिला चल पड़ा है। अफसोस की बात है कि असुरक्षा भाव की वजह से अखबार और पत्रकार इस सिलसिले का विरोध नहीं करते।
    हम कान फिल्म फेस्टिवल में अमिताभ बच्चन के हिंदी संभाषण की बात कर रहे थे। कान फिल्म फेस्टिवल में इस बार भारतीय सिनेमा 100 साल को रेखांकित किया जा रहा है। कुछ पाठकों को याद होगा कि पहले ही साल कान फिल्म फेस्टिवल में चेतन आनंद की फिल्म ‘नीचा नगर’ को श्रेष्ठ फिल्म का पुरस्कार मिला था। इस साल एक अंतराल के बाद भारत की चार फिल्में वहां विभिन्न खंडों में प्रदर्शित की जा रही है। यह भी सुयोग है कि चारों फिल्मों के साथ किसी न किसी रूप में अनुराग कश्यप जुड़े हुए हैं। यहां सचमुच एक उपलब्धि है। हालांकि पहले भी भारत की ऐसी मौजूदगी रही है। फर्क इतना आया है कि अब फेस्टिवल में प्रदर्शित फिल्में आगे-पीछे थिएटर भी पहुंच रही है। आम दर्शक उन्हें देख पा रहे हैं।
    इस साल यह भी उल्लेखनीय है कि विद्या बालन कान फिल्म फिल्म फेस्टिवल के निर्णायक मंडल की सदस्य हैं। एक अलग निर्णायक मंडल में नंदिता दास भी हैं। भारत से अनेक कलाकार, फिल्मकार और तकनीशियन कान फिल्म फेस्टिवल में गए हैं। नया जोश दिख रहा है। कान फिल्म फेस्टिवल में भारत की मौजूदगी और हिंदी की गूंज सालों यार रहेगी। धन्यवाद कान फिल्म फेस्टिवल, प्रणाम अमिताभ बच्चन।



Thursday, May 16, 2013

कान फिल्‍म फेस्टिवल में अमिताभ बच्‍चन का हिंदी संभाषण

कान फिल्‍म फेस्टिवल के उद्घाटन समारोह में अमिताभ बच्‍चन का हिंदी संभाषण....



Wednesday, January 9, 2013

बाबूजी की कमी खलती है- अमिताभ बच्चन

यह इंटरव्‍यू रघुवेन्‍द्र सिंह के ब्‍लॉग से लिया गया है चवन्‍नी के पाठ‍कों के लिए....
अमिताभ बच्चन ने दिल में अपने बाबूजी हरिवंशराय बच्चन की स्मृतियां संजोकर रखी हैं. बाबूजी के साथ रिश्ते की मधुरता और गहराई को अमिताभ बच्चन से विशेष भेंट में रघुवेन्द्र सिंह ने समझने का प्रयास किया
लगता है कि अमिताभ बच्चन के समक्ष उम्र ने हार मान ली है. हर वर्ष जीवन का एक नया बसंत आता है और अडिग, मज़बूत और हिम्मत के साथ डंटकर खड़े अमिताभ को बस छूकर गुज़र जाता है. वे सत्तर वर्ष के हो चुके हैं, लेकिन उन्हें बुजऱ्ुग कहते हुए हम सबको झिझक होती है. प्रतीत होता है  िक यह शब्द उनके लिए ईज़ाद ही नहीं हुआ है.
उनका $कद, गरिमा, प्रतिष्ठा, लोकप्रियता समय के साथ एक नई ऊंचाई छूती जा रही है. वह साहस और आत्मविश्वास के साथ अथक चलते, और बस चलते ही जा रहे हैं. वह अंजाने में एक ऐसी रेखा खींचते जा रहे हैं, जिससे लंबी रेखा खींचना आने वाली कई पीढिय़ों के लिए चुनौती होगी. वह नौजवान पीढ़ी के साथ $कदम से $कदम मिलाकर चलते हैं और अपनी सक्रियता एवं ऊर्जा से मॉडर्न जेनरेशन को हैरान करते हैं.
अपने बाबूजी हरिवंशराय बच्चन के लेखन को वह सबसे बड़ी धरोहर मानते हैं. आज भी विशेष अवसरों पर उन्हें बाबूजी की याद आती है. पिछले महीने 11 अक्टूबर को अमिताभ बच्चन का जन्मदिन बहुत धूमधाम से अनोखे अंदाज़ में सेलीब्रेट किया गया. इस माह की 27 तारी$ख को उनके बाबूजी का जन्मदिन है. प्रस्तुत है अमिताभ बच्चन से उनके जन्मदिन एवं उनके बाबूजी के बारे में विस्तृत बातचीत.  

पिछले दिनों आपके सत्तरवें जन्मदिन को लेकर आपके शुभचिंतकों, प्रशंसकों और मीडिया में बहुत उत्साह रहा. आपकी मन:स्थिति क्या है?
मन:स्थिति यह है कि एक और साल बीत गया है और मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि क्यों इतना उत्साह है सबके मन में? प्रत्येक प्राणी के जीवन का एक साल बीत जाता है, मेरा भी एक और साल निकल गया.
दुनिया की नज़र में आपके पास सब कुछ है, मगर जीवन के इस पड़ाव पर अब आपको किन चीज़ों की आकांक्षा है? 
हमने कभी इस दृष्टि से न अपने आप को, न अपने जीवन को और न अपने व्यवसाय को देखा है. मैंने हमेशा माना है कि जैसे-जैसे, जो भी हमारे साथ होता जा रहा है, वह होता रहे. ईश्वर की कृपा बनी रहे. परिवार स्वस्थ रहे. मैंने कभी नहीं सोचा कि कल क्या करना है, ऐसा करने से क्या होगा या ऐसा न करने से क्या होगा. जीवन चलता जाता है, हम भी उसमें बहते जाते हैं.
एक सत्तर वर्षीय पुरुष को बुजुर्ग कहा जाता है, लेकिन आपके व्यक्तित्व पर यह शब्द उपयुक्त प्रतीत नहीं होता.
अब क्या बताऊं मैं इसके बारे में? बहुत बड़ी गलतफहमी लोगों को. लेकिन हूं तो मैं सत्तर वर्ष का. आजकल की जो नौजवान पीढ़ी है, उसके साथ हिलमिल जाने का मन करता है. क्या उनकी सोच है, क्या वो कर रहे हैं, उसे देखकर अच्छा लगता है. खासकर के हमारी फिल्म इंडस्ट्री की जो नई पीढ़ी है, जो नए कलाकार हैं, उन सबका जो एक आत्मबल है, एक ऐसी भावना है कि उनको सफल होना है और उनको मालूम है कि उसके लिए क्या-क्या करना चाहिए. इतना कॉन्फिडेंस हम लोगों में नहीं था. अभी भी नहीं है. अभी भी हम लोग बहुत डरते हैं. लेकिन आज की पीढ़ी जो है, वो हमसे ज्यादा ता$कतवर है और बहुत ही सक्षम तरीके से अपने करियर को, अपने जीवन को नापा-तौला है और फिर आगे बढ़े हैं. इतनी नाप-तौल हमको तो नहीं आती. लेकिन आकांक्षाएं जो हैं, वो मैं दूसरों पर छोड़ता हूं. आप यदि कोई चीज़ लाएं कि आपने ये नहीं किया है, आपको ऐसे करना चाहिए, तो मैं उस पर विचार करूंगा. आप कहें कि अपने आपके लिए सोचकर बताइए, तो वो मैं नहीं करता. इतनी क्षमता मुझमें नहीं है कि मैं देख सकूं कि मुझे क्या करना है. 
आप जिस तरीके से नौजवान पीढ़ी के साथ कदम से $कदम मिलाकर चलते हैं, वह देखकर लोगों को ताज्जुब होता है कि आप कैसे कर लेते हैं?
ये सब कहने वाली बातें हैं. कष्ट तो होता है, शारीरिक कष्ट होता है. अब जितना हो सकता है, उतना करते हैं, जब नहीं होता है तो बैठ जाते हैं. लेकिन ऐसा कहना कि न जाने कहां से एनर्जी आ रही है, तो क्या कहूं मैं? मैं ऐसा मानता हूं कि जब ये निश्चित हो जाए कि ये काम करना है, तो उसके बाद पूरी दृढ़ता और लगन के साथ उसे करना चाहिए. परिणाम क्या होता है, यह बाद में देखना चाहिए. एक बार जो तय हो गया, उसे हम करते हैं.
क्या आप मानते हैं कि आप शब्दों, विशेषणों आदि से ऊपर उठ चुके हैं? इस बारे में सोचना पड़ता है कि आपके नाम के साथ क्या विशेषण लगाएं?
मैं अपने बारे में कैसे मान सकता हूं? और ये जो तकलीफ है, वह आपकी है. मुझ पर क्यों थोप रहे हैं आप? मैंने तो कभी ऐसा माना नहीं है. आप लोग तो बहुत अच्छी-अच्छी बातें लिखते हैं, अच्छे-अच्छे खिताब देते हैं मुझे. मैंने कभी नहीं माना है उनको, तो मेरे लिए वह ठीक है. अब आप को कष्ट हो रहा हो, तो अब आप जानिए.
बचपन में अम्मा और बाबूजी आपका जन्मदिन किस प्रकार सेलीब्रेट करते थे?
जैसे आम घरों में मनाया जाता था. हम छोटे थे, तो हमारी उम्र के बच्चों के लिए पार्टी-वार्टी दी जाती थी, केक कटता था, कैंडल लगता है. हालांकि ये प्रथा अभी तक चल रही है. अंग्रेज़ चले गए, अपनी प्रथाएं छोड़ गए. पता नहीं क्यों अभी तक केक काटने की प्रथा बनी हुई है! मैं तो धीरे-धीरे उससे दूर हटता जा रहा हूं. बड़ा अजीब लगता है मुझे कि फूंक मारो, कैंडल बुझ जाए. जितनी उम्र है, उतने कैंडल लगाओ. बाबूजी भी इसको कुछ ज़्यादा पसंद नहीं करते थे. इसलिए उन्होंने एक छोटी-सी कविता लिखी थी, जिसे जन्मदिन के दिन वो गाया करते थे. हर्ष नव, वर्ष नव...  
अभिषेक बच्चन ने हालिया भेंट में बताया कि घर के किसी सदस्य के जन्मदिन पर दादाजी उपहार स्वरूप कविता लिखकर देते थे. क्या आपने उन्हें सहेजकर रखा है?
जी, वह एक छोटी-सी कविता लिखकर लाते थे. ज़्यादातर तो हर्ष नव, वर्ष नव... ही हम सुनते थे. उसके बाद बाबूजी-अम्माजी कई जगह गाते थे इसको.
क्या बचपन में आपने बाबूजी से किसी गिफ्ट की मांग की थी? क्या आपकी मांगों को वो पूरा करते थे? उन दिनों इतने समृद्ध नहीं थे आप लोग.
कई बार हमने ऐसी मांग की, लेकिन मां-बाबूजी की परिस्थितियां ऐसी नहीं थीं कि वह हमें मिल सके तो हम निराश हो जाते थे. और अभी यह सुनकर शायद अजीब लगे, लेकिन मेरे स्कूल में एक क्रिकेट क्लब बना और उसमें भर्ती होने के लिए मेंबरशिप फीस थी दो रुपए. मैं मां से मांगने गया, तो उन्होंने कहा कि दो रुपए नहीं हैं हमारे पास. एक बार मैंने कहा कि मुझे कैमरा चाहिए. पुराने जमाने में एक बॉक्स कैमरा होता था, वो एक-एक आने इकट्ठा करके मां जी ने अंत में मुझे कैमरा दिया.
कैमरे का शौक आपको कब लगा? पहला कैमरा आपने कब लिया?
शायद मैं दस या गयारह वर्ष का रहा होऊंगा. कुछ ऐसे ही सडक़ पर पेड़-वेड़ दिखता था, तो लगता था कि यह बहुत खूबसूरत है, उसकी छवि उतारनी चाहिए और इसलिए हमने मां जी से कहा कि हमको एक बॉक्स कैमरा लाकर दो. अभी भी बहुत सारे कैमरे हैं. ये हैं परेश (इंटरव्यू के दौरान हमारी तस्वीरें क्लिक कर रहे शख्स), यही देखभाल करते हैं. कैमरे का जो भी लेटेस्ट मॉडल निकलता है, उसे प्राप्त करना और उसे चलाना अच्छा लगता है मुझे. मैं घर में ही तस्वीरें लेता हूं, बच्चों की, परिवार की.
आपमें और अजिताभ में बाबूजी का लाडला कौन था? कौन उनके सानिध्य में ज़्यादा रहता था? बराबरी का हिस्सा था और हमेशा बाबूजी ने कहा कि जो भी होगा, आधा-आधा कर लो उसको.
क्या बाबूजी आपके स्कूल के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में आया करते थे? क्या वे सांस्कृतिक गतिविधियों में हिस्सा लेने के लिए आपका उत्साहवर्द्धन किया करते थे?
अब पता नहीं कि फाउंडर डे पर जो स्कूल प्ले होता है, उसको एक सांस्कृतिक ओहदा दिया जाए या... लेकिन जब भी हमारा फाउंडर डे होता था, तो मां-बाबूजी आते थे. हम नैनीताल में पढ़ रहे थे. वो लोग आते थे और हफ्ता-दस दिन हमारे साथ गुज़ारते थे. हमारा नाटक देखते थे. हमेशा उन्होंने हमारा साथ दिया. मां जी ने स्पोट्र्स में प्रोत्साहित किया.  
क्या आप बचपन में उनके संग कवि सम्मेलनों में जाते थे?
जी. प्रत्येक कवि सम्मेलन में बाबूजी ले जाते थे और मैं भी साथ जाता था. रात-बिरात दिल्ली के पास या इलाहाबाद के पास मैं उनके साथ जाता था.
बाबूजी के कद, उनकी गरिमा और प्रतिष्ठा का ज्ञान आपको कब हुआ? 
सारी ज़िन्दगी. मैं तो जब पैदा हुआ, तभी से बच्चन जी, बच्चन जी थे. और हमेशा मैं था हरिवंश राय बच्चन का पुत्र अमिताभ. कहीं भी हम जाएं, तो लोग कहें कि ये बच्चन जी के बेटे हैं. उनकी प्रतिष्ठा जग ज़ाहिर थी.
निजी जीवन पर अपने बाबूजी का सबसे गहरा असर क्या मानते हैं? क्या हिंदी भाषा पर आपकी इतनी ज़बरदस्त पकड़ का श्रेय हम उन्हें दे सकते हैं?
हां, क्यों नहीं. मैंने सबसे अधिक उन्हीं को पढ़ा है. उनकी जो कविताएं हैं, जो लेखन है, जो भी छोटा-मोटा ज्ञान मिला है, उन्हीं से मिला है. लेकिन हिंदी को समझना और उसका उच्चारण करना, दो अलग-अलग बातें हैं. मैं नहीं मानता हूं कि मेरी जिज्ञासा या मेरा ज्ञान हिंदी के प्रति बहुत ज्यादा अच्छा है. लेकिन मैं ऐसा समझता हूं कि किसी भाषा का उच्चारण सही होना चाहिए. उसमें त्रुटियां नहीं होनी चाहिए. हिंदी बोलें या गुजराती या तमिल या कन्नड़ बोलें, तो उसे सही ढंग से बोलने का हमारे मन में  हमेशा एक रहता है. और बिना बाबूजी के असर के मैं मानता हूं कि मेरा जीवन बड़ा नीरस होता. स्वयं को भागयशाली समझता हूं कि मैं मां-बाबूजी जैसे माता-पिता की संतान हूं. माता जी सिक्ख परिवार से थीं और बहुत ही अमीर घर की थीं. उनके फादर बार एटलॉ थे उस जमाने में. वह रेवेन्यू मिनिस्टर थे पंजाब सरकार के पटियाला में. अंग्रेजी, विलायती नैनीज़ होती थीं उनकी देखभाल के लिए. उस वातावरण से माता जी आईं और उन्होंने बाबूजी के साथ ब्याह किया. जो कि लोअर मीडिल क्लास से थे, उनके पास व्यवस्था ज़्यादा नहीं थी. ज़मीन पर बैठकर पढ़ाई-लिखाई करते थे, मिट्टी के तेल की लालटेन जलाकर काम करते थे, लाइट नहीं होती थी उन दिनों. मुझे लगता है कि कहीं न कहीं मां जी का जो वातावरण था, जो उनके खयाल थे, वह बहुत ही पश्चिमी था और बाबूजी का बहुत ही उत्तरी था. इन दोनों का इस्टर्न और वेस्टर्न मिश्रण जो है, वो मुझे प्राप्त हुआ. मैं अपने आप को बहुत भागयशाली समझता हूं कि इस तरह का वातावरण हमारे घर के अंदर हमेशा फलता रहा. कई बातें थीं, जो बाबूजी को शायद नहीं पसंद आती होंगी, लेकिन कई बातें थीं, जिसमें मां जी की रुचि थी- जैसे सिनेमा जाना, थिएटर देखना. इसमें बाबूजी की ज़्यादा रुचि नहीं होती थी. वह कहते थे कि यह वेस्ट ऑफ टाइम है, घर बैठकर पढ़ो. मां जी सोचती थीं कि हमारे चरित्र को और उजागर करने के लिए ज़रूरी है कि पढ़ाई के साथ-साथ थोड़ा-सा खेलकूद भी किया जाए. मां जी खुद हमें रेस्टोरेंट ले जाती थीं, बाबूजी न भी जाते हों. तो ये तालमेल था उनका जीवन के प्रति और वो संगम हमको मिल गया. 
दोनों अलग-अलग विचारधारा के लोग थे. आप किससे अधिक जुड़ाव महसूस करते थे?
दोनों से ही. उत्तरी-पश्चिमी दोनों सभ्यताएं हमें उनसे प्राप्त हुईं. और उनमें अंतर कब और कहां लाना है, यह हमारे ऊपर निर्भर करता है. वो सारा जो मिश्रण है, वह हमको सोचकर करना पड़ता है.
जया बच्चन के फिल्मफेयर को दिए गए एक पुराने साक्षात्कार में हमने पाया कि आपको लिखने का बहुत शौक है. उन्होंने बताया है कि जब आप काम ज़्यादा नहीं कर रहे थे, तो अपने कमरे में एकांत में लिखते रहते हैं. क्या आप लिखते थे, वो उन्होंने नहीं बताया है.
अच्छा हुआ कि वो उन्होंने नहीं बताया है, क्योंकि मुझसे भी आपको नहीं पता चलने वाला है कि मैंने क्या लिखा उन दिनों. बैठकर कुछ पढ़ते-लिखते रहना, फिर सितार उठाकर बजा दिया, गिटार उठाकर बजा लिया. ये सब हमको आता नहीं है, लेकिन ऐसे ही करते रहते थे. 
क्या बाबूजी की तरह आप भी कविताएं लिखते हैं?
कविता हमने नहीं लिखी. अस्पताल में जब था मैं 1982 में, कुली के एक्सीडेंट के बाद, उस समय एक दिन ऐसे ही भावुक होकर हमने अंग्रेज़ी में एक कविता लिख दी. वो हमने बाबूजी को सुनाई, जब वो हमसे मिलने आए. वो चुपचाप उसे ले गए और अगले दिन आकर कहा उसका हिंदी अनुवाद करके हमको दिखाया. उन्होंने कहा कि ये कविता बहुत अच्छी लिखी है, हमने इसका हिंदी अनुवाद किया है. ज़ाहिर है कि उनका जो हिंदी अनुवाद था, वह हमारी अंग्रेज़ी से बेहतर था. वो कविता शायद धर्मयुग वगैरह में छपी थी.  
जीवन में किन-किन पड़ावों पर आपको बाबूजी और अम्मा की कमी बहुत अखरती है?
प्रतिदिन कुछ न कुछ जीवन में ऐसा बीतता है, जब लगता है कि उनसे सलाह लेनी चाहिए, लेकिन वो हैं नहीं. लेकिन ये जीवन है, एक न एक दिन सबके साथ ऐसा ही होगा. माता-पिता का साया जो है, ईश्वर न करें, लेकिन खो जाता है. लेकिन जो बीती हुई बातें हैं, उनको सोचकर कि यदि मां-बाबूजी जीवित होते, तो वो क्या करते इन परिस्थितियों में? और फिर अपनी जो सोच रहती है उस विषय पर कि हां, मुझे लगता है कि उनका व्यवहार ऐसा होता, तो हम उसको करते हैं.
अपने अभिनय के बारे में बाबूजी की कोई टिप्पणी आपको याद है? वह आपके प्रशंसक थे या आलोचक? 
नहीं, वो बाद के दिनों में $िफल्में वगैरह देखते थे और जो फिल्म उनको पसंद नहीं आती थी, वो कहते थे कि बेटा, ये फिल्म हमको समझ में नहीं आई कि क्या है. हालांकि वो कुछ फिल्मों को पसंद भी करते थे और देखते थे. जब वो अस्वस्थ थे, तो प्रतिदिन शाम को हमारी एक फिल्म देखते थे.  
कभी ऐसा पल आया, जब उन्होंने इच्छा ज़ाहिर की हो कि आप फलां किस्म का रोल करें?
ऐसा कभी उन्होंने व्यक्त नहीं किया. मैंने कभी पूछा भी नहीं. उनके लिए भी समस्या हो जाती और हमारे लिए भी.
क्या बाबूजी को अपना हीरो मानते हैं? उनकी कोई बात, जो आज भी आपको प्रेरणा और हिम्मत देती है?
हां, बिल्कुल. साधारण व्यक्ति थे, मनोबल बहुत था उनमें, एक आत्मशक्ति थी उनमें. लेकिन $खास तौर पर उनका आत्मबल. कई उदाहरण हैं उनके. एक बार वो कोई चीज़ ठान लेते थे, फिर वो जब तक $खत्म न हो जाए, तब तक उसे छोड़ते नहीं थे. बाबूजी को पंडित जी (जवाहर लाल नेहरू) ने बुलाया और कहा कि ये आत्मकथा लिखी है माइकल पिशर्ड ने. हम चाहते हैं कि इसका हिंदी अनुवाद हो, लेकिन ये हमारे जन्मदिन के दिन छपकर निकल जानी चाहिए. अब केवल तीन महीने रह गए थे. तीन महीने में एक बॉयोग्रा$फी का पूरा अनुवाद करना और उसे छापना बड़ा मुश्किल काम था, लेकिन बाबूजी दिन-रात उस काम में लगे रहे. जो उनकी स्टडी होती थी, उसके बाहर वो एक पेंटिंग लगा देते थे. उसका मतलब होता था कि अंदर कोई नहीं जा सकता, अभी व्यस्त हूं. बैठे-बैठे जब वो थक जाएं, तो खड़े होकर लिखें, जब खड़े-खड़े थक जाएं, तो ज़मीन पर बैठकर लिखें. विलायत में भी वो ऐसा ही करते थे. जब वो विलायत में अपनी पीएचडी कर रहे थे, तो उन्होंने अपने लिए एक खास मेज़ खुद ही बनाया. उनके पास इतना पैसा नहीं था कि मेज़ खरीद सकें. एक दिन मैं ऐसे ही चला गया, तो मैंने देखा कि एक कटोरी में गरम पानी है और उसमें उन्होंने अपना बायां हाथ डुबोया था. मैंने कहा कि क्या हो गया? तो उन्होंने बताया कि दर्द हो रहा था. हमने कहा कि कैसे हो गया? तो कहा कि लिखते-लिखते दर्द होने लगा. हमने कहा कि ये तो आपका बायां हाथ है, आप तो दाहिने हाथ से लिखते हैं? उन्होंने कहा कि हां, तुम सही कह रहे हो. दाहिने हाथ से लिखते-लिखते मेरा हाथ थक गया था, लेकिन क्योंकि मुझे काम खत्म करना था और लिखना था, तो मैंने अपने आत्मबल से दाहिने हाथ के दर्द को बाएं हाथ में डाल दिया है और अब मेरा बायां हाथ दर्द कर रहा है, इसलिए मैं उसकी मसाज कर रहा हूं. उनके ऐसे विचार थे.
अभिषेक और आपके बीच पिता-पुत्र के साथ-साथ दोस्त का रिश्ता नज़र आता है. क्या ऐसा ही संबंध आपके और आपके बाबूजी के बीच था?
हां, बाद के दिनों में. शुरुआत के सालों में हम सब उन्हें अकेला छोड़ देते थे, क्योंकि वो अपने काम में, अपने लेखन में व्यस्त रहते थे. मां जी थीं हमारे साथ, तो घूमना-फिरना होता था, जो बाबूजी को शायद उतना पसंद नहीं था. बाद में जब हमारे साथ यहां आए तो हमारा उनके साथ अलग तरह का दोस्ताना बना. कई बातें जो केवल दो पुरुषों के बीच हो जाती हैं, कई बार ऐसा अवसर आता था, जब हम करते थे. अभिषेक के पैदा होने के पहले ही मैंने सोच लिया था कि अगर मुझे पुत्र हुआ, तो वह मेरा मित्र होगा, वो बेटा नहीं होगा. मैंने ऐसा ही व्यवहार किया अभिषेक के साथ और अभी तक तो हमारी मित्रता बनी हुई है. 
क्या आप चाहते हैं कि अभिषेक और आपकी आने वाली पीढिय़ां बच्चनजी की रचनाओं, विचार और दर्शन को उसी तरह अपनाएं और अपनी पीढ़ी के साथ आगे बढ़ाएं, जैसे आपने बढ़ाया है?
ये अधिकार मैं उन पर छोड़ता हूं. यदि उनके मन में आया कि इस तरह से कुछ काम करना चाहिए, तो वो करें. मैं उन पर किसी तरह का दबाव नहीं डालना चाहता हूं कि देखो, ये हमारे परिवार की परंपरा रही है, हमारे लिए एक धरोहर है, जिसे आगे बढ़ाना है. न ही बाबूजी ने कभी हमसे ये कहा कि ये धरोहर है. क्योंकि उनकी जो वास्तविकता थी, उसे कभी उन्होंने हमारे सामने ऐसे नहीं रखा कि मैंने बहुत बड़ा काम कर दिया है. उसके पीछे छुपी हुई जो बात थी, वो हमेशा पता चलती थी. जैसे विलायत पीएचडी करने गए, पैसा नहीं था. कुछ फेलोशिप मिली, फिर बीच में वो भी बंद हो गई. मां जी ने गहने बेचकर पैसा इकट्ठा किया, क्योंकि वो चाहती थीं कि वो पीएचडी करें. चार साल जिस पीएचडी में लगता है, वो उन्होंने दो वर्षों में ही पूरी कर ली और का$फी मुश्किल परिस्थितियों में रहे वहां. जब वो वापस आए, तो उस ज़माने में तो विलायत जाना और वापस आना बहुत बड़ी बात होती थी और खासकर इलाहाबाद जैसी जगह पर. सब लोग बहुत खुश कि भाई, विलायत से लौटकर के आ रहे हैं और हम बच्चे ये सोचते थे कि हमारे लिए क्या तोहफा लाए होंगे. सबसे पहला सवाल हमने बाबूजी से यही किया कि क्या लाएं हैं आप हमारे लिए? उन्होंने मुझे सात कॉपी, जो उनके हाथ से लिखी हुई पीएचडी है, वो उन्होंने मुझे दी. कहा कि ये मेरा तोहफा है तुम्हारे लिए. ये मेरी मेहनत है, जो मैंने दो साल वहां की. उसे मैंने रखा हुआ है. उससे बड़ा उपहार क्या हो सकता है मेरे लिए.
बाबूजी की कौन सी रचना आपको बहुत प्रिय है और क्यों?
सभी अच्छी हैं. अलग-अलग मानसिक स्थितियों से जब बाबूजी गुज़रे, तो उन परिस्थितियों में उन्होंने अलग-अलग कविताएं लिखीं. बाबूजी के शुरुआत के दिन बहुत गंभीर थे. बाबूजी की पहली पत्नी का देहांत साल भर के अंदर हो गया था. वो बीमार थीं, उनकी चिकित्सा के लिए पैसे नहीं थे बाबूजी के पास, तो वो दुखदायी दिन थे. उनके ऊपर उनका वर्णन है. फिर मां जी से मिलने के बाद उनके जीवन में जो एक नया रंग, उल्लास आया, उसको लेकर उनकी कविताएं आईं. फिर आधुनिक ज़माने में आकर बहुत से जो ट्रेंड थे कविता लिखने के, खास तौर से हिंदी जगत में, वो बदलते जा रहे थे, हास्य रस बहुत प्रचलित हो गया था. कवि सम्मेलनों में हास्य कवियों को ज़्यादा तालियां मिलने लगीं. इन सारे दौर से गुज़रते हुए उन्होंने लेखन किया. किसी एक रचना पर उंगली रखना बड़ा मुश्किल होगा.
आपकी उनकी चीज़ों की आर्कइविंग करने की योजना थी?
प्रयत्न जारी है. समय नहीं मिल रहा है. दूसरी बड़ी बात ये है कि जो लोग बाबूजी के साथ उस ज़माने में थे, वो वृद्ध हो गए हैं. लेकिन मैं ये चाहूंगा कि जो उनके साथ उस ज़माने में थे, उन्हें ढूंढें. क्योंकि कई ऐसी बातें हैं, जो हमको नहीं पता हैं. बाबूजी पत्र बहुत लिखते थे और वो अपने हाथ से लिखते थे. प्रतिदिन वो पचास-सौ पोस्ट कार्ड लिखते थे जवाब में, जो उनके पास चिट्ठियां आती थीं और उसे $खुद ले जाकर पोस्ट बॉक्स में डालते थे. उन्होंने बहुत सी चिट्ठियां जो लोगों को लिखी हैं, उन चिट्ठियों को एकत्रित करके लोगों ने किताब के रूप में छाप दिया है. अब ये पता नहीं कि कानूनन ठीक है या नहीं, लेकिन उन्होंने कहा कि साहब, ये पत्र तो उन्होंने हमें लिखा है, आपका इसके ऊपर कोई अधिकार नहीं है. तो मैं ऐसा सोच रहा था कि कभी अगर मुझे जानकारी हासिल करनी होगी तो मैं इश्तहार दूंगा मैं या पूछूंगा कि जिन लोगों के पास बाबूजी की लिखी चिट्ठियां हैं या याददाश्त हैं, वो हमें बताएं ताकि हम उनका एक आर्काइव बना सकें.
अब आप स्वयं दादाजी बन चुके हैं. इस संबोधन से आपको अपने दादाजी (प्रताप नारायण श्रीवास्तव) एवं दादीजी (सरस्वती देवी) की याद आती है. उनके बारे में हमें बहुत कम सामग्री मिलती है.
जी, दादाजी की स्मृतियां हैं नहीं, क्योंकि जब मैं पैदा हुआ, तो उनका देहांत हो गया था. दादी थीं, लेकिन उनका भी मेरे पैदा होने के साल-डेढ़ साल बाद स्वर्गवास हो गया. मां जी की तरफ से, उनकी माता जी का देहांत उनके जन्म पर ही हो गया था. जो नाना जी थे, मुझे ऐसा बताया गया है कि अब तो वो पाकिस्तान हो गया है, मां जी का जन्म लायलपुर में हुआ था, जो अब फैसलाबाद हो गया है और उनकी शिक्षा-दीक्षा सब गर्वमेंट कॉलेज लाहौर में हुई. वो वहां पढ़ाने भी लगीं. मुझे बताया गया है कि जब मैं दो साल का था, तो मां जी उनसे मिलवाने कराची ले गई थीं. ऐसा मां जी बताती हैं कि एक बार मैं नाना के पास गया, तो चूंकि वो सरदार थे, तो उनकी दाढ़ी बड़ी थी, तो मैंने आश्चर्य से उनसे पूछा कि आप कौन हैं? तो मेरे नानाजी ने कहा कि अपनी मां से जाकर पूछो कि मैं कौन हूं.
अभिषेक चाहते हैं कि आप अब काम कम और आराम ज़्यादा करें, अपने नाती-पोतों को वह सारे संस्कार और गुर सिखाएं, जो आपने उन्हें और श्वेता को सिखाए हैं. आपकी इस बारे में क्या राय है? 
मैं ज़रूर नाती-पोतों को सिखाऊंगा और मैं काम भी करूंगा. यदि शरीर चलता रहा और सांस आती रहेगी, तो मैं चाहूंगा कि मैं काम करूं और जिस दिन मेरा शरीर काम नहीं करेगा, जैसा कि मैंने आपसे कई बार कहा है कि हमारे शरीर के ऊपर निर्भर है, चेहरा सही है, टांग-वांग चल रही है, तो काम है, वरना हम बोल देंगे कि अब हम घर बैठते हैं.
फिल्मों को लेकर आपकी ओर से कब घोषणा होगी?
एक तो अभी हुई है प्रकाश झा की सत्याग्रह और दूसरी है सुधीर मिश्रा की मेहरुन्निसा. उसमें चिंटू (ऋषि) कपूर हैं, शायद चित्रांगदा हैं और मैं हूं. दो-एक और फिल्में हैं, महीने भर के अंदर उनकी भी घोषणा की जाएगी. 

Tuesday, December 11, 2012

दिलीप साब! आप चिरायु हों- अमिताभ बच्चन

जन्मदिन विशेष

हिंदी सिनेमा के महानतम अभिनेता दिलीप कुमार को सदी के महानायक अमिताभ बच्चन के रुप में एक प्रिय प्रशंसक प्राप्त हैं. दिलीप कुमार को अमिताभ बच्चन अपना आदर्श मानते हैं. 11 दिसंबर को दिलीप कुमार जीवन के 89 बसंत पूरे कर रहे हैं. इस विशेष अवसर पर अमिताभ बच्चन के साथ दिलीप कुमार के बारे में रघुवेन्द्र सिंह ने बातचीत की. अमिताभ बच्चन के शब्दों में उस बातचीत को यहां प्रस्तुत किया जा रहा है.

मेरे आदर्श हैं दिलीप साहब

दिलीप साहब को मैंने कला के क्षेत्र में हमेशा अपना आदर्श माना है, क्योंकि मैं ऐसा मानता हूं कि उनकी जो अदाकारी रही है, उनकी जो फिल्में रही हैं, जिनमें उन्होंने काम किया है, वो सब सराहनीय हैं. मैंने हमेशा उनके काम को पसंद किया है. बचपन में जब मैं उनकी फिल्में देखा करता था, तबसे उनका एक प्रशंसक रहा हूं. मुझे उनकी सभी फिल्में पसंद हैं, लेकिन गंगा जमुना बहुत ज्यादा पसंद आई थी. जब भी मैं दिलीप साहब को देखता हूं तो मैं ऐसा मानता हूं कि भारतीय सिनेमा के इतिहास में अगर कला को लेकर, अदाकारी को लेकर, जब कभी इतिहास लिखा जाएगा तो यदि किसी युग या दशक का वर्णन होगा तो लोग कहेंगे कि ये ‘‘दिलीप साहब के पहले की बात है, या उनके बाद की.’’ वो अदाकारी के एक मापदंड बन गए हैं.

ताजा है पहली मुलाकात की याद

तब मैं फिल्म इंडस्ट्री में नहीं था. एक व्यक्तिगत छुट्टी मनाने के लिए परिवार के साथ मैं मुंबई आया था. यहां हमारे जो मित्र थे, वो एक शाम को हमें एक रेस्टोरेंट में ले गए और वहां पर दिलीप साहब आए. वहां मेरी उनसे पहली मुलाकात हुई. मैं उनका ऑटोग्राफ चाहता था. मैं पास की स्टेशनरी शॉप में कॉपी खरीदने के लिए भागा. जब वापस आया, तो देखा कि वे व्यस्त थे. उस समय उन्होंने मुझे ऑटोग्राफ दिया नहीं. मैं थोड़ा निराश हुआ. फिल्मों में आने के बाद उनसे मेरी पहली मुलाकात किसी के घर पर दावत में हुई थी और फिर अचानक एक दिन मुझे उनके साथ शक्ति फिल्म में काम करने का अवसर मिला.


मुश्किल था उनका विरोध करना

शक्ति सलीम-जावेद साहब की कहानी थी. रमेश सिप्पी उस फिल्म के निर्देशक थे. सलीम-जावेद ने कहा कि यह एक अच्छी कहानी है, इसे बनाना चाहिए. दिलीप साहब होंगे, आप होंगे और रमेश सिप्पी साहब. जाहिर है कि जब आप दिलीप साहब जैसे बड़े कलाकार के साथ काम करेंगे तो काफी डर रहता है. हालांकि अभिनय में मुझे कई वर्ष बीत चुके थे. फिर भी जिस शक्स को आपने इतना सराहा है, अपना आदर्श माना है, अगर वो अचानक आपके सामने आकर खड़े हो जाएं तो डर लगता है. और शक्ति में जिस तरह की हमारी भूमिका थी कि मैं थोड़ा सा विरोधी हूं उनके सामने, वो भी एक कठिन चीज थी मेरे लिए क्योंकि आप जिसको इतना चाहते हैं, उनका विरोध कैसे कर सकते हैं? मुश्किल था मेरे लिए, लेकिन काम करते हुए बहुत अच्छा लगा. मैंने उनका काम करने का तरीका देखा. वे हर एक बात को, हर एक चीज को, बार-बार समझना, उसकी बारीकियों में जाना और जब तक वह एक दम सही न हो जाएं, तब तक प्रयास करते रहना, वह सब मैंने देखा.

डेथ सीन करने की चुनौती

शक्ति का क्लाइमेक्स सीन हमने यहीं एयरपोर्ट पर किया था. डेथ सीन किसी कलाकार के लिए आम तौर पर बड़ा मुश्किल समय होता है कि कैसे किया जाए. और इतने सारे डेथ सीन हमने कर लिए थे. शोले में, दीवार में, मुकद्दर का सिकंदर में, तो हमेशा मन के अंदर एक विडंबना बनी रहती है कि डेथ सीन को कैसे करें कि नयापन आए. तो दिलीप साहब के साथ विचार-विमर्श किया वहीं पर और फिर उसी तरह किया जैसा कि आपने फिल्म में देखा है. मैं दाद देना चाहूंगा दिलीप साहब की क्योंकि उन्होंने उस सीन में एक शब्द नहीं कहा, क्योंकि वे जानते थे कि एक कलाकार के लिए वह समय बड़ा आवश्यक होता है कि वह कांसंट्रेट करे.

कलाकार की इज्जत करना उनसे सीखें

मैंने जितनी बार भी दिलीप साहब से कहा कि मैं रिहर्स करना चाहता हूं और मैंने कहा कि मैं किसी डुप्लीकेट के साथ कर लेता हूं तो उन्होंने कहा कि नहीं. उन्होंने मेरा पूरा सहयोग दिया. और उन्होंने कभी एक आवाज भी नहीं निकाली, जब मैं काम कर रहा था या मुझे याद है जो उन्होंने बीच में इधर-उधर की कुछ बात की हो. मुझे याद है जब मैं वह सीन रिहर्स कर रहा था, तो पीछे प्रोडक्शन के लोग काम कर रहे थे, ऊंची आवाज में वो कुछ बात कर रहे थे, तो दिलीप साहब ने उन्हें डांट दिया कि चुप रहिए आप. आप कलाकार की इज्जत नहीं करते हैं. देख नहीं रहे हैं आप. तो मुझे बड़ा अच्छा लगा यह देखकर कि अन्य कलाकारों के लिए भी उनके मन में इतनी इज्जत थी.

जब तीन बजे रात को पहुंच गए दिलीप साहब के घर

कई बार हम उनके घर रात-बिरात पहुंच जाते थे. और हमेशा वह बड़े ही दयालु और कहा जाए कि बहुत ही स्वागतमंद रहे. मुझे याद है. एक शाम सलीम साहब, जावेद साहब और हम अपने घर में बैठे हुए थे. ऐसे ही बातचीत चल रही थी. और बातचीत करते-करते तकरीबन रात के एक-दो बज गए. तो मैंने उन लोगों सेे कहा कि चलिए मैं आप लोगों को घर छोड़ देता हूं. रास्ते में जाते-जाते उन्होंने कहा कि यार, दिलीप साहब से मिलने का बड़ा मन कर रहा है. मैंने कहा अरे भई, रात के दो-तीन बज रहे हैं. कहां जाएंगे? तो उन्होंने कहा कि चलिए चलते हैं. देखते हैं कि क्या होता है. हम तीनों रात के तकरीबन तीन बजे उनके घर में चले गए. वो सो रहे थे. वो उठकर के आए. और एक-डेढ़ घंटे हमारे साथ बैठे रहे और बातें करते रहे. इतना उनका अनुभव है, इतनी कहानियां हैं जीवन की कि किस तरह से किसने क्या किया, कौन सा रोल कैसे हुआ, फिल्म के अलावा भी उनके पास इतनी जानकारी है कि उनको बैठकर सुनने में ही बड़ा आनंद मिलता है. हम लोग काफी देर तक बतियाते रहे. ये सेवेंटीज-एटीज की बात है.

टीवी व विज्ञापन में मेरा काम करना उन्हें पसंद नहीं

नई जेनरेशन के बारे में उन्होंने कभी मुझसे कोई जिज्ञासा प्रकट नहीं की. यदा-कदा मैं उनके इंटरव्यूज पढ़ता रहता हूं जिसके द्वारा पता चलता है कि वो क्या सोचते हैं. मेरे खयाल में उनके मन में यह बात है कि एक कलाकार को अदाकारी के साथ ही अपना संबंध रखना चाहिए. जब मैंने टेलीविजन में काम किया या जब मैंने इंडोर्समेंट किए तो शायद उनको पसंद नहीं आया. पसंद मतलब.. वो कहते थे कि तुम ये सब क्यों करते हो? अदाकारी ही किया करो. लेकिन अब परिस्थितियां बदल गई हैं. अभी हाल ही में उनसे प्राण साहब के जन्मदिन पर मुलाकात हुई थी और हाल ही में कौन बनेगा करोड़पति में दिलीप साहब के ऊपर एक प्रश्न आया तो मैंने उनके बारे में कुछ बातें की. उसके बारे में उन्हें सायरा जी के जरिए पता चला तो उन्होंने मुझसे कहा कि तुम उस एपीसोड की डीवीडी भेजो, मैं देखना चाहता हूं कि तुमने मेरे बारे में क्या कहा.
सबकी प्रेरणा हैं दिलीप साहब

मैं दिलीप साहब के अभिनय को मिस करता हूं. मैं ऐसा मानता हूं कि उन्होंने एक नए युग की शुरुआत की. अगर हमारा भारतीय सिनेमा का इतिहास युगों में बांटा जाएगा तो निश्चित ही दिलीप साब का जो युग था, उसका ऐसे ही वर्णन होगा कि ये दिलीप साहब से पहले की बात है और ये दिलीप साहब के बाद की बात है. कला के क्षेत्र में हम सब लोग प्रेरित होते हैं और ये विश्व भर की बात है. जितने भी लोग कला से संबंध रखते हैं, चाहे वो कवि हों, पेंटिंग करते हों, चाहे मॉडलिंग करते हों, कुछ भी करते हों, कहीं न कहीं से उनको प्रेरणा मिलती है. तो उनको देख करके ही, इतना ही हमारे लिए बहुत बड़ी उपलब्धि है कि हम दिलीप साहब को देखकर ही इंस्पायर होते हैं. मेरे लिए तो यही सबसे बड़ी उपलब्धि थी कि मुझे दिलीप साहब के साथ काम करने का अवसर मिला. और वो क्षण मैं कभी नहीं भूल पाऊंगा. उनके साथ हमारा लगाव निरंतर रहा है, बल्कि अभी दो दिन पहले ही उनसे एसएमएस पर मेरी बातचीत हुई. हर साल वो मुझे जन्मदिन पर बधाई देते हैं और मैं उन्हें जन्मदिन पर बधाई देता हूं. कई दिनों से वह अस्वस्थ हैं. मैं उनसे कह रहा था कि आप मेरी फिल्म पा देखिए तो उन्होंने कहा कि मैं जरुर देखूंगा. सायरा जी से मेरी बातचीत होती रहती है और मैं अभी उनसे मिलने भी जाऊंगा.

दिलीप साहब का व्यक्तित्व

मेरे खयाल से लोगों के मन में ये एक अजीब सी धारणा है कि क्योंकि कलाकार है और वह स्टार है तो उसका जो व्यक्तित्व है या उसका स्वभाव है, वह अलग तरीके का होगा. हमारे मन के अंदर ऐसी कोई धारणा नहीं है. हम लोग आम आदमी की तरह हैं. आम आदमी की तरह काम करते हैं और हमारे साथ जो काम करेगा, उसके साथ मिल-जुलकर ही काम करेंगे. ऐसा मान लेना कि मैं एक स्टार हूं तो मैं जब चलूं तो लोग बैठ जाएं और जब मैं खड़ा होऊं तो सब लोग झुक जाएं, ऐसा कुछ वातावरण होता नहीं है. हम सब आम इंसान हैं. दिलीप साब का व्यक्तित्व ऐसा ही है. काम के प्रति लगन होनी चाहिए और अपने परफॉर्मेंस को हम जितना नैचुरली कर सकें, वह कोशिश करनी चाहिए. दिलीप साहब बहुत ही नैचुरल एक्टर हैं. देखकर लगता नहीं कि वे अदाकारी कर रहे हैं. ऐसा ही काम करने की हम भी उनसे प्रेरणा लेते हैं.

दुख है कि गंगा जमुना के लिए उन्हें पुरस्कार नहीं मिला

उन्हें गंगा जमुना के लिए पुरस्कार नहीं दिया गया, इस बात का मुझे हमेशा दुख रहेगा. कई बार लोग मुझसे कहते हैं कि साहब आपको दीवार के लिए पुरस्कार नहीं मिला, मुकद्दर का सिकंदर के लिए नहीं मिला, लावारिस के लिए नहीं मिला, शराबी के लिए नहीं मिला, तो मैं उनसे कहता हूं कि छोड़ो, ये तो मैगजीन का निर्णय होता है, जो पुरस्कार देती है. अगर दिलीप साहब को उन्होंने गंगा जमुना के लिए पुरस्कार नहीं दिया तो फिर मैं किस खेत की मूली हूं. यह बात मैंने कुछ साल पहले फिल्मफेयर के एक समारोह में कही थी कि इस बात का हमेशा मुझे दुख रहेगा कि उन्होंने गंगा जमुना के लिए दिलीप साहब को पुरस्कार नहीं दिया. उस समारोह में दिलीप साहब मुख्य अतिथि थे.

फ्रेम करवाई है उनकी चिट्ठी

मैं दिलीप साहब को हमेशा अपनी सारी फिल्में देखने के लिए बुलाता हूं. मैंने उनको ब्लैक देखने के लिए बुलाया था. वो प्रीमियर पर आए थे. वह बड़ा अद्भुत क्षण था मेरे लिए. जब फिल्म खत्म हुई तो वह पहले निकल आए थे और मेरा इंतजार कर रहे थे. यहीं आईमैक्स में. जब मैं आया तो उन्होंने आकर मेरे दोनों हाथ पकड़ लिए. और कुछ शब्द नहीं निकले.. न मेरे मुंह से और न उनके मुंह से. बहुत ही भावुक समय था वह. मुझे बहुत ही अच्छा लगा. फिर उसके बाद उन्होंने मुझे चिट्ठी लिखी. उस चिट्ठी को मैंने फ्रेम करवाकर अपने ऑफिस में रखा हुआ है. दिलीप साहब के जन्मदिन के अवसर पर मैं यही कहूंगा कि उन्हें स्वास्थ्य लाभ प्राप्त हो. यही सबसे बड़ी चीज है. खुशियां तो स्वास्थ्य के साथ आ ही जाती हैं. काम तो अब वो कर नहीं रहे हैं. मैं यही चाहता हूं कि वो चिरायु हों.. बस. मैं उनके जन्मदिन पर पत्र लिखूंगा और व्यक्तिगत तौर पर बधाई दूंगा.

-फिल्मफेयर, दिसम्बर-2011

Sunday, October 7, 2012

70 वें जन्मदिन पर अमिताभ बच्चन से अजय ब्रह्मात्मज की बातचीत

-अमिताभ बच्चन का जीवन देश का आदर्श बना हुआ है। पिछले कुछ समय से फादर फिगर का सम्मान आप को मिल रहा है। पोती आराध्या के आने के बाद तो देश के बच्चे आप को अपने परिवार का दादा ही मानने लगे हैं।

0 यह देश के लोगों की उदारता है। उनका प्रेम और स्नेह है। मैंने कभी किसी उपाधि, संबोधन आदि के लिए कोई काम नहीं किया। मैं नहीं चाहता कि लोग किसी खास दिशा या दृष्टिकोण से मुझे देखें। इस तरह से न तो मैंने कभी सोचा और न कभी काम किया। जैसा कि आप कह रहे हैं अगर देश की जनता ऐसा सोचती है या कुछ लोग ऐसा सोचते हैं तो बड़ी विनम्रता से मैं इसे स्वीकार करता हूं।

- लोग कहते हैं कि  आप का वर्तमान अतीत के  फैसलों का परिणाम होता है। आप अपनी जीवन यात्रा और वर्तमान को किस रूप में देखते हैं? निश्चित ही आपने भी कुछ कठोर फैसले लिए होंगे?

0 जीवन में बिना संघर्ष किए कुछ भी हासिल नहीं होता। जीवन में कई बार कठोर और सुखद प्रश्न सामने आते हैं और उसी के अनुसार फैसले लेने पड़ते हैं। जीवन हमेशा सुखद तो होता नहीं है। हम सभी के जीवन में कई पल ऐसे आते हैं, जब कठोर निर्णय लेने पड़ते हैं। यह उतार-चढ़ाव जीवन में लगा रहता है। मैंने कभी उस ओर कभी ध्यान नहीं दिया। अपने फैसलों के बारे में ज्यादा नहीं सोचा।  पिताजी ने कहा है, जो बीत गई, वह बात गई। और फिर आगे बढ़ें। केवल इतना मुझे ज्ञात है कि जो भी मेरे साथ हुआ वह दुखद रहा हो या सुखद रहा हो, उससे मैंने क्या सीखा। यदि मैं उन संकट के क्षणों से निकल पाया तो यह अवश्य समझने की कोशिश की कि क्यों संकट के वे क्षण मेरे जीवन में आए? उन पर सोच-विचार करने पर ऐसा लगा कि मैंने कुछ सीखा ही। अगर आप मुझसे पूछें कि क्या अपना जीवन दोबारा ऐसे ही जीना चाहेंगे या उसमें परिवर्तन लाना चाहेंगे तो मेरा जवाब होगा, मैं उसे वैसे के वैसे ही जीना चाहूंगा।

- गलतियों, भूलों और संकटों के बावजूद...

0 अगर वे गलतियां नहीं होतीं तो हम कुछ सीखते नहीं। और संभव है कि बाद में मुसीबत ज्यादा बड़ी हो जाती। हम उन गलतियों से जो सीख पाए, वह नहीं हो पाता।

- कुछ लोग कहते हैं  कि स्थितियां ही मनुष्य को बनाती हैं। मुझे लगता है स्थितियां केवल मनुष्य को उद्घाटित करती हैं। कोई जन्मजात वैसा ही नहीं होता, जैसा वह आज है। अमिताभ बच्चन नित नए रूप में उद्घाटित हो रहे हैं?

0 इस दिशा में मैंने कुछ सोचा नहीं। यह तो आप जैसे लोग हैं, जो सोचते और मानते हैं कि एक नया रूप आ रहा है। मैं तो अपने आप को वैसा ही समझता हूं। मैंने अपने आप में न तो कोई परिवर्तन देखा है और न कभी इसकी कोशिश की है।

- दरअसल हम आपसे ही  जानने की कोशिश कर रहे  हैं?

0 जैसे ही मैं उसका वर्णन करना शुरू कर दूंगा तो ऐसा लगेगा कि मैं अपनी ही तारीफ के पुल बांध रहा हूं। देखना, सोचना, समझना और बताना यह आप लोगों का काम है। अगर आप को लगता है कि मुझ में कुछ ऐसी बातें हैं, जिनके बारे में लिखा जाना चाहिए तो लिखें। अपना परिचय या वर्णन मैं अपने आप नहीं कर पाऊंगा। जब भी इस तरह के सवाल आते हैं और मुझ से पीछे पलटकर देखने के लिए कहा जाता है तो मुझे लगने लगता है कि मैं अपनी आत्मकथा लिख रहा हूं। मैं नहीं समझता कि मैं आत्मकथा लिखने के योग्य हूं या मेरे अपने जीवन में ऐसा कुछ है, जो लिखा जाना चाहिए। बाबुजी ने जरूर आत्मकथा लिखी। वह ऐतिहासिक लेखन है।

- फिर भी कुछ क्षण और पल रहे होंगे, जब आप हताश और निराश हुए होंगे। फिल्मों में आने के समय की बात करें तो जिस प्रकार आप को अस्वीकार किया गया। फिर बाद में जिसे वन मैन इंडस्ट्री कहते थे, उसे ही फिल्में न मिलें। इन सारी परिस्थितियों में आप किसी अमरपक्षी की तरह फिर से उड़ान भरते हैं। आप में थोड़ी सी चिंगारी बची रह जाती है, जिससे आप लहलहा उठते हैं।

0 इतनी बारीकी से मैंने अपने आप को नहीं देखा और देखना भी नहीं चाहता।

- सिर्फ यह बता दें कि  आखिर वह कौन सी ऊर्जा है, जो आप को ताकत देती है?

0 शुरू में काम न मिलने का आपने जिक्र किया। इस संबंध में मेरी स्पष्ट राय है कि जब तक आप के गुणों से कोई परिचित नहीं है तो कैसे अपने व्यवसाय में ले ले। धीरे-धीरे परिचय मिलने लगता है तो काम भी मिलने लगता है। काम मिलने के बाद आप के गुण और काबिलियत की चीजें सामने आती हैं। फिर आप का काम और बढ़ता है। हमारी इंडस्ट्री में रूप, कला और बॉक्स ऑफिस तीनों को देखा जाता है। इन्हें समेटकर ही कोई फैसला लिया जाता है। हो सकता है कि मुझ में कुछ त्रुटियां रही हों, जिनकी वजह से मुझे काम न मिला हो। बीच में दो-तीन सालों तक मैंने कोई काम नहीं किया था। हां, जो संन्यास लिया था, वह मुझे नहीं लेना चाहिए था। बाबुजी ने कहा है, अनवरत समय की चक्की चलती रहती है। कई बार ऐसा मन करता है कि उस चक्की से छिटककर कुछ देखें, लेकिन मेरा मानना है कि एक बार चलायमान हो गए तो चलते रहना चाहिए। वह चक्की अपने आप रूक जाए या आप की नाकामयाबी से रूके तो यह दूसरी बात है। अनिश्चय का एक माहौल हमारे व्यवसाय में हमेशा बना रहता है। आगे भी ऐसा ही रहेगा। अब वृद्ध हो गए हम। सत्तर बरस के हो गए। अब मुझे नौजवान भूमिकाएं तो मिलेंगी नहीं। वृद्ध भूमिकाएं सीमित होती हैं। उसी तरह का काम मिलेगा, वही करते रहेंगे।

-बाबुजी ने चार खंडों में आत्मकथा लिखी। उसका एक खंड ‘क्या भूलुं क्या याद करूं’। आप के जीवन में भी कुछ भूलने और याद रखने वाली बातें होंगी। क्या कुछेक सुखद क्षण हमारे पाठकों से शेयर करेंगे?

0 सबसे सुखद बात है कि जनता ने इस व्यवसाय में स्वीकारा मुझे। उनका स्नेह, प्यार, प्रार्थनाएं और दुआएं नहीं होतीं तो हम आज की स्थिति में नहीं होते। माता-पिता का आशीर्वाद.. उन्होंने हमारी जो परवरिश की। बाबुजी का लेखन, उनके लेखन से मिली सीख.. उनके साथ समय बिताने का अवसर मिला। उनका जीवन हमारे लिए उदाहरण बना। यही सब कुछ सुखद बातें हैं।

-पारिवारिक जीवन में  आपने पुत्र, पति, पिता और अब दादा की भूमिकाएं निभाई हैं। अभिषेक के अनुसार आप सारी भूमिकाओं में परफेक्ट रहे हैं।

0 यह मुझे मालूम नहीं है कि मैं कितना परफेक्ट रहा हूं?

-पूरे देश ने आप  की पितृ और मातृ सेवा  देखी है। अपनी व्यस्तताओं के बावजूद आप ने उनकी पूरी देखरेख की। ऐसी सेवा बहुत कम लोग कर पाते हैं। मुझे लगता है कि यह उत्तर भारत के मध्यमवर्गीय परिवार के लोगों का खास गुण है। आपने उसे निभाया और एक आदर्श बने। पारिवारिक मूल्यों के प्रति आप का दृष्टिकोण आप के ब्लॉग लेखन, व्यवहार और प्रतिक्रियाओं में साफ नजर आता है।

0अपने जीवन के दौरान जो भी देखा, सुना, पढ़ा और सीखा मां-बाबुजी से या जिस वातावरण में हम रहे, जिस माहौल में पले-बढ़े, वहीं सब कुछ सीखा। कभी किसी ने बताया या कहा नहीं कि ऐसे करना चाहिए। जो मन में आया हमने किया। जो हमे लगा कि करना चाहिए, वही किया। मुझे लगता है, जिनकी वजह से हमारा जीवन है। जिन्होंने अपनी जिंदगी की तमाम कठिनाइयों के बीच हमें शिक्षा दी। पाला, बड़ा किया... इतना तो हमारा फर्ज बनता है कि जब वे सहायता की स्थिति में हों या चिकित्सा की आवश्यकता हो तो उसे पूरा करें। हर संतान को सब कुछ करना चाहिए। मैं ऐसा मानता हूं और मैंने यही किया। इस वजह से कभी कुछ नहीं किया कि आदर्श बनना है, या मिसाल रखनी है।

-पोती का नाम आराध्या ही है न?

0 हां, आराध्या ही है।

-दादा के रूप में आप आराध्या को कितना समय दे पाते हैं? कहते हैं हर पुरुष पति, पिता और दादा बनने के साथ बदलता है। उसके दृष्टिकोण बदल जाते हैं। इन दिनों ऐसा लग रहा है कि आप सुखी और संतुष्ट हैं। अभी आप किसी चीज के लिए प्रयासरत नहीं दिखते। जो मिल रहा है या जो सामने है, उसका आनंद उठा रहे हैं?

0 पहले भी ऐसा ही व्यवहार था मेरा। जो मिलता था, वह करते थे। पहले वाली असुरक्षा आज भी है। पता नहीं कल काम मिलेगा कि नहीं मिलेगा।

-क्या सत्तर साल के  सफल अमिताभ भी असुरक्षित हैं?

0 क्यों नहीं? प्रतिदिन एक भय रहता है कि आज जो काम करना है, वह कैसे होगा? होगा कि नहीं होगा? अभी आप का इंटरव्यू खत्म कर ‘केबीसी’ के सेट पर जाऊंगा। डर लगा रहता है। संघर्ष प्रतिदिन रहेगा हमारे जीवन में। बाबुजी के सामने जब हम अपनी दुविधाएं रखते थे तो वे यही कहते थे कि संघर्ष हमारे साथ रहने वाला है। उन्होंने कहा था कि कभी इत्मीनान नहीं रहता। मुझे नहीं लगता कि यह संभव होगा। यही हम चाहेंगे कि हमारा परिवार और निकट संबंधी सुख-शांति से रहें। हमारे चाहने वालों का स्नेह-प्यार बना रहे, क्योंकि उन्हीं की वजह से हम बने हैं। हम अलग से कोई खास प्रयत्न नहीं करते। जो आ जाता है, उसी में चुन लेते हैं सोच-समझकर कि इसी में रूचि होगी।

- आप अपने  काम में सौ प्रतिशत से  ज्यादा देते हैं। अभिषेक की एक ही शिकायत है कि डैड अपने सेहत का ख्याल रखें और आराम करें?

0 आराम तो एक दिन सभी को करना ही पड़ेगा। शरीर जब नहीं चलेगा तो आराम करना ही पड़ेगा। जब तक शरीर साथ दे रहा है तब तक शरीर चलाते रहेंगे।

- आप के ब्लॉग पर बार-बार उल्लेख आता है कि अब मैं समाप्त करता हूं, नहीं तो परिजन नाराज हो जाएंगे?

0 हां वो होता है।

- वह कौन सी चाहत  है, जो सुबह चार बजे भी ब्लॉग लिखने के लिए मजबूर करती है?

0 यह प्रथा बन गई है। मैं उसमें कोई व्यवधान नहीं आने देना चाहता। मैंने उनसे वादा किया हुआ है कि प्रतिदिन लिखूंगा। अब एक बार जबान या शब्द दे दिया तो उसे पूरा करना चाहिए। हां, यह होता है कि कई बार देर हो जाती है। दिनचर्या में कई सारे काम होते हैं। उन्हें पूरा करने के बाद ही लिखता हूं, लेकिन लिखता अवश्य हूं, ताकि उनसे संपर्क बना रहे।

- कई बार मैंने देखा कि आप अपने पाठकों का पूरा ख्याल रखते हैं। उनकी बात मानते हैं। उन्हें जवाब देते हैं?

0 हां, जवाब देता हूं। यह सुविधा हमने ही ब्लॉग में जोड़ी है कि जो कुछ भी मैं कहता हूं,आप उस टिप्पणी कर सकें। उसके बाद मैं भी उत्तर देता हूं। उन्हें लगता है कि वे भी मेरे आमने-सामने  बैठकर बातें करते हैं। यह सब अच्छा लगता है।

-तमाम कलाकारों के  बीच आप का यूथ कनेक्ट सबसे  ज्यादा और तीव्र है। आप की भाषा, आप की बातचीत। उसमें बड़े-बुजुर्ग होने का एहसास नहीं होता। कोई उपदेश नहीं देते आप?

0 उपदेश, आवे तो देवें(जोरदार ठहाका)।

-अगर मैं सीधे पूछूं कि आप क्यों ट्विट पर हैं, फेसबुक पर हैं, ब्लॉग पर हैं?

0 किसी ने कहा कि आप का वेबसाइट होना चाहिए, जहां पर लोग आप के बारे में जानें। जहां से जनता को आप के बारे में जानकारी मिले। बहुत सारे फेक लोग आप की आईडी और नाम का इस्तेमाल कर रहे हैं। उसमें गलत चीजें भी छप रही हैं। उसे सीधा और सही करने की जरूरत है।

मैंने कहा कि भाई वेबसाइट कर दो। उन्होंने मुझ से वक्त मांगा। मैंने कहा, मुझे तो कल ही चाहिए। फिर उन्होंने सुझाया कि कल ब्लॉग हो सकता है। मैंने उसे समझा। लगा कि अच्छी चीज है। पहला ब्लॉग लिखा। दो-चार लोगों ने उत्तर दिए। फिर प्रतिदिन करते गए। पाठकों की संख्या बढ़ती गई। फिर उसके बाद पता चला कि एक ट्विटर है। फिर फेसबुक की जानकारी मिली। धीरे-धीरे जो सुविधाएं मिल रही हैं, उन्हें मैं एक बार जरूर देखना और चखना चाहूंगा। एक जिज्ञासा है बस।

- खास बात है कि आप के ब्लॉग में कभी दोहराव नहीं होता?

0 मैं पहले से कुछ भी सोचकर नहीं लिखता। कंप्यूटर खोलने के बाद जो जी में आता है लिख देता हूं। मन में जो बात आती है, वही लिखता हूं। पहले से प्लान नहीं करता कि आज यह लिखूंगा, कल वह लिखूंगा। हां, तस्वीरें मैं डालता हूं। दिन भर की कुछ खिंची यादगार तस्वीरें। मेरा लेखन बहुत ही मामूली है। बस मैं एक लोगों से बातचीत करता हूं।

-अभी तो लोग आप के ब्लॉग पर शोध करेंगे?

0 शोध(एक ठहराव) कहां होने वाला है?

- अभी आप के सबसे अंतरंग मित्र कौन हैं?

0 परिवार के सदस्य हमारे मित्र हैं और कुछ मित्र आते-जाते हैं। मेरे ज्यादा दोस्त हैं नहीं, क्योंकि मैं ज्यादा लोगों से मिलता-जुलता नहीं हूं। 

-कुछ नाम ले सकें?

0 (ठहरकर)... क्या लें। सभी के लिए द्वार खुला हुआ है। जो आ जाए।

- सबसे कीमती  धरोहर क्या है आप के पास?

0 बाबुजी का लेखन.. माता-पिता के साथ बिताए गए क्षण। जो उनके सानिध्य में बीता, वही हमारी धरोहर है।

- अपने बाद  की पीढ़ी को और देश  को क्या धरोहर देना चाहेंगे?

0 इस विषय या लक्ष्य से जीवन जीने पर मैं गलत हो जाऊंगा। मैं यह सोचकर नहीं चलना चाह रहा हूं कि अगली पीढ़ी को कुछ दूंगा। यदि मेरे साथ रहकर उन्होंने कुछ सीखा या समझा तो वही उनकी धरोहर है।

-हम भाग्यशाली हैं कि हमने साक्षात अमिताभ बच्चन को देखा है। आने वाली पीढ़ी निश्चित ही हमसे रश्क करेगी। मुमकिन नहीं लगता कि भविष्य में कोई और अमिताभ बच्चन आएगा। आप सिर्फ एक जीवन नहीं हैं विशेष परिघटना हैं भारत की। देश की युवा पीढ़ी को जीवन का क्या संदेश देना चाहेंगे?

0 पहले तो मुझे  इस पर विश्वास होना चाहिए कि मैं  कोई परिघटना हूं। हमने तो  कभी ऐसे जीवन नहीं बिताया कि उस पर कोई शोध होगा, सर्वे होगा और लोग निष्कर्ष निकालेंगे। ना ही मैंने किसी को कुछ कहने, लिखने और नाम देने से रोका है। मैं सभी को बाबुजी की सीख देना चाहूंगा- मन का हो तो अच्छा, न हो तो ज्यादा अच्छा। जब तक जीवन है, तब तक संघर्ष है। ये छोटी-मोटी बातें हैं।

Saturday, July 7, 2012

फिल्‍म समीक्षा : बोल बच्‍चन

Review : Bol bachchan 

एक्शन की गुदगुदी, कामेडी का रोमांच 

पॉपुलर सिनेमा प्रचलित मुहावरों का अर्थ और रूप बदल सकते हैं। कल से बोल वचन की जगह हम बोल बच्चन झूठ और शेखी के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं। वचन बिगड़ कर बचन बना और रोहित शेट्टी और उनकी टीम ने इसे अपनी सुविधा के लिए बच्चन कर दिया। वे साक्षात अमिताभ बच्चन को फिल्म की एंट्री और इंट्रो में ले आए। माहौल तैयार हुआ और अतार्किक एक्शन की गुदगुदी और कामेडी का रोमांच आरंभ हो गया। रोहित शेट्टी की फिल्म बोल बच्चन उनकी पुरानी हास्य प्रधान फिल्मों की कड़ी में हैं। इस बार उन्होंने गोलमाल का नमक डालकर इसे और अधिक हंसीदार बना दिया है।
बेरोजगार अब्बास अपनी बहन सानिया के साथ पिता के दोस्त शास्त्री के साथ उनके गांव रणकपुर चला जाता है। पितातुल्य शास्त्री ने आश्वस्त किया है कि पृथ्वीराज रघुवंशी उसे जरूर काम पर रख लेंगे। गांव में पृथ्वीराज रघुवंशी को पहलवानी के साथ-साथ अंग्रेजी बोलने का शौक है। उन्हें झूठ से सख्त नफरत है। घटनाएं कुछ ऐसी घटती हैं कि अब्बास का नाम अभिषेक बच्चन बता दिया जाता है। इस नाम के लिए एक झूठी कहानी गढ़ी जाती है और फिर उसके मुताबिक नए किरदार जुड़ते चले जाते हैं। गांव की अफलातून नौटंकी कंपनी में शास्त्री का बेटा रवि नया प्रयोग कर रहा है। वह गोलमाल फिल्म का नाटय रूपांतर पेश कर रहा है। फिल्म के एक दृश्य में टीवी पर आ रही गोलमाल भी दिखाई जाती है। एक ही व्यक्ति को दो नामों और पहचान से पेश करने में ही गोलमाल की तरह बोल बच्चन का हास्य निहित है।
रोहित शेट्टी की फिल्मों में नाटकीयता, लाउड डॉयलॉगबाजी और हाइपर कैरेक्टर रहते हैं। कामेडी के साथ एक्शन की संगत भी चलती रहती है। इस फिल्म में जयसिंह निच्जर के निर्देशन में आए एक्शन दृश्यों का फिल्म के सीक्वेंस से सीधा ताल्लुक नहीं बैठता, फिर भी हवा में उड़ती कारों और कलाबाजी खाते गुंडा-बदमाशों को देखकर सिहरन नहीं थिरकन होती हैं। सब कुछ हैरतअंगेज होता है, इसलिए आ रही हंसी भी अनायास होती है। रोहित शेट्टी के एक्शन डिजाइन में सब कुछ गिरता-पड़ता है, लेकिन खून-खराबा नहीं दिखाई देता। पर्दे पर खून नजर नहीं आता। हंसी-मजाक के संवाद और दृश्य कई बार द्विअर्थी होते हैं, लेकिन वे फैमिली दर्शकों की मर्यादा में ही रहते हैं।
बहुत चालाकी से रोहित शेट्टी की फिल्मों के लेखक संदेश भी दे डालते हैं। इसी फिल्म में एक डूबते बच्चे को बचाने के लिए मुसलमान किरदार द्वारा मंदिर के दरवाजे पर सालों से लगा ताला तोड़ना मानवीय गुणों का बड़ा संदेश बन जाता है। फिल्म में एक संवाद है खून से खून साफ नहीं होता ़ ़ ़ इसे सुनते हुए गांधी के कथन अगर आंख के बदले आंख निकाली जाए तो सारी दुनिया अंधी हो जाएगी की प्रतिध्वनि सुनाई पड़ती है।
बोल बच्चन के कुछ प्रसंग लंबे होने की वजह से खींच गए हैं। लेखक और निर्देशक ने यह सावधानी जरूर रखी है कि हंसी की लहरें थोड़ी-थोड़ी देर में आती रहें। कभी-कभी हंसी की ऊंची लहर आती है तो दर्शक भी खिलखिलाहट से भीग जाते हैं। चुटीली पंक्तियां और पृथ्वीराज रघुवंशी की अंग्रेजी हंसी के फव्वारों की तरह काम करती हैं। ऐसे संवाद बोलते समय सभी कलाकारों की टाइमिंग और तालमेल उल्लेखनीय है। खासकर गलत अंग्रेजी बोलते समय अजय देवगन का कंफीडेंस देखने लायक है।
फिल्म की थीम के अनुरूप अजय देवगन के अभिनय और प्रदर्शन से संतुष्टि मिलती है, लेकिन साथ ही दुख होता है कि एक उम्दा एक्टर कामेडी के ट्रैप में कितना फंस गया है? हिंदी फिल्मों का यह अजीब दौर है। प्रतिभाएं मसखरी पर उतरने को मजबूर हैं। अभिषेक बच्चन ने दोनों किरदारों को अलग भाव मुद्राएं देने में सफल रहे हैं। अन्य कलाकारों में कृष्णा उल्लेखनीय है। असिन और प्राची देसाई फिल्म में क्यों रखी गई हैं?
ड्यूडली का कैमरा फिल्म के स्वभाव के मुताबिक पर्दे पर चटख रंग बिखेरता है। एक्शन दृश्यों और हवेली के विहंगम फ्रेम में उनकी काबिलियत झलकती है। फिल्म का एक ही गीत चलाओ ना नैनन के बाण रे याद रह पाता है।
*** तीन स्टार
अवधि-154 मिनट
-अजय ब्रह्मात्मज

 

Friday, July 1, 2011

फिल्‍म समीक्षा : बुड्ढा होगा तेरा बाप

बुढ्डा होगा..अपनी छवि को निभाते अमिताभ

अपनी छवि को निभाते अमिताभ

-अजय ब्रह्मात्‍मज
वीजू और कोई नहीं विजय ही है। दशकों पहले हिंदी सिनेमा में इस किरदार को हमने कई फिल्मों में देखा है। अलग-अलग फिल्मों में अमिताभ बच्चन ही रुपहले पर्दे पर विजय को जीवंत करते थे। एंग्री यंग मैन विजय.. नाइंसाफी के खिलाफहक के लिए लड़ता-जूझता विजय रोमांटिक होने पर नाचता-गाता भी था और हल्के-फुल्के मूड में हंसी-मजाक भी करता था। उसकी ढिशुम औ ढिंच क्यों के दर्शक दीवाने थे। वह हर फिल्म मेंविजयी होता था। विजय के विभिन्न रूपों को मिलाकर इक इमेज बनी थी, जो पूरी तरह से फिल्मी होने के बावजूद देश की लोकप्रिय संस्कृति का हिस्सा बन गई थी। इसी विजय ने बीसवीं सदी के मशहूर पॉपुलर आइकॉन अमिताभ बच्चन का निर्माण किया। विजय की छवि और अभिनेता अमिताभ बच्चन के युगल प्रभाव को पुरी जगन्नाथ ने वीजू नाम दिया है, जिसे हम बुड्ढा होगा तेरा बाप में देख रहे हैं।
बुढ्डा होगा तेरा बाप किवदंती बन चुके अमिताभ बच्चन की इमेज की पुनर्कथा है, जिसे पुरी जन्नाथ ने रोचक तरीके से एक फिल्म का रूप दिया है। मजेदार तथ्य है कि अपनी इमेज को लेकर बनी इस फिल्म में अमिताभ बच्चन ने स्वयं ही खुद के किरदार को निभाया है। अमिताभ बच्चन के इस क्रिएटिव साहस की तारीफ करनी होगी। फिल्मों के इतिहास में यह अपने किस्म की अनूठी फिल्म है। इस फिल्म का निर्माण उसी देश में संभव था, जहां अमिताभ बच्चन नामक स्टार हो चुका है। बुढ्डा होगा तेरा बाप विचित्र किस्म की मौलिक मनोरंजक फिल्म है। इस फिल्म की कल्पना भारत के बाहर नहीं की जा सकती थी। यह हमारी लोकप्रिय संस्कृति की देन है।
सालों पहले भारत छोड़कर पेरिस जा चुका वीजू एक मिशन पर लौटा है। मिशन के दौरान ही उसे अपनी जिंदगी की एक सच्चाई का पता चलता है। इसके बाद उसका मिशन दूसरे एंबीशन में बदल जाता है। वीजू एंबीशन पूरा करने के साथ ही अपन जीवन के खालीपन को भी भरता है। वीजू की उम्र बढ़ गई है, लेकिन जोश और उत्साह में थकान नहीं है। रंगीले मिजाज के वीजू की स्फूर्ति जवानों से अधिक है। वह इस उम्र में भी अपने भावनात्मक और पारिवारिक दायित्व को पूरा करता है।
बुढ्डा होगा तेरा बाप अमिताभ मुग्ध पुरी जगन्नाथ और आत्ममुग्ध अमिताभ बच्चन के प्रयासों का संयुक्त परिणाम है। अमिताभ बच्चन ने अपनी ही छवि को ढली उम्र में भी चुस्ती के साथ निभाया है। भारतीय सिनेमा में और कोई अभिनेता 68 की उम्र में कमर्शियल फिल्मों के घिसे-पिटे फार्मूले में इस कदर तल्लीन नहीं दिखता। अमिताभ बच्चन के सभी उम्र के प्रशंसक यह फिल्म पसंद करेंगे। इस फिल्म के बाकी कलाकारों के बारे में बातें करना फिजूल है। बुढ्डा होगा तेरा बाप केवल और केवल अमिताभ बच्चन पर टिकी हुई है।
*** तीन स्टार

Sunday, October 10, 2010

अमिताभ बच्‍चन : हो जाए डबल आपकी खुशी -सौम्‍या अपराजिता /अजय ब्रह्मात्‍मज

कल 11 अक्टूबर को अमिताभ बच्चन का 68वां जन्मदिन है और कल ही शुरू हो रहा है 'कौन बनेगा करोड़पति' का चौथा संस्करण। इस अवसर पर उनसे एक विशेष साक्षात्कार के अंश..

[कल आपका जन्मदिन है। प्रशंसकों को क्या रिटर्न गिफ्ट दे रहे हैं?]

उम्मीद करता हूं कि मेरा जन्मदिन मेरे चाहने वालों के लिए खुशियों की डबल डुबकी हो। जन्मदिन तो आते रहते हैं, पर इस बार कौन बनेगा करोड़पति मेरे जन्मदिन पर शुरू हो रहा है, यह मेरे लिए बड़े सौभाग्य की बात है। अभी तक मैंने जितने भी एपिसोड की शूटिंग की है, उसमें ज्यादातर प्रतियोगी छोटे शहरों और गांवों के लोग हैं। इंटरनेट और कंप्यूटराइजेशन की वजह से उनके पास भी बहुत सारा ज्ञान है। वे सब जानते हैं, पर धनराशि के अभाव में वे प्राइमरी एजुकेशन के बाद ज्यादा नहीं पढ़ पाते हैं। कई ऐसे प्रतियोगी केबीसी में आए हैं, जिन्होंने मुझे बताया कि मेरे पास पचास हजार रुपए नहीं थे, इसलिए मैं एमबीए नहीं कर पाया। सिविल सर्विसेज की तैयारी करनी थी, पर पैसे नहीं थे, तो आम लोगों के लिए यह एक अच्छा अवसर है। अभी कौन बनेगा करोड़पति शुरू होगा उसके बाद फिल्में होगी, जो अगले साल प्रदर्शित होंगी। राज कुमार संतोषी की पावर होगी। तेलुगू के पुरी जगन्नाथ की बुड्ढा, प्रकाश झा की आरक्षण, राकेश मेहरा के एक सहायक की फिल्म भी है।

[1990 में आई 'अग्निपथ' के लिए 48 की उम्र में आपको दूसरा राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। 'सात हिंदुस्तानी' के लिए मिले पहले पुरस्कार को छोड़ रहा हूं। इस बीच आप 'एंग्री यंग मैन' की इमेज के साथ उभरे, लेकिन आपकी इस लोकप्रिय छवि को कभी कोई पुरस्कार नहीं मिला। 'अग्निपथ' ,फिर 'ब्लैक' और अब 'पा', आखिर क्यों आप हमेशा छवि से भिन्न भूमिकाओं के लिए पुरस्कृत हुए?]

यह तो पुरस्कार देने वाली संस्थाओं का दृष्टिकोण है। वे किस वजह से और क्यों पुरस्कार देती हैं? इसकी मुझे जानकारी नहीं है। सही मायने में आपके सवाल में सच्चाई है। जिन फिल्मों को आइडेंटिफाई किया गया था मेरी छवि से उनको पुरस्कार नहीं मिला। जिस एंग्री यंग मैन को जंजीर में रूप दिया गया, उसे पुरस्कार नहीं मिला। न ही दीवार में मिला, न त्रिशूल में मिला ़ ़ ़ काला पत्थर, शोले, मुकद्दर का सिकंदर में भी नहीं मिला ़ ़ ़ मिला अमर अकबर एंथनी के लिए फिल्मफेअर का पुरस्कार।

इस पुरस्कार के अगले दिन या दो दिनों के बाद मैं वर्ली में शूटिंग कर रहा था। उस जमाने में ट्रेलर और वैनिटी वैन नहीं होती थी। किसी के घर में एक कमरा ले लिया जाता था आग्रह कर ़ ़ ़ उन्होंने जिस मकान में कमरा रखा था कपड़ा-वपड़ा बदली करने के लिए ़ ़ ़ उसकी मालकिन ज्यूरी में थीं। उन्होंने मुझसे कहा कि मैं ज्यूरी में थी। मैंने पूछा भी कि अमर अकबर एंथनी में ऐसा क्या दिखा कि आप ने उसके लिए पुरस्कार दिया? उन्होंने कहा कि आप एंग्री यंग मैन तो हैं, लेकिन पहली बार कामेडी किया तो हमने दिया। मैंने पूछा भी कि लेकिन 'एंग्री यंग मैन' के लिए क्यों नहीं दिया?

यह प्रश्न हमारे सामने हमेशा रहा है। मैं यह समझता हूं कि ज्यूरी का अपना दृष्टिकोण होता है। अब दे दिया गया है तो उसे स्वीकार कर लेना चाहिए। मेरे हिसाब से सबसे बड़ा पुरस्कार जनता का प्यार है। वे जब हमारी फिल्म देखने जाते हैं और भारी तादाद में देखने जाते हैं, तब हमें जो पुरस्कार मिलता है उसके मुकाबले कोई पुरस्कार नहीं होता। आज जंजीर, दीवार, त्रिशूल और मुकद्दर का सिकंदर का जिक्र आप पुरस्कार नहीं मिलने पर भी करते हैं तो यही हमारे लिए सबसे बड़ा पुरस्कार है।

[आप अपनी उपलब्धियों को ज्यादा महत्व नहीं देते,जबकि दूसरों के लिए वे ईष्र्या का विषय हैं। आप इन उपलब्धियों का श्रेय अनुभव, अभ्यास और अभिनय में किसे देंगे?]

अंदर से बात आनी चाहिए और थोड़ा-बहुत अभ्यास करना होता है। क्रिएटिव फील्ड में लगातार अभ्यास होना चाहिए। न केवल अभ्यास, बल्कि अन्य लोगों का काम देखना ़ ़ ़ सभी पर विस्तार से नजर रखना कि क्या चल रहा है, क्या हो रहा है ़ ़ ़ उससे अवगत रहना। कलाकार के लिए यह जरूरी है। आप लेखक हैं तो दूसरों की किताबें पढ़ते हैं ़ ़ ़ पेंटर हैं तो विख्यात चित्रकारों की पेंटिंग्स देखते हैं कि कैसे रंग इस्तेमाल हुए हैं? कलाकार की जिंदगी में यह जरूरी है कि साथ के कलाकारों का काम देखे ताकि उनसे सीख सके। बदलती पीढ़ी के साथ काम मिलता रहे तो हमें भी एक अवसर मिलता है कि उनकी सोच से हमारी सोच मिले। जब मैं सेट पर जाता हूं तो मेरी उम्र नई पीढ़ी के कलाकारों की औैसत उम्र से 30-40 साल ज्यादा होती है। अच्छा लगता है कि मैं भी नौजवान पीढ़ी के साथ शामिल हूं। उनकी बातें सुनता हूं। उनका नजरिया सुनता हूं। मैंने कभी यह प्रयत्न नहीं किया कि अपना नजरिया उनके ऊपर थोपूं। मैं ऐसा मानता हूं कि नई पीढ़ी पिछली पीढ़ी को पीछे छोड़ देगी। यह तो जीवन है ़ ़ ़ इसमें क्या बुराई है। मान लेना चाहिए कि अब आप उस जगह नहीं हैं, लेकिन यह जरूरी नहीं है कि उस जगह नहीं हैं तो घर पर बैठें। आप काम करना चाहते हैं तो इस मंशा से काम करें कि आप को पुरानी चीज नहीं मिलने वाली है। इसे स्वीकार कर लें।

[क्या अभी भी पुरस्कार मिलने पर ऐसा लगता है कि आपने कोई परीक्षा उत्ताीर्ण की हो?]

पुरस्कारों का मैं कभी निरादर नहीं करता। उतनी ही उत्सुकता से स्वीकार करता हूं जैसे कि स्कूल की परीक्षा में पास या फेल हो गए। ऐसा सोचना मैंने बंद कर दिया है कि बहुत पुरस्कार मिल चुके हैं, अब लेकर क्या करेंगे? ऐसा सोचना पुरस्कार देने वालों का निरादर करना है।

[आप की सक्रिय महत्वाकांक्षा के प्रेरक कौन हैं, दर्शक, आलोचक या आप स्वयं?]

तीनों चीजें हैं। हमारे अंदर काम करने की इच्छा होनी चाहिए। हम ऐसा काम कर रहे हैं, जिसमें प्राथमिकता दर्शक को मिलती है। दर्शक तय करते हैं कि आपका काम उन्हें अच्छा लग रहा है कि बुरा लग रहा है। अगर आप इसे स्वीकार नहीं करना चाहते हैं तो इस लाइन से हट जाइए। जाहिर है कि हर काम अच्छा नहीं होगा। कुछ में त्रुटियां और कमियां होंगी। ये त्रुटियां और कमियां आपको स्वयं न दिखें, लेकिन जो देख रहे हैं, पैसे खर्च कर रहे हैं, आप के लिए अपना समय दे रहे हैं, उन्हें तो दिख रही हैं। उनके निर्णय से हमें सीखना होगा। इस व्यवसाय में दर्शक बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। उनकी प्रतिक्रिया और आलोचना महत्वपूर्ण है। उनसे हम सीखते हैं। यह नहीं मान लेना चाहिए कि हम ने तो ऐसा किया, ये ऐसा क्यों बोल रहे हैं ़ ़ ़ ये गलत बोल रहे हैं। यह गलत हो जाएगा। यह भी हो सकता है कि एक समय वे आप से कहें कि अब आप काम मत कीजिए, क्योंकि अब जो कुछ भी आप कह रहे हैं, उसमें हमारी रुचि नहीं है तो उसे भी सुनना चाहिए। अब या तो चुनौती समझ कर हम कुछ अलग काम करें या उसे मान लें, यह व्यक्तिगत निर्णय होगा। अभी मैं ट्विटर और ब्लॉग पर हूं, वहां लोग अपने विचार डालते हैं। अब यह जरूरी थोड़े ही है कि सभी लोग अच्छी बातें करें। गालियां भी पड़ती हैं, विरोध भी होता है। कई लोग ऐसे भी कहते हैं कि बुढ़ाए गए हो यार, अब छोड़ो। हम भी पढ़ते हैं ़ ़ ़ हमें ज्ञात होता है कि हर व्यक्ति हम से प्रसन्न नहीं हैं। कहीं न कहीं यह बात दिमाग में रहती है। नया काम हाथ में लेते समय यह ध्यान में रहता है कि उस आदमी ने ऐसा कहा था, उसे ध्यान में रखना चाहिए।

[विज्ञापन, टीवी शो या फिल्म ़ ़ आप जो भी करें, उसकी गरिमा बढ़ जाती है। मार्केट बढ़ जाता है। ट्विटर या ब्लॉग, सभी जगह आप पॉपुलर हैं। दर्शकों की मनोभावना को समझना एक चुनौती है। कई कलाकार इसमें चूक जाते हैं। आप कैसे इसे सिद्ध करते हैं?]

यह मेरा अपना दृष्टिकोण है। मैं ऐसा मानता हूं कि आपको जनता ने बनाया और संवारा है। उनकी वजह से आप पनपे हैं ़ ़ ़आपको आदर-सम्मान मिलता है, लेकिन इसके साथ कहीं न कहीं आपका भी श्रेय है कि आप उनको क्या दे रहे हैं? यह मुझे निर्णय लेना होगा कि मैं कैसे अपने आपको जनता के सामने पेश करूं। मैंने हमेशा यह माना है कि मुझे कोई ऐसा काम नहीं करना है, जिसके लिए बाबूजी उठ कर सामने खड़े हों और कहें कि बेटा तुम ने यह गलत काम किया। उनके साक्ष्य से यह मेरा कर्तव्य बनता है कि मैं जीवन में जो कुछ भी करूं या मेरे परिवार के सदस्य जो कुछ भी जीवन में करें ़ ़ ़ हर जगह मां-बाबूजी सामने रहें। उन्होंने जैसे पाला-पोसा, उसमें किसी प्रकार का क्लेश न हो।

हम भाग्यशाली हैं कि जनता ने हमें स्वीकार कर लिया है। कभी कुछ विपरीत किया हो तो जनता हमें बोल देती है कि आपने सही नहीं किया है। हम उसे ठीक करने या उन्हें समझाने की कोशिश करते हैं कि हमने यह किस वजह से किया और आप को क्यों स्वीकार करना चाहिए। अगर वे फिर भी नहीं स्वीकार करते तो हाथ जोड़ कर क्षमा मांग लेते हैं!