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Friday, February 17, 2017

फिल्‍म समीक्षा : रनिंग शादी



फिल्‍म रिव्‍यू
मूक और चूक से औसत मनोरंजन
रनिंग शादी
-अजय ब्रह्मात्‍मज
 अमित राय की फिल्‍म रनिंग शादी की कहानी का आधा हिस्‍सा बिहार में है। पटना जंक्‍शन और गांधी मैदान-मौर्या होटल के गोलंबर के एरियल शॉट के अलावा पटना किसी और शहर या सेट पर है। अमित राय और उनकी टीम पटना(बिहार) को फिल्‍म में रचने में चूक गई है। संवादों में भाषा और लहजे की भिन्‍नता है। ब्रजेन्‍द्र काला की मेहनत और पंकज झा की स्‍वाभाविकता से उनके किरदारों में बिहारपन दिखता है। अन्‍य किरदार लुक व्‍यवहार में बिहारी हैं,लेकिन उनके संवादों में भयंकर भिन्‍नता है। शूजित सरकार की कोचिंग में बन रही फिल्‍मों में ऐसी चूक नहीं होती। उनकी फिल्‍मों में लोकल फ्लेवर उभर कर आता है। इसी फिल्‍म में पंजाब का फ्लेवर झलकता है,लेकिन बिहार की खुश्‍बू गायब है। टायटल से डॉट कॉम मूक करने से बड़ा फर्क पड़ा है। फिल्‍म का प्रवाह टूटता है। इस मूक-चूक और लापरवाही से फिल्‍म अपनी संभावनाओं को ही मार डालती है और एक औसत फिल्‍म रह जाती है।
भरोसे बिहारी है। वह पंजाब में निम्‍मी के पिता के यहां नौकरी करता है। उसकी कुछ ख्‍वाहिशें हैं,जिनकी वजह से वह बिहार से पंजाब गया है। सामान्‍य मध्‍यवर्गीय बिहारी परिवार का भरोसे कुछ करना चाहता है। चुपके से उसकी ख्‍वाहिशों में निम्‍मी भी शामिल हो जाती है। निम्‍मी से दिल टूटने और नौकरी छूटने पर वह अपने दोस्‍त सायबर के साथ मिल कर एक वेबसाइट आरंभ करता है। उसके । जरिए वह प्रेमीयुगलों की शादी भगा कर करवाता है। उसका वेंचर चल निकला है,लेकिन 50वीं कोशिश में वह स्‍वयं फंस जाता है। फिल्‍म भी यहीं आकर फंस जाती है। एक नया विचार कल्‍पना और जानकारी के अभाव में दम तोड़ देता है।
कलाकारों में तापसी पन्‍नू निम्‍मी के किरदार में उपयुक्‍त लगती हैं। आरंभिक दृश्‍यों में उनके लुक पर मेहनत की गई है। बाद में व‍ि हिंदी फिल्‍मों की हीरोइन हो जाती है। यह फिल्‍म देखते हुए दर्शकों को याद रहना वाहिए कि रनिंग शादी उनकी पिंक के पहले की फिल्‍म है। इससे उनकी निराशा कम होगी। किरदारों को गढ़ने में टीम का ढीलापन भरोसे और अन्‍य किरदारों में भी दिखता है। भरोसे के लहजे में बिहारी टच नहीं है। अमित साध ने संवाद और भाषा का अभ्‍यास नहीं किया है। हो सकता है उन्‍हें बताया या गाइड ही नहीं किया गया हो। सायबर के किरदार में हर्ष बाजवा सही लगते हैं। उन्‍होंने नायक का साथ निभाया है। पटना प्रसंग में पंकज झा और ब्रजेन्‍द्र काला पहचान में आते हैं। वहां के चरित्रों के लिए कलाकारों का चयन बेहतर है। उनकी भाव-भंगिमाओं में अनोखापन है। नेहा,नेहा का प्रेमी,मामी आदि चरित्र सुंदर बन पड़ हैं।
अमित राय निर्देशन की पहली कोशिश में फिसल गए हैं। उन्‍हें सही कोचिंग नहीं मिली है या कोच का ध्‍यान अपनी टीम के अन्‍य खिलाडि़यों(निर्देशकों व फिल्‍मों) में लगा रहा। पिंक की खूबसूरती और कामयाबी का श्रेय शूजित सरकार को नलता है। रनिंग शादी की फिसलन और कमी के लिए उन्‍हें ही दोषी माना जाएगा।
अवधि-115 मिनट
** दो स्‍टार  

Friday, December 13, 2013

ऑन सेट : रनिंगशादी डॉट कॉम : बेगानी शादी में दीवाने

ऑन सेट
बेगानी शादी में दीवाने
-अजय ब्रह्मात्मज
    पटियाला के गुरुबख्श कॉलोनी की एक गली में गहमागहमी है। दोमंजिले मकान के अहाते में खड़ी सफेद एंबेस्डर के पास मामा जी अपनी लैम्ब्रेटा स्कूटर के किक मार रहे हैं। पुराना स्कूटर स्टार्ट ही नहीं हो रहा है। उन्हें एडवर्टाइज(ऐड) बनाने के लिए जाना है। तभी सामने से उनका भांजा भरोसे अपने दोस्तों के साथ एक ऑटो से उतरता है। मामा उसे देख कर चौंकते हैं और झेंपते हुए कहते हैं, ‘बेटे तुमने बता दिया होता तो मैं तुझे लेने आ जाता।’ वे अपने सफेद एंबेस्डर की तरफ इशारा करते हुए कहते हैं कि यह सफेद हाथी यूं ही खड़ा रहता है। भरोसे मामा की बातों की सच्चाई जानता है। वह हंसता हुआ पूछता है, ‘मामा, आप स्कूटर क्यों नहीं बदल देते?’ फिर खुद ही कहता है,चलिए धक्के मार देता हूं। अपने मेहमान दोस्तों के साथ भरोसे स्कूटर को धक्का लगाता है।
    यह निर्माता शूजीत सरकार और निर्देशक अमित राय की फिल्म ‘रनिंगशादी डॉट कॉम’ का एक दृश्य है। इन दिनों पटियाला में इसके बचे दृश्यों की शूटिंग चल रही है। बातचीत में पता चलता है कि वास्तव में पटियाला में शूट किया जा रहा सीन पटना के किसी मोहल्ले का है। चूंकि उत्तर भारत के सारे मोहल्ले लगभग एक जैसे होते हैं, इसलिए निर्माता-निर्देशक ने सुविधा के लिए पटियाला में शूटिंग कर ली है। पटना में इसके मैचिंग लोशन पर शूटिंग कर ली जाएगी। फिल्मी भाषा में इसे ‘चिटिंग’ कहते हैं। पर्दे पर हमें किसी और शहर और स्थान का एहसास होता है, जबकि वास्तव में वह शहर और स्थान कहीं और होता है। शूजीत सरकार बताते हैं, ‘हम लोग पटना भी जाएंगे। इस फिल्म के कुछ दृश्य वहां शूट किए जाएंगे। फिल्म का नायक भरोसे पटना का रहने वाला है। पंद्रह साल की उम्र में वह अमृतसर आ गया था। अमृतसर में रच-बस चुके भरोसे (अमित साध) और उसकी दोस्त निम्मी (तापसी पन्नु)की यह रोचक प्रेमकहानी है। इसमें रोमांस के साथ कामेडी भी है।’
     ‘विकी डोनर’ और ‘मद्रास कैफे’ जैसी चर्चित फिल्मों से मशहूर हुए निर्देशक शूजीत सरकार अब निर्माता बन गए हैं। उनके प्रोडक्शन राइजिंग सन फिल्म्स की पहली फिल्म है ‘रनिंगशादी डॉट कॉम’। इस फिल्म के निर्देशन की जिम्मेदारी उन्होंने सफल सिनेमेटोग्राफर अमित राय को सौंपी है। निर्देशक अमित राय फिल्म के बारे में बताते हैं, ‘यह रॉमकॉम (रोमांटिक कामेडी) है। मुंबई के लेखक नवजोत गुलाटी के साथ मिल कर मैंने यह फिल्म लिखी है। अमृतसर की आम जिंदगी से लिए गए मुख्य किरदारों से दर्शक जुड़ाव महसूस करेंगे। पूरी फिल्म एक अनोखे कांसेप्ट पर है। इस फिल्म के मुख्य किरदार भाग कर शादी करने वालों की मदद करते हैं। उनकी सुरक्षा और बाकी जरूरतों का पूरा इंतजाम करते हैं। भरोसे और निम्मी के बीच भी अनोखा रिश्ता है। भरोसे पटना से अमृतसर आया युवक है, जो निम्मी के पिता की दुकान में काम करता है। धीरे-धीरे निम्मी से उसकी नजदीकियां बढऩे के साथ फिल्म की कहानी आगे बढ़ती है।’
    निर्माता शूजीत सरकार कहते हैं, ‘हम लोगों ने छोटी फिल्मों से फिल्म निर्माण में उतरने का फैसला किया है। ‘रनिंगशादी डॉट कॉम’ के साथ हमलोग एक बंगाली फिल्म भी बना रहे हैं। इन दोनों फिल्मों के अनुभव के बाद ही हम आगे बड़ा कदम उठाएंगे।’

Friday, February 22, 2013

फिल्‍म समीक्षा : काय पो छे

KPC_New POSTER_30x40_hindi.jpg-अजय ब्रह्मात्मज
गुजराती भाषा का 'काय पो छे' एक्सप्रेशन हिंदी इलाकों में प्रचलित 'वो काटा' का मानी रखता है। पतंगबाजी में दूसरे की पतंग काटने पर जोश में निकला यह एक्सप्रेशन जीत की खुशी जाहिर करता है।
'काय पो चे' तीन दोस्तों की कहानी है। तीनों की दोस्ती का यह आलम है कि वे सोई तकदीरों को जगाने और अंबर को झुकाने का जोश रखते हैं। उनकी दोस्ती के जज्बे को स्वानंद किरकिरे के शब्दों ने मुखर कर दिया है। रूठे ख्वाबों को मना लेने का उनका आत्मविश्वास फिल्म के दृश्यों में बार-बार झलकता है। हारी सी बाजी को भी वे अपनी हिम्मत से पलट देते हैं।
तीन दोस्तों की कहानी हिंदी फिल्मों में खूब पसंद की जा रही है। सभी इसका क्रेडिट फरहान अख्तर की फिल्म 'दिल चाहता है' को देते हैं। थोड़ा पीछे चलें तो 1981 की 'चश्मेबद्दूर' में भी तीन दोस्त मिलते हैं। सिद्धार्थ, ओमी और जय। 'काय पो चे' में भी एक ओमी है। हिंदी फिल्मों में रेफरेंस पाइंट खोजने निकलें तो आज की हर फिल्म के सूत्र किसी पुरानी फिल्म में मिल जाएंगे। बहरहाल, 'काय पो छे' चेतन भगत के बेस्ट सेलर 'द 3 मिस्टेक्स ऑफ माई लाइफ' पर आधारित है। साहित्यप्रेमी जानते हैं कि तमाम लोकप्रियता के बावजूद चेतन भगत के उपन्यासों को साहित्यिक महत्व का नहीं माना जाता। यह भी अध्ययन का विषय हो सकता है कि साधारण साहित्यिक और लोकप्रिय कृतियों पर रोचक, मनोरंजक और सार्थक फिल्में बनती रही हैं। गुलशन नंदा से लेकर चेतन भगत तक के उदाहरण साक्षात हैं। खोजने पर और भी मिल जाएंगे। ऐसी बेहतर फिल्मों पर लिखते समय यह खतरा रहता है कि कहीं साहित्य के फिल्म रुपांतरण का तिलिस्म न टूट जाए।
ईशान (सुशांत सिंह राजपूत), ओमी (अमित साध) और गोविंद (राज कुमार यादव) गहरे दोस्त हैं। एक-दूसरे के साथ समय बिताने और सपने देखते तीनों युवकों का समाज पारंपरिक और गैरउद्यमी है। इस समाज में पढ़ाई के बाद कुछ कर लेने का मतलब सिर्फ आजीविका के बेसिक साधन जुटा लेना होता है। तीनों देश में आए आर्थिक उदारीकरण के बाद के युवक हैं। उनके पास उद्यमी बनने के सपने हैं और वे खुद भी मेहनती और समझदार हैं। तीनों के साझा सपनों की पतंग का मांझा परिस्थितियों के कारण उलझता है। विवश और लाचार होने के बाद भी उनके जज्बे और जोश में कमी नहीं आती। उनके मतभेद और मनमुटाव क्षणिक हैं। प्रतिकूल परिस्थितियों में भी उनकी दोस्ती का धागा नहीं टूटता। तीनों मिलकर बिट्टू मामा की मदद से खेल के सामानों की दुकान खोलते हैं। ईशान क्रिकेटर है। वह क्रिकेट की कोचिंग भी देता है। उसकी नजर (दिग्विजय देशमुख) गोटीबाज अली हाशमी पर पड़ती है। अली को निखारने की कोशिश में वह उसके परिवार के करीब आता है। साथ काम करते हुए तीनों दोस्तों की प्राथमिकताएं बदलती हैं। राजनीति का भगवा उभार रेंगता हुआ उनकी दोस्ती में घुसता है। यहां हम देखते हैं कि गुजरात के गोधरा कांड की सतह के नीचे कैसी सच्चाइयां तैर रही थीं। भूकंप से कैसे सपनों में दरार पड़े और गोधरा कांड ने कैसे मानवता पर धर्माधों को हावी होने दिया।
इस फिल्म का अघोषित नायक अली हाशमी है। वह इन युवकों की संगत में पल्लवित होता है। वह खुद के लिए उनकी संजीदगी देखता है। लगन और प्रतिभा से वह देश की नेशनल क्रिकेट टीम में शामिल होता है। उसकी उपलब्धियों के सफर में तीनों दोस्तों का जोश भी है। अली हाशमी के बहाने हम सेक्युलर हिंदुस्तान को करीब से देखते हैं, जहां बंटवारे की भगवा कोशिशों के बावजूद कैसे एकजुटता से समान सपने साकार होते हैं। लेखक-निर्देशक ने अली हाशमी पर अधिक जोर नहीं दिया है। उन्हें तो तीनों युवकों की कहानी पेश करनी थी।
निस्संदेह अनय गोस्वामी के फिल्मांकन, हितेश सोनिक के पा‌र्श्व संगीत, दीपा भाटिया के संपादन के सहयोग से अभिषेक कपूर ने 'काय पो चे' जैसी उत्कृष्ट और मनोरंजक फिल्म पेश की है। स्वानंद किरकिरे के गीत और अमित त्रिवेदी का संगीत फिल्म की अंतर्धारा है। 'काय पो चे' गुजरात की पृष्ठभूमि में एक खास समय की ईमानदार कथा है, जब प्राकृतिक और राजनीतिक रूप से सब कुछ तहस-नहस हो रहा था। फिल्म का परिवेश और उसका फिल्मांकन स्वाभाविक है। कुछ भी लार्जर दैन लाइफ दिखाने या रचने की कोशिश नहीं की गई है।
मुकेश छाबड़ा की कास्टिंग और अभिषेक कपूर का निर्देशन उल्लेखनीय है। सभी किरदारों में उपयुक्त कलाकार चुने गए हैं। मुख्य कलाकारों के रूप में सुशांत सिंह राजपूत, अमित साध, राज कुमार यादव, अमृता पुरी और मानव कौल अपनी भूमिकाओं में रचे-बसे नजर आते हैं। सभी कलाकारों की अपनी विशेषताएं हैं, जो उनके चरित्र को प्रभावशाली और विश्वसनीय बनाती हैं। पहली फिल्म होने के बावजूद सुशांत सिंह राजपूत की सहजता आकर्षित करती है। अमित साध में एक ठहराव है। वे दृश्यों में रमते हैं और टिके रहते हैं। राज कुमार यादव ज्यादा सधे अभिनेता हैं। वे किरदार के सभी भावों को दृश्यों की मांग के मुताबिक व्यक्त करते हैं। प्रेम दृश्यों और गरबा डांस में उनकी घबराहट की भिन्नता देखते ही बनती है। दोस्तों से उनकी झल्लाहट और इरादों के प्रति उत्कट अभिलाषा का मूक प्रदर्शन भी उल्लेखनीय है। मानव कौल ने अभिनय कौशल से दिखाया है कि दुष्ट और खल चरित्र के लिए किसी प्रकार के मैनरिज्म या दिखावे की आवश्यकता नहीं है।
'काय पो छे' 2013 में आई उत्कृष्ट फिल्म है। यह मनोरंजक होने के साथ प्रेरक है। देश में करवट ले रही सदी के समय की प्रादेशिक सच्चाई होकर भी यह देश की युवाकांक्षा जाहिर करती है।
-चार स्टार