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Tuesday, August 11, 2015

यादगार रहा है 15 सालों का सफर : अभिषेक बच्चन

-अजय ब्रह्मात्मज
अभिनेता अभिषेक बच्चन ने हाल ही में फिल्म इंडस्ट्री में 15 साल पूरे किए हैं। 30 जून 2000 को उनकी पहली फिल्म जेपी दत्ता निर्देशित ‘रिफ्यूजी’ रिलीज हुई थी। उनकी उमेश शुक्ला निर्देशित ‘ऑल इज वेल’ 21 अगस्त को रिलीज होगी।    

    15 सालों के सफर यादगार और रोलरकोस्टर राइड रहा। उस राइड की खासियत यह होती है कि सफर के दरम्यान ढेर सारे उतार-चढ़ाव, उठा-पटक आते हैं, पर आखिर में जब आप उन मुश्किलों को पार कर उतरते हैं तो आप के चेहरे पर लंबी मुस्कान होती है। मेरा भी ऐसा ही मामला रहा है। मुझे बतौर अभिनेता व इंसान परिपक्व बनाने में ढेर सारे लोगों का योगदान रहा है। आज मैं जो कुछ भी हूं, उसमें बहुत लोगों की भूमिका है।
    शुरुआत रिफ्यूजी और जे.पी.दत्ता साहब से करना चाहूंगा। पिछले 15 सालों के सफर में सबसे यादगार लम्हे रिफ्यूजी की स्क्रीनिंग के पल के थे। मुझे याद है मैं जून के आखिरी दिनों में मनाली में ‘शरारत’ की शूटिंग कर रहा था। मुझे ‘रिफ्यूजी’ की स्क्रीनिंग के लिए आना था, पर ‘शरारत’ में भी बड़ी स्टारकास्ट थी। हमारे डायरेक्टर गुरुदेव भल्ला ने मुझसे कहा कि यार तुम्हारे बिना तो हम कोई सीन शूट नहीं कर सकेंगे। उस पर मैंने उनसे कहा कि साहब ‘रिफ्यूजी’ मेरी पहली फिल्म है, जाना तो पड़ेगा। उन्होंने नहीं  रोका। जिस दिन मैं स्क्रीनिंग के लिए निकला, उस दिन घना कोहरा था और मनाली से कुल्लू एक ही फ्लाइट जग्सन एयर इत्तफाकन उस दिन रद्द हो गई थी। मैं टैक्सी लेकर मनाली रिजॉर्ट से चंडीगढ़ आया। फिर दिल्ली और अंतत: मुंबई। जेपी साहब ने मेरी व बेबो (करीना कपूर खान) यूनिट के लिए एक स्क्रीनिंग रात के साढ़े नौ बजे रखी थी। स्क्रीनिंग माहिम के नए खुले मल्टीप्लेक्स मूवी स्टार में थी। उसके ठीक अगले दिन फिल्म की प्रीमियर हुआ था।
    प्रीमियर का किस्सा भी बड़ा रोचक रहा। मैं जलसा में तैयार बैठा था अपने चाचा और छोटे भाई समान सिकंदर के साथ। पहले मैं गया प्रतीक्षा। वह इसलिए कि प्रीमियर के पहले मैं बड़ों का आर्शीवाद ले लूं। तो मैं प्रतीक्षा गया। दादा-दादी के पांव छूए। दादी से कहा, ‘मैं जा रहा हूं अपने प्रीमियर के लिए।’ उन्होंने कहा कि मुझे भी फिल्म दिखाना। मैंने कहा कि मैं उनके लिए वीएसएस ले आऊंगा।
    बहरहाल मैं वहां से निकला लिबर्टी सिनेमा के लिए। मीठीबाई से एसवी रोड की राह ली। पवनहंस के सामने बस डिपो है। उससे पहले एक छोटा सा हनुमान मंदिर पड़ता है। बचपन में मैं जब दादी मां के साथ शाम को ड्राइव पर जाता था तो वहां दादी मां शीश नवाती थी। वे हनुमान जी की बड़ी भक्त थीं। रोज सुबह घर में वे हनुमान चालीसा प्ले करती थीं, जिसे अनूप जलोटा ने गाया था। एक और आरती थी जय जय जय बजरंगबली। वह आज भी घर में बजता है। बहरहाल प्रीमियर पर जाने के दौरान मैं वहां रूक कर प्रणाम करना चाहता था। काफी गाड़ियां थीं साथ में, फिर भी उतर कर मैंने मंदिर में जाकर प्रणाम किया। हम जब लिबर्टी सिनेमा पहुंचे तो पता चला कि जेपी साहब नहीं आ रहे हैं। रिलीज को लेकर कुछ प्रॉब्लम हो गया था। उनका मैसेज आया कि अभिषेक तुम सब संभालो। उन दिनों रेड कार्पेट की कोई अवधारणा थी नहीं, पर गाडी से उतर कर थिएटर जानें के रास्ते में दोनों साइड मीडिया थी। वहां से जो खुशी मिली तो समझ में आ गया कि बॉस अब मामला गंभीर बन चुका है।
    फिल्म को मुंबई में अजय देवगन डिस्ट्रीब्यूट कर रहे थे। उन्होंने मुझे इंटरवल में लिबर्टी के हॉल में कहा, ‘तुम्हारी फिल्म को जोरदार ओपनिंग मिली है। मैं यह बात बतौर वितरक बता रहा हूं। मुझे तुम्हारे लिए बड़ी खुशी है। गुडलक टू यू।’ प्रीमियर खत्म होते ही हम गए ओबरॉय हॉटेल, जो अब ट्राइडेंट है। वहां के रीगल रूम में तब तक जेपी साहब आ चुके थे। फिर केक कटा और सब फैल गए आराम से। वहां से सुबह छह बजे मैं और सिंकदर वहां से निकले। मैंने सिकंदर से कहा, ‘यार यह मेरे लिए इतना बड़ा दिन है। कुछ ही घंटों में मैं मनाली निकल जाऊंगा ‘शरारत’ की शूटिंग के लिए। मैं यहां की कुछ यादें अपने संग ले जाना चाहता हूं। चलो यार लिबर्टी चलते हैं। वहां से पोस्टर लाकर अपने ऑफिस में लगाऊंगा। वह यादगार तोहफा होगा मेरे लिए कि यही वह पोस्टर था, जो प्रीमियर पर लगा था। लिबर्टी गए तो बारिश हो रही थी। पोस्टर कहीं दिखा ही नहीं। एक अपना कटआउट मिला। उसे गाड़ी की बोनट पर रखा। सिंकदर को खिड़की पर बिठाया और कटआउट ऑफिस ले आया। वह आज भी लगा हुआ है।’
    तब से लेकर आज तक का कुल 15 सालों का सफर कैसे गुजर गया, पता ही नहीं चला। खास सफर रहा है। ढेर सारे लोगों से मिला। वह काम करने को मिला, जिसके ख्वाब देखता था। यह खुशकिस्मती है मेरी और यह किसी की बदौलत नहीं है। यह ऊपरवाले की देन है। आप चाहे किसी के भी बेटे या बेटी हों। यह दुनिया बहुत निर्दयी है। कुछ भी मुफ्त का नहीं मिलता। मैं आज जहां भी हूं, चाहे सफल या असफल, वह कम बड़ी उपलब्धि नहीं है। कितने लोग हैं दुनिया में जो सुबह उठें और अपने ख्वाब को जी पाएं? मैं अपना सपना जी रहा हूं। मैं बचपन से एक्टर ही बनना चाहता था। पापा के साथ स्टूडियो जाता था तो रोंगटे खड़े हो जाते थे। आज भी होते हैं।
    मुझे बहुत पहले लग चुका था कि मैं इसी के लिए पैदा हुआ हूं। खुशी इस बात की है कि मैं 15 सालों बाद भी इसे कर रहा हूं। मुझे मालूम है कि लोग पूछेंगे ही कि बहुत दिनों बाद आप की कोई सोलो फिल्म आ रही है। मैं इन सब चीजों में पड़ता नहीं हूं। मुझे खुशी तो इस बात की है कि मैं आज भी फिल्मों में पूरी तरह सक्रिय हूं। आज कई ऐसे एक्टर हैं, जो सक्रिय नहीं हैं। मैं काम कर रहा हूं। फिर फर्क नहीं पड़ता कि मल्टीस्टारर फिल्म का हिस्सा हूं या सोलो फिल्म का। कई सफल फिल्में दी हैं मैंने। अब उसका क्रेडिट आप किसी को दें,वह आप की ओपिनियन है।
    पिछले 15 साल बहुत उम्दा रहे हैं। मंै खुश हूं। कम से कम शिकायती तो नहीं हूं। मैं खुद को और बेहतर करने में लगा हुआ हूं। मेरे दर्शक मुझे आज भी स्वीकार करते हैं और कम से कम दो और साल तक तो मेरे पास तीन और फिल्में हैं। उन सालों को यादगार व खुशहाल बनाने में सबसे पहले तो मेरे माता-पिता हैं, जिनकी वजह से मैं यहां बैठा हुआ हूं। फिर दादा-दादी, नाना-नानी। बचपन से लेकर आज तक उनसे काफी कुछ सीखा हूं। मेरे नाना भी बहुत अच्छे लेखक रहे हैं।
    उनके अलावा मेरी दीदी, ऐश्वर्या, यार-दोस्त सबने मुझे शेप अप करने में बड़ी भूमिका निभाई। श्वेतदी(श्वेता बच्चन नंदा को प्यार से कहते हैं) मेरी बैकबोन रही हैं। मैं गलत-सही, सफल-असफल जो भी रहा, हर चीज में वे मेरे संग रहीं हैं। मेरे लिए श्वेता दीदी कहना लंबा था तो मैंने उन्हें श्वेतदी कहना शुरू कर दिया। अब घर में हर कोई उन्हें श्वेतदी ही पुकारते हैं। ऐश्वर्या मेरी सब कुछ हैं। वे मेरी दोस्त, पत्नी, मेरे बच्चे की मां हैं। इस तरह उनके संग बड़ा गहरा व निजी बौंड है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि मैं उनके संग कोई भी बात बिना किसी डर के कर
    पेशे की बात करें तो जेपी साहब ने मुझमें उस वक्त यकीन किया, जब मुझे खुद पर यकीन नहीं था। मुझे मलाल है कि मैं शायद उन्हें उतना नहीं दे सका। मैं और बढ़िया कर सकता था। मैं आज जितना जानता हूं,उतना उस वक्त जानता तो रिफ्यूजी और बेहतर हो सकती थी। फिर अनुपम खेर साहब का भी मैं शुक्रिया अदा करना चाहूंगा। बहुत से लोगों को लगता है कि मैं ‘युवा’ से ज्यादा निखरा, जबकि असलियत में वह काम ‘ओम जय जगदीश’ से हो गया था। बेबो को मैं बहन मानता हूं। वैसा ही मानता रहूंगा। अन्ना, जैकी दादा। उन सबसे मैं रोजाना नहीं मिलता, पर उनके प्रति प्यार कम नहीं होता।
    ये सब पिलर हैं मेरे लिए फिल्म इंडस्ट्री में। उक्त सभी मेरे लिए एक्स्टेंडेड परिवार की तरह हैं। मैं काफी देर तक औपचारिक नहीं रह सकता। मैं तो खुद से जलने वालों को भी पास जाकर जादू की झप्पी दे देता हूं।
सकता हूं। अक्सरहां हम अदाकारों को डर इस बात का रहता है कि हम कहीं जज न कर लिए जाएं। ऐसे में हम डर से बड़े औपचारिक से हो जाते हैं। वह बात ऐश्वर्या के संग नहीं होता। वे मुझे सब कुछ एक्सप्रेस करने का मौका देती हैं। वे मुझे बाहर जा फिल्में बनाने का मौका प्रदान करती हैं। घर की चिंता से मुक्त रखती हैं।

Saturday, April 11, 2015

छोड़ दी है कंफर्ट जोन : अभिषेक बच्चन


-अजय ब्रह्मात्मज
‘हैप्पी न्यू ईयर’ की शूटिंग, प्रोमोशन और रिलीज की व्यस्तता के बाद मैं कबड्ड़ी और फुटबॉल जैसे खेलों में लीन हो गया था। काफी व्यस्त रहा। खेलों को लेकर कुछ करने का सपना था, वह पूरा हुआ। कबड्डी और फुटबॉल दोनों खेलों के सफल आयोजन से बहुत खुशी मिली। ‘हैप्पी न्यू ईयर’ भी लोगों को पसंद आई। फिल्म में अपना काम सराहा जाता है तो बहुत अच्छा लगता है। कोई शिकायत नहीं है मुझे। हां, भूख बढ़ गई है।
    भूख एक्टिंग की बढ़ी है। इन दिनों ‘हेरा फेरी 3’ और ‘हाउसफुल 3’ की शूटिंग कर रहा हूं। मेरे लिए दोनों ही फिल्में चुनौतीपूर्ण हैं। दोनों सफल रही हैं। उनकी अपनी एक प्रतिष्ठा है। चुनौती यह है कि मुझे उस प्रतिष्ठा के अनुकूल होना है। ‘हेरा फेरी 3’ में जॉन अब्राहम, परेश रावल और सुनील शेट्टी के साथ हाव-भाव मिलाना है तो ‘हाउसफुल 3’ में अक्षय कुमार, रितेश देशमुख और बोमन ईरानी के साथ खड़ा होना है। ये सभी कलाकार इन फिल्मों से वाकिफ हैं। दर्शक भी उन्हें देख चुके हैं। मैं दोनों फिल्मों में नया हूं। गौर करें तो दोनों फ्रेंचाइजी फिल्मों के प्रशंसक और दर्शक हैं। मुझे उन्हें संतुष्ट करना है। सचमुच मैं अपने कंफर्ट जोन से बाहर आ गया हूं। रातों की नींद उड़ गई है। मुझे दोनों फिल्मों के सुर में आना है।
    ‘हेरा फेरी 3’ के डायरेक्टर नीरज वोरा हैं। उन्होंने ही ‘हेरा फेरी 2’ की थी। हां, ‘हाउसफुल 3’ के डायरेक्टर बदल गए हैं। इस बार साजिद-फरहाद हैं। मेरे लिए अच्छी बात है कि साजिद-फरहाद की लिखी ‘बोल बच्चन’ कर चुका हूं। उनसे मेरा अच्छा तालमेल है। उन्होंने ‘हाउसफुल 2’ लिखी थी।
    यह कहना ठीक नहीं होगा कि मैं केवल कॉमेडी फिल्में कर रहा हूं। ‘हैप्पी न्यू ईयर’ के पहले मैंने ‘धूम 3’ की थी। वह एक्शन फिल्म है। कुछ दिनों पहले उमेश शुक्ला की फिल्म ‘ऑल इज वेल’ की शूटिंग कर रहा था। अभी की दोनों फिल्में कॉमेडी हैं। कॉमेडी करने में थोड़ी दिक्कत हो रही है, लेकिन मजा आ रहा है। मेहनत करनी पड़ रही है। मुझे लगता है कि अपने करियर में मैं उस मुकाम पर हूं, जहां मुझे हल्की-फुल्की फिल्में करने की जरूरत है। हो सकता है 2016 में मैं कुछ इंटेंस और पॉवरफुल फिल्में करूं। कॉमेडी बहुत ही थकाऊ प्रॉसेस है। पर्दे पर जो एनर्जी लेवल दिखता है, उसे सेट पर भी बनाए रखना पड़ता है। आप जानते हैं कि हिंदी फिल्मों के सेट पर क्या-क्या होता है और कैसे-कैसे लोगों से मुलाकात होती है? शॉट के बीच में नॉर्मल होने के बाद फिर से कैमरा ऑन होते ही उसी एनर्जी के साथ शुरुआत करनी पड़ती है। संयोग ऐसा रहा कि अपनी कॉमेडी फिल्मों में मैंने ज्यादातर हायपर कैरेक्टर प्ले किए हैं। ड्रामा, एक्शन और रोमांस में जरूरी नहीं है कि साथ खड़े कलाकार और आप एक ही पिच पर हों। कॉमेडी फिल्मों में इसकी सख्त जरूरत पड़ती है।
    ऑफस्क्रीन होने पर मैं हमेशा नॉर्मल रहने की कोशिश करता हूं। बाकी कलाकारों के बारे में मुझे नहीं मालूम, लेकिन अपने बारे में कह सकता हूं कि निजी जिंदगी में मैं एक्टर नहीं हूं। वैसे यह भी सच है कि पर्दे पर लगातार किरदार निभाते-निभाते वास्तविक अभिषेक बच्चन कभी-कभी कहीं खो जाता है। मैं खुद अपने किरदारों नंदू, भीड़े या गुरू देसाई को तो जानता हूं, लेकिन अपने बारे में सही-सही नहीं बता सकता कि अभिषेक बच्चन कौन और क्या है? लोगों और प्रशंसकों के सामने मैं परफॉर्म नहीं करता। खुश हूं तो खुश दिखूंगा, उदास हूं तो शायद सामने नहीं आऊंगा। किसी इवेंट पर जाकर उदास और दुखी दिखना तो गलत बात है। कई बार हम अपनी तकलीफें छिपा कर हंसते हैं। अंग्रेजी की कहावत है, ‘पुल अप योर सॉक्स एंड फेस द वल्र्ड’। एक कलाकार मीडिया या इवेंट में कोई दूसरी बात याद नहीं रख सकता। फिल्मों की शूटिंग में भी कई बार न चाहते हुए भी काम करना पड़ता है, क्योंकि कई सारे लोगों की तारीखें जोड़ी गई रहती हैं। मैं सेट पर जाकर डायरेक्टर से यह नहीं कह सकता कि आज यह सीन नहीं, वह सीन शूट करो। किसी प्रकार का बदलाव करना पेशेवर तरीका नहीं होगा। हरेक सीन के पीछे सैकड़ों लोगों की मेहनत लगी रहती है। हर पेशे में तालमेल बिठाकर चलना पड़ता है। हमें यह देखना चाहिए कि हमारे आलस्य या इंकार से कितने लोगों की दिक्कतें बढ़ सकती हैं। किसी भी पेशे में सभी एक-दूसरे से जुड़े होने के साथ एक-दूसरे पर निर्भर भी करते हंै।
    अभी ओवर एक्सपोजर का दौर चल रहा है। मीडिया और स्टार के संबंध व तौर-तरीके बदल गए हैं। मुझे याद है ‘रिफ्यूजी’ रिलीज होने के समय मुझे महीने-महीने इंतजार करना पड़ा था कि फलां मैग्जीन आएगी तो उसमें मेरा इंटरव्यू आएगा। तब फिल्मी खबरों और इंटरव्यू के लिए दूसरा जरिया भी नहीं था। अभी तो तीस सेकेंड के अंदर ट्विटर पर सभी की प्रतिक्रियाएं आने लगती हैं। सब-कुछ झटपट हो गया है। स्थिति यह हो गई है कि सेलेब्रेटी की हर मूवमेंट खबर है। अभी खबरों की खपत बढ़ गई है। उस हिसाब से पत्रकारों को भी खबरें खोजने से ज्यादा ईजाद करनी पड़ती है। पूरा माहौल एक राक्षस के रूप में बदल चुका है, जिसकी भूख खत्म ही नहीं होती। किसी क्रॉसिंग पर मेरी गाड़ी खड़ी है तो कोई भी मेरी तस्वीर खींचकर छाप देगा। वह भी खबर है। सच कहें तो अपनी चर्चा की चाहत के बावजूद एक्टर डर गए हैं। इस डर से एक्टरों ने अपने आस-पास कवच सा बना लिया है। यह अच्छी बात नहीं है, लेकिन यही सच्ची बात है।

Sunday, February 15, 2015

कैरेमल पॉपकॉर्न पसंद है आशुतोष को

बर्थडे स्पेशल
आशुतोष गोवारिकर के बर्थडे पर अभिषेक बच्चन बता रहे हैं उनके बारे में ...
प्रस्तुति-अजय ब्रह्मात्मज

आशुतोष गोवारिकर मेरे घनिष्ठ मित्र हैं। उनसे पहली मुलाकात अच्छी तरह याद है। उनके गले में चाकू घोंपा हुआ था। चाकू गले को आर-पार कर रहा था। उनके गले से खून निकल रहा था। वे सेट पर चहलकदमी करते हुए अपने शॉट का इंतजार कर रहे थे। उन्होंने यह गेटअप ‘इंद्रजीत’ फिल्म के लिए लिया था। उस फिल्म में मेरे डैड अमिताभ बच्चन थे। उस फिल्म को रोज मूवीज ने प्रोड्यूस किया था। गोल्डी के पिता का तभी देहांत हुआ था तो वे अपनी बहन सृष्टि के साथ सेट पर आते थे। एक दिन मैं भी गया था तो मैंने आशुतोष को इस अवस्था में देखा। वे इस फिल्म में कैरेक्टर आर्टिस्ट का रोल प्ले कर रहे थे।
    उसके बाद मैं जिन दिनों असिस्टैंट डायरेक्टर और अपनी कंपनी का प्रोडक्शन का काम देख रहा था तो उन्होंने मुझे ‘लगान’ की स्क्रिप्ट सुनाई थी। मुझे वह फिल्म बेहद पसंद आई थी। मैंने कहा था कि यह फिल्म जरूर बननी चाहिए। उसके बाद हम पार्टियों और बैठकों में सामाजिक तौर पर मिलते रहे। हमारे संबंध हमेशा मधुर रहे। ऐश्वर्या ने उनके साथ ‘जोधा अकबर’ में काम किया। उन दिनों हमारी निकटता हुई। एक-दूसरे के करीब आने के साथ समझदारी बढ़ी। उसके बाद उन्होंने मुझे अपनी फिल्म ‘खेलें हम जी जान से’ के लिए चुना। उस फिल्म की शूटिंग में बहुत मजा आया।
    आशुतोष बेहद शांत,एकाग्र,स्वयंनिष्ठ व्यक्ति हैं। उन्हें राजी कर पाना आसान नहीं होता,लेकिन वह आप की बात सुनते हैं। कुड छायरेक्टर खुद को बॉस समझते हैं। वे दूसरों की नहीं सुनते। आशुतोष से आप कुछ कहें तो वे आदर और ध्यान से सुनते हैं। कर के दिखाने के लिए कहते हैं। वे आप को पूरा मौका देते हैं। देखने-सोचने के बाद राजी हो गए तो आप की राय अपना लेंगे। असहमत होने पर अपने तर्क देंगे। वे किसी की सलाह को बगैर सुने-समझे खारिज नहीं करते।  किसी आर्टिस्ट को वे यह नहीं जताते कि वे डायरेक्टर हैं,इसलिए उनकी ही बात सुनी जाए। सबसे बड़ी बात है कि वे अपने कलाकारों को पूरी प्रतिष्ठा देते हैं। अभी तो वे हम दोनों के दोस्त हैं। हमलोग कई बार साथ फिल्में देखने जाते हैं। उन्हें कैरेमल पॉपकार्न बहुत पसंद है। एक बार अमेरिका से मैं उनके लिए कैरेमल लेकर आया था। उस दुकान से कैरेमल लाया था,जिसने उसका आविष्कार किया था। फिर मैंने उन्हें बुलाया। हम दोनों ने खूब छक कर खाया।
    मुझे याद है। ‘खेलें हम जी जान से’ के मुंबई प्रीमियर के बाद हमलोग कोलकाता जा रहे थे। समझ में तो आ गया था कि फिल्म नहीं पसंद की जा रही है। मैं उदास था। उन्होंने मेरी उदासी भांप ली और समझाया कि हम फिल्म बनाने के अपने कारण और उद्देश्य में सफल रहे। हमें इस बात का अफसोस तो होगा कि फिल्म नहीं चली। फिर भी खुश होना चाहिए कि हम क्रांतिकारी सूर्यो सेन के जीवन से दर्शकों को परिचित करा सके। उसके बाद मैंने राहत की सांस ली और काफी अच्छा महसूस किया। जिंदगी और फिल्मों को देखने का यह भी एक नजरिश हो सकता है। ऐसा लगता है कि वे बहुत सीरियस किस्म के आदमी हैं। उनके साथ का समय मजे में गुजरता है।

Tuesday, May 6, 2014

कमी नहीं है काम की-अभिषेक बच्‍चन


-अजय ब्रह्मात्मज
    इन दिनों अभिषेक बच्चन फराह खान की ‘हैप्पी न्यू ईयर’ और उमेश शुक्ला की ‘आल इज वेल’ की शूटिंग कर रहे हैं। इन दोनों फिल्मों की शूटिंग समाप्ति तक कबड्डी का सीजन आ जाएगा। कबड्डी लीग की एक टीम उनके पास है। जुलाई में आरंभ होने वाले इस लीग के मैचों में पूरा समय देने की उनकी कोशिश रहेगी। इस साल के अंत में अमित शर्मा के साथ उनकी अगली फिल्म आरंभ होगी। लगातार व्यस्त अभिषेक बच्चन के बारे में कहीं खबर आई कि उनके पास फिल्में नहीं हैं, इसलिए वे कबड्डी पर ध्यान दे रहे हैं।
    थोड़े नाराज स्वर में वे स्पष्ट शब्दों में अपनी बात कहते हैं, ‘अभी कुछ महीने पहले ही ‘धूम 3’ रिलीज हुई थी। कैसे कोई कह सकता है कि मेरी फिल्मों को रिलीज हुए काफी समय हो गए। इस साल के अंत तक ‘हैप्पी न्यू ईयर’ और ‘आल इज वेल’ भी रिलीज आ जाएगी। ये फिल्में कम हैं क्या? मुझे लगता है कि मैं कुछ पत्रकारों के निगाहों में खटकता हूं। वे निराधार फब्तियां कसते रहते हैं।’  शाहरुख खान के होम प्रोडक्शन और फराह खान के निर्देशन में बन रही ‘हैप्पी न्यू ईयर’ के बारे में पूछने पर वे कहते हैं, ‘वह फराह खान की शैली की फिल्म है। फुल एंटरटेनमेंट और धमाल। फराह हैं तो मेरी दोस्त, लेकिन वह काम करवाते समय सख्त टास्कमास्टर हो जाती हैं। इस फिल्म के लिए उन्होंने काफी मेहनत करवाई हैं। ‘हैप्पी न्यू ईयर’ की शूटिंग लगभग खत्म हो चुकी है।’
    पिछले दिनों एक खबर आई कि वे सुविधा और समय की बचत के लिए फेरी का इस्तेमाल कर रहे हैं। मुंबई के अंधेरी उपनगर और मड आयलैंड के बीच खाड़ी है। मड आयलैंड से अंधेरी आने-जाने के लिए फेरी का रास्ता नजदीक का है। वर्सोवा जेट्टी से फेरी में बैठें और दस मिनट बाद मड आयलैंड उतर जाएं। अन्यथा लगभग 20 किलोमीटर का चक्कर लगा कर पहुंचे। अभिषेक बचन ने फेरी का रास्ता चुना। उन्होंने आम यात्रियों के साथ यह सफर किया। वे पूछते हैं, ‘इसमें खबर जैसी कौन सी बात है। आने-जाने के लिए सार्वजनिक साधनों का इस्तेमाल करने में कैसी झेंप और हिचक? मुझे तो अच्छा लगा और कोई परेशानी भी नहीं हुई। समय की कितनी बचत होत है।’ वे उमेश शुक्ला की ‘आल इस वेल’ की तारीफ करते हैं, ‘उमेश बड़े संजीदा और समझदार डायरेक्टर हैं। फिल्म के बारे में अभी कुछ बताना उचित नहीं होगा। यों समझिए कि यह सीधी-सादी एंटरटेनिंग फिल्म है। उमेश शुक्ला के साथ मैं आगे भी काम करना चाहूंगा।’
    वे इस खबर की पुष्टि तो नहीं करते कि उनके और पिता अमिताभ बच्चन के साथ किसी नई फिल्म की योजना बन रही है,जिसे उमेश शुक्ला ही डायरेक्ट करेंगे। वे झट से अमित शर्मा का उल्लेख करते हैं, ‘मेरी अगली फिल्म के निर्देशक अमित शर्मा होंगे। वह हमारे होम प्रोडक्शन की फिल्म होगी। उन्होंने मेरे साथ एक मोबाइल कंपनी के सारे ऐड शूट किए हैं। साी को वे ऐड पसंद आते हैं। दर्शकों की पसंद वे समझते हैं। उन्हें फिल्म मीडियम की गहरी समझ है।’ एबीकॉर्प की अन्य योजनाओं के बारे में वे बताते हैं, ‘हम लोग जल्दी ही अपनी अन्य योजनाओं पर काम शुरू करेंगे। फिलहाल आर बाल्की के साथ पापा की एक फिल्म बन रही है। हम हिंदी के साथ अन्य भाषाओं की फिल्मों के निर्माण की योजनाएं भी बना रहे हैं।’
    अभिषेक बच्चन से हुई मुलाकात में ऐश्वर्या राय बच्चन और बेटी आराध्या का जिक्र होना स्वाभाविक है। वे इन सवालों से परहेज भी नहीं करते। जवाब में उनकी खुशी जाहिर होती है, ‘आराध्या बड़ी हो रही है। खूब बोलती है। और हमारी बातों पर रेस्पांड करती है। ऐश्वर्या अभी फिल्मों की स्क्रिप्ट पढ़-सुन रही हैं। कुछ भी फायनल नहीं हुआ। स्क्रिप्ट और डायरेक्टर फायनल होते ही हम विधिवत घोषणा करेंगे।’

Tuesday, June 7, 2011

ऑन स्‍क्रीन ऑफ स्‍क्रीन : कामयाबी के साथ अभिषेक बच्चन की कदमताल नहीं बैठ पाई है

कामयाबी से कुछ कदम दूर है जूनियर बच्चन-अजय ब्रह्मात्‍मज

रोहन सिप्पी की फिल्म दम मारो दम की सीमित कामयाबी ने अभिषेक बच्चन की लोकप्रियता का दम उखडने से बचा लिया। फिल्म ट्रेड में कहा जा रहा था कि यदि फिल्म न चली तो अभिषेक का करियर ग्राफ गिरेगा। हर शुक्रवार को फिल्म रिलीज होने के साथ ही सितारों के लिए जरूरी होता है कि वे लगातार या थोडे-थोडे अंतराल पर अपनी सफलता से साबित करते रहें कि वे दर्शकों की पसंद पर अभी बने हुए हैं। दर्शकों की पसंद मापने का कोई अचूक पैमाना नहीं है। लेकिन माना जाता है कि जब किसी सितारे की मांग घटती है तो उसकी फिल्मों व विज्ञापनों की संख्या भी कम होने लगती है। इस लिहाज से अभिषेक अभी बाजार के पॉपुलर उत्पाद हैं। आए दिन उनके विज्ञापनों के नए संस्करण टीवी पर नजर आते हैं। पत्र-पत्रिकाओं के कवर पर उनकी तस्वीरें छपती हैं। अभी वे प्लेयर्स की शूटिंग के लिए रूस गए हैं। वहां से लौटने के बाद रोहित शेट्टी के निर्देशन में बन रही फिल्म बोल बचन शुरू होगी। इसमें उनके साथ अजय देवगन होंगे। फिर धूम-3 की अभी से चर्चा है, क्योंकि एसीपी जय दीक्षित को इस बार धूम-3 में आमिर खान को पकडना है। मुमकिन है कि अभिषेक के करियर की श्रद्धांजलि लिख रहे पत्रकारों को फिर से स्तुतिगान के लिए शब्द जुटाने पडें। फिल्म इंडस्ट्री की विडंबना है कि यहां सिर्फसफलता का ही गुणगान होता है। योग्यता व कोशिश भी सफलता के आईने में ही समझ में आती है।

कामयाबी से कदमताल

कामयाबी के साथ अभिषेक बच्चन की कदमताल बैठ नहीं पाई है। अभी तक उनकी सफलता सवालों से घिरी है। हर फिल्म की रिलीज के पहले मीडिया के एक समूह और ट्रेड पंडितों के एक हिस्से में जोरदार बहस चलती है कि इसके बाद अभिषेक बच्चन का पैकअप हो जाएगा। आखिर अमिताभ के नाम पर वे कब तक चलेंगे? वास्तव में आलोचकों का यह समूह ही उन्हें सबसे ज्यादा अमिताभ के साथ जोडकर देखता है। लिहाजा अभिषेक बच्चन का पृथक मूल्यांकन नहीं हो पाता। अपने पिता के साथ या समक्ष वे हमेशा छोटे दिखते हैं। उनके ट्विटर हैंडल का सहारा लेकर बोलें तो बच्चन पिता-पुत्र हमेशा सीनियर बच्चन और जूनियर बच्चन बने रहेंगे। इस स्थायी फर्क को अभिषेक स्वयं समझते हैं। उन्होंने एक बार कहा था, मैं स्वयं को सिर्फ अभिनेता मानूं तो मेरे लिए गौरव की बात है कि मुझे देश के सर्वश्रेष्ठ अभिनेताओं में एक अमिताभ बच्चन के साथ एक ही फ्रेम में खडे होने का मौका मिला है। मुझे लगता है कि दर्शक भी उन फ्रेमों में हमें बाप-बेटे के तौर पर नहीं देखते होंगे। हालांकि मैंने पर्दे पर भी उनके बेटों के किरदार निभाए हैं। डैड के साथ के दृश्यों में मेरी घबराहट किसी भी अन्य ऐक्टर से कम नहीं रहती।

पिता का सुरक्षा कवच

अभिषेक की सबसे बडी खुशी यही है कि वे अमिताभ के बेटे हैं, लेकिन दूसरे तरीकेसे सोचें तो यह उनके जीवन की एक ट्रेजेडी भी है। पिता के बरगदी साए से निकल पाना उनके लिए मुमकिन नहीं है। बाहरी दुनिया इस फिक्र में दुबली होती जाती है कि बेचारे अभिषेक को अपने पिता की लोकप्रियता रोज करीब से देखनी होती है। इसका अप्रत्यक्ष प्रभाव उन पर पडता होगा। उनकी हीन-ग्रंथि को बढाता होगा, टीस देता होगा उन्हें, लेकिन अभिषेक से मिल चुके सभी लोग मानेंगे कि वे अपनी पिता की लोकप्रियता का सम्मान करने के साथ एक दूरी भी रखते हैं। पिता उनके लिए आतंक नहीं रहे। अमिताभ के बारे में बातें करते समय उनकी आंखें पिता की उपलब्धियों से मोहित पुत्र की तरह चमकती हैं, लेकिन वे यह भी जानते हैं कि पिता की उपलब्धियां और उनसे मिली लोकप्रियता उन्हें विरासत में नहीं मिलेगी। उन्हें खुद मेहनत करनी होगी और अपना मुकाम पाना होगा।

डिफेंस मेकैनिज्म

खुद को सहज-सामान्य रखने की कोशिश में वे आलसी और लापरवाह दिखते हैं। उनके मजाकिया मिजाज व खिलंदडे अंदाज का मजा लेने वाले भी पीठ पीछे उनकी आलोचना करते हैं। मुझे लगता है कि यह उनका डिफेंस मेकैनिज्म है। उन्होंने पिता के कर्मक्षेत्र को अपनाया। पहले दिन से ही पिता से उनकी तुलना लाजिमी थी। उन्होंने निजी जीवन में अपने व्यक्तित्व को आलसी व एक हद तक नॉन सीरियस रखा। यकीन करें, यदि अभिषेक ने अपनी छवि ऐसी न बनाई होती तो वे साइकोलॉजिकल डिसऑर्डर के शिकार हो गए होते।

20 अप्रैल 2007 को ऐश्वर्या राय से हुई शादी के बाद उन पर दबाव और बढा। अपने आसपास हम रोज देखते हैं कि पत्नी की अधिक व्यस्तता, पहचान और कमाई से किस प्रकार भारतीय पुरुष ग्रंथियों के शिकार हो जाते हैं। शादी के चार साल बाद भी अभिषेक व ऐश्वर्या के बीच ऐसे किसी अप्रिय प्रसंग की खबर नहीं है।

प्रैंक्स्टर की छवि अभिषेक फिल्म सेट पर अपने दोस्तों के बीच प्रैंक्स्टर नाम से मशहूर हैं। अजय देवगन और सुनील शेट्टी की तरह वे भी साथी कलाकारों को फंसाने, छकाने और हास्यास्पद स्थितियों में डालने के लिए कुख्यात हैं। खेलें हम जी जान से के सेट पर दीपिका पादुकोण के साथ किया गया उनका मजाक मैंने खुद देखा है। इन पलों में उनका चेहरा भावहीन व निर्विकार होता है।

शरारतों के पीछे उनका तर्क है, ऐसी घटनाओं के बाद सेट का माहौल मैत्रीपूर्ण हो जाता है। एक-दूसरे पर भरोसा भी बढता है। अभिषेक के साथ काम कर चुकी हीरोइनें उनकी तारीफ करती हैं। प्रियंका चोपडा के अनुसार, अभिषेक प्रोटेक्टिव नेचर के अच्चछे दोस्त हैं। अगर वे सेट पर हैं तो कुछ चीजों के लिए हम निश्चिंत हो जाते हैं।

अपनों का खयाल

फिल्मी और फैमिली इवेंट पर कभी परिवार की महिला सदस्यों के साथ होने पर वे उनका अतिरिक्त खयाल रखते हैं। भीड में मां का हाथ कभी नहीं छोडते। ऐश्वर्या के साथ होने पर वे अवसरों के हिसाब से अपनी प्रासंगिकता और मौजूदगी समझते हैं। उनके स्टारडम को यथोचित स्पेस देते हैं। पब्लिक डोमेन में पिता और पत्नी के साथ संतुलन बिठाना तो कोई उनसे सीखे। परिवार के लोकप्रिय सदस्यों के प्रभामंडल से अलग वे प्रसन्नचित्त नजर आते हैं। अभिषेक के व्यवहार से यह नहीं दिखता कि सार्वजनिक जगहों पर अवांछित हैं। सामाजिक व्यवहार में वे मां-पिता और पत्नी से अलग एवं ज्यादा व्यावहारिक हैं। मीडिया, फैंस और क्राउड के साथ वे अधिक दोस्ताना व्यवहार रखते हैं। मीडिया भले ही उनकी खिल्ली उडाए, वे इसे मीडिया का धर्म समझ कर अपने भीतर रंजिश नहीं पनपने देते। विवाह, पिता की बीमारी और अन्य नाजुक अवसरों पर दुनिया ने उनकी व्यावहारिकता देखी है। मीडिया की जरूरतों और मजबूरियों को वे पिता से अधिक समझते हैं, इसलिए भरपूर सहयोग करते हैं। इस मामले में वे पिता, मां और पत्नी से भिन्न हैं। इस खासियत के कारण मीडिया में वे लोकप्रिय भी हैं। फिल्मों के हिट या फ्लॉप होने से उनकी इस लोकप्रियता में कमी नहीं आती।

इमोशनल झटका

उनकी पहली फिल्म समझौता एक्सप्रेस हो सकती थी। राकेश ओमप्रकाश मेहरा ने इसकी प्लानिंग कर ली थी, लेकिन जेपी दत्ता के बडे नाम ने इस फिल्म को हमेशा के लिए यार्ड में भेज दिया। फिल्मों में उनकी शुरुआत दत्ता की फिल्म रिफ्यूजी से हुई। इस फिल्म में उन्होंने शीर्षक भूमिका निभाई थी। इसकी भव्य लॉन्चिंग याद है। अभिषेक और करीना कपूर की पहली फिल्म रिफ्यूजी बॉक्स ऑफिस पर ज्यादा नहीं चली, लेकिन दोनों ही सितारा संतानों को इंडस्ट्री और दर्शकों ने स्वीकार कर लिया था। वैसे रिफ्यूजी की पहली हीरोइन बिपाशा बसु थीं। करीना ने इसे झटक लिया था। तब करिश्मा व अभिषेक का रोमैंस था। सगाई की खबरें भी आ चुकी थीं, लेकिन फिर सगाई टूटी और रिश्तों ने नई करवट ली। करियर की शुरुआत में मिले इस इमोशनल झटके को अभिषेक ने संयत भाव से लिया।

जटिल चरित्रों में सहज

अभिषेक को हमेशा उनके पिता के बरक्स आंका गया, इसलिए उनकी कोशिशें छोटी समझी गई। पहली बार मणि रत्नम की फिल्म युवा में उनका स्वतंत्र सिनेमाई व्यक्तित्व सामने आया। उन्होंने बिहारी लल्लन सिंह के किरदार को सही तरीके से निभाया। बंटी और बबली में उनकी प्रतिभा दिखी। दर्शकों ने उन्हें दस, ब्लफ मास्टर, दोस्ताना, गुरु और दम मारो दम में भी पसंद किया। सामान्य चरित्रों में वे अपना कौशल नहीं दिखा पाते। मुझे उनकी नाच व अंतर्महल खास फिल्में लगती हैं, लेकिन इन्हें पर्याप्त दर्शक नहीं मिले। आशुतोष गोवारीकर की खेलें हम जी जान से में उनके किरदार पर अधिक मेहनत नहीं की गई थी। मुमकिन है अभिषेक ने भी पर्याप्त ध्यान न दिया हो। ज्यादातर स्टारों की यही मुश्किल है कि वे फिल्मों और किरदारों को ऐतिहासिक संदर्भो में नहीं देखते। उनकी तात्कालिकता से लापरवाही पनपती है। लापरवाही परफॉर्मेस को कमजोर करती है।

भाषा व उच्चचारण दोष

अभिषेक से मेरी पहली मुलाकात शरारत के शूट पर हुई थी। वे वर्ली सीफेस पर शूटिंग कर रहे थे। उनका नया वैनिटी वैन आया था, जो काफी चर्चित था। उस इंटरव्यू में हिंदी में पूछे गए मेरे सारे सवालों के जवाब उन्होंने अंग्रेजी में दिए थे। मैंने इसकी शिकायत अमिताभ से की थी और कहा था कि हरिवंश राय बच्चन के पोते और अमिताभ के बेटे की यह सीमा अखरती है।

अमिताभ ने माना कि अभिषेक की हिंदी अच्चछी नहीं है, लेकिन वे अभ्यास कर रहे हैं। शायद अब उन्होंने हिंदी सुधारी है, इसलिए हिंदी में पूछे गए सवालों के जवाब वे हिंदी में देते हैं। फिर भी उच्चचारण दोष तो उनमें है। यदि वे हिंदी सुधार लें, पिता की संवाद अदायगी का ढंग सीख लें तो अभिनय में निखार ला सकते हैं। निश्चित ही उनका सफर कामयाबी के शीर्ष तक नहीं पहुंचा है, लेकिन पिछले दस सालों से वे टिके हैं। बच्चन का बैनर लहराते हुए पिता की आकांक्षा पूरी कर रहे हैं। बच्चन बैनर उनके हाथों में सुरक्षित लहरा रहा है। कामयाबी की हवा से उसका लहराना तेज और ऊंचा होगा।

Friday, April 22, 2011

फिल्‍म समीक्षा : दम मारो दम

दम मारो दम: पुराना कंटेंट, नया  क्राफ्ट पुराना कंटेंट, नया क्राफ्ट

-अजय ब्रह्मात्‍मज

निर्देशक और अभिनेता की दोस्ती और समझदारी से अच्छी फिल्में बनती हैं। दम मारो दम भी अच्छी है, अगर अभिषेक बच्चन की पिछली फिल्मों की पृष्ठभूमि में देखें तो दम मारो दम अपेक्षाकृत अच्छी फिल्म है। रोहन सिप्पी ने अभिषेक बच्चन का बेहतर इस्तेमाल किया है। अन्य फिल्मों की तरह यहां वे बंधे, सिकुड़े, सिमटे और सकुचाए नहीं दिखते। स्क्रिप्ट की अपनी सीमा में उन्होंने निखरा प्रदर्शन किया है। उन्हें सहयोगी कलाकारों का अच्छा साथ मिला है। इसके बावजूद यह फिल्म कई स्तरों पर निराश करती है। दम मारो दम माडर्न मसाला फिल्म है, जिसमें पुराने फार्मूले की छौंक भर है।

फिल्म में तीन मुख्य किरदार हैं, जो वास्तव में एक ही कहानी के हिस्से हैं। तीन कहानियों को एक कहानी में समेटने की संरचना अलग होती है। इस फिल्म में एक ही कहानी को टुकड़ों में बांट कर फिर से बुना गया है। लेखक और निर्देशक की कोशिश इसी बहाने क्राफ्ट में कमाल दिखाने की हो सकती है, लेकिन अगर यह विष्णु कामथ की सीधी कहानी के तौर पर पेश की जाती तो प्रभावशाली होती। विष्णु कामथ अपनी जिंदगी में सब कुछ खो चुका पुलिस अधिकारी है। सब कुछ से यहां मतलब परिवार है। हताशा की कगार पर पहुंचे विष्णु कामथ को गोवा में मादक पदार्थो के धंधे को रोकने की चुनौती के रूप में एक मकसद मिलता है। इस मकसद के लिए वह अपनी जान की परवाह नहीं करता। लॉरी और जोकी इस धंधे को समझाने के दो किरदार हैं। बाकी एक ड्रग लॉर्ड है, जिसे आठवें-नौवें दशक के खलनायकों की तरह खूंखार दिखाने की कोशिश भर की गई है। चूंकि ड्रग लॉर्ड बिस्किट की भूमिका निभा रहे आदित्य पंचोली कमजोर अभिनेता हैं, इसलिए यह किरदार भी कमजोर हो गया है।

फिल्म नई सोच की है। हीरो, हीरोइन, जीत, हार के पारंपरिक ढांचे में न होने की वजह थोड़ी बिखरी, अधूरी और ढीली लगती है। हमें आदत है हीरो और विलेन को लड़ते देखने की। नए किस्म के किरदारों पर अधिक मेहनत नहीं की गई है, इसलिए वे कनविंसिंग नहीं लगते। जोकी और लॉरी को आधे-अधूरे ढंग से पेश किया गया है। अभिनेताओं की बात करें तो प्रतीक की मौजूदगी भर ही अच्छी लगती है। उन्हें अभी बहुत सीखना है। राणा दगुबटी अच्छे लगे हैं, लेकिन उन्हें ज्यादा विस्तार नहीं मिला है। बिपाशा बसु चलताऊ और उन्होंने उसे उसी तरीके से निभा दिया है। आयटम गीत मिट जाए गम में दीपिका के लटकों-झटकों में दम नहीं है। संवाद चुटीले ओर आज की लैंग्वेज में हैं।

रेटिंग- तीन स्टार

Thursday, April 21, 2011

एक्शन फिल्म है दम मारो दम

-अजय ब्रह्मात्‍मज

रोहन सिप्पी और अभिषेक बच्चन का साथ पुराना है। 'कुछ न कहो', 'ब्लफ मास्टर' के बाद 'दम मारो दम' उनकी तीसरी फिल्म है। 'दम मारो दम' के बारे में बता रहे हैं रोहन सिप्पी

दम मारो दम एक सस्पेंस थ्रिलर है, जिसमें अभिषेक बच्चन पुलिस अधिकारी की भूमिका निभा रहे हैं। उनके साथ प्रतीक बब्बर और राणा दगुबटी भी हैं। फिल्म में बिपाशा बसु की खास भूमिका है, जबकि दीपिका पादुकोण सिर्फ एक गाने में दिल धड़काती दिखेंगी।

'दम मारो दम' को कॉप स्टोरी कह सकते हैं, लेकिन यह एक सस्पेंस थ्रिलर है। हमने एक नई कोशिश की है। फिल्म में तीन कहानिया हैं, जो एक दूसरे से गुंथी हुई हैं। पहली कहानी प्रतीक की है। वह स्टुडेंट है। एक खास मोड़ पर लालच में वह गलत फैसला ले लेता है। उसकी भिड़ंत एसीपी कामत से होती है। फिर अभिषेक की कहानी आती है। वह एक इंवेस्टीगेशन के सिलसिले में बाकी किरदारों से टकराता है। तीसरी कहानी में राणा और बिपाशा की लव स्टोरी है। राणा भी अभिषेक के रास्ते में आता है।

हमारी कहानी पूरी तरह से फिक्शनल है। खूबसूरती की वजह से हमने गोवा की पृष्ठभूमि रखी। गोवा की छवि के प्रति हम सवेदनशील रहे हैं। फिल्मों के लोकेशन के तौर पर जब कोई शहर चुना जाता है, तो उसके अच्छे-बुरे किरदार वहीं के होते हैं। दर्शकों को मालूम रहता है कि वे फिल्म देख रहे हैं, न कि डाक्यूमेंट्री।

फिल्म के टाइटल का ख्याल मशहूर गाने दम मारो दम से आया था। भारत में ड्रग या नशीले पदार्थो को लेकर कोई भी फिल्म बने, तो उसके रेफरेंस में दम मारो दम आएगा ही। वह बहुत ही खूबसूरत, दमदार और सही इंपैक्ट का गाना है। फिल्म में एक पार्टी की सिचुएशन बनी, तो हम ने वहा यह गाना डाला। दीपिका इस आइटम के लिए राजी हो गईं। 'दम मारो दम' नाम से ही फिल्म का सब्जेक्ट समझ में आ जाएगा। टाइटल का आइडिया लेखक श्रीधर राघवन ने दिया था।

एसीपी कामत के रोल में अभिषेक जंचे हैं, वैसे हम ने पहले उन्हें राणा वाला रोल दिया था। उन्होंने खुद ही पुलिस ऑफिसर का रोल चुना। उनकी तुलना उनके पिता से न करें। हमारी फिल्म के जरूरत के अनुसार उन्होंने बेहतरीन परफार्मेस दिया है। मैं इसे अभिषेक की एक्शन फिल्म कहूंगा। हालाकि अगर फिल्म हिट होती है तो उसका श्रेय सभी कलाकारों को मिलेगा।

सयोग है कि मेरी तीसरी फिल्म अभिषेक के साथ आ रही है। हमलोग बचपन से एक-दूसरे को जानते हैं। स्कूल में वह मुझ से जूनियर थे। काम करने के बाद वह हमारे दोस्त बने हैं।

Monday, April 11, 2011

दम मारने की फुर्सत नहीं-अभिषेक बच्चन

-अजय ब्रह्मात्मज

अभिषेक बच्चन की फिल्म गेम रिलीज हो चुकी है और बमुश्किल दो सप्ताह के भीतर दम मारो दम दर्शकों के बीच होगी। किसी भी अभिनेता की फिल्मों के लिए यह मुश्किल स्थिति होती है, क्योंकि माना जाता है कि दो फिल्मों की रिलीज के बीच सुरक्षित अंतर रहना चाहिए। यह भी एक संयोग है कि उनकी पहली फिल्म गेम व‌र्ल्ड कप के फाइनल के एक दिन पहले रिलीज हुई और दूसरी दम मारो दम आईपीएल के मध्य रिलीज हो रही है।

दर्शकों और ट्रेड पंडितों के बीच ऐसे संयोगों को लेकर भले ही चर्चा चल रही है, लेकिन अभिषेक बच्चन इनसे बेफिक्र हैं। वे स्पष्ट करते हैं, ''मैंने गेम के निर्माता रितेश से कहा था कि ऐसे वक्त फिल्म रिलीज न करें, लेकिन उन्होंने अपनी मजबूरी बताई। दूसरी फिल्म दम मारो दम 22 अप्रैल को रिलीज हो रही है। फिल्मों की रिलीज पर हमारा वश नहीं होता। फिल्म की डबिंग के बाद हमारा डिसीजन कोई मानी नहीं रखता।''

गेम के प्रति दर्शकों की प्रतिक्रिया को स्वीकार करते हुए अभिषेक बच्चन कहते हैं, ''सभी फिल्मों में हमारी मेहनत एक जैसी होती है। कुछ फिल्में दर्शकों को पसंद नहीं आतीं।'' वे बात बदल कर रोहन सिप्पी की फिल्म दम मारो दम की चर्चा शुरू कर देते हैं, ''रोहन ने नए अंदाज में फिल्म बनाई है। दम मारो दम एक्शन थ्रिलर है। मैं इसमें एसीपी विष्णु कामत की भूमिका निभा रहा हूं। गोवा के चीफ मिनिस्टर एसीपी कामत को बुलाकर एक बड़ी जिम्मेदारी सौंपते हैं। उनका निर्देश है कि दो हफ्तों के अंदर गोवा की गंद साफ हो जानी चाहिए। इसके लिए उन्होंने हर तरह की छूट दी है, लेकिन इसके साथ ही शर्त रखी है कि अगर ऐसा नहीं हुआ तो वे ही मेरे सस्पेंशन लेटर पर साइन करेंगे। अब एसीपी कामत को दो हफ्तों के अंदर इस मिशन को अंजाम देना है।''

अपनी अगली व्यस्तताओं के बारे में अभिषेक खुलासा करते हैं, ''अभी अब्बास मस्तान की फिल्म प्लेयर्स की शूटिंग चल रही है। उसके तुरंत बाद मैं रोहित शेट्टी की फिल्म बोल बचन शुरू करूंगा। इसमें अजय देवगन के साथ काम करने का मौका मिल रहा है। मैं आपके माध्यम से बताना चाहता हूं कि फिल्म का नाम 'बोल बच्चन' नहीं, 'बोल बचन' है। लोगों ने मेरे सरनेम को पता नहीं कैसे फिल्म में डाल दिया। वास्तव में बोल बचन मुंबई में प्रचलित एक मुहावरा है।''

अभिषेक के पास इतनी फिल्में हैं कि वे 2011 में पूरी तरह से व्यस्त रहेंगे। आम तौर पर माना जाता है कि अगर किसी स्टार की दो-तीन फिल्में फ्लाप हो तो नयी फिल्में मिलने में दिक्कत होने लगती है। इस लिहाज से अभिषेक अपवाद या खुशकिस्मत माने जा सकते हैं। इसका राज पूछने पर शरारती मुस्कान के साथ अभिषेक बताते हैं, ''मुझ पर फिल्म इंडस्ट्री का विश्वास बना हुआ है। वे मेरे टैलेंट के बारे में जानते हैं। बीच में फिल्में नहीं चलती हैं तो आप पत्रकार अपनी तरह से उसकी व्याख्या करते हुए मेरे फिल्मी कॅरियर का अंत बता देते हैं। सच तो यह है कि मुझे लगातार फिल्में मिल रही हैं। अलग-अलग जोनर की फिल्में करने का मौका मिल रहा है। मेरे पास दोस्ताना-2 और धूम-3 के अलावा राजकुमार संतोषी की लेडिज एंड जेंटलमैन भी है।''

दोस्ताना-2 की शूटिंग में हो रही देरी के लिए वे तरुण मनसुखानी को जिम्मेदार ठहराते हैं, ''मालूम नहीं तरुण कौन सी स्क्रिप्ट लिख रहे हैं। उनसे जब भी पूछो कि कब शुरू कर रहे हो तो एक ही जवाब मिलता है कि स्क्रिप्ट पूरी कर रहा हूं। हमें उनकी परफेक्ट स्क्रिप्ट का इंतजार है। यह अच्छी बात है कि शूटिंग के पहले स्क्रिप्ट से संतुष्ट हो लें। उनके सामने पहली दोस्ताना की चुनौती है।''

अभिषेक बताते हैं कि वे बड़े ही अधीर किस्म के अभिनेता हैं। आजकल के बड़े स्टारों की तरह वे साल में एक फिल्म कर के संतुष्ट नहीं रहना चाहते। उनके ही शब्दों मे, ''मैं अभी कॅरियर में उस मुकाम पर नहीं आया हूं कि साल में एक-दो फिल्म करके संतुष्ट हो लूं। मेरे पास पहले से फिल्में हैं। इसके बावजूद कोई अच्छी स्क्रिप्ट आती है तो मैं न नहीं कह पाता। अभी मेरी उम्र भी ऐसी है कि मैं लगातार काम करता रहूं। हो सकता है भविष्य में मैं भी आमिर खान की तरह साल-दो साल में एक फिल्म करूं।''

दूसरे अभिनेताओं की तरह अभिषेक बच्चन की अभी तक कोई खास छवि नहीं बनी है। वे स्वयं किसी एक इमेज में बंध कर नहीं रहना चाहते। यही वजह है कि वे हर तरह की फिल्में कर रहे हैं। अपनी फिल्मों के उदाहरण से वे बताते हैं, ''आपने मेरी पीरियड फिल्में देखी। इस महीने दो थ्रिलर फिल्में आयी हैं। उसके बाद कामेडी कर रहा हूं। मुझे लगता है कि आज के दर्शक अपने प्रिय स्टारों को किसी एक इमेज में देखना भी नहीं चाहते हैं। वे हम सभी से वैरायटी चाहते हैं। वे हमारी प्रतिभा के अनदेखे पहलुओं से परिचित होना चाहते हैं।''

दर्शकों की बदलती रुचि की बातें करते हुए अभिषेक मानते हैं कि भारतीय दर्शक आज भी इमोशनल ड्रामा देखना पसंद करते हैं। पिछले दिनों कामयाब हुई फिल्मों के नाम लेकर वे अपनी बात पर जोर देते हैं। अपने पिता अमिताभ बच्चन की तरह ही उनका तर्क होता है, ''भारतीय दर्शकों को मनोरंजन की पूरी थाली मिलनी चाहिए, जिसमें हर तरह के व्यंजन हो। स्वाद बदलने के लिए वे बीच विदेशी व्यंजन भी टेस्ट कर लेते हैं, लेकिन उन्हें पूरी संतुष्टि थाली में ही मिलती है!''

Saturday, December 5, 2009

फिल्‍म समीक्षा : पा

-अजय ब्रह्मात्‍मज

आर बाल्की ने निश्चित ही निजी मुलाकातों में अमिताभ बच्चन के अंदर मौजूद बच्चे को महसूस करने के बाद ही पा की कल्पना की होगी। यह एक बुजुर्ग अभिनेता के अंदर जिंदा बच्चे की बानगी है। अमिताभ बच्चन की सुपरिचित छवि को उन्होंने मेकअप से हटा दिया है। फिल्म देखते समय हम वृद्ध शरीर के बच्चे को देखते हैं, जो हर तरह से तेरह साल की उम्र का है। पा हिंदी फिल्मों में इन दिनों चल रहे प्रयोग में सफल कोशिश है। एकदम नयी कहानी है और उसे सभी कलाकारों ने पूरी संजीदगी से पर्दे पर उतारा है।

फिल्म थोड़ी देर के लिए ऑरो की मां की जिंदगी में लौटती है और उतने ही समय के लिए पिता की जिंदगी में भी झांकती है। फिल्म की स्क्रिप्ट केलिए आवश्यक इन प्रसंगों के अलावा कहानी पूरी तरह से ऑरो पर केंद्रित रहती है। ऑरो प्रोजेरिया बीमारी से ग्रस्त बालक है, लेकिन फिल्म में उसके प्रति करुणा या दुख का भाव नहीं रखा गया है। ऑरो अपनी उम्र के किसी सामान्य बच्चे की तरह है। मां, नानी, दोस्त और स्कूल केइर्द-गिर्द सिमटी उसकी जिंदगी में खुशी, खेल और मासूमियत है। स्कूल में आयोजित एक प्रतियोगिता का पुरस्कार लेने के बाद उसका परिचय राजनेता अमोल आरते से होता है। अमोल के साथ संबंध बढ़ने पर उसे पता चलता है कि वे ही उसके पिता हैं। अपने जन्म के पहले ही अलग हो चुके माता-पिता को फिर से साथ लाने की युक्ति में ऑरो सफल रहता है, लेकिन ़ ़ ़

सबसे पहले आर बाल्की को बधाई कि उन्होंने फिल्म को भावनात्मक विलाप नहीं होने दिया है। उन्होंने ऑरो को हंसमुख, जिंदादिल और खिलंदड़ा रूप दिया है। हालांकि प्रोजेरिया की वजह से ही ऑरो में हमारी दिलचस्पी बढ़ती है, लेकिन लेखक और निर्देशक आर बाल्की ने बड़ी सावधानी से इसे कारुणिक नहीं होने दिया है। कुछ दृश्यों में ऑरो की मां से सहानुभूति होती है, लेकिन फिर से बाल्की उस सहानुभूति को बढ़ने नहीं देते। वे मां की दृढ़ता और ममत्व को फोकस में ले आते हैं। कामकाजी महिला और उसके विशेष बच्चे के संबंध को बाल्की ने व्यावहारिक और माडर्न तरीके से चित्रित किया है। यह पा की बड़ी खासियत है।

पा की विशेषता ऑरो का मेकअप है। क्रिस्टियान टिंसले और डोमिनी टिल ने प्रोस्थेटिक मेकअप से अमिताभ बच्चन का हुलिया बदल दिया है। अमिताभ बच्चन की आवाज बदल कर रही-सही पहचान भी खत्म कर दी गयी है। इंट्रोडक्शन सीन के बाद ही हमारे सामने ऑरो रह जाता है और अमिताभ बच्चन खो जाते हैं। यह फिल्म अमिताभ बच्चन के अविस्मरणीय अभिनय के लिए याद रखी जाएगी। उनके लिए 67 साल की उम्र में 13 साल की मासूमियत को विश्वसनीय तरीके से जी पाना आसान नहीं रहा होगा। ऑरो की मां की भूमिका में विद्या बालन ने भावपूर्ण और प्रभावशाली अभिनय किया है। पारंपरिक छवि बरकरार रखते हुए उन्होंने मन और मिजाज की आधुनिक औरत के किरदार को जीवंत कर दिया है। जटिल मनोभावों को भी विद्या सहज तरीके से अभिव्यक्त करती हैं। अभिषेक बच्चन अपनी भूमिका में संयत हैं।

फिल्म का संगीत उल्लेखनीय है। स्वानंद किरकिरे के शब्द और ईल्याराजा के संगीत ने फिल्म के मर्म को उसकी गहराइयों में उतरकर संजोया है। फिल्म के दो कमजोर अंश हैं। मीडिया को एक्सपोज करने का प्रसंग बचकाना है और फिल्म के अंत की भावनात्मक लीपा-पोती अखरती है। पा जैसी बेहतरीन फिल्म को इन दोनों प्रसंगों का ग्रहण लगता है।

**** चार स्टार


Friday, November 13, 2009

भारत का पर्याय बन चुकी हैं ऐश्वर्या राय

-हरि सिंह
ऐश्वर्या राय के बारे में कुछ भी नया लिख पाना मुश्किल है। जितने लिंक्स,उतनी जानकारियां। लिहाजा हमने कुछ नया और खास करने के लिए उनके बिजनेस मैनेजर हरि सिंह से बात की। वे उनके साथ मिस व‌र्ल्ड चुने जाने के पहले से हैं। हरि सिंह बता रहे हैं ऐश के बारे में॥
मुझे ठीक-ठीक याद नहीं कि मैंने कब उनके साथ काम करना आरंभ किया। फिर भी उनके मिस व‌र्ल्ड चुने जाने के पहले की बात है। उन्होंने मॉडलिंग शुरू कर दी थी। मिस इंडिया का फॉर्म भर चुकी थीं। आरंभिक मुलाकातों में ही मुझे लगा था कि ऐश्वर्या राय में कुछ खास है। मुझे उनकी दैवीय प्रतिभा का तभी एहसास हो गया था। आज पूरी दुनिया जिसे देख और सराह रही है, उसके लक्षण मुझे तभी दिखे थे। मॉडलिंग और फिल्मी दुनिया में शामिल होने के लिए बेताब हर लड़की में सघन आत्मविश्वास होता है, लेकिन हमलोग समझ जाते हैं कि उस आत्मविश्वास में कितना बल है। सबसे जरूरी है परिवार का सहयोग और संबल। अगर आरंभ से अभिभावक का उचित मार्गदर्शन मिले और उनका अपनी बेटी पर भरोसा हो, तो कामयाबी की डगर आसान हो जाती है।
ऐश के साथ यही हुआ। उन्हें अपने परिवार का पूरा समर्थन मिला। मां-बाप ने उन्हें अपेक्षित संस्कार और मूल्यों के साथ पाला। अपने लंबे परिचय के आधार पर मैं यह दावे के साथ कह सकता हूं कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में इतनी संस्कार वाली दूसरी कोई अभिनेत्री नहीं है। ऐश बड़ों का मान-सम्मान करना जानती हैं। फिल्म इंडस्ट्री के किसी भी सीनियर व्यक्ति से आप बात कर लें। उन्होंने उनके साथ काम किया हो या नहीं किया हो, लेकिन अगर एक बार मिल चुके हैं, तो वे ऐश के गुण गाते मिलेंगे। वे गुणवंती हैं। आदर्श बेटी, बहन, बीवी और बहू हैं। अपने सभी रिश्तों को उन्होंने सहेज कर रखा है। उन रिश्तों को वे आदर, स्नेह और प्यार से सींचती रहती हैं। वे खुद काफी व्यस्त रहती हैं, लेकिन एक पल को भी संबंधों के बीच में व्यस्तता को आड़े नहीं आने देतीं। निश्चित ही उनके करीबी भी उनकी भावनाओं को समझते हैं और उन्हें भी पूरी जगह देते हैं। हर संबंध परस्पर व्यवहार और सम्मान से ही खिलता है।
मैं अपने अनुभवों से ही उदाहरण दूं, तो ऐश्वर्या के लिए कतई जरूरी नहीं है कि वे कभी मेरे पांव छूएं। अपने हर जन्मदिन पर वे ऐसा कर आशीर्वाद लेती हैं। इस एक सामान्य सम्मान से वे कितनी दुआएं ले लेती हैं। दिल से उनके लिए दुआ निकलती है। मुझे याद है कि शादी की रस्म निभाने के बाद जब बड़ों से आशीर्वाद लेने की बारी आई, तो उन्होंने तमाम प्रतिष्ठित लोगों के बीच भी ऐसा ही किया। अभिषेक बच्चन ने भी उनका अनुकरण किया। आज सोचता हूं, तो लगता है कि उनकी यह सहज क्रिया के पीछे कितना सम्मान और संस्कार रहा होगा। अमूमन बड़े और मशहूर होने के बाद लोग अदब भूल जाते हैं। अपने पारिवारिक और पारंपरिक मूल्यों को निभाने में भी झेंप महसूस करते हैं।
दैवीय सौंदर्य की धनी ऐश्वर्या राय की कद्र पूरी दुनिया करती है। मुझे विदेशों के लोग मिलते हैं, तो वे बताते हैं कि कैसे पूरी दुनिया के लोग उन्हें पहचानते हैं। भारत का नाम लेते ही उनके जहन में ऐश का नाम आता है। वह भारत का पर्याय बन चुकी हैं। यह बड़ी उपलब्धि है और उतनी ही बड़ी जिम्मेदारी भी है। ऐश्वर्या में नैसर्गिक प्रतिभा है। उन्होंने अपनी मेहनत और लगन से उसे निखारा है। शुरू से ही वे मेहनत करने से नहीं हिचकतीं। आज नाम और पहचान होने के बाद भी वे मेहनत में ढील नहीं करतीं। आमतौर पर अपने यहां शादी के बाद हीरोइनों को नई फिल्मों के ऑफर नहीं मिलते, लेकिन उनके पास अभी चार फिल्में हैं। वे दक्षिण भारत के शंकर और मणिरत्नम के साथ काम कर रही हैं, तो हिंदी की विपुल शाह और संजय लीला भंसाली की फिल्में भी कर रही हैं। उनके साथ हर डायरेक्टर काम करना चाहता है। अगर पिछले दशक की दस बड़ी फिल्मों की सूची बनाएं, तो उसमें आधी में ऐश मिलेंगी। इस उपलब्धि का उन्हें रत्ती भर अभिमान नहीं है। जीवन में नाम और पैसा तो बहुत से लोग कमाते हैं, लेकिन लोगों का प्यार कमाना आसान नहीं होता। उससे भी मुश्किल है अपने से बड़ों का आशीर्वाद पाना। मैं तो उन्हें लगातार देख रहा हूं। उनके व्यक्तित्व में जरा भी बदलाव नहीं आया है। मैं तो कहूंगा कि वे और भी विनम्र और समझदार हो गई हैं। आने वाले समय में शायद ही कोई लड़की उनसे आगे निकल पाए। वे मिसाल हैं कि ग्लैमर की दुनिया में भी अपने संस्कारों के साथ कैसे सिर ऊंचा रखा जा सकता है। वे संस्कारी हैं और अच्छी बात यह हुई कि वे संस्कारवान परिवार में गई। उनका बच्चन परिवार की बहू बनना सोने पर सुहागा की तरह है।

Tuesday, July 14, 2009

रेड कार्पेट पर मटकते चहकते सितारे


-अजय ब्रह्मात्मज
आए दिन पत्र-पत्रिका और टीवी चैनलों पर स्टारों के रेड कार्पेट पर चलने की खबर और तस्वीरें आती रहती हैं। कान फिल्म समारोह में पहले सोनम कपूर के रेड कार्पेट पर चलने की खबर आई। फिर इंटरनेशनल सौंदर्य प्रसाधन कंपनी ने स्पष्टीकरण दिया कि रेड कार्पेट पर ऐश्वर्या राय ही चलेंगी। अंदरूनी कानाफूसी यह हुई कि ऐश्वर्या ने सोनम का पत्ता कटवा दिया। समझ सकते हैं कि रेड कार्पेट का क्या महत्व है? ऑस्कर के रेड कार्पेट पर स्लमडॉग मिलेनियर के लिए भारतीय एक्टर अनिल कपूर और इरफान खान चले। साथ में फिल्म के बाल कलाकार भी थे। भारत में ऑस्कर रेड कार्पेट की तस्वीरें प्रमुखता से छपीं। उन्हें पुरस्कार समारोह के समान ही महत्व दिया गया। कान फिल्म समारोह में काइट्स की जोड़ी रितिक रोशन और बारबरा मोरी ने रेड कार्पेट पर तस्वीरें खिंचवाई।
देखें तो रेड कार्पेट पिछले कुछ सालों में प्रकाश में आया है। पहले विदेश से आए प्रमुख राजनयिक मेहमानों के लिए रेड कार्पेट वेलकम का चलन था। बाद में विदेश के पुरस्कार समारोह और कार्यक्रमों की तर्ज पर भारत मेंभी रेड कार्पेट का चलन बढ़ा। मुख्य कार्यक्रम से पहले स्टार और सेलिब्रिटी की रेड कार्पेट तस्वीरें बड़ा आकर्षण बनती हैं। पुरस्कार समारोह हो या कोई और कार्यक्रम.., वहां कुछ चुनिंदा स्टारों को ही मंच पर आने का अवसर मिलता है। रेड कार्पेट पर कार्यक्रम में भाग लेने आए छोटे-बड़े हर कलाकार कुछ मिनट के लिए महत्वपूर्ण हो जाते हैं। रेड कार्पेट स्टारों के लिए दिखावे की खास जगह है। इसके लिए वे विशेष पहनावे तैयार करते हैं। हीरोइनों की बात करें, तो उनकी पूरी सज-धज रेड कार्पेट पर दिखती है। अपने परिधान, ज्वेलरी और सैंडल तक पर वे पूरा ध्यान देती हैं। विदेश की तरह अपने देश में भी अब रेड कार्पेट वॉक स्टाइल स्टेटमेंट बन चुका है। हाल ही में मकाऊ में आयोजित आईफा अवार्ड समारोह में सभी हीरोइन और हीरोज ने ग्रीन कार्पेट पर जलवे बिखेरे। उसके पहले फिल्मफेअर अवार्ड, कान फिल्म समारोह, ऑस्कर और कुछ अन्य समारोहों में रेड कार्पेट पर मटकते और चहकते सितारों को हम देख चुके हैं। रेड कार्पेट की लाली परावर्तित होकर उनके चेहरों को लाल कर देती है या रेड कार्पेट पर चलने के गर्व से उनके चेहरे लाल हो उठते हैं? कहना मुश्किल है, लेकिन इसमें शक नहीं कि रेड कार्पेट पर स्टारों की चमक, दमक और ठसक देखते ही बनती है।
दर्शक और प्रशंसक अपने पसंदीदा स्टारों को आकर्षक परिधानों में रेड कार्पेट पर चलते देखकर विस्मित और आह्लादित होते हैं। उनके मन में निश्चित ही उनकी ड्रेसेज को लेकर सवाल उठते होंगे। जैसे हमारी हीरोइन या हीरो को कितने महंगे और भड़काऊ ड्रेसेज खरीदने होते होंगे? ऊपर से उन्हें यह भी ध्यान रखना पड़ता है कि एक रेड कार्पेट पर पहने गए कपड़े दूसरे रेड कार्पेट पर न दिखे। सचमुच उनके कपड़े महंगे, आकर्षक और विशेष तौर पर समारोह के रेड कार्पेट के लिए बनाए जाते हैं, लेकिन बड़े स्टारों को उन पर रत्ती भर भी खर्च नहीं करना पड़ता। डिजाइनर उनके लिए विशेष ड्रेसेज तैयार कराते हैं। बड़ी कंपनियां उनकी ड्रेसेज स्पॉन्सर करती हैं, तो ज्वेलरी कंपनियां उनके गहनों का खयाल रखती हैं। लोगों ने गौर किया होगा कि तस्वीरों के साथ यह हवाला दिया जाता है कि फलां कंपनी या फलां ड्रेस डिजाइनर के कपड़ों में सजी-धजी फलां अभिनेत्री रेड कार्पेट पर चली। इससे उन कंपनियों को प्रचार मिलता है। वास्तव में रेड कार्पेट जीवनशैली बेचने का नया माध्यम भी बन गया है। अक्सर देखने को मिलता है कि रेड कार्पेट में दिखे कपड़ों की खोज में अमीर परिवारों के बच्चे बड़ी दुकानों में आते हैं। वे इवेंट और कार्यक्रम का हवाला देकर या तस्वीरें दिखाकर वैसे कपड़ों की मांग करते हैं।
बिपाशा बसु रेड कार्पेट वॉक के पीछे के बिजनेस से अनभिज्ञता जाहिर करती हैं। उन्होंने अपने अनुभव बांटे, किसी समारोह में मेरी हिस्सेदारी और महत्व निर्भर करता है कि मैं उसमें कैसे कपड़े पहनूं। आईफा का वैसा ड्रेस मैंने इसलिए चुना था कि मुझे जल्दी-जल्दी तीन-चार बार मंच पर आना-जाना था। अगर साड़ी पहन लेती, तो थोड़ी मुश्किल होती। साड़ी पहनना मुझे अच्छा लगता है, लेकिन वह तभी संभव है, जब आप सीधे जाकर अपनी सीट पर बैठ जाएं। बिपाशा ने दूसरी हीरोइनों की तरफ से यह जोड़ा, हम सभी अपने प्रशंसकों के लिए सुंदर और आकर्षक दिखना चाहते हैं। हमें मालूम रहता है कि वे अपने घरों में बैठे हमें देख रहे होंगे। रेड कार्पेट और रैंप शो के एक फोटोग्राफर ने कहा, स्टार कुछ भी कहें। वे पहनावे में दिखावे पर ज्यादा जोर देते हैं। उनकी कोशिश होती है कि तस्वीर और फुटेज में उनके अंग दिखें। जब हम तस्वीरों के लिए उनसे रुकने का आग्रह करते हैं, तो वे स्किन शो करती हैं। हीरोइनें ऐसी तस्वीरों और फुटेज की वजह से चर्चा में रहती हैं। उक्त फोटोग्राफर ने इस बार आईफा समारोह के रोचक ट्रेंड का भेद बताया, सभी हीरोइनें पीछे से पोज दे रही थीं। उनकी पीठ खुली थी और एंगल ऐसा बनता था कि उनके अंग का उभार स्पष्ट दिखे। जाहिर है कि यह शो बिजनेस है। यहां कुछ दिखता है, तभी बिकता है।

Thursday, February 26, 2009

एक तस्वीर:दिल्ली ६,अभिषेक बच्चन और...

इस तस्वीर के बारे में आप की टिप्पणी,राय,विचार,प्रतिक्रिया का स्वागत है.यह तस्वीर पीवीआर,जुहू,मुंबई में २२ फरवरी को एक खास अवसर पर ली गई है.बीच में घड़ी के साथ मैं हूँ आप सभी का अजय ब्रह्मात्मज.



Saturday, February 21, 2009

फ़िल्म समीक्षा:दिल्ली ६


हम सब के अन्दर है काला बन्दर

-अजय ब्रह्मात्मज
ममदू, जलेबी, बाबा बंदरमार, गोबर, हाजी सुलेमान, इंस्पेक्टर रणविजय, पागल फकीर, कुमार, राजेश, रज्जो और कुमार आदि 'दिल्ली ६' के जीवंत और सक्रिय किरदार हैं। उनकी भागीदारी से रोशन मेहरा (अभिषेक बच्चन) और बिट्टू (सोनम कपूर) की अनोखी प्रेम कहानी परवान चढ़ती है। इस प्रेमकहानी के सामाजिक और सामयिक संदर्भ हैं। रोशन और बिट्टू हिंदी फिल्मों के आम प्रेमी नही हैं। उनके प्रेम में नकली आकुलता नहीं है। परिस्थितियां दोनों को करीब लाती हैं, जहां दोनों के बीच प्यार पनपता है। राकेश ओमप्रकाश मेहरा ने बिल्कुल नयी शैली और मुहावरे में यह प्रेमकहानी रची है।
न्यूयार्क में दादी (वहीदा रहमान) की बीमारी के बाद डाक्टर उनके बेटे राजन मेहरा और बहू फातिमा को सलाह देता है कि वे दादी को खुश रखने की कोशिश करें, क्योंकि अब उनके दिन गिनती के बचे हैं। दादी इच्छा जाहिर करती हैं कि वह दिल्ली लौट जाएंगी। वह दिल्ली में ही मरना चाहती हैं। बेटा उनके इस फैसले पर नाराजगी जाहिर करता है तो पोता रोशन उन्हें दिल्ली पहुंचाने की जिम्मेदारी लेता है। भारत और दिल्ली-6 यानी चांदनी चौक पहुंचाने पर रोशन की आंखें फटी रह जाती हैं। दादी के प्रति पड़ोसियों और गली के लोगों के प्रेम, आदर और सेवा भाव को देखकर वह दंग रह जाता है। यहीं उसकी मुलाकात यों कहें कि झड़प बिट्टू (सोनम कपूर) से होती है। बिट्टू मध्यवर्गीय परिवार की बेटी है। वह पिता और परिवार को उचित सम्मान देती है, लेकिन उसके अपने भी सपने हैं। वह कुछ करना चाहती है। अपनी पहचान बनाना चाहती है। एक सामान्य सी कहानी चल रही होती है, जिसमें हम रिश्तों की गर्माहट और चांदनी चौक की गर्मजोशी महसूस करते हैं। शहर में खबर फैली हुई है कि एक काला बंदर रात को उत्पात मचाता है। उस काले बंदर को किसी ने नहीं देखा है, लेकिन रात के अंधेरे में कुछ घटनाएं घटती रहती हैं। न्यूज चैनल ब्रेकिंग न्यूज में काले बंदर से संबंधित कयास लगाते रहते हैं। स्थितियां बदलती हैं और एक खास प्रसंग के बाद कहानी नाटकीय मोड़ लेती हैं। कुछ दिनों पहले तक जिस चांदनी चौक में हिंदू-मुसलमान में फर्क करना मुश्किल था। वहां दंगे शुरू हो जाते हैं और दोनों समुदायों की आक्रामकता से हिंसा भडक़ती है। सामाजिक और धार्मिक तनाव के इस मौहाल के बीच बिट्टू अपने सपनों के लिए दुस्साहसिक कदम उठाती है। रोशन उसे बचाने की कोशिश में दोनों समुदायों का कॉमन शिकार बन जाता है। बाद में भेद खुलता है तो पता चला हे कि काले बंदर का अस्तित्व बाहर नहीं है। वह तो हम सभी के अंदर कोने में बैठा रहता है, जिसे स्वार्थी तत्व अपने फायदे के लिए जगा और उकसा देते हैं।
राकेश ओमप्रकाश मेहरा अपनी पिछली फिल्म 'रंग दे बसंती' से कई कदम आगे आते हैं। वे सांप्रदायिकता के सामाजिक एवं राजनीतिक मुद्दे को नए नजरिए से पेश करते हैं। 'दिल्ली ६' सामयिक और महत्वपूर्ण फिल्म है। मजेदार तथ्य यह है कि यह मनोरंजन और मधुर संगीत की धुनों से सजा है। राकेश ओमप्रकाश मेहरा ने फिल्म की कहानी को प्रसंगों और घटनाओं से जोड़ते हुए चांदनी चौक का सुंदर कोलाज तैयार किया है, जिसमें तमाम किरदार अपनी धडक़नों के साथ मौजूद हैं। 'दिल्ली ६' चांदनी चौक का सजीव चित्रण है। राकेश ओमप्रकाश मेहरा ने फिल्म की जरूरत के मुताबिक फिल्मांकन की पारंपरिक शैली से अलग जाकर सफल प्रयोग किए हैं। उन्हें कैमरामैन विनोद प्रधान का सम्यक सहयोग मिला है। ए आर रहमान का संगीत फिल्म के भाव का प्रभाव बढ़ाता है। उन्होंने गीतों को धुनों से तराशा है।
कलाकारों में सोनम कपूर और अभिषेक बच्चन सहज एवं स्वाभाविक हैं। निर्देशक ने उन्हें नाटकीय नहीं होने दिया है। निर्देशक का अंकुश फिल्म के नायक-नायिका को बहकने नहीं देता है। फिल्म की खूबसूरती और ताकत सहयोगी चरित्रों से बढ़ी है। इन छोटे किरदारों को समर्थ कलाकारों ने निभाया है। सभी ने अपनी भूमिकाओं के साथ न्याय किया है और जरूरत से एक रत्ती ज्यादा या कम योगदान नहीं किया है। फिल्म के अंत में कसावट थोड़ी कम हुई है। कुछ दृश्य फिल्म के यथार्थ से मेल नहीं खाते। 'दिल्ली ६' हिंदी सिनेमा के बदलती छवि पेश करती है। युवा निर्देशक परंपरा को आत्मसात कर हिंदी फिल्मों की विशेषताओं को अपना कर सार्थक प्रयोग कर रहे हैं। 'दिल्ली ६' इसी दिशा में नयी पहल है।
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Wednesday, February 18, 2009

विश्वास और भावनाओं से मैं भारतीय हूं: अभिषेक बच्चन

-अजय ब्रह्मात्मज
अभिषेक बच्चन की फिल्म 'दिल्ली 6' शुक्रवार को रिलीज हो रही है। यह फिल्म दिल्ली 6 के नाम से मशहूर चांदनी चौक इलाके के जरिए उन मूल्यों और आदर्शो और सपनों की बात करती है, जो कहीं न कहीं भारतीयता की पहचान है। अभिषेक बच्चन से इसी भारतीयता के संदर्भ में हुई बात के कुछ अंश-

आप भारतीयता को कैसे डिफाइन करेंगे?
हमारा देश इतना विशाल और विविध है कि सिर्फ शारीरिक संरचना के आधार पर किसी भारतीय की पहचान नहीं की जा सकती। विश्वास और भावनाओं से हम भारतीय होते हैं। भारतीय अत्यंत भावुक होते हैं। उन्हें अपने राष्ट्र पर गर्व होता है। मुझमें भी ये बातें हैं।

क्या 'दिल्ली 6' के रोशन मेहरा और अभिषेक बच्चन में कोई समानता है?
रोशन मेहरा न्यूयार्क में पला-बढ़ा है। वह कभी भारत नहीं आया। इस फिल्म में वह पहली बार भारत आता है, तो किसी पर्यटक की नजर से ही भारत को देखता है। यहां बहुत सी चीजें वह समझ नहीं पाता, जो शायद आप्रवासी भारतीय या विदेशियों के साथ होता होगा। मैं अपने जीवन के आरंभिक सालों में विदेशों में रहा, इसलिए राकेश मेहरा ने मेरे परसेप्शन को भी फिल्म में डाला। इससे भारत को अलग अंदाज से देखने में मदद मिली।

पढ़ाई के बाद भारत लौटने पर आप की क्या धारणाएं बनी थीं?
मेरे लिए सब कुछ आसान रहा। मैंने कभी भी खुद को देश से अलग नहीं महसूस किया। मेरा दृष्टिकोण अलग था। अलग संस्कृति और माहौल में पलने से वह दृष्टिकोण बना था। पश्चिमी और भारतीय संस्कृति को एक साथ मैं समझ सकता था। मुझे भारत आने पर कभी झटका या बिस्मय नहीं हुआ। सड़क पर गाय बैठे देखना किसी विदेशी के लिए अजीब बात हो सकती है, लेकिन मेरे लिए यह सामान्य बात थी। मेरे मुंह से कभी नहीं निकला कि स्विट्जरलैंड में तो ऐसा नहीं होता।

आपकी पीढ़ी के युवक विदेश भागना चाहते हैं या विदेश में रहना चाहते हैं। आप क्या सोचते हैं?
बाहर रहते हुए तो हमें छुट्टियों का इंतजार रहता था कि घर कब जाएंगे? घर का खाना कब मिलेगा। अपने कमरे के पलंग पर कब सोएंगे। बोर्डिग स्कूल के बच्चे स्कूल पहुंचते ही लौटने के बारे में सोचने लगते हैं। मैं कोई अपवाद नहीं था। आज भी आउटडोर शूटिंग में कुछ दिन गुजरने पर मैं घर लौटना चाहता हूं। छुट्टी मिलने पर परिजनों के साथ घर पर समय बिताता हूं। बचपन से यही ख्वाहिश रही है। मुझे भारत में रहना अच्छा लगता है।
विदेश प्रवास में भारत की किन चीजों की कमी महसूस करते हैं?
घर का सपना, घर के लोग, दोस्त और यहां का माहौल, दुनिया के किसी और देश में ऐसी मेहमाननवाजी नहीं होती। किसी देश के लोगों में ऐसी गर्मजोशी नहीं मिलेगी। पश्चिम के लोग ठंडे और एक-दूसरे से कटे रहते हैं।

एक विकासशील देश में अभिनेता होना कैसी चुनौती या आनंद पेश करता है?
हम जो भी हैं, वह दर्शकों की वजह से हैं। इस दृष्टि से देखें, तो हम जमीन पर रहे। मुझे नहीं लगता कि सड़क पर चल रहे आदमी से मैं किसी मायने में अलग हूं। मैं सुविधा संपन्न या अलग नहीं हूं। मैं खुद को उनके जैसा ही पाता हूं। उन्होंने मुझे स्टार बनाया है। मैं जो हूं वही रहता हूं। लोगों से मिलने या बात करते समय मैं कोई और नहीं होता। लोगों को प्रभावित करने के लिए मुझे मेहनत नहीं करनी पड़ती।

कहते हैं आप अपनी छवि को लेकर आक्रामक नहीं हैं। आप अपने प्रचार में भी ज्यादा रुचि नहीं लेते?
मैं अपना प्रचार नहीं कर सकता। मैं इसे अच्छा भी नहीं मानता। दर्शक मुझे मेरी फिल्मों से जानते-पहचानते हैं। वे फैसला करते रहते हैं। मीडिया से बातें करते समय मैं बहुत खुश होता हूं। मुझे अपनी रोजमर्रा जिंदगी के बारे में बातें करना अच्छा नहीं लगता। दर्शकों से मेरा रिश्ता अभिनेता होने की वजह से है। उनकी रुचि मेरी फिल्मों में है। मैं अपना बिगुल नहीं बजा सकता। हां, फिल्म आती है, तो जरूर फिल्म के बारे में बातें करता हूं।

Tuesday, February 17, 2009

दिल्ली ६ के बारे में राकेश ओमप्रकश मेहरा

अभिषेक बच्चन और सोनम कपूर के साथ दिल्ली 6 में दिल्ली के चांदनी चौक इलाके की खास भूमिका है। चांदनी चौक का इलाका दिल्ली-6 के नाम से भी मशहूर है। राकेश कहते हैं, मुझे फिल्मों के कारण मुंबई में रहना पड़ता है। चूंकि मैं दिल्ली का रहने वाला हूं, इसलिए मुंबई में भी दिल्ली खोजता रहता हूं। नहीं मिलने पर क्रिएट करता हूं। आज भी लगता है कि घर तो जमीन पर ही होना चाहिए। अपार्टमेंट थोड़ा अजीब एहसास देते हैं।

क्या दिल्ली 6 दिल्ली को खोजने और पाने की कोशिश है?
हां, पुरानी दिल्ली को लोग प्यार से दिल्ली-6 बोलते हैं। मेरे नाना-नानी और दादा दादी वहीं के हैं। मां-पिता जी का भी घर वहीं है। मैं वहीं बड़ा हुआ। बाद में हमलोग नयी दिल्ली आ गए। मेरा ज्यादा समय वहीं बीता। बचपन की सारी यादें वहीं की हैं। उन यादों से ही दिल्ली-6 बनी है।

बचपन की यादों के सहारे फिल्म बुनने में कितनी आसानी या चुनौती रही?
दिल्ली 6 आज की कहानी है। आहिस्ता-आहिस्ता यह स्पष्ट हो रहा है कि मैं अपने अनुभवों को ही फिल्मों में ढाल सकता हूं। रंग दे बसंती आज की कहानी थी, लेकिन उसमें मेरे कालेज के दिनों के अनुभव थे। बचपन की यादों का मतलब यह कतई न लें कि यह पुरानी कहानी है। दिल्ली 6 आने वाले कल की कहानी है। फिल्म के अंशो को देख चुके लोगों ने बताया कि यह फिल्म अब ज्यादा प्रासंगिक हो गयी है। पूरी दुनिया में जो घटनाएं घट रही हैं, वे इस फिल्म को अधिक महत्वपूर्ण बना रही हैं। इसमें जिंदगी का हिस्सा बन रही घटनाओं का चित्रण है। फिल्म को भौगोलिक तौर पर दिल्ली में रखा है। मैं दिल्ली की गलियों, खुश्बू, तौर-तरीकों और लोगों से परिचित हूं। मुझे रिसर्च करने की ज्यादा जरूरत नहीं पड़ी।

रंग दे बसंती में दिल्ली थी और दिल्ली 6 में तो दिल्ली नाम में ही है। आपकी फिल्मों में स्थान या देशकाल सुनिश्चित रहने का कोई खास कारण?
मैं दिल्ली का हूं। मैं इस देश की भाषा बोलता हूं। इसकी संस्कृति में पला हूं और यही देख-देख कर बड़ा हुआ हूं। मैंने बाहर की दुनिया भी देखी है। 19 साल की उम्र से घूम रहा हूं। विदेश में भी नौकरी की। बाहर के एक्सपोजर का मतलब यह नहीं होता कि हम नकलची बंदर बन जाएं। अपनी कहानियां सुनाने में मजा आता है। गांव-घर में आज भी किस्से सुनाए जाते हैं। हम वही काम कर रहे हैं। बस,माध्यम अलग और खर्चीला है।

दिल्ली 6 के बारे में बताएं?
दिल्ली से जुड़ा मेरा एक अनुभव था। उसी को मैंने कहानी का रूप दिया। कमलेश जी ने उसका विस्तार किया। फिर प्रसून जोशी आए और वे कहानी को दूसरे स्तर पर ले गए। इस फिल्म में 9 गाने हैं, लेकिन कोई भी गाना लिप सिंक में नहीं है। एक जागरण है, जिसे मैंने रघुवीर यादव, ओम पुरी और पवन मल्होत्रा की आवाज में रखा है। एक रैप अभिषेक ने गाया है।

अभिषेक बच्चन और सोनम कपूर को प्रमुख भूमिकाएं सौंपने की क्या वजह रही?
अभिषेक बच्चन और मैं एक साथ करियर शुरू करने वाले थे। हम लोग समझौता एक्सप्रेस पर काम कर रहे थे। वह फिल्म नहीं बन सकी। फिर रंग दे बसंती आ गयी। दिल्ली 6 भी थोड़ी पहले बन सकती थी, लेकिन अभिषेक के पास समय नहीं था। मैंने बाहर तलाश की। संतुष्ट नहीं हुआ तो फिर अभिषेक के पास लौटा। सोनम के बारे में सोचने के बावजूद मैं आशंकित था। मुझे लग रहा था कि दिल्ली के मध्यवर्गीय परिवार की सामान्य लड़की की भूमिका में वो जंचेगी या नहीं? मैं मिलने गया तो एक घंटे की मुलाकात दिन भर लंबी हो गयी। मुझे सोनम न केवल जंची, बल्कि मैं तो कहूंगा कि वह दमदार अभिनेत्री हैं। उनमें नर्गिस और वहीदा रहमान की झलक है।



Saturday, November 15, 2008

फ़िल्म समीक्षा:दोस्ताना


भारतीय परिवेश की कहानी नहीं है

-अजय ब्रह्मात्मज


कल हो न हो में कांता बेन के मजाक की लोकप्रियता को करण जौहर ने गंभीरता से ले लिया है। अबकि उन्होंने इस मजाक को ही फिल्म की कहानी बना दिया।
दोस्ताना दो दोस्तों की कहानी है, जो किराए के मकान के लिए खुद को समलैंगिक घोषित कर देते हैं। उन्हें इस झूठ के नतीजे भी भुगतने पड़ते हैं। संबंधों की इस विषम स्थिति-परिस्थिति में फिल्म के हास्य दृश्य रचे गए हैं। आशचर्य नहीं की इसे शहरों के युवा दर्शक पसंद करें। देश के स्वस्थ्य मंत्री ने भी सुझाव दिया है कि समलैंगिक संबंधों को कानूनी स्वीकृति मिल जानी चाहिए। सम्भव है कि कारन कि अगली फ़िल्म समलैंगिक संबंधो पर हो।

करण की दूसरी फिल्मों की तरह इस फिल्म की शूटिंग भी विदेश में हुई है। इस बार अमेरिका का मियामी शहर है। वहां भारतीय मूल के दो युवकों को मकान नहीं मिल पा रहा है। एक मकान मिलता भी है तो मकान मालकिन अपनी भतीजी की सुरक्षा के लिए उसे लड़कों को किराए पर नहीं देना चाहती। मकान लेने के लिए दोनों खुद को समलैंगिक घोषित कर देते हैं। फिल्म को देखते समय याद रखना होगा कि यह भारतीय परिवेश की कहानी नहीं है। यह एक ऐसे देश की कहानी है, जहां का कानून समलैंगिक दंपति को रेसिडेंट परमिट देने में प्राथमिकता देता है। भारत में समलैंगिक संबंधों को अभी सामाजिकस्वीकृति नहीं मिली है।

हास्य फिल्मों में हमेशा अप्राकृतिक विषयों और कमियों को मजाक का विषय बनाया जाता है.समलैंगिकता पर बनी यह फ़िल्म ऐसे संबंधों के प्रति संवेदनशील होने के बजाय हंसाने कि वजह देती है.हिन्दी फिल्मों के इतिहास में यह फ़िल्म पुरूष अंग प्रदर्शन के लिए याद रखी जायेगी। निर्देशक तरूण मनसुखानी ने जॉन अब्राहम की सुडौल देहयष्टि का जमकर प्रदर्शन किया है। जॉन अब्राहम अपनी देह को लेकर बेफिक्र दिखते हैं। उन्हें कुछ दृश्यों में चड्ढी खिसकाने में शर्म नहीं आई है। इस देह दर्शन का उद्देश्य निश्चित रूप से वैसे दर्शकों को रिझाना है,जो पुरुषों के शरीर सौष्ठव में रूचि लेते हैं.यह हिन्दी का बदलता सिनेमा है.इस पर गौर करने की ज़रूरत है।

अभिनय के लिहाज से अभिषेक और जॉन अब्राहम ने अपने किरदारों को सहजता से निभाया है। दोनों के बीच के सामंजस्य से फ़िल्म रोचक बनी रहती है। अभिषेक बच्चन खिलंदडे किरदारों में अच्छे लगते हैं.जॉन अब्राहम भी इस बार किरदार में घुसते नज़र आए.प्रियंका चोपड़ा अभिनय के प्रति गंभीर हो गई हैं। फैशन के बाद दोस्ताना में भी वह जंचती है। इस फिल्म में बॉबी देओल सरप्राइज करते हैं। बाकी कलाकार सामान्य हैं।

Friday, November 14, 2008

दोस्ती का मतलब वफादारी है: अभिषेक बच्चन

अभिषेक बच्चन की नई फिल्म दोस्ताना दोस्ती पर आधारित है। आज रिलीज हो रही इस फिल्म के बारे में पेश है अभिषेक बच्चन से खास बातचीत-
दोस्ती क्या है आप के लिए?
मेरे लिए दोस्ती का मतलब वफादारी है। दोस्त आसपास हों, तो हम सुरक्षा और संबल महसूस करते हैं।
क्या दोस्त अपने पेशे के ही होते हैं?
दोस्त तो दोस्त होते हैं। जरूरी नहीं है कि वे आप के पेशे में ही हों। मेरे कई दोस्त ऐसे हैं,जिनका फिल्मों से कोई नाता नहीं है।
दोस्त बनते हैं या बनाए जाते है?
दोस्त बनाए जाते हैं। दोस्ती खुद-ब-खुद नहीं होती। दोस्ती की जाती है। उसके लिए कोशिश करनी पड़ती है।
कौन सा रिश्ता ज्यादा मजबूत होता है? दोस्ती या खून का रिश्ता?
यह व्यक्ति पर निर्भर करता है। मेरे और आपके या किसी और के अनुभव में फर्क हो सकता है। मैं रिश्तों को अलग-अलग करके नहीं देखता।
दोस्त और दोस्ती को लेकर आप के अनुभव कैसे रहे हैं?
मेरे ज्यादातर दोस्त बचपन के ही हैं। गोल्डी बहल,सिकंदर खेर,उदय चोपड़ा और रितिक रोशन सभी मेरे बचपन के दोस्त हैं। हम सभी एक ही स्कूल में पढ़ते थे। मैंने दोस्ती निभाई है और वे सभी दोस्त बने रहे हैं।
कोई गैरफिल्मी दोस्त भी है?
बिल्कुल। अभी दो के नाम लूंगा। गौरव चेन्नई में रहते हैं और रियल एस्टेट के धंधे से जुड़े हैं। कॉलेज के दिनों में गौरव से दोस्ती हुई थी। विनय लंदन में रहते हैं और मार्केटिंग से जुड़े हैं। वह मेरे बचपन के दोस्त हैं। हम पड़ोसी थे।
आप ने हमेशा कहा है कि पापा आप के सबसे अच्छे दोस्त हैं। अमित जी भी अपने ब्लॉग में उल्लेख करते हैं कि आप उनके दोस्त हैं। क्या इस दोस्ती को परिभाषित करेंगे?
पापा के साथ मेरी दोस्ती को परिभाषित नहीं किया जा सकता। इस रिश्ते की यही खासियत है। वह मेरे सबसे घनिष्ठ दोस्त हैं। हम दोनों एक-दूसरे के लिए कुछ भी कर सकते हैं। दोस्ती की शुरुआत डैड ने की थी। उनका मानना था कि जिस दिन बेटे के पांव में मेरा जूता आ गया उस दिन से वह मेरा दोस्त हो गया। मैं उनसे किसी भी मुद्दे पर बात कर सकता हूं। इस दोस्ती में मैं अपनी मर्यादा नहीं भूलता कि वह मेरे पिता हैं। एक हद है,जो मैं पार नहीं कर सकता।
आप ऐश्वर्या को भी दोस्त कहते हैं?
ऐश्वर्या से मेरी दोस्ती अलग किस्म की है। वह मेरी पत्‍‌नी हैं। ऐश्वर्या हमउम्र और हमपेशा भी हैं। वह मुझे अच्छी तरह समझती हैं।
जॉन अब्राहम आपके दोस्त हैं और अभी उनके साथ दोस्ताना आ रही है।
जॉन की दोस्ती की वजह से ही हम फिल्म में बेहतर काम कर सके। हमारे बीच किसी प्रकार की होड़ नहीं रही। सीन चुराने या छा जाने वाली बात हमारे दिमाग में नहीं आई। आाप फिल्म देखेंगे, तो पता चलेगा। इस फिल्म में एक ही लड़की से हम दोनों प्यार कर बैठते हैं।

Friday, September 26, 2008

'द्रोण' में मेरा लुक और कैरेक्टर एकदम नया है-अभिषेक बच्चन


-अजय ब्रह्मात्मज

कह सकते हैं कि अभिषेक बच्चन के करिअर पर थ्री डी इफेक्ट का आरंभ 'द्रोण' से होगा। यह संयोग ही है कि उनकी आगामी तीनों फिल्मों के टाइटल 'डी' से आरंभ होते हैं। 'द्रोण', 'दोस्ताना' और 'दिल्ली-६' में विभिन्न किरदारों में दिखेंगे। 'द्रोण' उनके बचपन के दोस्त गोल्डी बहल की फिल्म है। इस फंतासी और एडवेंचर फिल्म में अभिषेक बच्चन 'द्रोण' की शीर्षक भूमिका निभा रहे हैं। पिछले दिनों मुंबई में उनके ऑफिस 'जनक' में उनसे मुलाकात हुई तो 'द्रोण' के साथ ही 'अनफारगेटेबल' और बाकी बातों पर भी चर्चा हुई। फिलहाल प्रस्तुत हैं 'द्रोण' से संबंधित अंश ...

- सबसे पहले 'द्रोण' की अवधारणा के बारे में बताएं। यह रेगुलर फिल्म नहीं लग रही है।
0 'द्रोण' अच्छे और बुरे के सतत संघर्ष की फिल्म है। सागर मंथन के बाद देवताओं ने एक साधु को अमृत सौंपा था। जब साधु को लगा कि असुर करीब आ रहे हैं और वे उससे अमृत छीन लेंगे तो उसने अमृत घट का राज प्रतापगढ़ के राजा वीरभद्र सिंह को बताया और उनसे सौगंध ली कि वे अमृत की रक्षा करेंगे। इसी कारण उन्हें 'द्रोण' की उपाधि दी गयी। मैं इस फिल्म में आदित्य की भूमिका निभा रहा हूं। मैं वीरभद्र सिंह के वंश का हूं। इस पीढ़ी में मेरा दायित्व है कि मैं अमृत की रक्षा करूं, इसलिए मुझे द्रोण की उपाधि दी जाती है। आदित्य इन चीजों से अंजान सामान्य जिंदगी जी रहा होता है, लेकिन एकबारगी उसकी जिंदगी बदल जाती है।
- एक तरह से आप डबल रोल निभा रहे हैं। एक ही किरदार खास परिस्थिति में बदल जाता है?
0 जी हां, मैं पहले सामान्य युवक आदित्य हूं। 'द्रोण' की उपाधि मिलने के बाद मेरी जिंदगी बदल जाती है। मेरा दायित्व बढ़ जाता है। मेरे जीवन शैली में बदलाव आ जाता है। अब मुझे अपनी मां के साथ अमृत की रक्षा करनी है। देवताओं को दिए गए सौगंध की लाज रखनी है और असुरों को भी हराना है।
- इस फिल्म को लेकर कहा जा रहा है कि यह अभिषेक बच्चन की सुपरहीरो फिल्म है?
0 मालूम नहीं, कहां से यह बात फैली है। यह सुपरहीरो फिल्म नहीं है। द्रोण के पास कोई सुपरपावर नहीं है। वह एक शक्तिशाली राजा जरूर है। उसकी शक्तियां अलौकिक लग सकती हैं, लेकिन वह कहीं से भी सुपरहीरो नहीं कहा जा सकता।
- इस फिल्म की योजना कैसे बनी?
0 गोल्डी पहले किसी और विषय पर फिल्म लिख रहे थे। वह क्राइम थ्रिलर थी। उन्हें अचानक इस विषय का खयाल आया। उन्होंने 'गुरु' की शूटिंग के दौरान आकर मुझ से बात की और कहा कि बड़े पैमाने पर वे एक फिल्म की योजना बना रहे हैं। मैंने उनसे इतना ही कहा कि अगर आप अपने विषय को लेकर आश्वस्त हैं तो मुझे कोई दिक्कत नहीं है। गोल्डी के साथ मेरा ऐसा ही रिश्ता है। मुझे भी लगा कि मैं 'द्रोण' करूं या न करूं, लेकिन मैं इसे देखना चाहूंगा। इस विषय ने मुझे इतना आकर्षित किया कि मैंने गोल्डी को फट से हां कह दिया।
- इस फिल्म में विरासत की बात की गयी है। अभिषेक बच्चन स्वयं और द्रोण के किरदार के रूप में उसे कितना महत्व देते हैं?
0 'द्रोण' का वजूद ही इस विरासत की वजह से है। मैं अपनी बात करूं तो मैं विरासत को बहुत महत्व देता हूं। मेरे माता-पिता, दादा-दादी और उनसे भी पहले के हमारे पूर्वजों ने हमें विरासत सौंपी है। हमें उसकी रक्षा करने के साथ उसे आगे भी बढ़ाना चाहिए। हम क्या हैं? वास्तव में हम उसी विरासत के हिस्से हैं। मेरे लिए दादा जी द्वारा दिया गया बच्चन नाम और उसकी विरासत सबसे मूल्यवान धरोहर है। मैं उस पर गर्व करता हूं।
- 21वीं सदी में विरासत की बात करना ... क्या ऐसा नहीं लगता कि यह सामंती सोच है?
0 इसे सामंती व्यवस्था और मूल्यों से जोड़ कर न देखें। विरासत क्या है? मेरे लिए यह पिता और दादा द्वारा दिए गए मूल्य और सिद्धांत हैं, जो किसी भौतिक संपदा से अधिक मूल्यवान हैं।
- निजी तौर पर आपके लिए 'द्रोण' का अनुभव कैसा रहा? यह रेगुलर किस्म की फिल्म नहीं है और न ही आपका किरदार हिंदी फिल्मों का रेगुलर हीरो है?
0 मेरे लिए तो बहुत ही अलग रहा। मैंने 'द्रोण' जैसी कोई फिल्म पहले नहीं की थी। मुझे नहीं लगता कि जल्दी ही कोई दूसरा मौका भी नहीं मिलेगा। यह फिल्म बड़े पैमाने पर बनी है। मेरी अभी तक की सबसे महंगी फिल्म है 'द्रोण'। इस फिल्म का लुक और मेरा कैरेक्टर एकदम नया है। मुझे इस लाइन पर बनी कोई और हिंदी फिल्म याद नहीं आती। यह अपनी तरह की पहली फिल्म है और यही सबसे बड़ी चुनौती रही। मेरे लिए कोई रेफरेंस पाइंट नहीं था।
- किस तरह की चुनौतियां या मुश्किलें रहीं?
0 बड़ी फिल्म की मुश्किलें भी बड़ी होती हैं। अगर हम बड़ा काम करते हैं तो उसकी जांच होती रहती है। हमें अपनी मेहनत और लगन से वह अर्जित करना पड़ता है। मुश्किलें स्वाभाविक रूप से आती हैं। प्राग में ऐसी बर्फ गिरी की दो दोनों तक हम बैठे रहे। बीकानेर जैसी जगह में ऐसी बारिश हुई कि सेट बह गया। नामीबिया में शूटिंग कर रहे थे तो चक्रवात आया। हम ने तो सोचा भी नहीं था कि ऐसा कुछ होगा।
- ऐसी फिल्म में अभिनय और अभिव्यक्ति की निरंतरता पर कितना ध्यान पड़ता है?
0 हर फिल्म में वैसी निरंतरता पर ध्यान देना पड़ता है। एक एक्टर की मेहनत किसी भी फिल्म में कम नहीं होती। ऐसी फिल्मों में दूसरों की मेहनत बढ़ जाती है कि क्या पहना था और आगे क्या पहनना है? उसमें एक कंटीन्यूटी रखनी पड़ती है। इस किरदार के लिए मुझे पांच-छह चीजों का प्रशिक्षण लेना पड़ा। फिल्म में मेरा कॉस्ट्यूम 10 से 15 किलोग्राम के बीच रहता था। वह पहन कर चलना पड़ता था। मुझे मजा आया।
- इस फिल्म में अंडरवाटर स्टंट भी किया है आपने?
0 जी हां, और वह बहुत खतरनाक था। मुझे बगैर ऑक्सीजन मास्क के पानी में रहना था। स्टंट के समय अपनी सांसें रोक कर रखनी थी। अगर आक्सीजन की अचानक जरूरत महसूस हो तो सहायता के लिए एक आदमी रहता था। 20 फीट गहरे पानी के टैंक में इसकी शूटिंग हुई थी। पहले दिन तो पानी के दबाव के कारण नाक से खून बहने लगा था। रोजाना आठ से नौ घंटे पानी में शूटिंग करनी पड़ी थी। मैं उस कठिन शूटिंग को नहीं भूल सकता। उसका अलग रोमांच था।
- आप एक सुपरस्टार के बेटे होने के साथ दुनिया की सबसे खूबसूरत इंटरनेशनल आइकॉन के पति भी हैं। इनके कारण कोई दबाव या चुनौती महसूस करते हैं?
0 बिल्कुल नहीं। न ही कोई दबाव रहता है और न कोई चुनौती महसूस करता हूं। मैं इसके बारे में सोचता ही नहीं। अगर यह सब देखने और सोचने लगूं तो अपनी नार्मल जिंदगी तबाह कर लूंगा। मुझे अपनी क्षमता का पूरा उपयोग करते हुए काम करना चाहिए और परिणाम दर्शकों पर छोड़ देना चाहिए। मैं वही करता हूं।
- अब पिता अमिताभ बच्चन से आपकी तुलना नहीं की जाती। आप ने अपनी जगह पा ली है क्या?
0 मैं नहीं कह सकता कि मेरी कोई जगह बनी है या नहीं। लोग पहले पापा से मेरी तुलना करते थे और यह नैचुरल था। बाद में उन्हें लगा कि मेरी शैली अलग है। अगर कोई समानता दिखती है तो भी मैं शर्मिंदा नहीं हूं। मैं उनका बेटा हूं। उनके गुण मुझ में आने और रहने चाहिए। अगर कोई कहता है कि मैं तो अमिताभ बच्चन की तरह एक्टिंग करता हूं तो मेरे लिए यह बड़ी सराहना है। आप अमिताभ बच्चन को एक्टर के तौर पर देखें और फिर उनसे मेरी तुलना का महत्व समझें।

- मां के साथ भी आ रहे हैं आप 'द्रोण' में?

0 मां के साथ एक और फिल्म कर चुका हूं। मां तो मां हैं। शॉट के बाद वह मां हो जाती हैं। मैं चाहूंगा कि उनके साथ एक पूरी फीचर फिल्म करूं। इसमें उनका रोल बहुत छोटा है। उनके साथ काम करने में मजा आया। मां के साथ तो दुलार पाना निश्चित है।




Sunday, July 20, 2008

मेरी बीवी का जवाब नहीं: अभिषेक बच्चन

-अजय ब्रह्मात्मज
वे भारत ही नहीं, एशिया के सर्वाधिक ग्लैमरस परिवार के युवा सदस्य हैं, लेकिन घर जाने से पहले अभिषेक बच्चन शूटिंग स्पॉट के मेकअप रूम में पैनकेक की परतों के साथ ही अपनी हाई-फाई प्रोफाइल भी उतार आते हैं। ऐश्वर्या राय के साथ उनकी शादी का कार्ड पाना पूरे मुल्क की हसरत थी, तो अब देश इस इंतजार में है कि उनके आंगन में बच्चे की किलकारी कब गूंजेगी? एक लंबी बातचीत में जूनियर बच्चन ने खोला अपनी निजी जिंदगी के कई पन्नों को-
ऐश्वर्या राय में ऐसी क्या खास बात है कि आपने उनसे शादी की?
वह मेरी सबसे अच्छी दोस्त थीं। वह ऐसी हैं, जिनके साथ मैं अपनी जिंदगी गुजार सकता हूं। वह ऐसी हैं, जो सिर्फ मेरी ही चिंता नहीं करतीं, बल्कि पूरे परिवार का ख्याल रखती हैं। वह जैसी इंसान हैं, उनके बारे में कुछ भी कहना कम होगा। वह अत्यंत दयालु और सुंदर हैं। बचपन से मुझे मां-पिताजी ने यही शिक्षा दी कि जिंदगी का उद्देश्य बेहतर इंसान बनना होना चाहिए। ऐश्वर्या वाकई बेहतर इंसान हैं।
शादी के बाद आपका जीवन कितना बदला है?
फर्क यह आया है कि परिवार में अब एक नया सदस्य आ गया है। शादी के बाद सभी का जीवन बदलता है, जिम्मेदारी बढ़ती है। मैं कोई अलग या खास आदमी नहीं हूं। मेरे जीवन में भी बदलाव आया है।
अगर कोई विवाद हुआ तो किसकी बात मानी जाती है या मानी जाएगी?
आपकी शादी हो गई है न। आप अच्छी तरह जानते हैं कि किसकी बात मानी जाती है। वैसे अभी तक ऐसी स्थिति नहीं आई है। जब आएगी, तब देखेंगे।
ऐश्वर्या कितनी अच्छी पत्नी हैं?
मेरी तो एक ही पत्नी है और वह ऐश्वर्या हैं, इसलिए मैं किसी से उनकी तुलना नहीं कर सकता। जो मैंने सोचा था, वैसी पत्नी मिली।
जया जी के साथ ऐश्वर्या के संबंध के बारे में बताएं?
बहुत ही अच्छा है। मुझसे ज्यादा प्रगाढ़ संबंध हैं मां से, जो बहुत खास है। दोनों एक-दूसरे को स्नेह और आदर देते हैं। साथ में काफी समय बिताते हैं। मेरे मां-पिताजी को लगता है कि परिवार में एक बेटी आ गई है। उनके साथ बहू से ज्यादा बेटी जैसा व्यवहार होता है। श्वेता दीदी तो अब दिल्ली में रहती हैं, यहां परिवार में ऐश्वर्या उनकी कमी पूरी करती हैं।
कोई पुरानी आदत आप को छोड़नी पड़ी?
बिल्कुल नहीं। जैसा था, वैसा ही हूं।
ऐश्वर्या को आपने कितना बदल दिया?
यह आप उनसे पूछिए। मैं कैसे बता सकता हूं?
क्या ऐश्वर्या को खाना पकाना आता है?
जी हां, जिस दिन वह घर में आई, उस दिन रस्म के मुताबिक उन्होंने रसोई में काम किया। वह हलवा बहुत अच्छा बनाती हैं। हलवा मेरे घर में सभी को बहुत पसंद है।
आशंका व्यक्त की जा रही है कि शायद ऐश्वर्या लंबे समय तक फिल्मों में काम न करें?
वो काम कर रही हैं। लगातार फिल्में हैं उनके पास, वो काम करती रहेंगी। मैं चाहूंगा कि ऐश्वर्या काम करती रहें। मैं उनका जबरदस्त फैन हूं। यही चाहूंगा कि वो फिल्में करती रहें, जब तक उनका मन हो। मैंने, मां ने या पिताजी ने उन्हें कभी रोका नहीं है कि अब आप काम नहीं कर सकतीं। लोग भूल जाते हैं कि मेरे मां-पिता दोनों एक्टर हैं। मेरी मां ने शादी के बाद एक्टिंग नहीं छोड़ी, मेरी पैदाइश के समय उन्होंने एक्टिंग छोड़ी। मेरी बहन तब ढाई साल की थी, लेकिन वह काम करती रही थीं। उन्होंने एक्टिंग इसलिए छोड़ी कि उस समय वह सारा ध्यान परिवार में लगाना चाहती थीं। उन्होंने कहा कि अब मैं जीवन के इस दौर का आनंद उठाना चाहती हूं। वह उनकी व्यक्तिगत पसंद थी। उनसे किसी ने एक्टिंग छोड़ने के लिए नहीं कहा था। नौवें दशक के आरंभ में उन्होंने सिलसिला की। फिर हम बड़े हो गए। बोर्डिग स्कूल चले गए। जब हम बड़े हो गए तो उन्होंने फिर से एक्टिंग शुरू की और हजार चौरासी की मां जैसी फिल्म की। उस फिल्म के रोल ने उन्हें प्रेरित किया। मेरे परिवार में किसी ने किसी को कभी मना नहीं किया। मैं उम्मीद करता हूं कि ऐश्वर्या काम करती रहेंगी।
भारत इतना बड़ा देश है। इसमें दो राज्यों और संस्कृतियों के परिवारों में शादी होती है तो खान-पान से लेकर रस्म-ओ-रिवाज तक की कई दिक्कतें आती हैं। आप लोगों के परिवार में ऐसा सांस्कृतिक फर्क तो नहीं होगा?
पारंपरिक रूप से हम यूपी के हैं और वह कर्नाटक की हैं, लेकिन ऐसा कोई फर्क नहीं महसूस हुआ। ऐश्वर्या बहुत ही मिलनसार हैं और जल्दी घुल-मिल जाती हैं।
कितनी कोशिश रहती है कि आप दोनों साथ रहें और दिखें?
हम दोनों पति-पत्नी हैं। हम साथ रहना चाहते हैं। यह सामान्य बात है कि हम बाहर साथ जाएं और साथ दिखें। मौका मिलता है तो हम हमेशा साथ ही आते-जाते हैं। मैं न रहूं तो वह अकेली जाती हैं या वो न रहें तो मैं अकेला जाता हूं। कोशिश यही रहती है कि हम ज्यादा समय तक दूर न रहें।
पिछले साल खबर आई थी कि आप द्वारिका गए थे बच्चे की कामना लेकर, इस बारे में क्या कहेगे?
बिल्कुल गलत, मेरे दादा जी की पुण्यतिथि थी। हम लोग हर साल उनकी पुण्यतिथि के दिन किसी धार्मिक स्थान पर जाते हैं। ईश्वर का आशीर्वाद लेते हैं और उनके लिए प्रार्थना करते हैं।
फिर भी बच्चे की कामना तो होगी ही?
अभी हम लोगों ने इस बारे में नहीं सोचा है। हम युवा दंपति हैं और दोनों ही अपने-अपने काम में काफी व्यस्त हैं। हम दोनों मानते हैं कि जब बच्चे होने होंगे तो हो जाएंगे, आप उसकी प्लानिंग नहीं कर सकते।
एक बार खबर आई थी कि अमिताभ बच्चन ने अभिषेक बच्चन के लिए बेटी की नहीं, बेटे की कामना की। यह घटना समीर जी की पुस्तक के विमोचन के समय की है।
देखिए कि मीडिया कैसे गलत तरीके से कोई बात पेश करता है। मेरे पिताजी समीर जी की पुस्तक के विमोचन समारोह में गए थे। समीर जी ने कहा था कि मेरे पिता ने अमिताभ बच्चन के लिए गीत लिखे, मैं अभिषेक के लिए लिख रहा हूं और मैं चाहूंगा कि मेरा बेटा अभिषेक के बेटे के लिए गीत लिखे। इस संदर्भ में पिता जी ने कहा कि मैं जरूर चाहूंगा कि आपके बेटे मेरे पोते के लिए गीत लिखें। मीडिया ने इस वक्तव्य को गलत तरीके से पेश किया।
अपने पिताजी के बारे में कुछ बताएं?
उनके साथ सेट पर बीता हर दिन नया अनुभव छोड़ जाता है। जितना समय साथ बीते, उतना अच्छा। हर दिन विशेष होता है। वे पिता, इंसान और एक्टर सभी रूपों में द बेस्ट हैं।
अगर मैं पूछूं कि आप ने उनसे क्या सीखा है तो?
सब कुछ। मैंने अपने मा-पिता से ही सीखा है। मैं आज जो भी हूं, उन्हीं की वजह से हूँ। मैंने माँ-पिताजी की फिल्में देखी हैं और उनसे सीखा है। सेट पर वे किस तरह रोल को अप्रोच करते हैं? सेट से बाहर वे कैसे व्यवहार करते हैं? इंसान को कैसा होना चाहिए? इसके सर्वोत्तम उदाहरण हैं डैड।
आपके परिवार के चारों सदस्य अत्यंत व्यस्त हैं। एक परिवार के तौर पर मिलना-जुलना कैसे होता है?
बचपन से माँ का एक नियम रहा है कि अगर सारे लोग मुंबई में हैं तो चौबीस घंटे में एक बार सभी साथ मिलकर खाएंगे। वह चाहे नाश्ता हो या दिन या रात का खाना। आज भी वही नियम लागू होता है। हम लोग ज्यादातर डिनर एक साथ करते हैं।
लेकिन आप लोगों का काम तो अलग-अलग समय पर खत्म होता है?
सभी लोग इंतजार करते हैं। अगर मेरा पैकअप एक बजे रात को हो रहा है और पापा का छह बजे हो गया है तो वे इंतजार करेगे, मेरे लिए या मैं उनके लिए। पूरा परिवार एक साथ ही डिनर करता है।
आपके दादा जी के समय नियम था कि डायनिंग टेबल पर सभी हिंदी में बात करेंगे।
आज भी यही कोशिश रहती है। मां की सलाह रहती है कि डायनिंग टेबल पर कोई भी फिल्मों की बात नहीं करेगा। यह दादा जी के वक्त से चल रहा है। हम लोग अन्य विषयों पर बातें करते हैं। हम लोग हर तरह के विषयों पर बातें करते हैं। कितनी बातें हैं। दुनिया की इतनी घटनाएं हैं। मीडिया की वजह से हमें कितनी तो जानकारियां मिल जाती हैं। किसी ने कोई किताब पढ़ी हो तो उसकी बात होगी। ये सारे नियम-सिद्धांत दादा जी के समय से बने हैं।
आप एक अतिव्यस्त अभिनेता के पुत्र के रूप में बड़े हुए। आपका बचपन कैसा बीता था?
बचपन की अनेक यादें हैं। खासकर संडे की यादों से आज भी मन खुश हो जाता है। पिताजी संडे को छुट्टी लिया करते थे। उस दिन वे शूटिंग नहीं करते थे। हमलोग पूरे हफ्ते संडे का इंतजार करते थे और उसकी प्लानिंग करते थे। कई बार तो उनके साथ फुर्सत के पल बिताना ही महत्वपूर्ण हो जाता था। प्रतीक्षा के गार्डन में हम लोग खूब खेलते थे। संडे के लंच का खास महत्व रहता था। दादा जी-दादी जी, चाचा का परिवार और हमलोग एकत्रित होकर लंच लेते थे। एक कमरे में साथ बैठने की ऊर्जा आज भी महसूस करता हूं। अब लगता है कि कैसे हमारे अंदर भारतीय मूल्य आए। कैसे हम ने संयुक्त परिवार का महत्व समझा। पिताजी कभी-कभी यूं ही ड्राइव पर ले जाते थे। उनके साथ होने का आनंद कभी कम नहीं हुआ। आज भी पिताजी साथ रहते हैं तो मैं बहुत एक्साइटेड रहता हूं।
बचपन में पिताजी की डांट भी तो पड़ती होगी?
उन्होंने कभी किसी बात पर नहीं डांटा या पीटा। हमलोगों को अनुशासन में रखा जाता था, लेकिन कभी कोई चीज थोपी नहीं जाती थी। मां और पिताजी हमेशा सपोर्टिव रहे। हमने जो चाहा, वही किया और हर काम में उन दोनों का निर्देशन और समर्थन मिला। उनकी कोशिश रही कि हमें बेहतरीन चीजें और सुविधाएं दें। वे सब कुछ मुहैया करवा देते थे। यह हम पर निर्भर करता था कि हम उन चीजों और सुविधाओं का क्या उपयोग करते हैं? मां और पिताजी ने हमें खुला माहौल दिया। मैं अब महसूस करता हूं कि कैसे मां और पिताजी ने बगैर किसी प्रत्यक्ष दबाव के हमारे अंदर जिम्मेदारी का एहसास भरा। उन्होंने कभी नहीं कहा कि यह तुम्हें करना चाहिए या वह नहीं करना चाहिए। उन्होंने हमें ऐसी समझदारी दी कि हम स्वयं अपने लिए अच्छा-बुरा तय कर सकें।
मीडिया के रवैए के बारे में क्या कहेंगे?
पापा हमेशा कहते हैं कि यह जिंदगी तुमने चुनी है। यह सब इस जिंदगी का हिस्सा है। अगर पसंद नहीं है तो एक्टर मत बनो। अगर एक्टर बने हो तो यह सब होगा। तुम्हें इसके साथ जीना है और हम इसके साथ जीते हैं। मीडिया इतना बुरा नहीं है।
कहते हैं कि मीडिया आपकी प्रायवेसी में घुसपैठ करता है?
मैं बहुत ही प्रायवेट व्यक्ति हूं। यह आप पर निर्भर करता है कि आप अपनी प्रायवेसी कैसे संभालते हैं।
क्या आप मुंबई में आसानी से घूम लेते हैं। दर्शक और प्रशंसक घेर लेते होंगे?
मैं हाजी अली में जाकर जूस पीता हूं। वरली सी फेस पर भुट्टा खाता हूं और शिवाजी पार्क में वड़ा-पाव खा लेता हूं। आप अपना खाइए-पीजिए। हां, किसी ने पहचान लिया तो वह पास आता है। वे क्या चाहते हैं, एक ऑटोग्राफ। कभी हाथ मिलाना चाहते हैं या साथ में फोटो खींचते हैं। इसमें क्या जाता है? आप उन्हें खुश कर दें। मैं आज जो कुछ भी हूं, उनकी वजह से ही हूं। उनसे कैसे दूर रह सकता हूं।

Sunday, June 1, 2008

अभिषेक बच्चन से अजय ब्रह्मात्मज की बातचीत

अभिषेक बच्चन की पहली फिल्म से लेकर आज तक जितनी भी फिल्में आयीं है सभी में उनका अलग अंदाज देखने को मिला। प्रस्तुत है अभिषेक से बातचीत-
अभिषेक इन दिनों क्या कर रहे हैं?
शूटिंग कर रहा हूं। दिल्ली-6 की शूटिंग कर रहा था। उसके बाद करण जौहर की फिल्म कर रहा हूं, जो तरूण मनसुखानी निर्देशित कर रहे हैं। फिर रोहन सिप्पी की फिल्म शुरू करूंगा। काम तो है और आप लोगों के आर्शीवाद से काफी काम है।
सरकार राज आ रही है। उसके बारे में कुछ बताएं?
सरकार राज, सरकार की सीक्वल है। इसमें फिर से नागरे परिवार को देखेंगे। सरकार जहां खत्म हुई थी, उससे आगे की कहानी है इसमें। नयी कहानी है और नयी समस्या है। इसमें ऐश्वर्या राय भी हैं। मैं तो बहुत एक्साइटेड हूं। ऐश्वर्या इस फिल्म में बिजनेस वीमैन का रोल निभा रही हैं। वह नागरे परिवार के सामने एक प्रस्ताव रखती हैं और बाद में उस परिवार के साथ काम करती हैं।
द्रोण के बारे में क्या कहेंगे? सुपरहीरो फिल्म है?
सब लोग द्रोण को सुपरहीरो फिल्म समझ रहे हैं। वह सुपरहीरो फिल्म नहीं है। हां, मैं फिल्म का हीरो हूं, लेकिन सुपरहीरो नहीं हूं। द्रोण एक फैंटेसी फिल्म है। उस फिल्म का थोड़ा सा काम बाकी है। उस फिल्म में पोस्ट प्रोडक्शन का काम लंबा है। फिल्म में काफी मैजिक है। द्रोण आज की फिल्म है। कॉस्ट्यूम भी है, लेकिन कॉस्ट्यूम ड्रामा नहीं है। यह हाइपर रियल फिल्म है। मैंने ऐसी फिल्म पहले नहीं की। मेरे खयाल में कटिंग एज एंटरटेनमेंट होगा। इंटरनेशन स्टैंडर्ड के करीब होगी फिल्म। मैंने कभी स्पेशल इफेक्ट की फिल्म नहीं की है, इसलिए मैं तो सब कुछ सीख रहा हूं। फिल्म के डायरेक्टर गोल्डी मेरे दोस्त हैं। और क्या बताऊं फिल्म के बारे में।
फिल्म में आपका नाम द्रोण ही होगा न? प्रियंका चोपड़ा क्या कर रही हैं?
हां, मेरा नाम द्रोण ही है। प्रियंका चोपड़ा मेरी बॉडी गार्ड हैं। मैं उनसे प्रेम भी करता हूं।
संयोग से आपकी सरकार राज और द्रोण दोनों में आपके मां-पिता में से एक हैं। उनके साथ काम करने का अनुभव कैसा रहा?
द्रोण में मां के साथ ज्यादा काम नहीं है। दो-तीन दिनों का ही काम था, लेकिन बहुत मजा आया। लागा चुनरी में दाग में भी हम दोनों थे। उसमें एक दिन का काम था। उसके पहले हम दोनों ने एक बंगाली फिल्म देस की थी। मां के साथ सबसे बड़ा मजा यही है कि कट बोलते ही वह एक्टर से मां बन जाती हैं। पूछती हैं कि खाना खाया कि नहीं या ममता भरी कोई बात करने लगती है। परिवार में सारे लोग अपने कॅरियर और काम में इतने व्यस्त है कि हम अलग-अलग जगह काम कर रहे होते है। डैड के साथ तो फिर भी ज्यादा टाइम मिल जाता है। मां के साथ कम मौका मिलता है रहने का। एक्टर के तौर पर मैं क्या कह सकता हूं। शी इज जस्ट एन आउटस्टैंडिग आर्टिस्ट। आप उन्हें काम करते देख कर भी बहुत कुछ सीख सकते हैं। उनके साथ काम करना तो शुद्ध आनंद है। उन जैसी प्रतिभा का नियमित काम नहीं करना तो प्रतिभा की बर्बादी है।
अभिनेता की तरह निर्देशक की जिंदगी में भी उतार-चढ़ाव आता है। रामू की बात करें, रामगोपाल वर्मा की आग के बाद ऐसा लग रहा है कि वे खत्म हो गए। ऐसी स्थिति में रामू के साथ सरकार राज करते समय कोई संकोच या डर नहीं लगा?
बिल्कुल नहीं, कभी नहीं, मेरे अनुसार रामू अपने देश के एक प्रतिभाशाली निर्देशक हैं। निर्देशक कभी सफल होते हैं और कभी नहीं हो पाते। सरकार राज करते समय किसी के मन में यह ख्याल तक नहीं आया। रामू ने मुझे नाच तब दी थी, जब मेरी कोई फिल्म हिट नहीं हुई थी। उन्होंने मुझमें विश्वास किया था। उन्होंने मुझ में कुछ देखा था। रामू के साथ काम करते समय मैं उनकी प्रतिभा देख पाता हूं। उनकी एक फिल्म नहीं चली तो इसका मतलब यह नहीं होता कि आप उनका नाम मिटा दें। उन्होंने सरकार राज में गजब का काम किया है। मुझे पूरा विश्वास है कि इस फिल्म से वे सभी को खामोश कर देंगे।
ऐसा माना जाता है कि आपकी कोई ब्रांडिंग नहीं हुई है। किसी एक इमेज में आप नहीं बंधे हैं। यह आपकी कोशिश है या संयोग से ऐसा हुआ है?
एक एक्टर के तौर पर हम सभी चाहते हैं कि हम ब्रांडेड न हों। उससे बचे रहने पर मौका मिलता है कि हम अलग किस्म की फिल्में करें। हमारा हर किरदार अलग हो। मेरी पीढ़ी की बात करें और रितिक का उदाहरण लें। रितिक ने कहो ना..प्यार है से शुरूआत की। उसने फिजा, कोई मिल गया, कृष, धूम और जोधा अकबर जैसी फिल्में कीं। आप वैरायटी देखिए और ये सभी फिल्में हिट है। इन सारी फिल्मों में रितिक का काम बहुत सराहा गया। हम एक्टर है कुछ नया करते हैं तो हमें अच्छा लगता है। मैंने भी रिफ्यूजी से शुरूआत की थी। फिर मैंने कुछ न कहो जैसी फिल्म की। युवा, सरकार , बंटी बबली, दस, धूम, धूम-2 । मैं मानता हूं कि मेरी पीढ़ी किसी ब्रांड या इमेज में नहीं बंधी है। मेरी पीढ़ी निर्देशकों को मौका दे रही है कि वे रोचक रोल लिखें और हम उन्हें यह विश्वास दिला सकते हैं कि हम वे रोल कर पाएंगे। हमारी पीढ़ी का कोई भी अभिनेता एक तरह की फिल्म तक सीमित नहीं रहा है। हम सभी इस तथ्य के लिए सचेत नहीं हैं कि हमें एक्शन हीरो बनना है या रोमांटिक हीरो बनना है। हम सब कुछ करना चाहते हैं। इसे आप लालच कहेंगे या मूर्खता कहेंगे, मुझे नहीं मालूम, लेकिन मुझे खुशी है कि हम ऐसा कर पा रहे हैं।
क्या यह बात आप तक पहुंची कि आप रितिक रोशन के समान मेहनत नहीं करते या काम के प्रति उनकी तरह गंभीर नहीं रहते?
नहीं, मुझे किसी ने नहीं कहा कि मैं मेहनत नहीं करता हूं। मुझे लगता है कि दूसरों के समान मैं भी मेहनत करता हूं। और ज्यादा करनी चाहिए। जरूर करनी चाहिए, क्योंकि सुधार की संभावना हमेशा बनी रहती है। मेहनत की गुंजाइश रहती है। अभी तक किसी ने नहीं कहा कि मैं अपने काम के प्रति गंभीर नहीं रहता। मुझे हंसी आती है। आप इसे मेरा प्रमाद या अहंकार ना समझें। गुरु पिछले साल की हिट फिल्म थी। वह जनवरी में रिलीज हुई थी। दर्शक खुश थे। समीक्षकों ने दयालुता दिखाई। अब चूंकि लंबे समय से कोई फिल्म नहीं आई है तो लोग कहने लगे कि अभिषेक गंभीर नहीं है। यह बात मेरी समझ में नहीं आती। मेरे ख्याल में यह असंगत और मिथ्या आरोप है, लेकिन ऐसे आरोपों के बीच जीना हमारी नियति है। हमारा काम ही बोलता है। हम प्रचारक रख कर दूसरों की राय नहीं बदल सकते। हमारे बारे में राय हमारे काम से बनती है। हमें इसी में यकीन रखना चाहिए। मैं नहीं जानता हूं कि ऐसी बातें कहने वाले लोग कौन हैं? उन्होंने मेरे साथ कौन सी फिल्म की है? उन्होंने ऐसी धारणा किस आधार पर बनाई। और फिर कड़ी मेहनत क्या है? कौन तय करेगा। हर आदमी की अपनी शैली होती है। अगर कड़ी मेहनत का मतलब एक कोने में बैठकर अपनी पंक्तियां याद करना है तो मुझे खेद है कि मैं ऐसा नहीं कर सकता। मेरा अपना अप्रोच है और वह मेरे लिए कारगर है। हो सकता है वह अप्रोच दूसरों के लिए कारगर न हो, लेकिन मैं अपनी प्रक्रिया दूसरों पर नहीं लादता। मुझे लगता है कि मैं अपना काम पूरी ईमानदारी और मेहनत से करता हूं। फिर भी अगर कोई कुछ कह रहा है तो मुझे ध्यान देना चाहिए। मैं ऐसे लोगों से मिलकर यह जानना चाहूंगा कि वे ऐसा क्यों कह रहे हैं?
फिल्म हिट होती है तो सारा श्रेय एक्टर को मिलता है। उसी प्रकार फिल्म फ्लॉप हो तो दोषी भी एक्टर ही माना जाता है, ऐसा क्यों?
क्योंकि वह फिल्म का चेहरा होता है। आप ने पहले कहा था कि आप आलोचकों की टिप्पणियों से सीखते और खुद को सुधारते हैं, लेकिन जब लोग आपकी तारीफ करते हैं तो वह माथे पर चढ़ता भी होगा। आप कैसे संतुलन बनाए रखते हैं? मैं शुरू से स्पष्ट हूं कि जो आज ऊपर है, कल वह नीचे आएगा। यह प्रकृति का नियम है। यही जिंदगी का नियम है। गुरु हिट हुई। फिल्म की, मेरे रोल की और मेरे परफॉर्मेस की तारीफ हुई , मुझे यह मालूम था कि अगली फिल्म गुरु जैसी नहीं चलेगी, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि मैं कोशिश करना छोड़ दूं। पर आप कामयाब होते हैं। आप गिरते हैं, फिर उठते हैं और आगे बढ़ते हैं। आप गिरने पर रुक नहीं जाते। फिर से आगे बढ़ते हैं। मेरे दादाजी कहते थे कि जिंदगी में यह महत्वपूर्ण नहीं है कि आप कितनी बार गिरते हैं। महत्व इस बात का है कि आप कितनी बार खुद को बटोर कर उठते हैं और आगे बढ़ते हैं।
मणिरत्नम की युवा और गुरु दोनों ही फिल्मों में आपका काम बेहतरीन रहा। कहते है निर्देशक-अभिनेता की समझदारी हो तो फिल्म एवं भूमिका में निखार आता है। और किन निर्देशकों के साथ आप ऐसी समझदारी महसूस करते हैं?
मैं सारा श्रेय निर्देशकों को दूंगा। मैं बहुत ही सीमित किस्म का एक्टर हूं। इसलिए मैं अपने निर्देशकों से खास मदद चाहता हूं। मुझे अपनी सीमाएं मालूम हैं। मुझे मालूम है कि मैं क्या कर रहा हूं। मुझे यह भी मालूम है कि मैं क्या नहीं कर सकता हूं। मेरे खयाल से यह मालूम होना ज्यादा जरूरी है। मुझे निर्देशक का प्यार और विश्वास चाहिए होता है। अगर निर्देशक के साथ मैं सहज हूं तो मैं कुछ भी कर सकता हूं। शायद यही वजह है कि मैंने अपने दोस्तों के साथ ज्यादा काम किया है। गोल्डी बहल, रोहन सिप्पी, करण जौहर ये सब के सब मेरे दोस्त हैं। मणिरत्नम भी दोस्त हो गए हैं। हमारी समझदारी थी, तभी युवा वैसी बन पाई। बिल्कुल सही कहा आपने कि निर्देशक-अभिनेता की समझदारी हो तो सब कुछ निखर जाता है।
आजकल बॉडी बनाने पर बहुत जोर दिया जा रहा है। सिक्स पैक एब तो मशहूर ही हो गया। क्या इसे जरूरी नहीं मानते?
जरूरी मानता हूं, अगर किरदार की जरूरत है। जब मैं गुरु कर रहा था तो मणि सर ने कहा था कि जैसे-जैसे गुरु बूढ़ा होता जा रहा है, वैसे-वैसे उसे मोटा होना है। उस फिल्म के लिए मैंने ग्यारह किलो वजन बढ़ाया था। वह फिल्म की जरूरत थी। अगर कल किसी फिल्म में सिक्स पैक की जरूरत होगी तो उसकी कोशिश करूंगा। मेरा मानना है कि यह विजुअल मीडियम है और आपको कैरेक्टर की तरह दिखना चाहिए। जरूरी नहीं है कि सिक्स पैक एब हो ही। एक्टर होने की पहली शर्त है कि आप एक्टिंग जानें, लेकिन कैरेक्टर की तरह दिखना भी चाहिए। सरकार राज में लुक है, हल्की दाढ़ी और खास तरीके से काढ़े गए बाल। रामू ने इस बार कहा कि पार्ट वन की तरह पतला-दुबला नहीं होना है, क्योंकि शंकर नागरे बड़ा हुआ है। वह परिवार का मुखिया बन गया है। वह समृद्ध हुआ है। इसलिए हमने उसे पतला-दुबला नहीं दिखाया है। पहले में शंकर के हाथ में चीजें नहीं थीं। अब सब कुछ शंकर के हाथ में है। सरकार में उसे पतला-दुबला दिखाया गया था। उसकी आंखों में जिंदगी की भूख थी। अब वह भूख नहीं है। अब चूंकि वजन घटाने का फैशन चल रहा है, इसलिए खालिद मोहम्मद ने कहीं लिख दिया कि मैं मोटा दिखता हूं। आपको नहीं मालूम कि मैं क्या कर रहा हूं। मैं कौन सा रोल निभा रहा हूं।
शरीर सौष्ठव दिखने का नया क्रेज है। आप क्या कहते है?
हां है न, समय बदल गया है। अगर दर्शक वैसे ही देखना चाहते हैं तो हमारे ऊपर दबाव आएगा ही। मुझे अभी तक कोई ऐसा रोल नहीं मिला है। न ही कोई दबाव पड़ा है।
पिछले दिनों खबर आई थी कि ऐश्वर्या राय पिंक पैंथर-2 की शूटिंग के समय अकेलापन महसूस कर रही थीं, तो आप उनसे मिलने चले गए थे, लेकिन उसकी वजह से क्या शूटिंग में व्यवधान पड़ा?
हुआ यों था कि ऐश्वर्या बोस्टन में पिंक पैंथर-2 की शूटिंग कर रही थी। मेरा मुंबई का शेड्यूल रद्द हो गया था। मैं खाली था तो बस ऐसे ही मिलने चला गया। अब मालूम नहीं कि मीडिया को कैसे महसूस हो गया कि वह अकेलापन महसूस कर रही हैं। शूटिंग में कोई व्यवधान नहीं पड़ा।
आप एक्टर हैं। दुनिया में तमाम किस्म के लोगों से मिलते हैं। आपका एक्सपोजर गजब का होता है। कई सारी चीजें आप यों ही सीख और जान लेते हैं?
एक्टर तो स्पंज की तरह होते हैं। सब कुछ देखना और समझना ही हमारा काम है। यह हमारे काम का हिस्सा है। अब जैसे कि इस इंटरव्यू के समय आपका दाहिना हाथ गाल के आसपास रहा है। आप सवाल पूछते समय ऊपर दायीं तरफ देखते हैं और जब मैं लंबा जवाब देता हूं तो आप रिकॉर्डर देखते हैं। यह मेरा निरीक्षण है। यही मेरा काम है। हो सकता है कि कल किसी किरदार को निभाते समय मैं आपकी इस आदत का इस्तेमाल कर लूं। गुरु के समय मैंने बॉडी लैंग्वेज और बोलने का लहजा वासु भगनानी की तरह रखा था।
आप राजनीतिक रूप से कितने जागरूक हैं?
मैं राजनीतिक रूप से जागरूक नहीं हूं और होना भी नहीं चाहता हूं। मैं राजनीति समझ नहीं पाता। देश की घटनाओं की चर्चा होती है, लेकिन जरूरी नहीं है कि उस पर राजनीतिक नजरिए से बात हो। मेरा अपना दृष्टिकोण है। मैं परिवार में बात करते समय उसे रखता हूं। मेरी ऐसी कोई हैसियत नहीं है कि मैं अपना दृष्टिकोण सार्वजनिक रूप से रखूं या उसकी बात करूं। मेरा वह काम नहीं है। मेरा काम है एक्टिंग करना।
आप एक्टिंग के साथ कुछ प्रोडक्ट के साथ भी जुड़े हैं। उनके ब्रांड एंबैसडर हैं?
यह एक्टिंग का ही विस्तार है। मैं वैसे ही प्रोडक्ट का ब्रांड एंबैस्डर बनना स्वीकार करता हूं, जिन में यकीन रखता हूं। मैं मोटोरोला मोबाइल इस्तेमाल करता हूं। मेरे ख्याल में दर्शकों तक पहुंचने और उनसे जुड़ने का यह भी एक जरिया है।
ओम शांति ओम में आप थोड़ी देर के लिए दिखे और अपना ही मजाक उड़ाते हैं? और सांवरिया कैसी लगी?
वह स्क्रिप्ट का हिस्सा था। फराह और शाहरुख दोस्त हैं हमारे। वे बहुत करीबी हैं। आप उन्हें ना नहीं कह सकते। मैं दोस्ती के लिए बहुत कुछ करता हूं। मुझे वह फिल्म पसंद आई।
सांवरिया भी मुझे अच्छी लगी। वह बिल्कुल अलग फिल्म है। दोनों अलग फिल्में हैं।
इन दोनों फिल्मों के एक ही दिन रिलीज होने से असहज स्थितियां बनीं। अगर कभी आपके साथ ऐसा हुआ तो आप का क्या स्टैंड होगा?
मैं कोशिश करूंगा कि ऐसी स्थिति न बने। अगर किसी भी तरह से टाला नहीं जा सके तो मैं दर्शकों की राय का इंतजार करूंगा।
लगभग सभी स्टार अपने होम प्रोडक्शन को तरजीह दे रहे हैं और उनकी फिल्में सफल भी रहती हैं। क्या आप इस दिशा में नहीं सोच रहे हैं?
अगर ऐसी बात है तो मैं इस दिशा में सोचूंगा। वैसे, मैं इसे नहीं मानता। क्योंकि फिल्में चलती हैं, एक्टर या प्रोडक्शन हाउस कोई भी हो।
कभी किसी से प्रतियोगिता महसूस करते हैं?
आज सबसे अच्छी बात यह है कि कोई प्रतिद्वंद्विता या प्रतियोगिता नहीं है। स्वस्थ प्रतियोगिता है। हम एक-दूसरे को इसके लिए प्रेरित करते हैं। फिल्म इंडस्ट्री बहुत प्यारी जगह है और हमारे रिश्ते परिवार की तरह हैं।
क्या आप इसके प्रति सचेत रहते हैं कि फिल्म क्या संदेश दे रही है?
अगर कोई फिल्म गलत संदेश दे रही है तो आप उसका हिस्सा नहीं हो सकते। अगर आप ऐसा करते हैं तो आप एक्टर के तौर पर जिम्मेदार नहीं हैं। आपको जानकारी होनी चाहिए। आप यह नहीं कह सकते कि कोई भी फिल्म कर लूंगा। वह चाहे जो भी संदेश दे। मैं ऐसी फिल्म का हिस्सा नहीं हो सकता जो समाज विरोधी संदेश दे रही हो। एक्टर के तौर पर तब मैं अपनी जिम्मेदारी से चूकूंगा।