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Friday, February 12, 2016

फिल्‍म समीक्षा : फितूर



सजावट सुंदर,बुनावट कमजोर
-अजय ब्रह्मात्‍मज
अभिषेक कपूर की फितूर चार्ल्‍स डिकेंस के एक सदी से पुराने उपन्‍यास ग्रेट एक्‍पेक्‍टेशंस का हिंदी फिल्‍मी रूपांतरण है। दुनिया भर में इस उपन्‍यास पर अनेक फिल्‍में बनी हैं। कहानी का सार हिंदी फिल्‍मों की अपनी कहानियों के मेल में है। एक अमीर लड़की,एक गरीब लड़का। बचपन में दोनों की मुलाकात। लड़की की अमीर हमदर्दी,लड़के की गरीब मोहब्‍बत। दोनों का बिछुड़ना। लड़की का अपनी दुनिया में रमना। लड़के की तड़प। और फिर मोहब्‍बत हासिल करने की कोशिश में दोनों की दीवानगी। समाज और दुनिया की पैदा की मुश्किलें। अभिषेक कपूर ने ऐसी कहानी को कश्‍मीर के बैकड्राप में रखा है। प्रमुख किरदारों में कट्रीना कैफ,आदित्‍य रॉय कपूर,तब्‍बू और राहुल भट्ट हैं। एक विशेष भूमिका में अजय देवगन भी हैं।
अभिषेक कपूर ने कश्‍मीर की खूबसूरत वादियों का भरपूर इस्‍तेमाल किया। उन्‍होंने इसे ज्‍यादातर कोहरे और नीम रोशनी में फिल्‍मांकित किया है। परिवेश के समान चरित्र भी अच्‍छी तरह प्रकाशित नहीं हैं। अभिषेक कपूर की रंग योजना में कश्‍मीर के चिनार के लाल रंग का प्रतीकात्‍मक उपयोग किया गया है। पतझड़ में कश्‍मीर के चिनार लाल हो जाते हैं। अभिषेक कपूर ने अपने किरदारों को चिनार के पत्‍तों का लाल रंग देने के साथ पतझड़ का मौसम भी दिया है। इस परिवेश और हालात में कोई भी खुश नहीं है। पूरी फिल्‍म में एक उदासी पसरी हुई है। यही वजह है कि खूबसूरत दिखने के बावजूद फिल्‍म में स्‍पंदन और सुगंध नहीं है।
अभिषेक कपूर ने फिरदौस की भूमिका कट्रीना कैफ को सौंप दी है। अपनी खूबसूरती और अपीयरेंस से वह नाच-गानों और चाल में तो भाती हैं,लेकिन जब संवाद अदायगी और भावों को व्‍यक्‍त करने की बात आती है तो वह हमेशा फिसल जाती हैं। उनकी मां हजरत की की भूमिका में तब्‍बू हैं। उनकी भाषा साफ है और भावों की अदायगी में आकर्षण है। हालांकि फिल्‍म में यह बताया जाता है कि वह बचपन में ही पढ़ाई के लिए लंदन चली गई थी,फिर भी लहते और अदायगी में कशिश तो होनी चाहिए थी। तबबू और कट्रीना कैफ के साथ के दृश्‍यों में यह फर्क और रूपष्‍ट हो जाता है। आदित्‍य रॉय कपूर नूर की भूमिका में ढलने की पूरी कोशिश करते हैं,लेकिन उनके व्‍यक्तित्‍व का शहरी मिजाज आड़े आता है। कश्‍मीरी सलाहियत नहीं है उनकी चाल-ढाल में। प्रचार किया गया था कि इस फिल्‍म के लिए वर्कशॉप किए गए थे। फिर ये कलाकार क्‍यों नहीं निखर पाए? नायक और नायिका दोनों निराश करते हैं।
दरअसल, यह फिल्‍म ठहरी झील में बंधे शिकारे की तरह प्रकृति का नयनाभिरामी रूप तो दिखाती है,लेकिन जीवन में गति और लय नहीं है। कश्‍मीर की राजनीति और स्थिति सिर्फ धमाकों से जाहिर होती है। ऐसा लगता है कि किरदारों के जीवन हालात से अप्रभावित हैं। फिल्‍म के एक डॉयर्लाग में कलाकार,समाज और राजनीति के संबंधों की बात कही भर जाती है। वास्‍तविकता में फिल्‍म उससे परहेज करती है। आतंकवादी के रूप में आए अजय देवगन अचानक गायब होते हैं और फिर नमदार होते हैं तो नूर की जिंदगी में उनकी भूमिका का इतना ही औचित्‍य समझ में आता है कि बानक नूर ने उन्‍हें कभी खाना खिलाया था।
अभिषेक कपूर ने कहानी आगे बढ़ाने में घटनाएं जोड़ने की पूरी आजादी ली है। वे उन्‍हें जोड़ने और कार्य-कारण संबंध बिठाने पर अधिक ध्‍यान नहीं देते। नतीजतन फिल्‍म बिखरी हुई लगती है। कथा के घागे उलझे हुए हैं और किरदारों के संबंध भी स्‍पष्‍ट नहीं हैं। श्रीनगर,दिल्‍ली,पाकिस्‍तान और लंदन के बीच ये चरित्र आते-जाते रहते हैं। उनके आवागमन पर भी सावधानी नहीं बरती गई है।
फिल्‍म के गीत-संगीत पर काफी मेहनत की गई है। वह बेहतरीन भी है। स्‍वानंद किरकिरे और अमित त्रिवेदी ने स्‍थानीय खूबियों को गीत-संगीत में तरजीह दी है।
अभिषेक कपूर की फितूर की सजावट आकर्षक और सुंदर है,लेकिन उसकी बनावट में कमी रह गई है। यह फिल्‍म आंखों को अच्‍छी लगती है। प्रोडक्‍शन बेहतरीन है।
अवधि- 132 मिनट
स्‍टार ढाई स्‍टार

Wednesday, January 20, 2016

हर जिंदगी में है प्रेम का फितूर - अभिेषेक कपूर

फितूर की कहानी चार्ल्‍स डिकेंस के उपन्यास ग्रेट एक्सपेक्टेशंस पर आधारित है। सोचें कि यह उपन्यास क्लासिक क्यों है? क्‍योंकि यह मानवीय भावनाओं से परिपूर्ण है। दुनिया में हर आदमी इमोशन के साथ जुड़ जाता है। जब दिल टूटता है तो आदमी अपना संतुलन खो बैठता है। अलग संसार में चला जाता है। पागल हो जाता है। मुझे लगा कि इस कहानी से दर्शक जुड़ जाएंगे। हम ने उपन्‍यास से सार लेकर उसे अपनी दुनिया में अपने तरीके से बनाया है। इस फिल्‍म में व्‍यक्तियों और हालात से बदलते उनके रिश्‍तों की कहानी है।

यह फिल्म केवल प्रेम कहानी नहीं है। यह कहानी प्यार के बारे में है। प्यार और दिल टूटने की भावनाएं बार-बार दोहराई जाती हैं। कोई भी इंसान ऐसे मुकामों से गुजरे है तो थोड़ा हिल जाए। आप किसी से प्यार करते हैं तो अपने अंदर किसी मासूम कोने में उसे जगह देते हो। वहां पर वह आकर आपको अंदर से तहस-नहस करने लगता है। वहां पर आपको बचाने के लिए कोई नहीं होता है। वह प्यार आपको इस कदर तोड़ देता है कि आपका खुद पर कंट्रोल नहीं रह जाता। यह दो सौ साल पहले हुआ और दो सौ साल बाद भी होगा । केवलसाल बदलते हैं। मानवीय आचरण नहीं बदलते हैं।

फितूर में कश्‍मीर
कश्मीर को हमने राजनीतिक बैकड्राप की तरह नहीं रखा है। ट्रेलर में जो डॉयलाग आता है,उसके अलावा फिल्म में कुछ राजनीतिक नहीं है। कश्मीर का इस्तेमाल हमने खूबसूरती के लिए किया है। कश्मीर के चिनार के पेड़ हर साल नवंबर में पतझड़ से पहले लाल हो जाते हैं। मेरे लिए उससे खूबसूरत कुछ नहीं है।
जब मैं बड़ा हो रहा था तो मैंने देखा कि फिल्‍मों में खूबसूरती के लिए कश्मीर का ही इस्तेमाल होता है। यह मेरी चाह थी कि मैं कश्मीर को अपनी फिल्म में दिखाऊं। हमने श्रीनगर के बाहर की शूटिंग नहीं की है। श्रीनगर में निशात बाग है और डल लेक भी है। इन दोनों लोकेशन के बीच फिल्म का फर्स्ट एक्ट है।

तकलीफ होती है कश्‍मीरियों को देख कर
कश्मीर भारत का हिस्सा जरूर है। वहां के लोग मुझे बहुत तकलीफ में नजर आए। वहां के लोग हर दिन संघर्ष करते हैं। यह मेरी निजी राय है। हम सब हमेशा कश्मीर की खूबसूरती की बात करते हैं। वहां पर हमेशा सेना तैनात रहती है। कितनी तकलीफ होती है। आपके घर के बाहर सेना की लाइन लगी हुई है। आपकी जांच होती रहती है। मैं समझता हूं कि सुरक्षा के लिहाज से यह जरूरी है। कुल मिलाकर तकलीफ कश्मीरी को ही हो रही है। देश एक हैं। केबल टीवी के जरिए वे देखते हैं कि बाकी देश और देशों में क्या हो रहा है। पूरे देश में फिल्में लगती हैं,लेकिन वहां थिएटर नहीं है। यह सब देख के मुझे बहुत दुख होता है।

फिल्‍म की कहानी
इंसान जब पैदा होता है तो वह खाली ब्लैकबोर्ड की तरह होता है। उसके अनुभव और आस पास का माहौल उसे शख्सियत देते हैं। कोई आदमी पैदा होते ही अच्छा या बुरा नहीं होता है। अनुभव उसे अच्छा या बुरा बनाते हैं। उनमें से ही एक अनुभव प्यार है। कुछ लोगों के प्यार का अनुभव अच्छा होता है,जो उन्हें और बेहतर इंसान बनाता है। अगर किसी इंसान का दिल टूटता है तो उसके व्यक्तित्व में खरोंच आ जाती है। उस खरोंच से इंसान निगेटिव बन जाता है। वह हर चीज में शक करने लगता है। प्यार की एनर्जी ही ऐसी है। सही चैनल से आए तो आपको कमाल का इंसान बना देती है। अगर उसने आपको गलत तरीके से टच कर लिया तो सब कुछ निगेटिव हो जाता है। यह निगेटिविटी संक्रामक होती है। फैलती है।

कट्रीना कैफ का चुनाव
फिल्म देखेंगे तो आपको लगेगा कि मेरा फैसला सही है। मैं उनके चुनाव के कारण नहीं देना चाहता। मेरे बताने से धारणा बदलने वाली नहीं है। यह तो देख कर ही हो सकता है। कुछ लोगों में अलग तरह की खूबी होती है। खासकर फिल्म में मेरे किरदार की है,जिसे कट्रीना निभा रही हैं। किरदार और कट्रीना की छवि में थोड़ी समानता है। यह जरूरी है कि हम एक्टरों को मौका दें। पहली बार वह भी अपने कम्फर्ट जोन से बाहर आई हैं। एक बार किसी को मौका देकर देखना चाहिए। वह कर सकता है या नहीं। यह पहले देखना चाहिए। मैंने देखा है कि कट्रीना के उच्चारण की आलोचना होती है,लेकिन एक्टर केवल अपने उच्चारण से नहीं जाना जाता है। एक्टर अपनी पूरी ऊर्जा के लिए पहचाना जाता है। मुझे उच्चारण इतना आवश्यक नहीं लगता है। एक हद के बाद भाषा भी महत्व नहीं रखती है। अगर आप के इमोशन सही हैं तो भाषा बाधक नहीं बनती है। आप जो महसूस कर रहे हैं,वह सही तरीके से दर्शकों तक पहुंचना जरूरी है। कट्रीना में वह काबिलियत है। इस फिल्म में वह अपनी आलोचनाओं को खत्म करती नजर आएंगी।

तब्‍बू का चुनाव
सच कहूं तो फिल्‍म लिखते समय सबसे पहले मेरे दिमाग में तब्बू ही थी। मैंने तब्बू को २०१३ में एक मैसेज भेजा था कि मैं एक कहानी पर काम कर रहा हूं। आप उस किरदार के लिए परफेक्ट हैं। एक आइडिया भेजा था। हमने एक दूसरे के कुछ मैसेज भी किए थे। फिर जैसे कहानी बनती गई। किरदार बनते गए। फिर रेखा जी आ गईं। मुझे तीन किरदारों के माहौल के लिए वह सही लगा। फिर से बदलाव हुआ और  अंत में तब्बू ही फिल्म कर रही हैं। वह तीन दिनों में मेरे पास आ गईं। वह सीधे सेट पर ही आ गई। मुझे उनके साथ तैयारी का मौका ही नहीं मिला। ऐसे किरदार के लिए एक्‍टर तीन महीने तैयारी में लगाते हैं। ऐसे किरदार परतें होती हैं। यह फिल्म मेरे लिए कठिन रही। यह फिल्म ज्‍यादातर बिटवीन द लाइन है। किरदारों को भी उसी तरह तैयार करना था।

आदित्य राय कपूर
उनमें मासूमियत है। उन्होंने ज्यादा काम नहीं किया है। उसका मजा ही कुछ और है। जब ऐसा कोई एक्टर आता है तो वह खुले दिमाग से आता है। वह किरदार में अलग-अलग तरीके से ढलने की कोशिश करता है। हम उसका हाथ पकड़ के बातचीत करते थे। खूब चर्चा करते थे। इस फिल्म से उसकी ग्रोथ होगी। उसे भी नया अनोखा अनुभव मिला है। यह आगे उसके काम आएगा। उसकी अंदरूनी मासूमियत मुझे सबसे खास लगती है।

लव स्‍टोरी बनाने की ख्‍वाहिश
मैंने कुल तीन फिल्में बनायी है। यह चौथी फिल्म है। मुझे हमेशा से था कि लव स्टोरी बनाऊंगा। लव स्टोरी में मुझे रॉमकॉम नहीं बनाना था। वह हल्की होती है। ऐसी कहानियों में मेरा पेट नहीं भरता। मैं अपनी फिल्मों में जान लगा देना चाहता हूं। ऐसा न लगे कि टेबल टेनिस बॉल के साथ फुटबाल खेल रहे हैं। मुझे फुटबाल खेलने का शौक है। मुझे चाहिए कि कहानी में जान हो, जिसे बनाने में संघर्ष करना पड़े। मैं हमेशा यादगार फिल्में बनाना चाहता हूं। मेरी कोशिश यही रहती है। यह फिल्म प्यार के संघर्ष की कहानी है। खासकर दिल टूटने की। यह कहानी १९८० से लेकर अब तक की है। हम फिल्म में फ्लैश बैक से वर्तमान में जाते हैं। थोड़ी एपिक की तरह दिखेगी।

सोच-समझ में ग्‍लोबल,फिल्‍में लोकल
भारत जैसा कोई देश नहीं है। हॉलीवुड सारी दुनिया को टेक ओवर कर चुका है। दुनिया में कही पर फिल्म इंडस्ट्री खड़ी नहीं हो पा रही,हर देश में हॉलीवुड अपनी जगह बना चुका है भारत के आलावा। भारत पर अभी हॉलीवुड का जादू नहीं चल रहा है। यहां पर स्टार वॉर जैसी फिल्में आती हैं। मगर दिलवाले और बाजीराव मस्तानी उसे टक्कर देती हैं। और जीत जाती हैं। यह इसलिए नहीं कि हमारी फिल्में बहुत कमाल की है। हमारे देशवासी ही ऐसे ही हैं। वे अपनी सभ्यता-संस्‍कृति देखने के लिए हिंदी फिल्मों का चुनाव करते हैं। इसमें ही वे बहुत खुश है। हमारी इंटरटेनमेंट इंडस्ट्री अपने बलबूते पर चल रही है। यह सब मजाक नहीं है। हमारी फिल्में समाज का आईना है। हम जैसी भी फिल्में परोसें,दर्शक अपने लिए कुछ ना कुछ निकाल ही लेते हैं। वे अपनी पसंद की फिल्में देखते हैं। राजकपूर और बिमल रॉय कमाल की फिल्में बनाते थे। उनमें कहानियां होती थी। भारतीयता होती थी। उन फिल्मों को बनाने में वक्त लगता था। साल में एक या दो फिल्में आती थीं। मैं भी भारतीय फिल्में ही बनाना चाहता हूं। मैं हॉलीवुड की फिल्में नहीं बनाना चाहता। मुझे वहां की सभ्यता ही नहीं पसंद है। 


फिल्‍म का संगीत
अमित त्रिवेदी ने संगीत दिया है। वह काइ पो छे में भी मेरे साथ थे। वह प्रतिभाशाली हैं। इस फिल्म का संगीत कहानी से ही निकला है। हमने अलग से नहीं सोचा था। हमने कोई स्टाइल के बारे में नहीं सोचा था। फिल्म तय करती है। हम तो गुलाम है। फिल्म ही बताती है कि कपड़े और खूबसूरती क्या होनी चाहिए। किरदार और संगीत कैसे होने चाहिए।



Monday, June 2, 2014

‘फितूर’ में साथ आएंगी रेखा और कट्रीना


-अजय ब्रह्मात्मज
    रेखा, कट्रीना कैफ और आदित्य राय कपूर ़ ़ ़ अभिषेक कपूर की आगामी फिल्म ‘फितूर’ के तीनों कलाकारों के इस संयोग का कमाल पर्दे पर अगले साल दिखेगा। स्वयं अभिषेक कपूर इस कमाल के प्रति उत्सुक और उत्साही हैं। ‘सच कहूं तो अपनी ड्रीम कास्टिंग के बावजूद मैं अभी नहीं बता सकता कि पर्दे पर तीनों का साथ आना कैसा जादू बिखेरेगा? मेरी फिल्म ‘फितूर’ आम हिंदी फिल्म नहीं है। सभी जानते हैं कि यह चाल्र्स डिकेंस के उपन्यास ‘ग्रेट एक्पेक्टेशंस’ पर आधारित है। लेकिन मेरी फिल्म मूल उपन्यास के पन्नों से निकल कर भारतीय माहौल में बनेगी तो किसी और रूप में नजर आएगी,’ कहते हैं अभिषेक कपूर।
    ‘फितूर’ में रेखा और कट्रीना कैफ का साथ आना  हिंदी फिल्मों की एक बड़ी घटना है। 1970 में ‘सावन भादो’ से शुरुआत कर अंतिम फिल्म ‘कृष 3’ 2014 तक के सफर में रेखा ने अपनी प्रतिभा की विविधता का परिचय दिया है। लंबे समय तक नायिका की भूमिका में विभिन्न किरदारों को जीने के बाद निजी जिंदगी में वह रहस्य की मूर्ति बन गई हैं। अन्य अभिनेत्रियों की तरह आए दिन उनकी खबरें नहीं छपतीं। वह दिखती भी नहीं हैं। कभी-कभार किसी समारोह में अपनी मौजूदगी भर से वह सभी का ध्यान खींच लेती हैं। कांजीवरम साडिय़ों में उनकी आकर्षक भाव-भंगिमाओं को देख कर लगता है कि उम्र भी उन्हें छूने से डरती है। इधर एक-दो अवार्ड समारोहों में उन्होंने जब नए लोकप्रिय सितारों के साथ ठुमके लगाए तो दर्शकों से ज्यादा वे सितारे ही पुलकित नजर आए। रेखा का रहस्य सम्मोहित करता है। उनके बारे में जिज्ञासु बनाता है।
    ‘फितूर’ के लिए अभिषेक कपूर ने जब रेखा से संपर्क साधा तो उन्हें अनुमान नहीं था कि रहस्यमयी रेखा खुले दिल से उनका स्वागत करेंगी। एक तो फिल्मों से बनी उनकी इमेज और दूसरे रहस्य में लिपटी उनकी निजी जिंदगी ़ ़ ़ अभिषेक कपूर बताते हैं, ‘रेखा जी से संपर्क करना अधिक मुश्किल नहीं था। वह तैयार हो गईं तो मैं स्क्रिप्ट सुनाने की तैयारियों में लग गया। चाल्र्स डिकेंस के उपन्यास ‘ग्रेट एक्सपेक्टेशंस ’ के बारे में वह जानती थीं। मेरी स्क्रिप्ट में मूल किरदार का नाम और परिवेश अलग है। स्क्रिप्ट सुनाते समय मुझे लगा कि वह मेरा पक्ष समझ रही हैं। वह अपने किरदार को समझ सकीं। मेरी कहानी के लिए वह सहज ही तैयार हो गईं। उन्हें कहानी सुनाना, उनके व्यक्तित्व को समझना और जानना मेरे लिए रोचक अनुभव रहा। उनके व्यक्तित्व में एक मिस्ट्री तो है ही, लेकिन जब वह हंसते हुए रिएक्ट करती हैं तो एहसास होता है कि गहरे रहस्य से पर्दा उठ रहा है। हम सभी उनकी फिल्में देखते हुए बड़े हुए हैं। फिल्मों के साथ उनका व्यक्तित्व कद्दावर हुआ है। मुझे पूरा यकीन है कि उनके साथ काम करने से मेरा स्तर बढेगा। मैं बतौर निर्देशक समृद्ध हो जाऊंगा।’
    रेखा की प्रतिभा असंदिग्ध है। यही बात कट्रीना कैफ के बारे में नहीं कही जा सकती। पिछले कुछ सालों में कट्रीना कैफ की लोकप्रियता बढ़ती गई है। वह समकालीन अभिनेत्रियों की अगली कतार में हैं। रणबीर कपूर के साथ उनके प्रेम संबंधों की चर्चा ने उन्हें इन दिनों सुर्खियों में बदल दिया है। इसके बावजूद क्या वह रेखा के साथ एक ही फ्रेम में उनके समकक्ष या समतुल्य अभिनय कर सकेंगी? लोकप्रियता के बावजूद बतौर अभिनेत्री कट्रीना ने अभी ऐसी कोई यादगार फिल्म नहीं की है। ‘फितूर’ के निर्देशक अभिषेक कपूर इन आशंकाओं को सिरे से खारिज कर देते हैं। वे अपना पक्ष रखते हैं, ‘किसी भी कलाकार को भांपना या आंकना उचित नहीं है। ‘रॉक आन’ में जब मैंने अर्जुन रामपाल को चुना था, तब भी ऐसे सवाल उठे थे। मुझे खुशी है कि ‘रॉक ऑन’ के लिए अर्जुन रामपाल को नेशनल अवार्ड मिला था। मुझे यकीन है कि ‘फितूर’ से कट्रीना की छवि बदल जाएगी। फिल्म डायरेक्टर का माध्यम है। डायरेक्टर और एक्टर के परस्पर सहयोग से किरदार गढ़ता और संवरता है। कट्रीना की स्क्रीन प्रेजेंस चमत्कारी है। दर्शक या पत्रकार हर कलाकार को एक व्यक्ति के रूप में देखते हैं। हम निर्देशकों के लिए कलाकारों का कांबीनेशन महत्वपूर्ण होता है। हम फिल्म में उनके लिए माहौल क्रिएट कर देते हैं। फिर उनकी एनर्जी का इक्वेशन काम करता है। उनके बीच की केमिस्ट्री वर्क करती है। हर फिल्म में कलाकारों के सम्मिलित प्रयास से ही कहानी उभरती है। इस बार मुझे रेखा और कट्रीना का साथ आना इंटरेस्टिंग लग रहा है। अब देखना है कि परफारमेंस किस रूप में निकल कर आता है और क्या जादू बिखेरता है? मुझे रेखा और कट्रीना में समर्पित कलाकार मिले हैं। मुझे अपनी स्टाइल में उन्हें पेश करना है।’
    ‘फितूर’ में रेखा बेगम साहिबा की भूमिका में हैं। कट्रीना कैफ फिल्म में फिरदौस के रूप में दिखेंगी तो नूर की के रोल में आदित्य राय कपूर नजर आएंगे। फिल्म का मूल कथ्य प्रेम है। प्रेम और उसके प्रभाव से तीनों किरदार प्रभावित होते हैं। यह फिल्म उन किरदारों की जर्नी में आए बदलावों का भी चित्रण करती है। कश्मीर की पृष्ठभूमि पर बन रही इस फिल्म की शूटिंग मुंबई, दिल्ली, कश्मीर और लंदन में होगी। अभिषेक कपूर की कोशिश है कि फिल्म में मौसम भी किरदार के रूप में नजर आए। शूटिंग पर जाने के पहले ‘फितूर’ के कलाकार रेखा, कट्रीना कैफ और आदित्य राय कपूर सम्मिलित रीडिंग और वर्कशॉप में शामिल होंगे। उनके इस वर्कशॉप का संचालन फिल्म के कास्टिंग डायरेक्टर मुकेश छाबड़ा करेंगे। अभिषेक कपूर वर्कशॉप का महत्व बताते हैं, ‘इस वर्कशॉप से कलाकार एक-दूसरे के अप्रोच और स्टाइल से परिचित होंगे। चूंकि तीनों पहली बार साथ आ रहे हैं, इसलिए इस वर्कशॉप से अपरिचय के रुखड़े किनारे चिकने हो जाएंगे। वे एक-दूसरे को नहीं चुभेंगे। वर्कशॉप कर लेने से शूटिंग में आसानी हो जाती है।’


Friday, February 22, 2013

फिल्‍म समीक्षा : काय पो छे

KPC_New POSTER_30x40_hindi.jpg-अजय ब्रह्मात्मज
गुजराती भाषा का 'काय पो छे' एक्सप्रेशन हिंदी इलाकों में प्रचलित 'वो काटा' का मानी रखता है। पतंगबाजी में दूसरे की पतंग काटने पर जोश में निकला यह एक्सप्रेशन जीत की खुशी जाहिर करता है।
'काय पो चे' तीन दोस्तों की कहानी है। तीनों की दोस्ती का यह आलम है कि वे सोई तकदीरों को जगाने और अंबर को झुकाने का जोश रखते हैं। उनकी दोस्ती के जज्बे को स्वानंद किरकिरे के शब्दों ने मुखर कर दिया है। रूठे ख्वाबों को मना लेने का उनका आत्मविश्वास फिल्म के दृश्यों में बार-बार झलकता है। हारी सी बाजी को भी वे अपनी हिम्मत से पलट देते हैं।
तीन दोस्तों की कहानी हिंदी फिल्मों में खूब पसंद की जा रही है। सभी इसका क्रेडिट फरहान अख्तर की फिल्म 'दिल चाहता है' को देते हैं। थोड़ा पीछे चलें तो 1981 की 'चश्मेबद्दूर' में भी तीन दोस्त मिलते हैं। सिद्धार्थ, ओमी और जय। 'काय पो चे' में भी एक ओमी है। हिंदी फिल्मों में रेफरेंस पाइंट खोजने निकलें तो आज की हर फिल्म के सूत्र किसी पुरानी फिल्म में मिल जाएंगे। बहरहाल, 'काय पो छे' चेतन भगत के बेस्ट सेलर 'द 3 मिस्टेक्स ऑफ माई लाइफ' पर आधारित है। साहित्यप्रेमी जानते हैं कि तमाम लोकप्रियता के बावजूद चेतन भगत के उपन्यासों को साहित्यिक महत्व का नहीं माना जाता। यह भी अध्ययन का विषय हो सकता है कि साधारण साहित्यिक और लोकप्रिय कृतियों पर रोचक, मनोरंजक और सार्थक फिल्में बनती रही हैं। गुलशन नंदा से लेकर चेतन भगत तक के उदाहरण साक्षात हैं। खोजने पर और भी मिल जाएंगे। ऐसी बेहतर फिल्मों पर लिखते समय यह खतरा रहता है कि कहीं साहित्य के फिल्म रुपांतरण का तिलिस्म न टूट जाए।
ईशान (सुशांत सिंह राजपूत), ओमी (अमित साध) और गोविंद (राज कुमार यादव) गहरे दोस्त हैं। एक-दूसरे के साथ समय बिताने और सपने देखते तीनों युवकों का समाज पारंपरिक और गैरउद्यमी है। इस समाज में पढ़ाई के बाद कुछ कर लेने का मतलब सिर्फ आजीविका के बेसिक साधन जुटा लेना होता है। तीनों देश में आए आर्थिक उदारीकरण के बाद के युवक हैं। उनके पास उद्यमी बनने के सपने हैं और वे खुद भी मेहनती और समझदार हैं। तीनों के साझा सपनों की पतंग का मांझा परिस्थितियों के कारण उलझता है। विवश और लाचार होने के बाद भी उनके जज्बे और जोश में कमी नहीं आती। उनके मतभेद और मनमुटाव क्षणिक हैं। प्रतिकूल परिस्थितियों में भी उनकी दोस्ती का धागा नहीं टूटता। तीनों मिलकर बिट्टू मामा की मदद से खेल के सामानों की दुकान खोलते हैं। ईशान क्रिकेटर है। वह क्रिकेट की कोचिंग भी देता है। उसकी नजर (दिग्विजय देशमुख) गोटीबाज अली हाशमी पर पड़ती है। अली को निखारने की कोशिश में वह उसके परिवार के करीब आता है। साथ काम करते हुए तीनों दोस्तों की प्राथमिकताएं बदलती हैं। राजनीति का भगवा उभार रेंगता हुआ उनकी दोस्ती में घुसता है। यहां हम देखते हैं कि गुजरात के गोधरा कांड की सतह के नीचे कैसी सच्चाइयां तैर रही थीं। भूकंप से कैसे सपनों में दरार पड़े और गोधरा कांड ने कैसे मानवता पर धर्माधों को हावी होने दिया।
इस फिल्म का अघोषित नायक अली हाशमी है। वह इन युवकों की संगत में पल्लवित होता है। वह खुद के लिए उनकी संजीदगी देखता है। लगन और प्रतिभा से वह देश की नेशनल क्रिकेट टीम में शामिल होता है। उसकी उपलब्धियों के सफर में तीनों दोस्तों का जोश भी है। अली हाशमी के बहाने हम सेक्युलर हिंदुस्तान को करीब से देखते हैं, जहां बंटवारे की भगवा कोशिशों के बावजूद कैसे एकजुटता से समान सपने साकार होते हैं। लेखक-निर्देशक ने अली हाशमी पर अधिक जोर नहीं दिया है। उन्हें तो तीनों युवकों की कहानी पेश करनी थी।
निस्संदेह अनय गोस्वामी के फिल्मांकन, हितेश सोनिक के पा‌र्श्व संगीत, दीपा भाटिया के संपादन के सहयोग से अभिषेक कपूर ने 'काय पो चे' जैसी उत्कृष्ट और मनोरंजक फिल्म पेश की है। स्वानंद किरकिरे के गीत और अमित त्रिवेदी का संगीत फिल्म की अंतर्धारा है। 'काय पो चे' गुजरात की पृष्ठभूमि में एक खास समय की ईमानदार कथा है, जब प्राकृतिक और राजनीतिक रूप से सब कुछ तहस-नहस हो रहा था। फिल्म का परिवेश और उसका फिल्मांकन स्वाभाविक है। कुछ भी लार्जर दैन लाइफ दिखाने या रचने की कोशिश नहीं की गई है।
मुकेश छाबड़ा की कास्टिंग और अभिषेक कपूर का निर्देशन उल्लेखनीय है। सभी किरदारों में उपयुक्त कलाकार चुने गए हैं। मुख्य कलाकारों के रूप में सुशांत सिंह राजपूत, अमित साध, राज कुमार यादव, अमृता पुरी और मानव कौल अपनी भूमिकाओं में रचे-बसे नजर आते हैं। सभी कलाकारों की अपनी विशेषताएं हैं, जो उनके चरित्र को प्रभावशाली और विश्वसनीय बनाती हैं। पहली फिल्म होने के बावजूद सुशांत सिंह राजपूत की सहजता आकर्षित करती है। अमित साध में एक ठहराव है। वे दृश्यों में रमते हैं और टिके रहते हैं। राज कुमार यादव ज्यादा सधे अभिनेता हैं। वे किरदार के सभी भावों को दृश्यों की मांग के मुताबिक व्यक्त करते हैं। प्रेम दृश्यों और गरबा डांस में उनकी घबराहट की भिन्नता देखते ही बनती है। दोस्तों से उनकी झल्लाहट और इरादों के प्रति उत्कट अभिलाषा का मूक प्रदर्शन भी उल्लेखनीय है। मानव कौल ने अभिनय कौशल से दिखाया है कि दुष्ट और खल चरित्र के लिए किसी प्रकार के मैनरिज्म या दिखावे की आवश्यकता नहीं है।
'काय पो छे' 2013 में आई उत्कृष्ट फिल्म है। यह मनोरंजक होने के साथ प्रेरक है। देश में करवट ले रही सदी के समय की प्रादेशिक सच्चाई होकर भी यह देश की युवाकांक्षा जाहिर करती है।
-चार स्टार