Search This Blog

Showing posts with label अनुराग कश्‍यप. Show all posts
Showing posts with label अनुराग कश्‍यप. Show all posts

Monday, July 25, 2016

भोजपुरी फिल्मों का होगा भाग्योदय - अमित कर्ण




अनुराग कश्‍यप की दस्तक से सिने तबके में उत्साह

अनुराग कश्य्प ने भोजपुरी फिल्म निर्माण में भी उतरने का ऐलान किया है। उनकी फिल्म का नाम ‘मुक्काबाज’ है। ऐसा पहली बार है, जब हिंदी की मुख्यधारा का नामी फिल्मकार भोजपुरी फिल्मों के निर्माण में कदम रखेगा। जाहिर तौर पर इससे भोजपुरी फिल्म जगत में उत्साह की लहर है। अनुराग कश्यप के आने से वे भोजपुरी फिल्मों के फलक में अप्रयाशित इजाफे की उम्मीद कर रहे हैं। खुद अनुराग कश्यप कहते हैं, ‘फिल्मों के राष्ट्री य पुरस्कार में भोजपुरी फिल्मों का नाम भी नहीं लिया जाता। सभी की शिकायत रही है कि भोजपुरी में स्तरीय फिल्म नहीं बन रही है। मैं अभी कोई दावा तो नहीं कर सकता, लेकिन मैं पूरे गर्व के साथ अपनी पहली भोजपुरी फिल्म बना रहा हूं।‘
 

अब बदलेगी छवि
भोजपुरी फिल्में आज तक अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज करने में नाकाम रहा है, जबकि मराठी, पंजाबी व अन्य प्रांत की भाषाओं में फिल्में लगातार विस्तार हासिल कर रही हैं। भोजपुरी जगत पर सस्ती, बिकाऊ, उत्तेजक, द्विअर्थी कंटेंट वाली फिल्में बनाने के आरोप लगते रहे हैं। यह लांछन भी सामाजिक सरोकार की फिल्में बनाने वालों को बाहर का रास्ता दिखा जाता है। इसके लिए निर्माता खस्ताहाल सिने सुविधाओं व कम खरीद क्षमता वाले दर्शकों को कसूरवार ठहराते रहे हैं।
लेकिन अब अनुराग के आने की खबर से सिने जगत खुश है। भोजपुरी फिल्मों के सुपरस्टार रवि किशन कहते हैं, ‘ हम लोग इसी चीज की तलाश में थे। अनुराग कश्यप बहुत बड़ा नाम है। यकीनन हमारे विस्तार में चार चांद लग जाएंगे। ‘मु्क्काबाज’ भोजपुरी सिनेमा का सैराट साबित हो सकता है। इन दिनों जिस किस्म की फिल्में बन रही हैं, उनमें तब्दीली आएगी। इसकी रिलीज में समस्या नहीं आएगी, जिससे आमतौर पर। देश भर ही नहीं विदेशों में भोजपुरी बहुल इलाकों में भी फिल्मों की रिलीज के द्वार खुलेंगे। भोजपुरी फिल्म जगत को गंभीरता से लिया जाएगा। उसकी छवि सुदृढ़ होगी। कथ्यफपरक सिनेमा बनाने वालों की हौसलाअफजाई होगी। सरकार का ध्यान सिने इंफ्रासट्रक्चर मुहैया कराने की ओर जाएगा। ‘
 

उम्‍दा फिल्‍मों को बल
युवा फिल्मकार नितिन नीरा चंद्रा ने पांच साल पहले भोजपुरी में कथ्यरपरक फिल्म ‘देसवा’ बनाई थी। वह फेस्टिवल सर्किट में खासी मशहूर रही, मगर भोजपुरी सिने वितरकों ने इसे भाव नहीं दिया ।अब नितिन नीरा चंद्रा अनुराग के ऐलान से उत्साह से भर गए हैं। वे कहते हैं, ‘ उनकी वजह से उम्दा फिल्मों को बल मिलेगा। प्रबुद्ध एवं समर्थ खरीद क्षमता वाला दर्शक वर्ग भी भोजपुरी फिल्मों को देखने घरों से बाहर निकलेगा। स्वाभाविक तौर पर थिएटर की डिमांड बढेगी और उसके हालात बेहतर हो जाएंगे। वह टर्निंग पॉइंट साबित होगा। एकल निर्माता ही नहीं कॉरपोरेट भी इसके निर्माण में रुचि दिखाने लगेंगे।‘
 

सब आएं साथ
दरअसल अब तक भोजपुरी का शिकार दर्शक वर्ग ही उसकी टारगेट ऑडिएंस है, जिसकी खरीद क्षमता कम है। उसके चलते निवेशक यहां मोटा निवेश करने से कतराते रहे हैं। साथ ही इस जगत को चर्चित करने के लिए नामी चेहरे यानी ब्रैंड एंबेसेडर की कमी रही है। अनुराग कश्य प व उन जैसे बड़े नाम उस चीज की कमी पूरी कर सकते हैं। जाहिर तौर पर निवेशक बेफिक्र होकर निवेश कर सकते हैं।
हालांकि इसके लिए सतत प्रयास की दरकार रहेगी। जैसा महिंद्रा एंड महिंद्रा के साथ मिलकर आठ साल पहले ‘हम बाहुबली’ बना चुके अनिल अजिताभ कहते हैं, ‘अनुराग जैसे नामी नाम आने से वितरकों का गठजोड़ ध्वतस्त हो सकेगा। मसाला फिल्मों के साथ-साथ कथ्यपरक फिल्में भी बनने लगेंगी। पर इस जगत पर दोयम दर्जे की फिल्मों की मोटी धूल की परत चढी हुई है। उसे उतारने के लिए एक नहीं, बल्कि अनुराग कश्यंप जैसे चार-पांच और फिल्मकारों की दरकार होगी। एकला चलो रे की नीति से काम नहीं होगा। वरना प्रयास निर्रथक हो सकते हैं।
 

बड़े निवेशक भी आएंगे
दिनेश लााल यादव निरहुआ भी अनुराग के फैसले से खुश हैं। ‘ वे बेहतरीन फिल्मकार हैं। ऊपर से हैं भी यूपी से। वे भोजपुरी फिल्मों को ब्रैंड बना सकते हैं। जो चीजें अब तक नहीं हुई हैं, वे हो सकती हैं। बड़े निवेशक भी आएंगे। महिंद्रा एंड महिंद्रा व उन जैसे निवेशक ‘हम बाहुबली’ के बाद इसलिए कंटीन्यू नहीं रहे, क्योंकि उनका फोकस महज बिजनेस पर था। इमोशन से उनका कोई वास्ता नहीं था। प्रियंका चोपड़ा के बैनर की फिल्म में मैं हीरो था। उसे खासी सराहना मिली है। वे आगे और भी फिल्में प्रोड्यूस कर रही हैं। अब अनुराग के आने से हमारी ताकत और बढ़ेगी।
निर्देशक राजकुमार पांडे भोजपुरी की 35 हिट फिल्में बना चुके हैं। वे बताते हैं, ‘ हम अनुराग का स्वा्गत करते हैं। हालांकि उनसे पहले दिलीप कुमार व जीपी सिप्पी साहब ने भी भोजपुरी फिल्में प्रोड्यूस की थी। कुछ कॉरपोरेट घराने भी उतरे थे, मगर आज कोई नहीं हैं। वैसे रवैये के चलते हमारा मार्केट भी खराब हुआ था। मेरी गुजारिश बस इतनी है कि भोजपुरी फिल्म जगत दुधारू गाय के तौर पर इस्तेामाल न हो। बाकी अनुराग कश्यप आएं। लगातार अच्छी फिल्में बनाएं। उन जैसों का आना इस बात का सूचक है कि भोजपुरी फिल्में अप्रत्याशित विस्ता‍र की राह पर हैं।

Thursday, May 26, 2016

उदासियों के वो पांच दिन- विक्‍की कोशल



-अमित कर्ण

विक्की कौशल नवोदित कलाकार हैं। उन्होंने अब तक दो फिल्में ‘मसान’ व ‘जुबान’ की हैं। दोनों दुनिया के प्रतिष्ठित फिल्म फेस्टिवल की शान रही है। ‘मसान’ के बाद अब उनकी ‘रमन राघव 2.0’ भी कान फिल्म फेस्टिवल में चयनित हुई है।
- कभी ऐसा ख्‍याल आता है कि क्यों ने फ्रांस में बस जाऊं।
नहीं ऐसे विचार मन में कभी नहीं आते हैं। वहां गया या बसा भी तो कुछ दिनों बाद ही मुझे घर की दाल चाहिए होगी, जो वहां तो मिलने से रही। हां, वहां की आबोहवा मुझे पसंद है। उसमें रचनात्‍मकता घुली हुई है। लगता है वहां के लोग पैदाइशी रचनात्‍मक होते हैं। कान में पिछली बार ‘मसान’ के लिए जब नाम की घोषणा हुई तो लगा कि कदम जमीं पर नहीं हैं। दोनों के बीच कुछ पनीली सी चीज है, जिस पर तैरता हुआ मैं मंच तक जा रहा हूं। वह पल व माहौल सपना सा लगने लगा था। सिनेमा को बतौर क्राफ्ट वहां बड़ी गंभीरता से लिया जाता है। वहां सिने प्रेमियों को एक मुकम्मल व प्रतिस्पर्धी सिने माहौल दिया जाता है।
-वहां फिल्मों की प्रीमियर के बाद क्या कुछ होता है। विश्‍वसिनेमा के विविधभाषी फिल्मकार कैसे संवाद स्‍थापित करते हैं।
प्रीमियर बाद की पार्टियों में खाने की मेज देश या सिनेमा विशेष के आधार पर आरक्षित नहीं किया जाता। उस मेज पर कोई भी आ-जा, बैठ सकता है। मेरी कोशिश उन दिग्‍गज सिने प्रतिभाओं से तकनीक से ज्यादा मानवीय खूबी-खामी का निरीक्षण और आत्‍मसात करने की होती है। मिसाल के तौर पर पिछली बार मुझे उस जलसे में ‘यूथ’ के माइकल केन व हार्वे कीटल मिले। दोनों विश्‍वस्‍तरीय कलाकार हैं। उस फिल्म की स्‍क्रीनिंग वहां स्थित दुनिया के सबसे बड़े ल्‍यूमिए थिएटर में हुई थी। मैं ठहरा माइकल केन का बहुत बड़ा फैन। उनके वीडियो देख-देखकर अदाकारी के गुर सीखे हैं। उनसे मिल सादगी का पाठ पढ़ने को मिला। बातचीत में उन्होंने बताया कि उनकी पत्‍नी भी भारतीय ही है। एक तो वे पूरी विनम्रता से मिले। उनके संग तस्‍वीर का आग्रह किया तो कैमरा उन्होंने अपनी पत्‍नी के हाथों में थमाया। हमसे पूछा कि आप किस पोज में तस्‍वीर लेना पसंद करेंगे। मैं दंग रह गया कि इतना बड़ा स्‍टार और इतनी सरलता। ठीक ‘पाकर भी क्या पा लोगे’ सा मिजाज।
-और किस्‍सागोई के स्‍तर पर क्या कुछ सीखने को मिला।
यही कि दर्शक फिल्मों से अचंभित होने को तैयार बैठे हैं। आप वैसी कहानियां तो लेकर आएं। इसके चलते स्‍टार के साथ-साथ नवोदित कलाकारों की मांग में भी खासा इजाफा हुआ है। कहानी किंग व किंग मेकर बनने की राह पर है। ‘यूथ’ दो बुजुर्ग दोस्‍तों की कहानी है, जो ताउम्र रोजी-रोटी की भाग-दौड़ पूरी कर चुके हैं। आगे वे क्या-क्या गुल खिलाते हैं, कहानी उस बारे में थी। मतलब यह कि वहां के फिल्मकार दर्शकों को इंप्रेस करने के चक्कर में नहीं रहते। वे खुद को एक्प्रेस करते हैं। अधिसंख्‍य दर्शकों की पसंद का ख्‍याल रखा ही जाए, वैसा वे नहीं करते। कला के जरिए उन्हें क्या जाहिर करना है, वे बस उसकी फिक्र करते हैं। तभी वहां चौंकाने वाला सिनेमा बनता है।
-ऐसा तभी हो पाता है, जब वहां के दर्शक ज्‍यादा सिने जागरूक हैं।
ऐसा नहीं है। हमारे दर्शक भी काफी समझदार हैं। फर्क कल्चर से आता है। यहां ‘मसान’ का अलग रूप दिखाया गया, वहां अलग। दरअसल वहां के लोग अपनी भावनाओं को जल्दी जाहिर नहीं करते। उस पर उनका नियंत्रण होता है। हमारे यहां तो लोग ताक में रहते हैं कि कहां मौका मिले कि भावनाओं में बह जाएं। वह खुशी हो, रुलाई हो या गुस्‍सा । सब में अतिरेक है। वे लोग बड़े सोबर हैं। तभी हमारी फिल्मों के मेलोड्रामे उन्हें अजीब लगते हैं। वे सिनेमा में परम सत्य ढूंढते हैं। हम मनोरंजन। यह फर्क है।
-‘रमन राघव 2.0’ को अनसर्टेन रिगार्ड की जगह डायरेक्टर्स फोर्टनाइट में क्यों भेजा गया है।
कान में यह कै‍टेगरी आठ-दस साल पहले शुरू हुई है। यह प्रतिस्‍पर्धी श्रेणी नहीं है, पर इसमें आई फिल्मों पर दुनिया भर के वितरकों की नजर रहती है। ऑस्‍कर अवार्ड में भी विदेशी भाषाओं की फिल्मों के लिए भी ऐसी श्रेणी शुरू की गई है। इस श्रेणी में मिलने वाली फिल्मों को विदेशी खरीदार बहुत मिल जाते हैं। 
-फिल्म में राघव के रूप में किस किस्‍म के इंस्‍पेक्टर का रोल प्‍ले कर रहे हैं। टाइटिल में ‘2.0’ का क्या तात्‍पर्य यह है।
रमन के बारे में तो सब जानते ही हैं कि वह सायको किलर था। 1960 से लेकर 1969 तक उस इंसान ने 41 मर्डर किए थे। फुटपॉथ पर सोए लोगों को बेवजह मार चला जाता था। उसकी कहानी पर अनुराग कश्‍यप ने एक अलग स्‍टैंड लिया है। मैं राघव बना हूं। रमन के साथ दिमागी नूराकुश्‍ती में ऊंट किस करवट लेता है, ‘रमन राघव 2.0’ उस बारे में है। राघव भी सरल-सपाट नहीं है। अतीत में उसकी निजी जिंदगी में खासी दिक्कतें रही हैं। उनके अंदर क्षोभ और निराशा का लावा सुलग रहा है, पर वह अपनी भड़ास किसी पर डायरेक्टली नहीं निकाल सकता। ऐसे में वह सनकी सा बन चुका है। कहीं सुकून भी मिलता है तो उसे बेचैनी होने लगती है। अपनी प्रेमिका से प्‍यार भरी कम, तंज भरी बातें ज्यादा करता है, मगर उससे बहुत प्यार करता है। उसकी प्रेमिका भी इस बात से वाकिफ है। वह जानती है कि राघव अपना असली चेहरा, अपनी भड़ास उसके पास ही जाहिर कर सकता है। ऐसे में राघव की भड़ास को भी वह प्‍यार से लेती है। 
-उसे आत्मसात कैसे किया ।
उसका सफर ऑडिशन से शुरू हो गया। चूंकि असल जिंदगी में मैं राघव जैसों से मिला नहीं और मेरे पास उसके ज्यादा रेफ्रेंस नहीं थे। मैंने बैग पैक किया और मड आयलैंड स्थित अपने दूसरे घर अकेले चला गया। लोखंडवाला स्थित घर पर अपने परिजनों को बोल दिया कि मैं अगले पांच दिन किसी के संपर्क में नहीं रहने वाला। लिहाजा चिंता न करें। मैंने पांच दिन खुद को न्‍यूनतम सुविधाओं के साथ कैद कर लिया। न फोन था। न टीवी। लोगों के संपर्क में भी नहीं रहा। चारों तरफ निराशा व तन्हाई का माहौल क्रिएट कर लिया। संवाद के लिए अनुराग कश्‍यप सर से मिले दो पन्नों की स्क्रिप्‍ट थी। उस पर ही लगातार चिंतन-मनन करता रहा। दो दिनों में ही भावनात्मक तौर पर मुझ में तब्दीली आने लगी। चौथे दिन तक राघव की मानसिकता से काफी हद तक मैं अवगत हो गया। पांचवें दिन आते-आते तो लगा कि दिमाग ही ब्लास्‍ट कर जाएगा। उस दिन मेरा ऑडिशन था। मैं मड आयलैंड से सीधे वहीं पहुंचा। फिर बीते पांच दिनों से मेरे भीतर उपजे मनोभावों ने ऑडिशन में जादू किया। मैं इस रोल के लिए चुन लिया गया।
-अमित कर्ण 



Thursday, May 14, 2015

फिल्‍म समीक्षा : बॉम्‍बे वेल्‍वेट

-अजय ब्रह्मात्‍मज
स्टार : 4.5
हिंदी सिनेमा में इधर विषय और प्रस्तुति में काफी प्रयोग हो रहे हैं। पिछले हफ्ते आई ‘पीकू’ दर्शकों को एक बंगाली परिवार में लेकर गई, जहां पिता-पुत्री के बीच शौच और कब्जियत की बातों के बीच ही जिंदगी और डेवलपमेंट से संबंधित कुछ मारक बातें आ जाती हैं। फिल्म रोजमर्रा जिंदगी की मुश्किलों में ही हंसने के प्रसंग खोज लेती है। इस हफ्ते अनुराग कश्यप की ‘बॉम्बे वेल्वेट’ हिंदी सिनेमा के दूसरे आयाम को छूती है। अनुराग कश्यप समाज के पॉलिटिकल बैकड्राप में डार्क विषयों को चुनते हैं। ‘पांच’ से ‘बॉम्बे वेल्वेट’ तक के सफर में अनुराग ने बॉम्बे के किरदारों और घटनाओं को बार-बार अपनी फिल्मों का विषय बनाया है। वे इन फिल्मों में बॉम्बे को एक्स प्लोर करते रहे हैं। ‘बॉम्बे वेल्वेेट’ छठे दशक के बॉम्बे की कहानी है। वह आज की मुंबई से अलग और खास थी।

अनुराग की ‘बॉम्बे वेल्वेट’ 1949 में आरंभ होती है। आजादी मिल चुकी है। देश का बंटवारा हो चुका है। मुल्तान और सियालकोट से चिम्मंन और बलराज आगे-पीछे मुंबई पहुंचते हैं। चिम्मन बताता भी है कि दिल्ली जाने वाली ट्रेन में लोग कट रहे थे, इसलिए वह बॉम्बे की ट्रेन में चढ़ गया। बलराज अपनी मां के साथ पहुंचता है। ऐसी मां, जिसने उसे पाला था और जो बाद में उसे छोड़ कर चली जाती है। चिम्मसन और बलराज पोर्ट सिटी बॉम्बे में कुछ हासिल करने का ख्वाब देखते हैं। बलराज का जल्दी से ‘बिग शॉट’ बनना है। उसकी ख्वााहिश को खंबाटा भांप लेता है। खंबाटा को बलराज की आक्रामकता और पौरूष भाता है। वह चंद मुलाकातों में ही स्पष्ट कर देता है कि वह बलराज का इस्तेमाल करेगा। बलराज इसके लिए तैयार है, लेकिन वह अपना हिस्सा चाहता है। उसे इस्तेमाल होने में ऐतराज नहीं है। उसे तो जल्दी से जल्दीे अपना बलराज टावर देखना है। बलराज की ख्वाहिशों में खंबाटा की साजिशों के मिलने से ड्रामा क्रिएट होता है। इस ड्रामें में रोजी, जिम्मी मिस्त्री और मेहता शामिल होते हैं। फ्रंट में चल रही इस कहानी के पीछे एक बड़ी कहानी चल रही होती है, जिसमें गटर में समा रहे बॉम्बे का भविष्य तय किया जा रहा है। पॉलिटिशियन,गैंगस्टर,अखबारों के एडिटर और अन्य कई कैरेक्टर अपनी भूमिकाएं निभा रहे हैं। ‘बॉबे वेल्वेट’ एक साथ बलराज और रोजी की प्रेमकहानी और मुंबई शहर के विकास की कहानी भी है। मिल मजदूरों के कब्रिस्तान पर चमकती क्वीन नेकलेस की यह दास्तान महानगर के परतों में उतरती तो है, लेकिन वहां रुकती नहीं है। अनुराग बार-बार देश की राजनीति और बॉम्बे में चल रहे विकास के कुचक्र की ओर इशारा करते हैं। वे संवादों में ही घटनाओं और प्रसंगों को समेट देते हैं। फिल्म के लेखक, निर्देशक और किरदार राजनीति से बचते हुए निकल जाते हैं। इस परहेज की यही वजह हो सकती है कि भारत में फिल्में राजनीतिक होते ही मुश्किलों में फंस जाती हैं। इस परहेज के बावजूद ‘बॉम्बे वेल्वेट’ पांचवें और छठे दशक की सामाजिक और राजनीतिक घटनाओं का उल्लेेख जरूर करती है। हम उन घटनाओं के प्रभाव भी देखते हैं।

अनुराग कश्यप की सोच और निर्देशन की खूबियों का हम ‘बॉम्बे वेल्वेन’ में कई स्तरों पर देखते हैं। इस पैमाने पर हिंदी में कम फिल्में बनी हैं। ‘बॉम्बे वेन्ल्वेट’ में पांचवें और छठे दशक का बॉम्बेे है। प्रोडक्शन डिजायनर सोनल सावंत और कॉस्ट्यूम डिजायनर निहारिका खान ने उस काल को वास्तु, वेशभूषा और लुक के जरिए उतारा है। उन्होंने आज के कलाकरों को उस काल के किरदारों में ढाल दिया है। फिल्म देखते समय यह एहसास नहीं रहता कि हम 2015 के कलाकारों को 1969 के किरदारों में देख रहे हैं। रणबीर कपूर ने स्वयं कहा है कि उन्होंने किशोर कुमार, राज कपूर और रॉबर्ट डिनेरो से प्रेरणा ली है। लुक में वे कहीं से भी प्रेरित हो सकते हैं, लेकिन मिजाज में वे इस फिल्म के ग्रे किरदार ही हैं। पुराने बॉम्बे के क्रिएशन में उस समय की इमारतों और सवारियों का प्रमुखता से उपयोग किया गया है। दीवारों के साथ दिखते इश्तहारों और पृष्ठभूमि में चलते-फिरते लोगों के भी मेकअप और गेटअप पर ध्यान दिया गया है। पीरियड रचने में यह फिल्म पूरी तरह से सफल रही है। शुरू होते ही फिल्म दर्शकों को उस कालखंड में लेकर चली जाती है।

 ‘बॉबे वेल्वेट’ के कलाकरों के चयन की तारीफ करनी होगी। पहले तो छोटे-मोटे किरदारों में भी सटीक कास्टिंग का श्रेय कास्टिंग डायरेक्टर मुकेश छाबड़ा को मिलना चाहिए। उन्होंने खयाल रखा है कि वे स्वााभाविक और फिल्म की संगत में दिखें। प्रमुख कलाकारों में पहले विवान शाह और मनीष चौधरी की बात करें तो उन्होंने सीमित दृश्यों में भी प्रभावित किया है। खास कर मनीष चौधरी लुक और बॉडी लैंग्वेज से किरदार को सही रूप देते हैं। अनुष्का शर्मा ने सिंगर रोजी के किरदार को उसकी खूबियों और विवशताओं के साथ चित्रित किया है। जवानी में भी बचपन के दुखद अनुभवों से खिन्न रोजी को जब इलाज का बेइंतहा प्यार मिलता है तो वह भी मोहब्बत में पैशन दिखाती है। नाटकीय और रोमांटिक दृश्यों में उनकी संयमित इंटेनसिटी किरदार को प्रभावशाली बनाती है। रोजी जैज सिंगर है। फिल्म में गानों के दृश्य में अनुष्का को माइक के सामने लक-दक कॉस्ट़्यूम में खड़े होकर गीतों के भाव को चेहरे पर लाना था। ज्यादा मूवमेंट की गुंजाइश नहीं थी। धड़ाम, सेल्विया और नाक पर गुस्सा गानों में वह एक ही पोजीशन में होते हुए भी एक्स प्रेशन में सफल रही हैं। बलराज की भूमिका में रणबीर कपूर उद्घाटन हैं। अभी तक उनका यह रूप सामने नहीं आया था। उन्होंने बलराज के गुस्से,ख्वाहिश और बिग शॉट बनने की तमन्ना को पूरे आत्मविश्वावस से प्रकट किया है। गुस्से में लहराते हुए लंबे डग लेकर चलते हुए जब वे सामने वाले को घूंसा मारते हैं तो नाराजगी की तीव्रता जाहिर होती है। ‘बॉम्बे वेल्वेट’ के सरप्राइज हैं करण जौहर। उन्होंने धूर्त और नापाक इरादों के हैवान इंसान खंबाटा के किरदार को ठंडे तरीके से पेश किया है। उनकी आंखें, भौं और होंठों की टेढ़ी मुस्कान खंबाटा को साक्षात खड़ी कर देती है।

अनुराग कश्यप की ‘बॉबे वेल्वेट’ हिंदी की बेहतरीन फिल्मों में शुमार होगी। इस फिल्म में उन्होंने क्रिएटिव ऊंचाई हासिल की है। वे हिंदी सिनेमा को नए लेवल पर ले गए हैं। निश्चित ही उनकी अगुआई में इस फिल्म की रिसर्च, लेखन और टेक्नीकल टीम ने उल्ले खनीय काम किया है।
अवधि-148 मिनट

बॉम्‍बे वेल्‍वेट : यों रची गई मुंबई


-अजय ब्रह्मात्‍मज 
  पीरियड फिल्मों में सेट और कॉस्ट्यूम का बहुत महत्व होता है। ‘बॉम्बे वेल्वेट’ में इनकी जिम्मेदारी सोनल सावंत और निहारिका खान की थी। दोनों ने अपने क्षेत्रों का गहन रिसर्च किया। स्क्रिप्ट को ध्यान में रखकर सारी चीजें तैयार की गईं। पीरियड फिल्मों में इस पर भी ध्यान दिया जाता है कि परिवेश और वेशभूषा किरदारों पर हावी न हो जाएं। फिल्म देखते समय अगर यह फील न हो कि आप कुछ खास डिजाइन या बैकग्राउंड को देख रहे हैं तो वह बेहतर माना जाता है। अनुराग कश्यप ने ‘ब्लैक फ्राइडे’ और ‘गुलाल’ में भी पीरियड पर ध्यान दिया था, पर दोनों ही फिल्में निकट अतीत की थीं। ‘बॉम्बे वेल्वेट’ में उन्हें  पांचवें और छठे दशक की मुंबई दिखानी थी। सड़क और इमारतों के साथ इंटीरियर, पहनावा, गीत-संगीत, भाषा पर भी बारीकी से ध्यान देना था।
    निहारिका खान की टीम में आठ सदस्य थे। उन्होंने रेफरेंस के लिए आर्काइव, लायब्रेरी, वेबसाइट, पुरानी पत्र-पत्रिकाएं और परिचितों के घरों के प्रायवेट अलबम का सहारा लिया। रोजी, खंबाटा, जॉनी बलराज और जिमी मिस्त्री जैसे मुख्य किरदारों के साथ ही चिमन, पुलिस अधिकारी, ड्रायवर, पटेल,टोनी और अन्य छोटे-बड़े किरदारों की वेशभूषा पर भी ध्यान देना था। बहुत जरूरी था कि पृष्ठभूमि में दिख रहे किरदार भी पीरियड के अनुकूल रहें। ‘बॉम्बे वेलवेट’ में छठे-सातवें दशक की मुंबई के किरदारों में पारसी, मराठी, एंग्लो-इंडियन, पंजाबी आदि थे। उन दिनों की स्टाइल में पश्चिम का असर आज से ज्यादा था। क्लब में संभ्रांत भारतीय ही जा सकते थे। अंग्रेज तो चले गए थे, लेकिन मुंबई का आभिजात्य समूह अंग्रेजियत ढो रहा था।  ‘बॉम्बे वेल्वेट’ में बहुत खूबसूरती से निहारिका खान ने इस प्रवृत्ति को पिरोया है। उन्हें किरदारों को उस पीरियड के पहनावे और लुक दिए। उन किरदारों की जर्नी और सिचुएशन के मुताबिक उनके पहनावों में भी तब्दीली आती गई।
    ‘बॉम्बे वेल्वेट’ की प्रोडक्शन डिजायनर सोनल सावंत हैं। उन्होंने ‘लक्ष्य’ से अपने करियर की शुरुआत की थी। अनुराग कश्यप ने आरंभ में ही स्क्रिप्ट देने के बाद उनसे फीडबैक मांगा था। अनुराग ने सोनल को बताया था कि उन्हें 1942 से लेकर छठे दशक तक की मुंबई क्रिएट करनी है। फिल्म की कहानी मुख्य रूप से 1960 से लेकर 69 के बीच घूमती है। सोनल के लिए ‘बॉम्बे वेल्वेट’ चैलेंजिंग फिल्म रही। अच्छी बात थी कि प्रोडक्शन और डायरेक्टर की तरफ से उन पर पाबंदी नहीं रखी गई थी। पीरियड फिल्मों में बजट का अनुमान लगाना या खर्च की सीमा तय करना मुश्किल काम होता है। सोनल बताती हैं, ‘मेरे लिए प्राथमिक तौर पर किरदारों की रूपरेखा अहमियत रखती है। उनके जरिए ही माहौल और उनकी दुनिया रचती हूं।’
    सभी जानते हैं कि ‘बॉम्बे वेल्वेट’ के लिए श्रीलंका में छठे दशक की मुंबई का सेट तैयार किया गया था। देश के अनेक हिस्सों की छानबीन के बाद भी लोकेशन तय नहीं हो पा रहा था। मुंबई के तत्कालीन इमारतों का धोखा देना भी दूसरे शहरों में नामुमकिन था। फिल्म के इंटीरियर सीन तो कहीं भी शूट हो सकते थे, लेकिन एक्सटीरियर के लिए इमारतों का वजूद जरूरी था। सोनल सावंत ने श्रीलंका की सलाह दी। श्रीलंका में उपलब्ध सुविधाओं को देखते हुए सह निर्माता विवेक अग्रवाल ने हामी भरी। कोलंबो से छह घंटे की दूरी पर मुंबई का पूरा सेट तैयार किया गया। प्रमुख इमारतों के साथ विंटेज कार, बस, ट्राम और अन्य सवारियां तैयार की गईं। सबसे मुश्किल काम था पुरानी मुंबई को बसाना। शूटिंग की सुविधा के लिए इमारतों का वास्तविक क्रम नहीं रखा गया, लेकिन उनका ढांचा वही रहा।
    सोनल सावंत ने बॉम्बे वेल्वेट कैफे का बाहरी ढांचा मुंबई के चर्चगेट पर स्थित इरोस सिनेमा की तरह रखा। उसके अंदर का इंटीरियर क्लब का है। सोनल बताती हैं, ‘इस क्लब में ही फिल्म का अधिकांश हिस्सा है, इसलिए उसके अंदर हमने विस्तार से सब कुछ तैयार किया। कोशिश यह रही कि सब कुछ वास्तविक लगे। पांचवें-छठे दशक के प्रचलित जैज क्लब के लिए प्रायवेट अलबम से रेफरेंस लिए गए। तब ताज होटल में भी एक जैज क्लब चलता था। श्रीलंका में तैयार किए गए सेट की पृष्ठभूमि में शूटिंग करने के बाद वीएफएक्स से बड़ा और विस्तृत किया गया। उनमें जरूरत के मुताबिक रंग भरे गए।’
    ‘बॉम्बे वेल्वेट’ देखते समय पांचवें-छठे दशक की मुंबई की याद आएगी। हिंदी फिल्मों के शौकीन पुराने दर्शकों को छठे दशक के देव आनंद की क्राइम थ्रिलर फिल्मों का स्मरण होगा। हिंदी फिल्मों में मुंबई की पृष्ठभूमि पर आधारित पीरियड फिल्में कम बनती हैं। ज्यादातर फिल्मों में फिल्म के निर्माण के समय की मुंबई दिखती रही है। निर्देशक शहर और किरदारों की वास्तविकता में गहराई से नहीं उतरे हैं। ‘बॉम्बे वेल्वेट’ एक कोशिश है, जिसमें पांचवें-छठे दशक की मुंबई अपने किरदारों के साथ चलती-फिरती नजर आएगी। निहारिका खान और सोनल सावंत के मैसिव योगदान से यह मुंबई रची गई है।
    सोनल सावंत और निहारिका खान के योगदान को रेखांकित करते हुए अनुराग आगे बताते हैं, ‘इस फिल्म में विजुअल रेफरेंस के लिए हमने रोसिलिनी की फिल्म ‘इंडिया मातृभुमि’ के साथ फिल्म्स डिवीजन की अनेक फिल्मों का सहारा लिया। बहुत सारे घरों में जाकर हमने उनसे पुराने अलबम मांगे। उनके आधार पर ही कैरेक्टर और लोकेशन तय रचे गए। सोनल और निहारिका ने किरदारों और परिवेश को साकार कर दिया। उन्होंने आज के कलाकारों को दशकों पुराने रंग-ढंग में ढाल दिया।’

Saturday, May 9, 2015

प्रशंसकों को थैंक्यू बोल कर आगे बढ़ना पड़ता है-अनुराग कश्यप


-अजय ब्रह्मात्‍मज

- बाॅम्बे वेलवेट के पूरे वेंचर को आप कैसे देख पा रहे हैं?
इस फिल्म के जरिए हम जिस किस्म की दुनिया व बांबे क्रिएट करना चाहते थे, उसमें हम सफल रहे हैं। फैंटम समेत मुझ से जुड़े सभी लोगों के लिए यह बहुत बड़ी पिक्चर है। इस फिल्म के जरिए हमारा मकसद दर्शकों को छठे दशक के मुंबई में ले जाना है। लोगों को लगे कि वे उस माहौल में जी रहे हैं। लिहाजा उस किस्म का माहौल बनाने में काफी मशक्कत करनी पड़ी है।
-इस तरह की फिल्म हिंदी में रही नहीं है। जैसा बाॅम्बे आपने फिल्म में क्रिएट किया है, उसका कोई रेफरेंस प्वॉइंट भी नहीं रहा है..?
बिल्कुल सही। हम लोगों को शब्दों में नहीं समझा सकते कि फिल्म में किस तरह की दुनिया क्रिएट की गई है। पता चले हम लोगों को कुछ अच्छी चीज बताना चाहते हैं, लोग उनका कुछ और मतलब निकाल लें। बेहतर यही है कि लोग ट्रेलर और फिल्म देख खुद महसूस करें कि हमने क्या गढ़ा है? बेसिकली यह एक लव स्टोरी है...
-... पर शुरू में आप का आइडिया तीन फिल्में बनाने का था?
वह अभी भी है। यह बनकर निकल जाए तो बाकी दो पाइपलाइन में हैं। इत्तफाकन तीनों कहानियों में कॉमन फैक्टर  शहर बाम्बे और एकाध कैरेक्टर हैं।
-यह बाॅम्बे का फोक लोर तो नहीं है?
यह उन कहानियों का संग्रह है, जो मुंबई की जमीन तले दबी पड़ी हैं। जिनके बारे में लोग छिप-छिपाकर बातें करते हैं। उन कहानियों को पुराने अखबारों,किताबों और लोगों की यादों से खंगाला। यानी फिल्म में आप को ढेर सारे तथ्यात्मक रेफरेंस मिल जाएंगे। मैंने इसे बनाने का सपना नौ साल पहले देखा था। हिम्मत नहीं जुट रही थी कि इस पर कब काम शुरू करूं। इसे बनाना था.. वह बस तय था। इतने साल कहानी को बचाता रहा कि कहीं जल्दबाजी में आकर कहानी व्यर्थ न  कर दूं।
-शुरू में ऐसी खबरें भी थी कि शायद कोई और इसे बनाने वाला है? किसी और स्टार की भी बात थी?
मैंने सोच रखा था कि पहले खुद को स्थापित नाम बना लूं, फिर इस फिल्म को बनाने की पहल करूंगा। एक ने सलाह दी कि ऐसी फिल्म बनाने से पहले अपनी जगह बनाओ ताकि किसी पर डिपेंड न रहो। उसके बाद किसी स्टार को लो तो बजट और वैल्यू बढ़ जाती है। तो मैं इतने साल तक अपनी जगह बनाने में लगा रहा। मेरी सोच शुरू से स्पष्ट थी। इस फिल्म से पूरा माहौल बड़ा लगे। तभी मैं हर कदम फूंक-फूंक कर रख रहा था। स्केल इसलिए बड़ा हो ताकि लोग उस पर विश्वास कर सकें। सबसे पहले इसमें अनुष्का आई। उनकी ‘बैंड बाजा बारात’ देखने के बाद उन्हें इस फिल्म में रखने के लिए सोचा। उनसे उसकी रिलीज के बाद ही बात की और उन्होंने हां कह दी। रणबीर कपूर बाद में आए। करण जौहर और बाद में आए। केके मेनन आए। हां, मनीष चौधरी भी शुरुआती चरण में आ गए थे। फिर अमित त्रिवेदी आए।
-करण को लेकर भी चर्चाएं थी कि फिल्म में शायद उनका कैमियो ही है?
कतई नहीं। कायजाद खंबाटा के अवतार में उनका जोरदार कैरेक्टर है..
-वह कैरेक्टर काफी अहम है। फिर उसमें करण जौहर को क्यों लिया, क्योंकि उनका नाम अदाकार के तौर पर तो अब तक नहीं ही लिया जाता रहा है?
उनमें एक एक्टर तो है। उस एक्टर पर करण जौहर की शख्सियत इतनी हावी हो चुकी है कि लोगों को वे नॉन-एक्टर जैसे लगते हैं। वैसा आभामंडल ‘कॉफी विद करण’ होस्ट करने के चलते बन गया। हमें उन चीजों से दूर हटना था। करण भी उस किरदार के संग न्याय करने के लिए सब कुछ करने को तैयार थे। उन्होंने बाल-वाल कटवाए। पूरी बॉडी लैंग्वेज तब्दील की। उन्हें एल्कोहलिक भी दिखना था, जबकि उनमें कोई ऐब है ही नहीं। बहरहाल हम उन्हें कैमरे के सामने बिठाकर अकेले छोड़ देते थे।
-इस ड्रीम प्रोजेक्ट में कौन-कौन क्रिएटिव कंट्रीब्यूटर हैं?
राजीव रवि हमारे कैमरामैन, सोनल सावंत आर्ट डायरेक्टर, निहारिका भसीन हमारी कॉस्ट्यूम डिजाइनर सबसे बड़े कंट्रीब्यूटर हैं। और अमित त्रिवेदी भी। उन्होंने इसके म्यूजिक पर चार साल लगाए हैं। उन्होंने लाइव म्यूजिक कंपोज किया है। उन्होंने प्राग जाकर वहां लाइव बैंड के साथ संगीत तैयार किया। सब कुछ प्री-रिकॉर्डेड है। एक-एक गाने की रिकॉर्डिंग में 10-15 दिन लगे हैं। बाकी तो ज्ञान प्रकाश, विकास बहल और तन्वी तीनों इस प्रोजेक्ट के साथ शुरू से हैं। कूछ लोग आते रहे, जाते रहे। हां, फैंटम के बनने के बाद इस प्रोजेक्ट को खड़ा करने में काफी मदद मिली। उसके बाद हिम्मत हुई कि यह फिल्म बनाई जा सकती है। रणबीर को लाने में सबसे बड़ा हाथ विकास बहल का है। उनके जरिए रणबीर को स्क्रिप्ट भेजी गई। सौभाग्य से उन्हें स्क्रिप्ट अच्छी लगी और उन्होंने हामी भरी। उसके बाद हम इसे खड़ा करने में लग गए। फिल्म की शूटिंग श्रीलंका में करने का फैसला सबसे सही रहा। वह डिसीजन हमारे क्रिएटिव प्रोड्यूसर विकास अग्रवाल ने किया। मैं तो पूरी दुनिया घूम आया था मुंबई क्रिएट करने की खातिर, जो मुझे मिला नहीं। सेट बनाने से लेकर बाकी खर्चों को मिलाकर मेरा बजट छह साल पहले 160 करोड़ रुपए से ऊपर जा रहा था। फिर विकास के कहने पर हम श्रीलंका आए। यहां की सरकार और कंपनियों ने हमारी काफी मदद की। उनके मदद के बिना इस सपने को साकार करने की गुंजाइश ही नहीं थी।
-... और एक्टर की च्वॉइसेज?
वह तो मैंने हमेशा से कैरेक्टर के हिसाब से रखी है। कौन किरदार विशेष को ज्यादा सूट करता है, उसे मैं अपनी फिल्म में लेता हूं। इस फिल्म के संदर्भ में आप के दोनों मेन लीड नामी स्टार हैं तो बाकी की क्या जरूरत है?
- एक सवाल उन लोगों का भी, जो अनुराग के इस शिफ्ट को अपने तरीकों से डिफाइन कर रहे हैं? वे आज भी आप में पुराना अनुराग ही ढूंढते हैं?
उनकी वैसी आकांक्षाएं ‘बाम्बे वेलवेट’ पूरी कर ही रहा है। यह फिल्म वैसी ही बनी है, जैसी बननी चाहिए थी। स्टार के आने के चलते यह फिल्म नहीं बनी है। साथ ही इस फिल्म से कथित स्टार का परसेप्शन भी बदलेगा। पिक्चर तो वही है, जो नौ साल पहले हमने सोची थी। उसमें उसी किस्म का रियलिज्म है, जैसा नौ साल पहले हमने सोचा था। मैं स्टार के साथ काम कर रहा हूं, उसका यह मतलब कतई नहीं है कि मैं जिन फिल्मों को नकारता रहा हूं, उन्हीं के संग गलबहियां करने लगा हूं। हमारे सामने मार्टिन स्कौरसिसी का उदाहरण है। वे भी स्टार के साथ भी फिल्म बनाते हैं, पर बनाते वही हैं, जो वे बनाना चाहते हैं। तभी स्टार भी उनके पास जाते हैं कि वे मार्टिन स्कौरसिसी के मिजाज की फिल्मों में काम कर सकें। मैं स्टार के साथ इसलिए जुड़ा, क्योंकि ‘बाम्बे वेलवेट’ जैसी लार्ज स्केल की फिल्मों को बल मिल पाता है। साथ ही रणबीर सिर्फ स्टार नहीं हैं, उनमें एक्टर भी है। फिल्म हमने वैसी ही बनाई है, जैसा हम बनाना चाहते थे। बस इसका कमर्शियल पोटेंशियल ज्यादा है, पर वह है उसी जोन की। मैं तो बहुत पहले भी कह चुका हूं कि इंसान का सबसे बड़ा दुश्मन उसके खुद के फैन होते हैं। वे आप को ब्रैकेट कर देते हैं। मेरे गुलाल के फैन चाहते हैं कि में हमेशा गुलाल बनाता रहूं। देव डी के चाहने वालों की चाहत रहती है कि मैं सदा देव डी जैसी  फिल्मेंबनाता फिरूं। पता चला कि वे आपसे तब तक वही काम कराते रहें, जब तक कि सेम मिजाज की फिल्मों से वे चिढ़ न जाएं। लिहाजा मेरा मानना है कि आप अपने प्रशंसकों को थैंक्यू बोलें और आगे बढ़ें। गंैग्स ऑफ वासेपुर के फैन चाहते हैं कि मैं सदा वही बनाता रहूं। मैं कहता हूं कि वह जितनी बननी थी, बन गई। वैसी और बनानी है आप राइट्स ले लो। बनाओ न।
-अब सिनेरियो कितना अच्छा हुआ है?
बहुत बढ़िया हो चुका है। सभी तरह के डायरेक्टर खुद को पुश कर रहे हैं। इम्तियाज अली ‘हाईवे’ बना रहे हैं। अनुराग बासु ने ‘बर्फी’ बना दी। एक कंड्युसिव माहौल बन रहा है। हर कोई बढ़िया और बड़ा काम कर पा रहे हैं। खासकर वे जिनका मार्केट पोटेंशियल अच्छा नहीं है, वे भी। मिसाल के तौर पर अभिषेक कपूर। ‘रॉक ऑन’ दे चुके शख्स ने ‘काय पो छे’ बना दी। अब उनके ‘फितूर’ में बड़ा इंवेस्टमेंट हुआ है। मुझे बड़ी खुशी होती है, यह सब देखकर। नए लोगों के लिए भी अपार मौके हैं। रजत कपूर ‘आंखोदेखी’ जैसी फिल्म बना रहे हैं। हिंदी सिनेमा बहुत बड़े बदलाव से गुजर रहा है। हमारी ‘क्वीन’ आई है। वह बहुत अच्छी है। ‘रिवॉल्वर रानी’ भी अच्छी थी। साईं कबीर में मुझे कमाल की प्रतिभा महसूस हुई।



Saturday, May 2, 2015

बाम्‍बे वेलवेट,अनुराग और युवा फिल्‍मकारों पर वासन बाला


अनुराग तो वह चिंगारी हैं,जो राख में भी सुलगते रहते हैं। मौका मिलते ही वे सुलगते और लहकते हैं। उनकी क्रिएटिविटी की धाह सभी महसूस करते हें। 15 मई को उनकी नई फिल्‍म बाम्‍बे वेलवेट  रिलीज होगी। हम यहां उनके सहयात्री और सपनों के साथी वासन बाला का इंटरव्‍यू दे रहे हैं। 

-कहा जा रहा है कि अनुराग कश्‍यप जिनके खिलाफ थे,उनसे ही उन्‍होंने हाथ मिला लिया है। अनुराग के विकास और प्रसार को लेकर अनेक धारणाएं चल रही हैं। स्‍वयं अनुराग ने चंद इंटरव्‍यू में अपनी ही बातों के विपरीत बातें कीं। आप क्‍या कहेंगे ?
0 अनुराग कश्‍यप का कहना था कि जिनके पास संसाधन हैं,वे कंटेंट को चैलेंज नहीं कर रहे हैं। अनुराग संसाधन मिलने पर उस कंटेट को चैलेंज कर रहे हैं। बाम्‍बे वेलवेट का माहौल,कंटेंट,कैरेक्‍टर और पॉलिटिक्‍स देखने के बाद आप मानोगे कि वे जो पहले बोल रहे थे,अब उन्‍हीं पर अमल कर रहे हैं।  उन्‍हें संसाधन मिले हैं तो वे उसका सदुपयोग कर रहे हैं। हमलोंग हमेशा कहते रहे हैं कि कमर्शियल सिनेमा में दिखावे के लिए फिजूलखर्ची होती है। किसी गृहिणी का आठ लाख की साड़ी पहनाने का क्‍या मतलब है ? वे इन चीजों के खिलाफ थे। कुछ लोग कहने के लिए बेताब हैं,लेकिन उनके पास पैसे नहीं हैं। जिन्‍हें पैसे मिल रहे हैं,उनके पास कंटेंट नहीं है। वे कहानी के बजाए जीवनशैली दिखा रहे हैं। बाम्‍बे वेलवेट में कॉस्‍ट्यूम और सेट पर किया गया खर्च वाजिब और जरूरी है। पुराने बाम्‍बे को रीक्रिएट किया गया है। कहानी की जरूरत के लोकेशन उपलब्‍ध नहीं हैं। बाम्‍बे वेलवेट में कंटेंट की सघनता और तीव्रता वही रहेगी। अनुराग ने ने चार करोड़ में अगर आप को उत्‍तेजित किया है तो उम्‍मीद कर सकते हैं कि 100 करोड़ में क्‍या होगा ? वे क्‍या-क्‍या करेंगे। अगर इसी स्‍केल पर कोई और बाम्‍बे वेलवेट बना रहा होता तो कम से कम 200 करोड़ खर्च होते। वेकअप सिड जैसी फिल्‍म 120 दिनों में शूट हुई थी। यह 80 दिनों में पूरी हो गई। अनुराग को संयम में तेजी से काम करने की आदत है। दिक्‍कते वैसी ही हैं। बस,वे बड़ी हो गई हैं। वे अभी तक डटे हुए हैं। हमारी भी उनसे बहसें चलती ाहती हैं। मैं एक ही बात कह सकता हूं कि उनका बेस नहीं हिला हुआ है। यह भी हो सकता है कि बॉबे वेलवेट के बाद वे फिर से कोई सरप्राइज दें।
-बाम्‍बे वलवेट को आप कैसे देख रहे हो ? आप भी तो इनवॉल्‍व रहे हो ?
0 नो स्‍मोकिंग के बाद ही इस फिल्‍म का विचार आया था।  हमलोगों की टीम जुट गई थी। फिर उन्‍होंने कहा कि देव डी के बाद बनाता हूं। फिर ...येलो बूट्स आ गईत्र उसके बाद गैंग्‍स ऑफ वासेपूर में तीन साल लग गए। हम ने तो उम्‍मीद छोड़ दी थी। इस देरी से फायदा हुआ। गैंग्‍स ऑफ वासेपुर हिट होने की वजह से उन्‍हें बजट,स्‍टार और सपोर्ट मिला। उल्‍हें ताकत मिली। वे स्क्रिप्‍ट में उड़ान भर सके। देरी से बढ़ रही निराशा अब मूल्‍यवान हो गई है। जिस कास्टिंग,एनर्जी और एमपॉवरमेंट के साथ वे अभी बॉबे वेलवेट बना पाए,वैसी तब नहीं बना पाते। इस बीच उन्‍होंने खुद को तैयार भी किया है इस स्‍केल की फिल्‍म का हैंडल करने के लिए। फिल्‍म के सेट पर लग रहा था कि अनुराग हमेशा ऐसी फिल्‍में बनाते रहे होंगे। मैं भी समझ नहीं पा रहा था। अनुराग ने कभी सेट-वेट पर शूट नहीं की थी। सीमित बजट में मुश्किलों में काम करने की आदत रही है। पहले थिएटर के एक्‍टरों के साथ काम किया है। पहली बार स्‍टार के साक काम करेंगे तो उनके र्धर्य का क्‍या स्‍तर रहेगा ? अनुराग की शूटिंग ब्रूटल होती रही है। वे किसी को नहीं बख्‍शते। मुझे उनके जोश में फर्क नहीं दिखा। वही एनर्जी,वही दीवानगी,वही अप्रोच रहा। वे नए माहौल में पूरी टीम के साथ ढल गए।
-क्‍या विशेषताएं होंगी फिल्‍म की ?
0 सोनल सावंत आर्ट डायरेक्‍टर हैं। उन्‍होंने इतना अच्‍छा काम किया है। रियल लोकेशन की कमी महसूस नहीं हुई। आप कहीं भी कैमरा घुमा लो। मैं तो देख कर दंग रह गया था। एक किस्‍सा बताता हूं। एक सीन था,जिसमें कुछ होना था और उसके बैकग्राउंड में एक ट्रेन गुजरनी थी। ट्रेन पीरियड की थी। सीन के समय अनुराग ने कहा कि ट्रेन को पोजीशन पर लेकर आओ। फिर खुद ही चौंके कि इतनी बड़ी फिल्‍म बना रहे हैं कि ट्रेन को पोजीशन पर लाने के लिए कह रहे हें। पहले शेड्यूल में स्‍वयं अनुराग भी खुद को चकित पाते रहे। सभी ने अपनी क्षमता से अधिक काम किया है। फिल्‍म का सुर सभी की समझ में आ गया था। परफारमेंस से लेकर सभी क्षेत्रों में निखार आ गया। अनुराग के साथ काम करने वालों को पहले दिक्‍कत होती हैं वे सब कुछ क्‍यों कर रहे हैं ? कुछ दिनों के बा तरीका समझ में आ जाता है तो पता चलता है कि तिनी आजादी मिली हुई
है। आप सब कुछ बता सकते हो। क्रिएटिवली जुड़ सकते हो। अनुराग के सेट पर कोई भ कठपुतली नहीं रहता।
-पहले की टीम और बाम्‍बे वेलवेट की टीम के नेचर और काम करने के तरीके में क्‍या फर्क आया है ?
0  हमलोगों के समय गदहमजूरी ज्‍यादा थी। अभी की टीम समझदार है। वे ट्रेंड हैं। वे जब वॉी-टॉकी पर बात करते हैं तो उनकी लैंग्‍वज अलग होती है। पहले आर्ट और कास्‍ट्यूम को कोई छिवीजन नहीं होता था और न ही कोई इंचार्ज होता था। हम आर्ट और कॉस्‍टृयम के साथ फर्श की सफाई भी कर लेते थे।  राजीव सर लाइट भी पकड़वा लेते थे। कोई डिवीजन नहीं था। अभी सभी के काम बंटे हुए हैं। उससे फायदा होता है। टीम में अनोंसेंस वही रहती है। अनुराग के चुनाव में फर्क नहीं आया है। दूसरे स्‍कूल से आए एडी को इनके साथ एडजस्‍ट करने में समय लगता है। दूसरे डायरेक्‍टर के कॉल शीट में शॅट छिवीजन भी लिखे होते हैंत्र अनुराग के यहां केवल सीन होते हैं। सेट पर पता चलता है कि क्‍या शॉट लेना है ? हमारे समय में किसी को कोई भी काम कहा जा सकता था। अभी रिले रेस है। मुझे लगा था कि ऐसे व्‍यवस्थित तरीके से काम नहीं हो सकेगा। अभी सबकी ट्यूलनंग हो गई है। अनुराग बताने से ज्‍यादा इसमें यकीन रखते हैं कि एडी खुद ही बताए और समझे। कई लोग परेशान रहते हैं कि अनुराग कुछ बताते क्‍यों नहीं ? अनुराग बहुत अनुभवी लोगों को साथ नहीं जोड़ते। सब हमारी तरह ही आते हैं। यहां तो नदी में कूछ जाओ। तैरना आ ही जाएगा।
-बाम्‍बे वेलवेट की मुख्‍य बात क्‍या है ?
0 बाम्‍बे जैसी सिटी भारी कंट्रास्‍ट के साथ डेवलप होती है। उसका एक बाहरी वेलकमिंग चेहरा होता है। ऐसा लगता है कि इस मेट्रोपोलिस में हमें जगह बनाने के अवसर मिलें,लेकिन जैसे ही आप आते हो तो एक ट्रैप में फंस जाते हो। वह या तो आप को खा जाएगी या थूक देगी। उसी तरह की यह एक खास समय की कहानी है,जब रीक्‍लेमेशन हो रहा था। सारी दुनिया में ऐसा होता आया है। न्‍यू यॉर्क समेत सारे समुद्रतटीय शहरों का विकास ऐसे ही हुआ है। ऐसे समय में मिले अवसरों को जो पहले से समझ पाते हैं,वे उसका दोहन करते हैं। बॉबे वेलवेट में भी एक लड़का आता है,जो ड्रीम करता है। वह वक्‍त से पहले ड्रीम करता है। उसकी वजह से उसे क्‍या-क्‍या झेलना पड़ता है ? रिसर्च करने पर तो जबरदस्‍त जानकारियां मिलीं। फिर हम ने तय किया कि इतिहास दिखाने-पढ़ाने की जिम्‍मेदारी हम नहीं लेंगे। पहले ड्राफ्ट में तो हम ने महाभारत लिख दी थी। बाद में हम ने उसे बहसों से उबाल कर गाढ़ा किया। संक्षेप में सारी बातें कह दीं। अनुराग की पुरानी फिलमों की तरह इसे भी दोबारा-तिबारा देखने का अलग मजा होगा। मैं तो कहूंगा कि बाम्‍बे वेलवेट की मेकिंग गुलाल जैसी ही है,लेकिन स्‍केल बड़ा है। अनुराग के प्रशंसक खुश होंगे। उन्‍हें अच्‍छी ट्रीट मिलेगी।
-इस बार दांव बड़ा है। अनुराग को लेकर आशंकाएं बड़ी हैं।
0 फिल्‍म की सफलता-असफलता तो अपनी जगह है,लेकिन जो लोग मान रहे हैं कि अनुराग बिक गए,वह गलत है। पफल्‍म देखने पर आप पाएंगे कि वही जिदी और विद्रोही अनुराग यहां भी है। मैं सेंकेंड यूनिट देख रहा हूं। मैं मुंबई से हूं,इसलिए मेरी जिम्‍मेदारी ज्‍यादा थी। रणबीर कपूर के खास बंबईया ल‍हजे के लिए भी मैं ही था। और अगर आप अनुराग के साथ काम कर चुके हों तो उनके सेट पर आने के बाद कोई न कोई काम निकल ही आता है। मैं मुख्‍य रूप से सेकेंड यूनिट औा डायलॉग देख रहा हूं।
- आप की फिल्‍म की क्‍या पोजीशन है ?
0 इरोस ने खरीद ली थी। वे रिलीज नहीं कर रहे हैं। मेरी समझ में आ गया है कि ऐसी फिल्‍मों की रिलीज मुश्किल है। वह फील गुड सिनेमा नहीं है। वे समझ नहीं पर रहे हैं कि क्‍या करें ? हमारेद पास पैसे नहीं हैं कि हम खरीद लें। अभी सफल इंडी फिल्‍में भी फीलगुड ही हो गई हैं। हो सकता है किसी दिन दिखाई पड़ जाए। फिल‍हाल दो-तीन स्क्रिप्‍ट लिख रखी है। अभी कोई पूछता है तो यही कहता हूं कि यूए फिल्‍म लिख रहा हूं। नहीं तो सैटेलाइट बेचने में दिक्‍कत आ जाती है।  अभी लिखने के पहले ही बंध जाते हैं,फिर भी कहते हैं कि हम आजाद हैं। पहली फिल्‍म बन जाने के बाद उम्‍मीदें बढ़ जाती हैं और दबाव भी उसी अनुपात में बढ़ जाते हैं। आज की तारीख में कोई भी फिल्‍म बना सकता है। थोड़ा गुडविल बकट्ठा कर लो। चार लोगों को फोन करो। पैसे मिल जाएंगे। सस्‍ती तकनीक उपलब्‍ध है। आप फिल्‍म बना लेंगे। मसला फिल्‍म को रिलीज करने का है। अब नए डायरेक्‍टर को प्रोड्यूसर की तरह भी सोचना होगा। अब यह सिर्फ क्राफ्ट और आर्ट नहीं रह गया। एक समय के बाद आप को बिजनेसमैन भी बनना होगा। दोहरी जिम्‍मेदारी हो गई है। अभी आप जिद नहीं कर सकते कि हम इस फिल्‍म को ऐसे ही बनाएंगे। थोड़ा रियलिस्टिक होना पड़ता है। रिकवरी देखनी पड़ेगी। यह अनिवार्यता हमेशा से थी और आगे भी रहेगी। अनुराग को ही देखें कि उन्‍होंने अपनी सारी फिल्‍में रेस्‍पांसबल बजट में बनाई हैं। हम भी वैसी कोशिश कर रहे हैं।
-क्‍या ऐसा लगता है कि अगले दस साल में सिनेमा का सीनेरियो चेंज हुआ है ?
0 चेंज तो होना ही था। कुछ लोगों का लगता है कि है कि यह इंटेलेक्‍चुअल रिवोल्‍यूशन है,लेकिन ऐसा नहीं है। अभी मुझे यह टेक्‍नोलोजी ड्रिवेन रिवोल्‍यूशन लग रहा है। जो स्‍वर सुनाई पड़ रहे हैं,वे बौद्धि रूप से संपन्‍न नहीं हैं। उन्‍हें तकनीक मिल गई है। कुछ सालों में इसमें बदलाव आ जाएगा। फिल्‍टर हो जाएगा सब कुछ। ऐसी भी स्थिति आ सकती है कि चार फिल्‍मों की जरूरत होगी और हम बीस फिल्‍में लेकर तैयार होंगे। जल्‍दी ही सैचुरेशन होगा। दूसरी फिल्‍म बना रहे डायरेक्‍टर सचेत होंगे और पहली फिल्‍म बना रहे निर्देशकों को पहले हा तौर-तरीके समझाए जाएंगे। बड़े बैी फिल्‍मों को सपोर्ट करते रहेंगे तो माइंडसेट में चेंज आएगा।
-अगर मैं गेमचेंजर के बारे में पूछूं तो आप किन के नाम लेंगे ? मैं हमेयाा मानता और  दलील देता रहा हूं कि हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री में आउटसाइडर ही नई एनर्जी और इनर्शिया ले आत हैं। हिंदी फिल्‍मों में छोटे शहरों या महानगरों के छोटे मोहल्‍लों से आए आउटसाइडर ही कंट्रीब्‍यूट कर रहे हैं। कंफ्यूजन तब होता ळै,जब आउटसाइडर इनसाइडर की तरह बिहेव करने लगते हैं या बोलने लगते हें। अभी अनुराग कश्‍यप को लेकर ऐसी बातें कही जा रही हैं।
0 आप की आउटसाइडर थ्‍योरी से मैं पूरी तरह सहमत हूं। आउटसाइडर बिना कंडीशनिंग के आता है। अनजान होने से वह निडर रहता है। दूसरी-तीसरी फिल्‍म के समय तक समझ में आ जाता है कि फिल्‍में आर्थिक आधारों से निर्देशित होती हैं। यही कारण है कि प्‍योरिस्‍ट सरवाइव नहीं कर पातेत्र कमल स्‍वरूप एक फिल्‍म के बाद दूसरी नहीं बना पा रहे हैं। हमलोग अनुराग से कहते और पूछते थे कि आप क्‍यों निर्माता की हां में हां मिलाते हो। वे कहते थें कि फिल्‍म तो हमें बनानी है। इतना तो आप मान ही सकते हैं अनुराग समेत हमलोग कभी भी पैसे लेकर बूम नहीं बनाएंगे। फिल्‍ममेकिंग के दोनों पहलुओं को समझने के बाद ही गेम चेंज होगा। आप क्राफ्ट साधने में जिंदगी बिता देते हैं। आद में पता चलता है कि इकॉनोमिक्‍स का चैप्‍टर आप ने पढ़ा ही नहीं था,जबकि 80 प्रतिशत अंक उसी के हैं। गंमचेंजर में मैं आनंद गांधी का नाम ले सकता हूं। रितेश बत्रा हैं। गेमचेंजर में मैं पहला नाम रामगोपाल वर्मा का लूंगा। आप देखेंगे कि उनके बाद एक्टिव सारे गेमचंजर कभी न कभी रामगोपाल वर्मा सं जुड़े रहे हैं। अनुराग अपने मेंटोरशिप को सीरियसली नहीं लेते। उनके साथ के लोगों को खुद ही मेहनत करनी होगी। अनुराग के यहां डेमोक्रेसी है। इसी डेमोक्रेसी में उनकी जाती है।
-हर बदलाव में व्‍यक्ति की भूमिका रहती है। उसके साथ ही पूरा माहौल बनता है और फिर कई स्‍तरों पर बदलाव दिखता है। हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री की बात करें तो आप क्‍या देख पा रहे हैं ?
0 तकनीकी बदलाव तो दिख ही रहा है। इसके अलावा गुनीत मोंगा जैसी निर्माता हैं,जो इंटरनेशनल लेवल पर संसाधन जुटा और जुटवा रही हैं। वह एक नया जरिया है। उस से भी नए मेकर को फायदा होगा। मुझे लगता है कि हिंदी फिल्‍मों के लिए देश के होम मार्केट की महत्‍ता बनी रहेगी। घूम-फिर कर अपने दर्शकों तक आना ही पड़ेगा। तकनीक के साथ सिनेमा का नॉलेज बेस बढ़ गया है। आप आसानी से कोई भी जानकारी हासिल कर सकते हैं। एक रात या चंद दिनों में आप कुछ भी सीख सकते हैं। फिल्‍म और डिजीटल की बहस अभी खत्‍म नहीं हुई है। वह चलती रहेगी। स्‍कोरसिसी कहते हैं कि आखिरकार हमें कहानी कहनी है। हिंदी सिनेमा की खास शैली है। अज्ञानियों की जमात कुछ नया भी करती रहेगी। एक फिल्‍म कोई भी बना लेगा। दिक्‍कत दूसरी फिल्‍म की होगी। फिल्‍म बनाना आजीविका से जुड़ते ही दिक्‍कतें ले आता है।  वैसी स्थिति में हमें निर्माता की तरह सोचना होगा। अनुराग कश्‍यप और दिबाकर बनर्जी इन जरूरतों को समझ कर सरवाइव कर रहे हैं।
- अनुराग कश्‍यप की पीढ़ी को टीवी से भारी सपोर्ट मिला। उनके समकालीन टीवी के माध्‍यम से आए। नई पीढ़ी के फिल्‍मकारों को ऐसी सुविधा नहीं मिल पा रही है।
0 नई पीढ़ी के पास यू ट्यूब और सोशल मीडिया है।
- उससे क्रिएटिव अनुशासनहीनता भी बढ़ी है।
0 बढ़ी होगी। क्‍या दिक्‍क्‍त है ? सीखने की यह प्रक्रिया है। अब वह सीधे दर्शकों तक पहुंच सकता है। उसे किसी स्‍टूडियो या चैनल अधिकारी के पास नहीं जाना है। क्रिएटिव फिल्‍म में पहले चरण की आजादी अलग होती है। दूसरे चरण में आजादी की परिभाषा बदल जाती है। बेहतर है कि सभी खुद सीखें। दूसरे चरण तक अनेक इस दरिया में बह जाते हैं। कई बार हम क्रिएटिव मायनोरिटी में रह जाते हैं। हमारी तरफ किसी का ध्‍यान नहीं जाता। फिल्‍में बनाना और पहचान बनाना एक जटिल और अबूझ प्रक्रिया है।

Friday, December 26, 2014

फिल्‍म समीक्षा : अग्‍ली

- अजय ब्रह्मात्‍मज 
अग्ली अग्ली है सब कुछ
अग्ली अग्ली हैं सपने
अग्ली अग्ली हैं अपने
अग्ली अग्ली हैं रिश्ते
अग्ली अग्ली हैं किस्तें
अग्ली अग्ली है दुनिया
अब तो बेबी सबके संग
हम खेल घिनौना खेलें
मौका मिले तो अपनों की
लाश का टेंडर ले लें
बेबी लाश का टेंडर ले लें
क्योंकि अग्ली अग्ली है सब कुछ।
    अनुराग कश्यप की फिल्म 'अग्ली' के इस शीर्षक गीत को चैतन्य की भूमिका निभा रहे एक्टर विनीत कुमार सिंह ने लिखा है। फिल्म निर्माण और अपने किरदार को जीने की प्रक्रिया में कई बार कलाकार फिल्म के सार से प्रभावित और डिस्टर्ब होते हैं, लेकिन उनमें से कुछ ही भूमिका निभाने की उधेड़बुन को यों प्रकट कर पाते हैं। दरअसल, इस गीत के बोल में अनुराग कश्यप की फिल्म का सार है। फिल्म के थीम को गीतकार गौरव सोलंकी ने भी अपने गीतों में सटीक अभिव्यक्ति दी है। वे लिखते हैं, जिसकी चादर हम से छोटी, उसकी चादर छीन ली, जिस भी छत पर चढ़ गए हम, उसकी सीढ़ी तोड़ दी...या फिल्म के अंतिम भाव विह्वल दृश्य में बेटी के मासूम सवालों में उनके शब्द संगदिल दर्शकों के सीने में सूइयों की तरह चुभते हैं। इन दिनों बहुत कम फिल्मों में गीत-संगीत फिल्म के भाव को छू पाते हैं। 'अग्ली' की कुरूपता समझने के लिए इन गीतों को फिल्म देखने के पहले या बाद में सुन लें तो पूरा नजरिया और संदर्भ मिल जाएगा।
         अनुराग कश्यप की 'अग्ली' शहरी जीवन और समाज में रिश्तों में आए स्वार्थ, चिढ़, ईर्ष्या, छल, कपट, द्वेष, मान मर्दन, अपमान आदि स्याह भावनाओं को समेटती हुई ऐसी कली कथा का सृजन करती है, जिसे पर्दे पर घटते देख कर मन छलनी होता है। अनुराग की इस फिल्म में केवल कली ही निष्कपट चरित्र है। वह अपने पापा को प्यार करती है। उसे नहीं मालूम कि उसकी मां पापा से क्या अपेक्षा रखती है और क्यों दूसरे पापा के साथ रहने लगती है। वह तो पापा के साथ रहने की कोशिश में इस बेरहम समाज के लालच का शिकार होती है। कली की मां शालिनी, कली के पापा राहुल, कली के दूसरे पापा सौमिक, पापा के दोस्त चैतन्य, मामा सिद्धांत, मां की दोस्त राधा सभी किसी न किसी प्रपंच में लीन हैं। वे अपने स्वार्थ और लाभ के लिए किसी भी स्तर तक गिर सकते हैं। रात के पौने तीन बजे अंडरवियर में हजार-हजार के नोट खोंस कर हवा में हजारों के नोट उड़ाते और सोफे पर नोट बिछा कर लेटते कली के मामा को देख कर घिन आ सकती है, लेकिन यही मुंबई जैसे शहरों की घिनौनी काली सच्चाई है। कली के मां या दोनों पापा भी तो दूध के धुले नहीं हैं। ये आत्मकेंद्रित चरित्र खुद के बाएं-दाएं भी नहीं देख पाते। मौका मिलते ही सभी गिरह काटने में माहिर हैं। बतौर -लेखक निर्देशक अनुराग कश्यप की किसी किरदार से सहानुभूति नहीं है। वे निष्ठुर भाव से उन्हें ज्यों के त्यों पेश कर देते हैं। हमारी मुलाकात एक निर्दयी निर्देशक से होती है, जिसकी कटु कल्पना शहर के अंधेरे कोनों और इंसान के संकरे विवरों में प्रवेश करती है। वहां हर किरदार को अपनी कमजोरियों से लगाव है।
        निश्चित ही 'अग्ली' अनुराग कश्यप की अलहदा फिल्म है। यहां वे चित्रण, विवरण और प्रस्तुति में मुखर हैं। वे बेलाग तरीके से हमारे समय कसैले अनुभवों को स्थितियों और घटनाओं की तरह पेश करते हैं। कली का गायब होना ऐसा हादसा है, जिसके बाद रिश्तों की कलई उतरने लगती है। गौर करें तो कली के गायब होने का क्रूर रूपक सभी चरित्रों को एक-एक कर बेनकाब करता है। उनकी असली सीरत और सूरत कुरूप है। अनुराग ने किसी भी चरित्र को नहीं बख्शा है। यहां तक कि श्रीलाल और उसकी बुआ या इंस्पेक्टर जाधव भी नहीं बच पाते। ये सभी शहरी समाज के डिस्टर्ब चरित्र हैं। वे इरिटेट करते हैं। अनुराग ने अपनी फिल्म के लिए मुंबई का खास परिवेश चुना है। जीर्ण और जर्जर इमारतों का यह मध्यवर्गीय माहौल आम तौर हिंदी फिल्मों में नहीं दिखाई देता। उनके प्रोडक्शन डिजाइनर और कैमरामैन ने रंग और परिवेश से फिल्म के कथ्य को गढ़ा और प्रभावशाली बना दिया है।
        कलाकारों के चयन और और उनके अभिनय में अनुराग कश्यप ने हिंदी फिल्मों की परिपाटी का पालन नहीं किया है। यथार्थ की जमीन पर खड़े किरदारों का सभी कलाकारों ने मजबूती से पेश किया है। राहुल भट्ट, तेजस्विनी कोल्हापुरी और रोनित रॉय ने प्रमुख किरदारों के तनाव और उलझन को समुचित मात्रा में आत्मसात और प्रस्तुत किया है। छोटी भूमिका में सिद्धांत कपूर ध्यान खींचते हैं। इस फिल्म की उपलब्धि हैं विनीत कुमार सिंह और गिरीश कुलकर्णी। अपने किरदार से विनीत का एकात्मता का नतीजा है फिल्म का टाइटल गीत। गिरीश कुलकर्णी अपनी निर्दोष सादगी से इंस्पेकटर जाधव को असली रंग देते हैं।
अवधि-127 मिनट
**** चार स्‍टार

Tuesday, December 23, 2014

अग्‍ली के लिए लिखे गौरव सोलंकी के गीत

अनुराग कश्‍यप की फिल्‍म अग्‍ली के गीत गौरव सोलंकी ने लिखे हैं। मेरा सामान उनके ब्‍लाग्‍ा का नाम है। उन्‍हें आप फेसबुक और ट्विटर पर भी पा सकते हैं। खुशमिजाज गौरव सोलंकी मुंबइया लिहाज से सोशल नहीं हैं,लेकिन वे देश-दुनिया की गतिविधियों से वाकिफ रहते हैं। इन दिनों वे एडवर्ल्‍ड में आंशिक रूप से सक्रिय हैं। और एक फिल्‍म स्क्रिप्‍ट भी लिख रहे हैं। प्रस्‍तुत हैं अग्‍ली के गीत...






सूरज है कहां

सूरज है कहाँसर में आग रे
ना गिन तितलियांअब चल भाग रे
मेरी आँख में लोहा है क्या
मेरी रोटियों में काँच है
गिन मेरी उंगलियां
क्या पूरी पाँच हैं
ये मेरी बंदूक देखो, ये मेरा संदूक है
घास जंगल जिस्म पानी 
कोयला मेरी भूख हैं 
चौक मेरा गली मेरी, नौकरी वर्दी मेरी 
धूल धरती सोना रद्दी, धूप और सर्दी मेरी 

मेरी पार्किंग है, ये मेरी सीट है
तेरा माथा हैये मेरी ईंट है

तेरी मिट्टी से मेरी मिट्टी तक
आ रही हैं जोसारी रेलों से
रंग सेतेरे रिवाज़ों से
तेरी बोली से
तेरे मेलों से
कीलें चुभती हैं
चीलें दिखती हैं

लकड़ियां गीली नहीं हैं
तेल है, तीली यहीं है

मेरा झंडा, तरीका, मेरा सच सही
गर कोई आवाज़ उठीगाड़ दूंगा मैं यहीं
मैं यहां पहले खड़ा थाहै ये मेरा मैदान
आज़मा ले लाठियों पे, क्या तेरा संविधान

ये किताबें पाप हैं 
वे लोग सारे सांप हैं
जहालत के हमामों में 
मोरैलिटी की भाप है

मैं बताऊंगा तुझे, तू जीन्स पहने कितनी तंग
कौनसी बिल्डिंग में तू रह सकती है कब किसके संग
रात के कितने बजे कैसे चलेकिससे मिले
कब पलटकर मार देकब चुप रहेकब कब जले 
है ये वेलेंटाइन क्यूं तू पीती वाइन क्यूं
तेरे पब सेउसके रब से मुझको प्रॉब्लम है सब से
हमने उनको खूब धोया जो रूई से लोग थे 
बन गए उनके गुब्बारे, 
जो सुई से लोग थे 

जिसकी चादर हमसे छोटीउसकी चादर छीन ली  जिस भी छत पे चढ़ गए हम, उसकी सीढ़ी तोड़ दी 
इश्तिहारों में ख़ुशी है और घर आटा नहींदे मेरा चाकू मुझे मां, कब से कुछ काटा नहीं
बच्चे खेलते थे जहां पिछले जून में
अब बस्ते दीखते हैं वहां भीगे खून में
मर रही थी एक बच्ची सड़क परभीड़ थी
सबका दफ़्तर था ज़रूरीसबने मरती छोड़ दी

पापा

क्या वहाँ दिन है अभी भी
पापा तुम रहते जहाँ हो
ओस बन के मैं गिरूंगी
देखना, तुम आसमां हो

टीन के टूटे कनस्तर
से ज़रा बूंदी चुराकर
भागती है कोई लड़की
क्या तुम्हें अब भी चिढ़ाकर

फ़र्श अब भी थाम उंगली
साथ चलता है क्या पापा
भाग के देखो रे आँगन
नीम जलता है क्या पापा

आग की भी छाँव है क्या
चींटियों के गाँव हैं क्या
जिस कुएं में हम गिरे हैं
उस कुएं में नाव है क्या

क्या तुम्हें कहता है कोई कि चलो, अब खा भी लो
डिब्बियों में धूप भरकर कोई घर लाता है क्या
चिमनियों के इस धुएं में मेरे दो खरगोश थे
वे कभी आवाज़ दें तो कोई सुन पाता है क्या

गिनतियां सब लाख में हैं
हाथ लेकिन राख में हैं 

चाँद अब भी गोल है क्या
जश्न अब भी ढोल है क्या
पी रहे हैं शरबतें क्या
क्या वहाँ सब होश में हैं?
या कि माथे सी रहे हैं
दो मिनट अफ़सोस में हैं? 

निचोड़ दे 


लाइब्रेरी के हिस्ट्री वाले फ़्लोर पे
पोस्ट ऑफ़िस के पीछे वाले डोर पे
सेज पे या मेज पे क्लास में

रेत में या खेत में घास में
तू मुझे निचोड़ दे
मैं तुझे निचोड़ लूं
तू मुझे झिंझोड़ दे
मैं तुझे झिंझोड़ दूं

चाहे मिल लिफ़्ट में
रात वाली शिफ़्ट में
पी ले चाहे ओक से
चाहे चूल्हे झोंक दे
आ तुझे थोड़ा सा बिगाड़ दूं
दिल्लियां बिल्लियां उघाड़ दूं
तवे से जलें तलवे मेरे
काट मुझे, शर्ट तेरी फाड़ दूं

जैसे चाहे खेल ले
जैसे चाहे मोड़ दे
जब चाहे ढील दे
चरखियां तोड़ के

ढूंढ़े कहाँ सेब है
फटी मेरी जेब है
चाहे तुरपाई कर
चाहे तो उधेड़ दे

आ तू जैसे भूला कोई आए घर आके मेरी करवट में ठहर
सेकूं तुझे इस तन्दूर में सीना तेरा चूरमे सा चूर के 

ऐसे मैले हों कि जैसे साफ़ हों
दोनों एक दूजे के लिहाफ़ हो

तू मेरी ज़मीन बन
बाकी मुझपे छोड़ दे

मैं तुझे निचोड़ लूं
तू मुझे निचोड़ ले

चाहे मिल लिफ़्ट में
रात वाली शिफ़्ट में
पी ले चाहे ओक से
चाहे चूल्हे झोंक दे
आ तुझे थोड़ा सा बिगाड़ दूं
दिल्लियां बिल्लियां उघाड़ दूं
तवे से जलें तलवे मेरे
काट मुझे, शर्ट तेरी फाड़ दूं

तू मुझे निचोड़ दे
मैं तुझे निचोड़ लूं
तू मुझे झिंझोड़ दे
मैं तुझे झिंझोड़ दूं

Sunday, June 1, 2014

अनुराग कश्‍यप का युद्ध

तिग्‍मांशु धूलिया- ये क्षेत्र जो है ,हमारा है। यहां पर आप को हमारे तरीके से रहना होगा।
अमिताभ बच्‍चन- ये खेल अब आप को मेरी तरह ही खेलना होगा।
सोनी टीवी के आगामी धारावाहिक 'युद्ध' के संवाद...इसे अनुराग कश्‍यन निर्देशित कर रहे है। इसमें नवाज और केके भी है।

Tuesday, July 30, 2013

मिली बारह साल पुरानी डायरी



कई बार सोचता हूं कि नियमित डायरी लिखूं। कभी-कभी कुछ लिखा भी। 2001 की यह डायरी मिली। आप भी पढ़ें। 

30-7-2001

      आशुतोष राणा राकेशनाथ (रिक्कू) के यहां बैठकर संगीत शिवन के साथ मीटिंग कर रहे थे। संगीत शिवन की नई फिल्म की बातचीत चल रही है। इसमें राज बब्बर हैं। मीटिंग से निकलने पर आशुतोष ने बताया कि बहुत अच्छी स्क्रिप्ट है। जुहू में रिक्कू का दफ्तर है। वहीं मैं आ गया था। रवि प्रकाश नहीं थे।
      आज ऑफिस में बज (प्रचार एजेंसी) की विज्ञप्ति आई। उसमें बताया गया था कि सुभाष घई की फिल्म इंग्लैंड में अच्छा व्यापार कर रही है। कुछ आंकड़े भी थे। मैंने समाचार बनाया बचाव की मुद्रा में हैं सुभाष घई। आज ही क्योंकि सास भी कभी बहू थीका समाचार भी बनाया।
      रिक्कू के यहां से निकलकर हमलोग सुमंत को देखने खार गए। अहिंसा मार्ग के आरजी स्टोन में सुमंत भर्ती हैं। उनकी किडनी में स्टोन था। ऑपरेशन सफल रहा, मगर पोस्ट ऑपरेशन दिक्कतें चल रही हैं। शायद कल डिस्चार्ज करें। अब हो ही जाना चाहिए? काफी लंबा मामला खिच गया।
      रास्ते में आशुतोष ने बताया कि वह धड़ाधड़ फिल्में साइन कर रहे हैं। कल उन्होंने आकाशदीप की और फिर एक दिनसाइन की। इस फिल्म में ढेर सारे कलाकार हैं। यह थ्रिलर फिल्म है। आशुतोष ने इसकी कहानी भी सुनाई।
      सुमंत के यहां से लौटते समय आशुतोष ने बताया कि वह मंदिरा के पिता कश्यप से मिल कर लौटेंगे। कश्यप भगत सिंह पर फिल्म बनाने की सोच रहे हैं, जिसमें चंद्रशेखर आजाद का रोल आशु को दिया जा रहा है। रवि प्रकाश ने उनसे कहा कि रोल के लिए हां मत कहिएगा। आशुतोष ने साफ कहा, ‘इतने पैसे मांगूंगा कि अंकल खुद ही राजी नहीं होंगे।
      बातचीत में कभी मुकेश तिवारी का भी जिक्र आया।

31-7-2001

      सुमंत को हास्पिटल से डिस्चार्ज करवा कर उनके घर पहुंचाने के लिए बारह बज खार रोड स्थित आरजी स्टोन पहुंचा। वहीं महेश भट्ट का फोन आया। वे कल दिल्ली में थे। प्रिय पाठकों के लिए उन्हें लेख लिखना था। बात हुई कि इस बार सुभाष घई पर लेख हो। सुभाष घई की फिल्म यादेंबेहतर पिट गई है। फिर भी उनका अहंकार खत्म नहीं हुआ है। महेश भट्ट ने कहा है कि वे सुभाष घई पर अवश्य लिखेंगे। शाम में उनका फिर से फोन आया कि उन्होंने लिख लिया है। कल ऑफिस में उनका फैक्स मिलेगा।
      महेश भट्ट सुभाष घई को शो मैन नहीं मानते। कैसा शो मैन और काहे का शो मैन। राजकुमार संतोषी की भी यही राय है। पिछले दिनों हैदराबाद में लज्जा  की शूटिंग के अंतिम चरणों में उनसे मुलाकात हुई। वह उर्मिला मातोंडकर पर आइटम सौंग आइए, आ जाइए, आजी जाइएकी शूटिंग कर रहे थे। रात में डिनर के बाद अनौपचारिक गपशप में उन्होंने कहा कि पत्रकारों और समीक्षकों को सुभाष घई का पर्दाफाश करना चाहिए। फिल्मफेयर की पत्रकार अनुराधा ने तब हां में हां मिलाया। उसी रात राम गोपाल वर्मा का भी जिक्र आया। रोम गोपाल वर्मा किस प्रकार खालिद मोहम्मत से नाराज चल रहे हैं। उसकी वजह क्या है? अनुराधा ने बताया कि हर फिल्म की रिलीज के समय राम गोपाल वर्मा के फोन आने लगते हैं। इस बार लव के लिए कुछ भी करेगा’ - निर्देशक ई निवास पर खालिद का रिव्यू देख कर रामू बहुत नाराज हुए हैं।

1 अगस्त 2001

      आज महेश भट्ट ने सुभाष घई पर लेख भेजा। इसमें उन्होंने जीवन चक्र की बात की है। बताया है कि सुभाष घई नाम का ब्रांड मर रहा है। यादेंकी विस्तृत चर्चा नहीं थी लेख में। महेश भट्ट अपने लेखों में धार का भ्रम पैदा करते हैं। वे गहरे विश्लेषण में नहीं उतरते। उनके पास एक खास दृष्टि है। एक दर्शन भी है। यह उन्हें रजनीश और कृष्णमूत्र्ति की संगत से मिली है। मुझे लगता है कि वे या तो जल्दबाजी में रहते हैं या फिर कई फ्रंट पर एक साथ व्यस्त हैं।
      शाम में कर्मा फिल्म्स प्रेस कांफ्रेंस था। विजय जिंदल ने जी टीवी के साथ मिलकर इसका गठन किया है। यह छोटी फिल्में बनाएगा। पहली फिल्म तिग्मांशु धूलिया की हासिलहै। इसमें जिम्मी शेरगिल और रिशित भट्ट के साथ इरफान और आशुतोष राणा हैं। विजय जिंदल पहले जी टीवी में थे। वहां से निकलने के बाद कुछ समय तक बाहर रहे और अब यह काम - फिल्म निर्माण का। उन्होंने कारपोरेट संस्कृति की बात की है। वह मानते हैं कि फिल्म निर्देशक भी फिल्म का सीइओ होताहै। इस संबंध में पूछने पर तिग्मांशु ने जवाब दिया - निश्चित समय में फिल्म पूरी करना भी एक जिम्मेदारी है। यह जिम्मेदारी बगैर सीइओ का रूख अपराए नहीं निभाई जा सकती।
      तिग्मांशु की फिल्म हासिलकैंपस की पृष्ठभूमि में है। इसमें इलाहाबाद का बैकड्रॉप है। इसे प्रेमकहानी के तौर पर बना रहे हैं तिग्मांशु। उनका इरादा कभी खुशी कभी गमसे टकराने का है। उनकी लगन देखकर लगता है कि वह अवश्य कुछ कर लेंगे।
      इरफान ने बताया कि उन्होंने टीवी का काम बंद कर दिया है। मुझे याद आता है कि जब मैं मुंबई आया था तो गोविंद निहलानी की फिल्म दृष्टिमें वह डिंपल कपाडिय़ा के साथ दिखे थे। कुछ समांतर फिल्में भी की, लेकिन बाद में टीवी में व्यस्त हो गए। अभी फिर से फिल्म में सक्रिय हो रहे हैं।

Friday, May 3, 2013

फिल्‍म समीक्षा : बॉम्‍बे टाकीज

Movie review- Bombay talkies- अजय ब्रह्मात्‍मज 
भारतीय सिनेमा की सदी के मौके पर मुंबई के चार फिल्मकार एकत्रित हुए हैं। सभी हमउम्र नहीं हैं, लेकिन उन्हें 21वीं सदी के हिंदी सिनेमा का प्रतिनिधि कहा जा सकता है। फिल्म की निर्माता और वायकॉम 18 भविष्य में ऐसी चार-चार लघु फिल्मों की सीरिज बना सकते हैं। जब साधारण और घटिया फिल्मों की फ्रेंचाइजी चल सकती है तो 'बॉम्बे टाकीज' की क्यों नहीं? बहरहाल, यह इरादा और कोशिश ही काबिल-ए-तारीफ है। सिनेमा हमारी जिंदगी को सिर्फ छूता ही नहीं है, वह हमारी जिंदगी का हिस्सा हो जाता है। भारतीय संदर्भ में किसी अन्य कला माध्यम का यह प्रभाव नहीं दिखता। 'बॉम्बे टाकीज' करण जौहर, दिबाकर बनर्जी, जोया अख्तर और अनुराग कश्यप के सिनेमाई अनुभव की संयुक्त अभिव्यक्ति है। चारों फिल्मों में करण जौहर की फिल्म सिनेमा के संदर्भ से कटी हुई है। वह अस्मिता और करण जौहर को निर्देशकीय विस्तार देती रिश्ते की अद्भुत कहानी है।
करण जौहर - भारतीय समाज में समलैंगिकता पाठ, विमर्श और पहचान का विषय बनी हुई है। यह लघु फिल्म अविनाश के माध्यम से समलैंगिक अस्मिता को रेखांकित करने के साथ उसे समझने और उसके प्रति सहृदय होने की जरूरत महसूस कराती है। करण जौहर ने इसे संवेदनशील तरीके से चित्रित किया है। अपनी पिछली फिल्मों की तरह वे किसी और बहाने से समलैंगिकता की बात नहीं करते। यहां उनका फोकस स्पष्ट है। सिर्फ तीन किरदारों के जरिए वे अपनी बात कहने में सफल रहते हैं। अविनाश की भूमिका में साकिब सलीम का आत्मविश्वास प्रभावित करता है। उनके साथ अनुभवी और सधी अभिनेत्री रानी मुखर्जी हैं, फिर भी साकिब सलीम पर्दे पर नहीं डगमगाते। रणदीप हुडा ने देव की जटिल भूमिका को सहजता से पेश किया है।
दिबाकर बनर्जी - दिबाकर बनर्जी ने सत्यजित राय की एक कहानी को मराठी परिवेश में ढाल दिया है। उन्होंने पुरंदर के माध्यम से भारतीय नागरिक के सिनेमाई लगाव को बगैर लाग-लपेट के पेश किया है। नवाजुद्दीन सिद्दिकी ने पुरंदर की चुनौतीपूर्ण भूमिका को अपनी योग्यता से आसान बना दिया है। इस लघु फिल्म के अधिकांश हिस्से में नवाजुद्दीन सिद्दिकी अपने बॉडी लैंग्वेज से भाव जाहिर करते हैं। उन्हें बोलते या समझाते हम नहीं देखते, फिर भी हम उनकी हर बात समझते हुए उनसे जुड़ जाते हैं। लंबे समय के बाद इस फिल्म में सदाशिव अमरापुरकर की उपस्थिति प्रशंसनीय है। सिनेमा से दर्शकों-नागरिकों के रिश्ते को यह फिल्म अनूठे तरीके से छूती है।
जोया अख्तर - इस फिल्म में जोया अख्तर ने विक्की के माध्यम से करण जौहर की फिल्म में चित्रित समलैंगिकता एवं अस्मिता की दुविधा को छोटी उम्र में दिखाने की कोशिश की है। जोया की फिल्म वास्तव में करण की फिल्म की प्रिक्वल लगती है। विक्की को उसके पिता फुटबॉल खेलने की हिदायत देते रहते हैं। वे चाहते हैं कि लड़का होने की वजह से वह स्पोटर््स में रुचि ले, लेकिन विक्की नर्तक बनना चाहता है। उसे अपनी बहन के कपड़े पहनना पसंद है। वह शीला बनने के सपने देखता है। उसे कट्रीना कैफ की कही बात अच्छी लग जाती है कि अपने सपने को जियो। फिल्म हस्तियां अपने बात-व्यवहार से हमारी जिंदगी की दिशा बदल देती है। जोया अख्तर की यह फिल्म एक तरफ लैंगिक अस्मिता के प्रश्न से जुझती है तो दूसरी ओर फिल्म सेलिब्रिटी के असर को भी दर्शाती है। जोया ने बहुत खूबसूरती से बालमन की दुविधा को दृश्यों में उतारा है।
अनुराग कश्यप - अमिताभ बच्चन के मिथक और असलियत के ताने-बाने से तैयार अनुराग कश्यप की फिल्म को उत्तर भारतीय दर्शक ज्यादा अच्छी तरह समझ सकता है। इलाके या प्रदेश के अभिनेताओं से दर्शकों का सीधा-सच्चा रिश्ता होता है। बात करें तो प्रशंसक अपने स्टारों के बारे में हर छोटी जानकारी रखते हैं, इसलिए मिलते वक्त वे स्टार से रिश्ते और जानकारी की वही गर्मजोशी चाहते हैं। इस फिल्म में अनुराग ने दिलीप कुमार के किस्से और अमिताभ बच्चन के प्रसंग से स्टार और प्रशंसक के रिश्ते की गर्माहट को पेश किया है। यहां शहद और मुरब्बा उस रिश्ते का प्रतीक है। इस फिल्म में विनीत कुमार सिंह ने इलाहाबाद के विजय के किरदार को बखूबी निभाया है। भाषा और भाव पर उनकी पकड़ उल्लेखनीय है। अमिताभ बच्चन की मौजूदगी फिल्म को नया आयाम दे देती है।
निर्माताओं का 'बॉम्बे टाकीज' प्रयास प्रशंसनीय है। इस फिल्म के दो फिल्मकार फिल्म इंडस्ट्री की पैदाइश हैं और दो बाहर से आए फिल्मकार हैं। विषय के चुनाव से लेकर उनकी प्रस्तुति तक से संबंधित फिल्मकारों की समझ और संवेदना जाहिर होती है। करण जौहर और जोया की फिल्म व्यक्ति केंद्रित होने के साथ लैं“िक अस्मिता के इर्द-गिर्द रहती है, जबकि दिबाकर बनर्जी और अनुराग कश्यप की लघु फिल्में व्यक्ति और सिनेमा के रिश्तों को समझने की कोशिश करती हैं।
हां, फिल्म के अंत का गीत और उसका फिल्मांकन 'बॉम्बे टाकीज' के स्वाद को बेमजा कर देता है। इस गीत में फूहड़ कल्पना का भद्दा चित्रांकन हुआ है। गीत के बोल भी सतही और साधारण हैं।
अवधि-120 मिनट
चार स्टार

Tuesday, February 5, 2013

फिल्‍मकार अनुराग कश्‍यप की अविनाश से बातचीत

नया सिनेमा छोटे-छोटे गांव-मोहल्‍लों से आएगा

अनुराग कश्‍यप ऐसे फिल्‍मकार हैं, जो अपनी फिल्‍मों और अपने विचारों के चलते हमेशा उग्र समर्थन और उग्र विरोध के बीच खड़े मिलते हैं। हिंसा-अश्‍लीलता जैसे संदर्भों पर उन्‍होंने कई बार कहा है कि इनके जिक्र को पोटली में बंद करके आप एक परिपक्‍व और उन्‍मुक्‍त और विवेकपूर्ण दुनिया का निर्माण नहीं कर सकते। हंस के लिए यह बातचीत हमने दिसंबर में ही करना तय किया था, पर शूटिंग की उनकी चरम व्‍यस्‍तताओं के बीच ऐसा संभव नहीं हो पाया। जनवरी के पहले हफ्ते में सुबह सुबह यह बातचीत हमने घंटे भर के एक सफर के दौरान की। इस बातचीत में सिर्फ सिनेमा नहीं है। बिना किसी औपचारिक पृष्‍ठभूमि के हम राजनीति से अपनी बात शुरू करते हैं, सिनेमा, साहित्‍य और बाजार के संबंधों को समझने की कोशिश करते हैं। इसे आप साक्षात्‍कार न मान कर, राह चलते एक गप-शप की तरह लेंगे, तो ये बातचीत सिनेमा के पार्श्‍व को समझने में हमारी मददगार हो सकती है: अविनाश
____________________________________________________________________
पिछली सदी के नौवें दशक के बाद देश में जो नया राजनीतिक माहौल बना, उसमें विश्‍वसनीय राजनीतिक ताकतें लोगों को गोलबंद नहीं कर पायीं। ऐसे में नयी सदी के दूसरे दशक में जो जनसंघर्ष की रोशनी दिख रही है, उसमें क्‍या हम भारत के भविष्‍य को साफ-साफ देख सकते हैं?
इस नये दृश्‍य को उसकी हूबहू शक्‍ल में नहीं देखना चाहिए। हमें ये नहीं मालूम कि कौन किसके हाथ का खिलौना है। प्रधानमंत्री की अपनी कोई औकात नहीं है। वह सारे फैसले किसी और के कहने पर लेते हैं। एक भव्‍य राजनीतिक-पारिवारिक पृष्‍ठभूमि की महिला के आगे सारे नेता रेंगते नजर आते हैं। अब शक्ति के इस केंद्रीकरण को कौन कंट्रोल कर रहा है, ये किसी को नहीं मालूम। किसी बड़े औद्योगिक घराने के हाथों में यह शक्ति खेल रही है या किसी और के हाथ में – ये नहीं मालूम। अब एक हिसाब देखिए… वॉलमार्ट के लिए दरवाजे खुले हैं तो यह अच्‍छा है या बुरा – इसकी तस्‍वीर साफ नहीं है। बुरी चीज यह हो रही थी रिलायंस हर जगह घुस रहा था। इस हिसाब से वॉलमार्ट के आगमन को बेहतर कहा जा सकता है। अगर रिलायंस की हर जगह घुसपैठ पर पहले ही रोक लग गयी होती, तो ज्‍यादा बेहतर था। हो क्‍या रहा है कि हमारे देश में बहुत कुछ बिना किसी योजना के हो रहा है। सरकार की सोच है कि अर्थव्‍यवस्‍था मजबूत करनी है, ग्‍लोबलाइजेशन लाना है, हालात बेहतर करने हैं, मल्‍टीनेशनल को बुलाना है – बुलाएं। बहुत अच्‍छी बात है। ग्‍लोबलाइजेशन और शॉपिंग मॉल आएगा, तो उससे कल्‍चर भी बदलेगा न? पर नेता लोग इसके लिए तैयार नहीं हैं। वहां पर तो आपकी नैतिकता वही की वही है। आपको दरअसल आर्थिक विकास चाहिए। राजनीतिक इच्‍छाशक्ति कहां, किन चीजों में दिखता है… कि तमाम विरोध के बावजूद एफडीआई पास हुआ। यही राजनीतिक इच्‍छाशक्ति बाकी चीजों में क्‍यों नहीं दिखती? सिर्फ इकोनॉमिक डील में क्‍यों दिखती है? ऐसे में मेरे दिमाग में शक ये आता है कि इस वॉलमार्ट के पीछे कौन है? ये वॉलमार्ट वाले ही हैं या कोई इंडिया में ही इसका फ्रैंचाइज लेके आया है, जो बाद में इमर्ज हो जाएगा किसी देशी कंपनी के साथ। अभी मुझे या किसी को नहीं मालूम। जब होगा, तब पता चलेगा कि राजनीति हो क्‍या रही है? सवाल ये नहीं है कि वॉलमार्ट कैसे आया, क्‍यों आया… सवाल तो ये है कि सरकार ने वॉलमार्ट को वहां कैसे घुसने दिया, जो एरिया रिलायंस टेकओवर करने जा रहा था। इसके पीछे एक अलग राजनीति है। या तो कांग्रेस ने घुसने दिया क्‍योंकि इसके पीछे कोई और पावरफुल इंटीटी आ गयी थी। या फिर रिलायंस ही लेके आया वॉलमार्ट को, ताकि शुरू में कंपीटिशन दिखे, बाद में मर्ज हो जाए। अगर इस नजरिये से देखिएगा तो लगेगा कि रिलायंस का इंडिया टेकओवर का प्‍लान है।
ऐसा लगता है… और यह भी लगता है कि सरकार बेबस है। क्‍योंकि बड़ी कंपनियों के खिलाफ कोई एक्‍शन लेने में सरकार सक्षम नहीं दिखती।
बिल्‍कुल सक्षम नहीं है। आप देखिए न, प्राइस को इवॉल्‍यूएट कैसे किया जाता है? कंपीटिशन भी एक ट्रैजिक ड्रामे की तरह है। ये जो किसान है, उसके पास च्‍वाइस क्‍या है? या तो वो अपनी चीज रिलायंस को बेचे या वॉलमार्ट को बेचे। उसकी असली इच्‍छा क्‍या है – वो सामने आने से पहले ही उसके सामने दो विकल्‍प प्‍लांट कर दिये गये। और बाद में दोनों विकल्‍प मर्ज कर गये, तो फिर ये आपकी जेब कंट्रोल करेंगे। आप कहीं नौकरी कर लो, या कोई भी सैलरी कमा लो…
इस हालात को लोग कम या ज्‍यादा समझ रहे हैं। आप देखिए कि एक साल में कितनी बार लोग कई मसलों पर सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतर आये हैं। सामाजिक संगठनों से लेकर मीडिया तक रिएक्‍ट कर रहा है। सिनेमा के लोगों का दिमाग क्‍यों बंद है?
सिनेमा का मतलब ही जब हमारे यहां बचपन से ही इंटरटेनमेंट है, तब कहां से होगा। हम भारत को समझने दिखाने के लिए लिटरेचर की ओर देख सकते थे, लेकिन लिटरेचर का भी अस्तित्‍व कहां दिखता है? कहां है हमारा लिटरेचर? जितने लोग आपके ब्‍लॉग मोहल्‍ला लाइव पर आते हैं, उतने ही लोग पूरे हिंदुस्‍तान में लिटरेचर पढ़ते हैं।
आप हिंदी को छोड़ दीजिए, बाकी इंडिया के लिटरेचर को देखिए। बांग्‍ला, कन्‍नड़, तमिल, तेलुगु, मैथिली वगैरा…
देखिए, हर भाषा का अपना अहंकार है। साहित्‍य और उसके पढ़ने वालों का जो अहंकार है, वो ऐसा है कि वो दूसरी भाषा स्‍वीकार नहीं करते। हिंदी साहित्‍य वालों की क्‍या भूमिका है? वो स्‍वीकार ही नहीं करते किसी दूसरी भाषा को। वही बांग्‍ला का हाल है, वही हर रूटेड लिटरेचर का हाल है।
हां, आवाजाही तो नहीं है।
अगर तमिल साहित्‍य वाले, मलयालम साहित्‍य वाले, हिंदी साहित्‍य वाले एकजुट हो जाएं तो बहुत कुछ हो सकता है। वही नहीं होता। अगर तमिल साहित्‍य हिंदी में अनूदित हो, हिंदी तमिल में अनूदित हो, तो तस्‍वीर दूसरी होगी। तमिल वाले हिंदी को ट्रांसलेट करेंगे नहीं क्‍योंकि वो अपने आपको श्रेष्‍ठ समझते हैं।
मेरा सवाल ये है कि साहित्‍य का पाठक सीमित होते हुए भी उसमें देश आ रहा है, संघर्ष आ रहा है, सिनेमा में ऐसा क्‍यों नहीं हो रहा?
सिनेमा भी बदलेगा, लेकिन दो पीढ़ियों के बाद। आज का जो नया सिनेमा है, उसकी ऑडिएंस कौन है? सब तीस के अंदर वाली है। अधिकतर ऑडिएंस इस नये सिनेमा को टोरेंट के जरिये देखती है। ये ऑडिएंस वही है, जिसमें क्रिएटिव कॉमंस वाला बिलीव है। पहले भी राइटर लिखते थे, फिल्‍में बनती थीं, लोग देखते थे, लेकिन इकॉनोमिक्‍स और बिजनेस का मॉडल नहीं था इतना बड़ा। आज वो ज्‍यादा टेकओवर कर गया। आज फिल्‍में बना कौन रहा है? पहले जैसा नहीं है कि इंडीविजुअल प्रोड्यूसर बना रहा है। आज स्‍टूडियो फंड कर रहा है। स्‍टूडियो क्‍या होता है? स्‍टूडियो वो होता है, जिसके पास पब्लिक का पैसा है। मनी रेज क्‍या हुआ है। मनी कहां से रेज किया हुआ है, प्राइवेट फंडर से रेज किया हुआ है। प्राइवेट फंडर क्‍यों फंड करता है किसी चीज को, उसके पास तो अथाह पैसा है। हमलोग क्‍यों इनवेस्‍ट करते हैं, ग्रोथ फंड में डालते हैं अपना पैसा। क्‍योंकि हमारा पैसा सेव रहे और बढ़ता रहे। ताकि भविष्‍य में काम आये… एक मीडिल क्‍लास आदमी का फंडा ये है। जो बड़ा आदमी है, वो भी सेम फंडे पे चलता है। वो अपना अथाह पैसा उठा के डाल देता है कि चलो एक कंपनी बनाओ। उसे दुगना करो। उस पैसे से स्‍टूडियो बनता है। स्‍टूडियो का डायरेक्टिव क्‍या है, स्‍टूडियो कौन चलाता है? सात लोग हैं, उनको इतनी सैलरी मिल रही है, जितनी जिंदगी में उन्‍होंने देखी नहीं है। उनको इतनी सैलरी तभी मिलती रहेगी, जब स्‍टूडियो का बिजनेस बढ़ेगा। तो बिजनेस बढ़ाने के लिए वो वैसा ही सिनेमा बनाएंगे, जो पैसा कमा कर देगा, बिजनेस बढ़ाएगा। ताकि उनकी नौकरी बनी रहे। चीजें तभी चेंज होंगी, जब ऑडिएंस देखना शुरू करेगी। अभी थोड़ा सा चेंज क्‍यों आया है? कहानी चली, विकी डोनर चली, वासेपुर चली… इसलिए। लेकिन स्‍टूडियो बहुत चेंज नहीं होता है इस वजह से? सिर्फ सुजॉय घोष, अभिजीत सरकार, अनुराग कश्‍यप को कुछ भी बनाने की आजादी मिल जाती है।
यानी नया आदमी नये कंटेंट के साथ स्‍टूडियो में इंट्री नहीं कर सकता!
नये कंटेंट वाला नया आदमी कौन है? जिसने चिटगांव अप्राइजिंग जैसी फिल्‍म बनायी। कितने शो मिले चिटगांव को? हमलोग ने पूरी कोशिश कर ली, लेकिन एक शो से ज्‍यादा कहीं नहीं मिला। थिएटर वाला शो देने को तैयार नहीं है। वो शो भी इसलिए चल रहा है, क्‍योंकि वो फंडेड है। पहले जैसा नहीं है कि थिएटर वाले को पसंद आ गयी फिल्‍म, तो वो चला रहा है। ओडियन वाले को परिंदा पसंद आ गयी, तो सीमित दर्शकों के बाद भी उसने फिल्‍म नहीं उतारी। एक हफ्ते और चलने दी और एक हफ्ते में फिल्‍म अपना दर्शक ले आयी। तब एक मालिक था। आज थिएटर का एक मालिक नहीं है। कोई एक नुकसान दिखाएगा, कई और लोग नुकसान दिखाएंगे। अच्‍छे सिनेमा के लिए पीवीआर रेयर चालू हुआ, लेकिन उसका टिकट कितने का है? तीन सौ रुपये का। क्‍यों तीन सौ रुपये का है? उनका लॉजिक है कि इस फिल्‍म के लिए दस लाख का एडवरटाइजिंग डाल रहे हैं, तो इसकी रिकवरी भी चाहिए, इसलिए तीन सौ का टिकट है… क्‍योंकि लोग तो देखने नहीं आ रहे! दिक्‍कत यहां है।
खैर, जो नाम अभी आपने बताये और जिनको स्‍टूडियो ने भी छूट दे रखी है कि आप कुछ भी बनाएं… वो लोग क्‍यों नहीं सिनेमा की वर्तमान जड़ता को तोड़ते हैं?
देखिए, इनकी भी नौकरी है। ये लोग जब तक प्रॉफिट दिखाएंगे, उनकी नौकरी रहेगी। जहां साल के आखिर में लॉस आया, वो आदमी निकल जाएगा, नया आदमी आएगा।
यानी आपका मानना है कि जो हिंदुस्‍तानी सिनेमा है, वो गुलाम सिनेमा है।
मैं बता रहा हूं कि दुनिया का सिनेमा गुलाम सिनेमा है, सिर्फ हिंदुस्‍तान का सिनेमा गुलाम सिनेमा नहीं है।
नहीं, ईरान में तो माजिद मजीदी जैसे फिल्‍मकार नयी लकीर खींच रहे हैं…
ईरान का सिनेमा भी गुलाम सिनेमा है। ईरान में वही सिनेमा बन रहा है, जो स्‍टेट फंडेड है। जफर पनाही फिल्‍म नहीं बना सकते। माजिद मजीदी की जो भी फिल्‍में हैं, उसे स्‍टेट ने पहले अप्रूव किया है। वहां आपकी स्क्रिप्‍ट को पहले स्‍टेट सेंसर करता है, तभी आप आगे बढ़ सकते हैं। बाकी फिल्‍ममेकर अरेस्‍ट होते हैं। शॉर्ट फिल्‍में भी आप बिना स्‍टेट की इजाजत के नहीं बना सकते। जितना अच्‍छा सिनेमा हम बात करते हैं, वह कहां से फंडेड होता है? आज यूरोप में क्राइसिस क्‍यों है? आज यूरोप फिल्‍में बनाने के लिए इंडिया की तरफ देखता है। जो पहले वहां बन रहा था, उसे स्‍टेट फंड करता था। सरकार के कल्‍चर फंड से फंड आता था। वहां का अच्‍छा सिनेमा इसलिए मर रहा है, क्‍योंकि वहां पे सब गिद्ध बैठ गये हैं। पैसा कौन कमाता है? फिल्‍म बनाने वाला पैसा नहीं कमाता, स्‍टेट जो पैसे देता है वो पैसा नहीं कमाता – फिर कमाता कौन है? बीच का आदमी, मिडिल मैन कमाता है यूरोप में। जो आदमी आपकी बनायी हुई पिक्‍चर मार्केट में बेचता है, वही कमाता है, वही कमीशन लेता है और फिर आपकी रिकवरी कराता है। अपना प्रॉफिट लेने के बाद आपकी रिकवरी कराता है। इसमें सिनेमा मर रहा है। वहां के‍ फिल्‍मकार भारत आके पैसे खोज रहा है। बड़े बड़े निर्देशकों के पास फिल्‍म बनाने के लिए पैसे नहीं हैं। फातिहा अकीन ने फिल्‍में नहीं बनायी कई सालों से। प्रोड्यूसर ही नहीं मिल रहा है। मुझे फोन करके बोलता है कि पैसे अरेंज करो, मैं फिल्‍म बनाना चाहता हूं।
आप ठीक कह रहे हैं। हमारे यहां भी दिबाकर बनर्जी ने शंघाई बनायी, उसमें एनएफडीसी भी एक प्रॉड्यूसर है। यानी क्‍या यह अंतिम सत्‍य है कि स्‍टेट की मदद के बिना हम जेनुइन सिनेमा नहीं बना सकते?
शंघाई के लिए एनएफडीसी से बहुत ज्‍यादा फंड पीवीआर ने दिया था। लेकिन उसके बाद पीवीआर ने पिक्‍चर प्रोड्यूस करना बंद कर दिया। पीवीआर ने इसलिए फंड किया क्‍योंकि उसे लगा कि दिबाकर बनर्जी की फिल्‍म है, पब्लिक देखने के लिए आएगी। पब्लिक नहीं आयी। पीवीआर ने शंघाई के बाद फिल्‍म बनाना बंद कर दिया।
कंटेंट की दिक्‍कत है लोगों के आने या नहीं आने में, या किसी और चीज की दिक्‍कत है? शंघाई को ही लीजिए, सिनेमा वह जैसा भी हो, लेकिन उसने एक इश्‍यू को उठाने की कोशिश की।
वही तो मैं कह रहा हूं। शंघाई जैसा सिनेमा तब बनेगा, जब ऑडिएंस उसको देखने आएगी। आडिएंस आके शंघाई देखके क्‍या बोलती है? बोरिंग है, इंटरटेनमेंट नहीं है। प्रकाश झा और मधुर भंडारकर को वो सर पर चढ़ाते हैं कि ये ग्रेट फिल्‍ममेकर हैं, ये रीयल सब्‍जेक्‍ट पे फिल्‍म बनाते हैं। तो ऑडिएंस के दिमाग में रीयल की परिभाषा ही स्‍पष्‍ट नहीं है। मसाला के अंदर आलू होना बहुत जरूरी है। वरना उसे आप खा ही नहीं सकते। इसके लिए जरूरी है संतुलन बनाना। मैं प्रयोग कर रहा हूं, लेकिन मुख्‍यधारा से एकदम अलग होके नहीं कर सकता। साठ फीसदी प्‍योरिटी और चालीस फीसदी मेनस्‍ट्रीम मार्केट को ध्‍यान में रख कर काम करता हूं। इसी की वजह से वो फिल्‍म फंड कर पा रहा हूं, जो सौ फीसदी प्‍योर हैं। लेकिन सौ फीसदी प्‍योर फिल्‍में रीलीज नहीं हो पा रही हैं। बड़ी दिक्‍कत हो रही है। दस फिल्‍म बना के हमलोग बैठे हुए हैं।
पर आपने तो चिटगांव रीलीज की… शाहिद भी रीलीज करेंगे आप।
रीलीज की, लेकिन क्‍या हुआ रीलीज करके। सारे पैसे घुस गये। शाहिद रीलीज हो जाएगी, क्‍योंकि वो एक करोड़ की फिल्‍म है। लेकिन प्रोमोशन का बजट लगा कर आखिर में शाहिद के साथ भी ऐसा हो जाएगा कि सोचना पड़ेगा कि बेकार था बनाना। लेकिन करेंगे रीलीज। अब ऐसी फिल्‍में बनेंगी। ज्‍यादा बड़े पैमाने पर हो, तो वह अच्‍छा ही होगा। लेकिन अकेला आदमी ऐसा नहीं कर सकता। हमने एक कंपनी बनायी, फैंटम। फैंटम का एजेंडा था कि हम नये प्‍योर लोगों के साथ फिल्‍में बनाएंगे। लेकिन हम ऐसा नहीं कर पा रहे हैं। वही फिल्‍में बन पा रही हैं, जिसमें कोई न कोई जाना-पहचाना चेहरा है। अभी हम एक फिल्‍म बाला जी के साथ मिल कर बनाएंगे, एक फिल्‍म करन जौहर के साथ मिल कर बनाएंगे। एकेएफपीएल बंद करने वाले थे हम। उसको होल्‍ड करके एक दूसरी कंपनी के साथ फैंटम का एसोसिएशन बना रहे हैं। क्‍योंकि हो क्‍या रहा था कि हर फिल्‍म में मेरा ही नाम जा रहा था। इससे जिस आदमी ने फिल्‍म बनायी, उसका नाम मारा जा रहा था।
आपका नाम बिकता है, इसलिए तो नयी फिल्‍मों तक ऑडिएंस लाने के लिए उस नाम की मदद मिलती है?
लेकिन इसमें प्रोजेक्‍ट की विश्‍वसनीयता मारी जाती है। दस लोग जब इंडीविजुअल खड़े होंगे, तभी तो बदलेगा सिनेमा। सबका क्रेडिट मुझे मिलेगा, तब नहीं खड़ा होगा ये सिनेमा।
पर कंटेंट को क्रेडिबलिटी मिल रही है न… आप इनडीविजुअल की क्रेडिबलिटी को लेकर क्‍यों आग्रही हैं?
बहुत जरूरी है इंडीविजुअल का खड़ा होना।
वो तो धीरे-धीरे खड़े हो जाएंगे। किसी एक का चार प्रोजेक्‍ट आएगा, वह खड़ा हो जाएगा। भले ही उसके साथ आपका टैग लगा हो।
हमलोग वही अभी कोशिश कर रहे हैं। इस साल के आखिर तक आपको कई नये लोग मिलेंगे, जो अपने काम से जगह बनाएंगे।
समीर शर्मा ने लव शव चिकन खुराना बनायी, कल वो दूसरी-तीसरी फिल्‍म बनाएगा। तब जाकर उसकी आइडेंटिटी बनेगी। आप चाहेंगे कि एक प्रोजेक्‍ट से कोई खड़ा जाए, तब तो बहुत मुश्किल है न सर…
एक प्रोजेक्‍ट का सवाल नहीं है सर, मैं चाहता हूं कि उसकी अपनी आइडेंटिटी बने।
लाइफ ऑफ पाई जैसी फिल्‍में बाहर इतनी दिलेरी और प्रामाणिकता के साथ बनायी जाती हैं और इंडिया में लोग उसको हुमच कर देखने जाते हैं, फिर यहां के फिल्‍मकार उतने रचनात्‍मक क्‍यों नहीं हो पाते?
लाइफ ऑफ पाई इंडिया में ब्‍लॉक बस्‍टर हो जाती है। उस फिल्‍म में सेंस ऑफ प्राइड भी तो है। पूरी फिल्‍म में इंडिया का बैकड्रॉप है… यहां के अभिनेता हैं, अभिनेत्री हैं। तब्‍बू है, इरफान खान है। इरफान खान इंडियन एक्‍सेंट में अंग्रेजी बोल रहा है। हॉलीवुड का डायरेक्‍टर है, जो ताइवान का एथनीक रीजनल फिल्‍ममेकर है। अमेरिका में बस गया। वही बना सकता है ऐसी फिल्‍म। मैं तो खुश हो गया फिल्‍म देख कर। लाइफ ऑफ पाई जैसी फिल्‍में बननी चाहिए। लेकिन ये बहुत बड़े बजट की फिल्‍म है। एक सौ बीस मिलियन डॉलर। करीब छह सौ करोड़। हमारा बॉक्‍स ऑफिस दो सौ करोड़ देने में हांफ जाता है।
छह सौ करोड़ लगा कर आंग ली ने एक नॉवेल पर काम किया, लेकिन हमारे यहां सिनेमा का जो अर्थशास्‍त्र है, उसी की वजह से लोग साहित्‍य की ओर नहीं जाते। अभी थोड़ी देर पहले हम यही बात कर रहे थे!
सर, यहां पे लोगों को हिंदी नहीं आती है। हिंदी फिल्‍में इसलिए ये बनाते हैं, क्‍योंकि इनके बाप-दादा हिंदी में फिल्‍में बनाते थे। हिंदी में पढ़ना नहीं आता। हिंदी की स्क्रिप्‍ट रोमन में लिखी जाती है। बहुत अलग दिक्‍कत है। जब तक हमारे हिंदी साहित्‍य वालों की सिनेमा की समझ नहीं बढ़ेगी और जब तक उनका इगो बीच से नहीं जाएगा, हिंदी सिनेमा लिटरेचर की तरफ नहीं जाएगा।
किस किस्‍म का ईगो?
मतलब उन्‍हें सिनेमा की समझ नहीं है। वो किताब उठा कर किसको देते हैं? अपने ही झुंड में बैठे किसी चापलूस को देते हैं बनाने के लिए। मैंने बहुत लोगों से बहस की। इतने बढ़िया राइटर हैं उदय प्रकाश, लेकिन उनका आग्रह रहता है कि वो पटकथा भी खुद ही लिखेंगे… तो ऐसे तो फिल्‍म नहीं बनती है। ज्‍यादातर साहित्‍यकार एफटीआईआई पुणे से लौटे ऐसे फिल्‍मकारों के साथ प्रेस क्‍लब या आईआईसी में मीटिंग करेंगे जो सिनेमा की ए बी सी डी नहीं जानते। दिल्‍ली में बैठ कर वो सरकारी पैसे से डॉक्‍युमेंट्री बनाता है और इंटरनेशनल स्‍तर पर सेटिंग गेटिंग में लगा रहता है। तो सिनेमा बनाने का अधिकार जब आप ऐसे लोगों को देंगे, तो क्‍या फिल्‍म बनेगी, आप सोचिए। डाक्‍युमेंट्री बनके दूरदर्शन पर आ जाएगी। लोग वाहवाही में लग जाएंगे। वो चाहते ही नहीं कि साहित्‍य एक बड़े स्‍तर पर सिनेमा के साथ जुड़े। वो अपनी ही कोठरी में बैठकर चाय पीते हुए दुनिया का सत्‍य जान लेने का दावा करते रहेंगे तो कैसे उनके सत्‍य को दुनिया भी अपना मुहर लगाएगी। काशी का अस्‍सी में क्‍या है? चाय की दुकान पर बैठ कर लोग दुनिया भर की राजनीति बतियाते हैं। वहीं बड़ी से बड़ी क्रांतियों को अंजाम दे देते हैं। वही यहां भी है। एक जगह पर बैठे बैठे साहित्‍यकार लोग दुनिया के किसी भी सृजन को खारिज करने का सुख लेते रहते हैं। हिंदी साहित्‍य का परिदृश्‍य भी काशी का अस्‍सी ही है। ऐसे में नये आदमी पर बहुत दबाव होता है, जो साहित्‍य में आता है।
एफटीआईआई में जो निर्देशन के कोर्स में होता है, वह कभी डायरेक्‍टर नहीं बन पाता! क्‍यों? सेम रीजन है। आप इतनी बात कर लेते हो – फेलिनी और तारकोवस्‍की और जाने क्‍या क्‍या कि उसके प्रभाव से बाहर ही नहीं आ पाते। जैसे ही उस घेरे से बाहर आकर कोई मेनस्‍ट्रीम फिल्‍म साइन करता है, उसी का एक साथी उसे फोन करता है और कहता है कि बिक गये तुम? वो सतर्क हो जाता है। वो छोड़ देता है और फिर दूसरे को भी नहीं करने देता है। वे क्रैब मेंटैलिटी के हो जाते हैं। केकड़े की तरह एक दूसरे की टांग खींचने में लग जाते हैं। कोई डायरेक्‍शन स्‍टूडेंट डायरेक्‍टर नहीं बन पाता। जितने डायरेक्‍टर बने हैं, सब एडीटिंग स्‍टूडेंट हैं, सिनेमेटोग्राफी स्‍टूडेंट हैं। लिटरेचर का भी वही हाल है। इतना इंटेलेक्‍चुअलाइजेशन हो जाता है इतने यंग एज में कि बाहर जाकर जब जिंदगी के थपेड़े पड़ते हैं तब वे कहीं के नहीं रहते। जब उन्‍हें लगता है कि बाहर जाकर कुछ करना चाहिए, तो वही कैंटीन वाले दस लोग सामने आकर खड़े हो जाते हैं। क्‍योंकि उनकी दुनिया तो अभी भी उन्‍हीं दस लोगों के इर्द गिर्द बनी हुई है। हमलोग जब सेमिनार में जाते हैं, वहां जितने भी हिंदी और रीजनल वाले होते हैं, वो दरअसल उसकी बात ही नहीं करते, जो हमारे सिनेमा में हो रहा है, वो उसकी बात करते हैं, जिसका हमारे सिनेमा में कोई अस्तित्‍व नहीं है और बाकी दुनिया में है। माध्‍यम तो समझो पहले, फिर बाकी सब समझ में आएगा। मेरे पास लोग आते हैं और पूछते हैं कि आपने ये सब कैसे किया, तो मैं कहता हूं कि क्‍योंकि मैंने पृथ्‍वी में बैठना छोड़ दिया। मैंने बरिस्‍ता में बैठना छोड़ दिया। जब जब मैंने ऐसी एक जगह छोड़ी है, एक नयी चीज हुई है लाइफ में। कोई नयी चीज करने के बाद अगर मैं जाता हूं पीछे, तो लोग कहते हैं अरे यार अब तुम थिएटर में नहीं आते। तुम तो बड़े हो गये हो। तो मैं सुनता ही नहीं हूं। अपने आपको दीवार बना देता हूं। कट ऑफ हो जाता हूं।
ऐसा नहीं लगता कि हिंदी का जो पॉपुलर साहित्‍य है, जिसको घासलेटी साहित्‍य कहते हैं, हिंदी सिनेमा दरअसल वही है?
हमारा जो पल्‍प फिक्‍शन है, वह बहुत ज्‍यादा आयातित (बॉरोड) है। एक उमर में आपको पल्‍प फिक्‍शन पढ़ना अच्‍छा लगता है। आपकी ग्रोथ नहीं हुई तो वो चीज हमेशा आपको अच्‍छी लगेगी। आप दिमागी तौर पर विकसित हो गये, तो वही चीज बहुत सामान्‍य लगने लगेगी।
ऐसा हिंदी सिनेमा के साथ क्‍यों नहीं होता? यहां के दर्शक क्‍यों नहीं विकसित होते?
साइकलॉजिकल कंडीशनिंग ये है हमारे यहां कि सिनेमा मतलब सब भूल जाओ। क्रिटिक्‍स क्‍या लिख रहे हैं, इसका बहुत मतलब है हमारे यहां। छपे हुए शब्‍द पर बहुत विश्‍वास किया जाता है। अखबार में जो छप गया, मतलब वो सही है। अपना दिमाग नहीं इस्‍तेमाल करते। सवाल नहीं कर पाते?
आप ये कहना चाह रहे हैं कि हिंदी में समीक्षक उस तरह से नहीं आ पाये कि वो ऑडिएंस को स्‍तरीय सिनेमा के लिए प्रेरित कर सकें।
बहुत कम हैं सर। दो तरह के समीक्षक हैं। एक हैं जो पूरा ट्रेड वाले हैं। बॉक्‍स ऑफिस हिट उनके लिए सबसे अच्‍छा सिनेमा है। एक हैं, जो साठ-सत्तर के दशक की फिल्‍मों तक आकर रुक गये हैं। वे फिल्‍म आर्काइव के समीक्षक हैं। और आपको यह जानकर भी हैरानी होगी कि अपने यहां फिल्‍म आर्काइव बरसों से अपडेट नहीं हुआ है। 79 के बाद से उसमें फिल्‍म ही नहीं है। तो वही फिल्‍म देख के कुछ लोग बड़े हुए। उसके बाद का सिनेमा उन्‍होंने देखा ही नहीं। उसके बाद के सिनेमा में बड़ा परिवर्तन आया है।
पेशेवर समीक्षा से अलग अब दर्शक भी अपने तरीके से फिल्‍मों तक पहुंच रहे हैं। पान सिंह तोमर का उदाहरण लीजिए। उसको स्‍टूडियो प्रोमोट नहीं करता है। लेकिन सोशल मीडिया के जरिये लोगों तक सूचना पहुंचती है और अचानक से वो फिल्‍म हिट हो जाती है।
सर, पानसिंह तोमर के लिए वो सारी मुहिम मैंने शुरू की थी। पागलों की तरह। लेकिन वो मैं अपनी फिल्‍म के लिए नहीं कर सकता हूं। पानसिंह तोमर के वक्‍त लोगों ने मेरा विश्‍वास इसलिए किया कि मैं किसी और की फिल्‍म के लिए कर रहा था।
लेकिन गैंग्‍स ऑफ वासेपुर के प्रोमोशन में तो सोशल मीडिया का काफी इस्‍तेमाल हुआ।
देखिए, वक्‍त ऐसा है कि लोग तुरत सूंघ लेते हैं क्‍या चीज जेनुइनली हो रही है, क्‍या चीज नहीं हो रही है। वो तभी होगा, जब हमलोग उदार बनेंगे। मैं दुनिया भर की फिल्‍म उठा कर प्रोमोट करता हूं। आपने कभी देखा कि कोई मेरी फिल्‍म को लेकर ऐसा कर रहा हो। वे सतर्क हो जाते हैं कि अगर इसको प्रोमोट करेंगे तो लोग कहेंगे कि हम गाली-गलौज वाला सिनेमा हम प्रोमोट कर रहे हैं। उनको अपनी इमेज की चिंता इतनी ज्‍यादा है। मैं ये सब चीजें इसलिए कह रहा हूं, क्‍योंकि मैंने ये सब किया है। मैंने बिना किसी सपोर्ट सिस्‍टम के किया है। आज जो सपोर्ट सिस्‍टम बना है, वो नॉन फिल्‍म वालों का बना है। फिल्‍म वालों का नहीं है। 2006 से चालू किया मैंने ये सब करना। इसके बाद मैं हताश के बोल रहा हूं ये सब। इससे कुछ नहीं होता। एक ही आदमी बार-बार ये सब करे, तो लोग कहेंगे – धंधा बना लिया है क्‍या?
हिंदी के फिल्‍मकार हिंदी पत्रिकाओं को पढ़ते हैं?
नहीं। हिंदी कोई नहीं पढ़ता यहां पर। डॉ द्विवेदी या तिग्‍मांशु धूलिया के अलावा हिंदी कोई नहीं पढ़ता। दिबाकर बनर्जी हिंदी के लिए कुछ करना चाहते हैं। हिंदी और रीजनल लैंग्‍वेज के लिए एक स्क्रिप्टिंग सॉफ्टवेयर बनाने में लगे हुए हैं। उनका और हम सबका मानना है कि नया सिनेमा छोटे-छोटे गांव-मोहल्‍लों से आएगा। इसके लिए उनकी भाषा में स्क्रिप्‍ट लिखना आसान करना होगा।
इसी दशक में ऐसा हुआ कि जो माध्‍यम निर्देशक का है और जो अभिनेताओं की वजह से जाना जाता है, वह अब निर्देशकों की वजह से भी जाना जाने लगा है। जैसे आप ही हैं या दिबाकर बनर्जी, विशाल भारद्वाज, तिग्‍मांशु धूलिया, इम्तियाज अली… लोग इन नामों की वजह से भी फिल्‍म देखने जाते हैं।
हां, लेकिन ये पूरे देश के सिर्फ दस फीसदी दर्शकों को खींच पाने में सक्षम हैं। ये अभी भी बाजार को प्रभावित करने वाले निर्देशक नहीं हैं। मेरा फिल्‍म बना पाने का एक बहुत बड़ा कारण है। मेरी जितनी भी फिल्‍में हैं, वह किसी भी नयी कंपनी की पहली फिल्‍म है। बाजार में मैच्‍योर होने से पहले उन्‍होंने मेरी फिल्‍म को हरी झंडी दिखायी। स्‍पॉटब्‍वॉय की पहली फिल्‍म थी, आमिर और देव डी। वाय कॉम की नयी टीम की पहली फिल्‍म थी, शैतान और गैंग्‍स ऑफ वासेपुर। मिड डे की अकेली फिल्‍म थी ब्‍लैक फ्राइडे। मेरी फिल्‍म बनाने के बाद या तो कंपनियां बंद हो गयीं या उन्‍हें लगा कि यार बड़े स्‍टार के साथ फिल्‍म बनाना ज्‍यादा सही है।
साधिकार मोहल्‍ला लाइव से