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Tuesday, January 10, 2012

ऑन स्‍क्रीन ऑफ स्‍क्रीन : गढ़ते-बढ़ते अनुराग कश्‍यप

क्रिएटिव लेकिन अराजक है अनुराग कश्यप-अजय ब्रह्मात्‍मज

फिल्मों से संबंधित सारे बौद्धिक और कमर्शियल इवेंट में एक युवा चेहरा इन दिनों हर जगह दिखाई देता है। मोटे फ्रेम का चश्मा, बेतरतीब बाल, हल्की-घनी दाढी, टी-शर्ट और जींस में इस युवक को हर इवेंट में अपनी ठस्स के साथ देखा जा सकता है। मैं अनुराग कश्यप की बात कर रहा हूं। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के इस मुखर, वाचाल, निर्भीक और साहसी लेखक-निर्देशक ने अपनी फिल्मों और गतिविधियों से साबित कर दिया है कि चमक-दमक से भरी इस दुनिया में भी धैर्य और कार्य से अपनी जगह बनाई जा सकती है। बाहर से आकर भी अपना सिक्का जमाया जा सकता है। लंबे तिरस्कार, अपमान व संघर्ष से गुजर चुके अनुराग कश्यप में एक रचनात्मक आक्रामकता है। उनका एक हाथ मुक्के की तरह गलीज फिल्म इंडस्ट्री के ध्वंस के लिए तना है तो दूसरे हाथ की कसी मुट्ठी में अनेक कहानियां व सपने फिल्म की शक्ल लेने के लिए अंकुरा रहे होते हैं। अनुराग ने युवा निर्देशकों को राह दिखाई है। मंजिल की तलाश में वाया दिल्ली बनारस से मुंबई निहत्था पहुंचा यह युवक आज पथ प्रदर्शक बन चुका है और अब वह हथियारों से लैस है।

जख्म हरे हैं अब तक

इस तैयारी में अनुराग ने मुंबई में अनेक साल बिताए। थिएटर, टीवी, विज्ञापन और फिर फिल्मों तक पहुंचने का रास्ता सुगम तो बिलकुल नहीं रहा। निराशा हमेशा साथ रही, लेकिन निराशा में छिपी आशा ने उम्मीद का दामन थामे रखा। दोस्ती, बैठकी और सोहबत के शौकीन अनुराग ने कई-कई दिनों तक खुद को कमरे में बंद रखा, लेकिन अवसाद के क्षणों में भी आत्मघाती कदम नहीं उठाए। असमंजस और दुविधा के उस दौर में करीबी दोस्तों ने भी लानत-मलामत की। निकम्मा और फेल्योर कहा, दिल व दिमाग पर गहरे जख्म दिए। उन्हें अनुराग ने बडे जतन से पाल रखा है, क्योंकि उन जख्मों की टीस ही उन्हें नई चुनौतियों से जूझने और सरवाइव करने का जज्बा देती है। अभी अनुराग से अकेले मिल पाना मुश्किल काम है, लेकिन अगर आप उनके साथ समय बिताएं तो महसूस करेंगे वह भरी सभा में निर्लिप्त हो जाते हैं। अचानक खो जाना और फिर मुस्कराते हुए अपनी मौजूदगी जाहिर करना उनकी खासियत है। वे अपनी मौजूदगी से शांत झील में फेंके गए कंकड की तरह हिलोर पैदा करते हैं। उनसे हाथ मिलाते ही साथ हो जाने का गुमान फिल्मों में आने को उत्सुक और महत्वाकांक्षी युवकों को कालांतर में भारी तकलीफ देता है, लेकिन अनुराग अपने साथियों को हाथ मिला कर ही चुनते हैं। उन्हें अपना अनुगामी नहीं, सहयात्री बनाते हैं और यकीन करें कि उनसे दो-दो हाथ भी करने को तैयार रहते हैं। वे अपने युवा मित्रों एवं प्रशंसकों को साहस और मजबूती देकर अपनी चुनौती बढाते हैं। मैंने देखा है अपने कटु आलोचकों से उनका लाड-प्यार। उन्होंने रहीम के दोहे को जीवन में उतार लिया है। निंदक नियरे राखिए का वह आस्था से पालन करते हैं।

लुगदी साहित्य से प्रेम

अनुराग मुंबई आने के बाद सभी की तरह थोडा भटके और अटके। फिर उनकी मुलाकात राघवन बंधु (श्रीराम-श्रीधर), शिवम नायर और शिव सुब्रमण्यम से हुई। इनकी संगत और बातचीत में सिनेमा का ज्ञान बढा। लेखन का कौशल था, उसे और धार मिल गई। दरअसल फिल्मों में आने की प्रेरणा उन्हें फिल्म फेस्टिवल में देखी रिअलिस्टिक फिल्मों से मिली। उससे पहले की देखी हिंदी फिल्में भी अछी लगती थीं, उनसे रिश्ता भी महसूस होता था, लेकिन फिल्म बनाने का एहसास फेस्टिवल में देखी गई फिल्मों से ही जागा। लगा कि यह तो वह भी कर सकते हैं।

बहरहाल, मुंबई में पृथ्वी थिएटर और रंगमंच में थोडी सक्रियता बढी। तब इरादा ऐक्टिंग में भी किस्मत आजमाने का था। छोटे-मोटे काम भी किए। दो-चार संवाद बोले, मगर ऐक्टिंग का संघर्ष फालतू व लंबा लगने से लेखन की तरफ रुझान हो गया। उनके भाई-बहन बताते हैं कि कहानी सुनाना उन्हें बचपन से आता है। ड्रामा गढने में बचपन व किशोरावस्था में पढे लुगदी साहित्य से मदद मिली। अनुराग ने एक इंटरव्यू में बताया था कि वे सत्य कथा और मनोहर कहानियां बडे शौक से पढा करते थे।

पहली फिल्म डिब्बे में बंद आरंभिक दिनों में ही ऑटोशंकर के ऊपर एक स्क्रिप्ट लिखी। मजेदार वाकया है कि शूटिंग आरंभ होने वाली थी, मगर स्क्रिप्ट फाइनल नहीं थी। अनुराग ने जब जाना कि स्क्रिप्ट वर्क नहीं कर रही है तो राघवन बंधु से अनुमति लेकर लिखने की हिम्मत जुटाई। जोश और ऊर्जा की कमी थी नहीं। रातों-रात स्क्रिप्ट लिखी। उसी स्क्रिप्ट पर ऑटोशंकर की शूटिंग हुई। इससे प्रोत्साहित होकर अनुराग ने अपनी फिल्म लिखनी शुरू कर दी। फिल्म का नाम मिराज रखा था। बाद में वही स्क्रिप्ट पांच के नाम से बनी। हालांकि अनुराग की पहली सोची, लिखी और निर्देशित पांच अभी तक रिलीज नहीं हो सकी है। कैसी विडंबना है कि अंतरराष्ट्रीय ख्याति के इस युवा निर्देशक की पहली फिल्म पांच अभी तक डब्बे में बंद है!

मेनस्ट्रीम से दूरी

इसी बीच दिल्ली के मित्र मनोज बाजपेयी को महेश भट्ट की कुछ फिल्मों के बाद राम गोपाल वर्मा की दौड मिली। कहते हैं कि राम गोपाल वर्मा ने पहली मुलाकात में ही मनोज को भांपने के बाद भीखू म्हात्रे के बारे में सोच लिया था। उन्होंने मनोज को एक बार मना भी किया, तुम इतना छोटा काम मत करो, क्योंकि अगली बार मैं तुम्हें केंद्रीय भूमिका में लेकर फिल्म बनाऊंगा। एक स्ट्रगलर के लिए भविष्य से बेहतर विकल्प वर्तमान होता है। मनोज ने दौड में मामूली रोल किया। धुन के पक्के राम गोपाल वर्मा ने उन्हें सत्या का आइडिया सुनाया और कहा कि किसी नए लेखक को ले आओ। मनोज ने राम गोपाल वर्मा से अनुराग कश्यप की मुलाकात करवा दी। अनुराग ने बताया था, कुछ ही दिन पहले श्रीराम राघवन और दोस्तों के साथ मैंने रंगीला देखी थी। वह फिल्म मुझे इंटरेस्टिंग लगी थी। जब मनोज ने बताया कि राम गोपाल वर्मा मुझसे मिलना चाहते हैं तो मैं चौंका। मेरे मुंह से निकला- हां..और मुंह खुला रह गया। मुलाकात हुई। सत्या का लेखन आरंभ हुआ तो अनुराग की सारी योजनाएं धरी रह गई। अनुराग स्वीकार करते हैं, राम गोपाल वर्मा के साथ काम करने और सत्या, कौन और शूल फिल्म लिखने से मेरा आत्मविश्वास बढा। सत्या हिट होते ही सक्रियता और मांग बढ गई, लेकिन इंडस्ट्री की मुख्यधारा के निर्माता-निर्देशक अनुराग को लेकर आशंकित ही रहे। उन्हें यह ढीठ युवक नहीं सुहाता था।

अराजकता भी-एकाग्रता भी

अनुराग में लडने का दम है। अपने जीवन में अनुराग जितने भी अराजक व लापरवाह हों, काम को लेकर वह अनुशासित और एकाग्र रहते हैं। मैंने देखा है कि फिल्म की शूटिंग हो या राइटिंग, एक बार लीन हो जाने के बाद वे किसी और चीज पर ध्यान नहीं देते। पिछले 15-16 सालों में अनुराग ने यह विश्वास हासिल कर लिया है कि आप उन्हें जिम्मेदारी सौंप कर निश्िचत हो सकते हैं। यही कारण है कि अभी उन्हें निर्माता के तौर पर शामिल कर अनेक प्रोडक्शन कंपनियां चालू हो गई हैं। कॉरपोरेट हाउस हों या स्वतंत्र निर्माता, सभी को ब्रैंड अनुराग में भरोसा है। वे उनके नाम पर आज निवेश के लिए तैयार हैं। बडी से बडी फिल्म के लिए उत्सुक निर्देशकों-निर्माताओं के लिए उनका यह व्यवहार अनुकरणीय हो सकता है। देव डी की कामयाबी के बाद वह चाहते तो बडे स्टार्स को लेकर बडे बजट की महंगी फिल्म प्लान कर सकते थे। उनके समर्थन में कई निर्माता तैयार थे, लेकिन अनुराग ने दैट गर्ल इन येलो बूट्स जैसी छोटे बजट की फिल्म बनाई। इस फिल्म में कल्कि कोइचलिन मुख्य भूमिका में थीं। फिल्म के लिए बजट जुटा पाना मुश्किल था। लेकिन अनुराग ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने फिल्म पूरी की और एक साल के बाद उसे रिलीज किया। इसे कुछ लोग एक कलाकार की सनक के रूप में देख सकते हैं, लेकिन प्रलोभन से खुद को बचा लेने पर आर्टिस्ट भ्रष्ट होने से बचा रह जाता है। अनुराग के समकालीन दूसरे निर्देशकों में आ रहे भटकाव और पतन पर गौर करें तो इसे आसानी से समझा जा सकता है।

शादी ने दिया ठहराव

पति-पत्नी और प्रेमियों के बीच के संबंध को उनके अलावा कोई नहीं जान सकता। अनुराग पहली पत्नी आरती बजाज से कानूनी रूप से अलग हो चुके हैं। उन्होंने कल्कि कोइचलिन से शादी कर ली है। उनके नजदीकी बताते हैं कि इससे उनके जीवन और काम में व्यवस्था देखने को मिली है। उल्लेखनीय है कि अलगाव और झगडे के दिनों में कभी अनुराग ने आरती के लिए अपशब्द का इस्तेमाल नहीं किया और न शिकायत की। एकांतिक बातचीत में आत्मालोचना के स्वर में कहा, शायद मैं ही गलत था, निर्वाह नहीं कर सका। लेकिन आरती से उनके प्रोफेशनल संबंध बने रहे। इज्जत कायम रही। आरती ने उनकी फिल्में एडिट कीं। वे अपनी इकलौती बेटी के लिए पूरा समय निकालते हैं। उसके मन का काम करते हैं। उनके नए फ्लैट में बेटी का कमरा हमेशा सजा-धजा रहता है। पिछले दिनों वे अपने बेटी के साथ यूरोप की यात्रा पर गए थे। वे इसे अपने जीवन की यादगार यात्रा मानते हैं। उसके बाद कल्कि के साथ की गई दक्षिण अमेरिकी देशों की यात्रा ने उन्हें जिंदगी जीने व समझने का नया सलीका दिया है। मुझे साफ दिखता है कि शादी के बाद अनुराग की ग्रंथियां कम हुई हैं।

समकालीनों की तारीफ

पिछले दिनों इम्तियाज अली की फिल्म रॉकस्टार रिलीज हुई तो अनुराग ने दावा किया कि आलोचक अगर इसी फिल्म को दोबारा देखें तो उनकी राय बदल जाएगी। यही हुआ भी। उन्होंने असंतुष्ट और मुखर आलोचकों के बीच इम्तियाज अली को बिठाया। रात के एक से साढे तीन बजे तक मुंबई के सिनेमैक्स थिएटर की सीढियों पर चले उस प्रश्नोत्तर प्रसंग में शामिल मित्रों में से कोई भी ता-जिंदगी नहीं भूल पाएगा। अनुराग ने ऐसा क्यों किया? कायदे से देखें तो इम्तियाज और अनुराग की शैली की भिन्नता स्पष्ट है, लेकिन सोचा न था के समय से वे इम्तियाज के समर्थन में खडे दिखाई देते हैं। इम्तियाज का ऐसा ही समर्थन अनुराग को भी हासिल है। फर्क यही है कि इम्तियाज छाती ठोक कर समर्थन नहीं करते, जबकि अनुराग कश्यप बेशर्मी की हद तक समर्थन पर उतर आते हैं। अपने समकालीनों से परस्पर सम्मान और समर्थन का ऐसा व्यवहार हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में नहीं दिखता।

नए लोगों को दिया मौका

हाल ही में मध्य प्रदेश के एक शहर से आए युवा महत्वाकांक्षी निर्देशक से मुलाकात हुई। वह अपनी स्क्रिप्ट के साथ फिल्म बनाने की इछा लिए घूम रहा है। मैंने पूछा कि कहां रहते हो? जीवन कैसे चलता है? उसने तपाक से बताया, अनुराग सर ने ऑफिस में रहने की अनुमति दे दी है। कुछ दिन-महीने वहां रह लूंगा। मेरे जैसे कई स्वप्नजीवी वहां हैं। पता चला कि अनुराग थोडी नाराजगी और झडप के साथ सभी को अपने ऑफिस में रहने, टिकने और खुद को संभालने का मौका देते हैं। वे प्रतिभाशाली लडकों को कभी निराश नहीं करते। मौके देते और दिलवाते हैं, लेकिन उनका नारा है बी द चेंज (स्वयं परिवर्तन बनो)। उनकी यही सलाह है कि जो करना चाहते हो, खुद करो। किसी के सहारे या भरोसे मत रहो। हालांकि उनके इस तर्क से कई पुराने व अभिन्न मित्र नाराज भी हुए, क्योंकि अनुराग ने पुराने परिचितों-मित्रों के बजाय नए लोगों को फिल्में बनाने के मौके दिए।

हिंदी साहित्य से लगाव

अनुराग की खासियत है कि वे एक साथ विदेशों में पैदा हो रही नई प्रवृत्तियों और देश में आकार ले रहे नए विचारों से वाकिफ हैं। अधिकतर लेखक और निर्देशक कामयाब होने के साथ देखना, पढना और मिलना छोड देते हैं, लेकिन मैंने देखा है कि अनुराग बहुत पढते हैं। हिंदी साहित्य से लेकर विश्व सिनेमा तक से परिचित हैं। कारण पूछने पर वे हंसते हुए कहते हैं, वाकिफ नहीं रहूंगा तो दो साल बाद आप ही गाली देने लगोगे और मुझसे बातें करना बंद कर दोगे। अनुराग की ताजा कामयाबी है कि जिस यशराज कैंप से कभी उन्हें बहिष्कृत कर दिया गया था, अब उसी में अनुराग ने अपने मित्रों के साथ नई प्रोडक्शन कंपनी फैंटम की लॉन्चिंग की है। फिल्म इंडस्ट्री में कदम रख रहे सहमे-घबराए युवकों के लिए अनुराग सफल प्रेरणा हैं।

Thursday, December 31, 2009

दरअसल:अनुराग, इम्तियाज और विशाल

-अजय ब्रह्मात्मज
अपनी पसंद की फिल्मों के बारे में लिखना सहज नहीं होता। साल की 100 से अधिक फिल्मों में से श्रेष्ठ फिल्मों को चुनना व्यक्तिगत अभिरुचि के साथ इस तथ्य पर भी निर्भर करता है कि व्यापक दर्शक वर्ग ने उन फिल्मों को कैसे रिसीव किया? सन 2009 की बात करूं, तो सबसे पहले तीन युवा निर्देशकों की फिल्मों का उल्लेख करूंगा। अनुराग कश्यप, इम्तियाज अली और विशाल भारद्वाज की फिल्में हिंदी फिल्मों में आ रहे बदलाव का संकेत देती हैं। तीनों फिल्मकार हिंदी प्रदेश के हैं। उन्होंने हिंदी समाज के सोच और मुहावरे को बारीकी से फिल्मों में रखा है। तीनों की अलग शैली है और अपनी विलक्षणता से उन्होंने हिंदी फिल्म इंडस्ट्री को अचंभित किया है। अनुराग कश्यप की पहली फिल्म पांच थी। लंबे समय तक वह सेंसर की उलझनों और निर्माता की उदासी के कारण डिब्बे में पड़ी रही। इधर किसी ने उसे इंटरनेट पर लीक कर दिया। अभी अनुराग के प्रशंसक उसे इंटरनेट से डाउनलोड कर धड़ल्ले से देख रहे हैं। अनुराग की ब्लैक फ्राइडे पसंद की गई थी, लेकिन उसे फीचर फिल्म नहीं माना गया। फिर भी मुंबई के दंगों पर आधारित ब्लैक फ्राइडे उस समय के विचलित लोगों के मर्म को सामने ले आती है। मार्मिक और मानवीय ब्लैक फ्राइडे को डाक्यूमेंट्री के दर्जे में नहीं डाला जा सकता। अनुराग की नो स्मोकिंग के प्रयोग और प्रतीक को बहुत कम दर्शक समझ पाए। इस साल अनुराग की देव डी और गुलाल को कुछ समीक्षक और दर्शकों ने पसंद किया। दोनों ही फिल्मों में नवीनता और साफगोई के साथ चरित्रों को पेश करने की अनुराग की हिम्मत अच्छी लगी। दोनों ही फिल्में भिन्न किस्म से म्यूजिकल थीं। अनुराग को इंडस्ट्री ने स्वीकार कर लिया है। अब उन्हें एक ऐसी फिल्म बनानी है, जिससे आम दर्शकों के बीच उनकी पहचान बने।
इम्तियाज अली की पहली फिल्म सोचा न था का शीर्षक उनकी कामयाबी पर भी लागू होता है। अभय देओल और आयशा टाकिया की इस फिल्म को समीक्षकों ने इंडस्ट्री के लोग और दर्शकों से ज्यादा पसंद किया। उन्हें जब वी मेट जैसी बड़े बजट की फिल्म मिली। करीना कपूर और शाहिद कपूर की दोस्ती के दिनों में यह फिल्म बनी और उनके अलगाव के समय रिलीज हुई। जब वी मेट की एनर्जी ने सभी को प्रभावित किया। खास कर करीना की अल्हड़ अदायगी और शाहिद के संजीदा अभिनय की वजह से इम्तियाज की इस रोमांटिक फिल्म के जबर्दस्त कामयाबी मिली। इस साल उनकी लव आज कल आई। आशंका थी कि दीपिका पादुकोण और सैफ अली खान के साथ वे रोमांस की लहर पैदा कर पाएंगे या नहीं? फिल्म लगी, तो आशंकाएं निर्मूल निकलीं और पूरा देश इस फिल्म की धुन पर आहूं-आहूं करता नजर आया।
विशाल भारद्वाज संजीदा निर्देशक हैं। उन्होंने मकड़ी से शुरुआत कर जल्दी ही मकबूल से मकबूलियत हासिल कर ली। ब्लू अंब्रेला में उन्होंने फिर से मासूमियत को दर्ज किया, तो ओमकारा में पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति के खुरदुरे पहलू को सामने लाए। यह फिल्म राजनीति से अधिक परस्पर संबंधों में शक और संदेह के घात-आघात को चित्रित करती है। इस साल कमीने में विशाल ने मुंबई की पृष्ठभूमि में जुड़वा भाइयों की फरेबी कहानी सुनाई। कमीने पर विदेशी फिल्मकार टैरवाटिवो का असर दिखा, लेकिन विशाल की यही शैली है। वे हिंसा और अपराध के साथ रिश्तों की कहानी भी कहते हैं। कमीने के संगीत की गूंज अभी तक समाप्त नहीं हुई है। देव डी, लव आज कल और कमीने के साथ मुझे स्लमडॉग करोड़पति, लक बाई चांस, दिल्ली 6, फ्रोजेन, संकट सिटी, चिंटू जी, ह्वाट्स योर राशि, जेल और पा भी अच्छी लगीं।

Thursday, July 16, 2009

इम्तियाज ने मुझे हमेशा सरप्राइज किया है-अनुराग कश्यप

-अजय ब्रह्मात्मज

'लव आज कलÓ के निर्देशक और अनुराग कश्यप पुराने दोस्त हैं। फिल्ममेकिंग की में दोनों की शैली अलग है, लेकिन दोनों एक-दूसरे को पसंद करने के साथ निर्भर भी करते हैं। अनुराग कश्यप ने अपने दोस्त इम्तियाज अली के बारे में खास बात की-
इम्तियाज बहुत शांत आदमी है। उसको मैंने कभी घबराते हुए नहीं देखा है। कभी परेशान होते हुए नहीं देखा है। उसमें उत्सुकता बहुत है। अगर आप बताएं कि कल दुनिया खत्म होने वाली है तो पूछेगा कि कैसी बात कर रहे हो? अच्छा कैसे खत्म होगी? छोड़ो, बताओ कि शाम को क्या कर रहे हो? वह इस तरह का आदमी है। बड़े प्यार से लोगों को हैंडिल करता है। बहुत सारी खूबियां है। उसके साथ जो एक बार काम कर ले या उसे जान ले तो वो दूर नहीं जाना चाहेगा।
उसके चेहरे पर अजीब सी मुस्कराहट रहती है। हमलोग उसको शुरू से बोलते थे तू अंदर से कहीं न कहीं बहुत बड़ा शैतान है। वह मुस्कुरा कर... छुपा कर रखता है। उसके अंदर कुछ बहुत ही खास बात है। सेंसिटिव बहुत है। बहुत ही रोमांटिक आदमी है। बहुत स्थिर है। डिपेंडेबल है। मुझे मालूम है कल कोई हो ना हो मगर इम्तियाज अली है। काफी चीजों के लिए मैं उस पर निर्भर कर सकता हूं। सलाह के लिए खास कर... हर स्क्रिप्ट पढ़ाता हूं। हर फिल्म दिखाता हूं। वह मुझसे बोलता है कि तू सबसे लड़ाई-झगड़ा बंद कर के बस काम करो। वही एक आदमी है, जिससे मैं सलाह लेता हूं।
मुझे उसकी फिल्म बहुत अच्छी लगती है। हिंदी फिल्मों की प्रेमकहानियां मुझे अच्छी नहीं लगतीं। नकली प्रेम कहानियां बनाते हैं। पता नहीं क्यों मैं अजीब तरीके से चिढ़ता हूं और दूर भागता हूं। इम्तियाज की फिल्में कहीं न कही बहुत स्वाभाविक, बहुत ही रीयल होती है। उसमें गाने बहुत स्वाभाविक तरीके से आते हैं। कहीं न कहीं आप उसमें अपने आप को पाते हो। उसका कैरेक्टर भले ही बिजनेस मैन है। 'जब वी मेटÓ लार्जरदेन लाइफ नहीं है। फिल्म का हीरो बहुत बड़ा बिजनेसमैन है, लेकिन ह्यूमन है। वह आदमी है। वह लार्जर दैन लाइफ नहीं है। हेलीकॉप्टर में नहीं घूमता है। वह एक नार्मल इंसान है। उसकी लव स्टोरी बहुत ही अलग रहती है। कुछ लोग हैं जो इस तरह के रोमांटिक फिल्में बनाते हैं, जो बहुत रीयल स्वाभाविक एक वास्तविक दुनिया में आधारित होती हैं। जैसे एडवर्ड बर्न बनाया करता था पहले। कुछ फ्रेंच फिल्ममेकर हैं जो साधारण सी प्रेम कहानियां बनाते हैं। वह जिस तरह के सेंसिटिव मूवमेंट क्रिएट करता है,उस से फिल्में आसपास की लगती हैं। उसके कैरेक्टर कहीं न कहीं कंफ्यूज और कमजोर लोग होते हैं। उसके कैरेक्टर पहले अपने आपको खोते हैं,फिर पाते हैं। यह उसकी खास बात है, जो मुझे बहुत अच्छी लगती है।
हमारी दोस्ती बहुत पुरानी है। मुझे खुद नही मालूम था कि मैं फिल्ममेकर बनूंगा। हमलोग कॉलेज में थे। उसका पहला लक्ष्य यह था कि मैं 21 का होते ही पहले शादी कर लूंगा। 21 का होते ही उसने शादी कर ली। काम मिला नहीं और शादी कर ली। हम में से वह पहला आदमी था, जिसने पहले शादी की। वह सबसे ज्यादा ट्रैवल करता है और ट्रैवल करते समय लिखता है। सारी फिल्में वह ट्रैवल करते हुए लिखता है। वह यात्रा और जर्नी उसकी फिल्मों में आ जाती है। वह सही मायने में जीता है। 'सोचा न थाÓ की मैंने स्क्रिप्ट पढ़ी थी। स्क्रिप्ट पढक़र मुझे नहीं लगा था कि वह फिल्म इतनी अच्छी बनेगी। वह मेरी फेवरिट फिल्म है और 'जब वी मेटÓ में भी वही हुआ। उसका नजरिया ऐसा है कि आप स्क्रिप्ट को पढक़र अंदाज नहीं लगा सकते कि वह क्या करने वाला है। ऑन स्क्रीन क्या होने वाला है और कैसे अनफोल्ड होगी फिल्म... इसका अंदाजा स्क्रिप्ट पढ़ कर नहीं लगा सकते। वह सालों-साल बैठा रहता है, लिखता रहता है। उसकी कहानियां चलती रहती है। मैंने उसकी सारी कहानियां पढ़ी हैं और स्क्रीन पर देख कर सरप्राइज हुआ हूं। खास कर 'लव आज कलÓ मैंने देखी है। सात-आठ मिनट तक आप फिल्म देखते हैं तो समझने की कोशिश करते हैं। आठवें मिनट के बाद आप हिलेंगे नहीं। खास बात है। कहीं न कहीं पकड़ लेती है फिल्म।
इम्तियाज की जो कहानियां है, उसने उन्हें जिया हैं। मेरा जो सिनैमैटिक अप्रोच है, उसमें बहुत सारे प्रभाव दिख सकते हैं। क्योंकि मैं बहुत सारी चीजों से एक्सपोज्ड हूं। लेकिन इम्तियाज जिंदगी से कहानियां ढूंढ कर ला रहा है। जिंदगी की कहानियों की अलग बात होती है।

Friday, March 13, 2009

फ़िल्म समीक्षा:गुलाल

-अजय ब्रह्मात्मज
इस दशक में आए युवा निर्देशकों में अनुराग कश्यप ने अपनी नयी शैली, आक्रामक रूझान, सशक्त कथ्य और नयी भाषा से दर्शकों के बीच पैठ बना ली है। अपनी हर फिल्म में वे किसी नए विषय से जूझते दिखाई पड़ते हैं। गुलाल राजस्थान की पृष्ठभूमि पर बनी राजनीतिक फिल्म है। यह परतदार फिल्म है। इसकी कुछ परतें उजागर होती है और कुछ का आभास होता है। गुलाल हिंदी समाज की फिल्म है।
किरदारों और कहानी की बात करें तो यह दिलीप (राजा सिंह चौधरी) से आरंभ होकर उसी पर खत्म होती है। दिलीप के संसर्ग में आए चरित्रों के माध्यम से हम विकट राजनीतिक सच का साक्षात्कार करते हैं। दुकी बना (के। के। मेनन) अतीत के गौरव को लौटाने का झांसा देकर आजादी के बाद लोकतंत्र की राह पर चल रहे देश में फासीवाद के खतरनाक नमूने के तौर पर उभरता है। दुकी बना और उसका राजनीतिक अभियान वास्तव में देश की व‌र्त्तमान राजनीति का ऐसा नासूर है, जो लगातार बढ़ता ही जा रहा है। अनुराग कश्यप ने किसी व्यक्ति, जाति,, समुदाय या धर्म पर सीधा कटाक्ष नहीं किया है। समझदार के लिए इशारा ही काफी है। दर्शक समझ जाते हैं कि क्या बातें हो रही हैं और किरदारों के बीच के संघर्ष की वजह क्या है? इस फिल्म के किरदारों के साक्ष्य देश में उपलब्ध हैं।
अनुराग कश्यप की फिल्मों में आए प्रतीक और बिंब गहरे सामाजिक संदर्भ से युक्त होते हैं। अगर समाज, राजनीति, साहित्य और आंदोलनों की सामान्य समझ नहीं हो तो अनुराग की फिल्म के विषय और कथ्य का निर्वाह दुरूह लगने लगता है। गुलाल इस मायने में उनकी पिछली फिल्मों से थोड़ी सरल है। फिर भी फिल्म का कथा विन्यास पारंपरिक नहीं है, इसलिए कहानी समझने में कुछ वक्त लगता है। इस फिल्म के संवाद महत्वपूर्ण है। अगर संवादों में प्रयुक्त शब्द सुनने से रह गए तो दृश्य का मर्म समझने में चूक हो सकती है। गुलाल ऐसी फिल्म है, जिसे अच्छी तरह समझने के लिए जरूरी है कि सिनेमाघरों में आंख और कान खुले हों और दिमाग के दरवाजे बंद न हों। यह आम हिंदी फिल्म नहीं है, इसलिए खास तवज्जो चाहती है। अनुराग के कथ्य को पियूष मिश्रा ने गीतों से मजबूत किया है। लंबे समय के बाद फिल्म के कथ्य के मेल में भावपूर्ण और गहरे अर्थो के शब्दों से रचे गीत सुनाई पड़े हैं। निर्देशक के भाव को गीतकार ने यथायोग्य अभिव्यक्ति दी है।
पियूष मिश्रा का गीत-संगीत गुलाल को उचित ढंग से प्रभावशाली बनाता है। फिल्म का पालिटिकल मोजरा (जैसे दूर देश के टावर में घुस गयो रे ऐरोप्लेन), रामधारी सिंह दिनकर की पंक्तियां , प्यासा की ये दुनिया से प्रेरित गीत और शहर ़ ़ ़ जैसी अभिव्यक्ति उल्लेखनीय है। अनुराग कश्यप की गुलाल समूह के सामाजिक संदर्भ से आरंभ होकर व्यक्ति की वैयक्तिक ईष्र्या पर खत्म होती है। समाज के स्वार्थी तत्वों द्वारा इस्तेमाल किया जा रहा व्यक्ति सही समझ के अभाव में खुद ही खुद के विनाश का कारण बन जाता है। फिल्म का नायक दिलीप इस समाज में लाचार, विवश और पंगु हो रहे व्यक्ति का प्रतिनिधि है। वह नपुंसक नहीं है, लेकिन अपने सामाजिक परिवेश से कटे होने के कारण सच से टकराने पर खौफजदा रहता है। परिस्थितियों में फंसने पर वह डरपोक, कायर और भ्रमित दिखता है। अनुराग कश्यप ने गुलाल में राजा सिंह चौधरी, दीपक डोबरियाल,आयशा मोहन और अभिमन्यु सिंह जैसे नए कलाकारों से सुंदर काम लिया है। दृश्यों की तीव्रता इन कलाकारों को अपनी प्रतिभा दिखाने का पर्याप्त अवसर देती है। पियूष मिश्रा के योगदान के बगैर गुलाल इस रूप और प्रभाव में सामने नहीं आ पाती। उन्होंने अपने अभिनय, स्वर और गीत से फिल्म को उठा दिया है। के के मेनन और आदित्य श्रीवास्तव जैसे सधे अभिनेताओं की अलग से तारीफ लिखने की जरूरत नहीं है। दोनों ही अनुराग कश्यप के भरोसेमंद और मददगार अभिनेता हैं।

***1/2

Friday, February 6, 2009

फ़िल्म समीक्षा:देव डी


आत्मलिप्त युवक की पतनगाथा
-अजय ब्रह्मात्मज

घिसे-पिटे फार्मूले और रंग-ढंग में एक जैसी लगने वाली हिंदी फिल्मों से उकता चुके दर्शकों को देव डी राहत दे सकती है। हिंदी फिल्मों में शिल्प और सजावट में आ चुके बदलाव का सबूत है देव डी। यह फिल्म आनंद और रसास्वादन की पारंपरिक प्रक्रिया को झकझोरती है। कुछ छवियां, दृश्य, बंध और चरित्रों की प्रतिक्रियाएं चौंका भी सकती हैं। अनुराग कश्यप ने बहाना शरत चंद्र चट्टोपाध्याय के देवदास का लिया है, लेकिन उनकी फिल्म के किरदार आज के हैं। हम ऐसे किरदारों से अपरिचित नहीं हैं, लेकिन दिखावटी समाज में सतह से एक परत नीचे जी रहे इन किरदारों के बारे में हम बातें नहीं करते। चूंकि ये आदर्श नहीं हो सकते, इसलिए हम इनकी चर्चा नहीं करते। अनुराग कश्यप की फिल्म में देव, पारो, चंदा और चुन्नी के रूप में वे हमें दिखते हैं।
देव डी का ढांचा देवदास का ही है। बचपन की दोस्ती बड़े होने पर प्रेम में बदलती है। एक गलतफहमी से देव और पारो के रास्ते अलग होते हैं। अहंकारी और आत्मकेंद्रित देव बर्दाश्त नहीं कर पाता कि पारो उसे यों अपने जीवन से धकेल देगी। देव शराब, नशा, ड्रग्स, सेक्स वर्कर और दलाल के संसर्ग में आता है। वह चैन की तलाश में बेचैन है। उसकी मुलाकात चंदा से होती है तो उसे थोड़ा सुकून मिलता है। उसे लगता है कि कोई उसकी परवाह करता है। चंदा भी महसूस करती है कि देव खुद के अलावा किसी और से प्रेम नहीं करता। देव अमीर परिवार का बिगड़ैल बेटा है, जो भावनात्मक असुरक्षा के कारण भटकता हुआ पतन के गर्त में पहुंचता है। यही कारण है कि उसकी बेबसी और लाचारगी सहानुभूति नहीं पैदा करती। उसके जीवन में आए पारो, चंदा और रसिका रियल, स्मार्ट और आधुनिक हैं। वे भी उसकी हकीकत समझते हैं और दया नहीं दिखाते। देव डी का देव कमजोर, असुरक्षित, भावुक, आत्मलिप्त और अनिश्चित व्यक्ति है। बाह्य परिस्थितियों से ज्यादा वह खुद के अनिश्चय और भटकाव का शिकार है।
अनुराग कश्यप ने देव डी में चंदा की पृष्ठभूमि की खोज की है। सेक्स वर्कर बनने की विवशता की कहानी मार्मिक है। अनजाने में एमएमएस कांड में फंस गई लेनी परिवार और समाज से बहिष्कृत होने के बाद वह चुन्नी की मदद से दिल्ली के पहाड़गंज में शरण पाती है और अपना नाम चंद्रमुखी रखती है। कुल्टा समझी गई चंदा मानती है कि समाज का अधिक हिस्सा कुत्सित ओर गंदी चीजें देखने में रस लेता है। जिस समाज ने उसे बहिष्कृत किया, उसी समाज ने उसके एमएमएस को देखा। देव डी की पारो साहसी, आधुनिक और व्यावहारिक है। देव से अलग होने के बाद वह बिसूरती नहीं। दोबारा मिलने पर वह देव को अपनी अंतरंगता से तृप्त करती है, लेकिन देव के प्रति वह किसी किस्म की भावुकता नहीं दिखाती। वह अपने परिवार में रच-बस चुकी है। इस फिल्म को निर्देशित करते समय अनुराग के मानस में पुरानी देवदास मंडराती रही है। लेनी तो अपना नाम चंद्रमुखी देवदास की माधुरी दीक्षित के कारण रखती है। देव डी में चित्रित प्रेम, सेक्स, रिश्ते और भावनाओं को आज के संदर्भ में ही समझा जा सकता है। देव डी एक प्रस्थान है, जो प्रेम के पारंपरिक चित्रण के बजाए 21वीं सदी के शहरी और समृद्ध भारत के युवा वर्ग के बदलते प्रेमबोध को प्रस्तुत करती है। अनुराग कश्यप ने क्रिएटिव साहस का परिचय दिया है। उन्होंने फिल्म के नए शिल्प के हिसाब से पटकथा लिखी है। पारो, देव और चंदा के चरित्रों को स्थापित करने के बाद वे इंटरवल के पश्चात रिश्तों की पेंचीदगियों में उतरते हैं। दृश्य, प्रसंग, बिंब और रंग में नवीनता है। फिल्मांकन की प्रचलित शैली से अलग जाकर अनुराग ने नए प्रयोग किए हैं। ये प्रयोग फिल्म के कथ्य और उद्देश्य के मेल में हैं। अनुराग के शिल्प पर समकालीन विदेशी प्रभाव दिख सकता है।
अभय देओल स्वाभाविक अभिनेता हैं। उन्होंने देव के जटिल चरित्र को सहजता से निभाया है। मुश्किल दृश्यों में उनकी अभिव्यक्ति, भाव मुद्राएं और आंगिक क्रियाएं किरदार के मनोभाव को प्रभावशाली तरीके से जाहिर करती हैं। अभय अपनी पीढ़ी के निर्भीक अभिनेता हैं। माही और कल्कि में माही ने अपने किरदार को समझा और बखूबी निभाया है। माही के अभिनय में सादगी है। कल्कि को दृश्य अच्छे मिले हैं, किंतु वह चरित्र की संश्लिष्टता को चेहरे पर नहीं ला पातीं। चुन्नी की भूमिका में दिब्येन्दु भट्टाचार्य ध्यान खींचते हैं। इस किरदार को अनावश्यक तरीके से सीमित कर दिया गया है।
देव डी की विशेषता इसका संगीत है। फिल्म में गीत-संगीत इस खूबसूरती से पिरोया गया है कि पता ही नहीं चलता कि फिल्म खत्म होने तक हम अठारह गाने सुन चुके हैं। गीतों का ऐसा फिल्मांकन रंग दे बसंती के बाद दिखा है। अमिताभ भट्टाचार्य, शैली और अमित त्रिवेदी की टीम ने मधुर और भावपूर्ण सुर, स्वर और शब्द रचे हैं।
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Thursday, February 5, 2009

देव डी की पारो पंजाब की है और माही भी

-अजय ब्रह्मात्मज

देवदास की पार्वती देव डी में परमिंदर बन गयी है। वह बंगाल के गांव से निकलकर पंजाब में आ गयी है। पंजाब आने के साथ ही उसमें हरे-भरे और खुशहाल प्रदेश की मस्ती आ गयी है। उसके व्यक्तित्व में ज्यादा बदलाव नहीं आया है, लेकिन समय बदल जाने के कारण परमिंदर अब ट्रैक्टर भी चलाने लगी।
संयोग से अभिनय में आ गयी माही ने अब एक्टिंग को ही अपना करियर बना लिया है। देव डी के पहले उन्होंने दो पंजाबी फिल्में कर ली हैं। उनकी ताजा पंजाबी फिल्म चक दे फट्टे अच्छा बिजनेस कर रही है।
एक्टिंग के खयाल से मुंबई पहुंची माही अपने दोस्त दिब्येन्दु भट्टाचार्य के बेटे शौर्य के जन्मदिन की पार्टी में बेपरवाह डांस कर रही थीं? संयोग से उनकी अल्हड़ मस्ती अनुराग कश्यप ने देखी और तत्काल अपनी फिल्म के लिए पसंद कर लिया। उन्हें अपनी पारो मिल गयी थी। माही को एकबारगी यकीन नहीं हुआ। वह कहती हैं, मैं तब तक अनुराग के बारे में ज्यादा नहीं जानती थी। मैंने अपने दोस्तों से जानकारी ली। सभी ने कहा कि यह बेहतरीन लांचिंग है। ना मत कर देना।
माही ने सुचित्रा सेन वाली देवदास पहले देखी थी। दिलीप कुमार की फिल्में उन्हें पसंद हैं, इसलिए देख ली थी? तब कहां पता था कि भविष्य में पारो का रोल निभाना पड़ सकता है। फिल्म शुरू होने के बाद ऐश्वर्या राय की देवदास भी देख ली। माही कहती हैं, अनुराग की फिल्म की पारो उन फिल्मों से अलग है। वे थोड़ी सहमी और माता-पिता के अनुशासन में रहती थीं। यह पारो जिद्दी है। इस सदी की लड़की है पारो। उनकी तरह यह पारो भी अपने देव को प्यार करती है। उसके प्रेम में पैशन है, लेकिन मर-मिटने वाली बात नहीं है। वह खुद को समझा लेती है कि जिंदगी में एक रास्ता बंद हो गया तो दूसरा रास्ता भी है। पहले घबराहट महसूस होती है कि पता नहीं कर पाऊंगी या नहीं कर पाऊंगी? इस फिल्म में पहले दिन ही मैंने लगभग बारह घंटे शूटिंग की। हर तरह के एक्सप्रेशन दिए। अनुराग ने दिन भर कुछ नहीं बोला। बस शूट करते रहे। पैकअप के बाद उन्होंने कहा कि तुमने बहुत अच्छा काम किया। डायरेक्टर के मुंह से ये पांच शब्द सुनकर तसल्ली हुई और कंफीडेंस बढ़ गया। लगा कि अब मैं कर सकती हूं।
डांस और एक्टिंग के शौक के बारे में बात चलने पर माही कहती हैं, मेरी मां को एक पंजाबी फिल्म ऑफर हुई थी। तब वह फिल्मों में नहीं आ सकी थीं। मां की इच्छा थी कि मैं कुछ करूं। मां ने मुझे बचपन से ही डांस की ट्रेनिंग दिलवायी। रही बात एक्टिंग की तो एमए में एडमिशन के वक्त दोस्तों की सलाह पर मैंने अंग्रेजी और सोशियोलॉजी के साथ थिएटर का भी फार्म भर दिया था। संयोग से थिएटर में पहले एडमिशन मिल गया। हफ्ते-दस दिन क्लास भी हो गयी तो मुझे लगा कि यह अच्छी पढ़ाई है। मेरा मन लग गया। चंडीगढ़ में पढ़ाई कर रही थी तभी फिल्म के ऑफर मिलने लगे थे। मैंने मनमोहन सिंह की पंजाबी फिल्म की थी। उन दिनों ही हवाएं में एक छोटा रोल किया था।
माही अपने प्रोफेसर मोहन महर्षि की कृतज्ञ हैं। उनका नाम आदर के साथ लेते हुए कहती हैं, मोहन महर्षि ने मुझे अहसास कराया कि तू कर सकती है। उन्होंने खूब प्रोत्साहित किया। मेरे दोस्तों ने हमेशा बढ़ावा दिया। फिल्म शुरू होने पर अनुराग ने भरोसा किया और मुझ में विश्वास दिखाया। मैं थोड़ी नर्वस एक्टर हूं, लेकिन कैमरे के सामने ठीक हो जाती हूं।
इस फिल्म के नायक अभय देओल हैं। अभय के साथ ही माही के दृश्य हैं। दोनों ने लंबा वक्त साथ बिताया। अभय के बारे में माही ऊंचे खयाल रखती हैं। वह बेहिचक बताती हैं, जब अनुराग ने अभय को मेरे बारे में बताया और मिलवाया था तो अभय ने तुरंत सहमति दे दी थी। उन्होंने यह भी कहा था कि बाहर से आई लड़कियों की कामयाबी देखकर वे खुश होते हैं। उन्होंने मुझे पूरा समर्थन और सहयोग दिया। अभय अलहदा एक्टर और अच्छे इंसान हैं।
अपने निर्देशक अनुराग कश्यप के बारे में माही हंसते हुए बताती हैं, सच कहूं तो मैं यहां आयी थी तो अपने सर्किल में अनुराग-अनुराग सुना करती थी। मैं तो डायरेक्टर के तौर पर यश चोपड़ा और सुभाष घई को जानती थी। मुझे दिब्येन्दु ने ही उनके बारे में विस्तार से बताया। अपने अनुभव से कह सकती हूं कि वे बिल्कुल बच्चों की तरह रिएक्ट करते हैं। वैसे ही निश्छल हैं। खुश होने पर उसे जाहिर करते हैं। थोड़े मूडी हैं।
पारो का किरदार निभा कर इस कड़ी में आने की बात कहने पर माही झेंपने लगती हैं। अपनी घबराहट और खुशी छिपा नहीं पातीं। वह कहती हैं, वे सब बहुत खूबसूरत हैं। मैं तो उनके मुकाबले कुछ भी नहीं हूं। बस यही एहसास मुझे जोश देता है कि उनके निभाए किरदार को निभाने का मौका मुझे मिला। मैं दर्शकों से यही कहूंगी कि वे मेरी फिल्म के रेफरेंस में ही मुझे देखें।

Tuesday, February 3, 2009

21वीं सदी का देवदास है देव डी: अनुराग कश्यप

-अजय ब्रह्मात्मज

शरतचंद्र के उपन्यास देवदास पर हिंदी में तीन फिल्में बन चुकी हैं। इनके अलावा, कई फिल्में उससे प्रभावित रही हैं। युवा फिल्मकार अनुराग कश्यप की देव डी एक नई कोशिश है। इस फिल्म में अभय देओल, माही, कल्कि और दिब्येन्दु भट्टाचार्य मुख्य भूमिकाएं निभा रहे हैं। देव डी को लेकर बातचीत अनुराग कश्यप से..
देव डी का विचार कैसे आया?
सन 2006 में मैं अभय के साथ एक दिन फीफा व‌र्ल्ड कप देख रहा था। मैच में मजा नहीं आ रहा था। अभय ने समय काटने के लिए एक कहानी सुनाई। लॉस एंजिल्स के एक स्ट्रिपर की कहानी थी। एक लड़का उस पर आसक्त हो जाता है। उस लड़के की अपनी अधूरी प्रेम कहानी है। कहानी सुनाने के बाद अभय ने मुझसे पूछा कि क्या यह कहानी सुनी है? मेरे नहीं कहने पर अभय ने ही बताया कि यह देवदास है। मैं सोच भी नहीं सकता था कि देवदास की कहानी इस अंदाज में भी बताई जा सकती है!
अभय से आपकी पुरानी दोस्ती है?
देव डी में मेरे सहयोगी लेखक विक्रमादित्य मोटवाणे हैं। वे अभय के स्कूल के दिनों के दोस्त हैं। विक्रम से मेरी मुलाकात पहले हो चुकी थी, लेकिन वाटर के लेखन के दौरान हम करीब हुए। जब मैं पहली फिल्म पांच बना रहा था, तब विक्रमादित्य उसके गीतों के निर्देशन में मेरी सहायता कर रहे थे। उन्हीं दिनों अभय से मेरी मुलाकात हुई। तब वे स्केचिंग करते थे। बोस्टन से पढ़कर आए थे। मैं उन दिनों फिल्मी परिवारों के बच्चों को थोड़े संदेह और नाराजगी से देखता था। अभय में कुछ अलग बात थी। उन्होंने ब्लैकफ्राइडे के ब्लास्ट सीन के लिए स्टोरी बोर्ड भी तैयार किया था। बहरहाल, मैंने उन्हें अपने मित्र संजय राउत्रे से मिलवाया और संजय ने उनकी मुलाकात इम्तियाज अली से करवा दी। इस तरह एक ऐक्टर और एक डायरेक्टर प्रकाश में आए।
आपने अभय के साथ क्यों नहीं काम किया?
ऐसा संयोग नहीं बना। नो स्मोकिंग और गुलाल में अभय के लायक रोल नहीं थे। मैं उनका काम लगातार देख रहा था। सच कहूं, तो मुझे पहले यकीन नहीं था कि अभय ऐक्टिंग कर सकते हैं। एक चालीस की लास्ट लोकल देखने के बाद मैंने तय किया कि मुझे अभय के साथ काम करना है। संयोग देखें कि देव डी का आइडिया लेकर अभय ही आए। इस कहानी को दर्शक कई बार देख चुके हैं।
आपने इसके लिए निर्माता को कैसे तैयार किया?
कोई भी इस फिल्म में हाथ नहीं लगाना चाह रहा था। खासकर नो स्मोकिंग के फ्लॉप होने के बाद मेरे प्रति निर्माताओं का विश्वास हिल चुका था। यूटीवी के विकास बहल के पास मैं अपने मित्र राजकुमार गुप्ता की आमिर लेकर गया था। उस मीटिंग में मैंने आमिर के साथ देव डी की भी कहानी सुना दी। विकास बहल को आइडिया पसंद आया। इस तरह फिल्म की शुरुआत हुई।
कलाकारों के चयन के बारे में बताएंगे?
दोस्त दिब्येन्दु के बेटे के जन्मदिन की पार्टी में मैंने माही को पहली बार देखा था। माही उस शाम दुनिया से बेपरवाह डांस कर रही थी। मुझे उसका वह अंदाज पसंद आया। मुझे ऐसी ही पारो चाहिए थी। चूंकि देव डी की पृष्ठभूमि पंजाब की थी, इसलिए माही और ज्यादा सही लगी। मेरी फिल्म में पारो का नाम परमिंदर है। कल्कि का चुनाव काफी सोच-समझकर चंदा के रूप में किया। फिल्म देखने पर लोग उसका महत्व भी समझ जाएंगे।
21वीं सदी में देव डी के रूप में देवदास को आप कैसे परिभाषित करेंगे?
यह एक ऐसे युवक की कहानी है, जिसे समाज इसलिए बहिष्कृत कर देता है कि वह बने-बनाए नियमों का पालन नहीं करता। वह दुनिया की नहीं सुनता। सही और गलत का फैसला स्वयं करता है।
फिल्म में अठारह गाने रखने की वजह?
शुरू में ऐसा विचार नहीं था, लेकिन फिल्म के संगीतकार अमित त्रिवेदी ने जब गीत रचे और उन्हें सुरों से सजाया, तो मैं बहुत प्रभावित हुआ। यकीन करें, उनके संगीत के कारण मैंने स्क्रिप्ट में फेरबदल की। फिर मैंने देव डी को म्यूजिकल का रूप दिया। इस फिल्म के गीत बैकग्राउंड में चलते हैं। मुख्य कलाकारों ने गीतों पर होंठ नहीं हिलाए हैं।

Tuesday, November 4, 2008

अनुराग कश्‍यप से अंतरंग बातचीत



'सत्या' मैंने रिलीज के चंद दिनों पहले देखी थी। मनोज बाजपेयी के सौजन्य से यह संभव हुआ था। फिल्म देखने के बाद 'संझा जनसता' में मैंने 'सत्या' पर एक लेख लिखा था। मुझे किसी ने बताया था कि फिल्म के लेखक अनुराग कश्यप ने वह लेख राम गोपाल वर्मा को पढ़ कर सुनाया था और फिर उन्होंने मुझे इंटरव्यू के लिए बुलाया था। अनुराग कश्यप से मेरी मुलाकात तब तक नहीं हुई थी। 'शूल' की रिलीज के समय मनोज बाजपेयी और अनीस रंजन के साथ मैं लखनऊ और कानपुर जा रहा था। हिंदी फिल्मों और मीडिया ग्रुप के साथ आज फैशन बन चुके मीडिया टाईअप की वह पहली घटना थी। हमलोग दिल्ली में रूके थे। वहां 'शूल' से संबंधित एक प्रेस क्रांफ्रेंस आयोजित किया गया था। वहीं अनुराग कश्यप से पहली मुलाकात हुई और उसके बाद मुलाकात का सिलसिला चलता रहा। परस्पर आदर और प्रेम का भाव हम दोनों के बीच रहा है। एक-दूसरे के काम में बगैर हस्तक्षेप किए हमलोग जरूरत के समय मिलते रहे हैं। धीरे-धीरे अनुराग कश्यप ने अपनी स्पष्टता, पारदर्शिता और कस्बाई होशियारी से फिल्म इंडस्ट्री में खास जगह बना ली है। वह प्रयोगशील युवा पीढ़ी के अगुवा भी बन चुके हैं । समय-समय पर अपनी टिप्पणियों की वजह से फिल्म इंडस्ट्री के नामवर और धुरंधर व्यक्तियों के लिए आंख की किरकिरी बने रहते हैं।
'पहली सीढ़ी' की बातचीत के लिए वे सहज तैयार हो गए। इस बातचीत में प्रश्न पूछने की मुख्य जिम्मेदारी प्रवेश भारद्वाज ने निभायी। इसे दो निर्देशकों की बातचीत भी कहा जा सकता है। मैंने इस इंटरव्यू में मुश्किल से एक चौथाई सवाल पूछे। अनुराग जितना तेज बोलते हैं, उससे ज्यादा तेज सोचते हैं, इसलिए कई बार मूल वाक्य और विचार खत्म किए बिना वे कुछ और बताने लगते हैं। इस अनौपचारिक और मुक्त बातचीत को क्रम देना मुश्किल काम था। क्रम और तारतम्य बिठाने में कुछ शब्द, वाक्य और विचारांश भी काटने पड़े। अमूमन मेरी कोशिश रहती है कि हर बातचीत इंटरव्यू देने वाले की भाषा में जस की तस ही प्रस्तुत हो … उसमें मौलिकता के साथ भिन्नता भी बनी रहती है। मैं इंटरव्यू लेनेवाले की भाषा में बातचीत पेश करने का पक्षधर नहीं हूं। ऐसे इंटरव्यू में एकरसता और दोहराव की संभावना बढ़ जाती है।
बहरहाल, अनुराग कश्यप से हुई बातचीत के कई रोचक पहलू हैं। हम यहां पूरी बातचीत नहीं दे रहे हैं। पूरी बातचीत आप अंतिका प्रकाशन की शीघ्र प्रकाश्य पुस्तक 'मेरी पहली फिल्म' में पढ़ सकेंगे।

- कहां से फिल्म बनाना चाहता हूं की यात्रा शुरू हुई?
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1993 में दिल्ली के इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल से यह यात्रा शुरू होती है। उसमें मैंने विटोरियो डिसिका जैसे फिल्मकारों की फिल्में देखी थीं। चिल्ड्रेन्स आर वाचिंग,बाइसिकल थीफ और दूसरी कई फिल्में दिखाई गई थीं। उनका रेट्रोस्पेक्टिव रखा गया था। उन फिल्मों ने बहुत प्रभावित किया था। उसी साल 'मैच फैक्ट्री गर्ल' भी आई थी। इन फिल्मों को देखने का बहुत असर हुआ था।
-दिल्ली में आप क्या कर रहे थे?0 मैं जन नाटय मंच में था। स्ट्रीट थिएटर करता था। कंफ्यूज था उस समय… हद से ज्यादा कंफ्यूज था। गंजेरी था और मुझे पता नहीं था कि क्या करना है। कह लें कि दिशाहीन था। मुझे लगा कि फिल्म में ही कुछ करना चाहिए। जूलोजी की पढ़ाई कर रहा था। जो प्लान थे, उन्हें थर्ड इयर तक आते-आते धरासायी कर चुका था। पिताजी से बात हुई। उनसे मैंने कहा कि बंबई जाकर कुछ करना चाहता हूं। पिता जी भी बेहद नाराज… वे बोले बंबई जाकर क्या करोगे? मैं बहाना बना कर, लड़ाई-झगड़ा कर… घर से पांच हजार रूपया लेकर मुंबई भाग कर आ गया। यह सोच रखा था कि फिल्म में ही कुछ करना है, लेकिन क्या करना है? कुछ पता नहीं था कि क्या करना है? पिक्चर कैसे बनती है, क्या प्रोसेस है, कुछ नहीं मालूम था। सिर्फ डिसिका देखा था। उसके अलावा मेरा एक्सपोजर नहीं था। उसके पहले सिनेमा का मेरा एक्सपोजर बहुत लिमिटेड था। बचपन में जो था, हमारे कल्ब में हफ्ते में दो बार फिल्में दिखाते थे। छह साल की उम्र तक वह देखता था भाग-भागकर।
- कौन सा क्लब है?
0 मैं ओबरा में रहता था, ओबरा है यू पी में रेणूपुर में… रेणुसागर तालाब के पास, बिजली का जो गढ़ है। वहां मेरा बचपन गुजरा। वहां पर एक थिएटर था। वह भी मेरे सामने बना था। चलचित्र… ग़र्वमेंट का सरकारी थिएटर चालू हुआ था चलचित्र। उसके अलावा क्लब में ओपन एयर में फिल्में दिखाते थे। मैं बचपन में वहां जाकर 'आंधी' और 'कोरा कागज' देखता था। चार-पांच साल की उम्र रही होगी। मुझे खुद नहीं मालूम क्यों देखता था? मैं आंख खोले, मुंह बाए चुपचाप देखता रहता था। पिता जी भगाते थे और बोलते थे कि क्या है? यहां क्यों आते हो ? ये बड़ों की पिक्चर है। लेकिन मैं देखता रहा। क्यों, यह मेरी समझ में नहीं आता था। लेकिन उन फिल्मों की इमेजेज आज भी दिमाग में है। उसके बाद फिल्में देखने का सिलसिला टूट गया। मैं जब हॉस्टल में पहुंचा तो शनिवार को एक फिल्म दिखाते थे। कोई पुरानी हिंदी फिल्म कभी-कभार। ज्यादातर 'दो बदन' दिखाया करते थे। स्कूल में लगभग दस बार 'दो बदन' दिखाई है। स्क्रीन पर प्रोजेक्ट कर के दिखाते थे। प्रिंसिपल की फेवरिट फिल्म थी 'दो बदन' … वही दिखाते थे।
-मुंबई के आरंभिक जीवन के बारे में बताएं,कैसे शुरूआत हुई?
0 सिंधिया स्कूल ग्वालियर में था। उसके पहले देहरादून में पढ़ा। बिखरी हुई सी जर्नी रही है। बीच में बारह-तेरह साल फिल्मों से नाता टूट गया। फिर दिल्ली आए तो बदले की भावना के साथ फिल्म देखना चालू किया। वो भी मल्कागंज इलाके में… यूनिवर्सिटी के आस-पास के अंबा, कल्पना, बत्रा… वहां हिंदी फिल्में जो लगती थीं, बस वही देख पाता था। फिर एक अनटचेबल देखी थी तो इंग्लिश फिल्मों का शौक चर्राया तो 'डाय हार्ड' आदि देखी। तीन साल वैसी फिल्में देखीं। फिर 1993 के इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में सिनेमा से सही परिचय हुआ। सिनेमा एक्सपोजर वहां से चालू हुआ। लेकिन सिनेमा में एक्सेस नहीं था । उसके बाद मैं मुंबई आ गया । मुंबई में मेरी असली जर्नी शुरू हुई है। बाकी सब करता रहता था। थिएटर करता था , एक्टिंग करता था… समझ में नहीं आ रहा था कि एक्टिंग कर रहा हूं कि क्या कर रहा हूं। कंफ्यूजन तो था ही, दिशाहीन भी था। कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि किसके पास जाऊं? किसी-किसी के पास काम कर रहा था। सडक़ पर रह रहा था। मैंने एक दिन फ्रस्ट्रेशन में नाटक लिखा 'मैं … तो वह नाटक गोविंद जी निहलानी और सईद साहब मिर्जा जैसे लोगों को पसंद आया। उन सब से मिला लेकिन मुझे कुछ समझ में नहीं आया। मुझे लगा कि गोविंद जी मुझे बहुत ज्यादा क्रेडिट दे रहे हैं। मैंने सोचा कि मुझे मालूम है मेरी कितनी औकात और काबिलियत है और हम में कितनी समझ है। उन्होंने मुझे इब्सन का नाटक थमा दिया। उन्होंने मुझे काफ्का का ट्रायल पकड़ा दिया। वे सीरिज कर रहे थे। इसको तुम एडैप्ट करो। तुम कर सकते हो। मैंने पढ़ा, ट्रायल पढ़ा तो और कंफ्यूज हो गया। नहीं ये कैसे बन सकती है फिल्म। इस पर तो एनीमेशन फिल्म बन सकती है। मैंने कहा कि इस पर फिल्म नहीं बन सकती। उन्होंने कहा तुम सोचो। मैं इतना ज्यादा ग्रंथियों का शिकार हो गया कि खोल में चला गया। गोवंद जी के फोन आते थे केअर ऑफ नंबर पर… उनका फोन लेना बंद कर दिया। उनसे मिलना बंद कर दिया। उस समय क्या हुआ कि मैं एक आदमी से बाइचांस मिला,जिसका नाम था पंकज टिटोरिया… वे थिएटर कर रहे थे। पंकज टिटोरिया लेकर गया एक आदमी के पास उनका नाम था शिवम नायर। वहां से मेरी एक अलग जर्नी शुरू हुई। शिवम नायर के यहां मैं जिस दिन मिलने के लिए गया तो वहां कोई आदमी 'टैक्सी ड्राइवर' टेप लेकर आया था। वह बहुत एक्साइटेड था। गंदा वीसीआर था, म्युटलेटेड टेप था। मैंने वहां पर मार्टिन स्कारसिस की 'टैक्सी ड्रायवर' देखी… क़ुछ अजीब सा फैसीनेशन हो गया 'टैक्सी ड्राइवर' से। उनके यहां जाकर मैंने बोला कि मुझे लिखना है। दो-तीन दिन मैं कोने में बैठा रहता था और उनकी बातें सुनता था। श्रीराम राघवन, श्रीधर राघवन, शिव सुब्रमण्यम सब थे। शिवम चुप रहता था, श्रीराम जब बोलना चालू करता था तो अटक जाता था… श्रीराम को कुछ प्रोबलम था बोलने का। श्रीधर लगातार बोलता था। मैं सुनने लगा, मैं एक्साइटेड था श्रीधर राघवन से। उसकी एनर्जी से। श्रीधर जो-जो नाम लेता था मैं चुपचाप लिख लेता था। फिर मैं किताबे ढूंढने जाता था। मुझे मिलती नहीं थी। एक दिन मैंने श्रीधर से पूछा कि सर आप ये किताबें कहां से लेकर आते हैं? वह मुझे सांताक्रुज स्टेशन लेकर गया। सांताक्रुज इस्ट में स्टेशन के पास किताबों की दुकानें हैं।। वहीं एक किताब के एक लेखक के जरिए दूसरे लेखक को पाया। फिर तीसरे लेखक को खोजा। जेम्स एम केम को पढऩे के बाद मैं थोड़ा बेचैन होने लगा। यहां पर मुझे एक काम मिल गया। उन्होंने मुझे बोला कि एक फिल्म लिखनी है नागराजन के ऊपर। डाउन साउथ जो है, वो बंगलोर के थे। मैंने लिखना चालू किया। मैं स्ट्रकचरली अपने-आप ऑटोमेटिक हिलने लग गया। फिर वो सारा सब कुछ … ओमा स्वरूप डायरेक्ट करने वाले थे। उनको बहुत अच्छा लगा।मैंने कहा नागराजन बनाते हैं। मेरे मन में था कि मैंने स्क्रिप्ट तो लिख ली, लेकिन फिल्म कब बनेगी? क्योंकि उसके बनने से पहले एक और फिल्म बननी थी 'ऑटो शंकर'। मैंने कहा कि उसे बनाओ। उसमें वे लोग स्क्रिप्ट को शॉर्ट आउट नहीं कर पा रहे थे। बाकी शूटिंग डेट तय थी। मैं जब शूटिंग के दो दिन पहले ऑफिस में पहुंचा तो बहस चल रही थी कि शूटिंग रोक दें। स्क्रिप्ट नहीं थी। मैंने सोचा कि ये शूटिंग रूक गई तो मेरी नागराजन की शूटिंग रूक जाएगी। मैंने कहा कि सर ऐसा क्या है? इसको मत रोको या तो फिर नागराजन बना लो। उन्हें लगा कि इक्कीस साल का लौंडा है। चाहता है कि डेस्परेशन में फिल्म बन जाए। उन्होंने समझाया कि नहीं यार ऐसा नहीं है। ऐसे नहीं होता। पहले हमको ऑटो शंकर बनानी है। सब कुछ क्लियर है। मैंने कहा प्रोबलम क्या है। उन्होंने कहा स्क्रिप्ट नहीं वर्क कर रही है। मैंने कहा मैं पढ़ता हूं। स्क्रिप्ट मैं करूं? सब हैरानी से मुझे देखने लगे। सब ने शिव से कहा कि ट्राय कर लेने दो क्या जाता है? उन्होंने हिदायत दी कि लेकिन परसों शूटिंग है। मैंने कहा सर अभी करता हूं रात को और सुबह होने तक में आप को स्क्रिप्ट दे दूंगा। मैंने जोश में बोल दिया। उस समय एनर्जी बहुत थी। मैंने रातो-रात बैठकर स्क्रिप्ट लिखी और ऑफिस में स्क्रिप्ट रख कर मैं सो गया। सुबह जब उठा, डेढ़ बजे दिन में नींद खुली तो श्रीराम और बाकी सब लोग पढ़ रहे थे। मैंने रातो-रात लिखी थी स्क्रिप्ट। सब लोग पढ़ रहे थे। एक व्यू फॉर्म होता है न? सब के अंदर कुछ हुआ। वे एक नई नजर से मुझे देख रहे थे। तो मुझे कंप्लीट एक्सेस मिल गया। शूटिंग शुरू हुई। उस स्क्रिप्ट के हिसाब से शूट किया गया। मैंने वैसे ही लिख दी थी। शिव सुव्रमण्यम ने बोला कि स्क्रिप्ट अनुराग ने लिखी है तो उसे क्रेडिट तो मिलना चाहिए। उन लोगों ने मुझे एक तरह से विकसित किया। उसके बाद शिव सुव्रमण्यम, शिवम नायर, श्रीराम राघवन इन लोगों ने मुझे बढ़ाया। हमको वीसीआर और टीवी का एक्सेस मिल गया। मैं आकर पिक्चर देख सकता था। मैं टेप लाकर देखना चालू किया। नागराजन बन नहीं पा रही थी। मनोज बाजपेयी ने उसी दौरान 'दौड़' की । 'दौड़' में राम गोपाल वर्मा ने उसको देखा और उनके दिमाग में एक आयडिया आया। उन्होंने उसको कहा कि तुम्हारे साथ एक फिल्म बनानी है। एक नया रायटर लाकर दो। मनोज ने कहा कि एक आदमी फिट है, वो है अनुराग। उसने मुझे कहा कि राम गोपाल वर्मा मिलना चाहते हैं। मैंने कहा - हां? मैं तो चौंक गया। दो-तीन दिन पहले श्रीराम राघवन और हमलोग 'रंगीला' साथ में देख कर आए थे गोरेगांव के किसी थिएटर में। हमने कहा चलो। फिर वहां से 'सत्या' शुरू हुई। मैंने बहुत सारे चीजें और बातें यहां छोड़ दी हैं, जो मुझे नहीं लगता कि उन्होंने कुछ कंट्रीब्यूट किया। यही मेरी मुख्य जर्नी है। उसके अलावा और सारी चीजें थीं। महेश भट्ट का भी प्रसंग हैï,लेकिन वह मेरे लिए इतना आवश्यक नहीं है।
- वो क्या चीजें और बातें हैं?
0 मैंने लिखना चालू किया था। मैंने पांच लिखना शुरू किया था। तब पांच का नाम पांच नहीं था। मिराज नाम से मैंने स्क्रिप्ट चालू की थी। 1995 में 'सत्या' के पहले नागराजन और ऑटो नारायण के फेज में। मैंने एक फिल्म लिखी थी 'मिराज'। फिल्म क्या लिखी थी, चालीस पन्ने लिखे थे। मैंने ल्यूक केमी को जाकर सुनाया। ल्यूक केमी एक्टर था। उसको मैंने विक्रम कपाडिय़ा के एक नाटक में देखा था। एक फिल्म थी 'फन'… जो आज है मेरे पास। मैंने उसे बहुत सालों तक ढूंढा । क्या था इस फिल्म में जिसने मुझे प्रेरित किया मुझे? 'फन' में एक स्ट्रकचरिंग थी। जिसको आप पांच के पास जाओगे तो एक जैसी दिखेगी। 'फन' में कुछ ऐसा था। मैंने जब ट्रेस करना चालू किया था कि कहां है? हमको एक पैटर्न दिखा था 'लास्ट ट्रेन टू महाकाली' में। मेरी खुद की फिल्में हैं, 'पांच' में। और 'ऑटो शंकर' जो मैंने ड्राफ्ट लिखा था। एक फोर्मुलेशन था उसमें। तीनों में एक सिमलर फार्मूला था। मैं एनालाइज कर सकता हूं क्योंकि मैंने खुद किया है।

- अनुराग कश्यप का हस्ताक्षर यहां से गढ़ा गया?
0 वहां से गढ़ा गया। वहां से मेरी नयी जर्नी आरंभ हुई। यह रियलाइजेशन हुआ कि मेरे तीनों लेखन में एक समानता है। एक पैटर्न है।

- जब आप के अंदर का लेखक जागा तो वे क्या एहसास थे, जिनसे लगा कि आप सही दिशा में हैं?
0 अंदर से एहसास हुआ। जब पहली बार लिखा था 'मिराज' तो उस समय फर्स्ट हॉफ ही लिखा था। कोई मर्डर और किलिंग नहीं था। एक जर्नी थी एक आदमी की, जिसके पास पैसा नहीं है। सडक़ छाप है। गांजा के चक्कर में घूमता रहता है। बस वाला सीन लिखा था। सारी चीजें लिखी थी। कई कैरेक्टर थे। मैं उस समय कुछ उस तरह की जिंदगी जी रहा था।

- कहीं कुछ ऐसा तो नहीं था कि मेरी आवाज कुछ अलग हो, इसलिए सचेत रूप से कुछ अलग करने की कोशिश रही हो?0 नहीं, जो चीज थी वो ये थी कि जब मैंने 'टैक्सी ड्रायवर' देखी,जब मैंने 'फन' देखी, जब डिसिका की फिल्में देखी तो मुझे आयडेंटीफिकेशन मिला अंदर से। बाकी हिंदी फिल्में जब देखता था तो मुझे लगता था कि कोई ऐसी कहानी कही जा रही है,जो किसी और के बारे में है। शायद सिनेमा यही होता है। डिसिका ने, 'फन' ने, स्कॉरसेस ने एक चीज मेरे साथ की वो यह कि सिनेमा मेरे बारे में भी है। मुझे जो कांफीडेंस आया। न्वॉयर से जो मेरा आकर्षण हुआ वो इसलिए कि वह मेरे बारे में भी है। लोगों के हिसाब से न्वॉयर बहुत कुछ होता होगा। मेरे लिए मेरा अपना खुद का मिनिंग है। मेरे लिए वह एक ऐसा माहौल है। मेरे लिए वह अंडरडॉग की कहानी है। मेरे लिए वहे गोल है। जिंदगी में हम सडक़ पर आते-जाते देखते हैं लेकिन गौर नहीं करते हैं। सब की अपनी-अपनी कहानियां है। मुझे लगा कि सिनेमा उसके बारे में भी हो सकता है। जब यह लगा मुझे तो मेरे अंदर कांफीडेंस आ गया कि हां यही मेरा सिनेमा है। मुझे यही कहना है। मुझे यही करना है। फिर जो मैं खुद को असहज महसूस करता था। उस एहसास के बाद वह खत्म हो गया। मुझे पहले लगता था कि मैं कुछ नहीं कर सकता हूं। मुझे लगता था कि मैं जो सोचता हूं वो बेवकूफी है, अगर किसी को बोलूं तो वह हंस न पड़े। मुझे उर्दू नहीं आती थी। हिंदी सिनेमा लेखन वास्तव में उर्दू है। मेरी हिंदी अच्छी थी, तब जब मैं लिखता था। लेकिन मैं बोल नहीं पाता था।
- बोलते अंग्रेजी में थे?
0 नहीं अंग्रेजी भी नहीं बोलता था। खिचड़ी भाषा थी। मतलब, आप बोर्डिंग स्कूल में पढ़े हुए हैं, जहां पर सब अंग्रेजी बोलते हैं और आपको अंग्रेजी नहीं आती है। आप हिंदी बोलते हैं। आपकी खासियत क्या है कि आप हिंदी में निबंध प्रतियोगिता जीत जाते हैं। नौवीं में आप बारहवीं के लडक़े को हिंदी में पछाड़ देते हो। हिंदी में आपका कोई सानी नहीं है और जब हिस्ट्री में आप लिखते हैं तो अपनी कहानियां बना-बनाकर लिखते हैं। टीचर पास कर देता है, तब पता चलता है कि टीचर कितना उल्लू का पट्ठा है। मेरा खेल सिर्फ वहां था। मैं अच्छा लिखता था, लेकिन मैं पब्लिक स्पीकर नहीं था।

- एक लडका अनुराग कश्यप… उसमें अपना कंफीडेंस नहीं था। उस लडक़े में आत्मविश्वास कैसे आया? उसे यहां तक लाने की यात्रा किस तरह से आरंभ हुई?0 उसके लिए एक चीज बताना चाहूंगा । बचपन से मुझे कहानियां बनाने की आदत रही है। मेरे भाई-बहनों को ज्यादा याद है। मुझ से ज्यादा याद है। वे बताते हैं कि आप हर फिल्म की कहानी जानते थे। सरिता नाम की एक पत्रिका आती है। सरिता में चंचल छाया छपता है। चंचल छाया में एक लिस्ट आती थी, जिसमें सर्वोत्तम आदि श्रेणियों में फिल्मों की सूची होती थी। मेरी एक आदत थी कि मैं फिल्म के नाम से कहानियां बनाता था और अपने भाइयों-बहनों को सुनाता था। ये पिक्चर मैंने देखी है, इसमें ऐसा होता है, ऐसा होता है, इससे उनको लगता था कि मेरा भाई कितना बड़ा ज्ञानी है। सारी फिल्में देखता है। देखता कुछ नहीं था मैं। टीवी के अलावा कुछ नहीं था। एक वीडियो थिएटर था। उसमें 'नदिया के पार' ही देखता था। वहां से कहानियां बनाने की आदत पड़ी। मनोहर कहानियां, सत्यकथा जैसी पत्रिकाएं मैं छुप-छुप के पढ़ता था। यह सब था। अंदर से एक एक्साइटमेंट था।
- अपराध की कहानियां पढ़ते थे। आप ने जिन पत्रिकाओं के नाम लिए, उनसे लगता है कि क्राइम और सेक्स की कहानियों से आप का लगाव थ। उधर झुकाव था।0 हां क्राइम के साथ था। मैं आ रहा हूं उस बात पर। मेरा जर्नी का जो सबसे बड़ा महत्वपूर्ण पाइंट है। मेरी जिंदगी में सबसे बड़ी चीज जो रही, वह आज समझ में आता है कि क्यों है? मेरे अंदर काम्पलेक्स कब आया था? सीनियर स्कूल से पहले छुट्टियों में गांव जाता था या लखनऊ जाता था या अपने ननिहाल बलिया जाता था तो वहां पर एक किताब की दुकान थी मैं वहां पर जाकर बैठता था। मैं वहां वेद प्रकाश शर्मा, सुरेन्द्र मोहन पाठक, रानू आदि के हिंदी उपन्यास पढ़ता था। पिता जी को देखता था तो हार्डी ब्वॉयज उठा लेता था। उन्हें लगता था कि बेटा इंग्लिश पढ़ रहा है। उनके इधर-उधर होते ही उसे बंद कर सीधा वहां पहुंच जाता था। मेरी एक मौसी की लडक़ी थी हैदराबाद की,जो इस तरह के उपन्यास पढ़ती थी। वह मुझे पढऩे के लिए देती थी। बेबी दीदी। उन उपन्यासों को मैं पढ़ता था और कोने में घुसा रहता था। पढऩे का शौक था, लेकिन मेरे अंदर कहीं अपराध बोध पलने लगा। छुट्टियों के बाद जब स्कूल पहुंचा तो स्कूल की मैग्जीन देख कर वहां लिखने का मन किया। स्कूल में साहित्य सभा नाम की सोसायटी थी। मैं सोसायटी का मेम्बर बनने के लिए गया। मैंने कहानी लिखी। मैंने सातवीं क्लास में कहानी लिखी। लडक़ा है जो उत्पीड़ित ग्रंथि में जी रहा है और एक लड़का उसको बहुत तंग कर रहा है। कहानी का नाम था बिग शिफ्ट। जो मैं फील करता था स्कूल में,वही मैंने लिख दिया था। सिंधिया स्कूल बड़े लोगों का स्कूल था। जहां पर मैं एक ऐसा स्टूडेंट था जो दिवाली के दिन भी जब सभी रंगीन कपड़े पहनते थे तो मैं स्कूल का ड्रेस पहनता था। मेरे पास स्कूल के दिए हुए बाटा के जूते होते थे। एकमे का जूता था ब्लैक कलर का। स्कूल का जो सबसे गरीब तबका हो सकता था, मैं उसमें था। लिखा रहता था चेहरे पर। घड़ी तक नहीं थी। तो बहुत कॉम्पलेक्स फील करता था। सब अंग्रेजी में बात करते थे। मैं तड़ातड़ हिंदी में बात करता था। पिताजी कहते थे पढ़ाई करनी है तो उन्होंने सिंधिया स्कूल भेज दिया। उस कॉम्पलेक्स पर मैंने एक कहानी लिखी थी। मेरे एक टीचर थे पंडित आत्माराम शर्मा। उन्होंने मुझ से पूछा कि बेटा कहानी कहां से चुराई है? मैंने कहा कि कहीं से नहीं चुराई है। उन्होंने मुझे इतना लताड़ा। सच्चे नहीं हो। तुम लोग सच्चा होना सीखो। उन्होंने अंग्रेजी में जेन्युन शब्द कहा था। मुझे जेन्युन का मतलब नहीं मालूम था। उस रात डिक्शनरी में जेन्युन मतलब ढूंढ़ा। फिर मैंने कविता लिखी। मुझे अभी भी याद है। बहुत ही अजीब सी कविता थी। एक होता है न शायरी करें । कविता में एक लडक़ा आत्महत्या करना चाहता है। मैंने ऐसी कविता लिख दी आठवीं कक्षा में। एक लडक़ा जो आत्महत्या करना चाहता है। टीचर उसे देख के परेशान हो गए। पिताजी को फोन चला गया। यह लड़का ऐसा क्यों लिख रहा है। मैंने कहा कि मैंने लिखी है। शायरी की ऐसी फीलिंग आती है मेरे अंदर, ये लोग हमें ऐसा फील कराते हैं और मैं लिखना चाहता हूं। तो उन्होंने मेरा ट्रीटमेंट चालू कर दिया। काउंसलिंग करना चालू कर दिया। मैं कह रहा था मुझे लिखना है। पिताजी परेशान हो गए। प्रिंसिपल ने स्पेशल अटेंशन देना शुरू कर दिया। और फिर मेरा लिखा उन्होंने कुछ छापा ही नहीं। उन्होंने मुझे बोला कि तुम्हें लिखना नहीं आता है। गुस्से में मैंने नौवीं कक्षा में निबंध प्रतियोगिता में हिस्सा लेना शुरू कर दिया। वहां लगातार जीतता था। उन्होंने कहा कि किसी भी टॉपिक को लिखो। मैंने बाद में जब ध्यान दिया तो समझ में आया कि मेरी सोचने की प्रक्रिया चलती रहती थी। चीजें पढऩे पर अंदर जमा हो जाती थीं, लेकिन याद नहीं रहता था कि कहां पढ़ी थी, कब पढ़ी थी? 1982 में एशियाड हुआ था। उसके ऊपर एक निबंध प्रतियोगिता थी। मैंने इतना लंबा-चौड़ा लिख दिया। पता नहीं कहां से क्या-क्या लिख दिया? कहीं न कहीं जानकारी रहती थी, वह सब स्टोर हो जाता है, फिर एक बार निकलता है तो उमड़ कर निकलता था। जैसे आप ने उल्टी कर दी है। उस तरह की लेखन प्रक्रिया का एहसास हुआ। इतना कॉम्पलेक्स आ गया था अंदर… टीचरों ने बोल-बोल कर भर दिया था कि तुम्हें नहीं लिखना चाहिए। तुम क्या लिखते हो सारा सब कुछ। इस माहौल में आप अलग हो जाते हैं। इसके अलावा भी आप हंसी-मजाक के पात्र बन जाते हैं सब लोगों के लिए, इसको इंग्लिश नहीं आती। पिताजी ने नौवीं कक्षा में पहली बार टाइटन की घड़ी दी। उस समय टाइटन नई-नई आई थी। स्कूल में सब पूछते किसकी घड़ी है? मैं कहता था टाइटन। वे लोग चिढ़ाते थे टिटन बोलो तुम तो। ये सारी चीजें घर कर गई थीं। इन वजहों से मैं मिलता नहीं था किसी से और लाइब्रेरी में घुसा रहता था। सीनियर स्कूल में सबसे बड़ी चीज थी लाइब्रेरी। सीनियर स्कूल से अच्छी लाइब्रेरी मैंने कहीं नहीं देखी। मैंने उस समय लाइब्रेरी में छुप-छुप कर लोगों से बचने के लिए … मैंने मानसरोवर से शुरूआत की थी। सबसे आसान वही होता है। छोटी-छोटी कहानियां … पूरा मानसरोवर पढ़ा। फिर जीप में सवार इल्लियां पढ़ी। वहां से एक नयी जर्नी चालू हुई। मेरे लाइब्रेरी से अधिक प्रिय कोई जगह ही नहीं थी। फिर मैंने पल्प लिटरेचर पढऩा आरंभ किया। फिर यहां पहुंचा और मैंने डिस्कवर करना चालू किया। कैसे गुलशन नंदा, कर्नल रणजीत आदि कहानियां चुराया करते थे। कैसे सुरेन्द्र मोहन पाठक चुराया करते थे। मैंने उनकी कहानियां पढ़ रखी थी। मैंने बाद में ओरिजनल पढऩा चालू किया। पता चलना चालू हो गया कि सब चोरी से भरे परे हैं और लोग मुझे बोलते हैं कि मैं जेन्युन नहीं हूं।
- वह लडक़ा है, जो कहीं अपना जगह बनाना चाहता था या प्रोग्रेस करना चाहता था। उसके अंदर वह चाहत अभी तक है या… ?0 है, कहीं न कहीं है।
- आपने पहली एक स्क्रिप्ट लिखी और फिर तय किया कि मैं इसे डायरेक्ट करूंगा?
0 वो एक प्रोसेस में इवाल्व हुआ। मतलब स्क्रिप्ट कुछ छह साल में इवॉल्व हुआ है। आयडिया कुछ चेंज हुआ है। मतलब पांच वही फिल्म नहीं है, जो मैं बनाने निकला था, जब लिखना चालू किया था। वह अधूरी फिल्म थी, जिसे मैं कभी पूरा नहीं कर पाया। जब मैंने स्क्रिप्ट पूरी कर ली और लोगों के पास ले गया तो लोगों ने कहा यार ऐसी फिल्म बनेगी नहीं। मैंने बहुत कोशिश की। मैंने कहा भांड़ में जाए। नहीं बनेगी तो मैं भी कुछ और नहीं बनाऊंगा। बनाऊंगा तो यही बनाऊंगा। पहली बार जब मेरे हाथ में कैमरा दिया गया 'सत्या' के टाइम पर। राम गोपाल वर्मा ने मुझे कैमरा दिया और बोला कि सत्या जब बंबई आता है तो वह हिस्सा मुंबई के माहौल में लो। मैं एक्साइटमेंट में था कि मैं डायरेक्टर हो गया। मैं वहां जाकर बोल रहा हूं कि अच्छा क्या करना है। एक्टर कैमरामैन को बता रहा है कि ये शॉट लो। वो कर रहा है। मेरे दिमाग में आयडिया आ रहा है, लेकिन मेरी हिम्मत नहीं हो रही है एक्सप्रेस करने की। मैं एक्सप्रेस कर नहीं पा रहा था। फिर मैंने कहा ये शॉट लेते हैं। ऐसे लेते हैं-वैसे लेते हैं। जब सारा टेप गया राम गोपाल वर्मा के सामने। राम गोपाल वर्मा ने सुनाना चालू किया। क्या बकबास है? यह किसने शूट किया है? मैंने तुम्हें शूट करने के लिए बोला था। मैंने कहा हां सर,लेकिन वो मुझे करने नहीं दे रहे थे। ये था और वो था… इस तरह तुम पिक्चर बनाओगे? तुम क्या करोगे? उन्होंने कहा कि करने नहीं दे रहे थे क्या होता है? उन्होंने बताया कि मैंने ऐसा कुछ बोला था। मैंने बोलना चालू किया। मैंने बताया कि मैंने सोचा था ये करेंगे-वो करेंगे। उन्होंने पूछा कि जो तुमने सोचा था वो क्यों नहीं हुआ। मैंने कहा कि सब लोग बड़े हैं। मुझ से ज्यादा जानते हैं। उन्होंने कहा कि कोई ज्यादा नहीं जानता। वहां से मुझे पहली बार थोड़ा सा कांफीडेंस आया। फिर जो कैमरामैन था जैरी हूपर, उसके साथ मैं निकल जाया करता था। फिर जो सारा आयडिया आ जाए, ये जो गणपति हुआ, मैंने कहा कैमरा लेकर निकलते हैं। गणपति शूट करते हैं। उस समय बोला गया हमें कि पागल हो गए हो, ऐसा कैसे हो जाएगा। मैंने बोला कि मैं कर के लाता हूं। मैं और जैरी कैमरा लेकर गए। कोई नहीं था हमारे साथ। गणपति हमने असली शूट किया। पूरा माहौल शूट किया। धीरे-धीरे मुझे समझ में आ रहा था। मुझे लग रहा था कि मेरे अंदर कोई प्रोबलम नहीं है। मैं बोल सकता हूं। कैमरामैन की तरह भी बोल सकता हूं। पहले लेखक होने का विश्वास जगा था। मैंने कहा जो अंदर फील करता हूं वो बोलना चाहिए। तो मैंने कहानी डेवलप करनी चालू की थी 'शूल' की। कहानी मुझे सुनाई थी राम गोपाल वर्मा ने कि एक कस्टम ऑफिसर ने किस तरह अमिताभ बच्चन को भी नहीं छोड़ा। वह अपनी ड्यूटी कर रहा था। वो जो एटीट्यूटड था उसको लेकर मैंने बनारस पर आधारित बीएचयू को लेकर उस माहौल की कहानी लिखी थी 'शूल' की। पहले मुझे बताया गया कि तुम्हें डायरेक्ट करना है। फिर वहां कुछ हुआ। फिल्म मुझे अपनी तरह से बनानी थी। फिर सेकेंड हाफ में कुछ चेंज करने का सुझाव आया। तो मैंने कहा लिखूंगा नहीं,लेकिन मैं साथ में रहूंगा।। मैं साथ में रहा। 'शूल' आई-गई खत्म हो गई। 'कौन' में भी ऐसा ही कुछ हुआ था। जो स्क्रिप्ट मैंने लिखी थी, वो बनी नहीं। जो बनी थी, वो उसी में से था जो मैंने लिखी थी। कुछ इम्प्रूवाइजेशन भी थे। लेकिन क्या था कि मैंने राम गोपाल वर्मा को स्क्रिप्ट दिए, उसके छह पन्ने शुरू के पता नहीं कहा चले गए? उन्होंने सातवें से पढ़ी और फिल्म सातवें से शुरू हुई। मेरे लिए वो पहले छह पन्ने महत्वपूर्ण थे। और फिर उन्होंने पूरा पढ़ा नहीं, एक पाइंट तक इंट्रेस्ट था उसके बाद उन्होंने खुद ही इवॉल्व कर लिया। तो मैंने जो लिखा था। मुझे उस स्क्रिप्ट के साथ बहुत लगाव था। ये दो-तीन अनुभव हुए। फिर मिशन कश्मीर हुआ। जहां से मैं छोडक़र आ गया। एक होता है न कि कहानी आपने ये कही, जिससे मैं एक्साइटेड हो गया, मैं कश्मीर गया, मैंने रिसर्च की। मैंने काम किया, हमने फिल्म बनाई। ऑपरेशन टोपाज क्या था जिया उल हक का, उसे ढूंढ कर ले आए। उसको लेकर मिशन कश्मीर बनाया। जब पिक्चर बननी शुरू हुई तो पहली चीज आपने वही निकाल दिया जो मिशन कश्मीर था। जो कारण बताए गए थे वो अलग थे। हमें फ्री में रहने को जगह मिल रही थी श्रीनगर में। हमें फारूख अबदुल्ला मदद कर रहे थे। पुलिस वाले मदद कर रहे थे। वहां के एसटीएफ वाले मदद कर रहे थे। हमने बोला ये सब क्यों डाल रहे हो? मेरा लिख हटा दिया गया बिना किसी कारण के। तो मैं बहुत अपसेट था, विधु विनोद चोपड़ा के एटीट्यूटड से। ये सारी चीजें जमा होती गईं। फिर मैंने फैसला लिया कि मैं खुद डायरेक्ट करूंगा।

- ये लगभग कुछ वैसी ही बात है, जैसे टीचर आपको जेन्युन होना सीखा रहे थे। हम थोड़ा आगे बढ़ें। आप के पास चालीस पेज की एक स्क्रिप्ट थी। उसके बाद आप ने तय किया कि मैं फिल्म बनाऊंगा। यह चाहे अपने-आप में एक लड़ाई थी। चाहे पूरा अपना इवोल्यूशन था। फिर भी फिल्म डायरेक्ट करना एक पहला कदम होता है। उस दिशा में कदम उठा तो फिर आपने किया क्या? अनुराग कश्यप जो खुद को एसर्ट नहीं कर पा रहा था,जब वो कहता है कि मैं डायरेक्ट हूं तो क्या बात हुई थी? क्यों कि पहले अपने-आप को आप डायरेक्टर नहीं मान पाए थे। फिर आप ने खुद को डायरेक्टर माना। अब बात ये है कि सिनेमा में किसी का धन लगता है। कुछ लोग जोड़े जाते हैं। आप में उनका विश्वास होना चाहिए। इस संबंध में बताएं?0 बहुत इंटरनल जर्नी रही है। मेरी बहुत सारी चीजें रही हैं, जो मेरे मोहभंग की वजह से आई हैं। अब जैसे कि जिस तरह के मेरे पिताजी थे, जब मैं बड़ा हो रहा था। तो मैं कुछ आदर्शवादी टाइप का था। वो अंदर आदर्शवाद है सिनेमा को लेकर । मैं जिंदगी कैसे जीता हूं या बाकी क्या करता हूं? उस पर कुछ नहीं कहूंगा। लेकिन सिनेमा को लेकर, लिटरेचर को लेकर के, जो चीजें पसंद हैं उनको लेकर के वह आइडिसलिज्म है। वो कहीं न कहीं है अभी भी है। थोड़ा -बहुत है अभी भी, कुछ साल में हो सकता है चला जाए। लेकिन अभी तक तो है। उस समय ये सारे मोहभंग चल रहे थे,लेकिन मुझे जो चीज ड्राइव करती थी, वो ये है कि मुझे अपने तरह से काम करना है। और लोग समझ क्यों नहीं रहे हैं कि मैं किस तरह का काम करना चाहता हूं। वह ड्राइव आज भी है। मुझे लगता है लोग अभी भी नहीं समझ पा रह हैं। फिल्में रूकी हुई हैं। फिल्में बाहर नहीं आईं। मुझे लगता है कि क्यों नहीं मुझे एक्सप्रेस करने दिया जा रहा है। देखता हूं तो लगता है कि जब-जब मेरी आवाज दबाई गई है, जब-जब ठुकराया गया है तब मैंने और ज्यादा आतरिक दृढ़ता के साथ काम किया है। मेरी शुरूआत हुई 'लास्ट ट्रेन टू महाकाली' से। 'लास्ट ट्रेन टू महाकाली' मैंने निराशा में बनायी। गुस्सा भी था कि यार मुझे कोई बनाने नहीं दे रहा है। एक बात मुझे समझ में आ गई थी कि यहां का जो निर्माता है, जो पैसे वाला आदमी है, जो पूंजीवादी है, उसको लगता है कि निर्देशक का काम है कैमरा लगाना। बाकी कोई इसका काम नहीं है। तो मैंने इसी चीज के लिए तय किया कि मैं कैमरा लगा कर दिखाऊंगा। मेरे पास कोई ज्ञान नहीं था। उस समय सबसे बड़ी मदद मिली स्टार बेस्ट सेलर से। स्टार टीवी पर तब यह सीरिज चल रहा था। उस समय मेरा भाई अभिनव 'डर' नाम का सीरियल बना रहा था। उसमें उसने मेरे नाम का इस्तेमाल किया था। जब उसने मेरा नाम का इस्तेमाल किया तो मुझे पता चला कि कुछ तो है स्टैंडिंग है मेरी। मैंने कहा था भाई से कि क्या जरूरत है? भाई ने बोला कि नहीं अपना नाम दे दो तो सीरियल हो जाएगा। मैंने बोला कि अच्छा… उसने बताया कि बदले में पैसे मिलेंगे। कितने चाहिए? मैंने बड़े जोश मे आकर दस हजार रुपए मांग लिए। उन्होंने बड़ी आसानी से दे दिए। जब सीरियल चालू हुआ तो उन्होंने सीरियल का प्रोमोशन चालू किया । 'सत्या', 'शूल' और 'कौन' के लेखक का सीरियल… मुझे बहुत तकलीफ होती थी। मैं भाई को डांटता था कि तुम मेरा नाम ऐसे क्यों डाल रहे हो। मेरा भाई बोलता था कि आपके अंदर कांफीडेंस नहीं है। मैंने खुद फोन कर-कर के स्टार बेस्ट सेलर को बोला कि मेरा नाम हटाओ। लेकिन उस प्रक्रिया में मुझे रियलाइज हुआ कि मैं कुछ हूं। सब हमको बोले तुम बेवकूफ है। तेरे नाम पर प्रोमोट हो रही है चीज। तू मना क्यों कर रहा है? मैंने बोला कि शर्म आती है। उन्होंने बोला कि चूतिया आदमी है। इससे तुम्हें मालूम है कि तुम्हारी कितनी स्टैंडिंग है। मैंने कहा अच्छा। उन्होंने समझाया कि तुम जाओ स्टार प्लस । तुम जो बोलेगे, वे करने के लिए दे देंगे। मैंने कहा अच्छा। उन्हें जाकर मैंने एक कहानी सुनाई। उन्होंने तुरंत स्वीकृत कर दिया। बिना जाने और देखे कि डायरेक्टर के तौर पर मेरे अंदर क्या संभावनाएं हैं? मैंने लिखी है तीन फिल्में। तब मुझे लगा यार किया जा सकता है। फिर मेरे समझ में आने लगा कि पूरा ध्यान लगा के कुछ किया जाए। इसमें कैमरा लगा के दिखाया। नटी का काम मुझे बहुत अच्छा लगा था। उसने 'अब के सावन झूम के बरसो… धूम पिचक वीडियो मैंने देखा। नटी से मेरी बात हुई दिल्ली में। नटी 'सत्या' का फैन था। नटी मुंबई आ गया। मैंने कहा करते हैं कुछ, लेकिन शूटिंग के एक दिन पहले मेरी जान निकल गई। मैंने कहा करूंगा कैसे? मैंने आज तक किया नहीं। मैंने शिवम को रात के बारह बजे फोन किया। मैंने कहा सर कल शूटिंग है। उन्होंने बोला कि हां कर। शिवम ने कहा कि पागल है, तेरा दिमाग खराब है। जो तुम ने तय किया वही जाकर कर। उन्होंने मुझे रात भर समझाया, जा कर, डर मत। तुमने हाथ डाल दिया। अगले दिन सेट पर गया तो, सुबह-सुबह शिवम ने कहा कि मैं भी आता हूं। मैं वेट कर रहा हूं कि शिवम कब आएंगे। नौ बजे का शिफ्ट था। राजेश टिबरीवाल मेरा दोस्त मेरे साथ था। डॉक्टर चंद्रप्रकाश द्विवेदी के सहयोगी यशवंत शेखावत मेरे साथ थे। यशवंत मेरे को बोल रहा है कि ऐसे करते हैं। राजेश ने भी एक सीरियल बनाया हुआ था। उसने भी कहा कि ऐसे करते हैं। मैं कंफ्यूज… मैं उन दोनों की तरह से नहीं सोच रहा था। फिर नटी ने पूछा कि करना क्या है। मैंने कहा,नटी सीन तो ये है। अब इसको कैसे करना है। मैंने बोला कि मैं इतना बता देता हूं कि कौन कहां बैठा है और क्या कर रहा है। मैंने सीन स्टेज करना चालू किया। नटी ने कहा कहां से शुरू करेंगे। पहला सीन था लडक़ी से बात हो रही है। उसको लेकर आया जा रहा है। मैंने कहा इसको लेकर आते हैं। मैंने कहा कि नटी ऐसा नहीं हो सकता है कि यहां से ये भी दिखे और वो भी दिखे। नटी ने कहा क्यों नहीं हो सकता है। तो नटी ने कैमरा लगाया। फिर धीरे-धीरे जो मेरा पहला सीन था… उसे शूट करने में मैंने फिगर आउट किया अपने-आप। पहला सीन करने में मुझे साढ़ सात घंटे लगे। उस समय मैंने फिगर आउट किया कि फिल्म बनाने का कोई मेथड नहीं है । जो मेथड है, वो आपका मेथड है। आप जैसे फिल्म को अपने दिमाग में देख रहे हो, वैसे ही बना दो। मेरा यह था कि मैं अपने-आप को एक्सप्रेस कर पाता हूं। मेरा विजुअल माइंड है। मैं विजुअली देखता हूं इन चीजों को। उसको आप कैसे एक्सप्रेस कर पाते हो अपनी टीम को।
- आप फिल्म निर्देशन में आना चाहते थे। जब निर्देशन की दिक्कतों का सामना कर रहे थे तो क्या कहीं ये लगा नहीं कि काश मैं फिल्म स्कूल गया होता। कम से कम शॉट लेने की तमीज तो होती। क्या उस समय आप के मन में यह सवाल उभरा था?
0 ये सवाल मेरे दिमाग में बहुत पहले आया था। मैंने शुरू में फिल्म स्कूल जाने की कोशिश की थी। हमेशा लेट हो गया मैं। हर जगह लेट हो जाता था। मैं जा नहीं पाया। लेकिन धीरे-धीरे जब फिल्म स्कूलवालों के साथ बैठना-उठना चालू किया, तो मुझे लगा कि फिल्म स्कूल आदमी को लिमिट कर देते हैं। मैंने अपने प्वाइंट ऑफ व्यू से यह सोच लिया था। जब मैंने डायरेक्ट करना शुरू किया तो उस समय लगता था कि काश किसी ने मुझे सिखाया होता। लेकिन करते-करते वह सब दिमाग से निकल गया। पहली चीज मेरे समझ में यही आई कि बतौर निर्देशक आपको अपने-आपको एक्सप्रेस करना है। पहले दिन मैं सीख गया कि सबसे बड़ा काम निर्देशक का ये है कि लोगों को मैनेज करना, और जो लोग अलग-अलग दिशा में सोचते हैं, उन सब की दिशा को मोड़ कर एक दिशा में लाना। सबसे बड़ा काम निर्देशक का वो मुझे पहले दिन समझ में आया। विजुअली या किसी एक चीज को जिस तरह देखते हो, मन में, मूड में, उसमें कोई गलत नहीं है, आप उसको एक्सप्रेस कितना कर पाते हो और कैमरा मैन कितना समझ पाता है। वो रिश्ता, वो रिलेशनशिप बहुत महत्वपूर्ण है। पहले दिन से ही मैंने कागज लेकर बैठना चालू किया। नटी को बोला ये फ्रेम है। उस फ्रेम में कुछ ठहरा हुआ दिखता था। फ्रेम में जब अपने माइंड में देखता हूं तो स्टैटिक देखता हूं। मूवमेंडट के साथ देखता ही नहीं। मेरा एक वो लिमिटेशन है। मूवमेंट जो आया वो नटी लेकर आया। मैं फ्रेम को हमेशा स्टैटिक देखता था। मूड में देखता था। मुझे लाइट दिखती थी। इस तरह की लाइट गिर रही है उसके चहरे पर। मुझे लगता था कि इस तरह का एक विजुअल होना चाहिए। मैं ढूंढता रहता था कि कहां पर कैमरा लगना चाहिए और मैं उसको बैठ कर स्केच करता था। मैं जो स्केच करता था, नटी वैसा लगाता था कैमरा। और नटी अपनी तरफ से मूवमेंट एड करता था। अनुराग मैं ऐसा कर रहा हूं, बोल कैसा है? और मुझे अच्छा लगता था। एक मेथड इवॉल्व हुआ। वासिक था, आरती थी… हमारी वो टीम है जो चलती आ रही है। तो हमलोगों का बेसिकली तीन या चार दिन का शूट था। फिर हमने कहा कि ये सब करना है। मेरे दिमाग में था कि अब ट्रेन के अंदर शूट करना है। सडक़ पर शूट करना है। कैसे करना है। फिर दिमाग काम करने लगा कि फिल्म ज्यादा इंपोर्टेंट है। फिल्म बनाने के लिए कुछ भी करना है। मेरा एक दोस्त था जो चैनल वी में काम करता था। चैनल वी में नया-नया डीवी कैमरा आया था। मैंने अपने दोस्त को रोल दिया। मैंने कहा तुमको रोल देता हूं। वो प्रोड्यूसर था चैनल वी में। मैंने कहा कि मुझे वह कैमरा चाहिए। रात को जब चैनल वी बंद होता था तो वह कैमरा उठाकर ले आता था। और डीवी कैमरा - मेरे दिमाग में डीवी कैमरा की यह समझ थी कि इसमें आप बिना लाइट के शूट कर सकते हो। आपको लाइट की जरूरत नहीं है। मैंने कहा कि अगर ऐसा कैमरा हाथ में आ जाए तो मैं ट्रेन में शूट कर सकता हूं। मैंने कहा ट्रेन में घूस कर शूट करूंगा। हम लोगों ने लास्ट ट्रेन पकड़ी और उसमें घुस कर के एक कंपाटमेंट हाईजैक किया। हमलोगों ने उसमें शूट किया। बैठे-बैठे यहां से विरार तक गए, विरार से बांद्रा तक की जर्नी में हमने ट्रेन का पूरा हिस्सा बिना लाइट के शूट किया। एडवांटेज मेरे साथ था कि एक कैमरा मैन ऐसा था जो रिस्क लेने को तैयार था। जिसके अंदर कीड़ा था। नटी का न्यूज रीडर बैकग्राउंड था। वो भी तैयार था एक्सपेरीमेंट करने को। हमलोग सब कुछ लगातार ऑन द स्पॉट करते रहे। यह सब करते-करते 'लास्ट ट्रेन टू महाकाली' खत्म होने और उसके टेलीकास्ट होने से पहले मैंने स्क्रिप्ट खतम कर दी 'पांच' की। तब उसका नाम 'मीराज' था। मैंने बीस पन्ने खतम किए, वो एक जर्नी अपने-आप हो गयी। चार दिन बैठा रहा। पांचवें दिन वो सीन दिमाग में आया किडनैपिंग वाला। और किडनैपिंग के बाद अपने-आप एक रास्ता पकड़ लिया। पांचवें दिन मैं सुबह बैठा शाम आठ बजे तक स्क्रिप्ट पूरी हो गयी। और ये नहीं था कि कुछ सोच कर बनाया था। एक दिशा में चली गई। उस समय जो स्क्रिप्ट थी उसमें पुलिस स्टेशन नहीं था। एक सीधी लीनियर कहानी इन लोगों की, जो खत्म होती थी ल्यूक के मर्डर से। स्क्रिप्ट लेकर जब मैंने लोगों सुनाना चालू किया, घूमना चालू किया… लोगों ने कहा कि कठोर अंत है, फिल्म नहीं बनेगी। उस समय फिल्म के फस्र्ट हाफ की वजह से फिल्म बनाने की इच्छा थी। ये था कि कहानी मेरी है। बनाने की इच्छा सिर्फ उसके लिए थी। अब मुझे डेस्परेशन आ गया था। उसी दौरान 'मिशन कश्मीर' का भी हादसा हुआ था। फिर 'वाटर' के लिए मैं चला गया। 'लास्ट ट्रेन टू महाकाली' एयर हो गया। बहुत तारीफ हुई उसकी। लोगों ने बात की । तारीफ भी उसी कारण से हुई, जिस कारण से बनाया था। लोगों ने कहा कि - क्या शूट करता है। कहानी लोगों को नहीं पसंद आई। कुछ नहीं, लोगों ने कहा कि क्या शूट करता है? मेरी ये जर्नी थी कि कभी इस स्टेज पर आऊंगा, जो कहानी कहनी है, वो कहानी भी कह सकूं। 'वाटर' रूक गई तो उस समय बहुत एंगर था , बहुत गुस्सा था। मैंने 'वाटर' लेकर जो प्रोटेस्ट हुआ था बनारस में, उस से फिल्म रूक गई थी, उसकी वजह से मेरे अंदर बहुत गुस्सा था। मैं लोगों से गुस्सा था, चीजों से गुस्सा था। उस समय मोहभंग हो गया था। विधु विनोद चोपड़ा से मोहभंग हो गया था, राम गोपाल वर्मा से मोहभंग हो गया था। 'वाटर' के पॉलिटिक्स से मेरा भ्रम टूटा था। अपने खुद के लोगों से मैं दुखी था। एक बात हमने तय की कि हमलोग प्रोटेस्ट करेंगे। हमने परचे बांटे। सबने एग्री किया। अगले दिन सब पलट गए। लोगों ने बोला कि आप कैसे बोल सकते हैं कि काशी में यह होता है। मैंने कहा कि शिल्पी थिएटर में ट्रिपल एक्स फिल्में मैंने देखी हैं। लोगों ने कहा कि झूठ बोल रहे हैं आप। मैंने कहा कि जो देखा है वह देखा है। सब मेरे खिलाफ हो गए। कहा गया कि तेरी वजह से फिल्म नहीं बनेगी। मुझे बंद कर दिया गया। शबाना आजमी से मेरा मोहभंग हो गया। यहां-वहां सब लोगों से मैं दुखी हो गया। मुझे लगा कि पिक्चर किसी को नहीं बनानी है, सब लोग खामखां हल्ला करना चाहते हैं। मेरे उपर अलग से नाराज थे सभी, क्योंकि कोई बोले नहीं अपने मन की बात। मैं जाकर बोल देता था। फिर क्या हुआ कि मीडिया वाले भी मुझे ढूंढने लग गए। सब लोग मुझे ढूंढने लगे। बहुत सालों के बाद मुझे धीरे-धीरे पता चला कि मैं एक माउथपीस बनता जा रहा था कि बाइट देना है तो बुलाओ। इसलिए मैं बचने लगा। इतना ज्यादा डिसइलूजन हो गया कि क्या कहूं? फिर मैंने कहा कि फिल्म बनाता हूं। मैंने 'शूल' में मनोज और रवीना के साथ काम किया था। जब 'पांच' की नींव गढ़ी गई तो उन दोनों को सुनाया था। मनोज को बोला था,ये करना है। कहानी सुनाई थी रवीना को और बोला था कि करना है। दोनों करने के लिए रेडी थे। 'शूल' में जब उधर से गया तो अचानक उन्हें लगने लगा कि मैं अभी काम का नहीं हूं। मनोज ने बोला कि 17 लाख रूपये चाहिए। रवीना बोला 17 लाख चाहिए। जामू जी तैयार थे फिल्म करने को। उन्होंने बोला कि 1 करोड़ 80 लाख के अंदर बना कर दो। बाद में जब फिल्म बनी तो 1 करोड़ 11 लाख में बनी थी। लेकिन 1 करोड़ 80 लाख में भी उस समय भारी लग रही थी। मैं इतना ज्यादा डिसइलूजन हो गया कि एक दिन गुस्से में मैंने तय किया कि मैं उनके साथ फिल्म बनाऊंगा, जिन्होंने कभी फिल्म नहीं की हो। हर नए आदमी के साथ फिल्म बनाऊंगा। जितने पैसे चालीस लाख-पचास लाख में फिल्म बनाऊंगा। और स्टार सिस्टम पर निर्भर नहीं रहूंगा। बड़े लोगों से दूर रहूंगा। मैंने अपने लिए नियम बनाया। सारे नियम गुस्से में बनाए थे। बहुत ज्यादा गुस्सा था। मुझे लग रहा था कि सब लोग यहां पर जो है, उनमें सिनेमा का पैशन नहीं है। सब लोग अलग कारणों से सिनेमा करना चाहते हैं। फिल्म बनाने के कारण से नहीं करना चाहते हैं। उस समय मेरे अंदर कूट-कूट कर आइडियलिज्म भरा था। उस एंगर में मैं सुधीर मिश्रा के पास गया। मैंने कहा सर ये फिल्म बनानी है। उन्होंने कहा कितने चाहिए। मैंने कहा जितने मिले, उतने में फिल्म बनानी है, मुझे नहीं मालूम मैं कैसे बनाऊंगा। हैंडीकैम पर शूट कर लूंगा मैं। 16 एम एम पर शूट कर लूंगा। तय हुआ चालीस-पचास लाख में फिल्म बनाओ। उस समय मैं सुधीर के लिए एक फिल्म लिख रहा था, जो टूटू शर्मा प्रोड्यूस करने वाले थे। उन्होंने पूछा कि कास्ट कौन है? मैंने कहा कि मुझे नहीं मालूम कौन-कौन रहेगा। के के के साथ मैंने 'लास्ट ट्रेन टू महाकाली' किया है तो के के रहेगा। बाकी नहीं मालूम। उन्होंने कहा कि अच्छा ठीक है। तुम कास्ट इकट्ठा करो। मैंने आदित्य श्रीवास्तव को फोन किया। स्क्रिप्ट पढ़ने के लिए दी। आदित्य ने कहा कि ल्यूक कौन कर रहा है? मैंने उन्हें बताया कि ल्यूक के के कर रहा है। फिर उसने पूछा - मेरे लिए क्या सोचा है? मैंने कहा - मुर्गी। उसका जवाब था, मैं करूंगा। आदित्य श्रीवास्तव के आने से और कांफिडेंस आया। फिर विजय मौर्या दोस्त था। मैंने उस से कहा तू पोंडी कर। पोंडी वास्तव में लिखा था किसी और के लिए। मैंने टूटू को बताया कि ये कास्ट है। उनका कहना था कि यार इस कास्ट को बेचना मुश्किल है। क्या करेंगे? कोई तो लेकर आओ। मेरी एक दोस्त थी त्रिशीला पटेल। उसके घर की छत पर क्रिसमस के दिन पार्टी थी। मैंने वहां तेजस्विनी कोल्हापुरे को देखा डांस करते हुए। सत्यदेव दूबे जी के साथ वह थिएटर कर रही थी। नाटक मैंने देखा ही था। मुझे अपनी फिल्म के लिए वह ठीक लगी। मैंने उसे डांस करते हुए देखा। उसमें कुछ अजीब सी बात थी। एक अजीब सी सेक्सुवेलिटी थी। मैंने सोचा कि ये कैसी रहेगी। पूछा तेजू करेगी मेरी फिल्म। फिर मैंने सुधीर को तेजू के बारे में बताया। उसने भी कहा ठीक है। हमने तेजू से बात की। तेजू ने बताया कि मेरे लिए कुछ सोचा जा रहा है। हमलोग कुछ करनेवाले हैं। आपको टूटू जी से बात करनी पड़ेगी। सुधीर जी से बोला टूटू जी से बात करनी है। उन्होंने कहा चलो टूटू से बात करते हैं। हमने टूटू को स्क्रिप्ट सुनाई। टूटू ने कहा यार चालीस-पचास लाख में कहां फिल्म बनाओगे? कैसे बनाओगे? सुधीर मिश्रा और बृज राठी दो लोग थे। उन्होंने कहा कि मैं बनाता हूं। मैं प्रोड्यूस करता हूं। तेजू को ले रहे हो। सब लोगों को ले रहे हो तो मैं प्रोड्यूस करता हूं। उस तरह से टूटू शर्मा आए फिल्म में और फिल्म शुरू हो गई। जिस दिन टूटू शर्मा ने यह स्क्रिप्ट सुनी और यह डिसीजन लिया कि मैं प्रोड्यूस करता हूं। उसके बारह दिन के बाद शूटिंग शुरू हो गई। हुआ यों कि उन्होंने पूछा कि कब शुरू करना है? मैंने कहा , मैं रेडी हूं। मेरे लिए था कि जल्दी फिल्म शुरू हो। फिर मैं बैठा राजेश टिबरीवाल साथ। विजय मौर्या का उन्होंने एक नाटक देखा था, बोला अच्छा है। आदित्य श्रीवास्तव का काम देखा ही था टीवी में और 'सत्या' और 'बैंडिट क्वीन' में, कहा अच्छा है। के के पर सब को आपत्ति थी। इतना बढिय़ा रोल है। मैंने सोच लिया था कि मैं मनोज बाजपेयी को नहीं लाऊंगा। उस समय मेरी जिद्द थी कि मैं मनोज बाजपेयी के साथ काम ही नहीं करूंगा। मैंने कहा केके करेगा। उन्होंने कहा कि नहीं। मैंने कहा कि टेस्ट शूट करने दो। शूटिंग कैसे करोगे? मैंने सुना था… किसी एक इंटरव्यू में पढ़ा था या कहीं पढ़ा था मैंने कि किसी एक डायरेक्टर ने फिल्म बनाई थी, जबकि उसके पास पास पैसे नहीं थे। उसने ट्यूब लाइट और बल्ब में शूट किए थे। मुझे वह फिल्म बहुत अच्छी लगी थी मैंने खुल्ला बोल दिया कि ट्यूब लाइट और बल्ब में शूट करूंगा। बिना जाने-समझे कि उसके क्या परिणाम होते हैं, मैंने कहा ट्यूब लाइट और बल्ब में शूट करूंगा। नटी ने मुझे घूम कर देखा- क्या हो गया? पागल हो गया है? दिमाग खराब है। मैंने कहा, हां हमलोग ट्यूब लाइट और बल्ब में शूट करेंगे। नटी डर गया। नटी बोला कैसे करेंगे? मैंने कहा कि मैं दिखाता हूं। 'चंकींग एक्सप्रेस' का वीसीडी था मेरे पास। उसका बिगनींग था। मैंने 'चंकींग एक्सप्रेस' का बिगनींग दिखाया उस। नटी को विश्वास नहीं हुआ। उसने फिर से पूछा कि ये ट्यूब लाइट में शूट हुआ है? मैंने कहा - हां ट्यूब लाइट में हुआ है। उसने कहा कि मुझे टेस्ट करना पड़ेगा। मैंने कहा कि केके को टेस्ट करते हैं। एक रूम बुक किया गया। पांच-छह ट्यूब लाइट मंगाया गया। नटी को डर था कि ट्यूब लाइट फ्लिकर आएगा। हमने बीच में ट्यूब लाइट रख दी। वह शॉट फिल्म में हमने डाला है। हमारा टेस्ट शूट है। उसमें चारो एक्टर को बैठाया। कुछ अजीब सा शूट कर रहे थे हमलोग। सभी को आशंका थी कि ट्यूब लाइट में क्या लाइट आएगी? कैसा ग्लो आएगा? नटी बहुत कांफीडेंट हो गया था। नटी ने बोला कि बाबू कुछ मैजिक हो जाएगा। मैंने कहा ठीक है। शूट दिखाया गया। केके फिर रिजेक्ट हो गया। हमलोगों ने शूटिंग प्लान कर लिया। लोकेशन जाकर ढूंढ लिया। लोकेशन क्या था कि किसी ने बोला कि वाटसन होटल है टाउन में। वाटसन में भारत में पहली बार सिनेमा का शो हुआ था। वह एक आकर्षण था कि यार वहां जाकर शूट करते हैं। लेकिन कैसे शूट करें, कहां शूट करें, वहां एक घर था जो बंद था। वह घर कुछ अठारह-बीस साल से बंद था। उसमें पुराने फर्नीचर पड़े थे। हमने घर खोला और टार्च की रोशनी में हमने लोकेशन देखी थी। मैंने कहा यहां आ जाते हैं और यहीं शूट करेंगे। उन लोगों ने बोला कि आप दिन में आकर देख लेना। मैंने कहा कि देखना नहीं है। जगह समझ में आ गई, यहीं शूट करेंगे। कैसे करेंगे? फिर आर्ट डायरेक्टर के साथ बैठा। कमरे में ऐसे करेंगे। ल्यूक का घर बनाना था। मेरी अपनी पुरानी तस्वीरें थीं, जो अभी भी है। मैंने अपने कमरे की फोटोग्राफ्स दिखाई। कैसे मैं दीवाल पर लिखता था? यहां आने के बाद मैंने अपनी पहली कविता दीवाल पर लिखी थी। पंखे पर लिखा रहता था, पंखा किसने बंद किया चूतिए? तो पंखा चलते ही रहता था। हम जमीन पर लेटते थे, पंखे पर, दीवाल पर लिखा रहता था सब कुछ। मैं ऐसे लिखता था। और पेंट करता था और स्केच करता था। मैंने अपनी सारी फोटोग्राफ दिखाई। मैंने कहा ये चाहिए मेरे को। उसने कुछ और जानना चाहा तो जिम मोरिशन की बायोग्राफी दी। मैंने कहा कि उसमें वो डॉल का फेस है। एक ऐसा डॉल का चेहरा दो। मुझे इस्तेमाल करना है। एक माहौल क्रिएट करना है। मूड क्रिएट करना है। ये पोएट्री लिखी होगी दीवाल पर ,जो वास्तव में मेरे रूम के दीवाल पर लिखी रहती थी। रिकॉगनाइज जीनियेसेस, रिकॉगनाइज मी । जवानी के दिनों में एक जोश रहता है न? आपको लगता है कि आप बहुत कुछ कर सकते हैं। दुनिया नहीं समझती है। इस तरह से सब लिखा हुआ था। वो सारी चीजें दिखाईं, इवॉल्व हुआ सारा सबकुछ। वहां लोकेशन पर काम चल रहा है और यहां बोल रहे हैं केके है ही नहीं। दो दिन बचे हैं शूटिंग के लिए। कल मुहूर्त है, अनिल कपूर आनेवाला है मुहूर्त करने के लिए। अनिल कपूर ने आकर फिल्म का मुहूर्त किया । अनिल कपूर ने भी देखा और कहा यार ये लड़का कौन है। किसको हीरो बना रहे हो? जब मैंने केके को अप्रोच किया था क्रिसमस के पहले। टूटू शर्मा से मिलने के पहले, तभी से केके ने वर्क आउट चालू किया। उसने अपना शरीर बदल लिया था। उसके बाल इतने लंबे-लंबे थे। हमने कहा कि क्या करें। उसमें हाकिम आलिम जो है वो सिर्फ आलिम था। हमने कहा आलिम कुछ कर। मैं आलिम के यहां जाता था बाल कटाने। आलिम के यहां मैं बैठकर फोटो लेना चालू किया। फोटोग्राफ क्लिक करना चालू किया। तो एक लुक आया उसने बोला कि गोल्डन हाई लाइट दे दूं। मैंने कहा, दे दे… देखते हैं। उसने बाल ऐसे स्पाईक कर दी। मैंने जिंदगी में ऐसी हेअर स्टाइल नहीं देखी। हेयर स्टाइल ने किरदार का मूड ही बदल दिया। फबीया ने बोला कि यार इसके हिसाब कॉस्टूयम में मिलेट्री पैंट दूं तो एक नाजी फील आ जाएगा। तो वो आया। चीजें अपने-आप जुड़ती गर्इं। सब करके मैं केके को लेकर गया। ये सब मुहूर्त के बाद हुआ । अगले दिन शूटिंग होने वाली है। सेट पर पहली बार लेकर गया। सब लोग केके को देखकर डर गए। वह बिल्कुल बदल गया था। फिल्म टेक ऑफ कर गई। शूटिंग का पहले दिन जाकर फाइनल हुआ केके। मैंने तब तक सेट नहीं देखा था कि वासिक ने क्या किया है? मैं सेट पर गया। वहां मैंने देखा कि वासिक सेट को अलग लेवल पर ले गया था। उसने पांच चेहरे बना दिया था दीवाल पर और एक म्यूरल बना दिया था। मैंने कहा वासिक भाई ये क्या कर दिया। वासिक भाई ने बोला कि क्यों सर अच्छा नहीं लगा। मैंने कहा लिखा हुआ चाहिए था, ये चेहरे नहीं चाहिए। वासिक ने बोला कि एक घंटा दो, मैं हटवा देता हूं। मैंने कहा आप हटाइए। बैठा था, मैं चेहरा देखने लगा। मैं स्क्रिप्ट पढऩे लगा। एक पन्ना पढ़ा और बोला कि वासिक भाई आप रूको। मेरा यह डर था कि अवास्तविक लगेगा। मैंने स्क्रिप्ट का पन्ना खोला, वह सीन था जब इंस्पेक्टर पहली बार आता है। मैंने कहा सीन को रीयल बना दो। मुझे इसे फिल्म का हिस्सा बना लेने दो। मैंने फिर बैठे-बैठ पहले दिन शूट करने से पहले वह सीन लिखा। ये कौन है? ल्यूक है। ये कौन है? ल्यूक है। सब ल्यूक है? नहीं वो मैं हूं। कौन वो छोटा वाला? हां, अच्छा है, वैसा वो करने से मैं देखता हूं। उसको मैंने एक थॉट प्रोसेस दिया वहीं बैठे-बैठे। मैंने कहा अभी हो गया, छोड़ दो अच्छा लग रहा है। वो वासिक का आइडिया था।
- आप तीन फिल्मों में बतौर लेखक जुड़े हुए थे। एक टेली फिल्म बना चुके थे। स्टार बेस्ट सेलर के रूप में। उसको बाद इनाम भी मिला था। ये सारी चीजें करने के बाद भी आपको फिल्म मेकिंग का कह लें नटस एंड बोल्टस या क्रिएटिव एनर्जी ऑफ फिल्मस है… स्क्रिप्ट के बाद की जो फिल्ममेकिंग है, क्योंकि कागज पर तो फिल्म लिखी या सोची जा सकती है। बनती है वो ऐसे ही मौकों से है। इसका ज्ञान तब तक नहीं था इस पर मुझे ताज्जुब हो रहा है। इस संबंध में आप थोड़ा बताएंगे क्या?
0 मैं एक चीज मानता हूं। आज जब मैं पीछे देखता हूं न? मैं बीच में बहुत परेशान रहा हूं। पहली बार यह परेशानी तब हुई थी, जब 'पांच' रूक गई थी। कुछ आठ महीने मैंने शराब ही शराब पिया। बहत्तर किलो छरहरा था मैं, जो मोटा होकर नब्बे किलो का हो गया था। तब से आज तक वह वजन गया नहीं है। अपनी आठ महीने की उस जर्नी रही में मैंने बहुत चीजें सोची थीं। आप सफल होते हैं तो माइथोलोजी क्रिएट हो जाती। अपनी फिल्म के लिए ही नहीं ,मैं 'वाटर' के लिए भी लड़ा था। जिस चीज पर मुझे फेथ था, उसके लिए लड़ा था। मुझे लगता था जो सच है उसके लिए लडऩा है। लोगों ने मुझे एक स्थान दे दिया था। ऐसी फिल्में लिखता है। 'सत्या' के बाद कुछ नहीं मिला था। 'शूल' के बाद, राम गोपाल वर्मा को छोडऩे के बाद, 'मिशन कश्मीर' छोडऩे और 'वाटर' के लिए लडऩे के बाद लोगों मुझे एक नाम दे दिया था। एक आदमी है, जो ऐसा बोलता है,साफ बोलता है। लेकिन मैं वो चीज नहीं ढूंढ रहा था। 'पांच' के बाद भी क्या हुआ? लड़ाई के बाद लोगों ने मुझे पेडेस्टल पर चढ़ा दिया । मैं किसी से नार्मल बात नहीं करता था। मैं कहीं भी जाऊं, लोग एक्सपेक्ट करते थे कि मेरे मुंह से अभी कुछ ज्ञान निकलेगा। किसी से बात करने बैठूं तो ज्ञान निकलेगा। और मैं उस तरह आदमी हूं, जो आज तक बकचोदी करता है। मैं बैठूंगा बरिस्ता पर, सिनेमा पर बातें करूंगा और दोस्तों को डीवीडी दिखा कर जलाऊंगा। सिनेमा के बारे में बात करूंगा। ऐसी बहसों से सीखने को मिलता है। मुझे आधी फिल्में प्रवेश भारद्वाज ने बतायी हैं। मेरी जर्नी अभी तक चल रही है। मैं धीरे-धीरे डिस्कवर कर रहा हूं। 'मिल विल' मैंने 2005 में डिस्कवर किया है। नयी फिल्में देखता हूं। नए फिल्ममेकर मुझे वापस रीसेट कर रहे हैं। मेरी जर्नी चलती रहती है। लेकिन लोगों ने मुझे एक अजीब से पेडेस्टल पर बैठा रखा है। मैं विचारों से प्रेरित होकर बहस करता हूं। है। ये फिल्म इस तरह से बननी चाहिए। मेरी बातों में एक तरह का आइडियलिज्म आ जाता है । लोगों ने जब मुझे पेडेस्टलपर चढ़ाया। मैंने हर चीज निर्दोष भाव से किया। मेरी यही ताकत रही। इसका भी मुझे मुझे बाद में एहसास हुआ। क्योंकि मुझे नहीं मालूम, अगर मुझे मालूम होता तो शायद मैं नहीं करता। क्योंकि मुझे नहीं मालूम था, इसलिए मैं कर गया। मुझे पहली बार वर्कशॉप पर बुलाया गया तो मेरा रिएक्शन था, मैं क्या बताऊंगा किसी को, मुझे खुद नहीं लिखना आता। उनको मेरी यह बात अच्छी लगी। मैं जब वर्कशॉप के लिए गया तो उन्होंने कहा कि आपका क्या प्रोसेस है। मैंने कहा कि 'सत्या' मैंने नहीं लिखी, 'सत्या' लिख दी गई। 'सत्या' बन गई। 'सत्या' बनी तो मैंने उसमें सीखा। मैंने अपनी गलतियां बताना चालू कीं। उसका रिएक्शन क्या हुआ कि लोगों को वह बात पसंद आई। लोगों ने कहा कि इस तरह से कोई बात नहीं करता है। लोग आकर हमको सिखाते हैं ऐसे करो, वैसे करो। एक ईमानदारी होती है निर्दोषिता में, नहीं जानने में और मैं एडमिट करता रहा कि मुझे नहीं आता था, ये हो गया था। सबको लगा कि मैं बहुत विनम्र हूं। मैं विनम्र नहीं था। मैं सच बोल रहा हूं। हां, उसका रिजल्ट आया। रिजल्ट तब आया, जब मैं एफटीआई में वर्कशॉप करने गया और मैंने बोला, यार राइटिंग-वाइटिंग कुछ नहीं फिल्म देखते हैं साथ में। मैंने तीस फिल्में देखी साथ में। मैंने कहा लिखो, राइटिंग का प्रोसेस यही है, बस लिखते रहो। पहले जानो कि तुम क्या कहना चाह रहे हो। क्या कहानी है, कहानी के माध्यम से कहो। मैं बैठता था और कहता था कि लिख-लिख के दिखाओ। लिखते थे फिर बोलते थे, इसमें ऐसा कुछ हो सकता है? तो आयडिया लेवल पर वर्कशॉप की मैंने। अ'छा ये सीन ऐसा करें तो कैसा होगा? ऐसा करें तो कैसा होगा? उसका रिजल्ट यह हुआ कि उस वर्कशॉप में 17 स्क्रिप्ट सबमिट हुई। उसके पहले जो राइटिंग वकशॉप हर साल होती है, उसमें दो ही स्क्रिप्ट सबमिडट होती थी। मैंने दो का रिकार्ड 15 स्क्रिप्ट से तोड़ा था। हर आदमी ने स्क्रिप्ट लिखी थी। सोलह स्टूडेंट थे, एक ने दो स्क्रिप्ट लिख दी थी। मैं आधे लोगों से मिलता हूं, उन्होंने ना 'पांच' देखी है और ना 'ब्लैक फ्राइडे' देखी है। और वो मुझसे मिलना चाहते हैं। प्रोड्यूसर से मिलता हू तो वे कहते हैं कि आप से मिलने की बहुत इच्छा थी। लोग बात कर रहे थे कि स्क्रिप्ट आ गई है। यह गुलाब जामुन है, इसमें चाशनी की जरूरत है। अनुराग कश्यप को ले आओ। मैंने कहा आप जानते हैं मुझे? आपने मेरा काम देखा है? आपने कुछ देखा है? हवा पर हवा बनती गई और हवा किस बात पर बनी? मैंने महसूस किया कि मैं बहुत कुछ नहीं जानता हूं। बात ये है कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में लोगों को मालूम ही नहीं कि वे क्या कर रहे हैं?
- पांच पर वापस आते हैं।?
0 'पांच' बनाने के बाद मैंने ये सब महसूस किया। मुझे मालूम था कि मैं क्या कर रहा हूं। मुझे सिर्फ इतना मालूम था कि मैं क्या कर रहा हूं। ना मैं किसी ग्रेटनेस के लिए कर रहा था। ना कुछ और साबित कर रहा था 'पांच' से। मेरे सामने रोड़े आते गए और कहीं न कहीं होता है न कि आपके सामने दीवार आ गयी और दीवार तोडऩे में आपकी पर्सनालिटी थोड़ी बदल गयी। फिर दीवार आई, आज तक दीवार तोड़ रहा हूं। स्कूल से जो मेरा जर्नी चालू हुआ, वह अभी खम्त नहीं हुआ है। मेरा आत्माराम शर्मा आज भी है। या तो वह सेंसर बोर्ड के रूप में है या वह आत्माराम शर्मा सुप्रीम कोर्ट के रूप में है। और वही आत्माराम शर्मा 'पांच' बनाते समय इस रूप में था कि सीन कैसे शूट करूं? 'पांच' में जो मैंने पहला सीन शूट किया, उसे आज भी कोई फिल्ममेकर देख कर बता सकता है कि ये पहला है। क्योंकि वह इकलौता सीन है, जिसमें समझ में नहीं आ रहा है कि क्या करूं? तो मैंने सबकुछ शूट किया। हर एंगल से शूट किया। हर कैरेक्टर के क्लोजअप भी लिए। दोनों एक्सेस से भी शूट किया, जो किडनैपिंग का प्लान हो रहा है। तो उसमें एक्सेस भी जम्प हो रहा है। उसमें पचास चीजें हो रही हैं। धीरे-धीरे जब वह सीन एंड हो रहा है, उसे एक फिल्ममेकर समझ सकता है। पहले दिन और पहले सीन में मेरी समझ में आ गया कि पिक्चर कैसे बननी चाहिए। सीन का आरंभ अनगढ़ है। और सीन खत्म होते-होते एक रीदम आ गया उसमें। वहां से मेरी जर्नी शुरू हो गई। मेरे सामने जब चैलेंज आता है तो मैं ज्यादा अच्छा काम करता हूं। शिवम नायर भी बोलते हैं कि लास्ट मिनट क्राइसिस होता है न कि दो दिन में स्क्रिप्ट चाहिए तो तू लिखता है। तेरे को दो साल दे दें तो तू कुछ भी नहीं लिखेगा। मैं अपने-आप को लगातार प्रेशर में रखता हूं। शूटिंग करने की जगह पर व्यावहारिक समस्याएं रहती हैं। लाइट कहां लगाएं? इतनी पुरानी बिल्डिंग है। आप बाहर लाइट लगा नहीं सकते। छज्जा गिर जाएगा। सेंटर में लाइट ले लो। क्योंकि समस्याएं थी, लाइट और कहीं लग नहीं सकती थी। सेंटर में लगी तो टॉप लाइट हो गयी। टॉप लाइट डिसाइड कर के नहीं गया था। उससे एक अलग मूड क्रिएट हुआ। बहुत ज्यादा ब्राइट हो गया। मुझे लगा ज्यादा ब्राइट है। मैंने कहा नटी बहुत रोशनी है। उसने पूछा कि कितनी चाहिए। मैंने कहा कि विजुअली स्क्रीन पर इतना दिखना चाहिए। तू कितनी इस्तेमाल करता है, वह तेरे ऊपर। उस तरह से अपने प्रोसेस इवॉल्व किया। फिल्म स्टॉक से पहली बार डील कर रहा था। बार-बार नटी डांटता था। मैं जिद्द करता था कि 'लास्ट ट्रेन टू महाकाली' में तो हो गया था। नटी समझाता था, बाबा ये फिल्म स्टॉक है। ये सब फर्क मुझे नहीं मालूम था। नटी संभावना बतलाता था और मैं प्रयोग करने घुस जाता था। लाइटिंग में हमलोगों ने कई प्रयोग किए। उस तरह से एक प्रोसेस इवॉल्व होता रहा और मैं सीखता रहा। हमलोग क्लाइमेक्स शूट कर रहे थे। किसी को स्विमिंग नहीं आती थी। मैंने कहा कि चलो मैं सिखाता हूं। अठारह घंटों तक मैं सभी को पुल में सबको स्विमिंग सिखा रहा हूं। आप यहां से यहां तक का शॉट दे दो, बाकी मैं मैनेज कर लूंगा। फिर केके डाइव नहीं कर रहा था। वह फिल्म का ऑपनिंग शॉट था। कैसे करूं? मैंने कहा सेट पर आओ, शॉट इवॉल्व हुए और मजबूरी में हमने प्रयोग किया। मैंने केके को कहा कि आप जरा सा झुकना। फिर कैमरा आपसे दूर चला जाएगा और मैं डाइव करूंगा। मैं आपके पीछे रेडी खड़ा हूं। कैमरा आया वहां। मैंने डाइव किया। मैं तो डाइव कर रहा हूं। मैं डुप्लीकेट हूं। किसी को नहीं मालूम कि मैं क्या शूट कर रहा हूं। मैंने अंडरवाटर कभी शूट नहीं किया। हर चीज को क्रॉस चेक भी कर रहा हूं। करते-करते हमलोगों ने कुल अड़तीस घंटे शूट किया। जॉय का भी प्रोब्लम था। उसने कहा कि मैं बहुत मोटा हूं, मैं शर्ट नहीं उतार सकता। तो मैं खुद जॉय की शर्ट पहन कर कैमरे के सामने चला गया। हमारे पास इतना वक्त नहीं था कि वहां क्लाइमेक्स शूट कर लें। क्लाइमेक्स पर जब हमलोग पहुंचे तो बीच पर गए। वहां पानी उतरते-उतरते तीन बजा। मुझे वही लोकेशन चाहिए था। बैकग्राऊंड में फोर्ट दिख रहा था। मुझे लोकेशन की समझ है। मुझे मालूम है कि यहां शूट करूंगा तो अच्छा दिखेगा। मैंने वह लोकेशन फोर्ट के लिए ही चुना था। पानी उतरेगा नहीं तो हमलोग लाइट आगे कैसे लाएंगे। लाइट आगे नहीं लाऐंगे तो फोर्ट दिखेगा नहीं। फोर्ट पर लाइट पडऩी चाहिए। तीन बजे के बाद थोड़ा सा पानी उतरा। पांच बजे सुबह के पहले खत्म करना था, क्योंकि उसके बाद की अनुमति नहीं है। दो घंटे में ही सब करना है। नटी ने कहा, बाबा अभी टाइम नहीं है। उसने छह एच एम आई खड़ा कर के लाइट मार दिया। वहां मेरा एक दोस्त विक्रम मोटवानी पोलराइड कैमरा लेकर आया था। उसले फोटो खींच कर दिखाया। ये देख मस्त फोटो आया। फोटो कैसा? बैकग्राउंड में छह लाइट है और लाइट पीछे आ रही पीठ पर, सामने तो आ नहीं रही है। मैंने पाया कि इधर से तो चेहरा दिखता ही नहीं है। मैंने कहा कि मैं ऐसे ही शूट करूंगा इसमें आधा चेहरा दिखे आधा न दिखे तो मैजिक हो जाएगा। नटी बोला चल शूट करते हैं। हो जाएगा सीन। उसके पहले हमलोग क्या-क्या ट्राय कर चुके थे। मैंने कहा कि बारह फ्रेम पर शूट करते हैं। बारह फ्रेम पर शूट करने का मतलब है कि थोड़ा ज्यादा रिजोल्यूशन होगा, फोर्ट दिखेगा। एक्टर को स्लो चलना पड़ेगा। हमने एक पूरा सीन किया, जिसमें केके और आदित्य श्रीवास्तव धीरे-धीरे चल रहे थे। डायलॉग बोल रहे हैं। हमनें एक पूरा टेक लिया था। बाद में फूटेज देखी तो उस टेक में से हमने सिर्फ दो शॉट रखे। पांच बजे तक हमलोगों ने शूटिंग खत्म की। वहां सुबह देखी तो लाश खींच कर ले जाने का सीन भी वहीं कर दिया। वैसे 'पांच' बनी।
(बहुत मुश्किल से यह अपलोड हो पाया है.)

Sunday, March 9, 2008

...और कितने देवदास


-अजय ब्रह्मात्मज
शरत चंद्र चंट्टोपाध्याय की पुस्तक देवदास 1917 में प्रकाशित हुई थी। उनकी यह रचना भले ही बंगला और विश्व साहित्य की सौ महान कृतियों में स्थान नहीं रखती हो, लेकिन फिल्मों में उसके बार-बार के रूपांतर से ऐसा लगता है कि मूल उपन्यास और उसके किरदारों में ऐसे कुछ लोकप्रिय तत्व हैं, जो आम दर्शकों को रोचक लगते हैं। दर्शकों का यह आकर्षण ही निर्देशकों को देवदास को फिर से प्रस्तुत करने की हिम्मत देता है।
संजय लीला भंसाली ने 2002 में देवदास का निर्देशन किया था। तब लगा था कि भला अब कौन फिर से इस कृति को छूने का जोखिम उठाएगा? हो गया जो होना था।
सन् 2000 के बाद हिंदी सिनेमा और उसके दर्शकों में भारी परिवर्तन आया है। फिल्मों की प्रस्तुति तो बदल ही गई है, अब फिल्मों की देखने की वृति और प्रवृत्ति में भी बदलाव नजर आने लगा है। पिछले आठ सालों में जिस तरह की फिल्में पॉपुलर हो रही हैं, उनके आधार पर कहा जा सकता है कि दुख, अवसाद और हार की कहानियों पर बनी फिल्मों में दर्शकों को कम आनंद आता है। एक समय था कि ऐसी ट्रेजिक फिल्मों को दर्शक पसंद करते थे और दुख भरे गीत गाकर अपना गुबार निकालते थे। एकाध अपवादों को छोड़ दें तो इधर रोमांस, थ्रिलर और कॉमेडी फिल्में ही ज्यादा पसंद की जा रही हैं।
इस परिप्रेक्ष्य में सुधीर मिश्र और अनुराग कश्यप का फिर से देवदास पर आधारित फिल्म की बात सोचना सचमुच हिम्मत और युक्ति की बात है।
अनुराग कश्यप कहते हैं,भारतीय समाज में हम सभी आत्ममंथन और निजी दुख से प्यार करते हैं और दूसरों की सहानुभूति अर्जित करने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। यही कारण है कि देवदास का किरदार और उसका विषय हर पीढ़ी के दर्शकों को पसंद आता है। अनुराग आगे बताते हैं, मेरी फिल्म देवदास से प्रेरित है, लेकिन वह आज की कहानी है, इसलिए उसका नाम देव.डी है। मेरा देव पंजाब का आधुनिक युवक है, जो बेहद समझदार और दुनियादारी से परिचित है। अनुराग की फिल्म में अभय देओल , माही, कल्की और दिब्येंदु भट्टाचार्य मुख्य भूमिकाएं निभा रहे हैं।
दूसरी तरफ सुधीर मिश्र अपनी फिल्म देवदास के मूल कथानक को राजनीतिक संदर्भ दे रहे हैं। उन्होंने राजनीतिक बैंक ड्रॉप में देवदास को गढ़ा है। उनकी फिल्म में मां का किरदार महत्वपूर्ण है, जो अपनी राजनीतिक आकांक्षाओं की थाती देव को सौंपती हैं। एक तरह से मां की मदद के लिए राजनीति में आया देव आखिरकार कैसे राजनीति के पचड़े में फंसता है। यहां नए संबंध बनते हैं, क्योंकि उन संबंधों का राजनीतिक महत्व है। सुधीर मिश्र कहते हैं, मेरी फिल्म की कहानी शरत चंद्र के उपन्यास से अलग है। मैंने अपनी फिल्म में देवदास के स्वभाव को लिया है और उसे आज के संदर्भ में देखने की कोशिश की है।
क्या एक-दूसरे माहौल और समय में भी देवदास वैसे ही रिएक्ट करेगा, जैसे बिमल राय और संजय लीला भंसाली की फिल्मों में करता रहा या शरत चंद्र के उपन्यास में चित्रित हुआ? सुधीर मिश्र की फिल्म में शाइनी आहूजा और चित्रांगदा सिंह मुख्य भूमिकाओं में हैं।
देवदास उपन्यास के अंत में शरत चंद्र ने लिखा था, यदि कभी देवदास सरीखे अभागे, असंयमी और पापी के साथ आपका परिचय हो जाये तो उसके लिए प्रार्थना करना कि और चाहे जो हो, लेकिन उसकी तरह किसी की मृत्यु न हो। शायद सुधीर मिश्र और अनुराग कश्यप दोनों की ही फिल्मों में देवदास की मृत्यु नहीं होगी या उनकी फिल्म शोकांतिका नहीं होगी। यह भी पहली बार होगा कि देवदास पर आधारित इन फिल्मों के किरदार मूल उपन्यास के किरदारों से बिल्कुल अलग और समकालीन होंगे। दोनों ने अपने लिए यह चुनौती पहले ही खत्म कर दी है कि वे मूल के कितने करीब होते हैं?
फिल्म लेखक कमलेश पांडे दोनों युवा निर्देशकों के प्रयास की सराहना करते है और कहते हैं, यह छूट निर्देशकों को मिलनी चाहिए कि वे किरदार को अपनी जरूरत के सांचे में ढाल सकें। बस इतनी सावधानी रखें कि वे शाहरुख खान की अशोक की तरह अशोक को न बदल दें। आज के हिसाब से समसामयिक और सार्थक परिवर्तन का स्वागत होगा। देवदास में आत्मदया का एक भाव है। मुझे नहीं लगता कि आज की पीढ़ी के दर्शकों को यह भाव पसंद आएगा। गौर करें कि देवदास पतित व्यक्ति नहीं है। वह एक विरोध के तहत शराब को हाथ लगाता है। त्याग और विरोध के ऐसे किरदार की प्रासंगिकता इसी से समझ सकते हैं कि सौ सालों के बाद भी वह हमारी स्मृति में ताजा है। देखना रोचक होगा कि सुधीर मिश्र और अनुराग कश्यप के देवदास को दर्शक कितना पसंद करते हैं?

Tuesday, October 30, 2007

'नो स्मोकिंग' का के काफ्का नहीं कश्यप है ... अनुराग कश्यप

हिंदी फिल्मों के अंग्रेजी समीक्षकों पर चवन्नी की हैरानी बढ़ती ही जा रही है. एक अंग्रजी समीक्षक ने तो 'नो स्मोकिंग' के बजाए अनुराग कश्यप की ही समीक्षा कर दी. वे अनुराग से आतंकित हैं. उनके रिव्यू में यह बात साफ झलकती है. क्यों आतंकित हैं? क्योंकि अनुराग उन्हें सीधी चुनौती देते हैं कि आप खराब लिखते हो और हर लेखन के पीछे निहित मंशा फिल्म नहीं ... कुछ और रहती है.

'नो स्मोकिंग' को लेकर बहुत कुछ लिखा और कहा जा रहा है. अनुराग कश्यप की यह फिल्म कुछ लोगों की समझ में नहीं आई, इसलिए निष्कर्ष निकाल लिया गया कि फिल्म बुरी है. इस लॉजिक से तो हमें जो समझ में न आए, वो सारी चीजें बुरी हो गई. समझदारी का रिश्ता उपयोगिता से जोड़कर ऐसे निष्कर्ष निकाले जाते हैं. आज की पीढ़ी संस्कृत नहीं समझती तो फिर संस्कृत में लिखा सब कुछ बुरा हो गया. और संस्कृत की बात क्या करें ... आज तो हिंदी में लिखा भी लोग नहीं पढ़ पाते, समझ पाते ... तो फिर मान लें कि हम सभी हिंदी में लिखने वाले किसी दुष्कर्म में संलग्न हैं.

कला और अभिव्यक्ति के क्षेत्र में वह तुरंत पॉपुलर और स्वीकृत होता है, जो प्रचलित रूप और फॉर्म अपनाता है. जैसा सब लिखते और सृजित करते हैं, वैसा ही आप भी लिखो और सृजित करो तो तुरंत स्वीकृति मिलती है. किसी ने भी धारा के विपरीत तैरने की कोशिश की तो उसे अनाड़ी घोषित कर दिया जाता है. अनुराग कश्यप अनाड़ी साबित किए जा रहे हैं.

'नो स्मोकिंग' का के काफ्का नहीं, खुद कश्यप हैं ... अनुराग कश्यप.अगर आप के के ऊपर बढ़ रहे दबाव और उसमें आए बदलाव की प्रक्रिया पर गौर करें तो पाएंगे कि बाबा बंगाली, उसकी बीवी और उसके दोस्त सभी उसे उस व्यवहार को अपनाने के लिए कहते हैं, जिस पर चलना नैतिक रूप से सही माना जाता है. नैतिकता के वर्चस्व को स्थापित करने के पीछे निजता समाप्त करने की इच्छा है. आखिर इस समाज में कैसे के मनमर्जी से जी सकता है? आरंभ में अहंकारी दिख रहा के फिल्म के अंत में उसी सिस्टम का हिस्सा बन जाता है. आज की यही नियति है. सारे विद्रोही एक-एक कर सिस्टम का लाभ उठाने के लिए आत्मा से विमुख होकर शारीरिक उपभोग में लीन हो गए हैं. के का भी यही हश्र होता है.

के की लड़ाई और उसकी हार में हम कश्यप को देख सकते हैं. पिछले पंद्रह सालों में कश्यप ने धारा के विपरीत तैरने की कोशिश की है, लेकिन उस पर लगातार दबाव है कि वह भी दूसरों की तरह सोचना और फिल्में बनाना शुरू कर दे. 21वीं सदी में व्यक्तिगत आजादी पर एकरूपता का यह हमला वास्तव में किसी और समय से ज्यादा महीन और आक्रामक है. हम समझ नहीं पाते और अपनी विशिष्टता खोते चले जाते हैं. हमारी सफलता इसी एकरूपता पर निर्भर करती है.

वर्त्तमान परिप्रेक्ष्य में इस विसंगति और विडंबना को समझते हुए 'नो स्मोकिंग' की अन्योक्ति को पढ़ने का प्रयास करें तो फिल्म बच्चों की कविता की तरह सरल हो जाएगी. अगर हम शब्द, भाव और अभिव्यक्ति से परिचित नहीं हों तो हर कविता, कहानी और फिल्म दुरूह और अपरिचित हो जाएगी. अनुराग कश्यप पर ऐसी ही दुरूहता का आरोप है.

चवन्नी मानता है कि 'नो स्मोकिंग' को फिर से देखने की जरूरत है. बिंबों और प्रतीकों की ऐसी प्रगतिशील सिनेमाई भाषा हिंदी फिल्मों में विरल है .

Friday, October 26, 2007

अनुराग कश्यप का पक्ष

(चवन्नी ने अनुराग कश्यप के ब्लॉग का एक अंश तीन दिनों पहले पोस्ट किया तह.तभी वादा किया था कि पूरा पोस्ट जल्दी ही आप पढेंगे.पेश है सम्पूर्ण पोस्ट...आप पढें और अपनी राय ज़रूर दें.एक विमर्श शुरू हो तो और अच्छा... )

कोई वास्तव में होवार्ड रोअर्क नहीं हो सकता ॥ बाकी सब 'उसकी तरह होना' चाहते हैं … आयन रैंड की सफलता इसी तथ्य में है कि उनहोंने एक ऐसे हीरो का सृजन किया, जिसकी तरह हर कोई होना चाहेगा, लेकिन हो नहीं सकेगा … वह खुद जीवन से पलायन कर अपने किसी चरित्र में नहीं ढल सकीं। दुनिया को बदलने की ख्वाहिश अच्छी है, कई बार इसे बदलने की कोशिश भी पर्याप्त है, वास्तव में बदल देना तो चमत्कार है …

हमलोग अपने इंटरव्यू में ढेर सारी बातें करते हैं, उससे ज्यादा हम महसूस करते हैं, लेकिन बता नहीं पाते हैं। अनाइस नीन के शब्‌दों में, हम सभी जो कह सकते हैं, वही कहना लेखक का काम नहीं है, हम जो नहीं कह सकते, लेखक वह कहे …' इस लेख को लिखने की वजह मुझ पर लगातार लग रहे आरोप हैं, जिनमें मैं जूझता रहा हूं … मैं ईमानदारी से सारे सवालों के जवाब देता हूं, उन जवाबों को संपादित कर संदर्भ से अलग कर सनसनी फैलाने के लिए छाप दिया जाता है … ' नो स्मोकिंग ' के बारे में दिया गया इंटरव्यू कुछ और हो जाता है और उसका शीर्षक बनता है ' यशराज हमारी परवाह नहीं करता …'हां, मैं यह कहता हूं, लेकिन जिस संदर्भ या बात के दौरान कहता हूं … वह हमेशा कट जाता है। इस से मुझे जो नुकसान होना होता है, वह तो हो ही जाता है, लेकिन जो बात रखना चाहता हूं…वह बात नहीं आ पाती … इसलिए मैंने सोचा कि मैं बगैर लाग-लपेट के बात करूं … पिछले एक महीने में मेरे और पीएफसी के प्रति लोग बलबला रहे हैं और कई उंगलियां हमारी तरफ उठ रही हैं … कई लोगों को इसमें मजा आ रहा है। एक व्यक्ति ने मुझे नए फिल्मकारों का मसीहा कहा … उन्होंने कहा कि मैं यही होना चाहता हूं … नहीं … अजय जी से बातचीत के दरम्यान उद्घृत करने लायक पंक्ति आ गई … मैं तब से लगातार उसका इस्तेमाल कर रहा हूं … ' यहां जो हो रहा है, वह गदर है, आजादी बाद में आएगी … अगर 1857 का गदर नहीं हुआ होता तो 1947 में आजादी नहीं मिली होती … ' पीएफसी पर जो हो रहा है, वह मेरा किया हुआ नहीं है, मैं पीएफसी नहीं हूं, यह मेरा साइट है, क्योंकि मैं यहां लिखता हूं … यह मेरा खरीदा हुआ साइट नहीं है, मैं मालिक नहीं हूं … मेरी राय पीएफसी की राय नहीं है, पीएफसी मुझ से ज्यादा लोकतांत्रिक है …

हां, मैं बदलाव चाहता हूं … हां, मैं लोगों को साथ लाना चाहता हूं, लेकिन मैं यहां दोस्तों का प्रचार नहीं कर रहा हूं …फिल्मकारों से मेरी दोस्ती उनकी फिल्में देखने के बाद उनकी फिल्मों से प्रेरित होने के कारण हुई … कॉफी विद करण पर केवल पलटवार किया जाता है …वहां वही मेहमान बार-बार आते हैं और एक-दूसरे को खुश करने में लगे रहते हैं। मैं तुम से प्यार करता हूं, तुम्हारे पापा और चाचा और चाची मुझे प्यारे लगते हैं …अगर अभिषेक, ऋतिक रोशन aur शाहरुख खान में से ही बड़े स्टार के बारे में पूछा जाएगा तो क्या जवाब मिलेगा …वहां आमिर का नाम क्यों नहीं लिया जाता …कॉफी विद करण परस्पर हस्तमैथुन का क्लब है …पीएफसी ऐसा नहीं है … यहां हम ' दूसरे की पीठ थपथपाते ' हैं … मुझ पर आरोप है कि मैं अपने दोस्तों की फिल्में प्रचारित करता हूं … मैंने जिन फिल्मों की बातें की थीं … उनमें से पांच रिलीज हो चुकी हैं …भेजा फ्राय, मनोरमा, जॉनी गद्‌दार, दिल दोस्ती एटसेट्रा और लॉयन्स ऑफ पंजाब … इनमें से पहली के अलावा बाकी कोई जोरदार सफलता नहीं हासिल कर सकी …लेकिन वे सभी प्रेरक हैं और बदलाव का संकेत दे रही हैं …उनमें ताजगी है और उन्हें मैं नया हिंदी सिनेमा कहना चाहूंगा …'

ऐसी फिल्में बनाना और उन्हें सिनेमाघरों तक पहुंचाना खामोश एवं सृजनात्मक गदर की तरह है ... मैं उनके बारे में इसलिए लिखता हूं कि वैसी फिल्मों में रुचि रखनेवालों को जानकारी मिल सके ... कुछ लोग ऐसे हैं, जिन्हें वैसी फिल्में कतई पसंद नहीं हैं ... कुछ समीक्षकों की इनमें रुचि रहती है और बाकी समीक्षक या तो पृथक रुचि के हैं या फिर वे हैं ' जिन्होंने बेहतर सिनेमा देखा है और सोचते हैं कि बेहतर हो सकता है ... ' इन आखिरी असंतुष्ट लोगों को हिंदी फिल्मों की आजादी चाहिए ... ये वो लोग हैं, जो कर के बताते हैं कि सही क्या है और ऐसे ही लोग बदलाव लाएंगे ... इसलिए पीएफसी का कोई उद्‌देश्य नहीं है ... हां, वह उद्‌देश्य की पूर्ति करता है ... अगला भव्य स्मारक वर्त्तमान जमीन पर ही बनेगा और अगर जमीन नहीं मिलेगी तो हम जर्जर हो चुकी व्यवस्था को तोड़ देंगे ताकि नयी व्यवस्था कायम हो ... ऐसा वे ही लोग कर सकते हैं, जिन्होंने जिंदगी जी और देखी है ... उन्होंने उम्दा पढ़ाई की है और वे अपने दिल की बात कागज और पर्दे पर रख सकते हैं ... नोबेल पुरस्कार विजेता टोनी मोरीसन को उद्घृत करना चाहूंगा ... ' अगर कोई ऐसी किताब आप पढ़ना चाहते हैं, जो अभी तक नहीं लिखी गयी है तो उसे आप जरूर लिखें।'

इस लेख को लिखने की वजह अपना इरादा बताना है ... कोई एजेंडा नहीं है, लेकिन मैं साधारणता (मीडियोक्रेटी) से थक गया हूं ... इसका मतलब यह नहीं है कि मैं खुद से बेहतर की तुलना में मीडियाकर नहीं हूं ... मैं भी उसी मीडियोक्रेटी में तैर रहा हूं, लेकिन मैं तैरते हुए देख रहा हूं कि बाकी लोग उपला रहे हैं ... वे कहीं जाना नहीं चाहते ... अपने आसपास कुछ खोजना नहीं चाहते ... उस निर्माता को गाली देने का मतलब नहीं है, जो अपनी रसोई के लिए फिल्म बना रहा है, आप मीडियोक्रेटी को चुनौती देकर या गाली देकर बदलाव नहीं ला सकते ... जरूरत है कि आप शहंशाह को चुनौती दें ... उसके चेहरे के आगे आईना रखें ... या तो वह अपना सिंहासन बचाए रखने के लिए बदले या फिर सिंहासन खाली करे ... मैं ऐसा नहीं कर सकता, कोई दूसरा व्यक्ति नहीं कर सकता ... बहुसंख्यक के आह्‌वान के बाद ही ऐसा हो सकता है ... अगर यह 'बहुसंख्यक ' पीएफसी पर है तो हमें वह ताकत देता है कि हम अपना छोटा देश बनाएं ... जो ज्यादा लोकतांत्रिक होगा ... वैसे साइट से बेहतर होगा जो मेरे एवं दूसरों के इंटरव्यू एडिट कर देते हैं ...

मैं होवार्ड रोअर्क नहीं हूं और कभी हो भी नहीं सकता ... हाल ही में मुझ पर आरोप लगा कि मैं होना चाहता हूं ... वह होने के लिए मुझे पहले अपने परिवार को मारना होगा ... होवर्ड रोअर्क वैसा इसलिए हो सका कि वह शुरू से किसी भावनात्मक बंधन में नहीं था ... हमें नहीं मालूम कि वह किस के गर्भ से आया था ... इसलिए उस पर केवल शारीरिक आक्रमण ही हो सकता था ... उसे उनकी आंखों में नहीं देखना था ... मेरी एक बेटी है और वह मुझे कमजोर बना देती है, सफलता की आकांक्षा मुझे कमजोर बनाती है, सुविधाओं की चाहत मुझे कमजोर बनाती है ... मैं कमजोर हूं, इसीलिए ऐसा हूं ... मैं बस आततायी हूं ... और यह मेरी हताश चीख है ... यह चीख बदलाव के लिए है, पहली बार अपने अस्तित्व के लिए थी, सिर्फ अपने अस्तित्व के लिए और कुछ नहीं ... मेरी पहली चीख जिंदा रहने की थी, जो बहरे कानों में पड़ी ... किसी ने नहीं सुना तो मैंने और जोर, फिर और ज्यादा जोर से चीख मारी ... मेरी चीखों ने उन्हें परेशान कर दिया ... परेशान होकर उन्होंने प्रतिक्रिया की, लेकिन वह मेरे लिए कल्पनातीत था ... वे मुझ से घबरा गए, उन्हें मैं संभावित दुश्मन लगा, इसलिए उन्होंने मुझे बर्बाद करने की कोशिश की ... इसलिए मैं अपने एटीट्‌यूड में आक्रामक हो गया और यह आक्रामकता सिर्फ अपने अस्तित्व के लिए थी ... फिर मुझे थोड़े से अपने लोग मिले ... मैं टिका रह सका ... अस्तित्व बनाए रखने में कोई बुराई नहीं है ... मैंने अपने अस्तित्व के लिए पाला नहीं बदला ... हां, वो मुझ से समय-समय पर खेलते हैं, लेकिन मैंने पाला नहीं बदला ... बहुतों के लिए यह उनकी और हमारी लड़ाई नहीं है ... मेरे लिए यह हो गई, क्योंकि मैं जूझा ... कैसे ... मैं बताता हूं।

यशराज के लोगों ने मुझ पर बांबे टाइम्स की सुर्खी ' अनुराग ने झूम बराबर झूम से खुद को अलग किया ' पढ़ का आरोप लगाया, उन्होंने कहा कि पहले वह हमें गाली देता है और फिर झूम बराबर झूम के पैसे मांगता है और फिर खुद को अलग कर लेता है, यह कैसा पाखंड है। 'मैं पैसे मांगता हूं, क्योंकि मैंने बहुत काम किया है और खुद को अलग इसलिए करता हूं कि उन्होंने बच्चे की शक्ल ही बदल दी और उन्होंने मुझ से बगैर पूछे सब कुछ बदल दिया, इसलिए खुद को अलग कर लेता हूं। अगर मैं उस फैसले में सहभागी नहीं था तो वह मेरा कैसे हो सकता है ... मैं पैसे लूंगा, क्योंकि मैं आपका नौकर था (लेखक के तौर पर मुझे यही इज्जत मिली थी) ... अगर वे कहते कि मुझे तुम्हारी स्क्रिप्ट अच्छी नहीं लगी तो मैं खरीद लेता ... लेकिन उन्होंने किया और मेरे पास नए तरीके से लिखा ड्राफ्ट भी भेज दिया ... (उसी से मुझे पता चला और मैंने तभी पुणे के स्क्रीन राइटर कांफ्रेंस में जिक्र किया) ... वे नए ड्राफ्ट में मेरी मदद चाहते थे ... वे चाहते थे कि मैं उनका काम कर दूं, क्योंकि वे यशराज हैं और मैं कुछ भी नहीं हूं ... उनसे मेरी यही शिकायत है और जब मैंने एसएमएस किया तो उन्होंने बात करने के लिए जयदीप को भेजा ... जयदीप की मैं इज्जत करता हूं, इसलिए मैं कमजोर पड़ गया ... फिल्मों में आने के पहले से शाद मेरा दोस्त है, इसलिए मैं भावुक हो गया ... इसलिए कुछ न कर सका और उबलता रहा।

जब मेरी फिल्म रोम के लिए चुनी गयी तो वहां किसी ने सेलेक्शन समिति को समझाने की कोशिश की कि मेरी फिल्म लेने का कोई तुक नहीं है, क्योंकि मेरी कोई औकात नहीं है ... लागा चुनरी में दाग लेनी चाहिए v क्योंकि वे खास हैं ... मैं केवल अपने प्रारब्‌ध को धन्यवाद दूंगा कि उन्होंने उनकी नहीं सुनी ... टोरंटो में उन्होंने सुन ली थी और ओमकारा की जगह कभी अलविदा ना कहना को चुन लिया था ... ओमकारा को अंतिम क्षणों में रद्‌द किया गया था - वे ठीक से नहीं खेलते, वे 'पावर गेम ' खेलते हैं ... मैं कहता हूं। यह भी सही है।

मैं पहली बार यह सब बता रहा हूं, क्योंकि मैं यशराज का निंदक कहलाते-कहलाते थक गया हूं ... लोग जब कहते हैं कि हम पलटवार करते हैं तो मुझे बुरा लगता है ... यहां हर पोस्ट लेखक की मर्जी से आता है ... अगर कोई ‘लागा चुनरी में दाग‘ का अच्छा रिव्यू नहीं लिखता तो क्या करें ... लेकिन उन्होंने ‘चक दे‘ की तारीफ की ... इसलिए यहां सिनेमा की भूख और चाहत बनी रहती है ... मेरा सनकीपन मेरा अपना है और अगर कोई नहीं चाहता तो न पढ़े ...