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Saturday, August 10, 2013

हिंदी टाकीज पर चेन्‍नई एक्‍सप्रेस

अपने ओवरसीज और देसी बीज दोस्‍तों,दर्शकों और पाठकों के लिए हिंदी टाकीज की यह पेशकश...टिप्‍पणियों से नवाजें।

Saturday, February 18, 2012

फेमिनिस्ट नहीं,इंडेपेंडेंट हूं मैं- बिपाशा बसु


-अजय ब्रह्मात्मज

प्यार की परिभाषा सिखाने के लिए बिपाशा बसु को कई दिनों तक रिहर्सल करना पड़ा और 'जोड़ी ब्रेकर्स' के इस गाने की शूटिंग के समय अपने खास कॉस्ट्यूम के कारण घंटों स्टूल पर बैठना पड़ा। यह गाना हॉट किस्म का है और इसमें बिपाशा के नाम का इस्तेमाल किया गया है। अपने नाम के गीत की अनुमति देने से पहले बिपाशा बसु बिदक गई थीं। उन्होंने के निर्देशक अश्विनी चौधरी के प्रस्ताव को सीधे ठुकरा दिया था। अश्विनी चौधरी भी जिद्द पर अड़े थे। उन्होंने गाना तैयार किया। गीत सुनाने के साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि वे इसे किस तरह शूट करेंगे। अश्विनी चौधरी ने आखिरकार उन्हें राजी कर लिया। 'जोड़ी ब्रेकर्स' का यह गीत पॉपुलैरिटी चार्ट पर आ चुका है। बिपाशा बसु ने इस खास मुलाकात में इस गाने का का जिक्र सबसे पहले आ गया। हल्की मुस्कराहट के साथ बधाई स्वीकार करने के बाद उन्होंने उल्टा सवाल किया कि क्या अच्छा लगा?

हॉट बिपाशा पर इस हॉट गीत को उत्तेजक मुद्राओं में शूट किया गया है। पर्दे पर सेक्सुएलिटी को प्रदर्शित करना भी एक कला है, क्योंकि हल्की सी फिसलन या उत्तेजना से वह वल्गर हो सकता है... आप ने उसे वल्गर नहीं होने दिया। इस गाने के शूट के बारे में बताएं?

बिपाशा बताती हैं, 'कई आशंकाएं थीं मेरे मन में। पहले भी कई डायरेक्टर ऐसे आफर लेकर आए थे। वे मेरे नाम पर गीत बताना चाहते थे। वे कैरेक्टर को भी मेरा नाम देना चाहते रहे हैं। मैं हमेशा यही कहती रही कि मेरा असाधारण नाम है। मैं किसी को अपना नाम नहीं दूंगी। अश्विनी ने गाना बना कर दिखाया। मेरी टीम, फैमिली और फ्रेंड्स सभी को यह गाना अच्छा लगा तो मैंने उनकी खुशी के लिए हां कर दी। सभी ने ने समझाया कि अपने नाम के गीत पर खुद परफार्म करें तो अच्छा लगेगा।'

'जोड़ी ब्रेकर्स' अपेक्षाकृत नए निर्देशक अश्विनी चौधरी और नई प्रोडक्शन कंपनी प्रसार की फिल्म है। फिर भी बिपाशा की यह हिस्सेदारी...क्या इस फिल्म में कुछ खास...बिपाशा सवाल पूरा होने के पहले ही बोलना शुरू कर देती हैं, 'बहुत खास है। यह पहली फिल्म है, जिसे मैंने चेज किया है। इस फिल्म के साथ जुड़ी हुई हूं। मैं स्पष्ट कर दूं कि यह गाना रियल बिपाशा को उसके करीबियों के अलावा लोग नहीं जानते। मैं खुली किताब नहीं हूं, लेकिन इतनी जटिल और पर्दानशीं भी नहीं हूं। सरल सी है मेरी जिंदगी...मुझे समझना बहुत मुश्किल काम नहीं है। दो-चार बार मिलें तो आप भी एक धारणा बना सकते हैं।' बिपाशा का परिचय दे पाना या उनकी परिभाषा गढ़ पाना मुश्किल काम है। वह सरल होने के साथ इस मायने में विरल भी हैं कि वह स्वतंत्र स्वभाव की खुली लडक़ी हैं। फिल्मों और संबंधों को लेकर उन्होंने कभी कुछ छिपाने या ढकने की कोशिश नहीं की। पारदर्शी व्यक्तित्व रहा है उनका।

व्यक्तित्व के बारे में पूछने पर बिपाशा बसु स्पष्ट शब्दों में कहती हैं, 'यह झूठ है कि बड़े होने के बाद आप का व्यक्तित्व बनता है। मेरे खयाल में परवरिश, बचपन और अपने माता-पिता से संबंध की प्रगाढ़ता से व्यक्तित्व सजता और शेप लेता हैं। मैं अपने परिवार को अपने व्यक्तित्व का पूरा श्रेय देती हूं। मैं लडक़ी हूं,लेकिन मुझे हमेशा अपनी पसंद से कुछ भी करने की आजादी मिली। मेरे पापा आज भी मुझ पर भरोसा करते हैं, मेरे बारे में कुछ भी लिखा जाए, वे चिंतित नहीं होते। यह मेरा प्राइड है। मेरे पापा मेरी पीठ पर हाथ रखकर कहते हैं कि मेरी बेटी जिम्मेदार लडक़ी है, वह कभी गलत नहीं हो सकती। मैंने अपनी जिंदगी जिस तरह से जी, उसमें शर्मसार होने जैसी बात नहीं रही। मां किसी और मां की तरह थोड़ी चिंतित और परेशान हो जाती हैं...मेरे पापा तो ग्रेट हैं...मेरी तरफ इशारा कर के गर्व से कहते हैं - दैट्स माई डॉटर। मुझे चरित्र का बल अपने माता-पिता से मिला है। मां से मैंने 'लव योरसेल्फ' की फिलॉसफी ली। यह मेरे जीवन का दर्शन है - खुद से प्यार करो। अपने देश में लड़कियां और औरतें सबके के लिए सब कुछ करती हैं...अपनी परवाह नहीं करतीं। मां कहती हैं कि खुद की देखभाल नहीं करो, अपने पैशन और खुशी का खयाल न करो तो दुख खा जाएगा। व्यक्तित्व में कड़वाहट और उदासी आ जाएगी। खुद से प्यार करने पर संतुष्टि आती है और फिर हम ज्यादा दे भी पाते हैं..कर भी पाते हैं।'

बिपाशा के आत्मविश्वास को उनकी कामयाबी और आर्थिक स्वतंत्रता से जोड़ा जा सकता है। अगर बिपाशा फिल्मों में नहीं होतीं तो क्या तब भी ऐसी ही कंफीडेंट और अग्रेसिव रहतीं... वह सहमति में सिर हिलाती हैं... कहती हैं, ‘कंफीडेंस और अग्रेसन... यह बेसिक गुण है मेरी पर्सनैलिटी का। मैं जिंदगी के जिस क्षेत्र में भी रहती इतना तो कह ही सकती हूं कि कमा रही होती। किसी पर निर्भर नहीं रहती। मैं इंटेलिजेंट लडक़ी हूं। स्कूल में नंबर वन रही। किसी भी फील्ड में आगे ही रहती, क्योंकि एकाग्र भाव से अपना काम करती हूं। मैं बहुत महत्वाकांक्षी नहीं हूं। मुझे लगता है कि आज की लड़कियों को आर्थिक रूप से स्वतंत्र होना चाहिए। बचपन से ही मेरे दिमाग में यह ड्रिल कर दिया गया है कि जो भी करो, खुद का करो। आप किसी के साथ डेट पर जा रहे हो तो आप भी पे करो... ऐसा क्या कि हमेशा लडक़ा ही भुगतान करे? मुझे बिल्कुल पसंद नहीं है कि कोई मुझ पर खर्च करे। मैं फेमिनिस्ट नहीं हूं, इंडेपेंडेट हूं। इसलिए मैं हमेशा खुश रहती हूं।'

बिपाशा बसु इन दिनों 'राज-3' की शूटिंग कर रही हैं। इमरान हाशमी के साथ बन रही इस फिल्म के निर्देशक विक्रम भट्ट हैं। यह फिल्म महेश भट्ट की देखरेख में बन रही है। इस इंटरव्यू के लिए बिपाशा ने 'राज-3' की शूटिंग से समय निकाला है। स्वाभाविक तौर पर 'राज-3' विक्रम भट्ट और महेश भट्ट सवालों में आ जाते हैं। सभी सवालों को समेटती हुई बिपाशा बताती हैं, 'भट्ट फैमिली मेरे लिए खास रहा है। मैंने 'अजनबी' से शुरुआत की थी, लेकिन 'राज' की शूटिंग के समय एक्टिंग को लेकर सीरियस हुई। महेश भट्ट और विक्रम भट्ट ने मुझे विश्वास दिया कि मैं एक्टिंग कर सकती हूं। फिर उनकी देखरेख में 'जिस्म' आई थी। उस फिल्म से मुझे दमदार सेक्सी इमेज मिली। अपने लिए सेक्सी शब्द सुनना मुझे अच्छा लगता है। 'राज-3' फिर से हॉरर जोनर की फिल्म है। हमलोग थ्रीडी में इसकी शूटिंग कर रहे हैं।'

इन दिनों चर्चा है बिपाशा बसु एक्सपोजर पर उतर आई हैं। अपनी फिल्मों में वह बिकनी पहन रही हैं और बोल्ड दृश्यों में अंगप्रदर्शन कर रही हैं। पूछने पर बिपाशा हंस कर सवाल को टाल देती हैं, 'क्या पूछ रहे हैं आप? मैंने तो 2006 में ही बिकनी पहनी थी। मेरी बोल्ड और सेक्सी इमेज नई नहीं है। मेरे पास ग्रेट बॉडी है ...उसे दिखाने में क्या दिक्कत है। लोग कुछ भी लिखते और बोलते रहते हैं। मैं बता दूं कि मेरी गैंडे की चमड़ी है। कोई करीबी कुछ बोलता है तो चोट लगती है। यह जॉब मुझे पसंद है और मैं करती रहूंगी। मैं आइकॉन या वैक्स स्टैच्यू नहीं बनना चाहती। जरूरी नहीं है कि लोग मुझे याद रखें। अभी एक्टिंग करनी है। लाइफ में सिंगल माइंडेड यही फोकस करना है। कोई डेविएशन नहीं है लाइफ में...एक रिलेशनशिप थी। वह खत्म हो गई तो फिलहाल सिर्फ फिल्में हैं।' रिलेशनशिप खत्म होने से भी बिपाशा के मन में कोई कड़वाहट नहीं है और न लडक़ों के प्रति गुस्सा ... वह जोर देकर कहती हैं, 'एक लडक़े से संबंध खत्म हुआ तो क्या सारे लडक़े खराब हो जाएंगे ... अरे नहीं। मर्द की जात बहुत इंटरेस्टिंग होती है। अभी खबर चलती है कि मैंने इस से दोस्ती कर ली, उसके साथ गई...प्‍लीज... मेरे बहुत सारे लडक़े मेरे दोस्त हैं और कुछ दोस्ती करना चाहते हैं। इसमें मेरा क्या दोष है? मैं बहुत फ्रेंडली मिजाज की लडक़ी हूं, इसलिए जल्दी दोस्ती हो जाती है। मैं एक सवाल पूछती हूं,एक अकेली लडक़ी एक अकेले लडक़े से मिली तो क्या मिलते ही वे ब्वॉयफ्रेंड -गर्लफ्रेंड हो जाएंगे ... कम ऑन थोड़ा तो कॉमन सेंस का इस्तेमाल करो ... रिलेशन बनने में वक्त लगता है। देखें सिंपल प्रोसेस है ... पहले मुलाकात होती है, फिर लडक़ा या लडक़ी एक-दूसरे को चेज करते हैं ... फिर साथ समय बिताते हैं। एक-दूसरे को समझते हैं ... फिर डेटिंग होती हे और फिर लव होता है। आप लोग तो रोज प्रेम करवा देते हैं और फिर वह टूट भी जाता है। थोड़ा तो सांस लेने दो मुझे ... मैं चालू रिलेशन में यकीन नहीं करती। 15 साल की उम्र से मैं अकेली नहीं रही। मैं फिर से लडक़ों से मिलूंगी, किसी से दोस्ती होगी। किसी से प्रेम होगा।'

बिपाशा बसु हैप्पी मूड में हैं। वह अपनी फिल्मों और जीवन से खुश हैं। अकेलापन उन्हें सता नहीं रहा है। कुछ नया और चैलेंजिंग करने का मौका दे रहा है। बिपाशा बसु फिल्म और रिलेशन में एक्सप्लोर करना चाहती हैं। वह अपने व्यक्तित्व के परतों से परिचित होना चाहती हैं।

Wednesday, December 21, 2011

जार्डन को जीने की खुशी से मस्‍त रण्‍बीर कपूर

जे जे खुश हुआ-अजय ब्रह्मात्‍मज

अमूमन फिल्म रिलीज होने के बाद न तो डायरेक्टर किसी से मिलते हैं और न ही ऐक्टर.., लेकिन इस बार कुछ अलग हुआ। रॉकस्टार की रिलीज के बाद जेजे यानी जॉर्डन यानी रणबीर कपूर लोगों से मिले। फिल्म की कामयाबी और चर्चा से वे खुश थे। उन्होंने फिल्म की मेकिंग, किरदार, एक्टिंग और इससे संबंधित अनेक मुद्दों पर बातें कीं। बर्फी की शूटिंग के लिए ऊटी निकलने से पहले बांद्रा स्थित अपने बंगले कृष्णराज में हुई मुलाकात में वे अच्छे नंबरों से पास हुए बच्चे की तरह खुश थे। प्रस्तुत हैं उनके ही शब्दों में उनकी बातें..

फिल्म की शूटिंग शुरू करने से पहले के छह महीने हमने और इम्तियाज ने साथ बिताए थे। उस किरदार को समझना बहुत जरूरी था। बॉडी लैंग्वेज और फिजिकल अंदाज तो आ जाएगा। खास कपड़े पहनना, बालों को लंबा करना, दाढ़ी बढ़ाना.. ये सब बड़ी बातें नहीं हैं। किसी किरदार को समझने की एक आंतरिक प्रक्रिया होती है। जॉर्डन की म्यूजिकल क्वालिटी को समझना था। बात करना और चलना भी आ गया था, लेकिन वह अंदर से कैसे सोचता है? एक दो दिनों की शूटिंग के बाद समझ में आ गया। समझ में आने के बाद हम किरदार के साथ एकाकार हो जाते हैं। उसके बाद तो मुश्किल या आसान सीन होते हैं। अच्छे या बुरे दिन होते हैं।

फिल्म जिस क्रम में दिखाई देती है, जरूरी नहीं कि उसी क्रम में शूटिंग हुई हो। हमने लंबे बाल और दाढ़ी के दृश्य पहले किए थे। जनार्दन जाखड़ में मासूमियत है तो जॉर्डन में नाराजगी है। मैं अंदर से नाराज व्यक्ति नहीं हूं और न मुझमें जॉर्डन जैसी इंटेनसिटी है। इस किरदार के जरिए मुझे मौका मिला था यह जाहिर करने का फिल्म में सड्डा हक.. गाने के बाद के फेज में इम्तियाज जो कुछ कहना चाह रहे थे, वह व्यक्त हुआ है। अपने आसपास के समाज के प्रति गुस्सा, पाखंड और दोगलेपन से नाराजगी.. यों समझें कि किसी ने प्लग निकाल दिया हो, फिर भी करंट मौजूद है। जॉर्डन को पता ही नहीं है कि यह सब हीर की वजह से हो रहा है। जॉर्डन वास्तव में एक जीनियस है। आपने किसी जीनियस को करीब से देखा है। वे घबराए और अनिश्चित रहते हैं। इम्तियाज जीनियस हैं। वे जो महसूस कर रहे थे, उसे ही किरदारों के जरिए फिल्म में सजा रहे थे। फिल्म के शुरू में कॉलेज कैंटीन के सीन में खूब मजा आया। पहली बार मुझे किसी भारतीय कॉलेज-यूनिवर्सिटी में जाने और बैठने का मौका मिला। वहां का माहौल और खुशबू.. हॉस्टल देखे। कपड़े-बातचीत.., बिल्कुल अलग दुनिया थी। मैंने न्यूयॉर्क में पढ़ाई की है। यहां के बारे में नहीं जानता था। कैंटीन के सीन में सब रीअल स्टूडेंट्स थे। रीअल लोगों के होने से एक-एक आर्गेनिक फीलिंग आती है। आसपास के सारे लोग रीअल थे, तो मैं भी रीअल हो गया। मेरे अंदर अचानक परिवर्तन हुआ। परफॉर्म करना भूल गया। भूल गया कि मैं ऐक्टर हूं। मैं अपनी उम्र और स्टूडेंट की तरह बातें करने लगा।

इस फिल्म के कुछ दृश्यों में अगर लोगों को राजकपूर की झलक मिली या मैं पापा जैसा लगा, तो वह अनायास था। मैंने किसी की नकल करने की कोशिश नहीं की है। मैंने दादा राजकपूर और पापा की सारी फिल्में देखी हैं। मैं उसी परिवार का सदस्य हूं, तो यह स्वाभाविक है। आप अभिषेक बच्चन की फिल्मों में गौर करेंगे तो कई एंगल और दृश्यों में वे अमिताभ बच्चन की तरह दिखते हैं। अगर मेरे काम में पापा और दादा जी की झलक मिल रही है तो मैं तो इसे शिकायत नहीं, बल्कि कंप्लीमेंट की तरह लूंगा। वैसे मैं बता दूं कि पापा इतने ओरिजनल हैं कि उनकी नकल नहीं हो पाती। जॉनी लीवर स्टेज पर सभी स्टारों की मिमिक्री करते हैं। वे कहते हैं कि ऋषि जी आप की नकल ही नहीं हो पाती। इसकी वजह यही है कि पापा की ऐसी स्टाइल या मैनरिज्म नहीं है।

पापा से प्रेरणा लेकर मैंने फिल्म के गानों पर खास ध्यान दिया। इसे आप शम्मी कपूर जी की प्रेरणा भी कह सकते हैं। वे मोहम्मद रफी के साथ रिकार्डिग में बैठा करते थे। फिल्म में मैं एक संगीतकार हूं, इसलिए पर्दे पर गाते हुए मुझे वास्तविक दिखना चाहिए था। गिटार बनाना भी सही लगे। इस बार मैंने ट्रेनिंग ली है। हर गाने की रिकार्डिग के समय स्टूडियो गया। गाते समय चेहरे के भाव और हाव-भाव पर ध्यान दिया। इस फिल्म के गाने चालू किस्म के नहीं हैं। शुरू में बोल के अर्थ समझ में नहीं आए। इसमें पोएट्री है और अर्थो में गहराई है। इम्तियाज ने मुझे हर शब्द और गाने का मतलब समझाया। जॉर्डन का नजरिया गानों के बोल से समझ में आता है।

जॉर्डन की भूमिका लिए मुझे ढेरों बधाइयां मिलीं। आशीर्वाद मिले, लेकिन दादी का दिया तोहफा तो हमेशा की चीज हो गई। उन्हें बड़े दादा पृथ्वीराज कपूर ने सोने का मेडल किया था। दादी ने मुझे वह भेंट किया और आशीर्वाद दिया कि तुम कपूर परिवार की परंपरा आगे बढ़ा रहे हो। मैं अपने बेटे या पोते-पोतियों में किसी को इसे भेंट करूंगा। सचमुच मैं बहुत खुश हूं और नए जोश और जिम्मेदारी के साथ मेहनत कर रहा हूं।

Tuesday, December 20, 2011

सबकी आन सबकी शान ये है अपना सलमान

सबकी आन सबकी शान ये है अपना सलमान-अजय ब्रह्मात्‍मज

फि ल्मों में अपनी जगह बनाने की गरज से कुछ-कुछ कर रहे सलीम खान ने सुशीला से शादी कर उन्हें सलमा नाम दिया था। पहली संतान के आने की आहट थी। मुंबई में देखभाल का पर्याप्त इंतजाम नहीं था तो उन्हें पुश्तैनी घर इंदौर छोड आए। इंदौर में ही अब्दुल रशीद सलमान खान का जन्म हुआ। बडे होकर वे सलमान खान के नाम से मशहूर हुए।

छोटे शहर का हीरो

27 दिसंबर 1965 को जन्मे सलमान खान अपनी जिंदगी में इंदौर का बडा महत्व मानते हैं। इंदौर में अपनी पैदाइश और बचपन की वजह से सलमान हमेशा कहते हैं कि मैं तो छोटे शहर का लडका हूं। अपने देश को पहचानता हूं। मेरी रगों में छोटा शहर है। शायद इसी वजह से देश के आम दर्शक मुझे अपने करीब पाते हैं। मेरी अदाओं और हरकतों में उन्हें अपनी झलक दिखती है। मेरी शैतानियां उन्हें भाती हैं, क्योंकि मैं उनसे अलग नहीं हूं।

सलमान के बचपन की सनक और शरारतों के जानकार बताते हैं कि सलीम खान को उनसे कोई उम्मीद नहीं थी। तीनों भाइयों में अरबाज खान ज्यादा तेज दिमाग के थे। वे शांत और समझदार भी थे। सलमान सनकी होने के साथ जिद्दी भी थे। किसी बात पर अड गए तो मां के सिवा किसी और की बात नहीं मानते थे। आज भी पिता सलीम और मां सलमा ही सलमान की मर्जी के खिलाफ जा सकते हैं या अपनी बात मनवा सकते हैं। सलमान खान ज्यादा बातें और बहस नहीं करते। घर-परिवार, करियर, दोस्ती, चैरिटी जैसे सभी मामलों में वे गौर से सबकी बातें सुनते हैं और उसे गुनते रहते हैं। बातें खत्म होने पर वे थोडी देर के लिए खामोश रहते हैं। तब उनकी पुतलियां बंद पलकों के अंदर बहुत तेज घूमती हैं। मानो वे आगत फैसले को देख रही हों और फिर सलमान खान संक्षेप में अपनी बात कहते हैं और निकल जाते हैं। सभी जानते हैं कि उसके बाद कुछ भी नहीं बदलता। वह अंतिम फैसला होता है। उस फैसले को बदलने का अधिकार केवल मां या पिता को है, लेकिन अधिकतर मामलों में उन्हें अपने बेटे का फैसला सही लगता है। सलमान खान दुनियावी या व्यावहारिक नहीं हैं। कई बार उन्हें अपने फैसलों का परिणाम भुगतना पडता है। लेकिन वे बाज नहीं आते। हमेशा की तरह दिल की सुनते हैं, मानते हैं, उसी पर अमल करते हैं।

रोमैंटिक हीरो

पिता सलीम खान बडे लेखक हो गए थे, लेकिन सलमान के फिल्मों में प्रवेश करने के समय उनके लेखन करियर की सांझ चल रही थी। दोनों चाहते भी नहीं थे कि विशेष लांचिंग के लिए किसी की मदद ली जाए। उनकी एक फिल्म बीवी हो तो ऐसी शुरू भी हो चुकी थी। इसी बीच सलमान को पता चला कि राजश्री प्रोडक्शन के सूरज बडजात्या अपनी पहली फिल्म के लिए नए चेहरे की तलाश कर रहे हैं। सूरज मन बना रहे थे कि आशुतोष गोवारीकर व भाग्यश्री को वे अपनी फिल्म में मौका देंगे। तब दोनों का सीरियल धूप छांव टीवी पर आ रहा था। कहते हैं कि जानकारी के बावजूद सलमान खान उनसे मिलने गए। उन्होंने सूरज बडजात्या को इस कदर प्रभावित किया कि आशुतोष की छंटनी हो गई और वे उनकी फिल्म के हीरो हो गए। सूरज बडजात्या की पहली फिल्म मैंने प्यार किया से सलमान ने रोमैंटिक हीरो की पहचान बनाई और प्रेम के नाम से विख्यात हुए। उन्हें अपना यह नाम बहुत पसंद है। कई फिल्मों में वे इसी नाम से आए हैं।

बरकरार है जादू

सलमान खान अपनी फिल्मों और अदाओं से हमेशा दर्शकों के चहेते बने रहे। गौर करें तो उन्होंने कला और कथ्य के लिहाज से कोई उल्लेखनीय फिल्म नहीं की, फिर भी पिछले 22 सालों से वे पॉपुलर हैं। कुछ खास जादू है उनमें, जो पर्दे पर चमत्कार करता है और आम दर्शकों को उनका दीवाना बना देता है। आलोचकों और सुधी दर्शकों ने उन्हें कभी अधिक पसंद नहीं किया, लेकिन उन्हें इसकी फिक्र नहीं है। वे स्पष्ट कहते हैं, मैं दर्शकों का अभिनेता हूं। अगर दो-चार समीक्षकों को मेरी फिल्में नापसंद हैं तो क्या फर्क पडता है? देश के करोडों दर्शक मुझे पसंद कर रहे हैं न! मैं उनका मनोरंजन करता हूं। मुझे इसी बात की संतुष्टि है कि वे मुझे देखकर खुश होते हैं। दर्शकों की खुशी के लिए सलमान कुछ भी करने को तैयार रहते हैं।

निजी मदद करने से भी नहीं हिचकिचाते। यही चैरिटी उन्हें जेब पर भारी पडने लगी तो उन्होंने बीइंग ह्यूमन ट्रस्ट स्थापित किया और अब उसके जरिये जरूरतमंदों की मदद जारी है। दस का दम में बडी उम्मीद से आए एक प्रतियोगी को मौका नहीं मिला तो सलमान ने उसे अपनी तरफ से एक लाख देने में हिचक नहीं की।

संस्कार में है चैरिटी

सलमान पर पिता सलीम खान का अंकुश काम करता है। चैरिटी, मदद और जकात पर वे नजर रखते हैं। अगर छूट दे दी जाए तो सलमान अपनी जरूरत भर के पैसे रख कर सब कुछ दान में दे दें। चैरिटी उनके संस्कार में है। सलमान मानते हैं कि वे जो भी कमाते हैं, उसका 20 प्रतिशत उनके निजी उपयोग के लिए काफी है। बाकी 80 प्रतिशत दान किया जा सकता है। जब उनसे पूछा जाता है कि क्या उन्हें अपने बुढापे की चिंता नहीं है तो उनका कहना होता है, मरते दम तक मैं काम करता रहूंगा। मालूम है कि मैं हमेशा हीरो नहीं रह सकता। उम्रदराज होने पर मैं कैरेक्टर रोल करने लगूंगा, चाचा-ताया की भूमिका में आने लगूंगा। अगर वह भी नहीं मिला तो ऐक्शन डायरेक्टर बन जाऊंगा। मुझे अपनी चिंता नहीं है। अपनी आमदनी के लिए कुछ न कुछ करता रहूंगा।

आम दर्शक सलमान को मुख्य रूप से अभिनेता के तौर पर जानते हैं। लेकिन इन दिनों वे लेखन, ऐक्शन, डांस, संगीत, संवाद जैसे सभी क्रिएटिव क्षेत्रों में काम कर रहे हैं। वे अपने अनुभवों व दर्शकों की समझ से सब कुछ बदलते हैं। मजेदार तथ्य है कि दबंग की ओरिजनल स्क्रिप्ट अभी तक ज्यों की त्यों बची हुई है। हमने जो फिल्म देखी, वह मूल ढांचे पर सलमान द्वारा तैयार की गई फिल्म है। वांटेड के बाद से सलमान ने तय किया है कि वे फिल्म की क्रिएटिव लगाम अपने हाथों में रखेंगे। नतीजा सभी के सामने है। उनकी फिल्में दर्शकों को पसंद आ रही हैं और वे बिजनेस भी कर रही हैं।

सदाबहार लोकप्रियता

पिछली मुलाकात में मैंने उनसे पूछा था कि दर्शकों से उनका कैसा कनेक्शन है? क्या उसे परिभाषित किया जा सकता है? उनकी पॉपुलैरिटी का विश्लेषण किया जा सकता है? सलमान ने सरल शब्दों में बताया कि दर्शक जब हमारी ताजा फिल्म देखने आते हैं तो उनके मन में हमारी पुरानी छवि रहती है। मेरी पुरानी फिल्में, भूमिकाएं, मेरी निजी जिंदगी, मेरी चैरिटी, मेरा स्वभाव और मेरी इमेज.. इन सभी के सम्मिलित प्रभाव के साथ ही फिल्म का अपना असर होता है। ज्यादातर पॉपुलर और पुराने ऐक्टर के साथ यही बात होती है। यही वजह है कि हम सभी की फिल्मों को ओपनिंग मिलती है। पहले दो-तीन दिन दर्शक पिछले प्रभाव में आते हैं। उसके बाद अगर फिल्म में दम हो तो फिर वह चलती है। हमारा ब्रैंड बडा होता है और हमारी इमेज भी गहरी होती है। दर्शकों को हमारी अगली फिल्म का इंतजार रहता है।

सलमान फिल्म समीक्षकों और इतिहासकारों की समझ और विश्लेषण पर गौर नहीं करते। उनका क्रेज देश के बहुसंख्यक निम्न मध्यमवर्गीय व गरीब तबके के दर्शकों के बीच ज्यादा है। मुंबई में तबेले और चालों के बच्चे उनके नाम की माला जपते हैं। उनकी फिल्मों में एक गैर-इरादतन बदतमीजी रहती है, जो बच्चों, किशोरों और युवकों को बहुत पसंद आती है। उनकी फिल्मों में हीरो-हीरोइन का रिश्ता छेडखानी और बदतमीजी से भरा रहता है, जिसमें हीरो आमतौर पर हीरोइनों से दूर रहने या भागने की कोशिश करता है। हीरो जमीर का पक्का होता है। अपनी कही बातों से मुकरता नहीं और वादा कर लिया तो फिर जान पर खेल कर भी उसे पूरा करता है। हिंदी सिनेमा की गढी गई इस परिकथा को उनकी फिल्में आज भी बखूबी पेश करती हैं और दर्शकों का दिल जीत लेती हैं। बॉडीगार्ड की रिलीज के समय भयंकर दर्द के बावजूद उन्होंने अपने कमिटमेंट पूरे किए और कैमरे के आगे मुस्कराते रहे।

उदारता का आलम

दयालुता का आलम एक परिचित बताते हैं। बांद्रा के एक स्कूल में सलमान पढा करते थे। वहां लंच ब्रेक में बांद्रा से दूर के बच्चों को दिक्कत होती थी। एक टीचर ने सुझाव दिया कि अगर बांद्रा के लडके अपने सहपाठियों को लंच में बारी-बारी साथ ले जाएं तो उन्हें सहूलियत होगी। सलमान दस सहपाठियों को लेकर घर पहुंच गए। मां ने सभी के लिए लंच तैयार किया। यह सिलसिला लगभग दो साल तक चला। खाने-खिलाने के शौकीन सलमान आज भी शूटिंग में घर से लंच मंगवाते हैं। एक खास जीप है, जिसमें टिफिन व कंटेनर लाने-ले जाने का इंतजाम है। कम से कम पंद्रह व्यक्तियों का लंच तैयार होता है। वह ज्यादा नखरैल नहीं हैं। बताते हैं कि रात में देर से लौटने पर वे किसी को तंग नहीं करते। किचन में जाकर बचे-खुचे खाने को पैन में रखते हैं और घी का तडका लेकर स्पेशल मिक्स डिश का आनंद उठाते हैं।

सलमान को पेंटिंग का सलीका अपनी मां से मिला है। शादी के कई सालों बाद तक सलमा पेंटिंग करती रही थीं। सलमान को नींद नहीं आती। रात में जागने और दोस्तों के साथ मौज-मस्ती करने का उन्हें शौक है। कई बार दोस्त नहीं होते या उनका मूड मौज-मस्ती करने का होता है तो वे पेंटिंग करते हैं। सलमान ने अपनी ज्यादातर पेंटिंग्स रात में तैयार की हैं। इसी कारण उनमें एक अलग रंग और छटा दिखाई पडती है। उनकी पेंटिंग में उदासी, एकाकीपन और छटपटाहट जाहिर होती है, जो वास्तव में सलमान का निजी एकांत है। अपनी लोकप्रियता और व्यस्तता के बीच भी निहायत अकेले हैं सलमान खान।

निजता में प्रवेश

उनके पिता कहते भी हैं सलमान खान के जीवन में आई लडकियों में से कोई भी उनके इस एकांत में प्रवेश नहीं कर सकी। कुछ सालों और समय के बाद अपना स्वार्थ पूरा कर सारी लडकियां चलती बनीं। केवल ऐश्वर्या राय से उनका प्रेम गहरा और वास्तविक था, लेकिन सलमान खान ने अपने स्वभाव के भटकाव और अपनी आदतों के कारण उन्हें खो दिया।

अपनी सारी उदारता और दयालुता के बावजूद सलमान खान में एक सामंती पुरुष भी है, जो औरतों को सिर्फ बहन और मां के रूप में ही इज्जत देना जानता है। प्रेमिकाओं से उनके संबंध बराबरी और आदर के कभी नहीं रहे। ऊपरी तौर वे कहते हैं कि शादी बच्चों के लिए की जाती है। मेरे परिवार में पहले से इतने बच्चे हैं कि मुझे शादी की जरूरत ही नहीं है। लेकिन सच्चाई यह है कि सलमान को किसी प्रकार का बंधन एक सीमा के बाद स्वीकार नहीं होता। हालांकि वे अपने भाई-बहनों के लिए कुछ भी कर सकते हैं। फिलहाल तो एक-एक कर वे सभी को सफल निर्माता बना रहे हैं। उनकी फिल्में कर रहे हैं।

बादशाहत का भ्रम

सलमान खान को महेश भट्ट मौलिक शैतान छोकरा कहते हैं। उनके खयाल में सलमान खान की शैतानी कई बार उद्दंडता में बदल जाती है। वास्तव में सलमान खान जिस तरह की सीमित दायरे की जिंदगी जीते हैं, उसमें उन्हें दुनिया के दस्तूर से विशेष मतलब नहीं रहता। ऐसे सफल व्यक्ति खुद को अपनी दुनिया का बादशाह समझने की गलती कर बैठते हैं। उन्हें लगता है कि वे कानूनों, नियमों और बंधनों से परे हैं। ऐसे में उनके परिजनों और परिचितों की मुसीबतें बढती हैं। लोग पूछते हैं कि सलीम-जावेद की जोडी टूटने के बाद से सलीम खान और कुछ क्यों नहीं रच पाए। वास्तव में सलीम खान की पूरी ऊर्जा अपने इस शैतान बेटे को संभालने में ही गुजरती रहती है। सलमान खान सलीम खान की सर्वश्रेष्ठ रचना हैं।

Saturday, December 17, 2011

सच है कि इस इंडस्ट्री में पुरुषों की प्रधानता है-प्रियंका चोपड़ा

लेडी डॉन-अजय ब्रह्मात्‍मज
प्रियंका चोपड़ा की शाहरुख खान अभिनीत फिल्म डॉन-2 आ रही है। इसमें उनकी क्या भूमिका है और वे नया क्या कर रही हैं, बता रही हैं इस बातचीत में..

डॉन-2 की कहानी कितनी बदली और आगे बढ़ी है?

यह सीक्वल है। पिछली फिल्म खत्म होते समय सभी को पता चल गया था कि विजय ही डॉन है। यह फिल्म वहीं से शुरू होती है। चार साल बाद वही कहानी आगे बढ़ती है। रोमा महसूस करती है कि उसके साथ धोखा हुआ। उसे विजय से प्यार हो गया था, लेकिन विजय तो डॉन निकला।

फिर तो रोमा भी नाराज और अग्रेसिव होगी?

बिल्कुल.., बीच के चार सालों में ट्रेनिंग लेकर रोमा पुलिस ऑफिसर बन चुकी है। उसका एक ही मकसद है कि किसी तरह वह डॉन को पकड़े और उसे सीखचों के पीछे लाए। उनका आमना-सामना होता है तो उनके बीच नफरत और मोहब्बत का रिश्ता बनता है। चूंकि विजय ने उसे धोखा दिया है, इसलिए रोमा उससे बहुत नाराज है। पूरी फिल्म में लोग मुझे गुस्से में ही देखेंगे। उस गुस्से में एक मोहब्बत भी है, क्योंकि रोमा को प्यार तो उसी व्यक्ति से हुआ था।

सुना है कि आपने ऐक्शन किया है डॉन-2 में..। क्या हम उम्मीद करें कि द्रोण की तरह आप फिर से ऐक्शन करती दिखेंगी?

उतना ज्यादा तो नहीं है। इस फिल्म का ऐक्शन हाथापाई तक सीमित है। रोमा पुलिस ऑफिसर है तो कुछ तो ऐक्शन होगा ही। दोनों के बीच क्रिमिनल और पुलिस ऑफिसर का भी तो रिलेशनशिप है।

शाहरुख खान हमेशा आपके सपोर्ट में रहे हैं। उनके साथ फिल्म करने का मतलब निश्चित कामयाबी मानी जाती है। आप क्या सोचती हैं?

उनके साथ यह मेरी दूसरी फिल्म है और यह पिछली फिल्म की अगली कड़ी है। आपने सही कहा कि वे अपनी हीरोइनों के लिए लकी होते हैं। हमारी पिछली फिल्म सफल रही थी। इस फिल्म से भी वैसी ही उम्मीद है। शाहरुख की फिल्म को पर्याप्त दर्शक मिल जाते हैं।

और क्या-क्या चल रहा है? सुना है आप गाने भी गा रही हैं? दूसरी तरफ फिल्मों के फ्रंट पर भी बिजी हैं?

अभी तो बहुत कुछ हो रहा है। अग्निपथ पूरी हो चुकी है। जल्दी ही उसका प्रमोशन चालू होगा। उसके बाद बर्फी और कुणाल कोहली की फिल्म खत्म कर रही हूं मैं। मेरी कृष भी शुरू हो रही है। मेरा अंग्रेजी में एलबम आ रहा है।

एलबम के बारे में थोड़ा बताएंगी?

यह अंग्रेजी का एलबम है। विदेश में तैयार हो रहा है। इंटरनेशनल स्तर पर इसे रिलीज किया जाएगा। भारत में भी वह रिलीज होगा। खुद एलबम के गाने लिख रही हूं। गानों की रिकार्डिग के दौरान कई निर्माताओं से मुलाकात हुई। नए ढंग का एक्सपीरिएंस रहा। यह मुख्य रूप से पॉप एलबम है। कुछ लव सॉन्ग भी होंगे।

क्या आपने अपनी म्यूजिक कंपनी बनाई है या किस तरह का अरेंजमेंट हुआ है?

यह अमेरिका की मशहूर म्यूजिक कंपनी है। लेडी गागा, एमएनएम और दूसरे बड़े आर्टिस्ट के एलबम यहां से रिलीज हुए हैं। मुझे लगता है कि किसी इंडियन आर्टिस्ट के लिए यह बड़ा मौका है। मेरे लिए तो बहुत बड़ा अचीवमेंट है।

गाने का शौक कैसे और फिर एलबम लाने का इरादा क्यों हुआ? गाना ही था तो फिल्मों के लिए क्यों नहीं गाया?

सच कहूं तो मैं एक्टिंग के पहले से गीत गा रही हूं। पापा गायक रहे हैं। संगीत से हमारा वास्ता रहा है। उस तरफ ज्यादा ध्यान तब नहीं दे सकी। एक्टिंग में मेरा करियर 17 साल की उम्र में शुरू हो गया था, इसलिए गाने पर ध्यान नहीं गया। मुझे जब यूनिवर्सल से म्यूजिक के लिए अप्रोच किया गया तो मुझे लगा कि एक अच्छा प्लेटफार्म मिल रहा है, मैंने सोचा कि कर लेने में क्या हर्ज है? एक्टिंग तो कर ही रही हूं।

अग्निपथ और बर्फी के बारे में कुछ बताएंगी?

अग्निपथ में मैं काली की भूमिका निभा रही हूं। ओरिजनल फिल्म से यह किरदार बदल गया है। यह एक नया किरदार है। काली एक वेश्या की बेटी है, लेकिन वह वेश्यावृति में नहीं जाना चाहती। उसे विजय से प्यार है। विजय ही उसकी जिंदगी है। इस फिल्म में मैं एक चुलबुली मराठी लड़की का किरदार निभा रही हूं। वह मस्ती पसंद करती है। कुणाल कोहली की फिल्म का टाइटिल अभी तक नहीं मिला है। वह तीन युगों की कहानी है। तीन जन्मों में वह अपने प्रेमी से मिलती है। प्यार के रिश्ते में सात जन्मों की बात की जाती है, लेकिन यह फिल्म तीन जन्मों की है। कृष के बारे में अभी कुछ भी बताना जल्दबाजी होगी। कृष सुपरहीरो है और मैं उसका लव इंटरेस्ट हूं। कह सकती हूं कि अभी मेरे पास पर्याप्त काम है और हां, अनुराग बसु की बर्फी में ऑस्टिक गर्ल की भूमिका में हूं।

लगता है इंडस्ट्री ने हीरोइनों पर ध्यान देना शुरू किया है। इधर द डर्टी पिक्चर भी हिट हुई है और अब हीरोइन बन रही है?

मेरी लाइफ में तो फैशन आ चुकी है। इंडस्ट्री में आए चार साल भी नहीं हुए थे कि वह फिल्म मिली और उसके लिए अवार्ड भी मिले। अभी 7 खून माफ भी मैंने की। ठीक है कि फिल्म नहीं चली, लेकिन लोगों ने मेरे काम की तारीफ की। फिर कोई ऐसी फिल्म मिलेगी, तो जरूर करूंगी। इस बदलाव के बावजूद यह भी सच है कि इस इंडस्ट्री में पुरुषों की प्रधानता है। हमें पैसे कहां मिलते हैं। अगर मुख्य रोल है तो पैसे भी बढ़ने चाहिए। मुझे नहीं लगता कि ऐसी बराबरी कभी हीरोइनों को मिल पाएगी।

अभी की अभिनेत्रियों के लिए कितने काम हो गए हैं। फिल्मों के साथ बाकी सारी चीजें भी करनी पड़ती हैं। कैसे संतुलन बिठाती हैं?

मेरा मुख्य काम एक्टिंग है। यही मेरा पेशा है। फिल्म रहेंगी और चलेंगी, तभी दूसरी चीजें होती रहेंगी, इसलिए सबसे ज्यादा ध्यान फिल्मों पर देती हूं। बाकी मेरी एक टीम है, जो सभी चीजों और समय का ध्यान रखती है। अभी हमें क्या करना उनके लिए संतुलन बिठाना पड़ता है।

Sunday, October 16, 2011

लौटा हूं यमुना नगर फिल्‍म फेस्टिवल से

-अजय ब्रह्मात्‍मज

यमुनानगर में डीएवी ग‌र्ल्स कॉलेज है। इस कॉलेज में यमुनानगर के अलावा आसपास के शहरों और दूर-दराज के प्रांतों से लड़कियां पढ़ने आती हैं। करीब चार हजार से अधिक छात्राओं का यह कॉलेज पढ़ाई-लिखाई की आधुनिक सुविधाओं से युक्त है। इस ग‌र्ल्स कॉलेज की एक और विशेषता है। यहां पिछले चार सालों से इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल का आयोजन हो रहा है। कॉलेज की प्रिंसिपल सुषमा आर्या ने छात्र-छात्रओं में सिने संस्कार डालने का सुंदर प्रयास किया है। उनके इस महत्वाकांक्षी योजना में अजीत राय का सहयोग हासिल है।

सीमित संसाधनों और संपर्को से अजीत राय अपने प्रिय मित्रों और चंद फिल्मकारों की मदद से इसे इंटरनेशनल रंग देने की कोशिश में लगे हैं। डीवीडी के माध्यम से देश-विदेश की फिल्में दिखाई जाती हैं। संबंधित फिल्मकारों से सवाल-जवाब किए जाते हैं। फिल्मों के प्रदर्शन के साथ ही फिल्म एप्रीसिएशन का भी एक कोर्स होता है। निश्चित ही इन सभी गतिविधियों से फेस्टिवल और फिल्म एप्रीसिएशन कोर्स में शामिल छात्र-छात्राओं को फायदा होता है। उन्हें बेहतरीन फिल्में देखने को मौका मिलता है। साथ ही उत्कृष्ट सिनेमा की उनकी समझ बढ़ती है।

पिछले हफ्ते मैं यमुनानगर में था। पांच सौ छात्र-छात्राओं को संबोधित करते हुए मैं उनकी आंखों और चेहरों की चमक देख रहा था। अपने संबोधन के बाद मैंने उनसे पूछा कि क्या उनमें से कोई फिल्मकार भी बनना चाहता है? तकरीबन 25-30 छात्रों ने हाथ उठाया। औपचारिक संबोधन के बाद करीब दर्जन भर छात्रों ने मुंबई की फिल्म इंडस्ट्री में काम मिलने की संभावनाओं के बारे में जिज्ञासा प्रकट की। देश के हर कोने से उभर रहे युवा फिल्मकारों के मन में मुंबई आने और यहां नाम कमाने की आकांक्षा है। मैं इस आकांक्षा के पक्ष में नहीं हूं। मुझे लगता है कि अपने इलाके में रहते हुए भी सीमित संसाधनों के साथ फिल्में बनाई जा सकती हैं। हमें वितरण की नई प्रणाली विकसित करनी होगी। नए वितरक तैयार करने होंगे और अपने-अपने इलाकों के प्रदर्शकों को तैयार करना होगा। स्थानीय टैलेंट का स्थानीय उपयोग हो।

बहरहाल, यमुनानगर जैसे शहरों में आयोजित फिल्म फेस्टिवल अपने उद्देश्य और ध्येय में स्पष्ट नहीं हैं। फेस्टिवल के आयोजकों को अपनी प्राथमिकता तय करनी होगी। अगर नेटवर्क तैयार करना और निजी लाभ के लिए फेस्टिवल का इस्तेमाल करना है तो सारा प्रयास निरर्थक साबित होगा। फेस्टिवल का उद्देश्य और ध्येय तय होगा तो यह संपर्को और मित्रों की चौहद्दी में निकलेगा। इसमें अन्य फिल्मकारों और सिनेप्रेमियों का जुड़ाव होगा। यह अभियान आंदोलन बनेगा और धीरे-धीरे उस बंजर जमीन से नए फिल्मकार आते दिखाई पड़ेंगे। किसी भी फेस्टिवल के लिए चार साल के आयोजन कम नहीं होते। इस बार मोहल्ला लाइव के सहयोग से मनोज बाजपेयी के साथ की गई लंबी बातचीत पे्ररक और अनुकरणीय रही। मोहल्ला लाइव के सहयोग से ऐसे और भी आयोजन हों।

देश के विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों और अन्य संस्थाओं के सहयोग से छोटे-छोटे फेस्टिवल आयोजित होने चाहिए। उन्हें सरकारी समर्थन न मिले तो भी स्थानीय सहयोग से इसे संभव किया जा सकता है। शैक्षणिक उद्देश्य से आयोजित ऐसे फेस्टिवल में फिल्मों के डीवीडी प्रदर्शन में कानूनी अड़चनें भी नहीं आतीं। बेहतर होगा कि ऐसे फिल्म फेस्टिवल के नाम से इंटरनेशनल शब्द हटा दिए जाएं। सिर्फ विदेशी फिल्में दिखाने या एक-दो फिल्मकारों को बुलाने से कोई फेस्टिवल इंटरनेशनल नहीं हो जाता। इसे हरियाणा फिल्म फेस्टिवल भी कहें तो उद्देश्य और प्रभाव कम नहीं होगा। सबसे जरूरी यह समझना है कि फेस्टिवल क्या हासिल करना चाहता है और क्या वह इसके काबिल है?

Saturday, October 15, 2011

फिल्‍म समीक्षा : जो डूबा सो पार

बिहार की लव स्टोरी-अजय ब्रह्मात्‍मज प्रवीण कुमार की प्रेमकहानी का परिवेश बिहार का है। एक ट्रक ड्रायवर का बेटा किशु अपनी बदमाशियों के कारण स्कूल से निकाल दिया जाता है। पिता चाहते हैं कि वह कम से कम ड्राइविंग और ट्रक चलाने के गुर सीख ले। बेटे का मन पिता के साथ काम करने से अधिक दोस्तों के साथ चकल्लस करने में लगता है। इसी बीच कस्बे में एक विदेशी लड़की सपना आती है। सपना को देखते ही किशु उसका दीवाना हो जाता है।

किशु का अवयस्क प्रेम वास्तव में एक आकर्षण है। वह सपना का सामीप्य चाहता है। इसके लिए वह पिता की डांट और सपना के चाचा के गुंडों के हाथों पिटाई खाता है। स्मार्ट किशु फिर भी हिम्मत नहीं हारता। वह अपने वाकचातुर्य से सपना के करीब आता है। अपने प्रेम का इजहार करने के दिन ही उसे पता चलता है कि सपना का एक अमेरिकी ब्वॉय फ्रेंड है। कहानी टर्न लेती है। सपना का अपहरण हो जाता है। किशु अपने दोस्तों के साथ जान पर खेल कर सपना की खोज करता है। इस प्रक्रिया में पुलिस और किडनैपर के रिश्ते बेनकाब होते हैं।

प्रवीण कुमार ने परिवेश अलग चुना है। वे जिसे बिहार बताते हैं, वह हरगिज बिहार नहीं लगता। मधुबनी पेंटिंग्स पर रिसर्च कर रही सपना जिस गांव में पहुंचती है, वह मिथिला का गांव नहीं है। और फिर मिथिला के मधुबनी पेंटिंग्स के इलाकों को खतरनाक बताने की पुलिस अधिकारी की उक्ति अनुचित है। वास्तविकता का आभास देती इस फिल्म में ऐसी लापरवाहियां खटकती हैं। निस्संदेह प्रवीण कुमार हिंदी फिल्मों के दर्शकों को एक नए परिवेश में ले जाते हैं, लेकिन वह अलग होने के बावजूद सही तरीके से स्थापित और परिभाषित नहीं हो पाता। प्रवीण कुमार ने चरित्र गढ़े हैं, लेकिन उन्हें समुचित लोकेशन में नहीं रख पाए हैं। फिल्म इसी घालमेल में कमजोर पड़ जाती है।

आनंद तिवारी का अभिनय, संवादों में देसी लक्षणा-व्यंजना का पुट और सहयोगी चरित्रों में विनय पाठक और पितोबास उल्लेखनीय हैं। जो डूबा सो पार की सीमाएं बजट, प्रोडक्शन और अन्य क्षेत्रों में नजर आती हैं।

** दो स्टार

Friday, August 26, 2011

हार्दिक मार्मिक बातें सितारों की

हार्दिक मार्मिक बातें सितारों की-अजय ब्रह्मात्‍मज
इन दिनों फिल्मी सितारे आए दिन टीवी पर नजर आते हैं। वे खुद ही अपनी फिल्मों के बारे में बता रहे होते हैं या फिल्म पत्रकारों की जरूरी जिज्ञासाओं के घिसे-पिटे जवाब दे रहे होते हैं। मैं नहीं मानता कि पत्रकारों के सवाल एक जैसे या घिसे-पिटे होते हैं। सच बताएं, तो ज्यादातर फिल्म स्टार एहसान करने के अंदाज में इंटरव्यू देते हैं। वे गौर से सवाल भी नहीं सुनते और पहले से रटे या तैयार किए जवाबों को दोहराते रहते हैं। यही कारण है कि किसी भी फिल्म की रिलीज के समय हर चैनल, अखबार और पत्रिकाओं में फिल्म स्टार एक ही बात दोहराते दिखाई-सुनाई पड़ते हैं।

मामला इतना मतलबी हो चुका है कि वे फिल्म से अलग या ज्यादा कोई भी बात नहीं करना चाहते। प्रचारकों और पीआर कंपनियों पर दबाव रहता है कि कम से कम समय में ज्यादा से ज्यादा इंटरव्यू निबटा दो। नतीजा सभी के सामने होता है। उनके इंटरव्यू सुन, पढ़ या देख कर न तो फिल्म की सही जानकारी मिलती है और न उनकी पर्सनल जिंदगी या सोच के बारे में ज्यादा कुछ पता चलता है। इंटरव्यू देने का रिवाज किसी रूढि़ की तरह चल रहा है। अब तो पत्रकारों की रुचि भी स्टारों के रवैए के कारण इंटरव्यू में कम होती जा रही है। ऐसे में कभी अमिताभ बच्चन या शाहरुख खान या आमिर खान फुरसत में मिल जाते हैं, तो सवालों की कमी हो जाती है। कुछ पत्रकार तो सामूहिक साक्षात्कार के लिए प्रोत्साहित करते हैं। समूह में कुछ पूछना भी नहीं पड़ता और उधार के सवालों से इंटरव्यू अच्छा बन जाता है।

कभी हम फूल खिले हैं गुलशन गुलशन में तबस्सुम के साथ सितारों से मिला करते थे। तबस्सुम की बातचीत में उनके नाम जैसी ही मुस्कराहट रहती थी। फिर निर्देशक बनने से पहले लंबे समय तक कुणाल कोहली ने सितारों की बातचीत परोसने का काम किया। सैटेलाइट चैनलों के आ जाने के बाद छोटे पर्दे पर सितारों की आमद बढ़ी। दोनों ने एक-दूसरे की जरूरत समझी और पूरा सहयोग किया। इसी दौर में सितारों की बातचीत में दर्शकों की दिलचस्पी कम हुई, क्योंकि छिटपुट जवाबों से दर्शकों को संतुष्टि नहीं मिलती थी। याद होगा सैटेलाइट के इसी दौर में राजीव शुक्ला रू-ब-रू लेकर आते थे। करण थापर, प्रीतिश नंदी, वीर सांघवी, प्रणव राय आदि भी कई बार सितारों से रोचक बातें करते थे। फिर सिम्मी गरेवाल रेंदेवू लेकर आई, तो बातचीत का माहौल चकाचक सफेद हो गया। सिम्मी अपने मेहमानों से हमेशा बेदाग बातें करती थीं। चूंकि वे खुद फिल्म इंडस्ट्री की थीं, इसलिए उनके सामने बड़े से बड़े सितारों को मुंह के साथ-साथ दिल खोलने में दिक्कत नहीं होती थी। सिम्मी की कोशिश होती थी कि बातचीत में मेहमानों का गला रुंध जाए या आंखें नम हों या आंसू टपक पड़े। सिम्मी फिर से मोस्ट डिजायरेबल लेकर आई हैं। इसमें वे कुंवारे मेहमानों से बातें करती हैं।

सिम्मी से एक कदम आगे बढ़कर कॉफी विद करण लेकर करण जौहर आए, तो बातचीत जवान, दिलचस्प और रोचक हो गई। बातचीत में अंतरंगता नजर आई और मेहमानों ने अपने जीवन के प्राइवेट प्रसंगों पर भी बातें कीं। आमतौर पर फिल्म सितारे अपनी प्राइवेसी कह कर जिन सवालों से इनकार करते हैं, वैसे सवाल अगर करण पूछ लें, तो उन्हें जवाब देने में हिचक नहीं होती। दरअसल, जब एक समूह के लोग आपस में बातें करते हैं, तो ज्यादा मुखर और मुक्त रहते हैं। उनकी हार्दिक और मार्मिक बातों में मासूम चमक रहती है। हालांकि ऐसी बातचीत में आम दर्शकों की जिज्ञासाओं का समाधान नहीं हो पाता, फिर भी सितारों के मुंह से उनकी ज्ञात जानकारियां भी सुनना अच्छा लगता है।

जल्दी ही प्रीति जिंटा अप क्लोज ऐंड पर्सनल विद पीजी लेकर आ रही हैं। देखने वाली बात यह होगी कि वह सिम्मी और करण से कितनी अलग हो पाती हैं। अगर वह शेखर गुप्ता के वॉक द टॉक का अंदाज और असर ला पाएं, तो बेहतर होगा।

Monday, June 13, 2011

फिल्म के प्रिव्यू और रिव्यू

-अजय ब्रह्मात्‍मज

हिंदी सिनेमा का संकट कई रूपों में सामने आता है। इन दिनों प्रिव्यू और रिव्यू पर बहस चल रही है। फिल्मकारों और फिल्म समीक्षक के बीच कभी प्रेम तो कभी तनातनी की खबरें आती रहती हैं। इन दिनों दिल्ली और मुंबई दो प्रमुख सेंटर हैं फिल्मों के प्रिव्यू और रिव्यू के। दोनों सेंटर के रिव्यूअर को उनके अखबार के हिसाब से अघोषित दर्जा दे दिया गया है। उसे लेकर भी आरोप और शिकायतें रहती हैं।

पहले एक सामान्य तरीका था कि निर्माता फिल्म समीक्षकों को रिलीज के दो-तीन दिन पहले या कम से कम गुरुवार को फिल्म दिखा देते थे। फिल्म समीक्षक अपनी समीक्षाएं रविवार को प्रकाशित करते थे। बाद में समीक्षाओं का प्रकाशन रविवार से शनिवार और फिर शनिवार से शुक्रवार को खिसक कर आ गया। कुछ फिल्म समीक्षक तो पहले देखी हुई फिल्मों की समीक्षा बुधवार और कभी-कभी सोमवार को भी ऑन लाइन करने लगे हैं। ऐसी समीक्षाओं में आम तौर पर समीक्षक फिल्मों की प्रशंसा करते हैं और उन्हें अमूमन चार स्टार देते हैं। निर्माता या फिल्मकार की यही मंशा रहती है कि ऐसे रिव्यू से फिल्म के प्रति आम दर्शकों की सराहना बढ़े और वे एक बेहतर फिल्म की उम्मीद पा लें। गौर करें कि बुधवार या उसके पहले कभी कोई ऐसा रिव्यू नहीं छपता, जिसमें फिल्म की बुराई या खिंचाई हो। फिल्म की कमियों को गिनाकर तीन से कम स्टार दिए गए हों। स्पष्ट है कि निर्माता, सकारात्मक और हाई रैंकिंग रिव्यू से खुश होते हैं। इसके विपरीत कुछ निर्माताओं ने फैसला किया है कि अब वे समीक्षकों के लिए किसी प्रिव्यू शो का आयोजन नहीं करेंगे। उनका तर्क है कि एक तो इन्हें फिल्म दिखाओ, इंटरवल में कुछ खिलाओ-पिलाओ और फिर इनकी आलोचना पढ़ो। अच्छा है कि समीक्षक शुक्रवार को थिएटरों में जाकर पैसे खर्च करें और खुद से फिल्में देखें। समीक्षकों को इसमें कोई दिक्कत नहीं है। समस्या तब आती है, जब किसी हफ्ते 3-4 फिल्में रिलीज होती हैं और सभी फिल्में शुक्रवार को देखनी होती हैं। चूंकि अब ज्यादातर अखबारों में शनिवार को रिव्यू छपते हैं, इसलिए समीक्षकों को फटाफट फिल्में देखकर समीक्षा लिखनी पड़ती है। निर्माताओं का तर्क होता है कि पहले दिखा देने पर अगर निगेटिव रिव्यू आ जाए, तो पहले शो से ही दर्शक नहीं आते हैं। शुक्रवार को अगर समीक्षक फिल्म देखते हैं, तो शनिवार से पहले रिव्यू नहीं आते और दर्शक खुद फिल्म देखने का चांस लेते हैं। इसी बहाने दर्शक मिल जाते हैं। पिछले दिनों एक निर्माता ने यही किया, फिर भी उनकी फिल्म को दर्शक नहीं मिले। दरअसल, फिल्म इंडस्ट्री की इस धारणा में सच्चाई है कि दर्शक पहले से भांप लेते हैं। वे तमाम प्रचार के बावजूद कभी-कभी किसी फिल्म को देखने ही नहीं जाते। काइट्स और खेलें हम जी जान से इसके उदाहरण हैं। इन फिल्मों को दर्शकों ने रिलीज के पहले ही रिजेक्ट कर दिया था।

इन दिनों एक बहस यह भी चल रही है कि किसी फिल्म की समीक्षा कब लिखी जाए। मेरी राय में किसी भी फिल्म के सार्वजनिक प्रदर्शन के बाद उसकी समीक्षा लिखी जा सकती है। सार्वजनिक प्रदर्शन का सीधा मतलब फिल्म की रिलीज तक सीमित न करें। यह फिल्म फेस्टिवल का प्रदर्शन भी हो सकता है या किसी विशेष आयोजन में दिखाया गया अवसर हो सकता है। अगर निर्माताओं को रिलीज के पहले समीक्षा आने से डर लगता है, तो वे फेस्टिवल और अन्य सार्वजनिक प्रदर्शन से बचें। निर्माता कभी तो कहते हैं कि समीक्षकों से फिल्में प्रभावित नहीं होतीं और कभी इतना डरे रहते हैं कि समीक्षकों की फिल्म की भनक तक नहीं लगने देते..।


Tuesday, June 7, 2011

ऑन स्‍क्रीन ऑफ स्‍क्रीन : कामयाबी के साथ अभिषेक बच्चन की कदमताल नहीं बैठ पाई है

कामयाबी से कुछ कदम दूर है जूनियर बच्चन-अजय ब्रह्मात्‍मज

रोहन सिप्पी की फिल्म दम मारो दम की सीमित कामयाबी ने अभिषेक बच्चन की लोकप्रियता का दम उखडने से बचा लिया। फिल्म ट्रेड में कहा जा रहा था कि यदि फिल्म न चली तो अभिषेक का करियर ग्राफ गिरेगा। हर शुक्रवार को फिल्म रिलीज होने के साथ ही सितारों के लिए जरूरी होता है कि वे लगातार या थोडे-थोडे अंतराल पर अपनी सफलता से साबित करते रहें कि वे दर्शकों की पसंद पर अभी बने हुए हैं। दर्शकों की पसंद मापने का कोई अचूक पैमाना नहीं है। लेकिन माना जाता है कि जब किसी सितारे की मांग घटती है तो उसकी फिल्मों व विज्ञापनों की संख्या भी कम होने लगती है। इस लिहाज से अभिषेक अभी बाजार के पॉपुलर उत्पाद हैं। आए दिन उनके विज्ञापनों के नए संस्करण टीवी पर नजर आते हैं। पत्र-पत्रिकाओं के कवर पर उनकी तस्वीरें छपती हैं। अभी वे प्लेयर्स की शूटिंग के लिए रूस गए हैं। वहां से लौटने के बाद रोहित शेट्टी के निर्देशन में बन रही फिल्म बोल बचन शुरू होगी। इसमें उनके साथ अजय देवगन होंगे। फिर धूम-3 की अभी से चर्चा है, क्योंकि एसीपी जय दीक्षित को इस बार धूम-3 में आमिर खान को पकडना है। मुमकिन है कि अभिषेक के करियर की श्रद्धांजलि लिख रहे पत्रकारों को फिर से स्तुतिगान के लिए शब्द जुटाने पडें। फिल्म इंडस्ट्री की विडंबना है कि यहां सिर्फसफलता का ही गुणगान होता है। योग्यता व कोशिश भी सफलता के आईने में ही समझ में आती है।

कामयाबी से कदमताल

कामयाबी के साथ अभिषेक बच्चन की कदमताल बैठ नहीं पाई है। अभी तक उनकी सफलता सवालों से घिरी है। हर फिल्म की रिलीज के पहले मीडिया के एक समूह और ट्रेड पंडितों के एक हिस्से में जोरदार बहस चलती है कि इसके बाद अभिषेक बच्चन का पैकअप हो जाएगा। आखिर अमिताभ के नाम पर वे कब तक चलेंगे? वास्तव में आलोचकों का यह समूह ही उन्हें सबसे ज्यादा अमिताभ के साथ जोडकर देखता है। लिहाजा अभिषेक बच्चन का पृथक मूल्यांकन नहीं हो पाता। अपने पिता के साथ या समक्ष वे हमेशा छोटे दिखते हैं। उनके ट्विटर हैंडल का सहारा लेकर बोलें तो बच्चन पिता-पुत्र हमेशा सीनियर बच्चन और जूनियर बच्चन बने रहेंगे। इस स्थायी फर्क को अभिषेक स्वयं समझते हैं। उन्होंने एक बार कहा था, मैं स्वयं को सिर्फ अभिनेता मानूं तो मेरे लिए गौरव की बात है कि मुझे देश के सर्वश्रेष्ठ अभिनेताओं में एक अमिताभ बच्चन के साथ एक ही फ्रेम में खडे होने का मौका मिला है। मुझे लगता है कि दर्शक भी उन फ्रेमों में हमें बाप-बेटे के तौर पर नहीं देखते होंगे। हालांकि मैंने पर्दे पर भी उनके बेटों के किरदार निभाए हैं। डैड के साथ के दृश्यों में मेरी घबराहट किसी भी अन्य ऐक्टर से कम नहीं रहती।

पिता का सुरक्षा कवच

अभिषेक की सबसे बडी खुशी यही है कि वे अमिताभ के बेटे हैं, लेकिन दूसरे तरीकेसे सोचें तो यह उनके जीवन की एक ट्रेजेडी भी है। पिता के बरगदी साए से निकल पाना उनके लिए मुमकिन नहीं है। बाहरी दुनिया इस फिक्र में दुबली होती जाती है कि बेचारे अभिषेक को अपने पिता की लोकप्रियता रोज करीब से देखनी होती है। इसका अप्रत्यक्ष प्रभाव उन पर पडता होगा। उनकी हीन-ग्रंथि को बढाता होगा, टीस देता होगा उन्हें, लेकिन अभिषेक से मिल चुके सभी लोग मानेंगे कि वे अपनी पिता की लोकप्रियता का सम्मान करने के साथ एक दूरी भी रखते हैं। पिता उनके लिए आतंक नहीं रहे। अमिताभ के बारे में बातें करते समय उनकी आंखें पिता की उपलब्धियों से मोहित पुत्र की तरह चमकती हैं, लेकिन वे यह भी जानते हैं कि पिता की उपलब्धियां और उनसे मिली लोकप्रियता उन्हें विरासत में नहीं मिलेगी। उन्हें खुद मेहनत करनी होगी और अपना मुकाम पाना होगा।

डिफेंस मेकैनिज्म

खुद को सहज-सामान्य रखने की कोशिश में वे आलसी और लापरवाह दिखते हैं। उनके मजाकिया मिजाज व खिलंदडे अंदाज का मजा लेने वाले भी पीठ पीछे उनकी आलोचना करते हैं। मुझे लगता है कि यह उनका डिफेंस मेकैनिज्म है। उन्होंने पिता के कर्मक्षेत्र को अपनाया। पहले दिन से ही पिता से उनकी तुलना लाजिमी थी। उन्होंने निजी जीवन में अपने व्यक्तित्व को आलसी व एक हद तक नॉन सीरियस रखा। यकीन करें, यदि अभिषेक ने अपनी छवि ऐसी न बनाई होती तो वे साइकोलॉजिकल डिसऑर्डर के शिकार हो गए होते।

20 अप्रैल 2007 को ऐश्वर्या राय से हुई शादी के बाद उन पर दबाव और बढा। अपने आसपास हम रोज देखते हैं कि पत्नी की अधिक व्यस्तता, पहचान और कमाई से किस प्रकार भारतीय पुरुष ग्रंथियों के शिकार हो जाते हैं। शादी के चार साल बाद भी अभिषेक व ऐश्वर्या के बीच ऐसे किसी अप्रिय प्रसंग की खबर नहीं है।

प्रैंक्स्टर की छवि अभिषेक फिल्म सेट पर अपने दोस्तों के बीच प्रैंक्स्टर नाम से मशहूर हैं। अजय देवगन और सुनील शेट्टी की तरह वे भी साथी कलाकारों को फंसाने, छकाने और हास्यास्पद स्थितियों में डालने के लिए कुख्यात हैं। खेलें हम जी जान से के सेट पर दीपिका पादुकोण के साथ किया गया उनका मजाक मैंने खुद देखा है। इन पलों में उनका चेहरा भावहीन व निर्विकार होता है।

शरारतों के पीछे उनका तर्क है, ऐसी घटनाओं के बाद सेट का माहौल मैत्रीपूर्ण हो जाता है। एक-दूसरे पर भरोसा भी बढता है। अभिषेक के साथ काम कर चुकी हीरोइनें उनकी तारीफ करती हैं। प्रियंका चोपडा के अनुसार, अभिषेक प्रोटेक्टिव नेचर के अच्चछे दोस्त हैं। अगर वे सेट पर हैं तो कुछ चीजों के लिए हम निश्चिंत हो जाते हैं।

अपनों का खयाल

फिल्मी और फैमिली इवेंट पर कभी परिवार की महिला सदस्यों के साथ होने पर वे उनका अतिरिक्त खयाल रखते हैं। भीड में मां का हाथ कभी नहीं छोडते। ऐश्वर्या के साथ होने पर वे अवसरों के हिसाब से अपनी प्रासंगिकता और मौजूदगी समझते हैं। उनके स्टारडम को यथोचित स्पेस देते हैं। पब्लिक डोमेन में पिता और पत्नी के साथ संतुलन बिठाना तो कोई उनसे सीखे। परिवार के लोकप्रिय सदस्यों के प्रभामंडल से अलग वे प्रसन्नचित्त नजर आते हैं। अभिषेक के व्यवहार से यह नहीं दिखता कि सार्वजनिक जगहों पर अवांछित हैं। सामाजिक व्यवहार में वे मां-पिता और पत्नी से अलग एवं ज्यादा व्यावहारिक हैं। मीडिया, फैंस और क्राउड के साथ वे अधिक दोस्ताना व्यवहार रखते हैं। मीडिया भले ही उनकी खिल्ली उडाए, वे इसे मीडिया का धर्म समझ कर अपने भीतर रंजिश नहीं पनपने देते। विवाह, पिता की बीमारी और अन्य नाजुक अवसरों पर दुनिया ने उनकी व्यावहारिकता देखी है। मीडिया की जरूरतों और मजबूरियों को वे पिता से अधिक समझते हैं, इसलिए भरपूर सहयोग करते हैं। इस मामले में वे पिता, मां और पत्नी से भिन्न हैं। इस खासियत के कारण मीडिया में वे लोकप्रिय भी हैं। फिल्मों के हिट या फ्लॉप होने से उनकी इस लोकप्रियता में कमी नहीं आती।

इमोशनल झटका

उनकी पहली फिल्म समझौता एक्सप्रेस हो सकती थी। राकेश ओमप्रकाश मेहरा ने इसकी प्लानिंग कर ली थी, लेकिन जेपी दत्ता के बडे नाम ने इस फिल्म को हमेशा के लिए यार्ड में भेज दिया। फिल्मों में उनकी शुरुआत दत्ता की फिल्म रिफ्यूजी से हुई। इस फिल्म में उन्होंने शीर्षक भूमिका निभाई थी। इसकी भव्य लॉन्चिंग याद है। अभिषेक और करीना कपूर की पहली फिल्म रिफ्यूजी बॉक्स ऑफिस पर ज्यादा नहीं चली, लेकिन दोनों ही सितारा संतानों को इंडस्ट्री और दर्शकों ने स्वीकार कर लिया था। वैसे रिफ्यूजी की पहली हीरोइन बिपाशा बसु थीं। करीना ने इसे झटक लिया था। तब करिश्मा व अभिषेक का रोमैंस था। सगाई की खबरें भी आ चुकी थीं, लेकिन फिर सगाई टूटी और रिश्तों ने नई करवट ली। करियर की शुरुआत में मिले इस इमोशनल झटके को अभिषेक ने संयत भाव से लिया।

जटिल चरित्रों में सहज

अभिषेक को हमेशा उनके पिता के बरक्स आंका गया, इसलिए उनकी कोशिशें छोटी समझी गई। पहली बार मणि रत्नम की फिल्म युवा में उनका स्वतंत्र सिनेमाई व्यक्तित्व सामने आया। उन्होंने बिहारी लल्लन सिंह के किरदार को सही तरीके से निभाया। बंटी और बबली में उनकी प्रतिभा दिखी। दर्शकों ने उन्हें दस, ब्लफ मास्टर, दोस्ताना, गुरु और दम मारो दम में भी पसंद किया। सामान्य चरित्रों में वे अपना कौशल नहीं दिखा पाते। मुझे उनकी नाच व अंतर्महल खास फिल्में लगती हैं, लेकिन इन्हें पर्याप्त दर्शक नहीं मिले। आशुतोष गोवारीकर की खेलें हम जी जान से में उनके किरदार पर अधिक मेहनत नहीं की गई थी। मुमकिन है अभिषेक ने भी पर्याप्त ध्यान न दिया हो। ज्यादातर स्टारों की यही मुश्किल है कि वे फिल्मों और किरदारों को ऐतिहासिक संदर्भो में नहीं देखते। उनकी तात्कालिकता से लापरवाही पनपती है। लापरवाही परफॉर्मेस को कमजोर करती है।

भाषा व उच्चचारण दोष

अभिषेक से मेरी पहली मुलाकात शरारत के शूट पर हुई थी। वे वर्ली सीफेस पर शूटिंग कर रहे थे। उनका नया वैनिटी वैन आया था, जो काफी चर्चित था। उस इंटरव्यू में हिंदी में पूछे गए मेरे सारे सवालों के जवाब उन्होंने अंग्रेजी में दिए थे। मैंने इसकी शिकायत अमिताभ से की थी और कहा था कि हरिवंश राय बच्चन के पोते और अमिताभ के बेटे की यह सीमा अखरती है।

अमिताभ ने माना कि अभिषेक की हिंदी अच्चछी नहीं है, लेकिन वे अभ्यास कर रहे हैं। शायद अब उन्होंने हिंदी सुधारी है, इसलिए हिंदी में पूछे गए सवालों के जवाब वे हिंदी में देते हैं। फिर भी उच्चचारण दोष तो उनमें है। यदि वे हिंदी सुधार लें, पिता की संवाद अदायगी का ढंग सीख लें तो अभिनय में निखार ला सकते हैं। निश्चित ही उनका सफर कामयाबी के शीर्ष तक नहीं पहुंचा है, लेकिन पिछले दस सालों से वे टिके हैं। बच्चन का बैनर लहराते हुए पिता की आकांक्षा पूरी कर रहे हैं। बच्चन बैनर उनके हाथों में सुरक्षित लहरा रहा है। कामयाबी की हवा से उसका लहराना तेज और ऊंचा होगा।

Thursday, May 26, 2011

जवाब नहीं है पुरस्कारों की शेयरिंग

-अजय ब्रह्मात्‍मज

पिछले गुरुवार को जेपी दत्ता ने 58वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की घोषणा की। विजेताओं की सूची देखने पर दो तथ्य स्पष्ट नजर आए। पहला, अनेक श्रेणियों में एक से अधिक विजेताओं को रखा गया था और दूसरा, हिंदी की तीन फिल्मों को कुल जमा छह पुरस्कार मिले। आइए इन पर विस्तार से बातें करते हैं।

पिछले सालों में कई दफा विभिन्न श्रेणियों में से एक से अधिक विजेताओं के नामों की घोषणा होती रही है। ऐसी स्थिति में विजेताओं को पुरस्कार के साथ पुरस्कार राशि भी शेयर करनी पड़ती है। लंबे समय से बहस चल रही है कि देश की भाषाई विविधता को ध्यान में रखें, तो राष्ट्रीय पुरस्कारों में बेहतर फिल्मों और बेहतरीन प्रतिभाओं के साथ न्याय नहीं हो पाता। कई प्रतिभाएं छूट जाती हैं या उन्हें छोड़ना पड़ता है, लेकिन पुरस्कारों की शेयरिंग एक प्रकार से आधे पुरस्कार का अहसास देती है। ऐसा लगता है कि विजेता अपने क्षेत्र की श्रेष्ठतम प्रतिभा नहीं है। खासकर पुरस्कार राशि शेयर करने पर यह अहसास और तीव्र होता है।

जेपी दत्ता की अध्यक्षता में गठित निर्णायक मंडल ने पिछले अनुभवों से सबक लेते हुए इस बार सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय से सिफारिश की है कि विजेताओं को समान पुरस्कार राशि देने के साथ अलग-अलग ट्राफी भी दी जाए। सैद्धांतिक तौर पर मंत्रालय ने इसे मान लिया है, लेकिन इसके व्यावहारिक पक्ष पर भी ध्यान देने की जरूरत है। ठीक है कि एक से अधिक प्रतिभाओं को एक ही श्रेणी में पुरस्कृत कर उनका सम्मान किया जाएगा, लेकिन उन विजेताओं को यह अहसास तो होगा ही कि वे अपने क्षेत्र के श्रेष्ठतम नहीं हैं। उनके समकक्ष कोई और भी है। कला जगत की श्रेष्ठता खेल से अलग होती है। यहां कोई स्कोरिंग नहीं होती है कि अंकों के आधार पर विजेता का फैसला किया जा सके। कला की गुणवत्ता ज्यूरी विशेष की व्यक्तिगत अभिरुचि से तय होती है। कई बार देखा गया है कि एक ही फिल्म या प्रतिभा के मूल्यांकन में निर्णायक मंडल के दो सदस्य विरोधी राय रखते हैं। ऐसे मामलों में फिर मतों की गणना होती है। बहुत कम ऐसा होता है कि किसी पुरस्कार पर पूरे निर्णायक मंडल की आम सहमति हो।

राष्ट्रीय पुरस्कारों के संदर्भ में एक से अधिक विजेताओं की घोषणा पर आपत्ति करने वालों का तर्क है कि हमें श्रेष्ठतम का ही चुनाव करना चाहिए। अधिक विजेताओं के होने पर पुरस्कार का मान-सम्मान कम होता है। देश बड़ा होने पर भी खेलों की टीमों में निश्चित संख्या से अधिक खिलाड़ी तो नहीं शामिल किए जाते और न ही कभी एक की जगह दो प्रधानमंत्री चुने जाते हैं। फिर फिल्मों के पुरस्कारों पर ऐसा दबाव क्यों बनता है? आलोचकों का एक सुझाव यह है कि सांत्वना पुरस्कार आरंभ करना चाहिए। दरअसल, सांत्वना पुरस्कार हो या एक से अधिक विजेताओं की घोषणा.., दोनों ही स्थितियों में यह संतुष्टिकरण की नीति का फल है। देश बड़ा है और अनेक भाषाओं में उत्कृष्ट काम हो रहा है। हर राज्य को चाहिए कि वह अपने राज्य की भाषा की फिल्मों को अलग से पुरस्कृत करे। जहां जक हिंदी की बात है, तो सर्वाधिक प्रचलित होने पर भी यह किसी प्रदेश विशेष की भाषा नहीं है। हिंदी फिल्मों में सक्रिय प्रतिभाओं को प्रदेश विशेष भी सम्मानित और पुरस्कृत कर सकते हैं।

रही हिंदी फिल्मों को कम पुरस्कार मिलने की बात, तो यह स्वीकार करना चाहिए कि फिलहाल हिंदी में बेहतरीन फिल्में नहीं बन रही हैं। हम बड़ी फिल्में बना रहे हैं और बड़ा बिजनेस भी कर रहे हैं, लेकिन तकनीक और कंटेंट के मामले में हम अन्य भारतीय भाषाओं से बहुत पीछे चल रहे हैं। हिंदी फिल्मों के ज्यादातर निर्माताओं का ध्यान सिर्फ बिजनेस पर रहता है। कुछ फिल्म स्टार भी बॉक्स ऑफिस कलेक्शन को ही फिल्म की क्वालिटी का फल मानने की भूल करते हैं। अपने इंटरव्यू में बेशर्मी के साथ वे जोर देते हैं कि फिल्म चलनी चाहिए और उसके लिए हर युक्ति जायज है। भले ही उससे सिनेमा का नुकसान हो रहा हो।

Saturday, May 21, 2011

फिल्‍म समीक्षा :404

दिमाग  में डर 404दिमाग में डर

-अजय ब्रह्मात्‍मज

0 लंबे समय तक राम गोपाल वर्मा के सहयोगी रहे प्रवाल रमण ने डरना मना है और डरना जरूरी है जैसी सामान्य फिल्में निर्देशित कीं। इस बार भी वे डर के आसपास ही हैं, लेकिन 404 देखते समय डरना दर्शकों की मजबूरी नहीं बनती। तात्पर्य यह कि सिर्फ साउंड इफेक्ट या किसी और तकनीकी तरीके से प्रवाल ने डर नहीं पैदा किया है। यह फिल्म दिमागी दुविधा की बात करती है और हम एक इंटेलिजेंट फिल्म देखते हैं।

0 हिंदी फिल्मों में मनोरंजन को नाच-गाना और प्रेम-रोमांस से ऐसा जोड़ दिया गया है कि जिन फिल्मों में ये पारंपरिक तत्व नहीं होते,वे हमें कम मनोरंजक लगती हैं। दर्शकों को ऐसी फिल्म देखते समय पैसा वसूल एक्सपीरिएंस नहीं होता। दर्शक पारंपरिक माइंड सेट से निकलकर नए विषयों के प्रति उत्सुक हों तो उन्हें 404 जैसी फिल्मों में भी मजा आएगा।

0 404 बायपोलर डिस आर्डर पर बनी फिल्म है। इस रोग से ग्रस्त व्यक्ति डिप्रेशन,इल्यूजन और हैल्यूसिनेशन का शिकार होता है। वह अपनी सोच के भंवर में फंस जाता है और कई बार खुद को भी नुकसान पहुंचा देता है। मनुष्य की इस साइकोलोजिकल समस्या को भी फिल्म में रोचक तरीके से पिरोया जा सकता है। प्रवाल की थ्रिलर 404 में कुछ भी मनगढं़त नहीं है।

0 मेडिकल कालेज में एडमिशन लेकर आया अभिमन्यु रैगिंग और कैंपस की घटनाओं से बायपोलर डिसआर्डर से ग्रस्त होता है। उसी कालेज के प्रोफेसर अनिरूद्ध उसे केस स्टडी के रूप में लेते हैं। इन दोनों के अलावा फिल्म में सीनियर, क्लासमेट और टीचर के तौर कुछ और किरदार हैं। कहानी मुख्य रूप से अभिमन्यु, अनिरूद्ध और कृष के इर्द-गिर्द ही घूमती है। चूंकि ऐसे किरदार हिंदी फिल्मों में पहले नहीं दिखे हैं, इसलिए फिल्म देखते समय रोचक नवीनता बनी रहती है। दूसरी फिल्मों की तरह मुख्य किरदारों के व्यवहार का पहले से अनुमान नहीं होता।

0 404 हारर फिल्म नहीं है। इस फिल्म का डर आकस्मिक है, जो किरदारों के हैल्यूसिनेशन की वजह से क्रिएट होता है। प्रवाल ने दर्शकों का डर बढ़ाने के लिए बैकग्राउंड संगीत का इस्तेमाल नहीं किया है। यही वजह है कि डर स्वाभाविक तौर पर पनपता है। फिल्म के मुख्य किरदार रैशनल बुद्धि संगत हैं, इसलिए उनके डर में हमार ी रुचि बढ़ती है। एक स्तर पर उनसे सहानुभूति होती है कि उन्हें इस डर से मुक्ति मिले।

0 नए एक्टर राजवीर अरोड़ा ने अभिमन्यु के किरदार को सहज ढंग से चित्रित किया है। ईमाद शाह और निशिकांत कामथ भी सहज और नैचुरल हैं। निशिकांत कामथ प्रभावित करते हैं। खास चरित्रों के लिए वे उपयुक्त अभिनेता हैं। सहयोगी कलाकरों ने पूरा सहयोग दिया है। एक बात खटकती है कि क्या मेडिकल कालेज में इतने कम लोग दिखाई पड़ते हैं। बैकग्राउंड और पासिंग दृश्यों में हलचल होनी चाहिए थी। लगता है फिल्म के बजट ने निर्देशक की दृश्य संरचना को सीमित और बाधित किया है। उसकी वजह से रियलिस्टिक किस्म की यह फिल्म कुछ जगहों पर अनरियल और नकली लगने लगती है।

0 404 हिंदी फिल्मों चल रहे प्रयोगों का ताजा उदाहरण है। शिल्प और विषय के तौर पर आ रहे बदलाव के शुभ लक्षण इस फिल्म में हैं। ट्रैडिशनल मनोरंजन के इच्छुक दर्शक निराश हो सकते हैं।

रेटिंग- ***1/2 साढ़े तीन स्टार

फिल्‍म समीक्षा : कशमकश

पुराने अलबम सी कशमकशपुराने अलबम सी

-अजय ब्रह्मात्‍मज

0 यह गुरूदेव रवींद्रनाथ टैगोर की रचना नौका डूबी पर इसी नाम से बनी बांग्ला फिल्म का हिंदी डब संस्करण है। इसे संवेदनशील निर्देशक रितुपर्णो घोष ने निर्देशित किया है। बंगाली में फिल्म पूरी होने के बाद सुभाष घई को खयाल आया कि इसे हिंदी दर्शकों के लिए हिंदी में डब किया जाना चाहिए। उन्होंने फिल्म का शीर्षक बदल कर कशमकश रख दिया। वैसे नौका डूबी शीर्षक से भी हिंदी दर्शक इसे समझ सकते थे।

0 चूंकि हिंदी में फिल्म को डब करने का फैसला बाद में लिया गया है, इसलिए फिल्म का मूल भाव डबिंग में कहीें-कहीं छूट गया है। खास कर क्लोजअन दृश्यों में बोले गए शब्द के मेल में होंठ नहीं हिलते तो अजीब सा लगता है। कुछ दृश्यों में सिर्फ लिखे हुए बंगाली शब्द आते हैं। उन्हें हम संदर्भ के साथ नहीं समझ पाते। इन तकनीकी सीमाओं के बावजूद कशमकश देखने लायक फिल्म है। कोमल भावनाओं की बंगाली संवेदना से पूर्ण यह फिल्म रिश्तों की परतों को रचती है।

0 किसी पुराने अलबम का आनंद देती कशमकश की दुनिया ब्लैक एंड ह्वाइट है। इस अलबम के पन्ने पलटते हुए रिश्तों की गर्माहट के पुरसुकून एहसास का नास्टैलजिक प्रभाव पड़ता है। कशमकश में आज से 80 साल पहले का संसार है। तब भी संभ्रांत बंगाली अपनी सोच में बहुत प्रोग्रेसिव थे। हेमनलिनी और उसके पिता के बीच की समझदारी चकित करती है। बेटी के प्रेम और स्वतंत्र व्यक्तित्व के समर्थक पिता से आज की बेटियां ईष्र्या ही कर सकती हैं। टैगोर के नारी चरित्र हमेशा मजबूत और दृढ़ संकल्पों की होती हैं। बंगाली साहित्य में पुरूष ही ढुलमुल और कमजोर दिखते हैं। इस फिल्म में रमेश का द्वंद्व उसे अनिर्णय की स्थिति में रखता है।

0 रितुपर्णो घोष सीमित संसाधनों और प्रापर्टी से पीरियड रच लेते हैं। इस फिल्म में 1921 के बनारस और कोलकाता को दिखाने में उनकी संकल्पना और कला निर्देशक की होशियारी नजर आती है। पहनावे, साज-शृंगार और वास्तु से रितुपर्णो हमें 80 साल पहले के समय में ले जाते हैं। दृश्यों को फिल्माने में फ्रेम इतना नहीं खुलता कि उसमें आज का समय घुस आए।

0 हेमनलिनी, रमेश, नलीनक्ष और कमला के प्रेम संबंधों में लौट आने, लौटने और लौटने की प्रक्रिया में हम उस दौर की भावना,नैतिकता एवं समर्पण से परिचित होती हैं। कोई भी चरित्र किसी से छल नहीं कर रहा है। परिस्थिति और संयोग से वे एक-दूसरे से अलग होते हैं और फिर अनायास मिलते हैं। लगता है हिंदी फिल्मों ने खोने और पाने का फार्मूला ऐसी कहानियों से ही अपनाया है। कशमकश के संयोगों पर हंसी नहीं आती।

0 यह फिल्म अपने पीरियड के मुताबिक धीमी गति से चलती है। आज के फास्ट कट के आदी हो रहे दर्शकों यह फिल्म ढीली और ऊबाऊ लग सकती है,लेकिन यही इसकी खूबसूरती है। वास्तब में ऐसी फिल्में दर्शकों से अलग किस्म की सहृदयता की मांग करती हैं।

0 हिंदी फिल्मों में सुचित्रा सेन की नातिनियों रिया और राइमा सेन को अधिक मौके नहीं मिले। राईमा ने रितुपर्णो घोष के साथ पहले भीर दमदार अभिनय का परिचय दिया है। इस फिल्म में रिया सेन चौंकाती हैं। दोनों बहनों को उनकी योग्यता के मुतरबिक फिल्में नहीं मिल पा रही हैं। धृतिमन चटर्जी,प्रसेनजीत और जिशु सेनगुप्ता के टैलेंट से हिंदी के दर्शक प्रभावित होंगे।

0 इस फिल्म की खासियत गुलजार के गीत हैं। उन्होंने रवींद्र संगीत का अर्थपूर्ण भावानुवाद किया है। उनके गीत प्रसंगो को जोड़ने और कथा को आगे बढ़ाने में सहायक होते हैं।

0 एक दृश्य में अल्यूमिनियम जैसे धातु का तसला दिखा। क्या 1921 में अल्युमिनियम के बर्तन प्रचलन में आ गए थे?

*** 1/2 साढ़े तीन स्टार

Monday, May 9, 2011

सोच और सवेदना की रंगपोटली मेरा कुछ सामान

-अजय ब्रह्मात्‍मज
खराशें, लकीरें, अठन्निया और यार जुलाहे की चार प्रस्तुतियों की पोटली है- 'मेरा कुछ सामान'। गुलजार की कहानियों, नज्मों और गीतों के इस रंगमचीय कोलाज को देखना इस दौर का समृद्ध रंग अनुभव है। 'मेरा कुछ सामान' इसी अनुभव को सजोने की निर्देशक सलीम आरिफ की सुंदर कोशिश है। इस हफ्ते 11 मई से दिल्ली में गुलजार के नाटकों का यह महोत्सव प्रारंभ हो रहा है।
खराशें, लकीरें, अठन्निया और यार जुलाहे ़ ़ ़ चार शब्दों के चार शो ़ ़ ़ लेकिन थीम एक ही ़ ़ ़ गुलजार ़ ़ ़ कहानियों, गीतों, गजलों और नज्मों से छलकती गुलजार की चिता, सवेदना और छटपटाहट। गीतकार और निर्देशक गुलजार से परिचित प्रशसकों ने इन शामों में एक अलग मानवीय गुलजार को सुना और महसूस किया है। 'मोरा गोरा अंग लई ले' से लेकर '3 थे भाई' तक के गीतों से उन्होंने कई पीढि़यों के श्रोताओं और दर्शकों को लुभाया, सहलाया और रुलाया है। वही गुलजार इन नाटकों में आजादी के बाद देश में बदस्तूर जारी साप्रदायिकता के दर्द की पोटली खोलते हैं तो उनके सामानों में हमें लोगों के एहसास, जज्बात और सपनों की शक्ल नजर आती है। सलीम आरिफ के निर्देशन में एस्से कम्युनिकेशस की इन प्रस्तुतियों को देख चुके दर्शक बार-बार किसी प्रिय फिल्म की तरह इन्हें फिर से देखने पहुंचते हैं। सन् 2002 से जारी इन नाटकों के सैकड़ों शो देश-विदेश के विभिन्न शहरों में हो चुके हैं।
'मेरा कुछ सामान' गुलजार और सलीम आरिफ की सृजनात्मक सगत और समझदारी का क्रिएटिव नतीजा है। उन्हीं दिनों गुलजार दूरदर्शन के लिए 'मिजा गालिब' की तैयारी कर रहे थे। उन्होंने सलीम आरिफ को बुलाया। सलीम आरिफ 'किरदार', 'माचिस' और 'हू तू तू' में उनके साथ निर्माण और निर्देशन में सहायक रहे।
टीवी और फिल्मों में अपनी प्रतिभा का सपूर्ण उपयोग न होते देख सलीम आरिफ ने थिएटर में कुछ नया करने की बात सोची। वे शुरू से स्पष्ट थे कि उन्हें पारंपरिक या प्रचलित थिएटर नहीं करना है। हिंदी-अंग्रेजी के बारहा मंचित हो चुके मशहूर नाटकों को फिर से पेशकर फौरी वाहवाही नहीं बटोरनी है। इस तलाश और कोशिश में ही उनका पहला काम 'गालिबनामा' सामने आया। इसमें उन्होंने गजलों के माध्यम से गालिब की जद्दोजहद को मच पर उतारा। उसके बाद साप्रदायिक दंगों को केंद्र में रखकर कुछ करने का प्रस्ताव आया तो उन्हें सबसे पहले गुलजार का ख्याल आया। उन्होंने गुलजार की कहानियों और नज्मों के कोलाज की नई नाट्य कल्पना की। यही कल्पना 'खराशें' के रूप में मचित हुई। सलीम आरिफ की रंगकर्मी पत्‍‌नी लुबना सलीम बताती हैं, 'जब दो-तीन दिनों के बाद लोगों के फोन आने शुरू हुए तो हमें लगा कि कुछ हो गया है। हमने कुछ नया कर दिया है।'
'मेरा कुछ सामान' की पहली पोटली 'खराशें' थी। उसके कुछ सालों के बाद सीमा के आर-पार की आबोहवा, मनोदशा और साथ जीने की कोशिशों को सलीम आरिफ ने 'लकीरें' में गुलजार की मदद से पेश किया। 'खराशें' की तरह 'लकीरें' को भी दर्शकों ने सराहा और खूब पसद किया। 2006 की मुंबई की विभीषिका के बाद 'अठन्निया' की धमक मच पर सुनाई पड़ी। इसमें मुंबई के स्लम्स में गुजर-बसर कर रहे बाशिदों की जिद और जिजीविषा के साथ जिंदगी की ललक और झलक भी दिखाई देती है। 'खराशें', 'लकीरें', और 'अठन्निया' के साथ चौथी शाम 'यार जुलाहे' की होती है। इस शाम गुलजार के प्रशसक और दर्शक उनसे शब्दों की कताई, धुनाई और बुनाई की फ‌र्स्ट हैंड जानकारी लेते हैं। साक्षात गुलजार उनके सवालों के जवाब देते हैं। गुलजार की कोशिश रहती है कि जब भी उनके सामानों की पोटली मच पर खोली जाए तो वे स्वय वहा मौजूद रहें।
दर्शकों की प्रतिक्रिया देखने-सुनने में उनकी खुशी बच्चों की तरह छलकती है। सलीम आरिफ बताते है, अपनी पहचान और मशहूरियत के बावजूद गुलजार साहब इन प्रस्तुतियों को खास दर्जा देते है।
सलीम आरिफ 'मेरा कुछ सामान' की प्रस्तुतियों की लोकप्रियता, स्वीकृति और भव्यता का श्रेय गुलजार को देते हैं,' यह उनके सिग्नेचर और व्यक्तित्व की महक ही है, जिसे छूने और महसूस करने दर्शक आते हैं। थिएटर के इतिहास में इस अनोखी प्रस्तुति में गुलजार की शिरकत इसे गहरा मायने दे जाती है। गुलजार की मौजूदगी की वजह से ही कई सवेदनशील मुद्दों पर होने के बावजूद 'खराशें' और 'लकीरें' को लेकर कभी कोई प्रतिवाद या विवाद नहीं हुआ।' बतौर एक्टर सभी प्रस्तुतियों में शामिल यशपाल शर्मा हर मचन के लिए समय निकालते हैं। वे कहते हैं, मैं अपनी सतुष्टि के साथ नेक इरादे का हिस्सा बनने के मकसद से इसमें शामिल रहता हूं। मेरे लिए यह अलग अनुभव है। मैं इसकी ऊर्जा से खुद को अलग नहीं कर सकता।'