Search This Blog

Showing posts with label अजय ब्रह्मात्मज. Show all posts
Showing posts with label अजय ब्रह्मात्मज. Show all posts

Thursday, August 13, 2015

दरअसल : हिंदी प्रदेशों में सिनेमा और सरकार





-अजय ब्रह्मात्‍मज
    आए दिन उत्‍तर प्रदेश के अखबारों में फिल्‍म कलाकारों के साथ वहां के मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव की तस्‍वीरें छप रही हैं। नीचे जानकारी रहती है कि फलां फिलम को टैक्‍स फ्री कर दिया गया। टैक्‍स फ्री करने से फिल्‍म निर्माताओं को राहत मिलती है। उन्‍हें थोड़ा लाभ भी होता है। उत्‍तर प्रदेश सरकार फिल्‍मों को बढ़ावा देने के साथ प्रदेश की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए अनुदान भी देती है। अगर किसी फिल्‍म की उत्‍तर प्रदेश में शूटिंग की गई हो तो प्रतिशत के हिसाब से अनुदान दिया जाता है। मसलन 75 प्रतिशत फिल्‍म उत्‍तर प्रदेश में शूट की गई हो तो दो करोड़ और 50 प्रतिशत पर एक करोड़ का अनुदान मिलता है। हिंदी फिल्‍में अभी जिस आर्थिक संकट से गुजर रही हैं,उस परिप्रेक्ष्‍य में ऐसे अनुदान का महत्‍व बढ़ जाता है। उत्‍तर प्रदेश में फिल्‍मों से जुड़ी सारी गतिविधियां फिल्‍म विकास परिषद के तहत हो रही हैं। इन्‍हें विशाल कपूर और यशराज सिंह देखते हैं। कहा जा सकता है कि मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव के नेतृत्‍व में यह अनुकरणीय काम हो रहा है। बाकी हिंदी प्रदेशों को भी सबक लेना चाहिए। सभी हिंदी प्रदेशें में फिल्‍म विकास परिषद का गठन होना चाहिए।
    इतना ही नहीं। विशाल कपूर बताते हैं,मुख्‍यमंत्री महोदय इसे अधिक फिल्‍में,अधिक रोजगार के तौर पर देखते हैं। वे चाहते हैं कि बनारस और लखनऊ ही नहीं,प्रदेश के दूसरे मनोरम स्थानों में भी शूटिंग की सुविधाएं दी जाएं। दो स्‍थानों उन्‍नाव और लखनऊ-आगरा एक्‍सप्रेस पर फिल्‍मसिटी स्‍थापित करने की योजना है। उत्‍तर प्रदेश में शूट की गई पहली फिल्‍म के लिए भी अनुदान की व्‍यवस्‍था है। फिल्‍म विकास परिषद बच्‍चों के लिए भी कुछ करना चाहता है। उत्‍तर प्रदेश की तरह अगर दूसरे हिंदी प्रदेश भी हिंदी फिल्‍मों के लिए अपने दरवाजे खोलें तो हिंदी सिनेमा के इतिहास में नए चैप्‍टर की शुरूआत हो सकती है। अभी बिहार में प्रस्‍तावित फिल्‍म नीति ठंडे बस्‍ते में चली गई है। कुछ सालों पहले फिल्‍म समारोह आरंभ हुए थे,लेकिन नई सरकारों की उदासीनता से वह क्रम टूट गया। चुनाव के बाद सरकार किसी की भी आए। नई सरकार को फिल्‍मों के प्रति गंभीरता बरतनी चाहिए।
    मध्‍य प्रदेश अन्‍य कारणों से विवाद में है,लेकिन फिल्‍मों के प्रति उनका समर्थन उल्‍लेखनीय है। प्रकाश झा की कुछ फिल्‍में मध्‍य प्रदेश में ही शूट हुई हैं। निश्चित ही वहां की सुविधा और सुकून की वजह से प्रकाश झा कहीं और नहीं जाते। दूसरे फिल्‍मकार भी बताते हैं कि उन्‍हें अपनी फिल्‍मों की शूटिंग में पुलिस और प्रशासन का भरपूर समर्थन और सहयोग मिलता है। मध्‍यप्रदेश के साथ एक सुविधाजनक बात यह भी है कि मुंबई से अपेक्षाकृत नजदीक होने के कारण कलाकारों का भोपाल या इंदौर जाना-आना आसान होता है। राजस्‍थान में हवेलियों और प्राकृतिक सुदरता की वजह से हिंदी फिल्‍मों की लगातार शूटिंग चलती है। चूंकि निर्माता और निर्देशक मनोहार लोकेशन के लिए खुद ही राजस्‍थान जाते हैं,इसलिए सरकार किसी प्रकार के अनुदान या प्रलोभन की जरूरत नहीं समझती। फिर भी राजस्‍थान सरकार को राजस्‍थानी सिनेमा या प्रदेश के हिंदी सिनेमा को बढ़ावा देने की पहल करनी चाहिए। अभी राजस्‍थानी में बनी फिल्‍मों का उसकी पूर्णता के बाद दस लाख की समर्थन राशि दी जाती है। इस समर्थन का केवल प्रतीकात्‍मक महत्‍व रह गया है।
    इन चार प्रदेशों के साथ हिमाचल प्रदेश,उत्‍तराखंड और झारखंड जैसे भी प्रदेश हैं। हम जानते हैं कि ये प्रदेश भी सिनेमा के लोकेशन के लिए मुफीद हैं। इन प्रदेशों के टैलेंट मुंबई में कार्यरत हैं। इन प्रदेशों की सरकारें अपने यहां की प्रतिभाओं का सुविधाएं और मौके देकर फिल्‍मों के विकास में योगदान कर सकती हैं। अभी फिल्‍मों के प्रसार की संभावनाएं बनी हुई हें। तकनीकी विकास और उपलब्‍धता ने फिल्‍म निर्माण के लिए मुंबई,चेन्‍नई या कोलकाता पर फिल्‍मकारों की निर्भरता कम कर दी है। अब यह मुमकिन ही कि सुदूर इलाकों और शहरों में बैठ कर भी फिल्‍मों की शूटिंग की जा सके।
जारी...

Monday, March 18, 2013

डॉ चंद्रप्रकाश द्विवेदी से अजय ब्रह्मात्‍मज की बातचीत (वीडियो बातचीत )

2 मार्च 2013 को मुंबई में डॉ चंद्रप्रकाश द्विवेदी से मैंने उनके निर्देशक होने से लेकर सिनेमा में उनकी अभिरुचि समेत साहित्‍य और सिनेमा के संबंधों पर बात की थी। मेरे मित्र रवि शेखर ने उसकी वीडियो रिकार्डिंग की थी। उन्‍होंने इसे यूट्यूब पर शेयर किया है। वहीं से मैं ये लिंक यहां चवन्‍नी के पाठकों के लिए दे रहा हूं। आप का फीडबैक इस नए प्रयास को आंकेगा और बताएगा कि आगे ऐसे वीडियो किस रूप में  पेश किए जाएं। पांच किस्‍तों की यह बातचीत एक साथ पेश है...यह बातचीत संजय चौहान के सौजन्‍य से संपन्‍न हुई थी। दोनों मित्रों को धन्‍यवाद !
पहली किस्‍त
http://www.youtube.com/watch?v=K3vsQGenAyo

दूसरी किस्‍त 
http://www.youtube.com/watch?v=eBSsvIr6VN4

तीसरी किस्‍त 
http://www.youtube.com/watch?v=fzwnPNjigbE

चौथी किस्‍त 
http://www.youtube.com/watch?v=imvxn8VMDwc

पांचवीं किस्‍त 
http://www.youtube.com/watch?v=_JkdqS1XkWM

Sunday, October 7, 2012

70 वें जन्मदिन पर अमिताभ बच्चन से अजय ब्रह्मात्मज की बातचीत

-अमिताभ बच्चन का जीवन देश का आदर्श बना हुआ है। पिछले कुछ समय से फादर फिगर का सम्मान आप को मिल रहा है। पोती आराध्या के आने के बाद तो देश के बच्चे आप को अपने परिवार का दादा ही मानने लगे हैं।

0 यह देश के लोगों की उदारता है। उनका प्रेम और स्नेह है। मैंने कभी किसी उपाधि, संबोधन आदि के लिए कोई काम नहीं किया। मैं नहीं चाहता कि लोग किसी खास दिशा या दृष्टिकोण से मुझे देखें। इस तरह से न तो मैंने कभी सोचा और न कभी काम किया। जैसा कि आप कह रहे हैं अगर देश की जनता ऐसा सोचती है या कुछ लोग ऐसा सोचते हैं तो बड़ी विनम्रता से मैं इसे स्वीकार करता हूं।

- लोग कहते हैं कि  आप का वर्तमान अतीत के  फैसलों का परिणाम होता है। आप अपनी जीवन यात्रा और वर्तमान को किस रूप में देखते हैं? निश्चित ही आपने भी कुछ कठोर फैसले लिए होंगे?

0 जीवन में बिना संघर्ष किए कुछ भी हासिल नहीं होता। जीवन में कई बार कठोर और सुखद प्रश्न सामने आते हैं और उसी के अनुसार फैसले लेने पड़ते हैं। जीवन हमेशा सुखद तो होता नहीं है। हम सभी के जीवन में कई पल ऐसे आते हैं, जब कठोर निर्णय लेने पड़ते हैं। यह उतार-चढ़ाव जीवन में लगा रहता है। मैंने कभी उस ओर कभी ध्यान नहीं दिया। अपने फैसलों के बारे में ज्यादा नहीं सोचा।  पिताजी ने कहा है, जो बीत गई, वह बात गई। और फिर आगे बढ़ें। केवल इतना मुझे ज्ञात है कि जो भी मेरे साथ हुआ वह दुखद रहा हो या सुखद रहा हो, उससे मैंने क्या सीखा। यदि मैं उन संकट के क्षणों से निकल पाया तो यह अवश्य समझने की कोशिश की कि क्यों संकट के वे क्षण मेरे जीवन में आए? उन पर सोच-विचार करने पर ऐसा लगा कि मैंने कुछ सीखा ही। अगर आप मुझसे पूछें कि क्या अपना जीवन दोबारा ऐसे ही जीना चाहेंगे या उसमें परिवर्तन लाना चाहेंगे तो मेरा जवाब होगा, मैं उसे वैसे के वैसे ही जीना चाहूंगा।

- गलतियों, भूलों और संकटों के बावजूद...

0 अगर वे गलतियां नहीं होतीं तो हम कुछ सीखते नहीं। और संभव है कि बाद में मुसीबत ज्यादा बड़ी हो जाती। हम उन गलतियों से जो सीख पाए, वह नहीं हो पाता।

- कुछ लोग कहते हैं  कि स्थितियां ही मनुष्य को बनाती हैं। मुझे लगता है स्थितियां केवल मनुष्य को उद्घाटित करती हैं। कोई जन्मजात वैसा ही नहीं होता, जैसा वह आज है। अमिताभ बच्चन नित नए रूप में उद्घाटित हो रहे हैं?

0 इस दिशा में मैंने कुछ सोचा नहीं। यह तो आप जैसे लोग हैं, जो सोचते और मानते हैं कि एक नया रूप आ रहा है। मैं तो अपने आप को वैसा ही समझता हूं। मैंने अपने आप में न तो कोई परिवर्तन देखा है और न कभी इसकी कोशिश की है।

- दरअसल हम आपसे ही  जानने की कोशिश कर रहे  हैं?

0 जैसे ही मैं उसका वर्णन करना शुरू कर दूंगा तो ऐसा लगेगा कि मैं अपनी ही तारीफ के पुल बांध रहा हूं। देखना, सोचना, समझना और बताना यह आप लोगों का काम है। अगर आप को लगता है कि मुझ में कुछ ऐसी बातें हैं, जिनके बारे में लिखा जाना चाहिए तो लिखें। अपना परिचय या वर्णन मैं अपने आप नहीं कर पाऊंगा। जब भी इस तरह के सवाल आते हैं और मुझ से पीछे पलटकर देखने के लिए कहा जाता है तो मुझे लगने लगता है कि मैं अपनी आत्मकथा लिख रहा हूं। मैं नहीं समझता कि मैं आत्मकथा लिखने के योग्य हूं या मेरे अपने जीवन में ऐसा कुछ है, जो लिखा जाना चाहिए। बाबुजी ने जरूर आत्मकथा लिखी। वह ऐतिहासिक लेखन है।

- फिर भी कुछ क्षण और पल रहे होंगे, जब आप हताश और निराश हुए होंगे। फिल्मों में आने के समय की बात करें तो जिस प्रकार आप को अस्वीकार किया गया। फिर बाद में जिसे वन मैन इंडस्ट्री कहते थे, उसे ही फिल्में न मिलें। इन सारी परिस्थितियों में आप किसी अमरपक्षी की तरह फिर से उड़ान भरते हैं। आप में थोड़ी सी चिंगारी बची रह जाती है, जिससे आप लहलहा उठते हैं।

0 इतनी बारीकी से मैंने अपने आप को नहीं देखा और देखना भी नहीं चाहता।

- सिर्फ यह बता दें कि  आखिर वह कौन सी ऊर्जा है, जो आप को ताकत देती है?

0 शुरू में काम न मिलने का आपने जिक्र किया। इस संबंध में मेरी स्पष्ट राय है कि जब तक आप के गुणों से कोई परिचित नहीं है तो कैसे अपने व्यवसाय में ले ले। धीरे-धीरे परिचय मिलने लगता है तो काम भी मिलने लगता है। काम मिलने के बाद आप के गुण और काबिलियत की चीजें सामने आती हैं। फिर आप का काम और बढ़ता है। हमारी इंडस्ट्री में रूप, कला और बॉक्स ऑफिस तीनों को देखा जाता है। इन्हें समेटकर ही कोई फैसला लिया जाता है। हो सकता है कि मुझ में कुछ त्रुटियां रही हों, जिनकी वजह से मुझे काम न मिला हो। बीच में दो-तीन सालों तक मैंने कोई काम नहीं किया था। हां, जो संन्यास लिया था, वह मुझे नहीं लेना चाहिए था। बाबुजी ने कहा है, अनवरत समय की चक्की चलती रहती है। कई बार ऐसा मन करता है कि उस चक्की से छिटककर कुछ देखें, लेकिन मेरा मानना है कि एक बार चलायमान हो गए तो चलते रहना चाहिए। वह चक्की अपने आप रूक जाए या आप की नाकामयाबी से रूके तो यह दूसरी बात है। अनिश्चय का एक माहौल हमारे व्यवसाय में हमेशा बना रहता है। आगे भी ऐसा ही रहेगा। अब वृद्ध हो गए हम। सत्तर बरस के हो गए। अब मुझे नौजवान भूमिकाएं तो मिलेंगी नहीं। वृद्ध भूमिकाएं सीमित होती हैं। उसी तरह का काम मिलेगा, वही करते रहेंगे।

-बाबुजी ने चार खंडों में आत्मकथा लिखी। उसका एक खंड ‘क्या भूलुं क्या याद करूं’। आप के जीवन में भी कुछ भूलने और याद रखने वाली बातें होंगी। क्या कुछेक सुखद क्षण हमारे पाठकों से शेयर करेंगे?

0 सबसे सुखद बात है कि जनता ने इस व्यवसाय में स्वीकारा मुझे। उनका स्नेह, प्यार, प्रार्थनाएं और दुआएं नहीं होतीं तो हम आज की स्थिति में नहीं होते। माता-पिता का आशीर्वाद.. उन्होंने हमारी जो परवरिश की। बाबुजी का लेखन, उनके लेखन से मिली सीख.. उनके साथ समय बिताने का अवसर मिला। उनका जीवन हमारे लिए उदाहरण बना। यही सब कुछ सुखद बातें हैं।

-पारिवारिक जीवन में  आपने पुत्र, पति, पिता और अब दादा की भूमिकाएं निभाई हैं। अभिषेक के अनुसार आप सारी भूमिकाओं में परफेक्ट रहे हैं।

0 यह मुझे मालूम नहीं है कि मैं कितना परफेक्ट रहा हूं?

-पूरे देश ने आप  की पितृ और मातृ सेवा  देखी है। अपनी व्यस्तताओं के बावजूद आप ने उनकी पूरी देखरेख की। ऐसी सेवा बहुत कम लोग कर पाते हैं। मुझे लगता है कि यह उत्तर भारत के मध्यमवर्गीय परिवार के लोगों का खास गुण है। आपने उसे निभाया और एक आदर्श बने। पारिवारिक मूल्यों के प्रति आप का दृष्टिकोण आप के ब्लॉग लेखन, व्यवहार और प्रतिक्रियाओं में साफ नजर आता है।

0अपने जीवन के दौरान जो भी देखा, सुना, पढ़ा और सीखा मां-बाबुजी से या जिस वातावरण में हम रहे, जिस माहौल में पले-बढ़े, वहीं सब कुछ सीखा। कभी किसी ने बताया या कहा नहीं कि ऐसे करना चाहिए। जो मन में आया हमने किया। जो हमे लगा कि करना चाहिए, वही किया। मुझे लगता है, जिनकी वजह से हमारा जीवन है। जिन्होंने अपनी जिंदगी की तमाम कठिनाइयों के बीच हमें शिक्षा दी। पाला, बड़ा किया... इतना तो हमारा फर्ज बनता है कि जब वे सहायता की स्थिति में हों या चिकित्सा की आवश्यकता हो तो उसे पूरा करें। हर संतान को सब कुछ करना चाहिए। मैं ऐसा मानता हूं और मैंने यही किया। इस वजह से कभी कुछ नहीं किया कि आदर्श बनना है, या मिसाल रखनी है।

-पोती का नाम आराध्या ही है न?

0 हां, आराध्या ही है।

-दादा के रूप में आप आराध्या को कितना समय दे पाते हैं? कहते हैं हर पुरुष पति, पिता और दादा बनने के साथ बदलता है। उसके दृष्टिकोण बदल जाते हैं। इन दिनों ऐसा लग रहा है कि आप सुखी और संतुष्ट हैं। अभी आप किसी चीज के लिए प्रयासरत नहीं दिखते। जो मिल रहा है या जो सामने है, उसका आनंद उठा रहे हैं?

0 पहले भी ऐसा ही व्यवहार था मेरा। जो मिलता था, वह करते थे। पहले वाली असुरक्षा आज भी है। पता नहीं कल काम मिलेगा कि नहीं मिलेगा।

-क्या सत्तर साल के  सफल अमिताभ भी असुरक्षित हैं?

0 क्यों नहीं? प्रतिदिन एक भय रहता है कि आज जो काम करना है, वह कैसे होगा? होगा कि नहीं होगा? अभी आप का इंटरव्यू खत्म कर ‘केबीसी’ के सेट पर जाऊंगा। डर लगा रहता है। संघर्ष प्रतिदिन रहेगा हमारे जीवन में। बाबुजी के सामने जब हम अपनी दुविधाएं रखते थे तो वे यही कहते थे कि संघर्ष हमारे साथ रहने वाला है। उन्होंने कहा था कि कभी इत्मीनान नहीं रहता। मुझे नहीं लगता कि यह संभव होगा। यही हम चाहेंगे कि हमारा परिवार और निकट संबंधी सुख-शांति से रहें। हमारे चाहने वालों का स्नेह-प्यार बना रहे, क्योंकि उन्हीं की वजह से हम बने हैं। हम अलग से कोई खास प्रयत्न नहीं करते। जो आ जाता है, उसी में चुन लेते हैं सोच-समझकर कि इसी में रूचि होगी।

- आप अपने  काम में सौ प्रतिशत से  ज्यादा देते हैं। अभिषेक की एक ही शिकायत है कि डैड अपने सेहत का ख्याल रखें और आराम करें?

0 आराम तो एक दिन सभी को करना ही पड़ेगा। शरीर जब नहीं चलेगा तो आराम करना ही पड़ेगा। जब तक शरीर साथ दे रहा है तब तक शरीर चलाते रहेंगे।

- आप के ब्लॉग पर बार-बार उल्लेख आता है कि अब मैं समाप्त करता हूं, नहीं तो परिजन नाराज हो जाएंगे?

0 हां वो होता है।

- वह कौन सी चाहत  है, जो सुबह चार बजे भी ब्लॉग लिखने के लिए मजबूर करती है?

0 यह प्रथा बन गई है। मैं उसमें कोई व्यवधान नहीं आने देना चाहता। मैंने उनसे वादा किया हुआ है कि प्रतिदिन लिखूंगा। अब एक बार जबान या शब्द दे दिया तो उसे पूरा करना चाहिए। हां, यह होता है कि कई बार देर हो जाती है। दिनचर्या में कई सारे काम होते हैं। उन्हें पूरा करने के बाद ही लिखता हूं, लेकिन लिखता अवश्य हूं, ताकि उनसे संपर्क बना रहे।

- कई बार मैंने देखा कि आप अपने पाठकों का पूरा ख्याल रखते हैं। उनकी बात मानते हैं। उन्हें जवाब देते हैं?

0 हां, जवाब देता हूं। यह सुविधा हमने ही ब्लॉग में जोड़ी है कि जो कुछ भी मैं कहता हूं,आप उस टिप्पणी कर सकें। उसके बाद मैं भी उत्तर देता हूं। उन्हें लगता है कि वे भी मेरे आमने-सामने  बैठकर बातें करते हैं। यह सब अच्छा लगता है।

-तमाम कलाकारों के  बीच आप का यूथ कनेक्ट सबसे  ज्यादा और तीव्र है। आप की भाषा, आप की बातचीत। उसमें बड़े-बुजुर्ग होने का एहसास नहीं होता। कोई उपदेश नहीं देते आप?

0 उपदेश, आवे तो देवें(जोरदार ठहाका)।

-अगर मैं सीधे पूछूं कि आप क्यों ट्विट पर हैं, फेसबुक पर हैं, ब्लॉग पर हैं?

0 किसी ने कहा कि आप का वेबसाइट होना चाहिए, जहां पर लोग आप के बारे में जानें। जहां से जनता को आप के बारे में जानकारी मिले। बहुत सारे फेक लोग आप की आईडी और नाम का इस्तेमाल कर रहे हैं। उसमें गलत चीजें भी छप रही हैं। उसे सीधा और सही करने की जरूरत है।

मैंने कहा कि भाई वेबसाइट कर दो। उन्होंने मुझ से वक्त मांगा। मैंने कहा, मुझे तो कल ही चाहिए। फिर उन्होंने सुझाया कि कल ब्लॉग हो सकता है। मैंने उसे समझा। लगा कि अच्छी चीज है। पहला ब्लॉग लिखा। दो-चार लोगों ने उत्तर दिए। फिर प्रतिदिन करते गए। पाठकों की संख्या बढ़ती गई। फिर उसके बाद पता चला कि एक ट्विटर है। फिर फेसबुक की जानकारी मिली। धीरे-धीरे जो सुविधाएं मिल रही हैं, उन्हें मैं एक बार जरूर देखना और चखना चाहूंगा। एक जिज्ञासा है बस।

- खास बात है कि आप के ब्लॉग में कभी दोहराव नहीं होता?

0 मैं पहले से कुछ भी सोचकर नहीं लिखता। कंप्यूटर खोलने के बाद जो जी में आता है लिख देता हूं। मन में जो बात आती है, वही लिखता हूं। पहले से प्लान नहीं करता कि आज यह लिखूंगा, कल वह लिखूंगा। हां, तस्वीरें मैं डालता हूं। दिन भर की कुछ खिंची यादगार तस्वीरें। मेरा लेखन बहुत ही मामूली है। बस मैं एक लोगों से बातचीत करता हूं।

-अभी तो लोग आप के ब्लॉग पर शोध करेंगे?

0 शोध(एक ठहराव) कहां होने वाला है?

- अभी आप के सबसे अंतरंग मित्र कौन हैं?

0 परिवार के सदस्य हमारे मित्र हैं और कुछ मित्र आते-जाते हैं। मेरे ज्यादा दोस्त हैं नहीं, क्योंकि मैं ज्यादा लोगों से मिलता-जुलता नहीं हूं। 

-कुछ नाम ले सकें?

0 (ठहरकर)... क्या लें। सभी के लिए द्वार खुला हुआ है। जो आ जाए।

- सबसे कीमती  धरोहर क्या है आप के पास?

0 बाबुजी का लेखन.. माता-पिता के साथ बिताए गए क्षण। जो उनके सानिध्य में बीता, वही हमारी धरोहर है।

- अपने बाद  की पीढ़ी को और देश  को क्या धरोहर देना चाहेंगे?

0 इस विषय या लक्ष्य से जीवन जीने पर मैं गलत हो जाऊंगा। मैं यह सोचकर नहीं चलना चाह रहा हूं कि अगली पीढ़ी को कुछ दूंगा। यदि मेरे साथ रहकर उन्होंने कुछ सीखा या समझा तो वही उनकी धरोहर है।

-हम भाग्यशाली हैं कि हमने साक्षात अमिताभ बच्चन को देखा है। आने वाली पीढ़ी निश्चित ही हमसे रश्क करेगी। मुमकिन नहीं लगता कि भविष्य में कोई और अमिताभ बच्चन आएगा। आप सिर्फ एक जीवन नहीं हैं विशेष परिघटना हैं भारत की। देश की युवा पीढ़ी को जीवन का क्या संदेश देना चाहेंगे?

0 पहले तो मुझे  इस पर विश्वास होना चाहिए कि मैं  कोई परिघटना हूं। हमने तो  कभी ऐसे जीवन नहीं बिताया कि उस पर कोई शोध होगा, सर्वे होगा और लोग निष्कर्ष निकालेंगे। ना ही मैंने किसी को कुछ कहने, लिखने और नाम देने से रोका है। मैं सभी को बाबुजी की सीख देना चाहूंगा- मन का हो तो अच्छा, न हो तो ज्यादा अच्छा। जब तक जीवन है, तब तक संघर्ष है। ये छोटी-मोटी बातें हैं।

Tuesday, July 3, 2012

छोटी फिल्मों की रिलीज की पहल

-अजय ब्रह्मात्‍मज

बड़ी कॉरपोरेट कंपनियां सामाजिक जिम्मेदारी के तहत धर्मार्थ कार्य करती हैं। इनमें टाटा सबसे आगे है। अभी तो सारी कंपनियों में एक डिपार्टमेंट ऐसा होता है, जो सामाजिक जिम्मेदारियों के लिए अधिकारियों को सचेत करता है। उन्हें धर्मार्थ निवेश के कार्य बताता है और उन पर निगरानी भी रखता है।
मनोरंजन के व्यवसाय में व्यक्तिगत स्तर पर फिल्म स्टार ढेर सारे धर्मार्थ कार्य करते हैं। भारतीय दर्शन और सोच से प्रेरित उनकी यह कोशिश सामाजिक उत्थान और वंचितों के लिए होती है। हालांकि उनकी ऐसी गतिविधियों पर उंगलियां भी उठती रही हैं। कहा जाता रहा है कि अनगिनत पाप करने के बाद पुण्य कमाने के लिए ही धर्मार्थ कार्य किए जाते हैं। महात्मा गांधी ने हमेशा अपने समय के उद्योगपतियों को ऐसा करने के लिए प्रेरित किया। कुछ को तो राजनीतिक मंच पर भी ले आए।
गौर करें तो हिंदी फिल्मों में ज्यादातर गतिविधि बिजनेस बढ़ाने के लिए रहती है। कोई भी स्थापित निर्माता या कॉरपोरेट कंपनी प्रयोगात्मक फिल्म के निर्माण के पहले पच्चीस बार सोचती है। हर तरह से अपने जोखिमों को कम करने के बाद ही वे ऐसी फिल्मों के लिए आगे बढ़ते हैं। इधर पीवीआर ने एक बेहतरीन पहल की है। उनकी ओर से सीमित बजट की ऑफबीट और प्रयोगात्मक फिल्मों की रिलीज की व्यवस्था की गई है। इस तरह उन्होंने प्रयोगशील निर्माताओं को एक मंच देने और सुधी दर्शकों को ऐसी फिल्में दिखाने का एक पंथ दो काज किया। उन्हें अच्छी प्रतिक्रिया भी मिल रहा है।
हिंदी में पैरेलल सिनेमा के दौर में प्रदर्शन एक बड़ी समस्या थी। फिल्में तो एनएफडीसी या दूसरी संस्थाओं की मदद से बन जाती थीं लेकिन उनका प्रदर्शन अटक जाता था। कुछ फिल्में दूरदर्शन के राष्ट्रीय प्रसारण में जगह पाती थीं। बाकी चंद फेस्टिवल्स में दिखाए जाने के बाद गोदामों में रख दी जाती थीं। पैरेलल सिनेमा का हश्र हम जानते हैं। हिंदी फिल्मों की कलात्मक परंपरा की यह नदी सूख गई। पैरेलल सिनेमा के निर्माता बड़े स्टार्स को लेकर मेनस्ट्रीम फिल्में बनाने लगे और श्याम बेनेगल सरीखे फिल्मकारों ने सामाजिक विषयों में कॉमेडी का छौंक डाला। फिर भी स्थिति दयनीय ही बनी रही। पीवीआर की इस पहल से स्वतंत्र निर्माताओं, प्रयोगशील निर्देशकों और लीक से हटकर काम करने वाले सभी प्रकार के छोटे और युवा फिल्मकारों को एक मंच मिल रहा है। फिलहाल ये फिल्में मेट्रो शहरों के मल्टीप्लेक्स में दिखाई जा रही हैं। दर्शकों की प्रतिक्रिया से पीवीआर के अधिकारियों का उत्साह बढ़ा है। संभव है वे छोटे शहरों के दर्शकों के हित में वहां भी ये फिल्में रिलीज करें। इन फिल्मों को न तो सौ प्रतिशत ओपनिंग मिलती है और न उनके कलेक्शन की बॉक्स ऑफिस रिपोर्ट में चर्चा होती है। उद्देश्य लाभ कमाना नहीं है। उद्देश्य है फिल्में दर्शकों तक एक व्यवस्थित नेटवर्क के जरिये पहुंचे।
पिछले दिनों पीवीआर ने इसी कड़ी में करण ग्रोवर की क्षय रिलीज की। यह एक गुस्सल महिला की कहानी है। दस लाख से कम बजट में बनी यह फिल्म कंटेंट और क्राफ्ट के स्तर पर खास है। फिल्म अपना मंतव्य जाहिर करने में सफल रही है। पीवीआर में इस गतिविधि की देखरेख कर रहे शिलादित्य वोरा बताते हैं, हमने सुधीश कामथ की फिल्म गुड नाइट गुड मॉर्निग से इसकी शुरुआत की थी। उसके बाद से चौराहे, द फॉरेस्ट, लव रिंकल फ्री और क्षय रिलीज हो चुकी है। इनमें लव रिंकल फ्री दो हफ्ते तक चली। इस कड़ी में अगली फिल्म सुपरमैन ऑफ मालेगांव होगी। उन्होंने यह बताया कि अभी मुख्य रूप से मुंबई, दिल्ली, कोलकाता, हैदराबाद, अहमदाबाद, बंगलुरु और चेन्नई के थियेटरों में फिल्में रिलीज हो रही हैं। हम जल्दी ही छोटे शहरों की तरफ बढ़ेंगे।

Thursday, June 21, 2012

साहब बीबी और गुलाम


- अजय ब्रह्मात्मज
    फिल्मों की स्क्रिप्ट का पुस्तकाकार प्रकाशन हो रहा है। सभी का दावा रहता है कि ओरिजनल स्क्रिप्ट के आधार पर पुस्तक तैयार की गई है। हाल ही में  दिनेश रहेजा और जितेन्द्र कोठारी की देखरेख में ‘साहब बीबी और गुलाम’ की स्क्रिप्ट प्रकाशित हुई है। उन्हें ओरिजनल स्क्रिप्ट गुरुदत्त के बेटे अरुण दत्त से मिली है। दिनेश रहेजा और जितेन्द्र कोठारी ने चलन के मुताबिक फिल्म के हिंदी संवादों के अंग्रेजी अनुवाद के साथ उसे रोमन हिंदी में भी पेश किया है। संवादों के अंग्रेजी अनुवाद या रोमन लिपि में लिखे जाने से स्पष्ट है कि इस पुस्तक का भी मकसद उन चंद अंग्रेजीदां लोगों के बीच पहुंचना है, जिनकी हिंदी सिनेमा में रुचि बढ़ी हैं। उनकी इस रुचि को ध्यान में रखकर विनोद चोपड़ा फिल्म्स ने ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ और ‘3 इडियट’ के बाद गुरुदत्त की तीन फिल्मों ‘साहब बीवी और गुलाम’, ‘कागज के फूल’ और ‘चौदहवीं का चांद’ के स्क्रिप्ट के प्रकाशन का बीड़ा उठाया है। पिछले दिनों विधु विनोद चोपड़ा ने बताया था कि वे कुछ दूसरी फिल्मों की स्क्रिप्ट भी प्रकाशित करना चाहते हैं।
    दिनेश रहेजा और जितेन्द्र कोठारी ने पुस्तकाकार रूप में आई स्क्रिप्ट में पटकथा और संवादों के साथ कुछ इंटरव्यू और लेख भी दिए हैं। पुस्तक के आरंभ में जितेन्द्र कोठारी ने ‘रोमांसिंग द पास्ट’ शीर्षक से भूमिका लिखी है, जिसमें गुरुदत्त के सिनेमा के संक्षिप्त विवरण के साथ ‘साहब बीवी और गुलाम’ का संदर्भ दिया गया है। दिनेश रहेजा ने फिल्म पर लिखे अपने लेख में इसे ढंग से विश्लेषित किया है। उन्होंने छोटी बहू और भूतनाथ के बीच के रिश्ते की पड़ताल की है। दोनों के बीच के ‘प्लूटोनिक लव’ की खासियत बताते हुए दिनेश ने सप्रसंग बताया है कि छोटी बहू और भूतनाथ का यह संबंध हिंदी फिल्मों के लिए अनोखा और पहला है। छोटी बहू के प्रति भूतनाथ के लगाव में प्रेम के साथ आदर और चिंता भी है। छोटी बहू भी भूतनाथ को अपना विश्वस्त और प्रिय मानती हैं। भूतनाथ को देखकर वह खुश होती हैं। दूसरी तरफ भूतनाथ भी छोटी बहू पर अपना अधिकार समझता है। फिल्म के कुछ कोमल और अंतरंग दृश्यों में भूतनाथ छोटी बहू को तुम कहने से भी नहीं हिचकता। छोटी बहू के संबोधन में आए इस परिवर्तन पर दिनेश रहेजा ने अपने लेख में गौर नहीं किया है। अबरार अल्वी या गुरुदत्त जीवित रहते तो बना सकते थे कि भूतनाथ क्यों और कैसे छोटी बहू को ‘आप’ के बदल ‘तुम’ कहने लगता है? भूतनाथ एक नौकर है और छोटी बहू मालकिन है। दोनों के बीच ‘प्लूटोनिक रिश्ता’ है, लेकिन फिल्म के एक दृश्य में हम देखते हैं कि शराब का ग्लास छीनने में जब भूतनाथ अचानक छोटी बहू का हाथ छू लेता है तो वह बिफर उठती हें। वह डांटती हैं कि तुमने एक परायी स्त्री का हाथ छुआ। स्पष्ट है कि तमाम अंतरंगता के बावजूद दोनों के बीच कोई शारीरिक संबंध नहीं है। स्त्री-पुरुष संबंध का ऐसा चित्रण हिंदी में दुर्लभ है। दिनेश रहेजा ने इस पुस्तक में फिल्म के गीतों को उनकी लय में ही अनूदित करने का सुंदर प्रयास किया है। गीतों का यह काव्यात्मक अनुवाद भावपूर्ण है
    इस पुस्तक में गुरुदत्त के कैमरामैन वीके मूर्ति के साथ ही वहीदा रहमान, मीनू मुमताज और श्याम कपूर के भी इंटरव्यू हैं। वीके मूर्ति और वहीदा रहमान की बातचीत से फिल्म के निर्माण की हल्की झलक मिलती है। अगर यह बातचीत और विस्तार में रहती और फिल्म की मेकिंग के अन्य पहलुओं को भी टच करती तो फिल्म के अध्येताओं और छात्रों के लिए पुस्तक अधिक उपयोगी हो जाती। फिर भी जितेन्द्र कोठारी का यह प्रयास सराहनीय है। हिंदी फिल्मों के दस्तावेजी करण पर फिल्म इंडस्ट्री के लोग ही अधिक ध्यान नहीं देते। फिल्मों पर की गई बातचीत के दौरान उनका रवैया बहुत ही कैजुअल, चलताऊ और टरकाऊ रहता है। खास कर फिल्म की रिलीज के बाद वे कोई बात नहीं करने और फिल्म की रिलीज के पहले हर बात इतनी ढकी-छिपी और सामान्य होती है कि उस से फिल्म की रचना प्रक्रिया समझ में नहीं आती। देर से ही स्क्रिप्ट का पुस्तकों के रूप में प्रकाशन के इस अभियान का स्वागत किया जाना चाहिए। हां, थोड़ा इस पर भी ध्यान देना चाहिए कि ओरिजनल स्क्रिप्ट और फिल्म में बोले गए संवाद के फर्क को रेखांकित करते हुए उसका स्पष्टीकरण भी दिया जाना चाहिए।
साहब बीबी और गुलाम
संकलन,अनुवाद,निबंध और इंटरव्यू-दिनेश रहेजा और जितेन्द्र कोठारी
प्रकाशक-ओम बुक्स
मूल्य-595 रु

Monday, November 21, 2011

आफ़त होती है औरत-विद्या बालन





-अजय ब्रह्मात्‍मज

डांसिंग गर्ल सिल्क स्मिता के जीवन से प्रेरित फिल्म द डर्टी पिक्चरमें सिल्क की भूमिका निभाने की प्रक्रिया में विद्या बालन में अलग किस्म का निखार आया है। इस फिल्म ने उन्हें शरीर के प्रति जागृत, सेक्स के प्रति समझदार और अभिनय के प्रति ओपन कर दिया है। द डर्टी पिक्चरके सेट पर ही उनसे यह बातचीत हुई।

- चौंकाने जा रही हैं आप? पर्दे पर अधिक बोल्ड और थोड़ी बदतमीज संवाद बोलते नजर आ रही हैं। क्या देखने जा रहे हम?

0 बदतमीज तो नहीं कहूंगी। यह एक बेबाक लडक़ी का किरदार है। पर्दे पर उसे दिखाने का कोई शॉर्टकट नहीं है। उसकी पर्सनैलिटी को सही कंटेक्स्ट में दिखाने के लिए ऐसा चित्रण जरूरी है। वह निडर लडक़ी थी। मैं नहीं कहूंगी कि यह सिल्क स्मिता के ही जीवन से प्रेरित फिल्म है। उस वक्त ढेर सारी डांसिंग गर्ल थीं। उनके बगैर कोई फिल्म पूरी नहीं हो पाती थी। उनके डेट्स के लिए काफी टशन रहती थी। हीरो-हीरोइन के डेट्स मिल जाते थे, लेकिन उनके गाने और समय के लिए फिल्मों की शूटिंग रुक जाती थी।

- हिंदी फिल्मों में डांसिंग गर्ल की परंपरा रही है। कुक्कू, हेलन आदि... सिल्क स्मिता के दौर में क्या खास बात थी?

0 हेलन और कुक्कू जी के जमाने में डांसिंग गर्ल की एक अलग डिग्निटी थी। नौवें दशक में डांसिंग गर्ल वास्तव में आयटम गर्ल के तौर पर इस्तेमाल होने लगीं। उस दौर में काफी लड़कियां आईं। उनमें सिल्क स्मिता पहली थीं। उन्हें सभी जानते हैं। नायलेक्स नलिनी, पॉलिएस्टर पद्मिनी आदि न जाने कितनी लड़कियां थीं, लेकिन सिल्क की बात अलग थी। इस फिल्म में मेरा नाम सिल्क ही रखा गया है। फिल्म में उनके जीवन के अंश जरूर हैं। वह अपने किस्म की पहली लडक़ी थीं। उन्होंने साफ कहा था कि मेरी बॉडी है। खुद को पॉपुलर करने या काम पाने के लिए मैं अपनी बॉडी का इस्तेमाल करूंगी मुझे इसमें कोई झिझक नहीं है। उन्होंने अपनी सेक्सुएलिटी को सेलिब्रेट किया। उस दौर में यह बहुत बड़ी बात थी। आज ढेर सारी लड़कियां पॉपुलैरिटी के लिए अपनी बॉडी और सेक्सुएलिटी का इस्तेमाल करती हैं, लेकिन उस जमाने में किसी ने बेझिझक और निडर होकर यह किया। इसके प्रति उनके मन में कोई अपराधबोध भी नहीं था। न सिर्फ कपड़ों और डांस में, बल्कि पूरे एटीट्यूड में वह बिंदास थीं। अपने काम पर उन्हें गर्व था। उन्होंने इसे शोषण की तरह नहीं लिया। पूरी समझदारी और सहमति के साथ उन्होंने अपने काम को एंज्वॉय किया। द डर्टी पिक्चरका एक संवाद उनके बारे में बताता है, ‘जिंदगी एक बार मिली है तो दो बार क्या सोचना?’ हर लम्हे का आनंद उठाती हैं सिल्क।

- द डर्टी पिक्चरआपकी पिछली फिल्म इश्कियासे काफी आगे है। क्या इस भूमिका को निभाते समय अभिनेत्री विद्या बालन के मन में कोई द्वंद्व भी रहा?

0 तब इश्कियामेरे लिए आगे की फिल्म थी। अभी द डर्टी पिक्चरकाफी आगे की फिल्म है। अभिनेत्री के तौर पर मैंने अपनी कोई सीमा तय नहीं की है। मैंने हमेशा कहा है कि अगर किरदार की जरूरत हो तो मैं कुछ भी कर सकती हूं। अगर किसी फिल्म में वेश्या का किरदार निभा रही हूं तो पहनावे और मिजाज में उसकी तरह लगूंगी। द डर्टी पिक्चरमें दर्शकों को रिझाने के लिए कुछ नहीं रखा गया है। किरदार निभाते समय मेरे मन में कोई द्वंद्व नहीं रहता। इस फिल्म के संवाद और कपड़ों में खुलापन है। इस फिल्म को करते समय मैंने महसूस किया कि जो बोल्ड और बिंदास होते हैं, वे सरल और सीधे भी होते हैं। वे डरते और मुकरते नहीं हैं। मेरे किरदार में एक मासूमियत भी है।

- इस फिल्म के लिए हां कहने की क्या वजह थी?

0 जब मिलन लूथरिया मेरे पास स्क्रिप्ट लेकर आए थे तो मैंने भी उनसे यही सवाल किया था कि मैं ही क्यों? उन्होंने कहा था कि फिल्म बन जाने के बाद मैं तुम्हें बताऊंगा कि तुम क्यों? फिलहाल मैं इस किरदार में और किसी को नहीं देख पा रहा हूं। मैंने मिलन की पिछली फिल्म वन्स अपऑन ए टाइम इन मुंबईदेखी थी। मैंने देखा कि मिलन किसी ट्रिकी सीन को भी वल्गर नहीं होने देते। इस फिल्म में वल्गैरिटी का बहुत स्कोप था, लेकिन उन्होंने बहुत संभाल कर शूटिंग की। इस फिल्म के प्रोमो देखकर लोग मुझ से कह भी रहे हैं कि मैं कहीं से भी वल्गर नहीं लग रही। उस जमाने में अंग प्रदर्शन और शरीर के झटकों में एक कामुकता और अश्लीलता रहती थी। मिलन ने यह सब नहीं होने दिया। इस फिल्म के दृश्यों को करते समय कभी नहीं लगा कि मैं गंदी या अश्लील हरकत कर रही हूं। मैंने सच्चाई के साथ किरदार को चित्रित किया। मैं भूल गई कि मेरी परवरिश क्या रही है। मैं व्यक्तिगत तौर पर क्या सोचती हूं।

- कुछ खास तैयारी करनी पड़ी? आप ने उस दौर की फिल्में देखीं या डांसिंग गर्ल का बारीक अध्ययन किया?

0 मिलन ने कहा था कि किसी तैयारी की जरूरत नहीं है। उन्होंने कहा था कि तुम हर सीन के हिसाब से रिएक्ट करना। पहले से सोच कर करोगी तो सब कुछ बनावटी और नकली दिखेगा। पहले ही दिन की शूटिंग के बाद महसूस हो गया था कि मैं किसी बंधन या दबाव में नहीं हूं। सिल्क को मैंने आत्मसात कर लिया था। मेरे लिए यह समझना जरूरी था कि बॉडी का इस्तेमाल गलत नहीं है और मेरा शोषण नहीं हो रहा है। अगर किरदार की नासमझी में होता या किसी दबाव में होता तो शोषण होता। सिल्क अपने समय से बहुत आगे थी। उसका कहना था कि यह मेरा शरीर है। मैंने अपनी मर्जी से इसका इस्तेमाल कर रही हूं। मुझे यकीन है कि फिल्म देखते समय दर्शक सिल्क की सच्चाई को समझ पाएंगे। वह कनेक्ट बन गया तो दर्शक भी किरदार को उसके बॉडी के पार जाकर देख सकेंगे।

- इस फिल्म के तीन मर्द नसीरुद्दीन शाह, इमरान हाशमी और तुषार कपूर की क्या भूमिकाएं हैं। क्या वे सिल्क के अलग-अलग पहलुओं को उद्घाटित करेंगे?

0 मैं लेखक रजत अरोड़ा का एक संवाद बोलूंगी -इतिहास में मर्दो का जमाना रहा है। औरतों ने आकर आफत की है।मर्द हर हाल में मर्द रहता है। औरत हर मर्द के साथ अपने रिश्ते के हिसाब से खुद को ढाल लेती है और फिर मैनीपुलेट करती है। वही मजेदार चीज है। औरत एक साथ मां, बेटी और बीवी होती है, लेकिन मर्द हर जगह मर्द ही रहता है। आप मानते हैं मेरी बात?

- शायद मैं सहमत न होऊं... मर्द भी रंग बदलते हैं... हो सकता है कि जेंडर भिन्नता की वजह से मैं आपकी तरह नहीं सोच सकता...

0 यह लंबा विवाद है। मर्द कभी औरत को नहीं समझ पाएंगे और औरतें भी मर्द को नहीं समझ पाएंगी। यह सिलसिला चलता रहेगा। औरत-मर्द का रिश्ता दोधारी तलवार है।

- मैं तीनों मर्दों से आप के किरदार के रिश्तों की बात पूछ रहा था...

0 नसीर बहुत ही मतलबी और स्वार्थी मर्द हैं। उनसे जरूरत का रिश्ता है। इमरान के साथ नफरत का रिश्ता है,लेकिन नफरत भी एक नजदीकी रिश्ता होता है। तुषार के साथ प्यार और संभाल का रिश्ता है। मैं तुषार को पनपने देती हूं। लेकिन तीनों ही आखिरकार मर्द हैं। उनका मेल इगोही रिश्ते को परिभाषित करता है।

- किरदार को निभाने में आप के और मिलन के अप्रोच में कोई फर्क रहा क्या? मिलन और उनके लेखक मर्द हैं। उन्होंने सिल्क के किरदार को अपने नजरिए से लिखा होगा। आप एक औरत हैं, सिल्क के किरदार को निभाते समय औरत के मिजाज को आप ने समझा होगा... कभी कोई अंतर नजर आया सोच और अप्रोच में?

0 मिलन और रजत के साथ कहानी और चरित्र को लेकर मेरी पूरी सहमति थी। उसे निभाने की जिम्मेदारी उन्होंने मुझ पर छोड़ दी थी। मिलन हमेशा कहते हैं कि 70 प्रतिशत मैं एक्टर पर छोड़ देता हूं। मैंने महसूस किया कि मिलन के साथ बहस और सवाल की जरूरत ही नहीं पड़ी, क्योंकि उन्होंने स्टोरी समझदारी और उसे चित्रित करने का काम मेरे ऊपर छोड़ दिया। इस फिल्म को देखते समय आप निर्देशक और अभिनेत्री की परस्पर समझदारी देख पाएंगे। कई बार मेरे पोट्रेयल से किरदार के नए पहलू उद्घाटित हुए। मिलन भी चौंक जाते थे कि मुझे तो कुछ नया दिखा। मैंने खुद को पूरी तरह से उनके हवाले कर दिया था। पूर्ण समर्पण... उन्हें मुझ पर विश्वास था और मुझे उन पर उतना ही विश्वास था। कभी समझ में नहीं आया तो भी मैंने उनकी बात मानी। कई बार मेरे चित्रण को उन्होंने कबूल किया। सिल्क के किरदार को निभाते समय मैंने महसूस किया कि पांच किरदारों को एक साथ जी रही हूं। वह कभी बच्ची है तो कभी औरत है। कभी सेक्सुअल एनीमल है तो कभी नार्मल औरत है।

- आप फेमिनिस्ट नहीं हैं, फिर भी क्या सिल्क का किरदार औरत की मर्यादा के बाहर है या अगर मैं पूछूं कि लाज ही औरत की कहना हैजैसी सोच के विपरीत है सिल्क का किरदार... आप क्या सोचती हैं? मैं यह सवाल औरत विद्या बालन से पूछ रहा हूं।

0 सिल्क अपनी इज्जत का खयाल रखती है। वह आत्मसम्मान को महत्व देती है। उसकी मर्जी के खिलाफ उससे कुछ नहीं करवाया जा सकता। उसे नहीं लगता कि लाज का संबंध शरीर से है। वह सच्चाई से अपना काम कर रही है और दूसरों से इज्जत चाहती है। सिल्क के व्यक्तित्व में दोहरापन नहीं है। मेरे निभाए किरदारों में एक इज्जतदार औरत है सिल्क। वह अपने औरत होने का जश्न मनाती है। वह अपने काम के लिए शरीर दिखाती है, अंग प्रदर्शन करती है, लेकिन कहती है कि उसकी वजह से आप मेरा शोषण नहीं कर सकते। मुझे बदचलन या नीच औरत नहीं कह सकते। इस फिल्म में यही कोशिश है कि सिल्क महज एक शरीर नहीं है। मर्दों का नजरिया है कि औरत या तो सीता होती है या वेश्या होती है, लेकिन जैसा कि कहा गया है... तू कौन है तेरा नाम है क्या, सीता भी यहां बदमान हुई।

- इस फिल्म में सिल्क के किरदार को निभाने की प्रक्रिया में शरीर और सेक्सुएलिटी की आप की झिझक कितनी खत्म हुई या यह बताएं कि अब आप इन चीजों को किस रूप में देखती हैं?

0 मुझे लगता है कि शरीर को लेकर मैं सहज हो गई हूं। झिझक और खत्म हुई है। शरीर को लेकर अतिरिक्त रूप से सचेत नहीं हूं अब। एक्टर विद्या भी मेरे व्यक्तित्व का हिस्सा है। इस फिल्म से मुझे मुक्ति मिली है, मैं दायरों और सीमाओं से निकल गई हूं। अब मैं बंधन रहित हूं। अगर कैरेक्टर की डिमांड हो तो मैं 200 प्रतिशत तक योगदान कर सकूंगी।

- और आगे बढ़ कर पूछूं तो क्या किसी फिल्म में न्यूड सीन भी कर सकती हैं?

0 अश्लीलता के लिए हरगिज नहीं करूंगी, लेकिन राजा रवि वर्मा के लिए म्यूजका रोल है तो जरूर करूंगी। मुझे अगर वह किरदार अच्छा लगा तो कर सकती हूं। अभी तो यही कहूंगी कि मैं खुद को न्यूड सीन में नहीं देख पाऊंगी, लेकिन अगर किसी निर्देशक ने समझा दिया तो कर भी सकती हूं। सिल्क जिंदगी के हर लम्हे को मजेदार बनाना चाहती थी। वह आफत थी। उसे कोई अपराध बोध नहीं था। मैंने उसी रूप में पर्दे पर उसे जीवंत किया है। यह फिल्म दर्शकों को अच्छी लगेगी। इसमें हम सभी की महीनों की मेहनत है। इस फिल्म में मैंने बहुत कुछ दिया है। मुझे हमेशा गर्व रहेगा कि मैंने सिल्क का किरदार निभाया। मैं बहुत खुश हूं।

- आपकी मां और बहन की क्या प्रतिक्रिया सही?

0 मां की पहली प्रतिक्रिया थी कि तुम तो बिल्कुल पहचान में नहीं आ रही हो। मेरी बहन को बहुत अच्छा लगा। उसे मेरा काम पसंद आया। उसने कहा कि इसे निभाते समय तुम झिझकती तो पर्दे पर वह अश्लील लगता। तुम ने सच्चाई के साथ किया है, वह पर्दे पर दिख रहा है।

- अगली फिल्म?

0 सुजॉय घोष की कहानीपूरी हो चुकी है। वह जनवरी में रिलीज होगी। इस बीच मेरी तबियत खराब रही, इसलिए मैंने कोई फिल्म भी नहीं साइन की।

Friday, November 11, 2011

फिल्‍म समीक्षा : रॉकस्‍टार

रॉकस्टार : हीर का मॉर्डन प्रेमी जार्डन-अजय ब्रह्मात्‍मज

युवा फिल्मकारों में इम्तियाज अली की फिल्में मुख्य रूप से प्रेम कहानियां होती हैं। यह उनकी चौथी फिल्म है। शिल्प के स्तर पर थोड़ी उलझी हुई, लेकिन सोच के स्तर पर पहले की तरह ही स्पष्ट... मिलना, बिछुड़ना और फिर मिलना। आखिरी मिलन कई बार सुखद तो कभी दुखद भी होता है। इस बार इम्तियाज अली प्रसंगों को तार्किक तरीके से जोड़ते नहीं चलते हैं। कई प्रसंगअव्यक्त और अव्याख्यायित रह जाते हैं और रॉकस्टार अतृप्त प्रेम कहानी बन जाती है। एहसास जागता है कि कुछ और भी जोड़ा जा सकता था... कुछ और भी कहा जा सकता था।

रॉकस्टार की नायिका हीर है और नायक जनार्दन जाखड़... जो बाद में हीर के दिए नाम जॉर्डन को अपना लेता है। वह मशहूर रॉकस्टार बन जाता है, लेकिन इस प्रक्रिया में अंदर से छीजता जाता है। वह हीर से उत्कट प्रेम करता है, लेकिन उसके साथ जी नहीं सकता... रह नहीं सकता। कॉलेज के कैंटीन के मालिक खटाना ने उसे मजाक-मजाक में कलाकार होने की तकलीफ की जानकारी दी थी। यही तकलीफ अब उसकी जिंदगी बन गई है। वह सब कुछ हासिल कर लेने के बाद भी अंदर से खाली हो जाता है, क्योंकि उसकी हीर तो किसी और की हो चुकी है... छिन गई है उसकी हीर। क्या इम्तियाज अली ने वारिस शाह की हीर रांझा से प्रेरित होकर इस फिल्म की कहानी लिखी है? यहां भी हीर अमीर परिवार की खूबसूरत लड़की है और रांझा की तरह जॉर्डन संगीतज्ञ है। रांझा की जिंदगी में बाबा गोरखनाथ आए थे और अलख जगा गए थे। इस फिल्म में जॉर्डन उस्ताद जमील खान के संपर्क में आता है और निजामुद्दीन औलिया की दरगाह की कव्वाली के दौरान उसके अंदर के तार बजते हैं।

ओरिजनल रांझा की तरह पूरी जिंदगी जॉर्डन भी भटकता रहता है और हीर से मिलकर भी नहीं मिल पाता।

इम्तियाज अली ने हीर रांझा की कहानी को आधुनिक परिवेश में हीर-जॉर्डन की कहानी बना दिया है। रॉकस्टार जनार्दन के जॉर्डन बनने की भी कहानी है। एक संगीतज्ञ और कलाकार की जेनेसिस के रूप में इसे देखें तो पाएंगे कि साधारण व्यक्ति की जिंदगी की साधारण घटनाएं ही कई बार व्यक्ति के अंदर असाधारण विस्फोट करती हैं और उसे विशेष बना देती है। रूपांतरण की यह घटना आकस्मिक नहीं होती। कलाकार इससे अनजान रहता है। जॉर्डन के जीवन का द्वंद्व, विरोधाभास और सब कुछ हासिल कर उन्हें गंवा देने की सहज प्रवृत्ति अविश्वसनीय होने के बावजूद स्वाभाविक है।

रॉकस्टार एक विलक्षण प्रेम कहानी भी है। हीर और जॉर्डन के बीच प्रेम पनपता है तो वह नैतिकता और अनैतिकता ही परवाह नहीं करता। दोनों अपने प्रेम की अनैतिकता को जानते हुए भी उसमें डूबते जाते हैं, क्योंकि वे विवश हैं। उनका रिश्ता सही और गलत के परे है। साथ आते ही उनके बीच जादुई रिश्ता बनता है, जो मेडिकल साइंस को भी झुठला देता है। तर्क के तराजू पर तौलने चलें तो रॉकस्टार में कई कमियां नजर आएंगी। इस फिल्म का आनंद इसके उद्दाम भावनात्मक संवेग में है, जो किनारों और नियमों को तोड़ता बहता है।।

यह फिल्म सिर्फ रणबीर कपूर के लिए भी देखी जा सकती है। रणबीर अपनी पीढ़ी के समर्थ और सक्षम अभिनेता हैं। उन्होंने जनार्दन की सादगी और जॉर्डन की तकलीफ को अचछी तरह चित्रित किया है। वे एक कलाकार के दर्द, चुभन खालीपन, निराशा, जोश, खुशी सभी भावों को दृश्य के मुताबिक जीते हैं। रॉकस्टार में उनके अभिनय के रेंज की जानकारी मिलती है। फिल्म का कमजोर पक्ष नरगिस फाखरी का चुनाव है। वह सुंदर हैं, लेकिन भावपूर्ण नहीं हैं। फिल्म के महत्वपूर्ण दृश्यों को वह कमजोर कर देती हैं। सहयोगी कलाकारों में कुमुद मिश्रा और पियूष मिश्रा उल्लेखनीय हैं। दोनों सहज, स्वाभाविक और चरित्र के अनुरूप हैं।

इस फिल्म के गीत-संगीत की चर्चा पहले से है। इरशाद कामिल ने जॉर्डन की तकलीफ को उचित शब्द दिए हैं। उन्हें ए.आर. रहमान ने भाव के अनुरूप संगीत से सजाया है।

रेटिंग- *** 1/2 साढ़े तीन स्टार

Monday, October 24, 2011

नए अंदाज का सिनेमा है रा. वन - अनुभव सिन्‍हा

-अजय ब्रह्मात्‍मज

रा. वन में विजुअल इफेक्ट के चार हजार से अधिक शॉट्स हैं। सामान्य फिल्म में दो से ढाई हजार शॉट्स होते हैं। विजुअल इफेक्ट का सीधा सा मतलब है कि जो कैमरे से शूट नहीं किया गया हो, फिर भी पर्दे पर दिखाई पड़ रहा हो। 'रा. वन' से यह साबित होगा कि हम इंटरनेशनल स्टैंडर्ड के विजुअल इफेक्ट कम लागत में भारत में तैयार कर सकते हैं। अगर 'रा. वन' को दर्शकों ने स्वीकार कर लिया और इसका बिजनेस फायदेमद रहा तो भारत में दूसरे निर्माता और स्टार भी ऐसी फिल्म की कोशिश कर पाएंगे।

भारत में 'रा. वन' अपने ढंग की पहली कोशिश है। विश्व सिनेमा में बड़ी कमाई की फिल्मों की लिस्ट बनाएं तो ऊपर की पाच फिल्में विजुअल इफेक्ट की ही मिलेंगी। भारत में 'रा. वन' की सफलता से क्रिएटिव शिफ्ट आएगा। यह भारत में होगा और मुझे पूरा विश्वास है कि यह हिंदी में होगा।

ऐसी फिल्म पहले डायरेक्टर और लेखक के मन में पैदा होती हैं। डायरेक्टर अपनी सोच विजुअल इफेक्ट सुपरवाइजर से शेयर करता है। इसके अलावा विजुअल इफेक्ट प्रोड्यूसर भी रहता है। इस फिल्म में दो सुपरवाइजर हैं। एक लास एंजल्स के हैं और दूसरे यहीं के। आम शूटिंग में जो रोल कैमरामैन प्ले करते हैं, वही रोल विजुअल इफेक्ट सुपरवाइजर का होता है। मान लीजिए, मैंने माग रखी कि मेरा एक कैरेक्टर आग के बीच से आता दिखाई पड़े। अब विजुअल इफेक्ट डायरेक्टर तय करेगा कि कैसे आर्टिस्ट को चलना है, कैसे आग शूट करना है और कैसे दोनों में मेल बिठाना है, ताकि दर्शक आर्टिस्ट को आग के बीच से आते देखकर रोमाचित हों।

विजुअल इफेक्ट दो प्रकार के होते हैं। एक में तो दर्शकों को मालूम रहता है कि यह विजुअल इफेक्ट ही है जैसे कि हवा में उड़ना या ऊंची बिल्डिंग से कूदना, लेकिन आग के बीच से आर्टिस्ट के निकलने के शॉट में पता नहीं चलना चाहिए कि विजुअल इफेक्ट है। 'जुरासिक पार्क' में अगर डायनासोर को देखते समय विजुअल इफेक्ट दिमाग में आ जाता तो मजा चौपट हो जाता।

'रा. वन' एक बाप-बेटे की कहानी है, जिसमें बाप सुपर हीरो बन जाता है। बेसिक इमोशनल फिल्म है। इस फिल्म में सुपरहीरो थोपा नहीं गया है। बच्चा, मा और सुपरहीरो तीनों ही कहानी में गुथे हुए हैं। बाप-बेटे का रिश्ता बहुत उभर कर आया है। सक्षेप में कहूं तो यह भारतीय सुपरहीरो की फिल्म है। उसकी एक फैमिली भी है। फिल्म की कहानी लदन से शुरू होती है, भारत आती है और फिर लदन जाती है।

इस फिल्म में 'रा. वन' को व्यक्तिगत तकलीफ दे दी गई है। वह तबाही पर उतारू है। इस फिल्म के लिए शाहरुख ने न कर दिया होता तो मैं लिखता भी नहीं। मैं तो प्रोड्यूसर शाहरुख खान के पास गया था। मुझे मालूम था कि प्रोड्यूसर मिला तो स्टार मिल ही जाएगा। मुझे कमिटमेंट चाहिए था। वह विजन के साथ जुड़े। तीन साल पहले 2008 में हमने 100 करोड़ की फिल्म की कल्पना की थी। मुझे ऐसा प्रोड्यूसर-एक्टर चाहिए था, जो फिल्म से जुड़े और दिल से जुड़े। इस फिल्म में दुनिया के मशहूर और अनुभवी तकनीशियनों को जोड़ा गया है। उन सभी के योगदान से फिल्म बहुत बड़ी हो गई है।

'रा. वन' शीर्षक की कहानी भी दिलचस्प है। मैं एक ऐसे खलनायक की कल्पना कर रहा था, जो अभी तक के सभी खलनायकों से अधिक खतरनाक हो। मैंने यूं ही कहा कि 10 खूाखार दिमाग मिला दें तो वह तैयार हो। वहीं से 10 सिरों के रावण का ख्याल आया और हमारे विलेन का नाम 'रा. वन' पड़ा। वही बाद में फिल्म का शीर्षक हो गया। हीरो का नाम 'जी. वन' रखने में थोड़ी परेशानी जरुर हुई, क्योंकि जीवन नामक एक्टर निगेटिव भूमिकाएं करते थे। वैसे जीवन मतलब जिंदगी है, इसलिए 'रा. वन' के खिलाफ 'जी. वन' की कल्पना अच्छी लगी।

Tuesday, October 18, 2011

बेटी एषा को निर्देशित किया हेमा मालिनी ने

-अजय ब्रह्मात्‍मज

शाहरुख खान हेमा मालिनी को अपना पहला निर्देशक मानते हैं। पहली बार शाहरुख ने उनकी फिल्म दिल आशना है के लिए ही कैमरा फेस किया था। अब 19 सालों बाद हेमा ने टेल मी ओ खुदा के साथ फिर से निर्देशन की कमान संभाली है। इस बार हेमा के कैमरे के सामने उनकी बड़ी बेटी एषा देओल हैं।

हेमा मालिनी कहती हैं, ''मुझे लगता है कि एषा को उसके टैलेंट के मुताबिक रोल नहीं मिले। वह ट्रेंड डांसर है और इमोशनल सीन भी अच्छी तरह करती है। मणि रत्नम की फिल्म युवा के छोटे से रोल में भी उसने अपनी प्रतिभा दिखाई थी। मैंने जब देखा कि वह गलत फिल्में कर और भी फंसती जा रही है तो मुझे सलाह देनी पड़ी। टेल मी ओ खुदा में एषा को आप नए अंदाज में देखेंगे। इस फिल्म में उसने डांस, एक्शन और इमोशन सीन किए हैं।''

हेमा पहले इस फिल्म से बतौर प्रोड्यूसर जुड़ीं। उन्होंने क्रिएटिव फैसलों में भी दखल रखा, लेकिन निर्देशन के लिए मयूर पुरी को चुना और उन्हें पूरी छूट दी। फिल्म के आरंभिक हिस्से देखने पर हेमा मालिनी को संतुष्टि नहीं मिली और उन्होंने निर्देशन की बागडोर अपने हाथों में ले ली।

टेल मी ओ खुदा एक ऐसी लड़की की कहानी है, जिसे पता चलता है कि वह गोद ली हुई बेटी है। इसके बाद वह अपने पिता की तलाश में देश-दुनिया में भटकती है। इस सफर में वह तीन संभावित प्रौढ़ों से मिलती है। आखिरकार उसकी मुलाकात अपने पिता से होती है, लेकिन वह अपने जीवन में आए पिता सरीखे दूसरे व्यक्तियों को नहीं भूल पाती।

हेमा खुश हैं कि एषा के पिता की भूमिकाओं के लिए उन्हें विनोद खन्ना, फारूख शेख, ऋषि कपूर और धर्मेन्द्र का सहयोग मिला। चूंकि फिल्म अभिनेत्री प्रधान है, इसलिए सहयोगी भूमिकाओं में अपेक्षाकृत छोटे स्टार अर्जन बाजवा और चंदन राय सान्याल का चुनाव किया गया है।

दो फिल्मों के अपने अनुभवों को शेयर करते हुए हेमा मालिनी कहती हैं, ''पहले हम लोग फिल्म बना कर ही अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त हो जाते थे। अभी मार्केटिंग और प्रमोशन के लिए भी जूझना पड़ता है।'' उन्हें इस बात की प्रसन्नता है कि फिल्म इंडस्ट्री के भरोसेमंद दोस्तों ने हमेशा उनका साथ दिया। टेल मी ओ खुदा के प्रमोशनल गीत के लिए सलमान खान ने समय दिया तो म्यूजिक लॉन्च के लिए शाहरुख खान आए।

Monday, October 17, 2011

रा. वन पर लगा शाहरुख खान का दांव

-अजय ब्रह्मात्मज

इन दिनों मुंबई में हर हफ्ते दो-तीन ऐसे इवेंट हो रहे हैं, जिनका 'रा. वन' से कोई न कोई ताल्लुक रहता है। टीवी शो और खबरों में भी शाहरुख खान छाए हुए हैं। कोशिश है कि हर दर्शक के दिमाग में 'रा. वन' की जिज्ञासा ऐसी छप जाए कि वह सिनेमाघरों की तरफ मुखातिब हो।

अभी तक की सबसे महंगी फिल्म 'रा. वन' की लागत 200 करोड़ को छू चुकी है। इस लागत की भरपाई के लिए 250 करोड़ का बिजनेस लाजिमी होगा। इरोस इस फिल्म के 4000 प्रिंट्स जारी करेगा। कोशिश है कि अमेरिका, इंग्लैंड और जर्मनी के पारंपरिक पश्चिमी बाजार के साथ इस बार पूरब के बाजार कोरिया, ताइवान और चीन में भी प्रवेश किया जाए। कोरिया में 'माई नेम इज खान' से मिले मार्केट को बढ़ाने के लिए 100 स्क्रीन पर 'रा. वन' लगाई जाएगी। यूरोप और लैटिन अमेरिका के बाजार पर भी शाहरुख की नजर है।

वैसे शाहरुख के लिए असल चुनौती देसी बाजार में घुसने की है। पिछले महीनों में 100 करोड़ का आंकड़ा पार करने वाली फिल्मों का अधिकांश कलेक्शन सिंगल स्क्रीन थिएटर और छोटे शहरों से आया है। इन दिनों सिंगल स्क्रीन थिएटर के आम दर्शक 60-70 प्रतिशत का योगदान कर रहे हैं। इन आम दर्शकों के बीच शाहरुख खान अधिक पॉपुलर नहीं हैं। उन्होंने अपनी फिल्मों से शहरी हीरो की इमेज हासिल की है। उनकी ब्रांडिंग और एक्टिविटी भी मैट्रो और विदेशों के दर्शकों को ध्यान में रख कर की जाती है। ऐसे में अपेक्षित आंकड़े तक उनका पहुंचना बहुत बड़ी चुनौती होगी।

शाहरुख खान ने इस चुनौती और अघोषित ललकार से बचने का सुरक्षित रास्ता चुना है। वह दूसरे खानों से अपने मुकाबले की बात चलने या बॉक्स ऑफिस कलेक्शन में 100 करोड़ की रकम पार करने के सवाल पर गोल-मोल जवाब देने लगते हैं। वह बिल के बजाए दिल की बातें करने लगते हैं और दावा करते हैं कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के विकास और भारत के गौरव के लिए उन्होंने यह फिल्म बनाई है। वह शुरू से कह रहे हैं कि फिल्म का बजट काफी बढ़ गया है और वह अपना सारा धन इसमें लगा चुके हैं। अपने चुटीले अंदाज में वे यह कहने से भी नहीं चूकते कि अगर 'रा. वन' से लाभ नहीं हो सका तो वे शादी-ब्याह में नाच कर उसकी भरपाई कर लेंगे। शादी का मौसम आने ही वाला है। यूं तो एक ट्रेड पंडित के मुताबिक शादी ब्याह में नाचने के पैसे तभी ज्यादा मिलते हैं, जब आपकी फिल्में चल रही हों। इस क्षेत्र में भी शाहरुख खान का भाव 7 करोड़ से गिर कर 4 करोड़ पर आ गया है।

फिल्म ट्रेड के विशेषज्ञ मानते हैं कि प्रोडक्ट एंडोर्समेंट, डिजीटल राइट और दूसरे किस्म के एसोसिएशन से 'रा. वन' की लागत की बड़ी रकम वापस आ जाएगी, फिर भी बॉक्स ऑफिस कलेक्शन मायने रखता है। उसी के आधार पर स्टार पावर आंका जाता है। बाजार तो पहले से शाहरुख खान के सपोर्ट में है, लेकिन असल परीक्षा सिनेमाघरों में होगी। यहां आमिर, सलमान और अजय उनसे आगे निकल चुके हैं। शाहरुख खान की फिल्मों के कलेक्शन देखें तो 'रब ने बना दी जोड़ी' ने 87 करोड़, 'ओम शांति ओम' ने 79 करोड़ और 'माई नेम इज खान' ने 72 करोड़ का व्यवसाय किया। अपनी बादशाहत बरकरार रखने के लिए जरूरी हो गया है कि किंग खान की 'रा. वन' पहले ही हफ्ते में जादुई आंकड़ा पार करते हुए जल्द से जल्द 100 करोड़ का बिजनेस करे।

'रा. वन' की तकनीकी और स्पेशल इफेक्ट गुणवत्ता का उल्लेख किया जा रहा है। शाहरुख खान ने एक अच्छा काम किया है कि इतनी बड़ी फिल्म उन्होंने भारत में बनाई। अगर 'रा. वन' दर्शकों को पसंद आती है तो इसे कल्ट और ट्रेंड बनने में समय नहीं लगेगा। फिलहाल सब कुछ 26 अक्टूबर तक अनुमानित है। देखना रोचक होगा कि यह दीवाली शाहरुख खान के कॅरियर में कितनी जगमगाहट ले आती है?

Saturday, October 15, 2011

फिल्‍म समीक्षा : मुझ से फ्रेंडशिप करोगे

फेसबुक एज का रिलेशनशिप-अजय ब्रह्मात्मज

यह फेसबुक के दौर में मुंबई की प्रेमकहानी है। एक कॉलेज के कूल किस्म के कुछ छात्रों के बीच बनते-बिगड़ते और उलझते-सुलझते रिश्तों की इस कहानी के चरित्र शहरी यूथ है। इनकी भाषा, बातचीत, व्यवहार और तौर-तरीके बिल्कुल अलग है। ये बिल्कुल अलग ढंग से खीझते और खुश होते हैं। अपने भावों को स्माइली से जाहिर करते हैं और फेक आइडेंटिटी से अपने प्रेम का खेल रचते हैं।

पूरी फिल्म फेसबुक चैट की तरह ऑनलाइन चलती रहती है। राहुल, प्रीति, विशाल और मालविका आज की पीढ़ी के चार यूथ हैं। प्रीति और विशाल कॉलेज के एक प्रोजेक्ट पर एक साथ काम कर रहे हैं। उन्हें पिछले पच्चीस सालों में कॉलेज में बने 25 जोडि़यों की कहानी लिखनी है। उन कहानियों को लिखने और डाक्युमेंट करने की प्रक्रिया में ही उनका नजरिया भी बदलता जाता है। क्लाइमेक्स सीन में विशाल लिखित संभाषण भूल जाता है और अपने दिल की बात कहता है। उसके कथन का सार है कि पहले का समय और प्रेम सच्चा और सीधा था। जब इंटरनेट और फेसबुक नहीं था तो प्रेम की कठिनाइयां उसके एहसास को बढ़ा देती थीं।

नुपूर अस्थाना पूरी फिल्म में जो दिखती और बताती हैं, उसे खुद ही फिल्म के अंत में इस एहसास से काट देती हैं कि आज का फेसबुकिया प्रेम कृत्रिम और झूठा है। लेखक-निर्देशक की सोच का यह विरोधाभास हालांकि पुराने के प्रति आदर जगाता है, लेकिन आज की लाइफ स्टाइल और सोशल मीडिया नेटवर्क के युग के संबंधों का यह अस्वीकार उचित नहीं लगता। समय बदल रहा है। प्रेम के भाव और एक्सप्रेशन बदल रहे हैं। गौर करें तो पुराने तरीके के प्रति आस्था जाहिर करने पर भी प्रीति और विशाल का प्रेम तो आज के तकनीकी संप्रेषण के युग में ही हुआ है।

मुझ से फ्रेंडशिप करोगे में चारों नए कलाकार सहज और स्वाभाविक हैं। खास कर साकिब सलीम और सबा आजाद उम्मीद जगाते हैं। निशांत दहिया और तारा डिसूजा में आकर्षण है। सहयोगी भूमिकाओं में आए नए कलाकारों का योगदान कम नहीं है।

*** तीन स्टार

फिल्‍म समीक्षा : मोड़

झरने सा कलकल प्रेम -अजय ब्रह्मात्‍मज

झरने सा कलकल प्रेम

नागेश कुकनूर अपनी सहज संवेदना के साथ मोड़ में लौटे हैं। वे सरल कहानियां अच्छी तरह चित्रित करते हैं। मोड़ उनकी संवेदनात्मक फिल्म है। इस फिल्म की प्रेमकहानी पहाड़ी इलाके के चाय बागान की पृष्ठभूमि में है। प्रकृति की मौलिक सुंदरता का आकर्षण इस फिल्म के निर्दोष प्रेम को नया आयाम देता है।

अरण्या इस कस्बे में अपने पिता के साथ रहती है। पिता किशोर कुमार के परम भक्त हैं और मदिराप्रेमी हैं। घर और कस्बा छोड़ कर जा चुकी पत्‍‌नी का वे आज भी इंतजार कर रहे हैं। इंतजार अरण्या को भी है। उसे लगता है कि इस कस्बे में उसे किसी से प्रेम हो जाएगा। प्रेम होता है, लेकिन प्रेमी के खंडित व्यक्तित्व से परिचित होने पर अरण्या का द्वंद्व बढ़ जाता है। राहुल डिसोशिऐटेड आइडेंटिटी डिसआर्डर का मरीज है, जो एंडी बन कर अरण्या से प्रेम करता है और राहुल होते ही अरण्या से घृणा करने लगता है। सच तो यह है किराहुल दिल से अरण्या को चाहता है।

नागेश कुकनूर ने आयशा टाकिया और रणविजय सिंह के सहयोग से इस मनोवैज्ञानिक और जटिल प्रेमकहानी को मासूमियत के साथ पर्दे पर उतारा है। निश्छल प्रेम की यह भावुक दास्तान है। आयशा और रणविजय दोनों ही नैचुरल और अनाटकीय हैं। उन्हें रघुवीर यादव और तन्वी आजमी का भावपूर्ण साथ मिला है। शहरों के कोलाहल से दूर पनपे इस प्रेम में पहाड़ी झरने का कलकल है। फिल्म की धीमी गति परिवेश के अनुरूप है, लेकिन फास्ट कट के आदी हो चुके दर्शकों को इसमें थोड़ी ऊब हो सकती है।

*** तीन स्टार

Thursday, October 13, 2011

बदलाव का नया एटीट्यूड है यह

यह लेख इंडिया टुडे के 'बॉलीवुड का यंगिस्‍तान' 19 अक्‍टूबर 2011 में प्रकाशित हुआ है।

-अजय ब्रह्मात्‍मज

दुनिया की तमाम भाषाओं की फिल्मों की तरह हिंदी सिनेमा में भी दस-बारह सालों में बदलाव की लहर चलती है। यह लहर कभी बाहरी रूप बदल देती है तो कभी उसकी हिलोड़ में सिनेमा में आंतरिक बदलाव भी आता है। पिछले एक दशक में हिंदी सिनेमा का आंतरिक और बाह्य बदलाव स्पष्ट दिखने लगा है, लेकिन हमेशा की तरह हमारे आलसी विश्लेषक इसे कोई नाम नहीं दे पाए हैं। स्‍वयं युवा फिल्मकार अपनी विशेषताओं और पहचान की परिभाषा नहीं गढ़ पा रहे हैं। सभी अपने ढंग से कुछ नया गढ़ रहे हैं।

राम गोपाल वर्मा की कोशिशों और फिल्मों को हम इस बदलाव का प्रस्थान मान सकते हैं। राम गोपाल वर्मा ने हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के ढांचे,खांचे और सांचे को तोड़ा। दक्षिण से अाए इस प्रतिभाशाली निर्देशक ने हिंदी सिनेमा के लैरेटिव और स्‍टार स्‍ट्रक्‍चर को झकझोर दिया। उनकी फिल्मों और कोशिशों ने परवर्ती युवा फिल्मकारों को अपनी पहचान बनाने की प्रेरणा और ताकत दी। बदलाव के प्रतिनिधि बने आज के अधिकांश युवा फिल्मकार,अभिनेता और तकनीशियन किसी न किसी रूप में राम गोपाल वर्मा से जुड़े या प्रेरित रहे। यह दीगर तथ्य है कि राम गोपाल वर्मा स्वयं बदलाव के अलाव को आग बनाकर उसमें स्वाहा होने के करीब पहुंच चुके हैं। उनके अलावा चंद युवा फिल्मकारों को अपने अंदाज में महेश भट्ट का भी स्पर्श मिला है।

अनुराग कश्यप, विशाल भारद्वाज, इम्तियाज अली, श्रीराम राघवन, अनुराग बसु, विक्रमादित्य मोटवाणे, सुभाष कपूर, अभिषेक चौबे, अभिषेक शर्मा, मनीष तिवारी, निशिकांत कामत, संजय झा, प्रवेश भारद्वाज, अमोल गुप्ते, शिवम नायर, नीरज पांडे, राजकुमार गुप्ता, राज कुमार हिरानी,जयदीप साहनी,संजय चौहान आदि दर्जनों लेखकों और फिल्मकारों की लंबी फेहरिस्त तैयार की जा सकती है। इन सभी फिल्मकारों में एक खास किस्म का एटीट्यूड है, जो उन्हें अपने पूर्वजों और बॉलीवुडके कथित युवा फिल्मकारों से अलग करता है। 21वीं सदी के पहले दशक में आए ये सभी फिल्मकार देश के विभिन्न हिस्सों से अपनी कथाभूमि और सोच लेकर फिल्मों में आए हैं। उन्हें विरासत में अवसर नहीं मिले हैं। फिल्म इंडस्ट्री तक पहुंचने में सभी को अपमान, तिरस्कार और बहिष्‍कार के पृथक अनुभवों से गुजरना पड़ा है। ये सभी हिंदी सिनेमा की विशेषताओं को अपनाते हुए कुछ नया, अलग और समकालीन फिल्मों की कोशिश में लगे हैं।

युवा पीढ़ी के ज्यादातर फिल्मकारों की कथाभूमि वास्तविक और विश्वसनीय है। वे अपने करीब के परिचित स्थान और परिवेश को फिल्मों में ला रहे हैं। नई फिल्मों के समय, काल और स्थान को हम पहचान सकते हैं। अब पहले की तरह वायवीय या किसी समय किसी स्थान का काल्पनिक चरित्र हमारे सामने नहीं होता। इस बदलाव ने फिल्मों के लार्जर दैन लाइफस्वरूप को हिला दिया है।

युवा फिल्मकार अपनी फिल्मों में प्रेम और रोमांस की अपरिहार्यता से निकल चुके हैं। एक तो इन फिल्मों के प्रमुख चरित्रों पर प्रेम का दबाव नहीं है और दूसरे फिल्मों के कथानक का मुख्य स्वर रोमांस नहीं रह गया है। प्रेम और रोमांस की जकडऩ से निकलने के कारण चरित्रों के आपसी संबंधों का समीकरण बदल गया है। समकालीन फिल्मकारों में आउट ऑफ बॉक्सथीम पर काम करने का साहस बढ़ा है।

समकालीन युवा फिल्मकारों की पहचान और उदाहरण के लिए उड़ानकाफी है। उड़ानकी निर्माण प्रक्रिया और मिली पहचान के विस्तार में जाने पर हम नई कोशिशों को अच्छी तरह समझ सकते हैं। उड़ाननिजी प्रयासों से नए विषय पर बनी एक ऐसी फिल्म थी, जिसे कारपोरेट हाउस का समर्थन मिला। उड़ानएक ओर कान फिल्म फेस्टिवल और दूसरी ओर देश के सिनेमाघरों में आम फिल्मों की तरह रिलीज होकर दर्शकों तक भी पहुंची। उड़ानसंकेत है कि भविष्य का... बशर्ते हमारे फिल्मकार हिंदी फिल्मों के भ्रष्ट आचरण और लोभ के दुष्‍चक्र से बचे रह सकें। दिक्कत यह है कि सीमित पहचान मिलने के साथ ही बड़ी कामयाबी की लालसा में अधिकांश युवा फिल्मकार दिग्‍भ्रमित हो जाते हैं।

युवा फिल्‍मकारों की दुविधा और चुनौतियां बढ़ी हैं। पहली फिल्‍म के लिए निर्माता जुआने के साथ उनका संघर्ष खत्‍म नहीं होता। उन्‍हें हर नयी फिल्‍म के साथ अपनी काबिलियत की परीक्षा देनी होती है। परिवर्त्‍तन के हिमायती फिल्‍मकार अड़चनों और मुश्किलों के बावजूद नवीनता के नैरंतर्य के संवाहक हैं।

Saturday, June 25, 2011

फिल्म समीक्षा : डबल धमाल

डबल मलाल
-अजय ब्रह्मात्मज

इन्द्र कुमार की पिछली फिल्म धमाल में फिर भी कुछ तर्क और हंसी मजाक था। इस बार उन्होंने सब कुछ किनारे कर दिया है और लतीफों कि कड़ी जोड़ कर डबल धमाल बनायीं है। पिछली फिल्म के किरदारों के साथ दो लड़कियां जोड़ दी हैं। कहने को उनमें से एक बहन और एक बीवी है, लेकिन उनका इस्तेमाल आइटम ग‌र्ल्स की तरह ही हुआ है। मल्लिका सहरावत और कंगना रानौत क निर्देशक ने भरपूर अश्लील इस्तेमाल किया है। फिल्म हंसाने से ज्यादा यह सोचने पर मजबूर करती है की हिंदी सिनेमा क नानसेंस ड्रामा किस हद तक पतन कि गर्त में जा सकता है। अफसोस तो यह भी हुआ की इस फिल्म को मैंने व‌र्ल्ड प्रीमियर के दौरान टोरंटो में देखा। बात फिल्म से अवांतर हो सकती है, लेकिन यह चिंता जगी की आइफा ने किस आधार पर इसे दुनिया भर के मीडिया और मेहमानों के सामने दिखाने के लिए सोचा। इसे देखते हुए डबल मलाल होता रहा। फिल्म में चार नाकारे दोस्त कबीर को बेवकूफ बनाने की कोशिश करने में लगातार खुद ही बेवकूफ बनते रहते हैं। उनकी हर युक्ति असफल हो जाती है। चारों आला दर्जे के मूर्ख हैं। कबीर भी कोई खास होशियार नहीं हैं, लेकिन जाहिर सी बात है कि वे इन चारों के दांव समझ जाते हैं और हमेशा उनको पछाड़ देते हैं। दर्शकों को फिल्म के अंत में उन्होंने यह सूचना दे दी है कि वे इसकी अगली कड़ी के रूप में टोटल धमाल भी लेकर आयेंगे। दर्शकों ने इस फिल्म को पसंद कर लिया तो उनका मनोबल बढेगा और यह लगेगा कि दर्शक ऐसी ही बेसिर-पैर की फिल्में देखना चाहते हैं। वैसे इधर ऐसी फिल्मों के प्रति निदेशकों और दर्शकों क रुझान बाधा है।

फिल्म के एक ट्रैक में सतीश कौशिक स्वामी बाटानंद बनते हैं। अंडरव‌र्ल्ड के टपोरी के बाबा बनने और टपोरी भाषा में प्रवचन देने का प्रसंग रोचक है। सतीश कौशिक उम्दा अभिनेता हैं। उन्होंने इस भूमिका में प्रभावित किया है। चारों बेवकूफ में रितेश ने अपने रेंज की जानकारी दी है। दु:ख इसी बात का है कि एक साधारण से भी कमतर फिल्म में उन्हें यह मौका मिला है। अरशद वारसी में दोहराव बढ़ गया है। वे एक ही अंदाज में संवाद बोलते हैं। गोलमाल, मुन्नाभाई और धमाल के किरदारों में प्यार फर्क तो रखते।

जावेद जाफरी और आशीष चौधरी के बारे में कुछ भी कहने लायक नहीं है। संजय दत्त ऐसी भूमिकाओं के उस्ताद हो गए हैं, क्या उन्हें ऊब नहीं होती? मल्लिका और कंगना ने खुद को इस्तेमाल होने दिया है, कॉमेडी के नाम पर उनसे अंग प्रदर्शन और द्विअर्थी संवादों क निशाना बनाया गया है। दावा तो यह था कि उनकी वजह से डबल धमाल होगा।

रेटिंग- *1/2 डेढ़ स्टार

Monday, May 23, 2011

ऑन स्क्रीन,ऑफ स्क्रीन : बिंदास और पारदर्शी बिपाशा बसु

जीनत और परवीन बॉबी का मेल हैं बिपाशा-अजय ब्रह्मात्मज

संबंधों और अपने स्टेटस में पारदर्शिता के लिए मशहूर बिपाशा बसु आजकल नो कमेंट या चुप्पी के मूड में हैं। वजह पूछने पर कहती हैं, पूछे गए सारे सवालों का एक ही सार होता है कि क्या जॉन और मेरे बीच अनबन हो गई है? शुरू से ही अपने संबंधों को लेकर मैं स्पष्ट रही हूं। अब उसी स्पष्टता से दिए गए जवाब लोगों को स्वीकार नहीं हैं। उन्हें तो वही जवाब चाहिए, जो वे सोच रहे हैं या कयास लगा रहे हैं। मुझे यकीन है कि फिल्म रिलीज होगी और तमाम अफवाहें ठंडी हो जाएंगी। बेहतर है कि मैं अपने काम पर ही ध्यान दूं।

अफवाहों की परवाह नहीं

दरअसल, पिछले महीने फिल्म दम मारो दम के अभिनेता राणा दगुबट्टी के साथ उनकी अंतरंगता की चर्चा रही। मुमकिन है, किसी पीआर एक्जीक्यूटिव ने फिल्म के दौरान बने नए रिश्ते के पुराने फॉम्र्युले का इस्तेमाल किया हो और वह फिर से कारगर हो गया हो। हिंदी फिल्मों में रिलीज के समय प्रेम और अंतरंगता की अफवाहें फैलाई जाती हैं। सच्चाई पूछने पर बिपाशा स्पष्ट करती हैं, युवा अभिनेताओं के साथ काम करते समय मेरी कोशिश रहती है कि वे झिझकें नहीं। इसके लिए जरूरी है कि उनसे समान स्तर पर दोस्ती की जाए। बचना ऐ हसीनों में अभिनेता रणबीर कपूर, आ देखें जरा के समय नील नितिन मुकेश और दम मारो दम के दौरान राणा दगुबट्टी के साथ मैंने यही किया। अब किसी ने राणा के साथ फिल्म के लिए शूट किए गए फोटो डालकर अफवाह फैला दी है। फिल्म के दृश्य को कोई वास्तविक समझे तो कुछ नहीं किया जा सकता। बिपाशा के इस स्वभाव का खुलासा उनके निकट सहयोगी करते हैं। एक सहयोगी बताते हैं कि फिल्म बचना ऐ हसीनों की पब्लिसिटी कैंपेन के दौरान अपनी कोलकाता यात्रा में बिपाशा ने रणबीर कपूर का पूरा खयाल रखा था और उन्हें बंगाली खूबियों से परिचित कराया था। नील नितिन मुकेश के साथ भी उनकी घनिष्ठता की खबरें छपी थीं।

प्रोफेशनल नजरिया

सह-कलाकारों, परिवार के सदस्यों और सहयोगियों के प्रति बिपाशा का व्यवहार सरल और सहज रहता है। निर्देशक उनकी साफगोई की कद्र करते हैं और कहते हैं कि बिपाशा किसी प्रोडक्ट, विज्ञापन या मॉडलिंग के लिए हां कहने में थोडा समय भले ही लगा दें, लेकिन एक बार सहमति के बाद वह नखरे नहीं दिखातीं। इसके कारण न तो किसी को कोई दिक्कत होती है और न कभी काम रुकता है। मैंने शूटिंग के दरम्यान देखा है कि उनका सारा ध्यान डायरेक्टर के निर्देशों पर रहता है। सीन तैयार होते ही जब उनकी बुलाहट होती है तो वह देर नहीं करतीं। आमतौर पर आर्टिस्ट पहले-दूसरे बुलावे के आग्रह को नजरअंदाज करते हैं। इस विलंब से उनका अहं भले ही तुष्ट होता हो, लेकिन सेट की एनर्जी में खलल पडता है।

बिपाशा इस बात का भी पूरा खयाल रखती हैं कि फिल्मों के सेट पर किसी और को एंटरटेन न करें। गोवा में आल द बेस्ट की शूटिंग के दौरान उनकी इस आदत के कारण बमुश्किल ही उनसे मेरी बातचीत हो पाई थी। बिपाशा सवालों से परहेज नहीं करतीं। पूछे गए हर सवाल का जवाब देना उनकी फितरत है।

कम उम्र में परिपक्वता

सिर्फ 17 साल की उम्र में बिपाशा बसु सुपर मॉडल बन गई थीं। देश-विदेश की सैर और बडे शहरों में हो रहे आयोजनों में शरीक होने से उनकी झिझक खुलती गई। वह समझदार और दुनियादार हो गई। आरंभिक दिनों में एक इंटरव्यू में उन्होंने मुझसे कहा था, जिस उम्र में लडकियां प्रेमपत्र लिखती हैं या किसी दोस्त की तसवीरें किताबों के बीच छिपाती फिरती हैं, उस उम्र में मैं दुनिया घूम रही थी। तरह-तरह के लोगों से मिल रही थी और देख रही थी कि इस दुनिया में क्या-क्या हासिल किया जा सकता है। मैंने छोटी उम्र से ही कमाना शुरू कर दिया। उसकी वजह से मेरा आत्मविश्वास बढा और मैं अपनी उम्र से कहीं अधिक परिपक्व हो गई।

उनके सामने विकल्प था कि विदेश में रह कर इंटरनेशनल सुपरमॉडल बनें और मॉडलिंग में अपने करियर को नई ऊंचाई पर ले जाएं या भारत लौट कर कुछ करें। बिपाशा ने प्रियजनों के बीच भारत लौटने का फैसला किया और मुंबई को ठिकाना बनाया। फैसला इस सोच पर आधारित था कि माडलिंग के साथ-साथ फिल्मों में भी हाथ आजमाया जाए।

अफेयर और मुश्किलें

उन दिनों डिनो मोरिया उनके दोस्त थे। दोस्ती का यह सिलसिला बाद में थम गया। बिपाशा व्यस्त होती गई। फिल्मी लोगों से मुलाकातों का सिलसिला बढा। विनोद खन्ना ने हिमालय पुत्र में अपने बेटे अक्षय खन्ना के साथ उन्हें पेश करने का प्रस्ताव दिया। कुछ कारणों से बात नहीं बनी। फिर जया बच्चन ने उन्हें अभिषेक बच्चन की जोडी के लिए उपयुक्त समझा। जेपी दत्ता अभिषेक के साथ आखिरी मुगल की तैयारी कर रहे थे। उन्हें भी बिपाशा जंचीं, लेकिन आखिरी मुगल भी फ्लोर पर नहीं जा सकी। जेपी दत्ता ने अभिषेक व करीना कपूर को रिफ्यूजी में लॉन्च किया। बिपाशा के सपनों को ठेस लगी। फिर भी कुछ समय तक वह इस आश्वासन के भरोसे रहीं कि दत्ता उनके साथ फिल्म शुरू करेंगे। यही कारण है कि जब अब्बास मस्तान के साथ तलाश का ऑफर मिला तो उन्होंने मना नहीं किया। इसके बाद फिल्म अजनबी आई। इसमें करीना कपूर, अक्षय कुमार और बॉबी देओल के साथ उन्हें पहला मौका मिला था। इस फिल्म की शूटिंग के दरम्यान उन्हें करीना कपूर की फब्तियां सहनी पडी थीं। फिल्म यूनिट से मिली अवहेलना और अपमान को नजरअंदाज कर बिपाशा ने सिर्फ अपने काम पर ध्यान दिया।

बगैर किसी गॉडफादर के बिपाशा ने इंडस्ट्री में अपनी जगह बनाई, जहां बाहर से आई हुई लडकियों के ख्वाब दरक जाते हैं, बिपाशा को स्वयं पर विश्वास था। उन्हें अपनी सेक्सी इमेज का एहसास था।

आत्मविश्वास से भरपूर

बिपाशा एक नदी का नाम है। इसका मतलब घनी और गहरी इच्छाएं भी होता है। नदी की तरह कलकल व्यक्तित्व है बिपाशा का। आप गौर करें तो वह कभी सिमटकर नहीं चलतीं। ऊपर से नीचे तक पूरी देह पर उनका नियंत्रण बना रहता है। इस खुलेपन के बावजूद उनकी चाल-ढाल में उच्छृंखलता नहीं हैं। जिस्म में उन्होंने कामुक सोनिया खन्ना का किरदार निभाया था। इसके क्लाइमेक्स में वह बोलती हैं, यह जिस्म प्यार नहीं जानता। जानता है सिर्फ भूख.. तो वह अश्लील या फूहड नहीं लगतीं। इस एक फिल्म ने बिपाशा बसु को खास पहचान दी।

गौर करें तो जीनत अमान और परवीन बॉबी का संयुक्त संस्करण लगती हैं बिपाशा। सेक्सी इमेज के साथ उन्होंने अपनी गरिमा भी बनाए रखी है। दूसरी हीरोइनों की तरह उन्हें बेवजह अंग प्रदर्शन करने या भडकाऊ स्टेटमेंट देने की जरूरत कभी नहीं महसूस हुई। उनकी इस छवि का इस्तेमाल एक तरफ नो एंट्री तो दूसरी ओर ओमकारा जैसी फिल्मों में अलग शैली और शिल्प के फिल्मकारों ने किया। इन फिल्मों में एक अलग ही बिपाशा नजर आई।

अदाओं का जादू

अनीस बज्मी और विशाल भारद्वाज के आयटम गीतों में बिपाशा का व्यक्तित्व ही सबसे बडा आकर्षण है। वह कुशल डांसर नहीं हैं, लेकिन अपनी अदाओं और देहयष्टि से ऐसे गानों में समुचित मादक प्रभाव पैदा कर लेती हैं। बिपाशा स्वीकारती हैं, मैं ट्रेड डांसर नहीं हूं। कोरियोग्राफर की मदद से फिल्मों के लिए आवश्यक लटके-झटके सीख गई हूं। मैं मानती हूं कि पर्दे पर सेक्सी दिखने के लिए यह बिलकुल जरूरी नहीं है कि आप फूहड हरकतें करें।

फिल्मों में काम करते हुए बिपाशा को दस साल हो गए हैं। अजनबी 2001 में आई थी। फिल्मों की संख्या और कामयाबी के लिहाज से उनका करियर उल्लेखनीय नहीं कहा जा सकता, क्योंकि वह अपनी इमेज और सीमाओं के कारण कम ही फिल्मों में जंचती हैं। बीच में उन्होंने कुछ गलत फिल्में चुनीं और उनका खमियाजा भी भुगता।

समझदारी व परिपक्वता

अब बिपाशा बसु समझदार हो चुकी हैं। अपनी इमेज बदलने के लिए उन्होंने प्रकाश झा की अपहरण में मिडिल क्लास की घरेलू लडकी मेघा का किरदार निभाया था। मधुर भंडारकर की कॉरपोरेट में वह दबंग बिजनेस टायकून थीं। उन्होंने लमहा और आक्रोश जैसी फिल्में भी कीं। दोनों में उनकी ग्लैमर-रहित भूमिकाएं थीं। पिछले दिनों हुई मुलाकात में इन फिल्मों के प्रति अपने प्रशंसकों की प्रतिक्रिया शेयर करते हुए उन्होंने अपनी बात रखी, मुझे लगता है कि मेरे प्रशंसक मुझे कमजोर और पराजित किरदारों में नहीं देखना चाहते। उनकी भावनाओं का खयाल रखते हुए मैंने तय किया कि ग्लैमरहीन भूमिकाओं में भी मैं ध्यान रखूंगी कि वे किरदार मजबूत हों। नई फिल्म सिंगुलैरिटी मेरी ऐसी ही एक फिल्म होगी।

जॉन के साथ-साथ

जॉन अब्राहम से उनकी पहली नजदीकी आगे-पीछे बनी ऐतबार व जिस्म के सेट पर हुई थी। नजदीकी दोस्ती और फिर दोस्ती प्रेम में तब्दील हुई। तब से वह जॉन के साथ हैं। दोनों फिल्म इंडस्ट्री के पहले प्रेमी युगल हैं, जिन्होंने विवाह के औपचारिक बंधन में बंधे बगैर ही परस्पर समर्पण और प्रेम का खुलेआम इजहार किया। बिपाशा ने कभी अपने संबंधों पर पर्दा नहीं डाला। वह शुरू से ही अपने संबंधों को लेकर स्पष्ट रही हैं। मुंबई में जॉन और बिपाशा स्थायी तौर पर एक छत के नीचे नहीं रहते। दोनों के पते भी अलग हैं, लेकिन उनका जुडाव और लगाव पति-पत्नी से कम नहीं है।

संबंधों का यह एक नया समीकरण है, जो बाद में फिल्म इंडस्ट्री और समाज में प्रचलित हुआ है। लिव-इन-रिलेशनशिप से अलग आयाम है इस रिश्ते का। न कोई बंधन और न कानूनी जकडन.. दो वयस्क और समझदार व्यक्ति एक-दूसरे से समर्पित प्रेम करने के साथ अपने करियर और परिवार की जिम्मेदारियों का बखूबी निर्वाह कर रहे हैं। पुरुष होने के कारण जॉन अब्राहम के लिए यह सब आसान हो सकता है, लेकिन बिपाशा ने लडकी होने के बावजूद इस तरह के संबंधों में जीने का साहस दिखाया है।

सुंदर दिखना है पसंद

बिपाशा बसु को साज-सिंगार बहुत पसंद है। किसी भी अवसर पर उन्हें बेतरतीब नहीं देखा जा सकता। वह मानती हैं,सार्वजनिक जीवन में होने के कारण यह हमारा दायित्व बनता है कि हम सज-धज कर ही लोगों के सामने आएं। हम सुंदर और आकर्षक दिखते हैं तो प्रशंसकों को खुशी मिलती है। अपने इस आग्रह के बावजूद बिपाशा अपनी फिल्मों में मेकअप और एंगल के लिए बहुत अधिक परेशान नहीं रहतीं। उनके मुताबिक, डायरेक्टर को अच्छी तरह मालूम रहता है कि हमें किस रूप और अंदाज में पेश करना है। किरदार के अनुकूल ही लुक और प्रेजेंटेशन होना चाहिए।

बिपाशा के साथ कई फिल्में कर चुके निर्माता-निर्देशक महेश भट्ट उनकी तारीफ करते हैं। वह कहते हैं, बंगाल से आई इस सांवली सी लडकी को मालूम है कि पर्दे पर सुंदर दिखने से अधिक जरूरी है अपने किरदार में दिखना। राज में पति के रक्षक के तौर पर आई एक घरेलू औरत और जिस्म की सेक्सी लडकी सोनिया का किरदार बिपाशा ही निभा सकती थी। खासकर जिस्म के किरदार को आत्मसात करना किसी भी अभिनेत्री के लिए बडी चुनौती हो सकती है। इस फिल्म के बोल्ड दृश्यों में भी सिर्फ अपने विश्वास के कारण ही बिपाशा अश्लील नहीं लगतीं।