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Saturday, August 12, 2017

फिल्‍म समीक्षा : टॉयलेट- एक प्रेम कथा



फिल्‍म रिव्‍यू
शौच पर लगे पर्दा
टॉयलेट एक प्रेम कथा
-अजय ब्रह्मात्‍मज
जया को कहां पता था कि जिस केशव से वह प्‍यार करती है और अब शादी भी कर चुकी है...उसके घर में टॉयलेट नहीं है। पहली रात के बाद की सुबह ही उसे इसकी जानकारी मिलती है। वह गांव की लोटा पार्टी के साथ खेत में भी जाती है,लेकिन पूरी प्रक्रिया से उबकाई और शर्म आती है। बचपन से टॉयलेट में जाने की आदत के कारण खुले में शौच करना उसे मंजूर नहीं। बिन औरतों के घर में बड़े हुआ केशव के लिए शौच कभी समस्‍या नहीं रही। उसने कभी जरूरत ही नहीं महसूस की। जया के बिफरने और दुखी होने को वह शुरू में समझ ही नहीं पाता। उसे लगता है कि वह एक छोटी सी बात का बतंगड़ बना रही है। दूसरी औरतों की तरह अपने माहौल से एडजस्‍ट नहीं कर रही है। यह फिल्‍म जया की है। जया ही पूरी कहानी की प्रेरक और उत्‍प्रेरक है। हालांकि लगता है कि सब कुछ केशव ने किया,लेकिन गौर करें तो उससे सब कुछ जया ने ही करवाया।
टॉयलेट एक प्रेम कथा रोचक लव स्‍टोरी है। जया और केशव की इस प्रेम कहानी में सोच और शौच की खल भूमिकाएं हैं। उन पर विजय पाने की कोशिश और कामयाबी में ही जया और केशव का प्रेम परवान चढ़ता है। लेखक सिद्धार्थ-गरिमा ने जया और केशव की प्रेम कहानी का मुश्किल आधार और विस्‍तार चुना है। उन्‍होंने आगरा और मथुरा के इलाके की कथाभूमि चुनी है और अपने किरदारों का स्‍थानीय रंग-ढंग और लहजा दिया है। भाषा ऐसी रखी है कि स्‍थानीयता की छटा मिल जाए और उसे समझना भी दुरूह नहीं हो। उच्‍चारण की शुद्धता के बारे में ब्रजभूमि के लोग सही राय दे सकते हैं। फिल्‍म देखते हुए भाषा कहीं आड़े नहीं आती। उसकी वजह से खास निखार आया है।
जया बेहिचक प्रधान मंत्री के स्‍वच्‍छ भारत अभियान की थीम से जुड़ी यह फिल्‍म सदियों पुरानी सभ्‍यता और संस्‍कृति के साच पर सवाल करती है। लेखकद्वय ने व्‍यंग्‍य का सहारा लिया है। उन्‍होंने जया और केशव के रूप में दो ऐसे किरदारों को गढ़ा है,जो एक-दूसरे से बेइंतहा प्रेम करते हैं। सिर्फ शौच के बारे में उनकी सोच अलग-अलग है। केशव की सोच में कभी शौच का सवाल आया ही नहीं,क्‍योंकि बचपन से उसने खुले में शौच की ही नित्‍य ्रिया माना और समझा। जया के बिदकने पर भी शौच की जरूरत उसके पल्‍ले नहीं पड़ती। उसे जया की मांग का एहसास बाद में होता है। फिर तो वह एड़ी-चोटी का जोड़ लगा देता है। गांव और आसपास की महिलाएं जागृत होती हैं और शौच एक अभियान बन जाता है।
ऐसी फिल्‍मों के साथ खतरा रहता है कि वे डाक्‍यूमेंट्री न बन जाएं। या ऐसी उपदेशात्‍मक न हो जाएं कि दर्शक दुखी हो जाएं। निर्देशक श्रीनारायण सिंह संतुलन बना कर चलते हैं। उन्‍हें अपने कलाकारों और लेखकों का पूरा सहयोग मिला है।
फिल्‍म के संवाद चुटीले और मारक हैं। परंपरा और रीति-रिवाजों के नाम पर चल रह कुप्रथा पर अटैक करती यह फिल्‍म नारे लगाने से बची रहती है। एक छोर पर केशव के पिता पंडिज्‍जी हैं तो दूसरे छोर पर जया है। इनके बीच उलझा केशव आखिरकार जया के साथ बढ़ता है और बड़े परिवर्तन का कारक बन जाता है। पढ़ी-लिखी जया एक तरह से गांव-कस्‍बों में नई सोच के साथ उभरी लड़कियों का प्रतिनिधित्‍व करती है। वह केशव से प्रेम तो करती है,लेकिन अपने मूल्‍यों और सोच के लिए समझाौते नहीं कर सकती। और चूंकि उसकी सोच तार्किक और आधुनिक है,इसलिए हम उसके साथ हो लेते हैं। हमें केशव से दिक्‍कत होने लगती है। लेखकों ने केशव के क्रमिक बदलाव से कहानी स्‍वाभाविक रखी है। हां,सरकारी अभियान और मंत्रियों की सक्रियता का हिस्‍सा जबरन डाला हुआ लगता है। उनके बगैर या उनके सूक्ष्‍म इस्‍तेमाल से फिल्‍म ज्‍यादा असरदार लगती।
अक्षय कुमार ने केशव के रिदार को समझा है। उन्‍होंने उस किरदार के लिए जरूरी भाव-भंगिमा और पहनावे पर काम किया है। लहजे और संवाद अदायगी में भी उनकी मेहनत झलकती है। जया की भूमिका में भूमि पेडणेकर जंचती हैं। उन्‍होंने पूरी सादगी और वास्‍तविकता के साथ इस किरदार को निभाया है। उनके सहज अभिनय में जया भादुड़ी की झलग है। ग्‍लैमर की गलियों में वह नहीं मुड़ीं तो हिंदी फिल्‍मों को एक समर्थ अभिनेत्री मिल जाएगी। इस फिल्‍म की जान हैं पंडिज्‍जी यानी सुधीर पांडे। उन्‍होंने अपने किरदार को उसकी विसंगतियों को ठोस विश्‍वास के साथ निभाया है। छोटे भाई के रूप में दिव्‍येन्‍दु समर्थ परक और सहयोगी हैं। जया के मां-पिता के रूप में आए कलाकार भी स्‍वाभाविक लगे हैं। अनुपम खेर अपने अंदाज के साथ यहां भी हैं।
पर्दा सोच से हटा कर शौच पर लगाने का टाइम आ गयो।
अवधि- 161 मिनट
**** चार स्‍टार    

Sunday, August 6, 2017

गूगल बता रहा है गंभीर है समस्‍या - अक्षय कुमार



स्‍वच्‍छता अभियान की पृष्‍ठभूमि में एक प्रेहम कथा
-अजय ब्रह्मात्‍मज
अक्षय कुमार की टॉयलेट एक प्रेम कथा रिलीज हो रही है। हाल ही में इस फिल्‍म के पांच टीजर रिलीज किए गए,जिनसे फिल्‍म का फील मिल रहा है। यह एहसास बढ़ रही है कि अक्ष्‍य कुमार की यह फिल्‍म मनोरंजक लव स्‍टोरी होने के साथ ही एक जरूरी संदेश भी देगी। संदेश है स्‍वच्‍छता का,संडास का...हम सभी की दैनिक नित्‍य क्रियाओं में सबसे महत्‍वपूर्ण और आवश्‍यक शौचालय की उचित चर्चा नहीं होती। अक्षय कुमार की इस फिल्‍म ने शौचालय की जरूरत और अभियान की तरफ सभी का ध्‍यान खींचा है। रिलीज से पहले अक्षय कुमार इस फिल्‍म के प्रचार के लिए सभी प्‍लेटफार्म का इस्‍तेमाल कर रहे हैं। उनसे यह बातचीत फिल्‍मसिटी से जुहू स्थित उनके आवास की यात्रा के दौरान हुई।
-देश में अभी स्‍वच्‍छता अभियान चल रहा है। आप की फिल्‍म टॉयलेट एक प्रेम कथा का विषय भी स्‍वच्‍छता से जुड़ा है। क्‍या उस अभियान और इस फिल्‍म में कोई संबंध है?
0 स्‍वच्‍छता,क्लीनलीनेस,टॉयलेट...या संडास कह लें। कुछ भी कहें और करें...मकसद एक ही है कि भारत को स्‍वच्‍छ करना है। अभी वह सबसे महत्‍वपूर्ण मुहिम है। आम धारणा है कि यह गांवों की समस्‍या है। वहां शौचालय नहीं हैं। यह शहरों की भी उतनी ही बड़ी समस्‍या है। महानगरों में भी खुले में शौच होता है। रेल की पटरियों,पाईप के ऊपर-नीचे,समुद्र के किनारे आप का लोग मिल जाएंगे। हां,कुछ लोगों की शौचालय बनाने की हैसियत नहीं होती। हमारी सरकार इस दिशा में बहुत कुछ कर रही है। हमारी फिल्‍म का विषय उन लोगों से संबंधित है,जिनकी नियत नहीं है। वे शौचालय नहीं बनाना चाहते। वे खुले में शौच की वकालत भी करते हैं।खुले में शौच की गंदगी और बीमारी के चपेट में सभी आते हैं1 शहरों में तो बीमारी और भी तेजी से फैलती है।
-ऐसे गंभीर विषय पर फिल्‍म बनाना सचमुच चुनौती रही होगी और आप का इससे जुड़ना भी रोचक है...
0मैंने इस विषय के बारे में सुन रखा था। फिल्‍म की कहानी के बारे में जानने के बाद मुद्ददे के विस्‍तार में गया तो और भी जानकारियां मिलीं। देश की 54 प्रतिशत आबादी के पास शौचालय नहीं है। हर पांच मिनट के बाद एक बच्‍चे की मौत इसी वजह से होती है। खतरनाक स्थिति है। गूगल सर्च में कई अच्‍छी बातों में हम दुलनया में आगे और ऊपर हैं,लेकिन शर्म की बात है कि खुले शौच में भी हम बहुत ऊपर है। हमें जितनी जल्‍दी हो खुले में शौच की आदत और मजबूरी को खत्‍म करना चाहिए। इस फिल्‍म से जुड़ने की वजह यही मंशा है।
-कहीं न कहीं यह लगता है कि शौचालय सिर्फ गरीबी से जुड़ा मसला नहीं है। इसके प्रति हमारी लापरवाही खास मानसिकता की वजह से है....
0बिल्‍कुल। वे गलतफहमी और पुरानी सोच में जकड़े हुए हैं। मैं पूछता हूं,जो यह तर्क देते हैं कि खाना बनाने और खाने की जगह पर टॉयलेट नहीं बनवाएंगे। वे फिर खाना उगाने की जगह पर शौच के लिए कैसे राजी हो जाते हैं?
- इस मुद्दे को अपनी फिल्‍म में कैसे पिरोया है?
0 शौचालय फिल्‍म के बैकग्राउंड में है। फोर ग्राउंड में लवस्‍टोरी है। एक सीधी सी बात कहता हूं कि शाहजहां ने अपनी बेगम मुमताज के लिए ताजमहल बनवा दिया। क्‍या हम अपनी बीवियों के लिए संडास नहीं बनवा सकते। अगर अपने प्‍यार के लिए यह भी नहीं कर सकते तो लानत है। शौचालय न होने से घर की औरतें कितनी मुसीबतें झेलती हैं। उन्‍हें सूरज उगने से पहले और सूरज डूबने के बाद खेतों की तरफ जाना पड़ता है। दिन भर वे खुद को रोक कर पेट में बीमारियों को जन्‍म दे रही होती हैं। परिवार की औरतों की समस्‍या पर ध्‍यान दें। एक ओर घूघट की बात करते हैं और दूसरी ओर उन्‍हें साड़ी उठा कर खुले में बैठने को मजबूर करते हैं। मर्द तो कहीं भी खड़े हो जाते हैं। फिल्‍म की कहानी हकीकत है। मैं खुद ऐसे 8-10 व्‍यक्तियों और परिवारों को जानता हूं।
-मैंने सुना है कि पहले यह छोटी फिल्‍म थी। आप के जुड़ने के बाद यह बड़ी और चर्चित हो गई है?
0 आप को पता है साढ़ चार साल यह स्क्रिप्‍ट फिल्‍म इंडस्‍ट्री में घूती रही। किसी स्‍टार ने हां नहीं कहा। मुझे पता चला तो नीरज पांडेय से रिक्‍वेस्‍ट कर मैंने यह फिल्‍म ली। इसे श्रीनारायण सिंह डायरेक्‍ट कर रहे हैं। मैंने अभी तक 20-21 नए डायरेक्‍टरों के साथ काम किया है।
-नए डायरेक्‍टर के साथ केमेस्‍ट्री कैसे बनती है? आप की कोई मांग रहती है?
0फिल्‍म के लिए हां कहते ही रिश्‍ता बनने लगता है। कहानी सुनाने के लिए उन्‍हें सुबह चार बजे बुला लेता हूं तो वे सिर पीट कर आते हैं। फिर हम दोनों ब्‍लेंड करना शुरू करते हैं। एक-दूसरे के हिसाब से ढलते हैं। नए डायरेक्‍टर कुछ कर दिखाना चाहते है। उनकी इस कोशिश में मुझे अच्‍छी फिल्‍म मिल जाती है। मैं डायरेक्‍टर के विजन को ही फॉलो करता हूं।
-फिल्‍म के प्रमोशन में कितनी रुचि लेते हैं? क्‍या प्रमोशनल इवेंट से दर्शक बनते हैं?
0हां,अवेयरनेस बढ़ती है। दर्शकों को पता चलता है।फिल्‍म के प्रमोशन के लिए सभी जरूरी इवेंट में जाता हूं। अगर मैं शो या इवेंट में जाता हूं तो पूरी तरह से इंवॉल्‍व रहता हूं।
-अभी किसी ने आप की तुलना धर्मेन्‍द्र से की। उनकी नजर में आप उनकी तरह ही अलग होकर भी कामयाब हैं और हर तरह की फिल्‍में कर रहे है...
0 वे मेरे आदर्श रहे हैं और हैं। आप ने किस का नाम ले लिया और किस ने मेरी उनसे तुलना कर दी। मैं तो उनकी फिल्‍में देख कर बड़ा हुआ हूं। डैडी से कहता था कि धर्मेन्‍द्र की फिल्‍म देखनी है। हमें एक्‍शन का बहुत शौक था। डैडी उनकी फिल्‍में दिखाते थे। उनके साथ मेरी तुलना करना बड़ी बात है। अमैं उनका फैन ही नहीं,फॉलोअर भी हूं।
-क्रैक क्‍यों बंद हो गई। कहते हैं नीरज पांडेय के साथ अब आप नहीं हैं?
0 अभी लनंदन में हम दोनों साथ ही बैठे। बातें की। वे हमारे प्रेस कांफ्रेंस के लिए भी आए थे। मीडिया कुछ क्रैक नहीं कर पाती तो ऐसी स्‍टासेरी चला देती है।  सच इतना ही है कि अभी क्रैक की कहानी क्रैक नहीं हो पाई है।
-अपनी नायिका भूमि पेडणेकर के बारे में बताएं?
0सबसे पहले तो यह कहूंगा कि कि ऐसा रोल लेना ही बड़ी बात है। उन्‍हें ,खुले शौच का एक सीन करना था। आप बताएं कि कौन सा एक्‍टर ऐसे सीन के लिए तैयार होगी। उन्‍होंने क्राउड के बीच साड़ी उठाई और उंकड़ू बैठने का सीन किया। एेसा करने में आत्‍मा ठेस पहुंचती है। उन्‍होंने बताया कि मैं तो एक्टिंग कर रही थी तो इतनी शर्म आई। जो औरतें वास्‍त में खुले में शौच करती हैं,उन पर रोजाना क्‍या गुजरती होगी? उन्‍हें कितनी ठेस लगती होगी। वह पावरफुल एक्‍टर हैं।
-आप की फिल्‍म पर कोर्ट केस हुआ है कि कंटेंट में समानता है...
0 मामला अभी कोर्ट में है। देखिए,कोर्ट क्‍या फैसला सुनाती है। सही निर्णय आएगा। मुझे नहीं लगता कि ऐसा कुछ होगा।
-राकेश ओमप्रकाश भी इसी विषय पर मेरे प्‍यारे प्रधानमंत्री लेकर आ रहे हैं...
0 अच्‍छा है। और भी लोग आएं। हमारी तो लव स्‍टोरी है,इसीलिए इसका टाइटिल टॉयलेट एक प्रेम कथा है।


Friday, June 9, 2017

सामाजिक मुद्दे लुभाते हैं मुझे : अक्षय कुमार



अक्षय कुमार

-अजय ब्रह्मात्‍मज
अक्षय कुमार इन दिनों परिवार के साथ वार्षिक छुट्टी पर हैं। उनकी फिल्‍म टॉयलेट : एक प्रेम कथा का ट्रेलर 11 जून को दर्शकों के बीच आएगा। इस फिल्‍म को लेकर वह अतिउत्‍साहित हैं। उन्‍होंने छुटिटयों पर जाने के पहले अपने दफ्तर में इस फिल्‍म का ट्रेलर दिखाया और फिल्‍म के बारे में बातें कीं। तब तक ट्रेलर पूरी तरह तैयार नहीं हुआ था तो उन्‍होंने अपने संवाद बोल कर सुना दिए। टॉयलेट : एक प्रेम कथा के बारे में उनका मत स्‍पष्‍ट है। वे कहते हैं कि मैाने मुद्दों को सींग से पकड़ा है। आम तौर पर फिल्‍मों में सीधे सामाजिक मुद्दों की बाते नहीं की जातीं,लेकि टॉयलेट : एक प्रेम कथा में शौच की सोच का ऐसा असर है कि टायटल में टॉयलेट के प्रयोग से भी निर्माता,निर्देशक और एक्‍टर नहीं हिचके।
-शौच के मुद्दे पर फिल्‍म बनाने और उसका हिस्‍सा होने का खयाल कैसे आया?
0जब मुझे पता चला कि देश की 54 प्रतिशत आबादी के पास अपना टॉयलेट नहीं है तो बड़ा झटका लगा। मुझे लगा कि इस मुद्दे पर फिल्‍म बननी चाहिए। ऐसा नहीं है कि किसी दिक्‍कत या गरीबी की वजह से टॉयलेट की कमी है। कुछ संपन्‍न परिवारों में इसके बारे में सोचा ही नहीं जाता। शौच को लेकर उनकी सोच गलत है। उन्‍हें लगता है कि घर के हिस्‍से के रूप में शौच केलिएएक कमरा कैसे बनाया जा सकता है? कई परिवारों में तर्क दिया जाता है कि मंदिर,तुलसी और रसोई के आसपास शौच कैसे बनाया जा सकता है?
-इस फिल्‍म की कहानी कैसे मिली या लिखी गई?
0यह एक सच्‍ची कहानी है। हमें कहानी अच्‍छी लगी। तय हुआ कि इस जरूरी मुद्दे की बात पर गंभी फिल्‍म नहीं बनाई जाए। वैसा करने पर दर्शकों को फिल्‍म पसंद नहीं आती। फिल्‍म में कहानी का कॉमिकल ट्रीटमेंट है। नीरज पांडेय केपास ही यह कहानी आई थी। पिछली फिल्‍म की शूटिंग के समय उन्‍होंने इसकी चर्चा की थी। मुझे इस फिल्‍म का विचार ही पसंद आ गया।
-इस फिल्‍म की शूटिंग के समय विरोध और विवाद हुआ था?
0हां,कुछ लोग हमें समझाने आए थे कि आप गलत फिल्‍म बना रहे हैं। लहां खाना बनाया और खाया जाता है,वहां शौच की जगह बनाने के बारे में कोई सोच भी कैसे सकता है? मैं तो उनकी सोचसे हैरान हो गया। मुझे लगा कि उनसे बात नहीं की गई है। उन्‍हें समझाया नहीं गया। वे अपनी सोच से हिलना ही नहीं चाहते। ये बातें परिवार के मर्द कर रहे थे। उन्‍हें कोई दिक्‍कत ही नहीं होती। कहीं भी बैठ गए या खड़े हो गए। वहीं जब औरतों से बातें हुईं तो उन्‍होंने अपनी दिक्‍कतें बताईं। एक वृद्धा तो खास आग्रह करती रही कि किसी तरह मेरे अंगने में शौच बनवा दो।
-गरीबी भी तो एक वजह है?
0बिल्‍कुल है। उसके बारे में भी सोचा जाना चाहिए। यह तो वन टाइम इंवेस्‍टमंट है। पंचायत और प्रखंड के सतर पर यह अभियान चलाया जा सकता है। इन दिनों एक शौच बनवाने में 40 हजार रुपए का खर्च आता है। टूपिट टॉयलेट बनाया जाना चाहिए। मैंने स्‍वयं मध्‍यप्रदेश में इस अभियान में साथ दिया। खुद गड्ढा खोदा। मैंने तो एक पिट की सफाई भी की। अपने हाथों से पिट का ढेर उठाया। मल एक समय के बाद खाद बना जाता है। आर्गेनिक खाद के रूप में यह फसल और पेड़-पौधों के लिए बहुत उपयोगी है। अतिरिक्‍त खाद बेच कर पैसे भी बनाएजा सकते हैं। हमलोग फिल्‍म में इतनी बातें नहीं कर रहे हैं। दो घंटों में एक रोचक प्रेम कथा दिखाएंगे।-आप इन दिनों ऐसी फिल्‍मों में रुचि ले रहे हैं, इसके बाद आप की पैडमैन भी आएगी...0 क्‍या कहूं? मेरे पास ऐसे सब्‍जेक्‍ट आ जाते हैं। मुझे स्‍वयं ऐसी फिल्‍में करने में मजा आता है। मैं अपनी बात कहूं तो मुझेऐसे विषयों के साथ कुछ महीने बिताना अच्‍छा लगता है।-रजनीकांत के साथ आप की फिल्‍म 2.0 आएगी। उसका सभी को इंतजार है...0 मैं खुद इंतजार कर रहा हूं।उनके साक मुझे बहुत अच्‍छा लगा। रजनी सर के साथ पहले दिन का अनुभव रोचक था। मैं उनसे ज्‍यादा उन लोगों को देख रहा था जो उनकी हर अदा पर अहो-अहो कर रहे थे। उनकी आंखों में रजनी सर के लिए अथाह आदर था। पता चल रहा था कि वे उन्‍हें देख कर आनंदित हो रहे थे।-हिंदी फिल्‍मों के स्‍टार वैसा आदर क्‍यों नहीं पाते?0हम दिन-रात दिखते रहते हैं। इन दिनों कहें तो 665 चैनल आ गए हैं। हर जगह फोटोग्राफर हैं। हम सभी के सामने नंगे होते जा रहे हैं। हमें इतना खर्च कर दिया जाता है कि हमारा मूल्‍य घट जाता है। दक्षिण के स्‍टार हमारी तरह दिन-रात नहीं दिखते।
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Sunday, April 9, 2017

कॉमन मैन अप्रोच है अक्षय कुमार का - सुभाष कपूर

कॉमन मैन अप्रोच है अक्षय कुमार का
-सुभाष कपूर
सबसे पहले तो मैं अक्षय कुमार को बधाई दूंगा। उन्‍हें सर्वश्रेष्‍ठ अभिनेता का राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार मिलना खुशी की बात है।
हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री में अक्षय कुमार ऐसे अभिनेता रहे हैं,जो बार-बार राइट ऑफ किए जाते रहे हैं। फिल्‍मी पत्र-पत्रिकाओं में ऐसी घोषणाएं होती रही हैं। समय-समय पर कथित एक्‍सपर्ट उनके अंत की भविष्‍यवाणियां करते रहे हैं। उनके करिअर की श्रद्धांजलि लिखी गई है। अक्षय कुमार अपनी बातचीत में इसका जिक्र करते हैं। इन बातों को याद रखते हुए वे आगे बढ़ते रहे हैं।
अच्‍छा है कि एक मेहनती और अच्‍छे अभिनेता की प्रतिभा को राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार ने रेखांकित किया है। अभी वे जैसी फिल्‍में कर रहे हैं,जैसे किरदार चुन रहे हैं,जैसे नए विषयों पर ध्‍यान दे रहे हैं,वैसे समय में उनको यह पुरस्‍कार मिलना बहुत मानी रखता है।
अक्षय कुमार बहुत ही सरल अभिनेता हैं। वे मेथड नहीं अपनाते। वे नैचुरल और नैसर्गिक अभिनेता हैं। जॉली एलएलबी 2 के अनुभव से कह सकता हूं कि वे किरदार और फिल्‍म पर लंबे विचार-विमर्श में नहीं फंसते। अपने किरदार को देखने-समझने की उनकी आम लोगो की शैली है। मुझे ऐसा लगता है कि उसकी कॉमन मैन अप्रोच से वे फिल्‍म करने ना करने का फैसला लेते हैं।
अक्षय कुमार सौ फीसदी निर्देशक के अभिनेता हैं। वे सेट पर अधिक सवाल नहीं पूछते। वे अपने अनुभव या अभिव्‍यंजना को किरदार में जबरन नहीं डालते। डायरेक्‍टर की बात सुनते हैं। उसके निर्देशों का पालन करते हैं। मेरी फिल्‍म में उनके साथ कई प्रशिक्षित अभिनेता थे। वे उनकी बहुत इज्‍जत करते हैं। वे अक्‍सर कहते हैं कि प्रशिक्षित अभिनेताओं के सामने उनकी कोई काबिलियत नहीं है। फिर भी मैं कहूंगा कि कई बार वे चौंकाते हैं।
मेरी फिल्‍म में हीना सिद्दीकी के साथ के उनके सीन बहुत पावरफुल हैं। उन सीन में अक्षय कुमार ने पूर्ण समर्पण किया। उन्‍होंने सामने के कनाकार को पूरा मौका दिया। वे उन सीन में कुछ भी नहीं कर रहे हें। जाहिर सी बात है कि सीन में कैरेक्‍टर के महत्‍व को समझते हुए वे हीरोगिरी करने से बचते हैं। ऐसा ही एक सीन सौरभ शुक्‍ला और अन्‍नू कपूर के धरने पर बैठने का है। वहां जॉली चुपचाप रहता है। अक्षय कुमार का यह फेवरिट सीन है।
मुझे नहीं लगता कि किसी योजना के तहत अक्षय कुमार इस मुकाम पर आए हैं। सब कुछ होता गया और उस प्रवाह में दम साधे अक्षय कुमार बढ़ते रहे। लोकरुचि बदल रही है,वक्‍त बदल रहा है,इसका उन्‍हें भरपूर एहसास है। अपनी बातों में वे बताते हैं कि दर्शक कैसे बदल रहे हैं? वे कलाकारों और निर्देशकों से अपनी सोच में बदलाव लाने पर जोर देते हैं। खुद को उसी के अनुरूप वे बदलते गए। बदलते वक्‍त की समझ रखते हैं अक्षय कुमार। यह उनके काम की वैरायटी में साफ नजर आता है। वे निजी बातचीत में बगैर जुमलों के अपने विचार रखते हैं।
यह उनकी विनम्रता है कि वे स्‍वयं को फिल्‍म इंडस्‍ट्री का सबसे टैलेटेड या खूबसूरत एक्‍टर नहीं मानते। वे अपनी कड़ी मेहनत और अनुशासन का जरूर उल्‍लेख करते हैं। काम और प्रोफेशन के प्रति समर्पण को वे सर्वोपरि मानते हैं1 हां,एक बात जरूर कहूंगा कि उन्‍हें कैरा और लेंस की बहुत अच्‍छी समझ है। वे अपने परफारमेंस की बारीकी और निर्देशक की जरूरत समझते हैं।
अमिताभ बच्‍चन और विनोद खन्‍ना उनके आदर्श और प्रिय अभिनेता हैं।
( राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार से सम्‍मानित सुभाष कपूर जॉली एलएलबी 2 के निर्देशक हैं। फिलहाल वे अक्षय कुमार के साथ मुगल की तैयारी कर रहे हैं।)

Saturday, February 11, 2017

फिल्‍म समीक्षा : जॉली एलएलबी 2



फिल्‍म रिव्‍यू
सहज और प्रभावपूर्ण
जॉली एलएलबी 2
-अजय ब्रह्मात्‍मज

सुभाष कपूर लौटे हैं। इस बार वे फिर से जॉली के साथ आए हैं। यहां जगदीश त्‍यागी नहीं,जगदीश्‍वर मिश्रा हैं। व्‍यक्ति बदलने से जॉली के मिजाज और व्‍यवहार में अधिक फर्क नहीं आया है। लखनऊ में वकालत कर रहे जगदीश्‍वर मिश्रा उर्फ जॉली असफल वकील हैं। मुंशी के बेटे जगदीश्‍वर मिश्रा शहर के नामी वकील रिजवी के पंद्रहवें सहायक हैं। हां,उनके इरादों में कमी नहीं है। वे जल्‍दी से जल्‍दी अपना एक चैंबर चाहते हैं। और चाहते हैं कि उन्‍हें भी कोई केस मिले। अपनी तरकीबों में विफल हो रहे जगदीश्‍वर मिश्रा की जिंदगी में आखिर एक मौका आता है। पिछली फिल्‍म की तरह ही उसी एक मौके से जॉली के करिअर में परिवर्तन आता है। अपनी सादगी,ईमानदारी और जिद के साथ देश और समाज के हित वह मुकदमा जीतने के साथ एक मिसाल पेश करते हैं। जॉली एक तरह से देश का वह आम नागरिक है,जो वक्‍त पड़ने पर असाधारण क्षमताओं का परिचय देकर उदाहरण बनता है। हमारा नायक बन जाता है।
सुभाष कपूर की संरचना सरल और सहज है। उन्‍होंने हमारे समय की आवश्‍यक कहानी को अपने पक्ष और सोच के साथ रखा है। पात्रों के चयन,उनके चित्रण और प्रसंगों के चुनाव में सुभाष कपूर की राजनीतिक स्‍पष्‍टता दिखती है। उन्‍होंने घटनाओं को चुस्‍त तरीके से बुना है। फिल्‍म आम जिंदगी और ख्‍वाहिशों की गली से गुजरते हुए जल्‍दी ही उस मुकाम पर आ जाती है,जहां जगदीश्‍वर मिश्रा कोर्ट में शहर के संपन्‍न और सफल वकील प्रमोद माथुर के सामने खड़े मिलते हैं। मुकाबला ताकतवर और कमजोर के बीच है। अच्‍छी बात है कि फिल्‍म में इस मोड़ के आने तक जगदीश्‍वर मिश्रा हमारी हमदर्दी ले चुके होते हैं।
लोकप्रिय अभिनेता अक्षय कुमार ने जगदीश्‍वर मिश्रा की पर्सनैलिटी और एटीट्यूड को आत्‍मसात किया है। उन्‍होंने लखनऊ में वकालत कर रहे कनपुरिया वकील की लैंगवेज और बॉडी लैंग्‍वेज पर मेहनत की है। वे किसी भी दृश्‍य में निराश नहीं करते। लेखक और निर्देशक सुभाष कपूर ने लोकप्रिय अभिनेता की खूबियों को निखारा और विस्‍तार दिया है। अभिनेता अक्षय कुमार को जॉली एलएलबी2 में देखा जा सकता है। निश्चित ही यह फिल्‍म उनकी बेहतरीन फिल्‍मों में शुमार होगी। प्रतिद्वंद्वी वकील के रूप में अन्‍नू कपूर का योगदान सराहनीय है। इस फिल्‍म में कलाकारों के चुनाव और उनके किरदारों के चित्रण में खूबसूरत संतुलन रखा गया है। थिएटर के कलाकारों ने फिल्‍म के कथ्‍य को मजबूती दी है। चंद दृश्‍यों और छोटी भूमिकाओं में आए कलाकार भी कुछ न कुछ जोड़ते हैं। जलगदीश्‍वर के सहयोगी बीरबल की भूमिका में राजीव गुप्‍ता याद रह जाते हैं। हां,ऊपरी तौर पर पुष्‍पा पांडे(जगदीश्‍वर की पत्‍नी) की कोई खास भूमिका नहीं दियती,लेकिन वह जगदीश्‍वर की जिंदगी की खामोश उत्‍प्रेरक है। ऐन मौके पर वह उन्‍हें प्रेरित करती है और साथ में खड़ी रहती है। हुमा कुरैशी ने अपने किरदार को पूरी तल्‍लीनता से निभाया है। जज के रूप में सौरभ श्‍ुक्‍लाा पिछली फिल्‍म की तरह फिर से प्रभावित करते हैं। वे हंसाने के साथ न्‍याय के पक्ष में दिखते हैं। हिना की भूमिका में सयानी गुप्‍ता असर छोड़ती हैं। उनकी आंखें दर्द बयान करती हैं।
जॉली एलएलबी2 चरमरा चुकी देश की न्‍याय प्रणाली की तरफ संकेत करने के साथ लोकतंत्र में उसकी जरूरत और जिम्‍मेदारी को भी रेखांकित किया है। सुभाष कपूर की जॉली एलएलबी2 में हाई पिच ड्रामा नहीं है और न ही लोक लुभावन डॉयलॉग हैं। सरल शब्‍दों और सहज दृश्‍यों में कथ्‍य और भाव की गंभीरता व्‍यक्‍त की गई है। यह फिल्‍म सोच और समझ के स्‍तर पर प्रांसगिक और उपयोगी बातें करती है। अंतिम जिरह में जगदीश्‍वर मिश्रा जोरदार शब्‍दों में कहता है कि हमें इकबाल कादरी और सूर्यवीर सिंह दोनों ही नहीं चाहिए। दोनों ही देश और मानवता के दुश्‍मन हैं। अब जज को फैसला करना है कि दोनों जायज हैं कि दोनों ही नाजायज हैं।
जॉली एलएलबी2 में गानों की गुजाइश नहीं थी। ऐसा लगता है कि लोकप्रिय अभिनेता के प्रशंसकों के दबाव और फिल्‍म के प्रचार के लिए ही उन्‍हें रखा गया है। ठीक ही है कि निर्देशक ने उन्‍हें फिल्‍म में अधिक स्‍पेस नहीं दिया है।
अवधि- 136 मिनट
चार स्‍टार

Tuesday, February 7, 2017

मजेदार किरदार है जगदीश्‍वर मिश्रा- अक्षय कुमार




-अजय ब्रह्मात्‍मज
मंगलवार को जगदीश्‍वर मिश्रा फिल्‍मसिटी में द कपिल शर्मा शो की शूटिंग कर रहे थे। लखनऊ के जगदीश्‍वर मिश्रा वकील की वेशभूषा में ही थे। कपिल शर्मा को भी पहली बार समझ में आया कि किसी वकील से मजाकिया जिरह करने में भी पसीने छूट सकते हैं। यह अलग बात है कि कपिल शर्मा की मेहनत का यह पसीना छोटे पर्दे पर हंसी बन कर बिखरेगा। शो से निकलत ही जगदीश्‍वर मिश्रा प्रशंकों से घिर गए। जो पास में थे,वे सेल्‍फी लेने लगे और जो दूर थे वे उनकी तस्‍वीरें उतारने लगे। जगदीश्‍वर मिश्रा की पैनी निगाहों से कोई बचा नहीं रहा। वे सभी का अभिनंदन कर रहे थे। इस बीच चलते-चलते ड्रेसमैन ने उनका काला कोट उतार दिया। जगदीश्‍वर मिश्रा ने कमीज ढीली की और परिचित मुस्‍कराहट के साथ अक्षय कुमार में तब्‍दील हो गए। आप सभी को पता ही है कि सुभाष कपूर की नर्द फिल्‍म जॉली एलएलबी2 में अक्षय कूमार वकील जगदीश्‍वर मिश्रा की भूमिका निभा रहे हैं। वे पहली बार वकील का किरदार निभा रहे हैं।
अनुशासित और समय के पाबंद अक्षय कुमार फिल्‍मों की रिलीज के पहले कुछ ज्‍यादा व्‍यस्‍त हो जाते हैं। उन्‍होंने इंटरव्‍यू के लिए समय निकाला तो यह आग्रह किया कि फिल्‍मसिटी ही आ जाएं। यहां से जुहू लौटते समय रास्‍ते में बातचीत कर लेंगे। फिल्‍मसिटी से जुहू लौटने के 14 किलोमीटर के सफर में यह बातचीत उनकी गाड़ी में ही हुई। मुंबई में कुछ फिल्‍म स्‍टार ट्रेफिक का यह उपयोगी इस्‍तेमाल करते हैं। हमारी बातचीत मुख्‍य रूप से जॉली एलएलबी2 को ही लेकर हुई। फिल्‍मसिटी से निकलते ही अक्षय कुमार के नजर सामने पेड़ की डालियों पर उछलते-कूदते बंदर पर पड़ी और वे गाड़ी रोक कर बंदर देखने-दिखाने लगे।
अक्षय कुमार अपनी फिल्‍मों को लकर बहुत चूजी हैं। जॉली एलएलबी2 के चुनाव की वजह क्‍या रही? सुभाष कपूर,स्क्रिप्‍ट या फिर प्रोडक्‍शन बैनर? अक्षय बताते हैं,मैंने स्क्रिप्‍ट चुना। मुझे पार्ट 1 अच्‍छी लगी थी। मैंने स्क्रिप्‍ट के साथ आए सुभाष कपूर को भी चुना और प्‍लस मैंने फॉक्‍स स्‍टार के साथ पहले कोई फिल्‍म नहीं की थी। तो एक के बाद एक तीनों बातें हो गई,लेकिन पहली वजह स्क्रिप्‍ट ही रही। वास्‍तविक घटनाओं को लेकर लिखी गई यह स्क्रिप्‍ट मुझे बहुत अच्‍छी लगी।डिटेल में कुछ और बताने के आग्रह पर वे आगे कहते हैं, मैंने कभी वकील का रोल किया ही नहीं था। मैं अपनी फिल्‍मों के लिए नए किरदारों की तलाश में रहता हूं। उनके माध्‍यम से ही कुछ नया करने का मौका मिलता है। मुझे जगदीश्‍वर मिश्रा मजेदार किरदार लगा। यह सच होने के साथ एंटटेनिंग है। हमारी फिल्‍म न्‍यायपालिका की दिक्‍कतों की भी बात करती है। हमारे पास कम जज हैं। यही कारण है कि मुकदमों के फैसले में वक्‍त लगता है। अब आप ही बताएं न 21 हजार जज साढ़तीन करोड़ मुकदमों का फैसला कितनी जल्‍दी सुना पाएंगे?’क्‍या जगदीश्‍वर मिश्रा के बारे में भी कुछ बता सकेंगे? अक्षय मना कर देते हैं,वह बताऊंगा तो कहानी जाहिर हो जाएगी। एक हफ्ते के बाद आप खुद ही देख लेना न...
फिर भी उत्‍तर भारत के इस किरदार को निभाने और लखनऊ-बनारस में जाकर शूटिंग करने का अलग उत्‍साह तो रहा होगा। कैसा रहा अनुभव? अक्षय कुमार के लिए निर्देशक सुभाष कपूर ने जमीनी तैयारी कर दी थी। वे कहते हैं, मेरा आधा से ज्‍यादा होमवर्क सुभाष ने ही कर दिया था। वे मुझे गाइड करते रहे। इस फिल्‍म के कारण पहली बार बनारस गया और उफनती गंगा में डुबकी मारी। मैंने सोचा कि डुबकी लगा लो मेरे पाप भी धुल जाएंगे। पाप तो हो ही जाते हैं,बड़े हों या छोटे। बनारस के खान और पान का स्‍वाद लिया। मैं खाने का शौकीन हूं। मैं तो सभी से कहता हूं कि दिन में एक-डेढ़ घंटे कसरत करो और शाम में साढ़े छह बजे तक खा लो। फिर न तो कोई बीमारी होगी और न तकलीफ होगी। बनारस और लखनऊ के लोग प्‍यार और इज्‍जत देना जानते हैं। उनके मिजाज में थोड़ी मस्‍ती रहती है,लेकिन वही तो जिंदगी का मजा है।
जॉली एलएलबी2 में अक्षय कुमार के साथ हुमा कुरैशी हैं। अक्षय के पास उनकी तारीफ में बताने के लिए बहुत कुछ है,हुमा बेहतरीन एक्‍ट्रेस हैं। उन्‍होंने राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार से सम्‍मानित फिल्‍मों में काम किया है। उन्‍हें भी अच्‍छा किरदार मिला है। पहली बार पर्दे पर दिखेगा कि हीरो घर में रोटियां सेंकता है।सब्जियां बनाता है। हुमा ने तो एक इंटरव्‍यू में कहा कि मुझे रियल लाइफ में ऐसा ही पति चाहिए। हुमा इस फिल्‍म में मुझे संभालती और नैतिक बल देती हैं। वह मुझे हिम्‍म्‍ती बनाती है।
अक्षय बताते हैं कि सुभाष कपूर ने पहले भी किसी के जरिए इस फिल्‍म के लिए मुझे अप्रोच किया था। तब बात नहीं बन सकी थी। बाद में मुलाकात हुई तो सब तय हो गया। हर फिल्‍म का वक्‍त होता है। अक्षय कुमार सुभाष कपूर को एकदम नया फिल्‍मकार नहीं मानते। वे कहते हैं,वैसे भी मेरे साथ नए फिल्‍मकारों ने ही काम किया है। यह कुछ संयोग है। मुझे लगता है कि नए फिल्‍मकार ज्‍यादा जोश  के साथ काम करते हैं। वे नई सोच और उम्‍मीद ले आते हैं। वे कुछ कर दिखाना चाहते हैं। सुभाष कपूर फिल्‍मों में आने के पहले जर्नलिस्‍ट रहे हैं। समाज मनोरंजन के साथ कहते हैं। उनकी समझ पैनी है और फिर वे कुछ बड़ी बात मनोरंजन के साथ करते हैं। उनकी फिल्‍मों का हास्‍य हंसाने के के साथ कचोटता भी है। जॉली एलएलबी2 को रेगुलर कॉमेडी फिल्‍म नहीं समझें। यह फिल्‍म जगदीश्‍वर मिश्रा के बहाने बहुत कुछ कहती है।

Friday, August 12, 2016

फिल्‍म समीक्षा : रुस्‍तम



-अजय ब्रह्मात्‍मज
1963 की ये रास्‍ते हैं प्‍यार के और 1973 की अचानक से भिन्‍न है रुस्‍तमरुस्‍तम की प्रेरणा छठे दशक के नौसेना अधिकारी के जीवन से भले ही ली गई हो,पर इसे टीनू सुरेश देसाई ने लेखक विपुल के रावल के साथ मिल कर विस्‍तार दिया है। फिल्‍म में 1961 की यह कहानी छल,धोखा,बदला और हत्‍या से आगे बढ़ कर एक ईमानदार नौसेना अधिकारी के देशप्रेम और राष्‍ट्रभक्ति को छूती हुई उस दौर की मुंबई के परिवेश को भी दर्शाती है। तब मुंबई कां बंबई कहते थे और शहर में पारसी और सिंधी समुदाय का दबदबा था।

फिल्‍म में कलाकारों के भूमिका से पहले इस फिल्‍म के प्रोडक्‍शन से जुड़े व्‍यक्तियों के योगदान को रेखांकित किया जाना चाहिए। 1961 की मुंबई का परिवेश रचने में कठिनाइयां रही होंगी। हालांकि वीएफएक्‍स से मदद मिल जाती है,लेकिल तत्‍कालीन वास्‍तु और वाहनों को रचना,जुटाना और दिखाना मुश्किल काम है। प्रोडक्‍शन डिजायन प्रिया सुहास का है। आर्ट डायरेक्‍टर विजय घोड़के और अब्‍दुल हमीद ने बंबई को फिल्‍म की जरूरत के हिसाब से तब का विश्‍वसनीय परिवेश दिया है। सेट को सजाने का काम केसी विलियम्‍स ने किया है। अमेइरा पुनवानी ने सभी किरदारों के कॉस्‍ट्यूम का खयाल रखा है। मेकअप के जरिए आज के कलाकारों को 1961 का लुक देने की चुनौती विक्रम गायकवाड़ ने अच्‍छी तरह पूरी की है। इन सभी के प्रयास और सहयोग को सिनेमैटोग्राफर संतोष थुंडिल ने छठे-सावें दशक का रंग दिया है। वीएफएक्‍स की कमियों को छोड़ दें तो रुस्‍तम एक प्रभावपूर्ण पीरियड फिल्‍म है। फिल्‍म की तकनीकी टीम को कार्य सराहनीय है।

रूस्‍तम अलग किस्‍म की थ्रिलर फिल्‍म है। यहां गोली चलाने वाले के बारे में दर्शक जानते हैं। हां,कैसे और किन हालात में गोली चली यह कोर्ट में पता चलता है। चूंकि घटना का कोई चश्‍मदीद गवाह नहीं है,इसलिए जज और ज्‍यूरी को रुस्‍तम के बयान पर ही निर्भर होना पड़ता है। उस दौर में कोर्ट में ज्‍यूरी भी बैठती थीं,जो किसी फसले तक पहुंचने में जज की मदद करती थी। कहते हैं नौसेना अधिकारी के मुकदमे के बाद ज्‍यूरी सिटम समाप्‍त किया गया। फिल्‍म में संक्षेप में बताया गया है कि कैसे ज्‍यूरी 8-1 के बहुमत तक पहुंची और रुस्‍तम को निर्दोष करार दिया। मीडिया की भी भूमिका रही। मीडिया ने रुस्‍तम के समर्थन का माहौल तैयार किया। कोर्ट,मीडिया और तब की एलीट बंबई के जीवन को भी यह फिल्‍म दर्शाती है।

हालांकि फिल्‍म का फोकस नौसेना में मौजूद भ्रष्‍टाचार नहीं था। फिर भी यह फिल्‍म संकेत देती हैं कि नेहरू के जमाने से ही सेना में कदाचार है। रूस्‍तम जैसे राष्‍ट्रभक्‍त उनसे जूझते रहे हैं। अक्षय कुमार की ऐसी फिल्‍मों में देशप्रेम का एक तार चकमता रहता है। अक्षय कुमार उसे जोश के साथ पेश भी करते हैं।

रुस्‍तम पूरी तरह से शीर्षक भूमिका निभा रहे अक्षय कुमार की फिल्‍म है। अक्षय कुमार ने ऐसी फिल्‍मों की एक स्‍टायल विकसित कर ली है। वे इस स्‍टायल में जंचते और अच्‍छे भी लगते हैं। उन्‍होंने रुस्‍तम के किरदार को कभी हायपर नहीं होने दिया है। अभिनेत्रियों में इलियाना डिक्रूज अपनी सीमित भूमिका में भी प्रभावित करती हैं। उनके किरदार में एक से अधिक इमोशन थे। ईशा गुप्‍ता का किरदार एकआयमी और हल्‍का सा निगेटिव है। ईशा किरदार में रहने की कोशिश में हर दृश्‍य में सफल नहीं हो पातीं। उनके लुक और पहनावे पर अच्‍छी मेहनत की गई है। वह उसे ढंग से कैरी कर लेती हैं। यह फिल्‍म कुमुद मिश्रा,पवन मल्‍होत्रा,उषा नाडकर्णी और अनंग देसाई के सहयोंग से असरदार बनती है। चारों ने अपने किरदारों को सही रंग और ढंग से आत्‍मसात किया है।

फिल्‍म के गीत-संगीत में छठे-सातवें दशक के संगीत की ध्‍वनि और शैली रहती तो अधिक आनंद आता। फिल्‍म में डाले गए गाने और उनका संगीत पीरियड में छेद करते हैं। गीत के बोलों में फिल्‍म की थीम के अनुसार प्रेम और रिश्‍ते का भाव है,किंतु संगीत उसे आज की धुनों में लाकर बेमानी कर देता है।

क्‍या उन दिनों कोई चार आने का कोई अखबार अपनी सुर्खियों और खबरों की वजह से पांच रुपए तक में बिक सकता था?

अवधि- 152 मिनट

स्‍टार- तीन स्‍टार

Friday, January 22, 2016

फिल्‍म समीक्षा : एयरलिफ्ट

मानवीय संवेदना से भरपूर

-अजय ब्रह्मात्‍मज
हिंदी फिल्‍में आम तौर फंतासी प्रेम कहानियां ही दिखाती और सुनातीं हैं। कभी समाज और देश की तरफ मुड़ती हैं तो अत्‍याचार,अन्‍याय और विसंगतियों में उलझ जाती हैं। सच्‍ची घटनाओं पर जोशपूर्ण फिल्‍मों की कमी रही है। राजा कृष्‍ण मेनन की एयरलिफ्ट इस संदर्भ में साहसिक और सार्थक प्रयास है। मनोरंजन प्रेमी दर्शकों को थोड़ी कमियां दिख सकती हैं,पर यह फिल्‍म से अधिक उनकी सोच और समझ की कमी है। फिल्‍में मनोरंजन का माध्‍यम हैं और मनोरंजन के कई प्रकार होते हैं। एयरलिफ्ट जैसी फिल्‍में वास्‍तविक होने के साथ मानवीय संवेदना और भावनाओं की सुंदर अभिव्‍यक्ति हैं।
एयरलिफ्ट 1990 में ईराक-कुवैत युद्ध में फंसे 1,70,000 भारतीयों की असुरक्षा और निकासी की सच्‍ची कहानी है। (संक्षेप में 1990 मेंअमेरिकी कर्ज में डूबे ईराक के सद्दाम हुसैन चाहते थे कि कुवैत तेल उत्‍पादन कम करे। उससे तेल की कीमत बढ़ने पर ईराक ज्‍यादा लाभ कमा सके। ऐसा न होने पर उनकी सेना ने कुवैत पर आक्रमण किया और लूटपाट के साथ जानमान को भारी नुकसान पहुंचाया। कुवैत में काम कर रहे 1,70,000 भारतीय अचानक बेघर और बिन पैसे हो गए। ऐसे समय पर कुवैत में बसे कुछ भारतीयों की मदद और तत्‍कालीन विदेश मंत्री इंद्र कुमार गुजराल की पहल पर एयर इंडिया ने 59 दिनों में 488 उड़ानों के जरिए सभी भारतीयों की निकासी की। यह अपने आप में एक रिकार्ड है,जिसे गिनीज बुक में भी दर्ज किया गया है।) एयरलिफ्ट के नायक रंजीत कटियाल वास्‍तव में कुवैत में बसे उन अग्रणी भारतीयों के मिश्रित रूप हैं। राजा कृष्‍ण मेनन ने सच्‍ची घटनाओं को काल्‍पनिक रूप देते हुए भी उन्‍हें वास्‍विक तरीके से पेश किया है। चरित्रों के नाम बदले हैं। घटनाएं वैसी ही हैं। दर्शक पहली बार बड़े पर्दे पर इस निकासी की रोमांचक झलक देखेंगे। निर्देशक और उनके सहयोगियों तब के कुवैत को पर्दे पर रचने में सफलता पाई है। उल्‍लेखनीय है कि उन्‍होंने यह सफलता सीमिज बजट में हासिल की है। हालीवुड की ऐसी फिल्‍मों से तुलना न करने लगें,क्‍योंकि उन फिल्‍मों के लिए बजट और अन्‍य संसाधनों की कमी नहीं रहती।
एयरलिफ्ट रंजीत कटियाल,उनकी पत्‍नी अमृता और बच्‍ची के साथ उन सभी की कहानी है,जो ईराक-कुवैत युद्ध में नाहक फंस गए थे। शातिर बिजनेसमैन रंजीत के व्‍यक्तित्‍व और सोच में आया परिवर्त्‍तन पत्‍नी तक को चौंकाता है। वह समझती है कि उसका पति बीवी-बच्‍ची की जान मुसीबत में डाल कर मसीहा बनने की कोशिश कर रहा है। क्रूर,अमानवीय और हिंसक घटनाओं का चश्‍मदीद गवाह होने पर रंजीत का दिल पसीज जाता है। कुवैत से खुद निकलने की कोशिश किनारे रह जाती है। वह देशवासियों की मुसीबत की धारा में बहने लगता है। हम जिसे देशभक्ति कहते ह,वह कई बार अपने देशवासियों की सुरक्षा की चिंता से पैदा होता है। दैनिक जीवन में आप्रवासी भारतीय सहूलियतों और कमाई के आदी हो जाते हैं। कभी ऐसी क्राइसिस आती है तो देश याद आता है। एयरलिफ्ट में निर्देशक ने अप्रत्‍यक्ष तरीके से सारी बातें कहीं हैं। उन्‍होंने देश के राजनयिक संबंध और राजनीतिक आलस्‍य की ओर भी संकेत किया है। कुवैत में अगर रंजीत थे तो देश में कोहली भी था,जिसका दिल भारतीयों के लिए धड़कता था।एयरलिफ्ट देशभक्ति और वीरता से अधिक मानवता की कहानी है,जो मुश्किल स्थितियों में आने पर मनुष्‍य के भाव और व्‍यवहार में दिखता है।
एयरलिफ्ट में अक्षय कुमार ने मिले अवसर के मुताबिक खुद का ढाला और रंजीत कटियाल को जीने की भरसक सफल कोशिश की है। उन्‍हें हम ज्‍यादातर कामेडी और एक्‍शन फिल्‍मों में देखते रहे हैं। एयरलिफ्टमें वे अपनी परिचित दुनिया से निकलते हैं और प्रभावित करते हैं। समर्थ व्‍यक्ति की विवशता आंदोलित करती है। फिल्‍म के कुछ दृश्‍यों में उनके यादगार एक्‍सप्रेशन हैं। बीवी अमृता की भूमिका में निम्रत कौर के लिए सीमित अवसर थे। उन्‍होंने मिले हुए दृश्‍यों में अपनी काबिलियत दिखाई है। पति के विरोध से पति के समर्थन में आने की उनकी यह यात्रा हृदयग्राही है। अस फिल्‍म में इनामुलहक ने ईराकी सेना के कमांडर की भूमिका को जीवंत कर दिया है। भाषा और बॉडी लैंग्‍वेज को चरित्र के मुताबिक पूरी फिल्‍म में कायदे से निभा ले जाने में कामयाब हुए हैं। छोटी भूमिकाओं में आए किरदार भी याद रह जाते हैं।
एयरलिफ्ट की खूबी है कि यह कहीं से भी देशभक्ति के दायरे में दौड़ने की कोशिश नहीं करती। हां,जरूरत के अनुसार देश,राष्‍ट्रीय ध्‍वज,भारत सरकार सभी का उल्‍लेख होता है। एक खास दृश्‍य में झंडा देख कर हमें उस पर गुमान और भरोसा भी होता है। यह फिल्‍म हमें अपने देश की एक बड़ी घटना से परिचित कराती है।
अवधि-124 मिनट
स्‍टार-चार स्‍टार

Monday, January 4, 2016

उस साहस को सलाम : अक्षय कुमार




-अजय ब्रह्मात्‍मज
सन् 1990। 13 अगस्‍त से 11 अक्‍टूबर,1990 ।
1990 में कुवैत में ईराक ने घुसपैठ की। ईराक-कुवैत के इस युद्ध में वहां रह रहे भारतीय फंस गए थे। हालांकि तत्‍कालीन विदेश मंत्री आई के गुजराल ने ईराक के राष्‍ट्रपति से मिलकर भारतीयों के सुरक्षित निकास की सहमति ले ली थी,लेकिन समस्‍या थी कि कैसे कुवैत के विभिन्‍न्‍ इलाकों से भारतीयों को अमान लाया जाए और फिर उन्‍हें मुंई तक की एयरलिफ्ट दी जाए। ऐसे संगीन वक्‍त में भारतीय मूल के रंजीत कटियाल ने खास भूमिका निभायी। खुद को भारतीय से अधिक कुवैती समझने वाले रंजीत कटियाल ने मुसीबत के मारे भारतीयों को सु‍रक्षित मुंबई पहुंचाने की जिममेदारी ली। उनकी मदद से 56 दिनों में 1,11,711 भारतीयों की निकासी मुमकिन हो सकी। दुनिया की इस सबसे बड़ी निकासी और उसमें रंजीत कटियाल की भूमिका के बारे में अधिक जानकारी नहीं मिलती। कहते हैं अमेरिकी दबाव में इस घटना और समाचार को दबा दिया गया। 25 सालों के बाद राजा कृष्‍ण मेनन ने रंजीत कटियाल की जिंदगी और मातृभूमि के प्रति प्रेम के इस साहिसक अभियान को एयरलिफ्ट के रूप में पर्दे पर पेश कर रहे हैं। इसमें रंजीत कटियाल की भूमिका अक्षय कुमार निभा रहे हैं।
-अभी आप की एयरलिफ्ट आ रही है। हम लगातार आप को भिन्‍न भूमिकाओं में देख रहे हैं। यह किसी रणनीति के तहत है क्‍या ?
0 जी,ऐसा ही चल रहा है। रॉ आफिसर,कॉन आर्टिस्‍ट,नेवी ऑफिसर,हाउसफुल3,रुस्‍तम और अभी एयरलिफ्ट जैसी फिलमें कर रहा हूं। आप किसी को वर्सेटाइल एक्‍टर क्‍यों कहते हैं ? हमें ऐसे मौके मिलते हैं। हम अभिनय की वैरायटी दिखा सकते हैं। पिछले छह सालों से ऐसा ही चल रहा है।मैं तो कहता हूं कि अकेला मैं ही ऐसी भूमिकाएं कर रहा हूं। यहां से वहां और वहां से यहां जाने-आने में मुझे दिक्‍कत नहीं होती। एयरलिफ्ट मेरे लिए अलग अनुभव है।
-क्‍या है एयरलिफ्ट’?
0 यह सच्‍ची घटना पर आधारित फिल्‍म है। जब यह स्क्रिप्‍ट सुनाई गई थी तो मुझे खुद नहीं पता था कि कुवैत में ऐसा कुछ हुआ था। 2 अगस्‍त को ईराक के सद्दाम हुसैन ने कुवैत में घुसपैठ की। हाहाकार मच गया था। वहां के भारतीय समझ नहीं पा रहे थे कि वे क्‍या करें और कहां जाएं ? लूटमार मची हुई थी। सभी सड़क पर आ गए थे। एक लाख से ज्‍यादा भारतीयों की जिंदगी और भविष्‍य का सवाल था। बैंक में रखे पैसे एक झटके में शून्‍य हो गया। रात को अटैक हुआ और सुबह आप अमीर से फकीर हो गए। सब कुछ बदल गया।
-आप को कैसी तैयारी करनी पड़ी ? एयरलिफ्ट का नायक कौन है ?
0 कैरेक्‍टर स्‍केच और लुक तो निर्देशक अपनी टीम के साथ तैयार करते हैं। इस फिल्‍म की कहानी से मुझे बलराज शाहनी की फिल्‍म वक्‍त की याद आई। उसमें भूकंप में सब कुछ बर्बाद हो जाता है। मुझे यही डर रहता है कि हम इतनी मेहनत से सब जोड़ते और जमा करते हैं और प्रकृति या मनुष्‍य एक झटके में सब खत्‍म कर देते हैं। अभी हम यहां बैठे हैं(अक्षय कुमार का आवास और दफ्तर जुहू में समुद्र के किनारे है।) और सुनामी आ जाए। मौका भी नहीं मिलेगा। हर सुबह उठ कर यही प्रार्थना करता हूं कि प्रकृति नाराज न हो। सब कुछ खो जाने का भाव मैं समझ सकता हूं। मैं कुवैत से आए लोगों से मिला। उनके किस्‍से सुने। इतने सालों के बाद भी बताते समय उनकी आंखों में आंसू आ जाते थे। निकासी के लिए जरूरी डाक्‍यूमेंट यानी पासपोर्ट आदि नहीं थे उनके पास। वैसे लाखों बदहवास लोगों की निकासी में रंजीत कटियाल ने मदद की थी। हम इस फिल्‍म के अंत में उनके बारे में बताएंगे। हम उनकी तस्‍वीर भी देंगे।
-क्‍या हुआ था और रंजीत कटियाल ने क्‍या किया था?
0 यह तो ऐतिहासिक घटना है। कुवैत में ईराक की घुसपैठ के बाद भारतीयों की निकासी में रंजीत कटियाल ने अग्रणी भूमिका निभायी थी। युद्ध के उस माहौल में सारे इंतजाम करना और उन पर नजर रखना। 56 दिनों तक यह काम चला। हाल ही में यमन में कुछ भारतीय फंसे थे तो ऐसी निकासी की गई थी। कुवैत की निकासी का वर्ल्‍ड रिकार्ड है और इसे अंजाम देने में रंजीत कटियाल की बड़ी भूमिका रही है। यह आसान नहीं है। जब गोलियां उड़ रही हों तो बस एक गोली ही तो लगनी है। रंजीत के साहस ने मुझे प्रभावित किया। मुझे लगता है कि इस हादसे और रंजीत की बहादुरी को टेक्‍स्‍ट बुक में लाना चाहिए। रजीत कटियाल ने जान की परवाह नहीं की। उसने ईराकी अधिकारियों से तालमेल बिठा कर अपने रसूख का इस्‍तेमाल कर भारतीयों को सुरक्षित निकासी दी।
-बहुत ही मुश्किल काम और माहौल रहा होगा ?
0 कुछ हल्‍के प्रसंग भी हैं। भारतीयों की पहचान के लिए ईराकी सैनिक उनसे कहते थे कि हिंदी फिल्‍म के गाने सुनाओ। रंगरूप से कुवैती और भारतीय एक जैसे लगते हैं। इंटरेस्टिंग स्‍टोरी है।
- आप की सहभागिता किन स्‍तरों पर है ?
0 एक्टिंग के साथ मैं इसका एक निर्माता भी हूं। अभी तो हर फिल्‍म के निर्माण में मेरी सहभागिता रहती है। मेरी एक कंपनी केप ऑफ गुड फिल्‍म्‍स के बैनर में है यह फिल्‍म। ानौ साल पुरानी कंपनी है।
- इस फिल्‍म के पहले लुक में आप का पहनावा और खड़े होने के अंदाज में ही भिन्‍नता झलकती है। किसी किरदार को निभाने में ऐसे बदलाव सेक कितनी मदद मिलती है ?
0 पहनावे और लुक के बदलाव से फर्क पड़ता है। पूरा मिजाज ही बदल जाता है। अभी मैं ट्रैक पैंट में हूं तो उछलने और छलांग मारने का मन कर रहा है। बेल्‍ट और टाई काते ही आदमी बदल जाता है। बिजनेस सोचने लगता है। चेहरे पर दाढ़ी-मूंछ आ जाए। आप पगड़ी बांध लें। उस समय आईने में खुद को देखते ही बदलाव की प्रक्रिया आरंभ हो जाती है। पहनावे और लुक के साथ माहौल का भी महत्‍व होता है। हम तो एहसानमंद हैं रसल खेमा के राज परिवार को धन्‍यवाद देना चाहूंगा। उन्‍होंने हमारी पूरी मदद की। हम ने उसे ही कुवैत बनाया है। उन्‍होंने लॉजिस्टिक सुविधाएं भी दीं।
- राजा मेनन नए डायरेक्‍टर हैं। उनके साथ कैसा अनुभव रहा ?
0 मैंने अभी तक 20-22 नए डायरेक्‍टरों के साथ तो काम किया ही होगा। राजा ने पहले ऐड फिल्‍में बनाई हैं। समझदार हैं,तभी तो उन्‍होंने ऐसा विषय लिया।
- आप स्‍वयं अनुशासित हैं और पूरी यूनिट को भी वैसे ही रखते हें।
0 मैंने यह फिल्‍म 32 दिनों में पूरी की है। मैं 250-300 दिनों की फिल्‍में नहीं कर सकता। बेबी 42 दिनों में बनी थी। मेरी फिल्‍मों में इतने दिन ही लगते हैं। मैं संडे को काम नहीं करता। सैटरडे को हाफ डे काम करता हूं। हर तीन महीने के बाद सात दिनों की छुट्टी लेता हूं। साल के डेढ़ महीने छुट्टी करता हूं। घर के ऊपर ऑफिस है। कहीं जाना नहीं पड़ता। ऑफिस में तामझाम नहीं है। ऑफिस का प्राकृतिक माहौल है। सामने समुद्र है। घर या ऑफिस को म्‍यूजियम नहीं बनाया है।
- फिल्‍म में पत्‍नी बनी निम्रत कौर के बारे में बताएं?
0 मेरे खयाल में निम्रत बेहतरीन एक्‍टर हैं। उनके साथ काम करने में मजा आया। वह डिफरेंटली ब्‍यूटीफुल हैं। उनके चेहरे पर गजब को सौंदर्य है। वह उतनी ही अच्‍छी इंसान भी हैं। प्रोफेशनल किस्‍म की हैं। मेहनती हैं और रिहर्सल करती हैं। मुझे भी रिहर्सल करना जूरी लगता है। कुढ एक्‍टर मना कर देते हैं। वे सीधे टेक करती हैं।


Thursday, October 1, 2015

कॉमेडी और एक्‍शन कंफर्ट जोन है- अक्षय कुमार



अक्षय कुमार
    रिलीज के समय फिलमों का प्रचार एक बड़ा काम हो गया है। ज्‍यादा से ज्‍यादा दर्शक तैयार करना मकसद है। सोशल मीडिया के विस्‍फोट के बाद सभी कलाकार उसके भिन्‍न माध्‍यमों के साथ संगत बिठा रहे हैं। इस इंटरव्‍यू के ठीक पहले अक्ष्‍य कुमार ने एक ऐप्‍ के लिए लाइव चैअ किया। जिस तेजी से सवाल आ रहे थे,उस तेजी से एक कलाकार के लिए जवाब दे पाना मुश्किल था। फिर भी अक्षय कुमार उत्‍फुल्लित थे। उन्‍होंने आज कुछ नया सीखा था। बातचीत आरंभ इसी तथ्‍य से हुई कि नई चीजे सामने आ रही है और कलाकारों के लिए चुनौती है कि वे उसके लिए अंगूठों के बल तैयार रहें। वे उन वर ध्‍यान दें। 15 मिनट में दुनिया भर के प्रशंसकों से लाइव कनेक्‍शन बना और उन्‍हें अपने सवालों के जवाब भी मिल गए।
अक्षय कुमार तकनीक के साथ जुड़ना और अपडेट रहना जरूरी मानते हैं,लेकिन साथ ही हिदायत देते हैं कि वर्चुअल दुनिया के साथ-साथ अपनी फिजिकल दुनिया से भी जुड़े रहना जरूरी है। वे कहते हैं, बच्‍चे आज कल मोबाइल या लैपटॉप पर फुटबॉल और क्रिकेट के ऐप खोल कर खेलते रहते हें। इस से वे शार्प होते हैं,लेकिन अपनी दुनिया से वे कटते जा रह हैं। मैं देखता हूं कि समुद्र के किनारे बच्‍चे कम आ रहे हें। वे खुले में नहीं खेल रहे हैं। मुझे लगता है कि रियल खेलों से टच खत्‍म नहीं हो। जीवन के लिए खेल में शरीर का थकना जरूरी है।
    अभी प्रचार के तौर-तरीके बदल गए हैं। अक्षय में भी बदलाव आया है,लेकिन वे स्‍वीकार करते हें,पहले ज्‍यादा मजा आता था। तफसील से बातें होती थीं। अभी 20 दिनों तक हम बोलते रहते हैं। पता ही नहीं चलता कि क्‍या हो रहा है ? खर्च बढ़ रहा है सो अलग। अभी करें तो भी क्‍या ? सभी की जरूरतें पूरी करनी होती हैं। सोशल मीडिया का इंपैक्‍ट बढ़ गया है। सच कहूं तो पहले की बातचीत में माहौल भी आता था। अभी तो दोटूक सवाल होते हैं और उनके दोटूक जवाब होते हें। पहले एक पर्सनल टच रहता था। अब तो ऐसे प्रडयूसर भी नहीं रहे। हमें निर्माता के तौर पर कारपोरेट हाउस के तीन अधिकारी मिलते हें। फिल्‍म बनाने का मजा भी कम हुआ है। अब स्‍टूडियो से बातें होती हैं। हाल ही में मैंने साजिद नाडियाडवाला से कहा कि तुम बने रहना। तुम्‍हारे जैसे इंडेपेंडेंट प्रडयूसर नहीं हैं।
    अक्षय कुमार की सिंह इज ब्लिंग आ रही है। वे इसकी कहानी बताते हैं, इस फिल्‍म की हीरोइन को हिंदी नहीं आती और हीरो को अंग्रेजी नहीं आती। दोनों आपस में बात नहीं कर सकते हैं। फिर एक ट्रांसलेटर आती है। वह अर्थ का अनर्थ कर देती है। उसकी वजह से हमारी जिंदगी तबाह हो जाती है। इस फिल्‍म में ब्लिंग का मतलब है चमकना। दुनिया की आंखों में और अपने मां-बाप की आंखों में चमको1 कुछ चमकदार कर के दिखाओ। ब्लिंग इन योर लाइफ। फिल्‍म में मेरा नाम रफ्तार सिंह है। मैं लोगों की तकलीफें बांटता और कम करता हूं। उसकी वजह से मेरी डांट-डपट होती रहती है। मेरी एक और समस्‍या है कि मैं एक चीज पर फोकस नहीं रहता हूं। हां,यह सही है कि मैं हमेशा खुश रहता हूं और सभी को खुश रखने की कोशिश करता हूं। यह छुट्टियों वाली मौज-मस्‍ती की फिल्‍म है।
    सिंह इज ब्लिंग जैसी फिल्‍म और रफ्तार सिंह जैसा किरदार अक्षय कुमार के लिए थोड़े आसान होते हैं। ऐसे किरदारों में वे खूब जंचते हैं। अक्षय कुमार भी माते हैं, यह मेरा कंफर्ट जोन है। इसमें  मैं आसानी से काम कर लेता हूं। यहां अधिक सोचना नहीं पड़ता। मैं एक्‍शन भी आसानी से कर लेता हूं। मेरे लिए कामेडी और एक्‍शन एफर्टलेस है। अक्षय कुमार अमिताभ बच्‍चन और गोविंदा जैसे चंद कलाकारों में हैं जो पूरे प्रभाव के साथ कॉमिक किरदारों को पर्दे पर कैरी कर लेते हैं। अक्षय सहमति के साथ जोड़ते हें,वे दोनों हमारे जोरदार कलाकार हैं। उन्‍के साथ मुझे नहीं रख सकते। मैं कोशिश करता और दर्शकों को मेरी कोशिश पसंद आ जाती है। अभी एक गैप के बाद ऐसी फिल्‍म कर रहा हूं।