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Tuesday, June 25, 2019

सिनेमालोक : कबीर सिंह के दर्शक


सिनेमालोक
कबीर सिंह के दर्शक
अजय ब्रह्मात्मज

पिछले शुक्रवार को रिलीज हुई ‘कबीर सिंह’ मूल फिल्म ‘अर्जुन रेड्डी’ से अच्छा कारोबार कर रही है. ‘अर्जुन रेड्डी’ ने कुल 51 करोड़ का कारोबार किया था, जबकि ‘कबीर सिंह’ ने तीन दिनों के वीकेंड में 70 करोड़ का आंकड़ा पार कर लिया है. अगले दो नहीं तो तीन दिनों में यह 100 करोड़ी क्लब में शामिल हो जाएगी. कारोबार के लिहाज से ‘कबीर सिंह’ कामयाब फिल्म है. जाहिर है इसकी कामयाबी का फायदा शाहिद कपूर को होगा. वे इस की तलाश में थे. पिछले साल ‘पद्मावत’ ने जबरदस्त कमाई और कामयाबी हासिल की, पर उसका श्रेय संजय लीला भंसाली दीपिका पादुकोण और रणवीर सिंह के बीच बंट गया था. ‘कबीर सिंह’ में शाहिद कपूर अकेले नायक हैं, इसलिए पूरे श्रेय कि वे अकेले हकदार हैं.
इस कामयाबी और शाहिद कपूर के स्टारडम के बावजूद ‘कबीर सिंह’ पर बहस जारी है. आलोचकों की राय में यह फिल्म स्त्रीविरोधी और मर्दवादी है. पूरी फिल्म में स्त्री यानि नायिका केवल उपभोग (कथित प्रेम) के लिए है. फिल्म के किसी भी दृश्य में नायिका प्रीति आश्वस्त नहीं करती कि वह 21वीं सदी की पढ़ी-लिखी मेडिकल छात्र हैं, जिसका अपना एक करियर भी होना चाहिए. मुग्ध दर्शकों को नायिका के इस चित्रण पर सवाल नहीं करना है? उन्हें ख्याल भी नहीं होगा कि वह स्वतंत्र व्यक्ति के रूप में क्यों नहीं उभरती हैं? फिल्म के आरंभिक संवाद में ही नायक घोषणा करता है कि ‘प्रीति मेरी बंदी है’. ‘बंदी’ का एक अर्थ लड़की है लेकिन उसका दूसरा शाब्दिक/लाक्षणिक अर्थ ‘कैदी’ भी तो है. पूरी फिल्म में वह कैदीद ही नजर आती है. कभी कबीर सिंह की तो कभी अपने पिता की. इन दोनों के बाद वह परिस्थिति की भी कैदी है. लेखक-निर्देशक ने उसे गर्भवती बनाने के साथ पंगु भी बना दिया है. कबीर से अलग होने के बाद वह मेडिकल प्रैक्टिस भी तो कर सकती थी.
फिल्म के समर्थकों का आग्रह है कि कबीर सिंह के किरदार को पर्दे पर जीवंत करने के लिए शाहिद कपूर की तारीफ की जानी चाहिए. फिल्म के शिल्प और सभी तकनीकी पक्षों पर भी बातें होनी चाहिए. इस आग्रह में बुराई नहीं है, लेकिन हमें यह भी सोचना चाहिए कि क्या ऐसे (खल)नायक की सराहना होनी चाहिए. साहित्य और फिल्मों में इसे हम ‘एंटी हीरो’ के नाम से जानते हैं. फिल्म का ऐसा नायक जिसमें नेगेटिव और ग्रे शेड हो. हॉलीवुड की फिल्मों में एंटी हीरो’ का अच्छा-खासा ट्रेडिशन रहा है. हिंदी फिल्मों में भी ‘एंटी हीरो’ का क्रेज रहा है अमिताभ बच्चन का फिल्मी विशेषण ‘एंग्री यंग मैन’ इसी ‘एंटी हीरो’ का पर्याय था. अनिल कपूर,शाह रुख खान और अन्य अभिनेताओं ने भी ‘एंटी हीरो’ के किरदार निभाए हैं.
गौर करें तो हिंदी फिल्मों में एंटी हीरो के पीछे सलीम-जावेद तर्क ले लिए आते थे. नायक के साथ हुए अन्याय की पृष्ठभूमि रहती थी, जिसमें उसकी नेगेटिव और गैरकानूनी गतिविधियां उचित लगती थीं. सारे चित्रण और ग्लेमर के बावजूद फिल्म के अंतिम दृश्य में एंटीहीरो को अपराध बोध और पश्चाताप से ग्रस्त दिखाया जाता था. उसे ग्लानि होती थी. वह अपने लिए और अपनी गलतियों के लिए अफसोस जाहिर करता था. भारतीय शास्त्रों, नाटकों और सिनेमा में खलनायकों को गरिमा प्रदान नहीं की जाती है. उन्हें रोमांटिसाइज़ नहीं किया जाता. ‘कबीर सिंह’ का नायक किसी ग्लानि में नहीं आता. उसे अपनी करतूतों पर पश्चाताप भी नहीं होता है. वह लड़कियों को महज उपभोग की वस्तु समझता है. चाकू की नोक पर उनके कपड़े उतरवाता है. डॉक्टर दोस्तों के मरीजों से हवस मिटाता है. प्रेमिका के विछोह में वह व्यभिचारी हो जाता है. ताज्जुब यह है कि  दर्शक उसे पर्दे पर देखकर लहालोट हो रहे हैं. तालियां बजा रहे हैं. सोशल मीडिया पर उसके पक्ष में तर्क के गढ़ रहे हैं.
‘कबीर सिंह’ के प्रशंसकों और समर्थकों को लगता है कि शाहिद कपूर ने अपने कैरियर का सर्वश्रेष्ठ अभिनय इस फिल्म में किया है. अभिनय की श्रेष्ठता और उदात्तता की सभी परिभाषाओं को भूलकर वे इस किरदार से मोहित हैं. देर-सबेर इस फिल्म की कामयाबी का सामाजिक अध्ययन होगा. कारण खोजे जाएंगे कि 2019 के जून में क्यों ‘कबीर सिंह’ जैसी फिल्म दर्शकों को पसंद आई. कारण स्पष्ट है. हमारा समाज जिस तेजी से पुरुष प्रधानता को प्रश्रय दे रहा है और उसकी बेजा हरकतों को उचित ठहरा रहा है. जिस देश में दिन-रात बलात्कार हो रहे हैं. अपराधियों को सजा नहीं मिल पा रही है. जिस समाज में बेटियों की भ्रूण हत्या से लेकर दहेज हत्या तक आम है, गली मोहल्लों में लड़कियों पर भद्दी टिप्पणियां और इशारे करने में युवकों को गुरेज नहीं होता... उस समाज और देश में ‘कबीर सिंह’ की जलील और अश्लील हरकतों में कोई खामी क्यों दिखेगी?
आज ऐसे किरदार का नाम कबीर रखा गया है. कल राम,कृष्ण, मोहम्मद, यीशु,विवेकानंद,बुद्ध, गाँधी,नानक भी हो सकता है. जब पूरा जोर कमाई और कामयाबी पर हो तो क्रिएटिव कर्तव्य की कौन सोचे?


Tuesday, June 4, 2019

सिनेमालोक : कोरियाई यथार्थ की भावुक पारिवारिक फिल्म


सिनेमालोक
कोरियाई यथार्थ की भावुक पारिवारिक फिल्म
अजय ब्रह्मात्मज
कल ‘भारत’ रिलीज होगी. सलमान खान की इस प्रतीक्षित फिल्म के निर्देशक अली अब्बास ज़फर हैं. दोनों की पिछली फिल्मों ‘टाइगर जिंदा है’ और ‘सुल्तान’ ने अच्छा कारोबार किया था. ‘भारत’ के साथ तिगडी पूरी होगी. ऐसा माना जा रहा है कि यह फिल्म भी तगड़ा कारोबार करेगी. एक तो ईद का मौका है. दूसरे इसमें कट्रीना कैफ भी हैं. हालाँकि फिल्म के ट्रेलर और गानों को दर्शकों का जबरदस्त रेस्पोंस नहीं मिला है,लेकिन ट्रेड पंडितों को लग रहा है कि सलमान को देखने की बेताबी फिल्म का बिज़नस बढ़ाएगी. उनका जोर इस बात पर है कि क्या ‘भारत’ 300 करोड़ का कारोबार कर पायेगी.
फिल्मों के एक्टिव दर्शकों को मालूम होगा कि ‘भारत’ कोरियाई फिल्म ‘ओड टू माय फादर’(कुकसेजिंघ) की अधिकारिक रीमेक है. कोरियाई फिल्म 2014 में आई थी. इस फिल्म को देख कर सलमान खान इतने प्रभावित हुए थे कि उन्होंने अभी के प्रिय नर्देशक अली अब्बास ज़फर को इसे देखने के लिए उकसाया और हिंदी में भारतीय रूपांतर के लिए प्रेरित किया. कोरिई फिल्म देख रहे हिंदी दर्शक जानते हैं कि वहां की फिल्मों के इमोशन हिंदी फिल्मों जैसे ही होते हैं. पहले तो बगैर अधिकार और अनुमति लिए ही भारतीय निर्देशक चोरी-चोरी उन्हें हिंदी में बना लेते थे. अब इस तरह की चोरियां लगभग ख़त्म हो गयी हैं. अली अब्बास ज़फर ने ‘ओड टू माय फादर’ के मूल भाव को वैसे ही रखा है. भारतीय संदर्भ के लिए थोड़ी तब्दीलियाँ की हैं.
‘ओड टू माय फादर’ नायक सू देयोक की कहानी है. 23 दिसम्बर 1950 को युद्ध छिड़ने के बाद आज के उत्तर कोरिया के एक तटीय बस्ती को खाली करवाया जा रहा है. शिप में चढ़ने की हड़बोंग में सू का परिवार(पिता और बहन) बिखर जाता है. जाते-जाते उसके पिता हिदायत देते हैं कि परिवार का ख्याल रखना,क्योंकि आज से तुम ही परिवार के मुखिया हो. फिल्म सूके साथ साल के जीवन संघर्ष को समेटती है. पिता और बहन से मिलने की उम्मीद में वह पूरी जिंदगी कटता है. यह फिल्म दक्षिण कोरिया के इतिहास के साथ आगे बढती है. सारे ऐतिहासिक क्षणों को कैद करती यह फिल्म समय के थपेड़ों से जूझते एक परिवार की कहानी कहती है. बुरे दिनों में भी वे एक-दूसरे का सहारा बनते हैं. फिल्म का नायक जर्मनी और विएतनाम भी जाता है. इस फिल की सबसे बड़ी खूबी है कि भावनात्मक झंझावातों में यह अपनी ज़मीन नहीं छोडती. रियल रहने की कोशिश करती है. फिल्म में ऐसे प्रसंग हैं,जहाँ कठोरदिल दर्शकों की भी आँखें नम होती हैं. इस फिल्म ने कोरिया में ऐतिहासिक कारोबार किया था.
अब देखना है कि अली अब्बास ज़फर की कलम मूल कहानी का कैसे भारतीयकारन करती है. फिल्म के ट्रेलर और प्रमोशनल विडियो में कुछ महत्वपूर्ण दृश्य जस के तस दिख रहे हैं. इस फिल्म में नायक बहरत के बंटवारे से छह दशकों का सफ़र तय करता है. ‘भारत’ में सलमान खान को पांच उम्र के छह लुक दिए गए हैं. परदे पर सलमान की मौजूदगी आकर्षक होती है,लेकिन क्या वे किरदार की उम्र की भिन्नता को सही अंदाज और आवाज़ दे पाएंगे? इस फिल्म कट्रीना कैफ और दिशा पटनी के उपयोग के लिए कुछ गाने भी रखे गए हैं. हिंदी फिल्म है तो प्रेम कहानी का होना लाजिमी है. ऐसे में कतई ज़रूरी नहीं है ‘भारत’ मूल को फॉलो करे,लेकिन यह उम्मीद तो रहेगी ही कि यह मूल की तरह ही भावनाओं का उद्रेक कर सके. साथ ही बंटवारे के दर्द में जी रहे किरदारों की तकलीफ भी जाहिर कर सके. अली अब्बास ज़फर का दावा है कि उनकी टीम ने गहरे शोध और अध्ययन से पीरियड क्रिएट किया है. अधिकतम प्रामाणिक होने की कोशिश की है. फिल्म देखने के पहले किसी प्रकार की अशंक नहीं की जानी चाहिए. उम्मीद है कि अली अब्बास ज़फर ने ऐसी कहानी के लिए ज़रूरी परिपक्वता बरती होगी और सलमान खान की पूरी सहमती रही होगी.
सचमुच ‘भारत’ कोरियाई फिल्म ‘ओड टू माय फत्दर’ के करीब हुई तो यह हिंदी की एक उल्लेखनीय फिल्म साबित होगी.