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Tuesday, April 23, 2019

सिनेमालोक : दमकते मनोज बाजपेयी


सिनेमालोक
दमकते मनोज बाजपेयी
-अजय ब्रह्मात्मज
हिंदी फिल्मों में काम करते हुए मनोज बाजपेयी को 25 साल हो गए.इन 25 सालों में मनोज बाजपेयी ने अपनी प्रतिभा और मेहनत से खास मुकाम हासिल किया है. बिहार के बेलवा गाँव से दिल्ली होते हुए मुंबई पहुंचे मनोज बाजपेयी को लम्बे संघर्ष और अपमान से गुजरना पड़ा है. 1994 में उनकी पहली फिल्म ‘बैंडिट क्वीन’ आ गयी थी. इस फिल्म में मान सिंह के किरदार से उन्होंने यह तो जाहिर कर दिया था कि वे रंगमंच की तरह परदे पर भी प्रभावशाली मौजूदगी रखते हैं. नाटक और रंगमंच में सक्रिय अधिकांश अभिनेता की इच्छा बड़े परदे पर आने की रहती है,लेकिन बहुत कम को ही कैमरा,निर्देशक और दर्शक स्वीकार कर पाते हैं. मनोज बाजपेयी को भी वक़्त लगा. ‘बैंडिट क्वीन’ की सराहना और मुंबई के निमंत्रण से उत्साहित होकर वे मुंबई आ गए थे.
मुंबई में एक चर्चित और बड़े निर्देशक ने उन्हें मुंबई में मिलने का न्योता दिया था. स्वाभाविक रूप से मनोज को लगा था कि मुंबई पहुँचते ही फ़िल्में मिलने लगेंगी. कुछ कोशिशों के बाद उक्त निर्देशक से मुलाक़ात हुई तो उन्होंने दुत्कार दिया. उनकी प्रतिक्रिया का भाव था कि मिलने के लिए कहा था. काम यानि कि फिल्म देने की तो बात नहीं हुई थी. आरंभिक कुछ झटकों में से यह पहला झटका था. मनिज चेत गए और उन्होंने फिल्मों में काम पाने की रणनीति बदल दी. उन्होंने धैर्य से काम लिया और सही समय की प्रतीक्षा की. इस दौर में उन्हें महेश भट्ट से ज़रूरी संबल मिला. मनोज ने कभी बताया था कि वे तो बोरिया-बिस्तर समेत कर दिल्ली लौटने को तैयार थे,लेकिन महेश भट्ट ने उन्हें रोका.उन्होंने लगभग भविष्यवाणी सी कर दी कि सालों बाद ऐसा प्रतिभाशाली अभिनेता आया है.
और फिर वक़्त व मौका आया. रामगोपाल वर्मा ने मनोज को देखा तो उन्हें अपनी अगली फिल्म का किरदार मिल गया. शेखर कपूर के प्रशंसक रामगोपाल वर्मा को ‘बैंडिट क्वीन’ में मनोज पसंद आये थे,लेकिन उन्हें खोज पाने का कोई तरीका नहीं था. ‘दौड़’ फिल्म के समय मुलाक़ात हुई तो रामगोपाल वर्मा ने माना भी किया कि इस फिल्म की छोटी भूमिका न करो. वे ‘सत्या’ में भीखू म्हात्रे की भूमिका उन्हें देने का मन बना चुके थे. आश्वासनों से मनोज का मोहभंग हो चूका था. उन्होंने ‘दौड़’ नहीं छोड़ी. रामगोपाल वर्मा ने अपना वडा पूरा किया.’सत्या’ के भीखू म्हात्रे ने सभी को मिहित किया. हिंदी फिल्मों में ऐसे नेगेटिव किरदार बहुत ही कम हैं,जिन्हें दर्शक सिर-माथे पर बिठाते हों. उसके बाद तो फिल्मों कि झड़ी लग गयी. यह वही दौर था जब कामयाबी के असर में उनसे फिल्मों और भूमिकाओं के चुनाव में गलतियाँ भी हुईं.
समय के साथ मनोज बाजपेयी संभले. उन्होंने अपने सामर्थ्य के साथ सम्भावना पर विचार किया. फिल्मों के चुनाव में सजग हुए. नतीजा यह हुआ कि उन्हें दो बार राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गे. और इस साल उन्हें भारत सर्कार ने पद्मश्री से नवाज़ा.गाँव से निकले किसी कलाकार के लिए यह उल्लेखनीय यात्रा है. इस यात्रा के धूप-छाँव ने मनोज को गढ़ा है. वे हिंदी फिल्मों में प्रचलित किसी होड़ में शामिल नहीं हैं. उनकी जुदा राह है. इस राह में अधिक चमक नहीं है,लेकिन सोच की पुख्तगी है. मनोज बाजपेयी बाद की पीढ़ियों के लिए मिशल बन चुके हैं. वे एक साथ प्रायोगिक और मुख्यधारा की फ़िल्में कर रहे हैं. उन्होंने शार्ट फिल्म और वेब सीरीज को भी स्वीकार किया है. एक अन्तराल के बाद वे रंगमंच पर भी आने का मन बना रहे हैं.
25 सालों के इस सफ़र के बाद भी मनोज बाजपेयी के कदम ना तो थके आहें और न रुके हैं. वे आगे बढ रहे हैं. कम लोगों को मालूम है कि नयी प्रतिभाओं को आगे बढ़ाने में वे कभी पीछे नहीं रहते. मुझे याद है कि ‘गैंग्स ऑफ़ वासेपुर’ की शूटिंग से लौटने के बाद उन्होंने नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी के बारे में कहा था कि उसे खूब सराहना मिलेगी. और यही हुआ.
आज मनोज बाजपेयी का जन्मदिन है. जन्मदिन कि बधाई के साथ उनके आगामी करियर के लिए शुभकामनाएं.

Tuesday, April 16, 2019

सिनेमालोक : अब समीक्षकों की संस्था देगी पुरस्कार


सिनेमालोक 
अब समीक्षकोंकी संस्था देगी पुरस्कार 

-अजय ब्रह्मात्मज

देश में अनेक फिल्म पुरस्कार हैं. हर मीडिया हाउस के अपने पुरस्कार हैं.इनके अलावा स्थानीय और राष्ट्रीय स्टार पर कुछ समोह्ह या संगठन भी फिल्म पुरस्कार बाँटते हैं. इनमे सबसे अधिक सम्माननीय भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अधीन दिया जाने वाल राष्ट्रीय पुरस्कार है.यह पुरस्कार देश भर की फ़िल्मी गतिविधियों में से श्रेष्ठ कृति और व्यक्ति को दिया जाता है. कतिपय विवादों के बावजूद इस पुरस्कार की खास प्रतिष्ठा है. मुंबई में मैंने देखा है कि कलाकार और फ़िल्मकार अपने दफ्तर और बैठकी में इसे फ्रेम करवा कर रखते हैं. निश्चित ही यह उनके लिए गर्व और दिखावे की बात होती है.
ज्यादातर फिल्म पुरस्कार टीवी इवेंट बन चुके हैं. इन पुरस्कारों के स्पोंसर और आयोजकों की रुचि श्रेष्ठ काम से अधिक लोकप्रिय नाम में होती है, इसके अलावा फिल्म के कारोबार को भी मद्देनज़र रखा जाता है. नतीजा यह होता है कि श्रेष्ठ काम और नाम पुरस्कृत नहीं हो पाते. इन पुरस्कारों की मर्यादा इतनी गिर चुकी है कि कुछ शीर्षस्थ फ़िल्मकार और कलाकार इसमें भाग ही नहीं लेते. उनके बहिष्कार से ज्यादा फर्क नहीं पड़ता. ये पुरस्कार बदस्तूर चल रहे हैं. कलाकारों और फिल्मकारों को मालोम्म रहता कि उन्हेंक्यों नहीं ' याक्यों' पुरस्कार दिया जा रहा है? फोर भी वे ट्राफी के साथ माकली मुस्कान में नज़र आते हैं. मंच से पुरस्कार मिलने की ख़ुशी जाहिर करते हैं.
इन पुरस्कारों में एक केटेगरी होती हैक्रिटिक' अवार्ड. यह प्रायः उन समर्थ कलाकारों और फिल्मों को दिया जाता है,जिन्हें नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता. ऐसे सराहे गए कलाकारों को छोड़ने पर पुरस्कार कि विश्वसनीयता पूरी तरह से संदिग्ध हो जाती है. फिल्म बिरादरी में इसे सांत्वना पुरस्कार भी माना जाता है. मुख्य केटेगरी से बाहर खड़े कद्दावर सृजनशील नाम और काम को मजबूरन तवज्जो देने की कोशिश साफ़ दिखती है.क्रिटिक' पुरस्कार धीरे-धीरे अपनी महत्ता खो चूका है.
ई साल से एक नया पुरस्कार आरम्भ हो रहा है. इसेक्रिटिक चॉइस फिल्म अवार्ड'(सीसीएफए) नाम दिया गया है. यह देश भर के फिल्म क्रिटिक की नवगठित संस्थाफिल्म क्रिटिक गिल्ड' द्वारा आरम्भ किया गया है. पिछले साल गिल्ड ने शोर्ट फिल्म के पुरस्कारों के बाद फीचर फिल्मों के लिए भी पुरस्कारों कि घोषणा की है. यह पुरस्कार इसी हफ्ते 21 अप्रैल को मुंबई में प्रदान किया जायेगा. आयोजन से पहले ही इसे लेकर उत्सुकता बनी हुई है. इसके नॉमिनेशन कि घोषणा के लिए आई विद्या बालन ने कहा था कि यह देश का विश्वसनीय पुरस्कार होगा. निस्संदेह उनके इस बयां में सच्चाई है. उनके साथ आई जोया अख्तार भी यही मानती हैं.
फ़िलहाल फिल्म क्रिटिक गिल्ड के 34 सदस्य हैं. ये सभी सालों से फिल्म समीक्षा करते आ रहे हैं.पत्र-पत्रिकाओं से आगे बढ कर ऑनलाइन,वेब,ब्लॉग और अन्य प्लेटफार्म के जरिये वे अपनी समीक्षाएं और टिप्पणियां प्रकाशित करते रहे हैं. ये सारे समीक्षक अपने दायरे में लोकप्रिय और प्रशंसित हैं. इनमें से 27 समीक्षक हिंदी फिल्मों की नियमित समीक्षा करते हैं. इरादा है कि इस पुरस्कार का अखिल भारतीय स्वरुप हो. इस साल समय और संसाधनों की कमी से केवल हिंदी में सभी केटेगरी के अवार्ड दिए जायेंगे. बाकि हिंदी के अलावा देश की अन्य सात भाषाओं की सर्वश्रेष्ठ फिल्म को पुरस्कृत किया जायेगा. कोशिश है कि अगले साल से उन भाषाओं में भी सारे पुरस्कार दिए जाएँ.
पुरस्कारों की गिरती गरिमा के बीच देश भर के चुनिन्दा समीक्षकों का यह प्रयास सराहनीय है.


Tuesday, April 9, 2019

सिनेमालोक : हिंदी फिल्मों की पहली तिमाही


सिनेमालोक : हिंदी फिल्मों की पहली तिमाही
-अजय ब्रह्मात्मज
2019 के तीन महीने बीत गए. इन तीन महीनों में 30 से अधिक फ़िल्में रिलीज़ हुई हैं. कामयाबी और कलेक्शन के लिहाज से बात करें तो नतीजे बुरे नहीं दिख रहे हैं. कुछ फिल्मों की कामयाबी और कलेक्शन ने चौंकाया है. जनवरी से मार्च के बीच रिलीज़ फिल्मों में अभी तक किसी फिल्म ने उम्मीदों पर पानी नहीं फेरा है. ऐसी कोई फिल्म आई भी नहीं है,जिसका प्रचार बहुत ज्यादा हो. लोकप्रियता के ऊपरी पायदान पर बैठे सितारों की फ़िल्में नहीं आई हैं,इसलिए कोई ज़ोरदार झटका नहीं लगा है. इस लिहाज से अगली तिमाही में सलमान खान और रितिक रोशन की फ़िल्में आएंगी तो फिर सफलता और निराशा पर नए सिरे से बातें होंगी.
जनवरी के पहले हफ्ते में हिंदी फ़िल्में नहीं रिलीज़ करने का अंधविश्वास चला आ रहा है. माना जाता है कि पहले हफ्ते में रिलीज़ हुई फ़िल्में बिलकुल नहीं चल पातीं. इस साल भी यही हुआ,लेकिन दूसरे हफ्ते में 11 जनवरी को आई ‘उडी : द सर्जिकल स्ट्राइक’ ने तो कामयाबी के नए रिकॉर्ड बना कर विकी कौशल को स्टारडम की अगली कतार में ला दिया. इस फिल्म ने भारत में 244 करोड़ का कारोबार कर लिया है. भारत-पाकिस्तान तनाव और स्ट्राइक के दौर में सेना के जोश और देशभक्ति की भावना से भरपूर फिल्म को दर्शकों ने पसंद किया. ऊपर से प्रधानमंत्री ने फिल्म के संवाद ‘हाउ इज द जोश’ को सार्वजनिक मंचों से दोहरा कर फिल्म को एंडोर्स कर दिया. अक्षय कुमार की ‘केसरी’ के प्रति भी दर्शकों की देशभक्ति का ऐसा ही जोश दिखा,जबकि यह फिल्म इतिहास को एक निरपेक्ष सन्दर्भ देकर पेश करती है. सिखों की बहादुरी का बेबुनियाद ढोल पीटा गया. अब इतिहासकार और टिप्पणीकार सवाल उठा रहे हैं कि उनकी बहादुरी का उद्देश्य क्या था?
बहरहाल,पहली तिमाही में चार फिल्मों ने 100 करोड़ से अधिक का कारोबार किया.. ‘उड़ी : द सर्जिकल स्ट्राइक’ के अलावा ‘टोटल धमाल’(155 करोड़ ), ‘गली बॉय’( 139 करोड़) और ‘केसरी’( 134 करोड़) ने 100 करोड़ से ज्यादा का कारोबार किया. ‘टोटल धमाल’ में 50 और उससे अधिक उम्र के सारे कलाकार और निर्देशक थे. फिल्म की कॉमेडी भी लतीफों पर आधारित पुरानी किस्म की थी,लेकिन दर्शक लहालोट हो रहे थे. फिल्म में द्विअर्थी संवाद नहीं होने की दुहाई दी गयी और फैमिली दर्शकों को लुभाया गया. उनकी रणनीति काम आई.’गली बॉय’ मुंबई शहर की मलिन बस्ती के युवक की महत्वाकांक्षा को जोया अख्तर ने हिप-हॉप संगीत के सहारे पकड़ा और पेश किया. इस फिल्म में रणवीर सिंह और आलिया भट्ट की जोड़ी युवा दर्शकों को पसंद आई.’केसरी’ सिखों के शौर्य और बहादुरी के सहारे सफल रही. चारों 100 करोड़ी फिल्मों के साथ ‘मणिकर्णिका’(94 करोड़),’लुका छुप्पी’(92 करोड़) और ‘बदला’(83 करोड़) भी दर्शकों को पसंद आई हैं. कंगना रनोट,कार्तिक आर्यन,कृति सैनन और तापसी पन्नू के स्टारडम में इजाफा हुआ.
पहली तिमाही में कुछ कंटेंट प्रधान फ़िल्में भी आयीं. हालाँकि ऐसा लग रहा है कि सीमित बजट के स्वतंत्र सिनेमा का दौर समाप्त हो गया है, लेकिन ‘एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा’,’हामिद’,’फोटोग्राफ’.’मर्द को दर्द नहीं होता’ और ‘सोनचिड़िया’ जैसी फिल्मों को मिली सराहना से जाहिर हुआ कि दर्शक प्रयोगात्मक और नए विषयों कि फ़िल्में भी पसंद करने लगे हैं. मल्टीप्लेक्स के दौर में छोटी और सीमित बजट की फिल्मों की यह समस्या गहरी होती जा रही है कि उनके शो कैसे निर्धारित किये जाएँ कि अपेक्षित दर्शक आनंद उठा सकें. इन सभी फिल्मों को मल्टीप्लेक्स में प्राइम शो मिलते तो कमाई का आंकड़ा भी ऊपर जाता.
पहली तिमाही में रिलीज़ हुई 30 से अधिक फिल्मों में से अधिकांश फ़िल्में असफल रहीं और दर्शकों की नज़र में भी नहीं आयीं. गौर करें तो सफल-असफल फिल्मों का अनुपात और प्रतिशत ऐसा ही रहता है. पहली तिमाही में सात फिल्मों को सफल माना जा सकता है. यह अच्छा अनुपात है.

Tuesday, April 2, 2019

सिनेमालोक : 50 के हुए अजय देवगन


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50 के हुए अजय देवगन
-अजय ब्रह्मात्मज
वीरू देवगन के बेटे अजय देवगन आज 50 के हो गए.वे काजोल के पति हैं.उनकी पहली फिल्म ‘फूल और कांटे’ है. इसे कुक्कू कोहली ने निर्देशित किया था. इसी साल यश चोप्रा निर्देशित अनिल कपूर और श्रीदेवी की फिल्म ‘लम्हे’ भी रिलीज हुई थी. तब किसी को अनुमान नहीं था कि सामान्य चेहरे के अजय देवगन की फिल्म 1991 की बड़ी हिट साबित होगी. हिंदी सिनेमा का यह वैसा दौर था,जब मेलोड्रामा और गिमिक का खूब सहारा लिया जाता था. एक गिमिक हीरो की एंट्री हुआ करती थी.’फूल और कांटे’ में अजय देवगन दो मोटरसाइकिल पर खड़े होकर आते हैं. इस सीन पर तालियाँ बजी थीं और अजय देवगन एक्शन स्टार मान लिए गए थे. एक्शन डायरेक्टर के बेटे को एक्शन स्टार बताने के साथ हिंदी फिल्म इंडस्ट्री ने अजय देवगन के लिए एक अलग केटेगरी तय कर दी थी.
हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में लॉबी और ग्रुप के समीकरण बनते-बिगड़ते रहते हैं. बहार से देखने पर लग सकता है कि अजय देवगन तो इनसाइडर हैं. उनके पिता स्थापित एक्शन डायरेक्टर रहे हैं तो अजय की लौन्चिंग में कोई दिक्कत नहीं हुई होगी. सच्छायी कुछ और है. इनसाइडर की अपनी व्यवस्था और अनुक्रम है...आप किसी स्टार की संतान हैं,या डिरेक्टर की या किसी तकनीशियन की....परिवार की इस लिगेसी के आधार पर आपका स्थान तय किया जाता है. अजय देवगन एक्शन डायरेक्टर के बेटे थे,इसलिए उन्हें दूसरे स्टारकिड जैसी स्वीकृति नहीं मिली और न ही पहले से कोई हलचल मची. अजय ने अपनी प्रतिभा से लोहा मनवाया और पहली फिल्म से ही स्टार की कतार में खडे हो गए. उन्हें फिल्मफेयर का बेस्ट डेब्यू अवार्ड मिला. बाद में तो उन्हें ‘ज़ख्म’ और ‘द लीजेंड ऑफ़ भगत सिंह’ के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिले.
अजय देवगन अपनी पीढ़ी के लहदा अभिनेता हैं. कहते हैं उनकी आँखें बोलती हैं. निश्चित ही वे अपनी आँखों का सार्थक उपयोग करते हैं. उनकी अदाकारी की खास बात है कि वे समकालीन अभिनेताओं से अलग किसी भी किरदार को अंडरप्ले करते हैं. उनके निर्देशक उनकी चाल का भी इस्तेमाल करते हैं. उनकी ज्यादातर फिल्मों में उन्हें एक खास वाक के साथ कुछ दूरी तय करनी होती है और फिर दृश्य आरम्भ होता है. एक बार मैंने अपने इस निरिक्षण के बारे में उनसे पूछा था तो वे हंस पड़े थे. उन्होंने स्वीकार करते हर जवाब दिया था कि आपने सही गौर किया है. ऐसा लगभग सभी फिल्मों में मेरे साथ होता है. शायद उन्हें सीन ज़माने में इससे मदद मिलती हो. उनकी चाल और आँख के साथ ही दृश्यों और शॉट में उनक किफायती होना निर्देशकों और निर्माता के लिए फायदेमंद होता है.
किफायती अभिनय से तात्पर्य कम से कम रिटेक में अपना शॉट पूरा करना. सीन की ज़रुरत के मुताबिक एक्सप्रेशन रखना. ज्यादा फुटेज नहीं खाना और अपने शॉट में पर्याप्त स्फूर्ति रखना. फिल्म ढीली और कमज़ोर हो तो भी अजय देवगन के शॉट डल नहीं होते. उनकी कोशिश रहती है कि स्क्रिप्ट के अभिप्राय को अच्छी तरह व्यक्त करें, ज्यादातर निर्देशक उन्हें दोहराना पसंद करते हैं. गौर करें तो निर्देशकों ने उनकी अलग-अलग खासियत को पकड़ लिया है और वे उनके उसी आयाम को अपनी फिल्मों में दिखाते हैं. जैसे कि रोहित शेट्टी उनके व्यक्तित्व में मौजूद कॉमिक स्ट्रीक का ‘गोलमाल सीरीज में इस्तेमाल करते हैं तो सिंघम सीरीज में उनका रौद्र रूप दिखाई पड़ता है.
अजय देवगन को लगता नहीं है कि वे किसी विचलन के शिकार हैं या कमर्शियल सिनेमा उनका बेजा इस्तेमाल भी करता है. वे ‘टोटल धमाल’ जैसी फ़िल्में भी उसी संलग्नता से करते दिखाई पड़ते हैं,जबकि लगता है कि उनके जैसा होनहार एक्टर ऊल्जल्लो दृश्यों को कैसे हैंडल करता होगा? कोई कचोट तो उठती होगी? अगर ऐसा नहीं होता तो उन्हें बताना चाहिए कि इसे उन्होंने कैसे साधा है?
उन्हें जन्मदिन की बधाई!