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Sunday, March 31, 2019

संडे नवजीवन : मोदी चरित की हड़बड़ी


मोदी चरित की हड़बड़ी
-अजय ब्रह्मात्मज
चुनाव के मौसम में नेताओं के जीवन की झांकियां शब्दों में प्रस्तुत की जाती रही हैं.कोई चालीसा लिखता है तो कोई पुराण...कुछ पॉपुलर फ़िल्मी धुनों पर गीत बनाते हैं.चुनाव के दौरान ऑडियो-वीडियो के जरिये नेताओं और संबंधित पार्टियों के बारे में आक्रामक प्रचार किया जाता है. एक ही कोशिश रहती है कि मतदाताओं को को लुभाया जा सके.पहली बार ऐसा हो रहा है कि सत्ताधारी प्रधानमंत्री के जीवन पर एक फिल्म और एक वेब सीरीज की तैयारी चल रही है.इन्हें भाजपा की तरफ से आधिकारिक तौर पर नहीं बनवाया जा रहा है,लेकिन उक्त पार्टी का मौन व मुग्ध समर्थन है.पूरी कोशिश है कि चुनाव के पहले इन्हें दर्शकों के बीच लाकर उनके मतों को प्रभावित किया जाए. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को बड़े परदे के साथ डिजिटल प्लेटफार्म पर पेश करने की हड़बड़ी स्पष्ट है.
फिल्म ‘पीएम नरेन्द्र मोदी’ और वेब सीरीज ‘मोदी’ का निर्माण चुनाव के मद्देनज़र ही हो रहा है. निर्माता संदीप सिंह,सुरेश ओबेरॉय,आनंद पंडित और आचार्य मनीष ने जनवरी के पहले हफ्ते में ‘पीएम नरेन्द्र मोदी’ का फर्स्ट लुक अनेक राष्ट्रिय भाषाओँ में जरी किया था. थी की तीन महीनों के बाद यह फिल्म 5 अप्रैल को रिलीज होने जा रही है. गौर करें तो फिल्म की रिलीज की पहली घोषणा 12 अप्रैल थी. 11 अप्रैल से आरम्भ हो रहे चुनाव को ध्यान में रखते हुए इसकी तारीख 5 अप्रैल कर दी गयी. निर्माता,निर्देशक और अभिनेता को संभवतः मुगालता है कि वे अपनी फिल्म से दर्शकों को प्रभावित कर सकेंगे. फिल्म का ट्रेलर आ चुका है.ट्रेलर में शामिल मोदी के संवादों को गौर से सुनें तो स्पष्ट हो जायेगा कि निर्देशक ओमंग कुमार का क्या मकसद है. यह ट्रेलर स्वयं मोदी ने भी देखा होगा और मुमकिन है कि उनके करीबी फिल्म भी देख चुके हों. अभी तक कहीं से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है.हां,आम दर्शकों को यह ट्रेलर रत्ती भर भी फिल्म देखने के लिए प्रेरित नहीं कर सका है. खास दर्शकों की बात दीगर है. वे इसे देखेंगे और दिखायेंगे.
‘पीएम’ मोदी पर बनी फिल्म की कहानी अभी नहीं मालूम.ट्रेलर और कास्टिंग से  संकेत मिल रहा है कि इसमें उनकी मां,पत्नी,अमित शाह और रतन टाटा किरदार के तौर पर दिखेंगे. चाय बेचने से शुरु हुई उनकी यात्रा संन्यासी होने की चाहत और फिर देश सेवा के लिए संघ(यानि सेना) में शामिल होने के प्रसंग से गुअजरती हुई आगे बढती है. पूरे देश में तिरंगा फहराने का आह्वान करते हैं.कश्मीर के मसले पर वे उत्तेजित हैं और लाल चौक तिरंगा फहराते हैं. इंदिरा गाँधी के निर्देश पर उन्हें गिरफ्तार किया जाता है. एक दृश्य में वे कहते हैं,हिंदुस्तान आतंक से नहीं,आतंक हिंदुस्तान से डरेगा, वे रतन टाटा को कहते हैं,जो डिसिशन एक मनात में नहीं होता,वह डिसिशन ही नहीं होता. और फिर अंत में कहते हैं,चेतावनी देता हूँ पाकिस्तान को...अगर दोबारा हम पर हाथ उठाया तो हाथ काट दूंगा. तुम ने हमारा बलिदान देखा है. अब बदला भी देखोगे.भारत माता की जय! फिल्म आने पर सभी संवादों,प्रसंगों और दृश्यों का सन्दर्भ समझ में आएगा.फिर भी नरेन्द्र मोदी के सार्वजानिक भाषणों से हम सभी जानते हैं कि वे क्या सोचते और चाहते हैं? उनके व्यक्तित्व और विचारों का फ़िल्मी रूप राष्ट्रवाद के फ़िल्मी डोज के रूप में ‘पीएम नरेन्द्र मोदी’ में दिखेगा.
फिल्म इंडस्ट्री में इन दिनों बायोपिक की लोकप्रिय मांग है.साथ में राष्ट्रवाद का तड़का लगाया जा रहा है.’पीएम नरेन्द्र मोदी’ में लोकप्रिय तत्वों के साथ प्रधानमंत्री को खुश करने की मंशा भी है.आनन्-फानन में बनी इस फिल्म से जुड़े निर्माता,निर्देशक और लीड कलाकार(विवेक ओबेरॉय) के अतीत को देखें तो स्पष्ट हो जाता है कि इस फिल्म का पहला और फौरी उद्देश्य सत्तारूढ़ पार्टी के आकाओं को खुश करना है.वे स्वयं भी सत्तारूढ़ पार्टी की विचारधारा के हिमायती हैं. देखना तो यह होगा कि क्या दर्शक इसे किसी फिल्म की तरह ही लेते हैं या प्रोपगंडा समझ का उदास रवैया अपनाते हैं. भक्त दर्शक इसे देखेंगे...और अगर उन्होंने ही देख लिया तो फिल्म झट से वीकेंड में ही 100 करोड़ी हो जाएगी. फ़िल्मकार और कलाकार ट्रेलर देखने के बाद भी रियेक्ट नहीं कर रहे हैं. एक सिद्ध फ़िल्मकार ने नाम न लिखने की शर्त पर कहा कि फिल्म ‘टैकी’ लग रही है. परफार्मेंस में अपील नहीं है.विवेक ओबेरॉय के मोदी लुक पर अधिक काम नहीं किया गया है.मोदी का करिश्मा विवेक के अभिनय में नदारद है.
याद करें तो पिछले लोकसभा के चुनाव के पहले नरेन्द्र मोदी की जीत की हवा को भांपते हुए एक आप्रवासी भारतीय ने उन पर बायोपिक बनाने की सोची. उन्होंने भाजपा के समर्थक निर्देशकों को संपर्क किया. परेश रावल के नाम की घोषणा भी हो गयी थी कि वे मोदी की भूमिका निभाएंगे. २०१४ के इंटरनेशनल फिल्म समारोह के समय निर्माता मितेश शाह इस फिल्म की घोषणा के लिए आमादा थे,लेकिन उन्हें उपयुक्त कलाकार नहीं मिल पाया. मोदी की फिल्म खटाई में चली गयी. उन पर बन रही वेब सीरीज के लेखक मिहिर भूता भी तब अपनी इसी पटकथा पर फिल्म बनाने की सोच रहे थे. उन्होंने ने भी हाथ-पाँव मारे,लेकिन फिल्म फ्लोर पर नहीं जा सकी. खैर,उन्होंने फिल्म का खयाल छोड़ा और अब वेब सीरीज ‘मोदी’ लेकर आ रहे हैं.
मिहिर भूता गुजरती के लोकप्रिय नाटककार हैं. वे नरेन्द्र मोदी को उनके मुख्या मंत्री काल से जानते हैं. भाजपा के करीबी हैं. उनकी पत्नी माधुरी भूता भाजपा के महिला विंग में ज़िम्मेदार पद पर हैं. स्वयं मिहिर भूता संगठन के कार्य और विचार को लेकर सक्रिय रहे हैं. वे सीबीएफ़सी के भी सदस्य रहे. मिहिर भूता की पहली चाहत तो फिल्म बनाने की ही थी. वे संदीप सिंह और ओमंग कुमार की तरह नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता की बहती गंगा में हाथ धोने नहीं आये हैं. वे भाजपा के लिए समर्पित नाटककार हैं और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी में उनकी अटूट वैचारिक श्रद्धा है. मोदी के प्रधानमंत्री बन्ने के बाद यह श्रद्धा स्वाभाविक रूप से गढ़ी हो गयी है.
वेब सीरीज ‘मोदी’ इरोस नाउ नमक डिजिटल प्लेटफार्म पर आएगा. 10 एपिसोड के इस वेब सीरीज का निर्देशन उमेश शुक्ल कर रहे हैं. याद दिला दें कि उमेश शुक्ल ने ‘ओ माय गॉड’ और ‘102 नोट आउट’ फिल्मों का निर्देशन किया है. वे परेश रावल के प्रिय निर्देशक हैं. वेब सीरीज को मिहिर भूता ने राधिका आनंद के साथ लिखा है. इस सीरीज में 12 साल के नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनाने तक की रोमांचक राजनीतिक यात्रा होगी. उनके विभिन्न उम्र में चरित्र को निभाने के लिए लेखा-निर्देशक की टीम ने फैसल खान,आशीष शर्मा और महेश ठाकुर का चुनाव किया है. इरोस नाउ अपर आने के साथ इसके सारे 10 एपिसोड देखे जा सकते हैं. इरोस नाउ अभी नेटफ्लिक्स या अमेज़न की तरह लोकप्रिय प्लेटफार्म नहीं है. हो सकता है की इस वेब सीरीज की वजह से उसका प्रसार हो.
सवाल यह है कि क्या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर फिल्म स्वयं मोदी और भाजपा की सहमति से बन रही हैं.अगर हां तो इसके पीछे की मंशा और मानसिकता समझी जा सकती है.मतदाताओं/दर्शकों को लुभाने का यह माध्यम कितना कारगर होगा यह तो चुनाव के नतीजों पर इनके प्रभाव के आकलन से पता चलेगा. फिलहाल यही कहा जा सकता है कि नरेन्द्र मोदी और भाजपा फिल्म और वेब सीरीज को लेकर आश्वस्त हैं. और कुछ नहीं तो भोले मतदाताओं के लिए प्रचार सामग्री तो बन ही जायेगा. सोशल मीडिया और मीडिया में छाये मोदी के लिए यह अतिरिक्त प्रयास और प्रभाव होगा.
पुनःश्च : ताज़ा सूचना है कि निर्माता संदीप सिंह ने इस फिल्म के लिए एक रैप गया है,जिसे पैरी जी ने लिखा है और हितेश मोदक ने संगीतबद्ध किया है. बताने की ज़रुरत नहीं कि फिल्म की कहानी भी संदीप सिंह की है.
इस फिल्म का पिछला क्रेडिट पोस्टर आया तो उसमें भाजपा और मोदी के धुर विरोधी जावेद अख्तर का बतौर गीतकार नाम देख कर सभी को हैरानी हुई.उनके साथ समीर का भी नाम था.पहले जावेद अख्तर और फिर समीर ने सोशल मीडिया अपना पक्ष रखा. दोनों ने आश्चर्य व्यक्त करते हुए स्पष्ट किया कि फिल्म से उनका कोई संबंध नहीं है. दरअसल फिल्म में जावेद अख्तर के गीत ‘इश्वर अल्लाह’(1947:अर्थ) और समीर के गीत ‘सुनो गौर से दुनिया वालों’(दस) का उपयोग किया गया है.स्पष्ट नहीं हुआ है कि संगीत कंपनियों ने बगैर गीतकारों की सहमति के अधिकार कैसे दिए? बाद में संदीप सिंह का हिमाकत भरा बयान आया कि दोनों गीतकारों को सोशल मीडिया पर ना जाकर मुझ से बात करनी चाहिए थी.मोदी पर फिल्म बनाने से आया यह दुस्साहस तो देखिये कि बगैर अनुमति लिए ही आप प्रतोश्थित गीतकारों के नाम पोस्टर पर छाप देते हैं.पूछने पर माफ़ी मांगने बजाय गाल बजाने लगते हैं.
दक्षिण भारत के अभिनेता सिद्धार्थ ने ‘पीएम नरेन्द्र मोदी’ का ट्रेलर देखने के बाद कटाक्ष किया है. उन्होंने ट्वीट किया है...ट्रेलर में यह तो बताया ही नहीं गया की पीएम नरेन्द्र मोदी ने कैसे देश को अकेले ही आज़ादी दिलवा दी.फिल्म रिलीज होने पर निश्चित ही मखौल उदय जायेगा और सोशल मीडिया मीम से भर जायेगा.पर यही तो उन्हें चाहिए...आप मजाक करें या भर्त्सना ....सभी के केंद्र में मोदी हों.
यह भी आशंका है कि चुनाव आयोग फिल्म और वेब सीरीज पर आचार संहिता के मद्देनज़र पाबन्दी लगा दे.


Thursday, March 28, 2019

सिनेमालोक : सही फैसला है कंगना का


सिनेमालोक
सही फैसला है कंगना का
-अजय ब्रह्मात्मज
तीन दिनों पहले कंगना रनोट के जन्मदिन पर ‘जया’ फिल्म की घोषणा हुई. इसे तमिल में ‘थालैवी’ और हिंदी में ‘जया’ नाम से बनाया जा रहा है. निर्देशक हैं विजय और इसे लिख रहे हैं केवी विजयेंद्र प्रसाद. ‘बाहुबली’ के विख्यात लेखक ने ही कंगना रनोट की पिछली फिल्म ‘मणिकर्णिका’ लिखी थी. यह फिल्म तमिल फिल्मों की अभिएत्री और तमिलनाडु की भूतपूर्व मुख्यमंत्री जयललिता का बायोपिक है. इस फिल्म की घोषणा के साथ कंगना ने जाहिर किया है कि अब वह अपनी बायोपिक पर काम नहीं करेंगी.’मणिकर्णिका’ की रिलीज के समय कंगना ने बताया था कि वह अपनी आत्मकथा सेल्यूलाइड पर पेश करना चाहती हैं. इसे वह खुद ही लिखना और निर्देशित करना चाहती थीं.हिंदी फिल्मों के इतिहास में अपने ढंग का यह पहला प्रयास होता.
फ़िलहाल कंगना रनोट ने इरादा बदल दिया है. और यह सही किया.कंगना अपने करियर के उठान पर हैं. अभी उन्हें आने ऊंचाइयां और उपलब्धियां हासिल करनी हैं.लम्बे अपमान,तिरस्कार और संघर्ष के बाद वह यहाँ तक पहुंची हैं.आगे का रास्ता फिलहाल आसन नहीं दिख रहा है,क्योंकि फिल्म इंडस्ट्री के कथित ताकतवर बिरादरी और लॉबी खुले दिल से उन्हें स्वीकार नहीं कर रही है.विरोध जारी है,लेकिन कंगना के साथ दर्शकों का एक समूह है.वह कंगना को पसंद करने के साथ उनकी कामयाबी भी चाहता है.कंगना के बडबोलेपन और पंगा लेने की आदत को नज़रअंदाज कर दें तो उनकी प्रतिभा संदेह से परे है. वह कुछ नया और बेहतर करना चाहती हैं.’जया’ फिल्म के सन्दर्भ में उन्होंने कहा कि मैं तो अपनी बायोपिक(आत्मकथा) पर काम कर रही थी.इसी बीच ‘जया’ की कहानी सुनाने पर वह मुझे अपने जीवन सदृश और करीब लगी.हमारी ज़िन्दगी में अनेक समानताएं हैं.हाँ,उनकी उपलब्धिया मुझ से बड़ी हैं.
कंगना को इस फिल्म के लिए 24 करोड़ का पारिश्रमिक मिलेगा. ‘जया’ फिल्म की घोषणा के साथ यह खबर भी आई है.इस खबर की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है और ना ही कंगना की तरफ से कोई खंडन आया है.यकीन किया जा सकता है कि एस ही होगा. ‘मणिकर्णिका’ की कामयाबी क पूरा श्री कंगना को मिलना चाहिए.प्रतिकूल स्थितियों में वह फिल्मों को दर्शकों के बीच ले गयीं. फिल्म के कथ्य और प्रस्तुति से मैं असहमत हूँ,लेकिन कंगना की मेहनत और सफलता कैसे भूली जा सकती है. और फिर समकालीन अभिनेत्रियों के बीच वह अकेली ऐसी अभिनेत्री के तौर पर उभरी हैं जो किसी पॉपुलर स्टार का टेक लिए बगैर छलांग लगा रही है. यह दुर्लभ है.
अभी तक मन जा रहा था कि दीपिका पादुकोण सर्वाधिक पारिश्रमिक पाने वाली अभिनेत्री हैं. उन्हें ‘पद्मावत’ के लिए रणवीर सिंह और शहीद कपूर से अधिक राशी बतौर पारिश्रमिक मिली थी...13 करोड़. करीना कपूर खान को ‘वीरे दी वेडिंग’ के लिए 10 करोड़ दिए गए थे.पारिश्रमिक के लिहाज से भी कंगना ने अपने समकालीनों को बहुत पीछे छोड़ दिया है. अब यह देखना होगा कि दूसरी अभिनेतरियां कितनी तेज़ी से कंगना के करीब पहुँचती हैं.दीपिका अपनी अगली फिल्म ‘छपाक’ में निर्माता बन गयी हैं.वह अभिनेताओं की तरह प्रॉफिट शेयरिंग के समीकरण में चली गयी हैं. इससे फिल्म चलेगी और कमाएगी तो उन्हें भारी लाभ होगा.
बस,कंगना रनोट का विचलन कई बार चिंतित करता है.वह आवेश में अनावश्यक बयानबाज़ी कर जाती हैं.उन्हें थोडा सचेत रहना चाहिए.अपने राजनीतिक विचारों का भी मंथन करना चाहिए.भावावेश में कुछ भी बोलना गलत सन्देश देता है.हालांकि समाज और देश की उनकी समझ बढ़ी है,लेकिन राजनीतिक स्पष्टता आणि बाकि है.ऐसा लगता है कि वह किसी खास दिशा में झुक रही हैं और वह उनके व्यक्तित्व की तरह प्रगतिशील नहीं है. 

Tuesday, March 5, 2019

सिनेमालोक : खुश्बू हैं निदा फाजली

सिनेमालोक
खुश्बू हैं निदा फाजली
-अजय ब्रह्मात्मज
अपनी फिल्म पत्रकारिता में कुछ अफ़सोस रह ही जायेंगे.उनका निदान या समाधान नहीं हो सकता.उसे सुधारा ही नहीं जा सकता. एक समय था कि लगभग हर हफ्ते निदा साहब से मुलाक़ात होती थी.मुंबई के खार डांडा की अम्रर बिल्डिंग के पहले माले के उनके फ्लैट का दरवाज़ा सभी पत्रकारों और साहित्यकारों के लिए खुला रहता था. मुझे अफ़सोस है कि उनके जीते जी मैंने कभी उनसे उनके फ़िल्मी करियर के बारे में विस्तृत बातचीत क्यों नहीं की? या कभी उन पर लिखने का ख्याल क्यों नहीं आया? शायद करीबी और पहुँच में रहने वली हतियों के प्रति यह नाइंसाफी इस सनक में हो जाती है कि उनसे तो कभी भी बात कर लेंगे. फ्रीलांसिंग के दिनों में किसी संपादक या प्रभारी ने उन पर कुछ लिखने के लिए भी नहीं कहा.
बहरहाल,पिछले दिनों उनकी पत्नी मालती जोशी और मित्र हरीश पाठक के निमंत्रण पर निदा फाजली पर कुछ पढने और बोलने का मौका मिला.मुझे केवल उनके फ़िल्मी पक्ष पर बोलना था...बतौर गीतकार.पता चला कि उन्होंने फिल्मों के लिए 348 गीत लिखे. निदा साहब ग्वालियर के मोल निवासी थे,जहाँ उनका परिवार कश्मीर से आकर बसा था. कह्श्मिर के अपने गाँव फाज़िला से उन्होंने अपना सरनेम फाजली चुना था.उनका असली नाम मुक्तदा हसन थे.बचपन से उन्हें साहित्य का शौक़ रहा.कहते हैं कि सातवें दशक में जब उनका परिवार पाकिस्तान शिफ्ट कर रहा था तो उन्होंने भारत में ही रहने का फैसला किया. वे अपनी जड़ों से नहीं कटना चाहते थे. भारतीय संस्कृति और गंगा जमुनी तहजीब में उनका अटूट भरोस था. वे उससे कभी नहीं डिगे. हिंदू धर्म,दर्शन और मिथकों से वे खूब परिचित थे.अपनी शायरी और लेखन में उन्होंने इनका इस्तेमाल भी किया.कठमुल्ला मौलवियों और इस्लामिक कट्टरता से उन्हें नफरत थी. उन्होंने बेहिचक चोट की और फतवे भी बर्दाश्त किये.
फिल्मों की तरफ उनका रुझान था,लेकिन मुंबई आने के बाद पत्र-पत्रिकाओं के आरंभिक लेखन और मुशायरों के दिनों में उन्होंने साहिर लुधियानवी.कैफ़ी आज़मी और सरदार जाफरी को बेबाक टिप्पणियों से नाराज़ कर दिया था.जवान और आक्रामक निदा को लगता था कि क्रातिकारी शायरों की शायरी और ज़िन्दगी में फर्क और ढोंग है. वे बातें तो गरीबों की करते हैं,लेकिन खुद सुविधा संपन्न इमारतों और अपार्टमेंट में रहते हैं. साहिर साहेब को निदा इतने खटके कि उन्होंने उन मुशायरों में जाने से मन कर दिया,जहाँ निदा को भी बुलाया जाता था.मजबूरन निदा का बहिष्कार हुआ. इस हालत में उनके एक ही हमदर्द थे जां निसार अख्तर...उनसे ग्वालियर का परिचय था. फिर ऐसा संयोग भी बना कि कमल अम्तोही की फिल्म ‘रज़िया सुल्तान’ में वे उनके उत्तराधिकारी बने.फिल्म के निर्माण के दौरान उनकी मौत हुई. दो गीत लिखे जाने बाकी थे. कमल अमरोही चाहते थे कि कोई ‘मुक़म्मल’ शायर ही गीत लिखे. निदा को मौका मिला और उन्होंने लिखा ‘तेरा हिज्र मेरा नसीब है’.फिल्म रिलीज होने के पहले ही निदा को फ़िल्में मिलने लगीं. जिनको कमल अमरोही ने चुना हो.उनमें खास बात तो होगी.
निदा फाजली 1964-65 में मुंबई आ गए थे. फिल्मों में पहला मौका १९७९ में मिला.शायद पहले उनका इरादा न रहा हो कि फिल्मों के लिए गीत लिखे जायें.निदा हिंदी फिल्मों के ऐसे आखिरी गीतकार हैं,जो उर्दू अदब में भी बड़ा मुकाम रखते हैं.उनके बाद कोई ऐसा गीतकार नहीं दीखता,जो मकबूल शायर भी हो.तो 1979 में प्रख्यात स्तंभकार जयप्रकाश चोव्क्से ने ‘शायद’ की कहानी लिखी. मदन बावरिया निर्देशित इस फिल्म के तीनों गीतकार मध्यप्रदेश के थे.विट्ठल भाई पटेल.दुष्यंत कुमत त्यागी और निदा फाजली. इस फिल्के लिए निदा फाजली ने दो गीत लिखे...’खुश्बू हूँ मैं फूल नहीं हू जो मुरझाऊंगा’ और ‘दिन भर धुप का पर्वत कटा,शाम को पीने निकले हम,जिन गलियों में मौत बिछी थी,उनमें पीने निकले हम’... दूसरा गीत फिल्म की थीम को धयन में रख कर लिखा गया था. उन्होंने आरके की फिल्म ‘बीवी ऑ बीवी’ के गीत लिखे थे. राज कपूर से उनकी मुलाक़ात का किस्सा फिर कभी. अभि तो इतना ही कि निदा साहेब के गीत सुनिए और पढ़िए.उनकी खुश्बू से सुंगधित होइए,