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Tuesday, February 26, 2019

सिनेमालोक : अपनी कथाभूमि से बेदखल होते फिल्मकार

सिनेमालोक 
अपनी कथाभूमि से बेदखल होते फिल्मकार 
- अजय ब्रह्मात्मज
पिछले हफ्ते एक युवा फिल्मकार का फ़ोन आया. उनकी आवाज़ में बदहवासी थी.थोड़े घबर्सये हुए लग रहे थे. फोन पर उनकी तेज़ चलती सांस की सायं-सायं भी सुनाई पड़ रही थी.मैंने पूछा,जी बताएं, क्या हाल हैं? मन ही मन मना रहा  था कि कोई बुरी खबर न सुनाएं. उन्होंने जो बताया,वह बुरी खबर तो नहीं थी,लेकिन एक बड़ी चिंता ज़रूर थी.यह पहले भी होता रहा है.हर पीढ़ी में सामने चुनौती आती ही. उन्हें अभी एहसास हुआ. उनके जैसे और भी फिल्मकार होंगे,जो खुद को विवश और असहाय महसूस कर रहे होंगे. उन्होंने बताया कि सुविधा सम्पन्न फिल्मकार उनकी कहानियों और किरदारों को हथिया रहे हैं. उन पर काबिज हो रहे हैं. युवा फिल्मकार 'गली बॉय' देख कर लौटे थे. उनकी प्रतिक्रिया और चिंता थी कि सफल और सम्पन्न फिल्मकार उनका हक छीन रहे हैं. उन्हें उनकी ज़मीन से बेदखल कर रहे हैं.

हिंदी फिल्मों में यह सिलसिला सालों से चला आ रहा है. युवा और प्रयोगशील फिल्मकार कंटेंट और क्राफ्ट में नए-नए प्रयोग करते रहते हैं. उनकी सफलता-असफलता चलती रहती है. दशकों से हम यह देखते आ रहे हैं कि प्रयोगशील फिल्मकारों के प्रयोग और खोज को व्यवसायिक फिल्मों के फिल्मकार देर-सवेर अपना लेते हैं. पैरेलल सिनेमा के दौर में यह खूब देखने को मिला। उन दिनों ऐसे फिल्मकारों को आर्ट सिनेमा के फिल्मकार के तौर पर अलग कोष्ठक में रखा गया। मेनस्ट्रीम पॉपुलर मीडिया ने उन्हें खास बता कर हाशिए पर डाल दिया. ताया गया कि आर्ट सिनेमा आम दर्शकों के लिए नहीं होता है. आर्ट सिनेमा में दृश्य धीमी गति से आगे बढ़ते हैं, क्लोज अप देर तक टिका रहता है और संवाद कानाफूसी के अंदाज में बोले जाते हैं. उसकी खूबियों को कमियों के तौर पर प्रचारित किया गया. दरअसल, कथित आर्ट सिनेमा में दृश्यबंध की अलग प्रविधि अपनाई जाती हैं. वहां मनोरंजन के नाम पर दर्शकों को खुश करने की हड़बड़ी नहीं रहती. 

वास्तव में मनोरंजन और कमाई के दबाव ने हिंदी सिनेमा का बेड़ा गर्क किया है. अभी तो यह हालत हो गई है कि मनोरंजन के नाम पर हंसी का कूड़ा फैलाया जा रहा है. व्हाट्सएप लतीफों के इस हास्यास्पद दौर में तनावग्रस्त दर्शक इस कूड़े की बदबू नहीं महसूस कर पा रहे हैं. उन्हें पता भी नहीं चल रहा है कि मनोरंजन के नाम पर वे किस संक्रामक रोग के शिकार हो रहे हैं? फिल्मों का प्रचार तंत्र स्तरहीन मनोरंजन को श्रेष्ठ बता कर परोहैस रहा है. अफसोस की बात है कि इस कुचक्र में हिंदी फिल्मों की अनुभवी प्रतिभाएं संलग्न हैं.उन्हें मनोरंजन का काठ मार गया है.उम्र बढ़ने की साथ उनकी समझ और संवेदना कुंद हो गई है. हाल की एक सफल लेकिन फ़ूहड़ फिल्म के निर्देशक और कलाकार ५० की उम्र पार कर चुके हैं और उनकी सामूहिक कोशिश देख लें.

इस वास्तविकता से अलग भी एक स्थिति है. इसी स्थिति से चिंतित हैं हमारे युवा फिल्मकार. ऐसे फिल्मकार जिन्होंने हिंदी फिल्मों में नई भावभूमि और कथाभूमि प्रस्तुत की. नए किरदार लेकर लाए. सीमित बजट में उन्होंने रियलिस्टिक फिल्म बनाने की कोशिश की. इनमें से कुछ सफल रहे. उनकी फिल्मों की सफलता ने मेनस्ट्रीम फिल्मों के निर्देशकों को चौंकाया. मेनस्ट्रीम के फिल्मकारों ने ऐसे प्रतिरोधी युवा फिल्मकारों को अपनी पंगत में बिठाया. उनसे नए किरदारों और और कहानियों की बारीकियां सीखीं. कई बार देखने और समझने का नजरिया भी सीखा. और फिर धीरे से उन किरदारों और कहानियों को अपनी फिल्मों में ले आए. प्रेरणा कहीं से भी नहीं जा सकती है और प्रभाव भी ग्रहण किया जा सकता है. समस्या तब होती है, जब मेनस्ट्रीम के संपन्न फिल्मकार असीमित बजट में लोकप्रिय कलाकारों के साथ प्रयोगशील फिल्मकारों की कथा भूमि पर खेलने लगते हैं. इस खेल का व्यापक प्रचार और प्रसार होता है. कहा जाता है कि मेनस्ट्रीम के फिल्मकार ने निम्न तबके के किरदारों को समझा और पेश किया है. सच्चाई यह होती है कि यह उनके लिए एक मुनाफे का प्रयोग होता है. इसमें उन्हें नाम और दाम दोनों मिल जाता है.दूसरी तरफ प्रयोगशील फिल्मकार अपनी ही जमीन से बेदखल हो कर नई जमीन की तलाश में फिर से संघर्ष करता है.
इस व्यावसायिक और उपभोक्तावादी दौर में युवा फिल्मकार की चिंता बेवजह की शिकायत लग सकती है. कुछ लोग यह भी कह सकते हैं कि ऐसी रुदाली से कोई फर्क नहीं पड़ता. दर्शक तो सिनेमा देखना चाहता है और अगर उसे चमकदार आवरण में मनोरंजन मिल रहा है तो वह क्यों अनगढ़ और सस्ती फिल्मों की तरफ नजर करे. हिंदी फिल्मों में आ रहे युवा फिल्मकारों की नई पीढ़ियां फिर से खुद के लिए कहानी किरदार और कथाभूमि खोजती हैं. और फिर से स्थापित फिल्मकार उस कथाभूमि को हथिया लेते हैं. कथाबीज में ही फेरबदल कर वे अपनी फिल्म रोपते हैं और कामयाबी की फसल उगाते हैं। नाम और पुरस्कार बटोर लेते हैं. प्रयोगशील फिल्मकार उन्हें गुस्से में निहारते और कूढ़ते रहते हैं. चिंतित भटकते फिरते हैं।

Tuesday, February 19, 2019

सिनेमालोक : धारावी का ‘गली बॉय’


सिनेमालोक
धारावी का ‘गली बॉय’
-अजय ब्रह्मात्मज
जोया अख्तर की फिल्म ‘गली बॉय’ की खूब चर्चा हो रही है.जावेद अख्तर और हनी ईरानी की बेटी और फरहान अख्तर की बहन जोया अख्तर अपनी फिल्मों से दर्शकों को लुभाती रही हैं.उनकी फ़िल्में मुख्य रूप से अमीर तबके की दास्तान सुनाती हैं.इस पसंद और प्राथमिकता के लिए उनकी आलोचना भी होती रही है.अभि ‘गली बॉय’ आई तो उनके समर्थकों ने कहना शुरू किया कि जोया ने इस बार आलोचकों का मुंह बंद कर दिया. जोया ने अपनी फिल्म से जवाब दिया कि वह निम्न तबके की कहानी भी कह सकती हैं.’गली बॉय’ देख चुके दर्शक जानते हैं कि यह फिल्म धारावी के मुराद के किरदार को लेकर चलती है.गली के सामान्य छोकरे से उसके रैप स्टार बनने की संगीतमय यात्रा है यह फिल्म.
इस फिल्म की खूबसूरती है कि जोया अख्तर मुंबई के स्लम धारावी की गलियों से बहार नहीं निकलतीं.मुंबई के मशहूर और परिचित लोकेशन से वह बसची हैं.इन दिनों मुंबई की पृष्ठभूमि की हर फिल्म(अमीर या गरीब किरदार) में सी लिंक दिखाई पड़ता है.इस फिल्म में सीएसटी रेलवे स्टेशन की एक झलक मात्र आती है.फिल्म के मुख्य किरदार मुराद और सफीना के मिलने की खास जगह गटर के ऊपर बना पुल है.इस गटर में कचरा जलकुंभी की तरह पसरा हुआ है.आप को याद होगा कि डैनी बॉयल ने 2008 में ‘स्लमडॉग मिलियेनर’ नमक फिल्म में में धारावी के किरदारों को दिखाया था.इंटरनेशनल ख्याति की इस फिल्म से धारावी की तरफ पर्यटकों का ध्यान गे.’गली बॉय’ में एक दृश्य है,जहाँ कुछ पर्यटक मुराद का घर देखने आते हैं तो उसकी दादी 500 रुपए की मांग करती है. इस फिल्म को बारीकी से देखें तो जोया भी पर्यटक निर्देशक के तौर पर ही कैमरे के साथ धारावी में घुसती हैं.धारावी की ज़िन्दगी और सपनों को कभी सुधीर मिश्र ने ‘धारावी’ नाम की फिल्म बहुत संजीदगी से चित्रित किया था.दूसरी हिंदी फिल्मों में भी धारावी की छटा झलकती रही है.ज्यादातर फिल्म निर्देशक यहाँ की गंदगी,गंदे आचरण और गंदे धंधे ही कैमरे में क़ैद करते रहे हैं.जोया ने यहाँ के पॉजीटिव किरदार लिए हैं.
जोया अख्तर की ‘गली बॉय’ सच्चाई और सपने को करीब लेन की कोशिश में जुटे मुराद की कहानी है.मुराद बुरी सांगत में होने बावजूद अच्छे ख्याल रखता है.वह अपनी नाराज़गी को गीतों में अभिव्यक्त करता है.उसकी मुलाक़ात एमसी शेर से होती और फिर उसके जीवन की दिशा बदल जाती है.वह रैप करने लगता है.तय होता है कि एक वीडियो बनाया जाये और उसे यौतुबे पर डाला जाये.वीडियो तैयार करने के बाद उसे एक्सपोर्ट करने के पहले रैपर का नाम रखने की बात आती है तो मुराद कहता है कि मेरा क्या नाम? मैं तो गली का छोकरा....यही गली बॉय नाम पड़ता है.वीडियो आते ही उसकी यात्रा आरम्भ हो जाती है.वह सपनों को जीने लगता है.वह अपने मामा की इस धारणा और सोच को झुठलाता है कि नौकर का बेटा नौकर ही हो सकता है.
जोया ने ‘गली बॉय’ की प्रेरणा ज़रूर रियल रैपर नेज़ी और डिवाइन से ली है,लेकिन उन्होंने उनकी ज़िन्दगी के कडवे और सच्चे प्रसंग कम लिए हैं.रीमा कागती के साथ उन्होंने गली के छोकरे के रैपर बनाने की कहने को हिंदी फिल्मों के घिसे-पिटे ढांचे में फिट किया है.’गली बॉय’ की यही सीमा उसे देश के दर्शकों से नहीं जोड़ पति.पहले दिन यह फिल्म संगीत और नेज़ी व डिवाइन के किस्सों की वजह से शहरी दर्शकों को खींचती है,लेकिन दर्शक जा फिल्म से कूनेक्तिओन फील नहीं करते तो वे छंट जाते हैं.दूसरे दिन ही घटे दर्शकों ने जाहिर कर दिया है कि जोया अख्तर की फिल्म उन्हें अधिक पसंद नहीं आई है.निर्देशक जोया अख्तर और मुख्य कलाकार रणवीर सिंह मुराद का करैक्टर ग्राफ नहीं रच पाते.फिल्म के पहले फ्रेम से ही रणवीर सिंह का रवैया और व्यवहार रैप स्टार का है,इसलिए किरदार की यात्रा छू नहीं पाती.
जोया अख्तर और करण जौहर कोशिश तो कर रहे हैं कि वे आम दर्शकों की ज़िन्दगी की कहानी कहें,लेकिन अनुभव,समझदारी और शोध की कमी से उनके प्रयास में छेद हो जाते हैं.


Tuesday, February 12, 2019

सिनेमालोक : कामकाजी प्रेमिकाएं


सिनेमालोक
कामकाजी प्रेमिकाएं
-अजय ब्रह्मात्मज
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ ने इश्क और काम के बारे में लिखा था :
वो लोग बड़े खुशकिस्मत थे
जो इश्क को काम समझते थे
या काम से आशिकी करते थे
हम जीते जी मशरूफ रहे
कुछ इश्क किया कुछ काम किया
काम इश्क के आड़े आता रहा
और इश्क से काम उलझता रहा
आखिर तंग आकर हम ने
दोनों को अधूरा छोड़ दिया.

आज की बात करें तो कोई भी लड़की इश्क और काम के मामले में फ़ैज़ के तजुर्बे अलग ख्याल रखती मिलेगी.वह काम कर रही है और काम के साथ इश्क भी कर रही है.उसने दोनों को अधूरा नहीं छोड़ा है.इश्क और काम दोनों को पूरा किया है और पूरी शिद्दत से दोनों जिम्मेदारियों को निभाया है.आज की प्रेमिकाएं कामकाजी हैं.वह बराबर की भूमिका निभाती है और सही मायने में हमकदम हो चुकी है.अब वह पिछली सदी की नायिकाओं की तरह पलट कर नायक को नहीं देखती है.उसे ज़रुरत ही नहीं पडती,क्योंकि वह प्रेमी की हमकदम है.
गौर करेंगे तो पाएंगे कि हिंदी फिल्मों की नायिकाओं के किरदार में भारी बदलाव आया है.अब वह परदे पर काम करती नज़र आती है.वह प्रोफेशनल हो चुकी है.गए वे दिन जब वह प्रेमी के ख्यालों में डूबी रहती थी.प्रेमी के आने की आहट से लरजती और प्रेमी के जाने से आहत होकर तडपती नहीं है.21 वीं सदी की पढ़ी-लिखी लड़कियां सिर्फ प्रेम नहीं करतीं,वे प्रेम के साथ और कई बार तो उसके पहले काम कर रही होती हैं.जिंदगी में लड़कियां लड़कों से दोस्ती रखती हैं,लेकिन उन्हें प्रेमी के तौर पर स्वीकार करने के पहले अपने करियर के बारे में सोचती हैं.उन्हें बहु बन कर घर में बैठना मंज़ूर नहीं है.परदे पर जिंदगी का विस्तार नहीं दिखाया जा सकता,लेकिन यह परिवर्तन दिखने लगा है कि वे अपने प्रेमियों की तरह बोर्ड रूम की मीटिंग से लेकर २६ जनवरी की परेड तक में पुरुषों/प्रेमियों के समक्ष नज़र आती हैं.
नए सितारों में लोकप्रिय आयुष्मान खुराना की फिल्मों पर नज़र डालें तो उनकी प्रेमिकाएं ज्यादातर स्वतंत्र सोच की आत्मनिर्भर लड़कियां हैं.आयुष्मान को हर फिल्म में निजी समस्याओं को सुलझाने के साथ उनके काम के प्रति भी संवेदनशील रहना पड़ता है.कभी ऐसा नहीं दिखा कि वे अपनी कामकाजी प्रेमिकाओं की व्यस्तता से खीझते दिखे हों.वास्तव में यह जिंदगी का सर है.शहरी प्रेमकहानियों में कामकाजी प्रेमिकाओं की तादाद बढती जा रही है.और यह अच्छी बात है.
इधर की फिल्मों के प्रेमी-प्रेमिकाओं(नायक-नायिकाओं) का चरित्र बदल गया है.गीतकार इरशाद कामिल कहते हैं कि अब जिंदगी में रहते हुए ही प्रेम किया जा रहा है.उन्हें वीराने,चांदनी रात,झील और खयाली दुनिया की ज़रुरत और फुर्सत नहीं रह गयी है.फिल्मों और जीवन में रोज़मर्रा की गतिविधियों के बीच ही प्रेम पनप रहा है.साथ रहने-होने की रूटीन जिम्मेदारियों के बीच ही उनका रोमांस बढ़ता और मज़बूत होता है.फ़िल्में इनसे अप्रभावित नहीं हैं.
परदे की नायिकाओं की निजी जिंदगी में झाँकने पर हम देखते हैं कि पहले की अभिनेत्रियों की तरह आज की अभिनेत्रियों को कुछ छिपाना या ढकना नहीं पड़ता है.बिंदास युवा अभिनेत्रियाँ अपने प्रेमियों की पूर्व प्रेमिकाओं से बेधड़क मिलती और दोस्ती करती हैं और अभिनेता भी प्रेमिकाओं के प्रेमियों से बेहिचक मिलते हैं.पूर्व प्रेमी-प्रेनिकाओं से अलग होने और संबंध टूटने के बाद भी उन्हें साथ काम करने और परदे पर रोमांस करने में हिचक नहीं होती.उनके वर्तमान प्रेमी-प्रेमिकाओं को यह डर नहीं रहता कि कहीं शूटिंग के एकांत में पुराना प्रेम न जाग जाए.सचमुच दुनिया बदल चुकी है.प्रेम के तौर-तरीके बदल गए हैं और प्रेमी-प्रेमिका तो बदल ही गए हैं.इस बदलाव में उत्प्रेरक की भूमिका लड़कियों की है.उन्हें अब अपने काम के साथ इश्क करना है या यूँ कहें कि इश्क के साथ काम करना है. अगर प्रेमी कुछ और चाहता है या इश्क का हवाला देकर काम छुड़वाना चाहता है तो लड़कियां कई मामलों में प्रेमियों को छोड़ देती हैं.

Tuesday, February 5, 2019

सिनेमालोक : क्यों मौन हैं महारथी?


सिनेमाहौल
क्यों मौन हैं महारथी?
-अजय ब्रह्मात्मज
सोशल मीडिया के प्रसार और प्रभाव के इस दौर में किसी भी फिल्म की रिलीज के मौके पर फ़िल्मी महारथियों की हास्यास्पद सक्रियता देखते ही बनती है?हर कोई आ रही फिल्म देखने के लिए मर रहा होता है.यह अंग्रेजी एक्सप्रेशन है...डाईंग तो वाच.हिंदी के पाठक पूछ सकते हैं कि मर ही जाओगे तो फिल्म कैसे देखोगे?बहरहाल,फिल्म के फर्स्ट लुक से लेकर उसके रिलीज होने तक फिल्म बिरादरी के महारथी अपने खेमे की फिल्मों की तारीफ और सराहना में कोई कसार नहीं छोड़ते हैं.प्रचार का यह अप्रत्यक्ष तरीका निश्चित ही आम दर्शकों को प्रभावित करता है.यह सीधा इंडोर्समेंट है,जो सामान्य रूप से गलत नहीं है.लेकिन जब फिल्म रिलीज होती है और दर्शक किसी महारथी की तारीफ के झांसे में आकर थिएटर जाता है और निराश होकर लौटता है तो उसे कोफ़्त  होती है.फिर भी वह अगली फिल्म के समय धोखा खाता है.
इसके विपरीत कुछ फिल्मों की रिलीज के समय गहरी ख़ामोशी छा जाती है.महारथी मौन धारण कर लेते हैं.वे नज़रअंदाज करते हैं.महसूस होने के बावजूद स्वीकार नहीं करते कि सामने वाले का भी कोई वजूद है.ऐसा बहार से आई प्रतिभाओं के साथ होता है.उन्हें अपनी फिल्मों के लिए दोगुनी मेहनत करनी पड़ती है.ताज़ा उदहारण ‘मणिकर्णिका’ का है.कंगना रनोट की इस फिल्म के प्रति भयंकर भयंकर उदासी अपनाई गयी है.रिलीज के बाद दर्शकों ने इस फिल्म को स्वीकार किया है.रिलीज के बाद के विवादों के बावजूद इस फिल्म का कारोबार औसत से बेहतर रहा है.लेकिन महारथी और ट्रेड पंडित भी ‘मणिकर्णिका’ की कामयाबी को लेकर सहज नहीं दिख रहे है.महारानी लक्ष्मीबाई के जीवन,निरूपण और चित्रण को लेकर असहमति हो सकती है.मुझे खुद लगा कि इस फिल्म में व्यर्थ ही हिन्दू राष्ट्रवाद को तरजीह देने के साथ प्रचारित किया गया है.अंतिम दृश्य में महारानी लक्ष्मीबाई का ॐ में तब्दील हो जाना सिनेमाई ज्यादती है.फिर भी इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि कंगना रनोट ने इस फिल्म को अधिकांश दर्शकों की पसंद बना दिया है.उनका अभिनय प्रभावपूर्ण है.फिल्म के कारोबार को स्वीकार करने के साथ कंगना रनोट के योगदान की भी तारीफ होनी चाहिए थी.कंगना अपनी पीढ़ी की चंद अभिनेत्रियों में से एक हैं,जो नारी प्रधान फिल्म को प्रचलित फिल्मों के समकक्ष लेकर आई हैं.
कंगना रनोट की ‘मणिकर्णिका’ के बारे में अभी तक सोशल मीडिया पर फिल्म बिरादरी के महाराथियीं की हलचल नहीं दिख रही है.करण जौहर से लेकर अमिताभ बच्चन तक चुप हैं.अमिताभ बच्चन तो हर नए-पुराने कलाकार की तारीफ़ करते नहीं चूकते.हस्तलिखित प्रशंसापत्र और गुलदस्ता भेजते हैं.हो सकता है कि उन्होंने फिल्म नहीं देखी हो,लेकिन...करण ज़ोहर और कंगना रनोट का वैमनस्य हम सभी जानते है.उनके ही शो में कंगना ने उन्हें बेनकाब कर दिया था.उसके बाद से मुद्दे को लतीफा बना कर हल्का करने में करण जौहर सबसे आगे रहते हैं.उनके गिरोह ने एक अवार्ड शो में खुलेआम नेपोटिज्म का मजाक उड़ाया और बाद में माफ़ी मांगी.गौर करें तो यह नेपोटिज्म का दूसरा पक्ष और पहलू है,जब आप खुद के परिचितों और मित्रों के दायरे के बाहर की प्रतिभाओं की मौजूदगी और कामयाबी को इग्नोर करते हैं.अब तो कंगना ने नाम लेकर कहना शुरू कर दिया है.ताज्जुब यह है कि इसके बावजूद महारथियों के कान पर जूं नहीं रेंग रही है.
महारथियों का मौन भी दर्ज हो रहा है.हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में भाई-भतीजावाद,खेमेबाजी,लॉबिंग जैम कर चलती रही है.बार-बार एक परिवार होने का दावा करने वाली फिल्म इंडस्ट्री वास्तव में एक ही हवेली के अलग-अलग कमरों में बंद है.और वे चुन-चुन कर दूसरों के कमरों में जाते हैं या अपने कमरे में उन्हें बुलाते हैं.हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की बैठकी में सभी(खास कर बाहरी प्रतिभाओं) के लिए आसन नहीं होता.हाँ,अनुराग कश्यप जैसा कोई पालथी मार कर बैठ जाये तो उसे कुर्सी दे दी जाती है.