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Tuesday, July 16, 2019

सिनेमालोक : कंगना से ताज़ा टकराव के बाद


सिनेमालोक
कंगना से ताज़ा टकराव के बाद
पिछले दिनों कंगना रनोट की एक फिल्म के सोंग लॉन्च के इवेंट में एक पत्रकार से उनकी तू तू मैं मैं हो गई. बात उलाहने से शुरू हुई और फिर फिसलती गई. लगभग 8 मिनट की इस बाताबाती में कंगना रनोट का अहम और अहंकार उभर कर आया. पत्रकार लगातार उनकी बातों से इंकार करता रहा. बाद में कंगना रनोट के समर्थकों और उनकी बहन रंगोली चंदेल ने उक्त पत्रकार के पुराने ट्वीट के स्क्रीनशॉट दिख कर यह साबित करने की कोशिश की कि वह लगातार उनके खिलाफ लिखता रहा है. उनकी गतिविधियों का मखौल उड़ाता रहा है. हालाँकि इस आरोपण में दम नहीं है.
फिलहाल फिल्म पत्रकारिता का जो स्वरूप उभरकर आया है, उसमें फिल्म बिरादरी के सदस्यों से सार्थक और स्वस्थ बातचीत नहीं हो पाती, पत्रकारों की संख्या बढ़ गई है, इसलिए फिल्म स्टार के इंटरव्यू और बातचीत का अंदाज और तरीका भी बदल गया है. पहले बमुश्किल एक दर्जन फिल्म पत्रकार होते थे. उनसे फिल्म कलाकार की अकेली और फुर्सत की बातचीत होती थी. लिखने के लिए कुछ पत्र पत्रिकाएं थीं. उनमें ज्यादातर इंटरव्यू, फिल्म की जानकारी और कुछ पन्नों में गॉसिप छपा करते थे, पत्रिकाओं से अखबारों में आने और फिल्म के रंगीन होने के बाद फिल्म पत्रकारिता में तेजी से परिवर्तन आया, उधर फिल्म इंडस्ट्री में पीआर (प्रचारक) का जोर बढ़ा. इन सभी के साथ मीडिया का विस्तार होता रहा. कुछ सालों पहले सोशल मीडिया के आ जाने के बाद तो संयम और सदाचार के सारे बांध टूट गए. टाइमलाइन की रिपोर्टिंग और कवरेज ने गंभीरता समाप्त कर दी. यह दोनों तरफ से हुआ. इसके लिए पत्रकार और कलाकार दोनों बराबर के जिम्मेदार हैं.
कुछ मीडिया संस्थानों से जुड़े फिल्म पत्रकारों की ही क़द्र रह गई है. बाकी को पीआर और फिर इंडस्ट्री भीड़ से अधिक नहीं समझते. इसकी बड़ी वजह मीडिया की भेड़चाल ही है. मीडिया की बेताबी और जरूरतों को देखते हुए फिल्म कलाकारों के पीआर ने अंकुश लगाने के साथ शर्तें लड़नी शुरू कर दी हैं. स्थिति इतनी भयावह हो गई है कि पिछले दिनों एक लोकप्रिय स्टार का इंटरव्यू का वॉइस मेल सभी पत्रकारों को भेज दिया गया. बताया गया स्टार को फुर्सत नहीं है. पीआर ने तो अपनी सुविधा देखी. ताज्जुब तब हुआ जब ज्यादातर पत्र-पत्रिकाओं में उसी वॉइस मेल की बातचीत छपी हुई पढ़ने-सुनने को मिली.
कंगना रनोट अपने वीडियो मैं बोलते समय असंयमित हो गई और उन्होंने पत्रकारों के बारे में कुछ उटपटांग बातें भी कीं. उन्होंने एक तरफ से सभी को समेट लिया. जिन्हें ‘मणिकर्णिका’ पसंद नहीं आई,उन्हें ‘देशद्रोही’ तक कह डाला. यह कैसा बचकानापन है. दरअसल, गुस्से में कई बार हम व्यक्ति के साथ उसके परिवार, समूह, समुदाय और समाज को भी समेट लेते हैं, करना रनोट भूल गईं कि इसी मीडिया में से अधिकांश ने हमेशा उनकी हिम्मत की दाद दी, उनकी प्रतिभा का बखान किया, दिग्गजों से भिड़ने के समय उनके साथ रहे. वह अपने उलाहने में उन्हें अलग नहीं कर सकीं. नतीजतन मीडिया के सक्रिय सदस्य दुखी और नाराज हुए.
फिलहाल गतिरोध बना हुआ है, लेकिन कंगना रनोट अपनी आगामी फिल्म के प्रचार में जुटी हुई हैं. आनन-फानन में बने संगठन द्वारा लगाई गई पाबंदी के बावजूद कंगना से मीडिया की बातचीत हो रही है. आज के संदर्भ में किसी फ़िल्म पत्रकार के लिए यह मुमकिन नहीं है कि वह अपने समूह के आवाहन पर संस्थान के निर्देशों का उल्लंघन कर सके. पेशेवर पत्रकार के तौर पर यह मुमकिन भी नहीं है.
यह मौका है कि हम सभी फिल्म पत्रकारिता के स्वरूप और ढंग पर विचार करें. आज की जरूरतों और मांग के अनुसार उस में फेरबदल करें. कलाकारों से हो रही बातचीत को केवल क्विज और रैपिड फायर के नाम पर लतीफा और छींटाकशी का मंच न बनाएं. चंद् पत्रकार ही कलाकारों से बातें करते समय फिल्मों पर खुद को केंद्रित करते हैं. ज्यादातर बातचीत में कलाकारों की प्रतिक्रिया और सफाई रहती है. वे खुलासा कर रहे होते हैं. कलाकारों से ढंग की बातचीत नहीं हो पाने का सबसे बड़ा कारण बगैर फिल्म देखे किसी फिल्म पर बातचीत करना है. कलाकार कुछ बताना नहीं चाहते और पत्रकारों के पास भेदी सवाल नहीं होते. विदेशों की तरह फिल्म दिखा कर बातचीत की जाए तो उससे फिल्म इंडस्ट्री, मीडिया संस्थान और दर्शक सभी का भला होगा.


Tuesday, July 9, 2019

सिनेमालोक : अश्लीलता का क्रिएटिव व्यभिचार


 सिनेमालोक
अश्लीलता का क्रिएटिव व्यभिचार
-अजय ब्रह्मात्मज
वेब सीरीज धड़ल्ले से बन रही हैं. लगभग सारे कलाकार, तकनीशियन और बैनर किसी ने किसी वेब सीरीज के निर्माण से जुड़े हैं, फिल्म और टीवी के बाद आया वेब सीरीज का यह क्रिएटिव उफान सभी के लिए अवसर और लाभ जुटा रहा है. वेब सीरीज के प्रसारण के लिए विशेष प्लेटफॉर्म बन गए हैं. देश-विदेश के अनेक उद्यमी इस दिशा में सक्रिय हैं. सभी को अनेक संभावनाएं दिख रही है. खासकर वेब सीरीज पर सेंसर का अंकुश नहीं होने की वजह से लेखक, निर्देशक और कलाकार अभिव्यक्ति की नई उड़ानें भर रहे हैं, कुछ के लिए यह उनकी कल्पना का असीमित विस्तार है तो कुछ क्रिएटिव व्यभिचार में मशगूल हो गए हैं.
वेब सीरीज में गाली-गलौज, हिंसा और सेक्स की भरमार चिंता का विषय है, समाज के नैतिक पहरुए तो लंबे समय से शोर मचा रहे हैं कि वेब सीरीज के कंटेंट की निगरानी हो. वे आपत्तिजनक दृश्यों और संवादों पर कैंची चलाना चाहते हैं. दूसरा तबका सेंसरशिप के सख्त खिलाफ है. फिल्म और टीवी की सेंसरशिप से उकताया यह तबका थोड़ी राहत महसूस कर रहा है. पिछले दिनों निर्देशक और अभिनेता तिग्मांशु धूलिया ने एक बातचीत में साफ शब्दों में कहा था कि पहली बार हमें क्रिएटिव आजादी मिली है. हम दर्शकों को बेहतरीन कंटेंट दे पा रहे हैं. फिल्म और टीवी माध्यम पर सेंसरशिप का अंकुश न होने की वजह से विषय, कथ्य और दृश्यों के वर्जित क्षेत्र खुल गए हैं’ लेखकों और निवेशकों को बड़ा मौका मिला है.
यह बड़ा मौका किसी बाढ़ की तरह गंदगी भी लेकर आ चुका है. खासकर वेब सीरीज की भाषा(गाली-गलौज) और सेक्स चित्रण में कुछ लेखक-निर्देशक मिली छूट और स्वतंत्रता का दुरुपयोग कर रहे हैं. वे उत्तेजना और आकर्षण के लिए फूहड़ और अश्लील हो जाने की गलतियां कर रहे हैं. इस तरह वे पाबंदी और सेंसरशिप के समर्थकों को अवसर दे रहे हैं. हालांकि कोर्ट ने ऐसी आपत्तियों और जनहित याचिकाओं को फिलहाल ठुकरा दिया है, लेकिन ऐसा लग रहा है कि जल्दी ही वेब सीरीज की ढीली लगाम खींच ली जाएगी. ऐसा हुआ तो वेब सीरीज के विस्तार और संभावनाओं पर ब्रेक लग जाएगा.
वेब सीरीज पर पाबंदी और सेंसरशिप के पक्ष-विपक्ष की बहसों से अलग भी इस मुद्दे से संबंधित समस्याएं हैं. पिछले दिनों एक अभिनेता ने इसका खुलासा किया. अभिनय का प्रशिक्षण लेकर फिल्मों में आए इस अभिनेता की पिछले कुछ सालों में अपनी पहचान मिली है. सार्वजनिक स्थानों पर उनके दर्शक-प्रशंसक उनके साथ सेल्फी खिंचवाने के लिए बेताब रहते हैं. प्रशंसकों से घिरे अभिनेता ने फुर्सत मिलते ही अपनी दुविधा और उससे जुड़ा द्वंद्व शेयर किया. उन्हें इन दिनों काफी काम मिल रहा है और काम का बड़ा हिस्सा वेब सीरीज है.
अभिनेता ने बताया कि इन दिनों वेब सीरीज की भाषा से हमें दिक्कत होती है. कई दृश्यों में गाली-गलौज की जरूरत नहीं होती है. अपना गुस्सा जाहिर करने के लिए संवादों में हम ममूली शब्दों का सहारा ले सकते हैं, लेकिन उसे नाटकीय  और कथित रूप से प्रभावपूर्ण बनाने के लिए जबरन गालियां ठूसी जा रही हैं. गालियों में अद्भुत प्रयोग हो रहे हैं. भाषा की अश्लीलता के साथ ही सेक्स दृश्यों की अधिकता भी हमें परेशान कर रही है. मुमकिन है कि स्त्री-पुरुष के अंतरंग और कामुक दृश्यों में दर्शकों को स्फुरण और आनंद आता हो, लेकिन हमारी मुश्किलें बढ़ जाती हैं. पिछले दिनों एक निर्देशक ने बताया कि बेडरूम सीन के बाद हम आपके नितंब से कैमरा पुल करेंगे और आपको नंगे खड़े होकर तौलिया लपेटते हुए अपना संवाद बोलना है. जब मैंने आपत्ति की तो निर्माता का फोन आ गया. वह धमकी भरे अंदाज में अनुबंध का हवाला देने लगा. यह भी तर्क दिया गया कि हम इसे पूरे एस्थेटिक के साथ शूट करेंगे. आपको लाज या ग्लानि नहीं होगी. निर्देशक निर्माता की जिद देखने के बाद मुझे दूसरे इमोशनल और लॉजिकल तरीके से उन्हें समझाना पड़ा. फिर बात बनी और उन्होंने बॉक्सर पहनने की अनुमति दे दी. लेकिन एक अभिनेता कब तक ऐसे दबावों से बचेगा. मैं मना करूंगा तो कोई और तैयार हो जाएगा.  


Tuesday, July 2, 2019

सिनेमालोक : महज टूल नहीं होते कलाकार


 सिनेमालोक
महज टूल नहीं होते कलाकार
-अजय ब्रह्मात्मज
पिछले दो हफ्तों में ‘कबीर सिंह’ और ‘आर्टिकल 15 रिलीज हुई हैं. दोनों में दर्शकों की रुचि है. वे देख रहे हैं. दोनों को लेकर अलग-अलग दृष्टिकोण से बहसें चल रही हैं. बहसों का एक सिरा कलाकारों की सामाजिक जिम्मेदारी से जुड़ा है. क्या फिल्मों और किरदारों(खासकर नायक की भूमिका) को चुनते समय कलाकार अपनी जिम्मेदारी समझते हैं.

‘आर्टिकल 15 के संदर्भ में आयुष्मान खुराना ने अपने इंटरव्यू में कहा कि कॉलेज के दिनों में वह नुक्कड़ नाटक किया करते थे. उन नाटकों में सामाजिक मुद्दों की बातें होती थीं. मुद्दों से पुराने साहचर्य के प्रभाव में ही उन्होंने अनुभव सिन्हा की फिल्म ‘आर्टिकल 15 चुनी. कहा यह भी जा रहा है कि अनुभव ने उन्हें पहले एक रोमांटिक कॉमेडी फिल्म ऑफर की थी, लेकिन ‘मुल्क’ से प्रभावित आयुष्मान खुराना ने वैसे ही मुद्दों की फिल्म में रुचि दिखाई.अनुभव ने मौका नहीं छोड़ा और इस तरह ‘आर्टिकल 15 सामने आई. कह सकते हैं कि आयुष्मान खुराना ने अपनी लोकप्रियता का सदुपयोग किया. वह एक ऐसी फिल्म के साथ आए जो भारतीय समाज के कुछ विसंगतियों को रेखांकित करती हैं. उनकी लोकप्रियता और स्वीकृति का लाभ फिल्म को मिला. उसे दर्शक मिले.

आमिर खान फिल्म को मनोरंजन का माध्यम समझते हैं. उनकी फिल्में इसी उद्देश्य से बनती और प्रदर्शित होती हैं. फिर भी हम देखते हैं कि उनकी ज्यादातर फिल्मों में संदेश और कुछ अच्छी बातें रहती हैं. अपने कैरियर के आरंभ में आमिर खान ने भी दूसरे अभिनेताओं की तरह हर प्रकार की फिल्में कीं. उनमें कुछ ऊलजलूल भी रहीं, लेकिन ‘सरफरोश’ के बाद उनका चुनाव बदल गया है. उनकी स्लेट सार्थक फिल्मों से भरी है. उन्होंने एक बातचीत में मुझसे स्पष्ट शब्दों में कहा था कि मैं अपनी लोकप्रियता का उपयोग ऐसी फिल्मों में करना चाहता हूं, जो दर्शकों का मनोरंजन करने के साथ सुकून और शिक्षा भी दें. हमारे होने की वजह से उन फिल्मों में दर्शकों की जिज्ञासा रहती है. वे फ़िल्में देखने आते हैं.

फिल्म कलाकारों में बड़ी जमात ऐसे अभिनेता/अभिनेत्री की है, जिन्हें अपनी जिम्मेदारी का कोई एहसास नहीं है. वे और उनके प्रशंसक समर्थक मानते हैं कि कलाकार दो कलाकार होता है. उसे जो भी किरदार दिया जाता है, वह उसे निभाता है. एक स्तर पर यह तर्क सही है, लेकिन फिल्मों के प्रभाव को देखते हुए किसी भी अभिनेता/अभिनेत्री को यह तो देखना ही चाहिए कि उसकी फिल्म अंतिम प्रभाव में क्या कहती है? फिल्म में उनका किरदार पॉजीटिव या नेगेटिव हो सकता है, लेकिन इन किरदारों को निर्देशक कैसे ट्रीट करता है और फिल्म का क्या निष्कर्ष है? अगर इन बातों पर ध्यान ना दिया जाए तो फिजूल फिल्मों की झड़ी लग जाएगी. घटिया, अश्लील और फूहड़ फिल्मों की संख्या बढ़ती चली जाएगी. फ़िल्में  मनोरंजन और मुनाफा हैं, लेकिन इन उद्देश्यों के लिए उन्हें अनियंत्रित नहीं छोड़ा जा सकता.

‘कबीर सिंह’ सिंह के संदर्भ में शाहिद कपूर के प्रशंसक और समर्थक के साथ कुछ समीक्षक और विश्लेषक भी कहते नजर आ रहे हैं कि हमें शाहिद कपूर की मेहनत और प्रतिभा का कायल होना चाहिए. उनकी तारीफ करनी चाहिए. उन्होंने एक नेगेटिव किरदार को इतने प्रभावशाली ढंग से पेश किया. और फिर उन्होंने निर्देशक की मांग को पूरा किया. एक कलाकार के लिए सबसे जरूरी है कि वह अपने किरदार को सही तरीके से निभा ले जाए, लेकिन यह सोचना जरूरी है कि क्या कलाकार कोई मशीन है? वह मनुष्य है और उसकी अपनी सोच-समझ होनी चाहिए. कलाकार केवल टूल नहीं है कि चाभी देने या ऑन करने मात्र से चालू हो जाए. अपनी समझदारी से वह तय करता है कि कैरियर के लाभ के लिए उसे कौन सी फिल्म चुननी है? खासकर नायक हैं तो इतनी संवेदना तो होनी चाहिए कि  किरदार और फिल्म के प्रभाव को समझ सके.

भारतीय समाज में फिल्म कलाकारों की भूमिका बढ़ गई है, अब वे फिल्मों के अलावा सोशल इवेंट और प्रोडक्ट एंडोर्समेंट भी करते हैं. ज्यादातर कलाकारों को देखा गया है कि वे इवेंट और प्रोडक्ट चुनते समय यह खयाल रखते हैं कि उसका क्या प्रभाव पड़ेगा? किसी इवेंट में जाना या किसी प्रोडक्ट को एंडोर्स करना उनके लिए कितना उचित होगा? इसी आधार पर उनकी राजनीतिक और सामाजिक समझ व्यक्त होती है. मामला सिर्फ फिल्मों के चुनाव का ही नहीं है. पूरी जीवन शैली और उन सभी फैसलों का भी है, जिनका असर सार्वजनिक जीवन पर पड़ता है. कोई भी कलाकार सिर्फ यह कहने से नहीं छूट या बच सकता कि हमें निर्देशक जो भी कहते हैं, हम कर देते हैं.


Tuesday, June 25, 2019

सिनेमालोक : कबीर सिंह के दर्शक


सिनेमालोक
कबीर सिंह के दर्शक
अजय ब्रह्मात्मज

पिछले शुक्रवार को रिलीज हुई ‘कबीर सिंह’ मूल फिल्म ‘अर्जुन रेड्डी’ से अच्छा कारोबार कर रही है. ‘अर्जुन रेड्डी’ ने कुल 51 करोड़ का कारोबार किया था, जबकि ‘कबीर सिंह’ ने तीन दिनों के वीकेंड में 70 करोड़ का आंकड़ा पार कर लिया है. अगले दो नहीं तो तीन दिनों में यह 100 करोड़ी क्लब में शामिल हो जाएगी. कारोबार के लिहाज से ‘कबीर सिंह’ कामयाब फिल्म है. जाहिर है इसकी कामयाबी का फायदा शाहिद कपूर को होगा. वे इस की तलाश में थे. पिछले साल ‘पद्मावत’ ने जबरदस्त कमाई और कामयाबी हासिल की, पर उसका श्रेय संजय लीला भंसाली दीपिका पादुकोण और रणवीर सिंह के बीच बंट गया था. ‘कबीर सिंह’ में शाहिद कपूर अकेले नायक हैं, इसलिए पूरे श्रेय कि वे अकेले हकदार हैं.
इस कामयाबी और शाहिद कपूर के स्टारडम के बावजूद ‘कबीर सिंह’ पर बहस जारी है. आलोचकों की राय में यह फिल्म स्त्रीविरोधी और मर्दवादी है. पूरी फिल्म में स्त्री यानि नायिका केवल उपभोग (कथित प्रेम) के लिए है. फिल्म के किसी भी दृश्य में नायिका प्रीति आश्वस्त नहीं करती कि वह 21वीं सदी की पढ़ी-लिखी मेडिकल छात्र हैं, जिसका अपना एक करियर भी होना चाहिए. मुग्ध दर्शकों को नायिका के इस चित्रण पर सवाल नहीं करना है? उन्हें ख्याल भी नहीं होगा कि वह स्वतंत्र व्यक्ति के रूप में क्यों नहीं उभरती हैं? फिल्म के आरंभिक संवाद में ही नायक घोषणा करता है कि ‘प्रीति मेरी बंदी है’. ‘बंदी’ का एक अर्थ लड़की है लेकिन उसका दूसरा शाब्दिक/लाक्षणिक अर्थ ‘कैदी’ भी तो है. पूरी फिल्म में वह कैदीद ही नजर आती है. कभी कबीर सिंह की तो कभी अपने पिता की. इन दोनों के बाद वह परिस्थिति की भी कैदी है. लेखक-निर्देशक ने उसे गर्भवती बनाने के साथ पंगु भी बना दिया है. कबीर से अलग होने के बाद वह मेडिकल प्रैक्टिस भी तो कर सकती थी.
फिल्म के समर्थकों का आग्रह है कि कबीर सिंह के किरदार को पर्दे पर जीवंत करने के लिए शाहिद कपूर की तारीफ की जानी चाहिए. फिल्म के शिल्प और सभी तकनीकी पक्षों पर भी बातें होनी चाहिए. इस आग्रह में बुराई नहीं है, लेकिन हमें यह भी सोचना चाहिए कि क्या ऐसे (खल)नायक की सराहना होनी चाहिए. साहित्य और फिल्मों में इसे हम ‘एंटी हीरो’ के नाम से जानते हैं. फिल्म का ऐसा नायक जिसमें नेगेटिव और ग्रे शेड हो. हॉलीवुड की फिल्मों में एंटी हीरो’ का अच्छा-खासा ट्रेडिशन रहा है. हिंदी फिल्मों में भी ‘एंटी हीरो’ का क्रेज रहा है अमिताभ बच्चन का फिल्मी विशेषण ‘एंग्री यंग मैन’ इसी ‘एंटी हीरो’ का पर्याय था. अनिल कपूर,शाह रुख खान और अन्य अभिनेताओं ने भी ‘एंटी हीरो’ के किरदार निभाए हैं.
गौर करें तो हिंदी फिल्मों में एंटी हीरो के पीछे सलीम-जावेद तर्क ले लिए आते थे. नायक के साथ हुए अन्याय की पृष्ठभूमि रहती थी, जिसमें उसकी नेगेटिव और गैरकानूनी गतिविधियां उचित लगती थीं. सारे चित्रण और ग्लेमर के बावजूद फिल्म के अंतिम दृश्य में एंटीहीरो को अपराध बोध और पश्चाताप से ग्रस्त दिखाया जाता था. उसे ग्लानि होती थी. वह अपने लिए और अपनी गलतियों के लिए अफसोस जाहिर करता था. भारतीय शास्त्रों, नाटकों और सिनेमा में खलनायकों को गरिमा प्रदान नहीं की जाती है. उन्हें रोमांटिसाइज़ नहीं किया जाता. ‘कबीर सिंह’ का नायक किसी ग्लानि में नहीं आता. उसे अपनी करतूतों पर पश्चाताप भी नहीं होता है. वह लड़कियों को महज उपभोग की वस्तु समझता है. चाकू की नोक पर उनके कपड़े उतरवाता है. डॉक्टर दोस्तों के मरीजों से हवस मिटाता है. प्रेमिका के विछोह में वह व्यभिचारी हो जाता है. ताज्जुब यह है कि  दर्शक उसे पर्दे पर देखकर लहालोट हो रहे हैं. तालियां बजा रहे हैं. सोशल मीडिया पर उसके पक्ष में तर्क के गढ़ रहे हैं.
‘कबीर सिंह’ के प्रशंसकों और समर्थकों को लगता है कि शाहिद कपूर ने अपने कैरियर का सर्वश्रेष्ठ अभिनय इस फिल्म में किया है. अभिनय की श्रेष्ठता और उदात्तता की सभी परिभाषाओं को भूलकर वे इस किरदार से मोहित हैं. देर-सबेर इस फिल्म की कामयाबी का सामाजिक अध्ययन होगा. कारण खोजे जाएंगे कि 2019 के जून में क्यों ‘कबीर सिंह’ जैसी फिल्म दर्शकों को पसंद आई. कारण स्पष्ट है. हमारा समाज जिस तेजी से पुरुष प्रधानता को प्रश्रय दे रहा है और उसकी बेजा हरकतों को उचित ठहरा रहा है. जिस देश में दिन-रात बलात्कार हो रहे हैं. अपराधियों को सजा नहीं मिल पा रही है. जिस समाज में बेटियों की भ्रूण हत्या से लेकर दहेज हत्या तक आम है, गली मोहल्लों में लड़कियों पर भद्दी टिप्पणियां और इशारे करने में युवकों को गुरेज नहीं होता... उस समाज और देश में ‘कबीर सिंह’ की जलील और अश्लील हरकतों में कोई खामी क्यों दिखेगी?
आज ऐसे किरदार का नाम कबीर रखा गया है. कल राम,कृष्ण, मोहम्मद, यीशु,विवेकानंद,बुद्ध, गाँधी,नानक भी हो सकता है. जब पूरा जोर कमाई और कामयाबी पर हो तो क्रिएटिव कर्तव्य की कौन सोचे?


Tuesday, June 4, 2019

सिनेमालोक : कोरियाई यथार्थ की भावुक पारिवारिक फिल्म


सिनेमालोक
कोरियाई यथार्थ की भावुक पारिवारिक फिल्म
अजय ब्रह्मात्मज
कल ‘भारत’ रिलीज होगी. सलमान खान की इस प्रतीक्षित फिल्म के निर्देशक अली अब्बास ज़फर हैं. दोनों की पिछली फिल्मों ‘टाइगर जिंदा है’ और ‘सुल्तान’ ने अच्छा कारोबार किया था. ‘भारत’ के साथ तिगडी पूरी होगी. ऐसा माना जा रहा है कि यह फिल्म भी तगड़ा कारोबार करेगी. एक तो ईद का मौका है. दूसरे इसमें कट्रीना कैफ भी हैं. हालाँकि फिल्म के ट्रेलर और गानों को दर्शकों का जबरदस्त रेस्पोंस नहीं मिला है,लेकिन ट्रेड पंडितों को लग रहा है कि सलमान को देखने की बेताबी फिल्म का बिज़नस बढ़ाएगी. उनका जोर इस बात पर है कि क्या ‘भारत’ 300 करोड़ का कारोबार कर पायेगी.
फिल्मों के एक्टिव दर्शकों को मालूम होगा कि ‘भारत’ कोरियाई फिल्म ‘ओड टू माय फादर’(कुकसेजिंघ) की अधिकारिक रीमेक है. कोरियाई फिल्म 2014 में आई थी. इस फिल्म को देख कर सलमान खान इतने प्रभावित हुए थे कि उन्होंने अभी के प्रिय नर्देशक अली अब्बास ज़फर को इसे देखने के लिए उकसाया और हिंदी में भारतीय रूपांतर के लिए प्रेरित किया. कोरिई फिल्म देख रहे हिंदी दर्शक जानते हैं कि वहां की फिल्मों के इमोशन हिंदी फिल्मों जैसे ही होते हैं. पहले तो बगैर अधिकार और अनुमति लिए ही भारतीय निर्देशक चोरी-चोरी उन्हें हिंदी में बना लेते थे. अब इस तरह की चोरियां लगभग ख़त्म हो गयी हैं. अली अब्बास ज़फर ने ‘ओड टू माय फादर’ के मूल भाव को वैसे ही रखा है. भारतीय संदर्भ के लिए थोड़ी तब्दीलियाँ की हैं.
‘ओड टू माय फादर’ नायक सू देयोक की कहानी है. 23 दिसम्बर 1950 को युद्ध छिड़ने के बाद आज के उत्तर कोरिया के एक तटीय बस्ती को खाली करवाया जा रहा है. शिप में चढ़ने की हड़बोंग में सू का परिवार(पिता और बहन) बिखर जाता है. जाते-जाते उसके पिता हिदायत देते हैं कि परिवार का ख्याल रखना,क्योंकि आज से तुम ही परिवार के मुखिया हो. फिल्म सूके साथ साल के जीवन संघर्ष को समेटती है. पिता और बहन से मिलने की उम्मीद में वह पूरी जिंदगी कटता है. यह फिल्म दक्षिण कोरिया के इतिहास के साथ आगे बढती है. सारे ऐतिहासिक क्षणों को कैद करती यह फिल्म समय के थपेड़ों से जूझते एक परिवार की कहानी कहती है. बुरे दिनों में भी वे एक-दूसरे का सहारा बनते हैं. फिल्म का नायक जर्मनी और विएतनाम भी जाता है. इस फिल की सबसे बड़ी खूबी है कि भावनात्मक झंझावातों में यह अपनी ज़मीन नहीं छोडती. रियल रहने की कोशिश करती है. फिल्म में ऐसे प्रसंग हैं,जहाँ कठोरदिल दर्शकों की भी आँखें नम होती हैं. इस फिल्म ने कोरिया में ऐतिहासिक कारोबार किया था.
अब देखना है कि अली अब्बास ज़फर की कलम मूल कहानी का कैसे भारतीयकारन करती है. फिल्म के ट्रेलर और प्रमोशनल विडियो में कुछ महत्वपूर्ण दृश्य जस के तस दिख रहे हैं. इस फिल्म में नायक बहरत के बंटवारे से छह दशकों का सफ़र तय करता है. ‘भारत’ में सलमान खान को पांच उम्र के छह लुक दिए गए हैं. परदे पर सलमान की मौजूदगी आकर्षक होती है,लेकिन क्या वे किरदार की उम्र की भिन्नता को सही अंदाज और आवाज़ दे पाएंगे? इस फिल्म कट्रीना कैफ और दिशा पटनी के उपयोग के लिए कुछ गाने भी रखे गए हैं. हिंदी फिल्म है तो प्रेम कहानी का होना लाजिमी है. ऐसे में कतई ज़रूरी नहीं है ‘भारत’ मूल को फॉलो करे,लेकिन यह उम्मीद तो रहेगी ही कि यह मूल की तरह ही भावनाओं का उद्रेक कर सके. साथ ही बंटवारे के दर्द में जी रहे किरदारों की तकलीफ भी जाहिर कर सके. अली अब्बास ज़फर का दावा है कि उनकी टीम ने गहरे शोध और अध्ययन से पीरियड क्रिएट किया है. अधिकतम प्रामाणिक होने की कोशिश की है. फिल्म देखने के पहले किसी प्रकार की अशंक नहीं की जानी चाहिए. उम्मीद है कि अली अब्बास ज़फर ने ऐसी कहानी के लिए ज़रूरी परिपक्वता बरती होगी और सलमान खान की पूरी सहमती रही होगी.
सचमुच ‘भारत’ कोरियाई फिल्म ‘ओड टू माय फत्दर’ के करीब हुई तो यह हिंदी की एक उल्लेखनीय फिल्म साबित होगी.



Wednesday, May 29, 2019

संडे नवजीवन : कमाई और कामयाबी है बायोपिक में

संडे नवजीवन
कमाई और कामयाबी है बायोपिक में
-अजय ब्रह्मात्मज
हर हफ्ते नहीं तो हर महीने कम से कम दो बायोपिक की घोषणा हो रही है.उनमें से एक में कोई लोकप्रिय स्टार होता है.बायोपिक निर्माताओं में फिल्म इंडस्ट्री के बड़े बैनर होते हैं.दरअसल,बायोपिक का निर्माण निवेशित धन की वापसी और कमाई का सुरक्षित जरिया बन चुका है.पिछले कुछ सालों में आई बायोपिक में से कुछ की कामयाबी ने निर्माताओं का विश्वास और उत्साह भी बढ़ा दिया है.वे बायोपिक की तलाश में रहते हैं.लेखक किताबें छान रहे हैं.स्टार कान लगाये बैठे हैं.और निर्माता तो दुकान खोले बैठा है.अभी कम से कम 40 बायोपिक फ़िल्में निर्माण की किसी न किसी अवस्था में हैं.हाल ही में गणितज्ञ शकुंतला देवी पर बायोपिक की घोषणा हुई है,जिसका निर्देशन अनु मेनन करेंगी.विद्या बालन परदे पर शकुंतला देवी के रूप में नज़र आएंगी.कुछ बायोपिक फिल्मे इस साल के आखिर तक रिलीज होंगीं,जिनमें ‘उधम सिंह’ और ‘तानाजी’ पर सभी की नज़र है.
हिंदी फिल्मों के अतीत में झांक कर देखें तो शुरुआत से ही चरित कथाएं बनती रही है. मिथक और इतिहास के प्रेरक चुनिंदा चरित्रों को फिल्मों का विषय बनाया जाता रहा है. तब इनके लिए बायोपिक शब्द का इस्तेमाल नहीं होता था. उनकी कोई भी विधात्मक पहचान नहीं थी. रिचर्ड एटनबरो की ‘गांधी’ को भी हम बायोपिक के तौर पर नहीं जानते. वह हमारे लिए महज महात्मा गांधी के जीवन पर बनी प्रमाणिक फिल्म मानी जाती है. 
मूक फिल्मों के दौर से ऐतिहासिक और मिथकीय चरित्रों की शौर्य गाथा और कथा फिल्मकारों को आकर्षित और प्रेरित करती रही है. कह सकते हैं कि हॉलीवुड और विदेशी फिल्मों के प्रभाव से यह आरंभ हुआ होगा, लेकिन रामचरितमानस और रामलीला के देश में चरित्र चर्चा और कथा कहने और प्रदर्शन की सदियों पुरानी परंपरा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, संभव है, प्रेरणा बाहर से मिली हो, लेकिन प्रयास तो भारतीय रहे. देश के फिल्मकारों ने भारतीय चरित्रों को ही परदे पर पेश किया. राजा हरिश्चंद्र पर जीवन के प्रसंग पर बनी दादा साहेब फाल्के की पहली भारतीय फिल्म ‘राजा हरिशचंद्र से लेकर बोलती फिल्मों के आरंभिक दौर तक में ऐसे किरदारों को जगह मिलती रही. लोकगाथा और लोकश्रुति से नायक लिए गए. उन्हें कल्पना के सहारे फिल्मों में प्रभावशाली तरीके से पेश किया गया. आजादी के पहले के अधिकांश चरित्र नायक स्वतंत्रता की चेतना से आलोड़ित होते थे. ब्रिटिश सेंसरशिप की वजह से फिल्मकार अप्रत्यक्ष तरीके से देशभक्ति, राष्ट्रवाद और मुक्ति/आजादी की बातें करते थे. फिर भी उन्हें वास दफा सेंसरशिप का सामना करना पड़ा
आजादी के आसपास वी शांताराम ने ख्वाजा अहमद अब्बास की मदद से ‘डॉ कोटनीस की अमर कहानी’ का निर्माण और निर्देशन किया. डॉ कोटनीस चीनी क्रांति में मदद करने के लिए भारत से गए डॉक्टर थे, जो चीनी क्रांतिकारियों की सेवा करते हुए दिवंगत हुए चीन में आज भी उनका नाम आदर से याद किया जाता है. वी शांताराम की यह फिल्म तो अधिक नहीं चल पाई थी, लेकिन इससे समकालीन किरदारों पर फिल्म बनाने की शुरुआत हो गई. बाद के दशकों में देश के स्वतंत्रता सेनानियों और राष्ट्रीय नेताओं पर भी फिल्में बनीं, किन्तु रिचर्ड एटनबरो की ‘गांधी’ के अलावा कोई दूसरी फिल्म जनमानस(दर्शकों) के बीच लोकप्रिय नहीं हो पाई. निर्देशकों के लिए अकेली सचमुच विधात्मक और शिल्पगत चुनौती रही है कि किसी भी हस्ती के दशकों की जिंदगी को कैसे दो-तीन घंटों में समेटकर मनोरंजक तरीके से पेश किया जाए. कोशिश यह भी रहती है कि वह डॉक्यूमेंट्री ना बन जाए. हिंदी में राष्ट्रीय नेताओं पर बनी फिल्मों का शैक्षणिक महत्व हो सकता है. उनका मनोरंजक पक्ष कमजोर रहा है.यही कारन है कि अनगिनत चरित्रों में से कुछ खास ही रुपहले परदे पर नज़र आये,
लंबे अंतराल के बाद शेखर कपूर की फिल्म ‘बैंडिट क्वीन’ ने फिल्मकारों के लिए नया वितान खोल दिया. दस्यु सुंदरी फूलन देवी के जीवन पर आधारित ‘बैंडिट क्वीन’ रियलिस्टिक फिल्म थी’ हिंदी में किसी जीवित व्यक्ति पर बनी संभवत यह पहली फिल्म थी. फिल्म को अच्छी सराहना और चर्चा मिली.फिर मणिरत्नम की धीरूभाई अंबानी के जीवन से प्रेरणा लेकर गुरु का निर्माण और निर्देशन किया. मजेदार तथ्य है कि यह कभी लिखा और बताया नहीं गया कि ‘गुरु’ धीरूभाई अंबानी के जीवन पर आधारित फिल्म है, लेकिन सभी ने इसे उनके बायोपिक की तरह ही देखा. और फिर तिग्मांशु धूलिया के निर्देशन में आई ‘पान सिंह तोमर’ ने बायोपिक निर्माण में नया जोश दिया. इसे गहरे शोध के बाद संजय चौहान ने लिखा था. इस फिल्म की भाषा बुंदेली रखी गई थी. इरफान ने सैनिक और खिलाड़ी से भागी बने पान सिंह तोमर को पर्दे पर बखूबी चरितार्थ किया था. अब इस फिल्म के निर्माता भले ही ‘पान सिंह तोमर’ से आरंभ हुए बायोपिक ट्रेंड का क्रेडिट लेते रहें. कुछ नया दिखाने और करने पर गर्वित महसूस करते रहें. सच्चाई यह है कि बनने के बाद यह फिल्म एक अरसे तक रिलीज नहीं की गई. कहा नहीं गया,लेकिन निर्माताओं के लिए यह मेंनस्ट्रीम फिल्म नहीं थी. इसमें मनोरंजन भी नहीं था. जैसे-तैसे फिल्म रिलीज हुई तो दर्शकों ने इसे हाथोंहाथ लिया और सराहा. उसके बाद राकेश ओमप्रकाश मेहरा के निर्माण-निर्देशन में आई ‘भाग मिल्खा भाग’ ने कामयाबी का नया मंत्र देकर ट्रेंड स्थापित कर दिया. मुंबई के निर्माताओं को बायोपिक में कमाई के संभावना दिखी और वे टूट पड़े.
बायोपिक निर्माण के लिहाज से आसान प्रस्ताव हो गया है.निर्माता किसी भी लोकप्रिय कलाकार को सिर्फ मशहूर व्यक्ति का नाम बताता है और वह तैयार हो जाता है.प्रोजेक्ट और कहानी के लिए अधिक माथापच्ची नहीं करनी पड़ती. बायोपिक तैयार करने में समबन्धित व्यक्ति से आवश्यक इनपुट मिलने से फिल्म प्रमाणिक बन जाती है.फिल्म के प्रचार में भी मदद मिलती है. दर्शकों को अधिक कुछ बताना नहीं होता.उस मशहूर हस्ती से दर्शकों का पुराना परिचय रहता है.कई बार वे स्वयं प्रचार के लिए उपलब्ध रहते हैं.पिछले साल की ‘संजू’ का उदहारण सामने है.मज़ा तो तब है,जब किसी गुमनाम व्यक्ति पर बायोपिक बने और फिल्म की वजह से दर्शक और देश उस व्यक्ति को जाने.ऐसी कोशिश कम निर्माता करते हैं.ज्यादातर निर्माता खिलाडियों और सोशल वर्कर पर बायोपिक बनाना पसंद कर रहे हैं राजनीतिक और ऐतिहासिक चरितों को छूना बर्रे के छत्ते में हाथ लगाना माना जाता है.कोई न कोई समूह और समुदाय विरोध और तोड़फोड़ के लिए खड़ा हो जाता है.

निर्माणाधीन बायोपिक
साइना नेहवाल: अमोल गुप्ते के निर्देशन में बन रही बैडमिंटन खिलाड़ी साइना के जीवन पर और खेल पर आधारित है यह फिल्म. इस फिल्म में साइना की भूमिका पहले श्रद्धा कपूर निभा रही थीं. अब उनकी जगह परिणीति चोपड़ा आ गई है.
अभिनव बिंद्रा : इस फिल्म में अभिनव बिंद्रा की भूमिका हर्षवर्धन कपूर निभा रहे हैं. दो साल पहले इस फिल्म की घोषणा हुई थी, लेकिन अभी तक फिल्म निर्माण शुरू नहीं हुआ है, पहले विशाल भारद्वाज इसके निर्माता थे. अभी अनिल कपूर स्वयं बेटे की फिल्म प्रोड्यूस करेंगे.
मिताली राज : महिला क्रिकेट टीम की रिकॉर्ड होल्डर कप्तान मिताली राज की उपलब्धियों को समेटती इस फिल्म के अधिकार वायकॉम 18 के पास हैं. तापसी पन्नू मिताली राज की भूमिका निभाने के लिए उत्सुक हैं.
पुलेला गोपीचंद : बैडमिंटन खिलाडी पुलेला की इस बायोपिक में तेलुगू फिल्मों के अभिनेता सुधीर बाबू उनकी भूमिका निभाएंगे, वे कभी पुलेका के कोर्ट पार्टनर भी रहे हैं. यह फिल्म तेलुगू के साथ हिंदी और अंग्रेजी में भी बनेगी.
सैयद अब्दुल रहीम ; फुटबॉल कोच सैयद अब्दुल रहीम पर बन रही बायोपिक में अजय देवगन उनकी भूमिका निभाएंगे. इसके निर्माता बोनी कपूर हैं. ‘बधाई हो’ की कामयाबी के बाद अमित शर्मा का यह अगला निर्देशन होगा. जून महीने से इसकी शूटिंग आरंभ हो जाएगी.
अरुणिमा सिन्हा : अरुणिमा अपांग पर्वतारोही हैं. एक दुर्घटना के शिकार होने के बाद वॉलीबॉल खिलाड़ी अरुणिमा सिन्हा ने खुद को बटोरा था. और फिर एक मुश्किल उपलब्धि हासिल की थी. पहले इस फिल्म में कंगना रनोट के होने की खबर आई थी, लेकिन अभी यह भूमिका आलिया भट्ट निभा रही हैं. इसके निर्माता करण जोहार हैं.
बिरसा मुंडा : दक्षिण के निर्देशक पा रंजीत बिरसा मुंडा पर बायोपिक बना रहे हैं. वर्तमान झारखंड के क्रांतिकारी बिरसा मुंडा का प्रेरक जीवन ‘जल,जंगल,ज़मीं; की लडाई के लिए आज भी प्रासंगिक है. पा रंजीत ने महाश्वेता देवी के उपन्यास जंगल के दावेदार का अधिकार लिया है. निश्चित ही महाश्वेता देवी का नजरिया फिल्म में देखने को मिलेगा. इस फिल्म में ईशान खट्टर के चुने जाने की बात की जा रही है.
शकुंतला देवी : विक्रम मल्होत्रा की फिल्म शकुंतला देवी में विद्या बालन शीर्षक भूमिका निभाएंगी. इस फिल्म का निर्देशन अनु मेनन कर रही हैं
संजय चौहान का इंटरव्यू
बहुचर्चित बायोपिक के लेखक संजय चौहान को यह श्रेय मिलता है कि उनकी लिखी ‘पान सिंह तोमर’ की सफलता और सराहना ने फिल्मकारों को इस विधा के प्रति उत्साह और भरोसा दिया.लकीर की फ़क़ीर फिल्म इंडस्ट्री को तो कामयाबी का संकेत भर मिलना चाहिए.वे टूट पड़ते हैं.पेश है बायोपिक बनाने की होड़ के सन्दर्भ में संजय चौहान से हुई बातचीत के अंश.
-‘पान सिंह तोमर’ लिखे जाने के समय का क्या माहौल था?
० स्पष्ट कर दूं कि ‘लेट्स मेक अ बायोपिक’ के अंदाज में हम ने इसके बारे में नहीं सोचा था.हमारे लिए पान सिंह तोमर एक किरदार था. उसकी जर्नी रोचक थी. दर्शकों ने उसे पसंद किया. फिल्म चल गयी. फिर सभी का ध्यान गया कि यह भी एक जोनर हो सकता है.आप देखें कि उसके पहले हिंदी में छिटपुट बायोपिक बने हैं,लेकिन उन्हें वैसी कामयाबी नहीं मिली थी.’पान सिंह तोमर’ के बाद ट्रेंड चल पड़ा.
-बायोपिक में किसी व्यक्ति की पूरी ज़िन्दगी नहीं होती?
० हो भी नहीं सकती. फ़िल्में बायोग्राफी नहीं होतीं,इसीलिए बायोपिक शब्द बना होगा. बायोग्राफी तो फिर डोक्युमेंटऋ जैसी हो जाएगी. उसमे दर्शकों का इंटरेस्ट नहीं रहेगा.दर्शक किसी व्यक्ति की कहानी देखते हुए एंटरटेन भी होना चाहते हैं.
-इन दिनों हर बैनर और डायरेक्टर बायोपिक बनाने में लगा है.यह भेडचाल क्यों?
० आसान सा लगता है.किसी मशहूर व्यक्ति या अचीवर से अधिकार ले लो. किसी व्यक्ति की दशकों की ज़िन्दगी को दो घंटे में कहने के लिए रियल मसाले मिल जाते हैं. कल्पना की ज़रुरत नहीं पड़ती.सच्ची बात यह है कि लेखक के तौर पर मेरे लिए चुनौती होती है.किसी की ज़िन्दगी को मुकम्मल कहानी की तरह पेश करना होता है,होड़ जो लगी है,वह कामयाबी की है.एक और चीज देख रहा हूँ कि स्टार भी बायोपिक में इंटरेस्ट दिखा रहे हैं.उन्हें सिर्फ नाम बता दो तो आरंभिक सहमती हो जाती है.
-मिल्खा सिंह पर आये बायोपिक के बाद जीवित व्यक्तियों पर फिल्म बनाने का रुझान बढ़ा है...और खिलाडियों या दूसरे किस्म के लोगों पर ही फोकस है. राजनीतिज्ञ गायब हैं..
० राजनीतिज्ञों को कोई टच नहीं करना चाहता.वह थोडा मुश्किल भी.विवाद और आपत्ति की सम्भावना रहती है.मैं’मोदी’ जैसे बायोपिक की बात नहीं कर रहा हूँ.उसमें उन्हें निराधार हीरो बनाने की कोशिश है.कश्मीर में झंडा फहराने तो मुरली मनोहर जोशी गए थे.यहाँ मोदी बता रहे हैं.वे उस समूह का हिस्सा रहे होंगे.निर्माता को दर रहता है कि उसकी फिल्म न फँस जाए.दक्षिण में कोशिशें हो रही हैं. एनटीआर पर आ रही है. जयललिता पर बन रही है,
-अगर अभी आप को कोई बायोपिक लिखनी हो तो किसे चुनेंगे?
० मैं अंजान व्यक्ति की बायोपिक लिखना चाहूँगा. मैंने एक बायोपिक लिखी है,लेकिन वे मशहूर व्यक्ति हैं.मुझे अफ़सोस हुआ कि मुझे रेशमा पठान क्यों नहीं नज़र आयीं? ‘शोले’ की इस स्टंट गर्ल पर अच्छी फिल्म बनानी चाहिए थी. वह अफ्ली स्टंट गर्ल हैं.  



Tuesday, May 28, 2019

सिनेमालोक : मातृभाषा में संवाद


सिनेमालोक
मातृभाषा में संवाद
अजय ब्रह्मात्मज
पिछले दिनों कलाकार क्लब द्वारा आयोजित ‘शॉर्ट फिल्म प्रतियोगिता’ की जूरी में बैठने का संयोग बना. जूरी में मेरे अलावा निर्देशक डॉ, चंद्रप्रकाश द्विवेदी और एडिटर अरुणाभ भट्टाचार्य थे. इस प्रतियोगिता में अनेक भाषाओँ की फ़िल्में थीं. कई घंटो तक एक-एक कर फ़िल्में देखते हुए एक अलग एहसास घना होता गया. कलाकारों की भाषा...उनकी संवाद अदायगी और उससे प्रभावित अभिनय.हिंदी फिल्मों में हिंदी की बिगड़ती और भ्रष्ट हो रही हालत पर मैं लगातार लिखता रहता हूँ. नियमित फ़िल्में देखते समय भी दिमाग का एक अन्टेना यह पकड़ रहा होता है की संवादों में किस प्रकार का भाषादोष हो रहा है. हिंदीभाषी और हिंदी साहित्य का छात्र होने की वजह से भी कान चौकन्ने रहते हैं.यूँ भी कह सकते हैं कि खामियां जल्दी सुनाई पड़ती हैं. मैं अपनी समीक्षा और लेखों में आगाह और रेखांकित भी करता रहता हूँ.
कुछ हफ्ते पहले मैंने इसी कॉलम में उल्लेख किया था कि इन दिनों के अधिकांश अभिनेता स्पष्ट उच्चारण के साथ हिंदी संवाद नहीं बोल पते हैं.पहले के अभिनेता हिंदी में समर्थ नहीं होने पर अभ्यास करते थे. अभी भी भाषा और उसके लहजे के अभ्यास की औपचारिकता पूरी की जाती है,लेकिन कलाकारों का ध्यान भाषा सीखने से अधिक उसे निबटाने पर होता है. ज्यादातर यही सुनाई पड़ता है कि डबिंग में सुधार लेंगे. ठीक कर लेंगे,क्योंकि डबिंग करते समय एक भाषा इन्स्ट्रक्टर रहता है. इस सुविधा से कलाकारों में लापरवाही आ जाती है.
बहरहाल,उस दिन मैंने यह बात रखी कि कैसे हिंदीतर भाषाओँ की फिल्मों के कलाकार अपने संवादों को बोलते समय एक्सप्रेसिव दिखते हैं. ऐसा लगता है कि संवाद और भाव घुल गए हैं. हिंदी की फिल्मों में संवादों की अदायगी क्यों कृत्रिम और बनावटी लगती है? डॉ. द्विवेदी ने सहमति के साथ इस वजह की व्याख्या की. निर्देशन के अपने अनुभवों से उन्होंने बताया कि हिंदी फिल्मों के जिन कलाकारों की मातृभाषा हिंदी रही है या जो हिंदी संस्कार से आये हैं,उन सभी के साथ यह दिक्कत नहीं होती है. जिनकी पहली भाषा हिंदी नहीं है या जिनके व्यवहार में हिंदी नहीं है,वे सभी सही लहजे और पॉज के साथ हिंदी नहीं बोल पाते हैं. इनमें से कुछ हिंदी पढ़ लेते हैं,लेकिन धाराप्रवाह या भाव के साथ संवाद बोल पाना उनके लिए संभव नहीं होता. यही वजह है कि उनकी संवाद अदायगी और हिंदी में कृत्रिमता सुनाई पड़ती है. निर्देशक और बाकी तकनीकी सहायकों की भी हिंदी कमज़ोर होती है,इसलिए वे समय पर सही सुधार नहीं कर पाते. परिणाम परदे पर नज़र आता है. उनकी हिंदी संप्रेषणीय नहीं हो पाती.
यह समस्या हिंदी फिल्मों के साथ ही है. देश की शेष भाषाओँ की फिल्मों में उसी भाषा के कलाकार होते हैं.बंगला,तेलुगू,तमिल और मलयालम आदि भाषाओँ की फ़िल्में समान भाषा के कलाकारों की वजह से एक्सप्रेसिव और भावपूर्ण सुनाई पड़ती है. अभी के लोकप्रिय कलाकारों की संवाद अदायगी पर गौर करें तो वरुण धवन और राजकुमार राव की संवाद अदायगी के फर्क से इसे समझ सकते हैं. रणबीर कपूर और रणवीर सिंह के उच्चारण और लहजे में भी अंतर है. भाषा संस्कार के साथ आये कलाकार बोलते और अभिनय करते समय स्वाभाविक लगते हैं. यह स्वाभाविकता सीखी हुई भाषा में गहन अभ्यास से आ सकती है.उसके लिए ज़रूरी है कि आप हिंदी सुन भी रहे हों. लिखना-पढना तो आवश्यक है ही. आप देखें कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में हिंदी सिर्फ संवादों की भाषा रह गयी है और वह भी रोमन में लिखी हिंदी. नतीजे में हिंदी फिल्मों के अभिनय और एक्सप्रेशन में सामान रूप से कृत्रिमता बढती जा रही है. भाषा न बोल पाने का असर चेहरे के भाव और आंगिक मुद्राओं पर भी आता है. दरअसल,निर्माण के दौरान ढंग से परखने वाला कोई नहीं रहता.फिल्म की टीम की कप्तानी कर रहे निर्देशक खुद ही हिंदी में तंग होते है. संवाद अंग्रेजी में लिखे और सोचे जाते हैं और फिर कोई और उन्हें हिंदी में अनूदित करता है. अभी से ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले सालों में भाषा और अभिनय की स्थिति और बदतर होगी.
  

Tuesday, May 21, 2019

सिनेमालोक : प्रौढ़ नायक का प्रेम


सिनेमालोक
प्रौढ़ नायक का प्रेम
अजय ब्रह्मात्मज
हिंदी फिल्मों में एक्टर की वास्तविक उम्र हमेशा अपने कैरेक्टर से ज्यादा होती हैं. फिल्मों की यह परिपाटी है कि कोई एक्टर नायक की भूमिका में लोकप्रिय और स्वीकृत हो गया तो वह अंत-अंत तक नायक की भूमिका निभाता रहता है...वह भी जवान नायक की भूमिका. दिलीप कुमार, राज कपूर और देवानंद के जमाने से ऐसा चला आ रहा है. इनमें से दिलीप कुमार और राज कपूर तो एक उम्र के बाद ठहर गए,लेकिन देवानंद अंतिम सांस तक हीरो ही बने रहे. उन्होंने स्वीकार ही नहीं किया कि सभी की तरह उनकी उम्र बड़ी है. वह भी उम्रदराज हो गए हैं.
आज के पॉपुलर नायकों में खानत्रयी (आमिर, शाह रुख और सलमान. अभी तक बतौर हीरो ही पर्दे पर नजर आ रहे हैं. उनके ज्यादातर करैक्टर उनकी वास्तविक उम्र से कम होते हैं. आमिर खान ने ‘दंगल’ में खुद से बड़ी उम्र की भूमिका जरूर निभाई, लेकिन विज्ञापन से लेकर फिल्मों तक में भेष और उम्र बदलने का प्रयोग कर वे वास्तविक उम्र को धोखा देते रहते हैं. शाह रुख खान ने ऐसे ही ‘वीर जारा’ में प्रोढ़ छवि पेश की थी. ‘डियर ज़िंदगी’ में वह आलिया भट्ट के साथ अपनी उम्र के किरदार में नजर आए. सलमान खान का शरीर अब इस बात की सहूलियत नहीं देता कि वे 25-30 की उम्र के दिखे. फिर भी वे अपनी उम्र से जवान दिखने का प्रयास करते रहते हैं. ‘भारत’ में वह चार अलग-अलग उम्र की छवियों में दिख रहे हैं. उनके सफ़ेद बालों का ज़िक्र एक संवाद में सुनाई पड़ता है. फिल्म में जवान भारत की भूमिका निभाना उनके लिए मुश्किल चुनौती थी. उन्हें अपनी जवानी की फिल्में अंदाज-ओ-बयां के लिए देखनी पड़ी. उल्लेखनीय है कि तीनों खान 54 साल के हो चुके हैं.
इस पृष्ठभूमि में अजय देवगन और तब्बू की तारीफ करनी होगी. तब्बू तो पहले से उमदराज किरदारों की भूमिकायें पूरी संजीदगी से निभा रही हैं. खुद अजय देवगन ने भी पहले मधुर भंडारकर निर्देशित ‘दिल तो बच्चा है जी’ में अपनी उम्र का किरदार निभाया था. इस बार लव रंजन की अकिव अली निर्देशित ‘दे दे प्यार दे’ में वह 50 वर्ष के आशीष की भूमिका में दिखे. उन्होंने अपनी और किरदार की उम्र की समानता का ख्याल रखते हुए बालों की सफेदी को जाने दिया. अगर उनके बाल और दाढ़ी का रंग खिचड़ी (साल्ट एंड पेपर) होता तो फिल्म और जानदार हो जाती. इस फिल्म में तब्बू की उम्र 47 वर्ष थी. वह अजय देवगन की परित्यक्त पत्नी मंजू की भूमिका में है. लव रंजन और अकिव अली ने अपने  नायक -नायिका को प्रोढ़ रखा. उम्र के लिहाज से उनकी हरकतें होती हैं, लेकिन प्रेम का अधिकार नायक को ही मिलता है, वह खुद से 24 साल छोटी लड़की से प्रेम करने लगता है और उससे शादी भी करना चाहता है. यह स्वाभाविक तो नहीं है, लेकिन अजीब भी नहीं है. हिंदी फिल्मों में ही दिलीप कुमार, राजेश खन्ना, कबीर बेदी, मिलिंद सोमण और सैफ अली खान के उदाहरण हैं.
फिल्मों की बात करें तो 1986 में राजेश खन्ना की फिल्म ‘अनोखा रिश्ता’ में भी बेमेल उम्र के किरदारों का प्रेम था. फिल्म की नायिका सबीहा थीं.अमिताभ बच्चन ने राम गोपाल वर्मा की फिल्म ‘निःशब्द’ में अपनी बेटी की सहेली से प्रेम किया था. जिया खान ने युवा सहेली की भूमिका निभाई थी. अमिताभ बच्चन ‘चीनी कम’ में भी खुद से कम उम्र की तब्बू से प्रेम करते दिखे. 
फिल्मों के अंदरूनी समस्या है कि प्रोढ़ प्रेम की अनुमति सिर्फ नायकों को ही मिलती है. फिल्मों की किसी प्रोढ़ नायिका को किसी युवक से प्रेम करते नहीं दिखाया जाता. ’दिल चाहता है’ और ‘एक छोटी सी लव स्टोरी’ के बेमेल उम्र के प्रेम को पूरा एक्स्प्लोर नहीं किया गया था. हो सकता है कि भारतीय समाज और दर्शक अभी इसके लिए तैयार ना हों, लेकिन इसमें स्त्री-पुरुष संबंधों और रिश्तो के नए आयाम तलाश रहे फिल्मकार जल्दी ही ऐसी कोई फिल्म लेकर आयें तो आश्चर्य नहीं होगा. रियल लाइफ में प्रियंका चोपड़ा और निक जोंस ने प्रेम और शादी में उम्र के फासले को समेट दिया है. समाज में और भी उदाहरण हैं. बस, उन्हें पर्दे पर भी आना चाहिए.


Tuesday, May 14, 2019

सिनेमालोक : कलाकारों की हिंदी दोषपूर्ण

सिनेमालोक
 कलाकारों की हिंदी दोषपूर्ण
-अजय ब्रह्मात्मज
यह समस्या इधर बढ़ी है.हमारे युवा फिल्म कलाकार भाषा खास कर अपनी फिल्मों की भाषा - हिंदी पर ध्यान नहीं दे रहे हैं. लगता है घडी की सुई घूम कर फिर से चौथे दशक में पहुँच गयी है, हिंदी फिल्मों के टाकी होने के साथ फिल्मों में आये कलाकार ढंग से हिंदी नहीं बोल पाते थे.पारसी और कैथोलिक समुदाय से आये इन कलाकारों के परिवेश और परिवार की भाषा पारसी और अंग्रेजी रहती थी,इसलिए उन्हें हिंदी बोलने में दिक्कत होती थी.तब उनके लिए भाषा के शिक्षक रखे जाते थे,उनका उच्चारण ठीक किया जाता था.सेट पर शूटिंग के समय और तैयारी के लिए हिंदी-उर्दू के प्रशिक्षक रखे जाते थे.पूरा ख्याल रखा जाता था.फिर भी चूक हो जाती थी तो फिल्म समीक्षक उनकी हिंदी पर अलग से टिपण्णी करते थे.80 सालों के बाद हम फिर से वैसे ही हालात में पहुंच रहे हैं.
ताज़ा उदहारण है ‘स्टूडेंट ऑफ़ द ईयर 2’. इस फिल्म में टाइगर श्रॉफ मुख्य भूमिका में हैं.उनके साथ तारा सुतारिया और अनन्या पांडे दो नयी हीरोइनें हैं. यह दोनों की लौन्चिंग फिल्म है.इस फिल्म को देखते हुए गहरा एहसास हुआ कि उनकी बोली गयी हिंदी दोषपूर्ण है.उच्चारण और अदायगी में खोट होने की वजह से वे संवादों से भाव नहीं व्यक्त कर पा रहे थे.अब यह सभी जानते हैं कि हिंदी फिल्मों के कलाकारों को रोमन में संवाद दिए जाते हैं.थिएटर से आए एक्टर और अमिताभ बच्चन सरीखे कुछ कलाकारों को छोड़ दें तो सभी को अपने संवाद रोमन में चाहिए होते हैं.
हिंदी लिखना और पढना हमारी हिंदी फिल्मों के कलाकारों को नहीं आता.मैं यहाँ टो-टो कर पढने की क्षमता को महत्व नहीं दे रहा हूँ.तमाम लोकप्रिय कलाकारों की यह दिक्कत है.खास कर 21 वीं सदी के कलाकारों की यह समस्या विकट हो गयी है.वे जिम जाते हैं.शरीर सौष्ठव पर ध्यान देते हैं.किरदार के लिए ज़रूरी बाकी प्रशिक्षण और अभ्यास करते हैं.सिर्फ भाषा सौष्ठव पर उनका ध्यान नहीं होता.हिंदी के मामले में ’हो जायेगा’ एटीट्युड हावी रहता है.कुछ निर्माता और निर्देशक शिक्षक-प्रशिक्षक की व्यवस्था करते हैं तो उनके प्रति कलाकारों का आदर नहीं रहता.वे आवश्यक बोझ की तरह भी भाषा को नहीं लेते.नतीजा यह होता है कि हर तरह से बेहतरीन होने के बावजूद फिल्म में भाषाई खामी रह जाती है.
यह प्रसंग कई बार पढ़ा और सुना गया है कि जब लता मंगेशकर पार्श्व गायन के लिए फिल्मों में संघर्ष कर रही थीं तो उनकी मुलाक़ात दिलीप कुमार से हो गई.दोनों लोकल ट्रेन में सफ़र कर रहे थे.दिलीप कुमार ने उन्हें नेक सलाह दी कि उर्दू का अभ्यास करो और अपना उच्चारण ठीक करो.लता मंगेशकर ने गाँठ बाँध ली.उन्होंने सुर के साथ भाषा की भी साधना की.आज हम उनकी उपलब्धियों पर गर्व करते हैं.आज़ादी के पहले और बाद के दौर में सभी कलाकार भाषा का अभ्यास करते थे.हिंदी फिल्मों में पंजाबी कलाकारों की जबान साफ होती थी. यह भी एक वजह है कि किसी और इलाके से अधिक पंजाब के कलाकार हिंदी फिल्मों में सफल हुए.कभी गौर कीजियेगा कि हिंदी फिल्मों के ज्यादातर हीरो का संबंध पंजाब से क्यों था उर आज भी है?
हिंदी भाषा के प्रति लापरवाही बढती जा रही है.यह एक सामाजिक समस्या है.21 वीं सदी के बच्चों की पढाई-लिखाई इंग्लिश मध्यम में हो रही है.फिल्मों में आ रहे नए स्टार खास कर फिल्म परिवारों से आये स्टारकिड बचपन से फिल्मों में आने तक इंग्लिश में ही जीते हैं.उनकी संपर्क भाषा इंग्लिश रहती है.फिल्मों में आने की तैयारी में हिंदी शिक्षक रखे जाते हैं.वे कुछ महीनों में उन्हें बेसिक हिंदी सिखाते हैं.फिल्म शुरू होने के पहले तक तो अभ्यास होता है.फिल्म शुरू होते ही जिम ज्यादा ज़रूरी रूटीन हो जाता है.जैसे-तैसे संवाद बोले जाते हैं और वैसी ही उनकी डबिंग कर ली जाती है.कायदे से अब उन्हें हिंदी ट्यूटर बहांल करना चाहिए.जो रिहर्सल से लेकर डबिंग तक कलाकारों के साथ रहे.उनके उच्चारण और अदायगी पर ध्यान दे और ज़रूरी सुधार करे.

यह विडम्बना ही है कि हिंदी फिल्मों के कलाकारों को हिंदी बोलना नहीं आता.वे अपने संवाद भी सही लहजे और प्रभाव से नहीं बोल पाते.एक इंटरव्यू में अमिताभ बच्चन ने कहा था कि ‘भाषा से ही भाव आता है’.भाषा नहीं रहेगी तो भाव कहाँ से आएगा?और भाव नहीं होगा तो लाजिमी तौर पर प्रभाव भी नहीं होगा.

Wednesday, May 8, 2019

अवेंजर्स की अद्भुत कामयाबी


अवेंजर्स की अद्भुत कामयाबी
अजय ब्रह्मात्मज
इस समय देश में दो चर्चाएं आम हैं. एक तो हर कोने-नुक्कड़ में चुनाव की चर्चा चल रही है. और दूसरी चर्चा है ‘अवेंजर्स-द एंडगेम’ की. रिलीज के वीकेंड में फिल्प्रेमियों इसे देख लिया है. दर्शकों की रुचि और उत्साह को देखते हुए देश भर के सिनेमाघरों ने इसके अधिकाधिक शो रखे हैं. अहर्निश(दिन-रात) के शो चल रहे हैं. रात के शो भी हाउसफुल हैं. आलसी दर्शकों को टिकट नहीं मिल प् रहे हैं. अगर आप सोच रहे हैं कि शो के टाइम पर आप बॉक्स ऑफिस से टिकट ले लेंगे तो आप को घोर निराशा हो सकती है. रिलीज के पहले एडवांस से ही संकेत मिलने लगे थे कि दर्शकों कि बाढ़ से सिनेमाघर आप्लावित होंगे.यही हुआ भी. पहले ही 10 लाख टिकटों की बिक्री से अनुमान पुख्ता हो गया कि ‘अवेंजर्स-द एंडगेम’ की जबरदस्त ओपनिंग लगेगी. पहले ही दिन इस फिल्म को 53,10 करोड़ का कलेक्शन मिला और दूसरे दिन के 51.40 के कलेक्शन से ‘अवेंजर्स-द एंडगेम’ ने सफलता का जादुई 100 करोड़ का आंकड़ा पार कर लिया. यह एक नया रिकॉर्ड है,जिसे तोड़ पाना किसी भारतीय फिल्म के लिए बड़ी चुनौती होगी.
‘अवेंजर्स-द एंडगेम’ सिर्फ 2865 स्क्रीन में चल रही है. संख्या के हिसाब से देखें तो कई हिंदी फ़िल्में इससे ज्यादा स्क्रीन के साथ रिलीज होती हैं. खानत्रयी(आमिर,शाह रुख और सलमान) की अधिकांश फिल्मे लगभग 4000 स्क्रीन में रिलीज होती रही हैं,फिर भी वे ऐसा कलेक्शन जुटाने में पीछे रह गयी हैं.दर्शकों के उन्माद के साथ इस उल्लेखनीय कलेक्शन कि बड़ी वजह टिकट दर का बढ़ना है. ‘अवेंजर्स-द एंडगेम’ के टिकट दर दोगुने से ज्यादा कर दिए गए हैं.फिर भी भीड़ टूट पड़ी है, उन्हें 155 का टिकट 350 रुपये में खरीदने में दिक्कत नहीं हो रही है. ‘अवेंजर्स-द एंडगेम’ उनके लिए पैसा वसूल फिल्म है. उन्हें तीन घंटों का भरपूर मनोरंजन मिल रहा है. ऊपर से उनके तमाम सुपर हीरो एक साथ एक ही फिल्म में दिख रहे हैं. कल्पना करें कि किसी हिंदी फिल्म में तीनों खां एक साथ आ जाएं तो दर्शकों का उत्साह कितने गुने ज्यादा हो जायेगा. अफ़सोस यह है कि निर्देशकों के हहने पर भी ऐसा नहीं हो प् रहा है. याद होगा कि करण जौहर और रोहित शेट्टी ने ‘राम लखन’ के रीमेक की घोषणा की थी.अनेक कोशिशों और स्टारों के मनुहारों के बावजूद फिल्म फ्लोर पर नहीं जा सकी,क्योंकि हर स्टार को लखन की भूमिका चाहिए थी. हिंदी फिल्मों के स्टार का इगो उनसे आगे चलता है और दूसरों को धकेलता रहता है. ‘अवेंजर्स-द एंडगेम’ में सुपर हीरो और स्टारों की गिनती कर देख लें. सभी के फैन एकत्रित होकर ‘अवेंजर्स-द एंडगेम’ का दर्शक समूह बन गए हैं.
मार्वेल सिनेमेटिक यूनिट(एमसीयू) की 21 फिल्मों के समापन के रूप में आई ‘अवेंजर्स-द एंडगेम’ इस सीरीज के दीवाने दर्शकों के लिए यह फिल्म देखना अनिवार्य हो गया है. उनके लिए यह चाक्षुष उत्कर्ष है. यही कारण है कि दर्शक इसे देखने के लिए उतावले हो रहे हैं. एमसीयू की फिल्मों के प्रति शहरी दर्शकों की दीवानगी बहुत ज्यादा है. हमें गौर करना होगा कि यह फिल्म किस समूह के दर्शकों को भा रही है. 21वीं सदी में थिएटर जाने वाले दर्शकों का प्रोफाइल बदल चूका है. पिछली सदी में आरम्भ हुए उदारीकरण और मल्टीप्लेक्स कल्चर के लोकप्रिय होने के पहले माना जाता था कि निम्न माध्यम वर्ग और मजदूर ही हिंदी फिल्मों के मुख्य दर्शक हैं. सिनेमा के साथ दर्शकों में भी भरी बदलाव आया है.21वीं सदी के दर्शकों का प्रोफाइल अलग है. सिंगल स्क्रीन लगातार बंद हो रहे है. कस्बों और छोटे शहरों के दर्शक सिनेमाघरों से लगातार बहिष्कृत और वंचित हो रहे हैं. उन्होंने अपने मोबाइल फ़ोन को ही सिनेमाघर बना लिया है. और खुलेआम अवैध तरीके से फ़िल्में देख और दिखा रहे हैं. निर्माता,वितरक और एजेंसियों को उनकी परवाह नहीं है. उनका सारा जोर शहरी दर्शकों की रुचि पूरी करने पर रहता है. वे शहरी कमाई से ही संतुष्ट हो जाते हैं. सरकारी उदासीनता,दर्शकों की कृपणता और वैकल्पिक प्लेटफार्म आ जाने से देश में सिनेमाघरों की संख्या में बढ़ोत्तरी नहीं हो रही है. इसके साथ ही इन्टरनेट के प्रसार और सुविधा से शहरी दर्शकों का बड़ा समूह आम हिंदी फिल्मों से विमुख हो रहा है. उसकी जीवन शैली और संपर्क भाषा में अंग्रेजी के प्रचलन से हॉलीवुड की फिल्मों की आमद बढ़ी है. हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओँ में वह केवल इवेंट और कंटेंट की फ़िल्में देख लेता है,लेकिन ‘कलंक’ जैसी फिल्मों से धोखा खाने के बाद उसका भरोसा टूटता है.
संक्राति के इस दौर में ‘अवेंजर्स-द एंडगेम’ जैसी फ़िल्में भारतीय बाज़ार में सेंधमारी करने में सफल हो जाती हैं. उल्लेखनीय है कि संतोषजनक मनोरंजन मिले तो दर्शक पैसे खर्च करने को तैयार है. ऊपर से हॉलीवुड के मार्केटिंग पंडित अपनी फिल्मों की सही पोजिशनिंग के लिए जैम कर खर्च करते हैं. ‘अवेंजर्स-द एंडगेम’ के प्रचार में जितना खर्च भारतीय बाज़ार में हुआ है,उतने में एक ‘बधाई हो’ या ‘स्त्री’ बन सकती है. उनकी प्रचार रणनीति में फिल्म का स्थानिकीकरण खास महत्व रखता है. उन्होंने ए आर रहमान जैसी प्रतिभ को संगीत के लिए जोड़ा तो हिंदी,तमिल और तेलुगू की डबिंग के लिए स्थानीय प्रतिभाओं का इस्तेमाल किया.भारतीय भाषाओँ में उन्होंने स्क्रिप्ट का पुनर्लेखन किया. स्थानीय चुटकुले,मजाक और सन्दर्भ जोड़े और भारत के भाषायी दर्शकों के करीब ला दिया.
‘अवेंजर्स-द एंडगेम’ की रिलीज से कुछ महीने पहले निर्देशक रूसो बधुओं में से एक भारत आये थे, उन्होंने यहाँ घोषणा की थी कि भारतीय दर्शक और बाज़ार उनके लिए खास महत्व के हैं. उन्होंने भारतीय फिल्मों से सीखा है.परिवार,इमोशन और एक्शन के तालमेल से मनोरंजक फिल्म बनाने की उनकी शैली पर भारतीय प्रभाव है. उन्होंने यहाँ तक कहा कि वे इटली के एक संयुक्त परिवार से हैं. वे ओअरुवर की भावनाओं को समझते हैं. ‘अवेंजर्स-द एंडगेम’ में पारिवारिक रिश्तों के चित्रण के मुलायम क्षण हैं. ‘अवेंजर्स-द एंडगेम’ को देखते हुए दर्शकों की आँखें नम हो रही हैं. अंग्रेजी फिल्मों में इमोशन का ऐसा ज्वार कम होता है.
संक्षेप में भारतीय दर्शक ‘अवेंजर्स-द एंडगेम’ से खुश और आनंदित हैं.

‘अवेंजर्स-द एंडगेम’ के हिंदी संस्करण के लेखक मयूर पूरी से बातचीत ....
-कितने खुश हैं?
0  यह तो चलता रहता है. साल में 2 दिन खुशी के आते हैं, जब फिल्में रिलीज होती है.
- अवेंजर्स- एंडगेम को लेकर इतना उत्साह क्यों है और इसे ऐसी जबरदस्त स्वीकृति क्यों मिली है?
0 इसका प्रचार बहुत ज्यादा था.मार्वेल की फिल्मों के प्रशंसक भारी संख्या में है.ज़िन्दगी के हर क्षेत्र में कुछ ब्रांड ऐसे होते हैं,जिनकी विश्वसनीयता असंदिग्ध होती है.उन पर भरोसा होता है. यकीन रहता है कि उनसे अपेक्षाएं पूरी होगी. मार्वेल के कॉमिक बुक के कैरेक्टर पहले से लोकप्रिय रहे हैं.वे आदर्श अमेरिकी मूल्यों के लिए जूझते हैं. वे एक यूटोपिया रचते हैं, जिसमें न्याय,आजादी और पारिवारिक संबंध रहते हैं. सभी एक-दूसरे से प्यार करते हैं. दुनिया में कोई गड़बड़ी होती है तो उसे ठीक करने को सुपर हीरो आते हैं. इसी कोर इमोशन पर सुपर हीरो की फिल्में चलती है. कहानी कहने का उनका ढंग बहुत मजबूत होता है,  वे किसी और प्रकार की होशियारी नहीं करते.
- फिल्म को हिंदी में करते समय आप किन बातों का अधिक ध्यान रखते हैं. मैंने यह फिल्म हिंदी में देखी और मुझे लगा कि आप शब्द्शः अनुवाद करने के बदले भाव पकड़ते हैं और उसका भारतीयकरण करते हैं.
अवेंजर्स- एंडगेम कलेक्शन में हिंदी का हिस्सा 37 प्रतिशत है. तमिल का प्रतिशत 5 है और तेलुगू का 4. आप गौर करें तो भारतीय भाषाओं का कारोबार अंग्रेजी के बराबर हैं. जबकि 2865 स्क्रीन में से हिंदी को केवल 800 स्क्रीन मिले हैं. हमें एक तिहाई स्क्रीन मिले हैं लेकिन कारोबार आधे का हुआ है. अब मैं आप के सवाल पर आता हूं... मैंने पहली फिल्मजंगल बुककी थी .उसके पहले डबिंग के लिए शब्द्शः अनुवाद होते थे या फिर घटिया किस्म की चालबाजी की जाती थी. डायनासोर को बड़ी छिपकली या  स्पाइडरमैन को मकड़ मानव बोल देते थे.. मैंने काम शुरू करने के पहले उन्हें 8 पेज का ट्रीटमेंट नोट बना कर दिया था, जिसमें मैंने बताया था कि मैं क्या क्या करूंगा? डिज्नी का आग्रह रहता है कि आप आमफहम भाषा में लिखें. क्लिष्ट हिंदी का प्रयोग ना करें. मेरी कोशिश रहती है कि हिंदी की परंपरा और परिवेश के शब्द इस्तेमाल करूं. हिंदी के उपयोग का आखिरी फैसला कौन करता है पहले तो वही लोग करते थे अब वह मेरे ऊपर भरोसा करते हैं क्योंकि मैंने अभी तक 10 दिन में कर ली है और दर्शकों ने उन्हें खूब पसंद किया है अभी मुझे ज्यादा दिक्कत नहीं होती है वह मेरी बात मान लेते हैं
-क्या आपको नहीं लगता कि अवेंजर्स जैसी फिल्मों की कामयाबी हिंदी फिल्मों के लिए खतरा है. विदेशी फिल्में सेंध मारकर भारतीय दर्शकों के बीच पहुंच रही हैं
0 मुझे ऐसा नहीं लगता. हिंदी की अच्छी फिल्में चलती है. दर्शक भी पसंद करते हैं ‘बदला’,’बधाई हो’ और ‘अंधाधुन’ के उदहारण सामने हैं. अब अगर आप ‘कलंक’ बनाओगे तो भी नतीजा सामने है. अभी देखिये कि हिंदी फिल्में चीन में पैसे कमा रही हैं. ‘दबंग’ और ‘बाहुबली’ के बाद अभी ‘अंधाधुन’ वहां पसंद की जा रही है. मुझे लगता है कि धीरे-धीरे बाजार बढ़ेगा. क्यों ना हम ऐसी कोशिश करें कि हमारी फिल्में विदेशी बाजार में देखी जाएं.
-अभी क्या कर रहे हैं>
 अभी ‘लायन किंग’ का अनुवाद कर रहा हूं. इसके अलावा हिंदी में स्क्रिप्ट तैयार कर रहा हूं. बीच में सोचा था कि खुद डायरेक्ट करूंगा. वह नहीं हो पाया. फराह खान के लिए मैंने दो फ़िल्में की हैं. अगर उन्होंने अगली फिल्म शुरू की तो उसके लिए काम करूंगा. मैं स्क्रीन लाइटिंग का वर्कशॉप भी करता हूं. अनुपम खेर के इंस्टीट्यूट से जुड़ा हुआ हूं.








सिनेमालोक : रणवीर सबसे आगे


सिनेमालोक 
रणवीर सबसे आगे 
-अजय ब्रह्मात्मज
रात का समय था.करीब 11 बज चुके होंगे. यशराज स्टूडियो में दिन की चहल-पहल समाप्त हो चुकी थी. वहां मुझे एक इंटरव्यू के लिए बुलाया गया था. एक फ़िल्म के हीरो की व्यस्तता की वजह से इंटरव्यू के लिए मुझे यही समय मिला था. हीरो की फिल्म रिलीज पर थी. शुक्रवार को रिलीज हो रही फिल्म के हीरो का इंटरव्यू रविवार को छप जाए तो पाठक और संपादक दोनों खुश होते हैं. इसी खुशी के लिए दिन भर की थकान के बावजूद उस हीरो के इंटरव्यू के लिए हां कहना ही पड़ा. बातचीत शुरू हुई . और ना जाने कब बेख्याली में मुझ से भूल हुई. इंटरव्यू दे रहे रणवीर सिंह ने मुस्कुराते हुए मुझे टोका,' सर जी,आप मुझे दो बार रणबीर बुला चुके हैं. मैं रणबीर हूं. कहीं आप मुझ से रणबीर के सवाल तो नहीं पूछ रहे हैं.'
झेंपते हुए सॉरी कहने के बाद मैंने इंटरव्यू जारी रखा. मुझे विश्वास नहीं हो रहा था कि ऐसी गलती हो सकती है. सामने बैठे एक्टर को मैं उसके प्रतिद्वंद्वी के नाम से बुला सकता हूँ. घर लौटने के बाद रिकॉर्डिंग सुनते ही एहसास हुआ कि यह तो भारी गलती है. फिर मैंने सोचा कि रणवीर को गुस्सा क्यों नहीं आया? वे चाहते तो बीच में ही इंटरव्यू छोड़ सकते थे. अगर यह इंटरव्यू लाइव होता तो श्रोता/दर्शक क्या कहते? अगली मुलाकात में रणवीर से माफी मांगने लगा. उन्होंने आदतन भींचते हुए कहा,' सर जी मुझे अभी और मेहनत करनी होगी. आप सभी के सवालों में जगह बना चुके रणबीर से कुछ बड़ा और सफल काम करना होगा. बड़ी कामयाबी देनी होगी.'

यह वाकया संजय लीला भंसाली की फिल्म 'गोलियों की रासलीला - रामलीला' के समय हुआ था. तब से रणवीर सिंह ने संजय लीला भंसाली के साथ तीन कामयाब फिल्में कर ली हैं. तीनों में उनकी नायिका दीपिका पादुकोण रहीं, जो अब उनकी जीवनसंगिनी बन चुकी हैं. रणवीर खुद बताते हैं कि 'गोलियों की रासलीला-रामलीला' के सेट पर दीपिका पादुकोण ने भा गई थीं. शूटिंग के दौरान नज़दीकियां बढ़ीं. रणवीर ने धैर्य से काम लिया और फिर दोनों में प्यार हुआ. कुछ सालों के अफेयर के बाद दोनों ने शादी कर ली. शादी के बाद रणवीर सिंह भारतीय रिवाज के मुताबिक दीपिका पादुकोण को अपने घर नहीं लाए,बल्कि उनके साथ रहने चले गए. पुरुष प्रधान समाज और फिल्म इंडस्ट्री में यह छोटी और सामान्य बात नहीं है. शादी के समारोहों में भी वे दीपिका का जिस तरीके से ख्याल रख रहे थे,वह काबिले तारीफ है.
रणवीर सिंह लगातार कामयाबी की सीढ़ियां चढ़ते जा रहे हैं. इस साल रिलीज हुई उनके फिल्म 'गली ब्वॉय' खूब सराही गई और कामयाब रही. इसके पहले पिछले साल की जनवरी और दिसंबर में रिलीज हुई उनकी फिल्मों ने रिकॉर्ड कमाई की. 2018 में उनकी दोनों फिल्मों (पद्मावत और सिमबा) की कुल कमाई 500 करोड़ से अधिक रही. फिल्म इंडस्ट्री में कमाई और कामयाबी ही किसी स्टार अभिनेता के स्टारडम और भाव में इजाफा होता है. इस लिहाज से रणवीर सिंह अभी सबसे आगे हैं. उन्होंने खानत्रयी (आमिर,शाह रुख और सलमान),अक्षय कुमार,वरुण धवन, अजय देवगन और रितिक रोशन सभी को पीछे छोड़ दिया है. वे अभी सबसे आगे हैं. अभी वे '1983  की तैयारियों में जुटे हैं. इसके अलावा करण जौहर की फिल्म 'तख्त' में वे शाहजहां के बेटे दारा शिकोह की भूमिका निभाएंगे.
हर मुलाकात में रणवीर सिंह की आत्मीयता जस की तस बनी रहती है. विक्रमादित्य मोटवानी की फिल्म 'लूटेरा' की रिलीज के बाद हुई अंतरंग बातचीत में रणवीर ने वादा करने के साथ भरोसा दिया था कि मुझ में कोई बदलाव नहीं आएगा. 'सिम्बा' के समय हुई आखिरी मुलाकात में मैंने महसूस किया कि उनकी गर्मजोशी और आत्मीयता में कोई फर्क नहीं आया है. हालांकि इस बीच वे सफलता के शिखर पर पहुंच चुके हैं.