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Tuesday, May 21, 2019

सिनेमालोक : प्रौढ़ नायक का प्रेम


सिनेमालोक
प्रौढ़ नायक का प्रेम
अजय ब्रह्मात्मज
हिंदी फिल्मों में एक्टर की वास्तविक उम्र हमेशा अपने कैरेक्टर से ज्यादा होती हैं. फिल्मों की यह परिपाटी है कि कोई एक्टर नायक की भूमिका में लोकप्रिय और स्वीकृत हो गया तो वह अंत-अंत तक नायक की भूमिका निभाता रहता है...वह भी जवान नायक की भूमिका. दिलीप कुमार, राज कपूर और देवानंद के जमाने से ऐसा चला आ रहा है. इनमें से दिलीप कुमार और राज कपूर तो एक उम्र के बाद ठहर गए,लेकिन देवानंद अंतिम सांस तक हीरो ही बने रहे. उन्होंने स्वीकार ही नहीं किया कि सभी की तरह उनकी उम्र बड़ी है. वह भी उम्रदराज हो गए हैं.
आज के पॉपुलर नायकों में खानत्रयी (आमिर, शाह रुख और सलमान. अभी तक बतौर हीरो ही पर्दे पर नजर आ रहे हैं. उनके ज्यादातर करैक्टर उनकी वास्तविक उम्र से कम होते हैं. आमिर खान ने ‘दंगल’ में खुद से बड़ी उम्र की भूमिका जरूर निभाई, लेकिन विज्ञापन से लेकर फिल्मों तक में भेष और उम्र बदलने का प्रयोग कर वे वास्तविक उम्र को धोखा देते रहते हैं. शाह रुख खान ने ऐसे ही ‘वीर जारा’ में प्रोढ़ छवि पेश की थी. ‘डियर ज़िंदगी’ में वह आलिया भट्ट के साथ अपनी उम्र के किरदार में नजर आए. सलमान खान का शरीर अब इस बात की सहूलियत नहीं देता कि वे 25-30 की उम्र के दिखे. फिर भी वे अपनी उम्र से जवान दिखने का प्रयास करते रहते हैं. ‘भारत’ में वह चार अलग-अलग उम्र की छवियों में दिख रहे हैं. उनके सफ़ेद बालों का ज़िक्र एक संवाद में सुनाई पड़ता है. फिल्म में जवान भारत की भूमिका निभाना उनके लिए मुश्किल चुनौती थी. उन्हें अपनी जवानी की फिल्में अंदाज-ओ-बयां के लिए देखनी पड़ी. उल्लेखनीय है कि तीनों खान 54 साल के हो चुके हैं.
इस पृष्ठभूमि में अजय देवगन और तब्बू की तारीफ करनी होगी. तब्बू तो पहले से उमदराज किरदारों की भूमिकायें पूरी संजीदगी से निभा रही हैं. खुद अजय देवगन ने भी पहले मधुर भंडारकर निर्देशित ‘दिल तो बच्चा है जी’ में अपनी उम्र का किरदार निभाया था. इस बार लव रंजन की अकिव अली निर्देशित ‘दे दे प्यार दे’ में वह 50 वर्ष के आशीष की भूमिका में दिखे. उन्होंने अपनी और किरदार की उम्र की समानता का ख्याल रखते हुए बालों की सफेदी को जाने दिया. अगर उनके बाल और दाढ़ी का रंग खिचड़ी (साल्ट एंड पेपर) होता तो फिल्म और जानदार हो जाती. इस फिल्म में तब्बू की उम्र 47 वर्ष थी. वह अजय देवगन की परित्यक्त पत्नी मंजू की भूमिका में है. लव रंजन और अकिव अली ने अपने  नायक -नायिका को प्रोढ़ रखा. उम्र के लिहाज से उनकी हरकतें होती हैं, लेकिन प्रेम का अधिकार नायक को ही मिलता है, वह खुद से 24 साल छोटी लड़की से प्रेम करने लगता है और उससे शादी भी करना चाहता है. यह स्वाभाविक तो नहीं है, लेकिन अजीब भी नहीं है. हिंदी फिल्मों में ही दिलीप कुमार, राजेश खन्ना, कबीर बेदी, मिलिंद सोमण और सैफ अली खान के उदाहरण हैं.
फिल्मों की बात करें तो 1986 में राजेश खन्ना की फिल्म ‘अनोखा रिश्ता’ में भी बेमेल उम्र के किरदारों का प्रेम था. फिल्म की नायिका सबीहा थीं.अमिताभ बच्चन ने राम गोपाल वर्मा की फिल्म ‘निःशब्द’ में अपनी बेटी की सहेली से प्रेम किया था. जिया खान ने युवा सहेली की भूमिका निभाई थी. अमिताभ बच्चन ‘चीनी कम’ में भी खुद से कम उम्र की तब्बू से प्रेम करते दिखे. 
फिल्मों के अंदरूनी समस्या है कि प्रोढ़ प्रेम की अनुमति सिर्फ नायकों को ही मिलती है. फिल्मों की किसी प्रोढ़ नायिका को किसी युवक से प्रेम करते नहीं दिखाया जाता. ’दिल चाहता है’ और ‘एक छोटी सी लव स्टोरी’ के बेमेल उम्र के प्रेम को पूरा एक्स्प्लोर नहीं किया गया था. हो सकता है कि भारतीय समाज और दर्शक अभी इसके लिए तैयार ना हों, लेकिन इसमें स्त्री-पुरुष संबंधों और रिश्तो के नए आयाम तलाश रहे फिल्मकार जल्दी ही ऐसी कोई फिल्म लेकर आयें तो आश्चर्य नहीं होगा. रियल लाइफ में प्रियंका चोपड़ा और निक जोंस ने प्रेम और शादी में उम्र के फासले को समेट दिया है. समाज में और भी उदाहरण हैं. बस, उन्हें पर्दे पर भी आना चाहिए.


Tuesday, May 14, 2019

सिनेमालोक : कलाकारों की हिंदी दोषपूर्ण

सिनेमालोक
 कलाकारों की हिंदी दोषपूर्ण
-अजय ब्रह्मात्मज
यह समस्या इधर बढ़ी है.हमारे युवा फिल्म कलाकार भाषा खास कर अपनी फिल्मों की भाषा - हिंदी पर ध्यान नहीं दे रहे हैं. लगता है घडी की सुई घूम कर फिर से चौथे दशक में पहुँच गयी है, हिंदी फिल्मों के टाकी होने के साथ फिल्मों में आये कलाकार ढंग से हिंदी नहीं बोल पाते थे.पारसी और कैथोलिक समुदाय से आये इन कलाकारों के परिवेश और परिवार की भाषा पारसी और अंग्रेजी रहती थी,इसलिए उन्हें हिंदी बोलने में दिक्कत होती थी.तब उनके लिए भाषा के शिक्षक रखे जाते थे,उनका उच्चारण ठीक किया जाता था.सेट पर शूटिंग के समय और तैयारी के लिए हिंदी-उर्दू के प्रशिक्षक रखे जाते थे.पूरा ख्याल रखा जाता था.फिर भी चूक हो जाती थी तो फिल्म समीक्षक उनकी हिंदी पर अलग से टिपण्णी करते थे.80 सालों के बाद हम फिर से वैसे ही हालात में पहुंच रहे हैं.
ताज़ा उदहारण है ‘स्टूडेंट ऑफ़ द ईयर 2’. इस फिल्म में टाइगर श्रॉफ मुख्य भूमिका में हैं.उनके साथ तारा सुतारिया और अनन्या पांडे दो नयी हीरोइनें हैं. यह दोनों की लौन्चिंग फिल्म है.इस फिल्म को देखते हुए गहरा एहसास हुआ कि उनकी बोली गयी हिंदी दोषपूर्ण है.उच्चारण और अदायगी में खोट होने की वजह से वे संवादों से भाव नहीं व्यक्त कर पा रहे थे.अब यह सभी जानते हैं कि हिंदी फिल्मों के कलाकारों को रोमन में संवाद दिए जाते हैं.थिएटर से आए एक्टर और अमिताभ बच्चन सरीखे कुछ कलाकारों को छोड़ दें तो सभी को अपने संवाद रोमन में चाहिए होते हैं.
हिंदी लिखना और पढना हमारी हिंदी फिल्मों के कलाकारों को नहीं आता.मैं यहाँ टो-टो कर पढने की क्षमता को महत्व नहीं दे रहा हूँ.तमाम लोकप्रिय कलाकारों की यह दिक्कत है.खास कर 21 वीं सदी के कलाकारों की यह समस्या विकट हो गयी है.वे जिम जाते हैं.शरीर सौष्ठव पर ध्यान देते हैं.किरदार के लिए ज़रूरी बाकी प्रशिक्षण और अभ्यास करते हैं.सिर्फ भाषा सौष्ठव पर उनका ध्यान नहीं होता.हिंदी के मामले में ’हो जायेगा’ एटीट्युड हावी रहता है.कुछ निर्माता और निर्देशक शिक्षक-प्रशिक्षक की व्यवस्था करते हैं तो उनके प्रति कलाकारों का आदर नहीं रहता.वे आवश्यक बोझ की तरह भी भाषा को नहीं लेते.नतीजा यह होता है कि हर तरह से बेहतरीन होने के बावजूद फिल्म में भाषाई खामी रह जाती है.
यह प्रसंग कई बार पढ़ा और सुना गया है कि जब लता मंगेशकर पार्श्व गायन के लिए फिल्मों में संघर्ष कर रही थीं तो उनकी मुलाक़ात दिलीप कुमार से हो गई.दोनों लोकल ट्रेन में सफ़र कर रहे थे.दिलीप कुमार ने उन्हें नेक सलाह दी कि उर्दू का अभ्यास करो और अपना उच्चारण ठीक करो.लता मंगेशकर ने गाँठ बाँध ली.उन्होंने सुर के साथ भाषा की भी साधना की.आज हम उनकी उपलब्धियों पर गर्व करते हैं.आज़ादी के पहले और बाद के दौर में सभी कलाकार भाषा का अभ्यास करते थे.हिंदी फिल्मों में पंजाबी कलाकारों की जबान साफ होती थी. यह भी एक वजह है कि किसी और इलाके से अधिक पंजाब के कलाकार हिंदी फिल्मों में सफल हुए.कभी गौर कीजियेगा कि हिंदी फिल्मों के ज्यादातर हीरो का संबंध पंजाब से क्यों था उर आज भी है?
हिंदी भाषा के प्रति लापरवाही बढती जा रही है.यह एक सामाजिक समस्या है.21 वीं सदी के बच्चों की पढाई-लिखाई इंग्लिश मध्यम में हो रही है.फिल्मों में आ रहे नए स्टार खास कर फिल्म परिवारों से आये स्टारकिड बचपन से फिल्मों में आने तक इंग्लिश में ही जीते हैं.उनकी संपर्क भाषा इंग्लिश रहती है.फिल्मों में आने की तैयारी में हिंदी शिक्षक रखे जाते हैं.वे कुछ महीनों में उन्हें बेसिक हिंदी सिखाते हैं.फिल्म शुरू होने के पहले तक तो अभ्यास होता है.फिल्म शुरू होते ही जिम ज्यादा ज़रूरी रूटीन हो जाता है.जैसे-तैसे संवाद बोले जाते हैं और वैसी ही उनकी डबिंग कर ली जाती है.कायदे से अब उन्हें हिंदी ट्यूटर बहांल करना चाहिए.जो रिहर्सल से लेकर डबिंग तक कलाकारों के साथ रहे.उनके उच्चारण और अदायगी पर ध्यान दे और ज़रूरी सुधार करे.

यह विडम्बना ही है कि हिंदी फिल्मों के कलाकारों को हिंदी बोलना नहीं आता.वे अपने संवाद भी सही लहजे और प्रभाव से नहीं बोल पाते.एक इंटरव्यू में अमिताभ बच्चन ने कहा था कि ‘भाषा से ही भाव आता है’.भाषा नहीं रहेगी तो भाव कहाँ से आएगा?और भाव नहीं होगा तो लाजिमी तौर पर प्रभाव भी नहीं होगा.

Wednesday, May 8, 2019

अवेंजर्स की अद्भुत कामयाबी


अवेंजर्स की अद्भुत कामयाबी
अजय ब्रह्मात्मज
इस समय देश में दो चर्चाएं आम हैं. एक तो हर कोने-नुक्कड़ में चुनाव की चर्चा चल रही है. और दूसरी चर्चा है ‘अवेंजर्स-द एंडगेम’ की. रिलीज के वीकेंड में फिल्प्रेमियों इसे देख लिया है. दर्शकों की रुचि और उत्साह को देखते हुए देश भर के सिनेमाघरों ने इसके अधिकाधिक शो रखे हैं. अहर्निश(दिन-रात) के शो चल रहे हैं. रात के शो भी हाउसफुल हैं. आलसी दर्शकों को टिकट नहीं मिल प् रहे हैं. अगर आप सोच रहे हैं कि शो के टाइम पर आप बॉक्स ऑफिस से टिकट ले लेंगे तो आप को घोर निराशा हो सकती है. रिलीज के पहले एडवांस से ही संकेत मिलने लगे थे कि दर्शकों कि बाढ़ से सिनेमाघर आप्लावित होंगे.यही हुआ भी. पहले ही 10 लाख टिकटों की बिक्री से अनुमान पुख्ता हो गया कि ‘अवेंजर्स-द एंडगेम’ की जबरदस्त ओपनिंग लगेगी. पहले ही दिन इस फिल्म को 53,10 करोड़ का कलेक्शन मिला और दूसरे दिन के 51.40 के कलेक्शन से ‘अवेंजर्स-द एंडगेम’ ने सफलता का जादुई 100 करोड़ का आंकड़ा पार कर लिया. यह एक नया रिकॉर्ड है,जिसे तोड़ पाना किसी भारतीय फिल्म के लिए बड़ी चुनौती होगी.
‘अवेंजर्स-द एंडगेम’ सिर्फ 2865 स्क्रीन में चल रही है. संख्या के हिसाब से देखें तो कई हिंदी फ़िल्में इससे ज्यादा स्क्रीन के साथ रिलीज होती हैं. खानत्रयी(आमिर,शाह रुख और सलमान) की अधिकांश फिल्मे लगभग 4000 स्क्रीन में रिलीज होती रही हैं,फिर भी वे ऐसा कलेक्शन जुटाने में पीछे रह गयी हैं.दर्शकों के उन्माद के साथ इस उल्लेखनीय कलेक्शन कि बड़ी वजह टिकट दर का बढ़ना है. ‘अवेंजर्स-द एंडगेम’ के टिकट दर दोगुने से ज्यादा कर दिए गए हैं.फिर भी भीड़ टूट पड़ी है, उन्हें 155 का टिकट 350 रुपये में खरीदने में दिक्कत नहीं हो रही है. ‘अवेंजर्स-द एंडगेम’ उनके लिए पैसा वसूल फिल्म है. उन्हें तीन घंटों का भरपूर मनोरंजन मिल रहा है. ऊपर से उनके तमाम सुपर हीरो एक साथ एक ही फिल्म में दिख रहे हैं. कल्पना करें कि किसी हिंदी फिल्म में तीनों खां एक साथ आ जाएं तो दर्शकों का उत्साह कितने गुने ज्यादा हो जायेगा. अफ़सोस यह है कि निर्देशकों के हहने पर भी ऐसा नहीं हो प् रहा है. याद होगा कि करण जौहर और रोहित शेट्टी ने ‘राम लखन’ के रीमेक की घोषणा की थी.अनेक कोशिशों और स्टारों के मनुहारों के बावजूद फिल्म फ्लोर पर नहीं जा सकी,क्योंकि हर स्टार को लखन की भूमिका चाहिए थी. हिंदी फिल्मों के स्टार का इगो उनसे आगे चलता है और दूसरों को धकेलता रहता है. ‘अवेंजर्स-द एंडगेम’ में सुपर हीरो और स्टारों की गिनती कर देख लें. सभी के फैन एकत्रित होकर ‘अवेंजर्स-द एंडगेम’ का दर्शक समूह बन गए हैं.
मार्वेल सिनेमेटिक यूनिट(एमसीयू) की 21 फिल्मों के समापन के रूप में आई ‘अवेंजर्स-द एंडगेम’ इस सीरीज के दीवाने दर्शकों के लिए यह फिल्म देखना अनिवार्य हो गया है. उनके लिए यह चाक्षुष उत्कर्ष है. यही कारण है कि दर्शक इसे देखने के लिए उतावले हो रहे हैं. एमसीयू की फिल्मों के प्रति शहरी दर्शकों की दीवानगी बहुत ज्यादा है. हमें गौर करना होगा कि यह फिल्म किस समूह के दर्शकों को भा रही है. 21वीं सदी में थिएटर जाने वाले दर्शकों का प्रोफाइल बदल चूका है. पिछली सदी में आरम्भ हुए उदारीकरण और मल्टीप्लेक्स कल्चर के लोकप्रिय होने के पहले माना जाता था कि निम्न माध्यम वर्ग और मजदूर ही हिंदी फिल्मों के मुख्य दर्शक हैं. सिनेमा के साथ दर्शकों में भी भरी बदलाव आया है.21वीं सदी के दर्शकों का प्रोफाइल अलग है. सिंगल स्क्रीन लगातार बंद हो रहे है. कस्बों और छोटे शहरों के दर्शक सिनेमाघरों से लगातार बहिष्कृत और वंचित हो रहे हैं. उन्होंने अपने मोबाइल फ़ोन को ही सिनेमाघर बना लिया है. और खुलेआम अवैध तरीके से फ़िल्में देख और दिखा रहे हैं. निर्माता,वितरक और एजेंसियों को उनकी परवाह नहीं है. उनका सारा जोर शहरी दर्शकों की रुचि पूरी करने पर रहता है. वे शहरी कमाई से ही संतुष्ट हो जाते हैं. सरकारी उदासीनता,दर्शकों की कृपणता और वैकल्पिक प्लेटफार्म आ जाने से देश में सिनेमाघरों की संख्या में बढ़ोत्तरी नहीं हो रही है. इसके साथ ही इन्टरनेट के प्रसार और सुविधा से शहरी दर्शकों का बड़ा समूह आम हिंदी फिल्मों से विमुख हो रहा है. उसकी जीवन शैली और संपर्क भाषा में अंग्रेजी के प्रचलन से हॉलीवुड की फिल्मों की आमद बढ़ी है. हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओँ में वह केवल इवेंट और कंटेंट की फ़िल्में देख लेता है,लेकिन ‘कलंक’ जैसी फिल्मों से धोखा खाने के बाद उसका भरोसा टूटता है.
संक्राति के इस दौर में ‘अवेंजर्स-द एंडगेम’ जैसी फ़िल्में भारतीय बाज़ार में सेंधमारी करने में सफल हो जाती हैं. उल्लेखनीय है कि संतोषजनक मनोरंजन मिले तो दर्शक पैसे खर्च करने को तैयार है. ऊपर से हॉलीवुड के मार्केटिंग पंडित अपनी फिल्मों की सही पोजिशनिंग के लिए जैम कर खर्च करते हैं. ‘अवेंजर्स-द एंडगेम’ के प्रचार में जितना खर्च भारतीय बाज़ार में हुआ है,उतने में एक ‘बधाई हो’ या ‘स्त्री’ बन सकती है. उनकी प्रचार रणनीति में फिल्म का स्थानिकीकरण खास महत्व रखता है. उन्होंने ए आर रहमान जैसी प्रतिभ को संगीत के लिए जोड़ा तो हिंदी,तमिल और तेलुगू की डबिंग के लिए स्थानीय प्रतिभाओं का इस्तेमाल किया.भारतीय भाषाओँ में उन्होंने स्क्रिप्ट का पुनर्लेखन किया. स्थानीय चुटकुले,मजाक और सन्दर्भ जोड़े और भारत के भाषायी दर्शकों के करीब ला दिया.
‘अवेंजर्स-द एंडगेम’ की रिलीज से कुछ महीने पहले निर्देशक रूसो बधुओं में से एक भारत आये थे, उन्होंने यहाँ घोषणा की थी कि भारतीय दर्शक और बाज़ार उनके लिए खास महत्व के हैं. उन्होंने भारतीय फिल्मों से सीखा है.परिवार,इमोशन और एक्शन के तालमेल से मनोरंजक फिल्म बनाने की उनकी शैली पर भारतीय प्रभाव है. उन्होंने यहाँ तक कहा कि वे इटली के एक संयुक्त परिवार से हैं. वे ओअरुवर की भावनाओं को समझते हैं. ‘अवेंजर्स-द एंडगेम’ में पारिवारिक रिश्तों के चित्रण के मुलायम क्षण हैं. ‘अवेंजर्स-द एंडगेम’ को देखते हुए दर्शकों की आँखें नम हो रही हैं. अंग्रेजी फिल्मों में इमोशन का ऐसा ज्वार कम होता है.
संक्षेप में भारतीय दर्शक ‘अवेंजर्स-द एंडगेम’ से खुश और आनंदित हैं.

‘अवेंजर्स-द एंडगेम’ के हिंदी संस्करण के लेखक मयूर पूरी से बातचीत ....
-कितने खुश हैं?
0  यह तो चलता रहता है. साल में 2 दिन खुशी के आते हैं, जब फिल्में रिलीज होती है.
- अवेंजर्स- एंडगेम को लेकर इतना उत्साह क्यों है और इसे ऐसी जबरदस्त स्वीकृति क्यों मिली है?
0 इसका प्रचार बहुत ज्यादा था.मार्वेल की फिल्मों के प्रशंसक भारी संख्या में है.ज़िन्दगी के हर क्षेत्र में कुछ ब्रांड ऐसे होते हैं,जिनकी विश्वसनीयता असंदिग्ध होती है.उन पर भरोसा होता है. यकीन रहता है कि उनसे अपेक्षाएं पूरी होगी. मार्वेल के कॉमिक बुक के कैरेक्टर पहले से लोकप्रिय रहे हैं.वे आदर्श अमेरिकी मूल्यों के लिए जूझते हैं. वे एक यूटोपिया रचते हैं, जिसमें न्याय,आजादी और पारिवारिक संबंध रहते हैं. सभी एक-दूसरे से प्यार करते हैं. दुनिया में कोई गड़बड़ी होती है तो उसे ठीक करने को सुपर हीरो आते हैं. इसी कोर इमोशन पर सुपर हीरो की फिल्में चलती है. कहानी कहने का उनका ढंग बहुत मजबूत होता है,  वे किसी और प्रकार की होशियारी नहीं करते.
- फिल्म को हिंदी में करते समय आप किन बातों का अधिक ध्यान रखते हैं. मैंने यह फिल्म हिंदी में देखी और मुझे लगा कि आप शब्द्शः अनुवाद करने के बदले भाव पकड़ते हैं और उसका भारतीयकरण करते हैं.
अवेंजर्स- एंडगेम कलेक्शन में हिंदी का हिस्सा 37 प्रतिशत है. तमिल का प्रतिशत 5 है और तेलुगू का 4. आप गौर करें तो भारतीय भाषाओं का कारोबार अंग्रेजी के बराबर हैं. जबकि 2865 स्क्रीन में से हिंदी को केवल 800 स्क्रीन मिले हैं. हमें एक तिहाई स्क्रीन मिले हैं लेकिन कारोबार आधे का हुआ है. अब मैं आप के सवाल पर आता हूं... मैंने पहली फिल्मजंगल बुककी थी .उसके पहले डबिंग के लिए शब्द्शः अनुवाद होते थे या फिर घटिया किस्म की चालबाजी की जाती थी. डायनासोर को बड़ी छिपकली या  स्पाइडरमैन को मकड़ मानव बोल देते थे.. मैंने काम शुरू करने के पहले उन्हें 8 पेज का ट्रीटमेंट नोट बना कर दिया था, जिसमें मैंने बताया था कि मैं क्या क्या करूंगा? डिज्नी का आग्रह रहता है कि आप आमफहम भाषा में लिखें. क्लिष्ट हिंदी का प्रयोग ना करें. मेरी कोशिश रहती है कि हिंदी की परंपरा और परिवेश के शब्द इस्तेमाल करूं. हिंदी के उपयोग का आखिरी फैसला कौन करता है पहले तो वही लोग करते थे अब वह मेरे ऊपर भरोसा करते हैं क्योंकि मैंने अभी तक 10 दिन में कर ली है और दर्शकों ने उन्हें खूब पसंद किया है अभी मुझे ज्यादा दिक्कत नहीं होती है वह मेरी बात मान लेते हैं
-क्या आपको नहीं लगता कि अवेंजर्स जैसी फिल्मों की कामयाबी हिंदी फिल्मों के लिए खतरा है. विदेशी फिल्में सेंध मारकर भारतीय दर्शकों के बीच पहुंच रही हैं
0 मुझे ऐसा नहीं लगता. हिंदी की अच्छी फिल्में चलती है. दर्शक भी पसंद करते हैं ‘बदला’,’बधाई हो’ और ‘अंधाधुन’ के उदहारण सामने हैं. अब अगर आप ‘कलंक’ बनाओगे तो भी नतीजा सामने है. अभी देखिये कि हिंदी फिल्में चीन में पैसे कमा रही हैं. ‘दबंग’ और ‘बाहुबली’ के बाद अभी ‘अंधाधुन’ वहां पसंद की जा रही है. मुझे लगता है कि धीरे-धीरे बाजार बढ़ेगा. क्यों ना हम ऐसी कोशिश करें कि हमारी फिल्में विदेशी बाजार में देखी जाएं.
-अभी क्या कर रहे हैं>
 अभी ‘लायन किंग’ का अनुवाद कर रहा हूं. इसके अलावा हिंदी में स्क्रिप्ट तैयार कर रहा हूं. बीच में सोचा था कि खुद डायरेक्ट करूंगा. वह नहीं हो पाया. फराह खान के लिए मैंने दो फ़िल्में की हैं. अगर उन्होंने अगली फिल्म शुरू की तो उसके लिए काम करूंगा. मैं स्क्रीन लाइटिंग का वर्कशॉप भी करता हूं. अनुपम खेर के इंस्टीट्यूट से जुड़ा हुआ हूं.








सिनेमालोक : रणवीर सबसे आगे


सिनेमालोक 
रणवीर सबसे आगे 
-अजय ब्रह्मात्मज
रात का समय था.करीब 11 बज चुके होंगे. यशराज स्टूडियो में दिन की चहल-पहल समाप्त हो चुकी थी. वहां मुझे एक इंटरव्यू के लिए बुलाया गया था. एक फ़िल्म के हीरो की व्यस्तता की वजह से इंटरव्यू के लिए मुझे यही समय मिला था. हीरो की फिल्म रिलीज पर थी. शुक्रवार को रिलीज हो रही फिल्म के हीरो का इंटरव्यू रविवार को छप जाए तो पाठक और संपादक दोनों खुश होते हैं. इसी खुशी के लिए दिन भर की थकान के बावजूद उस हीरो के इंटरव्यू के लिए हां कहना ही पड़ा. बातचीत शुरू हुई . और ना जाने कब बेख्याली में मुझ से भूल हुई. इंटरव्यू दे रहे रणवीर सिंह ने मुस्कुराते हुए मुझे टोका,' सर जी,आप मुझे दो बार रणबीर बुला चुके हैं. मैं रणबीर हूं. कहीं आप मुझ से रणबीर के सवाल तो नहीं पूछ रहे हैं.'
झेंपते हुए सॉरी कहने के बाद मैंने इंटरव्यू जारी रखा. मुझे विश्वास नहीं हो रहा था कि ऐसी गलती हो सकती है. सामने बैठे एक्टर को मैं उसके प्रतिद्वंद्वी के नाम से बुला सकता हूँ. घर लौटने के बाद रिकॉर्डिंग सुनते ही एहसास हुआ कि यह तो भारी गलती है. फिर मैंने सोचा कि रणवीर को गुस्सा क्यों नहीं आया? वे चाहते तो बीच में ही इंटरव्यू छोड़ सकते थे. अगर यह इंटरव्यू लाइव होता तो श्रोता/दर्शक क्या कहते? अगली मुलाकात में रणवीर से माफी मांगने लगा. उन्होंने आदतन भींचते हुए कहा,' सर जी मुझे अभी और मेहनत करनी होगी. आप सभी के सवालों में जगह बना चुके रणबीर से कुछ बड़ा और सफल काम करना होगा. बड़ी कामयाबी देनी होगी.'

यह वाकया संजय लीला भंसाली की फिल्म 'गोलियों की रासलीला - रामलीला' के समय हुआ था. तब से रणवीर सिंह ने संजय लीला भंसाली के साथ तीन कामयाब फिल्में कर ली हैं. तीनों में उनकी नायिका दीपिका पादुकोण रहीं, जो अब उनकी जीवनसंगिनी बन चुकी हैं. रणवीर खुद बताते हैं कि 'गोलियों की रासलीला-रामलीला' के सेट पर दीपिका पादुकोण ने भा गई थीं. शूटिंग के दौरान नज़दीकियां बढ़ीं. रणवीर ने धैर्य से काम लिया और फिर दोनों में प्यार हुआ. कुछ सालों के अफेयर के बाद दोनों ने शादी कर ली. शादी के बाद रणवीर सिंह भारतीय रिवाज के मुताबिक दीपिका पादुकोण को अपने घर नहीं लाए,बल्कि उनके साथ रहने चले गए. पुरुष प्रधान समाज और फिल्म इंडस्ट्री में यह छोटी और सामान्य बात नहीं है. शादी के समारोहों में भी वे दीपिका का जिस तरीके से ख्याल रख रहे थे,वह काबिले तारीफ है.
रणवीर सिंह लगातार कामयाबी की सीढ़ियां चढ़ते जा रहे हैं. इस साल रिलीज हुई उनके फिल्म 'गली ब्वॉय' खूब सराही गई और कामयाब रही. इसके पहले पिछले साल की जनवरी और दिसंबर में रिलीज हुई उनकी फिल्मों ने रिकॉर्ड कमाई की. 2018 में उनकी दोनों फिल्मों (पद्मावत और सिमबा) की कुल कमाई 500 करोड़ से अधिक रही. फिल्म इंडस्ट्री में कमाई और कामयाबी ही किसी स्टार अभिनेता के स्टारडम और भाव में इजाफा होता है. इस लिहाज से रणवीर सिंह अभी सबसे आगे हैं. उन्होंने खानत्रयी (आमिर,शाह रुख और सलमान),अक्षय कुमार,वरुण धवन, अजय देवगन और रितिक रोशन सभी को पीछे छोड़ दिया है. वे अभी सबसे आगे हैं. अभी वे '1983  की तैयारियों में जुटे हैं. इसके अलावा करण जौहर की फिल्म 'तख्त' में वे शाहजहां के बेटे दारा शिकोह की भूमिका निभाएंगे.
हर मुलाकात में रणवीर सिंह की आत्मीयता जस की तस बनी रहती है. विक्रमादित्य मोटवानी की फिल्म 'लूटेरा' की रिलीज के बाद हुई अंतरंग बातचीत में रणवीर ने वादा करने के साथ भरोसा दिया था कि मुझ में कोई बदलाव नहीं आएगा. 'सिम्बा' के समय हुई आखिरी मुलाकात में मैंने महसूस किया कि उनकी गर्मजोशी और आत्मीयता में कोई फर्क नहीं आया है. हालांकि इस बीच वे सफलता के शिखर पर पहुंच चुके हैं.


Wednesday, May 1, 2019

सिनेमालोक : राजनीति के फ़िल्मी मोहरे


सिनेमालोक
राजनीति के फ़िल्मी मोहरे
-अजय ब्रह्मात्मज
हिंदी सिनेमा और राजनीति का रिश्ता बहुत मीठा और उल्लेखनीय नहीं रहा है.उत्तर भारत की राजनीति में उनका इस्तेमाल ही होता रहा है.वे सजावट और भीड़ जुटाने के काम आते रहे हैं.उत्तर भारत की राजनीति में हिंदी फिल्मों से ही फ़िल्मी हस्तियां आती-जाती रही हैं. पहले केवल राज्य सभा के लिए उन्हें चुन लिया जाता था.वे संसद की शोभा बढ़ाते थे और कभी-कभार फिल्म इंडस्ट्री या किसी सामाजिक मुद्दे पर कुछ सवाल या बहस करते नज़र आ जाते थे. उनका महत्व और प्रतिनिधित्व सांकेतिक ही होता था.
इधर 21वी सदी में अब उनका उपयोग मोहरे की तरह होने लगा है. खास कर इस चुनाव में जिस तरह चुनाव की घोषणा के बाद उन्हें पार्टी में शामिल कर टिकट दिए गए हैं,उससे यही संकेत मिलता है कि किसी राजनीतिक समझदारी से अधिक यह उनकी लोकप्रियता भुनाने का कदम है. अब सनी देओल का ही मामला लें. ठीक है कि स्वयं धर्मेन्द्र(सनी के पिता) ने कभी बीकानेर से सांसद का चुनाव लड़ा था. उनकी सौतेली मां हेमा मालिनी राजनीति में निरंतर सक्रिय हैं.लेकिन सनी या बॉबी देओल ने कभी राजनीतिक झुकाव नहीं दिखाया.
जिस दिन अमित शाह के साथ सनी देओल की तस्वीर मीडिया में आई,उसी दिन जाहिर हो गया था कि कुछ तो पक रहा है.तब कयास लगया जा रहा था कि वे अमृतसर से चुनाव लड़ेंगे.बाद में जानकारी मिली कि उन्हें गुरदासपुर से उमीदवार बनाया गया है.विनोद खन्ना वहां से सांसद रहे थे. उनकी मृत्यु के बाद उनकी पत्नी या बेटे अक्षय खन्ना को उमीदवार बनाने की ख़बर भी आई थी.बहरहाल,सनी देओल ने उम्मीदवार के तौर पर पर्ची भर दी है. खुद नरेन्द्र मोदी ने उनके साथ अपनी तस्वीर ट्विटर पर शेयर की और ‘ग़दर’ का संवाद लिखा... हिंदुस्तान जिंदाबाद था,है और रहेगा. ‘ग़दर’ के सन्दर्भ के साथ याद करें तो इशारा स्पष्ट है.
राजनीति के पत्रकारों के मुताबिक इस बार के चुनाव में भाजपा के लिए एक-एक सीट ज़रूरी है. उन्हें अपनी संख्या बढ़ानी या कम से कम बरक़रार रखनी है. वे नहीं चाहते कि किसी कमज़ोर पेशेवर नेता को सीट देकर वे उसे खोने का जोखिम लें.यही कारण है कि आज़मगढ़ से निरहुआ और गोरखपुर से रवि किशन को टिकट दिए गए हैं. भोजपूरी फिल्मों के ये स्टार इन इलाकों में बेहद लोकप्रिय हैं. उम्मीद तो यही की जा रही है कि मनोज तिवारी की तरह वे भी भाजपा के काम आयेंगे.एक तरह से भोजपुरी के तीनों लोकप्रिय स्टार अब भाजपा के पास हैं. रवि किशन ने पिछले चुनाव में कांग्रेस का साथ दिया था. इस बार वे पाला बदल कर भाजपा के साथ आ गए हैं.
फ़िल्मी मोहरों के इस्तेमाल में कांग्रेस भी पीछे नहीं है.राज बब्बर तो उनके सक्रिय नेता हैं.उत्तर प्रदेश की कमान संभाले हुए हैं. इस बार शत्रुघ्न सिन्हा भी उनके पाले में आ गए हैं. भाजपा के वतमान नेतृत्व ने आडवाणी,जोशी समेत अनेक शीर्ष नेताओं की अवमानना की तो शत्रुघ्न सिन्हा सावधान हो गए. उन्होंने समय रहते ही छलांग लगायी और कांग्रेस में आ गए. चर्चा चल रही थी कि शायद भाजपा उन्हें पटना साहिब से उम्मीदवार न बनाये. कांग्रेस में आने से उन्हें टिकट तो मिल गया.अब यह देखना है कि वे वहां से जीत पाते हैं या नहीं. उधर सपा से जयाप्रदा ने भाजपा में प्रवेश कर पुराने साथियों को तिलमिला दिया है.वे बुदबुदाने लगे हैं.कांग्रेस ने मुंबई में उर्मिला मातोंडकर को टिकट दिया है.वह जी-जान से चुनाव में लगी हैं. माना जा रही कि वह वर्तमान सांसद को कड़ी टक्कर देंगी.अगर अंतिम समय में मतदाताओं ने रुख बदला तो वह जीत भी सकती हैं.
अगर ये फ़िल्मी हस्तियां सांसद चुने जाने के बाद भी सक्रिय रहें और फिल्म इंडस्ट्री और समाज के वास्तविक मुद्दे पर अपनी सहभागिता दिखाएँ तो अच्छी बात होगी. उन्हें शो पीस से आगे बढ कर अपनी महत्ता साबित करनी होगी.  


Tuesday, April 23, 2019

सिनेमालोक : दमकते मनोज बाजपेयी


सिनेमालोक
दमकते मनोज बाजपेयी
-अजय ब्रह्मात्मज
हिंदी फिल्मों में काम करते हुए मनोज बाजपेयी को 25 साल हो गए.इन 25 सालों में मनोज बाजपेयी ने अपनी प्रतिभा और मेहनत से खास मुकाम हासिल किया है. बिहार के बेलवा गाँव से दिल्ली होते हुए मुंबई पहुंचे मनोज बाजपेयी को लम्बे संघर्ष और अपमान से गुजरना पड़ा है. 1994 में उनकी पहली फिल्म ‘बैंडिट क्वीन’ आ गयी थी. इस फिल्म में मान सिंह के किरदार से उन्होंने यह तो जाहिर कर दिया था कि वे रंगमंच की तरह परदे पर भी प्रभावशाली मौजूदगी रखते हैं. नाटक और रंगमंच में सक्रिय अधिकांश अभिनेता की इच्छा बड़े परदे पर आने की रहती है,लेकिन बहुत कम को ही कैमरा,निर्देशक और दर्शक स्वीकार कर पाते हैं. मनोज बाजपेयी को भी वक़्त लगा. ‘बैंडिट क्वीन’ की सराहना और मुंबई के निमंत्रण से उत्साहित होकर वे मुंबई आ गए थे.
मुंबई में एक चर्चित और बड़े निर्देशक ने उन्हें मुंबई में मिलने का न्योता दिया था. स्वाभाविक रूप से मनोज को लगा था कि मुंबई पहुँचते ही फ़िल्में मिलने लगेंगी. कुछ कोशिशों के बाद उक्त निर्देशक से मुलाक़ात हुई तो उन्होंने दुत्कार दिया. उनकी प्रतिक्रिया का भाव था कि मिलने के लिए कहा था. काम यानि कि फिल्म देने की तो बात नहीं हुई थी. आरंभिक कुछ झटकों में से यह पहला झटका था. मनिज चेत गए और उन्होंने फिल्मों में काम पाने की रणनीति बदल दी. उन्होंने धैर्य से काम लिया और सही समय की प्रतीक्षा की. इस दौर में उन्हें महेश भट्ट से ज़रूरी संबल मिला. मनोज ने कभी बताया था कि वे तो बोरिया-बिस्तर समेत कर दिल्ली लौटने को तैयार थे,लेकिन महेश भट्ट ने उन्हें रोका.उन्होंने लगभग भविष्यवाणी सी कर दी कि सालों बाद ऐसा प्रतिभाशाली अभिनेता आया है.
और फिर वक़्त व मौका आया. रामगोपाल वर्मा ने मनोज को देखा तो उन्हें अपनी अगली फिल्म का किरदार मिल गया. शेखर कपूर के प्रशंसक रामगोपाल वर्मा को ‘बैंडिट क्वीन’ में मनोज पसंद आये थे,लेकिन उन्हें खोज पाने का कोई तरीका नहीं था. ‘दौड़’ फिल्म के समय मुलाक़ात हुई तो रामगोपाल वर्मा ने माना भी किया कि इस फिल्म की छोटी भूमिका न करो. वे ‘सत्या’ में भीखू म्हात्रे की भूमिका उन्हें देने का मन बना चुके थे. आश्वासनों से मनोज का मोहभंग हो चूका था. उन्होंने ‘दौड़’ नहीं छोड़ी. रामगोपाल वर्मा ने अपना वडा पूरा किया.’सत्या’ के भीखू म्हात्रे ने सभी को मिहित किया. हिंदी फिल्मों में ऐसे नेगेटिव किरदार बहुत ही कम हैं,जिन्हें दर्शक सिर-माथे पर बिठाते हों. उसके बाद तो फिल्मों कि झड़ी लग गयी. यह वही दौर था जब कामयाबी के असर में उनसे फिल्मों और भूमिकाओं के चुनाव में गलतियाँ भी हुईं.
समय के साथ मनोज बाजपेयी संभले. उन्होंने अपने सामर्थ्य के साथ सम्भावना पर विचार किया. फिल्मों के चुनाव में सजग हुए. नतीजा यह हुआ कि उन्हें दो बार राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गे. और इस साल उन्हें भारत सर्कार ने पद्मश्री से नवाज़ा.गाँव से निकले किसी कलाकार के लिए यह उल्लेखनीय यात्रा है. इस यात्रा के धूप-छाँव ने मनोज को गढ़ा है. वे हिंदी फिल्मों में प्रचलित किसी होड़ में शामिल नहीं हैं. उनकी जुदा राह है. इस राह में अधिक चमक नहीं है,लेकिन सोच की पुख्तगी है. मनोज बाजपेयी बाद की पीढ़ियों के लिए मिशल बन चुके हैं. वे एक साथ प्रायोगिक और मुख्यधारा की फ़िल्में कर रहे हैं. उन्होंने शार्ट फिल्म और वेब सीरीज को भी स्वीकार किया है. एक अन्तराल के बाद वे रंगमंच पर भी आने का मन बना रहे हैं.
25 सालों के इस सफ़र के बाद भी मनोज बाजपेयी के कदम ना तो थके आहें और न रुके हैं. वे आगे बढ रहे हैं. कम लोगों को मालूम है कि नयी प्रतिभाओं को आगे बढ़ाने में वे कभी पीछे नहीं रहते. मुझे याद है कि ‘गैंग्स ऑफ़ वासेपुर’ की शूटिंग से लौटने के बाद उन्होंने नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी के बारे में कहा था कि उसे खूब सराहना मिलेगी. और यही हुआ.
आज मनोज बाजपेयी का जन्मदिन है. जन्मदिन कि बधाई के साथ उनके आगामी करियर के लिए शुभकामनाएं.

Tuesday, April 16, 2019

सिनेमालोक : अब समीक्षकों की संस्था देगी पुरस्कार


सिनेमालोक 
अब समीक्षकोंकी संस्था देगी पुरस्कार 

-अजय ब्रह्मात्मज

देश में अनेक फिल्म पुरस्कार हैं. हर मीडिया हाउस के अपने पुरस्कार हैं.इनके अलावा स्थानीय और राष्ट्रीय स्टार पर कुछ समोह्ह या संगठन भी फिल्म पुरस्कार बाँटते हैं. इनमे सबसे अधिक सम्माननीय भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अधीन दिया जाने वाल राष्ट्रीय पुरस्कार है.यह पुरस्कार देश भर की फ़िल्मी गतिविधियों में से श्रेष्ठ कृति और व्यक्ति को दिया जाता है. कतिपय विवादों के बावजूद इस पुरस्कार की खास प्रतिष्ठा है. मुंबई में मैंने देखा है कि कलाकार और फ़िल्मकार अपने दफ्तर और बैठकी में इसे फ्रेम करवा कर रखते हैं. निश्चित ही यह उनके लिए गर्व और दिखावे की बात होती है.
ज्यादातर फिल्म पुरस्कार टीवी इवेंट बन चुके हैं. इन पुरस्कारों के स्पोंसर और आयोजकों की रुचि श्रेष्ठ काम से अधिक लोकप्रिय नाम में होती है, इसके अलावा फिल्म के कारोबार को भी मद्देनज़र रखा जाता है. नतीजा यह होता है कि श्रेष्ठ काम और नाम पुरस्कृत नहीं हो पाते. इन पुरस्कारों की मर्यादा इतनी गिर चुकी है कि कुछ शीर्षस्थ फ़िल्मकार और कलाकार इसमें भाग ही नहीं लेते. उनके बहिष्कार से ज्यादा फर्क नहीं पड़ता. ये पुरस्कार बदस्तूर चल रहे हैं. कलाकारों और फिल्मकारों को मालोम्म रहता कि उन्हेंक्यों नहीं ' याक्यों' पुरस्कार दिया जा रहा है? फोर भी वे ट्राफी के साथ माकली मुस्कान में नज़र आते हैं. मंच से पुरस्कार मिलने की ख़ुशी जाहिर करते हैं.
इन पुरस्कारों में एक केटेगरी होती हैक्रिटिक' अवार्ड. यह प्रायः उन समर्थ कलाकारों और फिल्मों को दिया जाता है,जिन्हें नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता. ऐसे सराहे गए कलाकारों को छोड़ने पर पुरस्कार कि विश्वसनीयता पूरी तरह से संदिग्ध हो जाती है. फिल्म बिरादरी में इसे सांत्वना पुरस्कार भी माना जाता है. मुख्य केटेगरी से बाहर खड़े कद्दावर सृजनशील नाम और काम को मजबूरन तवज्जो देने की कोशिश साफ़ दिखती है.क्रिटिक' पुरस्कार धीरे-धीरे अपनी महत्ता खो चूका है.
ई साल से एक नया पुरस्कार आरम्भ हो रहा है. इसेक्रिटिक चॉइस फिल्म अवार्ड'(सीसीएफए) नाम दिया गया है. यह देश भर के फिल्म क्रिटिक की नवगठित संस्थाफिल्म क्रिटिक गिल्ड' द्वारा आरम्भ किया गया है. पिछले साल गिल्ड ने शोर्ट फिल्म के पुरस्कारों के बाद फीचर फिल्मों के लिए भी पुरस्कारों कि घोषणा की है. यह पुरस्कार इसी हफ्ते 21 अप्रैल को मुंबई में प्रदान किया जायेगा. आयोजन से पहले ही इसे लेकर उत्सुकता बनी हुई है. इसके नॉमिनेशन कि घोषणा के लिए आई विद्या बालन ने कहा था कि यह देश का विश्वसनीय पुरस्कार होगा. निस्संदेह उनके इस बयां में सच्चाई है. उनके साथ आई जोया अख्तार भी यही मानती हैं.
फ़िलहाल फिल्म क्रिटिक गिल्ड के 34 सदस्य हैं. ये सभी सालों से फिल्म समीक्षा करते आ रहे हैं.पत्र-पत्रिकाओं से आगे बढ कर ऑनलाइन,वेब,ब्लॉग और अन्य प्लेटफार्म के जरिये वे अपनी समीक्षाएं और टिप्पणियां प्रकाशित करते रहे हैं. ये सारे समीक्षक अपने दायरे में लोकप्रिय और प्रशंसित हैं. इनमें से 27 समीक्षक हिंदी फिल्मों की नियमित समीक्षा करते हैं. इरादा है कि इस पुरस्कार का अखिल भारतीय स्वरुप हो. इस साल समय और संसाधनों की कमी से केवल हिंदी में सभी केटेगरी के अवार्ड दिए जायेंगे. बाकि हिंदी के अलावा देश की अन्य सात भाषाओं की सर्वश्रेष्ठ फिल्म को पुरस्कृत किया जायेगा. कोशिश है कि अगले साल से उन भाषाओं में भी सारे पुरस्कार दिए जाएँ.
पुरस्कारों की गिरती गरिमा के बीच देश भर के चुनिन्दा समीक्षकों का यह प्रयास सराहनीय है.


Tuesday, April 9, 2019

सिनेमालोक : हिंदी फिल्मों की पहली तिमाही


सिनेमालोक : हिंदी फिल्मों की पहली तिमाही
-अजय ब्रह्मात्मज
2019 के तीन महीने बीत गए. इन तीन महीनों में 30 से अधिक फ़िल्में रिलीज़ हुई हैं. कामयाबी और कलेक्शन के लिहाज से बात करें तो नतीजे बुरे नहीं दिख रहे हैं. कुछ फिल्मों की कामयाबी और कलेक्शन ने चौंकाया है. जनवरी से मार्च के बीच रिलीज़ फिल्मों में अभी तक किसी फिल्म ने उम्मीदों पर पानी नहीं फेरा है. ऐसी कोई फिल्म आई भी नहीं है,जिसका प्रचार बहुत ज्यादा हो. लोकप्रियता के ऊपरी पायदान पर बैठे सितारों की फ़िल्में नहीं आई हैं,इसलिए कोई ज़ोरदार झटका नहीं लगा है. इस लिहाज से अगली तिमाही में सलमान खान और रितिक रोशन की फ़िल्में आएंगी तो फिर सफलता और निराशा पर नए सिरे से बातें होंगी.
जनवरी के पहले हफ्ते में हिंदी फ़िल्में नहीं रिलीज़ करने का अंधविश्वास चला आ रहा है. माना जाता है कि पहले हफ्ते में रिलीज़ हुई फ़िल्में बिलकुल नहीं चल पातीं. इस साल भी यही हुआ,लेकिन दूसरे हफ्ते में 11 जनवरी को आई ‘उडी : द सर्जिकल स्ट्राइक’ ने तो कामयाबी के नए रिकॉर्ड बना कर विकी कौशल को स्टारडम की अगली कतार में ला दिया. इस फिल्म ने भारत में 244 करोड़ का कारोबार कर लिया है. भारत-पाकिस्तान तनाव और स्ट्राइक के दौर में सेना के जोश और देशभक्ति की भावना से भरपूर फिल्म को दर्शकों ने पसंद किया. ऊपर से प्रधानमंत्री ने फिल्म के संवाद ‘हाउ इज द जोश’ को सार्वजनिक मंचों से दोहरा कर फिल्म को एंडोर्स कर दिया. अक्षय कुमार की ‘केसरी’ के प्रति भी दर्शकों की देशभक्ति का ऐसा ही जोश दिखा,जबकि यह फिल्म इतिहास को एक निरपेक्ष सन्दर्भ देकर पेश करती है. सिखों की बहादुरी का बेबुनियाद ढोल पीटा गया. अब इतिहासकार और टिप्पणीकार सवाल उठा रहे हैं कि उनकी बहादुरी का उद्देश्य क्या था?
बहरहाल,पहली तिमाही में चार फिल्मों ने 100 करोड़ से अधिक का कारोबार किया.. ‘उड़ी : द सर्जिकल स्ट्राइक’ के अलावा ‘टोटल धमाल’(155 करोड़ ), ‘गली बॉय’( 139 करोड़) और ‘केसरी’( 134 करोड़) ने 100 करोड़ से ज्यादा का कारोबार किया. ‘टोटल धमाल’ में 50 और उससे अधिक उम्र के सारे कलाकार और निर्देशक थे. फिल्म की कॉमेडी भी लतीफों पर आधारित पुरानी किस्म की थी,लेकिन दर्शक लहालोट हो रहे थे. फिल्म में द्विअर्थी संवाद नहीं होने की दुहाई दी गयी और फैमिली दर्शकों को लुभाया गया. उनकी रणनीति काम आई.’गली बॉय’ मुंबई शहर की मलिन बस्ती के युवक की महत्वाकांक्षा को जोया अख्तर ने हिप-हॉप संगीत के सहारे पकड़ा और पेश किया. इस फिल्म में रणवीर सिंह और आलिया भट्ट की जोड़ी युवा दर्शकों को पसंद आई.’केसरी’ सिखों के शौर्य और बहादुरी के सहारे सफल रही. चारों 100 करोड़ी फिल्मों के साथ ‘मणिकर्णिका’(94 करोड़),’लुका छुप्पी’(92 करोड़) और ‘बदला’(83 करोड़) भी दर्शकों को पसंद आई हैं. कंगना रनोट,कार्तिक आर्यन,कृति सैनन और तापसी पन्नू के स्टारडम में इजाफा हुआ.
पहली तिमाही में कुछ कंटेंट प्रधान फ़िल्में भी आयीं. हालाँकि ऐसा लग रहा है कि सीमित बजट के स्वतंत्र सिनेमा का दौर समाप्त हो गया है, लेकिन ‘एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा’,’हामिद’,’फोटोग्राफ’.’मर्द को दर्द नहीं होता’ और ‘सोनचिड़िया’ जैसी फिल्मों को मिली सराहना से जाहिर हुआ कि दर्शक प्रयोगात्मक और नए विषयों कि फ़िल्में भी पसंद करने लगे हैं. मल्टीप्लेक्स के दौर में छोटी और सीमित बजट की फिल्मों की यह समस्या गहरी होती जा रही है कि उनके शो कैसे निर्धारित किये जाएँ कि अपेक्षित दर्शक आनंद उठा सकें. इन सभी फिल्मों को मल्टीप्लेक्स में प्राइम शो मिलते तो कमाई का आंकड़ा भी ऊपर जाता.
पहली तिमाही में रिलीज़ हुई 30 से अधिक फिल्मों में से अधिकांश फ़िल्में असफल रहीं और दर्शकों की नज़र में भी नहीं आयीं. गौर करें तो सफल-असफल फिल्मों का अनुपात और प्रतिशत ऐसा ही रहता है. पहली तिमाही में सात फिल्मों को सफल माना जा सकता है. यह अच्छा अनुपात है.

Tuesday, April 2, 2019

सिनेमालोक : 50 के हुए अजय देवगन


सिनेमालोक
50 के हुए अजय देवगन
-अजय ब्रह्मात्मज
वीरू देवगन के बेटे अजय देवगन आज 50 के हो गए.वे काजोल के पति हैं.उनकी पहली फिल्म ‘फूल और कांटे’ है. इसे कुक्कू कोहली ने निर्देशित किया था. इसी साल यश चोप्रा निर्देशित अनिल कपूर और श्रीदेवी की फिल्म ‘लम्हे’ भी रिलीज हुई थी. तब किसी को अनुमान नहीं था कि सामान्य चेहरे के अजय देवगन की फिल्म 1991 की बड़ी हिट साबित होगी. हिंदी सिनेमा का यह वैसा दौर था,जब मेलोड्रामा और गिमिक का खूब सहारा लिया जाता था. एक गिमिक हीरो की एंट्री हुआ करती थी.’फूल और कांटे’ में अजय देवगन दो मोटरसाइकिल पर खड़े होकर आते हैं. इस सीन पर तालियाँ बजी थीं और अजय देवगन एक्शन स्टार मान लिए गए थे. एक्शन डायरेक्टर के बेटे को एक्शन स्टार बताने के साथ हिंदी फिल्म इंडस्ट्री ने अजय देवगन के लिए एक अलग केटेगरी तय कर दी थी.
हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में लॉबी और ग्रुप के समीकरण बनते-बिगड़ते रहते हैं. बहार से देखने पर लग सकता है कि अजय देवगन तो इनसाइडर हैं. उनके पिता स्थापित एक्शन डायरेक्टर रहे हैं तो अजय की लौन्चिंग में कोई दिक्कत नहीं हुई होगी. सच्छायी कुछ और है. इनसाइडर की अपनी व्यवस्था और अनुक्रम है...आप किसी स्टार की संतान हैं,या डिरेक्टर की या किसी तकनीशियन की....परिवार की इस लिगेसी के आधार पर आपका स्थान तय किया जाता है. अजय देवगन एक्शन डायरेक्टर के बेटे थे,इसलिए उन्हें दूसरे स्टारकिड जैसी स्वीकृति नहीं मिली और न ही पहले से कोई हलचल मची. अजय ने अपनी प्रतिभा से लोहा मनवाया और पहली फिल्म से ही स्टार की कतार में खडे हो गए. उन्हें फिल्मफेयर का बेस्ट डेब्यू अवार्ड मिला. बाद में तो उन्हें ‘ज़ख्म’ और ‘द लीजेंड ऑफ़ भगत सिंह’ के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिले.
अजय देवगन अपनी पीढ़ी के लहदा अभिनेता हैं. कहते हैं उनकी आँखें बोलती हैं. निश्चित ही वे अपनी आँखों का सार्थक उपयोग करते हैं. उनकी अदाकारी की खास बात है कि वे समकालीन अभिनेताओं से अलग किसी भी किरदार को अंडरप्ले करते हैं. उनके निर्देशक उनकी चाल का भी इस्तेमाल करते हैं. उनकी ज्यादातर फिल्मों में उन्हें एक खास वाक के साथ कुछ दूरी तय करनी होती है और फिर दृश्य आरम्भ होता है. एक बार मैंने अपने इस निरिक्षण के बारे में उनसे पूछा था तो वे हंस पड़े थे. उन्होंने स्वीकार करते हर जवाब दिया था कि आपने सही गौर किया है. ऐसा लगभग सभी फिल्मों में मेरे साथ होता है. शायद उन्हें सीन ज़माने में इससे मदद मिलती हो. उनकी चाल और आँख के साथ ही दृश्यों और शॉट में उनक किफायती होना निर्देशकों और निर्माता के लिए फायदेमंद होता है.
किफायती अभिनय से तात्पर्य कम से कम रिटेक में अपना शॉट पूरा करना. सीन की ज़रुरत के मुताबिक एक्सप्रेशन रखना. ज्यादा फुटेज नहीं खाना और अपने शॉट में पर्याप्त स्फूर्ति रखना. फिल्म ढीली और कमज़ोर हो तो भी अजय देवगन के शॉट डल नहीं होते. उनकी कोशिश रहती है कि स्क्रिप्ट के अभिप्राय को अच्छी तरह व्यक्त करें, ज्यादातर निर्देशक उन्हें दोहराना पसंद करते हैं. गौर करें तो निर्देशकों ने उनकी अलग-अलग खासियत को पकड़ लिया है और वे उनके उसी आयाम को अपनी फिल्मों में दिखाते हैं. जैसे कि रोहित शेट्टी उनके व्यक्तित्व में मौजूद कॉमिक स्ट्रीक का ‘गोलमाल सीरीज में इस्तेमाल करते हैं तो सिंघम सीरीज में उनका रौद्र रूप दिखाई पड़ता है.
अजय देवगन को लगता नहीं है कि वे किसी विचलन के शिकार हैं या कमर्शियल सिनेमा उनका बेजा इस्तेमाल भी करता है. वे ‘टोटल धमाल’ जैसी फ़िल्में भी उसी संलग्नता से करते दिखाई पड़ते हैं,जबकि लगता है कि उनके जैसा होनहार एक्टर ऊल्जल्लो दृश्यों को कैसे हैंडल करता होगा? कोई कचोट तो उठती होगी? अगर ऐसा नहीं होता तो उन्हें बताना चाहिए कि इसे उन्होंने कैसे साधा है?
उन्हें जन्मदिन की बधाई!


Sunday, March 31, 2019

संडे नवजीवन : मोदी चरित की हड़बड़ी


मोदी चरित की हड़बड़ी
-अजय ब्रह्मात्मज
चुनाव के मौसम में नेताओं के जीवन की झांकियां शब्दों में प्रस्तुत की जाती रही हैं.कोई चालीसा लिखता है तो कोई पुराण...कुछ पॉपुलर फ़िल्मी धुनों पर गीत बनाते हैं.चुनाव के दौरान ऑडियो-वीडियो के जरिये नेताओं और संबंधित पार्टियों के बारे में आक्रामक प्रचार किया जाता है. एक ही कोशिश रहती है कि मतदाताओं को को लुभाया जा सके.पहली बार ऐसा हो रहा है कि सत्ताधारी प्रधानमंत्री के जीवन पर एक फिल्म और एक वेब सीरीज की तैयारी चल रही है.इन्हें भाजपा की तरफ से आधिकारिक तौर पर नहीं बनवाया जा रहा है,लेकिन उक्त पार्टी का मौन व मुग्ध समर्थन है.पूरी कोशिश है कि चुनाव के पहले इन्हें दर्शकों के बीच लाकर उनके मतों को प्रभावित किया जाए. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को बड़े परदे के साथ डिजिटल प्लेटफार्म पर पेश करने की हड़बड़ी स्पष्ट है.
फिल्म ‘पीएम नरेन्द्र मोदी’ और वेब सीरीज ‘मोदी’ का निर्माण चुनाव के मद्देनज़र ही हो रहा है. निर्माता संदीप सिंह,सुरेश ओबेरॉय,आनंद पंडित और आचार्य मनीष ने जनवरी के पहले हफ्ते में ‘पीएम नरेन्द्र मोदी’ का फर्स्ट लुक अनेक राष्ट्रिय भाषाओँ में जरी किया था. थी की तीन महीनों के बाद यह फिल्म 5 अप्रैल को रिलीज होने जा रही है. गौर करें तो फिल्म की रिलीज की पहली घोषणा 12 अप्रैल थी. 11 अप्रैल से आरम्भ हो रहे चुनाव को ध्यान में रखते हुए इसकी तारीख 5 अप्रैल कर दी गयी. निर्माता,निर्देशक और अभिनेता को संभवतः मुगालता है कि वे अपनी फिल्म से दर्शकों को प्रभावित कर सकेंगे. फिल्म का ट्रेलर आ चुका है.ट्रेलर में शामिल मोदी के संवादों को गौर से सुनें तो स्पष्ट हो जायेगा कि निर्देशक ओमंग कुमार का क्या मकसद है. यह ट्रेलर स्वयं मोदी ने भी देखा होगा और मुमकिन है कि उनके करीबी फिल्म भी देख चुके हों. अभी तक कहीं से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है.हां,आम दर्शकों को यह ट्रेलर रत्ती भर भी फिल्म देखने के लिए प्रेरित नहीं कर सका है. खास दर्शकों की बात दीगर है. वे इसे देखेंगे और दिखायेंगे.
‘पीएम’ मोदी पर बनी फिल्म की कहानी अभी नहीं मालूम.ट्रेलर और कास्टिंग से  संकेत मिल रहा है कि इसमें उनकी मां,पत्नी,अमित शाह और रतन टाटा किरदार के तौर पर दिखेंगे. चाय बेचने से शुरु हुई उनकी यात्रा संन्यासी होने की चाहत और फिर देश सेवा के लिए संघ(यानि सेना) में शामिल होने के प्रसंग से गुअजरती हुई आगे बढती है. पूरे देश में तिरंगा फहराने का आह्वान करते हैं.कश्मीर के मसले पर वे उत्तेजित हैं और लाल चौक तिरंगा फहराते हैं. इंदिरा गाँधी के निर्देश पर उन्हें गिरफ्तार किया जाता है. एक दृश्य में वे कहते हैं,हिंदुस्तान आतंक से नहीं,आतंक हिंदुस्तान से डरेगा, वे रतन टाटा को कहते हैं,जो डिसिशन एक मनात में नहीं होता,वह डिसिशन ही नहीं होता. और फिर अंत में कहते हैं,चेतावनी देता हूँ पाकिस्तान को...अगर दोबारा हम पर हाथ उठाया तो हाथ काट दूंगा. तुम ने हमारा बलिदान देखा है. अब बदला भी देखोगे.भारत माता की जय! फिल्म आने पर सभी संवादों,प्रसंगों और दृश्यों का सन्दर्भ समझ में आएगा.फिर भी नरेन्द्र मोदी के सार्वजानिक भाषणों से हम सभी जानते हैं कि वे क्या सोचते और चाहते हैं? उनके व्यक्तित्व और विचारों का फ़िल्मी रूप राष्ट्रवाद के फ़िल्मी डोज के रूप में ‘पीएम नरेन्द्र मोदी’ में दिखेगा.
फिल्म इंडस्ट्री में इन दिनों बायोपिक की लोकप्रिय मांग है.साथ में राष्ट्रवाद का तड़का लगाया जा रहा है.’पीएम नरेन्द्र मोदी’ में लोकप्रिय तत्वों के साथ प्रधानमंत्री को खुश करने की मंशा भी है.आनन्-फानन में बनी इस फिल्म से जुड़े निर्माता,निर्देशक और लीड कलाकार(विवेक ओबेरॉय) के अतीत को देखें तो स्पष्ट हो जाता है कि इस फिल्म का पहला और फौरी उद्देश्य सत्तारूढ़ पार्टी के आकाओं को खुश करना है.वे स्वयं भी सत्तारूढ़ पार्टी की विचारधारा के हिमायती हैं. देखना तो यह होगा कि क्या दर्शक इसे किसी फिल्म की तरह ही लेते हैं या प्रोपगंडा समझ का उदास रवैया अपनाते हैं. भक्त दर्शक इसे देखेंगे...और अगर उन्होंने ही देख लिया तो फिल्म झट से वीकेंड में ही 100 करोड़ी हो जाएगी. फ़िल्मकार और कलाकार ट्रेलर देखने के बाद भी रियेक्ट नहीं कर रहे हैं. एक सिद्ध फ़िल्मकार ने नाम न लिखने की शर्त पर कहा कि फिल्म ‘टैकी’ लग रही है. परफार्मेंस में अपील नहीं है.विवेक ओबेरॉय के मोदी लुक पर अधिक काम नहीं किया गया है.मोदी का करिश्मा विवेक के अभिनय में नदारद है.
याद करें तो पिछले लोकसभा के चुनाव के पहले नरेन्द्र मोदी की जीत की हवा को भांपते हुए एक आप्रवासी भारतीय ने उन पर बायोपिक बनाने की सोची. उन्होंने भाजपा के समर्थक निर्देशकों को संपर्क किया. परेश रावल के नाम की घोषणा भी हो गयी थी कि वे मोदी की भूमिका निभाएंगे. २०१४ के इंटरनेशनल फिल्म समारोह के समय निर्माता मितेश शाह इस फिल्म की घोषणा के लिए आमादा थे,लेकिन उन्हें उपयुक्त कलाकार नहीं मिल पाया. मोदी की फिल्म खटाई में चली गयी. उन पर बन रही वेब सीरीज के लेखक मिहिर भूता भी तब अपनी इसी पटकथा पर फिल्म बनाने की सोच रहे थे. उन्होंने ने भी हाथ-पाँव मारे,लेकिन फिल्म फ्लोर पर नहीं जा सकी. खैर,उन्होंने फिल्म का खयाल छोड़ा और अब वेब सीरीज ‘मोदी’ लेकर आ रहे हैं.
मिहिर भूता गुजरती के लोकप्रिय नाटककार हैं. वे नरेन्द्र मोदी को उनके मुख्या मंत्री काल से जानते हैं. भाजपा के करीबी हैं. उनकी पत्नी माधुरी भूता भाजपा के महिला विंग में ज़िम्मेदार पद पर हैं. स्वयं मिहिर भूता संगठन के कार्य और विचार को लेकर सक्रिय रहे हैं. वे सीबीएफ़सी के भी सदस्य रहे. मिहिर भूता की पहली चाहत तो फिल्म बनाने की ही थी. वे संदीप सिंह और ओमंग कुमार की तरह नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता की बहती गंगा में हाथ धोने नहीं आये हैं. वे भाजपा के लिए समर्पित नाटककार हैं और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी में उनकी अटूट वैचारिक श्रद्धा है. मोदी के प्रधानमंत्री बन्ने के बाद यह श्रद्धा स्वाभाविक रूप से गढ़ी हो गयी है.
वेब सीरीज ‘मोदी’ इरोस नाउ नमक डिजिटल प्लेटफार्म पर आएगा. 10 एपिसोड के इस वेब सीरीज का निर्देशन उमेश शुक्ल कर रहे हैं. याद दिला दें कि उमेश शुक्ल ने ‘ओ माय गॉड’ और ‘102 नोट आउट’ फिल्मों का निर्देशन किया है. वे परेश रावल के प्रिय निर्देशक हैं. वेब सीरीज को मिहिर भूता ने राधिका आनंद के साथ लिखा है. इस सीरीज में 12 साल के नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनाने तक की रोमांचक राजनीतिक यात्रा होगी. उनके विभिन्न उम्र में चरित्र को निभाने के लिए लेखा-निर्देशक की टीम ने फैसल खान,आशीष शर्मा और महेश ठाकुर का चुनाव किया है. इरोस नाउ अपर आने के साथ इसके सारे 10 एपिसोड देखे जा सकते हैं. इरोस नाउ अभी नेटफ्लिक्स या अमेज़न की तरह लोकप्रिय प्लेटफार्म नहीं है. हो सकता है की इस वेब सीरीज की वजह से उसका प्रसार हो.
सवाल यह है कि क्या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर फिल्म स्वयं मोदी और भाजपा की सहमति से बन रही हैं.अगर हां तो इसके पीछे की मंशा और मानसिकता समझी जा सकती है.मतदाताओं/दर्शकों को लुभाने का यह माध्यम कितना कारगर होगा यह तो चुनाव के नतीजों पर इनके प्रभाव के आकलन से पता चलेगा. फिलहाल यही कहा जा सकता है कि नरेन्द्र मोदी और भाजपा फिल्म और वेब सीरीज को लेकर आश्वस्त हैं. और कुछ नहीं तो भोले मतदाताओं के लिए प्रचार सामग्री तो बन ही जायेगा. सोशल मीडिया और मीडिया में छाये मोदी के लिए यह अतिरिक्त प्रयास और प्रभाव होगा.
पुनःश्च : ताज़ा सूचना है कि निर्माता संदीप सिंह ने इस फिल्म के लिए एक रैप गया है,जिसे पैरी जी ने लिखा है और हितेश मोदक ने संगीतबद्ध किया है. बताने की ज़रुरत नहीं कि फिल्म की कहानी भी संदीप सिंह की है.
इस फिल्म का पिछला क्रेडिट पोस्टर आया तो उसमें भाजपा और मोदी के धुर विरोधी जावेद अख्तर का बतौर गीतकार नाम देख कर सभी को हैरानी हुई.उनके साथ समीर का भी नाम था.पहले जावेद अख्तर और फिर समीर ने सोशल मीडिया अपना पक्ष रखा. दोनों ने आश्चर्य व्यक्त करते हुए स्पष्ट किया कि फिल्म से उनका कोई संबंध नहीं है. दरअसल फिल्म में जावेद अख्तर के गीत ‘इश्वर अल्लाह’(1947:अर्थ) और समीर के गीत ‘सुनो गौर से दुनिया वालों’(दस) का उपयोग किया गया है.स्पष्ट नहीं हुआ है कि संगीत कंपनियों ने बगैर गीतकारों की सहमति के अधिकार कैसे दिए? बाद में संदीप सिंह का हिमाकत भरा बयान आया कि दोनों गीतकारों को सोशल मीडिया पर ना जाकर मुझ से बात करनी चाहिए थी.मोदी पर फिल्म बनाने से आया यह दुस्साहस तो देखिये कि बगैर अनुमति लिए ही आप प्रतोश्थित गीतकारों के नाम पोस्टर पर छाप देते हैं.पूछने पर माफ़ी मांगने बजाय गाल बजाने लगते हैं.
दक्षिण भारत के अभिनेता सिद्धार्थ ने ‘पीएम नरेन्द्र मोदी’ का ट्रेलर देखने के बाद कटाक्ष किया है. उन्होंने ट्वीट किया है...ट्रेलर में यह तो बताया ही नहीं गया की पीएम नरेन्द्र मोदी ने कैसे देश को अकेले ही आज़ादी दिलवा दी.फिल्म रिलीज होने पर निश्चित ही मखौल उदय जायेगा और सोशल मीडिया मीम से भर जायेगा.पर यही तो उन्हें चाहिए...आप मजाक करें या भर्त्सना ....सभी के केंद्र में मोदी हों.
यह भी आशंका है कि चुनाव आयोग फिल्म और वेब सीरीज पर आचार संहिता के मद्देनज़र पाबन्दी लगा दे.


Thursday, March 28, 2019

सिनेमालोक : सही फैसला है कंगना का


सिनेमालोक
सही फैसला है कंगना का
-अजय ब्रह्मात्मज
तीन दिनों पहले कंगना रनोट के जन्मदिन पर ‘जया’ फिल्म की घोषणा हुई. इसे तमिल में ‘थालैवी’ और हिंदी में ‘जया’ नाम से बनाया जा रहा है. निर्देशक हैं विजय और इसे लिख रहे हैं केवी विजयेंद्र प्रसाद. ‘बाहुबली’ के विख्यात लेखक ने ही कंगना रनोट की पिछली फिल्म ‘मणिकर्णिका’ लिखी थी. यह फिल्म तमिल फिल्मों की अभिएत्री और तमिलनाडु की भूतपूर्व मुख्यमंत्री जयललिता का बायोपिक है. इस फिल्म की घोषणा के साथ कंगना ने जाहिर किया है कि अब वह अपनी बायोपिक पर काम नहीं करेंगी.’मणिकर्णिका’ की रिलीज के समय कंगना ने बताया था कि वह अपनी आत्मकथा सेल्यूलाइड पर पेश करना चाहती हैं. इसे वह खुद ही लिखना और निर्देशित करना चाहती थीं.हिंदी फिल्मों के इतिहास में अपने ढंग का यह पहला प्रयास होता.
फ़िलहाल कंगना रनोट ने इरादा बदल दिया है. और यह सही किया.कंगना अपने करियर के उठान पर हैं. अभी उन्हें आने ऊंचाइयां और उपलब्धियां हासिल करनी हैं.लम्बे अपमान,तिरस्कार और संघर्ष के बाद वह यहाँ तक पहुंची हैं.आगे का रास्ता फिलहाल आसन नहीं दिख रहा है,क्योंकि फिल्म इंडस्ट्री के कथित ताकतवर बिरादरी और लॉबी खुले दिल से उन्हें स्वीकार नहीं कर रही है.विरोध जारी है,लेकिन कंगना के साथ दर्शकों का एक समूह है.वह कंगना को पसंद करने के साथ उनकी कामयाबी भी चाहता है.कंगना के बडबोलेपन और पंगा लेने की आदत को नज़रअंदाज कर दें तो उनकी प्रतिभा संदेह से परे है. वह कुछ नया और बेहतर करना चाहती हैं.’जया’ फिल्म के सन्दर्भ में उन्होंने कहा कि मैं तो अपनी बायोपिक(आत्मकथा) पर काम कर रही थी.इसी बीच ‘जया’ की कहानी सुनाने पर वह मुझे अपने जीवन सदृश और करीब लगी.हमारी ज़िन्दगी में अनेक समानताएं हैं.हाँ,उनकी उपलब्धिया मुझ से बड़ी हैं.
कंगना को इस फिल्म के लिए 24 करोड़ का पारिश्रमिक मिलेगा. ‘जया’ फिल्म की घोषणा के साथ यह खबर भी आई है.इस खबर की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है और ना ही कंगना की तरफ से कोई खंडन आया है.यकीन किया जा सकता है कि एस ही होगा. ‘मणिकर्णिका’ की कामयाबी क पूरा श्री कंगना को मिलना चाहिए.प्रतिकूल स्थितियों में वह फिल्मों को दर्शकों के बीच ले गयीं. फिल्म के कथ्य और प्रस्तुति से मैं असहमत हूँ,लेकिन कंगना की मेहनत और सफलता कैसे भूली जा सकती है. और फिर समकालीन अभिनेत्रियों के बीच वह अकेली ऐसी अभिनेत्री के तौर पर उभरी हैं जो किसी पॉपुलर स्टार का टेक लिए बगैर छलांग लगा रही है. यह दुर्लभ है.
अभी तक मन जा रहा था कि दीपिका पादुकोण सर्वाधिक पारिश्रमिक पाने वाली अभिनेत्री हैं. उन्हें ‘पद्मावत’ के लिए रणवीर सिंह और शहीद कपूर से अधिक राशी बतौर पारिश्रमिक मिली थी...13 करोड़. करीना कपूर खान को ‘वीरे दी वेडिंग’ के लिए 10 करोड़ दिए गए थे.पारिश्रमिक के लिहाज से भी कंगना ने अपने समकालीनों को बहुत पीछे छोड़ दिया है. अब यह देखना होगा कि दूसरी अभिनेतरियां कितनी तेज़ी से कंगना के करीब पहुँचती हैं.दीपिका अपनी अगली फिल्म ‘छपाक’ में निर्माता बन गयी हैं.वह अभिनेताओं की तरह प्रॉफिट शेयरिंग के समीकरण में चली गयी हैं. इससे फिल्म चलेगी और कमाएगी तो उन्हें भारी लाभ होगा.
बस,कंगना रनोट का विचलन कई बार चिंतित करता है.वह आवेश में अनावश्यक बयानबाज़ी कर जाती हैं.उन्हें थोडा सचेत रहना चाहिए.अपने राजनीतिक विचारों का भी मंथन करना चाहिए.भावावेश में कुछ भी बोलना गलत सन्देश देता है.हालांकि समाज और देश की उनकी समझ बढ़ी है,लेकिन राजनीतिक स्पष्टता आणि बाकि है.ऐसा लगता है कि वह किसी खास दिशा में झुक रही हैं और वह उनके व्यक्तित्व की तरह प्रगतिशील नहीं है. 

Tuesday, March 5, 2019

सिनेमालोक : खुश्बू हैं निदा फाजली

सिनेमालोक
खुश्बू हैं निदा फाजली
-अजय ब्रह्मात्मज
अपनी फिल्म पत्रकारिता में कुछ अफ़सोस रह ही जायेंगे.उनका निदान या समाधान नहीं हो सकता.उसे सुधारा ही नहीं जा सकता. एक समय था कि लगभग हर हफ्ते निदा साहब से मुलाक़ात होती थी.मुंबई के खार डांडा की अम्रर बिल्डिंग के पहले माले के उनके फ्लैट का दरवाज़ा सभी पत्रकारों और साहित्यकारों के लिए खुला रहता था. मुझे अफ़सोस है कि उनके जीते जी मैंने कभी उनसे उनके फ़िल्मी करियर के बारे में विस्तृत बातचीत क्यों नहीं की? या कभी उन पर लिखने का ख्याल क्यों नहीं आया? शायद करीबी और पहुँच में रहने वली हतियों के प्रति यह नाइंसाफी इस सनक में हो जाती है कि उनसे तो कभी भी बात कर लेंगे. फ्रीलांसिंग के दिनों में किसी संपादक या प्रभारी ने उन पर कुछ लिखने के लिए भी नहीं कहा.
बहरहाल,पिछले दिनों उनकी पत्नी मालती जोशी और मित्र हरीश पाठक के निमंत्रण पर निदा फाजली पर कुछ पढने और बोलने का मौका मिला.मुझे केवल उनके फ़िल्मी पक्ष पर बोलना था...बतौर गीतकार.पता चला कि उन्होंने फिल्मों के लिए 348 गीत लिखे. निदा साहब ग्वालियर के मोल निवासी थे,जहाँ उनका परिवार कश्मीर से आकर बसा था. कह्श्मिर के अपने गाँव फाज़िला से उन्होंने अपना सरनेम फाजली चुना था.उनका असली नाम मुक्तदा हसन थे.बचपन से उन्हें साहित्य का शौक़ रहा.कहते हैं कि सातवें दशक में जब उनका परिवार पाकिस्तान शिफ्ट कर रहा था तो उन्होंने भारत में ही रहने का फैसला किया. वे अपनी जड़ों से नहीं कटना चाहते थे. भारतीय संस्कृति और गंगा जमुनी तहजीब में उनका अटूट भरोस था. वे उससे कभी नहीं डिगे. हिंदू धर्म,दर्शन और मिथकों से वे खूब परिचित थे.अपनी शायरी और लेखन में उन्होंने इनका इस्तेमाल भी किया.कठमुल्ला मौलवियों और इस्लामिक कट्टरता से उन्हें नफरत थी. उन्होंने बेहिचक चोट की और फतवे भी बर्दाश्त किये.
फिल्मों की तरफ उनका रुझान था,लेकिन मुंबई आने के बाद पत्र-पत्रिकाओं के आरंभिक लेखन और मुशायरों के दिनों में उन्होंने साहिर लुधियानवी.कैफ़ी आज़मी और सरदार जाफरी को बेबाक टिप्पणियों से नाराज़ कर दिया था.जवान और आक्रामक निदा को लगता था कि क्रातिकारी शायरों की शायरी और ज़िन्दगी में फर्क और ढोंग है. वे बातें तो गरीबों की करते हैं,लेकिन खुद सुविधा संपन्न इमारतों और अपार्टमेंट में रहते हैं. साहिर साहेब को निदा इतने खटके कि उन्होंने उन मुशायरों में जाने से मन कर दिया,जहाँ निदा को भी बुलाया जाता था.मजबूरन निदा का बहिष्कार हुआ. इस हालत में उनके एक ही हमदर्द थे जां निसार अख्तर...उनसे ग्वालियर का परिचय था. फिर ऐसा संयोग भी बना कि कमल अम्तोही की फिल्म ‘रज़िया सुल्तान’ में वे उनके उत्तराधिकारी बने.फिल्म के निर्माण के दौरान उनकी मौत हुई. दो गीत लिखे जाने बाकी थे. कमल अमरोही चाहते थे कि कोई ‘मुक़म्मल’ शायर ही गीत लिखे. निदा को मौका मिला और उन्होंने लिखा ‘तेरा हिज्र मेरा नसीब है’.फिल्म रिलीज होने के पहले ही निदा को फ़िल्में मिलने लगीं. जिनको कमल अमरोही ने चुना हो.उनमें खास बात तो होगी.
निदा फाजली 1964-65 में मुंबई आ गए थे. फिल्मों में पहला मौका १९७९ में मिला.शायद पहले उनका इरादा न रहा हो कि फिल्मों के लिए गीत लिखे जायें.निदा हिंदी फिल्मों के ऐसे आखिरी गीतकार हैं,जो उर्दू अदब में भी बड़ा मुकाम रखते हैं.उनके बाद कोई ऐसा गीतकार नहीं दीखता,जो मकबूल शायर भी हो.तो 1979 में प्रख्यात स्तंभकार जयप्रकाश चोव्क्से ने ‘शायद’ की कहानी लिखी. मदन बावरिया निर्देशित इस फिल्म के तीनों गीतकार मध्यप्रदेश के थे.विट्ठल भाई पटेल.दुष्यंत कुमत त्यागी और निदा फाजली. इस फिल्के लिए निदा फाजली ने दो गीत लिखे...’खुश्बू हूँ मैं फूल नहीं हू जो मुरझाऊंगा’ और ‘दिन भर धुप का पर्वत कटा,शाम को पीने निकले हम,जिन गलियों में मौत बिछी थी,उनमें पीने निकले हम’... दूसरा गीत फिल्म की थीम को धयन में रख कर लिखा गया था. उन्होंने आरके की फिल्म ‘बीवी ऑ बीवी’ के गीत लिखे थे. राज कपूर से उनकी मुलाक़ात का किस्सा फिर कभी. अभि तो इतना ही कि निदा साहेब के गीत सुनिए और पढ़िए.उनकी खुश्बू से सुंगधित होइए,


Tuesday, February 26, 2019

सिनेमालोक : अपनी कथाभूमि से बेदखल होते फिल्मकार

सिनेमालोक 
अपनी कथाभूमि से बेदखल होते फिल्मकार 
- अजय ब्रह्मात्मज
पिछले हफ्ते एक युवा फिल्मकार का फ़ोन आया. उनकी आवाज़ में बदहवासी थी.थोड़े घबर्सये हुए लग रहे थे. फोन पर उनकी तेज़ चलती सांस की सायं-सायं भी सुनाई पड़ रही थी.मैंने पूछा,जी बताएं, क्या हाल हैं? मन ही मन मना रहा  था कि कोई बुरी खबर न सुनाएं. उन्होंने जो बताया,वह बुरी खबर तो नहीं थी,लेकिन एक बड़ी चिंता ज़रूर थी.यह पहले भी होता रहा है.हर पीढ़ी में सामने चुनौती आती ही. उन्हें अभी एहसास हुआ. उनके जैसे और भी फिल्मकार होंगे,जो खुद को विवश और असहाय महसूस कर रहे होंगे. उन्होंने बताया कि सुविधा सम्पन्न फिल्मकार उनकी कहानियों और किरदारों को हथिया रहे हैं. उन पर काबिज हो रहे हैं. युवा फिल्मकार 'गली बॉय' देख कर लौटे थे. उनकी प्रतिक्रिया और चिंता थी कि सफल और सम्पन्न फिल्मकार उनका हक छीन रहे हैं. उन्हें उनकी ज़मीन से बेदखल कर रहे हैं.

हिंदी फिल्मों में यह सिलसिला सालों से चला आ रहा है. युवा और प्रयोगशील फिल्मकार कंटेंट और क्राफ्ट में नए-नए प्रयोग करते रहते हैं. उनकी सफलता-असफलता चलती रहती है. दशकों से हम यह देखते आ रहे हैं कि प्रयोगशील फिल्मकारों के प्रयोग और खोज को व्यवसायिक फिल्मों के फिल्मकार देर-सवेर अपना लेते हैं. पैरेलल सिनेमा के दौर में यह खूब देखने को मिला। उन दिनों ऐसे फिल्मकारों को आर्ट सिनेमा के फिल्मकार के तौर पर अलग कोष्ठक में रखा गया। मेनस्ट्रीम पॉपुलर मीडिया ने उन्हें खास बता कर हाशिए पर डाल दिया. ताया गया कि आर्ट सिनेमा आम दर्शकों के लिए नहीं होता है. आर्ट सिनेमा में दृश्य धीमी गति से आगे बढ़ते हैं, क्लोज अप देर तक टिका रहता है और संवाद कानाफूसी के अंदाज में बोले जाते हैं. उसकी खूबियों को कमियों के तौर पर प्रचारित किया गया. दरअसल, कथित आर्ट सिनेमा में दृश्यबंध की अलग प्रविधि अपनाई जाती हैं. वहां मनोरंजन के नाम पर दर्शकों को खुश करने की हड़बड़ी नहीं रहती. 

वास्तव में मनोरंजन और कमाई के दबाव ने हिंदी सिनेमा का बेड़ा गर्क किया है. अभी तो यह हालत हो गई है कि मनोरंजन के नाम पर हंसी का कूड़ा फैलाया जा रहा है. व्हाट्सएप लतीफों के इस हास्यास्पद दौर में तनावग्रस्त दर्शक इस कूड़े की बदबू नहीं महसूस कर पा रहे हैं. उन्हें पता भी नहीं चल रहा है कि मनोरंजन के नाम पर वे किस संक्रामक रोग के शिकार हो रहे हैं? फिल्मों का प्रचार तंत्र स्तरहीन मनोरंजन को श्रेष्ठ बता कर परोहैस रहा है. अफसोस की बात है कि इस कुचक्र में हिंदी फिल्मों की अनुभवी प्रतिभाएं संलग्न हैं.उन्हें मनोरंजन का काठ मार गया है.उम्र बढ़ने की साथ उनकी समझ और संवेदना कुंद हो गई है. हाल की एक सफल लेकिन फ़ूहड़ फिल्म के निर्देशक और कलाकार ५० की उम्र पार कर चुके हैं और उनकी सामूहिक कोशिश देख लें.

इस वास्तविकता से अलग भी एक स्थिति है. इसी स्थिति से चिंतित हैं हमारे युवा फिल्मकार. ऐसे फिल्मकार जिन्होंने हिंदी फिल्मों में नई भावभूमि और कथाभूमि प्रस्तुत की. नए किरदार लेकर लाए. सीमित बजट में उन्होंने रियलिस्टिक फिल्म बनाने की कोशिश की. इनमें से कुछ सफल रहे. उनकी फिल्मों की सफलता ने मेनस्ट्रीम फिल्मों के निर्देशकों को चौंकाया. मेनस्ट्रीम के फिल्मकारों ने ऐसे प्रतिरोधी युवा फिल्मकारों को अपनी पंगत में बिठाया. उनसे नए किरदारों और और कहानियों की बारीकियां सीखीं. कई बार देखने और समझने का नजरिया भी सीखा. और फिर धीरे से उन किरदारों और कहानियों को अपनी फिल्मों में ले आए. प्रेरणा कहीं से भी नहीं जा सकती है और प्रभाव भी ग्रहण किया जा सकता है. समस्या तब होती है, जब मेनस्ट्रीम के संपन्न फिल्मकार असीमित बजट में लोकप्रिय कलाकारों के साथ प्रयोगशील फिल्मकारों की कथा भूमि पर खेलने लगते हैं. इस खेल का व्यापक प्रचार और प्रसार होता है. कहा जाता है कि मेनस्ट्रीम के फिल्मकार ने निम्न तबके के किरदारों को समझा और पेश किया है. सच्चाई यह होती है कि यह उनके लिए एक मुनाफे का प्रयोग होता है. इसमें उन्हें नाम और दाम दोनों मिल जाता है.दूसरी तरफ प्रयोगशील फिल्मकार अपनी ही जमीन से बेदखल हो कर नई जमीन की तलाश में फिर से संघर्ष करता है.
इस व्यावसायिक और उपभोक्तावादी दौर में युवा फिल्मकार की चिंता बेवजह की शिकायत लग सकती है. कुछ लोग यह भी कह सकते हैं कि ऐसी रुदाली से कोई फर्क नहीं पड़ता. दर्शक तो सिनेमा देखना चाहता है और अगर उसे चमकदार आवरण में मनोरंजन मिल रहा है तो वह क्यों अनगढ़ और सस्ती फिल्मों की तरफ नजर करे. हिंदी फिल्मों में आ रहे युवा फिल्मकारों की नई पीढ़ियां फिर से खुद के लिए कहानी किरदार और कथाभूमि खोजती हैं. और फिर से स्थापित फिल्मकार उस कथाभूमि को हथिया लेते हैं. कथाबीज में ही फेरबदल कर वे अपनी फिल्म रोपते हैं और कामयाबी की फसल उगाते हैं। नाम और पुरस्कार बटोर लेते हैं. प्रयोगशील फिल्मकार उन्हें गुस्से में निहारते और कूढ़ते रहते हैं. चिंतित भटकते फिरते हैं।