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Tuesday, January 15, 2019

सिनेमालोक : मृणाल सेन की ‘नील आकाशेर नीचे’


सिनेमालोक
मृणाल सेन की ‘नील आकाशेर नीचे’
-अजय ब्रह्मात्मज
हाल ही में मृणाल सेन का निधन हुआ है.पत्र-पत्रिकाओं में उन्हें याद करते हुए उनकी ‘भुवन शोम’ को बार-बार याद किया गया.इसी फिल्म से भारत में पैरेलल सिनेमा की शुरुआत मानी जाती है.हिंदी अख़बारों में इसकी अधिक चर्चा इसलिए भी होती है कि इसका वायसओवर अमिताभ बच्चन ने किया था.मृणाल सेन की ‘नील आकाशेर नीचे’ फिल्म को याद करते हुए तृषा गुप्ता ने प्यारा सा लेख लिखा है. उन्होंने उल्लेख किया था कि यह फिल्म महादेवी वर्मा के रेखाचित्र पर आधारित था.मेरी जिज्ञासा बढ़ी.मैंने पहले फिल्म देखी और फिर खोज कर मूल रचना पढ़ी.महादेवी वर्मा के संस्मरण का शीर्षक है ‘वह चीनी भाई’.
सिनेमा और साहित्य के संबंधों पर संगोष्ठियाँ होती रहती हैं.पर्चे लिखे जाते हैं.मैंने खुद कई बार ऐसी संगोष्ठियों को संबोधित किया है.मैं इस कहानी और इस पर बनी फिल्म से परिचित नहीं था.धन्यवाद् तृषा गुप्ता कि एक सुंदर और ज़रूरी फिल्म से परिचय हो गया.1959 में बनी इस फिल्म में एक चीनी और एक भारतीय के समबन्ध को मानवीय स्टार पर चित्रित किया गया है.महादेवी वर्मा के संस्मरण में वह खुद भी हैं.उन्होंने इलाहाबद में मिले चीनी के बारे में लिखा है.फिल्म में कथा का विस्तार किया गया है.संस्मरण की बेक स्टोरी में बर्मा है,लेकिन मृणाल सेन ने फिल्म बनाते समय इसमें चीन का उल्लेख किया है.फिल्म दो-तीन फ्लैशबैक में चीन की कहानी चलती है.फिल्म का नायक चीन के शानतुंग प्रान्त का वांग लू है.
मृणाल सेन ने ‘नील आकाशेर नीचे’ में महादेवी वर्मा के रेखाचित्र ‘वह चीनी भाई’ को चलचित्र में बदलते समय अनेक परिवर्तन किये हैं.इलाहबाद की कहानी कोलकाता चली जाती है.चीनी भाई का नामकरण वांग लू हो जाता है.महादेवी वर्मा कांग्रेसी कार्यकर्ता में बदल जाती हैं.उनके पति,सास और नौकर भी किरदार के तौर पर जुड़ जाते हैं.फिल्म की कहानी चीन के शानतुंग भी जाती है.वहां के जमींदार और बहन के जरिये हम वांग लू की पीड़ा से परिचित होते हैं.फिल्म में खूबसूरती के साथ चीन के तत्कालीन हालत को पिरोया गया है.तब जापान ने चीन के नानचिंग शहर पर भयानक हमला किया था.इस हमले का रविंद्रनाथ टैगोर ने विरोध किया था.उन्होंने जापान के नागुची को पत्र लिखा था.मृणाल सेन ने चीन के संघर्ष और भारत की आज़ादी के संघर्ष को वांग लू और बसंती के साथ जोड़ा एक ज़मीं पर लाकर जोड़ा है.
रेखाचित्र के अनुसार फिल्म में भी चीनी भाई बताता है कि वह फारेनर नहीं है,वह तो चीनी है.उसकी चमड़ी गोरी नहीं है.उसकी आँखें नीली नहीं हैं.पिछली सदी के चौथे दशक में भारत और चीन लगभग एक जैसी स्थिति में थे और अपनी आज़ादी के सपने बन रहे थे.’नील आकाशेर नीचे’ में बगैर किसी भाईचारे के नारे के ही एक रिश्ता बनता दिखाई देता है.यह फिल्म देखि जनि चाहिए.खासकर सिनेमा और साहित्य तथा भारतीय फिल्मों में चीनी किरदारों के चित्रण के सन्दर्भ में यह ज़रूरी फिल्म है.कुछ सालों पहले होंकोंग से एक पत्रकार भारत आये थे.वे भारतीय फिल्मों में चीनी किरदारों की नेगेटिव छवि की वजह जानना चाहते थे.तब इस फिल्म की जानकारी रहती तो मैंने ख़ुशी और गर्व से उन्हें बताया होता.1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद दोनों देशों के बीच आई खटास ने सदियों के सांस्कृतिक संबंध को खट्टा कर दिया.’नील आकाशेर नीचे’ पर भी प्रतिबन्ध लगा दिया गया था.इधर चीन भारतीय फिल्मों के बाज़ार के तौर पर उभरा है.फ़िल्मकार ध्यान दें तो चीन हिंदी और अन्य भाषाई फिल्मों के लिए उर्वर कथाभूमि हो सकती है.वहां अनेक कहानिया बिखरी पड़ी हैं,जिनके सिरे भारत से जुड़े हैं.
इस फिल्म की रिलीज के बाद निर्माता हेमेंद्र मुखर्जी(गायक हेमंत कुमार) ने प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरु और राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद को यह फिल्म दिल्ली में दिखाई थी.मृणाल सेन की यह दूसरी फिल्म थी.

Sunday, January 13, 2019

संडे नवजीवन : इस साल थोडा ही बदलेगा रुपहले परदे का परिदृश्य


इस साल थोडा ही बदलेगा रुपहले परदे का परिदृश्य 
-अजय ब्रह्मात्मज
 हिंदी फिल्म इंडस्ट्री का पुराना टोटका है. जनवरी के पहले हफ्ते में फिल्में रिलीज नहीं होतीँ. माना जाता है कि पहले हफ्ते में रिलीज हुई फिल्में ज्यादातर फ्लॉप होती हैं. हालाँकि बाद के हफ्तों में भी फिल्म के हिट होने की कोई गारंटी नहीं रहती, फिर भी टोटका टोटका होता है. 2019 में जनवरी के दूसरे हफ्ते मेंउरी : द सर्जिकल स्ट्राइकऔरद एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टरजैसी फिल्मों की रिलीज से शुरुआत हो रही है. 2019 के दिसंबर तक के शुक्रवार को रिलीज हो रही फिल्मों की तारीखें आ चुकी हैं. सारे त्यौहार और राष्ट्रीय पर्व के हफ्ते रिजर्व हो गए हैं. हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में फिल्मों की घोषणा के साथ उसके रिलीज की तारीख तय कर देने के सिस्टम कोरिवर्स प्लानिंगका नाम दिया जाता है. इसकी सफल शुरुआत रोहित शेट्टी ने की थी.

उरी : द सर्जिकल स्ट्राइक एक हद तक पॉलीटिकल फिल्म है. पहली 2016 में भारतीय सेना के सर्जिकल स्ट्राइक की घटना पर आधारित है, जिसमें एक सैन्य अधिकारी स्पष्ट शब्दों में कहता है, ‘हिंदुस्तान अब चुप नहीं बैठेगा. यह नया हिंदुस्तान है. यह घर में घुसेगा भी और मारेगा भी.गौर करें तो यह वर्तमान केंद्र सरकार के राष्ट्रवाद की चासनी में लिपटा संवाद है, जिसमें न्यू इंडिया की आक्रामक भाषा है, इस संवाद पर सिनेमाघरों में तालियां जरूर बजेगी, जनवरी में ही कंगना रनोट कीमणिकर्णिका  द क्वीन आफ झांसीरिलीज होगी. महारानी लक्ष्मी बाई के शौर्य पर आधारित इस फिल्म का लेखन ‘बाहुबली’ के लेखक विजयेन्द्र प्रसाद ने किया है.मूल निर्देशक कृष के छोड़ने के बाद कंगना रनोट ने निर्देशन की कमान संभाली तो सोनू सूद ने फिल्म छो दी.कुछ और भी तब्दीलियाँ हुईं.

2019 में रिलीज हो रही फिल्मों में खानत्रयी (आमिर, शाह रुख और सलमान) में से केवल सलमान खान की फिल्मभारत’ 5 जून को रिलीज होगी. बाकी दोनों खान आमिर और शाह रुख की कोई फिल्म 2019 में नहीं आएगी. आमिर ने फिल्मों से अस्थाई सन्यास लिया है और शाह रुख अभी राकेश शर्मा के जीवन पर आधारित फिल्म की शूटिंग शुरू करेंगे. पिछले साल सलमान खान कीरेस 3’ आमिर खान कीठग्स ऑफ हिंदोस्तानऔर शाह रुख खान कीजीरोअपेक्षा के मुताबिक कारोबार नहीं कर सकी. तीनों फिल्मों के साधारण कारोबार ने कुछ फिल्मी पंडितों को खान की श्रद्धांजलि लिखने का मौका दे दिया. हड़बड़ी में भविष्यवाणियां कर दी गईं कि खान का दौर खत्म हुआ. हिंदी फिल्मों में स्टारडम के प्रभाव और फिल्मों के कारोबार के जानकार ताकीद कर सकते हैं कि इन निष्कर्षों में कितनी सच्चाई है? जिन उदीयमान सितारों पर भरोसा जताया जा रहा है, उन्हें अपनी आगामी फिल्मों से साबित करना है. ऐसा नहीं कहा जा सकता कि उन पर बॉक्स ऑफिस और दर्शकों का अभी से भरोसा हो गया है. हिंदी फिल्म स्टार प्रेरित और प्रभावित होती है. किसी भी एक्टर के स्टारडम से फिल्मों की ओपनिंग निश्चित होती है. तात्पर्य कि रिलीज के पहले से दर्शकों की जिज्ञासा बनी रहती है. फिल्मों के एडवांस बुकिंग होती है.  फिल्म पहले दिन अच्छा प्रदर्शन करति है.दूसरे दिन से फिल्म का कारोबार क्वालिटी और दर्शकों की स्वीकृति से तय होता है. उदाहरण के लिएठग्स ऑफ हिंदोस्तानकी ओपनिंग इसी स्टारडम के दम पर 50 करोड़ से अधिक की थी, लेकिन फिल्म अच्छी नहीं होने की वजह से अगले ही दिन यह कलेक्शन आधा हो गया था.

2018 में आयुष्मान खुराना, विकी कौशल और राजकुमार राव की फिल्मों के 100 करोड़ी कारोबार से यह उम्मीद बंधी है कि तीनों 2019 के स्टार हैं. उनके साथ पंकज त्रिपाठी को भी नहीं भूलना चाहिए. मुख्य भूमिकाओं में तो नहीं लेकिन जोरदार सहयोगी भूमिकाओं में फिल्म की सफलता के लिए वे जरूरी बनते जा रहे हैं. उनकी मौलिकता ही उनकी प्रतिभा है. भाषा के नियंत्रण और खेल से अपने शब्दों में जादुई असर ले आते हैं. विकी को तो हम जनवरी में हीउरी…’ में देख लेंगे. बाद के महीनों में आयुष्मान खुराना और राजकुमार राव की फिल्में आएंगी. इन कलाकारों के साथ रणवीर सिंह,रणबीर कपूर, शाहिद कपूर, वरुण धवन, अर्जुन कपूर और सिद्धार्थ मल्होत्रा पर भी नजर रहेगी. इनमें से पहले तीन कोई भी चमत्कार कर सकते हैं. पत्र-पत्रिकाओं ,ऑनलाइन चैनल और टीवी की रणवीर और रणबीर की टक्कर और आगे-पीछे होने की होड़ में खास रूचि रहेगी. दोनों के पास दमदार फिल्में हैं. उनके निर्देशकों ने पिछली फिल्मों में खुद को साबित कर रखा है.
इस साल रणवीर सिंह और रणबीर कपूर की होड़ आमने-सामने की होगी.2018 में रणबीर कपूर की ‘संजू’ 300 करोड़ से अधिल का कारोबार कर उन्हें बढ़त दी है,लेकिन रणवी सिंह भी पीछे नहीं हैं.साल के शुरू में उनकी ‘पद्मावत’ ने अच्छा कारोबार किया उअर अभि उमकी ‘सिंबा’ का कलेक्शन बढ़ता ही जा रहा है.उदीयमान सितारों के अलावा रणबीर कपूर और रणवीर सिंह की भिडंत रोचक रहेगी.इनके साथ वरुण धवन और कार्तिक आर्यन पर भी नज़र रहेगी.2019 में रिलीज हो रही फिल्मों से उनका भविष्य तय होगा.इन चरों के पास पर्याप्त फ़िल्में हैं.

2019 में अनेक ऐतिहासिक और बायोपिक फिल्में आएंगी. करण जौहर कीतख़्त', अजय देवगन कीतानाजी’,चन्द्रप्रकाश द्विवेदी कीपृथ्वीराजरितिक रोशन कीसुपर 30’ के अलावा दीपिका पादुकोण,सोनम कपूर,जान्हवी कपूर और अनुष्का शर्मा की कुछ बायोपिक फिल्में भी होंगी. कंगना रनोट कीमणिकर्णिका…’ से ऐतिहासिक फिल्मों की शुरुआत हो रही है. वास्तव मेंबाहुबलीऔरपद्मावतीकी कामयाबी ने निर्माताओं को हिस्टोरिकल फिल्मों का नया विश्वास दिया है. दूसरे इन फिल्मों के जरिए राष्ट्रवाद के आड़ में भारतीय गर्व और गौरव को दिखाने और रेखांकित करने के साथ सत्तारूढ राजनीतिक पार्टी को खुश करने का बहाना भी निर्माताओं को मिल रहा है. उम्मीद की जानी चाहिए कि हिंदी फिल्मों में घुस आई राष्ट्रवाद की अतिजना सत्ता के संभावित बदलाव के साथ कम होगी.

हर साल की तरह इस साल भी फिल्म इंडस्ट्री के बेटे-बेटियों की लॉन्चिंग होगी. नेपोटिज्म के तमाम होहल्ले के बीच स्टार किड फिल्मों में आते रहेंगे. इस साल अनन्या पांडे, अहान शेट्टी, यशवर्धन, प्रनूतन और भाग्यश्री के बेटे का नाम प्रमुखता से लिया जा रहा है, सनी देओल के बेटे करण की फिल्म लगभग बन चुकी है. अभी ऐसा कोई संकेत नहीं है, लेकिन शाह रुख खान के बेटे आर्यन के फिल्म की घोषणा किसी सरप्राइज़ की तरह दर्शकों को हैरत में डाल सकती है.

2019 में वेब सीरीज दर्शकों का बड़ा आकर्षण होगा.सैक्रेड गेम्सकी अगली कड़ियों की शूटिंग चल रही है.मिर्जापुरऔररंगबाजकी नकल में अनेक वेब सीरीज की तैयारियां हो रही हैं. इन दिनों मुंबई में हर कलाकार और तकनीशियन किसी न किसी वेब सीरीज के साथ या तो जुड़ा है या उसकी तैयारी कर रहा है. यहां तक कि फिल्मों के लोकप्रिय स्टार भी वेब सीरीज करने के लिए आतुर दिख रहे हैं.
इस बीच एक बड़ी खबर आई है की प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के जीवन पर एक बायोपिक फिल्म बनेगी. इस फिल्म में विवेक ओबेरॉय अपने प्रिय नेता मोदी की भूमिका निभाएंगे.फिल्म गलियारे में कहा जा रहा है कि उनके नाम पर स्वयं नरेन्द्र मोदी ने मुहर लगायी है.ओमंग कुमार निर्देशित इस फिल्म को अं चुनाव के मौके पर रिलीज किया जायेगा कि फिल्मों के जरिये नरेन्द्र मोदी की झांकी पेश की जा सके.तीन महीने में बायोपिक बनाने और रिलीज करने की इस हड़बड़ी में हम अभि से अनुमान लगा सकते हैं कि फिल्म कितनी रोचक और विश्वसनीय होगी?


Tuesday, January 8, 2019

सिनेमालोक : चाहिए कंटेंट के साथ कामयाबी

सिनेमालोक
चाहिए कंटेंट के साथ कामयाबी
-अजय ब्रह्मात्मज
2018 में रिलीज हुई फिल्मों के आधार पर ट्रेन और निष्कर्ष उनकी बात करते हुए लगभग सभी समीक्षकों और विश्लेषको ने स्त्री अंधाधुंध और बधाई हो का उल्लेख करते हुए कहा कि दर्शक अब कंटेंट पसंद करने लगे हैं. संयोग ऐसा हुआ कि खानत्रयी(आमिर,शाह रुख और सलमान) की फिल्में अपेक्षा के मुताबिक शानदार कारोबार नहीं कर सकीं.बस,क्या था? खान से बेवजह परेशान विश्लेषकों ने बयान जारी करने के साथ फैसला सुना दिया कि खानों के दिन लद गए.27 सालों के सफल अडिग कैरियर में चंद फिल्मों की असफलता से उनके स्टारडम की चूलें नहीं हिलेंगी.हां, उन्हें अपनी उम्र के अनुसार भूमिकाएं चुनते समय दर्शकों की बदलती अभिरुचि का खयाल रखना होगा.उदीयमान सितारों राजकुमार राव,आयुष्मान खुराना और विकी कौशल को 2019 में रिलीज हो रही फिल्मों से साबित करना होगा कि वे ताज़ा स्टारडम के काबिल हैं.
इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि कंटेंट प्रधान छोटी फिल्मों का ज़िक्र करते समय हम उन फिल्मों के ही नाम गिनाते हैं,जिन्होंने 100 करोड़ या उसके आसपास का कारोबार किया.इसी लिहाज से 'स्त्री' और ' बधाई हो' उल्लेखनीय फिल्में हो गयी हैं.बेहतरीन होने के बावजूद हम 'अंधाधुन' का नाम उन दोनों के बाद ही ले रहे हैं.खुले दिल से हम भले ही स्वीकार न करें,लेकिन सच्चाई यही है कि कारोबार और कमाई ही हम सभी के लिए लोकप्रियता और श्रेष्ठता का प्रमाण है.अन्यथा 2018 की श्रेष्ठ फिल्मों की सूची में 'गली गुइयां' और 'तुम्बाड' शामिल रहती। दरअसल, कामयाबी के लिहे भी चेहरे चाहिए और 100 करोड़ का आंकड़ा.

दर्शकों की पसंद-नापसंद का कोई सामान्य नियम नही है.और न कोई ऐसा फार्मूला है कि ट्रेंड और कामयाबी मापी जा सके. पिछले साल की 13 सौ करोड़ी फिल्मों पर ही नज़र डालें तो हिस्टोरिकल,सोशल,कॉमेडी,एक्शन और हॉरर फिल्में दर्शकों को पसंद आईं। दर्शकों को तो साल के आझिरी हफ्ते में रिलीज 'सिंबा' भी पसंद आई,जिसमें कुछ भी मौलिक नहीं था.जिस कंटेंट और दर्शकों की बदलती पसंद की दुहाई दी जा रही है,वह 'सिंबा' में कहां थी? दर्शकों को नई और मौलिक कहानियां पसंद आती हैं,लेकिन उन्हें समयसिद्ध फार्मूला फिल्में भी पसंद आती हैं.कंटेंट नया हो या घिसा-पिटा... अगर मनोरंजन मिल रहा है दर्शक टूट पड़ते हैं.दर्शकों को अगर भनक भी लग जाये कि निर्माता-निर्देशक उन्हें बेवकूफ बना रहे हैं तो वे लोकप्रिय स्टारों की फिल्में भी ठुकरा देते हैं.हर साल कुछ स्थापित और लोकप्रिय स्टारों और निर्देशकों को दर्शकों की तरफ से अस्वीकृति का तमाचा लगता है.कई बार दर्शक अनजाने में बेहतरीन फिल्मों तक नहीं पहुंच पाते.पर्यापत प्रचार नहीं होने से दर्शक उनसे अनजान राह जाते हैं.
वास्तव में दर्शकों को कामयाब कंटेंट चाहिए.फिल्मों का कारोबार अच्छा होता है तो वे ललकते हैं.कुछ फिल्में कलेक्शन और कारोबार की वजह दर्शकों की पसंद बन जाती हैं. सच कहें तो दर्शक और समीक्षक बेहतरीन फिल्मों के विवेक से वंचित हैं.फिलहाल बाजार हावी है.वह बहुत कुछ निर्धारित कर रहा है।

Saturday, January 5, 2019

सिनेमालोक : शहरी दर्शकों के लिए बन रहा है सिनेमा


सिनेमालोक
शहरी दर्शकों के लिए बन रहा है सिनेमा
-अजय ब्रह्मात्मज
याद करें कि ग्रामीण पृष्ठभूमि की आखिरी फिल्म कौन सी देखी थी? मैं यह नहीं पूछ रहा हूँ कि किस आखिरी फिल्म में धोती-कमीज और साडी पहने किरदार दिखे थे.बैलगाड़ी,तांगा और सायकिल भी गायब हो चुके हैं.कुआं,रहट,चौपाल,खेत-खलिहान आदी की ज़रुरत ही नहीं पड़ती.कभी किसी आइटम सोंग में हो सकता है कि यह सब या इनमें से कुछ दिख जाये.तात्पर्य यह कि फिल्म की आवश्यक प्रोपर्टी या पृष्ठभूमि में इनका इस्तेमाल नहीं होता.अब ऐसी कहानियां ही नहीं बनतीं और कैमरे को ग्रामीण परिवेश में जाने की ज़रुरत नहीं पड़ती.धीरे-धीरे सब कुछ शहरों में सिमट रहा है.किरदार,परिवेश और भाषा शहरी हो रही है.
दरअसल,फ़िल्में शहरी दर्शकों के लिए बन रही हैं.हिंदी फ़िल्में कहने को पूरे भारत में रिलीज होती हैं,लेकिन हम जानते है कि दक्षिण भारत में हिंदी फिल्मों की मौजूदगी टोकन मात्र ही होती है.तमिल और तेलुगू फिल्म इंडस्ट्री हिंदी के समकक्ष खड़ी है.कन्नड़ और मलयालम के अपने दर्शक हैं.कर्णाटक में हिंदी फिल्मों के प्रदर्शन पर हदबंदी रहती है.दक्षिण के राज्य अपनी भाषा की फिल्मों के लिए संवेदनशील हैं.उन्होंने प्रदेश की भाषाओँ की फिल्मों के प्राइम प्रदर्शन की अनिवार्यता सख्त कर दी है.महाराष्ट्र में मराठी फिल्मों का सुनिश्चित प्रदर्शन होता है.
पिछले पांच-दस सालों में मल्टीप्लेक्स की संख्या बढ़ी है और सिंगल स्क्रीन लगातार कम हुए हैं.जिन शहरों और कस्बों के सिंगल स्क्रीन टूट या बंद हो रहे हैं,उन शहरों में उनके स्थान पर मल्टीप्लेक्स नहीं आ पा रहे हैं.कुछ राज्यों में सरकारें कर में छूट और अन्य सुविधाएँ भी दे रही हैं,लेकिन सिनेमाघरों के बंद होने और खुलने का अनुपात संतुलित नहीं है.स्थिति बद से  बदतर होती जा रही है.अपने बचपन के सिनेमाघरों को याद करें तो अब वे केवल आप की यादों में ही आबाद हैं.ज़मीन पर उनका अस्तित्व नहीं रह गया है.इलाहांबाद,माफ़ करें प्रयागराज के मेरे फिल्म इतिहासकार मित्र अपने शहर के बंद हुए सिनेमाघरों की मर्मान्तक कथा लिख रहे हैं.यह जानना और समझना रोचक होगा कि कैसे और क्यों सिनेमाघर हमारे दायरे से निकल गए?
देश की सामाजिक संरचना तेज़ी से बदली है.शिक्षा के प्रसार और आवागमन की सुविधा बढ़ने हिंदी प्रदेशों के युवा राजधानियों और बड़े शहरों की तरफ भाग रहे हैं.अच्छी पढाई और नौकरी की तलाश में शहरों में युवा जमघट बढ़ रहा है.थोड़ी और अच्छी व ऊंची पढाई और फिर उसी के अनुकूल नौकरी के लिए हिंदी प्रदेशों के युवा मेट्रो शहरों को चुन रहे हैं.हिंदी फिल्मों के मुख्य दर्शक यही युवा हैं.पूरे बाज़ार का मुख्य ग्राहक युवा ही है और वही हिंदी फिल्मों का दर्शक है.कभी सर्वेक्षण होना चाहिए कि हिंदी फिल्मों के दर्शकों का प्रोफाइल कितना बदल चुका है.दर्शक फ़िल्में तो देख रहे हैं,लेकिन उनके प्लेटफार्म और माध्यम बदल चुके हैं.फिल्म देखने की वैकल्पिक सुविधा और किफ़ायत से सिनेमाघर में जाकर फिल्म देखनेवाले शहरी दर्शकों की संख्या घटी है.गंवाई और कस्बाई दर्शकों की हद में सिनेमाघर ही नहीं हैं,उनसे यह उम्मीद करना ज्यादती होगी कि फिल्म देखने के लिए वे पास के शहरों में जायेंगे.
मेट्रो शहरों और प्रदेश की राजधानियों में सिनेमाघर और दर्शक सिमट रहे हैं.हिंदी प्रदेशों के हिन्दीभाषी दर्शक अभी तक इस भ्रम में रहते हैं कि उनकी संख्या की वजह से ही हिंदी फ़िल्में चलती हैं.यह कभी सच रहा होगा.अभी की सच्चाई यह है कि हिंदी फिल्मों की सर्वाधिक कमाई मुंबई से होती है.इसके बाद दिल्ली एनसीआर का स्थान है.इधर कुछ सालों में बंगलोर में हिंदी फिल्मों के दर्शक बढे हैं.इस बढ़त की वजह सभी समझते हैं.आईटी उद्योग ने उत्तर भारतीय युवा को आकर्षित किया है.उत्तर भारत का अब शायद ही कोई ऐसा परिवार होगा ,जिसका कम से कम एक सदस्य बंगलौर में कार्यरत न हो. क्या आप जानते हैं कि बंगलौर फिल्म के बॉक्स ऑफिस कलेक्शन के मामले में मुंबई और दिल्ली के बाद तीसरे नंबर पर आ चुका है.