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Tuesday, December 25, 2018

सिनेमालोक : कार्तिक आर्यन

सिनेमालोक
कार्तिक आर्यन
-अजय ब्रह्मात्मज
इस महीने के हर मंगलवार को 2018 के ऐसे अचीवर को यह कॉलम समर्पित होगा,जो हिंदी फिल्मों में बहार से आए.जिन्होंने अपनी मेहनत और प्रतिभा के दम पर पहचान हासिल की.2018 में आई उनकी फिल्मों ने उन्हें खास मुकाम दिया.
दस महीने पहले 23 फ़रवरी को ‘सोनू के टीटू की स्वीटी’ रिलीज हुई थी. लव रंजन की इसी फिल्म के शीर्षक से ही प्रॉब्लम थी. कुछ को यह टंग ट्विस्टर लग रहा था तो अधिकांश का यही कहना था कि यह भी कोई नाम हुआ? फिल्म रिलीज हुई और सभी को पसंद आई. इस तरह के विषय की फिल्मों पर रीझ रहे दर्शक टूट पड़े तो वहीँ खीझ रहे समीक्षक इसे दरकिनार नहीं कर सके.समीक्षकों ने फिल्म के विषय की स्वाभाविक आलोचना की, लेकिन उसके मनोरंजक प्रभाव को स्वीकार किया.नतीजा यह हुआ कि खरामा-खरामा यह फिल्म 100 करोड़ के क्लब में पहुंची. फिल्म के कलाकारों में सोनू यानि कार्तिक आर्यन को शुद्ध लाभ हुआ. छह सालों से अभिनय की दुनिया में ठोस ज़मीन तलाश रहे कार्तिक आर्यन को देखते ही देखते दर्शकों और फिल्म इंडस्ट्री ने कंधे पर बिठा लिया. उन्हें फ़िल्में मिलीं,एनडोर्समेंट मिले और कार्तिक ग्लैमर वर्ल्ड के इवेंट में चमकने लगे.
22 नवम्बर 1990 को ग्वालियर के डॉक्टर दंपति के परिवार में जन्मे और पीला-बढे कार्तिक मुंबई तो आये थे इंजीनियरिंग की पढाई करने,लेकिन मन के कोने में सपना फिल्मों में एक्टिंग का था.पढाई के दौरान सपनों को पंख लगे और कार्तिक ने अभिनय के आकाश की तलाश जारी रखी. नए कलाकार फिल्म इंडस्ट्री के ताऊ-तरीकों से नावाकिफ होते हैं. सही हिम्मत और पूरा जज्बा न हो तो सपनों को चकनाचूर करने के रोड़े रास्तों में पड़े मिलते हैं.कार्तिक ने खुद ही राह बनायीं.दिक्कत का एहसास हुआ तो तैयारी की और प्रयास करते रहे. आख़िरकार 2011 में उन्हें लव रंजन की ‘प्यार का पंचनामा’ मिली.इस फिल्म में रजत का किरदार दर्शकों के ध्यान में आया.वह उन्हें याद रहा.पहली फिल्म के नए एक्टर के लिए इतना बहुत होता है.इस फिल्म में उनके लम्बे संवाद और उसकी अदायगी ने सभी को प्रभावित किया. कार्तिक के साथ ऐसा चल रहा है.उनकी फ़िल्में अपने विषय की वजह से आलोचित होती हैं,लेकिन उनका किरदार प्रशंसित होता है.कार्तिक की नयी फ़िल्में इस विरोधाभास को कम करें तो उनकी लोकप्रियता और स्वीकृति तेज़ी से बढ़ेगी.
पहली फिल्म की सफलता और चर्चा के बावजूद दूसरी फिल्म ‘आकाशवाणी’ दर्शकों ने पसंद नहीं की. अगले साल ई सुभाष घई की ‘कांची’ कब रिलीज होकर चली गयी? किसी को पता ही नहीं चला. इं दोनों फिल्मों की असफलता से कार्तिक के करियर में विराम आया.निराशा नज़दीक पहुंची.इस छोटे अंतराल में बेचैन होने के बावजूद कार्तिक ने बेसब्री में गलत फ़िल्में नहीं चुनीं.वक़्त गुजरता रहा और कार्तिक सही फिल्म के इंतजार में रहे.फिर से लव रंज आये और उन्होंने ‘प्यार का पंचनामा 2’ में कार्तिक आर्यन को अंशुल का किरदार दिया.इस फिल्म में फिर से उनके एकल संवाद की तारीफ हुई.बतौर एक्टर भी उनमें आत्मविश्वास और परफॉरमेंस की रवानी दिखी.बीच में आई ‘गेस्ट इन लंदन’ हलकी रही,लेकिन ‘सोनू के टीटू की स्वीटी’ ने परिदृश्य ही बदल दिया.
पिछले 10 महीनों में कार्तिक लगातार चौंका रहे हैं.वे सुर्ख़ियों में बने हुए हैं.उनकी फिल्मों की घोशनाएँ हो रही है.सही या गलत यह खबर भी फैल रही कि उन्होंने कौन सी फिल्म छोड़ दी.करीना कपूर के साथ रैंप वाक तो चर्चा में आये. उस इवेंट की तस्वीरों में कार्तिक का कॉन्फिडेंस देखते ही बनता है.यूँ लगता है की कार्तिक लगातार खुद को मंज रहे हैं और अभी से बड़ी चमक और खनक के लिए खुद को तैयार कर रहे हैं.कार्तिक की एक अघोषित खूबी है.ग्वालियर की पृष्ठभूमि और परिवार से उन्हें हिंदी मिली है.हिंदी के उच्चारण और अदायगी में अपने समकालीनों से बहुत आगे हैं.उनके एकल संवाद प्रमाण हैं कि हिंदी पर उनकी जबरदस्त पकड़ है.
कार्तिक की ‘लुका छुपी’ की शूटिंग पूरी हो चुकी है. इसमें वह कार्तिक आर्यन के साथ हैं.’किंक पार्टी’ में वह जैक्लिन फ़र्नांडिस के साथ नज़र आयेंगे. इम्तियाज़ अली की ‘लव आजकल 2’ में सारा अली खान के साथ उनकी जोड़ी बनेगी. 2018 ने कार्तिक के सपनों को ऊंची उड़ान दी है.


Tuesday, December 18, 2018

सिनेमालोक : राधिका आप्टे


सिनेमालोक
राधिका आप्टे
-अजय ब्रह्मात्मज
पिछले दिनों ऑनलाइन स्ट्रीमिंग प्लेटफार्म नेटफ्लिक्स ने एक ट्विट किया कि ‘अंधाधुन की स्ट्रीमिंग चल रही है.यह इसलिए नहीं बता रहे हैं कि इसमें राधिका आप्टे हैं,लेकिन हाँ इसमें राधिका आप्टे हैं.’ इस ट्विट की एक वजह है.कुछ महीने पहले सोशल मीडिया पर मीम चल रही थी और दर्शक सवाल कर रहे थे कि नेटफ्लिक्स के हर हिंदी प्रोग्राम में राधिका आप्टे ही क्यों रहती है? संयोग कुछ ऐसा हुआ कि ‘लस्ट स्टोरीज’,’सेक्रेड गेम्स’ और ‘गुल’ में एक के बाद एक राधिका आप्टे ही दिखीं.मान लिया गया है कि डिजिटल शो में राधिका का होना लाजिमी है.
करियर के लिहाज से देखें तो राधिका आप्टे की पहली फिल्प्म 2005 में ही आ गयी थी.उन्होंने महेश मांजरेकर के निर्देशन में ‘वह लाइफ हो तो ऐसी’ फिल्म की थी,जिसमे शहीद कपूर और अमृता राव मुख्या भूमिकाओं में थे.उस फिल्म की आज किसी को याद भी नहीं है.हिंदी,बंगाली मराठी और तेलुगू फिल्मों में छोटी-मोटी भूमिकायें करने के बाद एक तरीके से ऊब कर राधिका लंदन चली गयीं.वहां उन्होंने कंटेम्पररी डांस सीखा.वहीँ उनके लाइफ पार्टनर बेनेडिक्ट टेलर भी मिल गए.कुछ समय तक लीव इन रिलेशनशिप में रहने के बाद दोनों ने शादी कर ली.राधिका के प्रशंसक उनके पति को नहीं पहचानते,क्योंकि वह राधिका के आगे-पीछे डोलते नज़र नहीं आते.शादी के बाद राधिका ने जिस तरह की बोल्ड फ़िल्में की हैं,वह शायद आम हिन्दुस्तानी पति को गवारा नहीं होता.तमाम आज़ादी और और नारी स्वतंत्रता की बैटन के बावजूद हिंदी फिल्मों की अभिनेत्रियों को शादी के बाद अघोषित दायरे में रहना पड़ता है.
राधिका ने ऐसी कोई परवाह नहीं की.डांस और थिएटर की ट्रेनिंग से उनकी एक्टिंग की नींव पुख्ता है.धीरे-धीरे दिख रहा है कि वह हर किस्म और तबके के किरदारों को आसानी से निभा ले जाती हैं.उन्होंने ‘लस्ट स्टोरीज’ की तो ‘पैडमैन’ में घरेलू महिला की भी भूमिका निभाई.इसके पहले उन्हें ‘माझी-द माउंटेनमैन’ में भी हमने देखा था.राधिका के परफॉरमेंस में वैराइटी है.थोड़ी सी दिक्कत उनके उच्चारण और संवाद अदायगी की है.हल्का सा मराठी टच होने से उनकी भूमिकाओं का असर कम होता है.राधिका के दोस्तों और निर्देशकों को उन्हें हिंदी उच्चारण सुधारने की सलाह देनी चाहिए.
राधिका के साथ सबसे अच्छी बात है कि वह किसी एक भाषा या विधा से नहीं बंधी हैं. वह अंग्रेजी समेत 6-7 राष्ट्रीय बह्षाओं में काम कर चुकी अहै और उन्होंने आगे के लिए भी खुद को हिंदी तक सीमित नहीं किया है.फीचर के साथ शार्ट फिल्म और वेब सेरिज करने में भी उन्हें कोई गुरेज नहीं है.इं दिनों शार्ट फिल्मों की काफी चर्चा है.राधिका आप्टे ने 2015 में सुजॉय घोष के साथ ‘अहल्या’ होर्त फिल्म की थी.तब कुछ आलोचकों ने समझा और लिखा था कि फिल्मों में राधिका का करियर समाप्त सा हो गया है,इसलिए वह शार्ट फाइलों की ओर मुड़ गयी हैं.अब पलट कर देखें तो वह पायनियर जान पड़ती हैं.उन्होंने भांप लिया था कि आने वाला समय शार्ट फिल्म और वेब सीरिज का है.
इस सन्दर्भ में अनुराग कश्यप औr विक्रमादित्य मोटवानी की ‘सेक्रेड गेम्स’ में राधिका आप्टे की भूमिका की बहुत चर्चा हुई.वह और भी वेब सीरिज कर रही हैं.लगातार दिखने से भी फिल्म एक्टर दर्शकों को खटकने लगते हैं.राधिका ने ‘बाज़ार’ जैसी फिल्मों में मामूली भूमिकाएं स्वीकार कर गलती ही की.इन फिल्मों में ज्यादा कुछ करने की गुंजाईश नहीं होती.और फिर डायरेक्टर सक्षम नहीं हो तो वह कलाकार को प्रेरित भी नहीं कर पाटा.राधिका के अभिनय में एकरसता नहीं है,लेकिन उसके लिए बेहतरीन और कल्पनाशील डायरेक्टर की ज़रुरत है.और फिर हिंदी फिल्मों में लोकप्रियता हासिल करने के लिए नाच-गाने वाली आकर्षक भूमिकाएं भी करनी पड़ती हैं.राधिका का मिजाज ऐसी फिल्मों से मेल नहीं खता.यही उम्मीद की जा सकती है कि इंडी सिनेमा के नए दौर में राधिका को अपनी प्रतिभा दिखाने के लिए कुछ चुनौतीपूर्ण भूमिकाएं मिलें. अगले साल पिया सुकन्या के निर्देशन में उनकी ‘बंबैरिया’ रिलीज होगी.



Sunday, December 16, 2018

संडे नवजीवन : सेलेब्रिटी शादी : वैभव और बदली परंपरा


संडे नवजीवन
सेलेब्रिटी शादी : दिखा वैभव और बदली परंपरा

-अजय ब्रह्मात्मज
भारतीय समाज में शादी हम सभी के सामाजिक-पारिवारिक जीवन का अनिवार्य चरण है.अभिभावक और माता-पिता चाहते हैं कि उनकी संतान समय रहते शादी कर ले और ‘सेटल’ हो जाये.अभिभावक और परिवार की मर्जी व सहमति से शादी हो रही हो तो औकात से ज्यादा खर्च करने का उत्साह आम है.यूँ आये दिन शादी और दहेज़ के लिए क़र्ज़ लेने के किस्से ख़बरों में आते रहते हैं.फिर भी शादी में अतिरिक्त खर्च का सिलसिला नहीं थम रहा है.गाँव-देहात से लेकर शहरी समाज तक की शादी में दिखावा बढ़ता जा रहा है.टीवी और फिल्मों के प्रसार और प्रभाव से रीति-रिवाज से लेकर विधि-विधान तक में तब्दिली आ रही है.अपनाने की आदत इतनी प्रबल है कि फिल्मों और ख़बरों में दिखी शादियों से परिधान और विधान अपनाये जा रहे हैं.देश के सारे दूल्हे शेरवानी और सारी दुल्हनें लहंगे में नज़र आने लगी हैं.संगीत,वरमाला और जूता छिपाई की रस्में देश के कोने-कोने में दोहराई जा रही हैं.रुढियों के नाम पर हल्दी,चुमावन और विदाई जैसी आत्मीय और रागात्मक रस्मों से तौबा किया जा रहा है.सबकुछ यकसां हो रहा है.
अब तो फिल्मों के अलावा फिल्म कलाकारों और अमीर परिवारों की शादियों का छूत किसी महामारी की तरह फ़ैल रहा है.हाल-फिलहाल में संपन्न हुई चार अभिनेत्रियों की शादी के लाइव कवरेज हम देख चुके.पांचवी शादी इन पंक्तियों के लिखने के समय चल रही है,जो इस देश के सर्वाधिक अमीर अंबानी परिवार में हो रही है.इन शादियों के प्रभाव और आकर्षण का अंदाजा इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि देश के प्रधानमंत्री को भी इन शादियों में शामिल होना पड़ रहा है.शादी के रिसेप्शन में दूल्हा-दुल्हन के संग मंच पर खड़े किसी और प्रधानमंत्री की तस्वीर पहले नहीं दिखी.हो सकता है प्रचारप्रिय नरेन्द्र मोदी का यह व्यक्तिगत फैसला हो कि वे लोकप्रिय शादियों में शामिल होंगे ताकि उनके वैसे प्रशंसक और मतदाता खुश हों,जो इन लोकप्रिय हस्तियों के जबड़ा फैन हैं.
बहरहाल,पिछले कुछ महीनों में चार अभिनेत्रियों की शादियाँ हुईं.अनुष्का शर्मा,सोनम कपूर.दीपिका पादुकोण और प्रियंका चोपड़ा अनुष्का ने क्रिकेटर विरत कोहली से शादी की.सोनम कपूर ने बिजनेसमैन आनंद आहूजा को चुना.दीपिका की जोड़ी रणवीर सिंह के साथ बनी. और प्रियंका चोपड़ा ने निक जोनस से विवाह रचाया.मीडिया ने चारों जोड़ियों में केवल सोनम कपूर-आनंद आहूजा को कोई संक्षिप्त नाम नहीं दिया.बाकी तीन विरुष्का,दीपवीर और निक्यंका नाम से मशहूर हुए.चारों शादियों के मीडिया कवरेज में कोई कमी नहीं रही.पांचवी शादी में यह कवरेज अतिरेक पर है,लेकिन उसमें मीडिया की आत्मीयता नहीं झलक रही है.एक बड़ा फर्क यह है कि चारों अभिनेरियों की शादी में वे स्वयं मेहमानों के आगमन की धुरी थीं,जबकि ईशा अंबानी की शादी में शिरकत करने की वजह उनके पिता मुकेश अंबानी हैं.गौर करें और चारों अभिनेत्रियों बनाम एक ईशा की शादी के बड़े फर्क को महसूस करे.समृद्धि और वैभव से परिपूर्ण होने के बावजूद ईशा बनाम चारों अभिनेत्रियों की शादी में भी धन,साख और प्रभुत्व की वजह से अंतर रहा.ईशा की शादी से पहले उदयपुर में आयोजित समारोह में हिलेरी क्लिंटन से लेका मुंबई के तमाम फ़िल्मी सितारे मौजूद रहे.उन्होंने मानक पर सार्वजानिक नृत्य भी किया.भारतीय मिथक से उदहारण लें तो यह देवलोक की शादी की तरह हैं,जहाँ बेहतरीन परिधानों में सजे सभी देवी-देवता आशीर्वाद के साथ पुष्पवर्षा कर रहे हैं.देश में पहले भी उद्योगपतियों ने अपनीं संतानों की शादी में करोड़ों खर्च किये हैं.शाह रुख खान ऐसी कुछ शादियों में फीस लेकर नाचते रहे हैं.पहली बार किसी गैरफिल्मी परिवार की शादी में सितारों की ऐसी जमघट दिखी तो खबर तो बनती ही है.
चारों अभिनेत्रियों में केवल सोनम कपूर समृद्ध फ़िल्मी परिवार की बेटी हैं.बाकी तीनों अभिनेत्रियों की पृष्ठभूमि मध्यवर्गीय रही है.हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में तीनों ‘आउटसाइडर’ हैं. तीनों ने अपनी मेहनत और लगन से आज का मुकाम हासिल किया है.उनकी प्रतिभा और योग्यता ही उन्हें यहाँ तक ले आई है.अगर कभी उनके आरंभिक इंटरव्यू से गुजरेंगे तो पाएंगे कि उनमें शुरू से आत्मविश्वास था.उन्होंने अपने प्रेमी चुने और उनसे विवाह रचाया.तीनों की शादियों की तस्वीरों में चेहरे की मुस्कराहट और उल्लसित भाव-भंगिमाओं से उनकी आंतरिक ख़ुशी जाहिर होती है.सभी तस्वीरों और वीडियो में अपने प्रेमी/पति के साथ उनकी अंतरंगता झलकती है.शादी के पहले की कोर्टशिप से यह अंतरंगता गाढ़ी हुई है.इन सभी छवियों में एक उन्मुक्तता है,जो अंबानी परिवार के समारोहों में लापता है.दरअसल अनुष्का,दीपिका और प्रियंका की शादियां 21वीं सदी की लड़कियों के एटीट्युड का सार्वजनिक बयान हैं.उल्लेखनीय है कि हमारे मन-मस्तिष्क में इन शादियों में दुल्हनें प्रमुख हैं.दूल्हे सेकेंडरी महत्व के हैं.यहाँ तक कि रणवीर सिंह जैसे लोकप्रिय अभिनेता भी दीपिका के साये की तरह ही डोलते नज़र आये.दुल्हनों ने शादी की आम सोच और धारणा को अपनी तरफ झुका लिया है.भविष्य में मध्यवर्गीय समाज की लड़कियों पर इसका गहरा असर पड़ेगा.शादी की समझ बढ़ेगी.शादी में उन्हें अपनी भूमिका तय करने में प्रेरक मदद मिलेगी.इन शादियों ने विदाई की रस्म को निबटा दिया है.दुल्हन की विदाई कहीं न कहीं पितृसत्ता के पक्ष को मजबूत करने के साथ आधार देती है.मध्यवर्गीय समाज में लड़कियां मायके और सौरल के पारंपरिक धुर्वों से निकल रही हैं.शादी के पहले से उनका अपना घर होता है या शादी के बाद वे अपने घर जाती हैं,जिसे नवदम्पति ने बनाया होता है.
फिल्म अभिनेत्रियों की महंगी और खर्चीली शादी पर हायतौबा मची हुई है.कुछ आलोचक इसे वैभव का अश्लील प्रदर्शन मान रहे हैं.निश्चित रूप से ये शादिय भव्य और महंगी रही हैं.प्रदर्शन तो इन्हें मीडिया कवरेज ने बनाया.दरअसल,चहेती फिल्म अभिनेत्रियों के बारे में सब कुछ जानने और देखने की दर्शकों-प्रशंसकों की ललक ने ही मीडिया को विस्तृत कवरेज के लिए बाध्य किया.बदले हुए समय में प्रशंसक और स्टार के नए रिश्तों को समझना ज़रूरी है.अकेली सोनम कपूर ने अपनी शादी के मीडिया कवरेज का पुख्ता और प्रवेशनीय इंतजाम किया था.बाकि तीनों ने मीडिया को दूर ही रखा था.निषेध के इस परिप्रेक्ष्य में जिज्ञासा ज्यादा थी और सबसे पहले खबर व तस्वीर देने की आपाधापी मची थी.अनुष्का,दीपिका और प्रियंका सोशल मीडिया के जरिये खुद ही सूचना और इमेज देकर मीडिया की उपयोगिता को नज़रअंदाज कर रहे थे.नतीजतन मीडिया रिपोर्ट में संयम की कमी और टिप्पणियों की हड़बड़ी रही.मीडिया की खीझ और झल्लाहट में रिपोर्ट में जाहिर हो रही थी.और फिर यह कैसे तय होगा कि अपनी शादी में कौन कैसे और कितना खर्च करे?कानूनी तौर पर कोई सीलिंग नहीं लगी है.आजकल तो फैशन शो,अवार्ड समारोह और अन्य एवेब्त में रेड कारपेट पर फ़िल्मी हस्तियां इस्ससे ज्यादा लकदक,चकमक,महंगे और भडकीले परिधानों में नज़र आते हैं.शो बिज़नस के स्सरे इवेंट अब सोशल मीडिया और टीवी शो बन चुके है.फिल्म कलाकारों की लोकप्रियता छवि के खेल पर टिकी है,इसलिए यह प्रदर्शन स्वाभाविक और प्रश्नों से परे है.
जिसकी ज्यादा चर्चा नहीं हुई और जो गौरतलब है कि सोच और व्यवस्था के तमाम बदलावों के बावजूद स्सभी शादियों में रुढियों का पालन किया गया.दूल्हे और दुल्हन के परिवारों की विधियों से दो बार शादियों की रस्में पूरी हुईं.खासकर दीपिका और प्रियंका की शादियाँ दो अलग दिनों में संपन्न हुई.चरों ने अपनी शादियों में नजदीकी दोस्तों और रिश्तेदारों को आमंत्रित किया.हाँ,अपने दायरे के मुताबिक उन्होंने एक से अधिक रिसेप्शन रखे.यह जिज्ञासा है कि उनकी शादी की कौन सी तारीख मुकम्मल और रजिस्टर की गयी है? कितना ही मज़ा आता और सरप्राइजिंग रहता अगर उन्होंने कोर्ट में शादी कर ली होती या दो-चार करीबी दोस्तों के बीच फेरे ले लिए होते.तब एक नया और ज्यादा ज़रूरी आदर्श पेश करते.है कि नहीं?
फिर से इन शादियों के वीडियो देखें तो आप देख और समझ पाएंगे कि चारों अभिनेत्रियों ने अभूत कुछ तोडा और जोड़ा है.उन्होंने शादी केजष्ण की परिभाषा बदल दी है.पहले फिल्मों में दिखाई शादियां समाज पर असर डालती थीं.अब यह रील से निकलकर रियल होते ही ज्यादा करीब आने के साथ मकाल के लिए आसान हो गयी हैं. मंगनी और शादी के तौर-तरीकों में भारी फेरबदल होगा.और यकीन करें अब लड़कियों की सुनी जाएगी या लड़कियां शादी की प्लानिंग खुद करेंगी.भारतीय समाज में यह बड़ा परिवर्तन होगा.


Tuesday, December 11, 2018

सिनेमालोक :आयुष्मान खुराना



सिनेमालोक
आयुष्मान खुराना
-अजय ब्रह्मात्मज
इस महीने के हर मंगलवार को 2018 के ऐसे अचीवर को यह कॉलम समर्पित होगा,जो हिंदी फिल्मों में बहार से आए.जिन्होंने अपनी मेहनत और प्रतिभा के दम पर पहचान हासिल की.2018 में आई उनकी फिल्मों ने उन्हें खास मुकाम दिया.

2018 में दो हफ़्तों के अन्दर आयुष्मान खुराना की दो फ़िल्में कामयाब रहीं.श्रीराम राघवन निर्देशित ‘अंधाधुन’ और अमित शर्मा निर्देशित ‘बधाई हो’. दोनों फिल्मों का फलक अलग था.दोनों के नायक हिंदी फिल्मों के पारंपरिक नायक से अलग थे.आयुष्मान की ताहि खासियत उन्हें विशिष्ट बनाती है.शूजित सरकार की ‘विकी डोनर’ से लेकर ‘बधाई हो’ तक के उनके चुनाव पर गौर करें तो सभी फिल्मों में उनके किरदार अलहदा रहे हैं.धीरे-धीरे स्थापित होने के साथ ही नयी धारणा बन चुकी है की अगर आयुष्मान खुराना की कोई फिल्म आ रही है तो उसका नायक मध्यवर्गीय ज़िन्दगी के किसी अनछुए पहलू को उजागर करेगा.हाल ही में उनकी ताज़ा फिल्म ‘ड्रीम गर्ल’ का फर्स्ट लुक सामने आया है.यहाँ भी वह चौंका रहे हैं.उम्मीद करते हैं कि इस बार वह किसी शारीरिक या पारिवारिक उलझन में नहीं फंसे होंगे.
इन दिनों लोकप्रिय और बड़े स्टार भी दर्शक नहीं जुटा पाते.दर्शक निर्मम हो चुके हैं.उन्हें फिल्म पसंद नहीं आई तो वे परवाह नहीं करते कि इसमें आमिर खान हैं या अमिताभ बच्चन हैं,या फिर दोनों हैं.इस माहौल में ‘बधाई हो’ ने सिनेमाघरों में 50 दिन पूरे कर लिए.दर्शक अभी तक इसे देख रहे हैं.यह बड़ी बात है,क्योंकि आजकल कुछ फिल्मों के लिए कई बार 50 शो खींचना भी मुश्किल हो जाता है.क्या आप को याद है कि ‘बधाई हो’ के साथ ‘नमस्ते लंदन’ रिलीज हुई थी.फेसवैल्यू के लिहाज से उसमें बड़े नाम थे.चालू फार्मुले की पंजाब की चाशनी में लिपटी उस फिल्म को दर्शकों ने सिरे से नकार दिया था.दरअसल,दर्शक इन दिनों स्टार और बैनर के झांसे में पहले दिन सिनेमाघरों में चले भी जायें.अगले शो और अगले दिन तक उन्हें सही रिपोर्ट मिल चुकी होती है.
आयुष्मान के करियर को देखें तो स्टेज और टीवी शो के जरिये वह फिल्मों तक पहुंचे.चंडीगढ़ में मामूली परिवार एन पले-बढे आयुष्मान खुराना के सपने बड़े थे.चंडीगढ़ शहर भी उन सपनों के लिए छोटा पड़ गया था.पढाई के दिनों में ही उन्होंने मंडली बनायीं और सपनों को परवाज़ दिया.वक़्त रहले लोगों ने पहचाना और उन्हें उड़ने के लिए आकाश दिया.उन पारखी नज़रों को भी धन्यवाद् देना चाहिए,जिन्होंने साधारण चेहरे और कद-काठी के इस युवक को मौके दिए.आयुष्मान ने खुद की मेहनत और प्रतिभा से सभी अवसरों का भरपूर लाभ उठाया और निरंतर कामयाबी की सीढियां चढ़ते गए.आयुष्मान की कामयाबी नयी युवा प्रतिभाओं के लिए नयी मिसाल बन गयी है.
आयुष्मान खुराना की फिल्मों,किरदार और अभिनय शैली पर नज़र डालें तो उनमें हिंदी फिल्मों के हीरो के लक्षण नहीं दिखते.सभी किरदार मामूली परिवारों और परिवेश से आते हैं.ज्यादातर मध्यवर्गीय परिवार और परिवेश ही होते हैं.फिल्म शुरू होने के साथ नायक की साधारण उलझन उभर आती है.लगभग सभी फिल्मों में वे अपनी प्रेमिकाओं को रिझाने और उलझनों से निकलने की कोशिश में एक साथ लगे रहते हैं.उनकी नायिकाएं कामकाजी होती हैं.उनका अपना परिवार भी होता है.यानि आम फिल्मों की नायिकाओं की तरह उन्हें परदे पर सिर्फ प्रेम नहीं करना होता है.आयुष्मान खुराना आम हीरो जैसी मुश्किलों में नहीं फंसते,इसलिए उन्हें हीरोगिरी दिखाने का भी मौका नहीं मिलता.फिर भी यह मामूली नायक दर्शकों को पसंद आता है.कुछ आलोचक इस नए नायक को नहीं पहचान पाने की वजह से सुविधा के लिए आयुष्मान खुराना को अमोल पालेकर से जोड़ देते हैं.वास्तव में दोनों बहुत अलग कलाकार हैं.कह सकते हैं कि दोनों के निभाए किरदार समय और परिस्थिति की वजह से भी अलग मिजाज रखते हैं.
आयुष्मान खुराना की एक और खासियत है.वह गायक हैं.उनकी फिल्मों में उनकी आवाज़ का इस्तेमाल होता है.उन गीतों को परदे पर निभाते और गुनगुनाते समय  आयुष्मान खुराना की तल्लीनता देखते ही बनती है.ठीक है कि उन्हें अभि किशोर कुमार या सुरैया जैसी ऊंचाई नहीं मिली है,लेकिन यह एहसास ही कितना सुखद है कि 21वीं सदी में कोई कलाकार अभिनय के साथ गायन भी करता है.हिंदी फिल्मों की यह परमपरा विलुप्त ही हो गयी है. सुना है कि फुर्सत मिलते ही आयुष्मान खुराना जिम के बजे जैमिंग(गाने का अभ्यास) में समय बिताते हैं.







Tuesday, December 4, 2018

सिनेमालोक : तापसी पन्नू


सिनेमालोक
तापसी पन्नू
दिसंबर आरभ हो चुका है.इस महीने के हर मंगलवार को 2018 के ऐसे अचीवर को यह कॉलम समर्पित होगा,जो हिंदी फिल्मों में बहार से आए.जिन्होंने अपनी मेहनत और प्रतिभा के दम पर पहचान हासिल की.2018 में आई उनकी फिल्मों ने उन्हें खास मुकाम दिया.
हम शुरुआत कर रहे हैं तापसी पन्नू से.2012 की बात है.तापसी पन्नू की पहली हिंदी फिल्म ‘चश्मेबद्दूर रिलीज होने वाली थी. चलन के मुताबिक तापसी के निजी पीआर ने उनके साथ एक बैठक तय की.पता चला था कि दक्षिण की फिल्मों से करियर आरम्भ कर दिल्ली की यह पंजाबी लड़की हिंदी में आ रही है.पहली फिल्म के समय अभनेता/अभिनेत्री थोड़े सहमे और डरे रहते हैं.तब उनकी चिंता रहती है कि कोई उनके बारे में बुरा न लिखे और उनका ज़रदार स्वागत हो.तापसी भी यही चाहती रही होंगी या यह भी हो सकता है कि पीआर कंपनी ने उन्हें भांप लिया हो.बहरहाल अंधेरी के एक रेस्तरां में हुई मुलाक़ात यादगार रही थी.यादगार इसलिए कह रहा हूँ की,उसके बाद तापसी ने हर मुलाक़ात में पहली भेंट का ज़िक्र किया.हमेशा अच्छी बातचीत की.अपनी तैरियों और चिंताओं को शेयर किया.अपना हमदर्द समझा.कामयाबी के साथ आसपास हमदर्दों और सलाहकारों की भीड़ लग जाती है.ऐसे में संबंध टूटते हैं,लेकिन तापसी ने इसे संभाल रखा है.
बहरहाल,तापसी ने ‘चश्मेबद्दूर से शुरुआत कर ‘बेबी से बड़ी धमक दी.’बेबी में तापसी की भूमिका छोटी लेकिन महत्वपूर्ण थी.शबाना खान इ भूमिका ने तापसी ने अपनी फूर्ती और मेधा से चकित किया था.अक्षय कुमार के होने के बावजूद वह दर्शकों और समीक्षकों को याद रह गयी थीं.यह उस भूमिका का ही कमाल था कि बाद में नीरज पाण्डेय ने ‘नाम शबाना फिल्म बनायीं और उस किरदार को नायिका बना दिया.’नाम शबाना का निर्देशन शिवम नायर ने किया था.इसके पहले अनिरुद्ध राय चौधरी के निर्देशन में ‘पिंक आ चुकी थी.’पिंक में तापसी ने मीनल अरोड़ा की दमदार भूमिका में ज़रुरत के मुताबिक एक आधुनिक लड़की की हिम्मत का परिचय दिया था.’पिंक अपने विषय की वजह से शहरी दर्शकों के बीच खूब पसंद की गयी थी.इं दोनों फिल्मों के बाद जब तापसी ने ‘जुड़वां 2 चुनी तो उनके खास प्रशंसकों को परेशानी हुई.तब तापसी ने कहा था की वह मेनस्ट्रीम हिंदी सिनेमा और हाई कांसेप्ट सिनेमा के बीच तालमेल रखना चाहती हैं.वह अपने दर्शकों का विस्तार चाहती हैं.
2018 में तापसी पन्नू की ‘सूरमा,’मुल्क और ‘मनमर्जियाँ’ फ़िल्में आयीं हैं.तीनों ही फ़िल्में अलग मिजाज की हैं.’सूरमा में वह हाकी प्लेयर हैं,जो अपने प्रेमी संदीप सिंह से दूर जाने का मुश्किल फैसला लेती है ताकि वह अपने खेल और रिकवरी पर ध्यान दे सके.अनुभव सिन्हा निर्देशित ’मुल्क में वह वकील आरती मल्होत्रा की भूमिका में है.आरती ने मुस्लिम लड़के से शादी की है.वह अपने ससुराल के पक्ष में कोर्ट में कड़ी होती है और मुसलमानों के प्रति बनी धारणाओं को तर्कों से तोडती है.अनुराग कश्यप की ‘मनमर्जियाँ’ में वह आजाद ख्याल रूमी बग्गा के किरदार में खूब जंची हैं.यह तो स्पष्ट है कि तापसी पन्नू अभि तक किसी एक इमेज में नहीं बंधी हैं.वह प्रयोग कर रही हैं.
तापसी पन्नू हिंदी फिल्मों की टिपिकल हीरोइन बन्ने से बची हुई हैं.यह एक अभिनेत्री के लिए तो सही है,लेकिन एक स्टार अभिनेत्री को मेनस्ट्रीम हिंदी फिल्मों की ज़रुरत होती है.किसी लोकप्रिय स्टार के साथ रोमांटिक भूमिका में आने से उनके दर्शक बढ़ते हैं,तापसी भी यह चाहती हैं.अभि तक लोकप्रिय स्टार उनसे दूर-दूर हैं.अगर बात नहीं बिगड़ी होती तो वह आमिर खान की बेटी की भूमिका में ‘दंगल में दिखी होतीं. हो सकता है उसके बाद उनके करियर की दिशा अलग हो जाती. ‘दंगल न हो पाने का एक फायदा हुआ कि तापसी नए निर्देशकों की पसंद बनी हुई हैं,उन्हें लगता है कि अलग किस्म की भूमिकाओं में तापसी को चुना जा सकता है.’तड़का और ‘बदला उनकी अगली फ़िल्में हैं.
हिंदी फिल्मों में बाहर से आई अभिनेत्रियों के लिए टिक पाना ही मुश्किल होता है.ताप पन्नू ने तो अपनी पहचान और प्रतिष्ठा हासिल कर ली है.फिर भी हिंदी फिल्मों के केंद्र में अभि वह नहीं पहुंची हैं.म्हणत के साथ ही उन्हें फिल्मों के चुनाव के प्रति भी सजग रहना होगा.उन्हें बड़े बैनर और बड़े निर्देशकों के साथ फ़िल्में करनी होंगी.लोकप्रियता और स्टारडम का यही रिवाज़ है.