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Tuesday, November 13, 2018

सिनेमालोक : क्या बिखर रहा है अमिताभ बच्चन का जादू?


सिनेमालोक
क्या बिखर रहा है अमिताभ बच्चन का जादू?
-अजय ब्रह्मात्मज
दिवाली के मौके पर रिलीज हुई ‘ठग्स ऑफ़ हिंदोस्तान’ को दर्शकों ने नापसंद कर दिया.सोशल मीडिया को ध्यान से पढ़ें तो फिल्म की असफलता का ठीकरा आमिर खान के माथे फूटा.यह स्वाभाविक है,क्योंकि आज की तारिख में आमिर खान अधिक सफल और भरोसेमंद एक्टर-स्टार हैं.उनकी असामान्य फ़िल्में भी अच्छा व्यवसाय करती रही हैं.अपनी हर फिल्म से कमाई के नए रिकॉर्ड स्थापित कर रहे आमिर खान ने दर्शकों की नापसंदगी के बावजूद दीवाली पर रिलीज हुई सबसे अधिक कलेक्शन का रिकॉर्ड तो बना ही लिया.इस फिल्म को पहले दिन 50 करोड़ से अधिक का कलेक्शन मिला.
फिल्मों की असफलता का असर फिल्म से जुड़े कलाकारों के भविष्य पर पड़ता है. इस लिहाज से ‘ठग्स ऑफ़ हिंदोस्तान’ के कलाकारों में आमिर खान के चमकते करियर को अचानक ग्रहण लग गया है और फातिमा सना शेख को दूसरी फिल्म में बड़ा झटका लगा है. अमिताभ बच्चन महफूज़ रहेंगे.अपनी दूसरी पारी की शुरुआत से ही खुद की सुरक्षा में अमिताभ बचचन ने इंटरव्यू में कहना शुरू कर दिया था कि अब फिल्मों का बोझ मेरे कन्धों पर नहीं रहता.उनकी इस सफाई के बावजूद हम जानते हैं कि उन्हें ध्यान में रख कर स्क्रिप्ट लिखी जा रही हैं.जिस फिल्म में भी वे रहते हैं,उसमें उनकी खास भूमिका होती है.फिल्म की सम्भावना और कामयाबी में उनकी भी शिरकत होती है.अगर ‘ठग्स ऑफ़ हिन्दोस्तान नहीं चली है तो यह मान लेना चाहिए कि अमिताभ बच्चन भी नहीं चले हैं.
‘ठग्स ऑफ़ हिंदोस्तान’ देख कर निकले अमिताभ बच्चन के प्रशंसक फ़िल्मकार की टिपण्णी ठ,’अमित जी थक गए हैं.थकान उनके चेहरे पर दिखने लगी है.’ फ़िल्मकार की आवाज़ में उदासी थी.अपने प्रिय अभिनेता के लिए यह चिंता वाजिब है.अमिताभ बच्चन 76 की उम्र में भी किसी युवा अभिनेता से अधिक सक्रिय हैं.उन्हें फ़िल्में मिल रही हैं. फिल्मों के साथ विज्ञापन मिल रहे हैं. उद्घाटन और समरोहों में आज भी उन्हें खास मेहमान के तौर पर बुलाया जा रहा है.मज़ेदार तथ्य है कि वे सभी को उपकृत भी कर रहे हैं.अपने ब्लॉग और ट्विटर पर अनेक दफा वह बता और लिख चुके हैं कि देर रात को सोने जा रहे हैं और सुबह जल्दी ही उन्हें काम पर जाना है.दैनिक जीवन में कर्मयोगी दिख रहे अमिताभ बच्चन पहले की तरह स्वस्थ नहीं हैं.वे कई बीमारियों के रोगी हैं.उन्हें बेहतर आराम और देखभाल की ज़रुरत है,लेकिन वे किसी भी आम भारतीय परिवार के जिद्दी बुजुर्ग की तरह व्यवहार कर रहे हैं.बिखर रहे हैं.
‘ठग्स ऑफ़ हिंदोस्तान’ और उसके पहले की कुछ फिल्मों में अब यह दिखने लगा है कि उनकी प्रतिक्रिया विलंबित होती है.उम्र बढ़ने के साथ प्रतिक्रियाओं,बोलचाल और गतिविधि में शिथिलता आती है.वह अब परदे पर दिखने लगी है.दूसरे कलाकारों के साथ के दृश्यों में इसकी झंलक मिलती है.सीधे शब्दों में कहें तो अपने अभिनय में तत्परता के लिए मशहूर अमिताभ बच्चन दृश्यों में तीव्रता और आवेग खो रहे हैं.’कौन बनेगा करोडपति में भी यह शिथिलता जाहिर हो रही है.हिंदी भाषा के उच्चारण और व्याकरण के लिए विख्यात अमिताभ बच्चन की पकड़ भाषा पर छूट रही है.उनकी हिंदी पिछली सदी के एक दशक विशेष की है और कुछ शब्दों को वे गलत ‘अर्थ में प्रयोग करते हैं.पिछले साल मामी फिल्म फेस्टिवल में उन्होंने ‘निरर्थक शब्द का उपयोग ‘प्रयास के साथ ‘सार्थक सन्दर्भ में किया था...अन्य अवसरों पर भी चूकें हो रही हैं.निस्संदेह हिंदी का उनका उच्चारण अधिकांश अभिनेताओं से बेहतर है,लेकिन शब्दों के अर्थ और प्रयोग में वे छोटी भूलें करने लगे हैं.स्क्रिप्ट सामने रहने पर गलतियाँ कम होती हैं.खुद बोलते समय वे आज की हिंदी की चाल में नहीं आ पाते.
प्रशंसक होने के नाते अमित जी की प्रतिभा की आभा के सीमित होने का उल्लेख करते हुए मन में विषाद घना हो रहा है,लेकिन समय का चक्र ऐसे ही चलता है.यही सच्चाई है कि दिन ढलने के साथ सूरज भी ढलता है.अस्ताचल होता है.

Monday, November 12, 2018

फिल्म लॉन्ड्री : आज़ादी के बाद की ऐतिहासिक फ़िल्में



आज़ादी के बाद की ऐतिहासिक फ़िल्में
ऐतिहासिक फिल्में पार्ट 3: यथार्थ और ख्याली दुनिया का कॉकटेल
-अजय ब्रह्मात्मज
(अभी तक हम ने मूक फिल्मों और उसके बाद आज़ादी तक की बोलती फिल्मों के दौर की ऐतिहासिक फिल्मों का उल्लेख और आकलन किया.इस कड़ी में हम आज़ादी के बाद से लेकर 20वीं सदी के आखिरी दशक तक की ऐतिहासिक फिल्मों की चर्चा करेंगे.)

देश की आज़ादी और बंटवारे के पहले मुंबई के साथ कोलकाता और लाहौर भी हिंदी फिल्मों का निर्माण केंद्र था.आज़ादी के बाद लाहौर पाकिस्तान का शहर हो गया और कोलकाता में हिंदी फिल्मों का निर्माण ठहर सा गया.न्यू थिएटर के साथ जुड़ी अनेक प्रतिभाएं बेहतर मौके की तलाश में मुंबई आ गयीं.हिंदी फिल्मों के निर्माण की गतिविधियाँ मुंबई में ऐसी सिमटीं की महाराष्ट्र के कोल्हापुर और पुणे से भी निर्माता,निर्देशक,कलाकार और तकनीशियन खिसक का मुंबई आ गए.
मुंबई में नयी रवानी थी.नया जोश था.लाहौर और कोलकाता से आई प्रतिभाओं ने हिंदी फिल्म इंदस्ट्री को मजबूत और समृद्ध किया.देश के विभिन्न शहरों से आई प्रतिभाओं ने हिंदी फिल्मों को बहुमुखी विस्तार दिया.इसी विविधता से माना जाता है कि पांचवा और छठा दशक हिंदी फिल्मों का स्वर्णकाल है,जिसकी आभा सातवें दशक में भी दिखाई पड़ती है.आज़ादी के तुरंत बाद के सालों में ऐतिहासिक फिल्मों के प्रति रुझान नहीं दिखाई देता,जबकि कुछ सालों पहले तक मुगलों,मराठों और राजस्थान के राजपूत राजाओं की शौर्य गाथाओं पर फ़िल्में बन रही थी.आज़ादी के पहले इन फिल्मों से राष्ट्रीय चेतना का उद्बोधन किया जा रहा था.मुमकिन है आज़ादी के बाद फिल्मकारों को ऐसे उद्बोधन की प्रासंगिकता नहीं दिखी हो.
सोहराब मोदी और उनकी ऐतिहासिक फ़िल्में
आज़ादी के पहले ‘पुकार(1939),’सिकंदर(1941) और ‘पृथ्वी वल्लभ(1943) जैसी ऐतिहासिक फ़िल्में निर्देशित कर चुके सोहराब मोदी ने अजाची के बाद पहले ‘शीशमहल(1950) नामक सोशल फिल्म का निर्देशन किया.फिर 1952 में उन्होंने महत्वाकांक्षी फिल्म ‘झाँसी की रानी का निर्माण और निर्देशन किया.यह फिल्म जनवरी 1953 में रिलीज हुई थी.इसका एक अंग्रेजी संस्करण भी बना था. अंग्रेजी में इसका शीर्षक था ‘द टाइगर एंड द फ्लेम. बता दें कि अंग्रेजी में डब करने के बजाय अलग से साथ में ही शूटिंग की गयी थी.इस वजह से फिल्म के सेट और शूटिंग पर भारी खर्च हुआ था.इस फिल्म की नायिका सोहराब मोदी की पत्नी महताब थीं.कहते हैं कि महताब रानी लक्ष्मीबाई की भूमिका में नहीं जंची थीं.उनकी उम्र किरदार की उम्र से ज्यादा लग रही थी.लिहाजा दर्शकों ने फिल्म नापसंद कर दी थी.हिंदी की पहली टेक्नीकलर फिल्म ‘झाँसी की रानी का अब सिर्फ श्वेत-श्याम प्रिंट ही बचा हुआ हैं.अध्येता बताते हैं कि अंग्रेजी संस्करण का टेक्नीकलर प्रिंट मौजूद है. इस फिल्म से सोहराब मोदी को बड़ा नुकसान हुआ.
फिर भी दो सालों के अन्दर सोहराब मोदी ने ‘मिर्ज़ा ग़ालिब का निर्माण और निर्देशन किया.किस्सा है कि पंडित जवाहरलाल नेहरु को एक साल जन्मदिन की बधाई देने पहुंचे सोहराब मोदी ने ग़ालिब का शेर सुनाया तुम सलामत रहो हज़ार बरस
हर बरस के दिन हों पचास हज़ार
नेहरु ने शायर का नाम पूछा और सोहराब मोदी से उनके ऊपर फिल्म बनाने की बात कही.सोहराब मोदी ने उनकी बात मान ली. भारत भूषण और सुरैया के साथ उन्होंने ‘मिर्ज़ा ग़ालिब बना डाली.इस फिल्म को पहला राष्ट्रपति पुरस्कार भी मिला.फिल्म में सुरैया ने ग़ालिब की ग़ज़लों को अपनी आवाज़ दी थी.जिन्हें सुन कर नेहरु ने सुरैया से कहा था,’आप ने तो मिर्ज़ा ग़ालिब की रूह को जिंदा कर दिया.’पुरस्कृत और प्रशंसित होने के बावजूद ‘मिर्ज़ा ग़ालिब नहीं चली थी.सोहराब मोदी इस उम्मीद में आगे फ़िल्में बनाते रहे कि किसी एक फिल्म के चलने से उनके स्टूडियो की गाड़ी पटरी पर आ जाएगी.ऐसा नहीं हो सका.एक दिन ऐसा आया कि मिनर्वा मूवीटोन बिक गया.
सोहराब मोदी ने बाद में ‘नौशेरवां-ए-एदिल’ और ‘यहूदी जैसी ऐतिहासिक फिल्मों का निर्माण किया.सोहराब मोदी हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के अकेले फ़िल्मकार हैं,जिन्होंने आज़ादी के पहले और बाद के सालों में ऐतिहासिक फिल्मों के निर्माण और निर्देशन पर जोर दिया.उनके समकालीनों ने छिटपुट रूप से ही इस विधा पर ध्यान दिया.
सामान्य उदासीनता के बावजूद
यह अध्ययन का विषय हो सकता है कि आज़ादी के बाद के सालों में ऐतिहासिक फिल्मों के प्रति क्यों उदासीनता रही? देश के आजाद होने के बाद राष्ट्र निर्माण की भावना से नयी कहानी लिखने-रचने का जोश कहीं न कहीं नेहरु के सपनों के भारत के मेल में था.नए दौर में फ़िल्मकार आत्म निर्भरता की चेतना से सामाजिक बदलाव की भी कहानियां लिख रहे थे.और जैसा कि हम ने पहले कहा कि देशभक्ति की भावना और राष्ट्रीय चेतना का फोकस बदल जाने से सामाजिक और पारिवारिक फिल्मों का चलन बढ़ा.प्रेम कहानियों में नायक-नायिका के बीच सामाजिक,आर्थिक और शहर-देहात का फर्क रखा गया.उनके मिलन की बाधाओं के ड्रामे में पुरानी धारणाओं और रुढियों को तोड़ने का प्रयास दिखा.प्रगतिशील और सेक्युलर समाज की चिंताएं फिल्मकारों की कोशिशों में जाहिर हो रही थीं.
कुछ फिल्मकारों ने मुग़लों और मराठों की कहानियों को दोहराया.ऐतिहासिक फिल्मों के सन्दर्भ में हम बार-बार उल्लेख कर रहे हैं कि फ़िल्मकार नयी कहानियों की तलाश में कम रहे हैं.आज़ादी के बाद के दौर में भी सलीम-अनारकली,जहाँगीर,शाहजहाँ आदि मुग़ल बादशाहों के महलों के आसपास ही हमारे फ़िल्मकार भटकते रहे.सलीम-अनारकली की काल्पनिक प्रेमकहानी पर पहले ‘अनारकली और फिर ‘मुग़लेआज़म’ जैसी मनोरंजक और भव्य फिल्म आई.’अनारकली में प्रदीप कुमार और बीना राय की जोड़ी थी.इस फिल्म में अकबर की भूमिका मुबारक ने निभाई थी.फिल्म के निर्देशक नन्दलाल जसवंतलाल थे. ‘मुग़लेआज़म’ में के आसिफ ने पृथ्वीराज कपूर,दिलीप कुमार और मधुबाला के साथ ऐसी कहानी रची कि फिर कोई इस कमाल के साथ इसे नहीं दोहरा सका.हाँ,तीन सालों के बाद ए के नाडियाडवाला ने ज़रूर एम सादिक के निर्देशन में प्रदीप कुमार और बीना राय के साथ ‘ताजमहल का निर्माण किया.साहिर लुधियानवी और रोशन की जोड़ी के रचे गीत-संगीत ने धूम मचा दी थी.एम् सादिक ने फिर प्रदीप कुमार और मीना कुमारी के साथ ‘नूरजहाँ का निर्देशन किया.इसके निर्माता शेख मुख़्तार थे.उन्होंने इस फिल्म में एक किरदार भी निभाया था.इस फिल्म के बाद शेख मुख़्तार फिल्म लेकर पाकिस्तान चले गए थे.भारत में यह फिल्म दर्शकों को अधिक पसंद नहीं आई थी,जबकि पाकिस्तान में यह फिल्म खूब चली.
समकालीन नायक और जीवनीपरक फ़िल्में
ऐतिहासिक फिल्मों के विस्तार के रूप में हम राजनेताओं पर बनी जीवनीपरक फिल्मों को देख सकते हैं.अभी बायोपिक फैशन में है.गौर करें तो बायोपिक की शुरुआत स्वतंत्रता सेनानियों पर बनी फिल्मों से होती है.आज़ादी के पहले प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से भी राजनेताओं का नाम लेना और उनके ऊपर फिल्म बनाना मुमकिन नहीं था.ब्रिटिश हुकूमत बर्दाश्त नहीं कर पाती थी.आज़ादी के बाद लोकमान्य तिलक,भगत सिंह,गाँधी,सुभाष चन्द्र बोस जैसे नेताओं पर फ़िल्में बनीं.आज़ादी के बाद 20वीं सदी के पांच दशकों में नौवें दशक में अनेक राजनेताओं पर फ़िल्में बनीं.रिचर्ड एटेनबरो की ‘गाँधी के निर्देशक भले ही विदेशी हों,लेकिन यह भारत सरकार के सहयोग से बनी फिल्म थी.’गाँधी(1982) और ‘मेकिंग ऑफ़ महात्मा(1996) एक साथ देख लें तो महात्मा गाँधी के जीवन और कार्य को आसानी से सम्पूर्णता में समझा जा सकता है.शहीदेआज़म भगत सिंह के जीवन पर बनी ‘शहीद ने बहुत खूबसूरती से किंवदंती बन चुके क्रान्तिकारी के जीवन को राष्ट्र धर्म और मर्म के सन्दर्भ में पेश किया.भगत सिंह की जन्म शताब्दी के समय 2002 में एक साथ अनेक फ़िल्में हिंदी और अन्य भाषाओँ में बनी.यहाँ तक कि राकेश ओमप्रकाश मेहरा की आमिर खान अभिनीत ‘रंग दे बसंती भी उनके जीवन से प्रेरित थी.
अन्य ऐतिहासिक फिल्मे
आज़ादी के बाद की अन्य ऐतिहासिक फिल्मों में हेमेश गुप्ता की ‘आनंद मठ(1952),केदार शर्मा की ‘नीलकमल(1947),सत्यजित राय की ‘शतरंज के खिलाडी(1977),लेख टंडन की ‘आम्रपाली(1966),एम् एस सथ्यू की ‘गर्म हवा(1974),श्याम बेनेगल की ‘जुनून’(1978),केतन मेहता की ‘सरदार(1993} आदि का उल्लेख आवश्यक होगा.इन फिल्मों के निर्देशकों ने समय की प्रवृतियों से अलग जाकर महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाओं पर काल्पनिक कथा बुनी या ऐतिहासिक प्रसंगों के सन्दर्भ के साथ उनका चित्रण किया.एक कमी तो खटकती है कि स्वाधीनता आन्दोलन,प्रथम स्वतंत्रता संग्राम,भारत-पाकिस्तान और भारत-चीन युद्ध,देश में चले सुधार आन्दोलन,किसानों और मजदूरों के अभियान और संघर्ष जैसे सामयिक विषयों पर फिल्मकारों ने ध्यान नहीं दिया.देश के विभाजन की राजनीतिक और मार्मिक कथा भी नहीं कही गयी.हम अपने अतीत के यथार्थ से भागते रहे.हिंदी फ़िल्में और कमोबेश सभी भारतीय फ़िल्में मुख्य रूप से ख्याली दुनिया में ही उलझी रहीं.अर्द्धसामन्ती देश में प्रेम कहानियां भी एक तरह से विद्रोह की ही दास्तानें हैं,लेकिन फिल्मों में इसकी अति दिखाई पड़ती है.
21वीं सदी में अलबत्ता अनेक ऐतिहासिक फ़िल्में बनती हैं.साधन और सुविधा के साथ भव्यता की चाहत ने फिल्मकारों को ऐतिहासिक फिल्मों के लिए प्रेरित किया है.पिछले दो सालों में अनेक फ़िल्में प्रदर्शित हुई हैं और अभी कुछ ऐतिहासिक फिल्मों के निर्माण में लोकप्रिय और बड़े बैनर संलग्न हैं.

 
प्रसंग  
पारसी परिवार में जन्मे सोहराब मोदी का बचपन मुंबई की पारसी कॉलोनी में बीता था.किशोर उम्र में वे अपने पिता के साथ उत्तर प्रदेश के रामपुर चले गए थे.उनके पिता रामपुर के राजा के मुलाजिम थे.सोहराब मोदी का मन पढ़ाई-लिखाई में अधिक नहीं लगता था.खास कर इतिहास में वे फिसड्डी थे.शिक्षकों ने कई बार उनके पिता को उलाहना भी दिया था.सोहराब का मन खेल और कसरत में अधिक लगता था.14-15 की उम्र में सोहराब को रंगमंच का शौक चढ़ा और वे शेक्सपियर के नाटक करने लगे,उनके भाई रुस्तम भी उनका साथ देते थे.विडम्बना देखें कि इतिहास की पढाई में कमज़ोर सोहराब मोदी भविष्य में ऐतिहासिक फिल्मों के बड़े फ़िल्मकार हुए.उन्होंने अनेक ऐतिहासिक फिल्मों का निर्माण और निर्देशन किया.उन्होंने एक बार कहा था,’हिंदी फिल्मों में प्रवेश करने के बाद मैंने ध्यान से इतिहास पढ़ना आरम्भ किया.फिर एहसास हुआ कि इतिहास में कितना ज्ञान छिपा है.अगर हम ऐतिहासिक व्यक्तियों के जीवन का अनुसरण करें और उनसे शिक्षा लें तो हम अपना जीवन बदल सकते हैं.मुझे लगा कि मेरी तरह अनेक छात्र इतिहास पढ़ने में रूचि नहीं रखते होंगे.क्यों न उन सभी के लिए ऐतिहासिक फिल्मों का निर्माण करूं? इन फिल्मों से उनकी इतिहास की समझदारी बढ़ेगी और वे इतिहास के सबक से अपना भविष्य संवार सकेंगे.

सिनेमालोक : लोकप्रियता का नया पैमाना


सिनेमालोक
लोकप्रियता का नया पैमाना
-अजय ब्रह्मात्मज
सोशल मीडिया के विस्तार से फिल्मों के प्रचार को नए प्लेटफार्म मिल गए हैं.फेसबुक,इंस्टाग्राम,ट्विटर और यूट्यूब....सोशल मीडिया के चरों प्लेटफार्म किसी भी फिल्म के प्रचार के लिए मह्त्वपूर्ण हो गए हैं.उनके लिए खास रणनीति अपनाई जा रही है.कोशिश हो रही है कि ज्यादा से ज्यादा यूजर और व्यूअर इन प्लेटफार्म पर आयें.जितनी ज्याद तादाद,निर्माता-निर्देशक और स्टार की उतनी बड़ी संतुष्टि.आरंभिक ख़ुशी तो मिल ही जाती है.ख़ुशी होती है तो जोश बढ़ता है और फिल्म के प्रति उत्सूकता घनी होती है.इन दिनों फिल्मों की कमाई और कामयाबी के लिए वीकेंड के तीन दिन ही थर्मामीटर हो गए हैं.वीकेंड के तीन दिन के कलेक्शन से पता चल जाता है कि फिल्म का लाइफ टाइम बिज़नस क्या होगा?शायद ही कोई फिल्म सोमवार के बाद नए सिरे से दर्शकों को आकर्षित कर पा रही है.
पिछले हफ्ते ‘जीरो’ और ‘2.0’ के ट्रेलर जारी हुए.मुंबई के आईमैक्स वदला में प्रशंसकों और मीडिया के बीच ट्रेलर जरी कर निर्देश आनद एल राय ने अपने स्टार श रुख खान,अनुष्का शर्मा और कट्रीना कैफ के साथ मीडिया को संबोधित किया.मुख्या रूप से शाह रुख खान से ही सवाल किये जा रहे थे और वही जवाब भी दे रहे थे.निर्माता-निर्देशक ने फिल्म की कथाभूमि मेरठ का फील देने के लिए वहां के घंटाघर का कटआउट लगाया था.मेरठ के स्वाद की भी व्यवस्था की गयी थी.इन आकर्षणों के साथ शाह रुख खान का जन्मदिन भी था.लिहाजा ट्रेलर के यूट्यूब पर आते ही दर्शक और प्रशंसक टूट पड़े.दूसरी तरफ रजनीकांत और निर्देशक शंकर की टीम ने ‘2.0 के ट्रेलर लांच का आयोजन चेन्नई में किया था.मुंबई से अक्षय कुमार भी वहां गए थे.’2.0 मूल रूप से तमिल फिल्म है.इसे हिंदी समेत अन्य भाषाओँ में भी डब किया गया है.ट्रेलर भी अनेक भाषाओँ में यूट्यूब पर चल रहे हैं.दोनोंओ ही फिल्मों के त्रलेर के व्यूअर की संख्या करोड़ों में पहुँच चुकी है और अभी गिनती जारी है.
‘जीरो के बारे में तो अनुमान था कि इसे दर्शकों का प्यार मिलेगा.बौने शाह रुख खान के तेवर और अंदाज को सभी देखना चाहते थे.निर्माता-निर्देशक ने ट्रेलर में कुछ छिपाया नहीं है.खास कर तीनों प्रमुख किरदारों के बारे में बता दिया है.बऊआ का खिलंदड़ा और आक्रामक अंदाज पसंद आ रहा है.बऊआ ग्रंथिहीन हीरो है.उसे अपने अधूरेपन का कोई रंज नहीं है.वह मस्त रहता है और किसी के साथ भी जुड़ कर उसकी ज़िन्दगी बदल देता है.देखते ही देखते ‘जीरो के ट्रेलर के व्यूअर की संख्या करोड़ों में पहुँच गयी.’2.0 का भी यही हाल रहा.उसके व्यूअर भाषाओँ की वजह से बंट गए.इन दोनों के पहले आये ‘ठग्स ऑफ़ हिन्दोस्तान के ट्रेलर के व्यूअर की संख्या 8 करोड़ पार कर चुकी है.क्या ये सभी इन फिल्मों के दर्शक भी होंगे?
फिल्मों के ट्रेलर के व्यूअर दर्शक में तब्दील हो पते हैं क्या?इसे मापने का अभी तक कोई सूत्र विकसित नहीं हुआ है.पिछली कुछ फिल्मों के ट्रेलर ने भी यूट्यूब पर आग लगा दी थी,लेकिन बॉक्स ऑफिस तक उस आग की गर्मी नहीं पहुंची.मीडिया के विशेषज्ञ मानते हैं कि यूट्यूब के व्यूअर और थिएटर के दर्शक अलग होते हैं.यूँ समझें कि किसी भी मॉल में रोजाना फूटफॉल हजारों और लाखों में होता है,लेकिन वास्तविक खरीददारों की संख्या उनके अनुपात में बहुत कम होती है.यही हाल व्यूअर और दर्शक के बीच के गैप में नज़र आता है.
फिर भी यूट्यूब फिल्मों की प्रति उत्सुकता और लोकप्रियता का नया पैमाना बन गया है.उसके विशेषज्ञ आ गए हैं.ट्रेलर के व्यूअर जुटाने के लिए भी ऐड दिए जाते है.उन्हें बूस्ट किया जाता है.व्यूअर की संख्या के खोखलेपन को समझते हुए भी निर्माता-निर्देशक उन तरकीबों और रणनीतियों के मद में भारी राशि खर्च कर रहे हैं.मीडिया के इन्फ़्लुऐंसर की भी मदद ली जा रही है.देखें तो सोशल मीडिया और खास कर यूट्यूब नया मैदान-ए-जंग बना हुआ है.लोकप्रियता की पहली झड़प यहाँ जीतनी होती है.

Sunday, November 4, 2018

आयुष्मान खुराना : रुपहले परदे के राहुल द्रविड़


आयुष्मान खुराना : रुपहले परदे के राहुल द्रविड़ 
-अजय ब्रह्मात्मज

क्रिकेट और फिल्म में अनायास रिकॉर्ड बनते हैं.अचानक कोई खिलाडी या एक्टर उभरता है और अपने नियमित प्रदर्शन से ही नया रिकॉर्ड बना जाता है.अक्टूबर का महीना हमें चौंका गया है.आयुष्मान खुराना की दो फ़िल्में 15 दिनों के अंतराल पर रिलीज हुईं और दोनों फिल्मों ने अच्छा प्रदर्शन किया.दोनों ने बॉक्स ऑफिस पर बेहतर परफॉर्म किया और आयुष्मान खुराना को एक्टर से स्टार की कतार में ला खडा किया.पिछले शनिवार को उनकी ताज़ा फिल्म ‘बधाई हो ने 8.15 करोड़ का कलेक्शन किया.यह आंकड़ा ‘बधाई हो के पहले दिन के कलेक्शन से भी ज्यादा है,जबकि यह दूसरा शनिवार था.लोकप्रिय स्टार की फ़िल्में भी दूसरे हफ्ते के वीकेंड तक आते-आते दम तोड़ देती हैं.इस लिहाज से आयुष्मान खुराना ‘अंधाधुन और ‘बधाई हो की कामयाबी से भरोसेमंद एक्टर-स्टार की श्रेणी में आ गए हैं.

गौर करने वाली बात है कि ‘बधाई हो अर्जुन कपूर और परिणीति चोपड़ा की ‘नमस्ते इंग्लैंड के साथ रिलीज हुई थी.विपुल शाह निर्देशित यह फिल्म ‘नमस्ते लंदन की कड़ी में पंजाब की पृष्ठभूमि की कहानी थी.स्वाभाविक तौर पर माना जा रहा था कि यह फिल्म अच्छा कारोबार करेगी.आजमाए हुए सफल फार्मुले की ‘नमस्ते इंग्लैंड के सामने ‘बधाई हो जैसी ‘आउटऑफ़ बॉक्स फिल्म थी.’बधाई हो के कलाकारों की स्टार वैल्यू ‘नमस्ते इंग्लैंड के कलाकारों से कम और कमज़ोर थी.फिर भी दर्शकों के रुझान से पहले ही दिन जाहिर हो गया कि पंजाब की देखी-सुनी कहानी से वे विरक्त हैं.उन्होंने ‘बधाई हो को पसंद किया और उमड़ कर सिनेमाघरों में पहुंचे.और अभी तक जा रहे हैं.

आज बासु चटर्जी,हृषीकेश मुखर्जी,सई परांजपे आदि डायरेक्टर एक्टिव होते तो अमोल पालेकर और फारुख शेख की तरह आयुष्मान खुराना उनके पसंदीदा एक्टर-स्टार होते.यह भी हो सकता था कि कुछ अनोखी कहानियां लिखी जातीं.आयुष्मान खुराना ने फिल्मों के चुनाव से यह स्पष्ट संकेत दिया है कि वे अपारंपरिक हीरो की भूमिका निभाने के लिए तैयार और सक्षम हैं.उनकी पहली फिल्म ‘विकी डोनर’ स्पर्म डोनेशन के अनोखे विषय पर बनी रोचक फिल्म थी.शूजित सरकार की इस फिल्म को दूसरे अभिनेताओं ने ठुकरा दिया था.फिल्म इंडस्ट्री के रिवाज से किसी भी नए एक्टर के लिए ऐसा विषय चुनना पूरी तरह से जोखिम का काम था,लेकिन शूजित सरकार के सधे हाथों और पैनी नज़र से यह फिल्म मानवीय संवेदना के अनछुए पहलू को लेकर आई.आयुष्मान खुराना,अन्नू कपूर और अन्य सहयोगी कलाकारों ने इसे फूहड़ और साधारण होने से बचा लिया.दर्शक फिल्म देखते हुए आनंदित हुए.

हाल ही में राष्टीय पुरस्कारों से सम्मानित और प्रशंसित एक्टर मनोज बाजपेयी से इधर तेज़ी से उभरे तीन अभिनेताओं राजकुमार राव,विकी कौशल और आयुष्मान खुराना की मौजूदगी पर बात हो रही थी.उन्होंने आयुष्मान खुराना के बारे में मार्के की बात कही.उनके मुताबिक,’ आयुष्मान खुराना का दिल और दिमाग सही जगह पर है.वह इंटेलीजेंट एक्टर हैं.उन्होंने अपना स्ट्रेंग्थ जान लिया है.वह फिल्मों के राहुल द्रविड़ हैं.वह खेलते रहेंगे.’ किसी सीनियर अभिनेता का यह ऑब्जरवेशन गौरतलब है.आयुष्मान खुराना मामूली विफलताओं के बावजूद समय बीतने के साथ लोकप्रियता और स्वीकृति की सीढियां चढ़ते गए हैं.’विकी डोनर के बाद उनसे भी ‘बेवकूफियां हुई हैं.’बेवकूफियां,’नौटंकी साला और ‘हवाईजादा’ उनकी कमज़ोर फ़िल्में रहीं.उन्होंने 2016 में आई ‘दम लगा के हईसा से बताया कि अपनी असफलता से वह बेदम नहीं हुए हैं.इस फिल्म में प्रेम प्रकाश तिवारी जैसे फेलियर और ग्रंथिपूर्ण किरदार को वह पूरी संजीदगी और प्रभाव के साथ जीते हैं.इस फिल्म के बाद उनके चढ़ते कदम अभी तक नहीं लड़खड़ायें हैं.2017 में ‘बरेली की बर्फी और ‘शुभ मंगल सावधान की कामयाबी से ‘मेरी प्यारी बिंदु को गौण कर दिया.उनके प्रशंसकों को उस फिल्म का नाम याद भी नहीं होगा.

हिंदी फिल्मों के इतिहास में हर अभिनेता को कुछ साल ऐसे मिलते हैं,जब उसकी जबरदस्त स्वीकृति रहती है.इस दौर में उसके उन्नीस-बीस परफॉरमेंस को दर्शक-प्रशंसक नज़रअंदाज कर देते हैं.वे किसी प्रेमी/प्रेमिका की तरह अपने प्रिय स्टार की मामूली चूकों पर ध्यान नहीं देते. आयुष्मान खुराना का अभी ऐसा ही वक़्त चल रहा है. अगर उनकी फिल्मों के विषय देखें तो हम पाते हैं कि अपनी अधिकांश फिल्मों में आयुष्मान खुराना पारंपरिक नायक नहीं होते.वे मध्यवर्गीय परिवारों के औसत युवक होते हैं,जो कभी शारीरिक तो कभी पारिवारिक उलझनों में फंसा है.वह उनसे निबटने का कोई ‘ओवर द टॉप’ या अतिरंजित युक्ति नहीं अपनाता.उसमें हिंदी फिल्मों के नियमित नायकों की अविश्वसनीय शक्तियां नहीं रहतीं.अपनी नायिकाओं के साथ उसकी गलतफहमियां चलती रहती हैं.आयुष्मान खुराना की फिल्मों की नायिकाएं दमदार और स्वतंत्र व्यक्तित्व की होती हैं.वे शरमाती या सिफोन की साड़ियाँ लहराती उसके पास नहीं आतीं.वे कामकाजी भी होती हैं.ऐसी नायिकाओं के साथ नायक के प्रेम संबंध दिखाने के लिए लेखकों और निर्देशकों को भी मशक्कत करनी पड़ती है.और फिर आयुष्मान खुराना अपनी सामान्य कद-काठी से उन नायकों को सहज भाव-भंगिमा देते हैं.आयुष्मान अपनी फिल्मों में अधिक नाटकीय या हाइपर नहीं दिखते.’बरेली की बर्फी में उनका किरदार आक्रामक और चालाक था,लेकिन अपनी मासूमियत से वह ठगा भी जाता है.उस फिल्म में तो राजकुमार राव अपने दोरंगी किरदार से दर्शकों के चहेते बन गए थे और आयुष्मान खुराना से लाइमलाइट छीन ली थी.

आयुष्मान खुराना ने पिछले छह सालों में खुद की मेहनत और दर्शकों के प्रेम से यह ऊंचाई हासिल की है.शादीशुदा आयुष्मान खुराना एक समझदार और सहयोगी पति की छवि पेश करते हैं और पारिवारिक गरिमा का पालन करते हैं.वे गायक,कवि और लेखक भी हैं.कहीं न कहीं माँ से उन्हें सारी सृजनात्मकता मिली है.अभिनय कौशल पर उनकी किताब आ चुकी है.और खबर है कि वे जल्दी ही अपनी कविताओं का संग्रह प्रकाशित करना चाहते हैं.सफलता के साथ हर एक्टर-स्टार के आसपास एक हुजूम खड़ा हो जाता है.शुभचिंतक बना यह हुजूम स्टार को खास दिशा में ले जाना चाहता है और शीर्ष पर ले जाने का भुलावा देकर ग्लैमर की गलियों में भटका भी देता है.बस,आयुष्मान खुराना सावधान रहें और बहके नहीं तो उनकी पारी राहुल द्रविड़ की तरह मजबूत और यादगार होगी.