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Wednesday, October 31, 2018

सिनेमालोक : मुंबई में फिल्मों की फुहार


सिनेमालोक
मुंबई में फिल्मों की फुहार  
-अजय ब्रह्मात्मज
मुंबई में इन दिनों फिल्मों की बहार है.खास कर पश्चिमी उपनगर के तीन मल्टीप्लेक्स में चल रही फिल्मों की फुहार से सिनेप्रेमी भीग रहे हैं. वे सिक्त हो रहे हैं.देश-विदेश से लायी गयी चुनिन्दा फिम्लें देखने के लिए उमड़ी दर्शकों की भीड़ आश्वस्त करती है कि इन्टरनेट प्रसार के बाद फिल्मों की ऑन लाइन उपलब्धता के बावजूद दर्शक सिनेमाघरों के स्क्रीन पर फ़िल्में देखना पसंद करते हैं.फेस्टिवल सिनेमा का सामूहिक उत्सव है.दर्शकों को मौका मिलता है कि वे अपनी रिची और पसंद के मुताबिक फ़िल्में देखें और सह्दर्शक के साथ उस पर बातचीत करें.ज्यादातर नयी फिल्मों के निर्माता,निर्देशक और कलाकार फिल्मों के प्रदर्शन के बाद दर्शकों से मुखातिब होते हैं. वे उनकी जिज्ञासाओं के जवाब देते हैं.यह सुखद अनुभव होता है.फेस्टिवल के मास्टरक्लास से अंतर्दृष्टि मिलती है और विमर्शों से सिनेमहौल की दिशा और दृष्टि मिलती है.
देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु ने आज़ादी के बाद देश में विभिन्न कला माध्यमों के विकास के लिए अनेक संस्थाओं का गठन किया,जिनके तहत कला चेतना के विकास के लिए गतिविधियाँ आयोजित की गईं.उनमें से एक महत्वपूर्ण गतिविधि इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल का आयोजन था.1952 में पहला फिल्म फेस्टिवल आयोजित किया गया था,जिसमें सिर्फ 23 देशों की फ़िल्में आ सकी थीं.इस साल ख़बरों के अनुसार 100 से अधिक देशों की फ़िल्में प्रदर्शित होंगीं.पिछले अनेक सालों से यह फेस्टिवल अब गोवा में आयोजित होने लगा है.फिल्म फेस्टिवल के प्रति सूचना और प्रसारण मंत्रालय की बेरुखी और फिल्म निदेशालय की नौकरशाही से यह फिल्म फेस्टिवल अपनी गरिमा खो चुका है. देश के दूसरे शहरों में ज्यादा सुगठित और सुविचारित फिल्म फेस्टिवल हो रहे हैं.दर्शक अपने आसपास के शहरों के फेस्टिवल में शिरकत कर लेते हैं.देखा यह जा रहा है कि सभी फेस्टिवल में 60 से 70 प्रतिशत फ़िल्में एक सी होती हैं.दुनिया भर से चर्चित 200 फिल्मों से ही सभी काम चलाते हैं.ऐसी स्थिति में हर फेस्टिवल में जाना ज़रूरी नहीं रह जाता.अब समय आ गया है कि ये फेस्टिवल सोच-विचार का भिन्नता जाहिर करें.तात्पर्य यह की सभी फेस्टिवल की अपनी खासियत हो.मुंबई में इस तरह के कुछ आयोजन इधर पॉपुलर हुए हैं.
मुंबई का फिल्म फेस्टिवल मुंबई अकादमी ऑफ़ मूविंग इमेजेज(मामी) के तहत आयोजित होता है.श्याम बेनेगल के नेतृत्व में इसकी शुरुआत इस उद्देश्य के साथ की गयी थी कि फिल्म इंडस्ट्री का एक अपना फेस्टिवल हो,जिसमें इंडस्ट्री के कलाकार और तकनीशियन भी शामिल हो सकें.साथ ही हिंदी फिल्मों की केन्द्रीय नगरी होने की वजह से भी मुंबई में ऐसे फेस्टिवल की आवश्यकता महसूस की जाने लगी थी.आरंभिक वर्षों में महराष्ट्र सर्कार ने भी इस फेस्टिवल की मदद की.फिर अंबानी बंधुओं ने बारी-बारी से इस फेस्टिवल के लिए आवश्यक धन प्रदान किये.अभी यह फेस्टिवल जियो और स्टार के सहयोग से संचालित हो रहा है.
अनुपमा चोपड़ा और किरण राव के नेत्रित्व में मामी फिल्म फेस्टिवल अधिक पॉपुलर और व्यापक हुआ है.अनुपमा चोपड़ा फ़िल्मकार विधु विनोद चोपड़ा की पत्नी हैं और किरण राव फिल्म स्टार आमिर खान की पत्नी हैं.दोनों की पृष्ठभूमि और पहुँच से फिल्म फेस्टिवल में लोकप्रिय चेहरों की मौजूदगी बढी.आम दर्शक भी खींचे आये.इस साल तो दर्शकों और डेलिगेट की भागीदारी इतनी ज्यादा हो गयी है कि पहले दिन टिकट बुक करने की ऑन लाइन व्यवस्था कुछ घंटों के लिए बैठ गयी.बाद में स्थिति सुधरी तो भी दर्शकों को मनपसंद फ़िल्में चुनने और देखने में भी दिक्कतें हो रही हैं.बढती भीड़ और भागीदारी को देखते हुए फेस्टिवल के नियंताओं को नयी तरकीब खोजनी पड़ेगी या मल्टीप्लेक्स की संख्या बढानी पड़ेगी.
सीमाओं और कमियों के बावजूद मामी फिल्म फेस्टिवल देश का अग्रणी फिल्म फेस्टिवल बन चूका है.यह लोकतान्त्रिक,मुखर और उदार फेस्टिवल है.गोवा का सरकारी फिल्म फेस्टिवल सरकारी सोच की संकीर्णता का शिकार है.नयी सरकार के नुमाइंदों ने अपने खेमे के अयोग्य लोगों को ज़िम्मेदारी देकर इस फेस्टिवल का स्वरुप नष्ट कर दिया है.पिछले साल के आयोजन की कमियां फेस्टिवल के दौरान ही उजागर हो गयी थीं.इस साल सिनेप्रेमियों का उत्साह नज़र नहीं आ रहा है.



Friday, October 26, 2018

मी टू से मची खलबली


मी टू से मची खलबली
अजय ब्रह्मात्मज

भविष्य में भारत के सामाजिक इतिहास में 2018 का अक्टूबर महीना #MeToo अभियान के लिए याद किया जायेगा. मुख्य रूप से कार्यस्थल पर यौन शोषण और उत्पीडन की शिकायतों को समेटते इस अभियान को पहले सोशल मीडिया और फिर ट्रेडिशनल मीडिया से भरपूर समर्थन मिला.सोशल मीडिया पर इससे संबंधित हर अपडेट को पात्र-पत्रिकाओं ने सुर्ख़ियों में छापा.ज्यादा तफसील और तहकीकात की कोशिश नहीं की गयी.हाँ,हर नए उद्घाटन के साथ सार्वजानिक शर्मिंदगी ज़रूर हुई.कुछ मामलों में आरोपियों को उनकी तात्कालिक ज़िम्मेदारी और कार्य से अलग कर दिया गया.कुछ शिकायतों की जांच चल रही है.कयास लगाये जा रहे हैं कि जल्दी ही कोई फैसला लिया जायेगा.आरोप और इंकार के गुंफित महौल अभी स्पष्टता नहीं है कि न्यायालय भारतीय दंड संहिता की किस धारा में इन मामलों का निबटान करे.महिला और बाल विकास मंत्रालय ने अवश्य कुछ सालों पहले 2013 में ‘महिलाओं का कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीडन (निवारण,प्रतिषेध और प्रतितोष) अधिनयम ‘ जरी किया था. इस अधिनियम के मुताबिक सभी कार्यस्थलों पर लैंगिक उत्पीडन की शिकायतों को सुलझाने के लिए आतंरिक समिति के गठन की अनिवार्यता तय की गयी थी.इस साल जब कुछ शिकायतें प्रकाश में आईं तो पता चला कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की चंद कंपनियों ने ही इसका पालन किया था.

इसी महीने ज़ूम को दिए एक वीडियो इंटरव्यू में तनुश्री दत्ता ने बताया कि ‘हॉर्न ओके प्लीज के सेट पर एक डांस सीक्वेंस की शूटिंग के समय नाना पाटेकर ने उनके साथ बदतमीजी की. तनुश्री ने जब सेट पर मौजूद निर्माता सामी सिद्दीकी,निर्देशक राकेश सारंग और कोरियोग्राफर से इसका ज़िक्र किया और नाना को सेट से हटाने की मांग की तो उन्होंने तनुश्री की मांग नहीं सुनी.मजबूरन तनुश्री को सेट छोड़ कर जाना पड़ा.तनुश्री ने पुलिस में शिकायत दर्ज की तो एफ़आईआर में बदतमीजी(यौन उत्पीडन) का उल्लेख नहीं किया गया. 2008 में यह मामला दब गया.प्रतिकूल स्थितियों में तनुश्री को फिल्म इंडस्ट्री छोडनी पड़ी. 10 सालों के बाद तनुश्री ने इस मामले को फिर से उठाया तो पहले कोई खास सुगबुगाहट नहीं दिखी,लेकी इस बार सोशल मीडिया और कुछ सितारों ने तनुश्री से हमदर्दी दिखाई.उन्होंने तनुश्री की शिकायतों पर गौर करने की अपील की.इसी समय फैंटम के एक निदेशक विकास बहल के मामला प्रकाशित हुआ.उन्होंने फैंटम की फिल्म ‘बॉम्बे वेलवेट के गोवा इवेंट के समय एक महिला सहयोगी के साथ बदतमीजी की थी.एक वेब पोर्टल में आई विस्तृत रिपोर्ट के बाद आनन्-फानन में फैंटम का विलयन हो गया और विकास बहल सवालों के घेरे में आ गए.इन दोनों मामलों की ख़बरों और चर्चा के साथ ही आमिर खान का बयां आया कि वे निर्माणाधीन फिल्म ‘मुग़ल से खुद को अलग कर रहे हैं.फिल्म के निर्देशक पर यौन उत्पीडन का आरोप है,जो अभी न्यायालय के अधीन है.इसके बाद तो झड़ी लग गयी.हर दिन किसी न किसी पुरुष सेलिब्रिटी पर अभियोग और आरोप लगा.मीडिया ने खबरें छापीं.तत्काल प्रभाव से संबंधित व्यक्ति की छवि धूमिल हुई और उसे सार्वजानिक शर्मिदगी से गुजरना पड़ा.अभी तक दर्जन से अधिक नामों पर आरोप लग चुके हैं.ज्यादातर आरोपियों ने खुद को दोषमुक्त कहा है.कुछ ही मामलों में जांच या कारर्वाई हो पाई है.बाकी सारे मामले हवा में तैर रहे हैं.सभी चुस्की लेकर उन्हें सुना-बता रहे हैं.निदान या समाधान की किसी को चिंता नहीं है.मी टू विवादों में जिनके नाम आ गए हैं,वे अपनी सामाजिक छवि और शोहरत के साथ भविष्य के काम को लेकर थोड़े चिंतित ज़रूर हैं.यूँ लग रहा है कि उनका सामाजिक बहिष्कार हो चुका है.एक तबका यह भी पूछ रहा है कि आरोप साबित हो जाने पर क्या सजा होगी और फिर सजा काट लेने के बाद पुनर्वसन कैसे होगी?ढेर सारे प्रश्न अनुत्तरित हैं.

हिंदी फिल्म इंडस्ट्री समेत भारतीय समाज की बात करें तो सभी जानते हैं कि पितृसत्तात्मक अर्धसामंती और अविकसित पूंजीवादी मूल्यों से संचालित भारतीय समाज में स्त्री-पुरूष को सामान अधिकार नहीं मिले हुए हैं.घर,समाज और कार्यस्थल पर महिलाओं के साथ अन्याय होता है.उनका शोषण एक स्थापित तथ्य और सत्य है.भारतीय संविधान के तहत समानता के अधिकार के आश्वासन के बावजूद महिलाओं को अवसर,पारिश्रमिक और अधिकारों के लिए जूझना पड़ता है.व्यवहारिक तौर पर उन्हें दोयम दर्जे का समझा जाता है.हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की बात करें तो चमक और ग्लैमर के बावजूद कमरे के आगे-पीछे काम करने वाली महिलाओं की अच्छी स्थिति नहीं है.पहले तो उन्हें मौके ही नहीं मिलते थे.एक अभिनय के अलावा किसी और विभाग के लिए उन्हें काबिल नहीं समझा जाता था.फिल्मों की शुरूआत के दिनों में महिलाएं अभिनय के लिए भी नहीं मिल पाती थीं.दादा साहेब फाल्के ने तो मजबूरी में महिला चरित्रों के लिए भी पुरूष अभिनेताओं को ही चुना.बाद में कोठेवालियों.रेड लाइट एरिया के सेक्स वर्करों और एंग्लो-इंडियन परिवारों की महिलाओं को आकृष्ट किया गया.धीरे-धीरे पहले मुस्लिम और फिर हिन्दू परिवारों की लड़कियों ने फिल्मों में कदम रखा.फिल्मों में उनके चुनाव(कास्टिंग की प्रक्रिया) को लेकर किस्से बताये जाते रहे हैं.आज भी कास्टिंग काउच अहम् मसला है.माना जाता है और कुछ हद तक इसमें सच्चाई भी है कि अधिकांश लड़कियों को रोल पाने के लिए समझौते करने पड़ते हैं.पुरुषों का एक तबका तर्क देता है कि लड़कियों को जबरन बिस्तर या काउच तक नहीं ले जाया जाता.वे खुद तैयार होती हैं.सवाल है कि वे आखिर क्यों तैयार होती हैं...उनकी सहमती और स्वीकृति के दबाव और मजबूरी को समझना होगा.नासमझी में सरोज खान जैसी अनुभवी कोरियोग्राफर तर्क गढ़ लेती हैं कि इन सबके बावजूद फिल्म इंडस्ट्री के लोग काम तो देते हैं.यह अजीब से संतुष्टि है.समझौतों से करियर में शीर्ष तक पहुंची महिलाएं इस संतुष्टि भाव से ही ग्लानी से बहार आ जाती हैं और अपनी समृधि और लोकप्रियता के मज़े लेने लगती हैं.फिल्मों में अभिनेत्रियोंकी स्थिति की वास्तविकता इस तथ्य से भी समझी जा सकती है कि स्थापित फ़िल्मी हस्तियाँ अपनी बेटियों को फिल्मों में आने से रोकती और हतोसाहित करती हैं.फ़िल्मी परिवारों से आई ज्यादातर अभिनेत्रियों की माताओं ने उन्हें सपोर्ट किया है.इस सन्दर्भ में अनेक अभिनेत्रियों के नाम गिनाये जा सकते हैं.

ताज़ा मी टू अभियान में अभी तक कोई भी बड़ा नाम सामने नहीं आया है.लोकप्रिय अभिनेता और निर्देशक भी दूध के धुले नहीं हैं.बड़े नामों में एक सुभाष घई का ज़िक्र आया है.वे सिरे से खुद पर लगे आरोप ख़ारिज कर रहे हैं.कंगना रनोट ने विकास बहल के बारे में सुविधा देख कर पुरानी बातें बता दिन,उनके साथ शोषण के दूसरे किस्से भी हैं.उनमें कुछ बड़े नाम भी हो सकते हैं.फ़िलहाल कंगना ने उनका उल्लेख नहीं किया है.निजी बातचीत में अनेक आउटसाइडर अभिनेत्रियां ऑफ द रिकॉर्ड अनेक निर्देशकों और कास्टिंग डायरेक्टरों के इशारों और सजेशन के बारे में बताती हैं.वे डरती नहीं हैं,लेकिन अलग-थलग कर दिए जाने और काम न दिए जाने के खौफ से घबरा जाती हैं.ऐसी अनेक अभिनेत्रियों ने बड़े अवसर छोड़े.वे खुद दूसरी अभिनेत्रियों की सफलता की सीढ़ियों के तौर पर काम आए अभिनेताओं और निर्देशकों के नाम तक बेहिचक बता देती हैं.यह भी बताती हैं कि किस अभिनेता ने किस नवोदिता को क्यों काम दिलवाया? ‘क्यों का एक ही अर्थ होता है...सहवास.अभी यह कहा जा रहा कि स्थिति में कुछ सुधार होगा.लड़कियां इज्ज़त के साथ अभिनेत्रियाँ बन सकेंगी.यह सिर्फ एक उम्मीद भर है.कहा तो यह भी जा रहा है कि अब लड़कियों के लिए काम और अवसर पाना ‘टफ हो जायेगा.

अच्छी बात यह हुई है कि पुरुष डरे हुए हैं.उन्हें डर है कि न जाने कब उनकी करतूतों का पर्दाफाश हो जाये.उन्हें डर है कि कब उनकी किसी हरकत पर शोर मच जाये.उन्हें डर है कि पॉवर और पौरुष का प्रभाव ख़त्म हो जायेगा.और लड़कियां जागरूक हुई हैं.परस्पर ज़रूरतें बनी रहेगीं,लेकिन कोई जबरन फायदा उठाने या मजबूर करने की कोशिश करेगा तो आवाज़ उठेगी.खलबली सी मची और हर खलबली यथास्थिति बदल देती है.
यहाँ प्रकाशित हुआ था 

Tuesday, October 23, 2018

फिल्म लॉन्ड्री : भारत में भी लाहौरी ही रहे प्राण नेविले


फिल्म लॉन्ड्री
भारत में भी लाहौरी ही रहे प्राण नेविले
-अजय ब्रह्मात्मज
प्राण नेविले से मेरा परिचय सबसे पहले ट्विटर के जरिए हुआ.पार्टीशन म्यूजियम के एक अपडेट में मुझे प्राण नेविले का छोटा विडियो दिखा.उस विडियो में वे लाहौर में 1941 में बनी फिल्म ‘खजांची का ज़िक्र कर रहे थे.इस फिल्म ने पूरे देश में हंगामा मचा दिया था.यह अविभाजित भारत की बात है.तब लाहौर भारत का हिस्सा था.उसे ‘पूर्व का पेरिस’ कहा जाता था. अविभाजित भारत में कलकत्ता और बॉम्बे के अलावा लाहौर में भी फिल्म निर्माण की गतिविधियाँ आरम्भ हो चुकी थीं.कलकत्ता और बॉम्बे की तुलना में निर्माण की संख्या और क्वालिटी के हिसाब से लाहौर की फ़िल्में कम और कमतर थीं.हालांकि लाहौर से निकले अभिनेता,अभिनेत्री,गायक और निर्देशक देश भर में अपनी प्रतिभा और कामयाबी से खास जगह बना रहे थे,लेकिन लाहौर में निर्मित फ़िल्में कमाई और कामयाबी में पिछड़ जाती थीं. निर्माता दलसुख पंचोली और निर्देशक मोती बी गिडवानी की फिल्म ‘खजांची की नायिका रमोला थीं.इस फिल्म के एक गीत में रमोला ‘सावन के नज़ारे हैं गाती सहेलियों के साथ साइकिल पर सवार हैं.उनका दुपट्टा लहरा रहा है.प्राण नेविले बता रहे थे कि इस गीत की वजह से ‘खजांची को आधुनिक फिल्म कहा गया था,जिसमें आजाद ख्याल नायिका फिल्म के नायक की तरह साइकिल चला रही थी और बेफिक्र अंदाज में गाना गा रही थी.आज़ादी और विभाजन के पहले की इस फिल्म ने हिंदी सिनेमा पर दूरगामी प्रभाव डाला.
‘खजांची की रिलीज के समय प्राण नेविले की उम्र 19 साल थी.उन्हें उस फिल्म के बारे में सब कुछ याद रहा.उनकी याददाश्त का यह आलम था कि 1937 में के एल सहगल की लाहौर यात्रा के बारे में उन्होंने विस्तार से अपनी पुस्तक ‘के एल सैगल- द डेफिनीटिव बायोग्राफी में लिखा है.तब वे सिर्फ 15 साल के थे.अपने दोस्त के साथ वे के एल सैगल को सुनने गए थे.उन्होंने उमड़ी भीड़ के बीच दो रुपये के टिकट ब्लैक में तीन रुपये में खरीदे थे.उनकी याददाश्त जबरदस्त थी.इसी साल अप्रैल में उनके गुरुग्राम निवास में हुई बातचीत मुझे अच्छी तरह याद है.लाहौर और लाहौर की फिल्म इंडस्ट्री से संबंधित मेरे हर सवाल का उन्होंने दो टूक जवाब दिया था.उन्हें इस बात की ख़ुशी थी कि मैं लाहौर की फिल्म इंडस्ट्री के योगदान को रेखांकित कर रहा हूँ.स्रोत और सामग्री की दिक्कतों का प्रसंग आने पर जब मैंने बताया कि अभी के हालत में लाहौर जाना मुम्किन नहीं है.मैं तो सूचना और प्रसारण मंत्रालय से किसी प्रकार के सहयोग की उम्मीद नहीं कर सकता,क्योंकि अपने लेखों और टिप्पणियों में मैं सत्तारूढ़ पार्टी का विरोधी घोषित हो चूका हूँ.उन्होंने मेरी बात धयान से सुनी और फिर धीमे स्वर में अनोखी सलाह दी. उन्होंने सुझाया कि भाजपा की सरकार के मंत्री के पास तुम पत्र भेजो.उस पत्र में लिखों कि विभाजन के पहले लाहौर में सक्रिय अधिकांश निर्माता और स्टूडियो के मालिक हिन्दू थे. मुझे उनके बारे में पता करना है.देखना सरकार तुम्हारी हर मदद करेगी.मैं अभी तक वह पत्र नहीं लिख सका,लेकिन उनके इस सुझाव से मुझे एहसास हुआ कि वे बिल्कुल व्यवहारिक व्यक्ति और विचारक थे.सार्वजानिक हित में सत्ता का इस्तेमाल उन्हें आता था.हो सकता लम्बे समय तक भारतीय विदेश सेवा में रहने के कारन वे सत्ता के गलियारों और कार्यप्रणाली से वाकिफ हों.
उनके बारे में जानने और उनकी किताबें पढने के बाद मिलने की इच्छा होने पर भी उनसे संपर्क करने का मन नहीं कर रहा था.मुझे हमेशा लगता है कि सक्रिय बुजुर्गों को नाहक तंग नहीं करना चाहिए.मिलने-मिलाने की औपचारिकता में उनका वक़्त खर्च होता है.बहरहाल,ट्विटर की पाकिस्तानी दोस्त अमारा अहमद ने उनसे मुलाक़ात का कहीं ज़िक्र किया था.मैंने अमारा से ही इस बाबत पूछा.अमारा ने सलाह दी कि मुझे उनसे संपर्क कर मिलने का वक़्त माँगना चाहिए.और सचमुच तब मुझे विस्मित ख़ुशी हुई,जब उन्होंने मेरा आग्रह मान लिया और मिलने के लिए तैयार हो गए.निश्चित तारीख को वक़्त से कुछ पहले ही मैं उनके गुरुग्राम निवास पर हाज़िर था.मुझे उनकी स्टडी में बिठा दिया गया.स्टडी में जाते समय मैंने उनकी झलक पा ली थी और यही सोच कर खड़ा रहा कि वे पीछे से आते ही होंगे.5 से 10 मिनट हो गए,लेकिन वे नहीं आये.थोड़ी देर तक उनकी किताबों को निहारने के बाद मैं बैठ गया.ठीक 11 बजे वे आये....11 का वक़्त ही मुकम्मल हुआ था.आने के साथ उन्होंने कहा कि मैं वक़्त पर आ गया.तुम पहले आ गए थे,इसलिए इंतजार करना पड़ा.मेरी हंसी छूट गयी और वे भी हंसने लगे.फिर तो घंटे भर से ज्यादा देर तक मैं कुछ न कुछ पूछता रहा और वे पूरी संजीदगी से मेरी हर जिज्ञासा का जवाब देते रहे.अप्रैल 2018 में उनकी उम्र 96 साल थी.
जी हाँ, उम्र उन्हें छू नहीं पाई थी.वे लगातार सक्रिय और सचेत रहे.भारतीय बुजुर्ग इस उम्र में घर,परिवार और समाज से नाराज़ रहते हैं.उन्हें लगता है कि आज की पीढ़ी नाकारा और नासमझ है.अपनी बातचीत में मैंने महसूस किया कि उन्हें ऐसी कोई शिकायत नहीं है.वे आज की पीढ़ी को संबोधित करना चाहते हैं.उनके संपर्क में रहते हैं.उनके पास ठोस योजनायें थीं.वे उन पर काम कर रहे थे.जब मैंने निवेदन किया कि आप की किताबें हिंदी में आयें और आप हिंदी में भी लेख लिकहें.उन्होंने झट से सूफी संगीत पर लिखा एक लेख थमा दिया और कहा कि इसे छपवा लो.वे अपनी किताबें हिंदी में लाना चाहते थे.इन किताबों का हिंदी अनुवाद आना ही चाहिए.प्राण नेविले लाहौर शहर पर केन्द्रित ‘लाहौर-ए सेंटीमेंटल जर्नी’ नामक किताब लिखी है.इस किताब में उन्होंने अपने दौर के लाहौर का सजीव चित्र शब्दांकित किया है.छोटी-छोटी रवायतों पर विस्तार से लिखा है.वे सही लिखते हैं,’शहर केवल अपने बाज़ार और इमारतों में नहीं होता.यह माहौल,परिवेश,ख़ुशी और ग़म के आलम,पागलपन और उदासी,मौज-मस्ती और सबसे बढ़ कर अपने बाशिंदों में होता है. वे ही उसकी आत्मा होते है.’प्राण नेविले की यह पुस्तक किसी भी शहर की धड़कन को समझने का कारगर टूल देती है.प्राण साहेब ने लाहौर के राजनीतिक और आर्थिक हलचल पर अधिक ध्यान नहीं दिया है.वे लाहौर के उस सांस्कृतिक पहलू को सामने ले आते हैं,जो भारत और पाकिस्तान से अलग लाहौर को उजागर करता है.लाहौरी इस तथ्य में फख्र महसूस करते हैं कि एक भारत है और एक पाकिस्तान है....और एक लाहौर है.विभाजन के पहले के लाहौर के बारे में पढने-जानने पर शिद्दत से यह बात महसूस होती है.
प्राण नेविले का प्राण लाहौर में ही था.वे भारत ज़रूर आ गए थे,लेकिन किसी ब्याहता की तरह वे अपने मायके लाहौर को कभी नहीं भूल पाए.मौका मिलते ही वे लाहौर जाते थे.लाहौर के बारे में खूब लिखते थे. कोठेवालियों पर उनकी किताब शोधपूर्ण मानी जाती है. ब्रिटिश राज के विशेषज्ञ के रूप में उनकी खास पहचान थी.इसके साथ ही भारतीय चित्रकला और कंपनी स्कूल के अवसान पर उनकी महत्वपूर्ण किताब है.उन्होंने सुगम संगीत और फ़िल्मी संगीत पर भी भरपूर लिखा है. वे ठुमरी गायिका नैना देवी के मुरीद और दोस्त थे.उनके जरिए वे बेगम अख्तर से मिले.उन्होंने इन दोनों गायिकाओं पर भी लिखा है.उन्होंने बेगम अख्तर की गायी कुछ ठुमरी और ग़ज़ल एक वक़्त के बाद उनके प्रशंसकों के बीच बिखेरी.दिल्ली में हर साल संगीत सभा का आयोजन उनका खास शगल था.के एल सैगल पर किताब लिखने के साथ ही उनकी गायकी और खूबियों की याद बनाये रखने के लिए उनकी जन्म शताब्दी पर भारत सरकार के सहयोग से भव्य आयोजन करने में वे सफल रहे थे.
चौथे और पांचवे दशक के लाहौर में सांस्कृतिक सामूहिकता थी.अविभाजित भारत का यह शहर उत्तर भारत के पश्चिम का सांस्कृतिक,शैक्षणिक और राजनीतिक केंद्र था.इसके समानान्तर पूर्व में स्थित इलाहाबाद ही प्रभाव में इसके समक्ष ठहरता है.यह तुलनात्मक अध्ययन का विषय हो सकता है कि कैसे और क्यों उत्तर भारत के दोनों शहर आज़ादी के बाद अपनी चमक और धमक बरक़रार नहीं रख सके.और अब तो इलाहाबाद का नाम बदल कर प्रयागराज रखने के साथ योगी आदित्यनाथ ने बची-खुची गरिमा भी समाप्त कर दी.

सिनेमालोक दीपिका-रणवीर की शादी


सिनेमालोक
दीपिका-रणवीर की शादी
-अजय ब्रह्मात्मज
दीपिका पादुकोण और रणवीर सिंह की शादी की ट्विटर पर की गयी संयुक्त घोषणा ने मीडिया की संडे की शांति में खलबली मचा दी. धडाधड अपडेट होने लगे और उनकी पंक्तियों को दोहराया और उद्धृत किया जाने लगा.हाल-फिलहाल में शादी की घोषणा कर रही किसी फिल्म स्टार जोड़ी ने पहली बार हिंदी में भी अपना सन्देश जारी किया.इस बात के लिए हिंदी फिल्मों के दोनों स्टार बधाई के पात्र हैं.ठीक है कि वर्तनी और व्याकरण की कुछ गलतियाँ हैं.जैसे कि दीपिका का नाम ही दीपीका लिखा गया है.फिर भी जिस इंडस्ट्री में अंग्रेजी का बोलबाला है,वहां पॉपुलर स्टार की ऐसी पहल के दूरगामी प्रभाव होते हैं.
बताते हैं कि 2012 में संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘गोलियों की रासलीला राम-लीला की शूटिंग के दरम्यान दोनों करीब आये.संजय लीला भंसाली की अगली दो फिल्मों में वे फिर से साथ रहे.शूटिंग के दिनों के लम्बे साथ में दोनों एक-दूसरे को अच्छी तरह समझ सके.पहली फिल्म की रिलीज के बाद से ही दोनों की नजदीकियां नज़र आने लगी थीं,लेकिन शुरू में इसे रणवीर सिंह का हाइपर अंदाज माना गया.रणवीर मौके-बेमौके अपने प्रेम का सार्वजानिक इजहार करते रहे.दीपिका की स्मित मुस्कान से स्पष्ट था कि वह भी राज़ी हैं.दीपिका का व्यवहार हमेशा संयत रहा,जबकि रणवीर सिंह बेहिचक प्रेम प्रदर्शन करते रहे.
पलट कर देखें तो दीपिका पादुकोण पुराने प्रेम संबंध से निकलने के बाद डिप्रेशन की शिकार हो गयी थीं.उस दौर में उन्हें अपने परिवार से पूरा प्यार और समर्थन मिला.मुंबई में रणवीर सिंह की समझदार संवेदना और हमदर्दी से दीपिका को संबल मिला.याद करें तो दीपिका संबंध टूटने से बिखर गयी थीं.उन्हें रणवीर सिंह ने मजबूत सहारा दिया.वह उनके साथ रहे.अपने खिलंदडपने से उन्हें हंसाते रहे.रणवीर सिंह की हरकतें ऊलजलूल लग सकती हैं,लेकिन आप ठहर कर देखें तो उनके पीछे एक सिस्टम है.एनर्जी से लबालब रणवीर अपने रिएक्शन रोक नहीं पाते हैं.वे दूसरे फिल्म स्टार की तरह गले मिलने की सिर्फ औपचारिकता नहीं निभाते.मैंने पाया है कि वे प्यार से भींचते हैं.निहाल कर देते हैं.उन्होंने डिप्रेशन में डूबी दीपिका की उंगली थामी और समय पर ज़रूरी सहारा दिया.शुरू में कुछ लोगों को यही लगता रहा कि रणवीर जबरदस्ती दीपिका से चिपकने की कोशिश करते हैं.अब उन आलोचकों की समझ में आ गया होगा कि दोनों एक-दूसरे से कितना प्रेम करते हैं.
रणवीर सिंह का फ़िल्मी करियर दीपिका के आगमन के चार साल बाद शुरू हुआ. यशराज फिल्म्स की ‘बैंड बाजा बारात से सफल लेकिन छोटी शुरुआत के बावजूद रणवीर सिंह कामयाबी की छलांगे मारते हुए अपनी पीढ़ी के पॉपुलर स्टारों की कतार में आ गए. दीपिका के साथ आई तीनों फिल्मों ने बतौर स्टार और एक्टर उनकी पोजीशन मजबूत कर दी.आखिरी फिल्म ‘पद्मावत के बाद रणवीर सिंह ने जोया अख्तर की ‘गली बॉय पूरी कर ली है और अभी रोहित शेट्टी की ‘सिम्बा’ पूरी कर रहे हैं.दीपिका ने अलबत्ता ‘पद्मावत के बाद केवल एक फिल्म की घोषणा की है.तेजाब हमले की शिकार लक्ष्मी अग्रवाल के जीवन पर बन रही बायोपिक में वह मेघना गुलज़ार के निर्देशन में काम करेंगी.वह इस फिल्म की एक निर्माता भी हैं.
कयास लगाये जा रहे हैं कि दीपिका-रणवीर की शादी के बाद उनका फ़िल्मी करियर क्या करवट लेगा? अब इस तरह का सवाल बेमानी है कि क्या शादी के बाद दीपिका फिल्मों में काम करेंगी? समय बदल चुका है.अभी की अभिनेत्रियाँ न तो प्रेम छिपाती हैं और ना शादी के बाद अपने करियर को विराम देती हैं.दर्शकों की मानसिकता और स्वीकृति भी बदली है.अब वे शादीशुदा अभिनेत्रियों को बराबर पसंद करते हैं.यह हो सकता है कि भविष्य में फिल्मों के चुनाव के मामले में दीपिका की पसंद और प्राथमिकतायें बदल जाएं.समृद्धि और सम्मान हासिल कर चुकी दीपिका से यह उम्मीद भी रहेगी कि वह फिल्मों सार्थक भूमिकाएं निभाएं.अपने स्टारडम का लाभ लेकर ऐसी फ़िल्में करें जो अबी तक किसी और दबाव की वजह से वह नहीं कर पायी हों.
दोनों के सुखी दांपत्य जीवन और फ़िल्मी करियर के लिए शुभकामनाएं!


Wednesday, October 17, 2018

संडे नवजीवन : राष्ट्रवाद का नवाचार


संडे नवजीवन
राष्ट्रवाद का नवाचार
-अजय ब्रह्मात्मज
सर्जिकल स्ट्राइक की दूसरी वर्षगांठ पर हिंदी फिल्म ‘उरी – द सर्जिकल स्ट्राइक’ का टीजर आया. इस फिल्म में विकी कौशल प्रमुख नायक की भूमिका में है. 1 मिनट 17 सेकंड के टीजर में किसी संय अधिकारी की अनुभवी.आधिकारिक और भारी आवाज़ में वाइस् ओवर है. बताया जाता है कि ‘हिंदुस्तान के आज तक के इतिहास में हम ने किसी भी मुल्क पर पहला वार नहीं किया. 1947,61,75,99... यही मौका है उनके दिल में डरर बिठाने का. एक हिन्दुस्तानी चुप नहीं बैठेगा. यह नया हिंदुस्तान है. यह हिंदुस्तान घर में घुसेगा और मारेगा भी.’ वरिष्ठ अधिकारी की इस अधिकारिक स्वीकारोक्ति और घोषणा के बीच जवान ‘अहिंसा परमो धर्मः’ उद्घोष दोहराते सुनाई पड़ते हैं. सभी जानते हैं कि पाकिस्तान ने 18 सितम्बर 2016 को कश्मीर के उरी बेस कैंप में घुसपैठ की थी और 19 जवानों की हत्या कर दी थी. भारत ने डर बिठाने की भावना से सर्जिकल स्ट्राइक किया था. इस सर्जिकल स्ट्राइक को देश की वर्तमान सरकार ने राष्ट्रीय गर्व और शोर्य की तरह पेश कर अपनी झेंप मिटाई थी. गौर करें तो इस संवाद में पाकिस्तान का नाम नहीं लिया गया है,लेकिन युद्ध के सालों से पाकिस्तान का ही संकेत मिलता है.इसमें 196 की ज़िक्र नहीं आता. जिस नया हिंदुस्तान’ की बात की जा रही है,वह सीधे तौर पर वर्तमान प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी के ‘न्यू इंडिया’ का अनुवाद है.
याद करे कभी हिंदी फिल्मों के नायक ‘ ये पूरब है पूरबवाले,हर जान की कीमत जानते हैं’ और ‘है प्रीत जहां की रीत सदा,मैं गीत वहां के गता हूँ. भारत का रहनेवाला हूँ,भारत की बात सुनाता हूँ’ जैसे गीतों से भारत की विशेषताओं का बक्कन किया करते थे. राष्ट्र और राष्ट्रवाद फिल्मों के लिए नयी चिंता या टूल नहीं है. आज़ादी के पहले की मूक और बोलती फिल्मों में कभी प्रछन्न और अप्रत्यक्ष रूप से तो कभी सीधे शब्दों में भारतीय अस्मिता की पहचान और राष्ट्र गौरव का उल्लेख होता था. आज़ादी के पहले स्वतंत्रता की लडाई के दौर में मुक्ति  की चेतना और गुलामी के विरुद्ध जागरूकता फैलाने में फ़िल्मों की छोटी-बड़ी भूमिका रही है. विश्वविद्यालयों में राष्ट्रवाद में फिल्मों की भूमिका और योगदान पर पारंपरिक पर्चे तो लिखे गए हैं,लेकिन फिल्मों का व्यवहारिक और उपयोगी अध्ययन और विश्लेषण नहीं किया गया है. मुग़ल बादशाहों और राजपूत राजाओं की हाथों का मकसद कहीं न कहीं दर्शकों को यह बताना और जाताना रहा है कि गुलामी की बेड़ियों में जकड़ा हिंदुस्तान कभी शांति,समृदधि और संस्कृति का केंद्र था. सत्य,धर्म,अहिंसा और लोकतंत्र की राह पर चल रहे भारत ने कभी पडोसी देशों पर आक्रामण नहीं किया. भारत की भूमि में कदम रखे व्यक्तियों को मेहमान माना और उन्हें बार-बार सत्ता तक सौंप दी. कुछ तो यहीं बस हाय और भारतीय समाज में घुलमिल गए,जिनमें से कुछ को अलगाने और छांटने की कोशिश की जा रही है. और कुछ शासक बन कर लूटते रहे. हिंदी फिल्मों में में इनका यशोगान मिलता है तो साथ ही शासकों के खिलाफ छटपटाहट भी जाहिर होती है.
हिंदी फिल्मों में राष्ट्रवाद कभी मुखर तरीके से व्यक्त नहीं हुआ.आज़ादी के पहले अंग्रेजों के सेंसर का डर रहता था. आज़ादी के बाद राष्ट्र गौरव के बदले राष्ट्र निर्माण पर जोर दिया जाने लगा नेहरु के सपनों के सेक्युलर भारत के चरित्र गधे गए. इन फिल्मों में विविधता में एकता और राष्ट्रीय एकता के संवैधानिक सिद्धांतों को चरित्रों और संवादों में पिरोया जाता था. तब फिल्मों में वर्णित राष्ट्रवाद ‘भारत’ के लिए लक्षित होता था. वह किसी राजनीतिक पार्टी के एजेंडा या किसी नेता के भाषण से निर्दिष्ट या संचालित नहीं होता था.यह शोध और अध्ययन का विषय हो सकता है कि कैसे नेहरु और शास्त्री के आह्वान देश के प्रधानमंत्री के आग्रह के रूप में फ़िल्मकारों ,कलाकारों और नागरिकों तक संप्रेषित होते थे,जबकि आज प्रधानमंत्री का आह्वान किसी राजनीतिक पार्टी के नेता मोदी के आदेश के रूप में सुनाई पड़ता है. यही कारण है कि आज की फिल्मों में राष्ट्रगान,भारतीय तिरंगा या भारत की गौरव गाथा सुन कर राष्ट्रीय भावना का संचार नहीं होता. ‘वन्दे मातरम’ का उद्घोष ‘बोलो वन्दे मातरम’ का आदेश बन जाता है. डर लगता है कि जयघोष नहीं किया या बीच फिल्म में ‘जन गण मन’ सुन कर खड़े नहीं हुए तो कोई अदृश्य हाथ कालर पकड़ कर खींचेगा और ‘मॉब लिंचिंग’ के लिए ‘न्यू इंडिया’ के भक्तों के बीच ड्राप कर देगा. राष्ट्रवाद धीरे से अंधराष्ट्रवाद और फिर फर्जी राष्ट्रवाद में बदल गया है.
यह अनायास नहीं हुआ है. हम इसी सदी की बात करें तो ‘लगान’ या ‘चक दे इंडिया’ देखते हुए कतई भान नहीं होता कि देशभक्ति की घुट्टी पिलाई जा रही है. भुवन और कबीर खान का संघर्ष और प्रयत्न भारत के लिए है. वे अपे परिवेश और माहौल में गुलामी और क्षेत्रीयता से निकलना चाहते हैं. उनकी एकजुटता उस विजय के लिए है,जो सामूहिक है.’चक दे इंडिया’ और ‘गोल्ड’ को आगे-पीछे देखें तो स्पष्ट हो जायेगा कि फ़िल्मकार किस तरह के दबाव में सृजनात्मक एकांगिता के शिकार हो रहे हैं. ‘चक दे इंडिया’ का कबीर खान भी ‘इंडिया’ के लिए टीम बना रहा है और ‘गोल्ड’ के तपन दास की ‘इंडिया’ की जीत की आकांक्षा में फर्क है. एक खेल में जीत चाहता है तो दूसरा देश के रूप में जीत चाहता है.’हमरी टीम लंदन में ब्रिटेन को हरा कर 200 सालों की गुलामी का बदला लेगी’ या ‘हम अपना झंडा फहराएंगे और राष्ट्र गान गायेंगे’ जैसे संवाद बोलता तपन दास फर्जी देशभक्त जान पड़ता है. यह थोपा गया राष्ट्रवाद है,जो इन दिनों फैशन में है. इसे संयोग कहें या सुनियोजित चुनाव कि अक्षय कुमार  ‘न्यू इंडिया’ के भारत कुमार के रूप में उभरे हैं. उनकी फिल्मों ‘एयरलिफ्ट’,‘टॉयलेट एक प्रेमकथा’ और ‘पैडमैन’ में भी राष्ट्रवाद छलकाया गया है है. नीरज पाण्डेय ने ‘बेबी’ में उन्हें देशभक्ति दिखाने का पहला मौका दिया. उसके बाद उनकी फिल्मों में लगातार देशभक्ति और राष्ट्रवाद के सचेत संदेशात्मक संवाद होते हैं. मनोज कुमार और अक्षय कुमार की प्रस्तुति और धरना में बड़ा फर्क है. हम सभी जानते हैं कि प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के कहने पर मनोज कुमार ने ‘जय जान जय किसान’ के नारे को लेकर ‘उपकार’ लिखी और निर्देशित की. अभी प्रधानमंत्री ने नहीं कहा है,लेकिन सभी उन्हें सुननाने में लगे हैं. कभी जॉन अब्राहम तो कभी कोई और देशभक्ति के ‘समूह गान’ में शामिल होता दिखता है.
अभी का फर्जी राष्ट्रवाद हिन्दू राष्ट्रवाद से प्रेरित है,जो सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के नाम पर रचा जा रहा है.इसकी शुरुवात तो ‘आज़ादी’ के नारे से होती है,लेकिन आखिर में ‘हर हर महादेव’ सुनात्यी पड़ता है. कंगना रनोट की ‘मणिकर्णिका’ का टीजर आप सभी ने देख ही लिया होगा. समस्या हिन्दू प्रतीकों और जयकारों से नहीं है. समस्या उनके जबरन उपयोग या दुरुपयोग को लेकर है. फिल्म शुरू होने के पहले सिनेमाघरों में राष्ट्र गान कई साल पहले से अनिवार्य हो चुका है,उसके सम्मान में खड़े होने या न हो पाने का विवाद पिछले चार सालों में समाचारों में आने लगा है.’भाग मिल्खा भाग’ में मिल्खा सिंह का संघर्ष भारत के एक खिलाडी का संघर्ष ‘सूरमा’ तक आते-आते भिन्न अर्थ ले लेता है.न्यू इंडिया के ‘राष्ट्रवाद’ का दवाब इतना ज्यादा है की सामान्य प्रेम कहानियों एन भी किसी न किसी बहने इसे लेप और थोपा जा रहा है..

Tuesday, October 16, 2018

सिनेमालोक : लाहौर के दूसरे प्राण भी नहीं रहे

सिनेमालोक
लाहौर के दूसरे प्राण भी नहीं रहे
-अजय ब्रह्मात्मज
देश के विभाजन के बाद लाहौर के दो प्राण वहां से निकले – प्राण सिकंद और प्राण नेविले. प्राण सिकंद मुंबई आये.उन्होंने लाहौर में ही एक्टिंग आरम्भ कर दी थी. मुंबई आने के बाद वे प्राण के नाम से मशहूर हुए.पहले खलनायक और फिर चरित्र भिनेता के तौर पर अपनी अदाकारी से उन्होंने दर्शकों का भरपूर मनोरंजन किया. दूसरे प्राण दिल्ली में रुके. उन्होंने भारतीय विदेश सेवा की नौकरी की.कला,संगीत और फिल्मों में उनकी खास रूचि रही.उन्होंने लाहौर की यादों को सह्ब्दों में लिखा और भारतीय संगीत में ठुमरी और फ़िल्मी संगीत पर अनेक निबन्ध और पुस्तकें लिखीं. उन्हें के एल सहगल खास पसंद रहे.उन्होंने के एल सहगल मेमोरियल सर्किल की स्थापना की और सहगल की यादों और संगीत को जोंदा रखा. उन्होंने भारत सरकार की मदद से सहगल की जन्म शताब्दी पर खास आयोजन किया और उनके ऊपर एक पुस्तक भी लिखी.
पिछले गुरुवार को दिल्ली में उनका निधन हुआ.उनके निधन की ख़बरें अख़बारों की सुर्खिउयाँ नहीं बन पायीं.हम नेताओं,अभिनेताओं और खिलाडियों की ज़िन्दगी के इर्द-गिर्द ही मंडराते रहते हैं.हमें अपने समाज के साहित्यकारों,कलाकारों और इतिहासकारों की सुधि नहीं रहती.हम उनके बारे में बेखबर रहते हैं.प्राण नेविले भारत सर्कार की विदेश सेवा से मुक्त होने के पहले से कला और संगीत के अध्ययन और दस्तावेजीकरण में व्यस्त रहे.उन्होंने ब्रिटिश राज के दिनों पर गहरा रिसर्च किया था.उनकी पुस्तकों और लेखों में उस ज़माने की कहानियों और घटनाओं का विस्तृत चित्रण हुआ है.कोठेवालियों पर उनकी पुस्तक महत्वपूर्ण मानी जाती है.नैना देवी और बेगम अख्तर के मुरीद प्राण नेविले ने दोनों प्रतिभाओं पर मन से लिखा है.
प्राण नेविले से मेरा परिचय लाहौर की वजह से हुआ.नौकरी से मुक्ति और निवृति के बाद मैं लाहौर की फिल्म इंडस्ट्री पर शोध कर रहा हूँ.मुझे स्पष्ट रूप से लगता है कि विभाजन के पहले फिल्म निर्माण में सक्रिय लाहौर के योगदान का संचयन और उल्लेख नहीं हुआ है.भारतीय इतिहासकारों ने नए देश पाकिस्तान में होने की वजह से लाहौर का उल्लेख ज़रूरी नहीं समझा और पाकिस्तान ने विभाजन के पहले के लाहौर की गतिविधियों को पाकिस्तानी सिनेमा से बहार रखा.जाहिर तौर पर पाकिस्तान का सिनेमा 1947 के बाद आरम्भ होता है.भारतीय और हिंदी सिनेमा के इतिहास की इस लुप्त कड़ी पर ध्यान देने की ज़रुरत है.शोध के सिलसिले में ही मुझे प्राण नेविले की पुस्तक लाहोर – ए सेंटीमेंटल जर्नी की जानकारी मिली.इस पुस्तक के कई चैप्टर में उन्होंने आज़ादी के पहले के लाहौरी सिनेमा के बारे में लिखा है. इसके साथ लाहौर के रोज़मर्रा ज़िन्दगी को भी उन्होंने अपने संस्मरणों में याद किया है.
पिछले दिनों लाहौर फिल्म इंडस्ट्री के अध्ययन और शोध के सिलसिले में दिल्ली में उनसे मुलाक़ात का अवसर मिला.मेरी सोच रही है कि वयोवृद्ध चिंतकों को तंग नहीं किया जाना चाहिए.इसी संकोच में उनका संपर्क मिल जाने पर भी मैंने उनसे बात नहीं की.फिर लगा कि पता नहीं आज़ादी और विभाजन के पहले के लाहौर की धडकनों को महसूस किये किसी और शख्स से मेरी कब मुलाक़ात होगी?मैंने उनसे मिलने की इच्छा प्रकट की तो वे सहज ही तैयार हो गए.उन्होंने २८ अप्रैल २०१८ को 11 बजे का समय दिया. मैं आदतन समय से पहले पहुँच गया,लेकिन वे ठीक 11 बजे ही मिले.खूब साडी बातें हुईं.उनकी बातचीत से लाहौर और वहां की फिल्म इंडस्ट्री को समझने की अंतर्दृष्टि मिली.उन्होंने अपनी किताबें मुझे भेंट में दीं.वे चाहते थे कि उनकी पुस्तकें हिंदी में प्रकाशित होकर हिंदी पाठकों के बीच पहुंचे.एक प्रकाशन के संपादक आश्वासन देकर निष्क्रिय हो गए.प्राण साहेब हिंदी पत्र-पत्रिकाओं के लिए लिखना चाहते थे.एक दैनिक अख़बार के फीचर प्रभारी ने सूफी संगीत पर लिखे उनके शोधपूर्ण लेक को छपने का आश्वासन दिया था.वह लेख उनके जीते जी नहीं छप पाया.
तय था कि हम फिर मिलेंगे.उन्होंने मेरे काम में रूचि दिखाई थी और हर प्रकार की मदद का वादा किया था.वे चाहते थे कि मैं जल्दी से अपना काम पूरा करूं और उन्हें दिखाऊँ.मेरा शोध अब उन जैसे लाहौरियों के लिए समर्पित होगा.

Thursday, October 11, 2018

फिल्म लॉन्ड्री : #MeToo: मुंबई फिल्म उद्योग का खुला और घिनौना सच

फिल्म लॉन्ड्री
नया नहीं है यौन शोषण का मसला
-अजय ब्रह्मात्मज
तनुश्री दत्ता ने 2008 में ‘हॉर्न ओके प्लीज के सेट पर एक डांस सीक्वेंस के समय हुए अप्रत्याशित और अपमानजनक अनुहवों को शेयर करते हुए नाना पाटेकर पर यौन शोषण का ताज़ा आरोप लगाया है. इस आरोप के बाद हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में यौन शोषण के मामले ने तूल पकड़ा है. पत्रकार छोटे,मझोले और बड़े फिल्म स्टार और अन्य हस्तियों से उनकी राय पूछ रहे हैं.कुछ समर्थन में तो कुछ महिलाओं के प्रति निस्संग सहानुभूति में अपनी रायरख रहे हैं. हॉलीवुड में ‘मी टू’ अभियान के जोर पकड़ने और हार्वी वाइनस्टीन का मामला सामने आने के बाद भारत में भी अभिनेत्रियों के बीच सुगबुगाहट दिख रही है. पिछले साल दबे स्वर में ही सही,लेकिन अनेक अभिनेत्रियों ने खुद के हौलनाक अनुभव शेयर किये.इसके बावजूद यह सच्चाई है कि कभी बदनामी और कभी अलग-थलग कर दिएजाने के डर से अभिनेत्रियाँ ऐसे अपराधियों के नाम लेने से हिचकिचाती हैं. एक निर्माता,एक निर्देशक.एक कास्टिंग डायरेक्टर और एक को-एक्टर का चेहराविहीन उल्लेख किया जाता है. अपराधियों का पर्दाफाश नहीं होता. कुछ समय के बाद फिल्म इंडस्ट्री पुराने ढर्रे पर चलने लगती है.
इसी साल डेज़ी ईरानी ने जब पचास साल पुराना भेद खोला कि उनके संरक्षक और अभिभावक के तौर पर साथ आए पुरुष ने उनके साथ दुष्कर्म किया तो फिल्म इंडस्ट्री में खलबली सी मच गयी.एक बार फिर पुराने किस्से सुनाई पड़ने लगे. दिक्कत यह है कि हमेशा आरंभिक शोर के बाद सब कुछ कानाफूसी में तब्दील होकर अगली घटना तक दब जाता है.याद करें कि  इसी साल अप्रैल में ‘कास्टिंग काउच’ की कितनी घटनायें सुनाई और बताई गईं. राधिका आप्टे,स्वरा भास्कर,रिचा चड्ढा,उषा जाधव ने अपने अनुभव बताये. उस समय कुछ अभिनेत्रियों ने तो ऑफ द रिकॉर्ड कुछ कास्टिंग डायरेक्टर और डायरेक्टर के नाम भी बताये. उनमें से कोई भी दोषियों के नामों के सार्वजानिक उद्घाटन का सहस नहीं कर पाया. सभी को एक ही डर है कि हिंदी फिल्मों का तंत्र उसे पीस डालेगा और निकल बहार करेगा. उनमें से एक सक्रिय अभिनेत्री तनुश्री का प्रकरण सामने आने और उनकी हिम्मत की दाद देने पर यही कहा कि उसे फिल्म इंडस्ट्री में काम नहीं चाहिए,इसलिए वह हिम्मत कर सकती है.सारा मसला और मामला एकता के अभाव और सामूहिक स्वर की कमी से बेजान हो जाता है. फिल्म और टीवी कलाकारों के एसोसिएशन CINTAA के मानद सचिव और प्रवक्ता सुशांत सिंह ने अपने बयान में स्पष्ट कहा है कि 2008 में तनुश्री की शिकायत पट उचित फैसला नहीं लिया जा सका था.उन्होंने अफ़सोस जाहिर किया है कि एसोसिएशन के संविधान में तीन साल से पुराने मामले पर विचार करने का प्रावधान नहीं है. उन्होंने अधिकारीयों से अपील की है कि इस मेल की निष्पक्ष जांच करवाएं.
इस बीच नाना पाटेकर के वकील ने तनुश्री दत्ता को लीगल नोटिस भेजी है.महारष्ट्र सर्कार के गृह मंत्री दीपक केसरकर ने पहले तो नाना पाटेकर के बारे कहा कि वे महज अभिनेता नहीं हैं. वह सोशल वर्कर भी हैं और उन्होंने महाराष्ट्र के लिए अनेक कार्य किये हैं. संकेत यह था कि उन्हें किसी आरोप में घसीटना उचित नहीं होगा.बाद में उन्होंने यह कहना शुरू किया कि अगर तनुश्री दत्ता पुलिस में शिकायत करती हैं तो पूरी पारदर्शिता के साथ जाँच होगी.शनिवार को तनुश्री दत्ता ने अँधेरी के ओशिवारा पुलिस स्टेशन में एफ़आईआर दर्ज कर दिया है. तनुश्री दत्ता ने नाना पाटेकर और गणेश आचार्य के साथ ही निर्माता सामी सिद्दीकी,निर्देशक राकेश सारंग और मनसे के कार्यकर्ताओं के खिलाफ मामला दर्ज किया है.अब देखना रोचक होगा कि मुंबई पुलिस और महारष्ट्र सरकार पारदर्शी जांच के लिए क्या कदम उठाती है. उन्होंने अपनी शिका्यत में लिखा है कि तीन दिनों के रिहर्सल के बाद गाने की शूटिंग के चौथे दिन 26 मार्च 2008 को ज़रुरत नहीं होने के बावजूद नाना पाटेकर सेट पर मौजूद थे. मुझे डांस सिखाने के नाम पर हाथ पकड़ कर खींच और धकेल रहे थे. इस प्रक्रिया में अनुचित तरीके से वे मुझे छू रहे थे.मुझे सब असहज लगा तो मैंने निर्माता-निर्देशक से शिकायत की.शूटिंग रोक दे गयी. एक घंटे के बाद जब मुझे बुलाया गया तो नए स्टेप जोड़ दिए गए,जो अन्तरंग होने के साथ मुझे छूने के भी थे. इस मामले में नाना पाटेकर और उनके समर्थक तर्क दे रहे हैं कि सेट पर सकदों लोगों की मौजूदगी में कैसे कोई ऐसी हरकत करेगा? बस,बाज़ार और मेले की छेडखानियों को याद करें तो वह भीड़ के बीच ही होती है.यौन उत्पीडन के दोषी उत्तेजना में हिंसक और आक्रामक हो जाते हैं. उन्हें परिणाम की चिंता नहीं रहती.अमूमन देखा गया है कि ऐसे मामलों में प्रत्यक्षदर्शी भी खामोश रह जाते हैं.फिल्म इंडस्ट्री में ताकतवर और रसूखदार का दबदबा बना रहता है.उनकी लॉबी नाराज़ होने पर इंडस्ट्री से निकाल बाहर करने का इंतजाम कर लेती है.तनुश्री के बारे में प्रचार हो गया कि वह अनप्रोफेशनल है.स्थिति यह बन गयी कि आख़िरकार तनुश्री दत्ता को फिल्म इंडस्ट्री छोडनी पड़ी.
नाना पाटेकर हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में सक्रिय मराठी एक्टर हैं.किसी राजनीतिक पार्टी से उनका सीधा ताल्लुक नहीं है,लेकिन सत्ता में मौजूद सभी नेता बतौर अभिनेता और सोशल वर्कर उनका सम्मान करते हैं.अपने बेबाक और ढीठ व्यक्तित्व से उन्होंने एक अलग पहचान बनायीं है.फिल्म इंडस्ट्री में सभी मानते हैं कि नाना ‘नो नोंसेंस’ व्यक्ति हैं और सेट पर निर्माता-निर्देशक और सहयोगी कलाकारों से कुछ भी कह सकते हैं.रूखे व्यवहार के लिए मशहूर नाना तुनकमिजाज हैं. वे थोड़े अप्रिय और अप्रत्याशित माने जाते हैं नाना.फिल्मों में उनकी प्रतिभा की वजह से लेने के बावजूद डायरेक्टर डरे-सहमे रहते हैं.अनेक फिल्मकारों और को-एक्टर के खट्टे अनुभव रहे हैं.व्यर्थ औपचारिकताओं का पालन न करने की वजह से उनका व्यवहार उज्जड और उदंड लगता है.इसका उन्हें लाभ भी मिलता है.वह कुछ बोल कर निकल जाते हैं.उन्हें ‘मूडी' कलाकार की संज्ञा मिली हुई है.साथ कर चुके कलाकार कहते हैं कि वे ऐसे ही हैं.
तनुश्री दत्ता के ताज़ा एफ़आईआर  से स्पष्ट है कि वह पिछली बार की तरह खामोश नहीं रहेंगी.पिछली बार अपमान के घूँट पीकर उन्हें फिल्म इंडस्ट्री से तौबा करनी पड़ी थी.फिल्म इंडस्ट्री में इतिहास कुरेदें तो अनेक नई-पुरानी घटनाएं मिल जायेंगीं. ‘दो शिकारी' (1979) फिल्म में बिश्वजीत ने निर्माता-निर्देशक से साठगांठ कर फिल्म में चुम्बन का दृश्य डलवाया.फिल्म की नायिका रेखा थीं.इस सीन को फिल्माते समय बिश्वजीत ने रेखा को दबोचा और निर्देशक ने पांच मिनट तक कट नहीं बोला.रेखा तब नयी-नयी थीं.माधुरी दिक्सित को भी ऐसे जबरन दृश्यों से गुजरना पड़ा है.1935 की कोलकाता के न्यू थिएटर की एक घटना है. कोलकाता के बोउ बाज़ार(रेड लाइट ) की इमाम बांदी को बी एन सरकार की टीम ने चुना और उन्हें ‘यहूदी की लड़की',’कारवां-ए-हयात' जैसी फिल्मों में काम दिया.रतन बाई को राष्ट्रिय ख्याति मिली.लेकिन जब ‘कारवां-ए-हयात' रिलीज हुई तो रतन बाई अपनी भूमिका के कट जाने से हैरान हुईं और उन्होंने इसकी लिखित शिकायत की.तब बी एन सरकार के वकील ने जवाब में जो चिट्ठी लिखी,उसमें उनकी पृष्ठभूमि का उल्लेख कर यह जताने की कोशिश की कि न्यू थिएटर ने उन्हें इस मुकाम तक पहुँचाया,भला बी एन सरकार रतन बाई की प्रतिष्ठा को कैसे आंच पहुंचा सकते हैं? रतन बाई चुप नहीं बैठीं. उन्होंने पलट कर जवाब भेजा कि सोनागाछी,रामबागान.हरकटा गली और बोउ बाज़ार से सैकड़ों लड़कियां चुनी गईं,लेकिन उनमें से कितनी को राष्ट्रीय ख्याति मिली ? मेरी पैदाईश और पृष्ठभूमि के बारे में बता कर सरकार अपनी घृणा व्यक्त कर रहे हैं.
ऐसी अनेक घटनाओं का उल्लेख मिलता है,जिसमें अभिनेत्रियों का यौन शोषण और उत्पीडन किया गया.कानन देवी और दुर्गा खोते ने अपनी आत्मकथाओं में ऐसे बुरे अनुभवों का ज़िक्र किया है.उन दिनों तो मन ही जाता था कि सभ्य और शिक्षित परिवारों की लड़कियां फिल्मों में नहीं आतीं.अख्तरी बाई फैजाबादी उर्फ़ बेगम अख्तर के साथ किशोरावस्था में ही दुष्कर्म हुआ.उन्होंने एक बेटी को जन्म दिया,लेकिन उसे बेटी का दर्जा नहीं दे सकीं.उसे बहन ही बताती रहीं.हर दशक में मशहूर होने के पहले अभिनेत्रियों को बुरे और अपमानजनक अनुभवों से गुजरना पड़ा है.फिल्म इंडस्ट्री में यह मानी हुई बात है किआउटसाइडर लड़कियों को यह सब भुगतना ही पड़ेगा.अभी लड़कियां थोड़ी सजग हो गयी हैं.उन्हें हमेशा सचेत रहना पड़ता है.इसी हफ्ते पूजा भट्ट ने दिल्ली में बताया कि एक बार एक को-एक्टर ने एअरपोर्ट पर उनकी छाती पर हाथ रखा था.फैंटम दो दिनों पहले बंद हो गया,उसके चार निदेशकों में से एक विकास बहल पर एक सहायिका ने यौन उत्पीडन का आरोप लगाया था.फैंटम के विलयन में इस आरोप का भी असर रहा है.महिला और बाल विकास मंत्रालय के सख्त आदेश के बावजूद फिल्म कंपनियों में यौन उत्प्पेदन और शोषण की कार्रवाई के लिए ज़रूरी कमिटी नहीं हैं.शशित और उत्पीडित लड़कियां बदनामी के डर और कुछ भी नतीजा न निकलने की आशंका से घटनाओं को खुलेआम नहीं करती हैं.उन्हें सलाह दी जाती है कि देख लो,कुछ होगा नहीं और तुम्हें बदनामी मिलेगी.
तनुश्री दत्ता के मेल में ही अमिताभ बच्चन,सलमान खान और दुसरे बड़े स्टार का रवैया खेदजनक है.सपोर्ट करना तो दूर,उन्होंने सिरे से किनारा कर लिया और कुछ भी कहने से बचे.एक रेणुका शहाणे खुल कर समर्थन में आईं और उन्होंने तार्किक तरीके से अपना पक्ष रखा.युवा कलाकारों ने बेशक हमदर्दी दिखाई है.कुछ ऐसी भी प्रतिक्रियाएं आईं कि ऐसे मामले तो हर जगह होते हैं.और देखना पड़ेगा कि कौन दोषी है और किस का आरोप सही है.पितृसत्तात्मक समाज में लड़कियों की शिकायत को सबसे पहले ख़ारिज कर दिया जाता है.अमूमन सभी सोचते हैं कि यह कौन सी नयी बात है.’नो मीन्स नो' की किताबी और फ़िल्मी वकालत तो की जाती है,लेकिन व्यवहार में उसके पैरोकार ही पलटते नज़र आते हैं.
पिछले दो सालों में जागरूकता आई है.फिल्म इंडस्ट्री के दफ्तरों,सेट और स्टूडियो में लड़कियों की तादाद बढी है.अब अभिनेत्रिय अपनी बहनों या मां के साथ शूटिंग पर नहीं जातीं’कमरे में कोई लड़की मौजूद हो तो फिल्म यूनिट के पुरुष सदस्य अपनी टिप्पणियों,बैटन और मजाक में सावधान रहते हैं.समबन्ध और स्थितियां बदल रही है. अगर तनुश्री दत्त के आरोपों का उचित नतीजा निकला तो इसके व्यापक परिणाम होंगे.कास्टिंग काउच के अगले चरण के शोषण और उत्पीडन की संभावनाओं पर अंकुश लगेगा.

Wednesday, October 10, 2018

सिनेमालोक : यौन शोषण के और किस्से आएंगे सामने


सिनेमालोक
और किस्से आएंगे सामने
-अजय ब्रह्मात्मज
तनुश्री दत्ता-नाना पाटेकर प्रसंग के किसी निदान और निष्कर्ष पर पहुँचने के पहले विकास बहल का मामला सामने आ गया है. उसके बाद से कुछ और नाम आये हैं.कुछ ने तो आरोप लगने की आशंका में माफ़ी मंगनी शुरू कर दी है.अगर प्रशासन ने इस मामले को उचित तरीके से सुलझाया तो यकीं करें सकदों मामले उजागर होंगे.अनेक चेहरे बेनकाब होंगे.स्त्रियों को लेकर बढ़ रही बदनीयती की सडांध कम होगी. पिछले पच्चीस सालों के अनुभव पर यही कहना चाहूँगा की भारतीय समाज की तरह फिल्म जगत में भी औरतों के प्रति पुरुषों का रवैया सम्मानजनक नहीं है.उन्हें दफ्तर,स्टूडियो औए सेट पर तमाम सावधानी के बावजूद शर्मनाक और अपमानजनक स्थितियों से गुजरना पड़ता है.
सोमवार की ख़बरों के मुताबिक मुंबई पुलिस ने तनुश्री दत्ता के एफ़आईआर पर कार्रर्वाई शुरू कर दी है. गृह राज्य मंत्री दीपक केसरकर ने अस्वासन दिया था कि अगर तनुश्री दत्ता पुलिस में शिकायत दर्ज करती हैं तो मामले की पारदर्शी और निष्पक्ष जांच होगी.उम्मीद की जाती है कि मुंबई पुलिस तत्परता से जांच कर जल्दी ही किसी निष्कर्ष पर पहुंचेगी.मुंबई की फिल्म इंडस्ट्री में यौन शोसन और उत्पीडन की बातें और शिकायतें तो चलती रहती हैं,लेकिन पहली बार मामला इतना उभर कर सामने आया है.तनुश्री दत्त के मुताबिक 2008 में 26 मार्च को एक डांस सीक्वेंस की शूटिंग के समय नाना पाटेकर ने उनके साथ अवांछित दुर्व्यवहार किया.तनुश्री दत्त ने 2008 में भी इस मेल को उठाया था,लेकिन फिल्म बॉडी और पुलिस विभाग की तरफ से उन्हें राहत नहीं मिल सकी थीं.स्थितियां ऐसी बनीं कि तनुश्री दत्ता को फिल्म इंडस्ट्री ही छोड़नी पड़ी.दास सालों के बाद उन्होंने ने इस मेल को उठा तो उन्हें मीडिया और सोशल मीडिया का भरपूर सपोर्ट मिला.मिडिया  ने हर सेलेब्रिटी से सार्वजानिक मंच पर इस प्रसंग में उनसे सवाल पूछे.कुछ उदासीन रहे और सवाल को टाल गए,लेकिन ज्यादातर फ़िल्मी हस्तियों ने सपोर्ट किया.इस वजह से दबाव बढ़ा है.
इस बीच विकास बहल का मामला भी सामने आया है.विकास बहल फैंटम के चार निदेशकों में से एक थे.फिल्मों की यह प्रोडक्शन कंपनी हफिंगटन पोस्ट में आई खबर के बाद रातोंरात डिजोल्व कर दि गयी.अब इस कंपनी के निदेशक अनुराग कश्यप और विक्रमादित्य मोटवानी अफ़सोस जाहिर कर रहे हैं.अपनी भूल स्वीकार कर रहे हैं.अपने आप में यह स्वीकृति उनके अच्छे रवैये को व्यक्त करती है,लेकिन यह किसी परिणाम तक नहीं पहुँचती. इधर कंगना रनोट ने ‘क्वीन की शूटिंग के समय का हवाला देकर विशाल के व्यवहार पर सवाल खड़े करते हुए उसे यौन उत्पीडन से जोड़ दिया है.कुछ लोगों को लग रहा है कि अभी विकास बहल पर मौका देख कर चौतरफा आक्रमण हो रहा है.आरोप लग रहे हैं.इस तरह के विवादों में हमेशा कुछ लोग बेवजह ‘यह भी सच,वह भी सच’ का रवैया अपनाते हैं.वे न्याय की बात करते हुए भी अन्याय के खिलाफ खड़े नहीं मिलते.दूसरे दशकों से यही देखा जा रहा की हर विवाद पर कुछ दिनों के शोर-शराबे के बाद ये किस्से कानाफूसियों तक रह जाते हैं.
माना और बताया जा रहा है की हालीवुड के ‘मी टू के प्रभाव में भारत की हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में यह चेतना जगी और बढ़ी है.लड़कियां खुल कर उल्लेख कर रही हैं.भारतीय समाज महिलाओं को बराबरी का दर्जा देने और उनकी बात सुनने के मामले में अभी बहुत पीछे है.सबसे पहले तो उनकी शिकायत को छुपाने-दबाने की बात की जाती है.बदनामी का खौफ दिखाया जाता है.कहीं न कहीं यह धरना घर कर चुकी है कि कोई भी परिणाम नहीं निकलता.हिंदी फिल्म इन्दुस्त्री में आवाज़ उठाने वाली लड़कियों को धीरे से किनारे कर दिया जाता है.उन्हें काम मिलना बंद हो जाता है.नतीजतन महिलाएं दशकों से ख़ामोशी की साजिश की शिकार होती रहती हैं.हर दशक में ऐसे किस्से मिलेंगे,जिनमें किसी निर्माता,निर्देशक या को-स्टार ने नयी अभिनेत्रियों के शोषण की कोशिश की है.कुछ अभिनेत्रियों ने अपनी आत्मकथाओं में ऐसे हादसों के संकेत दिए हैं.
वक़्त आ गया है कि हम ऐसी शिकायतों को गॉसिप से अलग कर के देखें.समाज में लड़कियों और फिल्मों में अभिनेत्रियों के प्रति अपना नजरिया बदलें.

Wednesday, October 3, 2018

सिनेमालोक : फ़िल्में और गाँधी जी


सिनेमालोक
 फ़िल्में और गाँधी जी
-अजय ब्रह्मात्मज
आज महात्मा गाँधी का जन्मदिन है. 1869 में आज ही के दिन महत्मा गाँधी का जन्म पोरबंदर गुजरात में हुआ था.मोहनदास करमचंद गाँधी को उनके जीवन कल में ही महत्मा और बापू संबोधन मिल चूका था. बाद में वे राष्ट्रपिता संबोधन से भी विभूषित हुए. अनेक समाजशास्त्रियों और इतिहासकारों का मनना है कि गौतम बुद्ध की तरह ही महात्मा गाँधी के नाम और काम की चर्चा अनेक सदियों तक चलती रहेगी. गाँधी दर्शन की नई टीकाएँ और व्याख्याएं होती रहेंगी. उनकी प्रासंगिकता बनी रहेगी.
महात्मा गाँधी ने अपने समय के तमाम मुद्दों को समझा और निजी अनुभवों और ज्ञान से उन पर टिप्पणियां और प्रतिक्रियाएं दीं. बस,इस तथ्य पर ताज्जुब होता है कि उन्होंने अपने जीवन कल में पापुलर हो रहे मनोरंजन के माध्यम सिनेमा के प्रति उदासी बरती. उनसे कभी कोई आग्रह किया गया तो उन्होंने टिपण्णी करने तक से इंकार कर दिया. क्या इसकी वजह सिर्फ इतनी रही होगी कि आधुनिक तकनीकों के प्रति वे कम उदार थे. इन पूंजीवादी आविष्कारों के प्रभाव और महत्व को समझ नहीं पाए. यह भी हो सकता है कि सिनेमा उनकी सोच और सामाजिकता में प्राथमिकता नहीं रखता हो. सच्चाई यही है कि उन्होंने सिनेमा के प्रति हमेश बेरुखी जताई. उसके भविष्य के प्रति आशंका भी जाहिर की. उन्हें फ़िल्में देखने का शौक नहीं रहा. फ़िल्मी हस्तियों से उनका मिलना-जुलना नहीं होता था. केवल चार्ली चैप्लिन के साथ उनकी एक तस्वीर कभी-कभार दिखाई पड़ जाती है.
सन्‌ 1927 में इंडियन सिनैमेटोग्राफ कमेटी ने उनकी राय जानने के लिए एक प्रश्नावली भेजी तो गाँधी जी ने उसका नकारात्मक जवाब दिया। उन्होंने जवाब में लिखा, 'मैं आपकी प्रश्नावली के उत्तर के लिए अनुपयुक्त व्यक्ति हूं। मैंने कभी कोई सिनेमा नहीं देखा और मैं इसके प्रभाव से अनभिज्ञ हूं। अगर इस माध्यम में कोई अच्छाई है तो वह अभी सिद्घ होना बाकी है।' गाँधी जी ने बाद में भी सिनेमा की अनभिज्ञता ख़त्म नहीं की. उनकी राजनीतिक सक्रियता बढती गयी.कुछ सालों के बाद भारतीय सिनेमा की रजत जयंती के मौके पर एक स्मारिका के लिए उनसे सन्देश माँगा गया तो उनके सचिव ने जवाब दिया, 'नियमत: गांधी केवल विशेष अवसरों पर संदेश देते हैं और वह भी ऐसे उद्देश्यों के लिए जिनके गुणों पर कोई संदेह न हो। सिनेमा इंडस्ट्री की बात करें तो इसमें उनकी न्यूनतम रुचि है और इस संदर्भ में किसी को उनसे सराहना की उम्मीद नहीं करनी चाहिए।' अपनी पत्रिका 'हरिजन' में एक संदर्भ में उन्हों स्पष्ट लिखा, 'मैं तो कहूंगा कि सिनेमा फिल्म ज्यादातर बुरे होते हैं।'
सिनेमा के प्रति गांधी जी के कट्टर विरोधी विचारों को देखते हुए ही ख्वाजा अहमद अब्‌बास ने उन्हें एक कुला पत्र भेजा.इस पत्र के जरिए अब्बास ने गांधी जी से फिल्म माध्यम के प्रति सकारात्मक सोच अपनाने की अपील की थी। अब्बास  के पत्र का अंश है - 'आज मैं आपकी परख और अनुमोदन के लिए अपनी पीढ़ी के हाथ लगे खिलौने - सिनेमा को रखना चाहता हूं। आप सिनेमा को जुआ, सट्‌टा और घुड़दौड़ जैसी बुराई मानते हैं। अगर यह बयान किसी और ने दिया होता, तो हमें कोई चिंता नहीं होती...लेकिन आपका मामला अलग है। इस देश में या यों कहें कि पूरे विश्व में आपको जो प्रतिष्ठा मिली हुई है, उस संदर्भ में आपकी राय से निकली छोटी टिप्पणी का भी लाखों जनों के लिए बड़ा महत्व है। दुनिया के एक सबसे उपयोगी आविष्कार को ठुकराया या इसे चरित्रहीन लोगों के हाथों में नहीं छोड़ा जा सकता। बापू, आप महान आत्मा हैं। आपके हृदय में पूर्वाग्रह के लिए स्थान नहीं है। हमारे इस छोटे खिलौने सिनेमा पर ध्यान दें। यह उतना अनुपयोगी नहीं है, जितना दिखता है। इसे आपका ध्यान, आर्शीवाद और सहिष्णु मुस्कान चाहिए।'
ख्वाजा अहमद अबबास के इस निवेदन पर गांधी जी की प्रतिक्रिया नहीं मिलती। अगर वह आजादी के बाद के वर्षों में जीवित रहते और फिल्मों के प्रभाव को करीब से देख पाते तो निश्चित ही अपनी राय बदलते,क्योंकि गांधीजी अपने विचारों में कट्‌टरपंथी नहीं थे और दूसरों से सीखने-समझने के लिए हमेशा तैयार रहते थे।
भारतीय समाज और विश्व इतिहास में महात्मा गांधी के महत्व के संबंध में दो राय नहीं हो सकती। गांधी के सिद्घांतों ने पूरी मानवता को प्रभावित किया है। बीसवीं सदी के दो विश्व युद्घों की विभीषिका के बीच अपने अहिंसक आंदोलन और सत्याग्रह से उन्होंने अनुकरणीय उदाहरण पेश किया। भारतीय मानस में गांधी अचेतन रूप से मौजूद हैं। लाख कोशिशों के बावजूद उनके प्रभाव को नकार नहीं जा सकता. उनकी प्रासंगिकता बनी रहेगी.
सिनेमा और खास कर हिंदी फिल्मों में हम गांधी दर्शन से कभी ‘गांधीगिरी’(लगे रहो मुन्नाभाई) तो कभी किसी और नाम से प्रेरित और प्रभावित चरित्रों को देखते रहेंगे.