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Friday, August 31, 2018

फिल्म समीक्षा : स्त्री

 फिल्म रिव्यू
स्त्री
-अजय ब्रह्मात्मज

अमर कौशिक निर्देशित ‘स्त्री’ संवादो,किरदारों और चंदेरी शहर की फिल्म है. इन तीनों की वजह से यह फिल्म निखरी है. सुमित अरोड़ा, राजकुमार राव, पंकज त्रिपाठी,अपारशक्ति खुराना,अभिषेक बनर्जी और चंदेरी शहर की खूबियों का अमर कौशिक ने रोचक मिश्रण और उपयोग किया है. हिंदी फिल्में घिसी-पिटी लकीर से किसी भी नई पगडंडी पर निकलती है तो नजारा और आनंद अलग होता है. ‘स्त्री’ प्रचार हॉरर कॉमेडी फिल्म के तौर पर किया गया है. यह फिल्म हंसाती और थोड़ा डराती है. साथ-साथ टुकड़ों में ही सही लेकर बदल रहे छोटे शहरों की हलचल,जरूरत और मुश्किलों को भी छूती चलती है.

चंदेरी शहर की मध्यवर्गीय बस्ती के विकी .बिट्टू और जना जवान हो चुके हैं. विकी का मन पारिवारिक सिलाई के धंधे में नहीं लगता. बिट्टू रेडीमेड कपड़े की दुकान पर खुश नहीं है. जना पास कोई काम नहीं है. छोटे शहरों के ये जवान  बड़े शहरों के बयान से बदल रहे हैं. बातचीत में अंग्रेजी शब्दों का इस्तेमाल कर धौंस जमाते हैं.विकी तो ‘चंदेरी के मनीष मल्होत्रा’ के नाम से मशहूर है. उनकी ठहरी और सुस्त जिंदगी में तब भूचाल आता है, जब विकी की मुलाकात अचानक एक लड़की से हो जाती हैं. लड़की का नाम-पता विकी को भी नहीं मालूम.

शहर में चर्चा है पूजा के पहले चार दिनों मेंकोई स्त्री(चुड़ैल) आती है और मर्दों को उठा ले जाती है.वह  केवल उसके कपड़े फेंक जाती है. बिट्टू और जना को लगता है कि विकी के पीछे भी हो ना हो कोई ना कोई स्त्री है. चिंता के साथ ईर्ष्या की वजह से विकी को सावधान करते हैं. गांव के पुस्तक भंडार के मालिक रुद्र चुड़ैलों के विषय के ज्ञाता हैं.  अंदर से डरपोक लेकिन खुद को जानकार बताने वाले रूद्र इन तीनों को सलाह और मदद देते हैं. हास्य के पुट के साथ फिल्म रहस्य और डर भी रचती है. ‘ओ स्त्री कल आना’ का प्रसंग रोचक और कहानी में गुंथा हुआ है.

नई फिल्मों और नई भूमिकाओं के साथ राजकुमार राव के आयाम खुलते जा रहे हैं. इस फिल्म के सामान्य से किरदार को उन्हें शिद्दत और जरूरी भाव के साथ पर्दे पर निभाया है. छोटे शहर के युवकों की शेखी,शर्म और शरारत को वे अच्छी तरह अपनी चाल और भूल  बोलचाल के लहजे में ले आते हैं. उनके साथअपारशक्ति खुराना और अभिषेक बनर्जी की तिगड़ी जमती है. तीनों ने बहुत खूबसूरती से छोटे शहरों के युवकों की मासूमियत और शोखी पकड़ी है. दृश्यों में पंकज त्रिपाठी के आते ही निखार आ जाता है. इस फिल्म के कई दृश्यों में ऐसा लगता है कि कलाकार तत्क्षण अपनी प्रतिक्रिया और बातों से कुछ नया टांक देते हैं, जो उस दृश्य की खूबसूरती को बढ़ा देता है. सुमित अरोड़ा के संवादों का धागा तो उन्हें मिला ही हुआ है.कलाकारों में श्रद्धा कपूर इन सक्षम अभिनेताओं के साथ कदम नहीं मिला पातीं. सीमित भावों की श्रद्धा कपूर को यह सपोर्ट मिल गया है कि वह बाहर से आई लड़की हैं.

अवधी : 108 मिनट
***1/2

Tuesday, August 28, 2018

सिनेमालोक : हिंदी फिल्मों के दर्शक

सिनेमालोक

हिंदी फिल्मों के दर्शक
-अजय ब्रह्मात्मज

पिछले 6 सालों में दिल्ली और हिंदी प्रदेशों मैं हिंदी फिल्मों के दर्शकों की संख्या बढ़ी है. इस बढ़त के बावजूद अभी तक हिंदी फिल्मों की कमाई  में मुंबई की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा होती है. ताजा आंकड़ों के अनुसार इस साल मुंबई की हिस्सेदारी 31.37 प्रतिशत रही है.2012 में मुंबई की हिस्सेदारी 36.28 प्रतिशत थी. लगभग 5 प्रतिशत  की कमी शिफ्ट होकर दिल्ली और दूसरी टेरिटरी में चली गई है. कारोबार के हिसाब सेभारत में 13 टेरिटरी की गणना होती है. दशकों से ऐसा ही चला रहा है. इनके नए नामकरण और क्षेत्रों के विभाजन पर कभी सोचा नहीं गया.  मसलन अभी भी सीपी, ईस्ट पंजाब और निजाम जैसी टेरिटरी चलती हैं. राज्यों के पुनर्गठन के बाद इनमें से कई टेरिटरी एक से अधिक राज्यों में फैली है. पारंपरिक रूप से दिल्ली और यूपी एक ही टेरिटरी मानी जाती है.
हिंदी प्रदेशों के हिंदी भाषी दर्शक इस भ्रमित गर्व में रहते हैं हिंदी फिल्में उनकी वजह से ही चलती हैं. सच्चाई यह है राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों को मिलाने के बावजूद फिल्मों की कुल कमाई में हिंदी प्रदेशों का प्रतिशत 25 से अधिक नहीं होता. बिहार-झारखंड का ही उदाहरण लें तो इस साल बढ़त के बावजूद उनका योगदान 2.9 प्रतिशत है. मैसूर,ईस्ट पंजाब और वेस्ट बंगाल का योगदान 5 प्रतिशत से अधिक ही है. हिंदीभाषी दर्शकों को निराधार इतराने से निकलना चाहिए. कोशिश होनी चाहिए कि वे थियेटर में जाकर फिल्में देखें. जाहिर सी बात है कि हिंदी प्रदेशों में ज्यों-ज्यों  मल्टीप्लेक्स बढ़ेंगे त्यों-त्यों दशकों में इजाफा होगा.
पिछले 6 सालों में मुंबई समेत सीआई, राजस्थान, निजाम और उड़ीसा में हिंदी फिल्मों के दर्शकों की संख्या में गिरावट आई है, जबकि दिल्ली-यूपी, ईस्ट पंजाब,सीपी, मैसूर, वेस्ट बंगाल, बिहार-झारखंड, आसाम और टीएनके में हिंदी फिल्मों के दर्शक बढे हैं.यह परिवर्तन शुभ है. दर्शकों की तादाद फिल्मों के विषय तय करती है. गौर करें तो पिछले कुछ सालों में हिंदी फिल्मों की कहानियां मुम्बई से निकल कर देश के अंदरूनी इलाकों में जा रही हैं. निश्चित ही हिंदी प्रदेशों में हिंदी फिल्मों के दर्शक हैं. यह स्वाभाविक है. दिक्कत यह है कि इन दर्शकों में से अधिकांश सिनेमाघरों में जाकर फिल्में नहीं देखते.इसके कई कारण हैं. सिनेमाघर लगातार टूट और बंद हो रहे हैं.कस्बों के सिनेमाघरों पर ताले लग रहे हैं.पहले रिपीट या देर से रिलीज की सुविधा होने से छोटे सिनेमाघरों में भी फिल्में आ जाती थीं. अब नई से नई फिल्म रिलीज के दिन ही देश-विदेश में पहुंच जाती हैं.रिलीज के वीकेंड ।इन ही दर्शक फिल्में देखना चाहते हैं. सिनेमाघर न होने से वंचित दर्शक दूसरे प्लेटफार्म पर फिल्में देख लेते हैं. मुम्बई के निर्माताओं को यकीन नहीं होगा,लेकिन यही कड़वा तथ्य है कि दर्शक स्मार्टफोन पर उनकी ताज़ा फिल्में देख रहे हैं.
दर्शकों की प्राथमिकताओं का खयाल रखते हुए निर्माताआ,वितरक और प्रदर्शकों को युक्ति निकालनी पड़ेगी. मोबाइल नेटवर्क,डाटा डिस्ट्रीब्यूटर और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म की मदद से वे दर्शकों तक पहुंच कर खो रहे रेवेन्यू को हासिल कर सकते हैं. छोटे और स्मार्ट सिनेमाघरों के निर्माण पर भी ध्यान देने की ज़रूरत है. काम सीटों और आधुनिक सुविधाओं से लैस सिनेमाघर हों. स्थिति यह है कि राज्यों की राजधानियों के बाहर के शहरों-कस्बों में सिनेमाघर बनाने में प्रशासन और स्थानीय व्यापारियों का ध्यान नहीं है। इसके साथ ही मौजूद मल्टीप्लेक्स में टिकट दर भी कम करना होगा.

Tuesday, August 21, 2018

सिनेमालोक : निक और प्रियंका : प्रशंसकों की आशंका


सिनेमालोक

 निक और प्रियंका : प्रशंसकों की आशंका

-अजय ब्रह्मात्मज

 अमेरिका के गायक निक जोनस और अमेरिका में नाम कमा रही भारतीय अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा का अभीरोकाहुआ है. शादी अभी दूर है. दोनों में से किसी नेअभी तक इसका संकेत नहीं दिया है.रोका’(मंगनी) हुआ है तो देर-सवेर शादी भी होगी. दोनों सेलिब्रिटी हैं. उनके सामने उनका भविष्य और कैरियर हैं. जाहिर सी बात है कि फुरसत पर सुविधा होने पर दोनों परिणय सूत्र में बंध जाएंगे. अभी कहना मुश्किल है कि शादी के बाद उनका आशियाना भारत में होगा या अमेरिका में? किसी भी देश को वे अपना स्थायी ठिकाना बनाएं. इतना तय है कि दोनों में से कोई भी कैरियर से संन्यास नहीं लेगा.दोनों एक-दूसरे की जरूरतों का ध्यान रखते हुए परस्पर मदद ही करेंगे.
निक जोनस और प्रियंका चोपड़ा के साथ होने से दोनों के परिजन और प्रशंसक खुश हैं. परिजनों को तो मालूम रहा होगा लेकिन प्रशंसकों के लिए इतनी जल्दबाजी में सब कुछ हो जाना हैरानी की बात है. अमूमन सेलिब्रिटी शादी जैसे बड़े फैसले में वक्त लगाते हैं. ज्यादा उन्हें अपने कैरियर का ख्याल रहता है. भारत में खुद को स्थापित करने के बाद प्रियंका चोपड़ा ने अमेरिका के टीवी और फिल्म जगत में भी जोरदार दस्तक दी है. वहां उन्हें अभी और भी मंजिलें तय करनी है .वह भारत मैं हिंदी फिल्म भी कर रही हैं. उन्होंने अपने समय और फोकस को बहुत अच्छी तरह दोनों महाद्वीपों में बांट रखा है. दूसरी तरफ निक जोनस अभी अपने करियर की चढ़ाई पर हैं. उन्हें कामयाबी के अनेक पायदान चढ़ना है.इस पृष्ठभूमि में दोनों को बहुत सोच-समझकर अपने कदम उठाने होंगे. दोनों कामयाब होने के साथ इतने समझदार हैं कि वे अपने भविष्य विवाह को लेकर उचित निर्णय ले सकें.
 प्रियंका चोपड़ा और निक जोनस  की उम्र में 11 साल का फर्क है. प्रेम और विवाह में ऐसे फर्क सचमुच कोई फर्क नहीं पड़ता. फिल्म  बिरादरी में अनेक जोड़ियों के बीच उम्र का यह फासला रहा है. दिलीप कुमार और सायरा बानो की उम्र में 22 सालों का अंतर है. असल चीज होती है मोहब्बत और समझदारी.  बाकी उम्र तो एक अंक मात्र है. फिर भी उन दोनों के बीच से उम्र का यह अंतर और पूर्व एवं पश्चिम से होने की वास्तविकता से उनके प्रशंसक आशंकित हैं.रोकाके दिन ही उनके घोर प्रशंसक  पत्रकार ने चिंता व्यक्त की,’ क्या लगता है? दोनों की शादी चल पाएगी?’ मैंने उनकी चिंता की वजह पूछी. उनके पास कोई ठोस आधार नहीं था फिर भी वे  उन आशंकित प्रशंसकों की चिंता ही जाहिर कर रहे थे,जिन्हें लगता है कि निक जोनस और प्रियंका चोपड़ा की शादी टिकने वाली नहीं है.
आज मिलेनियल पीढ़ी के इस दौर में रिश्ते स्थायी होने के पहले ही दरकने लगते हैं. ऐसा माना और कहा जाता है कि नई पीढ़ी त्याग और जिम्मेदारियों से भागती है. दबाव पड़ने पर वे एक-दूसरे का सहारा बनने के बजाय पहले मौके पर कन्नी काट लेते हैं. पिछली और पुरानी पीढ़ी ने मिलेनियल पीढ़ी के बारे में गलत धारणाएं बना रखी हैं. पीढ़ियों के अंतर के बीच पल रही ऐसी गलतफहमियां नई नहीं है. फिल्मों से ही उदाहरण लें अतीत में अनेक अभिनेत्रियों ने विदेशियों से शादी की और आज सुखी दांपत्य जीवन जी रही हैं. प्रीति जिंटा,सेलिना जेटली,श्रिया सरन और राधिका आप्टे का उदाहरण मौजूद है. प्रियंका चोपड़ा बुद्धिमान है.  खुद निक जोनस उनकी बुद्धिमत्ता के कायल हैं. हम आशंकाओं को किनारे रख कर हम तो यही चाहेंगे दोनों सुखी और संपन्न रहें.


Thursday, August 16, 2018

फिल्म समीक्षा : सत्यमेव जयते

फिल्म समीक्षा : सत्यमेव जयते 

सत्य की जीत 
-अजय ब्रह्मात्मज

शब्दों को ढंग से संवाद में पिरोया जाये तो उनसे निकली ध्वनि सिनेमाघर में ताली बन जाती है.मिलाप मिलन जावेरी की फिल्म 'सत्यमेव जयते' देखते समय यह एहसास होता है कि लेखक की मंशा संवादों से तालियाँ बटोरने की है.मिलाप को 10 में से 5 मौकों पर सफलता मिलती है.

पिछले दिनों एक निर्देशक बता रहे थे कि हिंदी फिल्मों के संवादों से हिंदीपन गायब हो गया है.लेखकों से मांग रहती  है कि वे संवादों में आम बोलचाल की भाषा लिखें.कुछ फिल्मों के लिए यह मांग उचित हो सकती है,लेकिन फिल्में इक किस्म का ड्रामा हैं.उनके किरदार अगर अडोस-पड़ोस के नहीं हैं तो संवादों में नाटकीयता रखने में क्या हर्ज है. 'सत्यमेव जयते' संवादों के साथ ही चरित्र चित्रण और प्रस्तुति में भी नौवें दशक की याद दिलाती है. यह वह समय था,जब खानत्रयी का हिंदी सिनेमा के परदे पर उदय नहीं हुआ था और हिंदी सिनेमा घिसी-पिटी एकरसता से गर्त में जा रही थी. इस फिल्म के प्रीव्यू शो से निकलती एक फिल्म पत्रकार की टिपण्णी थी - बचपन याद आ गया.

'सत्यमेव जयते' हिंदी सिनेमा की मुख्यधारा की दशकों पुराणी तलछट पर बचे कर्कटों को जुटा कर बनायी गयी फिल्म है.इस फिल्म को देखना किसी नॉसटेलजिक फीलिंग से भर जाना है.थोड़े उम्रदराज दर्शकों को यह उनकी किशोरावस्था और जवानी के दिनों में ले जाएगी तो मिलेनिअल पीढ़ी को पुराने स्वाद से परिचित कराएगी. वे अपने दोस्तों के साथ इस फिल्म का मजाक उड़ाते हुए भी मज़े ले सकते हैं.फिल्म का शिल्प इतना साधारण है कि वह रस देने लगता है.

फिल्म में कानून के साथ और कानून अपने हाथ में लेकर चलने वाले दो किरदार हैं. दोनों आमने-सामने हैं.हम किसी एक को विलेन भी नहीं कह सकते.फिल्म की टैग लाइन 'बेईमान पिटेगा,भ्रष्टाचार मिटेगा' के अनुसार दोनों का मकसद एक ही है लेकिन उनके रास्ते अलग हैं.फिल्म रोचक तरीके से आगे बढती है.लेखक ने दोनों प्रमुख किरदारों की तनातनी को अलग अंदाज में पेश भी किया है,लेकिन जैसे ही उनके रिश्ते की जानकारी मिलती है...कहानी कमज़ोर पड़ जाती है. उसके बाद की कहानी के मोड़ दर्शक भी लिख सकते हैं.हां,यह फिल्म इतनी प्रेडिक्टेबल है. फिर भी दर्शक बंधे हुए बैठे रहेंगे,क्योंकि उनके सामने परदे पर अभिनेता मनोज बाजपेयी हैं.वे अपनी अदाकारी से हिलने नहीं देते.

कई दृश्यों में निर्देशक यूँ लिप्त हुए हैं कि सीन का उद्देश्य पूरा होने के बाद भी कैमरा बंद नहीं करते,उधर दर्शक को होने लगता है कि अब हो न गया...हम समझ गए,अगले सीन पर चलो..और एक्टर को उस सीन में हर कुछ सेकंड के बाद पूरी ऊर्जा से इमोशन के अगले पायदान पर चढ़ना होता है.थक गए होंगे मनोज बाजपेयी. इस फिल्म में  'शूल' के समर प्रताप सिंह की भी याद आती है.

अब तो जॉन अब्राहम भी एक्टिंग करते दिखने लगे हैं. 

अच्छा एक सवाल है कि हिंदी फिल्मों के ईमानदार पुलिस अधिकारी राठोड़ या प्रताप सिंह ही क्यों होते हैं? क्या उस सरनेम से ईमानदारी टपकती है,जो चौधरी,यादव या पासवान सरनेम रखने से नहीं टपकेगी?

अवधि 140 मिनट 
*** तीन स्टार 

Wednesday, August 15, 2018

फिल्म समीक्षा : गोल्ड

फिल्म समीक्षा : गोल्ड 
एक और जीत 

-अजय ब्रह्मात्मज 

इस फिल्म में अक्षय कुमार हैं और इसके पोस्टर पर भी वे ही हैं. उनकी चर्चा बाद में.

'गोल्ड' के बारे में प्रचार किया गया है कि यह 1948 में लंदन में आयोजित ओलिंपिक में आजाद भारत की पहली जीत की कहानी है.तपन दास के निजी प्रयास और उदार वाडिया के सहयोग से यह संभव हो सका था.तपन दस 1936 के उस विख्यात मैच के साक्षी थे,जब बर्लिन में बिटिश इंडिया ने गोल्ड जीता था.तभी इम्तियाज़ और तपन दास ने सोचा था कि किसी दिन जीत के बाद भारत का तिरंगा लहराएगा.आखिरकार 22 सालों के बाद यह सपना साकार हुआ,लेकिन तब इम्तियाज़ पाकिस्तानी टीम के कप्तान थे और तपन दास भारतीय टीम के मैनेजर.तपन दास भारत के पार्टीशन की पृष्ठभूमि में मुश्किलों और अपमान के बावजूद टीम तैयार करते हैं और गोल्ड लाकर 200 सालों कि अंग्रेजों कि ग़ुलामी का बदला लेते हैं.

'गोल्ड' जैसी खेल फ़िल्में एक उम्मीद से शुरू होती है. बीच में निराशा,कलह,मारपीट और अनेक रोचक मोड़ों से होते हुए फतह की ओर बढती है.सभी खेल फ़िल्में या खिलाडियों के जीवन पर आधारित फिल्मों का मूल मंत्र हिंदी फिल्मों का आजमाया मंत्र है-अंडरडॉग कि जीत.इन दिनों खेल और खिलाडियों के जीवन पर आधारित फिल्मों में राष्ट्रवाद का नवाचार चल रहा है.निर्मात,लेखक और निर्देशकों को राष्टवादी जमात में खड़ा होने का अच्छा मौका मिल जाता है.राष्ट्र गौरव की बात,देश की जीत,कुछ राष्ट्रप्रेमी संवाद और तिरंगा फहराने के साथ 'जन गन मन' का सस्वर या सांगीतिक पाठ.इन मसलों के होने पर फिल्म कीकहानी,चरित्रों के निर्वाह,प्रस्तुति और अन्विति पर दर्शकों का ध्यान नहीं जाता.वे दर्प के साथ अच्छी फीलिंग लेकर सिनेमाघरों से निकलते हैं.'गोल्ड' बिलकुल इसी प्रकार की फिल्म है.

यह सच्ची घटना पर आधारित काल्पनिक कहानी है.अगर इन्टरनेट पर भी खोज लें तो पता चल जायेगा कि पूरी टीम और खिलाडियों के नाम अलग थे.सवाल है कि ऐसी काल्पनिकता कि ज़रुरत क्यों होती है? वास्तविक खिलाडियों के नाम के साथ बी तो यह फिल्म बनायीं जा सकती थी.फिल्म में ज़िक्र होता है कि टीम पंजाब के 6 खिलाडी हैं,जबी मूल टीम में बॉम्बे के 6 खिलाडी थे.तपन दास का किरदार कमोबेश तत्कालीन टीम के कप्तान किशन लाल पर आधारित है.तथ्यों के अन अंतरों को नज़रन्दाज कर फिल्म देखें तो 'गोल्ड' निराश नहीं करती.

रीम कागटी ने आज़ादी के दौर को वास्तु,वस्र,माहौल और प्रोडक्शन के इहज से रचा है. उनकी टीम के योगदान को श्री मिलना चाहिए.केवल अक्षय कुमार और उनकी बीवी मोनी रॉय के किरदारों में थोड़ी आज़ादी इ गयी है या ढील दी गयी है.अक्षय कुमार कभी तो बंगाली लहजा ले आते हैं और कभी खालिस हिंदी बोलने लगते हैं.सहयोगी किरदारों को निभा रहे कलाकार ऐसी गलती नहीं करते.उन सभी ने अपने किरदारों को मजबूती से थम रखा है. उनकी मेहनत और लगन से ही फिल्म का प्रभाव बढ़ता है.वे किरदार याद रह जाते हैं.

इस फिल्म में सनी कौशल और विनीत कुमार सिंह संक्षिप्त भूमिकाओं के बावजूद प्रभावी हैं.उन्हें कुछ प्रभापूर्ण दृश्य मिले हैं और उन्होंने उन दृश्यों अपनी क्षमता का परिचय दिया है.किरदार के मूल स्वाभाव को समझ कर जब किरदार हव-भाव और संवाद अदायगी पर मेहनत करते हैं तो किरदार निखारते है.दिखने लगते हैं.इन दोनों के साथ अमित साध और कुनाल कपूर भी कदम मिला कर चलते हैं.अमित ने ठाकुर परिवार के एटीट्युड को साधा है और अंत तक निभाया है.

अक्षय कुमार का अभ्यास कहें या रीमा कागटी का प्रयास मानें...इस फिल्म में अक्षय कुमार कुछ दृश्यों में सधे और सटीक अभिनय से प्रभावित करते हैं.उम्र,अनुभव और विषयों की विविधता से उनके अभिनय में आया गुणात्मक बदलाव इस फिल्म में दिखता है.

रीमा कागती और उनकी टीम ने बेहतरीन प्रयास किया है.इस फिल्म का पार्श्व संगीत फिल्म की थीम को असरदार बनता है.

अवधि 153 मिनट
*** 1/2 साढ़े तीन स्टार 

Tuesday, August 14, 2018

सिनेमालोक : इस 15 अगस्त को

सिनेमालोक

 इस 15 अगस्त को 

-अजय ब्रह्मात्मज

कल 15 अगस्त है. दिन बुधवार... बुधवार होने के बावजूद दो फिल्में रिलीज हो रही हैं. अमूमन हिंदी फिल्में शुक्रवार को रिलीज होती हैं, लेकिन इस बार दोनों फिल्मों के निर्माताओं ने जिद किया कि वे दो दिन पहले ही अपनी फिल्में लेकर आएंगे. रिलीज की तारीख को लेकर वे टस से मस ना हुए. दोनों 15 अगस्त की छुट्टी का लाभ उठाना चाहते हैं. इस तरह उन्हें पांच दिनों का वीकेंड मिल जाएगा. इन दिनों शुक्रवार को रिलीज हुई फिल्मों के बारे में रविवार इन दिनों में पता चल जाता है एक ऐसा व्यवसाय करेगी?  इस बार परीक्षा के लिए दोनों फिल्मों को पांच दिनों का समय मिल जाएगा.देखना रोचक होगा इन दोनों फिल्मों को दर्शक क्या प्रतिसाद देते हैं? रीमा कागटी कीगोल्डऔर मिलाप मिलन झावेरी की फिल्मसत्यमेव जयतेआमने-सामने होंगी.

पहली फिल्मगोल्डकी पृष्ठभूमि में हॉकी है. हॉकी खिलाड़ी तपन दास के नेतृत्व में 1948 में भारत ने पहला गोल्ड जीता था. पिछले रविवार को इस उपलब्धि के 70 साल होने पर देश के सात स्थापत्यों और जगहों को सुनहरी रोशनी से आलोकित किया गया था.रीमा कागटी ने सच्ची घटना पर इस फिल्म की कहानी लिखी है. कहते हैं तपन दास के बारह सालों के अथक प्रयासों से यह मुमकिन हो पाया था. आजाद भारत में इंग्लैंड की धरती पर देश का पहला गोल्ड मेडल जीता था. राष्ट्र गौरव के क्षण को हाईलाइट करने के साथ ही जीत के संघर्ष और तैयारी पर भी रीमा ध्यान देंगी. विजेता टीम बनाना उसमें जीत का जोश भरना आसान काम नहीं रहा होगा. अक्षय कुमार इस फिल्म में तपन दास की भूमिका निभा रहे हैं.  उनकी टीम में विनीत कुमार सिंह, कुणाल कपूर, अमित साध  और सनी कौशल जैसे कलाकार हैं.

 ‘गोल्डके सामनेसत्यमेव जयतेरहेगी. मिलाप मिलन झावेरी ने आज के दौर की फिल्म में भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाया है. हम सभी जानते हैं कि भ्रष्टाचार ने देश को ग्रस्त रखा है. सीधा और ईमानदार नागरिक भ्रष्टाचारियों के चंगुल में फंसते हैं. देश को आर्थिक नुकसान होता है. प्रगति और विकास की योजनाएं रुक जाती हैं.सत्यमेव जयतेमें  जॉन अब्राहम और मनोज बाजपेयी की टक्कर दिखेगी. पहली बार दोनों कलाकार किसी फिल्म में एक साथ आ रहे हैं. इस फिल्म की कैच लाइन है -  ‘बेईमान पिटेगा, करप्शन मिटेगा’. मनोज बाजपेयी एक बार फिर पुलिस अधिकारी की भूमिका में बहादुरी दिखाएंगे. हाल ही में उन्हें ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न मेंगली गुलियां' फिल्म के लिए  एक्टर अवार्ड मिला है.

गौर करें तो दोनों ही फिल्मों की थीम राष्ट्र और देश प्रेम है. इसी वजह से उनके निर्माताओं ने रिलीज के लिए 15 अगस्त का दिन चुना है. राष्ट्रीय भावना से लबरेज इस दिन को थिएटर जा रहे दर्शकों में यह फिल्में देश प्रेम और राष्ट्रीयता का संचार करेंगी. इन दिनों हिंदी फिल्मों में राष्ट्रवाद का नवाचार चल रहा है. फिल्में किसी भी जोनर की हों . लेखक और निर्देशक की कोशिश रहती है कि किसी दृश्य, संवाद या गाने में राष्ट्र से संबंधित कुछ संदेशात्मक बातें हों.यह तरीका बहुतों को पसंद आ रहा है. अक्षय कुमार इस दौर केभारत कुमारबन गए हैं. कवि मनोज कुमार को हम इस नाम से जानते थे.  अक्षय कुमार के ठीक पीछे जॉन अब्राहम खड़े हैं. उन्होंने परमाणु’  में संकेत दिया  कि वे भी अक्षय कुमार के रास्ते पर चल रहे हैं.

देखना रोचक होगा की इस हफ्ते दर्शक किस राष्ट्रप्रेमी को अधिक पसंद करते हैं. दोनों फिल्मों के निर्माताओं और कलाकारों ने प्रचार का हर जोर लगा रखा है. वे दर्शकों को अपनी फिल्मों के लिए लुभा रहे हैं.


Thursday, August 9, 2018

दरअसल करण जौहर की ‘तख़्त' में मुग़ल सल्तनत


दरअसल
करण जौहर कीतख़्त' में मुग़ल सल्तनत
-अजय ब्रह्मात्मज

करण जौहर ने आज अपनी नई फिल्मतख़्त' की घोषणा की है. अभी केवल यह बताया गया है कि यह फिल्म 2020 में आएगी. इस फिल्म में रणवीर सिंह, करीना कपूर खान, आलिया भट्ट, विकी कौशल, भूमि पेडणेकर, जान्हवी कपूर और अनिल कपूर मुख्य भूमिकाओं में हैं. धर्मा प्रोडक्शन की यह सबसे महत्वाकांक्षी फिल्म है. इस फिल्म से करण जौहर की एक नई निर्देशकीय यात्रा शुरू होगी. वह इतिहास के किरदारों को भव्य भंगिमा के साथ पर्दे पर ले आयेंगे. इस फिल्म की कहानी सुमित राय ने लिखी है  घोषणा के अनुसार  इसके संवाद  हुसैन हैदरी  और सुमित राय लिखेंगे. घोषणा में तो नहीं लेकिन करण जौहर ने एक ट्विट में सोमेन मिश्र का उल्लेख  किया है.
दरअसल, इस फिल्म के पीछे सोमेन मिश्रा का बड़ा योगदान है.उन्होंने ही इस फिल्म की स्क्रिप्ट तैयार करवाई है.तख्तमुग़ल सल्तनत के के बादशाह शाहजहां के अंतिम दिनों की कहानी होगी. बादशाह बीमार हो गए थे और उनके बेटों के बीच तख़्त पर काबिज होने की लड़ाई चालू हो गई थी. हम सभी जानते हैं कि शाहजहां के बाद औरंगजेब हिंदुस्तान के बादशाह बने थे. औरंगजेब की छवि कट्टर मुसलमान शासक की है, जिन्होंने अपने हिसाब से इस्लाम को भारत में फैलाने और मजबूत करने की कोशिश की.उनके शासन कल में ही मुग़ल सल्तनत की चूलें हिलीं और फिर देखते-देखते वह साम्राज्य ख़त्म हो गया. शाहजहां औरंगजेब के दिमाग,इरादे और हरकतों से वाकिफ थे. उन्होंने औरंगजेब को अपनी नजरों से दूर भी रखा था. उनकी ख्वाहिश थी कि तख्त का वारिस उनका बड़ा बेटा दारा हो. दारा का पूरा नाम दारा शिकोह था.वे संत और सूफी मिजाज के इन्सान थे.
तख़्त राज परिवार की कहानी है.इसमें छल-कपट,ईर्ष्या,महत्वाकांक्षा,धोखा,मोहब्बत और तख़्त हथियाने का ड्रामा है.करण जौहर परिवार की कहानी से आगे बढ़ कर राज परिवार की कहानी सुनाने-दिखाने आ रहे हैं.हिंदी सिनेमा का यह नया दौर बेहद रोचक और विशाल होने जा रहा है.बाहुबली' की कामयाबी ने सभी को संकेत दिया है कि भारतीय इतिहास और मिथक को परदे पर लाने का समय आ गया है.इतिहास के किरदारों को झाड-पोंछ कर जिंदा किया जा रहा है.करण जौहर की घोषणा के पहले ही आशुतोष गोवारिकरपानीपत' में जुटे हैं  तो डॉ चंद्रप्रकाश द्विवेदीपृथ्वीराज' की तैयारी कर रहे हैं..डॉ चंद्रप्रकाश द्विवेदी के नाम से याद आया की कभी वह दारा शिकोह के जीवन पर फिल्म बनाने की सोच रहे थे.उनकी सनी देओल से आरंभिक बातें भी हुई थीं.फिल्म नहीं बन सकी तो उन्होंने दूरदर्शन के धारावाहिकउपनिषद गंगा' में दारा शिकोह पर दो एपिसोड किये थे.उपनिषद गंगा' के पांचवें एपिसोड के दो खण्डों में दारा शिकोह की झलक मिल जाएगी.
फिल्म की कास्टिंग से स्पष्ट है कि यह सिर्फ औरंगजेब और दारा शिकोह के संघर्ष और विजय की कहानी नहीं है. इसमें उनकी दोनों बहनें जहांआरा और रोशनआरा की भी भूमिकाएं हैं. जहांआरा विदुषी और दारा के मिजाज की थीं,इसलिए वह बड़े भाई के समर्थन में थीं.और रोशनआरा महल में रहते हुए औरंगजेब की मदद कर रही थीं.इतिहास गवाह है की सल्तनत कोई भी हो,बादशाहत के लिए भाइयों और रिश्तेदारों में खूनी संघर्ष होते रहे हैं.औरंगज़ेब ने अपने वालिद शाहजहाँ की ख्वाहिश के खिलाफ जाकर दारा को बंदी बनाया और सजा-ए-मौत दी. वह खुद बादशाह बना और उसने शाहजहाँ को भी कैदी बना दिया.उसने देश के रियाया पर ज़ुल्म किया. सच तो यही है कि उसके फैसलों से आख़िरकार मुग़ल सल्तनत का ही नुकसान हुआ.
कहते हैं शाहजहाँ के तख्त्नशीं होने के पहले ही जहाँगीर ने लाहौर के पीर मियां मीर को आगरा बुलाया था.हर तरह के मुशाव्रे के बाद उन्होंने शाहजहाँ के चारों बेटे दारा,शूजा,मुराद और औरंगजेब से उन्हें मिलवाया और पूछा था कि इनमें से कौन बादशाह हो सकता है? मियां मीर ने दारा की तरफ इशारा किया था.दारा जहीन और नेकदिल था.वह पढने-लिखने में रूचि रखता था.उसने 14 साल की छोटी उम्र में अपनी लाइब्रेरी में पढ़ा कि मोहम्मद गजनी ने भारत पर आक्रमण कर सोमनाथ मंदिर को लूटा था. दारा को यह बात समझ में नहीं आई. उन्होंने मिया मीर से अपनी जिज्ञासा रखी.मियां मीर ने उन्हें भारतीय वेद और उपनिषद पढने की सलाह दी और साथ ही कहा कि उपनिषद का फारसी में अनुवाद करो.हिन्दू शास्त्रों में दारा की रूचि को औरंगजेब ने इस्लाम के खिलाफ कह कर प्रचार किया और मुल्लों को लामबंद किया. उसने यह बात फैलाई कि काफ़िर दारा तख़्त पर बैठा तो हिंदुस्तान में इस्लाम का नाम-ओ- निशां नहीं रह जायेगा. उसने धर्म के नाम पर तख़्त हथियाने की साजिशें कीं और कामयाब रहा..
अगर दारा शिकोह को तख़्त मिला होता तो आज हिंदुस्तान कुछ और होता.धर्म के नाम पर चल रही लड़ाइयाँ सदियों पहले ख़त्म हो गयी होतीं. उम्मीद है कि करण जौहरतख़्त' में इस पक्ष को भी रखेंगे.


Wednesday, August 8, 2018

सिनेमालोक : फैशन पत्रिका के कवर पर सुहाना


सिनेमालोक
 फैशन पत्रिका के कवर पर सुहाना
-अजय ब्रह्मात्मज

महंगी फैशन पत्रिकावोग' के कवर पर सुहाना खान का आना अस्वाभाविक नहीं है.वह शह रुख खान की बेटी हैं.फिल्मों में काम करने को उत्सुक हैं.उनकी इस उत्सुकता के बारे में शाह रुख खान अपने इंटरव्यू में बता चुके हैं.किसी समय वे सुहाना के लिए अभिनय के टिप्स कलमबद्ध कर रहे थे.सुहाना आगे की पढाई के लिए फ़िलहाल अमेरिका जा रही है. यह तय है कि देर-सवेर वह फिल्मों में ज़रूर काम करेंगी, बिना शक उन्हें अच्छी लॉन्चिंग मिलेगी. फिल्मों के आने के पहले से वह सेलिब्रिटी का दर्जा रखती हैं.फिल्म की घोषणा के साथ उनका स्टारडम भी निश्चित है. आगे सब कुछ  उनकी प्रतिभा पर निर्भर करेगा. फिल्म बिरादरी के बच्चों को मौके आसानी से मिल जाते हैं और बार-बार मिलते हैं,लेकिन दर्शक ही उनका भविष्य तय करते हैं.
चर्चा गर्म है कि क्या सुहाना खान अपनी योग्यता से फैशन पत्रिका के कवर पर आई हैं? बिलकुल....फ़िलहाल शाह रुख खान की बेटी होना ही उनकी योग्यता है. इस योग्यता को नज़रन्दाज नहीं किया जा सकता. भारत उपमहाद्वीप में जीवन के सभी क्षेत्रों में माता-पिता के पेशों में आ रहे बच्चों को वरीयता मिलती है. उन्हें आम दर्शक,पाठक और नागरिक सहज ही स्वीकार कर केते हैं. सार्वजानिक जीवन में राजनीति इसका सबसे बड़ा उदहारण है. तेजस्वी यादव से लेकर राहुल गाँधी तक हम यही देख रहे हैं. फिल्मों में यह सिलसिला बहुत पुराना है. भाई-भतीजावाद चल रहा है,जिसे कंगना रनोट ने साफ़ शब्दों मेंनेपोटिज्मकहते हुए करण जौहर को उसका सबदे बड़ा पैरोकार बताकर हलचल मचा दी थी. उसी सन्दर्भ में लोग सुहाना के कवर पर आने को भी देख रहे हैं. अज मीडिया समेत सभी को आपति हो रही है.
गौर करें तो स्टारकिड पर मीडिया का ध्यान रहता है.पाठकों के अतिरिक्त आकर्षण के लिए वे स्टार के नन्हे शिशुओं की तस्वीरों के लिए लालायित रहते हैं.कायदे से तभी आपति और खुद पर रोक होनी चाहिए. उन्हें बच्चों की तस्वीरों के लिए हडकंप नहीं मचना चाहिए. अभी करीना कपूर खान और सैफ अली खान का बेटा तैमूर मीडिया की आँखों का तारा बना हुआ है.एक फिल्म स्टार ने तैमूर का उल्लेख करते हुए पूछा कि उसकी तस्वीर छापने का कम्पीटीशन क्यों चल रहा है? बाकी स्टारों के बच्चों की तरफ कैमरे लगे रहते हैं. यह सवाल अपनी जगह वाजिब है,लेकिन उस स्टार के पास इसका जवाब नहीं था कि बच्चे तो आमिर और अजय देवगन के भी हैं,लेकिन उनकी तस्वीरें क्यों नहीं छपतीं? मीडिया और पापाराज़ी के जानकार बता सकते हैं कि उन्हें इन बच्चों के मूवमेंट की अग्रिम जानकारी दे दी जाती है.बता दिया जाता है कि कौन कब और कहाँ पहुँच रहा है? स्टार खुद भी कहते हैं.तभी तोएअरपोर्ट लुक' की उनकी तस्वीरें लगातार छपती रहती हैं.
वोग' पत्रिका के कवर पर सुहाना का आना अनायास नहीं है. यह दोतरफा ज़रुरत से संभव हुआ है. शाह रुख खान की बेटी 18 की हो चुकी हैं.सुहाना के माता-पिता चाहते हैं कि उनकी बेटी के फिल्मों में आगमन का सही माहौल बने. लॉन्चिंग में वे कोई कसर नहीं छोड़ेंगे. इस कवर को जरी करते समय भी शाह रुख खान ने स्पष्ट शब्दों में कहा किहमारे कुछ दोस्त हैं जो हमारे बच्चों को अपना ही समझते हैं. वो उन्हें (सुहाना) लॉन्च करने को तैयार हैं.पत्रिका के कवर पर आना भी ऐसी चाहत का नमूना है. सभी देश के लोकप्रिय स्टार को खुश करना चाहते हैं. इसमें उनका अपना फायदा होता है. अबी इसी कवर की वजह से उन्हेंवोग ब्यूटी अवार्ड्स' के लिए शाह रुख खान मिल गए. और आप देखें कि इस कथित चर्चा और विवाद की वजह से पत्रिका का कितना उल्लेख हुआ? सुहाना को क्या फायदा हुआ? उसके बारे में फिर कभी बातें करेंगे.