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Friday, June 29, 2018

फिल्म समीक्षा : संजू


फिल्म समीक्षा
संजय दत्त की निगेटिव छवि और खलनायक मीडिया
संजू
अजय ब्रह्मात्मज
अवधि-161 मिनट
            कुछ दिनों पहले राजकुमार हिरानी से संजूफिल्म के बारे में बातचीत हुई थी. इस बातचीत के क्रम में उनसे मेरा एक सवाल था कि संजय दत्त की पिछली दो फिल्मों मुन्ना भाई एमबीबीएसऔर लगे रहो मुन्नाभाईमें क्रमशः जादू की झप्पीऔर गांधीगिरीका संदेश था. इस बार संजूमें क्या होगा? उनका जवाब था, ‘इस बार कोई शब्द नहीं है. यह है ? ‘(प्रश्न चिह्न)। संजय दत्त के जीवन के कुछ हिस्सों को लेकर बनीं इस फिल्म में यह प्रश्न चिह्न मीडिया की सुखिर्यों और खबरों पर हैं. फिल्म की शुरुआत में और आखिर में इस प्रश्न चिह्नऔर मीडिया कवरेज पर सवाल किए गए हैं. कुछ सुर्खियों और खबरों के हवाले से मीडिया की भूमिका को कठघरे में डालने के साथ निगेटिव कर दिया गया है. इस फिल्म के लिए श्रेष्ठ खलनायक का पुरस्कार मीडिया को दिया जा सकता है. संजय दत्त के संदर्भ में मीडिया की निगेटिव छवि स्थापित करने के साथ उसे समय का सत्यबना दिया गया है. संजूफिल्म का यह कमजोर पक्ष है.
            फिल्म के ट्रेलर से ही जाहिर हो गया था कि संजय दत्त पर लगे टेररिस्टके कथित दाग को मिटाने की कोशिश हो सकती है. यह फिल्म तर्कों और साक्ष्यों से यह साबित करती है कि संजय दत्त टेररिस्ट नहीं है. फिर मीडिया पर आरोप लगाया जाता है कि उन्होंने कोर्ट के फैसले में संजय दत्त के टेररिस्ट न होने की खबर को प्रमुखता से नहीं छापा. उसे सुर्खियों में नहीं डाला. संजय दत्त की छवि सुधार के प्रति लेखक-निर्देशक की अतिरिक्त सहानुभूति शुरू से लेकर आखिर तक झलकती है. राजकुमार हिरानी और अभिजात जोशी ने अपने पक्ष को रखने के लिए उनके जीवन के उन्हीं प्रसंगों और तथ्यों को चुना हैजो उनकी प्रस्तावना की मदद करें. स्पष्ट रूप से संजय दत्त की मटमैली और विवादित छवि के लिए मीडिया को जिम्मेदार ठहराया गया है. बाद में संजय दत्त और रणबीर कपूर मीडिया की बुराई का पूरा गाना गेट हैं. संजय दत्त की करतूतों को मीडिया की निगेटिव छवि या प्रश्न वाचक सुर्खियों की आड़ में नहीं ढका जा सकता. सच्चाई तो यही है कि ड्रग्स की आदत और गन रखने की भूल से उनकी जिंदगी तबाह हुई. दोनों ही मौकों पर पिता ने उन्हें उवारने और रास्ते पर लाने की सफल कोशिश की. फिल्म में मध्यांतर के पहले संजय दत्त एक दृश्य में कहते हैं कि पिता की लिगेसी मेरे ऊपर भार हो गई है. मैं उसे नहीं ढो सकता. वहीं मध्यांतर के बाद वह पिता का सिर ऊंचा रखने के लिए सरकारी गवाह बन कर जेल से छूटने के मौके को हाथ से जाने देते हैं. फिल्म में संजय दत्त की दुविधाओं का सुविधापूर्ण चित्रण किया गया है उनकी सोच में आये परिवर्तन का विकास नहीं दीखता.
            फिल्म के दो हिस्से हैं पहले हिस्से में ड्रग्स की लत के शिकार संजय दत्त हैं. उन्होंने पहली बार इसलिए ड्रग लिया कि पिता से नाराज  थे. दूसरी बार मां बीमार थीं और तीसरी बार तक उन्हें आदत हो गई थी. पिता के साथ संजय दत्त के संबंध की जटिलता और ग्रंथि में निर्देशक गहराई में नहीं उतरे हैं. बहुत कुछ अनकहा रह गया है। शायद सुनील दत्त जीवित रहते तो उसके पहलू खुलते. दूसरे हिस्से में गनका किस्सा है. एक ही घर में रहते हुए पिता और पुत्र के बीच की संवादहीनता की वजह से ही संजय दत्त परिवार की सुरक्षा के लिए गन मंगवा लेते हैं. क्या बाबरी मस्जिद टूटने के बाद मुंबई में हुए दंगों में सुनील दत्त की भूमिका (मुसलमानों के पक्ष में) पर बाप-बेटे के बीच कोई बात नहीं हुई कभी? फिल्म में केवल यह दृश्य आया है कि संजय दत्त धमकी मिलने पर पिता की सुरक्षा के लिए भागते हैं. बहरहाल, गन रखने की वजह से गिरफ्तार होने के बाद संजय दत्त के साथ जो कुछ हुआ, उसके बारे में एक धारणा है कि उन्हें सुनील दत्त की पार्टी (कांग्रेस) के नेताओं का समर्थन नहीं मिला था। इस प्रसंग के विस्तार में जाने पर कुछ भेद खुलते। साथ ही सुनील दत्त और बाला साहेब ठाकरे की मुलाकात के महत्व और प्रभाव को भी फिल्म नहीं छूती। दोनों ही प्रसंग राजनीतिक हैं और संजय दत्त की स्थिति के लिए महत्वपूर्ण हैं.
            यह फिल्म संजय दत्त और सुनील दत्त के बीच व्यक्त-अव्यक्त पिता-पुत्र संबंधों का भावनात्मक और नाटकीय चित्रण करती है. मां नरगिस बेटे संजय दत्त की जिंदगी की आसन्न तबाही से पहले गुजर जाती हैं. संजय दत्त के बिगड़ने में मां नरगिस की ढील बड़ा कारण है. फिल्म उधर झांकती ही नहीं. यह फिल्म संजय दत्त और उनके दोस्त कमली (कमलेश) के संबंधों की प्रगाढ़ता को बहुत अच्छे तरीके से फिल्म में पिरोती है. संजय दत्त की छवि साफ करने के साथ ही संजूपिता-पुत्र संबंध और दोस्ती की भी कहानी है. लेखक-निर्देशक ने बहुत चालाकी से संजय दत्त के अन्य दुर्बल पक्षों को किनारे कर दिया है. उनके प्रेम प्रसंगों, 350 लड़कियों के साथ कथित सहवास और फिल्म करिअर पर निर्देशक की नजर नहीं है. भरपूर इमोशन छलकाती यह फिल्म कमियों के बावजूद हंसाती और रुलाती है. ड्रामा भी प्रचुर मात्रा में है.
            अभिनय के लिहाज से रणबीर कपूर और विक्की कौशल उल्लेखनीय हैं. दोनों ने श्रेष्ठ और समर्थ अभिनय किया है. इसमें मेक उप के उस्ताद विक्रम गायकवाड का बड़ा योगदान है. विक्की कौशन संजूमें लगभग पैरेलल भूमिका में हैं। वे अपने किरदार के साथ पूरा न्याय करते हैं। उनकी अभिनय क्षमता और बारीकियां प्रभावित करती हैं। सुनील दत्त की भूमिका में परेश रावल गन मामले में मुश्किलों में फंसे बेटे की वजह से टूटे और कमजोर पड़े सुनील दत्त को पर्दे पर नहीं उतार पाते। उन दृश्यों में वे अप्रभावी हैं। मान्यता दत्त की भूमिका में दीया मिर्जा और नरगिस की भूमिका में मनीषा कोईराला ने जरूरत के मुताबिक साथ दिया है। राजकुमार हिरानी की प्रच्छन्न और बदली भूमिका निभा रही अनुष्का शर्मा के पास विस्मित होने के अलावा और कोई भाव नहीं था। यही विस्मय राजकुमार हिरानी को संजय दत्त की जिंदगी में ले गया होगा, जिसका परिणाम संजूहै।
अवधि 161 मिनट
***½ साढ़े तीन स्टार

Thursday, June 28, 2018

दरअसल : ‘संजू’ है बाप-बेटे और दोस्ती की फिल्म


दरअसल
संजू है बाप-बेटे और दोस्ती की फिल्म
-अजय ब्रह्मात्मज
    
राजकुमार हिरानी निर्देशित संजू अगले हफ्ते रिलीज होगी.संजय दत्त की ज़िन्दगी पर आधारित इस फिल्म के बारे में दर्शकों की जिज्ञासा रिलीज की तारीख नज़दीक आने के साथ बढती जा रही है.फिल्म के ट्रेलर में संजय दत्त खुद के बारे में बताते हैं कि वे बेवडा हैं,ठरकी हैं,ड्रग एडिक्ट हैं....सब कुछ हैं,लेकिन टेररिस्ट नहीं हैं. इस ट्रेलर में यह बात दोहराई जाती है.याद होगा जब संजय दत्त सजा पूरी कर आये थे तो उन्होंने मीडिया से गुजारिश की थी कि उन्हें टेररिस्ट न कहा जाए.हो सकता है कि फिल्म में संजय दत्त पर लगे इस दाग को मिटाने की भी कोशिश हो.यूँ राजकुमार हिरानी अपने इंटरव्यू में लगातार कह रहे हैं कि यह फिल्म संजय दत्त की इमेज ठीक करने के लिए नहीं बनायीं गयी है.
हम भी मानते हैं कि राजकुमार हिरानी सरीखा डायरेक्टर इस उद्देश्य से फिल्म नहीं बना सकता.इसी ट्रेलर में हमने संजय दत्त के कुछ सीन पिता सुनील दत्त और दोस्त परेश के साथ के भी देखें हैं.दोस्त के किरदार में तो अनेक दोस्तों की छवियाँ समेटी गयी हैं,लेकिन बाप-बेटे के सम्बन्ध का चित्रण तो उनके बीच का है.इस सम्बन्ध के बारे में संजय दत्त के बताये प्रसंगों,घटनाओं और भावोँ के साथ राजकुमार हिरानी और अभिजात जोशी के जुटाए तथ्य भी होंगे.यह फिल्म बाप-बेटे के रिश्ते और दोस्ती की भी कहानी कहती हैं.पिता जो अडिग भाव से अपने बेटे के साथ खड़े रहे और उन्हें हर मुश्किलों से निकाला. बेटे के प्रति सुनील दत्त के लगाव और एहसास को समझने के लिए इतना ही काफी है कि जब संजय दत्त ठाणे जेल में बंद थे तो वे कई बार रातों को जेल की दीवार से लगी सड़क पर घूमने जाते थे.उन्हें लगता था कि वे अपने बेटे को महसूस कर पा रहे हैं.
१९९६ में क्रिस रोडली ने बीबीसी के चैनल ४ के लिए टू हेल एंड बैक शीर्षक से एक documentry बनायीं थी.संजू फिल्म देखने के पहले या बाद में यह documentry ज़रूर देखनी चाहिए.बहुत संक्षेप में संजय दत्त के जीवन के झंझावातों को समेटती यह फिल्म पिता सुनील दत्त के दर्द को जाहिर करती है. हमें एक परिप्रेक्ष्य भी मिलता है.पिता के दुःख,विवशता और बेटे से हमदर्दी को हम समझ सकते हैं.सुनील दत्त अपने ज़माने के हिसाब से सख्त पिता थे. वे अनुशासन पर बहुत जोर देते थे,लेकिन माँ के लाड-दुलार की आड़ में संजय दत्त हाथ से निकलते गए. वे बिगडैल मिजाज की स्वछन्द ज़िन्दगी जीने वाले कथित बांद्रा बॉयज में शामिल हो गए..वे किसी प्रकार का अंकुश नहीं स्वीकार करते थे.
टू हेल एंड बैक में सुनील दत्त कहते हैं...मेरे बेटे ने जो भी तकलीफ सही,वह मेरी वजह से थी...मेरी विचारधारा,मेरी सोच और आम लोगों के लिए मैंने जो काम किया...उसी की वजह से उसे तकलीफ हुई.मैं इसलिए ज्यादा दुःख महसूस करता हूँ. संजय राजनीति के बारे में कुछ नहीं जानता.उसने कभी राजनीति में हिस्सा नहीं लिया. उन्होंने अपना दिल खोलते हुए कहा है...जब मेरे बेटे को हथकड़ी पहनाई गयी तो लगा कि कोई मेरी प्रतिष्ठा और इज्ज़त,मैंने देश के लिए जो भी किया...उन सभी को फांसी दे रहा है.उस क्षण मैं अपनी भावनाओं पर काबू नहीं रख सका...हालाँकि मैं चाहता था कि यह जाहिर नहीं हो,क्योंकि मेरा बेटा प्रभावित होगा और खुद को कमजोर महसूस करेगा.फिर भी मैं अपने आंसू नहीं रोक सका और उसने इसे महसूस किया.
भावनाओं पर काबू पाने और आंसू रोकने की कोशिश संजय भी करते थे.एक तरफ वे नहीं चाहते थे उन्हें कमजोर भांप कर पिता और बहनें टूटें.दूसरी तरफ पिता औरबहनें मुलाकातों में अपनी हिम्मत और एनर्जी बनाये रखते थे.सुनील दत्त को यह तो मालूम हो गया था कि बम विस्फोट और उसके बाद हुए दंगों से पीड़ित मुस्लिम बहुल इलाके में किये उनके काम को सही नज़रिए से नहीं देखा जा रहा है.घर पर धमकी भरे कॉल आने लगे थे.बाप-बेटे के बीच एक संवादहीनता थी.असुरक्षा की इस घडी में आक्रमण की आशंका में संजय दत्त ने खुद से तैयारी की और अवैध हथियार रखने की आपराधिक भूल की. इस दरम्यान सुनील दत्त को फिल्म बिरादरी से तो समर्थन मिला,लेकिन खुद कांग्रेस पार्टी उदासीन रही.इस कठिन दौर में उनके पड़ोसी और मित्र दिलीप कुमार साथ खड़े रहे.सुनील दत्त की उस पीड़ा का अनुमान ही लगाया जा सकता है जब करीबियों की सलाह  पर वे बाला साहेब ठाकरे से मदद मांगने गए थे.जीवन भर की राजनीति और सोच की पूँजी उन्होंने खो दी थी.इस विवशता और तकलीफ ने ही उन्हें राजनीतिक क्रिया-कलापों से दूर और उदासीन कर दिया.उनका दिल दरक गया था.
बाप-बेटे के बीच के दर्द के इस रिश्ते और भावना को राजकुमार हिरानी ने परदे पर उतारा होगा.उनकी फिल्मों में पिता की खास भूमिका होती है.अब की सच्ची कहानी है.इस बार तो हमे तीन बाप-बेटों के रिश्तो का सार दृश्यों के रूप में इस फिल्म में दिखेगा.लेखन और अभिनय हमारे अनुभवों की ही अभिवयक्ति है.संजू में संजय दत्त-सुनील दत्त,रणबीर कपूर-ऋषि कपूर और राजकुमार हिरानी-सुरेश हिरानी के रिश्तों की छवियाँ परदे पर निभाते रणबीर कपूर-परेश रावल दिखेंगे.विधु विनोद चोपड़ा ने बताया था कि मुन्नाभई एमबीबीएस की शूटिंग में बाप-बेटे के मिलने का दृश्य रियल हो गया था.शॉट हो जाने के बाद भी संजय दत्त का सर पिता के कंधे पर देर तक टिका रहा था.  

Wednesday, June 27, 2018

छोटी फिल्मों में कैरेक्टर मिलते हैं,बड़ी फिल्मों से पैसे - संजय मिश्रा


छोटी फिल्मों में कैरेक्टर मिलते हैं - संजय मिश्रा 
-अजय ब्रह्मात्मज
संजय मिश्रा कीअंग्रेजी में कहते हैं' हाल ही में दर्शकों को पसंद आई.सीमित बजट की  यह फिल्म सफल रही है.ऐसी फिल्मों में लीड भूमिका निभाने के साथ ही संजय मिश्रा मुख्यधारा की फिल्मों के भी चहेते कलाकार हैं.

-आप जैसे कलाकारों पर फिल्म इंडस्ट्री की निर्भरता बढ़ी है.आप इसे कैसे लेते हैं?
0 मैं इसे फिल्म इंडस्ट्री की निर्भरता नहीं कहूंगा. हां,स्वतंत्र निर्माता हमें चुन रहे हैं. हालाँकि वे भी फिल्मों में आ जाते हैं तो फिल्म इंडस्ट्री का हिस्सा हो जाते हैं. इनके पास फिल्म बनाने की तमन्ना रहती है. इनके पास 40-50 करोड़ नहीं होत, इसलिए ये छोटी फिल्मों में निवेश करते हैं.ये लोग दो से चार करोड़ रुपए में फिल्में बनाना चाहते हैं.मसानऔरआखिन देख फिल्मों से इन्हें प्रेरणा मिलती है. मुझे यह अच्छा लगता है कि स्वतंत्र निर्माता आ रहे हैं. कॉर्पोरेट तो एक ही विचार को लेकर चलते हैं कि उन्हें फायदा चाहिए. स्वंतंत्र निर्माता अलग-अलग विषयों और विचारों को लेकर आते हैं.


-मुख्य धारा की फिल्मों में भी आप लोगों की पहचान और जरूरत बड़ी है मुझे याद हैदिलवाले' में दर्शक आपके आने का इंतजार करते थे, जबकि उस फिल्म में आकर्षण के कई स्टार और कारण थे…
0 हां, यह तो हुआ है. मुझे लगता है कि ऐसा शुरू से था. कभी महमूद और जॉनी वाकर हुआ करते थे. रहमान साहब थे और भी कलाकार थे. सभी जानते हैं कि रोमांस और डांस तो संजय मिश्रा से नहीं मिलेगा, लेकिन दूसरे मजे जरुर मिलेंगे. यह निर्भरता हम जैसे कलाकारों के लिए मान की बात है.


-यह तो दिख रहा है?
अगर ऐसा सोचा जा रहा है तो यह किसी भी कलाकार के लिए सम्मान की बात है. उसे पहचान और वाहवाही मिल रही है. एक कलाकार तो यही चाहता है. हम घरेलू(हाउस होल्ड) नाम बन जायें. यही देखकर छोटी फिल्मों के सीमित पूंजी वाले निर्माता हमारे पास आते हैं और हमें नायक की भूमिका सौंप जाते हैं. ऐसे निर्माता पैसे तो नहीं देते हैं लेकिन कैरेक्टर देते हैं. मुख्यधारा की फिल्मों में कैरेक्टर नहीं मिलते, लेकिन पैसे अच्छे मिलते हैं तो वह भी चाहिए. एक एक्टर के तौर पर मुख्यधारा की फ़िल्में मेरे लिए बड़ी  चुनौती होती हैं. अभी मैं इंदर कुमार की फिल्मटोटल धमालकर रहा हूं. शॉट से पहले कांपता रहता हूं. उन किरदारों मेंअकड़ और एटीट्यूड चाहिए होता है. फिर आपको दूसरे कलाकारों के मेल में होना चाहिए. आपनेदिलवाले' का जिक्र किया. उस फिल्म में शॉट से पहले मैं डरा रहता था. यह डर हम एक्टरों के लिए बहुत अच्छा है. अच्छा काम होता है


-मैं देख रहा हूं कि केवल प्रशिक्षित अभिनेताओं पर ही ऐसा भरोसा किया जा रहा है. क्या यह महज संयोग है कि वैसे कलाकारों को फिल्में मिल रही हैं?
0 बिल्कुल, क्योंकि वे प्रशिक्षित हैं. यह बात निकल कर आ रही है कि प्रशिक्षण ही काम देता है. ज़िन्दगी के हर फील्ड में ऐसा होता है. हर जगह ट्रेनिंग काम आती है.


-मेरा तो मानना है कि प्रशिक्षित अभिनेताओं ने हिंदी फिल्मों में अभिनय का स्वरुप बदल दिया है इस पर अलग से कभी लिखा जाना चाहिए.
0प्रशिक्षित कलाकारों ने इसे साधा है. थिएटर और रंगमंच से आए अभिनेता फिल्मों के हिसाब से एक्टिंग में बारीकी से परिवर्तन ले आते हैं. थिएटर और सिनेमा की एक्टिंग अलग होती है. सिनेमा में लेंस का सामना करना पड़ता है. ऐसा लेंस जो सिर्फ आपकी पलकों को दिखा सकता है. मैं तो इसमें जोडूंगा कि प्रशिक्षित अभिनेताओं के साथ अब शिक्षित दर्शक भी आ रहे हैं. कहने का मतलब कि दर्शक हमारे काम को पसंद कर रहे हैं. ऐसा लगता है कि ऐसी फिल्मों के प्रति दर्शकों की भूख थी. उन्हें पहले ऐसी फिल्में नहीं मिल पा रही थीं. अब मिल रही हैं तो वे उसे स्वीकार कर रहे हैं. सिनेमाघरों में देख रहे हैं. बीच में ऐसी फिल्में बनने बंद हो गई थीं. अब शुरुआत हुई है. दर्शकों की संख्या बढ़ रही है. यह बहुत ही अच्छा संकेत है.

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यह परिवर्तन किस दिशा में जा रहा है?
0अब हमें ऐसी कंटेंट प्रधान फिल्मों का इंतजार रहता है, जो कुछ कहे, इंटरटेनमेंट का मतलब सिर्फ हंसाना नहीं है, वह किसी भी प्रकार से गुदगुदा जाए. फिल्मों में कंटेंट लौट रहा है. हम पुरानी फिल्मों की परंपरा अपना रहे हैं. आज विचित्र स्थिति हो गई है. नया भारत बन रहा है और पुरानी बातें की जा रही है. बदलाव के लिए चीजें बेवजह बदली जा रही हैं.  बनारस का एक उदाहरण दूं तो मणिकर्णिका घाट तक गाड़ी ले जाने की जरूरत नहीं है. बनारस में हम पीढ़ियों से ऐसे ही जिंदगी जीते आ रहे हैं. सुना है कि वहां मकान तोड़े जा रहे हैं. घाट तक गाड़ियां ले जाएंगे. नए दर्शक को भीमसान; का बाप और बच्चा अपना लगता है.