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Thursday, May 31, 2018

दरअसल : पानी के लिए लड़ते किरदार



दरअसल
पानी के लिए लड़ते किरदार
- अजय ब्रह्मात्‍मज
विक्रमादित्य मोटवानी का सुपरहीरो भावेश जोशी मुंबई के वाटर माफिया को के खिलाफ खड़ा होता होता है। भावेश जोशी 21वीं का सजग युवक है,जो मुंबई में रहता है। वह अपने आसपास के भ्रष्टाचार और समाज के स्वार्थी व्यक्तियों के आचरण से उक्त चूका है। उसे कोई रास्ता नहीं सूझता तो वह नक़ाब पहन कर उन्हें बेनक़ाब करने की मुहीम पर निकलता है। यह सिस्टम से नाराज़ आज के यवक की कहानी है। विक्रमादित्य अपनी पीढ़ी के संवेदनशील फ़िल्मकार हैं। इस बार वे किरदारों के परस्पर मानवीय रिश्तों और उनकी उलझनों से निकल कर समाज से जूझते और टकराते किरदार को सुपरहीरो के तौर पर पेश कर रहे हैं। यथार्थ कठोर और जटिल हो तो साहित्य और फिल्मों में फंतासी का सहारा लिया जाता है। ज़िन्दगी में नामुमकिन लग रही मुश्किलों को फंतासी से सुलझाने का क्रिएटिव प्रयास किया जाता है। विक्रमादित्य का विषय आज की मुंबई और मुंबई की रोज़मर्रा की समस्याएं हैं। उनमें पानी एक विकट समस्या है।
ख़बरों और फिल्मों के जरिये महानगरों में पर्याप्त पानी के लिए तरसते नागरिकों की व्यथा हम देखते रहे हैं। हम में से अधिकांश भुक्तभोगी भी रहे हैं।  पानी के नियंत्रण और वितरण में अमीरों और अमीर बस्तियों का खास ख्याल रखा जाता है। मुंबई में मध्यवर्गीय और निम्नवर्गीय इमारतों और बस्तियों के बाशिंदे वाटर और टैंकर माफिया के नियमित शिकार होते हैं। यहाँ बहुमज़िली इमारतों के टॉप फ्लोर के बाथरूम में पानी पहुँचने में दिक्कत नहीं होती,लेकिन मलिन बस्तियों की नालों से बूँदें भी नहीं टपकतीं। इस सन्दर्भ में 1946 में बनी चेतन आनंद की फिल्मनीचा नगरकी याद आती है। कान फिल्म फेस्टिवल में उसी साल इसे ग्रैंड प्रिक्स अवार्ड से सम्मानित किया गया था।चेतन आनंद ने समाज में उंच-नीच के बढ़ते भेद और स्वार्थ को गहराई से चित्रित किया था। इस फिल्म ने सत्यजीत राय को फिल्म निर्देशन में उतरने की प्रेरणा दी थी।
हयातुल्लाह अंसारी की कहानी को स्क्रिप्ट का रूप देने में ख्वाजा अहमद अब्बास ने मदद की थी। हिंदी फिल्मों सामाजिक यथार्थ की फिल्मों की यह शुरुआत थी। उन दिनों मुंबई में इप्टा (इंडियन पीपल थिएटर एसोसिएशन) के सदस्य बहुत एक्टिव थे।  वामपंथी सोच के इन संस्कृतिकर्मियों का फ़िल्मी हस्तियों से अच्छा राब्ता था। उनमें से कुछ फिल्म जैसे लोकप्रिय माध्यम का उपयोग करना चाहते थे। हिंदी फ़िल्में पारसी थिएटर के प्रभाव में मेलोड्रामा,फंतासी,ऐतिहासिक और मिथकीय चरित्रों से बाहर नहीं निकल पा रही थी। ऐसे दौर में ख्वाजा अहमद अब्बास,चेतन आनद,बलराज साहनी और कैफ़ी आज़मी जैसे क्रिएटिव दिमाग फिल्मों में कुछ नया और सार्थक करने के लिए बेताब थे। ख्वाजा अहमद अब्बास कीनया संसारऐसी पहली कोशिश थी।नीचा नगरमें उस फिल्म की गलतियों से सीखते हुए नाच-गाने भी रखे गए थे। कान फिल्म फेस्टिवल के लिए फ्रांस भेजते समय एक गाना और नृत्य के दृश्य हटा दिए गए थे।
नीचा नगरमें लेखक-निर्देशक ने ऊंचा नगर और नीचा नगर का रूपक गढ़ा था। समाज में अमीर और गरीब के बीच की बढ़ती खाई और ख्वाहिशों को यह फिल्म आज़ादी के ठीक पहले की पृस्ठभूमि में रखती है।  दोनों नगर काल्पनिक हैं। ऊंचा नगर में आलीशान हवेली में सरकार निवास करते हैं। उनकी नज़र नीचा नगर के पास की उस दलदल पर है,जहाँ ऊंचा नगर का गंदा नाला जाता है। वे गंदे नाले का रुख नीचा नगर की तरफ मोड़ देते हैं ताकि दलदल सूखने पर वे माकन बना कर पैसे कमा सकें। नीचा नगर के बाशिंदों को यह बात नागवार गुजरती है। गंदा नाला अपने साथ बीमारियां भी लाया है। विद्रोह होता है तो सरकार के नुमाइंदे पानी बंद कर देते हैं। नीचा नगर में प्यास से त्राहि-त्राहि होने लगती है। फिर भी वे हिंसक नहीं होते। वे (गाँधी की प्रभाव में) अहिंसा का मार्ग अपनाते हैं। क़ुर्बानियों और संघर्ष के बाद आख़िरकार उनकी मांगे मानी जाती हैं।  नीचा नगर के बाशिंदों को गंदे नाले से निजात मिलती है और पानी मिलता है। कुछ सालों पहले शेखर कपूर ने भीपानीशीर्षक से फिल्म बनाने की घोषणा की थी। अब पानी की समस्या से विक्रमादित्य मोटवानी का भावेश जोशी अपने ढंग से निबट रहा है।  
नीचा नगरकामिनी कौशल की पहली फिल्म थी। चेतन आनंद की पत्नी उमा आनंद ने भी इस फिल्म में काम किया था। मशहूर संगीतज्ञ रवि शंकर भी इस फिल्म के साथ बतौर संगीतकार जुड़े थे।
jagran.comhttps://www.jagran.com/entertainment/bollywood-vishesh-cine-sanvad-indian-films-and-actors-now-fight-against-water-crisis-18031178.html 




Tuesday, May 29, 2018

सिनेमालोक : बनारस के बैकड्रॉप में ‘नक्काश’


सिनेमालोक

बनारस के बैकड्रॉप मेंनक्काश
-अजय ब्रह्मात्मज

कान फिल्म फेस्टिवल में हिंदी फिल्मों की हेरोइनों की धूम-झूम और कुछ फिल्मों के बड़े स्टार की कवरेज में मीडिया मेंनक्काशको नज़रअंदाज किया। ज़ैग़म इमाम निर्देशित यह फिल्म बनारस की गंगा-जमुनी तहजीब के दरकते पहलुओं को छूती हुई कुछ वाजिब सवाल उठाती है।ज़ैग़म बनारस की पृष्ठभूमि में हिन्दू-मुसलमान किरदारों को लेकर मौजूं मसलों पर बातें करते हैं। उनकी यह खास खूबी है।  ‘दोजखऔरअलिफ़के बाद इसी परंपरा मेंनक्काशउनकी तीसरी फिम है। इसमें फिल्मिस्तानऔरएयरलिफ्टफेम इनामुल हक़ इसमें मुख्य भूमिका निभा रहे हैं।
इस फिल्म में मुख्य भूमिका निभाने के अपने अनुभवों को इनामुल ने शेयर किया था। उनके अनुसार,’बनारस में शूटिंग का पहला दिन था...छोटे शहरों की 'सिनेमाई जिज्ञासा' भीड़ में बदलने लगी थी, उसी भीड़ से कुछ नौजवान ये कहते हुए नज़दीक आ रहे थे कि चलो देखते हैं 'हीरो' कौन है"?...जैसे ही उनकी ये बात मेरे कानों तक पड़ी 'ब-ख़ुदा' मैं छुप गया था... वजह बहुत सीधी सी है..उनकी उत्सुकता को 'निराशा' में नही बदलना चाहता था । मुझे पता है 'हीरो' क्या होता है...रोज़ आईना देखता हूँ इसलिए किसी ग़लतफ़हमी में नहीं हूँ । लेकिन सपनों की कोई 'बाउंडरी वाल' नही होती...इसलिए अपने आपको कभी भी ये सोचने से नही रोक पाया कि किसी फ़िल्म में 'लीड रोल' हो । नियति पूर्व निर्धारित है हमें बस मदद करनी होती, उसकी राहों की रुकावटें हटानी होती है, उसे 'घट जाने देने' के लिए...घट जाना दरअसल बढ़ जाना ही होता है । पिछले छह महीने में बहुत कुछ 'घटा' इसलिए कुछ बढ़ पा रहा हूँ ।इनामुल और उन जैसे दर्जनों कलाकारों के लिए कान पहुंचना किसी मुश्किल सफर की मंज़िल से कम नहीं है। पिछले कुछ सालों में इनामुल सरीखे अनेकआउटसाइडरकलाकार हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में अपने अभिनय के डैम पर पहचान बना कर आगे बढ़ रहे हैं।
नक्काशके मूल विचार के बारे में ज़ैग़म कहते हैं,’यह एक ऐसे मुसलमान कारीगर की कहानी है जो मंदिरों में नक्काशी का काम करता है। मंदिरों के गर्भ गृह में ऐसी नक्काशियां होती हैं। फिल्म में इस कला के जानकारी के साथ यह भी बताया गया है कि कैसे कारीगर अल्लारखा सिद्दीक़ी समाज में हो रहे बदलावों की वजह से अब दबाव में है। उसे अपने समुदाय और हिन्दुओं से भी विरोध झेलने पड़ रहे हैं। मुश्किल में भगवान दास वेदांती भी हैं कि वे नए दौर में कैसे इस परंपरा का निर्वाह करें? अल्ला मियां दशकों से भगवान दास के निर्देश पर मंदिरों में नक्काशी करते रहे हैं,लेकिन नए राजनीतिक परिप्रेक्ष्य से दोनों सांसत में हैं।' अपने समुदायों के दोनों प्रतिनिधि के आत्मसंघर्ष को बनारस के बदले राजनीतिक परिदृश्य में हम देखेंगे। बनारस की सदियों पुरानी सामासिक संस्कृति खतरे में है।
ज़ैग़म इमाम ने पहले दोनों फिल्मों की तरहनक्काशकी भी शूटिंग बनारस में की है। इस फिल्म के लिए उन्होंने सेट तैयार किया और वास्तविक कारीगरों से खूबसूरत नक्काशी करवाई। उन्होंने कुछ स्थानीय कलाकारों के साथ मुंबई से गए कुमुद मिश्रा और शारिब हाशमी को उन्होंने प्रमुख भूमिकाएं सौंपी हैं। फिल्म के फर्स्ट लुक को जारी करने के लिए कान जाने की ज़रुरत पर वे कहते हैं,’इस से थोड़ी चर्चा हो जाती है और फिल्म ट्रेड के साथ दर्शकों के बीच भी जिज्ञासा बढ़ जाती है। हमें लाभ हुआ है। अस फिल्म में लोग रूचि दिखा रहे हैं।क्या फिल्म के विषय और चित्रण को लेकर विवाद नहीं होगा?’मुझे तो नहीं लगता। मैंने विवादस्पद विषय नहीं चुना है। अगर कोई सवाल करेगा तो मेरे पास जवाब है। मैं खुद बनारस की पैदाइश हूँ।  वही मेरी परवरिश हुई है। मैं हो रहे बदलावों को करीब से देख रहा हूँ,’दोटूक जवाब देते हैं ज़ैगम इमाम। 

Friday, May 25, 2018

दरअसल : संजू की ज़िंदगी का नया ‘प्रस्थान’


दरअसल

संजू की ज़िंदगी का नयाप्रस्थान
-अजय ब्रह्मात्मज

खबर आई है कि संजय दत्त माँ नरगिस दत्त के जन्मदिन 1 जून से अपने होम प्रोडक्शन की नई फिल्म की शूटिंग आरम्भ करेंगे। सात सालों  के बाद उनके करियर का यह नयाप्रस्थानहोगा।  उनकी इस फिल्म का निर्देशन मूल तेलुगूप्रस्थानमके निर्देशक देवा कट्टा ही करेंगे। इस नई शुरुआत के लिए संजय दत्त को बधाई और यह ख़ुशी की बात है कि उन्होंने इसके लिए माँ का जन्मदिन ही चुना। इसी महीने माँ नरगिस के पुण्य दिवस के मौके पर उन्होंने एक ट्वीट किया था किमैं जो भी हूँ,तुम्हारी वजह से हूँ।  मैं तुम्हारी कमी महसूस करता हूँ।माँ के प्रति उमड़े उनके प्यार की क़द्र होनी चाहिए।
सचमुच संजय आज जो भी हैं,उसमें नरगिस दत्त की परवरिश और लाड-प्यार का बड़ा योगदान है। राजकुमार हिरानी की फिल्मसंजूमें माँ-बेटे के सम्बन्ध को देखना रोचक होगा। उनके निर्देशन में मनीषा कोइराला ने अवश्य नरगिस के लाड,चिंता और तकलीफ को परदे पर उतारा होगा। संजय दत्त पर छिटपुट रूप से इतना कुछ लिखा जा चुका है कि माँ-बेटे के बीच की भावनात्मक उथल-पुथल और घटनाओं के बारे में सभी कुछ ना कुछ जानते हैं। उनके आधार पर संजय के प्रति उनकी धारणाएं भी बनी हुई हैं,जिसमें उनकी बाद की गतिविधियों ने दृश्टिकोण तय किया है। उन्हें बिगड़ैल बाबा के नाम से सम्बोधित किया जाता रहा है। बहुत मुमकिन है कि हिरानी कीसंजूसे संजय दत्त के बारे में बनी निगेटिव धारणाएं टूटें। हम उस संजय को देख पाएं,जो माँ की मौत के तीन सालों के बाद उनका सन्देश सुन कर चार दिनों तक फूट-फूट कर रोते रहे। उस सन्देश में नरगिस ने उन्हेंविनम्रऔरनेक इंसानहोने की सलाह दी थी।
अनुशासन प्रिय सख्त पिता और लाड-दुलार में डूबी माँ के बीच संजय को लेकर झगडे होते थे। नरगिस के जीवनीकारों ने विस्तार से इन झगड़ों और मतभेदों के बारे में लिखा है। शुरू में नरगिस संजय दत्त को पिता की डाट-फटकार से बचाती रहीं। संजय के पक्ष में खड़ी रहीं। ऐसे भी मौके आये जा सुनील दत्त ने दो टूक शब्दों में कहा कि हम दोनों में से एक को चुन लो तो नरगिस ने बेटे को चुना। एक बार ऐसी ही एक घटना के बाद नाराज़ सुनील दत्त दो दिनों तक घर नहीं लौटे। बुरी संगत और बुरी आदतों ने संजय दत्त को बिगाड़ दिया था। माँ से मिली शह संजय दत्त को सुधारने की सुनील दत्त की कोशिशें नाकाम रहीं। बाद में नरगिस को एहसास हुआ कि उनसे चूक हो गई। संजय दत्त की चिंता में वह घुलती गईं। जीवन के आखिरी दिनों कैंसर ने उनकी तकलीफ और बढ़ा दी। पीड़ा के इसी दौर में उन्होंने बेटे संजय समेत परिवार के सभी सदस्यों के लिए सन्देश छोडे थे।   
आज की पीढ़ी के पाठकों को नरगिस की फ़िल्में देखनी चाहिए। उनकी जीवनियां पढ़नी चाहिए। नरगिस ने बतौर अभिनेत्री लम्बी सफल पारी पूरी करने के बाद सुनील दत्त के साथ गृहस्थी में कदम रखा। सम्परित पत्नी और माँ की भूमिका तक हो वह सीमित नहीं रहीं। उन्हें राज्य सभा की सदस्यता मिली थी और पद्मा श्री से भी उन्हें सम्मानित किया गया था। देश के पहले प्रधान मंत्री नेहरू से उनके पारिवारिक सम्बन्ध थे। देशसेवा और राष्ट्रभक्ति के मिसाल रही दत्त दंपति। उनकी मृत्यु पर तत्कालीन प्रधानमंती इंदिरा गाँधी ने कहा था,’नरगिस की मृत्यु की खबर से उन्हें गहरा दुःख हुआ है। जी करोड़ों दर्शकों ने उन्हें परदे पर देखा,उनके लिए नरगिस प्रतिभा और समर्पण की प्रतीक हैं। वह गर्मजोशी और सहानुभूति की साक्षात देवी थीं। उन्होंने अनगिनत सामाजिक मुद्दों का समर्थन किया।
उम्र के इस पड़ाव पर बीवी-बच्चों,फिल्म इंडस्ट्री और प्रशंसकों से घिरे होने बावजूद संजय दत्त की तन्हाई का अंदाजा लगाना मुश्किल है। जीवन के इस मोड़ पर उन्हें माँ की याद आ रही है। वे उनकी कमी महसूस कर रहे हैं। यह एक प्रकार से उनका पश्चाताप है।  हम यही उम्मीद करते हैं कि वे ज़िन्दगी की भूलों के अफ़सोस पर काबू कर साढ़े क़दमों से आगे बढ़ें। सफल रहें।
नरगिस की जीवनियां:
Darlingji,The true story of Nargis & Sunil Dutt,KIswar desai
THe LIfe and Times of Nargis,T J S George

फिल्‍म समीक्षा : परमाणु


फिल्‍म समीक्षा
फ़िल्मी राष्‍ट्रवाद का नवाचार
परमाणु
-अजंय ब्रह्मात्‍मज
हिंदी फिल्‍मों में राष्‍ट्रवाद का नवाचार चल रहा है। इन दिनों ऐसी फिल्‍मों में किसी घटना,ऐतिहासिक व्‍यक्ति,खिलाड़ी या प्रसंग पर फिल्‍में बनती है। तिरंगा झंडा,वतन या देश शब्‍द पिरोए गाने,राष्‍ट्र गर्व के कुछ संवाद और भाजपाई नेता के पुराने फुटेज दिखा कर नवाचार पूरा किया जाता है। अभिषेक शर्मा की नई फिल्‍म ‘परमाणु’ यह विधान विपन्‍नता में पूरी करती है। कल्‍पना और निर्माण की विपन्‍नता साफ झलकती है। राष्‍ट्र गौरव की इस घटना को कॉमिक बुक की तरह प्रस्‍तुत किया गया है। फिल्‍म देखते समय लेखक और निर्देशक के बचकानेपन पर हंसी आती है। कहीं फिल्‍म यूनिट यह नहीं समझ रही हो कि दर्शकों की ‘लाफ्टर’ उनकी सोच को एंडोर्स कर रही है। राष्‍ट्रवाद की ऐसी फिल्‍मों की गहरी आलोचना करने पर राष्‍ट्रद्रोही हो जाने का खतरा है।
हो सकता है कि यह फिल्‍म वर्तमान सरकार और भगवा भक्‍तों को बेहद पसंद आए। इसे करमुक्‍त करने और हर स्‍कूल में दिखाए जाने के निर्देश जारी किए जाएं। इे राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार से सम्‍मनित किया जाए और फिर जॉन अब्राहम को श्रेष्‍ठ अभिनेता का पुरस्‍कार सूचना एवं प्रसारण मंत्री के हाथें दे दिया जाए। इन सारी संभावनाओं के बावजूद ‘परमाणु’ महत्‍वपूर्ण विषय पर बनी कमजोर फिल्‍म है। इस विषय का वितान कुछ किरदारों और घरेलू शक-ओ-शुबहा में समेट कर लेखक-निर्देशक गंभीर विषय के प्रति अपनी अपरिपक्‍वता जाहिर की है। आवश्‍यक तैयारी और निर्माण के संसाधनों की कमी प्रोडक्‍शन में नजर आती है। न्‍यूक्लियर टेस्‍ट के लिए बना लैब किसी टेलीफोन एक्‍सचेंज की तरह लगता है। ‘चेज’ का सीक्‍वेंस किसी पाकेटमार को पकड़ने के लिए गली के मुहाने पर रगेदते पड़ोसी की याद दिलाता है। सीआईए और आईएसआई के एजेंट कार्टून चरित्रों सरीखे ही हरकतें करते हैं। उनके लिए भारतीय सीमा में मुखबिरी करना कितना आसान है? दर्शक जान चुके हैं,फिर भी वह फिल्‍म के हीरो को बताता है कि मैं ‘वेटर’ नहीं हूं। मियां-बीवी के झगड़े का लॉजिक नहीं है। और 1998 में ‘महाभारत’ का प्रसारण...शायद रिपीट टेलीकास्‍ट रहा होगा।
लेखक-निर्देषक ने सच्‍ची घटनाओं के साथ काल्‍पनिक किरदारों को जोड़ा है। बाजपेयी,नवाज शरीफ और क्लिंटन वास्‍तविक हैं। उनके पुराने फटेज से फिल्‍म को विश्‍वसनीयता दी गई है। यह अलग बात है कि स्क्रिप्‍ट में उनके फुटेज गूंथने में सफाई नहीं रही है। यों जॉन अब्राहम ने पहले ही बता दिया है कि ‘इस फिल्‍म में दिखाई गई वास्‍तविक फुटेज का लक्ष्‍य सिर्फ कहानी को अभिलाषित प्रभाव देना  है’।
प्रधान मंत्री बाजपेयी के सचिव(ब्रजेश मिश्रा) की भूमिका में बोमन ईरानी प्रभावित नहीं करते। फिल्‍म के नायक जॉन अब्राहम के सहयोगी कलाकारों के चुनाव में उनकी अभिनय क्षमता का खयाल नहीं रखा गया है। सिर्फ बुजुर्ग किरदार को निभा रहे अभिनेता ही याद रह जाते हैं। डायना पेटी जैसी बेढब सैन्‍य अधिकारी टीम की कमजोर कड़ी हैं। उनकी बीवी की भूमिका निभा रही अभिनेत्री को कुछ नाटकीय दृश्‍य मिले हैं,जिनमें वह निराश नहीं करतीं। रहे जॉन अब्राहम तो उन्‍होंने अपनी सीमाओं में बेहतरीन प्रदर्शन किया है। भावभिव्‍यक्ति के संकट से वे निकल नहीं सके हैं।
इन कमियों के बावजूद जॉन अब्राहम और अभिषक शर्मा की तारीफ की जानी चाहिए कि उन्‍होंने घिसी-पिटी कहानी के दायरे से निकल कर कुछ अलग करने की कोशिश की है। उनके पास पर्याप्‍त साधन-संसाधन होते और स्क्रिप्‍ट पर थोड़ी और मेहनत की गई होती तो यह उल्‍ल्‍ेखनीय फिल्‍म बन जाती। उनका ध्‍येय प्रश्‍ंसनीय है।
अवधि – 129 मिनट
** दो स्‍टार  ाष्‍ट्र िक व्‍यक्तित्‍व क्त्त्व