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Saturday, March 31, 2018

पर्दे पर दर्द को जीने वाली मीना - अजय ब्रह्मात्‍मज

पर्दे पर दर्द को जीने वाली मीना 
- अजय ब्रह्मात्‍मज

महजबीन.. यह एक खूबसूरत लड़की का खूबसूरत नाम था, लेकिन वह लड़की स्वयं को खूबसूरत नही मानती थी। पतले चेहरे, गालो की उभरी हड्डियों और झुकी आंखों के कारण वह पूर्वी एशिया की लड़की लगती थी। दादी मां चिढ़ाने के लिए उसे चीनी लड़की कहती थी। मजाक में दिया यह नाम उससे चिपक गया और उसने लड़की के अंदर हीन भावना पैदा की। चार वर्ष की उम्र में वह पहली बार कैमरे के सामने आई। उसका नाम पूछा गया। उसने महजबीन बताया। यूनिट के लोगों ने मजाक किया, यह तो किसी मोटी और गबदी बेगम का नाम लगता है, इसलिए इस नाम से काम नही चलेगा। उसे मीना, प्रभा और कमला तीन नामों में से एक चुनने के लिए कहा गया। उसने मीना चुना और वह मीना कुमारी हो गई। 
किसी स्टार की तरह उसने शुरुआत में ही नखरे दिखाए। निर्देशक ने उसे बताया कि उसे दौड़कर डकैत द्वारा परेशान की जा रही अपनी मां के पास पहुंचना है और फिर धड़ाम से जमीन पर गिरना है। मीना के मन में प्रश्न आया कि वह गंदे फर्श पर क्यों गिरेगी? मान-मुनौव्वल का असर नही हुआ, लेकिन जब मां ने वादा किया कि क्रीम केक मिलेगा, तो तुरंत वह तैयार हो गई। बाद में चूल्हा जलता रहे, यह सोचकर मीना को फिल्मों में काम करने की अनुमति दी गई। हालांकि पिता ने विरोध किया, पर उन्हे अपनी पत्नी की व्यावहारिकता के आगे झुकना ही पड़ा। जल्द ही उनकी दोनो कम उम्र की बेटियां अपने नाजुक कंधों पर परिवार का बोझ ढोने लगी। अब मीना, मीना कुमारी हो चुकी थी।
मां की मौत के बाद उन्हे किताबो और कविताओ का ही सहारा रह गया। 1949 के आखिरी महीनों में वे एक पत्रिका पढ़ रही थीं। पत्रिका में एक व्यक्ति का जीवन-परिचय छपा था। उसके कार्यों से प्रभावित होकर मैं उसकी तरफ खिंचती चली गई कि वह कैसा लगता होगा? कुछ दिनों के बाद एक पत्रिका में कमाल अमरोही की तस्वीर दिखी। मेरी आंखो के आगे कुछ चमका और एक अहसास ने मुझे कंपकंपा दिया। मैं आशंकाओं से घिर गई। वही मेरे सपनो के देवता की तस्वीर थी। उसकी छवि मेरे दिल में अंकित थी.. ऐसा नही हो सकता, मै स्वयं को समझाती रही, लेकिन हमेशा अंदर से एक ही आवाज आती रही, मुझे पहचानने से नही डरो। मैं ही तुम्हारा अभीष्ट हूं। मैं तुम्हारी कल्पना मात्र नही हूं। आखिरकार मै हार गई और मैंने उस आवाज पर विश्वास कर लिया। मीना ने स्वीकार किया था।  
कमाल अमरोही जब सोहराब मोदी की फिल्म जेलर की कास्टिंग कर रहे थे, तब वे सात साल की एक लड़की के रोल के लिए मीना से मिलने उनके घर गए थे, उन्हे उस रोल के लिए मीना पसंद आई, लेकिन काम अंतत: किसी और लड़की को मिल गया। कमाल अमरोही महल मे भी मीना को नही ले सके थे। गौरतलब यह है कि महल मे मधुबाला ने काम किया था और वे रातोरात स्टार बन गई। मीना अपने सपनों के देवता के इंतजार में ही रह गई। तमाशा के सेट पर अशोक कुमार ने कमाल अमरोही से मीना का परिचय करवाया। बाद मे 15 फरवरी, 1952 को दोनो की शादी हो गई। कुछ वर्षो तक वे अपार खुशी मे सराबोर दिखी। उनकी दोस्त नादिरा ने कभी कहा था, उनके मन में अमरोही के प्रति अथाह आदर था। अगर मीना मर भी रही हो और कमाल कमरे में आ जाएं, तो वे उठकर बैठ जाती थीं। किसी को यकीन नही था कि वे कमाल साहब का घर छोड़कर कभी जाएंगी! अमरोही के घर से मीना का निकलना उनके प्रवेश की तरह ही नाटकीय था। एक दिन वे स्टूडियो आई और फिर नही लौटी। निर्माता-निर्देशक केदार शर्मा ने कभी बताया था, हमारी रोज मुलाकात होती थी। उस दिन मीना ने अचानक पूछा, शर्मा जी एक औरत के लिए सबसे प्यारी चीज क्या होती है? थोड़ी देर सोचने के बाद मैने जवाब दिया, औलाद या जेवर। उन्होने फिर पूछा, यदि उसकी औलाद ही नही हो और उसे जेवरो का भी शौक न हो तो..? मुझे तुरंत कोई जवाब नही सूझा। फिर उन्होने बताया कि कमाल साहब ने उसे घर से जो चाहे लेकर निकल जाने को कहा है। यदि लौटकर जाऊंगी, तो वे मेरी टांगे तोड़ देंगे। वहां से मै क्या लेकर आती, सिर्फ इस एक चीज के अलावा? उन्होंने मुझे एक पॉकेट बुक दिखाया, जो मैने वर्षो पहले उन्हे भेट की थी। 
वे अपनी भावनाओं के अनुसार चली। अमरोही से उनका अलग होना उन्हे तोड़ गया। नादिरा ने बताया था, जब वे कमाल साहब के साथ थीं, तब एक सहमी और दबी हुई स्त्री थीं। वहां से निकलते ही उनके पंख निकल आए। उन्हे देखकर ऐसा लगता था कि वे कफन बांधकर निकली हैं। जैसे-जैसे उनका करियर गिरता गया, वे अपने काम के प्रति उदासीन होती चली गई। वे पढ़ने और शायरी करने मे समय बिताने लगी। पर एक समय यह भी आया कि वे चाहकर भी कुछ नही कर पाती थी। उनका लीवर खराब हो चुका था। उपचार के लिए उन्हे लंदन और स्विट्जरलैड ले जाया गया। डा1टरो ने उन्हे शराब पीने से मना किया था। कुछ समय तक वे शराब से दूर भी रही, लेकिन अधिक दिनों तक ऐसा नही चला। 
कमाल अमरोही जब सोहराब मोदी की फिल्म जेलर की कास्टिंग कर रहे थे, तब वे सात साल की एक लड़की के रोल के लिए मीना से मिलने उनके घर गए थे, उन्हे उस रोल के लिए मीना पसंद आई, लेकिन काम अंतत: किसी और लड़की को मिल गया। कमाल अमरोही महल मे भी मीना को नही ले सके थे। गौरतलब यह है कि महल मे मधुबाला ने काम किया था और वे रातोरात स्टार बन गई। मीना अपने सपनों के देवता के इंतजार में ही रह गई। तमाशा के सेट पर अशोक कुमार ने कमाल अमरोही से मीना का परिचय करवाया। बाद मे 15 फरवरी, 1952 को दोनो की शादी हो गई। कुछ वर्षो तक वे अपार खुशी मे सराबोर दिखी। उनकी दोस्त नादिरा ने कभी कहा था, उनके मन में अमरोही के प्रति अथाह आदर था। अगर मीना मर भी रही हो और कमाल कमरे में आ जाएं, तो वे उठकर बैठ जाती थीं। किसी को यकीन नही था कि वे कमाल साहब का घर छोड़कर कभी जाएंगी! अमरोही के घर से मीना का निकलना उनके प्रवेश की तरह ही नाटकीय था। एक दिन वे स्टूडियो आई और फिर नही लौटी। नादिरा ने ही बताया था। निर्माता-निर्देशक केदार शर्मा ने कभी बताया था, हमारी रोज मुलाकात होती थी। उस दिन मीना ने अचानक पूछा, शर्मा जी एक औरत के लिए सबसे प्यारी चीज क्या होती है? थोड़ी देर सोचने के बाद मैने जवाब दिया, औलाद या जेवर। उन्होने फिर पूछा, यदि उसकी औलाद ही नही हो और उसे जेवरो का भी शौक न हो तो..? मुझे तुरंत कोई जवाब नही सूझा। फिर उन्होने बताया कि कमाल साहब ने उसे घर से जो चाहे लेकर निकल जाने को कहा है। यदि लौटकर जाऊंगी, तो वे मेरी टांगे तोड़ देंगे। वहां से मै क्या लेकर आती, सिर्फ इस एक चीज के अलावा? उन्होंने मुझे एक पॉकेट बुक दिखाया, जो मैने वर्षो पहले उन्हे भेट की थी।
वे अपनी भावनाओं के अनुसार चली। अमरोही से उनका अलग होना उन्हे तोड़ गया। नादिरा ने बताया था, जब वे कमाल साहब के साथ थीं, तब एक सहमी और दबी हुई स्त्री थीं। वहां से निकलते ही उनके पंख निकल आए। उन्हे देखकर ऐसा लगता था कि वे कफन बांधकर निकली हैं। जैसे-जैसे उनका करियर गिरता गया, वे अपने काम के प्रति उदासीन होती चली गई। वे पढ़ने और शायरी करने मे समय बिताने लगी। पर एक समय यह भी आया कि वे चाहकर भी कुछ नही कर पाती थी। उनका लीवर खराब हो चुका था। उपचार के लिए उन्हे लंदन और स्विट्जरलैड ले जाया गया। डा1टरो ने उन्हे शराब पीने से मना किया था। कुछ समय तक वे शराब से दूर भी रही, लेकिन अधिक दिनों तक ऐसा नही चला।
जब उन्हे पता चल गया कि अब आखिरी दिन बीत रहे है, तब उन्होंने अपने नौकरो का पूरा हिसाब किया, लेकिन बहन मधु से संबंध खराब हो गए। केदार शर्मा अभी भी उनके सलाहकार थे, लेकिन बीच मे दो वर्ष तक उनके बीच बोल-चाल बंद रही। उन्होंने उनसे सुलह कर ली।
मर्सीडीज कार मीना ने फैमिली डॉक्टर को दे दी, आप ले जाइए नही तो कोई और ले जाएगा। उनका स्वास्थ्य तेजी से गिरने लगा। 31 मार्च, 1972 शुक्रवार का दिन। मुसलिम होने के बावजूद उस दिन मीना ने घर पर हवन किया और माउंट मेरी चर्च गई। बाहर दुनिया ईसा मसीह के बलिदान को याद कर रही थी, जब लोग अस्पताल पहुंचे। वे दुनिया छोड़ने को तैयार नही थीं। शायद इसीलिए उन्होंने चीखकर कहा, मैं मरना नही चाहती। फिर अचानक सब कुछ शांत हो गया। उन्होंने बहन मधु की गोद में अंतिम सांसें ली। भारत की प्रसिद्ध अभिनेत्री अपनी मौत के समय बिल्कुल तनहा थीं। उन्होने स्वयं कभी कहा था- 
जिंदगी क्या इसी को कहते है
हम तनहा है और जां तनहा
हमसफर कोई गर मिले भी कही,
चलते ही रहे कहां कहां तनहा।

Friday, March 30, 2018

फिल्‍म समीक्षा : बागी 2



फिल्‍म समीक्षा
एक्‍शन भरपूर,इमोशन कर्पूर
बागी 2
-अजय ब्रह्मात्‍मज
 ‘बागी 2’ देखते हुए मुझे जुहू चौपाटी पर घोड़े पर घूमते बच्‍चों की याद आई। वे किसी काबिल घुड़सवार की तरह घोड़े पर मुस्‍कराते और लहराते रहते हैं,जबकि चंद रुपयों के लिए देश के अंदरुनी इलाके से आया कोई जवान घोड़े को चला और नियंत्रित कर रहा होता है। मां-बाप बच्‍चों को गर्व भाव से देख रहे होते हैं। उन्‍हें भी अपना बच्‍चा घुड़सवार जान पड़ता है। यहा ‘बागी 2’ घोड़ा है। टाइगर श्रॉफ बच्‍चा, अहमद खान,फॉक्‍स स्‍टार और साजिद नाडियाडवाला मां-बाप और घोड़े की लगाम थामें चल रहे गंवई जवान मनोज बाजपेयी,रणदीप हुडा,विपिन शर्मा और दीपक डोबरियाल हैं।

हर कमजोर सीन और सीक्‍वेंस के बीच में मनोज बाजपेयी,रणदीप हुडा,विपिन शर्मा और दीपक डोबरियाल में से कोई एक या दो टाइगर श्रॉफ और फिल्‍म को संभालने चले आते हैं। अगर उनके निभाए किरदारों को असमर्थ कलाकार निभा रहे होते तो यह फिल्‍म पूरी तरह से अझेल हो जाती। हां,फिश्र भी किशोर और युवा दर्शकों को टाइगर श्रॉफ के एक्‍शन में मजा आता। मजा तो मुझे भी आया,क्‍योंकि जब टाइगर श्रॉफ गुरूत्‍वविकर्षण एक्‍शन करते हुए हवा में कुलांचे भरते हैं तो वह अविश्‍वसनीय होने के बावजूद रोमांचक लगता है। पार्श्‍व संगीत एक्‍शन के प्रभाव को पूरी झनझनाहट के साथ हमें उत्‍तेजित करता है। हाथ,पैर,सिर और शरीर के सभी अंगों को संचालित कर रहे टाइगर श्रॉफ किसी मिथकीय या कार्टून कैरेक्‍टर की तरह कुछ भी कर सकते हैं। छलांग लगाने के लिए उन्‍हें किसी टेक या पकड़ की जरूरत नहीं होती। विरोधी या दुश्‍मनों की संख्‍या उनके लिए मायने नहीं रखती। वह ‘वन मैन आर्मी’ हैं। फिल्‍म के आरंभ में उन्‍हें देशभक्‍त भी बताया गया है। काश्‍मीर में तैनाती के दौरान वे तीन आतंकवादियों को मार गिराते हैं और खुली जीप के बोनट पर एक आतंकवादी को बांध कर घुमाते हैं। पूछने पर कारण बताते हैं कि उसने ‘नेशनल फ्लैग’ जलाया था। बाद में गोवा के थाने में मारपीट और हड़कंप के दौरान भी ने ‘नेशनल फ्ल्‍ैग’ के मिनिएचर को जमीन पर नहीं गिरने देते। हिंदी फिल्‍मों में हीरो इन दिनों मौका मिलते ही राष्‍ट्रवाद के नारे लगाने से नहीं चूकता।

इस फिल्‍म में टाइगर श्रॉफ के साथ दिशा पाटनी हैं। दोनों की केमिस्‍ट्री की काफी बातें की जाती हैं। उनकी ऑफ स्‍क्रीन केमिस्‍ट्री हो सकती है,लेकिन ऑन स्‍क्रीन केमिस्‍ट्री जाहिर नहीं होती। पर्दे पर साथ होने पर भी वे जोड़ी की तरह नहीं दिखते। यहां तक कि गाने में भी उनका रोमांस उभर कर नहीं आता। मुमकिन है कि लेखक-निर्देशक से ही उन्‍हें सहयोग नहीं मिला हो या कैमरे के सामने वे अंतरंग दृश्‍यों में संकोच कर गए हो। टाइगर श्रॉफ यानी रणवीर प्रताप सिंह उर्फ रोनी आर्मी में है। नाम में प्रताप सिंह लगाने की श्रेष्‍ठ जाति ग्रंथि 21वीं सदी में भी फिल्‍मों से नहीं जा रही है। बहरहाल,रोनी का नेहा से प्रेम करवा दिया जाता है। दोनों जल्‍दीबाजी में शादी भी कर लेते हैं। तभी पता चलता है कि नेहा के पिता को चौथे स्‍टेज का कैंसर है। बेटी पति को त्‍याग देती है और प्रेम की यादें लेकर पिता की मर्जी से दूसरी शादी कर लेती है। पूरी फिल्‍म प्रेम की उस याद के नतीजे पर ही टिकी है। कहानी के पंच या पेंच बताना सही नहीं होगा। तीन-तीन लेखकों और एक संवाद लेखक के बावजूद फिल्‍म न तो कुछ कह पाती है और न सुना पाती है। यों लगता है कि निर्देशक अहमद खान अपने हीरो टाइगर श्रॉफ को एक्‍शन के अलग-अलग सीक्‍वेंस देकर उनके कौशल का प्रदर्शन करना चाह रहे हैं। कहानी में प्रवाह नहीं है। मूल कहानी ही उलझी हुई है। समर्थ कलाकारों की चौकड़ी कहानी को नए सिरे देती है,लेकिन उनका ओर-छोर समझ में नहीं आता।

एक्‍शन,एक्‍शन और एक्‍शन करते हुए टाइगर श्रॉफ की स्‍फूर्ति प्रभावित करती है। हर तरह के हथियारों से लैस रोनी द्वंद्व युद्ध में भी माहिर है। हड्डियां चटखाने में उसे ज्‍यादा आनंद आता है। इमोशन के मामले में टाइगर श्रॉफ फिसड्डी हैं। उनके चहरे पर कोई भाव ही नहीं उभरता। उहाहरण के लिए मनोज बाजपेयी,रणदीप हुडा,विपिन शर्मा और दीपक डोबरियाल के साथ के दृश्‍यों में उन्‍हें देख लें।
और हां,इस फिल्‍म में 'तेजाब' के गाने 123 की हत्‍या हुई है।
अवधि – 144 मिनट
दो स्‍टार **

Thursday, March 29, 2018

दरअसल : किफायती और कामयाब अजय देवगन

दरअसल...
किफायती और कामयाब अजय देवगन
(जन्‍मदिन 2 अप्रैल के मद्देनजर)
-अजय ब्रह्मात्‍मज
संयोग कुछ ऐसा बना था कि 2003 के राष्‍ट्रीय फिल्‍म पुरस्‍कारों की दिल्‍ली के एक पत्रकार मित्र से एक दिन पहले अग्रिम जानकारी मिल गई थी। यह पता चल गया था कि ‘द लिजेंड ऑफ भगत सिह’ में भगत सिंह की ओजपूर्ण भूमिका निभाने के लिए अजय देवगन को सर्वश्रेष्‍ठ अभिनेता का पुरस्‍कार मिलने जा रहा है। उन दिनों मैं महेश भट्ट के सान्निध्‍य में एक दैनिक का मनोरंजन परिशिष्‍ट संभाल रहा था। रहा नहीं गया तो मैंने महेश भट्ट को बता दिया। संभवत: उनसे अजय देवगन को पता चला। रात में अजय देवगन के एक सहयोगी का फोन आया...क्‍या यह सच है कि अजय देवगन को सर्वश्रेष्‍ठ अभिनेता का पुरस्‍कार मिल रहा है? ठोस जानकारी के बावजूद मैंने टालमटोल के अंदाज में कहा कि हां सुना तो है,लेकिन कल तक इंतजार करें। अगले दिन आधिकारिक जानकारी मिलने पर उनके उसी सहयोगी का फिर से फोन आया...अरे आप कल ही कंफर्म कर दिए होते। बहरहाल,’जख्‍म’ के बाद दूसरी बार राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार मिलने से महेश भट्ट,अजय देवगन और उनके प्रशंसक सभी खुश हुए।
महेश भट्ट की सिफारिश से अजय देवगन से मिलने और इंटरव्‍यू करने की कोशिश में मैं सफल रहा। तब उनकी ‘भूत’ रिलीज हो रही थी। तय हुआ कि ऑफिस में मिलते हैं। अचानक तबियत ढीली होने से यह मुलाकात उनके आवास के टेरेस पर शिफ्ट हो गई। पत्रकार मित्रों ने पहले से बता रखा था कि अजय मितभाषी हैं। बहुत मुश्किल से जवाब देते हैं। तब मीडिया जगत में ख्‍याति थी कि आमिर खान और अजय देवगन ने पत्रकारों को दूर रखने के लिए ही पीआरओ रखा है। दोनों के पीआरओ राजेन्‍द्र राव थे। और वे इस कला में माहिर थे। खैर,आदतन मैं पूरी तैयारी के साथ यह ठान कर पहुंचा था कि अच्‍छा,लंबा और गहरा(इन डेफ्थ) लेकर ही आना है। पूरे इंटरव्‍यू के चौथाई समय तक अजय देवगन चंद शब्‍दों और छोटे वाक्‍यों में जवाब देते रहे। फिर कुछ हुआ। मेरे एक सवाल ने तार जोड़ दिया और उनके जवाबों में प्रवाह आ गया। फिर तो हमारे बीच परस्‍पर विश्‍वास और सम्‍मान का एक रिश्‍ता बना,वह आज भी जारी है।
दो हफ्ते पहले राज कुमार गुप्‍ता के निर्देशन में उनकी ‘रेड’ आई है। इस फिल्‍म में भी वे ईमानदार,कर्तव्‍यनिष्‍ठ और धुनी नायक के किरदार में हैं। ऐसे किरदारों को निभाने में वे पारंगत हो चुके हैं। ‘गोलमाल’ जैसी कॉमिक सीरीज के बावजूद दर्शक उन्‍हें ऐसी भूमिकाओं में खूब पसंद करते हैं। ‘जख्‍म’ के बाद प्रकाश झा की मेनस्‍ट्रीम की रियलिस्‍ट फिल्‍मों में उन्‍होंने अपने अभिनेता के इस आयाम को खूब मांजा है। दर्शकों को किरदार की ईमानदारी का विश्‍वास दिलाने के लिए उन्‍हें संवादों और दृश्‍यों की अधिक जरूरत नहीं पड़ी। उनकी मौजूदगी ही दर्शकों को भरोसा देती है कि उनका नायक दृढ़प्रतिज्ञ है। वह हार नहीं मानेगा। खलनायक से वह सीधी भिडंत करेगा। रोहित शेट्टी ने उनके इसी व्‍यक्तित्‍व को लाउड और नाटकीय बना कर ‘सिंघम’ में पेश किया।
अभिनेता अजय देवगन के बारे में महेश भट्ट,प्रकाश झा और राज कुमार गुप्‍ता की राय एक सी है। अजय देवगन किफायती(इकोनॉमिकल) अभिनेता हैं। वे शॉट्स की बर्बादी नहीं करते। राज कुमार गुप्‍ता ने हाल की मुलाकात में बताया कि अपने किरदार और फिल्‍म के बारे में स्‍पष्‍ट हो जाने के बाद वे हर मुमकिन सहयोग के लिए तैयार रहते हैं। कागज पर लिखे गए किरदार शब्‍दों में होते हैं। अच्‍छा अभिनेता उन्‍हें ‘फ्लेश और ब्‍लड’ देकर पर्दे पर जीवंत करता है। अजय के अभिनय की प्रक्रिया में मेहनत नहीं दिखाई पड़ती। दरअसल वे ‘इंटेलिजेंट एक्‍टर’ हैं। वे किरदार का टोन पकड़ लेते हैं। ‘रेड’ में उन्‍होंने न तो कहीं हाथ उठाया है और न आवाज ऊंची की है। फिर भी अपने तेवर से वे सौरभ शुक्‍ला पर भारी ठहरते हैं। आप कह सकते हैं कि स्क्रिप्‍ट में ऐसा लिखा गया होगा...लिखा तो हर फिल्‍म में जाता है। केवल समर्थ अभिनेता ही उन्‍हें अपनी अदा और अंदाज से विश्‍वसनीय बना पाता है।
राजकुमार गुप्‍ता ने पाया कि अजय देवगन बेहद ‘सेक्‍योर’ अभिनेता हैं। सहयोगी कलाकारों की मदद करते हैं। उनके लिए जरूरी नहीं है कि हर दृश्‍य के केंद्र में वे रहें। वे दूसरों के सीन नहीं छीनते। इस प्रक्रिया से उम्‍दा फिल्‍म बनती हैं। अजय देवगन नैचुरल अभिनेता हैं। शॉट के पहले सीन समझ लेते हैं और सहज ही निभा जाते हैं। मुश्किल से मुश्किल दृश्‍यों को भी वे अधिकतम दो से तीन टेक में कर ही लेते हैं। ज्‍यादातर शॉट तो सिंगल टेक में ही पूरे हो जाते हैं।
मैंने देखा है कि अजय देवगन सेट पर मौज-मस्‍ती के मूड में रहते हैं। और हंसी-मजाक के बीच ही काम करते हैं। उन्‍हें कभी अपने सीन को मथते हुए नहीं देखा। अनुभव और अभ्‍यास से उन्‍होंने खुद के अंदर अभिनय की ऐसी वायरिंग कर ली है कि स्‍वीच दबाते ही वे कॉमिक,एक्‍शन,सीरियस और ईमानदार किरदारों के लिए झट से तैयार हो जाते हैं। अभी तक किसी फिल्‍म में क्रॉस वायरिंग से उनके परफारमेंस में कंफ्यूजन नहीं दिखा। उनके समकालीन कुछ अभिनेताओं में यह कंफ्यूजन दिखता है।  
जागरण डॉट कॉम में प्रकाशित

हिंदी टाकीज 2(13) : हीरो का मरना बर्दाश्‍त नहीं - पवन रेखा

परिचय
पवन रेखा, यूपी के छोटे से गांव बिलासपुर में रहते हुए कभी सोचा भी नहीं था कि पत्रकारिता में कभी कुछ कर पाउंगी। बस समय समय पर कदम बढ़ती गई और रास्ते बनते गए। पोस्ट ग्रेजुएशन के बाद द संडे इडियन मैगजीन में आर्ट एंड कल्चर रिपोर्टिंग से करियर की शुरूआत, फिर जनसत्ताऑनलाइन में करीब डेढ़ साल काम किया। एबीपी न्यूज़ में 2013 से कार्यरत। जनसत्ता अखबार, योजना मैगजीन सहित कई पत्र-पत्रिकाओं में विभिन्न मुद्दों पर लेखन जारी।


'ड्रीम के बिना ज़िंदगी का कोई प्वाइंट नहीं होता...ना सोने का, ना जागने का, ना जीने का ना मरने का, ड्रीम देखना बेसिक होता है और ये सबको अलाउड होना चाहिए।' पिछले साल रिलीज हुई ‘सीक्रेट सुपरस्टार’ जब मैंने देखी तो मुझे मेरे बचपन की याद आ गई। मेरा परिवार तो ऐसा नहीं था कि मुझे सपने ना देखने दे और उसी का नतीजा है कि आज में यह लिख पा रही हूं। लेकिन गांवों में आज भी लड़कियों को लेकर समाज की जो सोच है वहां से निकलकर किसी भी लड़की के लिए एक मेट्रो सिटी तक आने की कहानी किसी फिल्म से कम नहीं है। यूपी में देवरिया से करीब 25 किलोमीटर दूर है मेरा गांव बिलासपुर। सिनेमा देखना, फिल्मी मैगजीन पढ़ना और उपन्यास का तो नाम लेना भी आवारगर्दी की निशानी है। परिवार और समाज के हिसाब से आवारागर्दी तो ये लड़कों के लिए है लेकिन अगर किसी लड़की ने इनका नाम भी ले लिया तो गज़ब हो जाता है। यहां सिनेमा पर कोई बात नहीं करना चाहता। वहीं रहते हुए फिल्मी दुनिया के लिए मेरे दिल में प्यार पनपा। आज अगर हफ्ते में तीन-चार फिल्म ना देखी तो ऐसा लगता है कि कुछ तो छूट रहा है। मैंने कभी सोचा ही नहीं था कि जिस टीवी और सिनेमा की वजह से बचपन में इतनी धुनाई हुई, आज वही मेरा पैशन बन चुका है और उसी से रोजी-रोटी भी चल रही है।

तब गांव में टीवी एकाध लोगों के घर हुआ करता था और वह भी ब्लैक एंड ह्वाइट। संडे को श्री कृष्णा देखने से शुरूआत होती, फिर शक्तिमान और फिर चार बजे की फिल्म का इंतजार रहता था। रविवार शाम और शुक्रवार रात की फिल्म के लिए हम बच्चे किसी हद से गुजर जाते। जितनी मार पड़े हम हर हफ्ते फिल्म देखने से बाज नहीं आते थे। बिजली ना होने पर बैटरी का भी जुगाड़ हो जाता। ‘गोलमाल’, ‘साजन’, ‘दो और दो पांच’, ‘मेला’, ‘राजा हिंदुस्तानी’, ‘दूध का कर्ज’, ‘तेरी मेहरबानियां’ और ‘एक ही रास्ता’ जैसी तमाम ऐसी फिल्में हैं,जो दूरदर्शन पर ना जाने कितनी बार देखी है।
सिर्फ मुझे ही नहीं ज्यादा बच्चों को बचपन में सिनेमा के बारे में जानने की ललक रहती है। मुझे भी थी। तब सहारा न्यूज़पेपर में दो पेज की फिल्मी खबरें बहुत लुभाती थीं। वैसे तो दैनिक जागरण, अमर उजाला सहित कई अखबार थे लेकिन सहारा में फिल्मों के पेज का कलर कुछ ज्यादा ही अपनी तरफ खींचता था। रंगीन बड़ी-बड़ी तस्वीरें...जिस पेपर में ज्यादा फिल्मी खबरें होती हैं वही घर तक पहुंचे यह तय करने के लिए मैं चौराहे पर घंटो न्यूज़पेपर वाले का इंतजार करती थी। फिल्में देखने और पढ़ने का चस्का इस कदर सवार था। बस घरवाले को कभी समझ ना आया कि हर हफ्ते न्यूज़पेपर कैसे बदल जाता है।
सालों पुरानी फिल्मी मैगजीन मिल गई तो बस एक बार में खत्म करना होता था। सरस सलिल भी खूब पढ़ा है, ये तब सिर्फ तीन रूपये का मिलता था। उसमें कहानियां छपती थीं। तब जो लोग उसमें लिखते थे उन्हें पढ़कर ऐसा लगता था कि जैसे मेरे नाम से लिखा हुआ छपना सिर्फ सपना हो सकता है। गांव में स्कूलिंग करते समय कुछ कर दिखाने के सपने भी सिनेमा देख-देखकर ही आए।
दूरदर्शन का भला हो जिसने सिनेमा को हमारे अंदर जगाए रखा वरना उस माहौल से सिनेमा हॉल तक जाना भी किसी जंग जीतने से कम नहीं था। इतनी मुश्किल से घर वाले पढ़ाई के लिए राजी हुए फिर सिनेमा का नाम लेकर उन्हें बिदकाना क्यों। मुझे याद है जब मैं पहली बार सिनेमाहॉल पहुंची थी। सातवीं क्लास में थी। मामा के यहां जाने पर सभी का साथ में फिल्म देखने का प्लान बना। फिल्म थी ‘कच्चे धागे’...मैंने पहली बार बड़ा पर्दा देखा। पर्दा बहुत ही खराब था लेकिन फिल्म के कुछ सीन और गानों के लिरिक्स अब तक याद हैं। रोमांटिक सीन पर सीटियों और तालियों की वो गड़गड़ाहट सुनकर लगा कि Wow! ऐसा भी होता है।
इस फिल्म के बाद काफी सालों तक सिनेमा हॉल में कुछ नहीं देखा क्योंकि पढ़ाई करनी थी। ये मौका भी गांवों में हर लड़की को नहीं मिलता। लड़के तो क्लास और कोचिंग बंक करके सिनेमाघर जा सकते है,लेकिन लड़कियों का क्या जिनपर परिवार ही नहीं आस-पास के लोगों की भी नज़र रहती है। उनके पास तो कुछ काम भी नहीं होता और इस फिराक में रहते हैं कि कोई मौका मिले और चिंगारी भड़काए। तो सिनेमा देखने का मन होते हुए भी यह सोचकर उन अरमानों को दबाया जाता कि कहीं फिल्म के चक्कर में अपनी ज़िंदगी ना फिल्मी बन जाए। 11वीं में थी जब तेरे नाम रिलीज हुई। सलमान खान का जलवा था। मैं भी इस कदर दीवानी थी कि न्यू ईयर पर उन्हीं की ग्रीटिंग कार्ड खरीदी जाती थी। तेरे नामके समय ऐसा लगा कि इसे तो बस कैसे भी देखना है।
तब मैं घर से कुछ दूर बरहज में रहकर पढ़ाई कर रही थी। यहां भी लड़कियां थीं लेकिन हमारा कलेजा नहीं था कि खुद सिनेमाहॉल तक पहुंच जाएं। कोई और रास्ता ना होते हुए यह बात मां को बताई। आमतौर पर घरवाले यही कहते कि एक्जाम है पढ़ाई कर लो, अभी से फिल्मों के चक्कर में ना पड़ो। लेकिन मां ने एक लड़की के साथ हमें सलेमपुर के एक सिनेमा हॉल का टिकट दिलाकर देखने भेजा। उस फिल्म को देखकर मैं जितना रोई उतना तो किसी बड़े दुख में भी नहीं रोना आया। अपने फेवरिट हीरो को दुखी कोई कैसे देख सकता है। रो-रोकर बुरा हाल हुआ फिर डिसाइड किया कि अब सलमान की फिल्म की कहानी पता करने के बाद देखने जाना है। अगर फिल्म में हीरो का मरना पता चला तो फिल्म नहीं देखनी है। 
उस वक्त की फिल्में देखकर तो यह दिमाग में बैठ गया कि अंत में सब ठीक हो जाना है। हीरो जो करे वही दुनिया का अंतिम सत्य है। उसका मरना बर्दाश्त नहीं क्योंकि बॉलीवुड फिल्मों में ज्यादातर ऐसा ही देखा है। ऐसा ही हुआ जब पिछले साल शाहरूख खान की रईस देखी। उसमें शाहरूख का मरना दिखाया तब भी ऐसा ही लगा कि हीरो कैसे मर सकता है। सिनेमा देखते-देखते उसे लेकर सोचने का नज़रिया बदला है, देखने का तरीका बदला है लेकिन फिर दिल तो बच्चा है जी!
ग्रैजुएशन के लिए गोरखपुर पहुंची तो वहां रूममेट के रिश्तेदार का गोरखपुर में सिनेमाहॉल था। जब भी अच्छी फिल्म लगती वो हमें ले जाते और फिल्म दिखाते। हॉस्टल में वीकेंड पर भी डीवीडी में भी कुछ फिल्में देखीं। ये सब तो ठीक था लेकिन बड़ी कन्फ्यूजन थी कि बीएससी तो कर रहे हैं, पर आगे क्या? सच्चाई यही है कि तब तक मुझे ये भी पता नहीं था कि पत्रकारिता के लिए कौन सी पढ़ाई होती है। जब पता चला तो फिर दिल्ली जाने का सोचा। यह सुनकर मां खुश हुईं, दोस्त दुखी। खुशी इस बात की थी कि दिल्ली के बारे में सोचा तो सही और दोस्तों को दुख इस बात का कि लड़की का पढ़ने में मन नहीं लग रहा इसलिए ये सब कर रही है। बहुतों ने राय दी कि एमएससी करती तो ज़िंदगी बन जाती। खैर! 2008 में दिल्ली आकर हर तरह के स्ट्रगल के बीच फिल्म देखना जारी रहा। वैसे तो फिल्म के लिए पैसे जुटाना मुश्किल था लेकिन सपना सिनेमा (जो अब M Cinemas बन चुका है) हमारे लिए ही था,जहां हम लोग 60-80 रूपये में फिल्में देख लिया करते थे।
2011 में पहली नौकरी द संडे इंडियन मैगजीन में मिली जहां आर्ट एंड कल्चर बीट पर रिपोर्टिंग की जिम्मेदारी दी गई। जिस परिवेश से हम आए थे वहां आर्ट जैसी कोई चीज नहीं थी और कल्चर तो ऐसा कि अगर कोई ये बता दें कि उसे डांस, गाने या सिनेमा में दिलचस्पी हो तो लोग नचनिया बुलाने लगते। पहले तो लगा कि क्या करें लेकिन फिर सीनियर की मदद से बहुत कुछ सीखा। एनएसडी से नाता जुड़ा, बहुत से नाटक देखे। करीब 7-8 महीने काम किया। फिर जनसत्ता ऑनलाइन ज्वाइन किया जहां पर काम करने के दौरान बस फेसबुक स्टेटस ही अपडेट हुआ, लिखा तो कुछ भी नहीं। लेकिन सिनेमा से नाता नहीं टूटा। इस दौरान बहुत सी फिल्में देखी, किताबें पढ़ीं और नाटक भी देखे।
इसको बाद तो सिनेमा देखना तो ज़िंदगी का एक हिस्सा बन चुका था। एबीपी न्यूज़ में सिनेमा को लेकर दिलचस्पी और समझ दोनों बढ़ी। डेस्क पर खबरों के साथ-साथ इंटरटेनमेंट पर जमकर लिखा। फिर लगा कि क्यों ना इसी पर लिखें। फिर क्या।।फिल्में देखने, समझने, उसे जानने और उस पर लिखने का जो सिलसिला शुरू हुआ वह अब तक तो जारी है। इसमें करियर बनेगा या नहीं ये पता नहीं लेकिन इतना जरूर है कि सिनेमा अब मेरे लिए सिर्फ इंटरटेनमेंट नहीं है!
बाकी आखिर में बस इतना ही- ले दे के अपने पास फ़क़त इक नज़र तो है, क्यों देखें ज़िंदगी को किसी की नज़र से हम।
कुछ पसंदीदा फिल्में-
एंगरी इडियन गॉडेसेस, अस्तित्व, सीक्रेट सुपरस्टार, निल बटे सन्नाटा, तनु वेड्स मनु (रिटर्न्स), क्वीन, 3 इडियट्स, पेज 3, लम्हें, आनंद, शेप ऑफ वॉटर