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Wednesday, January 31, 2018

अनोखे गीत : कभी न बिगड़े किसी की मोटर रस्ते में

अजीत और सुरैया की इस फिल्म 'मोती महल' का निर्देशन रवीन्द्र दवे ने किया था. १९५२ में रिलीज़ हुई इस फिल्म में सुरैया के गाए कई गीत थे.
एक बार सुरैय्या शूटिंग पर देर से आई और बताया की रास्ते में कार खराब हो गई थी और यूनिट के लोगों को पूरा किस्सा सुनाया जो की गीतकार प्रेम धवन ने भी सुना. कहते हैं उसी पर ये गाना उन्होने लिखा जिसे बाद में मोती महल फिल्म मे शामिल किया गया.
आज विविध भारती पर सुरैया की पुण्य तिथि ( 31जनवरी 2004)  के अवसर पर रेडियो सखी ममता सिंह ने सुरैया का गाया यह गाना पेश किया.... 

कभी न बिगड़े किसी की मोटर रस्ते में
कभी न बिगड़े किसी की मोटर रस्ते में
खड़े रहो बस बेबस होकर रस्ते में
कभी न बिगड़े किसी की मोटर रस्ते में

कपडे हों मैले मुँह काला काला
हो वो सुरैया या मधुबाला
आ हो
हो वो सुरैया या मधुबाला
बड़े बड़े भी बन जाया करते है जोकर रस्ते में
बड़े बड़े भी बन जाया करते है जोकररस्ते में
कभी न बिगड़े किसी की मोटर रस्ते में

बार बार हैंडल को घुमाया
धक्के दे दे सर चकराया
धक्के दे दे सर चकराया
निकल गया है अपना तो हाय रे कचूमर रस्ते में
निकल गया है अपना तो हाय रे कचूमर रस्ते में
कभी न बिगड़े किसी की मोटर रस्ते में

तेल पिलाया डाला पानी पर ज़ालिम ने एक न मानी
पर ज़ालिम ने एक न मानी
याद आती है हमको नानी अब रो रो कर रस्ते में
याद आती है हमको नानी अब रो रो कर रस्ते में
कभी न बिगड़े किसी की मोटर रस्ते में

सच कहती है दुनिआ सारी
चलती का ही नाम है गाड़ी
चलती का ही नाम है गाड़ी
मोटर भी छकड़ा है जब हो जाए पंचार रस्ते में
मोटर भी छकड़ा है जब हो जाए पंचार रस्ते में
कभी न बिगड़े किसी की मोटर रस्ते में
खड़े रहो बस बेबस होकर रस्ते में
कभी न बिगड़े किसी की मोटर रस्ते में.


फिल्म : मोती महल
गायिका : सुरैया जमाल शेख (सुरैया)
गीतकार : प्रेम धवन
संगीतकार : हंसराज बहल
निर्माता : निगारिस्तान फिल्म्स
प्रदर्शन तिथि : 9 मई 1952

Tuesday, January 30, 2018

सिनेमालोक : फिल्‍मों में गांधीजी



सिनेमालोक
फिल्‍मों में गांधीजी
-अजय ब्रह्मात्‍मज
आज से ठीक 70 साल पहले 30 जनवरी को महात्‍मा गांधी की नियमित प्रार्थना सभा में नाथूराम गोडसे ने उन पर तीन गोलियां चलाई थीं। ‘हे राम’ बोलते हुए गांधी जी ने अंतिम सांसें ली थीं और उनकी इहलीला समाप्‍त हो गई थी। इसके बावजूद सत्‍तर सालों के बाद भी महात्‍मा गांधी व्‍यक्ति और विचार के रूप में आज भी जिंदा हैं।
हर भारतीय अपने दैनंदिन जीवन में उनसे मिलता है। उनकी छवि देखता है। जाने-अनजाने उन्‍हें आत्‍मसात करता है। राष्‍ट्रपिता के तौर पर वे चिरस्‍मरणीय हैं। भारतीय नोट पर अंकित उनका चित्र मुहावरे के तौर पर इस्‍तेमाल होता है। लगभग हर शहर में एक महात्‍मा गांधी मार्ग है। शहर के किसी नुक्‍कड़ या चौराहे पर विभिन्‍न आकारों में उनकी प्रतिमाओं के भी दर्शन होते हैं। भारतीय समाज में भगवान बुद्ध,महात्‍मा गांधी और डॉ. भीमराव अंबेडकर की प्रतिमाएं सबसे ज्‍यादा प्रचलित हैं। शेष दोनों से विशेष दर्जा हासिल है महात्‍मा गांधी को। उनकी तस्‍वीरें कोर्ट-कचहरी,थाने,दफ्तर,सरकारी कार्यालयों,स्‍कूल-कालेज और अन्‍य सार्वजनिक जगहों पर भी दिखाई पड़ती हैं। शायद ही कोई दिन ऐसा जाता हो जब भारतीय नागरिक गांधी का दर्शन न करता हो। उनके विचारों को भी प्रत्‍यक्ष-अप्रत्‍यक्ष रूप से हम ने जीवन में अपनाया है। फिल्‍मों में गांधी किसी न किसी रूप में बार-बार आते रहे हैं।
गांधी अपने कद्दावर व्‍यक्त्त्वि और प्रभाव के साथ लोकप्रिय छवि के कारण फिल्‍मकारों को प्रभावित करते रहे हैं। उनके जीवनकाल में ही उनसे प्रेरित फिल्‍में बनने लगी थीं। गांधी 1915 में भारत लौटे। देश के स्‍वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय गतिविधि और सोच से उन्‍होंने तत्‍कालीन नेताओं के साथ व्‍यापक जनसमूह को भी आकृष्‍ट किया। सनू् 1921 में ही आई कोहिनूर फिल्‍म कंपनी की ‘संत विदुर’ में विदुर के चरित्र को गांधी के हाव-भाव और वेशभूषा से प्रभावित दिखाया गया था। सेंसर बोर्ड ने निर्देशक कांजीभाई राठौड़ की मंशा समझ ली थी और फिल्‍म पर पाबंदी लगा दी थी। आजादी के पहले की फिल्‍मों में महात्‍मा गांधी के जीवनकाल में उनके व्‍यक्त्त्वि और विचारों की छटा से प्रभावित किरदार गढ़े जाते रहे।
फिल्‍मों में गांधी मुख्‍यत: तीन रूपों में दिखाई पड़ते हैं। पहला उनका प्रत्‍यक्ष रूप है,ऐसी फिल्‍में महात्‍मा गांधी के जीवन पर बनी हैं। इनमें रिचर्ड एटनबरो की ‘गांधी’(1982) और श्‍याम बेनेगल की ‘द मेकिंग ऑफ महात्‍मा’ प्रमुख हैं। इन दोनों फिल्‍मों को आगे-पीछे देख लें तो महात्‍मा गांधी का व्‍यक्त्त्वि और कृतित्‍व दोनों ही समझ में आ जाता है। रिचर्ड एटनबरो की ‘गांधी’ में उनके राजनीतिक व्‍यक्तित्‍व की सक्रियता है। भारतीय स्‍वाधीनता आंदोलन में उनकी निर्णायक भूमिका का अंदाजा लगता है। श्‍याम बेनेगल ने उनके अफ्रीका प्रवास को ध्‍यान में रखा। उन्‍होंने गांधी के महात्‍मा बनने की कहानी को चित्रित किया है। इनके अलावा गांधी के निजी जीवन का एक पहलू फिरोज खान की फिल्‍म ‘गांधी माय फादर’ में अच्‍छी तरह आया है। बेटे हरिलाल के साथ उनके विषम संबंधों को लेकर चलती यह फिल्‍म एक पिता और सार्वजनिक व्‍यक्ति का द्वंद्व पेश करती है। गांधी का दूसरा रूप उनके समकालीनों के जीवन पर बनी फिल्‍मों में चित्रित हुआ है। इन फिल्‍मों में फिल्‍मकारों ने संबंधित व्‍यक्तियों के संदर्भ में गांधी को पेश किया है। खास कर उन व्‍यक्तियों से गांधी के संबंध और रवैए पर फोकस किया गया है। तीसरा रूप गांधी के विचारों यानी गांधीवाद का है। इन फिल्‍मों में गांधी के विचारों को फिल्‍म की थीम से जोड़ा गया है। इसका सफल उदाहरण राजकुमार हिरानी निर्देशित ‘लगे रहो मुन्‍नाभाई’ है। राजनीतिक रूप से सचेत यह फिल्‍म कॉमिकल अंदाज में आज के समय में गांधी को पेश करती है। इस फिल्‍म में राजकुमार हिरानी ने फिल्‍म के किरदारों के मिजाज के मेल में ‘गांधीगिरी’ शब्‍द का इस्‍तेमाल किया था। आशुतोष गोवारीकर की ‘स्‍वदेस’ में फिल्‍म का नायक गांधी के विचारों से प्रभावित है। जानू बरुआ ने ‘मैंने गांधी को नहीं मारा’ में गांधी को नया संदर्भ दिया है। हिंदी के अलावा अन्‍य भाषाओं की फिल्‍मों में गांधी आते रहे हैं।
मजेदार तथ्‍य है कि महात्‍मा गांधी ने अपने जीवनकाल में केवल एक फिल्‍म देखी थी। वे सिनेमा को बुरा माध्‍यम मानते थे। उनके इस पक्ष का ख्‍वाजा अहमद अब्‍बास ने संबोधित किया था। उन्‍होंने महात्‍मा गांधी के नाम लिखे खुले पत्र में उनसे आग्रह किया था कि वे इस माध्‍यम को समझें और अपनी सहानुभूति दें। अगर गांधी ने फिल्‍म माध्‍यम की आवश्‍यकता पर जोर दिया होता और उसके लिए राजी हुए होते तो फिल्‍में भी थोड़ी बदली होतीं।
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originaly publised at 

Thursday, January 25, 2018

फिल्म समीक्षा : पद्मावत




फिल्‍म समीक्षा : पद्मावत
‘मी टू’ के दौर में ‘जौहर’ का औचित्‍य


-अजय ब्रह्मात्‍मज  
‘प्रस्‍तुत फिल्‍म ‘पद्मावत’ मलिक मोहम्‍मद जायसी द्वारा लिखे गए महाकाव्‍य ‘पद्मावत’ से प्रेरित है,जिसे प्रचलित रूप से काल्‍पनिक माना जाता है।फिल्‍म में दर्शाए गए सभी स्‍थल,किरदार,घटनाएं,जगह,भाषाएं,नृत्‍य,पहनावे इत्‍यादि ऐतिहासिक रूप से सटीक या वास्‍तविक होने का कोई दावा नहीं करते। हम किसी भी सूरत में किसी भी इंसान,समंदाय,समाज उनकी संस्कृति,रीति-रिवाजों उनकी मान्‍यताओं,परंपराओं या उनकी भावनाओं का हानि पहुंचाना या उनकी उपेक्षा करना नहीं चाहते। इस फिल्‍म का उद्देश्‍य सती या ऐसी किसी भी प्रथा को बढ़ावा देना नहीं है।‘ इस लंबे डिस्‍क्‍लेमर के बाद फिल्‍म संजय लीला भंसाली की फिल्‍म ‘पद्मावत’ पर्दे पर आरंभ होती है। फिल्‍म के पर्दे पर आने के पहले और देश में इस फिल्‍म को लकर विवादा और बवाल मचा हुआ है। करणी सेना नामक एक समूह कई महीनों से इस फिल्‍म पर पाबंदी लगाने की मांग कर रही है। उन्‍होंने चेतावनियां दी हैा कि अगर फिल्‍में राजपूती आन,बान और शान के खिलाफ कोई बात हुई तो वे थिएटर में उपद्रव करेंगे। रिलीज होने के बाद यह देख लिया गया है कि राजपूती भवनाओं को आहत करने का कोई प्रसंग,दृश्‍य या संवाद फिल्‍म में नहीं है तो भी उनका उपद्रव जारी है। प्रशासन चौकस नहीं है। उपद्रवी सड़कों पर घूम रहे हैं। ज्‍यादातर सिनेमाघरों में शांति हैलेकिन छिटपुट से हुई घटनाएं भी प्रशासन पर प्रश्‍न डइाती हैं। यहां तक सर्वोच्‍च न्‍यायालय की आदेश की अवमानना करते हुए इस फिल्‍म की रिलीज बाधित की गई है। सरकार को फौरी कदम उठाते हुए दर्शकों और थिएटर के जान-माल की रक्षा की गारंटी लेनी चाहिए,लेकिन इस फिल्‍म को लेकर केंद्र की सत्‍ताधारी राजनीतिक पार्टी के असमंजस से हम परिचित हैं। देश में अभिव्‍यक्ति की आजादी है। किसी भी फिल्‍मकार को यह अधिकार हासिल है कि वह देश के संविधान के तहत अपनी सृजनात्‍मक कल्‍पना का उपयोग करे और दर्शकें के मनोरंजन के लिए मनोवांछित फिल्‍म बना सके।
संजय लीला भंसाली में ‘गोलियों की रासलीला-रामलीला’ के समय से बड़ा क्रिएटिव शिफ्ट दिख रहा है। अपनी मूल शैली के साथ वे कथ्‍य की नई जमीन तलाश रहे हैं। वे पीरियड और कॉस्‍ट्यूम ड्रामा में नए प्रयोग कर रहे हैं। पहली कोशिश में सफल होने के बाद उन्‍होंने मध्‍यकाल के ऐतिहासिक घटनाओं के आधार पर ‘बाजराव मस्‍तानी’ की कहानी बुनी। उस फिल्‍म की रिलीज के समय भी तथ्‍यों की ऐतिहासिकता और कथ्‍य की प्रामाणिकता को लेकर सवाल उठे थे। धीरे-धीरे विवाद की लहरें ‘बाजीरा मस्‍तानी’ से मिले मनोरंजन के आवेग में समा गईं। दर्शक भूल गए। विरोधी भी शांज हो गए। इस बार ‘पद्मावत’ की रिलीज के पहले से चल रहा विवाद लंबा खिंच गया। हर तरह से फिल्‍म को राजपूतों का की विरोधी न होने का सर्टिफिकेट मिलने के बावजूद विवाद और अब उपद्रव जारी है। कुछ तो गड़बड़ हैं। समझदारी लुप्‍त हो गई है। मजेदार बात यह है कि फिल्‍म के बारे में उसकी खूबियों और खामियों को लेकर अधिक बाते नहीं हो रही हैं। सब यही बताने में लगे हैं कि फिल्‍म में कोई भी कथित विवादसस्‍पद दृश्‍य नहीं है। थोड़ा आगे बढ़ने पर फिल्‍म की भव्‍यता,दीपिका के रूप-सौंदर्य,रणवीर सिंह नाटकीय ऊर्जाऔर शाहिद कपूर की सौम्‍य वीरता की बातें हो रही हैं। फिल्‍म के ये जरूरी पहलू हैं,लेकिन फिल्‍म का ध्‍येय और उद्देश्‍य तो और भी कुछ होता है। हर फिल्‍म कुछ कहती है,क्‍योंकि फिल्‍मकार कुछ कहना चाहता है। इस फिल्‍म को चल रहे विवाद के कारण संजय लीला भंसाली ने पहले मुंह ही नहीं खोला। उन्‍हें अब भी बताना चाहिए कि वे इस फिल्‍म के जरिए क्‍या कहना चाह रहे हैं? फिलहाल दर्शक और समीक्षक तो कवल राजपूत-राजपूत देख रहे हैं। लिर्देशक मौन हैा। इस फिल्‍म में पहली बार कलाकार गौण हो गए हैं। उन्‍हें कोई पूछ ही नहीं रहा है। यों उनके भी श्रीमुख पर पट्टी चिपकी है।
‘पद्मावत’ में अलाउद्दीन खिलजी के खल,राजा रतनसेन के शौर्य और पद्मावती के सौंदर्य के परिवेश के रूप में भारतीय इतिहास का एक काल है। इस काल के विस्‍तार में न जाएं तो भी सुल्‍तान-ए-हिंद बना अलाउद्दीन खिलजी मंगोलों के आक्रमण से सचेत है। वह अपने राज्‍य का विस्‍तार भी चाहता है। हमें यह नहीं पता चलता कि वह कैसा शासक है? फिल्‍म में उसे वासना में लिप्‍त कामुक व्‍यक्ति के रूप में दिखाया गया है। शादी की रात भी वह किसी और लड़की के साथ उलझा हुआ है। उसे तो चित्‍तौड़ की सुधि भी नहीं है। राघव नेतन से पद्मावती का रूप बखान सुनने के बाद वह चित्‍तौड़ का रुख करता है। वह किसी भी तरह पद्मावती को पाना चाहता है और राजा रतनसेन नहीं चाहते कि उनकी पद्मावती को कोई छू सके। निर्णायक युद्ध में जाने के पहले पद्मावती के आग्रह पर वे उसे जौहर का हक देकर जाते हैं। हम देखते हैं कि संजय लीला भंसाली की अन्‍य फिल्‍मों की तरह ही इस फिल्‍म के क्‍लाइमेक्‍स में एक चरित्र(खिलजी) कुछ पाने की लालसा और जिद में भाग रहा है और दूसरा चरित्र यहां पद्मावती स्थिर भाव से उससे दूरी बनाते हुए ओझल हो रही है। इन दोनों के बीच मौजूद राजा रतन सेन पहले ही पिस चुका है। गौर करें तो तीनों ही चरित्रों को उनके स्‍वभाव के मुताबिक तीनों कलाकारों ने निभाया है। वे लिखे गए चरित्र से आगे नहीं बढ़ पाते हैं। ऐसा लगता है कि मूल फिल्‍म कतरब्‍योंत और अपेक्षित सुधार की वजह से संष्लिष्‍ट नहीं रह सकी है। कथ्‍य भंग से निर्वाह में अवरोध आता है। हर चरित्र खंडित है। संजय लीला भंसाली की यह अभी तक की सबसे मुश्किल और कमजोर फिल्‍म है। कल्पित सोच के साथ अंत तक नहीं पहुंच पाने के कारण संजय लीला भंसाली का मंतव्‍य छूट गया है।
इस फिल्‍म की सोच और निष्‍कर्ष से आपत्ति है। फिल्‍म का क्‍लाइमेक्‍स जौर इतने नियोजित और भ्‍व्‍य तरीके से फिल्‍माया गया है कि उसका असर देर तक रहता है। पद्मावती का जौहर काल्‍पनिक सत्‍य है,लेकिन उसका असर वास्‍तविक है। क्‍या 2017 में ऐसी फिल्‍म को ऐसी क्रिया की प्रासंगिकता बनती है। तर्क दिया जा सकता है कि उस समय ऐसा हुआ होगा। मान लिया कि हुआ होगा,लेकिन अभी उसे दिखाने का उद्देश्‍य क्‍या है? संजय लीला भंसाली से राजपूती सेना की मांग ही अधिक मात्रा में फिल्‍म पेश की गई है। संजय लीला भंसाली मध्‍ययुग के संस्‍कार और विचार के चित्रण में इस कदर लिप्‍त हो गए हैं कि अपनी सृजनात्‍मकता ही स्‍वाहा कर देते हैं। ‘मी टू’ के इस दौर में जौहर का क्‍या औचित्‍य बनता है? समर्थ और प्रगतिशील फिल्‍मकार अतीत और इतिहास के तथ्‍यों से सबक लेकर वर्तमान को बेहतर बनाने की कोशिश करता है। इस फिल्‍म में औरत के शरीर को इज्‍जत से जोड़ कर ‘निर्भया कांड’ के बाद तेजी से उभरी इस नई सोच को जड़ से काटने की कोशिश है कि शरीर का इज्‍जत से कोई रिश्‍ता नहीं है। यह फिल्‍म मध्‍यकालीन कथा से उस कथित ‘इज्‍जत’ को स्‍थापित करने के साथ जौहर को गरिमापूर्ण बना देती है। संजय लीला भंसाली की यह सोच प्रतिगामी और रुढि़वादी है। विरोध तो इसका होना चाहिए था। कम से कम फिल्‍म देखने के बाद फिल्‍म के इस पक्ष्‍ की आलोचना होनी चाहिए थीं।
लगभीग 200 साल पहले राजा राम मोहन राय ने ब्रह्म समाज की स्‍थापना की और सती प्रथा के विरोध में अभियान छेड़ा। उन्‍के प्रयास से सती प्रथा रोकने के लिए कानून बना। हालांकि उसके बावजूद यह प्रथा किसी न किसी रूप में जारी रही। आजादी के बाद संविधान के धारा बना कर इस पर रोक लगाई गई। 1988 में इस कानून में सुधार करते हुए यह भी जोड़ा गया कि सती होने के लिए उकसाना या किसी भी रूप में समी को महिमामंडित करना दंडनीय अपराध होगा। सती के मंदिर नहीं बनाए जा सकते। और यहां संजय लीला भंसाली ने पूरी फिल्‍म बना दी। इस फिल्‍म में काल्‍पनिक तथ्‍यों के चित्रण से सती प्रथा के सामूहिंक कृत्‍य जौहर को उचित ही ठहराया गया है। फिल्‍म के अंत में निष्‍कर्ष के रूप में एक महिला स्‍वर उभरता है....रानी पद्मावती का जौहर अलाउउद्दीन की सबसे बड़ी हार थी। और चित्‍तौड़ की सबसे बड़ी जीत। आज इतनी सदियों बाद भी रानी पद्मावती के जौहर की गूंज भारत के हर कोने में सुनाई देती है। और रानी पद्मावती को लोग आज भी उस देवी की तरह पूजते हैं जो बुराई का संहार करती है।
फिल्‍म देखने के बाद बताएं कि फिल्‍म के इस निष्‍कर्ष से आप कितने सहमत हैं और क्‍या यह फिल्‍म सती प्रथा के समर्थन में खड़ी नहीं हो जाती ?

अवधि – 163 मिन
**1/2 ढाई स्‍टार
निर्देशक – संजय लीला भंसाली
कलाकार – दीपिका पादुकोण,शाहिद कपूर,रणवीर सिंह
प्रदर्शन तिथि – 25 जनवरी 2018