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Tuesday, December 25, 2018

सिनेमालोक : कार्तिक आर्यन

सिनेमालोक
कार्तिक आर्यन
-अजय ब्रह्मात्मज
इस महीने के हर मंगलवार को 2018 के ऐसे अचीवर को यह कॉलम समर्पित होगा,जो हिंदी फिल्मों में बहार से आए.जिन्होंने अपनी मेहनत और प्रतिभा के दम पर पहचान हासिल की.2018 में आई उनकी फिल्मों ने उन्हें खास मुकाम दिया.
दस महीने पहले 23 फ़रवरी को ‘सोनू के टीटू की स्वीटी’ रिलीज हुई थी. लव रंजन की इसी फिल्म के शीर्षक से ही प्रॉब्लम थी. कुछ को यह टंग ट्विस्टर लग रहा था तो अधिकांश का यही कहना था कि यह भी कोई नाम हुआ? फिल्म रिलीज हुई और सभी को पसंद आई. इस तरह के विषय की फिल्मों पर रीझ रहे दर्शक टूट पड़े तो वहीँ खीझ रहे समीक्षक इसे दरकिनार नहीं कर सके.समीक्षकों ने फिल्म के विषय की स्वाभाविक आलोचना की, लेकिन उसके मनोरंजक प्रभाव को स्वीकार किया.नतीजा यह हुआ कि खरामा-खरामा यह फिल्म 100 करोड़ के क्लब में पहुंची. फिल्म के कलाकारों में सोनू यानि कार्तिक आर्यन को शुद्ध लाभ हुआ. छह सालों से अभिनय की दुनिया में ठोस ज़मीन तलाश रहे कार्तिक आर्यन को देखते ही देखते दर्शकों और फिल्म इंडस्ट्री ने कंधे पर बिठा लिया. उन्हें फ़िल्में मिलीं,एनडोर्समेंट मिले और कार्तिक ग्लैमर वर्ल्ड के इवेंट में चमकने लगे.
22 नवम्बर 1990 को ग्वालियर के डॉक्टर दंपति के परिवार में जन्मे और पीला-बढे कार्तिक मुंबई तो आये थे इंजीनियरिंग की पढाई करने,लेकिन मन के कोने में सपना फिल्मों में एक्टिंग का था.पढाई के दौरान सपनों को पंख लगे और कार्तिक ने अभिनय के आकाश की तलाश जारी रखी. नए कलाकार फिल्म इंडस्ट्री के ताऊ-तरीकों से नावाकिफ होते हैं. सही हिम्मत और पूरा जज्बा न हो तो सपनों को चकनाचूर करने के रोड़े रास्तों में पड़े मिलते हैं.कार्तिक ने खुद ही राह बनायीं.दिक्कत का एहसास हुआ तो तैयारी की और प्रयास करते रहे. आख़िरकार 2011 में उन्हें लव रंजन की ‘प्यार का पंचनामा’ मिली.इस फिल्म में रजत का किरदार दर्शकों के ध्यान में आया.वह उन्हें याद रहा.पहली फिल्म के नए एक्टर के लिए इतना बहुत होता है.इस फिल्म में उनके लम्बे संवाद और उसकी अदायगी ने सभी को प्रभावित किया. कार्तिक के साथ ऐसा चल रहा है.उनकी फ़िल्में अपने विषय की वजह से आलोचित होती हैं,लेकिन उनका किरदार प्रशंसित होता है.कार्तिक की नयी फ़िल्में इस विरोधाभास को कम करें तो उनकी लोकप्रियता और स्वीकृति तेज़ी से बढ़ेगी.
पहली फिल्म की सफलता और चर्चा के बावजूद दूसरी फिल्म ‘आकाशवाणी’ दर्शकों ने पसंद नहीं की. अगले साल ई सुभाष घई की ‘कांची’ कब रिलीज होकर चली गयी? किसी को पता ही नहीं चला. इं दोनों फिल्मों की असफलता से कार्तिक के करियर में विराम आया.निराशा नज़दीक पहुंची.इस छोटे अंतराल में बेचैन होने के बावजूद कार्तिक ने बेसब्री में गलत फ़िल्में नहीं चुनीं.वक़्त गुजरता रहा और कार्तिक सही फिल्म के इंतजार में रहे.फिर से लव रंज आये और उन्होंने ‘प्यार का पंचनामा 2’ में कार्तिक आर्यन को अंशुल का किरदार दिया.इस फिल्म में फिर से उनके एकल संवाद की तारीफ हुई.बतौर एक्टर भी उनमें आत्मविश्वास और परफॉरमेंस की रवानी दिखी.बीच में आई ‘गेस्ट इन लंदन’ हलकी रही,लेकिन ‘सोनू के टीटू की स्वीटी’ ने परिदृश्य ही बदल दिया.
पिछले 10 महीनों में कार्तिक लगातार चौंका रहे हैं.वे सुर्ख़ियों में बने हुए हैं.उनकी फिल्मों की घोशनाएँ हो रही है.सही या गलत यह खबर भी फैल रही कि उन्होंने कौन सी फिल्म छोड़ दी.करीना कपूर के साथ रैंप वाक तो चर्चा में आये. उस इवेंट की तस्वीरों में कार्तिक का कॉन्फिडेंस देखते ही बनता है.यूँ लगता है की कार्तिक लगातार खुद को मंज रहे हैं और अभी से बड़ी चमक और खनक के लिए खुद को तैयार कर रहे हैं.कार्तिक की एक अघोषित खूबी है.ग्वालियर की पृष्ठभूमि और परिवार से उन्हें हिंदी मिली है.हिंदी के उच्चारण और अदायगी में अपने समकालीनों से बहुत आगे हैं.उनके एकल संवाद प्रमाण हैं कि हिंदी पर उनकी जबरदस्त पकड़ है.
कार्तिक की ‘लुका छुपी’ की शूटिंग पूरी हो चुकी है. इसमें वह कार्तिक आर्यन के साथ हैं.’किंक पार्टी’ में वह जैक्लिन फ़र्नांडिस के साथ नज़र आयेंगे. इम्तियाज़ अली की ‘लव आजकल 2’ में सारा अली खान के साथ उनकी जोड़ी बनेगी. 2018 ने कार्तिक के सपनों को ऊंची उड़ान दी है.


Tuesday, December 18, 2018

सिनेमालोक : राधिका आप्टे


सिनेमालोक
राधिका आप्टे
-अजय ब्रह्मात्मज
पिछले दिनों ऑनलाइन स्ट्रीमिंग प्लेटफार्म नेटफ्लिक्स ने एक ट्विट किया कि ‘अंधाधुन की स्ट्रीमिंग चल रही है.यह इसलिए नहीं बता रहे हैं कि इसमें राधिका आप्टे हैं,लेकिन हाँ इसमें राधिका आप्टे हैं.’ इस ट्विट की एक वजह है.कुछ महीने पहले सोशल मीडिया पर मीम चल रही थी और दर्शक सवाल कर रहे थे कि नेटफ्लिक्स के हर हिंदी प्रोग्राम में राधिका आप्टे ही क्यों रहती है? संयोग कुछ ऐसा हुआ कि ‘लस्ट स्टोरीज’,’सेक्रेड गेम्स’ और ‘गुल’ में एक के बाद एक राधिका आप्टे ही दिखीं.मान लिया गया है कि डिजिटल शो में राधिका का होना लाजिमी है.
करियर के लिहाज से देखें तो राधिका आप्टे की पहली फिल्प्म 2005 में ही आ गयी थी.उन्होंने महेश मांजरेकर के निर्देशन में ‘वह लाइफ हो तो ऐसी’ फिल्म की थी,जिसमे शहीद कपूर और अमृता राव मुख्या भूमिकाओं में थे.उस फिल्म की आज किसी को याद भी नहीं है.हिंदी,बंगाली मराठी और तेलुगू फिल्मों में छोटी-मोटी भूमिकायें करने के बाद एक तरीके से ऊब कर राधिका लंदन चली गयीं.वहां उन्होंने कंटेम्पररी डांस सीखा.वहीँ उनके लाइफ पार्टनर बेनेडिक्ट टेलर भी मिल गए.कुछ समय तक लीव इन रिलेशनशिप में रहने के बाद दोनों ने शादी कर ली.राधिका के प्रशंसक उनके पति को नहीं पहचानते,क्योंकि वह राधिका के आगे-पीछे डोलते नज़र नहीं आते.शादी के बाद राधिका ने जिस तरह की बोल्ड फ़िल्में की हैं,वह शायद आम हिन्दुस्तानी पति को गवारा नहीं होता.तमाम आज़ादी और और नारी स्वतंत्रता की बैटन के बावजूद हिंदी फिल्मों की अभिनेत्रियों को शादी के बाद अघोषित दायरे में रहना पड़ता है.
राधिका ने ऐसी कोई परवाह नहीं की.डांस और थिएटर की ट्रेनिंग से उनकी एक्टिंग की नींव पुख्ता है.धीरे-धीरे दिख रहा है कि वह हर किस्म और तबके के किरदारों को आसानी से निभा ले जाती हैं.उन्होंने ‘लस्ट स्टोरीज’ की तो ‘पैडमैन’ में घरेलू महिला की भी भूमिका निभाई.इसके पहले उन्हें ‘माझी-द माउंटेनमैन’ में भी हमने देखा था.राधिका के परफॉरमेंस में वैराइटी है.थोड़ी सी दिक्कत उनके उच्चारण और संवाद अदायगी की है.हल्का सा मराठी टच होने से उनकी भूमिकाओं का असर कम होता है.राधिका के दोस्तों और निर्देशकों को उन्हें हिंदी उच्चारण सुधारने की सलाह देनी चाहिए.
राधिका के साथ सबसे अच्छी बात है कि वह किसी एक भाषा या विधा से नहीं बंधी हैं. वह अंग्रेजी समेत 6-7 राष्ट्रीय बह्षाओं में काम कर चुकी अहै और उन्होंने आगे के लिए भी खुद को हिंदी तक सीमित नहीं किया है.फीचर के साथ शार्ट फिल्म और वेब सेरिज करने में भी उन्हें कोई गुरेज नहीं है.इं दिनों शार्ट फिल्मों की काफी चर्चा है.राधिका आप्टे ने 2015 में सुजॉय घोष के साथ ‘अहल्या’ होर्त फिल्म की थी.तब कुछ आलोचकों ने समझा और लिखा था कि फिल्मों में राधिका का करियर समाप्त सा हो गया है,इसलिए वह शार्ट फाइलों की ओर मुड़ गयी हैं.अब पलट कर देखें तो वह पायनियर जान पड़ती हैं.उन्होंने भांप लिया था कि आने वाला समय शार्ट फिल्म और वेब सीरिज का है.
इस सन्दर्भ में अनुराग कश्यप औr विक्रमादित्य मोटवानी की ‘सेक्रेड गेम्स’ में राधिका आप्टे की भूमिका की बहुत चर्चा हुई.वह और भी वेब सीरिज कर रही हैं.लगातार दिखने से भी फिल्म एक्टर दर्शकों को खटकने लगते हैं.राधिका ने ‘बाज़ार’ जैसी फिल्मों में मामूली भूमिकाएं स्वीकार कर गलती ही की.इन फिल्मों में ज्यादा कुछ करने की गुंजाईश नहीं होती.और फिर डायरेक्टर सक्षम नहीं हो तो वह कलाकार को प्रेरित भी नहीं कर पाटा.राधिका के अभिनय में एकरसता नहीं है,लेकिन उसके लिए बेहतरीन और कल्पनाशील डायरेक्टर की ज़रुरत है.और फिर हिंदी फिल्मों में लोकप्रियता हासिल करने के लिए नाच-गाने वाली आकर्षक भूमिकाएं भी करनी पड़ती हैं.राधिका का मिजाज ऐसी फिल्मों से मेल नहीं खता.यही उम्मीद की जा सकती है कि इंडी सिनेमा के नए दौर में राधिका को अपनी प्रतिभा दिखाने के लिए कुछ चुनौतीपूर्ण भूमिकाएं मिलें. अगले साल पिया सुकन्या के निर्देशन में उनकी ‘बंबैरिया’ रिलीज होगी.



Sunday, December 16, 2018

संडे नवजीवन : सेलेब्रिटी शादी : वैभव और बदली परंपरा


संडे नवजीवन
सेलेब्रिटी शादी : दिखा वैभव और बदली परंपरा

-अजय ब्रह्मात्मज
भारतीय समाज में शादी हम सभी के सामाजिक-पारिवारिक जीवन का अनिवार्य चरण है.अभिभावक और माता-पिता चाहते हैं कि उनकी संतान समय रहते शादी कर ले और ‘सेटल’ हो जाये.अभिभावक और परिवार की मर्जी व सहमति से शादी हो रही हो तो औकात से ज्यादा खर्च करने का उत्साह आम है.यूँ आये दिन शादी और दहेज़ के लिए क़र्ज़ लेने के किस्से ख़बरों में आते रहते हैं.फिर भी शादी में अतिरिक्त खर्च का सिलसिला नहीं थम रहा है.गाँव-देहात से लेकर शहरी समाज तक की शादी में दिखावा बढ़ता जा रहा है.टीवी और फिल्मों के प्रसार और प्रभाव से रीति-रिवाज से लेकर विधि-विधान तक में तब्दिली आ रही है.अपनाने की आदत इतनी प्रबल है कि फिल्मों और ख़बरों में दिखी शादियों से परिधान और विधान अपनाये जा रहे हैं.देश के सारे दूल्हे शेरवानी और सारी दुल्हनें लहंगे में नज़र आने लगी हैं.संगीत,वरमाला और जूता छिपाई की रस्में देश के कोने-कोने में दोहराई जा रही हैं.रुढियों के नाम पर हल्दी,चुमावन और विदाई जैसी आत्मीय और रागात्मक रस्मों से तौबा किया जा रहा है.सबकुछ यकसां हो रहा है.
अब तो फिल्मों के अलावा फिल्म कलाकारों और अमीर परिवारों की शादियों का छूत किसी महामारी की तरह फ़ैल रहा है.हाल-फिलहाल में संपन्न हुई चार अभिनेत्रियों की शादी के लाइव कवरेज हम देख चुके.पांचवी शादी इन पंक्तियों के लिखने के समय चल रही है,जो इस देश के सर्वाधिक अमीर अंबानी परिवार में हो रही है.इन शादियों के प्रभाव और आकर्षण का अंदाजा इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि देश के प्रधानमंत्री को भी इन शादियों में शामिल होना पड़ रहा है.शादी के रिसेप्शन में दूल्हा-दुल्हन के संग मंच पर खड़े किसी और प्रधानमंत्री की तस्वीर पहले नहीं दिखी.हो सकता है प्रचारप्रिय नरेन्द्र मोदी का यह व्यक्तिगत फैसला हो कि वे लोकप्रिय शादियों में शामिल होंगे ताकि उनके वैसे प्रशंसक और मतदाता खुश हों,जो इन लोकप्रिय हस्तियों के जबड़ा फैन हैं.
बहरहाल,पिछले कुछ महीनों में चार अभिनेत्रियों की शादियाँ हुईं.अनुष्का शर्मा,सोनम कपूर.दीपिका पादुकोण और प्रियंका चोपड़ा अनुष्का ने क्रिकेटर विरत कोहली से शादी की.सोनम कपूर ने बिजनेसमैन आनंद आहूजा को चुना.दीपिका की जोड़ी रणवीर सिंह के साथ बनी. और प्रियंका चोपड़ा ने निक जोनस से विवाह रचाया.मीडिया ने चारों जोड़ियों में केवल सोनम कपूर-आनंद आहूजा को कोई संक्षिप्त नाम नहीं दिया.बाकी तीन विरुष्का,दीपवीर और निक्यंका नाम से मशहूर हुए.चारों शादियों के मीडिया कवरेज में कोई कमी नहीं रही.पांचवी शादी में यह कवरेज अतिरेक पर है,लेकिन उसमें मीडिया की आत्मीयता नहीं झलक रही है.एक बड़ा फर्क यह है कि चारों अभिनेरियों की शादी में वे स्वयं मेहमानों के आगमन की धुरी थीं,जबकि ईशा अंबानी की शादी में शिरकत करने की वजह उनके पिता मुकेश अंबानी हैं.गौर करें और चारों अभिनेत्रियों बनाम एक ईशा की शादी के बड़े फर्क को महसूस करे.समृद्धि और वैभव से परिपूर्ण होने के बावजूद ईशा बनाम चारों अभिनेत्रियों की शादी में भी धन,साख और प्रभुत्व की वजह से अंतर रहा.ईशा की शादी से पहले उदयपुर में आयोजित समारोह में हिलेरी क्लिंटन से लेका मुंबई के तमाम फ़िल्मी सितारे मौजूद रहे.उन्होंने मानक पर सार्वजानिक नृत्य भी किया.भारतीय मिथक से उदहारण लें तो यह देवलोक की शादी की तरह हैं,जहाँ बेहतरीन परिधानों में सजे सभी देवी-देवता आशीर्वाद के साथ पुष्पवर्षा कर रहे हैं.देश में पहले भी उद्योगपतियों ने अपनीं संतानों की शादी में करोड़ों खर्च किये हैं.शाह रुख खान ऐसी कुछ शादियों में फीस लेकर नाचते रहे हैं.पहली बार किसी गैरफिल्मी परिवार की शादी में सितारों की ऐसी जमघट दिखी तो खबर तो बनती ही है.
चारों अभिनेत्रियों में केवल सोनम कपूर समृद्ध फ़िल्मी परिवार की बेटी हैं.बाकी तीनों अभिनेत्रियों की पृष्ठभूमि मध्यवर्गीय रही है.हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में तीनों ‘आउटसाइडर’ हैं. तीनों ने अपनी मेहनत और लगन से आज का मुकाम हासिल किया है.उनकी प्रतिभा और योग्यता ही उन्हें यहाँ तक ले आई है.अगर कभी उनके आरंभिक इंटरव्यू से गुजरेंगे तो पाएंगे कि उनमें शुरू से आत्मविश्वास था.उन्होंने अपने प्रेमी चुने और उनसे विवाह रचाया.तीनों की शादियों की तस्वीरों में चेहरे की मुस्कराहट और उल्लसित भाव-भंगिमाओं से उनकी आंतरिक ख़ुशी जाहिर होती है.सभी तस्वीरों और वीडियो में अपने प्रेमी/पति के साथ उनकी अंतरंगता झलकती है.शादी के पहले की कोर्टशिप से यह अंतरंगता गाढ़ी हुई है.इन सभी छवियों में एक उन्मुक्तता है,जो अंबानी परिवार के समारोहों में लापता है.दरअसल अनुष्का,दीपिका और प्रियंका की शादियां 21वीं सदी की लड़कियों के एटीट्युड का सार्वजनिक बयान हैं.उल्लेखनीय है कि हमारे मन-मस्तिष्क में इन शादियों में दुल्हनें प्रमुख हैं.दूल्हे सेकेंडरी महत्व के हैं.यहाँ तक कि रणवीर सिंह जैसे लोकप्रिय अभिनेता भी दीपिका के साये की तरह ही डोलते नज़र आये.दुल्हनों ने शादी की आम सोच और धारणा को अपनी तरफ झुका लिया है.भविष्य में मध्यवर्गीय समाज की लड़कियों पर इसका गहरा असर पड़ेगा.शादी की समझ बढ़ेगी.शादी में उन्हें अपनी भूमिका तय करने में प्रेरक मदद मिलेगी.इन शादियों ने विदाई की रस्म को निबटा दिया है.दुल्हन की विदाई कहीं न कहीं पितृसत्ता के पक्ष को मजबूत करने के साथ आधार देती है.मध्यवर्गीय समाज में लड़कियां मायके और सौरल के पारंपरिक धुर्वों से निकल रही हैं.शादी के पहले से उनका अपना घर होता है या शादी के बाद वे अपने घर जाती हैं,जिसे नवदम्पति ने बनाया होता है.
फिल्म अभिनेत्रियों की महंगी और खर्चीली शादी पर हायतौबा मची हुई है.कुछ आलोचक इसे वैभव का अश्लील प्रदर्शन मान रहे हैं.निश्चित रूप से ये शादिय भव्य और महंगी रही हैं.प्रदर्शन तो इन्हें मीडिया कवरेज ने बनाया.दरअसल,चहेती फिल्म अभिनेत्रियों के बारे में सब कुछ जानने और देखने की दर्शकों-प्रशंसकों की ललक ने ही मीडिया को विस्तृत कवरेज के लिए बाध्य किया.बदले हुए समय में प्रशंसक और स्टार के नए रिश्तों को समझना ज़रूरी है.अकेली सोनम कपूर ने अपनी शादी के मीडिया कवरेज का पुख्ता और प्रवेशनीय इंतजाम किया था.बाकि तीनों ने मीडिया को दूर ही रखा था.निषेध के इस परिप्रेक्ष्य में जिज्ञासा ज्यादा थी और सबसे पहले खबर व तस्वीर देने की आपाधापी मची थी.अनुष्का,दीपिका और प्रियंका सोशल मीडिया के जरिये खुद ही सूचना और इमेज देकर मीडिया की उपयोगिता को नज़रअंदाज कर रहे थे.नतीजतन मीडिया रिपोर्ट में संयम की कमी और टिप्पणियों की हड़बड़ी रही.मीडिया की खीझ और झल्लाहट में रिपोर्ट में जाहिर हो रही थी.और फिर यह कैसे तय होगा कि अपनी शादी में कौन कैसे और कितना खर्च करे?कानूनी तौर पर कोई सीलिंग नहीं लगी है.आजकल तो फैशन शो,अवार्ड समारोह और अन्य एवेब्त में रेड कारपेट पर फ़िल्मी हस्तियां इस्ससे ज्यादा लकदक,चकमक,महंगे और भडकीले परिधानों में नज़र आते हैं.शो बिज़नस के स्सरे इवेंट अब सोशल मीडिया और टीवी शो बन चुके है.फिल्म कलाकारों की लोकप्रियता छवि के खेल पर टिकी है,इसलिए यह प्रदर्शन स्वाभाविक और प्रश्नों से परे है.
जिसकी ज्यादा चर्चा नहीं हुई और जो गौरतलब है कि सोच और व्यवस्था के तमाम बदलावों के बावजूद स्सभी शादियों में रुढियों का पालन किया गया.दूल्हे और दुल्हन के परिवारों की विधियों से दो बार शादियों की रस्में पूरी हुईं.खासकर दीपिका और प्रियंका की शादियाँ दो अलग दिनों में संपन्न हुई.चरों ने अपनी शादियों में नजदीकी दोस्तों और रिश्तेदारों को आमंत्रित किया.हाँ,अपने दायरे के मुताबिक उन्होंने एक से अधिक रिसेप्शन रखे.यह जिज्ञासा है कि उनकी शादी की कौन सी तारीख मुकम्मल और रजिस्टर की गयी है? कितना ही मज़ा आता और सरप्राइजिंग रहता अगर उन्होंने कोर्ट में शादी कर ली होती या दो-चार करीबी दोस्तों के बीच फेरे ले लिए होते.तब एक नया और ज्यादा ज़रूरी आदर्श पेश करते.है कि नहीं?
फिर से इन शादियों के वीडियो देखें तो आप देख और समझ पाएंगे कि चारों अभिनेत्रियों ने अभूत कुछ तोडा और जोड़ा है.उन्होंने शादी केजष्ण की परिभाषा बदल दी है.पहले फिल्मों में दिखाई शादियां समाज पर असर डालती थीं.अब यह रील से निकलकर रियल होते ही ज्यादा करीब आने के साथ मकाल के लिए आसान हो गयी हैं. मंगनी और शादी के तौर-तरीकों में भारी फेरबदल होगा.और यकीन करें अब लड़कियों की सुनी जाएगी या लड़कियां शादी की प्लानिंग खुद करेंगी.भारतीय समाज में यह बड़ा परिवर्तन होगा.


Tuesday, December 11, 2018

सिनेमालोक :आयुष्मान खुराना



सिनेमालोक
आयुष्मान खुराना
-अजय ब्रह्मात्मज
इस महीने के हर मंगलवार को 2018 के ऐसे अचीवर को यह कॉलम समर्पित होगा,जो हिंदी फिल्मों में बहार से आए.जिन्होंने अपनी मेहनत और प्रतिभा के दम पर पहचान हासिल की.2018 में आई उनकी फिल्मों ने उन्हें खास मुकाम दिया.

2018 में दो हफ़्तों के अन्दर आयुष्मान खुराना की दो फ़िल्में कामयाब रहीं.श्रीराम राघवन निर्देशित ‘अंधाधुन’ और अमित शर्मा निर्देशित ‘बधाई हो’. दोनों फिल्मों का फलक अलग था.दोनों के नायक हिंदी फिल्मों के पारंपरिक नायक से अलग थे.आयुष्मान की ताहि खासियत उन्हें विशिष्ट बनाती है.शूजित सरकार की ‘विकी डोनर’ से लेकर ‘बधाई हो’ तक के उनके चुनाव पर गौर करें तो सभी फिल्मों में उनके किरदार अलहदा रहे हैं.धीरे-धीरे स्थापित होने के साथ ही नयी धारणा बन चुकी है की अगर आयुष्मान खुराना की कोई फिल्म आ रही है तो उसका नायक मध्यवर्गीय ज़िन्दगी के किसी अनछुए पहलू को उजागर करेगा.हाल ही में उनकी ताज़ा फिल्म ‘ड्रीम गर्ल’ का फर्स्ट लुक सामने आया है.यहाँ भी वह चौंका रहे हैं.उम्मीद करते हैं कि इस बार वह किसी शारीरिक या पारिवारिक उलझन में नहीं फंसे होंगे.
इन दिनों लोकप्रिय और बड़े स्टार भी दर्शक नहीं जुटा पाते.दर्शक निर्मम हो चुके हैं.उन्हें फिल्म पसंद नहीं आई तो वे परवाह नहीं करते कि इसमें आमिर खान हैं या अमिताभ बच्चन हैं,या फिर दोनों हैं.इस माहौल में ‘बधाई हो’ ने सिनेमाघरों में 50 दिन पूरे कर लिए.दर्शक अभी तक इसे देख रहे हैं.यह बड़ी बात है,क्योंकि आजकल कुछ फिल्मों के लिए कई बार 50 शो खींचना भी मुश्किल हो जाता है.क्या आप को याद है कि ‘बधाई हो’ के साथ ‘नमस्ते लंदन’ रिलीज हुई थी.फेसवैल्यू के लिहाज से उसमें बड़े नाम थे.चालू फार्मुले की पंजाब की चाशनी में लिपटी उस फिल्म को दर्शकों ने सिरे से नकार दिया था.दरअसल,दर्शक इन दिनों स्टार और बैनर के झांसे में पहले दिन सिनेमाघरों में चले भी जायें.अगले शो और अगले दिन तक उन्हें सही रिपोर्ट मिल चुकी होती है.
आयुष्मान के करियर को देखें तो स्टेज और टीवी शो के जरिये वह फिल्मों तक पहुंचे.चंडीगढ़ में मामूली परिवार एन पले-बढे आयुष्मान खुराना के सपने बड़े थे.चंडीगढ़ शहर भी उन सपनों के लिए छोटा पड़ गया था.पढाई के दिनों में ही उन्होंने मंडली बनायीं और सपनों को परवाज़ दिया.वक़्त रहले लोगों ने पहचाना और उन्हें उड़ने के लिए आकाश दिया.उन पारखी नज़रों को भी धन्यवाद् देना चाहिए,जिन्होंने साधारण चेहरे और कद-काठी के इस युवक को मौके दिए.आयुष्मान ने खुद की मेहनत और प्रतिभा से सभी अवसरों का भरपूर लाभ उठाया और निरंतर कामयाबी की सीढियां चढ़ते गए.आयुष्मान की कामयाबी नयी युवा प्रतिभाओं के लिए नयी मिसाल बन गयी है.
आयुष्मान खुराना की फिल्मों,किरदार और अभिनय शैली पर नज़र डालें तो उनमें हिंदी फिल्मों के हीरो के लक्षण नहीं दिखते.सभी किरदार मामूली परिवारों और परिवेश से आते हैं.ज्यादातर मध्यवर्गीय परिवार और परिवेश ही होते हैं.फिल्म शुरू होने के साथ नायक की साधारण उलझन उभर आती है.लगभग सभी फिल्मों में वे अपनी प्रेमिकाओं को रिझाने और उलझनों से निकलने की कोशिश में एक साथ लगे रहते हैं.उनकी नायिकाएं कामकाजी होती हैं.उनका अपना परिवार भी होता है.यानि आम फिल्मों की नायिकाओं की तरह उन्हें परदे पर सिर्फ प्रेम नहीं करना होता है.आयुष्मान खुराना आम हीरो जैसी मुश्किलों में नहीं फंसते,इसलिए उन्हें हीरोगिरी दिखाने का भी मौका नहीं मिलता.फिर भी यह मामूली नायक दर्शकों को पसंद आता है.कुछ आलोचक इस नए नायक को नहीं पहचान पाने की वजह से सुविधा के लिए आयुष्मान खुराना को अमोल पालेकर से जोड़ देते हैं.वास्तव में दोनों बहुत अलग कलाकार हैं.कह सकते हैं कि दोनों के निभाए किरदार समय और परिस्थिति की वजह से भी अलग मिजाज रखते हैं.
आयुष्मान खुराना की एक और खासियत है.वह गायक हैं.उनकी फिल्मों में उनकी आवाज़ का इस्तेमाल होता है.उन गीतों को परदे पर निभाते और गुनगुनाते समय  आयुष्मान खुराना की तल्लीनता देखते ही बनती है.ठीक है कि उन्हें अभि किशोर कुमार या सुरैया जैसी ऊंचाई नहीं मिली है,लेकिन यह एहसास ही कितना सुखद है कि 21वीं सदी में कोई कलाकार अभिनय के साथ गायन भी करता है.हिंदी फिल्मों की यह परमपरा विलुप्त ही हो गयी है. सुना है कि फुर्सत मिलते ही आयुष्मान खुराना जिम के बजे जैमिंग(गाने का अभ्यास) में समय बिताते हैं.







Tuesday, December 4, 2018

सिनेमालोक : तापसी पन्नू


सिनेमालोक
तापसी पन्नू
दिसंबर आरभ हो चुका है.इस महीने के हर मंगलवार को 2018 के ऐसे अचीवर को यह कॉलम समर्पित होगा,जो हिंदी फिल्मों में बहार से आए.जिन्होंने अपनी मेहनत और प्रतिभा के दम पर पहचान हासिल की.2018 में आई उनकी फिल्मों ने उन्हें खास मुकाम दिया.
हम शुरुआत कर रहे हैं तापसी पन्नू से.2012 की बात है.तापसी पन्नू की पहली हिंदी फिल्म ‘चश्मेबद्दूर रिलीज होने वाली थी. चलन के मुताबिक तापसी के निजी पीआर ने उनके साथ एक बैठक तय की.पता चला था कि दक्षिण की फिल्मों से करियर आरम्भ कर दिल्ली की यह पंजाबी लड़की हिंदी में आ रही है.पहली फिल्म के समय अभनेता/अभिनेत्री थोड़े सहमे और डरे रहते हैं.तब उनकी चिंता रहती है कि कोई उनके बारे में बुरा न लिखे और उनका ज़रदार स्वागत हो.तापसी भी यही चाहती रही होंगी या यह भी हो सकता है कि पीआर कंपनी ने उन्हें भांप लिया हो.बहरहाल अंधेरी के एक रेस्तरां में हुई मुलाक़ात यादगार रही थी.यादगार इसलिए कह रहा हूँ की,उसके बाद तापसी ने हर मुलाक़ात में पहली भेंट का ज़िक्र किया.हमेशा अच्छी बातचीत की.अपनी तैरियों और चिंताओं को शेयर किया.अपना हमदर्द समझा.कामयाबी के साथ आसपास हमदर्दों और सलाहकारों की भीड़ लग जाती है.ऐसे में संबंध टूटते हैं,लेकिन तापसी ने इसे संभाल रखा है.
बहरहाल,तापसी ने ‘चश्मेबद्दूर से शुरुआत कर ‘बेबी से बड़ी धमक दी.’बेबी में तापसी की भूमिका छोटी लेकिन महत्वपूर्ण थी.शबाना खान इ भूमिका ने तापसी ने अपनी फूर्ती और मेधा से चकित किया था.अक्षय कुमार के होने के बावजूद वह दर्शकों और समीक्षकों को याद रह गयी थीं.यह उस भूमिका का ही कमाल था कि बाद में नीरज पाण्डेय ने ‘नाम शबाना फिल्म बनायीं और उस किरदार को नायिका बना दिया.’नाम शबाना का निर्देशन शिवम नायर ने किया था.इसके पहले अनिरुद्ध राय चौधरी के निर्देशन में ‘पिंक आ चुकी थी.’पिंक में तापसी ने मीनल अरोड़ा की दमदार भूमिका में ज़रुरत के मुताबिक एक आधुनिक लड़की की हिम्मत का परिचय दिया था.’पिंक अपने विषय की वजह से शहरी दर्शकों के बीच खूब पसंद की गयी थी.इं दोनों फिल्मों के बाद जब तापसी ने ‘जुड़वां 2 चुनी तो उनके खास प्रशंसकों को परेशानी हुई.तब तापसी ने कहा था की वह मेनस्ट्रीम हिंदी सिनेमा और हाई कांसेप्ट सिनेमा के बीच तालमेल रखना चाहती हैं.वह अपने दर्शकों का विस्तार चाहती हैं.
2018 में तापसी पन्नू की ‘सूरमा,’मुल्क और ‘मनमर्जियाँ’ फ़िल्में आयीं हैं.तीनों ही फ़िल्में अलग मिजाज की हैं.’सूरमा में वह हाकी प्लेयर हैं,जो अपने प्रेमी संदीप सिंह से दूर जाने का मुश्किल फैसला लेती है ताकि वह अपने खेल और रिकवरी पर ध्यान दे सके.अनुभव सिन्हा निर्देशित ’मुल्क में वह वकील आरती मल्होत्रा की भूमिका में है.आरती ने मुस्लिम लड़के से शादी की है.वह अपने ससुराल के पक्ष में कोर्ट में कड़ी होती है और मुसलमानों के प्रति बनी धारणाओं को तर्कों से तोडती है.अनुराग कश्यप की ‘मनमर्जियाँ’ में वह आजाद ख्याल रूमी बग्गा के किरदार में खूब जंची हैं.यह तो स्पष्ट है कि तापसी पन्नू अभि तक किसी एक इमेज में नहीं बंधी हैं.वह प्रयोग कर रही हैं.
तापसी पन्नू हिंदी फिल्मों की टिपिकल हीरोइन बन्ने से बची हुई हैं.यह एक अभिनेत्री के लिए तो सही है,लेकिन एक स्टार अभिनेत्री को मेनस्ट्रीम हिंदी फिल्मों की ज़रुरत होती है.किसी लोकप्रिय स्टार के साथ रोमांटिक भूमिका में आने से उनके दर्शक बढ़ते हैं,तापसी भी यह चाहती हैं.अभि तक लोकप्रिय स्टार उनसे दूर-दूर हैं.अगर बात नहीं बिगड़ी होती तो वह आमिर खान की बेटी की भूमिका में ‘दंगल में दिखी होतीं. हो सकता है उसके बाद उनके करियर की दिशा अलग हो जाती. ‘दंगल न हो पाने का एक फायदा हुआ कि तापसी नए निर्देशकों की पसंद बनी हुई हैं,उन्हें लगता है कि अलग किस्म की भूमिकाओं में तापसी को चुना जा सकता है.’तड़का और ‘बदला उनकी अगली फ़िल्में हैं.
हिंदी फिल्मों में बाहर से आई अभिनेत्रियों के लिए टिक पाना ही मुश्किल होता है.ताप पन्नू ने तो अपनी पहचान और प्रतिष्ठा हासिल कर ली है.फिर भी हिंदी फिल्मों के केंद्र में अभि वह नहीं पहुंची हैं.म्हणत के साथ ही उन्हें फिल्मों के चुनाव के प्रति भी सजग रहना होगा.उन्हें बड़े बैनर और बड़े निर्देशकों के साथ फ़िल्में करनी होंगी.लोकप्रियता और स्टारडम का यही रिवाज़ है.


Sunday, November 25, 2018

संडे नवजीवन : जीवित पात्रों का जीवंत चित्रण वाया मोहल्ला अस्सी


संडे नवजीवन
जीवित पात्रों का जीवंत चित्रण वाया मोहल्ला अस्सी
अजय ब्रह्मात्मज
हिंदी फिल्मों के इतिहास में साहित्यिक कृत्यों पर फ़िल्में बनती रही हैं.और उन्हें लेकर विवाद भी होते रहे हैं.ज्यादातर प्रसंगों में मूल कृति के लेखक असंतुष रहते हैं.शिकायत रहती है कि फ़िल्मकार ने मूल कृति के साथ न्याय नहीं किया.कृति की आत्मा फ़िल्मी रूपांतरण में कहीं खो गयी.पिछले हफ्ते डॉ. काशीनाथ सिंह के उपन्यास ‘काशी का अस्सी पर आधारित ‘मोहल्ला अस्सी देश के चंद सिनेमाघरों में प्रदर्शित हुई.इस फिल्म के प्रति महानगरों और उत्तर भारत के शहरों की प्रतिक्रियाएं अलग रहीं.यही विभाजन फिल्म के अंग्रेजी और हिंदी समीक्षकों के बीच भी दिखा.अंग्रेजी समीक्षक और महानगरों के दर्शक ‘मोहल्ला अस्सी के मर्म को नहीं समझ सके.फिल्म के मुद्दे उनके लिए इस फिल्म की बनारसी लहजे(गालियों से युक्त) की भाषा दुरूह और गैरज़रूरी रही.पिछले कुछ सालों में हम समाज और फिल्मों में मिश्रित(हिंग्लिश) भाषा के आदी हो गए हैं.इस परिप्रेक्ष्य में ‘मोहल्ला अस्सी में बोली गयी हिंदी को क्लिष्ट कहना लाजिमी है.
रिलीज से दो दिनों पहले डॉ. काशीनाथ सिंह के शहर बनारस में ‘मोहल्ला अस्सी का विशेष शो रखा गया था.फिल्म के निर्माण के समय निर्देशक डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी और लेखक डॉ. काशीनाथ सिंह ने सोचा था कि फिल्म का प्रीमियर बनारस में रखा जायेगा. प्रीमियर में काशी और अस्सी के निवासियों और उपन्यास के पात्रों को आमंत्रित किया जायेगा.ऐसा नहीं हो सका.फिल्म की रिलीज में हुई देरी और निर्माता-निर्देशक के बीच ठनी अन्यमनस्कता से प्रदर्शन के समय जोश और उत्साह नज़र नहीं आया.यह विडंबना ही है कि हिंदी उपन्यास पर बनी हिंदी फिल्म ‘मोहल्ला अस्सी का कोई पोस्टर हिंदी में नहीं आया.हिंदी दर्शकों तक पहुँचने के लिए हॉलीवुड के निर्माता तक अपनी फिल्मों के पोस्टर हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओँ में लेन लगे हैं.बनारस स्थित लेखक डॉ. काशीनाथ सिंह की शिकायत थी कि शहर में फिल्म के प्रचार के लिए ज़रूरी पोस्टर भी दीवारों पर नहीं लगे हैं.यूँ लगा कि रिलीज की रस्म अदायगी भर कर दी गयी.
बहरहाल,बनारस में आयोजित विशेष शो में ‘काशी का अस्सी के लेखक अपने पात्रों और मित्रों-परिचितों के साथ मौजूद रहे.ढाई सौ दर्शकों का स्क्रीन खचाखच भर गया था,क्योंकि पात्र और मित्र अपने दोस्तों और रिश्तेदारों के साथ आ गए थे.डॉ. काशीनाथ सिंह के लिए यह ख़ुशी का मौका था. वे अपने उपन्यास के पत्रों के साथ फिल्म देख रहे थे. लगभग 20-22 सालों पहले जिन व्यक्तियों के साथ उनका उठाना-बैठा था,जिनसे बहसबाजी होती थी....वे सभी ही अपने संवादों के साथ उपन्यास के पात्र बने.उन पात्रों को डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने खास सोच-समझ से आकार दिया और ‘मोहल्ला अस्सी का चरित्र बना दिया.फिर उन चरित्रों के अनुरूप कलाकारों का चयन किया गया.उन कलाकारों ने निर्देशक के निर्देश और अपनी समझदारी से निभाए जा रहे पात्रों को परदे पर जीवंत किया और उन्हें एक किरदार दिया..व्यक्ति,पात्र,चरित्र,अभिनेता और किरदार की यह प्रक्रिया सृजनात्मक चक्र पूरा कर उन व्यक्तियों के साथ परदे पर चल्तिफिरती नज़र आ रही थी.दर्शकों के बीच पप्पू भी मौजूद थे.वही पप्पू,जिनकी दुकान बनारस के अस्सी के लिए किसी संसद से कम नहीं थी. अंग्रेजी में इसे ‘सररियल’ अनुभव कह सकते हैं.25 सालों की फिल्म पत्रकारिता के करियर में अतीत में कभी ऐसा अनुभव नहीं हुआ,जब परदे के जीवंत किदर जीवित व्यक्ति के रूप में सिनेमाघर में मौजूद हों.इधर उनकी साँसें चल रही हो और उधर रील.रील औए रियल का यह संगम और समागम दुर्लभ अनुभव रहा.’मोहल्ला अस्सी के प्रदर्शन में डॉ.काशीनाथ सिंह,डॉ.गया सिंह,रामजी राय,वीरेंद्र श्रीवास्तव,पप्पू और कुछ दूसरे पात्र(जो फिल्म में नहीं आ पाए) भी आये थे. फिल्म देखने के बाद आह्लादित डॉ. काशीनाथ सिंह की अंतिम पंक्ति थ,’मैं संतुष्ट हूँ.’
प्रदर्शन के बाद की बातचीत में सभी पात्र अपने किरदारों को निभाए कलकारों के अभिनय और संवाद अदायगी की चर्चा मशगूल हुए. डॉ. गया सिंह का मन्ना था की वे पूरा तन कर चलते हैं लाठी की तरह,जबकि उन्हें निभा रहे कलाकार कमर से लचके हुए थे.हां,आवाज़ की ठसक उन्होंने पकड़ ली थी.वीरेंद्र श्रीवास्तव का किरदार राजेंद्र गुप्ता ने निभाया है.वीरेंद्र श्रीवास्तव खुश थे कि राजेंद्र गुप्ता उन्हीं की तरह लहते हैं और उन्होंने बोलने का अंदाज भी सही पकड़ा था.फिल्म में पप्पू की खास भूमिका नहीं थी.वह तो चाय ही बनता रहा,लेकिन प्रदर्शन के दिन वह भी पत्रों में शामिल होकर खुद को उनके समकक्ष महसूस कर रहा था.रवि किशन के भाव,अंदाज और चंठपन से सभी मुग्ध थे कि उन्होंने ने अस्सी के ‘अड़ीबाज’ को आत्मसात कर लिया है.उनके प्रणाम और हर हर महादेव में बनारसी बेलौसपन था.दुर्भाग्य है कि ‘मोहल्ला अस्सी निर्माण और वितरण-प्रदर्शन की आधी-अधूरी रणनीति और असमर्थ हस्तक्षेप की वजह से अपने दर्शकों तक सही संदर्भों के साथ नहीं पहुँच सकी.फिल्मों में चित्रित भारतीय समाज के लिए ‘मोहल्ला अस्सी एक ज़रूरी पाठ के तौर पर देखी और पढ़ी जाएगी.
‘मोहल्ला अस्सी नौ सालों की म्हणत और इंतज़ार का नतीजा है.मुंबई से वाराणसी की एक फ्लाइट में डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने उषा गांगुली के नाटक ‘काशीनामा की समीक्षा पढ़ कर इतने प्रभावित हुए कि उसी नाम की किताब खोजने लगे.बाद में पता चला कि वह डॉ. काशीनाथ सिंह का उपन्यास ‘काशी का अस्सी पर आधारित नाटक है.खैर,अपने मित्र और लेखक के परिचित अतुल तिवारी के साथ बनारस जाकर 2009 में उन्होंने उपन्यास के अधिकार लिए.2010 में उन्हें निर्माता विनय तिवारी मिले.2011 में मुंबई शूटिंग आरम्भ हुई और मार्च तक ख़त्म भी हो गयी.निर्माता-निर्देशक के बीच विवाद हुआ.फिल्म की रिलीज खिसकती गयी.2012 में रिलीज करने की योजना पर पानी फिर गया.2015 में पहले अवैध ट्रेलर और फिर फिल्म लीक होकर इन्टरनेट पर आ गयी.फिल्म अटक गयी.उसके बाद सीबीएफसी का लम्बा चक्कर चला.आख़िरकार दिल्ली हाईकोर्ट ने फिल्म की रिलीज की अनुमति दी और साथ ही कहा कि कला माध्यमों में सृजनात्मक अभिवयक्ति की आज़ादी मिलनी चाहिए.
‘काशी का अस्सी उपन्यास के ‘मोहल्ला अस्सी फिल्म के रूप में रूपांतरण की रोचक कथा पर पूरी किताब लिखी जा सकती है.

   



Wednesday, November 21, 2018

सिनेमालोक : ठगे गए दर्शक,लुट गए निर्माता


सिनेमालोक
ठगे गए दर्शक,लुट गए निर्माता
-अजय ब्रह्मात्मज
दीवाली के मौके पर रिलीज हुई ‘ठग्स ऑफ़ हिंदोस्तान’ ने पहले दिन ही 50 करोड़ से अधिक का कलेक्शन कर एक नया रिकॉर्ड बना दिया.फिर तीन दिनों में 100 करोड़ क्लब में फिल्म आ गयी. चार दिनों के वीकेंड में 123 करोड़ के कुल कलेक्शन की विज्ञप्ति आ चुकी है.कमाई के इन पड़ावों के बावजूद ‘ठग्स ऑफ़ हिंदोस्तान’ के बारे में आम धारणा बन चुकी है कि इस फिल्म को दर्शकों ने नापसंद कर दिया है.यह फिल्म अपेक्षा के मुताबिक दर्शकों को लुभा नहीं सकी. नतीजतन फिल्म का कारोबार लगातार नीचे की ओर फिसल रहा है.ट्रेड पंडित हैरान नहीं हैं.उनहोंने तो पहले दिन ही घोषणा कर दी थी.उसके बाद शायद ही किसी समीक्षक ने फिल्म की तारीफ की हो.फिल्म देख कर निकले दर्शक सोशल मीडिया और लाइव रिव्यू में फिल्म से निराश दिखे..
पहली बार तो ऐसा नहीं हुआ है,लेकिन हाल-फिलहाल की यह बड़ी घटना है जब किसी फिल्म ने दोनों पक्षों को निराश किया.’ठग्स ऑफ़ हिंदोस्तान’ की घोषणा के समय से दर्शकों की उम्मीदें अमिताभ बच्चन और आमिर खान की जोड़ी से बंध गयीं.हिंदी फिल्मों के सन्दर्भ में यह बड़ी घटना है.दो पीढ़ियों के लोकप्रिय अभिनेताओं के साथ आने से यह आस बनी थी कि परदे पर परफारमेंस बिजली चमकेगी और संवाद अदायगी के बादल गरजेंगे.यशराज फिल्म्स के बैनर में बन रही कॉस्टयूम और पीरियड फिल्म के निर्माण में हो रहे भारी खर्च से भव्य मनोरंजन(बाहुबली किस्म का) का अंदाजा था.ऊपर से ‘धूम 3 के निर्देशक विजय कृष्ण आचार्य के हाथों में कमान होने से लग रहा था कि पिछली फिल्म के जैसा ही कुछ रोचक ड्रामा दिखेगा.’धूम 3’ में भी आमिर खान और कट्रीना कैफ थे.पहले दिन इन उम्मीदों की वजह से ही दर्शक उमड़े,लेकिन सारी उम्मीदें धरी रह गयीं.आम दर्शक और खास समीक्षक दोनों ही थिएटर से निराश निकले और देखते ही देखते सोशल मीडिया पर निगेटिव टिपण्णी,कटाक्ष,वीडियो और मीम का ताँता लग गया.हर तरफ से फिल्म की बुराई होने लगी.
फिल्म में अमिताभ बच्चन हैं,लेकिन यह फिल्म आमिर खान की है.पिछली कुछ फिल्मों(पीके,दंगल,सीक्रेट सुपरस्टार आदि) की सफलता का सेहरा.आमिर खान के माथे बंधता रहा है,इसलिए असफलता का ठीकरा भी उनके माथे फूटा है.यह सही भी है.जानकारों के मुताबिक आमिर खान ने फिल्म के लिए हाँ कहने के बाद पूरी स्क्रिप्ट फिर से लिखवाई.ऐसा कहा और माना जाता है कि आमिर खान का स्क्रिप्ट सेंस जबरदस्त है.उनसे कोई चूक नहीं होती.ऐसे में उनके सुझाओं को तरजीह दी जाती है.फिल्म के लेखन से लेकर एडिटिंग तक में आमिर खान की सक्रिय भागीदारी रही.अन्य फिल्मों की तरह ही इस फिल्म में भी आमिर खान इन्वोल्व रहे.उन्होंने ही फिल्म को वह रंग और शेप दिया,जो दर्शकों के बीच आया.विजय कृष्ण आचार्य फिल्म के निर्देशक और कप्तान हैं,लेकिन फिल्म के कोच आमिर खान हैं.उन्होंने ने ही फिल्म की विधि और रणनीति तय की.फ़िल्में असफल होती हैं तो मुख्या सितारे खामोश हो जाते हैं.यही ‘ठग्स ऑफ़ हिंदोस्तान’ के साथ हो रहा है.
फिल्म के शीर्षक से भ्रांति बढ़ी.सभी को यही लग रहा था कि यह फिल्म 18-19वीं सदी में सक्रिय और अंग्रेजों के सिरदर्द बने ठगों पर आधारित होगी.बहुत बाद में आमिर खान ने बताना शुरू किया कि यह ठगों की प्रचलित कहानी पर आधारित नहीं है.विजय कृष्णा आचार्य ने काल्पनिक कहानी लिखी है और एक फंतासी गढ़ी है.लगातार अंग्रेजी फ़िल्में देख रहे दर्शक और समीक्षक फिल्म की प्रस्तुति,किरदारों के गठन,लुक और निर्वाह,सेट और सजावट में विदेशी फिल्मों की झलक देखते-खोजते रहे.शहरों के एक बड़े तबके को ऐसा लगता है कि फिल्म का वीएफ़एक्स साधारण कोटि का है.इन दिनों नेटफ्लिक्स और दूसरे लाइव स्ट्रीमिंग प्लेटफार्म पर सभी देशों की बेहतरीन फ़िल्में उपलब्ध हैं.तकनीक के स्तर पर अब कोई भी कोताही झट से पकड़ी जाती है.हिंदी फिल्मों के युवा निर्देशक फिल्मों में भारतीय इमोशन लाने में विफल हो रहे हैं.इस फिल्म के किरदारों में भावनात्मक आवेग नदारद है.संबंधों का गाढ़ापन नहीं है.अधिकांश युवा निर्देशक भारतीय फिल्मों की मेकिंग,शैली और परंपरा से खुद को अलग कर आधुनिक होने की कोशिश में ‘ठग्स ऑफ़ हिंदोस्तान जैसी गलतियाँ कर रहे हैं.
‘ठग्स ऑफ़ हिंदोस्तान अपनी लागत और भव्यता की वजह से नुकसान में है. अब एक ही उम्मीद बची है कि अगर यह फिल्म चीन में दर्शकों को पसंद आये तो आंकड़े और कमाई में थोड़ी बढ़त हो जाए.आमिर खान की फ़िल्में चीन में अच्छा कारोबार करती रही हैं.

Tuesday, November 13, 2018

सिनेमालोक : क्या बिखर रहा है अमिताभ बच्चन का जादू?


सिनेमालोक
क्या बिखर रहा है अमिताभ बच्चन का जादू?
-अजय ब्रह्मात्मज
दिवाली के मौके पर रिलीज हुई ‘ठग्स ऑफ़ हिंदोस्तान’ को दर्शकों ने नापसंद कर दिया.सोशल मीडिया को ध्यान से पढ़ें तो फिल्म की असफलता का ठीकरा आमिर खान के माथे फूटा.यह स्वाभाविक है,क्योंकि आज की तारिख में आमिर खान अधिक सफल और भरोसेमंद एक्टर-स्टार हैं.उनकी असामान्य फ़िल्में भी अच्छा व्यवसाय करती रही हैं.अपनी हर फिल्म से कमाई के नए रिकॉर्ड स्थापित कर रहे आमिर खान ने दर्शकों की नापसंदगी के बावजूद दीवाली पर रिलीज हुई सबसे अधिक कलेक्शन का रिकॉर्ड तो बना ही लिया.इस फिल्म को पहले दिन 50 करोड़ से अधिक का कलेक्शन मिला.
फिल्मों की असफलता का असर फिल्म से जुड़े कलाकारों के भविष्य पर पड़ता है. इस लिहाज से ‘ठग्स ऑफ़ हिंदोस्तान’ के कलाकारों में आमिर खान के चमकते करियर को अचानक ग्रहण लग गया है और फातिमा सना शेख को दूसरी फिल्म में बड़ा झटका लगा है. अमिताभ बच्चन महफूज़ रहेंगे.अपनी दूसरी पारी की शुरुआत से ही खुद की सुरक्षा में अमिताभ बचचन ने इंटरव्यू में कहना शुरू कर दिया था कि अब फिल्मों का बोझ मेरे कन्धों पर नहीं रहता.उनकी इस सफाई के बावजूद हम जानते हैं कि उन्हें ध्यान में रख कर स्क्रिप्ट लिखी जा रही हैं.जिस फिल्म में भी वे रहते हैं,उसमें उनकी खास भूमिका होती है.फिल्म की सम्भावना और कामयाबी में उनकी भी शिरकत होती है.अगर ‘ठग्स ऑफ़ हिन्दोस्तान नहीं चली है तो यह मान लेना चाहिए कि अमिताभ बच्चन भी नहीं चले हैं.
‘ठग्स ऑफ़ हिंदोस्तान’ देख कर निकले अमिताभ बच्चन के प्रशंसक फ़िल्मकार की टिपण्णी ठ,’अमित जी थक गए हैं.थकान उनके चेहरे पर दिखने लगी है.’ फ़िल्मकार की आवाज़ में उदासी थी.अपने प्रिय अभिनेता के लिए यह चिंता वाजिब है.अमिताभ बच्चन 76 की उम्र में भी किसी युवा अभिनेता से अधिक सक्रिय हैं.उन्हें फ़िल्में मिल रही हैं. फिल्मों के साथ विज्ञापन मिल रहे हैं. उद्घाटन और समरोहों में आज भी उन्हें खास मेहमान के तौर पर बुलाया जा रहा है.मज़ेदार तथ्य है कि वे सभी को उपकृत भी कर रहे हैं.अपने ब्लॉग और ट्विटर पर अनेक दफा वह बता और लिख चुके हैं कि देर रात को सोने जा रहे हैं और सुबह जल्दी ही उन्हें काम पर जाना है.दैनिक जीवन में कर्मयोगी दिख रहे अमिताभ बच्चन पहले की तरह स्वस्थ नहीं हैं.वे कई बीमारियों के रोगी हैं.उन्हें बेहतर आराम और देखभाल की ज़रुरत है,लेकिन वे किसी भी आम भारतीय परिवार के जिद्दी बुजुर्ग की तरह व्यवहार कर रहे हैं.बिखर रहे हैं.
‘ठग्स ऑफ़ हिंदोस्तान’ और उसके पहले की कुछ फिल्मों में अब यह दिखने लगा है कि उनकी प्रतिक्रिया विलंबित होती है.उम्र बढ़ने के साथ प्रतिक्रियाओं,बोलचाल और गतिविधि में शिथिलता आती है.वह अब परदे पर दिखने लगी है.दूसरे कलाकारों के साथ के दृश्यों में इसकी झंलक मिलती है.सीधे शब्दों में कहें तो अपने अभिनय में तत्परता के लिए मशहूर अमिताभ बच्चन दृश्यों में तीव्रता और आवेग खो रहे हैं.’कौन बनेगा करोडपति में भी यह शिथिलता जाहिर हो रही है.हिंदी भाषा के उच्चारण और व्याकरण के लिए विख्यात अमिताभ बच्चन की पकड़ भाषा पर छूट रही है.उनकी हिंदी पिछली सदी के एक दशक विशेष की है और कुछ शब्दों को वे गलत ‘अर्थ में प्रयोग करते हैं.पिछले साल मामी फिल्म फेस्टिवल में उन्होंने ‘निरर्थक शब्द का उपयोग ‘प्रयास के साथ ‘सार्थक सन्दर्भ में किया था...अन्य अवसरों पर भी चूकें हो रही हैं.निस्संदेह हिंदी का उनका उच्चारण अधिकांश अभिनेताओं से बेहतर है,लेकिन शब्दों के अर्थ और प्रयोग में वे छोटी भूलें करने लगे हैं.स्क्रिप्ट सामने रहने पर गलतियाँ कम होती हैं.खुद बोलते समय वे आज की हिंदी की चाल में नहीं आ पाते.
प्रशंसक होने के नाते अमित जी की प्रतिभा की आभा के सीमित होने का उल्लेख करते हुए मन में विषाद घना हो रहा है,लेकिन समय का चक्र ऐसे ही चलता है.यही सच्चाई है कि दिन ढलने के साथ सूरज भी ढलता है.अस्ताचल होता है.

Monday, November 12, 2018

फिल्म लॉन्ड्री : आज़ादी के बाद की ऐतिहासिक फ़िल्में



आज़ादी के बाद की ऐतिहासिक फ़िल्में
ऐतिहासिक फिल्में पार्ट 3: यथार्थ और ख्याली दुनिया का कॉकटेल
-अजय ब्रह्मात्मज
(अभी तक हम ने मूक फिल्मों और उसके बाद आज़ादी तक की बोलती फिल्मों के दौर की ऐतिहासिक फिल्मों का उल्लेख और आकलन किया.इस कड़ी में हम आज़ादी के बाद से लेकर 20वीं सदी के आखिरी दशक तक की ऐतिहासिक फिल्मों की चर्चा करेंगे.)

देश की आज़ादी और बंटवारे के पहले मुंबई के साथ कोलकाता और लाहौर भी हिंदी फिल्मों का निर्माण केंद्र था.आज़ादी के बाद लाहौर पाकिस्तान का शहर हो गया और कोलकाता में हिंदी फिल्मों का निर्माण ठहर सा गया.न्यू थिएटर के साथ जुड़ी अनेक प्रतिभाएं बेहतर मौके की तलाश में मुंबई आ गयीं.हिंदी फिल्मों के निर्माण की गतिविधियाँ मुंबई में ऐसी सिमटीं की महाराष्ट्र के कोल्हापुर और पुणे से भी निर्माता,निर्देशक,कलाकार और तकनीशियन खिसक का मुंबई आ गए.
मुंबई में नयी रवानी थी.नया जोश था.लाहौर और कोलकाता से आई प्रतिभाओं ने हिंदी फिल्म इंदस्ट्री को मजबूत और समृद्ध किया.देश के विभिन्न शहरों से आई प्रतिभाओं ने हिंदी फिल्मों को बहुमुखी विस्तार दिया.इसी विविधता से माना जाता है कि पांचवा और छठा दशक हिंदी फिल्मों का स्वर्णकाल है,जिसकी आभा सातवें दशक में भी दिखाई पड़ती है.आज़ादी के तुरंत बाद के सालों में ऐतिहासिक फिल्मों के प्रति रुझान नहीं दिखाई देता,जबकि कुछ सालों पहले तक मुगलों,मराठों और राजस्थान के राजपूत राजाओं की शौर्य गाथाओं पर फ़िल्में बन रही थी.आज़ादी के पहले इन फिल्मों से राष्ट्रीय चेतना का उद्बोधन किया जा रहा था.मुमकिन है आज़ादी के बाद फिल्मकारों को ऐसे उद्बोधन की प्रासंगिकता नहीं दिखी हो.
सोहराब मोदी और उनकी ऐतिहासिक फ़िल्में
आज़ादी के पहले ‘पुकार(1939),’सिकंदर(1941) और ‘पृथ्वी वल्लभ(1943) जैसी ऐतिहासिक फ़िल्में निर्देशित कर चुके सोहराब मोदी ने अजाची के बाद पहले ‘शीशमहल(1950) नामक सोशल फिल्म का निर्देशन किया.फिर 1952 में उन्होंने महत्वाकांक्षी फिल्म ‘झाँसी की रानी का निर्माण और निर्देशन किया.यह फिल्म जनवरी 1953 में रिलीज हुई थी.इसका एक अंग्रेजी संस्करण भी बना था. अंग्रेजी में इसका शीर्षक था ‘द टाइगर एंड द फ्लेम. बता दें कि अंग्रेजी में डब करने के बजाय अलग से साथ में ही शूटिंग की गयी थी.इस वजह से फिल्म के सेट और शूटिंग पर भारी खर्च हुआ था.इस फिल्म की नायिका सोहराब मोदी की पत्नी महताब थीं.कहते हैं कि महताब रानी लक्ष्मीबाई की भूमिका में नहीं जंची थीं.उनकी उम्र किरदार की उम्र से ज्यादा लग रही थी.लिहाजा दर्शकों ने फिल्म नापसंद कर दी थी.हिंदी की पहली टेक्नीकलर फिल्म ‘झाँसी की रानी का अब सिर्फ श्वेत-श्याम प्रिंट ही बचा हुआ हैं.अध्येता बताते हैं कि अंग्रेजी संस्करण का टेक्नीकलर प्रिंट मौजूद है. इस फिल्म से सोहराब मोदी को बड़ा नुकसान हुआ.
फिर भी दो सालों के अन्दर सोहराब मोदी ने ‘मिर्ज़ा ग़ालिब का निर्माण और निर्देशन किया.किस्सा है कि पंडित जवाहरलाल नेहरु को एक साल जन्मदिन की बधाई देने पहुंचे सोहराब मोदी ने ग़ालिब का शेर सुनाया तुम सलामत रहो हज़ार बरस
हर बरस के दिन हों पचास हज़ार
नेहरु ने शायर का नाम पूछा और सोहराब मोदी से उनके ऊपर फिल्म बनाने की बात कही.सोहराब मोदी ने उनकी बात मान ली. भारत भूषण और सुरैया के साथ उन्होंने ‘मिर्ज़ा ग़ालिब बना डाली.इस फिल्म को पहला राष्ट्रपति पुरस्कार भी मिला.फिल्म में सुरैया ने ग़ालिब की ग़ज़लों को अपनी आवाज़ दी थी.जिन्हें सुन कर नेहरु ने सुरैया से कहा था,’आप ने तो मिर्ज़ा ग़ालिब की रूह को जिंदा कर दिया.’पुरस्कृत और प्रशंसित होने के बावजूद ‘मिर्ज़ा ग़ालिब नहीं चली थी.सोहराब मोदी इस उम्मीद में आगे फ़िल्में बनाते रहे कि किसी एक फिल्म के चलने से उनके स्टूडियो की गाड़ी पटरी पर आ जाएगी.ऐसा नहीं हो सका.एक दिन ऐसा आया कि मिनर्वा मूवीटोन बिक गया.
सोहराब मोदी ने बाद में ‘नौशेरवां-ए-एदिल’ और ‘यहूदी जैसी ऐतिहासिक फिल्मों का निर्माण किया.सोहराब मोदी हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के अकेले फ़िल्मकार हैं,जिन्होंने आज़ादी के पहले और बाद के सालों में ऐतिहासिक फिल्मों के निर्माण और निर्देशन पर जोर दिया.उनके समकालीनों ने छिटपुट रूप से ही इस विधा पर ध्यान दिया.
सामान्य उदासीनता के बावजूद
यह अध्ययन का विषय हो सकता है कि आज़ादी के बाद के सालों में ऐतिहासिक फिल्मों के प्रति क्यों उदासीनता रही? देश के आजाद होने के बाद राष्ट्र निर्माण की भावना से नयी कहानी लिखने-रचने का जोश कहीं न कहीं नेहरु के सपनों के भारत के मेल में था.नए दौर में फ़िल्मकार आत्म निर्भरता की चेतना से सामाजिक बदलाव की भी कहानियां लिख रहे थे.और जैसा कि हम ने पहले कहा कि देशभक्ति की भावना और राष्ट्रीय चेतना का फोकस बदल जाने से सामाजिक और पारिवारिक फिल्मों का चलन बढ़ा.प्रेम कहानियों में नायक-नायिका के बीच सामाजिक,आर्थिक और शहर-देहात का फर्क रखा गया.उनके मिलन की बाधाओं के ड्रामे में पुरानी धारणाओं और रुढियों को तोड़ने का प्रयास दिखा.प्रगतिशील और सेक्युलर समाज की चिंताएं फिल्मकारों की कोशिशों में जाहिर हो रही थीं.
कुछ फिल्मकारों ने मुग़लों और मराठों की कहानियों को दोहराया.ऐतिहासिक फिल्मों के सन्दर्भ में हम बार-बार उल्लेख कर रहे हैं कि फ़िल्मकार नयी कहानियों की तलाश में कम रहे हैं.आज़ादी के बाद के दौर में भी सलीम-अनारकली,जहाँगीर,शाहजहाँ आदि मुग़ल बादशाहों के महलों के आसपास ही हमारे फ़िल्मकार भटकते रहे.सलीम-अनारकली की काल्पनिक प्रेमकहानी पर पहले ‘अनारकली और फिर ‘मुग़लेआज़म’ जैसी मनोरंजक और भव्य फिल्म आई.’अनारकली में प्रदीप कुमार और बीना राय की जोड़ी थी.इस फिल्म में अकबर की भूमिका मुबारक ने निभाई थी.फिल्म के निर्देशक नन्दलाल जसवंतलाल थे. ‘मुग़लेआज़म’ में के आसिफ ने पृथ्वीराज कपूर,दिलीप कुमार और मधुबाला के साथ ऐसी कहानी रची कि फिर कोई इस कमाल के साथ इसे नहीं दोहरा सका.हाँ,तीन सालों के बाद ए के नाडियाडवाला ने ज़रूर एम सादिक के निर्देशन में प्रदीप कुमार और बीना राय के साथ ‘ताजमहल का निर्माण किया.साहिर लुधियानवी और रोशन की जोड़ी के रचे गीत-संगीत ने धूम मचा दी थी.एम् सादिक ने फिर प्रदीप कुमार और मीना कुमारी के साथ ‘नूरजहाँ का निर्देशन किया.इसके निर्माता शेख मुख़्तार थे.उन्होंने इस फिल्म में एक किरदार भी निभाया था.इस फिल्म के बाद शेख मुख़्तार फिल्म लेकर पाकिस्तान चले गए थे.भारत में यह फिल्म दर्शकों को अधिक पसंद नहीं आई थी,जबकि पाकिस्तान में यह फिल्म खूब चली.
समकालीन नायक और जीवनीपरक फ़िल्में
ऐतिहासिक फिल्मों के विस्तार के रूप में हम राजनेताओं पर बनी जीवनीपरक फिल्मों को देख सकते हैं.अभी बायोपिक फैशन में है.गौर करें तो बायोपिक की शुरुआत स्वतंत्रता सेनानियों पर बनी फिल्मों से होती है.आज़ादी के पहले प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से भी राजनेताओं का नाम लेना और उनके ऊपर फिल्म बनाना मुमकिन नहीं था.ब्रिटिश हुकूमत बर्दाश्त नहीं कर पाती थी.आज़ादी के बाद लोकमान्य तिलक,भगत सिंह,गाँधी,सुभाष चन्द्र बोस जैसे नेताओं पर फ़िल्में बनीं.आज़ादी के बाद 20वीं सदी के पांच दशकों में नौवें दशक में अनेक राजनेताओं पर फ़िल्में बनीं.रिचर्ड एटेनबरो की ‘गाँधी के निर्देशक भले ही विदेशी हों,लेकिन यह भारत सरकार के सहयोग से बनी फिल्म थी.’गाँधी(1982) और ‘मेकिंग ऑफ़ महात्मा(1996) एक साथ देख लें तो महात्मा गाँधी के जीवन और कार्य को आसानी से सम्पूर्णता में समझा जा सकता है.शहीदेआज़म भगत सिंह के जीवन पर बनी ‘शहीद ने बहुत खूबसूरती से किंवदंती बन चुके क्रान्तिकारी के जीवन को राष्ट्र धर्म और मर्म के सन्दर्भ में पेश किया.भगत सिंह की जन्म शताब्दी के समय 2002 में एक साथ अनेक फ़िल्में हिंदी और अन्य भाषाओँ में बनी.यहाँ तक कि राकेश ओमप्रकाश मेहरा की आमिर खान अभिनीत ‘रंग दे बसंती भी उनके जीवन से प्रेरित थी.
अन्य ऐतिहासिक फिल्मे
आज़ादी के बाद की अन्य ऐतिहासिक फिल्मों में हेमेश गुप्ता की ‘आनंद मठ(1952),केदार शर्मा की ‘नीलकमल(1947),सत्यजित राय की ‘शतरंज के खिलाडी(1977),लेख टंडन की ‘आम्रपाली(1966),एम् एस सथ्यू की ‘गर्म हवा(1974),श्याम बेनेगल की ‘जुनून’(1978),केतन मेहता की ‘सरदार(1993} आदि का उल्लेख आवश्यक होगा.इन फिल्मों के निर्देशकों ने समय की प्रवृतियों से अलग जाकर महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाओं पर काल्पनिक कथा बुनी या ऐतिहासिक प्रसंगों के सन्दर्भ के साथ उनका चित्रण किया.एक कमी तो खटकती है कि स्वाधीनता आन्दोलन,प्रथम स्वतंत्रता संग्राम,भारत-पाकिस्तान और भारत-चीन युद्ध,देश में चले सुधार आन्दोलन,किसानों और मजदूरों के अभियान और संघर्ष जैसे सामयिक विषयों पर फिल्मकारों ने ध्यान नहीं दिया.देश के विभाजन की राजनीतिक और मार्मिक कथा भी नहीं कही गयी.हम अपने अतीत के यथार्थ से भागते रहे.हिंदी फ़िल्में और कमोबेश सभी भारतीय फ़िल्में मुख्य रूप से ख्याली दुनिया में ही उलझी रहीं.अर्द्धसामन्ती देश में प्रेम कहानियां भी एक तरह से विद्रोह की ही दास्तानें हैं,लेकिन फिल्मों में इसकी अति दिखाई पड़ती है.
21वीं सदी में अलबत्ता अनेक ऐतिहासिक फ़िल्में बनती हैं.साधन और सुविधा के साथ भव्यता की चाहत ने फिल्मकारों को ऐतिहासिक फिल्मों के लिए प्रेरित किया है.पिछले दो सालों में अनेक फ़िल्में प्रदर्शित हुई हैं और अभी कुछ ऐतिहासिक फिल्मों के निर्माण में लोकप्रिय और बड़े बैनर संलग्न हैं.

 
प्रसंग  
पारसी परिवार में जन्मे सोहराब मोदी का बचपन मुंबई की पारसी कॉलोनी में बीता था.किशोर उम्र में वे अपने पिता के साथ उत्तर प्रदेश के रामपुर चले गए थे.उनके पिता रामपुर के राजा के मुलाजिम थे.सोहराब मोदी का मन पढ़ाई-लिखाई में अधिक नहीं लगता था.खास कर इतिहास में वे फिसड्डी थे.शिक्षकों ने कई बार उनके पिता को उलाहना भी दिया था.सोहराब का मन खेल और कसरत में अधिक लगता था.14-15 की उम्र में सोहराब को रंगमंच का शौक चढ़ा और वे शेक्सपियर के नाटक करने लगे,उनके भाई रुस्तम भी उनका साथ देते थे.विडम्बना देखें कि इतिहास की पढाई में कमज़ोर सोहराब मोदी भविष्य में ऐतिहासिक फिल्मों के बड़े फ़िल्मकार हुए.उन्होंने अनेक ऐतिहासिक फिल्मों का निर्माण और निर्देशन किया.उन्होंने एक बार कहा था,’हिंदी फिल्मों में प्रवेश करने के बाद मैंने ध्यान से इतिहास पढ़ना आरम्भ किया.फिर एहसास हुआ कि इतिहास में कितना ज्ञान छिपा है.अगर हम ऐतिहासिक व्यक्तियों के जीवन का अनुसरण करें और उनसे शिक्षा लें तो हम अपना जीवन बदल सकते हैं.मुझे लगा कि मेरी तरह अनेक छात्र इतिहास पढ़ने में रूचि नहीं रखते होंगे.क्यों न उन सभी के लिए ऐतिहासिक फिल्मों का निर्माण करूं? इन फिल्मों से उनकी इतिहास की समझदारी बढ़ेगी और वे इतिहास के सबक से अपना भविष्य संवार सकेंगे.

सिनेमालोक : लोकप्रियता का नया पैमाना


सिनेमालोक
लोकप्रियता का नया पैमाना
-अजय ब्रह्मात्मज
सोशल मीडिया के विस्तार से फिल्मों के प्रचार को नए प्लेटफार्म मिल गए हैं.फेसबुक,इंस्टाग्राम,ट्विटर और यूट्यूब....सोशल मीडिया के चरों प्लेटफार्म किसी भी फिल्म के प्रचार के लिए मह्त्वपूर्ण हो गए हैं.उनके लिए खास रणनीति अपनाई जा रही है.कोशिश हो रही है कि ज्यादा से ज्यादा यूजर और व्यूअर इन प्लेटफार्म पर आयें.जितनी ज्याद तादाद,निर्माता-निर्देशक और स्टार की उतनी बड़ी संतुष्टि.आरंभिक ख़ुशी तो मिल ही जाती है.ख़ुशी होती है तो जोश बढ़ता है और फिल्म के प्रति उत्सूकता घनी होती है.इन दिनों फिल्मों की कमाई और कामयाबी के लिए वीकेंड के तीन दिन ही थर्मामीटर हो गए हैं.वीकेंड के तीन दिन के कलेक्शन से पता चल जाता है कि फिल्म का लाइफ टाइम बिज़नस क्या होगा?शायद ही कोई फिल्म सोमवार के बाद नए सिरे से दर्शकों को आकर्षित कर पा रही है.
पिछले हफ्ते ‘जीरो’ और ‘2.0’ के ट्रेलर जारी हुए.मुंबई के आईमैक्स वदला में प्रशंसकों और मीडिया के बीच ट्रेलर जरी कर निर्देश आनद एल राय ने अपने स्टार श रुख खान,अनुष्का शर्मा और कट्रीना कैफ के साथ मीडिया को संबोधित किया.मुख्या रूप से शाह रुख खान से ही सवाल किये जा रहे थे और वही जवाब भी दे रहे थे.निर्माता-निर्देशक ने फिल्म की कथाभूमि मेरठ का फील देने के लिए वहां के घंटाघर का कटआउट लगाया था.मेरठ के स्वाद की भी व्यवस्था की गयी थी.इन आकर्षणों के साथ शाह रुख खान का जन्मदिन भी था.लिहाजा ट्रेलर के यूट्यूब पर आते ही दर्शक और प्रशंसक टूट पड़े.दूसरी तरफ रजनीकांत और निर्देशक शंकर की टीम ने ‘2.0 के ट्रेलर लांच का आयोजन चेन्नई में किया था.मुंबई से अक्षय कुमार भी वहां गए थे.’2.0 मूल रूप से तमिल फिल्म है.इसे हिंदी समेत अन्य भाषाओँ में भी डब किया गया है.ट्रेलर भी अनेक भाषाओँ में यूट्यूब पर चल रहे हैं.दोनोंओ ही फिल्मों के त्रलेर के व्यूअर की संख्या करोड़ों में पहुँच चुकी है और अभी गिनती जारी है.
‘जीरो के बारे में तो अनुमान था कि इसे दर्शकों का प्यार मिलेगा.बौने शाह रुख खान के तेवर और अंदाज को सभी देखना चाहते थे.निर्माता-निर्देशक ने ट्रेलर में कुछ छिपाया नहीं है.खास कर तीनों प्रमुख किरदारों के बारे में बता दिया है.बऊआ का खिलंदड़ा और आक्रामक अंदाज पसंद आ रहा है.बऊआ ग्रंथिहीन हीरो है.उसे अपने अधूरेपन का कोई रंज नहीं है.वह मस्त रहता है और किसी के साथ भी जुड़ कर उसकी ज़िन्दगी बदल देता है.देखते ही देखते ‘जीरो के ट्रेलर के व्यूअर की संख्या करोड़ों में पहुँच गयी.’2.0 का भी यही हाल रहा.उसके व्यूअर भाषाओँ की वजह से बंट गए.इन दोनों के पहले आये ‘ठग्स ऑफ़ हिन्दोस्तान के ट्रेलर के व्यूअर की संख्या 8 करोड़ पार कर चुकी है.क्या ये सभी इन फिल्मों के दर्शक भी होंगे?
फिल्मों के ट्रेलर के व्यूअर दर्शक में तब्दील हो पते हैं क्या?इसे मापने का अभी तक कोई सूत्र विकसित नहीं हुआ है.पिछली कुछ फिल्मों के ट्रेलर ने भी यूट्यूब पर आग लगा दी थी,लेकिन बॉक्स ऑफिस तक उस आग की गर्मी नहीं पहुंची.मीडिया के विशेषज्ञ मानते हैं कि यूट्यूब के व्यूअर और थिएटर के दर्शक अलग होते हैं.यूँ समझें कि किसी भी मॉल में रोजाना फूटफॉल हजारों और लाखों में होता है,लेकिन वास्तविक खरीददारों की संख्या उनके अनुपात में बहुत कम होती है.यही हाल व्यूअर और दर्शक के बीच के गैप में नज़र आता है.
फिर भी यूट्यूब फिल्मों की प्रति उत्सुकता और लोकप्रियता का नया पैमाना बन गया है.उसके विशेषज्ञ आ गए हैं.ट्रेलर के व्यूअर जुटाने के लिए भी ऐड दिए जाते है.उन्हें बूस्ट किया जाता है.व्यूअर की संख्या के खोखलेपन को समझते हुए भी निर्माता-निर्देशक उन तरकीबों और रणनीतियों के मद में भारी राशि खर्च कर रहे हैं.मीडिया के इन्फ़्लुऐंसर की भी मदद ली जा रही है.देखें तो सोशल मीडिया और खास कर यूट्यूब नया मैदान-ए-जंग बना हुआ है.लोकप्रियता की पहली झड़प यहाँ जीतनी होती है.

Sunday, November 4, 2018

आयुष्मान खुराना : रुपहले परदे के राहुल द्रविड़


आयुष्मान खुराना : रुपहले परदे के राहुल द्रविड़ 
-अजय ब्रह्मात्मज

क्रिकेट और फिल्म में अनायास रिकॉर्ड बनते हैं.अचानक कोई खिलाडी या एक्टर उभरता है और अपने नियमित प्रदर्शन से ही नया रिकॉर्ड बना जाता है.अक्टूबर का महीना हमें चौंका गया है.आयुष्मान खुराना की दो फ़िल्में 15 दिनों के अंतराल पर रिलीज हुईं और दोनों फिल्मों ने अच्छा प्रदर्शन किया.दोनों ने बॉक्स ऑफिस पर बेहतर परफॉर्म किया और आयुष्मान खुराना को एक्टर से स्टार की कतार में ला खडा किया.पिछले शनिवार को उनकी ताज़ा फिल्म ‘बधाई हो ने 8.15 करोड़ का कलेक्शन किया.यह आंकड़ा ‘बधाई हो के पहले दिन के कलेक्शन से भी ज्यादा है,जबकि यह दूसरा शनिवार था.लोकप्रिय स्टार की फ़िल्में भी दूसरे हफ्ते के वीकेंड तक आते-आते दम तोड़ देती हैं.इस लिहाज से आयुष्मान खुराना ‘अंधाधुन और ‘बधाई हो की कामयाबी से भरोसेमंद एक्टर-स्टार की श्रेणी में आ गए हैं.

गौर करने वाली बात है कि ‘बधाई हो अर्जुन कपूर और परिणीति चोपड़ा की ‘नमस्ते इंग्लैंड के साथ रिलीज हुई थी.विपुल शाह निर्देशित यह फिल्म ‘नमस्ते लंदन की कड़ी में पंजाब की पृष्ठभूमि की कहानी थी.स्वाभाविक तौर पर माना जा रहा था कि यह फिल्म अच्छा कारोबार करेगी.आजमाए हुए सफल फार्मुले की ‘नमस्ते इंग्लैंड के सामने ‘बधाई हो जैसी ‘आउटऑफ़ बॉक्स फिल्म थी.’बधाई हो के कलाकारों की स्टार वैल्यू ‘नमस्ते इंग्लैंड के कलाकारों से कम और कमज़ोर थी.फिर भी दर्शकों के रुझान से पहले ही दिन जाहिर हो गया कि पंजाब की देखी-सुनी कहानी से वे विरक्त हैं.उन्होंने ‘बधाई हो को पसंद किया और उमड़ कर सिनेमाघरों में पहुंचे.और अभी तक जा रहे हैं.

आज बासु चटर्जी,हृषीकेश मुखर्जी,सई परांजपे आदि डायरेक्टर एक्टिव होते तो अमोल पालेकर और फारुख शेख की तरह आयुष्मान खुराना उनके पसंदीदा एक्टर-स्टार होते.यह भी हो सकता था कि कुछ अनोखी कहानियां लिखी जातीं.आयुष्मान खुराना ने फिल्मों के चुनाव से यह स्पष्ट संकेत दिया है कि वे अपारंपरिक हीरो की भूमिका निभाने के लिए तैयार और सक्षम हैं.उनकी पहली फिल्म ‘विकी डोनर’ स्पर्म डोनेशन के अनोखे विषय पर बनी रोचक फिल्म थी.शूजित सरकार की इस फिल्म को दूसरे अभिनेताओं ने ठुकरा दिया था.फिल्म इंडस्ट्री के रिवाज से किसी भी नए एक्टर के लिए ऐसा विषय चुनना पूरी तरह से जोखिम का काम था,लेकिन शूजित सरकार के सधे हाथों और पैनी नज़र से यह फिल्म मानवीय संवेदना के अनछुए पहलू को लेकर आई.आयुष्मान खुराना,अन्नू कपूर और अन्य सहयोगी कलाकारों ने इसे फूहड़ और साधारण होने से बचा लिया.दर्शक फिल्म देखते हुए आनंदित हुए.

हाल ही में राष्टीय पुरस्कारों से सम्मानित और प्रशंसित एक्टर मनोज बाजपेयी से इधर तेज़ी से उभरे तीन अभिनेताओं राजकुमार राव,विकी कौशल और आयुष्मान खुराना की मौजूदगी पर बात हो रही थी.उन्होंने आयुष्मान खुराना के बारे में मार्के की बात कही.उनके मुताबिक,’ आयुष्मान खुराना का दिल और दिमाग सही जगह पर है.वह इंटेलीजेंट एक्टर हैं.उन्होंने अपना स्ट्रेंग्थ जान लिया है.वह फिल्मों के राहुल द्रविड़ हैं.वह खेलते रहेंगे.’ किसी सीनियर अभिनेता का यह ऑब्जरवेशन गौरतलब है.आयुष्मान खुराना मामूली विफलताओं के बावजूद समय बीतने के साथ लोकप्रियता और स्वीकृति की सीढियां चढ़ते गए हैं.’विकी डोनर के बाद उनसे भी ‘बेवकूफियां हुई हैं.’बेवकूफियां,’नौटंकी साला और ‘हवाईजादा’ उनकी कमज़ोर फ़िल्में रहीं.उन्होंने 2016 में आई ‘दम लगा के हईसा से बताया कि अपनी असफलता से वह बेदम नहीं हुए हैं.इस फिल्म में प्रेम प्रकाश तिवारी जैसे फेलियर और ग्रंथिपूर्ण किरदार को वह पूरी संजीदगी और प्रभाव के साथ जीते हैं.इस फिल्म के बाद उनके चढ़ते कदम अभी तक नहीं लड़खड़ायें हैं.2017 में ‘बरेली की बर्फी और ‘शुभ मंगल सावधान की कामयाबी से ‘मेरी प्यारी बिंदु को गौण कर दिया.उनके प्रशंसकों को उस फिल्म का नाम याद भी नहीं होगा.

हिंदी फिल्मों के इतिहास में हर अभिनेता को कुछ साल ऐसे मिलते हैं,जब उसकी जबरदस्त स्वीकृति रहती है.इस दौर में उसके उन्नीस-बीस परफॉरमेंस को दर्शक-प्रशंसक नज़रअंदाज कर देते हैं.वे किसी प्रेमी/प्रेमिका की तरह अपने प्रिय स्टार की मामूली चूकों पर ध्यान नहीं देते. आयुष्मान खुराना का अभी ऐसा ही वक़्त चल रहा है. अगर उनकी फिल्मों के विषय देखें तो हम पाते हैं कि अपनी अधिकांश फिल्मों में आयुष्मान खुराना पारंपरिक नायक नहीं होते.वे मध्यवर्गीय परिवारों के औसत युवक होते हैं,जो कभी शारीरिक तो कभी पारिवारिक उलझनों में फंसा है.वह उनसे निबटने का कोई ‘ओवर द टॉप’ या अतिरंजित युक्ति नहीं अपनाता.उसमें हिंदी फिल्मों के नियमित नायकों की अविश्वसनीय शक्तियां नहीं रहतीं.अपनी नायिकाओं के साथ उसकी गलतफहमियां चलती रहती हैं.आयुष्मान खुराना की फिल्मों की नायिकाएं दमदार और स्वतंत्र व्यक्तित्व की होती हैं.वे शरमाती या सिफोन की साड़ियाँ लहराती उसके पास नहीं आतीं.वे कामकाजी भी होती हैं.ऐसी नायिकाओं के साथ नायक के प्रेम संबंध दिखाने के लिए लेखकों और निर्देशकों को भी मशक्कत करनी पड़ती है.और फिर आयुष्मान खुराना अपनी सामान्य कद-काठी से उन नायकों को सहज भाव-भंगिमा देते हैं.आयुष्मान अपनी फिल्मों में अधिक नाटकीय या हाइपर नहीं दिखते.’बरेली की बर्फी में उनका किरदार आक्रामक और चालाक था,लेकिन अपनी मासूमियत से वह ठगा भी जाता है.उस फिल्म में तो राजकुमार राव अपने दोरंगी किरदार से दर्शकों के चहेते बन गए थे और आयुष्मान खुराना से लाइमलाइट छीन ली थी.

आयुष्मान खुराना ने पिछले छह सालों में खुद की मेहनत और दर्शकों के प्रेम से यह ऊंचाई हासिल की है.शादीशुदा आयुष्मान खुराना एक समझदार और सहयोगी पति की छवि पेश करते हैं और पारिवारिक गरिमा का पालन करते हैं.वे गायक,कवि और लेखक भी हैं.कहीं न कहीं माँ से उन्हें सारी सृजनात्मकता मिली है.अभिनय कौशल पर उनकी किताब आ चुकी है.और खबर है कि वे जल्दी ही अपनी कविताओं का संग्रह प्रकाशित करना चाहते हैं.सफलता के साथ हर एक्टर-स्टार के आसपास एक हुजूम खड़ा हो जाता है.शुभचिंतक बना यह हुजूम स्टार को खास दिशा में ले जाना चाहता है और शीर्ष पर ले जाने का भुलावा देकर ग्लैमर की गलियों में भटका भी देता है.बस,आयुष्मान खुराना सावधान रहें और बहके नहीं तो उनकी पारी राहुल द्रविड़ की तरह मजबूत और यादगार होगी.