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Tuesday, January 31, 2017

देसी किरदार होते हैं मजेदार : भूमि पेडणेकर




    -अजय ब्रह्मात्‍मज
भूमि पेडणेकर अभी मुंबई में टॉयलेट-एक प्रेम कथा की शूटिंग कर रही हैं। इसी फिल्म की शूटिंग के सिलसिले में वे कुछ महीनों पहले मथुरा और आगरा में थीं। दम लगा के हईसा की रिलीज के बाद से उनकी कोई फिल्म अभी तक नहीं आई है। इस बीच उन्होंने अपनी पहली फिल्म के हीरो आयुष्‍मान खुराना के साथ ही शभ मंगल सावधान की शूटिंग पूरी कर ली है। आयुष्‍मान और भूमि दोनों ही आनंद एल रॉय प्रस्तुत इस फिल्म में नए रूप-रंग और अंदाज में दिखेंगे। शुभ मंगल सावधान के निर्देशक प्रसन्ना हैं।
    हमारी बात पहले टॉयलेट एक प्रेम कथा से ही शुरू होती है। इस फिल्म की घोषणा के समय से ही टायटल की विचित्रता के कारण जिज्ञासा बनी थी। टॉयलेट एक प्रेम कथा नीरज पांडे के प्रॉडक्‍शन की फिल्म है। इसे श्री नारायण सिंह निर्देशित कर रहे हैं। भूमि बताती हैं, आगरा और मथुरा में इस फिल्म की शूटिंग में बेहद मजा आया। साथ में अक्षय कुमार जैसे अभिनेता हों तो हर तरह की सुविधा हो जाती है। टॉयलेट एक प्रेम कथा रोमांटिक सटायर है। दर्शकों को यह यूनीक लव स्टोरी बहुत मजेदार लगेगी। फिल्म की कहानी गोवर्द्धन की पृष्‍ठभूमि में है। गोवर्द्धन आगरा और मथुरा के बीच स्थित है। खास बात है कि टॉयलेट एक प्रेम कथा फनी के होने के साथ ही सामाजिक रूप से प्रासंगिक फिल्म है। इस फिल्म की अभी जरूरत है। देश के स्वच्छता अभियान का समर्थन करती है यह फिल्म।
    भूमि पेडणेकर के नाम से उनका मराठी होने का अहसास होता है। दम लगा के हईसा और टॉयलेट एक प्रेम कथा की शूटिंग के दौरान उत्‍तर भारत में रहने के अनुभवों के बारे में पूछने वह कहती हैं, कम लोगों को मेरा नॉर्थ इंडियन कनेक्शन मालूम है। उत्‍तर भारत मेरे लिए कभी नया नहीं रहा। मैं साल के कुछ महीनों के लिए वहां जाती रही हूं। हरियाणा में मेरा ननिहाल है। मेरी मां वहां की हैं। मैं तो एक तरह से नॉर्थ इंडिया में भी पली-बढी हूं। वहां का कल्चर मेरे लिए अनजान नहीं है। मेरे अंदर जो गुस्सा और प्यार है, वह हरियाणा का ही है। हिम्मत भी वहीं से मिली है। मैं हरियाणवी नहीं बोल पाती हूं, लेकिन समझ लेती हूं। हरियाणा के संपर्क की वजह से मेरी हिंदी साफ है।
    बहरहाल, शुभ मंगल सावधान इसी साल अगस्त में रिलीज होगी। यह रोमांटिक स्टोरी है। मैं दावा कर सकती हूं कि ऐसी रोमांटिक स्टोरी हिंदी फिल्मों में तो नहीं बनी है। मेरा किरदार देश की हर लड़की से कनेक्ट कर पाएगा। बहत ही सरस फिल्म है। फैमिली एंटरटेनमेंट के रूप में आ रही इस फिल्म पर पूरा भरोसा है, क्योंकि इसके साथ आनंद एल राय और इरॉस की  बैकिंग में यह केमिस्ट्री पर्दे पर दिखाई पड़ती है। सेट पर हमारा कंफर्ट जोन देख कर यूनिट के लोग दंग रह जाते हैं। हमारे डायरेक्टर प्रसन्ना का अप्रोच नया और अलग है।
    भूमि की दूसरी फिल्म के भी हीरो आयुष्‍मान खुराना हैं। क्या पहली फिल्म की सराहना का लाभ शुभ मंगल सावधान को मिलेगा। भूमि अपनी खुशी छिपा नहीं पातीं। वे कहती हैं, दूसरी फिल्म में आयुष्‍मान के साथ आकर मैं बहुत खुश हूं। वह मेरे पहले को-स्टार हैं। उनके साथ मेरा संबंध स्पेशल है और हमेशा रहेगा। हम अच्छे दोस्त हैं। अच्छी बात है कि वे बहुत ही उम्दा एक्टर हैं। उम्दा एक्टर होने के साथ-साथ वे अपना काम भी बेहतर होता है। हम दोनों अपनी एक्टिंग को लेकर बहुत सुरक्षित हैं। आयष्‍मान खुराना भी भूमि को पूरा सम्मान देते हैं। वे भूमि को लेडी आमिर खान कहते हैं। वह इसलिए कि उन्होंने भी उनकी ही तरह अपना वजन बढाया था। फर्क इतना ही है कि उन्होंने किसी एक फिल्म के लिए ऐसा नहीं किया। भूमि अपने को-स्टार की इस तारीफ पर हंसती हैं। वे कहती हैं, इसकी वजह से मेरी आइडेंटिटी क्राइसिस बढ़ जाती है। परिवार के लोग पहचान नहीं पाते। मां भी नहीं पहचानती। मुझे लगता है कि टॉयलेट एक प्रेम कथा में ही दर्शक असली भूमि पेडणेकर को देख पाएंगे।
    शुभ मंगल सावधान की कहानी दिल्ली की है। इस फिल्म के नैरेशन के समय ही हम हंस-हंस कर लोटपोट हो रहे थे। बहत मजा आया था। यही उम्मीद है कि वही मजा दर्शकों को भी आएगा। मैं कह सकती हूं कि शुभ मंगल सावधान लीक से हटकर लव स्टोरी है। फिल्म में मेरे किरदार का नाम सुगंधा है। आनंद एल रॉय और इरॉस साथ आते हैं तो एसोसिएशन बहुत अच्छा हो जाता है। वे सिंपल देसी कहानी उठाते हैं। उनकी फिल्में स्वीट और सिंपल रहती हैं। शुभ मंगल सावधान भी उसी जोन की फिल्म है।
    भूमि की उक्त तीनों फिल्मों को देख ऐसा लग रहा है कि वे खास किस्म की भूमिका में बंधती जा रही हैं। भूमि बताती हैं कि वह तीनों फिल्मों के मेरे किरदार बहुत अलग है। हां, तीनों हिंदुस्तानी लड़कियां हैं। उनका संबंध खास किस्म के परिवेश से है। अभी तो इतना ही कह सकती हूं कि टाइपकास्ट होने के डर से फिल्में नहीं छोडूंगी। अभी लेखक-निर्देशक समझ गए हैं कि हमारे दर्शक स्मार्ट हो गए हैं। जरा भी दोहराव होगा तो वे रिजेक्ट कर देंगे। आप उन्हें एक ही फिल्म नहीं दे सकते। तो क्या भूमि की ख्‍वाहिश नहीं है कि वह भी पहाड़ी वादियों में शिफॉन की साड़ी पहने कोई रॉकस्टार गीत गाएं? भूमि जवाब देती हैं, अभी तो मुझे एक साल हुआ है। दर्शकों का प्रेम मिलता रहा तो वह भी मिलेगा। असल हिंदुस्तानी की भूमिका निभाने में मुझे मजा आता है। गर्व होता है।  

Wednesday, January 25, 2017

फिल्‍म समीक्षा - रईस



फिल्म रिव्‍यू
मोहरे हैं गैंगस्‍टर और पुलिसकर्मी
रईस
    -अजय ब्रह्मात्‍मज
फिल्म के नायक शाह रुख खान हों और उस फिल्म के निर्देशक राहुल ढोलकिया तो हमारी यानी दर्शकों की अपेक्षाएं बढ़ ही जाती हैं। इस फिल्म के प्रचार और इंटरव्यू में शाह रुख खान ने बार-बार कहा कि रईस में राहुल(रियलिज्‍म) और मेरी(कमर्शियल) दुनिया का मेल है। रईस की यही खूबी और खामी है कि कमर्शियल मसाले डालकर मनोरंजन को रियलिस्टिक तरीके से परोसने की कोशिश की गई है। कुछ दृश्‍यों में यह तालमेल अच्छा लगता है, लेकिन कुछ दृश्‍यों में यह घालमेल हो गया है।
    रईस गुजरात के एक ऐसे किरदार की कहानी है, जिसके लिए कोई भी धंधा छोटा नहीं होता और धंधे से बड़ा कोई धर्म नहीं होता। बचपन में वह मां से पूछता भी है कि क्या यह सच है तो मां आगे जोड़ती है कि उस धंधे की वजह से किसी का बुरा न हो। रईस पूरी जिंदगी इस बात का ख्‍याल रखता है। वह शराब की अवैध बिक्री का गैरकानूनी धंधा करता है, लेकिन मोहल्ले और समाज के हित में सोचता रहता है। यह विमर्श और विवाद का अलग विषय हो सकता है कि नशाबंदी वाले राज्य में शराब की अवैध बिक्री करना नैतिक रूप से उचित है या नहीं। रईस कम पढा-लिखा और उद्यमी स्‍वभाव का बालक है। वह अपने ही इलाके के सेठ का सहायक बन जाता है। धंधे के गुर सीखने के बाद वह खुद का कारोबार शुरू करता है। उसके पास बनिए का दिमाग और मियां भाई की डेयरिंग है। वह कामयाब होता है और अपने ही इलाके के सेठ के लिए चुनौती बन जाता है। अपने धंधे की सुरक्षा और बढ़ोत्‍तरी के लिए वह सत्ता और विपक्ष दोनों का इस्तेमाल करता है। धीरे-धीरे वह इतना ताकतवर हो जाता है कि सिस्टम से टकरा जाता है। फिर सिस्टम उसे अपना रंग दिखाता है
          ऊपरी तौर पर यह फिल्म रईस और आईपीएस अधिकारी मजमुदार की लुका-छिपी और भिड़ंत की कहानी लग सकती है। लेखक और निर्देशक ने उन्हें रोचक तरीके से आमने-सामने कर दर्शकों का मनोरंजन किया है। हमेशा रईस की दबोचने के पहले मजमुदार का ट्रांसफर हो जाता है। लगता है कि रईस ही मजुमदार की बाजी पलट देता है। दोनों के बीच जारी सांप-सीढी के खेल को अलग से देखें तो पता चलता है कि यह बिसात तो राजनीति और सिस्टम ने बिछायी है। वे अपनी सुविधा और लाभ से रईस और मजमुदार को छूट देते हैं। फिल्म खत्म होने के बाद कुछ सवाल बचे रह जाते हैं। गौर करें तो वे बड़े सवाल हैं, जो भारतीय समाज में कानून और व्‍यवस्था के पक्ष-विपक्ष में खड़े नागरिकों की वास्तविकता और विवशता जाहिर करते हैं। फिल्म की समय सीमा और शैली व शिल्‍प के मसलों में राहुल ढोलकिया सिस्टम की इस पोल को स्पष्‍ट तरीके से नहीं खोल पाते। अपराधी हों या पुलिस कर्मीसिस्टम के लिए दोनों मोहरें हैं, जिन्हें वह अपने हित में उठाता, बिठाता और गिराता है।
    राहुल ढोलकिया ने फिल्म का अप्रोच रियलिस्टिक रखा है, इसलिए पॉपुलर अभिनेता शाह रुख खान को अलग अंदाज में देखते हुए दिक्कत हो सकती है। निस्संदेह, शाह रुख खान ने कुछ अलग करने की कोशिश की है। वे इसमें सफल भी रहे हैं। उन्होंने अपना स्टारडम ओढे नहीं रखा है। वे साधारण दिखने और होने की भरपूर कोशिश करते हैं। उनके किरदार को संवारने में साए की तरह उनके सहयोगी बने सादिक (मोहम्मद जीशान अय्युब) की बड़ी भूमिका है। लगभग हर सीन में अगल-बगल में सादिक की मौजूदगी रईस को गढ़ती है। हां, कुछ निर्णायक दृश्‍य और संवाद भी सादिक को मिले होते तो फिल्म और विश्‍वसनीय लगती। नरेन्‍द्र झा मूसा के रूप में जंचते हैं। नायिका माहिरा खान कुछ विशेष नहीं जोड़ पातीं।
    फिल्म में आईपीएस अधिकारी मजमुदार की भूमिका में नवाजुद्दीन सिद्दीकी मिले हुए हर दृश्‍य में कुछ जोड़ते और रोचक बनाते हैं। नवाजुद्दीन सिद्दीकी अपने किरदारों को थोड़ा अलग और विशेष बना देते हैं। रईस में वह पूरी योग्यता के साथ उपस्थित हैं। निर्देशक ने उनकी क्षमता का पूरा उपयोग वहीं किया है। रईस और मजुमदार की ज्यादा भिड़ंत की चाहत अधूरी रह जाती है। फिल्म का एक हिस्सा तत्‍कालीन राजनीति के परिदृश्‍य को सामने लाती है। यह हिस्सा फिल्म में अच्छी तरह समाहित नहीं हो पाया है। मूल कथा और रईस के मिजाज के लिए जरूरी होने के बावजूद जोड़ा गया लगता है।
    रईस अपराधी और गैंगस्टर है, लेकिन वह नेकदिल और संस्कारी है। वह मां की बात याद रखता है कि धंधे से किसी का बुरा नहीं होना चाहिए और जब फिल्म के क्लाइमेक्स में उसकी वजह से ऐसा हो जाता है तो वह पश्‍चाताप करता है। वह स्पष्‍ट कहता है कि मेरे लिए धंधे से बड़ा कोई धर्म नहीं है, लेकिन मैं धंधे का धर्म नहीं करता। अपने इस वक्तव्‍य के बाद रईस आपराधिक पृष्‍ठभूमि के बावजूद नेक इंसान बन जाता है।
अवधि- 149 मिनट
***1/2 साढे तीन स्टार

Tuesday, January 24, 2017

फिल्‍म समीक्षा - काबिल



फिल्म रिव्‍यू
काबिल
इमोशन के साथ फुल एक्शन
-अजय ब्रह्मात्‍मज
    राकेश रोशन बदले की कहानियां फिल्मों में लाते रहे हैं। खून भरी मांग और करण-अर्जुन में उन्होंने इस फॉर्मूले को सफलता से अपनाया था। उनकी फिल्मों में विलेन और हीरो की टक्कर और अंत में हीरो की जीत सुनिश्वित होती है। हिंदी फिल्मों के दर्शकों का बड़ा समूह ऐसी फिल्में खूब पसंद करता है, जिसमें हीरो अपने साथ हुए अन्याय का बदला ले। चूंकि भारतीय समाज में पुलिस और प्रशासन की पंगुता स्पष्‍ट है, इसलिए असंभव होते हुए भी पर्दे पर हीरो की जीत अच्छी लगती है। राकेश रोशन की नयी फिल्म काबिल इसी परंपरा की फॉर्मूला फिल्म है, जिसका निर्देशन संजय गुप्ता ने किया है। फिल्म में रितिक रोशन हीरो की भूमिका में हैं।
    रितिक रोशन को हम ने हर किस्म की भूमिका में देखा और पसंद किया है। उनकी कुछ फिल्में असफल रहीं, लेकिन उन फिल्मों में भी रितिक रोशन के प्रयास और प्रयोग को सराहना मिली। 21वीं सदी के आरंभ में आए इस अभिनेता ने अपनी विविधता से दर्शकों और प्रशंसकों को खुश और संतुष्‍ट किया है। रितिक रोशन को काबिल लोकप्रियता के नए स्तर पर ले जाएगी। उनके दर्शकों का दायरा बढ़ाएगी। काबिल में रितिक रोशन ने हिंदी फिल्मों के पॉपुलर हीरो के गुणों और मैनेरिज्म को आत्‍मसात किया है और उन्हें अपने अंदाज में पेश किया है। वे रोमांटिक हीरो, डांसर और फाइटर के रूप में आकर्षक और एग्रेसिव तीनों हैं। संजय गुप्ता ने अकल्‍पनीय एक्शन सीन नहीं दिए हैं। सभी घटनाओं और एक्शन में विश्‍वसनीय कल्‍पना है।
    बदले की कहानियों में पहले परिवार(पिता, भाई-बहन आदि) की वजह से फिल्म का हीरो समाज और कानून की मदद न मिलने पर मजबूर होकर खुद ही बदले के लिए निकलता था। एंग्री यंग मैन की कहानियों का यही मुख्‍य आधार था। इधर हीरो अपनी बीवी या प्रेमिका के साथ हुए अन्याय या व्‍यभिचार के बाद बदले की भावना से प्रेरित होता है। अभी के विलेन को किसी न किसी प्रकार से पुलिस व प्रशासन का भी सहयोग मिल रहा होता है। पहले दो-चार ईमानदार सहयोगी किरदार मिल जाते थे। अभी ज्यादातर भ्रष्‍ट और विलेन से मिले होते हैं, इसलिए हीरो की लड़ाई ज्यादा व्‍यक्तिगत और निजी हो जाती है। कथ्‍य की इस सीमा को लेखक और निर्देशक लांघ पाते हैं। उनकी फिल्में ज्यादा दर्शक पसंद करते हैं। आम दर्शक पसंद करते हैं। हिंदी फिल्मों की लोकप्रियता का यह तत्‍व अभी तक सफल और कामयाब है। काबिल में भी यह तत्‍व है।
    रोहन डबिंग आर्टिस्ट है। वह अंधा है। हमदर्द मुखर्जी आंटी उसकी मुलाकात सुप्रिया से करवाती हैं। सुप्रिया भी अंधी है। पहली ही मुलाकात में रोहन अपनी बातों से सुप्रिया को रिझा लेता है। जल्द ही दोनों की शादी हो जाती है। एक दर्शक के तौर पर उनकी सुखी और प्रेमपूर्ण जीवन की संभावना से खुश होते हैं। फिल्म के इस हिस्से में लेखक-निर्देशक ने रोमांस और डांस के सुंदर पल जुटाए हैं। उनमें रितिक रोशन और यामी गौतम की जोड़ी प्रिय लगती है। रोहन की बस्ती में ही शेलार बंधु का परिवार रहता है। सत्ता के मद में चूर बदतमीज छोटे भाई की बेजा हरकत से मुश्किल पैदा होती है। उसे बड़े भाई की शह मिली हुई है। शुरू में रोहन को उम्मीद रहती है कि उसे पुलिस की मदद मिलेगी। वहां से निराश होने के बाद वह पुलिस अधिकारी को खुली चुनौती देता है कि अब वह खुद कुछ करेगा। वह पुलिस अधिकारी से कहता है, आप की आंखें खुली रहेंगी, लेकिन आप देख नहीं पाएंगे। आप के कान खुले रहेंगे, पर आप सुन नहीं पाएंगे। आप का मुंह खुला रहेगा, पर आप कुछ बोल नहीं पाएंगे। सबसे बड़ी बात सर, आप सब कुछ समझेंगे, पर किसी को समझा नहीं पाएंगे।
    इंटरवल के ठीक पहले आए रोहन की इस चुनौती के बाद जिज्ञासा बढ़ जाती है कि एक अकेला और अंधा रोहन कैसे सिस्टम के समर्थन से बचे गुनहगारों से निपटेगा। रितिक रोशन ने रोहन के आत्‍मविश्‍वास को स्‍वाभाविक रूप से पर्दे पर उतारा है। रितिक रोशन अभिनय और अभिव्‍यक्ति की नई ऊंचाई काबिल में छूते हैं। हां, उन्होंने आम दर्शकों को रिझाया है। उन्होंने रोहन के किरदार को सटीक रंग और ढंग्र दिया है। फिल्म की शुरूआत में उंगली और पांव की मुद्राओं से उन्होंने अपने अंधे चरित्र को स्थापित किया है। यहां तक कि डांस के सीक्वेंस में कोरियोग्राफर अहमद खान ने उन्हें ऐसे डांसिंग स्टेप दिए हैं कि रोहन दृष्टिबाधित चरित्र जाहिर हो। दर्शकों से तादातम्य बैठ जाने के बाद यह ख्‍याल ही नहीं आता कि कैसे अंधा रोहन सुगमता से एक्शन कर रहा है। एक्शन डायरेक्टर शाम कौशल का यह योगदान है।
    इस फिल्म की विशेषता संजय मासूम के संवाद हैं। उन्होंने छोटे वाक्य और आज के शब्दों में भाव को बहुत अच्छी तरह व्यक्‍त किया है। ऐसा नहीं लगता कि संवाद बोले जा रहे हैं। डायलॉगबाजी हो रही है। संवाद चुटीले, मारक, अर्थपूर्ण और प्रसंगानुकूल हैं।
    यह फिल्म रितिक रोशन की है। फिल्म के अधिकांश दृश्‍यों में वे अकेले हैं। सहयोगी कलाकारों में रोनित रॉय और रोहित रॉय सगे भाइयों की कास्टिंग जबरदस्त है। दोनों ने अपने किरदारों का ग्रे शेड अच्छी तरह पेश किया है। पुलिस अधिकारी चौबे की भूमिका में नरेंद्र झा याद रह जाते हैं। उन्हें अपने किरदार को अच्छी तरह अंडरप्ले किया है।
**** चार स्टार
अवधि 139 मिनट

Saturday, January 21, 2017

तोड़ी हैं अपनी सीमाएं -शाह रूख खान





रईसने कंफर्ट से बाहर निकाला : शाह रुख खान
नए साल में शाह रुख खान अलग सज और धज के आ रहे हैं। वे दर्शकों को रईस’, ‘द रिंगऔर आनंद एल राय की फिल्म की सौगात देंगे, जो उनके टिपिकल अवतार से अलग है। वे ऐसा क्यों और किस तरह कर पाए, पढें खुद उनकी जुबानी
    -अजय ब्रह्मात्‍मज
वे बताते हैं, ’मैंने अमूमन ऐसे किया है। हालांकि लोगों को सामयिक घटनाक्रम ही नजर आता है। रईसभी उसी की बानगी है। दरअसल चेन्नई एक्सप्रेस’, ‘हैप्पी न्यू ईयरऔर दिलवालेसाथ आ गईं थीं। हालांकि नहीं आनी चाहिए थीं। वह इसलिए कि मैंने हैप्पी न्यू ईयरके बाद रईसकी थी। इसकी शूटिंग खत्म हो रही थी और हम हैदराबाद से दिलवालेशुरू करने वाले थे। तब हम उसकी सिर्फ बल्गारिया वाले हिस्से की शूटिंग करने को थे, कि तभी फैनआ गई। वह 40 दिनों की शूटिंग थी। इस बीच रईसआगे खिसक गई। मेरा घुटना चोटिल हो गया। रईसका 14-15 दिनों का काम बाकी रह गया। फैनवीएफएक्स के चलते 11 महीने टल गई। तो कायदे से रईसहैप्पी न्यू ईयरके बाद ही आती, पर अब आई है। लिहाजा लोगों को लग रहा है कि मेरी पसंद में तब्दीली हुई है, जबकि मैं ऑफबीट और जश्‍न वाली फिल्में मिलाकर करता रहा हूं। मसलन, ‘ओम शांति ओमके बाद चक दे इंडियामाय नेम इज खानके साथ दूल्हा मिल गया
असल में फैनया रईसजैसे मिजाज की फिल्में अधिकतम 60-65 दिनों में शूट हो जाती है, लेकिन वह हो नहीं पाया। चोट के चलते बना-बनाया सेट हटा। बाद में फिर से लगाया गया, क्योंकि मेरे साथ आउटडोर शूट करना मुश्किल है। तो यह अब आ रही है। बहरहाल, बीच में गौरी शिंदे के साथ डियर जिंदगीमैंने की। वह अलग दुनिया है, जो मैं नहीं समझता। कई बार मगर बतौर एक्टर आप वैसी जगह जाएं तो कुछ नया जानने-समझने को मिलता है। वही चीज यहां भी हुई। राहुल ढोलकिया परजानियांजैसे जोन से आते हैं। यहां वे पॉपुलर सिनेमा के साथ रियलिज्‍म मिक्स करना चाहते थे, इसलिए वे फरहान-रितेश के पास आए। उनसे कहा कि वे शाह रुख को ले आएं तो मकसद पूरा हो जाएगा। तो वह मेरी दुनिया में आए, मैं उनके जहां में गया। नवाज, जीशान, अतुल कुलकर्णी सब उनकी कायनात से है, पर एक्शन मास्टर मेरी दुनिया का। फिर भी हमने यह नहीं होने दिया है कि हीरो का घूंसा पड़ा और गुंडे हवा में उड़ गए। जालिमागाना राहुल की दुनिया का नहीं है, पर वह फिल्म में फिट हो गया है। इसी तरह लैला मैं लैला महज आइटम नंबर नहीं है। 1985 में उसी तरह के गाने गाए जाते थे। तो रईसएक उम्दा मिश्रण साबित हो गया।
देखा जाए तो रईससे जुड़े हर कलाकार ने अपनी बाउंड्री पुश की है। मिसाल के तौर पर नवाजुद्दीन सिद्दीकी फिल्म में इंस्पेक्टर हैं। मैं माफिया रईस खान। हमारे बीच बहुत बातें हुईं कि हम नया क्या कर सकते हैं। काफी माथापच्ची के बाद तय हुआ कि दोनों के किरदार आपस में बेइंतहा नफरत करें। दोनों चाहते हैं कि दूसरा खत्म हो जाए, पर दोनों का काम ऐसा है कि एक के बिना दूसरे की नौकरी ही नहीं रहेगी। इंस्पेक्टर कहता भी है, ‘साथ रहने नहीं देता, दूर जाने नहीं जाता रईस। नवाज भाई के लिए इज्जत इसलिए बढ़ी कि उन्होंने नफरत को टिपिकल नहीं बनने दिया। फिल्म में उनके किरदार की एंट्री माइकल जैक्सन के डांस से हुई है। वह चीज मैं करूं तो समझ आता है, पर उन्होंने भी अपना कंफर्ट तोड़ा। उन्होंने ही नहीं, बाकी सारे कलाकारों ने अपनी-अपनी खूबियां एक-दूसरे से साझा कीं।
राहुल ढोलकिया को ही देखें तो मुलाकात से पहले उनको लेकर एक अलग धारणा थी। वह यह कि बड़े सीरियस किस्म का फिल्मकार होंगे। बंदे ने परजानियाजैसी फिल्म बनाई है। सच कहूं तो पॉपुलर सिनेमा में बहुत रिसर्च की जरूरत नहीं होती है। सारा काम हीरो के जिम्मे हो जाता है। उसमें कोई बुराई नहीं है। हैलीकॉप्टर से छलांग मारी और लैंड कर गया। वह भी फ्लाइट ऑफ फैंटेसी है। राहुल उस स्‍कूल से आते हैं, जहां कहानी में बहुत रिसर्च की दरकार होती है। यहां उन्होंने मुझ से मिलकर उस कहानी को सब तक पहुंचाने की कोशिश की है। मैं जब स्थापित नहीं भी था तो सबसे कहा करता था कि यार जब अच्छी कहानी है तो उसे हर किसी तक पहुंचाओ न। क्यों आर्टी फिल्म बनाकर सीमित दर्शक तक पहुंचते हो। यहां वह दीवार टूटी है। राहुल और हमने मिलकर आम सहमति से रियल और कमर्शियल के मेल वाली फिल्म बनाई है। हालांकि यह आसान नहीं था। मुझे सेट पर आने में देर होती ही थी, पर सबके जहन में यह बात थी कि यार यह अपनी फिल्म बना रहे हैं।
    हीरोइन के रोल के लिए फरहान, रितेश और मेरे पास सारी च्‍वॉइसें थीं, पर राहुल यहां रियलिज्‍म ही चाहते थे। वह इसलिए कि रईस और उसकी प्रेमिका की कहानी उम्र के सात साल से लेकर 45 तक चलती है। ऐसे में, हमें परफॉर्म करने वाली अभिनेत्री ही चाहिए थी। उनके नाम पर आखिरी क्षणों में मोहर लगी। वे भी सीरियस किस्म की एक्टिंग करती हैं, पर मैं मानता हूं कि उन्हें भी उड़ी उड़ीगाना करने में मजा आया होगा। काफी कुछ सीखने को मिला होगा।

दरअसल : चित्रगुप्‍त की जन्‍म शताब्‍दी



दरअसल....
चित्रगुप्‍त की जन्‍म शताब्‍दी
-अजय ब्रह्मात्‍मज
2017 हुनरमंद संगीतकार चित्रगुप्‍त का जन्‍म शताब्‍दी वर्ष है। इंटरनेट पर उपलब्‍ध सूचनाओं के मुताबिक उन्‍होंने 140 से अधिक फिल्‍मों में संगीत दिया। बिहार के गोपालगंज जिले के कमरैनी गांव के निवासी चित्रगुप्‍त का परिवार अध्‍ययन और ज्ञान के क्षेत्र में अधिक रुचि रखता था। चित्रगुप्‍त के बड़े भाई जगमोहन आजाद चाहते थी। उनका परिवार स्‍वतंत्रता आंदोलन से भी जुड़ा था। कहते हैं चित्रगुप्‍त पटना के गांधी मैदान की सभाओं में हारमोनियम पर देशभक्ति के गीत गाया करते थे। बड़े भाई के निर्देश और देखरेख में चित्रगुप्‍त ने उच्‍च शिक्षा हासिल की। उन्‍होंने डबल एमए किया और कुछ समय तक पटना में अध्‍यापन किया। फिर भी उनका मन संगीत और खास कर फिल्‍मों के संगीत से जुड़ रहा। आखिरकार वे अपने दोस्‍त मदन सिन्‍हा के साथ मुंबई आ गए। उनके बेटों आनंद-मिलिंद के अनुसार चित्रगुप्‍त ने कुछ समय तक एसएन त्रिपाठी के सहायक के रूप में काम किया। उन्‍होंने पूरी उदारता से चित्रगुप्‍त को निखरने के मौके के साथ नाम भी दिया। आनंद-मिलिंद के अनुसार बतौर संगीतकार चित्रगुप्‍त की पहली फिल्‍म तूफान क्‍वीन थी। इंटरनेट पर फाइटिंग हीरो का उल्‍लेख मिलता है। यों दोनों ही फिल्‍मेंब 1946 में आई थीं।
एसएन त्रिपाटी के संरक्षण से निकलते पर चित्रगुप्‍त ने आरंभ में स्‍टंड और एक्‍शन फिल्‍मों में संगीत दिया। संगीतकार एसडी बर्मन ने उनका परिचय दक्षिण के एवीएम से करवा दिया। इस प्रोडक्‍शन के लिए उन्‍होंने अनेक धार्मिक और सामाजिक फिल्‍मों में संगीत दिया। दिग्‍गज संगीतकारों के बीच मुख्‍यधारा की फिल्‍मों में जगह बनाने में उन्‍हें देर लगी। हाशिए पर मिले कुछ मौकों में ही उन्‍होंने अपना हुनर जाहिर किया। उनके गीत पॉपुलर हुए। समीक्षकों और संगीतप्रेमियों ने उनकी तारीफ भी की। हालांकि 1946 से चित्रगुप्‍त को स्‍वतंत्र फिल्‍में मिलने लगी थीं,ले‍किन उन्‍हें सिंदबाद द सेलर से ख्‍याति मिली। इस फिल्‍म में उन्‍होंने अंजुम ज्‍यपुरी और श्‍याम हिंदी के लिखे गीतों को शमशाद बेगम,मोहम्‍मद रफी और किशोर कुमार से गवाया था। इसी फिल्‍म के एक गीत धरती आजाद है में चित्रगुप्‍त ने मोहम्‍म्‍द रफी के साथ आवाज भी दी थी।
16 नवंबर 1917 को बिहार में जन्‍मे चित्रगुप्‍त का निधन मुंबई में 14 जनवरी 1991 को उनके बेटों की फिल्‍म कयामत से कयामत तक आ चुकी थी। उन्‍होंने अपने पापा के नाम और परंपरा को थाम लिया था। चित्रगुप्‍त के करिअर में 1962 में आई भोजपुरी की पहली फिल्‍म गंगा मैया तोहे पियरी चढ़इबो का खास महत्‍व है। इस फिल्‍म के बाद उन्‍होंने अनेक भोजपुरी फिल्‍मों में संगीत दिया। इस उल्‍लेखनीय शिफ्ट से उनके संगीत में भी बदलाव आया। 1962 के बाद की उन्‍की हिंदी फिल्‍मों के संगीत में भी भोजपुरी या यूं कहें कि पुरबिया धुनों और वाद्यों की गूंज सुनाई पड़ती है। चित्रगुप्‍त के संगीत में हिंदुस्‍तान की धरती की भरपूर सुगंध है। हिंदीभाषी इलाके से आने की वजह से उनके निर्देशन में लोकप्रिय गायकों की आवाज में शब्‍दों की शुद्धता के साथ लहजे और उच्‍चारण पर भी जोर दिखता है। वे गीतकारों की भी मदद करते थे। अंतरों में शब्‍दों को ठीक करने से लेकर भावों के अनुकूल शब्‍दों के चयन तक में उनका योगदान रहता था। आज का दौर रहता तो उन्‍हें कई गीतों में गीतकार का भी क्रेडिट मिल जाता।
उम्‍मीद है कि उनकी जन्‍म शताब्‍दी के वर्ष में उनके महत्‍व और योगदान को रेखांकित किया जाएगा। कम से कम बिहार सरकार और वहां की सरकारी व गैरसरकारी फिल्‍म और सांस्‍कृतिक संस्‍थाएं ध्‍यान देंगी। 
बाक्‍स आफिस
दर्शक बढ़े हरामखोर के

समीति बजट से कम लागत में बनी श्‍लोक शर्मा की हरामखोर ने पहले वीकएंड में 1 करोड़ से अधिक का कलेक्‍शन किया। फिल्‍म कारोबार में ऐसी छोटी फिल्‍मों के मुनाफे पर ध्‍यान नहीं जाता। इस लिहाज से हरामखोर कामयाब फिल्‍म है। शुक्रवार को इसका कलेक्‍शन 23.70 लाख था,जो रविवार को बढ़ कर 41.90 लाख हो गया। वहीं शाद अली की फिल्‍म ओक जानू की यह बढ़त मामूली रही। शुक्रवार को ओक जानू का कलेक्‍शन 4.08 करोड़ था,जो शनिवार को 4.90 और रविवार को 4.82 करोड़ हुआ। ओके जानू का वीकएंड कलेक्‍शन 13.80 करोड़ रहा। हां,इस बीच दंगल ने 370 करोड़ का भी आंकड़ा पार कर लिया।
 


Tuesday, January 17, 2017

बड़ी कुर्बानियां दी हैं मैंने : प्रियंका चोपड़ा




-मयंक शेखर

प्रियंका चोपड़ा हाल ही में अमेरिका से अपने वतन लौटी थीं। वहां से, जहां डोनाल्‍ड ट्रंप नए राष्‍ट्रपति बने हैं। वहां से, जहां के ग्लैमर जगत में प्रियंका भारत का नाम रौशन कर रही हैं। हमारे सहयोगी टैबलॉयड मिड डे के एंटरटेनमेंट एडीटर मयंक शेखर उनकी सोच के हमराज बने। पेश है उनसे हुई बातचीत के प्रमुख अंश :-


-बीते दो-तीन बरसों में आप के करियर ने अलग मोड़ लिया है। क्वांटिको के अगुवा केली ली से हुई मुलाकात को आप के करियर में आते रहे मोड़ का विस्तार कहें। साथ ही उस मुलाकात में और उसके बाद क्या कुछ हुआ।
0 मुझे नहीं लगता कि मैं एक खोज हूं। उसकी बजाय मैं एक अनुभव हूं। आओ चलो, उसे लौंच करते हैं। ऐसा मेरे संग कभी नहीं हुआ। लोगों को मेरे करियर के आगाज से लेकर अब तलक मेरी प्रतिभा को महसूस करना पड़ा है। तभी प्रारंभ से ही हर दो-तीन साल के अंतराल पर मेरे करियर में अहम मोड़ आते रहे हैं। क्वांटिकोमें भी मैं इसलिए कास्ट की गई, क्योंकि वह किसी भारतीय कलाकार का अमरीकियों के लिए सबसे आसान परिचय था। जैसा निर्माताओं ने मुझे बताया। एफबीआई एजेंट के किरदार में खुद को तब्दील कर वह काम मेरे लिए आसान रहा। इस किस्म का काम अब तलक किसी भारतीय कलाकार ने नहीं किया है।
-आप ने अपना सिंगल वहां लौंच किया था। पिट बुल के साथ भी गाना तैयार किया। उनके चलते वे आप को जान सके।
0 नहीं। केली ली से मेरी मुलाकात एक पार्टी में हुई थी।
-         यानी, वह आप का टर्निंग पॉइंट था।
0 लेकिन , मैं किसी की खोज नहीं थी। पार्टी में केली मुझसे कहने लगीं कि मैं टिपिकल हिंदुस्तानी कलाकारों की तरह नहीं लगती। सिनेमा, अदाकारी को लेकर मेरे विचारों से वे प्रभावित थीं। उस मुलाकात में केली ने यह नहीं कहा कि मैं बड़ी हसीन हूं। या मैं आप को तो कास्ट करूंगी ही। मुझे लगता है कि आज की तारीख में कहीं की भी प्रतिभा ग्लोबल फिल्म परिवार का हिस्सा बन सकती हैं। वही हुआ। मेरा चयन रिकॉर्डिंग आर्टिस्ट के लिए भी हुआ। इसलिए नहीं कि मैं गाना गा सकती हूं। वह तो हर कोई कर सकता है। मुझे बताया कि मैं उस काम के लिए मुफीद थी। मुझे नहीं मालूम कि उनकी मुफीद की क्या परिभाषा है। मुझे नहीं पता कि मेरे फेवर में किन चीजों ने फेवर किया। बस इतना जानती हूं कि मैं मिलते रहे कामों को ढंग से करती रही। आज आप के समक्ष हूं।
-अपने 30वें जन्मदिन पर आप वहां के ह्वाइट हाउस में आयोजित रात्रिभोज की मेहमान बनीं। अमरीका की जानी-मानी हस्तियों से मिलीं। उन पलों को सोच आप को नहीं लगता कि वाह, कितना कुछ हासिल कर लिया मैंने।
0 मैं महज 17 की उम्र में मिस वल्र्ड बनी। उसके बाद हिंदी सिनेमा का हिस्सा बनी। मैं 20 की भी नहीं थी, जब कई नामी ग्लोबल लीडर से मेरी मुलाकात हो चुकी थी। लिहाजा बड़े-बड़े लोगों से मिलने पर हतप्रभ वाले एहसास तो बहुत पहले जा चुके हैं। अब काम की खातिर भारत, अमेरिका या ब्रिटेन में मैं लोगों से बतौर सहकर्मी मिला करती हूं। मैं किसी की आभा में नहीं आती। सिवाय गायकों को छोड़। उन्हें देख, सुन या मिल तो पता नहीं मुझे क्या हो जाता है।
-         आप इस प्रवास से पहले भी अमेरिका में रह चुकी हैं। 12 से 16वें साल तक ही। आप के क्लास में नस्लभेदी छात्र भी थे, इसलिए आप वहां से लौट आईं। अब डोनाल्ड ट्रंप की जीत से आप क्या मतलब निकालती हैं।
-         0 तब नस्लभेदी टिप्पणी करने वाली लड़की से ज्यादा स्‍कूल के माहौल को मैं कसूरवार मानती हूं। वह लड़की मुझसे प्रतिस्‍पर्धा रखती थी। दौड़ में आगे रहने की खातिर भी वह मन में मेरे प्रति कड़वाहट रखती थी। रहा सवाल वहां के हालिया चुनाव का तो मैं कौन होती हूं, ट्रंप की जीत के मायने मालूम करने वाली। मैं तो बस वहां काम करती हूं। लेकिन हां, मैंने अपने दोस्तों व सहकर्मियों में उनकी जीत से हुई निराशा महसूस की है। मैंने लोगों में खासा कन्फ्यूजन देखा। इस बात को लेकर कि अरे यह क्या हो गया। कैसे हो गया। दरअसल हर मुल्क के अपने मसले हैं। हमारे अपने हैं। उनके अपने। आप को अपना स्टैंड पता होना होना चाहिए। जोर इस बात पर हो कि आप के कर्मों से देश के टुकड़े न हों।
-नफरत के निशां अब भी नहीं मिटे हैं। हाल में आप ट्वीटर पर ट्रॉल की गई थीं। आप को अरबी आतंकी तक कहा गया। क्या यह ट्रंप का अमेरिका जाहिर करता है।
0 ऐसा मानना नाजायज होगा। पूरी दुनिया में अव्‍यावहारिक नेता चुने जाते रहे हैं। यह हमारी जिम्मेदारी बनती है कि इस सिलसिले पर कैसे लगाम लगाई जाए। हम साथ मिलकर काम करना भी भूल जाते हैं। हमारा अधिकांश वक्त तो अपनी सरकार को कोसने में चला जाता है। यह कहते हुए कि उसने हमारे लिए क्या किया। मेरा कहना है कि भई, हमने  अपने देश के लिए क्या किया। इंसानियत जिंदा रहे, उसके लिए कुछ भी किया। नहीं। मैं मिस वल्र्ड जैसा साउंड नहीं करना चाहती, मगर यह हकीकत है। रौ में आ नेताओं को कोसना बदस्तूर जारी रहा, तो हमारी दशा जस की तस बनी रहने वाली है।
-         आप इतना काम कर रही हैं। जीवन के साथ काम का संतुलन है भी कि नहीं।
0 है तो। पर हां, डेडलाइन के साथ। दरअसल हमें कुछ भी यूं ही नहीं मिलता। मैंने बहुत कुर्बानियां दी हैं। तब जाकर यह स्टेटस हासिल हुआ है। मैं उन चुनिंदा लोगों में से हूं, जो अपार मौके व कहीं की भी स्‍वीकार्यता हासिल कर लेते हैं। लिहाजा अपने लिए दो महीने भी छुट्टियां लेने का ख्‍याल दिल में नहीं आता।
-अपने लिए तो छोड़ ही दें। डेटिंग के लिए भी वक्त निकाल पाती हैं।
0 मुझे डेटिंगका कौन्सेप्ट पल्ले नहीं पड़ता। भारत में तो वैसे भी डेटिंग कहां होती है। आप दोस्तों से मिलते हो। आप के तार जुड़ते हैं
-आप पुरातन काल या टिंडर जैसे डेटिंग साइट आने से पहले की बातें कर रही हैं।
0 हो सकता है। मैं अब तक उस साइट का हिस्सा नहीं बनी हूं। न कभी किसी को डेट किया है। बाकी जो जब तक शादीशुदा नहीं है,  वह तब तलक सिंगल ही कहलाता है।

Saturday, January 14, 2017

फिल्‍म समीक्षा : ओके जानू

फिल्‍म रिव्‍यू
ओके जानू
-अजय ब्रह्मात्‍मज
शाद अली तमिल के मशहूर निर्देशक मणि रत्‍नम के सहायक और शागिर्द हैं। इन दिनों उस्‍ताद और शाग्रिर्द की ऐसी जोड़ी कमू दिखाई देती है। शाइ अली अपने उस्‍ताद की फिल्‍मों और शैली से अभिभूत रहते हैं। उन्‍होंने निर्देशन की शुरूआत मणि रत्‍नम की ही तमिल फिल्‍म के रीमेक साथिया से की थी। साथिया में गुलजार का भी यागदान था। इस बार फिर से शाद अली ने अपने उस्‍ताद की फिल्‍म ओके कनमणि को हिंदी में ओके जानू शीर्षक से पेश किया है। इस बार भी गुलजार साथ हैं।
मूल फिल्‍म देख चुके समीक्षकों की राय में शाद अली ने कुछ भी अपनी तरफ से नहीं जोड़ा है। उन्‍होंने मणि रत्‍नम की दृश्‍य संरचना का अनुपालन किया है। हिंदी रीमेक में कलाकार अलग हैं,लोकेशन में थोड़ी भिन्‍नता है,लेकिन सिचुएशन और इमोशन वही हैं। यों समझें कि एक ही नाटक का मंचन अलग स्‍टेज और सुविधाओं के साथ अलग कलाकारों ने किया है। कलाकरों की अपनी क्षमता से दृश्‍य कमजोर और प्रभावशाली हुए हैं। कई बार सधे निर्देशक साधारण कलाकारों से भी बेहतर अभिनय निकाल लेते हैं। उनकी स्क्रिप्‍ट कलाकारों को गा्रे करने का मौका देती है। ओके जानू में ऐसा ही हुआ है। समान एक्‍सप्रेशन से ग्रस्‍त आदित्‍य राय कपूर पहली बार कुछ खुलते और निखरते नजर आए हैं। हां,श्रद्धा कपूर में उल्‍लेखनीय ग्रोथ है। वह तारा की गुत्थियों और दुविधाओं को अच्‍छी तरह व्‍यक्‍त करती है। चेहरा फोकस में हो तो उतरते,बदलते और चढ़ते हर भाव को कैमरा कैद करता है। कलाकार की तीव्रता और प्रवीणता पकड़ में आ जाती है। श्रद्धा कपूर ऐसे क्‍लोज अप दृश्‍यों में संवाद और भावों को अच्‍दी तरह व्‍यक्‍त करती हैं। युवा कलाकारों को संवाद अदायगी पर काम करने की जरूरत है। इसी फिल्‍म में गोपी का किरदार निभा रहे नसीरूद्दीन शाह मामूली और रुटीन दृश्‍यों में भी बगैर मेलोड्रामा के दर्द पैदा करने में सफल रहे हैं। यह उनकी आवाज और संवाद अदायगी का असर है। यहां तक कि लीला सैमसन अपने किरदार को भी ऐसे ही गुणों से प्रभावशाली बनाती हैं।
फिलम की कहानी आज के युवा किरदारों के आग्रह और भ्रम पर केंद्रित है। तारा और आदि आज के युवा ब्रिगेड के प्रतिनिधि हैं। दोनों महात्‍वाकांक्षी हैं और जीवन में समृद्धि चाहते हैं। तारा आर्किटेक्‍अ की आगे की पढ़ाई के लिए पेरिस जाना चाहती है। आदि का ध्‍येय वीडियो गेम रचने में लगता है। वह अमेरिका को आजमाना चाहता है। आदि उसी क्रम में मुंबई आता है। वह ट्रेन से आया है। दोनों उत्‍तर भारतीय हैं। तारा समृद्ध परिवार की लड़की है। आदि मिडिल क्‍लस का है। फिल्‍म में यह गौरतलब है कि आदि को वहडयो गेम का सपना आता है तो निर्देश और सड़कों के दोनों किनारों की दुकानों के साइन बोर्ड हिंदी में लिखे हैं,लेकिन जब वह वीडियो गेम बनाता है तो सब कुछ अंग्रेजी में हो जाता है। शाद अली ने बारीकी से उत्‍तर भारतीय के भाषायी अवरोध और प्रगति को दिखाया है। बहरहाल, इस फिल्‍म में भी दूसरी हिंदी फिल्‍मों की तरह पहली नजर में ही लड़की लड़के को आकर्षित करती है और फिर प्रेम हो जाता है।
ओके जानू प्रेम और करिअर के दोराहे पर खड़ी युवा पीढ़ी के असमंजस बयान करती है। साहचर्य और प्‍यार के बावजूद शादी करने के बजाय लिव इन रिलेशन में रहने के फैसले में कहीं न कहीं कमिटमेंट और शादी की झंझटों की दिक्‍कत के साथ ही कानूनी दांवपेंच से बचने की कामना रहती है। हम लिव इन रिलेशन में रहने और अलग हो गए विख्यात प्रेमियों को देख रहे हैं। उनकी जिंदगी में तलाक की तकलीफ और देनदारी नहीं है। खास कर लड़के ऐसे दबाव से मुक्‍त रहते हैं। आदि और तारा दोनों ही स्‍पष्‍ट हैं कि वे अपने ध्‍येय में संबंध को आड़े नहीं आने देंगे। ऐसा हो नहीं पाता। साथ रहते-रहते उन्‍हें एहसास ही नहीं रहता कि वे कब एक-दूसरे के प्रति कमिटेड हो जाते हैं। उनके सामने गोपी और चारू का साक्ष्‍य भी है। उन दोनों की परस्‍पर निर्भरता और प्रेम आदि और तारा के लिए प्रेरक का काम करते हैं।
अपनी प्रगतिशीलता के बावजूद हम अपनी रूढि़यों से बच नहीं पाते। इसी फिल्‍म में गोपी तारा से पूछते हैं कि वह करिअर और प्‍यार में किसे चुनेगी? यही सवाल आदि से भी तो पूछा जा सकता है। दरअसल, हम लड्कियों के लिए प्‍यार और करिअर की दुविधा खड़ी करते हैं। ओके जानू ऐसे कई प्रसंगों की वजह से सोच और अप्रोच में आधुनिक होने के बावजूद रूढि़यों का पालन करती है।
अवधि- 135 मिनट
तीन स्‍टार