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Sunday, December 31, 2017

शाह रुख खान और आनंद एल राय की जोड़ी का कमाल




-अजय ब्रह्मात्‍मज 

कल यानी 1 जनवरी 2018 दिन सोमवार को शाम पांच बजे शाह रुख खान और आनंद एल राय अपनी निर्माणाधीन अनाम फिल्‍म के नाम की घोषणा करेंगे। यह भी संकेत मिला है कि वे फिल्‍म की झलकी भी दिखाएंगे।


इस अनाम फिल्‍म की घोषणा के बाद से ही दर्शकों के बीच नाम की जिज्ञासा है। चूंकि फिल्‍म का हीरो मेरठ का बौना है,इसलिए सभी मान रहे हैं कि फिल्‍म का नाम ड्वार्फ भी हो सकता है। इन दिनों अंग्रेजी नाम रखने का चलन है। लोगों का मानना निराधार नहीं है। फिल्‍म की योजना और आरंभिक निर्माण के दौरान आनंद एल राय ने हमेशा यही कहा कि नाम तो रख लेंगे...पहले हम अपने विषय और भावनाओं को सलझा लें। कहानी पक्‍की कर लें। कुछ लोग पहले शीर्षक लिख कर कहानी आरंभ करते हैं। वे अपनी कहानी की संभावनाओं और उड़ान से वाकिफ होते हैं। मैा खुद अपने लेखों के शीर्षक पहले नहीं लिख पाता। लेख लिखने के बाद शीर्षक लिखता हूं। रिव्‍यू लिखने के बाद स्‍टार जड़ता हूं। मैंने साथी समीक्षकों को देखा है कि वे फिल्‍म के प्रीव्‍यू से निकलते ही स्‍टार बताने लगते हैं। सभी की अपनी सोच और अपना तरीका।

बहरहाल,हम बात कर रहे थे शाह रुख खान और आनंद एल राय की अनाम फिल्‍म की। इसके नाम की घोषणा के साथ झलकी भी दिखेगी। कल ठीक पांच बजे। अभी इवेंट और मीडिया मेल-मिलाप का झेझट ही खत्‍म्‍। ट्वीटर इतना जबरदस्‍त प्‍लेटफार्म हो गया है। अकेले शाह रुख खान के 3 करोड़ 21 लाख फालोअर्स हैं। कोई भी खबर जंगल की आग की रु्तार से फैल जाएगी। और उसके बाद सभी मीडिया प्‍लेटफार्म और पत्रकार एक-दूसरे को पछाड़ते हुए उसे शेयर करेंगे। मैं भी करूंगा। आप देखना और रीट्वीट करना न भूलना।

यह फिल्‍म कितनी प्रतीक्षित है? इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसके नाम का बेसब्री से इंतजार हो रहा है। फिल्‍म के विषय के बारे में अभी तक कोई जानकरी नहीं मिली है। इस बार शाह रुख खान की फिल्‍म के बारे में आमिर खान वाली सीक्रेसी बरती जा रही है। यह अच्‍छी बात है। अभी पहले का दौर नहीं है कि पूरी कहानी बता दो तब भी दर्शक पूरे उत्‍साह से सिनेमा देखने आते थे। वैसे यह सीक्रेसी पहले शो तक की ही रहती है। उसके बाद पूरा देश जान जाता है।

आप कुछ अनुमान लगा सकते हैं क्‍या? बताएं फिल्‍म में क्‍या है? आप कितने उत्‍सुक हैं?

हम अभी इतना ही बता सकते हैं कि यह दो विशेष व्‍यक्तियों की प्रेमकहानी है,जिसे दो विशेष पूरे प्रेम और मनोयोग से बना रहे हैं।





Tuesday, December 26, 2017

मुक्काबाज़ और मुक्केबाज़ का फ़र्क़

Image result for mukkabaaz- अजय ब्रह्मात्मज

मैंने २३ दिसंबर को एक ट्वीट किया था। ...
अच्छा चलिए मुक्काबाज़ और मुक्केबाज़ फ़र्क़ बता दीजिये। आम दर्शक भाई लोग भी ट्राई कर सकते हैं।
भाई लोगों ने क्या खूब ट्राई किया?
वल्लभ खत्री - मुक्काबाज़ गाली और अनादर के तौर पर उपयोग किया जाता है,जबकि मुक्केबाज पेशेवर प्रयोग हैं। अनुराग सर क्या यह सही है?

लेखक शसवानी - सौ सुनार की एक लोहार की।  यही फ़र्क़ होता है मुक्काबाज़ और मुक्केबाज़ में।
जय हिंद जय भारत।

मिर्ची मनोज - मात्रा का फर्क है और मात्रा से किरदार बदल जाता है इंसान का। मुक्काबाज़ लड़ाई जी सकता है,मुक्केबाज़ आदर हासिल करता है।

चैतन्य कांबले - भक्त मुक्काबाज़ है, जो मालिक के इशारे पर मुक्का मारता है। मुक्केबाज़ आप अनुराग कश्यप हो, जो दिल और दिमाग के सुनकर मक्का मारता है।

सुरेश देवसहाय - बचपन में हम लोग कभी किसी को मुक्का मारा करते थे तो वह टीचर या अपने माता पिता से शिकायत में कहता था,इसने मुझे मुक्का से मारा। शायद वही मुक्काबाज़ है।

शिवम - जो सबक सिखा दे,वह मुक्काबाज़।
जो प्राण पखेरू उड़ा दे,वह मुक्केबाज़।

क्षितिज - एक मुक्का है तो मुक्काबाज़,
दो मुक्के हैं तो मुक्केबाज़।

साजिद सिद्दीकी - It's singular and plural.

राजेंद्र धिधारिया - बंद मुट्ठी को,जिसको मुंह पर मारते हैं,उसको मुक्का कहते हैं। पुरानी कहावत है।
पुराने लोगों की आवाज।

सईद यूसुफ मेहंदी - मुक्केबाज़ =boxer
मुक्काबाज़ = brawler

फैज़ान उमर - जो एक मुक्का मारे वो मुक्काबाज़,को कई मुक्के मारे वो मुक्केबाज़।

गजेंद्र सिंह चौहान - किसी एक आदमी को मुक्काबाज़ कहा जा सकता है।

जूनियर वरुण बिधुरी - मुक्काबाज़ one who punch without reason. मुक्केबाज़ one who is athelete and punch in ring with reason.



 

Friday, December 8, 2017

फिल्म समीक्षा : फुकरे

- अजय ब्रह्मात्मज
एक पंकज त्रिपाठी और दूसरी रिचा चड्ढा के अलावा इस फिल्म के बाकी कलाकार बहुत सक्रिय नहीं हैं।उन्हें फिल्में नहीं मिल रही हैं। वरुण शर्मा ने जरूर 12 फिल्में की, लेकिन वह अपनी ख़ास पहचान और अदाकारी में ही सिमट कर रह गए हैं। मनजोत सिंह अली फजल और पुलकित सम्राट के करियर में खास हलचल नहीं है। बाकी कलाकारों की निष्क्रियता का संदर्भ इस फिल्म के निर्माण से जुड़ा हुआ है। रितेश सिधवानी और फरहान अख्तर की कंपनी एक्सेल ने किफायत में एक फिल्म बनाकर पिछली सफलता को दोहराने की असफल कोशिश की है। इस कोशिश में ताजगी नहीं है। फुकरे फोकराइन हो गई है। फटे दूध दूध से आ रही गंध को फोकराइन कहते हैं।
मूल फिल्म में चार निठल्लों की कहानी रोचक तरीके से कही गई थी उस फिल्म में दिख रही दिल्ली भी थोड़ी रियल और रफ थी। चारों किरदार जिंदगी के करीब थे। उनके साथ आई भोली पंजाबन अति नाटकीय होने के बावजूद अच्छी लगी थी। इस बार भी भोली पंजाबन अच्छी लगी है लेकिन चारों किरदार पुराने रंग और ढंग में नहीं है। हल्के और खोखले होने की वजह से वे जानदार नहीं लगते हैं। इस बार घटनाओं के अभाव में कहानी की कमी खलती है। लेखक-निर्देशक नए कलाकारों की पिछली छवि खासकर चूचा की लोकप्रियता का इस्तेमाल किया है। अफसोस कि वे यहां भी विफल रहे हैं।
दिक्कत तो एक फ्रेम मैं चार-छह कलाकारों को साथ खड़ा करने और उन से काम लेने में भी रही है कई दृश्य में यूं लगता है कि वे नुक्कड़ नाटकों के कलाकारों की तरह आपस में संगति बिठा रहे हैं निर्देशक ने उन्हें एक विषय दे दिया है और वे खुद इंप्रोवाइज कर रहे हैं। कलाकार सक्षम होते तो शायद कुछ चमत्कार कर देते। जिस फ्रेम में रिचा चड्ढा और पंकज त्रिपाठी हैं वहां तो फिर भी बात बनती है दोनों अपनी अदाकारी और हिंदी भाषा की वाकपटुता सदस्यों को संभाल लेते हैं। यह हुनर बाकी चार कलाकारों के पास नहीं है। माफ करें चूचा यानी वरुण शर्मा सीमित एक्सप्रेशन के कलाकार हैं। यह केवल चेहरे बनाते रहते हैं और समझते हैं कि अदाकारी हो गई। संभवत: यह उनका दोष नहीं है। तुमसे यही कहा गया होगा और वे इसे अपने तई इमानदारी से निभाते हैं।
यह फिल्म रिचा चड्ढा और पंकज त्रिपाठी के लिए देखी जा सकती है। इन दोनों के अलावा नेता के रुप में आए राजीव गुप्ता ने प्रभावित किया है। उन्होंने अपने किरदार को साधा है।
फिल्म में एक जगह कहीं 2014 ईसवी का उल्लेख होता है। उस उल्लेख को विस्तार नहीं मिला है, इसलिए फिल्म अपने समय में आते-आते फिसल जाती है। एक्सेल की यह किफायती कोशिश निराश करती है।
*1/2 डेढ़ स्टार