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Friday, November 24, 2017

फिल्म समीक्षा : कड़वी हवा

फिल्म समीक्षा : कड़वी हवा
अवधि : 100 मिनट
***1/2 साढ़े तीन स्टार
- अजय ब्रह्मात्मज
जिस फिल्म के साथ मनीष मुंद्रा, नीला माधव पांडा, संजय मिश्रा, रणवीर शौरी और तिलोत्तमा शोम जुड़े हों,वह फिल्म खास प्रभाव और पहचान के साथ हमारे बीच आती है। दृश्यम फिल्म्स के मनीष मुंद्रा भारत में स्वतंत्र सिनेमा के सुदृढ़ पैरोकार हैं। वहीं नीला माधव पांडा की फिल्मों में स्पष्ट सरोकार दिखता है। उन्हें संजय मिश्रा, रणवीर शौरी और तिलोत्तमा शोम जैसे अनुभवी और प्रतिबद्ध कलाकार मिले हैं। यह फिल्म उन सभी की एकजुटता का प्रभावी परिणाम है। ऐसी फिल्मों से चालू मनोरंजन की उम्मीद नहीं की जानी चाहिए। हमें देखना चाहिए कि वे सभी अपने कथ्य और नेपथ्य को सही रखते हैं या नहीं?

बेघर और बंजर हो रहे मौसम के मारे हेदू और गुणों वास्तव में विपरीत और विरोधी किरदार नहीं है। दहाड़ मार रही बदहाली के शिकार दोनों किरदार एक ही स्थिति के दो पहलू हैं। बुंदेलखंड के महुआ गांव में हेदूअपने बेटे, बहु और दो पोतियों के साथ रहता है गांव के 35 लोग कर्ज में डूबे हुए हैं। उनमें से एक हेदू का बेटा मुकुंद भी है। हेदू अंधा है फिर भी यथाशक्ति वह घर परिवार के काम में हाथ बंटाता है। हेदू अपने बेटे मुकुंद के लिए चिंतित है। स्थितियां इतनी शुष्क हो चली हैं कि बाप बेटे में बात भी नहीं हो पाती। एक बहु ही है, जो परिवार की धुरी बनी हुई है। दूसरे पहलू की झलक दे रहा गुनु उड़ीसा के समुद्र तटीय गांव से आया है। स्थानीय ग्रामीण बैंक में वह वसूली कर्मचारी है, जिसे गांव वाले यमदूत कहते हैं। गुनु इस इलाके की वसूली में मिल रहे डबल कमीशन के लालच में अटका हुआ है। उसके पिता को समुद्र निकल चुका है। बाकी परिवार तूफान और बारिश से तबाह हो जाने के भय में जीता रहता है।

'कड़वी हवा' सतह पर बदलते मौसम की कहानी है। बदलते मौसम से आसन्न विभीषिका को हम फिल्म के पहले फ्रेम से महसूस करने लगते हैं। नीला माधव पांडा ने अपने किरदारों के जरिए अवसाद रचा है। कर्ज में डूबी और गरीबी में सनी हेदू के परिवार की जिंदगी महुआ गांव की झांकी है। कमोबेश सभी परिवारों का यही हाल है। इसी बदहाली में जानकी के पिता रामसरण की जान जाती है। हेदू को डर है कि कहीं उसका बेटा मुकुंद भी ऐसी मौत का शिकार ना हो जाए लाचार हेदू अपने बेटे के संकट को कम करने की युक्ति में लगा रहता है। इसी क्रम में वह गुनु की चाल में फंसकर वसूली में मददगार बन जाता है। हेदू अनैतिक आचार नहीं करता और गुनु वसूली के लिए अत्याचार नहीं करता,लेकिन इस संवेदनशील और दमघोंटू माहौल में उनकी मिलीभगत नकारात्मक लगती है। फिल्म के अंत में पता चलता है कि गुनु भी हेदू की तरह परिस्थिति का मारा और विवश है। अपने तई  खुद को परिवार के संकट से उबारने का यत्न कर रहा है।

सुखाड़ के माहौल में परिदृश्य की 'कड़वी हवा' उदास करती है। इस उदासी में ही हेदू की चुहल और गुनु के अहमकपने से कई बार हंसी आती है। अपनी पोती कुहू से हेतु का मार्मिक संबंध ग्रामीण परिवेश में रिश्ते के नए आयाम से परिचित कराता है। लेखक-निर्देशक ने किरदारों को बहुत ख़ूबसूरती से रचा और गूंथा है।

यह फिल्म संजय मिश्रा और रणवीर शौरी की जुगलबंदी के लिए देखी जानी चाहिए। दोनों एक दूसरे के पूरक हैं और परस्पर प्रयास से फिल्म के कथ्य को प्रभावशाली बनाते हैं। अभिनेता संजय मिश्रा के अभिनय का एक सिरा कॉमिक रोल में हमें हंसाता है तो ट्रैजिक रोल में द्रवित भी करता है। अच्छी बात है कि वे एक साथ दोनों तरह की फिल्में कर रहे हैं। रणवीर शौरी ऐसी फिल्मों में लगातार सहयोगी भूमिकाओं से खास भरोसेमंद पहचान हासिल कर चुके हैं।संजय मिश्रा और रणवीर शौरी के बीच के कुछ दृश्य उनकी पूरक अदाकारी की वजह से याद रह जाते हैं। तिलोत्तमा शोम अपनी भूमिका में जंचती हैं।

फिल्म के अंत में  गुलजार अपनी पंक्तियों को खुद की आवाज में सुनाते हैं। गुलजार की आवाज में कशिश और लोकप्रियता है,जिसकी वजह से ऐसा लगता है कि कोई संवेदनशील और गंभीर बात कही जा रही है। इन पंक्तियों को गौर से पढ़े तो यह तुकबंदी से ज्यादा नहीं लगती हैं।

Friday, November 17, 2017

फ़िल्म समीक्षा : तुम्हारी सुलु

फ़िल्म समीक्षा - तुम्हारी सुलु
अवधि - 140 मिनट
**** चार स्टार
-अजय ब्रह्मात्मज

 सुरेश त्रिवेणी निर्देशित तुम्हारी सुलु मुंबई के उपनगर विरार की एक घरेलू महिला सुलोचना की कहानी है। सुलोचना के परिवार में पति अशोक और बेटा है। मध्यवर्गीय परिवार की सुलोचना अपने पति और बेटे के साथ थोड़ी बेचैन और थोड़ी खुश रहती है। बिल्डिंग और सोसाइटी में होने वाली प्रतियोगिताओं में वह सेकंड या फर्स्ट आती रहती है। इन प्रतियोगिताओं से ही उसने घर के कुछ उपकरण भी हासिल किए हैं। पति अशोक पत्नी सुलोचना की हर गतिविधि में हिस्सा लेता है। सुलोचना अपनी व्यस्तता के लिए नित नई योजनाएं बनाती है और उनमें असफल होती रहती है। पिता और बड़ी बहनें(जुड़वां) उसका मजाक उड़ाती रहती हैं।मायके के सदस्यों के निशाने पर होने के बावजूद वह हीन भावना से ग्रस्त नहीं है। वह हमेशा कुछ नया करने के उत्साह से भरी रहती है। अशोक भी उसका साथ देता है।

नित नए एडवेंचर की रुटीन प्रक्रिया में वह एक एफएम चैनल में आरजे बनने की कोशिश में सफल हो जाती है। उसे रात में 'तुम्हारी सुलु' प्रोग्राम पेश करना है,जिसमें उसे श्रोताओं की फोन इन जिज्ञासाओं के जवाब सेक्सी आवाज़ में देने हैं। शुरू की दिक्कतों के बाद सुलोचना को इस काम में मज़ा आने लगता है और वह अपने सुलु अवतार को एंजॉय करती है। पति अशोक को शुरू में यह सब मजाक लगता है लेकिन सुलोचना की गंभीरता उसे राजी कर लेती है। वह पत्नी के इस नए एडवेंचर में उसके साथ है। उसकी मदद भी करता है। पत्नी के प्रोग्राम को सुनते हुए वह कई बार आम पति की तरह असहज भी होता है । धीरे-धीरे ऐसी स्थिति बनती है की वह सुलोचना के इस नए जॉब के प्रति सहज नहीं रह पाता।उसकी अपनी नौकरी की दिक्कतें उसके तनाव को और बढ़ा देती हैं। बीच में बेटे को लेकर एक ऐसा प्रसंग आता है कि दोनों एक-दूसरे को उसके लिए दोषी ठहराते हैं। मायके के सदस्य मदद के लिए आते हैं और एक सुर से फैसला करते हैं कि सुलोचना को यह काम छोड़ देना चाहिए। उसे अपने बेटे पर ध्यान देना चाहिए। परिवार के इस दबाव को सुलोचना शिद्दत से ठुकराती है और उनके सामने विरोध के बावजूद दफ्तर के लिए निकल जाती है।

यहीं यह साधारण सी फिल्म बड़ी और जरूरी हो जाती है। सुलोचना अपने इरादे में दृढ़ है।वह परिवार के विरोध का डटकर मुकाबला करती है। स्वतंत्र महिला के रूप में उस का आविष्कार होता है। यहीं सुलोचना उन लाखों-करोड़ों घरेलू महिलाओं की प्रतिनिधि चरित्र बन जाती है जो अपनी जिंदगी की सीमाओं से निकलकर कुछ करना चाहती हैं। स्वतंत्र होना चाहती हैं। स्वतंत्रता पति या परिवार से अलग होने में नहीं है। स्वतंत्रता अपने फैसले पर अडिग रहने की है और इसकी वजह से आई मुश्किलों को संजीदगी से निपटाने में है। 'तुम्हारी सुलु' की सुलोचना इस मायने में महिला सशक्तिकरण के प्रभाव में आई फिल्मों से दो कदम आगे निकल जाती है।

विद्या बालन ने सुलोचना के किरदार को अपेक्षित प्रभाव के साथ निभाया है। गौर करें तो विद्या बालन लगातार पिछले कई फिल्मों से ऐसे किरदार निभा रहीं हैं,जो फिल्म के केंद्र में रहती है। विद्या अपनी पीढ़ी की खास अभिनेत्री हैं उन्होंने 'द डर्टी पिक्चर' और 'कहानी' से अलग राह पकड़ी है। इस राह में वह कुछ फिल्मों के साथ गिरी हैं कुछ के साथ आगे बढ़ी हैं और और यह दिखाया है कि उन्हें सही स्क्रिप्ट और निर्देशन मिले तो वह नए मुकाम हासिल कर सकती हैं। 'तुम्हारी सुलु' में उनका व्यक्तित्व निखार कर आया है। इस फिल्म में मानव कौल ने उनके पति की भूमिका निभाते हुए शहरों के उन लाखों पतियों को अभिव्यक्ति दी है जो अपनी पत्नियों के एडवेंचर और प्रयोग में साथ रहते हैं। मानव कौल अशोक की भूमिका में अत्यंत सहज और प्रभावशाली हैं।

Monday, November 13, 2017

करीब करीब सिंगल होती है दिलों से मिंगल : प्रतिभा कटियार

करीब करीब सिंगल होती है दिलों से मिंगल
प्रतिभा कटियार 
प्रतिभा कटियार ने फेसबुक पर 'करीब करीब सिंगल' देखने के बाद एक टिप्‍पणी की थी। मुझे लगा कि उन्‍हें थोड़ा विस्‍तार से लिखना चाहिए। इस फिल्‍म के बारे में और भी सकारात्‍मक टिप्‍पणियां दिख रही हैं। अगर आप भी कुछ लिखें तो brahmatmaj@gmail.com पर भेज दें। लंबे समय के बाद आई यह फिल्‍म अलग तरीके से सभी को छू रही है।

संवादों के इस शोर मेंलोगों की इस भीड़ में कोई अकेलापन चुपके से छुपकर दिल में बैठा रहता है, अक्सर बेचैन करता है. जीवन में कोई कमी न होते हुए भी ‘कुछ कम’ सा लगता है. अपना ख्याल खुद ठीक से रख लेने के बावजूद कभी अपना ही ख्याल खुद रखने से जी ऊब भी जाता है. वीडियो चैटिंग, वाट्सअप मैसेज, इंटरनेट, दोस्त सब मिलकर भी इस ‘कुछ कम’ को पूर नहीं पाते. करीब करीब सिंगल उस ‘कुछ’ की तलाश में निकले दो अधेड़ युवाओं की कहानी है. जया और योगी यानी इरफ़ान और पार्वती.

योगी के बारे में फिल्म ज्यादा कुछ कहती नहीं हालाँकि योगी फिल्म में काफी कुछ कहते हैं. लेकिन जया के बहाने समाज के चरित्र की परतें खुलती हैं. दोस्त उनके अकेले होने का बिंदास फायदा उठाते हैं और पीछे उनका मजाक भी उड़ाते हैं. कभी उसे कोई बच्चों के साथ शौपिग के लिए भेजती है, कभी कोई बेबी सिटिंग के लिए पुकार लेती है. मित्र भाव से जया यह सब करती भी है लेकिन साथ ही अकेले होने को लेकर एक तानाकशी का रवैया भी महसूस करती रहती है. एक अकेली स्त्री किस तरह समाज के लिए स्टपनी की तरह समझी जाती है. जिसे हर कोई अपना काम निकालने के लिए कहीं भी इस्तेमाल करना चाहता है. और खूँटी समझकर उस पर अपनी सलाह टांगने के लिए. जिस दिन वो खूँटी होने से मना कर देती है स्टपनी होने से इंकार कर देती है उस दिन उस दिन इस समाज की शक्ल देखने लायक होती है.
फिल्म की नायिका जिन्दगी में जिन्दगी तलाश रही है लेकिन उदासी को ओढ़े नहीं फिर रही है. शिकायत का रंग उसकी जिन्दगी के रंग में घुला हुआ हो ऐसा भी नहीं है. वो विधवा है लेकिन वैधव्य की नियति में घिसट नही रही. उसने भीतर जिन्दगी सहेजी हुई है, जिन्दगी जीने की लालसा को खाद पानी दिया है लेकिन इस जीने की जिजीविषा में ‘कुछ भी’ ‘कैसा भी’ की हड़बड़ी नहीं है. एक एलिगेंस, एक ठहराव वो जीती है और इसी की तलाश में है.
एक रोज वो एक डेटिंग वेबसाईट पर लॉगिन करती है. एकदम से वीयर्ड कमेंट्स नमूदार होते हैं, जया हडबडा जाती है. लेकिन अगले रोज एक मैसेज मिलता है उसे जो उसे अलग सा लगता है. यहीं से शुरू होती है फिल्म. किसी कॉफ़ी शॉप का बिजनेस बढ़ाने के बहाने शुरू हुई मुलाकातें ट्रैवेल एजेंसी का बिजनेस बढ़ाने लगती हैं. डेटिंग वेबसाईट कितनी भरोसेमंद होती हैं पता नहीं लेकिन फिल्म उनके प्रति उदार है. योगी की तीन पुरानी प्रेमिकाओं से मिलने के बहाने दोनों निकल पड़ते हैं पहले ऋषिकेश, फिर अलवर और उसके बाद गंगटोक.

फिल्म एक साथ दो यात्राओं पर ले जाती है. रोजमर्रा की आपाधापी वाली जिन्दगी से दूर प्राकृतिक वादियों में नदियों की ठंडक, हवाओं की छुअन महसूस करते हुए भीतर तक एक असीम शान्ति से भरती जाती है जिसमें योगी का चुलबुला अंदाज़ अलग ही रंग भरता है. प्रेम का पता नहीं लेकिन दोनों साथ में अलग-अलग यात्राओं को जीने में कोई कसर नहीं छोड़ते खासकर जया.

फिल्म की कहानी और इस कहानी का कहन दोनों ही अलहदा है. वो जो अकेले होना हैफिल्म में उसका बिसूरना कहीं नहीं हैउसकी गहनता है. जो संवाद हैं वो अपने भीतर ढेर सारे अनकहे को सहेज रहे होते हैं. और वो जो ख़ामोशी है वो बहुत गहरे उतरती है. शब्दहीनता में कोई जादू गढ़ती. फिल्म दिल्ली देहरादूनऋषिकेशअलवगंगटोक घुमाते हुए ले जाती है अपने ही भीतर कहीं. यह एक खूबसूरत प्रेम कहानी है जो असल में प्रेम की यात्रा है. बेहद अनछुए लम्हों को सहेजते हुएअनकहे को उकेरते हुए.

किसी ताजा हवा के झोंके सी मालूम होती है यह फिल्म. सारे मौसम, सहरा, पहाड़, जंगल, फुहार सब महसूस होते हैं. योगी की शायरी के बीच सुनी जा सकती है वो खामोश कविता जिसे इंटरनेट पर पब्लिसिटी की दरकार नहीं है.

यह फिल्म असल में ख्वाबों पर यकीन करने की फिल्म हैजिन्दगी में आस्था बनाये रखने की फिल्म है. एक संवेदनशील और मौजूं विषय को सलीके से उठाया भी गया है और निभाया भी गया है जिसमें हास्य की मीठी फुहारें झरती रहती हैं. बस योगी के किरदार को थोड़ा बंद सा रखा गया हैमसलन एक स्त्री के अकेलेपन पर समाज के रवैये को तो दिखाया गया है लेकिन एक पुरुष किरदार के जरिये दूसरे पक्ष को भी सामने लाने का मौका जैसा गँवा दिया गया हो. या फिर योगी करते क्या हैं, 'मेरे पास बहुत पैसा है 'और पुरानी गर्लफ्रेंड द्वारा 'फटीचर'कहे जाने के बीच वो कहीं अटके हुए हैं जिसका भेद खुलता नहीं है.

फिल्म के कुछ दृश्य बेहद प्रभावी हैं. तारों भरे आसमान के नीचे नींद की गोद में लुढ़क जाना हो या नींद की गोलियों के असर में जया की पजेसिवनेस का उभरना या बात करते करते योगी का सो जाना. फिल्म का क्लाइमेक्स बिना किसी हड़बड़ी के अपने मुकाम तक पहुँचता है...एक रिदम में. वो रिदम फिल्म के अंतिम दृश्य के अनकहे संवाद तक बनी रहती है.


फिल्म की खूबसूरती को सिनेमेटोग्राफी ने खूब निखारा है. कुछ फ्रेम तो जेहन में ठहर से जाते हैं. फिल्म की एडिटिंग चुस्त हैएक भी दृश्य या संवाद बेवजह नहीं लगता. इरफ़ान हमेशा की तरह लाजवाब हैं जया के किरदार में पार्वती भी खूब खिली हैं. बिना किसी ‘आई लव यू’ के यह साफ सुथरी सी प्रेम कहानी दिल को छू लेती है. संगीत फिल्म को कॉम्प्लीमेंट करता है. खासकर वो जो था ख्वाब सा क्या कहें या जाने दें’ गाना जो सुनने में मधुर, मौजूं और प्रभावी पिक्चरजाइशेन बांधता है. फिल्म के संवाद काफी चुटीले और असरदार हैं.

Friday, November 10, 2017

फिल्‍म समीक्षा : करीब करीब सिंगल




फिल्‍म समीक्षा
करीब करीब सिंगल
-अजय ब्रह्मात्‍मज
अवधि- 125 मिनट
***1/2  साढ़े तीन स्‍टार
हिंदी में लिखते-बोलते समय क़रीब के क़ के नीचे का नुक्‍ता गायब हो जाता है। आगे हम इसे करीब ही लिखेंगे।
करीब करीब सिंगल कामना चंद्रा की लिखी कहानी पर उनकी बेटी तनुजा चंद्रा निर्देशित फिल्‍म है। नए पाठक जान लें कि कामना चंद्रा ने राज कपूर की प्रेमरोग लिखी थी। यश चोपड़ा की चांदनी और विधु विनोद चोपड़ा की 1942 ए लव स्‍टोरी के लेखन में उनका मुख्‍य योगदान रहा है। इस फिल्‍म की निर्माताओं में इरफान की पत्‍नी सुतपा सिकदर भी हैं। एनएसडी की ग्रेजुएट सुतपा ने फिल्‍में लिखी हैं। इरफान की लीक से हटी फिल्‍मों में उनका अप्रत्‍यक्ष कंट्रीब्‍यूशन रहता है। इस फिल्‍म की शूटिंग में इरफान के बेटे ने भी कैमरे के पीछे हिस्‍सा लिया था। तात्‍पर्य यह कि करीब करीब सिंगल कई कारणों से इसके अभिनेता और निर्देशक की खास फिल्‍म है। यह खासियत फिल्‍म के प्रति तनुजा चंद्रा और इरफान के समर्पण में भी दिखता है। फिल्‍म के प्रमोशन में इरफान की खास रुचि और हिस्‍सेदारी सबूत है।
इस फिल्‍म की पहली खूबी इरफान हैं। इरफान अपनी पीढ़ी के अलहदा अभिनेता हैं। रुटीन से जल्‍दी ही तंग आ जाने वाले इरफान लगातार ऐसी फिल्‍म और स्क्रिप्‍ट की तलाश में है,जो उनकी शख्सियत और मिजाज के करीब हो। दूसरे इसे उनकी सामा कह सकते हैं। मैं इसे उनकी खसियत मानता हूं कि वे हिंदी फिल्‍मों के पारंपरिक अभिनेता हैं। जब भी उन्‍हें हिंदी फिल्‍मों के प्रचलित किरदारों के खांचे में डालने की कोशिश की गई है,तब उनके साथ फिल्‍म का भी नुकसान हुआ है। विदेशी फिल्‍मों में मिली सफलता और हिंदी फिल्‍मों की कामयाब चपलता से उन्‍हें खास कद और स्‍पेस मिला है। वे अब इसका इस्‍तेमाल कर रहे हैं। -मदारी,हिंदी मीडियम और करीब करीब सिंगल उनके इसी प्रयास के नतीजे हैं।
इस फिल्‍म की दूसरी खूबी पार्वती हैं। मलयाली फिल्‍मों की सफल अभिनेत्री पार्वती को हिंदी फिल्‍मों के दर्शकों ने नहीं देखा है। अपने अंदाज,हाव-भाव और अभिनय से वह हिंदी फिल्‍मों में अनदेखे किरदार जया में जंचती हैं। हिंदी फिल्‍मों की परिचित और नॉपुलर अभिनेत्रियों में कोई भी जया के किरदार में नहीं जंचती। अगर थोड़ी कम पॉपुलर अभिनेत्री को इरफान के साथ में रखते तो फिल्‍म की माउंटिंग ही कमजोर हो जाती। हिंदी फिल्‍मों में कास्टिंग बहुत मायने रखती है। खास कर करीब करीब सिंगल जैसी फिल्‍मों की नवीनता के लिए ऐसी कास्टिंग जरूरी होती है। जया के रूप में पार्वती को देखते हुए ऐसा नहीं लगता कि हम रंदा मार कर सुडौल की गई अभिनेत्री को पर्दे पर देख रहे हैं। ऐसी अभिनेत्रियां किरदारों में नहीं दिख पातीं। पार्वती ने अपनी जिम्‍मेदारी सहजता से निभाई है। फिल्‍म के खास दृश्‍यों में उनका ठहराव तो हिंदी फिल्‍मों की पॉपुलर अभिनेत्रियों में कतई नहीं दिखता। फिल्‍म के एक खास दृश्‍य में पार्वती के चेहरे पर अनेक भाव एक-एक कर आते और जाते हैं और हर भाव के साथ उनकी अभिव्‍यक्ति बदलती जाती है। कैमरा उनके चेहरे पर टिका रहता है। कोई कट या इंटरकट नहीं है।
करीब करीब सिंगल मैच्‍योर लव स्‍टोरी है। मैच्‍युरिटी के साथ ही यह कमिंग ऑफ एज स्‍टोरी भी है। फिल्‍म की शुरूआत में हम जिन किरदारों(योगी और जया) से मिलते हैं,वे फिल्‍म के अंत तक नई शख्सियतों में तब्‍दील हो चुके होते हैं। बदलते तो हम हर उम्र में हैं। इस फिल्‍म में योगी पहले फ्रेम से ही खिलंदड़े व्‍यक्ति के रूप में पेश आते हैं। लाते,जातें और लातों का प्रसंग मजेदार है। कोई वाक्पटु अभिनेता ही इसे व्‍यक्‍त कर सकता था। बहरहाल,योगी चालू,स्‍मार्ट,बड़बोला अज्ञैर हावी हाने वाला व्‍यक्ति है। वह जया पर भी हावी होता है और उसे बरगलाने की कोशिश करता है। अने मिजाज से वह जया का खिझाता है,लेकिन अनजाने में उसे रिझाता भी जाता है। उसकी संगत में जया की ख्‍वाहिशें हरी होती हैं। वह अपनी इच्‍छाओं को पनपते देखती है और फिर ऐसे फैसले लेती है,जो अमूमन भारतीय औरतें नहीं ले पाती हैं। स्‍वतंत्र व्‍यक्त्त्वि के रूप में उसका परिवर्तन फिल्‍म का बेहद खूबसूरत पक्ष है।
करीब करीब सिंगल हिंदी की रेगुलर फिल्‍मों से अलग हैं। इसे दर्शकों की तवज्‍जो चाहिए है। यह फिल्‍म आपकी नई दोस्‍त की तरह है। ध्‍यान देने पर ही आप उसकी खूबसूरती देख-समझ पाएंगे। फिल्‍म इतनी सरल है कि साधारण लगती है,लेकिन अंतिम प्रभाव में यह फिल्‍म सुकून देती है। एक नई स्‍टोरी से अभिभूत करती है। इर फान और पार्वती के साथ तनुजा चंद्रा भी बधाई की पात्र हैं।
(माफ करें इस फिल्‍म का हिंदी पोस्‍टर नहीं मिल पाया,इसलिए...)

Wednesday, November 1, 2017

दरअसल : हीरोइनें हैं बराबर और आगे



दरअसल...
हीरोइनें हैं बराबर और आगे
-अजय ब्रह्मात्‍मज
हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री में पुरुषों के वर्चस्‍व की बात की जाती है। सभी मानते और जानते हैं कि हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री मेल डोमिनेटेड है....जैसे कि पूरा समाज है। यहां हीरो को ज्‍यादा पैसे मिलते हैं। फिल्‍मों के हिट होने का श्रेय हीरो ही ले जाता है। हीरोइनों के बारे में तभी अलग से लिखा और श्रेय दिया जाता है,जब फिल्‍म हीरोइन ओरियेंटेड होती है। यही धारणात्‍मक सच्‍चाई है।
पिछले दिनों एक ट्रेड मैग्‍जीन ने पिछले नौ सालों में देश की भिन्‍न टेरिटरी में सर्वाधिक लोकप्रिय रहे स्‍टारों की लिस्‍ट छापी है। उसे गौर सेपढ़ें तो रोचक तथ्‍य सामने आते हैं1 देश में मुंबई,दिल्‍ली-यूपी,ईस्‍ट पंजाब,सीपी,सी आई,राजस्‍थान,निजाम एपी,मैसूर,वेस्‍ट बंगाल,बिहार-झारखंड,असम,ओडिसा और टीएनके 13 टेरिटरी हैं। इनमें कलेक्‍शन के हिसाब से सबसे बड़ी टेरिटरी मुंबई है। मुंबई में आमिर खान सबसे अधिक कलेक्‍शन के साथ नंबर वन पर हैं। नौ सालों में उनकी छह फिल्‍में रिलीज हुईं और उनसे 4 अरब 10 करोड़ का कलेक्‍शन हुआ। हालांकि कुल कलेक्‍शन में शाह रुख खान आगे रहे,लेकिन इस दरम्‍यान उनकी 11 फिल्‍में रिलीज हुईं। प्रति फिल्‍म कलेक्‍शन के अनुपात में आमिर खान अव्‍वल रहे। सलमान खान,रितिक रोशन और वरुण धवन उनके नीचे रहे।
इन नौ सालों में आमिर और शा रुख के कलेक्‍शन के बराबर या ज्‍यादा आंकड़ा लेकर हीरोइनें आईं। कट्रीना कैफ,अनुष्‍का शर्मा,करीना कपूर खान,दीपिका पादुकोण और सानोक्षी सिन्‍हा की फिल्‍मों ने 4 से 5 अरब का कलेक्‍शन किया। अफसोस की बात है कि इस कलेक्‍शन और कामयाबी में हीरोइनों के योगदान को रेखांकित ही नहीं किया जाता। फिल्‍मों की संख्‍या के लिहाज से देखें तो आमिर खान ने 6,सलमान खान ने 15,शाह रुख खान ने 11,रितिक रोशन ने 8 और वरुण धवन की 9 फिल्‍में प्रदर्शित हुईं। अब जरा हीरोइनों की फिल्‍मों की संख्‍या देख लें। करीना कपूर खान की 18,कट्रीना कैफ की 15,दीपिका पादुकोण की 17,सोनाक्षी सिन्‍हा की 15 और अनुष्‍का शर्मा की 14 फिल्‍में आईं।
फिल्‍मों की संख्‍या और कलेक्‍शन के लिहाज से हीरोइनें कतई पीछे नहीं हैं। फिर भी हिंदी फिल्‍मों की सक्‍सेस स्‍टोरी में उनका महत्‍व नहीं जोड़ा जाता। वास्‍तव में हमें नए मिजाज के ट्रेड पंडितों और फिल्‍मों की कामयाबी के व्‍याख्‍याकारों की जरूरत है। हमें नए तरीके से बॉक्‍स आफिस का विश्‍लेषण करना होगा। स्‍वयं हीरोइनों का इस दिशा में प्रयास करना चाहिए। कोई दुखी हो या नाराज...उन्‍हें अपने इंटरव्‍यू में अपनी कामयाबी और फिल्‍मों के कलेक्‍शन का उल्‍लेख करना चाहिए। निर्माता-निर्देशकों को सिर्फ पर्दे पर हीरो के पहले हीरोइनों का नाम देकर अपने कर्तव्‍य की इतिश्री नहीं करनी चाहिए। उन्‍हें अपनी हीरोइनों को भी सिंहासन पर बिठाने की आदत पड़े।
यह सिर्फ कहने की बात नहीं है कि हीरोइनें हीरो के समकक्ष आ चुकी है। वे उनके बराबर और आगे का काम कर रही हैं। अब इसे बार-बार रेखांकित और उल्लिखित करने का समय आ गया है। इस कार्य में हीरोइनों को अग्रणी भूमिका निभानी होगी। उन्‍हें अपना हक खुद ही लेना होगा। तभी उन्‍हें अपने हीरो के समकक्ष पारिश्रमिक मिल पाएगा।
ट्रेड मैग्‍जीन के सवेक्षण में पूरे देश में हीरो में आमिर खान और हीरोइन में अनुष्‍का शर्मा अव्‍वल रहे। केवल बिहार-झारखंड में राष्‍ट्रीय रुचि से अलग सलतान खान और सोनाक्षी सिन्‍हा अव्‍वल रहे। है न यह रोचक विक्षेप।
(प्रिय मित्रों और पाठको...फिलहाल यह मेरा आखिरी कॉलम है। हर आरंभ का एक अंत होता है। विराम के बाद नया अध्‍याय शुरू होता है। आप सभी के स्‍नेह और प्‍यार का मैं कृतज्ञ हूं। अलविदा।)