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Wednesday, September 13, 2017

रोजाना : विश्वास जगाती लड़कियां

रोजाना
 विश्वास जगाती लड़कियां
- अजय ब्रह्मात्मज 
आठवें जागरण फिल्म फेस्टिवल के तहत पिछले दिनों रांची और जमशेदपुर में अविनाश दास की फिल्म अनारकली ऑफ आरा दिखाई गई। रांची और जमशेदपुर दोनों ही जगह के शो में भीड़ उमड़ी। हॉल की क्षमता से अधिक दर्शकों के आने से ऐसी स्थिति बन गई कि कुछ दर्शकों को को अंदर नहीं आने दिया गया। रांची और जमशेदपुर के शो हाउसफुल रहे। दोनों शहरों में शो के बाद फिल्म के निर्देशक अविनाश दास और हीरामन की भूमिका निभा रहे इश्‍तेयाक खान से दर्शकों ने सीधी बातचीत की। उन्‍होंने अपनी जिज्ञासाएं रखीं। कुछ सवाल भी किए। अच्‍छी बात रही कि दोनों शहरों में लड़कियों ने सवाल-जवाब के सत्र में आगे बढ़ कर हिस्‍सेदारी की।
अनारकली ऑफ आरा के निर्देशक अविनाश दास के लिए दोनों शहरों के शोखास मायने रख्‍ते थे। मीडिया के उनके दोस्‍त तो वाकिफ हैं। अविनाश दास ने रांची शहर से अपने करिअर की शुरूआत की थी। उन्‍होंने प्रभात खबर में तत्‍कालीन संपादक हरिवंश के मार्गदर्शन में पत्रकारिता और दुनियावी चेतना का ककहरा सीखा। इसी शहर में उनकी पढ़ाई-लिखाई भी हुई। उत्‍तर भारत खास कर बिहार में सातवें-आठवें दशक तक यह चलन था कि अपनी संतान ढंग से पढ़-लिख नहीं रही हो तो उसे किसी कड़क और सख्‍त किस्‍म के रिश्‍तेदार के पास पढ़ने के लिए भेज दिया जाता था। रिश्‍तेदारों पर इतना यकीन रहता था कि वे अपने अभिभावकत्‍व में बच्‍चे का भविष्‍य संवार देंगे। अविनाश्‍दास को दरभंगा से उनके माता-पिता ने उन्‍हें रांची में मामा के पास भेज दिया था। अविनाश के लिए वह भावुक शो था,क्‍योंकि उनकी बहनें और मामी उस शो में मौजूद थीं। भावनाओं का उद्रेकदूसरी तरफ भी दिख रहा था। अविनाश के स्‍कूल और पत्रकारिता के समय के दोस्‍त भी आए थे।
किसी भी उत्‍तर भारतीय के लिए यह गर्व का विषय हो सकता है। एक फील्‍ड में करिअर के उत्‍कर्ष पर पहुंच कर वह फिल्‍म निर्देशन का सपना पाले और उसे निश्चित समय में पूरा भी कर ले। अनिाश दास को अपनी यात्रा के बारे में खुद लिखना चाहिए। वे लिख सकते हैं। बहरहाल,हम बाते कर रहे थे लड़कियों के सवालों और प्रतिक्रियाओं की। उन सभी को अनारकली की लड़ाई और जीत में अपनी जीत दिख रही थी। वे खुश थीं कि अनारकली ने वीसी चौहान को ललकारा और किसी हिरणी की तरह कुलांचे भरती हुई चलीं। कई लड़कियों केसवाल थे कि परिवार और प्रशासन से समर्थन न मिले तो वे क्‍या करें ? कैसे अपनी प्रतिष्‍ठा बनाए रखें?
रांची और जमशेदपुर जैसे शहरों की लड़कियां अपने सवालों से यह विश्‍वास जगाने में सफल रहीं कि वे बदल चुकी हैं। वे बेहतरीन और हीरोइन ओरिएंटेड सिनेमा के लिए लालायित हैं।


2 comments:

Pushpendra Dwivedi said...

anarkali of ara movie achhi thi umeed hai darshakon ko pasand ayee hogi





http://www.pushpendradwivedi.com/%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A5%87-%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A5%87-%E0%A4%B9%E0%A4%AE%E0%A4%A8%E0%A5%87-%E0%A4%87%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A5%98-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%A4%E0%A5%8B%E0%A4%B9/

Amit Kumar Jha said...

अविनाश जी का सचमुच एक प्रेरणा है। यदि वे अपनी आत्मकथा लिखते हैं, तो सचमुच वह हम सब के लिए एक मार्गदर्शक पुस्तक होगी।

मैंने ये सच की दुकान खोली है.... कभी फुर्सत मिले तो जरूर आइए.....